विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.17 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४५७ 250 115558 674878 384171 2026-08-29T07:32:12Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674878 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>यह पृष्ठ (पृष्ठ ४९८) तैयार हो चुका है। कृपया इसके आगे का भाग (पृष्ठ ४९९ या अगला पेज) साझा करें, ताकि मैं उसे भी तुरंत सही फॉर्मेट और शुद्ध वर्तनी के साथ तैयार कर दूँ।<noinclude></noinclude> 52mcajo2c4jl83laevbx8uzgs5qdtn3 पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४५८ 250 115559 674880 384172 2026-08-29T07:37:58Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674880 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४३८|प्रसाद वाङ्मय|}} मातृगुप्त — निस्सन्देह। अनन्तदेवी के इशारे पर कुमारगुप्त नाच रहे हैं। अद्भुत पहेली है! धातुसेन — पहेली! यह भी रहस्य ही है। पुरुष है कुतूहल और प्रश्न; और स्त्री है विश्लेषण, उत्तर और सब बातों का समाधान। पुरुष के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देने के लिए वह प्रस्तुत है। उसके कुतूहल — उसके अभावों को परिपूर्ण करने का उष्ण प्रयत्न और शीतल उपचार! अभागा मनुष्य सन्तुष्ट है — बच्चों के समान। पुरुष ने कहा — 'क', स्त्री ने अर्थ लगा दिया — 'कौवा'; बस, वह रटने लगा। विषय-विह्वल वृद्ध सम्राट, तरुणी की आकांक्षाओं के साधन बन रहे हैं। काले मेघ क्षितिज में एकत्र हैं, शीघ्र ही अन्धकार होगा। परन्तु आशा का केन्द्र ध्रुवतारा एक युवराज 'स्कन्द' है। निर्मम शून्य आकाश में शीघ्र ही अनेक वर्ण के मेघ रंग भरेंगे। एक विकट अभिनय का आरम्भ होनेवाला है। तुम भी सम्भवतः उसके अभिनेताओं में से एक होगे। सावधान! सिंहल तुम्हारे लिये प्रस्तुत है। (प्रस्थान) मातृगुप्त — विचक्षण उदार कुमार! (प्रस्थान) {{c|'''दृश्यान्तर'''}} {{c|'''चतुर्थ दृश्य'''}} {{c|[कुसुमपुर में अनन्तदेवी का सुसज्जित प्रकोष्ठ]}} अनन्तदेवी - जया! रात्रि का द्वितीय प्रहर तो व्यतीत हो रहा है, अभी भटार्क के आने का समय नहीं हुआ? जया — स्वामिनी! आप बड़ा भयानक खेल खेल रही हैं। अनन्तदेवी — क्षुद्र हृदय — जो चूहे के शब्द से भी शंकित होते हैं, जो अपनी साँस से ही चौंक उठते हैं, उनके लिये उन्नति का कण्टकित मार्ग नहीं है। महत्त्वाकांक्षा का दुर्गम स्वर्ग उनके लिये स्वप्न है। जया — परन्तु राजकीय अन्तःपुर की मर्यादा बड़ी कठोर अथच फूल से कोमल-कोमल है। अनन्तदेवी — अपनी नियति का पथ मैं अपने पैरों चलूँगी, अपनी शिक्षा रहने दे। [जया कपाट के समीप कान लगाती है, संकेत होता है, गुप्तद्वार खुलते ही भटार्क सामने उपस्थित होता है] भटार्क — महादेवी की जय हो! अनन्तदेवी — परिहास न करो मगध के महाबलाधिकृत! देवकी के रहते किस साहस से तुम मुझे महादेवी कहते हो?<noinclude></noinclude> 3swaie13cqh587prbdkjoh5a7gmwrvm पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४५९ 250 115560 674881 384173 2026-08-29T07:42:00Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674881 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य|४३९}} भटार्क — हमारा हृदय कह रहा है, और आये दिन साम्राज्य की जनता, प्रजा सभी कहेगी। अनन्तदेवी — मुझे विश्वास नहीं होता। भटार्क — महादेवी! कल सम्राट् के समक्ष जो विद्रूप और व्यंग्य-बाण मुझपर बरसाए गये हैं, वे अन्तस्तल में गड़े हुए हैं। उन्हें निकालने का प्रयत्न नहीं करूँगा, वे ही भावी विप्लव में सहायक होंगे। चुभ-चुभकर वे मुझे सचेत करेंगे। मैं उन पथ-प्रदर्शकों का अनुसरण करूँगा। बाहुबल से, वीरता से और अनेक प्रचण्ड पराक्रमों से ही मुझे मगध के महाबलाधिकृत का माननीय पद मिला है, मैं उस सम्मान की रक्षा करूँगा। महादेवी! आज मैंने अपने हृदय के मार्मिक रहस्य का अकस्मात् उद्घाटन कर दिया है। परन्तु वह भी जान-बूझ कुछ समझकर। मेरा हृदय शूलों के लोहफलक सहने के लिए है, क्षुद्र विष-वाक्य-बाण के लिए नहीं। अनन्तदेवी — तुम वीर हो भटार्क! यह तुम्हारे उपयुक्त ही है। देवकी का प्रभाव जिस उग्रता से बढ़ रहा है उसे देखकर मुझे पुरगुप्त के जीवन में शंका हो रही है। महाबलाधिकृत, दुर्बल माता का हृदय उसके लिये आज ही से चिन्तित है, विकल है। सम्राट् की मति एक-सी नहीं रहती, वे अव्यवस्थित और चंचल हैं। इस अवस्था में वे विलास की अधिक मात्रा से केवल जीवन के जटिल सुखों की गुत्थियाँ सुलझाने में व्यस्त हैं। भटार्क — मैं सब समझ रहा हूँ। पुष्यमित्रों के युद्ध में मुझे सेनापति की पदवी नहीं मिली, इसका कारण भी मैं जानता हूँ। मैं दूध पीनेवाला शिशु नहीं हूँ और यह मुझे स्मरण है कि पृथ्वीसेन के विरोध करने पर भी आपकी कृपा से मुझे महाबलाधिकृत का पद मिला है। मैं कृतघ्न नहीं हूँ, महादेवी! आप निश्चिन्त रहें। अनन्तदेवी — पुष्यमित्रों के युद्ध में भेजने के लिये मैंने भी कुछ समझकर उद्योग नहीं किया। भटार्क! क्रान्ति उपस्थित है, तुम्हारा यहाँ रहना आवश्यक है। भटार्क — क्रान्ति के सहसा इतने समीप उपस्थित होने के तो कोई लक्षण मुझे नहीं दिखाई पड़ते। अनन्तदेवी — राजधानी में आनन्द-विलास हो रहा है, और पारसीक मदिरा की धारा बह रही है। इनके स्थान पर रक्त की धारा बहेगी! आज तुम कालागुरु के गन्ध-धूम से सन्तुष्ट हो रहे हो, कल इन उच्च सौध-मन्दिरों में महापिशाची की विप्लव-ज्वाला धधकेगी! उस चिरायँध की उत्कट गन्ध असह्य होगी। तब तुम भटार्क! उस आगामी खण्ड-प्रलय के लिए प्रस्तुत हो कि नहीं? (ऊपर देखती हुई) उहूँ, प्रपञ्चबुद्धि की कोई बात आज तक मिथ्या नहीं हुई। भटार्क — कौन प्रपञ्चबुद्धि? अनन्तदेवी — सूची-भेद्य अन्धकार में छिपनेवाली रहस्यमयी नियति का —<noinclude></noinclude> 1rh6ki8fvgvcj4706ogdo5la1c0ahrw पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४६१ 250 115562 674882 384175 2026-08-29T07:52:38Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674882 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य|४४१}} भटार्क — एक दुर्भेद्य नारी-हृदय में विश्व-प्रहेलिका का रहस्य-बीज है। ओह, कितनी साहसशीला स्त्री है! देखूँ, गुप्त-साम्राज्य के भाग्य की कुंजी यह किधर घुमाती है। परन्तु इसकी आँखों में कामपिपासा के संकेत अभी उबल रहे हैं। अतृप्ति की चंचल प्रवंचना कपोलों पर रक्त होकर क्रीड़ा कर रही है। हृदय में श्वासों की गरमी विलास का सन्देश वहन कर रही है। परन्तु... अच्छा चलूँ, यह विचार करने का स्थान नहीं है। [गुप्तद्वार से जाता है] {{c|'''दृश्यान्तर'''}} {{c|'''पंचम दृश्य'''}} {{c|[अन्तःपुर का द्वार]}} शर्वनाग — (टहलता हुआ) कौन-सी वस्तु देखी? किस सौन्दर्य पर मन रीझा? कुछ नहीं, सदैव इसी सुन्दरी खड्ग-लता की प्रभा पर मैं मुग्ध रहा। मैं नहीं जानता कि और भी कुछ सुन्दर है। वह मेरी स्त्री — जिसके अभावों का कोश खाली ही, जिसकी भर्त्सनाओं का भण्डार अक्षय है, उससे मेरी अन्तरात्मा काँप उठती है। आज मेरा पहरा है। घर से जान छूटी, परन्तु रात बड़ी भयानक है। चलूँ, अपने स्थान पर बैठूँ। सुनता हूँ कि परमभट्टारक की अवस्था अत्यन्त शोचनीय है — जाने भगवान्... :भटार्क — (प्रवेश करते हुए) कौन? :शर्वनाग — नायक शर्वनाग। :भटार्क — कितने सैनिक हैं? :शर्वनाग — पूरा एक गुल्म। :भटार्क — अन्तःपुर से कोई आज्ञा मिली है? :शर्वनाग — नहीं। :भटार्क — तुमको मेरे साथ चलना होगा। :शर्वनाग — मैं प्रस्तुत हूँ, कहाँ चलूँ? :भटार्क — महादेवी के द्वार पर। :शर्वनाग — वहाँ मेरा क्या कर्तव्य होगा? :भटार्क — कोई न तो भीतर जाने पाये और न भीतर से बाहर आने पाये। शर्वनाग — (चौंककर) इसका तात्पर्य? भटार्क — (गम्भीरता से) तुमको महाबलाधिकृत की आज्ञा पालन करनी चाहिये। शर्वनाग — तब भी, क्या स्वयं महादेवी पर नियन्त्रण रखना होगा?<noinclude></noinclude> ksm65a0djir7wi5tqc1ns6r4kb6a5fp पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४६२ 250 115563 674883 384176 2026-08-29T07:56:06Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४४२|प्रसाद वाङ्मय|}} भटार्क : हाँ। शर्वनाग : ऐसा! [कोलाहल, भीषण उल्कापात] भटार्क : ओह, ठीक समय हो गया! अच्छा, मैं अभी आता हूँ। [द्वार खोलकर भटार्क भीतर जाता है। रामा का प्रवेश] रामा : क्यों, तुम आज यहाँ हो? शर्वनाग : मैं, मैं यहाँ हूँ, तुम कैसे? रामा : मूर्ख! महादेवी सम्राट् को देखना चाहती हैं, परन्तु उनके आने में बाधा है। गोबर-गणेश! तू कुछ कर सकता है? शर्वनाग : मैं क्रोध से गरजते हुए सिंह की पूँछ उखाड़ सकता हूँ; परन्तु सिंहवाहिनी! तुम्हें देखकर मेरे देवता कूच कर जाते हैं। रामा : (पैर पटककर) तुम कीड़े से भी अधम हो। शर्वनाग : न-न-न-न, ऐसा न कहो, मैं सब कुछ हूँ। परन्तु मुझे घबराओ मत, समझाकर कहो! मुझे क्या करना होगा? रामा : महादेवी देवकी की रक्षा करनी होगी, समझा? क्या आज इस सम्पूर्ण गुप्त-साम्राज्य में कोई ऐसा प्राणी नहीं, जो उनकी रक्षा करे? शत्रु अपने विषैले डंक और तीखी दाढ़ें सँवार रहे हैं। पृथ्वी के नीचे कुमन्त्रणाओं का क्षीण भूकम्प चल रहा है। शर्वनाग : यही तो मैं भी कभी-कभी सोचता था। परन्तु... रामा : तुम, जिस प्रकार हो सके, महादेवी के द्वार पर जाओ। मैं जाती हूँ। (जाती है) [एक सैनिक का प्रवेश] सैनिक : नायक! न जाने क्यों हृदय दहल उठा है, जैसे सनसन करती हुई, डर से, यह आधी रात खिसकती जा रही है! पवन में गति है, परन्तु शब्द नहीं। 'सावधान' रहने का शब्द मैं चिल्लाकर कहता हूँ, परन्तु मुझे ही सुनाई नहीं पड़ता है। यह सब क्या है, नायक? शर्वनाग : तुम्हारी तलवार कहीं भूल तो नहीं गयी है? सैनिक : म्यान हल्की-सी लगती है, टटोलता हूँ पर... शर्वनाग : तुम घबराओ मत, तीन साथियों को साथ लेकर घूमो, सबको सचेत रखो। हम इसी शिला पर हैं, कोई डरने की बात नहीं। [सैनिक जाता है, फाटक खोलकर पुरगुप्त निकलता है, पीछे-पीछे भटार्क और सैनिक] पुरगुप्त : नायक शर्वनाग!<noinclude></noinclude> 37lsreiqa81103vr1t75chg5cckqlyb पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४६३ 250 115564 674884 384177 2026-08-29T08:10:38Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य|४४३}} शर्वनाग : जय हो कुमार की! क्या आज्ञा है? पुरगुप्त : तुम साम्राज्य की शिष्टता सीखो। शर्वनाग : दास चिर-अपराधी है, कुमार! (सिर झुका लेता है) भटार्क : इन्हें महादेवी के द्वार पर जाने की आज्ञा दीजिये, ये विश्वस्त सैनिक वीर हैं। पुरगुप्त : जाओ, तुम महादेवी के द्वार पर। जैसा महाबलाधिकृत ने कहा है, वैसा करना। शर्वनाग : जैसी आज्ञा। (अपने सैनिकों को साथ लेकर जाता है। दूसरे नायक और सैनिक परिक्रमण करते हैं) भटार्क : कोई भी पूछे तो यह मत कहना कि सम्राट् का निधन हो गया है; हाँ, बढ़ी हुई अस्वस्थता का समाचार बतलाना और सावधान, कोई भी — चाहे वह कुमारामात्य ही क्यों न हों — भीतर न आने पावें। तुम यही कहना कि परमभट्टारक अत्यन्त विकल हैं, किसी से मिलना नहीं चाहते, समझा? नायक : अच्छा... [दोनों जाते हैं, फाटक बन्द होता है] नायक : (सैनिकों से) आज बड़ी विकट अवस्था है, भाइयो, सावधान! [कुमारामात्य पृथ्वीसेन, महादण्डनायक और महाप्रतिहार का प्रवेश] महाप्रतिहार : नायक, द्वार खोलो, हम लोग परमभट्टारक का दर्शन करेंगे। नायक : प्रभु! किसी को भीतर जाने की आज्ञा नहीं है। महाप्रतिहार : (चौंककर) आज्ञा! किसकी आज्ञा? अबोध, तू नहीं जानता — सम्राट् के अन्तःपुर पर स्वयं सम्राट् का भी उतना अधिकार नहीं जितना महाप्रतिहार का? शीघ्र द्वार उन्मुक्त कर। नायक : दण्ड दीजिये प्रभु, परन्तु द्वार न खुल सकेगा। महाप्रतिहार : तू क्या कह रहा है? नायक : जैसी भीतर से आज्ञा मिली है। कुमारामात्य : (पैर पटककर) ओह! महादण्डनायक : विलम्ब असह्य है, नायक! द्वार से हट जाओ। महाप्रतिहार : मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम अन्तःपुर से हट जाओ, युवक! नहीं तो तुम्हें पदच्युत करूँगा। नायक : यथार्थ है। परन्तु मैं महाबलाधिकृत की आज्ञा से यहाँ हूँ, और मैं उन्हीं के अधीनस्थ सैनिक हूँ। महाप्रतिहार के अन्तःपुर-रक्षकों में मैं नहीं हूँ। महाप्रतिहार : क्या अन्तःपुर पर भी सैनिक नियन्त्रण है? पृथ्वीसेन!<noinclude></noinclude> ico2sifm6s6ttyghsupzeltjml01nmb पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/४६४ 250 115565 674885 384178 2026-08-29T08:13:42Z Somya Shaw 6839 674885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="कृति तिवारी" /></noinclude>{{rh|४४४|प्रसाद वाङ्मय|}} पृथ्वीसेन : इसका परिणाम भयानक है। अन्तिम शय्या पर लेटे हुए सम्राट् की आत्मा को कष्ट पहुँचाना होगा। महाप्रतिहार : अच्छा (कुछ देखकर) हाँ, शर्वनाग कहाँ गया? नायक : उसे महाबलाधिकृत ने दूसरे स्थान पर भेजा है। महाप्रतिहार : (क्रोध से) मूर्ख शर्वनाग! महादण्डनायक : (कान लगाकर अन्तःपुर का क्षीण क्रन्दन सुनते हुए) क्या सब शेष हो गया? हम अवश्य भीतर जायेंगे। [तीनों तलवार खींच लेते हैं, नायक भी सामने आ जाता है, द्वार खोलकर पुरगुप्त और भटार्क का प्रवेश] पृथ्वीसेन : भटार्क! यह सब क्या है? भटार्क : (तलवार खींचकर सिर से लगाता हुआ) परमभट्टारक राजाधिराज पुरगुप्त की जय हो! माननीय कुमारामात्य, महादण्डनायक और महाप्रतिहार, साम्राज्य के नियमानुसार, शस्त्र-अर्पण करके, परमभट्टारक का अभिवादन कीजिए। [तीनों एक-दूसरे का मुँह देखते हैं] महाप्रतिहार : तब क्या सम्राट् कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य अब संसार में नहीं हैं? भटार्क : नहीं। पृथ्वीसेन : परन्तु उत्तराधिकारी युवराज स्कन्दगुप्त? पुरगुप्त : चुप रहो। तुम लोगों को बैठकर व्यवस्था नहीं देनी होगी। उत्तराधिकारी का निर्णय स्वयं स्वर्गीय सम्राट् कर गये हैं। पृथ्वीसेन : परन्तु प्रमाण? पुरगुप्त : क्या तुम्हें प्रमाण देना होगा? पृथ्वीसेन : अवश्य। पुरगुप्त : महाबलाधिकृत! इन विद्रोहियों को बन्दी करो। [भटार्क आगे बढ़ता है] पृथ्वीसेन : ठहरो भटार्क! तुम्हारी विजय हुई, परन्तु एक बात... पुरगुप्त : आधी बात भी नहीं, बन्दी करो। पृथ्वीसेन : कुमार! तुम्हारे दुर्बल और अत्याचारी हाथों में गुप्त-साम्राज्य का राजदण्ड टिकेगा नहीं। सम्भवतः तुम साम्राज्य पर विपत्ति का आवाहन करोगे। इसलिये कुमार! इससे विरत हो जाओ। पुरगुप्त : महाबलाधिकृत! क्यों विलम्ब करते हो? भटार्क : आप लोग शस्त्र रखकर आज्ञा मानिये। महाप्रतिहार : आततायी! यह स्वर्गीय आर्य चन्द्रगुप्त का दिया हुआ खड्ग तेरी आज्ञा से नहीं रखा जा सकता। उठा अपना शस्त्र और अपनी रक्षा कर।<noinclude></noinclude> t76c3dct4p59qvdi27g0k4ruw2njaim पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४१ 250 159732 674800 674613 2026-08-28T16:15:13Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674800 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१९३. भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर'''<ref>गांधीजीने बम्बईमें भायखला कांग्रेस कमेटीके तत्त्वावधानमें इतवारकी रातको मदनपुरामें बुनकरोंको एक सभामें भाषण किया था।</ref>}}}} {{Right|१७ जुलाई, १९२१}} '''महात्मा गांधीने कहा : मैं इसके पहले भी मदनपुरा आ चुका हूँ। दो साल पहले मैं यहाँ आपका काम देखने आया था। लेकिन यह सभा एक बिलकुल दूसरे ही उद्देश्यसे बुलाई गई है। पिछली बार जब मैं यहाँ आया था, तब खिलाफतके सवालको लेकर कोई आशंका नहीं थी और हमें अपने शासकोंसे न्याय पानेका पक्का भरोसा था; क्योंकि ग्रेट ब्रिटनके प्रधान मन्त्रीने न्याय करने का वायदा किया था। लेकिन बावजूद उसके ब्रिटिश सरकारने मुसलमानोंको काफी नुकसान पहुँचाया। और अब जबतक मुसलमानोंकी शिकायतें दूर नहीं हो जाती तबतक हमारे दिमागको चैन नहीं मिल सकता। सरकारने पंजाबके साथ जो-कुछ किया है, उसको लेकर भी जनता बहुत चिन्तित है। भारतीय जनता जबतक अपने सैनिकोंको ब्रिटेन की ओरसे लड़नेके लिए विदेश जानेसे नहीं रोक सकती तबतक यह नहीं कहा जा सकेगा कि असली ताकत जनताके हाथोंमें आ गई है। अब हमें एक शक्तिशाली अस्त्र मिल गया है, असहयोगका अस्त्र; और कांग्रेसने बड़े निश्चित शब्दोंमें बता दिया है कि इस दिशामें जनताको क्या करना चाहिए। लेकिन अभी जनताने इस दिशामें बहुत बड़े पैमानेपर पहल नहीं की है। लोगोंने अपने खिताब वापस नहीं किये हैं और उन्होंने स्कूलों या न्यायालयोंका त्याग नहीं किया है। इस तरह लोगोंने अपना फर्ज पूरा नहीं किया है। किन्तु फिर भी सरकारकी प्रतिष्ठा गिरी है; लोग अब सरकारी खिताबोंको उतनी इज्जतकी नजरसे नहीं देखते; लोग कचहरियोंमें तो जाते हैं पर यह समझकर नहीं कि वे अच्छी हैं या वहाँ उनको न्याय मिल जायेगा, बल्कि इसलिए कि वे उनके पतनकी निशानी हैं।''' '''बुनकरोंके सामने उनका फर्ज साफ है——उनको स्वदेशी आन्दोलनकी भरसक सहायता करनी चाहिए। अगर बुनकर इस आन्दोलनमें हाथ बँटायें तो वे देशको फिरसे खुशहाल बना सकते हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि बुनकर लोग विदेशी सूत इस्तेमाल करते हैं। श्री गांधीने बुनकरोंसे कहा कि आपको विदेशी सूतका इस्तेमाल छोड़ देना चाहिए, सिर्फ स्वदेशी और हाथका कता सूत ही इस्तेमाल करना चाहिए। आपको महीन सूत ही नहीं हाथका कता मोटा सूत भी इस्तेमाल करना चाहिए। और किसी भी देशके बुनकर मिलका तैयार किया हुआ सूत इस्तेमाल नहीं करते। वे हाथका कता महीन सूत इस्तेमाल करते हैं, लेकिन साथ ही मोटा सूत भी इस्ते-'''<noinclude></noinclude> dhp6szef7pt8kwxv0lq3n2uua5tmrtx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६८३ 250 176888 674852 619878 2026-08-29T04:56:19Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674852 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{c|{{x-larger|सांकेतिका}}}} {{rh|||६४७}} {{Multicol}} {{outdent|'''इंडिया इन द इयर्स''' — १९१७-१९१८, ३३०}} {{outdent|इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल, देखिए शाही-विधान परिषद}} {{outdent|इर्विन, डब्ल्यू० एस० ४२०, ४२२, ४२६, ४५५-५६, ४७३, ४८४-८५ पा० टि., ४९९ पा० टि., ५०१-२, ५०९, ५१२, ५४८, ५५२, ५६३-६६, ५७०}} {{outdent|इसलिंगटन, लॉर्ड, ५२१}} {{outdent|इस्लाम धर्म, -की उन्नतिका कारण, ५२७}} {{outdent|इस्लामिया, पुस्तकालय, १९९ पा० टि०}} {{c|'''ई'''}} {{outdent|ईसा मसीह, २७९-८०, २९३, ३१४-१५, ३१९, ४४५, ५३२, ५४०}} {{outdent|ईसाई मिशनरी, २२२}} {{c|'''उ'''}} {{outdent|उद्धव, २०५}} {{outdent|उमरी, बेजनजी मेरवानजी, १२ पा० टि०}} {{outdent|उमरेठ, ४०२}} {{outdent|उमियाशंकर, १०३, १६०}} {{outdent|उर्दू, ५}} {{c|'''ए'''}} {{outdent|एडमी, (एडमी) ४४१, ४९८, ५०६, ५१४-१५, ५४८-५२, ५५४-५७, ५६४}} {{outdent|एडवर्ड, जे० पी०, ४०१, ४१५}} {{outdent|एवर्स्ट, लेफ्टिनेंट, २०९}} {{outdent|एडल बहराम, डॉ०, ४७३}} {{outdent|'''एन अपील टू द ब्रिटिश डिमॉक्रेसी''', ५६९}} {{outdent|एंड्र्यूज, चार्ल्स फ्रीअर, ५, १८-१९, ४९, १२१, १३२, १५१, १६३-६५, १६९, १८२, २४९-५०, २८७, ३३९-४०, ३४२, ३४९, ३५३, ३५६, ३६३, पा० टि., ३६९, ३७२, ३७४, ३८० ५६९ पा० टि०}} {{outdent|एपरले, एफ० डब्ल्यू०, ५१६, ५६६}} {{outdent|एलिजाबेथ, ३०४}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}एल्बर्ट विक्टरी, कंजर्वेटरी, ८६ पा० टि०}} {{outdent|एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया, ६०, २४४ पा० टि०, ३६३ पा० टि०, ४००, ४१३ पा० टि०, ४४६, ४५०}} {{outdent|एसकम्ब, हैरी, १५०}} {{c|'''ओ'''}} {{outdent|ओ'डायर, २८१ पा० टि०}} {{outdent|ओझा, भवानीशंकर, १७८}} {{c|'''औ'''}} {{outdent|औद्योगिक शिक्षण, २६६}} {{c|'''क'''}} {{outdent|कंधारिया भोगीलाल, १७२}} {{outdent|कछबी, नारणजी, १८५}} {{outdent|कनाबारगी, आर०एस० शिवमूर्ति स्वामी, २५४}} {{outdent|कपूत, -और सपूत, १३}} {{outdent|कराचीबन्धु-मण्डल, २५९ पा० टि०}} {{outdent|करीमभाई, १८१, १८३}} {{outdent|करुणाशंकर (अध्यापक), १८०}} {{outdent|कर्जन, लॉर्ड, २०६, २२५}} {{outdent|कर्टिस लायनेल, ३३०-३१, ३३९}} {{outdent|कर्वे, धोंडो केशव, २१, १६२, २४७}} {{outdent|कल्याणदास, २१०}} {{outdent|कवलधारी, ४२०}} {{outdent|कांग्रेस, अखिल भारतीय, ३४-३५, ७८, १५५; -का भारत और उपनिवेश-सम्बन्धी प्रस्ताव, १५७-५८, २०५, २१५, २४२, २५३, २५६, ३२२ ३२५, ४७०, ५२५, ५३९, ५६८ पा० टि०}} {{outdent|काकू, २९, ८८, १६१, १७२}} {{outdent|कॉक्स, हर्बर्ट, ३८१}} {{outdent|काछलिया, अहमद मुहम्मद, ६१, ११२, १३९, १९८, ३५५-५६, ३७३}} {{outdent|काठियावाड़ टाइम्स, २८७ पा० टि०}} {{outdent|कानू, गुल्ली साहू, ४०१}} {{outdent|कॉफी, २३२}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> jhtlmvcc4slz8tenobcwzcdppvzqcyd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६८४ 250 176889 674853 619879 2026-08-29T05:03:06Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674853 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{Rh|६४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Multicol}} {{outdent|कामलेगी, ३६४}} {{outdent|कार्रपेंटर एच० एच० एस०, ६२}} {{outdent|'''कॉरपोरेशन''', ४४८ पा० टि., ५०८}} {{outdent|कॉलिन्स, ५४३}} {{outdent|कालेलकर, काका, ८८, ११७, १६५, १६६, २७५, २८५, ४३३, ४३७, ४६२, ४६८}} {{outdent|काशी, -तथा अन्य तीर्थोंकी गन्दगी, २४७; -नागरी प्रचारिणी सभा, २११}} {{outdent|कास्मोपोलिटन क्लब, १६९}} {{outdent|किचिन, हर्बर्ट, १३७}} {{outdent|किशोरीलाल, ४३७}} {{outdent|कीर्त्यानन्द सिंह, राजा, ४८६, ४९७-९८, ५०८, ५१५, ५५१-५५२, ५५५}} {{outdent|कुंजरू, ए० एन० २७, १६३, १६७, १७२}} {{outdent|कुप्पु, ८८}} {{outdent|कुमार, बापू, १६९}} {{outdent|कृपलानी, आचार्य जे० बी०, ३७५, ३८६, ४३४}} {{outdent|कृष्ण, १७९}} {{outdent|कृष्णराव, १७९, ४७३}} {{outdent|कृष्णस्वामी, १८१, २९१}} {{outdent|कृष्णमाचारी, बी० टी० ६३}} {{outdent|केलकर, नू० चि०, २७६ पा० टि}} {{outdent|केशवराव भाई, ३२}} {{outdent|केशवलाल भाई, १७३}} {{outdent|केसू, ३६ पा० टि., ८८, १२०, १४०, १७९}} {{outdent|केसरीप्रसाद, १५२}} {{outdent|कोटनी, डॉ०, २७३}} {{outdent|कैनेडी (न्यायाधीश), ३७८}} {{outdent|कैम्बल, लॉर्ड हार्डिंग, ३४७}} {{outdent|कैलेनबैक, हरमान, ५ पा० टि., १४, ५७, १११, ११९, २०८, ३६४}} {{outdent|कैसरे हिन्द स्वर्ण पदक, ३७०}} {{outdent|कोठारी, मणिलाल, १७३}} {{outdent|कोतवाल, १०९, १६५-६८, २७७}} {{outdent|कोर्ट ऑफ वार्ड्स, ४८७, ५१२, ५१५}} {{outdent|कौल, १६१}} {{outdent|कोशी, बकोरा, २०१}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}क्लार्क, सर जॉर्ज, १४४}} {{outdent|किकफ्रेड, डॉ० जॉन, ५४०}} {{outdent|किंड्ल, ५२१}} {{outdent|क्रिश्चियन एसोसिएटेड सोसाइटी, २७५ पा० टि.}} {{outdent|क्रिश्चियन लिट्रेचर फॉर ऐंड बाइबिल सोसा-इटी, ३२१}} {{outdent|क्लिटोकर, ५१}} {{c|'''खा'''}} {{outdent|खांडेरिया, १८४}} {{outdent|खापर्डे, जी० एस०, २७६ पा० टि.}} {{outdent|खिमजी, रावबहादुर वसनजी, ३}} {{outdent|'''खेड़ा वर्तमान''', ४७४ पा० टि.}} {{outdent|खिस्तनी, १६३}} {{c|'''गा'''}} {{outdent|गंगानाथ विद्यालय, १०९ पा० टि.}} {{outdent|गंगाबेन, ९६, १६१, १७३}} {{outdent|गजधर, पी० त्रिभुवनदास कल्याणदास, ४६२, ४६८}} {{outdent|गयाजी, १८२}} {{outdent|गयाप्रसाद सिंह, बाबू, १५३}} {{outdent|गांधर्व, महाविद्यालय, ४३४}} {{outdent|'''गांधी ऐंड मार्क्स''', ४६२, पा० टि.}} {{outdent|गांधी, काशी, ३३३ पा० टि.}} {{outdent|गांधी, कृष्णदास, ८८, ३३३ पा० टि.}} {{outdent|गांधी, छगनलाल, ११६, १३०, १४०, १४२, २४८-४९, ३३२, ४३५, ४३७-३८}} {{outdent|गांधी, गोकुलदास, १५१-५२, १७१-७२}} {{outdent|गांधी, छगनलाल, ६०, १२५, १३२, १३९-४१, १५५, १८१, २४८, २४९ पा० टि., ३६०-६१, ३३३, ३६५, ३६८, ४०२-३, ४१८-१९, ४३५, ४३७, ४३९, ४६२, ४६८, ५४७}} {{outdent|गांधी, जमनादास, २०-२१, ४५, ७७, ९४, १४३, १५९, १६०, १७१-७२, १८७ २४८, २६६, २६९, ३२८, ३८७, ५२०}} {{Multicol-end}} &nbsp;<noinclude></noinclude> lkddkma37ynarpth0neozp4xs5vvf8c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६८५ 250 176890 674861 619880 2026-08-29T06:22:42Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674861 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{c|{{x-larger|सांकेतिका}}}} {{rh|||६४९}} {{Multicol}} {{outdent|गांधी, देवदास, ८८, १२०, २६०, ३६५, ४३५, ४३७, ४४५, ४९०}} {{outdent|गांधी, नारणदास, २०, ३९, ६६, ७७, ८८, ९४, ११५, १२७, १२९-३०, १७२ पा० टि., १७३, १७५, १७७, १८४, २१०, २६८ पा० टि., ३३१ पा० टि., ३३२, ३६२, ३८७, ४०२, ४३८}} {{outdent|गांधी, पुरुषोत्तमदास, १३०}} {{outdent|गांधी, प्रभुदास, ८८, १४३, २६०, २६२, ३६५, ३६७, ४३५-३६, ४९०}} {{outdent|गांधी, मगनलाल, ४, ४ पा० टि., ३६, ४०, ६६, ८८, ९२, ९४ पा० टि., ९५, १०४, ११२, १२५, १३०, १३६, १३९-४१, १४३, १६३-६४, १६६-६७, १७२-७३, १७७, १८२-८३, २४८, २६०, २६८-६९, ३१०, ३४५, ३६२, ३६५-६७, ३७० पा० टि., ४१९, ४३३, ४३५, ४३७, ४६४, ४७३, ४७८, ४८०, ५२०, ५२५, ५४७, ५६२}} {{outdent|गांधी, मणिलाल, ८८, ११८, १२०-२१, १२७, १३७, १४३, १७३, १८३-८५, २१०, ३३२ पा० टि., ३३३, ३५७}} {{outdent|गांधी ऐंड अनार्की, २८१ पा० टि०}} {{outdent|गांधी, रामदास, २९, ६६, ८८, १६५, १६७, १८१, २६०, २१०, ३३१, ३३२ पा० टि., ३३३}} {{outdent|गांधी, लक्ष्मीदास, १३ पा० टि., ४९, ९४ पा० टि०}} {{outdent|गांधी, श्रीमती कस्तूरबा, १०, २१, ३९, ७८, ८८, ११६, १४०, १६३, १६८, १७४-७५, १७८, १८०, १८३, १८७, ४४५, ४८२, ५६३}} {{outdent|गांधी, संतोक, ८८, ९४, १७२, १८१-८४, ४३७, ४३७}} {{outdent|गांधी, शामलदास, ९४-९५, ११६, ४७२}} {{outdent|गांधी, हरिलाल, १२, २१, ६६, १६१-६२, १६४-६५, १७९, १८१-८२}} {{outdent|गार्डन, लॉर्ड (जनरल), २९९, ३६३}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}गार्ले, डब्ल्यू० आर० ४०५, ४०९, ५५८}} {{outdent|गिदवानी, प्रो० ३१८}} {{outdent|गिब्सन, टी० एम० ५१४ पा० टि०}} {{outdent|गिरमिट-प्रथा, १३३, १४४, २४९, २८७, ३०७, ३२२, ३२७, ३३९-४१, ३४३-४४, ३४८-५०, ३५५, ५२३-२४; -के सम्बन्धमें नटालके प्रधान-मन्त्रीका वक्तव्य १३२; -शब्दकी व्युत्पत्ति, १५०; -से मुक्ति, १३५}} {{outdent|गिरमिटिया, १३२, १३८; -प्रवासकी समस्या, ५२२; -मजदूर, १३४; -मजदूरोंकी भर्तीकी प्रथा, १३४; -मजदूरों की भारतमें भर्ती, १२१ पा० टि.; -मजदूरोंके साथ अन्याय, १३५; -भूतपूर्व, ११३, १५८}} {{outdent|गिरिशंकर, १७४}} {{outdent|गीतांजलि, ८२ पा० टि०}} {{outdent|गुजरात वर्नाक्यूलर सोसाइटी, २७०}} {{outdent|गुजराती, ३३०}} {{outdent|गुजराती मण्डल, १६५}} {{outdent|गुजरात समाज, ७१}} {{outdent|गुप्त, शिवप्रसाद, २११}} {{outdent|गुप्त, सर कृष्ण, ३५३}} {{outdent|गुप्ता, मखनलाल, १८६}} {{outdent|गुरुकुल, कांगड़ी, ४९, ६६, ९२, १६७ पा० टि० २६२}} {{outdent|गुरुदेव, देखिए ठाकुर रवीन्द्रनाथ}} {{outdent|गुलाम हुसैन, २५२}} {{outdent|गेट, सर एडवर्ड, ४४३ पा० टि., ५४८-४९, ५७२}} {{outdent|गोकीबेन, देखिए रलियातबेन}} {{outdent|गोखले, गोपालकृष्ण, १, ३, ७, ९, ११, १५, १८, ३०, ३४, ३७-३८, ४४, ४६, ५७-५८, ६०, ७०, ७६, ७८, ८१, ८२ पा० टि., ८३, ८६, १०६, ११०, ११८, १२०, १३२-३३, १४४, १४६, १४८, १५०-५२, १५७, १६०, १६३, १६४ पा० टि., १७१, १९२,}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 576hxkj4xgu5qb4ljgeo2nfizini795 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/७०० 250 176903 674844 619893 2026-08-29T03:51:46Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आवश्यक नहीं */ 674844 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude><noinclude></noinclude> aepnu4wruspn5dbg8c87ncz9rb1sejm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/७०१ 250 176904 674845 619894 2026-08-29T03:52:07Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आवश्यक नहीं */ 674845 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude><noinclude></noinclude> aepnu4wruspn5dbg8c87ncz9rb1sejm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/७०२ 250 176905 674847 619895 2026-08-29T03:52:29Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आवश्यक नहीं */ 674847 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude><noinclude></noinclude> aepnu4wruspn5dbg8c87ncz9rb1sejm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/७०३ 250 176906 674848 619896 2026-08-29T03:52:56Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आवश्यक नहीं */ 674848 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude><noinclude></noinclude> aepnu4wruspn5dbg8c87ncz9rb1sejm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/७०४ 250 176907 674849 619897 2026-08-29T03:53:18Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आवश्यक नहीं */ 674849 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude><noinclude></noinclude> aepnu4wruspn5dbg8c87ncz9rb1sejm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७१ 250 183013 674870 630685 2026-08-29T07:20:26Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674870 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''शीर्षक सांकेतिका'''}}}} {{Multicol}} {{Outdent|अपील : भारतीय कला और शिल्पके लिए, ११६}} {{outdent|टिप्पणी, ४१, १०४, ४५७; (–णियाँ), १-२, ७१-३, १००-३, १३८-४४, १८०-२, २२३-५, ३११-५, ३३३-४, ३६२-४, ४०८-११, ४३१-४, ४४२-४, ४७६-७, ४८९-९१, ४९७-८, ५००-१, ५३९-४१, ५६०-२, ५७९-८२, ५९३-६}} {{Outdent|तार: के° टी° पॉलको, ५०४, ५५१, ५८४; –जमनालाल बजाजको, १९०; –सोराबजीको, ४४; –हाजीको, ९६}} {{Outdent|पत्र: अनुपमा बनर्जीको, ८; –अब्दुर्रह-मानको, १७७; –अब्दुल हुसैनको, २१८; –अब्बास तैयबजीको, ३७५-६, ४१३, ५०५, ५८८; अ° भा° च° संघके मन्त्रीको, ४६८, –अमियचन्द्र चक्रवर्तीको, ६०५-६; –अमूल्यचन्द्र सेनको, १९२, ३८३-४; –अमृतलालको, ५७५; –अमृतलाल ठक्करको ३८७-८; –अमृतलाल नानावटी और अन्य लोगोंको, २६४; –अमृतलाल बेचर-दासको, ३८६; –अयोध्याप्रसादको, १२४; –अहमद मियाँको, ३९४; –अत्वानेत मिरवेलको, १०-११; –आ° टे° गिडवानीको, ३५, ५०६; –आदम-सालेह अली पटेलको, ३०५ –आनन्द-प्रियको, ११८; –आनन्दलालको, १७८; –आर° ए° ह्यमको १३; –आर° एल° सूरको, १०; –आर°}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}एस° अय्यरको, ३२४; –आर° डी° टाटाको, २०१-२; –आर° डी° सुत्र- ह्मण्यम्को, २४०, ४४०; –आर° बी° ग्रेगको, ५०८-९; –इ° एच° जेम्सको, ४७०; –इन्द्र विद्यालंकारको, ५१२-३; –उदित मिश्रको, ४४१; उमराव-सिंहको १५२; –उर्मिला देवीको, १३६-७, ४१४-५, ५६४; –ए° अरुणाचलम् पिल्लेको, ५८; –ए° आई° काजीको, ५४८; –ए° इर्बीको, २९२; –ए° ए° पॉलको, ७०, १२५, ४५७-८, ५४७; –ए° एल° नायरको, ५११; –ए° एस° डेविडको, ५७२-३; –एक ग्राहक- को, ११५; –एक जिज्ञासुको, २०-२१; –ए° जोजेफको, २३४; –एक बहनको, १२-३, २४७; –एक महिलाको, १५७; –एक मित्रको, २४, २६४, ४३८-९; –एक मुस्लिम नेताको, ५७१-२; –एक विद्यार्थीको २६९; –एक्सेल एफ° कुण्डसेनको, ३७६; –एच° के° वीरन्ना गौड़को, ५९०; –एच° एस° एल° पोलकको, ५६८-९; –एडविन एम° स्टैंडिंगको, ८३-४, ५०७; –एडा रसेन-ग्रेनको, ३७१; –एन° एस° वरदाचारी और एस° वी° पुणताम्बेकरको, २३६; –एन° एस° वरदाचारीको, ३७२, ६१९-२०; –एफ° ए° बुशको, २२६-७; –एम° आर° जयकरको ५५३-४; –एम° आर° हवेलीवालाको, ५११-२;}}<noinclude></noinclude> 29u57sdh66df3woewv02njb4j7fjg10 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३२ 250 184415 674789 640348 2026-08-28T15:47:58Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674789 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|अट्ठाईस}}</noinclude>{|width=100% | |- |५५५.|| तार : के० टी० पॉलको (२३-५-१९२६)|| ५०४ |- |५५६.|| सन्देश : अब्राह्मणों को (२३-५-१९२६)|| ५०४ |- |५५७.|| पत्र : अब्बास तैयबजीको (२३-५-१९२६)|| ५०५ |- |५५८.|| पत्र : आ० टे० गिडवानीको (२३-५-१९२६)|| ५०६ |- |५५९.|| पत्र : एडविन एम० स्टैंडिंगको (२३-५-१९२६)|| ५०७ |- |५६०.|| पत्र : आर० बी० ग्रेगको (२३-५-१९२६)|| ५०८ |- |५६१.|| पत्र : पी० एन० राजमणिकम् चेट्टियारको (२३-५-१९२६)|| ५०९ |- |५६२.|| पत्र : गो० कृ० देवधरको (२३-५-१९२६)|| ५१० |- |५६३.|| पत्र : एस० जी० वझेको (२३-५-१९२६)|| ५१० |- |५६४.|| पत्र : ए० एल० नायरको (२३-५-१९२६)|| ५११ |- |५६५.|| पत्र : एम० आर० हवेलीवालाको (२३-५-१९२६)|| ५११ |- |५६६.|| पत्र : इन्द्र विद्यालंकारको (२३-५-१९२६)|| ५१२ |- |५६७.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२३-५-१९२६)|| ५१३ |- |५६८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२३-५-१९२६)|| ५१५ |- |५७९.|| पत्र : देवदास गांधीको (२६-५-१९२६)|| ५१५ |- |५६९.|| पत्र : कोण्डीपार्थी पन्नियाको (२३-५-१९२६)|| ५१६ |- |५७०.|| पत्र : जी० एम० नलावड़ेको (२३-५-१९२६)|| ५१६ |- |५७१.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२३-५-१९२६)|| ५१७ |- |५७२.|| पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२३-५-१९२६)|| ५१७ |- |५७३.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको (२३-५-१९२६)|| ५१८ |- |५७४.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (२३-५-१९२६)|| ५१८ |- |५७५.|| पत्र : देवदास गांधीको (२३-५-१९२६)|| ५१९ |- |५७६.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२४-५-१९२६)|| ५२० |- |५७७.|| पत्र : देवदास गांधीको (२५-५-१९२६)|| ५२० |- |५७८.|| पत्र : मूलशंकरको (२६-५-१९२६)|| ५२१ |- |५८०.|| त्रैमासिक आँकड़े (२७-५-१९२६)|| ५२२ |- |५८१.|| उसका रहस्य (२७-५-१९२६)|| ५२२ |- |५८२.|| कताई एक कला है (२७-५-१९२६)|| ५२६ |- |५८३.|| पत्र : देवदास गांधीको (२७-५-१९२६)|| ५२७ |- |५८४.|| पत्र : राजारामको (२७-५-१९२६)|| ५२८ |- |५८५.|| पत्र : देवप्रसाद सर्वाधिकारीको (२८-५-१९२६)|| ५२८ |- |५८६.|| पत्र : सैयद रजा अलीको (२८-५-१९२६)|| ५२९<noinclude></noinclude> jkazcm14uggnx6ccldyllseqz0rkpeb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३३ 250 184416 674790 640349 2026-08-28T15:58:18Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674790 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|उनतीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |५८७.|| पत्र : डॉ० नॉरमन लीको (२८-५-१९२६)|| ५३० |- |५८८.|| पत्र : एस० अरुणाचलम्को (२८-५-१९२६)|| ५३१ |- |५८९.|| पत्र : डॉ० माणिकबाई बहादुरजीको (२८-५-१९२६)|| ५३२ |- |५९०.|| पत्र : जी० आर० एस० रावको (२८-५-१९२६)|| ५३३ |- |५९१.|| पत्र : कृष्णदासको (२८-५-१९२६)|| ५३४ |- |५९२.|| पत्र : शार्दूलसिंह कवीसरको (२९-५-१९२६)|| ५३५ |- |५९३.|| पत्र : डी० वी० रामराव को (२९-५-१९२६)|| ५३६ |- |५९४.|| पत्र : कृष्णदासको (२९-५-१९२६)|| ५३७ |- |५९५.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२९-५-१९२६)|| ५३७ |- |५९६.|| अहमदाबादके मिल मजदूरोंकी गृह-योजनाका मसविदा (३०-५-१९२६)|| ५३८ |- |५९७.|| टिप्पणियाँ : प्रागजी देसाई; पूर्व आफ्रिकासे प्राप्त एक प्रार्थना (३०-५-१९२६)|| ५३९ |- |५९८.|| असहयोग और राष्ट्रीय शिक्षा (३०-५-१९२६)|| ५४१ |- |५९९.|| गुजरातमें चरखा (३०-५-१९२६)|| ५४३ |- |६००.|| पत्र : एस० जी० वझेको (३०-५-१९२६)|| ५४४ |- |६०१.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (३०-५-१९२६)|| ५४४ |- |६०२.|| पत्र : के० टी० पॉलको (३०-५-१९२६)|| ५४५ |- |६०३.|| पत्र : के० टी० पॉलको (३०-५-१९२६)|| ५४६ |- |६०४.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (३०-५-१९२६)|| ५४७ |- |६०५.|| पत्रः ए० आई० काजीको (३०-५-१९२६)|| ५४८ |- |६०६.|| पत्र : महादेव वी० पाण्डलोरकरको (३०-५-१९२६)|| ५४९ |- |६०७.|| पत्र : सी० लक्ष्मी नरसिंहनुको (३०-५-१९२६)|| ५४९ |- |६०८.|| पत्र : वी० एम० तारकुण्डेको (३०-५-१९२६)|| ५५० |- |६०९.|| पत्र : तेहमीना खम्भाताको (३०-५-१९२६)|| ५५० |- |६१०.|| पत्र : हरिलालको (३०-५-१९२६)|| ५५१ |- |६११.|| तार : के० टी० पॉलको (३१-५-१९२६)|| ५५१ |- |६१२.|| पत्र : विलहेम वार्टेनबर्गको (३१-५-१९२६)|| ५५२ |- |६१३.|| पत्र : दिनशा मंचरजी मुंशीको (१-६-१९२६)|| ५५३ |- |६१४.|| पत्र : जयसुखलाल ए० गांधीको (१-६-१९२६)|| ५५३ |- |६१५.|| पत्र : एम० आर० जयकरको (२-६-१९२६)|| ५५४ |- |६१६.|| पत्र : सी० विजयराघवाचारीको (२-६-१९२६)|| ५५५ |- |६१७.|| पत्र : नाजुकलाल चौकसीको (२-६-१९२६)|| ५५५<noinclude></noinclude> 08c0o49nxi7qr8aynbf2z84u7tbdg5y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७२ 250 184429 674871 640362 2026-08-29T07:21:38Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674871 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{Gap}}–एम° के° आचार्यको, ८८-९; –एल° गिबार्टीको, २३८; –एलिस मैक्के केली-को, ८२-३ –एस° अरुणाचलम्‌को, ५३१-२ ; –एस° आर° स्कॉटको, २१-२, ४५; –एस° गणेशनको, ३९८-९; –एस° गोविन्दस्वामी अय्यरको, २८०; –एस° जी° वझेको, ५१०, ५४४; –एस° नागसुन्दरम्को, २८८; –एस° पी° एन्ड्रयूज डयूबको, २२८; –एस° मेहताको, ३५६; –एस° वी° फडनीस-को, ३५२; –एस° वी° वेंकटनरसय्यन-को, २३०; –एस° शंकरको, ५६९-७०; –एस° श्रीनिवास अय्यंगारको, ३९९; –एस° सदानन्दको, ४३९-४०; –एस्थर मेननको, ४१६; –कस्तूरचन्द सू° मारफतियाको, ११७-८; –काका कालेलकरको १५९-६०, १७३-४, ३५३-४, ३९७, ४५४-६, ४६६; –कान्तिलाल मो° दलालको, २१७; –कान्तिलाल ह° पारेखको, ६०८-९; –कायम अली मु° सलेमवालाको, ३०५; –कालीशंकर चक्रवर्तीको, २३१; –कासम अलीको, ६२२; –किशोरलाल मशरूवालाको, १४९-५०, २३२-३, ४२९, ६२१; –कुँवरजीको २१४-५; –कुँवरजी वी° मेहताको, २०९; –कुसुम और धीरुको, ४५२; –कृष्ण-दासको, १४, ८६-७, १८०, ३२४, ४७१, ५३४-५, ५३७; –के° टी° पॉलको, २९८-९, ५०२-४, ५४५-६, ५४६-७, ५८२; –के० टी० मैथ्यूको, ३८०; –के° बी° मेननको, ८२;}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{Gap}}–के° वेंकटेशनको, ३१५; –केलप्पनको, १०७; –के° श्रीनिवासनको, ५४; –के° सन्तानम्को, ४६२-३ –कैथरीन मेयोको, १९१-२, २७८; –कोण्डा वेंकटप्पैया गारूको, ४२६-७, ६११; –कोंडीपार्थी पन्नियाको, ५१५; –क्लारा एलियासको, ८; –खंडेरियाको, २६३; –गंगाबहन मजमुदारको, ६१३; –गंगाराम छत्रालाको, १३८; –गांधी-आश्रम, बनारसको, ३४७; –गिरधर-लालको, १५३-४; –गिरिराज किशोर-को, ३१७; –गुलाबदासको, २८४; –गुलाबदास लालजीको, ३९५-६ ; –गोपबन्धु दासको, ४७; –गो° कृ° देवधरको, २५८, २७५-६, २९४, ३१७-८, ४१७, ५१०; –गोपालदासको, ७१; –गोविन्दजी पीताम्बरको ३२६; –ग्रीव्ज कॉटन व कम्पनीको २५८-९; –घनश्यामदास बिड़लाको, २०८, २९५, ३२०-१, ४०१, ५१६, ५९०-१; –च° राजगोपालाचारीको, १०७, १२१-२, १४८-९, ४६५-६, ५१३-४, ५३७-८, ६०९-१० ; –चन्दुलालको, ५००; –चन्द्रकान्तको, ३२९; –चन्द्र शंकर पण्डयाको, ३९७-८; –चिमन-लाल भो° पटेलको, २४६; –चीनी मित्रोंको, १९६; –चुनीलालको, ११२; –चुन्नीलाल डी° गांधीको, ६०७; –चुन्नीलाल रंगवालाको, १६८-९; –छगनलाल जोशीको, ३००-१; –छोटालालको, ४४८, ४७२, ४७८; –जंगबहादुर सिंहको, २२९; –जग-}}<noinclude></noinclude> ght9z64fewzij9qmlflcuyunanl768p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७३ 250 184430 674874 640363 2026-08-29T07:22:45Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674874 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||शीर्षक सांकेतिका|६३७}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{Gap}}जीवनदासको, २८३; –जगजीवन-दास नारणदास मेहताको, ६१४-५; –जनकधारी प्रसादको, ५८७; –जफर-उल-मुल्कको, ३८३; –जमनादासको, २१४; –जमनालाल बजाजको, १२५-६, १७२-३, १७६, २५६, ३७३, ३९४-५, ४५३, ४६०, ४६१-२, ५१८, ५७६, ६०३; –जयकुँवरको, ३२२; –जयकुँवर मणिलाल डॉक्टरको, ५७४-५; –जयन्तीलालको, ५६७; –जयसुखलालको, १७८-९, ३०४, ३२८, ४२०, ४५४, ४७९-८०, ४९९-५००; –जयसुखलाल ए° गांधीको, ५५३; –जयाको, ४५२; –जवाहर-लाल नेहरूको, ८१, ३६९; –जी° आर° एस° रावको, ५३३; –जी° ए° नटेसनको, ३७१; –जी° एम° नलावड़ेको, ५१६; –जी° जी° जोगको, २६३; –जी° पी° नायरको १९९-२००, २४१; –जीवनलालको, ३७-८; –जी° स्टेनली जोन्सको, ३७८; –जुगलकिशोर बिड़लाको, ४०२; –जे° ई° डेनिसनको, १९०; –जे° चटर्जीको, २८२; –जेठालालको, १९; –जेठालाल हरिकृष्ण जोशीको, ६०६; –जे° बी° पेटिटको, ६७; –जे° लाइल टेलफोर्डको, ४७०; –जे° वी° बेथमैनको, ८६; –जोआकिम हेनरी राइनहोल्डको, १४८; –टी° के° माधवनको, ११०; –ठाकोरलालको, २४८; –डॉ° एम° ए° अन्सारीको, ८७; –डॉ° नायडूको, ५८; –डॉ° नॉरमन लीको, ५३०-१; –डॉ° पॉल लिंडको, २२७; –डॉ° प्रतापचन्द्र}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}गुहा रायको, ८५; –डॉ° बी° एस° मुंजेको, ५८५; –डॉ° माणिकवाई बहा-दुरजीको ४००, ५३२; –डॉ° सत्य-पालको, १३४; –डाह्याभाई म° पटेल-को, ५६, ८८, २४७; –डी° हनुमन्त-रावको, ४१-३, १०५-६; –श्रीमती हनुमन्तरावको, १६५; –डी° वी° राम-रावको, ५३६; –डी° वी° रामस्वामीको, १६६, १९६, २३९-४० -३५०-१; –डी° वेंकटरावको, ४३९; –डुंगरसी कचराको, ३८६-७; –तुलसी मेहरको, ९५; –तेहमीना खम्भाताको, ५५०; –दयालजीको, ३२३; –दीनशा मंचरजी मुंशीको, १३७, ५५२; –दीपक चौधरी-को, ११६; –दूनीचन्दको, २२८; –देव-चन्द पारेखको, २३७, ३४९, ३५५, ४०२, ४२८, ६०८ –देवदास गांधीको, १६७, २०४, २४८, २६७-८, ४६१, ५१८-९, ५२०, ५२१, ५२७-८; –देव-प्रसाद सर्वाधिकारीको, ५२८-९; –धनगोपाल मुखर्जीको, ३१६; –धन-जीको १५८-९; –धर्मवीरको २४३; –धीरेन्द्रनाथ दासगुप्तको, २३५; –नगीनदासको, ३९५, ४२०; –न° चि° केलकरको, ३२५; –नमुदुरी वेंकट-रावको, ५७०; –नरगिस कैप्टेनको, ३०१, ४२९-३०; –नरभेराम पो° मेहताको, २४५-६; –नवरोजी खम्भा-ताको, ४६; –नलिनीरंजन सरकारको, १५५; –नागजीभाईको, २७७; –नागर-दास लल्लूभाईको, ४१८; –नाजुकलाल नन्दलाल चौकसीको, १२६-७, २०३, ३२७, ३६६, ४०३, ५५५; –निर्भय-राम वि° कानावारको, २१६; –निर्मला-}}<noinclude></noinclude> qvrt4ic7hhawzn3qu6tpwzomwrasui7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७४ 250 184431 674875 640364 2026-08-29T07:23:43Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674875 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}को, ४२०-१; –न्यायमूर्ति पी° आर° दासको, ५६५; –परशुराम मेहरोत्राको, १५४; –पारसी रुस्तमजी के न्यासीको, ३४९; –पी° एन° राजमणिकम् चेट्टि-यारको, ५०९; –पी° एस° आर° चौधरीको १०४; –पी° एस° एस° राम अय्यरको, २६०; –पी° एस० वारियरको ११, २३३; –पी° गोवि-न्दन कुट्टी मेननको, २४१-२; –पी° जी° मलकानीको, १२७; –पुरी जिला बोर्ड के उपाध्यक्षको, २५९; –पुरुलिया कुष्ठ आश्रमके अधीक्षकको, ३५; –पुरुषोत्तम मू° सेठको, ३८५; –पूँजा श्रवणको, १५२-३; –पेरीन कैप्टेनको, ५७३, ५९३; –प्यारेलाल नैयरको, २९१, ३१८-९, ४१४, ५८९-९०; –प्रतापसिंहको, ५७, १८८, ३०४; –प्रफुल्लचन्द्र मित्रको, ३५५-६; –प्रभालक्ष्मीको, २१३, ३२९; –प्रभा-शंकर पट्टणीको ४२८, ४८३; –प्रभु-दासको, १६०-१; –प्रभुदास गांधीको, २०३-४; –प्राणजीवन के° देसाईको, २६५; –प्राणजीवनदास ज° मेहताको, २१५, ३२२, ५७४; –'फॉरवर्ड' के सम्पादकको, ६१२; –फूकनको, २११; –फूलचन्द कस्तूरचन्द शाहको ६०६-७; –फूलचन्दको, १८८-९, ४४९-५०; –फेनर ब्रॉकवेको, ६१०; –फेड कैम्बेल-को, ३६७-८; –फेड्रिक हाइलरको, १९९; –बगलाप्रसन्न गुहारायको, २९२-३; –बर्रा सत्यनारायणको, १३५; –बहरामजी खम्भाताको, ५१७; –बासन्ती देवीको, ५६५; –विशप फिशर-को, ९; –बी° सुब्बारावको, ३५७;}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}-बुद्धूको, २२५-६; –बेचर भाणजी-को, २६८- ९; –ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको, १२३, ५६६; –भगवानदास ब्रह्मचारी-को, ३००; –भूकनशरणको, ४१७; –मंगलभाई शा° पंचालको, १२३-४; –मणिवहन पटेलको, २०, ४८३; –मणिलाल गांधीको, २४४, २६६; –मणिलाल डाक्टरको, ३२१; –मथुरादास त्रिकमजीको, ५६, ६९, १७०, २०४-५, २६६, ३३०, ३९६, ५६७; –मदनमोहन शर्माको, ४४९; –मनुको, ३२८; –मरियम आइजकको, १९५; –महादेव देसाईको, ४६७-८; –महादेव वी° पाण्डलोरकरको ५४९; –महासुखको, २९९ –मॉड चीजमैनको, १५०-१; –माणेकलालको, २६७; –मानसिंह जसराजको, २४५; –मावजीको, १९७-८; –मिर्जा कासिम अलीको, २३३; –मिल्टन न्यूबेरी फैजको, २५७; –मीठाबाईको, १९७; –मीठू-बहन पेटिटको, २१०, ३५३, ४५३; –मीराबह्नको, ४८१, ४८२, ४९४; –मु° रा° जयकरको, ३१९; –मुहम्मद शफीको, १९३; –मूलशंकर कानजी भट्टको, ६१३; –मूलशंकरको, ५२०; –मैनाको, १२; –मोतीबहन चौकसीको, २५-६, ४४, ४६, १६९, २११, २१७, २९६, २९६-७, ५८४; –मोतीलालको, ३०१; –मोतीलाल नेहरूको, २२-३, ५९-६०, ४९१-२, ५१९, ५६३; –मोती-लाल रायको, ४२५, ४५८; –मौलाना अबुल कलाम आजादको, ४५१; –मौलाना एम° मुजीबको, ८४-५; –मौलाना मुहम्मद अलीको, २००-१; –मौलाना}}<noinclude></noinclude> 3axx73qrzyc700u60b8ygjab83a5ui8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७५ 250 184432 674879 640365 2026-08-29T07:33:35Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674879 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||शीर्षक सांकेतिका|६३९}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}मुहम्मद शफीको, ७०; –मौलाना शौकत अलीको, ३७२; –राखालचन्द्र मैतीको, २६१; –राजबहादुरको, १२२; –राजा-रामको, ५२८; –राजेन्द्रप्रसादको, २६१; –राधाकृष्ण बजाजको, ४४७-८; –रामदत्त चोपड़ाको, ३८२, ४५०-१; –रामदास गांधीको, २६, ३०३; –राम-नारायणसिंहको, १६८; –रामरीष ठाकुरको, २४३; –रामू ठक्करको ३८८-९; –रामेश्वरदास पोद्दारको, १५१-२, ४२७, ४५९; –राय प्रभुदास भीखाभाई-को, ५९२; –रिचर्ड बी° ग्रेगको, २८९; –रुथ एस° एलेक्जेंडरको, ५८९; –रुस्तमजी डी° बाटलीवालाको, २६८; –रेवरेंड जॉन एम° डारलिंगटनको, २३०; –रेवरेंड कॉर्नीलियस ग्रीनवेको, ४३; –रोमाँ रोलाँको, ३६८, ४३७-८; –लक्ष्मीदासको, २१५-६; –लक्ष्मीदास पुरुषोत्तम आसरको, ५७५-६; –लल्लुभाई ब° पटेलको, ११७; –लल्लू मोरारको, २६२; –लाभशंकर मेहताको, ३०२; –लालजीको १७५; –लाला लाजपतरायको, ६८-९, १५५-६, २५५; –लूसियन जैक्विनको, ४६९; –वसनजी- को, २१८; –वसुमती पण्डितको, ४५९; –वामन लक्ष्मण फड़केको, २६२; –विधानचन्द्र रायको, १३३; –विनोद-बिहारी दत्तको, २२९; –विनोबा भावेको ३६; –विलहेम वार्टेनवर्गको, ५५१-२; –विलियम डॉलको, ३४८; –वी° एन° एस° चारीको, २७९-८०; –वी° एम° तारकुंडेको, ५४९; –वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको, ५४४-५, ५६८, ६०५; –वी° जे° पटेलको,}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}५६३-४; –वीरसुतको, १७५; –वी° लॉरेंसको, ६२०-१; –वी° वी° दास्ताने-को, २४; –वी° सुन्दरम्‌को, ५८३; –शंकरन् नम्बूद्रीपादको, ३८१; –शंकर-लालको, ३८१, ४९३ –शरत्चन्द्र बोसको, २७८-९; –शरदेन्दु बी° बनर्जी-को, ४६३; –शान्तिकुमार मोरारजीको, ५९१; –शार्दूलसिंह कवीसरको, ३६-७, ११३-५, ५३५; –शाह जमील आलमको, २३४; –शिवाभाई जी° पटेलको, ८९; –शुकदेवप्रसाद सिंहको, ११८; –शौकत अलीको, २९०; –श्री-प्रकाशको, ४२२; –सतीशचन्द्र दास-गुप्तको, २१२-३, २८१, २८२-३, २९७, ३५१-२, ४१५, ४२३, ४२६, ४६९, ५१५, ५६६, ६०४; –सतीशचन्द्र मुखर्जीको, ३२६, ३७९; –सरोजिनी नायडूको, ९४-५, १०९, १७६-७; –सी° ए° अलेक्जैन्डरको, २०२; –सी° रामलिंग रेड्डीको, १५७; -सी° वी° कृष्णको, १६६-७, २३५, ३७७, ४६४, ६११-२; –सी° विजयराघवाचारीको, ५५४; –सी° वी° रंगम चेट्टीको, २३; –सी° लक्ष्मी नरसिंहन्को, ५४९; –सी° श्रीनिवास रावको, ५५; –सुधांशु कुमारी घोषको, २३२; –सुन्दरस्वरूपको, १०८; –सुरेशचन्द्र बनर्जीको, ३१८; –सुरेश बाबूको, १११; –सुहासिनी देवीको, ४७-८; –सेवारामको, ४७२; –सैयद रजा अलीको, ५२९; –सोमनाथको, ३८४; –सोमनाथ पंचालको, २६५; –सोमनाथ पुरुषोत्तमको, ६१४, –सत्या-नन्द बोसको, १४-५; –स्वामी श्रद्धा-}}<noinclude></noinclude> tnse8ofokv0ph19n016a65lz8j2wqc6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७६ 250 184433 674891 640366 2026-08-29T09:29:09Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674891 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>{{Rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} {{Multicol}} {{outdent|{{gap}}नन्दको, १७७-८; -हकीम अजमलखाँ- का जाला, ४८४-८; अधिक लोग नहीं, को, १९३-५, २८१; -हरनारायणको, २७७; - हरबर्ट ऐंडर्सनको, १९८, २३७-८; - हरसुखरायको, ९० ; - हरिभाऊको, ८०-१; - हरिभाऊ गणेश पाठकको, ४९२; -हरिलालको, ५५०-१; -हासम हीरजीको ४१८-९; - हिन्दी साहित्य-सम्मेलनके प्रधान मन्त्रीको, ३७०; - हेनरी लारेंस-को, ३५०; -हेमप्रभा दासगुप्तको, ५१७; –हैरॉल्डमैनको, २५; –हेलेन हाउसडिंगको, २३९}} {{outdent|प्रस्ताव : दक्षिण आफ्रिकाके सम्बन्ध में, ४४१-२}} {{outdent|भाषण : एक विवाहमें, ६४-७; –संगीतके बारेमें, १७०-२}} {{outdent|भेंट : कृषि आयोगके सम्बन्धमें, ३६७; –दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलको, १९; –समाचारपत्रोंको, ५८६}} {{outdent|वक्तव्य : दक्षिण आफ्रिकाकी समस्यापर, ३७४-५; –मसूरी यात्रा स्थगित करने के सम्बन्धमें, ३४७; –रंगभेद विधेयकपर, ४८०}} {{outdent|सन्देश : अब्राह्मणोंको, ५०४; –जलियाँवाला बागके सम्बन्ध में, २९३-४; –त्रिवेन्द्रम-की एक सभाके लिए, २२५; –दक्षिण आफ्रिकासे एन्ड्रयूजकी वापसीपर, ४२२; –'फ्रीडम' को, ४२१; –भावनगर रियासत जन-परिषद्को, ४८१; –'लिबरेटर' को, १११-२; –वकीलों-के सम्मेलनको, २७५; –विद्यार्थियोंको, ६२२-४; –'हिन्दुस्तानी' को, ११३}} {{c|विविध}} {{outdent|{{Gap}}अखिल भारतीय गोरक्षा संघ, ५५५-६; अ° भा° च° संघसे ऋण लेनेके लिए इकरारनामेका मसविदा, ४२४-५; अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक, २५४-५; अज्ञान-}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}का जाला ४८४-८; अधिक लोग नहीं, गुणी और दृढ़ लोग चाहिए, ४०७-८; अपंग ढोरोंका क्या हो?, ६१९; अपने नग्न रूपमें ७८-८०; अब भी समस्यासे आँखें चुरा रहे हैं, ९८-९; अविश्वास या उचित सावधानी?, ११९-२०; सहयोग और राष्ट्रीय शिक्षा, ५४१-३; अहमदाबादके मिल मजदूरोंकी गृह-योजनाका मसविदा, ५३८-९; अहिंसाकी गुत्थी, ५७७-८; आजकी चर्चाका विषय, २६-८; आमुख, २७६; आशाको किरण, २८४-५; उनकी उलझन, १८२-३; उसका रहस्य, ५२२-६; एक अच्छा उदाहरण, ४९७; एक चरखा-प्रेमीका दुःख, १६१-२; एक नीरस परिसंवाद, १४४; एक पत्र, १०८ ९; एक प्रतिवाद, ७४-५; एक भारत-सेवक, १८४; एक विद्यार्थीके प्रश्न, ५०-३; एन्ड्रयूजकी व्यथा, ९६-७; कट्टरपन, ४७३-४; कताईमें सहयोग, ६०१-३; काठियावाड़ी खादी, ४३५-६; कुछ धार्मिक प्रश्न, २०५-८; कुटिल कानून, ५५६-८; कुरीतियोंके साम्राज्यमें क्या करें?, १२०-१; केवल परिमाणका भेद, १४५-७; कैथरीन मेयोके साथ हुई बातचीतका विवरण, १२७-३३, कैसा लगता है?, ३१०; क्या करें?, ३५८; क्या भारत मद्यनिषेध चाहता है?, २७३-५; खादीकी प्रगति, ३२-३, ५९६; खादीके पक्ष और विपक्षमें, ३६४-५; खादीके प्रति द्वेष, ३८९; खादी-सम्बन्धी चित्र-तालिका, ४९९; गलतफहमी, २८६-७; गश्ती पत्र, ३६९-७० ; गुजरातमें खादी, १८; गुजरात में खादीकी मासिक प्रगति, १६४-५; गुजरातमें चरखा, ५४३; गुरुकुल और खादी, २८५, गोरक्षा, ५०१-२; जड़ाऊ जूतियां बनाम चिथड़े, २२१-२; जाति-सुधार, १६४; जेल या अस्पताल?, २९-३१; 'तकली शिक्षक', ३०६-७; तमिलनाडुका एक गाँव, १८६-७; त्रैमासिक}}<noinclude></noinclude> mzpoiymhw7ogm9vw5a3wjlmeljowr73 674892 674891 2026-08-29T09:29:41Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित नहीं */ 674892 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>{{Rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} {{Multicol}} {{outdent|{{gap}}नन्दको, १७७-८; -हकीम अजमलखाँ- का जाला, ४८४-८; अधिक लोग नहीं, को, १९३-५, २८१; -हरनारायणको, २७७; - हरबर्ट ऐंडर्सनको, १९८, २३७-८; - हरसुखरायको, ९० ; - हरिभाऊको, ८०-१; - हरिभाऊ गणेश पाठकको, ४९२; -हरिलालको, ५५०-१; -हासम हीरजीको ४१८-९; - हिन्दी साहित्य-सम्मेलनके प्रधान मन्त्रीको, ३७०; - हेनरी लारेंस-को, ३५०; -हेमप्रभा दासगुप्तको, ५१७; –हैरॉल्डमैनको, २५; –हेलेन हाउसडिंगको, २३९}} {{outdent|प्रस्ताव : दक्षिण आफ्रिकाके सम्बन्ध में, ४४१-२}} {{outdent|भाषण : एक विवाहमें, ६४-७; –संगीतके बारेमें, १७०-२}} {{outdent|भेंट : कृषि आयोगके सम्बन्धमें, ३६७; –दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलको, १९; –समाचारपत्रोंको, ५८६}} {{outdent|वक्तव्य : दक्षिण आफ्रिकाकी समस्यापर, ३७४-५; –मसूरी यात्रा स्थगित करने के सम्बन्धमें, ३४७; –रंगभेद विधेयकपर, ४८०}} {{outdent|सन्देश : अब्राह्मणोंको, ५०४; –जलियाँवाला बागके सम्बन्ध में, २९३-४; –त्रिवेन्द्रम-की एक सभाके लिए, २२५; –दक्षिण आफ्रिकासे एन्ड्रयूजकी वापसीपर, ४२२; –'फ्रीडम' को, ४२१; –भावनगर रियासत 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हरसुखरायको, ९० ; - हरिभाऊको, ८०-१; - हरिभाऊ गणेश पाठकको, ४९२; -हरिलालको, ५५०-१; -हासम हीरजीको, ४१८- ९; - हिन्दी साहित्य-सम्मेलनके प्रधान मन्त्रीको, ३७०; - हेनरी लारेंस- को, ३५०; - हेमप्रभा दासगुप्तको, ५१७; - हैरॉल्डमैनको, २५; -हेलेन हाउसडिंगको, २३९ प्रस्ताव : दक्षिण आफ्रिकाके सम्बन्ध में, ४४१-२ भाषण : एक विवाहमें, ६४-७; -संगीतके बारेमें, १७०-२ भेंट : कृषि आयोगके सम्बन्धमें, ३६७; -दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलको, १९; -समाचारपत्रोंको, ५८६ वक्तव्य : दक्षिण आफ्रिकाकी समस्यापर, ३७४-५; - मसूरी यात्रा स्थगित करने के सम्बन्धमें, ३४७ - रंगभेद विधेयकपर, ४८० सन्देश : अब्राह्मणोंको, ५०४, -जलियाँवाला बागके सम्बन्ध में, २९३-४; - त्रिवेन्द्रम- की एक सभाके लिए, २२५; -दक्षिण आफ्रिकासे एन्ड्रयूज की वापसीपर, ४२२; -'फ्रीडम' को, ४२१; -भावनगर रियासत जन-परिषद्को, ४८१; -'लिबरेटर' को, १११-२; -वकीलों- के सम्मेलनको, २७५; -विद्यार्थियोंको, ६२२-४; -'हिन्दुस्तानी ' को, ११३ विविध अखिल भारतीय गोरक्षा संघ, ५५५-६; अ० भा० च० संघसे ऋण लेनेके लिए इकरारनामेका मसविदा, ४२४-५; अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक, २५४-५; अज्ञान- गुणी और 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(३-६-१९२६)|| ५६४ |६२५.|| पत्र : न्यायमूर्ति पी० आर० दासको (३-६-१९२६)|| ५६५ |६२६.|| पत्र : बासन्तीदेवीको (३-६-१९२६)|| ५६५ |६२७.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३-६-१९२६)|| ५६६ |६२८.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (३-६-१९२६)|| ५६६ |६२९.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३-६-१९२६)|| ५६७ |६३०.|| पत्र : जयन्तीलालको (३-६-१९२६)|| ५६७ |६३१.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२६)|| ५६८ |६३२.|| पत्र : एच० एस० एल० पोलकको (४-६-१९२६)|| ५६८ |६३३.|| पत्र : एस० शंकरको (४-६-१९२६)|| ५६९ |६३४.|| पत्र : नमुदुरी वेंकटरावको (४-६-१९२६)|| ५७० |६३५.|| पत्र : एक मुस्लिम नेताको (४-६-१९२६)|| ५७१ |६३६.|| पत्र : ए० एस० डेविडको (५-६-१९२६)|| ५७२ |६३७.|| पत्र : पेरीन कैप्टेनको (५-६-१९२६)|| ५७३ |६३८.|| पत्र : प्राणजीवनदास ज० मेहताको (५-६-१९२६)|| ५७४ |६३९.|| पत्र : जयकुँवर मणिलाल डॉक्टरको (५-६-१९२६)|| ५७४ |६४०.|| पत्र : अमृतलालको (५-६-१९२६)|| ५७५ |६४१.|| पत्र : लक्ष्मीदास पुरुषोत्तम आसरको (५-६-१९२६)|| ५७५ |६४२.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (५-६-१९२६)|| ५७६ |६४३.|| भारत सेवक समाजकी क्षति (६-६-१९२६)|| ५७७ |६४४.|| अहिंसाकी गुत्थी (६-६-१९२६)|| ५७७ |६४५.|| टिप्पणियाँ: एक शिकायत; ऐसे गोरक्षा हो सकती है ? धर्मके नामपर अधर्म (६-६-१९२६)|| ५७९ |६४६.|| पत्र : के० टी० पॉलको (६-६-१९२६)|| ५८२<noinclude></noinclude> dq4i7grnwptaoa1etmtmz0cubhqdopj 674792 674791 2026-08-28T16:07:13Z शिखर तिवारी 633 674792 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|तीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |६१८.|| अखिल भारतीय गोरक्षा संघ (३-६-१९२६)|| ५५५ |- |६१९.|| कुटिल कानून (३-६-१९२६)|| ५५६ |- |६२०.|| राष्ट्रीय शिक्षा (३-६-१९२६)|| ५५८ |- |६२१.|| टिप्पणियाँ : भारत सेवक समाज; देशभक्ति बनाम पूँजीवाद; साधन जुटाने की चतुराई; अच्छा भी और बुरा भी; अप्रैलके आँकड़े (३-६-१९२६)|| ५६० |- |६२२.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३-६-१९२६)|| ५६३ |- |६२३.|| पत्र : वी० जे० पटेलको (३-६-१९२६)|| ५६३ |- |६२४.|| पत्र: उर्मिलादेवीको (३-६-१९२६)|| ५६४ |- |६२५.|| पत्र : न्यायमूर्ति पी० आर० दासको (३-६-१९२६)|| ५६५ |- |६२६.|| पत्र : बासन्तीदेवीको (३-६-१९२६)|| ५६५ |- |६२७.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३-६-१९२६)|| ५६६ |- |६२८.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (३-६-१९२६)|| ५६६ |- |६२९.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३-६-१९२६)|| ५६७ |- |६३०.|| पत्र : जयन्तीलालको (३-६-१९२६)|| ५६७ |- |६३१.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२६)|| ५६८ |- |६३२.|| पत्र : एच० एस० एल० पोलकको (४-६-१९२६)|| ५६८ |- |६३३.|| पत्र : एस० शंकरको (४-६-१९२६)|| ५६९ |- |६३४.|| पत्र : नमुदुरी वेंकटरावको (४-६-१९२६)|| ५७० |- |६३५.|| पत्र : एक मुस्लिम नेताको (४-६-१९२६)|| ५७१ |- |६३६.|| पत्र : ए० एस० डेविडको (५-६-१९२६)|| ५७२ |- |६३७.|| पत्र : पेरीन कैप्टेनको (५-६-१९२६)|| ५७३ |- |६३८.|| पत्र : प्राणजीवनदास ज० मेहताको (५-६-१९२६)|| ५७४ |- |६३९.|| पत्र : जयकुँवर मणिलाल डॉक्टरको (५-६-१९२६)|| ५७४ |- |६४०.|| पत्र : अमृतलालको (५-६-१९२६)|| ५७५ |- |६४१.|| पत्र : लक्ष्मीदास पुरुषोत्तम आसरको (५-६-१९२६)|| ५७५ |- |६४२.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (५-६-१९२६)|| ५७६ |- |६४३.|| भारत सेवक समाजकी क्षति (६-६-१९२६)|| ५७७ |- |६४४.|| अहिंसाकी गुत्थी (६-६-१९२६)|| ५७७ |- |६४५.|| टिप्पणियाँ: एक शिकायत; ऐसे गोरक्षा हो सकती है ? धर्मके नामपर अधर्म (६-६-१९२६)|| ५७९ |- |६४६.|| पत्र : के० टी० पॉलको (६-६-१९२६)|| ५८२<noinclude></noinclude> b4718qvtjm84u9wlwv2t6tbhfdxw8po 674793 674792 2026-08-28T16:07:51Z शिखर तिवारी 633 674793 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|तीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |६१८.|| अखिल भारतीय गोरक्षा संघ (३-६-१९२६)|| ५५५ |- |६१९.|| कुटिल कानून (३-६-१९२६)|| ५५६ |- |६२०.|| राष्ट्रीय शिक्षा (३-६-१९२६)|| ५५८ |- |६२१.|| टिप्पणियाँ : भारत सेवक समाज; देशभक्ति बनाम पूँजीवाद; साधन जुटाने की चतुराई; अच्छा भी और बुरा भी; अप्रैलके आँकड़े (३-६-१९२६) || ५६० |- |६२२.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३-६-१९२६)|| ५६३ |- |६२३.|| पत्र : वी० जे० पटेलको (३-६-१९२६)|| ५६३ |- |६२४.|| पत्र: उर्मिलादेवीको (३-६-१९२६)|| ५६४ |- |६२५.|| पत्र : न्यायमूर्ति पी० आर० दासको (३-६-१९२६)|| ५६५ |- |६२६.|| पत्र : बासन्तीदेवीको (३-६-१९२६)|| ५६५ |- |६२७.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३-६-१९२६)|| ५६६ |- |६२८.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (३-६-१९२६)|| ५६६ |- |६२९.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३-६-१९२६)|| ५६७ |- |६३०.|| पत्र : जयन्तीलालको (३-६-१९२६)|| ५६७ |- |६३१.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२६)|| ५६८ |- |६३२.|| पत्र : एच० एस० एल० पोलकको (४-६-१९२६)|| ५६८ |- |६३३.|| पत्र : एस० शंकरको (४-६-१९२६)|| ५६९ |- |६३४.|| पत्र : नमुदुरी वेंकटरावको (४-६-१९२६)|| ५७० |- |६३५.|| पत्र : एक मुस्लिम नेताको (४-६-१९२६)|| ५७१ |- |६३६.|| पत्र : ए० एस० डेविडको (५-६-१९२६)|| ५७२ |- |६३७.|| पत्र : पेरीन कैप्टेनको (५-६-१९२६)|| ५७३ |- |६३८.|| पत्र : प्राणजीवनदास ज० मेहताको (५-६-१९२६)|| ५७४ |- |६३९.|| पत्र : जयकुँवर मणिलाल डॉक्टरको (५-६-१९२६)|| ५७४ |- |६४०.|| पत्र : अमृतलालको (५-६-१९२६)|| ५७५ |- |६४१.|| पत्र : लक्ष्मीदास पुरुषोत्तम आसरको (५-६-१९२६)|| ५७५ |- |६४२.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (५-६-१९२६)|| ५७६ |- |६४३.|| भारत सेवक समाजकी क्षति (६-६-१९२६)|| ५७७ |- |६४४.|| अहिंसाकी गुत्थी (६-६-१९२६)|| ५७७ |- |६४५.|| टिप्पणियाँ: एक शिकायत; ऐसे गोरक्षा हो सकती है ? धर्मके नामपर अधर्म (६-६-१९२६)|| ५७९ |- |६४६.|| पत्र : के० टी० पॉलको (६-६-१९२६)|| ५८२<noinclude></noinclude> t2icarn9lgn0nm24mr9mnw686j7ryxk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४२ 250 184946 674805 641228 2026-08-28T16:25:15Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674805 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''माल करते हैं। दुनियाके किसी भी देशमें, जापान तकमें, इतने कुशल बुनकर नहीं हैं जितने कि हमारे पास हैं। मैं खुद एक बुनकर हूँ और मुझे इसपर गर्व है, क्योंकि बुनकरोंपर ही देशकी खुशहालीका दारोमदार है। लोग जब भी मुझसे पूछते हैं कि मेरा पेशा क्या है, तो मैं गर्वसे यही जवाब देता हूँ कि मैं किसान और बुनकर हूँ, बैरिस्टर नहीं हूँ। बुनकर हाथका कता सूत इस्तेमाल करके इस देशको खुशहाल बना सकते हैं। यह नहीं सोचना चाहिए कि यदि आप हाथका कता सूत इस्तेमाल करेंगे तो बरबाद हो जायेंगे। आज आपके लिए अपना हुनर दिखाने या लोगोंके लिए बढ़िया कपड़े पहनकर निकलनेका अवसर नहीं है। स्वराज्य मिलनेतक और खिलाफत तथा पंजाबके अन्यायोंका प्रतिकार होनेतक हमें मोटे कपड़े पहनने चाहिए। यदि आप कोशिश करें तो आसानीसे हाथके कते सूतसे कपड़ा बुन सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि आपको जबतक हायका कता सूत मिलता रहेगा तबतक आप यह खयाल अपने दिमागमें नहीं लायेंगे कि हाथका कता सूत इस्तेमाल करनेसे आपको कम मजूरी मिलेगी। मैं आपको भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि आपकी कमाई इतनी ही बनी रहेगी जितनी कि आज है। आपके पास अभी जितना भी विदेशी सूत हो उसे आपको त्याग देना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि पहली अगस्तको<ref>विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका आन्दोलन आरम्भ करनेके लिए यही तिथि निश्चित की गई थी।</ref> कोई भी विदेशी वस्त्र पहने न दिखाई पड़े, और मैं कहूँगा कि उस दिन किसीको भी विदेशी वस्त्र पहनकर चौपाटीपर नहीं आना चाहिए। बुनकर लोगोंको श्री मुहम्मद अली और श्री खत्रीसे मिलकर उनके साथ अपनी कठिनाइयोंके बारेमें बात करनी चाहिए। अगर आप १ अगस्ततक विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार कर सकें तो आप आसानीसे स्वराज्य प्राप्त करने योग्य हो जायेंगे।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १९-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१९४. पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्र्यूजको'''}}}} {{Right|बम्बई<br>१८ जुलाई [१९२१]}} {{Left|प्रिय चार्ली,}} यदि तुमको पत्र न लिखना कर्त्तव्यकी उपेक्षा करना कहा जा सकता है तो मैं कर्त्तव्यकी उपेक्षा करनेका दोषी हूँ। तुम्हारी आत्मा तो सदा ही मेरे साथ रहती है। मैं समझता था कि तुम शिमलामें हो। मैंने स्टोक्सकी<ref>सैम्युल स्टोक्स, सार्वजनिक कार्यकर्त्ता और गांधीजीके सहयोगी।</ref> खुली चिट्ठी नहीं देखी।<noinclude></noinclude> qw495a81xbws7jutyo4xd892204cxgj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४३ 250 184947 674810 641229 2026-08-28T16:38:57Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674810 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईकी मुसलमान महिलाओंके समक्ष|४११}}</noinclude>लेकिन इस हफ्तेके 'यंग इंडिया'में बेगार<ref>देखिए "शिमलाकी छाया", २१-७-१९२१।</ref> और स्त्रियोंकी स्थितिके<ref>देखिए "स्त्रियों की स्थिति", २१-७-१९२१।</ref> सम्बन्धमें अग्रलेख रहेंगे। मैंने इस मामलेमें बंगालके नाम तुम्हारे सन्देशके बारेमें विचार व्यक्त किये हैं। जल्दी अच्छे हो जाओ। गुरुदेवके प्रति मेरा प्रेम निवेदन करना और उनके स्वास्थ्यके बारेमें मुझे लिखना। सस्नेह, {{Right|{{larger|तुम्हारा,<br>मोहन}}}} {{Left|[पुनश्च :]}} पोलककी बहन सैली नहीं रही। अंग्रेजी पत्र (जी॰ एन॰ १३०९ और जी॰ एन॰ २६३९) की फोटो-नकलसे। {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१९५. भाषण : बम्बईकी मुसलमान महिलाओंके समक्ष'''<ref>नेपियन सी रोडपर ५०० से अधिक मुसलमान महिलाओंकी एक सभा हुई थी। गांधीजीने स्वदेशीके बारेमें हिन्दुस्तानीमें भाषण किया था। मूल हिन्दी भाषण उपलब्ध नहीं है।</ref>}}}} {{Right|१९ जुलाई, १९२१}} '''महात्मा गांधीने कहा : मुसलमानोंके साथ मेरे पुराने सम्बन्ध हैं। जो सज्जन मुझे पहली बार आफ्रिका ले गये थे वे भी एक मुसलमान मित्र ही थे। यहाँ मौजूद आप सभी महिलाएँ मेरी बहनें हैं। स्वराज्यके लिए हम जितनी भी कोशिशें कर रहे हैं वे सब आपके मजहबपर कोई आँच न आने देनेके लिए हैं। मेरे दिमागमें हिन्दू और मुसलमानके बीच कोई फर्क नहीं है।''' '''मेरी रायमें तो सभी मजहब अच्छे हैं। कभी-कभी कुछ गुमराह लोगोंकी वहजसे मजहबमें कुछ गलत बातें शामिल जाती हैं। 'कुरान शरीफ' में जो भी कुछ है सब अच्छा है। सभी मजहबोंमें सचाई मौजूद है। हम सभी इस्लामकी बहबूदी चाहते हैं। हम बिलकुल नहीं चाहते कि दुनियामें शैतानका राज हो।''' '''शैतानके राजमें मै कोई भी अच्छा काम नहीं कर सकता। आज ही शामको मेरे पास अलीगढ़से एक तार आया है, जिसमें कहा गया है कि श्री शेरवानीको जेल भेज दिया गया है, हालाँकि वे शान्तिके लिए काम कर रहे थे। ऐसा भी मौका आ सकता है जब सभी अच्छे आदमियोंको जेलोंमें डाल दिया जाये। हममें से हर एकको उसके लिए तैयार रहना चाहिए। आफ्रिकामें हिन्दुओं और मुसलमानोंने मर्द-औरतका कोई फर्क माने बिना जेल जानेमें कोई कोताही नहीं की थी और इस तरह अपने'''<noinclude></noinclude> qffkcbwsirn7sjed01zez4ujo7xljgn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४४ 250 184948 674811 641230 2026-08-28T16:49:55Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674811 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''देशकी इज्जतको महफूज रखा था। ऐश-आरामकी जिन्दगी बसर करनेवाले लोग जेलकी जिन्दगी बरदाश्त नहीं कर पायेंगे, क्योंकि उनको वहाँ दिनमें दस बार चाय और बढ़िया कपड़े मिलनेवाले नहीं हैं।''' आपको अपने मजहबकी खातिर सभी ऐश-आराम छोड़ देने चाहिए और खादी पहनना शुरू कर देना चाहिए। भारतको जबतक स्वराज्य नहीं मिल जाता और खिलाफत तथा पंजाबके अन्यायोंका प्रतिकार नहीं हो जाता, तबतक हर एकको विलायती कपड़ोंसे दूर रहना चाहिए। स्वराज्य मिल जानेपर हम सभी तरहका स्वदेशी कपड़ा तैयार करने लगेंगे। इसलिए आपको छः महीनेके लिए सभी ऐश-आराम छोड़ देने पड़ेंगे। '''मुझे यह सुनकर बड़ी खुशी हुई है कि श्रीमती हाजी यूसुफ सोबानीने कातना शुरू कर दिया है। आप सबको अपने पास उसी तरह चरखा रखना चाहिए जैसे आप अपनी गोदमें बच्चेको रखती हैं। आपको स्वराज्य और खिलाफतकी खातिर हर दिन कमसे-कम कुछ घंटे तो जरूर ही भगवान्‌का नाम लेते हुए कताई करनी चाहिए। चरखके जरिये भारतीय नारीत्वकी प्रतिष्ठाकी रक्षा ही नहीं होगी, आप अपने घरोंमें ही बैठकर स्वतन्त्र रूपसे अपनी आमदनी भी बढ़ा सकेंगी। चरखके जरिये आप अपने मुल्कके लिए जितना कर सकती हैं, उतना तलवारके जोरपर नहीं किया जा सकता। बहुतसे भारतीयोंकी महीने-भरकी आमदनी आठसे पन्द्रह रुपयेतक है। जो उनके परिवारोंके लिए पूरी नहीं पड़ती। गंगाबेतने बीजापुरके गरीब भारतीयोंके घरोंमें दो हजार चरखे चलवाये हैं; इसका नतीजा यह हुआ है कि उनको वहाँसे बढ़िया किस्मका हाथका कता सूत मिल जाता है और वहाँके लोगोंको जीविकाका एक स्वतन्त्र साधन मिल गया है।''' '''महात्मा गांधीने भाषण जारी रखते हुए कहा : पहले हम ढाकाकी उम्दा मल-मल तैयार कर लेते थे, लेकिन मौजूदा सरकारकी वजहसे वहाँके बुनकर बड़ी खराब हालतमें हैं और वे अपना धन्धा करनेमें असमर्थ हैं। हमें बढ़िया कपड़ेके लिए मैनचेस्टर नहीं जाना चाहिए। एक भारतीय महिलाने मुझे जरीके कामकी एक साड़ी दी है। उसका वजन करीब बारह सेर<ref>स्पष्टता यह भूल है यहाँ सेरको जगह पौंड होना चाहिए। देखिए "भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर", १६-७-१९२१।</ref> है। अगर आप लोग इतनी भारी साड़ियाँ पहन सकती हैं, तो खादीकी साड़ियाँ क्यों नहीं पहन सकतीं? स्त्रियाँ पुरुषोंकी अपेक्षा कहीं ज्यादा तकलीफ और मुसीबत बरदाश्त कर सकती हैं; इसलिए खादीका पूरा-पूरा इस्तेमाल करनेमें उनके लिए कोई रुकावट नहीं है। श्रीमती मजहरुल हकने मुझे हीरेकी चार चूड़ियाँ दी हैं। स्त्रियोंको अपने आभूषणोंसे बहुत मोह होता है, इसलिए इस तरहका त्याग बतलाता है कि स्वराज्य नजदीक आ रहा है। सुन्दर स्त्री वही है जिसके दिलमें भगवान्का खयाल है। बाहरी सुन्दरताके सभी उपकरण उनको छोड़ देने'''<noinclude></noinclude> 48br31qpf68rwp60505i85z3d8wfupo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४५ 250 184949 674820 641231 2026-08-28T17:41:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674820 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष|४१३}}</noinclude>'''चाहिए। बढ़िया महीन कपड़ोंके लिए आपको जापान, फ्रांस और चीनकी तरफ नहीं देखना चाहिए। आप सभीको हिन्दुओं और मुसलमानोंकी कामयाबीके लिए भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिए, लेकिन आपकी प्रार्थनामें असर तभी पैदा होगा जब आपके दिल पवित्र हों और बदनपर स्वदेशी कपड़े हों। यह एक बड़ा मुश्किल-सा अहद है। लेकिन एक बार ऐसा अहद कर लेनेपर उसपर चलना सचमुच आसान हो जाता है।''' '''अन्तमें महात्मा गांधीने वहाँ मौजूद सभी महिलाओंसे कहा कि वे या तो अपने विलायती कपड़े आगमें झोंक दें या उनको स्मरना भेज दें। उन्होंने बोलनेकी दावत देने और पूरे ध्यानसे उनकी बात सुननेके लिए सभीको धन्यवाद दिया।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २०-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१९६. भाषण : बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष'''<ref>पारसी राजकीय सभाके तत्त्वावधानमें मारवाड़ी विद्यालय हॉलमें एक सभा आयोजित की गई थी, जिसमें गांधीजीने शहरके शराबके हिन्दू और पारसी ठेकेदारोंके सामने भाषण दिया था।</ref>}}}} {{Right|१९ जुलाई, १९२१}} श्री गांधीने कहा : मैंने पिछली बार आप लोगोंको बतलाया था कि धरनेका सारा काम कांग्रेस कमेटीके हाथमें है और मैं तो आपको सलाह-भर दे सकता हूँ कि आपको क्या करना चाहिए। लेकिन आप लोगोंको मेरी सलाहका नतीजा मालूम ही है। कुछ ठेकेदारोंने सरकारके पास भेजा जानेवाला प्रार्थनापत्र देख ही लिया है; और चूँकि आप असहयोगी नहीं हैं, इसलिए आपके ऐसा करनेपर किसीको कोई एत-राज नहीं हो सकता। यदि आप असहयोगी होते तो शराबके ठेके न रखते। ठेकेदारोंको सरकारके पास प्रार्थनापत्र भेजने का पूरा अधिकार है। कहा गया है कि ठेकेदार सेवक हैं। अगर सेवक हैं, तो भी सरकारको अदा की गई फीसकी वापसीके लिए अपनी सरकारसे कहना कोई गलत बात नहीं है। सरकार आपके ठेके जबरन बन्द नहीं कर सकती। इसके लिए उसे एक नया कानून पास करना पड़ेगा। लेकिन ठेकेदार लोग अपनी अदा की गई फीस वापस लेकर अपने ठेके बन्द कर सकते हैं।''' '''धारवाड़ और अलीगढ़की दुःखद घटनाओंके बारेमें आपको मालूम ही है। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि इतने सारे लोगोंके मरनेकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी शराबके ठेकोंपर ही है। श्री शेरवानी अलीगढ़के एक बहुत ही जाने-माने प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वे एक मुसलमान जमींदार परिवारके हैं और केम्ब्रिजके ग्रेजुएट हैं। अलीगढ़से मिले एक तारमें मुझे बतलाया गया है कि कल श्री शेरवानीको भी गिरफ्तार कर लिया गया। श्री शेरवानीने भीड़को शान्त करनेकी भरसक कोशिश की, उन्होंने भीड़को'''<noinclude></noinclude> mli8zpbi5d8lrqfhxnm7skv8n3x9dx7 674821 674820 2026-08-28T17:41:59Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674821 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष|४१३}}</noinclude>'''चाहिए। बढ़िया महीन कपड़ोंके लिए आपको जापान, फ्रांस और चीनकी तरफ नहीं देखना चाहिए। आप सभीको हिन्दुओं और मुसलमानोंकी कामयाबीके लिए भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिए, लेकिन आपकी प्रार्थनामें असर तभी पैदा होगा जब आपके दिल पवित्र हों और बदनपर स्वदेशी कपड़े हों। यह एक बड़ा मुश्किल-सा अहद है। लेकिन एक बार ऐसा अहद कर लेनेपर उसपर चलना सचमुच आसान हो जाता है।''' '''अन्तमें महात्मा गांधीने वहाँ मौजूद सभी महिलाओंसे कहा कि वे या तो अपने विलायती कपड़े आगमें झोंक दें या उनको स्मरना भेज दें। उन्होंने बोलनेकी दावत देने और पूरे ध्यानसे उनकी बात सुननेके लिए सभीको धन्यवाद दिया।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २०-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१९६. भाषण : बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष'''<ref>पारसी राजकीय सभाके तत्त्वावधानमें मारवाड़ी विद्यालय हॉलमें एक सभा आयोजित की गई थी, जिसमें गांधीजीने शहरके शराबके हिन्दू और पारसी ठेकेदारोंके सामने भाषण दिया था।</ref>}}}} {{Right|१९ जुलाई, १९२१}} '''श्री गांधीने कहा : मैंने पिछली बार आप लोगोंको बतलाया था कि धरनेका सारा काम कांग्रेस कमेटीके हाथमें है और मैं तो आपको सलाह-भर दे सकता हूँ कि आपको क्या करना चाहिए। लेकिन आप लोगोंको मेरी सलाहका नतीजा मालूम ही है। कुछ ठेकेदारोंने सरकारके पास भेजा जानेवाला प्रार्थनापत्र देख ही लिया है; और चूँकि आप असहयोगी नहीं हैं, इसलिए आपके ऐसा करनेपर किसीको कोई एत-राज नहीं हो सकता। यदि आप असहयोगी होते तो शराबके ठेके न रखते। ठेकेदारोंको सरकारके पास प्रार्थनापत्र भेजने का पूरा अधिकार है। कहा गया है कि ठेकेदार सेवक हैं। अगर सेवक हैं, तो भी सरकारको अदा की गई फीसकी वापसीके लिए अपनी सरकारसे कहना कोई गलत बात नहीं है। सरकार आपके ठेके जबरन बन्द नहीं कर सकती। इसके लिए उसे एक नया कानून पास करना पड़ेगा। लेकिन ठेकेदार लोग अपनी अदा की गई फीस वापस लेकर अपने ठेके बन्द कर सकते हैं।''' '''धारवाड़ और अलीगढ़की दुःखद घटनाओंके बारेमें आपको मालूम ही है। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि इतने सारे लोगोंके मरनेकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी शराबके ठेकोंपर ही है। श्री शेरवानी अलीगढ़के एक बहुत ही जाने-माने प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वे एक मुसलमान जमींदार परिवारके हैं और केम्ब्रिजके ग्रेजुएट हैं। अलीगढ़से मिले एक तारमें मुझे बतलाया गया है कि कल श्री शेरवानीको भी गिरफ्तार कर लिया गया। श्री शेरवानीने भीड़को शान्त करनेकी भरसक कोशिश की, उन्होंने भीड़को'''<noinclude></noinclude> bbgt6xiz72o30020lsngpvl4xjucslw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४६ 250 184950 674822 641232 2026-08-28T17:43:27Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674822 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{Rh|४१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>शान्त बनाये रखने के लिए हर कोशिश की थी; अलबत्ता उन्होंने 'नाक रगड़ने' से इनकार कर दिया था और लोगोंमें उत्साह बनाये रखनेका प्रयत्न किया था। अब उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया है। सारी गड़बड़ीको जिम्मेदारी किसपर है ? गड़बड़ी धरनेके समय शुरू हुई थी। श्री गंगाधरराव देशपाण्डेने मुझे बेलगाँव से तार भेजकर सूचित किया है कि उनको और उनके मित्रोंको आदेश दिया गया है कि वे वहाँ छावनीके हलके में शराबके ठेकोंपर धरना न दें। श्री देशपाण्डेने पूछा है कि वे इस आदेशका पालन करें या न करें। मैंने श्री देशपाण्डेको यही सलाह दी है कि आदेश गैर-कानूनी तो है पर उसका पालन किया जाना चाहिए और सविनय अवज्ञा भी संयत ढंग से करना ही ठीक होगा। शराब-विक्रेताओंका फर्ज है कि वे अपने करोड़ों देशवासियोंकी इच्छाका आदर करें। अपने ठेके बन्द करके, आप अपने देश- को लाभ पहुँचायेंगे और जो चीज पूरे देशके हित में है वह आपके भी हितकी चीज है। मैं पक्की तौरपर जानता हूँ कि शराबके कुछ ठेकेदारों की माली हालत अच्छी नहीं है । देशकी जनताका फर्ज है कि वह इन लोगोंकी सहायता के लिए जो भी कर सकती हो, करे। लेकिन आप लोगोंको भी यह स्वीकार करना चाहिए कि आप अपने ठेके चालू रखकर देशको नुकसान पहुँचा रहे हैं। श्री गांधीने शराब के ठेकेदारोंको चेतावनी दी कि अगर आपने अगस्तके अन्ततक कुछ नहीं किया तो बड़ी गड़बड़ी मच जायेगी। दुबारा जब धरना देना शुरू किया जायेगा तो वह काफी संजीदगीसे किया जायेगा। धरना देनेवाले लोग धरना छोड़ने- की अपेक्षा जेल जाना और यहाँतक कि गोली खाना ही ज्यादा पसन्द करेंगे। मैं महसूस करता हूँ कि ठेके बन्द हो जाने चाहिए, चाहे फिर सरकारी आदेशपर धरना देना बन्द न करनेपर खूनकी नदियाँ ही बह चलें । मैं आपसे यह वायदा नहीं कर सकता कि अगस्त के महीने में फिरसे धरना देना शुरू नहीं किया जायेगा। क्योंकि धरना देनेवालों ने जिस बातका अहद किया है वह उन्हें कामयाबी के साथ पूरा करना ही चाहिए, फिर उनको चाहे जितनी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। मेरे पास कई पत्र आ चुके हैं जिनमें कहा गया है कि धरने बन्द करके मैंने ठीक नहीं किया। मुझपर दोष लगाया गया है कि मैंने अली भाइयोंको कमजोर सलाह दी और मुझे इस बात के लिए भी दोषी ठहराया गया है कि मैंने पहले सत्याग्रह आन्दोलन बन्द करवा दिया था और अब धरने भी बन्द करा दिये हैं। मैंने अली भाइयोंको जो सलाह दी थी वह कमजोरीकी सलाह नहीं थी, वह मजबूती पैदा करनेवाली सलाह थी और सत्याग्रह तथा धरनोंके मामले में भी यही बात है। इसीलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप देशकी आवाजपर कान दें और देशको आसन्न बलिदानसे बचायें । में किसी रोग से पीड़ित होकर भरने की बजाय धरना देते हुए मरना ही ज्यादा पसन्द करूँगा । मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि और भी बहुतसे लोग ऐसा ही करनेके लिए तैयार हैं ।<noinclude></noinclude> pcx85aifa82d80g2ecwb10zb69bkqqu 674839 674822 2026-08-28T18:43:21Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''शान्त बनाये रखनेके लिए हर कोशिश की थी; अलबत्ता उन्होंने 'नाक रगड़ने' से इनकार कर दिया था और लोगोंमें उत्साह बनाये रखनेका प्रयत्न किया था। अब उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया है। सारी गड़बड़ीको जिम्मेदारी किसपर है? गड़बड़ी धरनेके समय शुरू हुई थी। श्री गंगाधरराव देशपाण्डेने मुझे बेलगाँवसे तार भेजकर सूचित किया है कि उनको और उनके मित्रोंको आदेश दिया गया है कि वे वहाँ छावनीके हलकेमें शराबके ठेकोंपर धरना न दें। श्री देशपाण्डेने पूछा है कि वे इस आदेशका पालन करें या न करें। मैंने श्री देशपाण्डेको यही सलाह दी है कि आदेश गैर-कानूनी तो है पर उसका पालन किया जाना चाहिए और सविनय अवज्ञा भी संयत ढंगसे करना ही ठीक होगा। शराब-विक्रेताओंका फर्ज है कि वे अपने करोड़ों देशवासियोंकी इच्छाका आदर करें। अपने ठेके बन्द करके, आप अपने देशको लाभ पहुँचायेंगे और जो चीज पूरे देशके हितमें है वह आपके भी हितकी चीज है। मैं पक्की तौरपर जानता हूँ कि शराबके कुछ ठेकेदारों की माली हालत अच्छी नहीं है। देशकी जनताका फर्ज है कि वह इन लोगोंकी सहायताके लिए जो भी कर सकती हो, करे। लेकिन आप लोगोंको भी यह स्वीकार करना चाहिए कि आप अपने ठेके चालू रखकर देशको नुकसान पहुँचा रहे हैं।''' '''श्री गांधीने शराबके ठेकेदारोंको चेतावनी दी कि अगर आपने अगस्तके अन्ततक कुछ नहीं किया तो बड़ी गड़बड़ी मच जायेगी। दुबारा जब धरना देना शुरू किया जायेगा तो वह काफी संजीदगीसे किया जायेगा। धरना देनेवाले लोग धरना छोड़नेकी अपेक्षा जेल जाना और यहाँतक कि गोली खाना ही ज्यादा पसन्द करेंगे। मैं महसूस करता हूँ कि ठेके बन्द हो जाने चाहिए, चाहे फिर सरकारी आदेशपर धरना देना बन्द न करनेपर खूनकी नदियाँ ही बह चलें। मैं आपसे यह वायदा नहीं कर सकता कि अगस्तके महीनेमें फिरसे धरना देना शुरू नहीं किया जायेगा। क्योंकि धरना देनेवालों ने जिस बातका अहद किया है वह उन्हें कामयाबीके साथ पूरा करना ही चाहिए, फिर उनको चाहे जितनी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। मेरे पास कई पत्र आ चुके हैं जिनमें कहा गया है कि धरने बन्द करके मैंने ठीक नहीं किया। मुझपर दोष लगाया गया है कि मैंने अली भाइयोंको कमजोर सलाह दी और मुझे इस बातके लिए भी दोषी ठहराया गया है कि मैंने पहले सत्याग्रह आन्दोलन बन्द करवा दिया था और अब धरने भी बन्द करा दिये हैं। मैंने अली भाइयोंको जो सलाह दी थी वह कमजोरीकी सलाह नहीं थी, वह मजबूती पैदा करनेवाली सलाह थी और सत्याग्रह तथा धरनोंके मामलेमें भी यही बात है। इसीलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप देशकी आवाजपर कान दें और देशको आसन्न बलिदानसे बचायें। मैं किसी रोगसे पीड़ित होकर भरनेकी बजाय धरना देते हुए मरना ही ज्यादा पसन्द करूँगा। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि और भी बहुतसे लोग ऐसा ही करनेके लिए तैयार हैं।'''<noinclude></noinclude> h70bbdb19hngjmaigfntlsuy0oknnx9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४७ 250 184951 674840 641233 2026-08-28T18:52:06Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674840 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष|४१५}}</noinclude>'''श्री गांधीने अपने भाषणके अन्तमें शराबके ठेकेदारोंसे अपील की कि उनको ऐसे समयमें देशके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा करना चाहिए, और कहा कि उपस्थित लोगोंमें से जो लोग प्रश्न करना चाहते हों, वे प्रश्न करें।''' '''श्री मानेकजी बारियाने कहा कि बेईमानी शराब-विक्रेताओंमें ही नहीं सभी पेशोंमें चल रही है। हमारे सामने सवाल यह है कि ठेके कौन लोग और कब बन्द करें? शराबका रोजगार हजारों सालसे चलता आ रहा है और उसे एकबारगी बन्द नहीं किया जा सकता। ठेके धीरे-धीरे एक-एक करके बन्द किये जाने चाहिए। कोई भी पेशा हो, यदि उसे ईमानदारीसे चलाया जाये तो फिर उसमें शर्म या बेईमानीकी बात नहीं है। हर एकको अपने-अपने हितोंका ध्यान रखना पड़ता है। और यहाँतक कि स्वदेशीके प्राण, श्री गांधीको भी यदि कोलाबा जाना हो तो वे बैलगाड़ीमें नहीं जायेंगे, बल्कि तेज चलनेवाली विदेशी विक्टोरियामें ही जाना पसन्द करेंगे। शराबबन्दी तो शराब पीनेवालों की आदत छुड़ाकर ही की जा सकती है; उसका दूसरा कोई रास्ता नहीं है। ठेकेदारोंने सरकारको फीसकी वापसीके लिए लिखा है और उसके वापस होते ही वे अपने ठेके बन्द कर देंगे। सरकार उनको होनेवाले घाटका हिसाब पूरे सालकी उनकी बिक्री को देखकर ही लगा सकती है, कुछ महीनोंकी विक्रीको देखकर नहीं। मैं श्री गांधीसे पूछता हूँ, आप कहते हैं कि हमें सितम्बरतक स्वराज्य मिल जायेगा; तो क्या उस समय हम एक कानून पास करके शराबकी बिक्री बन्द नहीं कर सकते? श्री गांधी किस तारीखसे शराबकी बिक्री बन्द करना चाहते हैं?''' श्री गांधी : आज ही से। (हँसी और हर्ष-ध्वनि) '''इसपर श्री बारियाने कहा कि यदि श्री गांधी इसी दिनसे बिक्री बन्द कराना चाहते हैं, तो यह तो भगवान् चाहे तभी हो सकता है।''' '''श्री गांधीने कहा कि मैं तो चाहता हूँ कि आज ही से बन्द हो जाये, लेकिन सवाल यह है कि क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? मैं तो बहुत-सी चीजें करना चाहता हूँ, लेकिन हो सकता है कि मैं न कर पाऊँ!''' '''श्री गांधीने [श्रोताओंके प्रश्नोंका] उत्तर देते हुए कहा कि मुझे आशा है कि हम इस समासे एक कदम आगे बढ़े हैं। मैं चाहता हूँ कि आप इस मसविदेपर तभी दस्तखत करें जब आप इस दिशामें कदम आगे बढ़ाना चाहते हों। सितम्बर महीनेमें खूनकी नदियाँ बहनेके बारेमेंमें कहना चाहता हूँ कि श्री शेरवानी, श्री मुहम्मद अली और मेरी तरह धरना देनेवाले बहुत सारे लोग होंगे और यदि उनको गिरफ्तार कर लिया जायेगा तो उनकी जगह लेनेके लिए सैकड़ों और लोग खड़े हो जायेंगे। और यदि उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया तो हजारों देशवासी अपनी जान कुर्बान करनेको आगे आ जायेंगे और तब सरकारके सामने यही एक चारा रह जायेगा कि उनको गोली मारकर उनका खून कर दे। धारवाड़ और अलीगढ़में क्या हुआ था? शायद धारवाड़में भीड़ने पथराव किया था। उसका जवाब दिया गया गोलियोंसे।'''<noinclude></noinclude> 31cqp8xuwt80vemphqrtnncu72q584p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०१ 250 185184 674779 643259 2026-08-28T13:08:55Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674779 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|६६५}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|देशी राजा, -[ओं] की स्वराज्य के अन्तर्गत स्थिति, ५८७-८, ५९८; -के विरुद्ध शिकायत, ५८७-९०}} {{outdent|देशी राज्य; -[ों] का स्वराज्यमें दर्जा, ५८६-८७; -में कांग्रेसका काम, ५८६}} {{outdent|देसाई, गोपालदास, ८६}} {{outdent|देसाई, जीवनलाल, ४२}} {{outdent|देसाई, प्रागजी, के॰ ३४०, ४२३; -के प्रति जेलमें व्यवहार, ४१२-३, ४६२}} {{outdent|देसाई, भूलाभाई, ३६५}} {{outdent|देसाई, महादेव, १, ३१, ३७, ११४-५, १३७, १४१, १६८, १७९, १९५, २१६, २३२, २५०, २७४, ३२१-२, ३२४, ३८३, ४०६, ४२५, ४६१; -की उपवासरत गांधीजी से बातचीत, १८७-८}} {{outdent|देसाई, वा॰ गो॰, ३४६}} {{outdent|द्रोणाचार्य, ६०२}} {{outdent|द्रौपदी, ६-७, ९४, १००, २०२}} {{c|'''ध'''}} {{outdent|धनपतराय, ५५४}} {{outdent|धर्म, -और अहिंसा, ९९-१०१, १८०-१; -और उपवास, १८८, १९४-५, २२८; -और जीवन, ५०; -और दया, ६३८; -और राजनीति, ५५-६, ३८१}} {{c|'''न'''}} {{outdent|नकुल, ९४}} {{outdent|नगरपालिकाओंका कार्य, ४८१}} {{outdent|नगावी, भीमराव, ८७}} {{outdent|नटराजन, १०४}} {{outdent|नटेसन, जी॰ ए॰, ३२३ पा॰ टि॰, ४६५}} {{outdent|नन्दा, गुलजारीलाल, ३३}} {{outdent|नम्बूद्रीपाद, ४१३}} {{outdent|नरमदलवाले (उदारदलवाले या लिबरल दलवाले), ८१, १३७, २७७, ३१३,}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}३६५, ३८०, ३८५, ३८७-८, ४१९, ४४१, ५०३-४, ५२४, ५७८}} {{outdent|नल, ७}} {{outdent|'''नवजीवन,''' ३-४ ६१, १०७, ११३, ११५, ११७, १५५, १७६, १७९, २०७, २१०, २१६, २२२-३, २७५, ३२१, ३६९, ४०६, ५९०, ६०९, ६१७}} {{outdent|'''नवयुग,''' ४१२, ४६२}} {{outdent|'''नवाकाल''', १५५}} {{outdent|नवीन, ३४३}} {{outdent|नाग, हरदयाल; -के बलगाँव कांग्रेस में सम्मिलित न होनेका कारण, ४९६ पा॰ टि॰}} {{outdent|नागरिक संस्थाके कर्त्तव्य, ३०९}} {{outdent|नायडू, पी॰ के॰, ३९९, ५०४, ५२५; -की मृत्युपर टिप्पणी, २२५-६}} {{outdent|नायडू, (श्रीमती), पी॰ के॰, २२६}} {{outdent|नायडू, श्रीमती सरोजिनी, १८, २९, ३७, ४६, ५६, ५९, ६४, ६८, २१३, २६१, ३५४, ३६५, ३९७-८, ४८२, ५०२-४, ५५७, ५७७; -की सराहना, ५३३}} {{outdent|नारंग, गोकुलचन्द, १६५}} {{outdent|नारायण, [भगवान], ३७२}} {{outdent|निकलसन, ९०}} {{outdent|निजामी, ख्वाजा, हसन, १९७, २५५, ५४७, -द्वारा एकता परिषद्की आलोचनाका खण्डन, २५५-५७}} {{outdent|निम्बकर, १३७}} {{outdent|निरंजन (बाबू), १०३}} {{outdent|निर्वाचक-मण्डल और साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व, ४४७-८}} {{outdent|निषादराज, १७७}} {{outdent|निष्कुलानन्द, ३७२}} {{outdent|नीरो, ४७०}} {{outdent|'''नेचुरल हिस्ट्री ऑफ वर्ड्स,''' ८९}} {{outdent|नेटाल, -में भारतीय, १७}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> f31jhngl2n3kqtork3stidpd8l72ieh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०२ 250 185185 674785 643260 2026-08-28T14:22:40Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674785 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{Rh|६६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|नेहरू, कमला, ८८}} {{outdent|नेहरू, जवाहरलाल, ६८, ८८, १०४, १०८, ११३, १२४-५, १५७, १९३, २२७, २५७, २५९, ३२४, ३४८, ४४६, ५०७, ५३७, ५३९; -की सराहना, ५४३; -के पुत्रकी मृत्युपर शोक-सन्देश, ३९५}} {{outdent|नेहरू, मोतीलाल, १४, ३१, ३८, ५६, ५८, ६२, ६५, ६८, ७१, ७५, ९५, १०३, १४२, १६८, २३०, २५७, २५९, २६२-३, २८६, २८८, ३०७, ३१९, ३२९ पा॰ टि॰, ३३३, ३७८, ३९५, ४०९, ४११, ४३८, ४४४, ४५०, ४८४, ४९१, ४९९, ५००, ५१०, ५२६, ५२८-३१, ५३५, ५७७; -के हिन्दू-मुस्लिम एकताको बढ़ावा देनेके प्रयास, ४४५-६}} {{outdent|नेपोलियन, २३८}} {{outdent|नैयर, प्यारेलाल, १, ३१, ११५, १४१, ३२४}} {{outdent|नौरोजी, दादाभाई, ६४, ३५८; -की यादगार, १०९-११}} {{outdent|'''न्यू इंडिया''', ५८ पा॰ टि॰}} {{c|'''प'''}} {{outdent|पंजाब प्रान्तीय परिषद्, ४४१, ४५७}} {{outdent|'''पंचीकरण''', २५२}} {{outdent|पटनायक, निरंजन, ८८}} {{outdent|पटेल डाह्याभाई, एम॰, २७५, ४६५}} {{outdent|पटेल, मणिबहन, १४१, १६१, २२८, २९१}} {{outdent|पटेल, वल्लभभाई, ३, १४, ३५, १४१, १६१, ३२२, ३६१, ४०६, ४६२, ५६०, ५६७, ५७०, ५७७, ६१६, ६३५}} {{outdent|पटेल, विट्ठलभाई, ४८४}} {{outdent|पट्टणी, रमाबहन, ४०७}} {{outdent|पट्टणी, सर प्रभाशंकर, ४०८, ४६०, ४६२-६४, ४७६, ५७४, ५७६, ६१५; -द्वारा कताई, ३२६-२७}} {{Multicol-break}} {{outdent|पणिक्कर, के॰ एम॰, १५९}} {{outdent|पण्डित वसुमती, १, ११६, १६९, २००, २७४, २८६, ३२८-२९}} {{outdent|पत्रकारिता, -के सिद्धान्त, ६०८; -लोकसेवा, २९८-९९}} {{outdent|परमानन्द भाई, २३६}} {{outdent|परांजपे, आर॰ पी॰, 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674785 2026-08-28T14:24:35Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674786 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|नेहरू, कमला, ८८}} {{outdent|नेहरू, जवाहरलाल, ६८, ८८, १०४, १०८, ११३, १२४-५, १५७, १९३, २२७, २५७, २५९, ३२४, ३४८, ४४६, ५०७, ५३७, ५३९; -की सराहना, ५४३; -के पुत्रकी मृत्युपर शोक-सन्देश, ३९५}} {{outdent|नेहरू, मोतीलाल, १४, ३१, ३८, ५६, ५८, ६२, ६५, ६८, ७१, ७५, ९५, १०३, १४२, १६८, २३०, २५७, २५९, २६२-३, २८६, २८८, ३०७, ३१९, ३२९ पा॰ टि॰, ३३३, ३७८, ३९५, ४०९, ४११, ४३८, ४४४, ४५०, ४८४, ४९१, ४९९, ५००, ५१०, ५२६, ५२८-३१, ५३५, ५७७; -के हिन्दू-मुस्लिम एकताको बढ़ावा देनेके प्रयास, ४४५-६}} {{outdent|नेपोलियन, २३८}} {{outdent|नैयर, प्यारेलाल, १, ३१, ११५, १४१, ३२४}} {{outdent|नौरोजी, दादाभाई, ६४, ३५८; -की यादगार, १०९-११}} {{outdent|'''न्यू इंडिया''', ५८ पा॰ टि॰}} {{c|'''प'''}} {{outdent|पंजाब प्रान्तीय परिषद्, ४४१, ४५७}} {{outdent|'''पंचीकरण''', २५२}} {{outdent|पटनायक, निरंजन, ८८}} {{outdent|पटेल डाह्याभाई, एम॰, २७५, ४६५}} {{outdent|पटेल, मणिबहन, १४१, १६१, २२८, २९१}} {{outdent|पटेल, वल्लभभाई, ३, १४, ३५, १४१, १६१, ३२२, ३६१, ४०६, ४६२, ५६०, ५६७, ५७०, ५७७, ६१६, ६३५}} {{outdent|पटेल, विट्ठलभाई, ४८४}} {{outdent|पट्टणी, रमाबहन, ४०७}} {{outdent|पट्टणी, सर प्रभाशंकर, ४०८, ४६०, ४६२-६४, ४७६, ५७४, ५७६, ६१५; -द्वारा कताई, ३२६-२७}} {{Multicol-break}} {{outdent|पणिक्कर, के॰ एम॰, १५९}} {{outdent|पण्डित वसुमती, १, ११६, १६९, २००, २७४, २८६, ३२८-२९}} {{outdent|पत्रकारिता, -के सिद्धान्त, ६०८; -लोकसेवा, २९८-९९}} {{outdent|परमानन्द भाई, २३६}} {{outdent|परांजपे, आर॰ पी॰, ३६५}} {{outdent|परीख, नरहरि, २३२, ४०६}} {{outdent|परीडा विश्वनाथ, ८८}} {{outdent|परेरा, ५७९-८०}} {{outdent|पाण्डव, ३८३, ४३९}} {{outdent|'''पातंजल योगसूत्र''', ९०, २५३}} {{outdent|पादशा, पेस्तनजी, ४९५}} {{outdent|पापाराव, एम॰, ८५}} {{outdent|पारसी, ५६, ६०, ६२, ८५, १०१, १२१, २०२ पा॰ टि॰, २९८, ३९७; -और सरकारी नौकरियाँ, ५५८; -[सियों] की परोपकारिता, १११}} {{outdent|पारसी धर्म, १९२}} {{outdent|पारेख देवचन्द, ४६३, ५७६, ६१५}} {{outdent|पार्वती, १००, १७३, १८८, २४१}} {{outdent|पार्वती, टी॰ वी॰, ३६५}} {{outdent|पॉल, के॰ टी॰, ४०}} {{outdent|पाल, विपिनचन्द्र, ३६५}} {{outdent|'''पावरटी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया,''' ११० पा॰ टि॰}} {{outdent|पिक्थॉल, ६३}} {{outdent|पिट, १३६}} {{outdent|पियर्सन, ; -की सेवाएँ, २०४-५}} {{outdent|पिल्ले, षण्मुख सुन्दरम्, ८७}} {{outdent|पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, सर, ३६५}} {{outdent|पुजारी, एस॰ जी॰, ४९३}} {{outdent|पूंजी; -और श्रमके बीच सम्बन्ध ५८७}} {{outdent|पूंजीवाद, ५६५}} {{outdent|पूअर, ४९५}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> eswdu8cwjth2gzunodtra0maf946uvd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०३ 250 185186 674787 643261 2026-08-28T15:36:53Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674787 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|६६७}}</noinclude>{{Multicol} {{outdent|पेटिट, कुमारी, २३५}} {{outdent|पेटिट, जे॰ बी॰ ३६५}} {{outdent|'''पैगम्बर साहबकी जीवनी''', ९१}} {{outdent|'''पैगम्बर साहबकी स्वीकारोक्तियाँ''', ९०}} {{outdent|प्रसाद, डॉ॰ राजेन्द्र, ८६, ११३, १७६, ५३९, ५८९-८०}} {{outdent|प्रसाद, यशवन्त, २१०, ६१५}} {{outdent|प्रह्लाद, ६०३}} {{outdent|प्रार्थना; की प्रभावकारिता, ३४२}} {{outdent|प्रीतम, ३७२}} {{outdent|'''प्रेममित्र''', ९०}} {{outdent|'''प्रो क्रिस्टो एट एक्शेल्सिया''', ९०}} {{outdent|प्रोटेस्टैंट पंथ, २७१}} {{c|'''फ'''}} {{outdent|फड़के, वी॰ एल॰, ४७५ -की सराहना, ५६७-६८}} {{outdent|'''फाइव एम्पायर्स''', ९०}} {{outdent|'''फाइव नेशन्स''', ९०}} {{outdent|'''फॉरवर्ड''' ४६६}} {{outdent|'''फॉस्ट''', ८२, ९०, १९० पा॰ टि॰}} {{outdent|'''फिलो क्रिस्ट्स''', ९०}} {{outdent|फीडियस, २६७}} {{outdent|फीनो, एम॰, २८}} {{outdent|फील्ड, क्लॉड, १६४}} {{outdent|फेरर, ८९, ८१}} {{outdent|फेरवानी, ९०}} {{outdent|'''फ्रीडम ऐंड ग्रोथ''', ९१}} {{c|'''ब'''}} {{outdent|'''बंगाल''', -के विरुद्ध सर्वदलीय सम्मेलन का प्रस्ताव, ३६२-६३; -में गिरफ्तारी २८७, २८९, २९३-९४, २९९, ३०७-८, ३१५, ३३१, ३६७, ३९१}} {{outdent|'''बंगाली''', ३०२}} {{outdent|बकल, ९०}} {{Multicol-break}} {{outdent|बजाज, जमनालाल, २९-३१, १०१, १०३, १०६, 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/>{{Rh|६६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|बुहलर, ९०}} {{outdent|बेकन, ९०}} {{outdent|बेटी-व्यवहार, -और अस्पृश्यता, ५४६-४७ बेलगाँव, -की कांग्रेस में गांधीजीके भाषण, ४९७, ५२५}} {{outdent|बेलगाँववाला, १४}} {{outdent|बेलामी, एडवर्ड, ९०}} {{outdent|बेसेंट, डॉ॰ एनी, ६२, ६४, ६९, ७५, १०४, १५४, १८५, २५८, ३६३, ३८५, ४१०, ५१७, ५२९, ५४३; -बेलगाँव कांग्रेस में प्रशंसा, ५३६; -के जन्म-दिवसपर सन्देश, २३४; -द्वारा कताई, १७१}} {{outdent|बैंकर, शंकरलाल, २०३, ३६१, ५७७, ५८२}} {{outdent|बैप्टिस्टा, जोजेफ, ३६५}} {{outdent|'''बैरकरूम बैलेड्स,''' ९०}} {{outdent|बोथा, जनरल, ९६}} {{outdent|बोलशेविज्म, -और इस्लाम, १९; -और गांधीवाद, १९-२१, ४५२-५३, ५६५}} {{outdent|बोस, सत्यानन्द, ३२०}} {{outdent|बोस, सुभाषचन्द्र, ३९१; -की गिरफ्तारी, ३०९}} {{outdent|बोहमेन, जेकब, ९०, १६३}} {{outdent|बौद्ध; -[ों] का बुद्ध गया-मन्दिरपर दावा, ५७९-८०}} {{outdent|ब्रह्मचर्य, ३४२, -और ब्रह्मचर्य-जीवन, ६०९; -के गुण, २७०-७१; –के पालनके लिए आवश्यक बातें, १४२; -के लक्षण, ६०१}} {{outdent|ब्रह्मचारी, ३४३}} {{outdent|ब्रिअर्ली, जे॰, ९०, १६५}} {{outdent|ब्रिटिश साम्राज्य, ४७३, ५८५; -और देशी राज्य, ५८६-८७; -के कानून, २९४}} {{c|'''भ'''}} {{outdent|'''भगवती सूत्र''', ९१}} {{Multicol-break}} {{outdent|'''भगवद्‌गीता''', ६४, ७२, ७४, ९०, १६५, १७४, १९१, २५३, २६०, ४३१, ४६८, ४९१, ५००, ५४६, ५४८, ५५३, ६१२-१३, ६३८; देखिए, 'गीता' भी ।}} {{outdent|भगवानदास, बाबू, ९०, १३१, ३६५, ३८४, ५१४}} {{outdent|भट्ट, मणिशंकर रतनजी, ५८६}} {{outdent|भरत, २४१}} {{outdent|भरूचा, ७३, ३५१, ३५७, ५३९-४०}} {{outdent|भर्गरी, जी॰ एम॰, की मृत्युपर शोक-प्रस्ताव, ५३२-३३}} {{outdent|भवभूति, ७}} {{outdent|भवानीदयाल, ३२}} {{outdent|'''भागवत्,''' ९०, ९३, २४७, २५२, ३४२, ५००, ५५२}} {{outdent|भानु, ९०}} {{outdent|'''भारतका इतिहास,''' ९०}} {{outdent|भारतीय प्रवासी, ५२३; -केनिया में, १८, ४६; ट्रान्सवाल में २६१; -दक्षिण आफ्रिका में, १७; -नेटाल में, १७, ४१३; -पूर्वी आफ्रिका, ५५८; -फिजीमें, ४२२; -बर्मामें, ४६; -[सियों] द्वारा भारतके लिए दान, ३०५-६}} {{outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ११, ३४, ३८, ५७, ६६, ६९, ७५, ८१, ८५, ९७-९८, १४८, १७१-७२, १८५, ३०२, ३३४, ३३५, ३८०, ४५७, ४६९, ४७८; -और गांधीजीका स्वराज्यवादियोंके साथ समझौता, ४०९; -और सोवियत कांग्रेस, २१७-१८; -और स्वराज्यवादी, ५८, १३०-३२, १५७-५८, २७८, २७९, ३५७-६०, ३७२-७७, ३८६, ४८९-९२, ५१६-१८; -का कलकत्ता समझौते और कताई-सदस्यतापर प्रस्ताव, ५२६-२८; -का देशी राज्यों में काम, ५८६;}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ts4cykfr6fcg13cundsl814jlu9pypf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०५ 250 185188 674894 643263 2026-08-29T09:50:29Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|६६९}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}-का बड़ा दायरा, १२८-३२, १४९-५१, ३२४, ३६५, ३७४, ४१९-२०; -का बेलगाँव अधिवेशन, ४०९; -का संविधान, ३०७; -की अखिल भारतीय कमेटी द्वारा पुष्टि, ३७२-७७, ४१०; -की कार्य समितिकी बैठक, ३६१, ५७७; -की फिजूलखर्ची, ५५९-६०; -को एक करनेका प्रयत्न, ३०७-८; -द्वारा असहयोगका स्थगन, २०७-९, ३०७; -पर प्रभाव, ५५८-६२, ५७८-८१; -पर भाषण, ५२९-३२; -महामण्डलके रूपमें, २४८-४९, ३७४, ४१२}} {{outdent|भावे, बालकृष्ण, न॰, ११८}} {{outdent|भाषा, –केन्द्र और राज्योंमें सरकारी भाषा, ५१५; -राष्ट्रीय, १३३}} {{outdent|भीकाजी, दिनशा, ११२}} {{outdent|भीड़शाही, ५६५}} {{outdent|भीम, ९३, १००}} {{outdent|भीष्म, ६०२}} {{outdent|भोपटकर, ४८७, ५३५, ५४२}} {{outdent|भोर, जे॰ डब्ल्यू॰ ४२२}} {{c|'''म'''}} {{outdent|'''मं'''गलदत्त, ३८४}} {{outdent|मंजरअली, १, ६९, १३३, ३२४}} {{outdent|मजीद अब्दुल, ४३}} {{outdent|'''मणिरत्नमाला,''' २५२}} {{outdent|मणिलाल, विश्वेश्वर, ३}} {{outdent|मताधिकार ; -स्वराज्य के अन्तर्गत, ५१४}} {{outdent|मथुरादास, त्रिकमजी, ११८, १६८, २४१, २७६, ३९४, ४६१, ६१५}} {{outdent|मद्यपान; -अमेरिकामें २४८, २५०; -का निषेध, २५०-५१, २७५, ३३६-३७, ३४४; -पर कांग्रेसका प्रस्ताव, ५३८-३९}} {{outdent|मनसुख लाल, ५८६}} {{outdent|'''मनुस्मृति''', ९०}} {{Multicol-break}} {{outdent|मरे, कर्नल, ४२३}} {{outdent|मलाबार; -में सहायता कार्य, २-४, ३८, २०६}} {{outdent|मवन्त (क्रमवन्त), जगन्नाथ शास्त्री, ११२}} {{outdent|मशीन; -और मनुष्य, २६८-६९, २७३}} {{outdent|महमूद, डॉ॰ सैयद, २५७, २६२, २७९}} {{outdent|'''महाभारत''', ९०, ९३, १०२, १३३, २६०, २९७; -क्या है, १६-१७, १३६}} {{outdent|'''महाराष्ट्र धर्म''', ९१}} {{outdent|महावीर, (तीर्थंकर), १७०}} {{outdent|महिला; -[एँ] और कताई, २३३; -और खादी, ४०७; -[ओं] के गुण, ७}} {{outdent|'''माई फिलासफी ऐंड रिलीजन''', ९०}} {{outdent|'''मॉडर्न प्रॉब्लम्स''', ९१}} {{outdent|'''मॉडर्न रिव्यू''', ३३६}} {{outdent|'''माधुरी''', ३२८}} {{outdent|मान्टेग्यू, ई॰ एस॰, ४३५, ६०५}} {{outdent|मामूँ, १९२}} {{outdent|'''मार्कण्डेय पुराण''', ९०}} {{outdent|मार्क्सवाद, देखिए बोलशेविज्म}} {{outdent|मार्गरेट, ८२}} {{outdent|मालवीय, मदनमोहन, १०२, ३४९, ३५२, ३६५, ४१८, ४५५, ४७०, ४९२, ५००, ५०३, ५२६, ५४६; -के खिलाफ लगाये गये आरोपोंपर क्षोभ, ४२९}} {{outdent|माल्कम, मेजर जनरल, सर, ११२}} {{outdent|मावलंकर, ४०५}} {{outdent|[द] '''मास्टर ऐंड हिज टीचिंग''', ८९}} {{outdent|मिल जान स्टुअर्ट, २७२}} {{outdent|'''मिलाप''', २८३}} {{outdent|मिल्टन, ४३२}} {{outdent|'''मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम''', ९१}} {{outdent|'''मिस्टिक्स ऐंड सेंट्स ऑफ इस्लाम''', १६४}} {{outdent|'''मिस्र, कुमारी''', ८९}} {{outdent|मिस्र, -में दमन, ५२३}} {{outdent|मीनाक्षी, सुन्दरम् श्रीयुत, ८७, ५४०}} {{outdent|मीर अली, (श्रीमती), २३५}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> fsp5gsx0eyeqkyf7d372dlvltdx5sqe पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०६ 250 185189 674911 643264 2026-08-29T11:45:01Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674911 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|मीराबाई, ६४, ३७२}} {{outdent|मीराबहन, ३४१, ५५७}} {{outdent|मुंजे, डॉ॰ बी॰ एस॰, ८३, १७७, १८१, २५८, २६३}} {{outdent|'''मुक्तधारा''', ९०}} {{outdent|मुखर्जी, सर आशुतोष, ५०४, ५२५}} {{outdent|मुखर्जी, सतीशचन्द्र, ११५, २२१, ३१८, ३५०, ३८३}} {{outdent|मुदवेडकर, के॰, ५३३, ५३७}} {{outdent|मुदालियर, टी॰ वी॰ गोपालस्वामी, ५२५}} {{outdent|मुदालियर, रामस्वामी, ३६४}} {{outdent|मुन्शीराम, देखिए स्वामी श्रद्धानन्द,}} {{outdent|'''मुबल्लिग''', २५५}} {{outdent|मुलशीपेटा; -के सत्याग्रहियों द्वारा मारपीटकी भर्त्सना, ४७३-७४}} {{outdent|मुसलमान, ५, १६, १९-२०, ५५-५६, ६०, ६२, ८४, ९२, १०० १, १०६, १११, १२५, १४७-४८, १८२, १८३-८४, १८७-८८, २०२, २२५, २३२, २५८, २६३, २६७-६९, ३३५, ३४८, ४९, ३८२, ३९०, ३९६, ४२७, ५४९, ६०१; -और कताई, १५-१६; -और गो-रक्षा, ५५२-५४; -और सरकारी पद, ५५८; -कोहाटमें, ४५५-५६; -[ों] को हिन्दी पढ़नी चाहिए, १३३; -द्वारा गोंडलके शासकके खिलाफ शिकायत, ६०६-७}} {{outdent|मुस्लिम लीग; -का वार्षिक अधिवेशन, ५५७-५८}} {{outdent|मुस्लिम लीगी, ५२४}} {{outdent|मुहम्मद अली, ३१, १०२, १०७, ११३, ११७, १४१, १५३, १६६, १८२, १८७- ८८, १९५, २१५, २३८, २४०, २४२, २६२, २७९, २८३, २९८, ३०५, ३२१, ३२३, ३२५, ३५४, ३६१-६२, ३६५, ३६९, ३८२, ३९७, ४२५, ४३९,}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}४९८, ५००-१, ५२९, ५४१, ५५८, ६२९; -द्वारा कताई, १५, १५६, १९९, २५०}} {{outdent|मुहम्मद अली, (बेगम), ४९८}} {{outdent|मुहम्मद अली, डा॰, ९१}} {{outdent|मुहम्मद, पैगम्बर, (हजरत), १९०, १९५-९६, २५६, २७३, २९६-९७, ४१४-१५, ४३२; -का व्यक्तित्व, १३४-३५}} {{outdent|मृत्यु और जन्म, २७६, ३५५, ३८०, ३९७; -पर रोना-धोना व्यर्थ, ३९७}} {{outdent|मेकॉलिफ, ९०, १६४}} {{outdent|'''मेसेज ऑफ क्राइस्ट''', ९०}} {{outdent|'''मेसेज ऑफ मुहम्मद''', ९०}} {{outdent|मेकाले, लार्ड, ४३१}} {{outdent|मेल, कर्नल, ३४०, ४२३}} {{outdent|मेहता, कुंवरजी विट्ठलभाई, ४६२}} {{outdent|मेहता, जयसुखलाल, ३८५}} {{outdent|मेहता, डॉ॰, ३४३, ५७४}} {{outdent|मेहता, सर फिरोजशाह, ४६६}} {{outdent|मेहर, तुलसी, २११, ३४३}} {{outdent|मैंजियरली, मैडम डी॰,; -द्वारा हाथ कताई, ४१० पा॰ टि॰}} {{outdent|मैक्समूलर, ९०}} {{outdent|मैडॉक, कर्नल, ९५, ४२३, ४६७, ६०३, ६१२}} {{outdent|मैडॉक, श्रीमती, ९५, ६१२}} {{outdent|'''मैन ऐंड सुपरमैन''', ९०}} {{outdent|मोअज्जम, १०५, ११४}} {{outdent|मोक्ष, २६९, ५४८; -और अहिंसा, २९; -और सत्य, २९; -की प्राप्तिके साधन, ५५४}} {{outdent|मोटले, ९१, १३६}} {{outdent|मोटी बा, १६९}} {{outdent|मोदी, भगवानजी अ॰, ४६३}} {{outdent|मोरारजी, शान्तिकुमार, २४३, ३२८}} {{outdent|मोल्टन, ९०}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> lqjiih8ztk1k9wuwk8moejmz1j6mlgm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४२ 250 186310 674888 674542 2026-08-29T09:15:24Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|५१०| सम्पूर्ण गांधी वाङमय}}</noinclude>हिंसा करके हमें हजरत मुहम्मदके बतलाये मार्ग से भटकना नहीं चाहिए, और अपनी ही मूर्खतासे प्रगतिके चक्रको पीछे की ओर नहीं घुमाना चाहिए । {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,''' २४-११-१९२१}} {{C|{{larger|'''२०९. बम्बईके नागरिकोंसे'''<ref>१. यह अंग्रेजीमें वे टु पीस' (शान्तिका मार्ग) शीर्षकसे छपा था और प्रारम्भिक टिप्पणी में बताया गया था कि यह गांधीजी द्वारा जारी की गई गुजराती अपीलका अनुवाद है ।</ref>}}}} {{Right|बम्बई<br> २६ नवम्बर, १९२१}} ईश्वरकी कृपासे एक बार फिर हमारे बीच शान्ति स्थापित हो गई है । अब हम एक-दूसरेका सिर फोड़ने, एक दूसरेपर पथराव करने और इमारतें जलानेमें नहीं लगे हुए हैं। फिर भी, हममें से कुछ लोग अब भी नाराज हैं, उनमें कटुता है और हमारे भीतर भय है । यह बात मिलनेवाले अनेक लोगों और पत्र लेखकोंकी भाषासे जाहिर होती है । हम तभी इस शान्तिको सच्ची शान्ति कह सकते हैं जब हमारे मन इन कलुषोंसे मुक्त हो जायें। ऐसी स्थिति उत्पन्न करनेके लिए पहला काम यह करना चाहिए कि हिन्दू और मुसलमान साफ दिलसे अपना अपराध स्वीकार करें। जिन्होंने पहले हाथ उठाया, दोषी उन्हींको माना जायेगा । यदि मैं अपनी बात किसीको अपशब्द कहकर शुरू करता हूँ तो उसके सारे नतीजे के लिए जिम्मेदार मैं ही होऊँगा । यदि हिन्दुओं और मुसलमानोंने लोगोंके सिरपरसे जबरदस्ती विदेशी टोपियाँ हटाकर या पत्थर चलाकर किसी वारदातकी शुरूआत की तो दोषी पक्ष उन्हींका है। इसके अलावा उनका बहुत भारी बहुमत है; और अधिकांशतः हिन्दुओं तथा मुसलमानोंने ही अहिंसाकी शपथ ली है। इसलिए पहले उन्हींको अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए । मैं यहाँपर कानूनकी निगाहसे जिम्मेदारीका विचार नहीं कर रहा हूँ। मैं तो केवल आदमी-आदमीके बीच पारस्परिक व्यवहारकी दृष्टिसे इस बातका विचार कर रहा हूँ । यदि पारसी और ईसाई, उनका जितना दोष है, उसे महसूस नहीं करते, तो स्थायी शान्ति प्रस्थापित करना कठिन है। जिस समय हिन्दुओं और मुसलमानोंने हिंसा शुरू की उस समय यदि पारसी और ईसाइयोंने जवाबमें हाथ न उठाया होता तो उन्हें देवदूत समझा जाता और उन्होंने संसारको अपने आत्मिक बलका अद्भुत परिचय दिया होता । वे अपने बचाव में हाथ उठाते, यह तो बिल्कुल ठीक था, किन्तु उन्होंने केवल अपना बचाव ही नहीं किया वरन वे भी क्रुद्ध हो उठे और आत्मरक्षाकी सीमाओंसे आगे बढ़ गये । उनमें से कुछने जरूरत से ज्यादा हिंसाका प्रयोग किया। और यदि वे उतना भर स्वीकार नहीं करते तो तत्काल हार्दिक शान्ति पाना कठिन होगा, क्योंकि इस तथ्य के बावजूद कि पारसियों और ईसाइयोंको उत्तेजित किया गया था, हिन्दू और मुसलमान<noinclude></noinclude> 435al4xy96u9qj3ia1fd71mxtk6lz9s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४३ 250 186311 674895 644662 2026-08-29T09:56:16Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674895 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||बम्बईके नागरिकोंसे| ५११}}</noinclude>उन्हें पूरी तरह बेगुनाह नहीं मानेंगे। यदि केवल एक ही पक्ष अपराध करता रहे और दूसरा बराबर धैर्यसे सहता रहे तो अपराधी पक्ष अपने प्रयत्नमें थक जायेगा । यदि क्रियाकी कोई प्रतिक्रिया ही न हो तो संसारका उद्धार हो जाये। लेकिन आमतौरपर हम गालीका जवाब तमाचेसे देते हैं । एक तमाचेका जवाब दोसे दिया जाता है और फिर उसका जवाब लातसे और लातका गोलीसे दिया जाता है। इस तरह पापका दायरा बराबर बढ़ता जाता है । परन्तु आमतौर पर जो लोग " दाँतके बदले दाँत " के सिद्धान्तमें विश्वास रखते हैं, वे कुछ समय बाद एक-दूसरेको क्षमा कर देते हैं और दोस्त बन जाते हैं। क्या इस सामान्य नियमपर चलना असम्भव है ? इसलिए मैं पारसी और ईसाई दोस्तोंसे यह कहने में नहीं झिझकता कि वे पारस्परिक क्षमा-दानके नियमपर चलकर एक दूसरेके अपराध भूल जायें । परन्तु हिन्दुओं और मुसलमानोंपर जो विशेष उत्तरदायित्व है, उसपर मैं अवश्य ही जोर देता हूँ । पारसी और ईसाई क्षमा करें या न करें, हिन्दुओं और मुसलमानोंको अपना अपराध स्वीकार करके, ईश्वरसे क्षमा माँगकर और शान्त रहकर अपने आपको शुद्ध करना है। जिन लोगोंको क्षति पहुँची है या जिन्हें प्रियजनोंसे वंचित होना पड़ा है उन्हें इस तरहकी चोटोंका असर अवश्य महसूस होगा। उनमें से कुछ तो इतने गरीब हैं कि नुकसान झेल ही नहीं सकते । हमें उनकी स्थिति समझनी चाहिए। और मुझे विश्वास है कि जो इस नुकसानकी मार सह नहीं सकते, ऐसे लोगोंके नुकसानकी जाँच करने और अन्दाजा लगानेके लिए एक गैर-सरकारी समिति नियुक्त की जायेगी और यह समिति उन लोगोंकी सहायता के लिए आवश्यक राशि संग्रह करेगी। साथ ही मुझे आशा है कि कोई भी पक्ष कानून या सरकारकी शरणमें नहीं जायेगा । यह सलाह मैं सिर्फ एक असहयोगी के ही नाते नहीं दे रहा हूँ, यह सलाह अपने इस अनुभव के आधार पर दे रहा हूँ कि निजी पंच-फैसले द्वारा ऐसे मामलोंका अधिक सच्चा और उपयुक्त निपटारा होता है। कटुतासे बचनेका भी यही रास्ता है । शान्ति कायम करनेका सबसे आसान तरीका यह है कि हम अदालत में एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत करनेका खयाल छोड़कर निरोधक उपायोंकी ओर अपना ध्यान केन्द्रित करें ताकि ऐसा पागलपन फिर नहीं किया जा सके। और मुझे आशा है कि ऐसे उपाय अपनाकर बम्बई अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा फिर प्राप्त कर लेगा । {{Right|आपका सेवक,<br>'''मो० क० गांधी'''}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,'''१-१२-१९२१}}<noinclude></noinclude> cqfj7138c8ykg6jsy5b3sdfc27pamxt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४४ 250 186312 674896 644663 2026-08-29T10:02:33Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''२१०. सन्देश : बम्बईके मिल मजदूरोंको'''<ref>बम्बईके मिल मजदूरोंके क्षेत्रमें एक पर्चे के रूपमें वितरित ।</ref>}}}} {{Right|[ २७ नवम्बर, १९२१ के पूर्व ]}} {{Left|मिलमें काम करनेवाले बन्धुओ,}} {{Gap}}यह सच है कि मैं आपको व्यक्तिगत रूपसे नहीं जानता लेकिन समस्त हिन्दुस्तान के मजदूरोंके लिए मैं मजदूर बना हूँ । इसलिए आपके साथ मेरा निकटका सम्बन्ध है । मेरी इच्छा है कि आप सब मिलोंके खुलते ही तुरन्त कामपर जायें और फिर कभी मालिकोंके छुट्टी दिये बिना कामसे अलग न रहें और न किसी भी उपद्रवमें भाग लें। {{right|आपका हितैषी,<br> '''मोहनदास करमचन्द गांधी'''}} {{Left|[ गुजरातीसे ]<br> '''गुजराती''', २७-११-१९२१}} {{c|{{x-larger|'''२११. उदार दलवालोंके नाम'''<ref>यह " मोपलोंके बारेमें " शीर्षकसे इसी तिथिको प्रकाशित किया गया था ।</ref>}}}} {{Right|[ २७ नवम्बर, १९२१ ]}} {{Left|मित्रो,}} हम सब दूसरी बातोंमें इतने व्यस्त हैं कि मलाबारकी घटनाओंपर शायद ही उतना ध्यान दे रहे हों जितना कि देना चाहिए। इस झगड़ेको खत्म करना बहुत ही जरूरी हो गया है। यह सीधा-सादा मानवीयताका प्रश्न है । मोपला लोग चाहे कितने भी बुरे हों, पर उनके साथ मानवीयताका बर्ताव होना चाहिए। उनके बीवी-बच्चोंके साथ हमारी सहानुभूति होनी चाहिए। सबके सब वे बुरे भी नहीं हैं। फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि बहुत-से निर्दोष व्यक्ति भी अपराधी मान लिये गये होंगे । जबर्दस्ती धर्म-परिवर्तन एक भयानक चीज है । परन्तु मोपलोंकी वीरताकी हमें सराहना करनी चाहिए । ये मलाबारी इसीलिए नहीं लड़ते कि लड़ाईसे इन्हें प्रेम है । ये उस चीजके लिए लड़ रहे जिसे ये अपना धर्म समझते हैं, और जिस ढंगसे लड़ रहे हैं उसे भी ये धार्मिक समझते हैं । इनकी भारी बहुसंख्याको अपना प्रतिरोध जारी रखनेसे कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होगा । इनका अपराध ऐसा नहीं है जो जान-बूझकर किया गया हो, बल्कि उसका कारण इनका अज्ञान ही है ।<noinclude>{{dhr|1em}} {{Smallrefs}}</noinclude> lrpb77de5c3kskloffkvtt5h9dhotn8 674897 674896 2026-08-29T10:03:33Z Shivaniya shaw 4129 674897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''२१०. सन्देश : बम्बईके मिल मजदूरोंको'''<ref>बम्बईके मिल मजदूरोंके क्षेत्रमें एक पर्चे के 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चाहिए। सबके सब वे बुरे भी नहीं हैं। फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि बहुत-से निर्दोष व्यक्ति भी अपराधी मान लिये गये होंगे । जबर्दस्ती धर्म-परिवर्तन एक भयानक चीज है । परन्तु मोपलोंकी वीरताकी हमें सराहना करनी चाहिए । ये मलाबारी इसीलिए नहीं लड़ते कि लड़ाईसे इन्हें प्रेम है । ये उस चीजके लिए लड़ रहे जिसे ये अपना धर्म समझते हैं, और जिस ढंगसे लड़ रहे हैं उसे भी ये धार्मिक समझते हैं । इनकी भारी बहुसंख्याको अपना प्रतिरोध जारी रखनेसे कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होगा । इनका अपराध ऐसा नहीं है जो जान-बूझकर किया गया हो, बल्कि उसका कारण इनका अज्ञान ही है ।<noinclude>{{dhr|1em}} {{Smallrefs}}</noinclude> 2hdecwlhfxy3nv9sx2jgbp45lca02og पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४५ 250 186313 674899 644664 2026-08-29T10:08:33Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||उदार दलवालोंके नाम| ५१३}}</noinclude>{{gap}}इस तरह के वीर लोगोंको यदि हम निर्मूल हो जाने देंगे तो इतिहास इसे हमारे विरुद्ध याद रखेगा और यह भारतकी कायरता मानी जायेगी । मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि यदि श्री याकुब हसनको मलाबार जाने दिया गया होता, यदि मलाबारमें मेरे प्रवेशपर प्रतिबन्ध न लगाया गया होता, यदि ऐसे मुसलमानोंको, जिनका सचमुच प्रभाव है, वहाँ जानेके लिए आमन्त्रित किया गया होता, तो इस लम्बे उत्पीड़नसे बचा जा सकता था । परन्तु अभी भी बहुत देर नहीं हुई है । तलवारका जोर आजमाते तीन महीने हो गये हैं, पर इससे उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। वह गर्वीले मोपलोंको झुका नहीं सका, और न हिन्दुओंको ही उनकी लूट-मार और वासनासे बचा सका है। तलवार मोपलाओंको पूरे मद्रास अहातेपर हावी होनेसे रोक-भर पाई है । वह जनताकी रक्षा करनेकी अपनी सामर्थ्य सिद्ध नहीं कर पाई है । मुझे यकीन है कि आप अपनी असमर्थताकी दुहाई नहीं देंगे । यह सच है कि पुलिस और सेनाका कार्य-भार आपको नहीं सौंपा गया है । परन्तु नैतिक जिम्मेदारीसे आप बच नहीं सकते । मलाबार-सम्बन्धी सरकारी नीतिका आप समर्थन कर रहे हैं । और न मैं यह आशा करता हूँ कि आपइसके जवाब में असहयोगियोंको ही दोषी ठहराने लगेंगे । इस झगड़े के लिए वे किसी भी तरहकी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ले सकते, वैसे यदि हर तरहके आन्दोलनको ही दोषी ठहराया जाये तो बात दूसरी है । परन्तु, मैं यह मानता हूँ कि असहयोगी अपना सन्देश मोपलोंके बीच पहुँचा नहीं पाये हैं । और इसके लिए आन्दोलनको कम करना नहीं, बल्कि और बढ़ाना होगा । लेकिन मैंने इस समय लेखनी असहयोगियोंकी सफाई देने के लिए नहीं उठाई है । मेरा यह निवेदन है कि आप इस प्रश्नके व्यापक मानवीय पहलुओंपर विचार करें, और सरकारको इस बात के लिए बाध्य करें कि वह लड़ाई रोक दे, यह वायदा करे कि आत्मसमर्पण करनेपर मोपलोंको पिछली लूट-मारके लिए क्षमा कर दिया जायेगा, और असहयोगियोंको मलाबारमें जाने और मोपलोंको आत्मसमर्पण के लिए राजी करने की अनुमति दे । मैं जानता हूँ कि इस अन्तिम सुझावका अर्थ असहयोगियोंको महत्व देना है । निश्चय ही आपको उनकी संख्या या उनके प्रभाव के बारेमें सन्देह नहीं है । यदि है, तो आपको इस जातिको निर्मूल कर देनेके अलावा इस झगड़ेका कोई और समाधान ढूँढ़ना चाहिए। मुझे चिन्ता केवल यह है कि मलाबारमें चल रही यह लज्जाजनक नृशंसता, जिसे उदारदलीय और असहयोगी दोनों लाचार दर्शकोंकी तरह देख रहे हैं, बन्द होनी चाहिए। मैंने यह पत्र सरकारके नाम न लिखकर आपके नाम इसलिए लिखा है कि आपके 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पूरा नहीं हो सका। वह गर्वीले मोपलोंको झुका नहीं सका, और न हिन्दुओंको ही उनकी लूट-मार और वासनासे बचा सका है। तलवार मोपलाओंको पूरे मद्रास अहातेपर हावी होनेसे रोक-भर पाई है । वह जनताकी रक्षा करनेकी अपनी सामर्थ्य सिद्ध नहीं कर पाई है । मुझे यकीन है कि आप अपनी असमर्थताकी दुहाई नहीं देंगे । यह सच है कि पुलिस और सेनाका कार्य-भार आपको नहीं सौंपा गया है । परन्तु नैतिक जिम्मेदारीसे आप बच नहीं सकते । मलाबार-सम्बन्धी सरकारी नीतिका आप समर्थन कर रहे हैं । और न मैं यह आशा करता हूँ कि आपइसके जवाब में असहयोगियोंको ही दोषी ठहराने लगेंगे । इस झगड़े के लिए वे किसी भी तरहकी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ले सकते, वैसे यदि हर तरहके आन्दोलनको ही दोषी ठहराया जाये तो बात दूसरी है । परन्तु, मैं यह मानता हूँ कि असहयोगी अपना सन्देश मोपलोंके बीच पहुँचा नहीं पाये हैं । और इसके लिए आन्दोलनको कम करना नहीं, बल्कि और बढ़ाना होगा । लेकिन मैंने इस समय लेखनी असहयोगियोंकी सफाई देने के लिए नहीं उठाई है । मेरा यह निवेदन है कि आप इस प्रश्नके व्यापक मानवीय पहलुओंपर विचार करें, और सरकारको इस बात के लिए बाध्य करें कि वह लड़ाई रोक दे, यह वायदा करे कि आत्मसमर्पण करनेपर मोपलोंको पिछली लूट-मारके लिए क्षमा कर दिया जायेगा, और असहयोगियोंको मलाबारमें जाने और मोपलोंको आत्मसमर्पण के लिए राजी करने की अनुमति दे । मैं जानता हूँ कि इस अन्तिम सुझावका अर्थ असहयोगियोंको महत्व देना है । निश्चय ही आपको उनकी संख्या या उनके प्रभाव के बारेमें सन्देह नहीं है । यदि है, तो आपको इस जातिको निर्मूल कर देनेके अलावा इस झगड़ेका कोई और समाधान ढूँढ़ना चाहिए। मुझे चिन्ता केवल यह है कि मलाबारमें चल रही यह लज्जाजनक नृशंसता, जिसे उदारदलीय और असहयोगी दोनों लाचार दर्शकोंकी तरह देख रहे हैं, बन्द होनी चाहिए। मैंने यह पत्र सरकारके नाम न लिखकर आपके नाम इसलिए लिखा है कि आपके नैतिक समर्थन के बिना सरकार विध्वंसका यह निर्दयतापूर्ण मार्ग अपना नहीं सकती थी । मेरी आपसे यही विनती है कि आप मुझे अपना प्रिय मित्र मानकर मेरी प्रार्थनापर ध्यान दें । {{right|आपका मित्र,<br> '''मो० क० गांधी'''}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया''', १-१२-१९२१}} {{Left|२१-२३}}<noinclude></noinclude> tmksk4vbjmrg0g8bz8xjh4glarwgipb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३६६ 250 186789 674780 645185 2026-08-28T13:27:14Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674780 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> लोग अपनी मरजीका खाना खिलायें, वह दूसरी बात है। एकमें संस्थाको चलानेकी मंशा है, दूसरीमें अनाथोंका अपमान होता है। फिर, इस तरह भोजन मंजूर करने- बाली संस्था उसमें रहनेवालोंकी तन्दुरुस्तीको जोखिममें डालती है और उन्हें चटोरे बनाकर उनकी जिन्दगी बिगाड़ती है। इसलिए अगर इस तरहकी संस्थाएँ भोजनके बजाय दान ही लेनेका आग्रह रखें और दानी लोग भोजनके रूपमें दान न देनेका आग्रह रखें, तो वे प्रजाकी भलाईके भागीदार बनेंगे । :[गुजराती से] :'''नवजीवन''', १३-५-१९२८ {{c|{{larger|'''३७७. बारडोलीका यज्ञ'''}}}} बारडोलीमें जो यज्ञ चल रहा है, उसके सम्बन्ध में वल्लभभाईने अब तक कोई आर्थिक मदद नहीं माँगी थी। किन्तु अब माँगनेका अवसर आ गया है। श्री रविशंकर और श्री चिनाई जैसे सत्याग्रहके सिपाही कैदमें जा बैठे हैं । दूसरे मी जायेंगे । जाना ही होगा। लोगोंमें अगर जीवट होगा और सरकार अपना हठ अन्त तक न छोड़ेगी तो एक भी सेवक कैदके बाहर न रहेगा और प्रजाका एक भी व्यक्ति माल- मिल्कियतवाला या कैदके बाहर न बच रहेगा। सभी लड़ाइयाँ अमुक हदतक एक सरीखी ही होती हैं, फिर वे चाहे पशुबलकी हों या आत्मबलकी । दोनोंमें कष्ट तो सहना ही होता है। यूरोप के महायुद्ध में दोनों पक्षोंके लोगों की दुर्दशा हुई। दोनों पक्षोंके सिपाहियोंने अपनी जान गँवाई । जर्मनीके असंख्य आदमी बेघरबार हो गये । किन्तु सत्याग्रह और पशुबलका साम्य यहीं खत्म हो जाता है। सत्याग्रही आप ही नष्ट होता है। वह विरोधीका सर्वनाश करनेके क्षणिक आनन्दका जानबूझकर त्याग करता है और अपने त्यागमें ही रस लूटता है। कहेंगे । उसमें आत्मशुद्धि है । इसलिए सत्याग्रहको लड़ाईको यज्ञ बारडोलीसे ही मिलती रही है। स्वीकार की गई है। अब ऐसा इस यज्ञ में आज तक आर्थिक मदद मुख्यतः बाहरसे जिन्होंने स्वेच्छा से कोई मदद भेजी है, वह करना शक्ति से बाहर कहा जायेगा । बारडोली के लोगों के पास कल न घर, न वार, न खेत होगा और न ढोर ही होंगे। ऐसी स्थिति में बाहरकी मदद माँगनेका अधिकार वल्लभभाईको है । वल्लभभाईकी भिक्षाकी पुकार सभी कोई सुनें और जिन्हें बारडोलीकी लड़ाई पसन्द है, जो उसमें शुद्धि और वीरता देखते हैं, वे यथाशक्ति अपना भाग चुकायें। :[गुजरातीसे] :'''नवजीवन''', १३-५-१९२८<noinclude></noinclude> 5tbemh7exe7nv0xgon7lcrnfg7973hu 674781 674780 2026-08-28T13:35:20Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674781 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> लोग अपनी मरजीका खाना खिलायें, वह दूसरी बात है। एकमें संस्थाको चलानेकी मंशा है, दूसरीमें अनाथोंका अपमान होता है। फिर, इस तरह भोजन मंजूर करनेवाली संस्था उसमें रहनेवालोंकी तन्दुरुस्तीको जोखिममें डालती है और उन्हें चटोरे बनाकर उनकी जिन्दगी बिगाड़ती है। इसलिए अगर इस तरहकी संस्थाएँ भोजनके बजाय दान ही लेनेका आग्रह रखें और दानी लोग भोजनके रूपमें दान न देनेका आग्रह रखें, तो वे प्रजाकी भलाईके भागीदार बनेंगे। :[गुजराती से] :'''नवजीवन''', १३-५-१९२८ {{c|{{larger|'''३७७. बारडोलीका यज्ञ'''}}}} बारडोलीमें जो यज्ञ चल रहा है, उसके सम्बन्धमें वल्लभभाईने अब तक कोई आर्थिक मदद नहीं माँगी थी। किन्तु अब माँगनेका अवसर आ गया है। श्री रविशंकर और श्री चिनाई जैसे सत्याग्रहके सिपाही कैदमें जा बैठे हैं। दूसरे भी जायेंगे। जाना ही होगा। लोगोंमें अगर जीवट होगा और सरकार अपना हठ अन्त तक न छोड़ेगी तो एक भी सेवक कैदके बाहर न रहेगा और प्रजाका एक भी व्यक्ति माल–मिल्कियतवाला या कैदके बाहर न बच रहेगा। सभी लड़ाइयाँ अमुक हदतक एक सरीखी ही होती हैं, फिर वे चाहे पशुबलकी हों या आत्मबलकी। दोनोंमें कष्ट तो सहना ही होता है। यूरोप के महायुद्धमें दोनों पक्षोंके लोगों की दुर्दशा हुई। दोनों पक्षोंके सिपाहियोंने अपनी जान गँवाई। जर्मनीके असंख्य आदमी बेघरबार हो गये। किन्तु सत्याग्रह और पशुबलका साम्य यहीं खत्म हो जाता है। सत्याग्रही आप ही नष्ट होता है। वह विरोधीका सर्वनाश करनेके क्षणिक आनन्दका जानबूझकर त्याग करता है और अपने त्यागमें ही रस लूटता है। इसलिए सत्याग्रहको लड़ाईको यज्ञ कहेंगे। उसमें आत्मशुद्धि है। इस यज्ञमें आज तक आर्थिक मदद मुख्यतः बारडोलीसे ही मिलती रही है। बाहरसे जिन्होंने स्वेच्छासे कोई मदद भेजी है, वह स्वीकार की गई है। अब ऐसा करना शक्तिसे बाहर कहा जायेगा। बारडोलीके लोगोंके पास कल न घर, न वार, न खेत होगा और न ढोर ही होंगे। ऐसी स्थितिमें बाहरकी मदद माँगनेका अधिकार वल्लभभाईको है। वल्लभभाईकी भिक्षाकी पुकार सभी कोई सुनें और जिन्हें बारडोलीकी लड़ाई पसन्द है, जो उसमें शुद्धि और वीरता देखते हैं, वे यथाशक्ति अपना भाग चुकायें। :[गुजरातीसे] :'''नवजीवन''', १३-५-१९२८<noinclude></noinclude> afacq6sjsr50sw0wrva7lz1vsf0uthh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३६७ 250 186790 674782 645186 2026-08-28T13:37:50Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674782 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३७८. प्राथमिक शिक्षा - १'''}}}} गुजरात विद्यापीठका एक उद्देश्य यह है कि उसका मुख्य काम देहातकी शिक्षाके बारेमें होना चाहिए, और आजकल ज्यादातर देहाती शिक्षाका मतलब प्राथमिक शिक्षा ही होता है। इस विद्यापीठका काम क्लर्क तैयार करना नहीं, बल्कि ग्रामसेवक तैयार करना है । विद्यापीठको अगर शहरके पास रहना है और शहरका रवैया बदला जा सकता हो, तो उसे बदलनेमें हाथ बँटाना उसका काम है। यानी आज शहर जो गांवोंकी बरबादीपर आबाद होते जा रहे हैं, उसके बजाय गाँवोंकी सेवामें लगें । ऐसा होना सम्भव हो या न हो, फिर भी विद्यापीठको शहरोंमें जितने युवक और युवतियाँ इस खयालके बनाये जा सकते हों, बनाने चाहिए। इसलिए प्राथमिक शिक्षाका विचार अलग-अलग तरहसे किया जाना जरूरी है। इस लेखमें तो मैं एक ही विचारकी छानबीन कर लेना चाहता हूँ । बहुत बरसोंके मनन और कुछ प्रयोगोंके बाद मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि प्राथमिक शिक्षा कमसे कम एक साल बगैर किताबोंके ही दी जानी चाहिए, और उसके बाद भी विद्यार्थियोंमें कमसे कम पुस्तकोंका उपयोग होना चाहिए। बारहखड़ीको सीखते-सीखते और ककहरा रटते रटते बच्चेकी दूसरी इन्द्रियोंका विकास रुक जाता है और उनकी बुद्धि खिलनेके बजाय कुण्ठित हो जाती है । बच्चा पैदा होते ही ज्ञान लेने लगता है, पर ज्यादातर आँखों और कानोंसे । बोलना प्रारम्भ करते ही उसे भाषाकी जानकारी होने लगती है । इसीलिए जैसे माँ-बाप होते हैं, वैसा ही बच्चा हो जाता है। अगर माँ-बाप संस्कारी होते हैं, बच्चा शुद्ध उच्चारण करता है, और घरमें होनेवाले शुद्ध आचरणकी नकल करता है । यही उसकी सच्ची शिक्षा है । और अगर हमारी सभ्यता छिन्न-भिन्न न हो गई होती, तो बच्चे अच्छी से- अच्छी तालीम अपने घरोंमें ही पाते होते। इस वक्त हमारे लिये यह शुभ अवसर नहीं है। बच्चोंको पाठशाला भेजने के सिवा कोई चारा नहीं। परन्तु बच्चा पाठशाला जाये, तो उसे पाठशाला घर जैसी लगनी चाहिए, और शिक्षक माँ-बापकी तरह मालूम होने चाहिए। शिक्षा भी वैसी होनी चाहिए, जैसी एक सभ्य घरमें दी जानी चाहिए। यानी बच्चोंको शुरूका ज्ञान शिक्षकोंकी जबानी मिलना चाहिए। और इस तरह शिक्षा पानेवाला बच्चा कानों और आँखोंके जरिये जितना ज्ञान एक सालमें पाता है, उतने ही अर्से में ककहरेसे मिले हुए ज्ञानसे दस गुना ज्यादा होगा। मामूली इतिहास-भूगोलकी जानकारी बालक हँसी-हँसी में और कहानीके रूपमें पहले सालमें पा लेगा। कितनी ही कविताएँ वह शुद्ध उच्चारणके साथ जबानी याद कर लेगा । अंक उसने अपने आप ही कण्ठस्थ कर लिये होंगे । और बालकपर अक्षर<noinclude></noinclude> rgrc9uz591j27l6wci3x5vsy0cid23z 674783 674782 2026-08-28T13:44:53Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674783 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३७८. प्राथमिक शिक्षा — १'''}}}} गुजरात विद्यापीठका एक उद्देश्य यह है कि उसका मुख्य काम देहातकी शिक्षाके बारेमें होना चाहिए, और आजकल ज्यादातर देहाती शिक्षाका मतलब प्राथमिक शिक्षा ही होता है। इस विद्यापीठका काम क्लर्क तैयार करना नहीं, बल्कि ग्रामसेवक तैयार करना है। विद्यापीठको अगर शहरके पास रहना है और शहरका रवैया बदला जा सकता हो, तो उसे बदलनेमें हाथ बँटाना उसका काम है। यानी आज शहर जो गांवोंकी बरबादीपर आबाद होते जा रहे हैं, उसके बजाय गाँवोंकी सेवामें लगें। ऐसा होना सम्भव हो या न हो, फिर भी विद्यापीठको शहरोंमें जितने युवक और युवतियाँ इस खयालके बनाये जा सकते हों, बनाने चाहिए। इसलिए प्राथमिक शिक्षाका विचार अलग–अलग तरहसे किया जाना जरूरी है। इस लेखमें तो मैं एक ही विचारकी छानबीन कर लेना चाहता हूँ। बहुत बरसोंके मनन और कुछ प्रयोगोंके बाद मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि प्राथमिक शिक्षा कमसे–कम एक साल बगैर किताबोंके ही दी जानी चाहिए, और उसके बाद भी विद्यार्थियोंमें कमसे–कम पुस्तकोंका उपयोग होना चाहिए। बारहखड़ीको सीखते–सीखते और ककहरा रटते–रटते बच्चेकी दूसरी इन्द्रियोंका विकास रुक जाता है और उनकी बुद्धि खिलनेके बजाय कुण्ठित हो जाती है। बच्चा पैदा होते ही ज्ञान लेने लगता है, पर ज्यादातर आँखों और कानोंसे। बोलना प्रारम्भ करते ही उसे भाषाकी जानकारी होने लगती है। इसीलिए जैसे माँ–बाप होते हैं, वैसा ही बच्चा हो जाता है। अगर माँ–बाप संस्कारी होते हैं, बच्चा शुद्ध उच्चारण करता है, और घरमें होनेवाले शुद्ध आचरणकी नकल करता है। यही उसकी सच्ची शिक्षा है। और अगर हमारी सभ्यता छिन्न–भिन्न न हो गई होती, तो बच्चे अच्छीसे–अच्छी तालीम अपने घरोंमें ही पाते होते। इस वक्त हमारे लिये यह शुभ अवसर नहीं है। बच्चोंको पाठशाला भेजने के सिवा कोई चारा नहीं। परन्तु बच्चा पाठशाला जाये, तो उसे पाठशाला घर जैसी लगनी चाहिए, और शिक्षक माँ–बापकी तरह मालूम होने चाहिए। शिक्षा भी वैसी होनी चाहिए, जैसी एक सभ्य घरमें दी जानी चाहिए। यानी बच्चोंको शुरूका ज्ञान शिक्षकोंकी जबानी मिलना चाहिए। और इस तरह शिक्षा पानेवाला बच्चा कानों और आँखोंके जरिये जितना ज्ञान एक सालमें पाता है, उतने ही अर्सेमें ककहरेसे मिले हुए ज्ञानसे दस गुना ज्यादा होगा। मामूली इतिहास–भूगोलकी जानकारी बालक हँसी–हँसीमें और कहानीके रूपमें पहले सालमें पा लेगा। कितनी ही कविताएँ वह शुद्ध उच्चारणके साथ जबानी याद कर लेगा। अंक उसने अपने आप ही कण्ठस्थ कर लिये होंगे। और बालकपर अक्षर<noinclude></noinclude> kdquxe4zpcrfisg8mqrfepavfcqg0n9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३६८ 250 186791 674813 645187 2026-08-28T17:22:54Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674813 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|३३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> पहचाननेका बोझा न पड़नेके कारण उसका मन मुरझाना बन्द हो जायेगा और उसकी आँखका दुरुपयोग रुक जायेगा। बच्चे के हाथका उपयोग स्लेटपर आड़े-टेढ़े अक्षर लिखने और अक्षरोंके मुश्किल नाम समझाने के बजाय भूमितिकी रेखाएँ खींचने में और चित्र बनाने में होगा। यह हाथकी सच्ची प्राथमिक शिक्षा है । अगर हम गुजरातके और हिन्दुस्तानके करोड़ों बच्चोंको शिक्षा देना चाहते हों, तो प्राथमिक शिक्षा और किसी तरह दी ही नहीं जा सकती । करोड़ों बच्चोंको किताबें दे सकना इस देशके लिए आजकी हालतमें लगभग नामुमकिन चीज है। मैं स्वीकार करता हूँ कि प्राथमिक शिक्षाके लिए अगर बच्चोंको पुस्तकें देना जरूरी ही हो, तो कितना भी खर्च क्यों न हो, पुस्तकें देनेकी कोशिश जरूर होनी चाहिए। लेकिन जब ये किताबें अनावश्यक और नुकसान पहुँचानेवाली समझी जायें, तब इस व्यावहारिक दलीलको काममें लिया जा सकता है। जो चीज नैतिक दृष्टिसे अनावश्यक और नुकसानदेह है, वह व्यावहारिक दृष्टिसे भी न करने लायक है। शुद्ध सभ्यतामें नीति और व्यवहार विरोधी चीजें न हैं, न होनी चाहिए । यह साफ है कि मौजूदा पाठशालाओंके शिक्षकोंके द्वारा ऐसी शिक्षा नहीं दी जा सकती। ये शिक्षकगण मारपीट कर बारहखड़ी भले सिखा दें, शायद कुछ अंक भी सिखा दें । पर जिस साधारण ज्ञान, की मैंने बच्चोंको पहले वर्षमें मिलनेकी कल्पना की है वह तो स्वयं बेचारे शिक्षकको ही नहीं होता। वह खुद ही शुद्ध भाषा बोलना नहीं जानता, तो बच्चे क्या सीखेंगे ? इसका विचार हम दूसरे भागमें करेंगे। :[गुजरातीसे] :'''नवजीवन''', १३-५-१९२८ {{c|{{larger|'''३७९. पत्र : पी० वी० कर्मचन्दानीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> १३ मई, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके कृपा पत्रके लिए धन्यवाद। मैंने रेडियमके इलाजके बारेमें सुना है । आपके पास जो बोतलें हैं उन्हें भेजनेके आपके प्रस्तावके लिए मैं आपको धन्य- वाद देता हूँ । परन्तु मैं आपके इस प्रस्तावका लाभ नहीं उठाऊँगा, क्योंकि दवाई न १. पी० बी० कर्मचन्दानीने गांधीजीको रक्तचापके इलाज के लिए रेडियम क्लोराइडके इलाजकी सलाह दी थी।<noinclude></noinclude> dg678dh86uo4w4jtn0tlqo5bvgs6m4p 674819 674813 2026-08-28T17:39:00Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674819 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|३३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> पहचाननेका बोझा न पड़नेके कारण उसका मन मुरझाना बन्द हो जायेगा और उसकी आँखका दुरुपयोग रुक जायेगा। बच्चेके हाथका उपयोग स्लेटपर आड़े–टेढ़े अक्षर लिखने और अक्षरोंके मुश्किल नाम समझानेके बजाय भूमितिकी रेखाएँ खींचनेमें और चित्र बनानेमें होगा। यह हाथकी सच्ची प्राथमिक शिक्षा है। अगर हम गुजरातके और हिन्दुस्तानके करोड़ों बच्चोंको शिक्षा देना चाहते हों, तो प्राथमिक शिक्षा और किसी तरह दी ही नहीं जा सकती। करोड़ों बच्चोंको किताबें दे सकना इस देशके लिए आजकी हालतमें लगभग नामुमकिन चीज है। मैं स्वीकार करता हूँ कि प्राथमिक शिक्षाके लिए अगर बच्चोंको पुस्तकें देना जरूरी ही हो, तो कितना भी खर्च क्यों न हो, पुस्तकें देनेकी कोशिश जरूर होनी चाहिए। लेकिन जब ये किताबें अनावश्यक और नुकसान पहुँचानेवाली समझी जायें, तब इस 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नारायणका बेड़ा भी पार लग जाये । तुम्हारे चेकका उपयोग तुम्हारी इच्छानुसार करूँगा । बापूके आशीर्वाद गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७०४) की फोटो–नकलसे। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी {{c|{{larger|'''३८१. पत्र : लॉर्ड इर्विनको'''}}}} साबरमती १६ मई, १९२८ प्रिय मित्र, मेरे दुःखके अवसर पर आपने जो पत्र लिखा है, उसकी मैं हृदयसे कद्र करता हूँ । मुझे याद आया कि पिछले साल नडियादमें मगनलाल गांधीसे आपकी भेंट कराई गई थी। {{right|मैं हूँ,<br> परमश्रेष्ठका विश्वस्त मित्र,<br> मो॰ क॰ गांधी}} {{left|परमश्रेष्ठ वाइसराय}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३८६) की फोटो–नकलसे। ३६-२२<noinclude></noinclude> jtb8a88d8pm50ow6yo8e4mzbrs12m6c 674825 674823 2026-08-28T17:50:01Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674825 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : लॉर्ड इर्विनको|३३७}}</noinclude> खानेके अपने निश्चयके अलावा मुझे वैसे भी यह लगता है कि आजकल मैं रक्तचापसे पीड़ित नहीं हूँ। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|कैप्टेन पी॰ वी॰ कर्मचन्दानी, आई॰ एम॰ एस॰<br> इंडियन मिलिटरी हास्पिटल<br> पिशिन<br> बलूचिस्तान}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२२८) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''३८०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{right|रविवार, १३ मई, १९२८}} {{left|चि॰ शान्तिकुमार,}} तुम्हें बिना मांगे ही आशीर्वाद भेज रहा हूँ। तुम खूब जियो और खूब सेवा करो। सुमतिने तुम्हें वर्षगाँठके दिन क्या भेंट दी है? क्या वह रोज कातती है?।निरन्तर खादी पहनती है? निरन्तर दरिद्रनारायणका विचार करती है? यदि प्रत्येक वर्षगाँठ पर वह तुम्हें ऐसे ही उपहार दे, तो तुम दोनोंका कल्याण हो और दरिद्रनारायणका बेड़ा भी पार लग जाये। तुम्हारे चेकका उपयोग तुम्हारी इच्छानुसार करूँगा। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७०४) की फोटो–नकलसे। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी {{c|{{larger|'''३८१. पत्र : लॉर्ड इर्विनको'''}}}} {{right|साबरमती<br> १६ मई, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} मेरे दुःखके अवसर पर आपने जो पत्र लिखा है, उसकी मैं हृदयसे कद्र करता हूँ। मुझे याद आया कि पिछले साल नडियादमें मगनलाल गांधीसे आपकी भेंट कराई गई थी। {{right|मैं हूँ,<br> परमश्रेष्ठका विश्वस्त मित्र,<br> {{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}} {{left|परमश्रेष्ठ वाइसराय}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३८६) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{left|३६—२२}}</noinclude> 0dtm1xw8aqdscxq5ofr64puoute75o2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७० 250 186795 674827 645191 2026-08-28T17:52:03Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674827 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८२. सवाल तो यह है'''}}}} बारडोली संग्राम मजेमें चल रहा है। जिस तेजी से जब्तीके नोटिस तामील किये जा रहे हैं, उससे तो कुछ ही दिनोंमें साराका सारा बारडोली ताल्लुका सरकारके हाथोंमें चला जाना चाहिए और तब सरकार अपने बेशकीमती लगानसे हजार गुना अधिक वसूल कर लेगी। बारडोलीके लोग अगर बहादुर हैं तो खेती-बाड़ीकी बेदखलीसे उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा । उनकी सम्पत्ति जाती रहेगी मगर उनके पास बच जायेगी उनकी इज्जत, जो हरएक भले स्त्री और पुरुषको प्राणोंसे भी प्यारी होनी चाहिए। जिनके मन दृढ़ हैं, जिनके हाथोंमें बल है, उन्हें धन-सम्पत्तिकी हानिसे कभी नहीं डरना चाहिए। मगर जब्तीके नोटिस जब कामयाब न हुए तो सरकारने कार्यकर्त्ताओंको जेलों में ठूसना भी शुरू किया है। पंजाब मार्शल लॉ के दिनोंमें जैसे मुकदमे चलानेके मखौल देखने में आये थे, आजकल वैसे ही नकली मुकदमे चलाये जा रहे हैं। प्रोसिक्यूटर साहेबने सजा देनेकी माँग की और उन्हें खुश करनेमें प्रयत्नशील स्पेशल मजिस्ट्रेट साहेब तुरन्त ही ऐसी सजाएँ दे देते हैं जिससे किसीको फिर वैसा करनेका साहस न हो । सभीको सख्त कैदकी ही सजा दी जाती है। इनसे भी बेदखलीकी तरह स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहनेवालोंका भला ही होगा । स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहनेवालेको कष्टसे कभी नुकसान नहीं पहुँचता है। मगर जो बात दिलमें खटकती है वह है अफसरोंकी बेईमानी और उनकी अपमानजनक उद्धतता। गुजरातके उत्तरी खण्डके आयुक्तने एक आदमीको पत्र लिखा है जिसमें अपमानजनक लांछन और झूठी बातें भरी पड़ी हैं। यह कहना सरासर झूठा लांछन लगाना है कि यह आन्दोलन खेड़ाके आन्दोलन- कारियोंका शुरू किया हुआ है। यह आन्दोलन तो खुद बारडोलीवालोंने ही अपनी प्रेरणासे आप शुरू किया था। उन्होंने केवल एक आदमीकी मदद और सलाह ली थी । और वे थे श्रीयुत वल्लभभाई पटेल, जिनको मेरा खयाल है कि आयुक्त थोड़ा बहुत जानते हैं । यह तो पाठक ही निर्णय करें कि सचमुच उन्हें उसी अर्थ में आन्दोलक कहा जा सकता है या नहीं जिस अर्थमें आयुक्तने कहना चाहा है। यह कहना झूठ है कि सरकारी अफसरोंके पीछे खुफिया दूत लगे रहते हैं, या वे जहाँ जाते हैं, उनके आसपास हुल्लड़ मच जाता है या अन्य ढंगोंसे उनका अपमान किया जाता है। कार्यकर्त्ताओंका वर्णन इस प्रकार किया गया है : "यह तो आन्दोलनकारियोंका एक गिरोह है जो बारडोलीवालोंकी मदद पर ही जीता है और जो उनको गलत राहपर ले जाता है ।" यह ऐसा अपमान है कि यदि राष्ट्रके दिन अच्छे होते और राष्ट्रको अपनी शक्तिका भान होता, तो आयुक्तको माफी मांगने पर लाचार किया जाता। उनको मालूम होना चाहिए कि गुस्से और शक्तिके मदमें वह जिन्हें " आन्दोलनकारियोंका<noinclude></noinclude> ay83zd9avvxxb4r3bidw99382koekmg 674828 674827 2026-08-28T17:59:59Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674828 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८२. सवाल तो यह है'''}}}} बारडोली संग्राम मजेमें चल रहा है। जिस तेजीसे जब्तीके नोटिस तामील किये जा रहे हैं, उससे तो कुछ ही दिनोंमें साराका सारा बारडोली ताल्लुका सरकारके हाथोंमें चला जाना 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आयुक्तने एक आदमीको पत्र लिखा है जिसमें अपमानजनक लांछन और झूठी बातें भरी पड़ी हैं। यह कहना सरासर झूठा लांछन लगाना है कि यह आन्दोलन खेड़ाके आन्दोलनकारियोंका शुरू किया हुआ है। यह आन्दोलन तो खुद बारडोलीवालोंने ही अपनी प्रेरणासे आप शुरू किया था। उन्होंने केवल एक आदमीकी मदद और सलाह ली थी। और वे थे श्रीयुत वल्लभभाई पटेल, जिनको मेरा खयाल है कि आयुक्त थोड़ा बहुत जानते हैं। यह तो पाठक ही निर्णय करें कि सचमुच उन्हें उसी अर्थमें आन्दोलक कहा जा सकता है या नहीं जिस अर्थमें आयुक्तने कहना चाहा है। यह कहना झूठ है कि सरकारी अफसरोंके पीछे खुफिया दूत लगे रहते हैं, या वे जहाँ जाते हैं, उनके आसपास हुल्लड़ मच जाता है या अन्य ढंगोंसे उनका अपमान किया जाता है। कार्यकर्त्ताओंका वर्णन इस प्रकार किया गया है : "यह तो आन्दोलनकारियोंका एक गिरोह है जो बारडोलीवालोंकी मदद पर ही जीता है और जो उनको गलत राहपर ले जाता है।" यह ऐसा अपमान है कि यदि राष्ट्रके दिन अच्छे होते और राष्ट्रको अपनी शक्तिका भान होता, तो आयुक्तको माफी मांगने पर लाचार किया जाता। उनको मालूम होना चाहिए कि गुस्से और शक्तिके मदमें वह जिन्हें "आन्दोलनकारियोंका<noinclude></noinclude> 8gwg9d9brz3zksx6bnwwnxcmgzwrpwu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७१ 250 186797 674830 645193 2026-08-28T18:03:04Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674830 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||सवाल तो यह है|३३९}}</noinclude> गिरोह" कहते हैं, वे राष्ट्रके सम्माननीय सेवक हैं जो काफी त्याग करके बारडोलीकी सेवा मुफ्त में कर रहे हैं। इन लोगोंमें वल्लभभाईके अलावा, जो खुद बैरिस्टर हैं, वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी हैं, वे भी एक बैरिस्टर हैं और बड़ौदा रियासतके प्रधान न्यायाधीश रह चुके हैं, इमाम साहब बावजीर हैं, जो तकरीबन एक फकीर ही हैं, और जिन्हें अपनी रोटियोंके लिए बारडोलीसे कुछ लेनेकी जरूरत नहीं है, और हैं डाक्टर सुमन्त मेहता और उन्हीं के समान उनकी सुसंस्कृत पत्नी । डाक्टर सुमन्त मेहता जो पिछले काफी अर्से से बीमार रहते हैं, अपने स्वास्थ्यको खतरेमें डालकर बारडोली गये हैं । इन चारोंमें से खेड़ाका कोई नहीं है। फिर हैं ढासाके दरबार साहब चन्दूलाल और उनकी बहादुर पत्नी भक्ति बा, जिन्होंने देशके लिए अपनी रियासतका बलिदान किया है। ये लोग बारेडालीके लोगोंपर नहीं जीते। इनके अलावा और लोगोंमें डाक्टर चन्दूलाल और त्रिभुवनदास हैं; वे भी खेड़ाके नहीं हैं। फिर फूलचन्द शाह उनकी पत्नी तथा उनके योग्य सहायक शिवानंद (जो जेल भेजे जा चुके हैं) के नाम जोड़ दीजिए। इनमें भी खेड़ाका कोई नहीं है और ये कई वर्षोंसे शान्तिपूर्ण सेवामें लगे हुए हैं। यह तो बारडोलीकी करुण पुकार है, जो इन लोगोंको तथा दूसरोंको, जिनके नाम मैं गिना सकता हूँ, वहाँ खींच लाई है । अगर आयुक्तको अपनी इज्जतका जरा भी खयाल है तो वह इन महिलाओं और भद्र पुरुषोंसे अपने आप क्षमा माँगेंगे। इतने अधिक कार्य- कर्त्ताओंके बीच, सच पूछो तो खेड़ाके कार्यकर्त्ता दालमें नमकके बराबर भी नहीं हैं । आयुक्तने बड़ी शानसे बम्बई कौन्सिलके विरुद्ध मतको प्रकाशित किया है, और बड़ी सफाईसे स्वार्थवश कौंसिलके पहले दो प्रस्तावोंका जिक्र किया है । वे प्रस्ताव सरकारके विरुद्ध थे और सरकारने उन्हें इतना हेय माना था कि उनपर विचार करनेकी भी, या उनका जिक्र करनेकी भी जरूरत नहीं समझी थी। आयुक्तने कामकी इस महत्वपूर्ण बातको छिपाया है, दबाया है कि सत्याग्रह शुरू करनके पहले, बारडोली के किसानोंने वे सभी उपाय काममें लाकर देख लिये थे, जिन्हें वैध कहते हैं; किन्तु उनसे उनकी शिकायत दूर न हुई बल्कि वे बिल्कुल असफल रहे। आयुक्तका यह कहना लोगोंकी आँखोंमें धूल झोंकना है कि अगर दुखद अनुभवोंके बाद बारडोलीके लोग सत्याग्रह बन्द कर दें तो वे उन गाँवोंके मामलेकी जांच बखुशी करेंगे, जिनके वर्गीकरणमें भूल मालूम पड़ेगी। वह इस सत्यको छिपाते हैं कि विचारणीय प्रश्न यह नहीं है कि इस गाँव या उस गाँवके वर्गीकरणमें भूल है या नहीं, बल्कि बात तो यह है कि लगान निश्चित करनेका सारा तरीका ही स्पष्टतः गलत है। और बारडोलीवाले इस बातपर अड़े हुए नहीं हैं कि उनका ही दावा सही है, बल्कि वे एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष न्यायाधिकरणकी माँग करते हैं, जो उनकी शिकायतकी न्याययताकी जाँच करे । न्यायाधिकरणका जो कुछ भी फैसला होगा वे उसे माननेको तैयार हैं । यहाँ लगान देनेसे जी चुरानेका सवाल ही नहीं है, व्यक्तिगत शिकायतें दूर करनेका सवाल ही नहीं है । सवाल तो यहाँ सिद्धान्तका है। बारडोलीवाले तो सरकारके इस हकको माननेसे इनकार करते हैं कि वह जब<noinclude></noinclude> 2sp5a22rxa9roq2206ketxpg08pjyg8 674833 674830 2026-08-28T18:11:09Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674833 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||सवाल तो यह है|३३९}}</noinclude> गिरोह" कहते हैं, वे राष्ट्रके सम्माननीय सेवक हैं जो काफी त्याग करके बारडोलीकी सेवा मुफ्तमें कर रहे हैं। इन लोगोंमें वल्लभभाईके अलावा, जो खुद बैरिस्टर हैं, वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी हैं, वे भी एक बैरिस्टर हैं और बड़ौदा रियासतके प्रधान न्यायाधीश रह चुके हैं, इमाम साहब बावजीर हैं, जो तकरीबन एक फकीर ही हैं, और जिन्हें अपनी रोटियोंके लिए बारडोलीसे कुछ लेनेकी जरूरत नहीं है, और हैं डाक्टर सुमन्त मेहता और उन्हींके समान उनकी सुसंस्कृत पत्नी। डाक्टर सुमन्त मेहता जो पिछले काफी अर्सेसे बीमार रहते हैं, अपने स्वास्थ्यको खतरेमें डालकर बारडोली गये हैं। इन चारोंमें से खेड़ाका कोई नहीं है। फिर हैं ढासाके दरबार साहब चन्दूलाल और उनकी बहादुर पत्नी भक्ति बा, जिन्होंने देशके लिए अपनी रियासतका बलिदान किया है। ये लोग बारेडालीके लोगोंपर नहीं जीते। इनके अलावा और लोगोंमें डाक्टर चन्दूलाल और त्रिभुवनदास हैं; वे भी खेड़ाके नहीं हैं। फिर फूलचन्द शाह उनकी पत्नी तथा उनके योग्य सहायक शिवानंद (जो जेल भेजे जा चुके हैं) के नाम जोड़ दीजिए। इनमें भी खेड़ाका कोई नहीं है और ये कई वर्षोंसे शान्तिपूर्ण सेवामें लगे हुए हैं। यह तो बारडोलीकी करुण पुकार है, जो इन लोगोंको तथा दूसरोंको, जिनके नाम मैं गिना सकता हूँ, वहाँ खींच लाई है। अगर आयुक्तको अपनी इज्जतका जरा भी खयाल है तो वह इन महिलाओं और भद्र पुरुषोंसे अपने आप क्षमा माँगेंगे। इतने अधिक कार्यकर्त्ताओंके बीच, सच पूछो तो खेड़ाके कार्यकर्त्ता दालमें नमकके बराबर भी नहीं हैं। आयुक्तने बड़ी शानसे बम्बई कौन्सिलके विरुद्ध मतको प्रकाशित किया है, और बड़ी सफाईसे स्वार्थवश कौंसिलके पहले दो प्रस्तावोंका जिक्र किया है। वे प्रस्ताव सरकारके विरुद्ध थे और सरकारने उन्हें इतना हेय माना था कि उनपर विचार करनेकी भी, या उनका जिक्र करनेकी भी जरूरत नहीं समझी थी। आयुक्तने कामकी इस महत्वपूर्ण बातको छिपाया है, दबाया है कि सत्याग्रह शुरू करनके पहले, बारडोलीके किसानोंने वे सभी उपाय काममें लाकर देख लिये थे, जिन्हें वैध कहते हैं; किन्तु उनसे उनकी शिकायत दूर न हुई बल्कि वे बिल्कुल असफल रहे। आयुक्तका यह कहना लोगोंकी आँखोंमें धूल झोंकना है कि अगर दुखद अनुभवोंके बाद बारडोलीके लोग सत्याग्रह बन्द कर दें तो वे उन गाँवोंके मामलेकी जांच बखुशी करेंगे, जिनके वर्गीकरणमें भूल मालूम पड़ेगी। वह इस सत्यको छिपाते हैं कि विचारणीय प्रश्न यह नहीं है कि इस गाँव या उस गाँवके वर्गीकरणमें भूल है या नहीं, बल्कि बात तो यह है कि लगान निश्चित करनेका सारा तरीका ही स्पष्टतः गलत है। और बारडोलीवाले इस बातपर अड़े हुए नहीं हैं कि उनका ही दावा सही है, बल्कि वे एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष न्यायाधिकरणकी माँग करते हैं, जो उनकी शिकायतकी न्याययताकी जाँच करे। न्यायाधिकरणका जो कुछ भी फैसला होगा वे उसे माननेको तैयार हैं। यहाँ लगान देनेसे जी चुरानेका सवाल ही नहीं है, व्यक्तिगत शिकायतें दूर करनेका सवाल ही नहीं है। सवाल तो यहाँ सिद्धान्तका है। बारडोलीवाले तो सरकारके इस हकको माननेसे इनकार करते हैं कि वह जब<noinclude></noinclude> q9day2zurzneian3uaruz6u2h7z1o6a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७२ 250 186799 674834 645195 2026-08-28T18:13:45Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674834 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|३४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> चाहे, बिना यथोचित जाँचके लगानमें कुछ भी बढ़ती कर सकती है। मैं यह भी कह दूँ कि यह आन्दोलन किसी राजनीतिक उद्देश्यके लिए किया गया लगान बंदीका आन्दोलन नहीं है। यह आन्दोलन एक ऐसी स्पष्ट निर्धारित शिकायत के विरुद्ध है, जिसका एक ताल्लुकेके सभी लोगों पर असर पड़ता है। इसलिए आयुक्तका यह कहना शेखी और झूठकी हद है कि : मुझसे अधिक इस बात के लिए कोई और चिन्तित नहीं है कि गरीब किसानोंको, उनपर जोनेवाले आन्दोलनकारियोंका गिरोह गलत रास्ते ले जाकर उनका सर्वनाश न करा दे। खेड़ा जिलेमें पाँच ताल्लुके हैं जहाँसे ये आन्दोलनकारी आते हैं। बाढ़के कारण वहाँके लगानमें रद्दोबदल दो वर्षोंके लिए मुल्तवी कर दिया गया है। पिछले ७-८ महीनों में सरकारने बाढ़ संकट निवारणके लिए खेड़ा जिलेमें कोई ५० लाख तकका तकावी कर्ज दिया है। अगर इन आन्दोलनकारियोंको बारडोलीमें सफलता मिल गई तो खेड़ा जिलेमें लगान और तकावीका वसूल होना खतरे में पड़ जायेगा। अगर आन्दोलनकारियोंको सफलता मिली तो खेड़ाका तकावी कर्ज वसूल होना खतरे में नहीं पड़ेगा। अगर कर्ज लेनेवालोंने उसे लौटानेमें आनाकानी की तो सरकार देखेगी कि आन्दोलनकारियोंके मुखिया वल्लभभाई पटेल उसके अवैतनिक पटवारी बनकर कर्ज वसूल करते फिरेंगे । आन्दोलनकारियोंकी सफलतासे यह अवश्य होगा कि सरकारी अफसरोंको सम्मानित लोक-सेवकोंका अपमान करनेका साहस न होगा, झूठी बातें कहनेकी हिम्मत न होगी, जैसी कि हिम्मत गुजरातके उत्तरी खण्डके आयुक्तने दिखलाई है; और लोग, बारडोली के बारेमें जिस अत्यन्त अनुचित और अन्यायपूर्ण लगान लगाये जानेकी बात कही जा रही हैं, वैसे लगानसे राहत पा सकेंगे । जनतासे भी एक बात कहनी है । सरकारने अपनी बुद्धिमानीसे, और इस बातपर जोर देनेके लिए कि शासनकी सफलता प्रजामें फूट डालनेपर निर्भर है, बारडोली जैसे हिन्दू बहुल प्रदेशमें मुसलमान अफसरों और पठानोंको ला बुलाया है । बतौर सत्याग्रहीके, लोग चाहें तो सहज ही सरकारको मात दे सकते हैं। वे अफसरों और पठानोंके साथ मित्रताका बरताव करें। वे उनपर न तो अविश्वास करें, न उनसे जरा भी डरें और न उन्हें तकलीफ पहुँचायें। अफसर तो हमारे देशबन्धु हैं और पठान पड़ोसी हैं। शीघ्र ही सरकार अपनी मूल देख लेगी और जान जायेगी कि हिन्दुओंकी इज्जत मुसलमानोंको भी वैसी ही प्यारी है जैसी मुसलमानोंकी हिन्दुओंको बारडोलीवालोंको यह बात कार्यरूपमें व्यक्त कर दिखानेका अवसर मिला है । वे सत्याग्रहके उस नियमकी सफलताको सिद्ध करें जो कि प्रेमका नियम है, जो एक स्वेच्छाचारी आयुक्तके पाषाण हृदयको भी पिघला सकता है। [अंग्रेजीसे] यंग इंडिया, १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> nlftenfofqx4q77k3kzp7bda7rt8rho 674835 674834 2026-08-28T18:22:30Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674835 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|३४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> चाहे, बिना यथोचित जाँचके लगानमें कुछ भी बढ़ती कर सकती है। मैं यह भी कह दूँ कि यह आन्दोलन किसी राजनीतिक उद्देश्यके लिए किया गया लगान बंदीका आन्दोलन नहीं है। यह आन्दोलन एक ऐसी स्पष्ट निर्धारित शिकायत के विरुद्ध है, जिसका एक ताल्लुकेके सभी लोगों पर असर पड़ता है। इसलिए आयुक्तका यह कहना शेखी और झूठकी हद है कि : {{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''मुझसे अधिक इस बातके लिए कोई और चिन्तित नहीं है कि गरीब किसानोंको, उनपर जीनेवाले आन्दोलनकारियोंका गिरोह गलत रास्ते ले जाकर उनका सर्वनाश न करा दे।'''}} 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इस बातपर जोर देनेके लिए कि शासनकी सफलता प्रजामें फूट डालनेपर निर्भर है, बारडोली जैसे हिन्दू बहुल प्रदेशमें मुसलमान अफसरों और पठानोंको ला बुलाया है। बतौर सत्याग्रहीके, लोग चाहें तो सहज ही सरकारको मात दे सकते हैं। वे अफसरों और पठानोंके साथ मित्रताका बरताव करें। वे उनपर न तो अविश्वास करें, न उनसे जरा भी डरें और न उन्हें तकलीफ पहुँचायें। अफसर तो हमारे देशबन्धु हैं और पठान पड़ोसी हैं। शीघ्र ही सरकार अपनी मूल देख लेगी और जान जायेगी कि हिन्दुओंकी इज्जत मुसलमानोंको भी वैसी ही प्यारी है जैसी मुसलमानोंकी हिन्दुओंको बारडोलीवालोंको यह बात कार्यरूपमें व्यक्त कर दिखानेका अवसर मिला है। वे सत्याग्रहके उस नियमकी सफलताको सिद्ध करें जो कि प्रेमका नियम है, जो एक स्वेच्छाचारी आयुक्तके पाषाण हृदयको भी पिघला सकता है। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> 32wandy7m1iqol9d77680ey98a2x0qr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७३ 250 186800 674836 645196 2026-08-28T18:23:43Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674836 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८३. दलित वर्ग और बाघात रियासत'''}}}} आखिर गत ५ तारीखको बाघात रियासतके राणा साहबने आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाबकी ओरसे जो शिष्टमण्डल उनसे मिलनेके लिए गया था उससे भेंट की और आर्यसमाज द्वारा शुद्ध किये कोलियोंके यज्ञोपवीत धारण करनेके मामलेमें रियासत के व्यवहारसे पैदा हुई स्थितिपर चर्चा की। इस शिष्ट मण्डलमें राय साहब लाला गंगाराम, पंडित चमूपति, एम० ए०, लुधियानाके दीवान रामशरणदास, पण्डित धर्मवीर वेदालंकार और शिमलाके एडवोकेट लाला शंकरनाथ शामिल थे । शिष्टमण्डलको, भेंटके दौरान जो कुछ हुआ उसके बारेमें निम्नलिखित बयान देनेकी इजाजत मिली है : शिष्टमण्डल के सदस्योंने राणा साहबको सौहार्दपूर्ण अतिथिसत्कारके लिए धन्यवाद दिया और प्रस्तुत प्रश्नके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी तथा आर्य प्रतिनिधि सभाकी स्थिति स्पष्ट की। राणा साहबने मण्डलकी बात धैर्यसे सुनी तथा उसे यकीन दिलाया कि उनकी रियासतमें सभी सुस्थापित धार्मिक समाजोंको धर्म प्रचारकी पूरी स्वतन्त्रता है। मण्डलने उनका ज्ञापन शिष्टतासे सुननेके लिए तथा उत्साहवर्धक जवाब देने के लिए राणा साहबको धन्यवाद दिया और उनसे विदा ली। इस संयुक्त बयानमें अत्यधिक सतर्कता तथा राज्यकी भीरुताकी झलक दिखलाई पड़ती है। दलितोंके प्रति किये गये अन्याय तथा एक महान् धार्मिक संस्थाके अपमानको साफ तौरपर स्वीकार करनेसे रियासतकी इज्जत जनताके मनमें बहुत बढ़ जाती। खैर थोड़ा-बहुत जो भी हुआ उसीके लिए धन्यवाद देना चाहिए। अगर राणा साहबकी प्रतिज्ञाका पूर्ण पालन हुआ तो अन्याय और अपमानकी बातको लोग भूल जायेंगे। :[अंग्रेजीसे] ''':यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> c8qm8v0bi6qt8nukqlzdgplvcrwhrop 674837 674836 2026-08-28T18:25:34Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674837 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८३. दलित वर्ग और बाघात रियासत'''}}}} आखिर गत ५ तारीखको बाघात रियासतके राणा साहबने आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाबकी ओरसे जो शिष्टमण्डल उनसे मिलनेके लिए गया था उससे भेंट की और आर्यसमाज द्वारा शुद्ध किये कोलियोंके यज्ञोपवीत धारण करनेके मामलेमें रियासतके व्यवहारसे पैदा हुई स्थितिपर चर्चा की। इस शिष्ट मण्डलमें राय साहब लाला गंगाराम, पंडित चमूपति, एम॰ ए॰, लुधियानाके दीवान रामशरणदास, पण्डित धर्मवीर वेदालंकार और शिमलाके एडवोकेट लाला शंकरनाथ शामिल थे। शिष्टमण्डलको, भेंटके दौरान जो कुछ हुआ उसके बारेमें निम्नलिखित बयान देनेकी इजाजत मिली है : शिष्टमण्डल के सदस्योंने राणा साहबको सौहार्दपूर्ण अतिथिसत्कारके लिए धन्यवाद दिया और प्रस्तुत प्रश्नके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी तथा आर्य प्रतिनिधि सभाकी स्थिति स्पष्ट की। राणा साहबने मण्डलकी बात धैर्यसे सुनी तथा उसे यकीन दिलाया कि उनकी रियासतमें सभी सुस्थापित धार्मिक समाजोंको धर्म प्रचारकी पूरी स्वतन्त्रता है। मण्डलने उनका ज्ञापन शिष्टतासे सुननेके लिए तथा उत्साहवर्धक जवाब देने के लिए राणा साहबको धन्यवाद दिया और उनसे विदा ली। इस संयुक्त बयानमें अत्यधिक सतर्कता तथा राज्यकी भीरुताकी झलक दिखलाई पड़ती है। दलितोंके प्रति किये गये अन्याय तथा एक महान् धार्मिक संस्थाके अपमानको साफ तौरपर स्वीकार करनेसे रियासतकी इज्जत जनताके मनमें बहुत बढ़ जाती। खैर थोड़ा-बहुत जो भी हुआ उसीके लिए धन्यवाद देना चाहिए। अगर राणा साहबकी प्रतिज्ञाका पूर्ण पालन हुआ तो अन्याय और अपमानकी बातको लोग भूल जायेंगे। :[अंग्रेजीसे] ''':यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> 6skprdkr2etg2ii389n8ceo3n0k24d1 674838 674837 2026-08-28T18:28:35Z आदेश यादव 3609 674838 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८३. दलित–वर्ग और बाघात रियासत'''}}}} आखिर गत ५ तारीखको बाघात रियासतके राणा साहबने आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाबकी ओरसे जो शिष्टमण्डल उनसे मिलनेके लिए गया था उससे भेंट की और आर्यसमाज द्वारा शुद्ध किये कोलियोंके यज्ञोपवीत धारण करनेके मामलेमें रियासतके व्यवहारसे पैदा हुई स्थितिपर चर्चा की। इस शिष्ट मण्डलमें राय साहब लाला गंगाराम, पंडित चमूपति, एम॰ ए॰, लुधियानाके दीवान रामशरणदास, पण्डित धर्मवीर वेदालंकार और शिमलाके एडवोकेट लाला शंकरनाथ शामिल थे। शिष्टमण्डलको, भेंटके दौरान जो कुछ हुआ उसके बारेमें निम्नलिखित बयान देनेकी इजाजत मिली है : {{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''शिष्टमण्डलके सदस्योंने राणा साहबको सौहार्दपूर्ण अतिथिसत्कारके लिए धन्यवाद दिया और प्रस्तुत प्रश्नके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी तथा आर्य प्रतिनिधि सभाकी स्थिति स्पष्ट की। राणा साहबने मण्डलकी बात धैर्यसे सुनी तथा उसे यकीन दिलाया कि उनकी रियासतमें सभी सुस्थापित धार्मिक समाजोंको धर्म–प्रचारकी पूरी स्वतन्त्रता है। मण्डलने उनका ज्ञापन शिष्टतासे सुननेके लिए तथा उत्साहवर्धक जवाब देने के लिए राणा साहबको धन्यवाद दिया और उनसे विदा ली।'''}} इस संयुक्त बयानमें अत्यधिक सतर्कता तथा राज्यकी भीरुताकी झलक दिखलाई पड़ती है। दलितोंके प्रति किये गये अन्याय तथा एक महान् धार्मिक संस्थाके अपमानको साफ तौरपर स्वीकार करनेसे रियासतकी इज्जत जनताके मनमें बहुत बढ़ जाती। खैर थोड़ा–बहुत जो भी हुआ उसीके लिए धन्यवाद देना चाहिए। अगर राणा साहबकी प्रतिज्ञाका पूर्ण पालन हुआ तो अन्याय और अपमानकी बातको लोग भूल जायेंगे। :[अंग्रेजीसे] ''':यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> 85oftsrwipp8x2vsm81rk6y5j2z84e9 674887 674838 2026-08-29T09:14:49Z आदेश यादव 3609 674887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८३. दलित–वर्ग और बाघात रियासत'''}}}} आखिर गत ५ तारीखको बाघात रियासतके राणा साहबने आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाबकी ओरसे जो शिष्टमण्डल उनसे मिलनेके लिए गया था उससे भेंट की और आर्यसमाज द्वारा शुद्ध किये कोलियोंके यज्ञोपवीत धारण करनेके मामलेमें रियासतके व्यवहारसे पैदा हुई स्थितिपर चर्चा की। इस शिष्ट मण्डलमें राय साहब लाला गंगाराम, पंडित चमूपति, एम॰ ए॰, लुधियानाके दीवान रामशरणदास, पण्डित धर्मवीर वेदालंकार और शिमलाके एडवोकेट लाला शंकरनाथ शामिल थे। शिष्टमण्डलको, भेंटके दौरान जो कुछ हुआ उसके बारेमें निम्नलिखित बयान देनेकी इजाजत मिली है : {{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''शिष्टमण्डलके सदस्योंने राणा साहबको सौहार्दपूर्ण अतिथिसत्कारके लिए धन्यवाद दिया और प्रस्तुत प्रश्नके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी तथा आर्य प्रतिनिधि सभाकी स्थिति स्पष्ट की। राणा साहबने मण्डलकी बात धैर्यसे सुनी तथा उसे यकीन दिलाया कि उनकी रियासतमें सभी सुस्थापित धार्मिक समाजोंको धर्म–प्रचारकी पूरी स्वतन्त्रता है। मण्डलने उनका ज्ञापन शिष्टतासे सुननेके लिए तथा उत्साहवर्धक जवाब देने के लिए राणा साहबको धन्यवाद दिया और उनसे विदा ली।'''}} इस संयुक्त बयानमें अत्यधिक सतर्कता तथा राज्यकी भीरुताकी झलक दिखलाई पड़ती है। दलितोंके प्रति किये गये अन्याय तथा एक महान् धार्मिक संस्थाके अपमानको साफ तौरपर स्वीकार करनेसे रियासतकी इज्जत जनताके मनमें बहुत बढ़ जाती। खैर थोड़ा–बहुत जो भी हुआ उसीके लिए धन्यवाद देना चाहिए। अगर राणा साहबकी प्रतिज्ञाका पूर्ण पालन हुआ तो अन्याय और अपमानकी बातको लोग भूल जायेंगे। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> 1otajl0te0q6e181x9mfqlgrk2enyvo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७४ 250 186801 674889 645197 2026-08-29T09:16:06Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674889 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८४. मगनलाल गांधी स्मारक'''}}}} अ० भा० च० संघकी कौंसिलने अपनी १२ ता० की बैठकमें यह प्रस्ताव स्वीकार किया है : यह कौंसिल निश्चय करती है कि स्व० श्रीयुत मगनलाल गांधीको स्मृतिमें एक खादी संग्रहालय बनाया जाये । उसके लिए एक लाख रुपयोंकी अपील की जाये । कौंसिल यह निर्णय करेगी कि स्मारक कहाँ बनाया जाये तथा उसकी व्यवस्था किस तरह की जाये। मेरे पास भारतवर्ष में दूर-दूरसे तथा सुदूर दक्षिण आफ्रिकासे जो संवेदना सन्देश आये हैं, उनसे विदित होता है कि मगनलालका लोगोंके हृदयमें क्या स्थान था। उनके जैसे सज्जन, लोकप्रिय और चुपचाप काम करनेवाले कार्यकर्ताका स्मारक बनाना उचित ही है। खूब सोच विचारके बाद अ० मा० च० संघकी कौंसिलने निश्चय किया कि उनका इससे अच्छा स्मारक कोई दूसरा नहीं हो सकता कि किसी उपयुक्त स्थान पर एक खादी संग्रहालय खोला जाये । संग्रहालय खोलनेकी कल्पना तो मगनलालकी ही थी और उन्होंने अपने स्वभावके अनुसार सत्याग्रह आश्रमके एक कमरेमें छोटा-सा संग्रहालय बनाया भी था । किन्तु खादीने जो उन्नति की है, उसे देखते हुए हमें उसके लिए एक स्थायी और बड़े मकानकी और वहाँ वस्तुओंका ऐसा संग्रह करनेकी जरूरत है, जो दिवंगतकी प्रतिष्ठाके अनुरूप हो। ऐसा संग्रहालय एक लाख रुपयोंसे कममें बन ही नहीं सकता। इसलिए संघने कमसे कम एक लाख रुपयोंकी रकम निश्चित की है । गम्भीर अध्ययन और शिक्षणके लिए जो खादी संग्रहालय बनाया जाये, उसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं हो सकती । एक लाख रुपयोंसे कौंसिल केवल बहुत मामूली, मगर काफी अच्छी शुरुआत कर सकने तथा स्वर्गीय व्यक्तिकी कल्पनाको स्थायी रूप दे सकने भरकी आशा रखती है। जनता जैसी सहायता दे, उसके अनुसार संग्रहालय में कपासकी खेती पहले जमाने में किस तरह होती थी और आजकल किस तरह होती है, इससे सम्बन्धित तमाम किताबें रखी जा सकती हैं, पुराने जमानेकी तथा आजकलकी अच्छी-अच्छी, महीनसे-महीन तथा मोटी-मोटी खादीके नमूने रखे जा सकते हैं, और धुनकी, ओटनी, चरखे तथा करघेके पुरानेसे-पुराने तथा नए-नए नमूने रखे जा सकते हैं। संग्रहालयके साथ ही थोड़ी जमीन रखी जा सकती है, जिसमें कपासकी खेतीके प्रयोग किये जायें। इन प्रयोगोंमें हमारी दृष्टि कपास की खेती से गरीब गाँववालोंको लाभ पहुँचानेकी होगी; दुनियाके बाजारसे या शोषण-कुशल धनी व्यापारियोंको लाभ पहुँचानेसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होगा । सत्याग्रह आश्रम में स्वर्गीय मगनलाल ऐसे प्रयोग कर रहे थे । आश्रमकी यह कपास कतैयोंके बीच बहुत प्रिय हो गई है। मिलोंके उपयोगमें आनेवाली कपासको बहुत ज्यादा दबा दिया जाता है जिससे वह कमजोर हो जाती है । घरकी खेतीकी कपासमें इस<noinclude></noinclude> 9qzd7nirtk7e47t5plohmofshleg2gu 674890 674889 2026-08-29T09:25:36Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674890 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८४. मगनलाल गांधी स्मारक'''}}}} अ॰ भा॰ च॰ संघकी कौंसिलने अपनी १२ ता॰ की बैठकमें यह प्रस्ताव स्वीकार किया है : {{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''यह कौंसिल निश्चय करती है कि स्व॰ श्रीयुत मगनलाल गांधीकी स्मृतिमें एक खादी संग्रहालय बनाया जाये। उसके लिए एक लाख रुपयोंकी अपील की जाये। कौंसिल यह निर्णय करेगी कि स्मारक कहाँ बनाया जाये तथा उसकी व्यवस्था किस तरह की जाये।'''}} मेरे पास भारतवर्षमें दूर–दूरसे तथा सुदूर दक्षिण आफ्रिकासे जो संवेदना सन्देश आये हैं, उनसे विदित होता है कि मगनलालका लोगोंके हृदयमें क्या स्थान था। उनके जैसे सज्जन, लोकप्रिय और चुपचाप काम करनेवाले कार्यकर्ताका स्मारक बनाना उचित ही है। खूब सोच विचारके बाद अ॰ भा॰ च॰ संघकी कौंसिलने निश्चय किया कि उनका इससे अच्छा स्मारक कोई दूसरा नहीं हो सकता कि किसी उपयुक्त स्थान पर एक खादी–संग्रहालय खोला जाये। संग्रहालय खोलनेकी कल्पना तो मगनलालकी ही थी और उन्होंने अपने स्वभावके अनुसार सत्याग्रह आश्रमके एक कमरेमें छोटा–सा संग्रहालय बनाया भी था। किन्तु खादीने जो उन्नति की है, उसे देखते हुए हमें उसके लिए एक स्थायी और बड़े मकानकी और वहाँ वस्तुओंका ऐसा संग्रह करनेकी जरूरत है, जो दिवंगतकी प्रतिष्ठाके अनुरूप हो। ऐसा संग्रहालय एक लाख रुपयोंसे कममें बन ही नहीं सकता। इसलिए संघने कमसे–कम एक लाख रुपयोंकी रकम निश्चित की है। गम्भीर अध्ययन और शिक्षणके लिए जो खादी संग्रहालय बनाया जाये, उसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं हो सकती। एक लाख रुपयोंसे कौंसिल केवल बहुत मामूली, मगर काफी अच्छी शुरुआत कर सकने तथा स्वर्गीय व्यक्तिकी कल्पनाको स्थायी रूप दे सकने भरकी आशा रखती है। जनता जैसी सहायता दे, उसके अनुसार संग्रहालयमें कपासकी खेती पहले जमानेमें किस तरह होती थी और आजकल किस तरह होती है, इससे सम्बन्धित तमाम किताबें रखी जा सकती हैं, पुराने जमानेकी तथा आजकलकी अच्छी–अच्छी, महीनसे–महीन तथा मोटी–मोटी खादीके नमूने रखे जा सकते हैं, और धुनकी, ओटनी, चरखे तथा करघेके पुरानेसे–पुराने तथा नए–नए नमूने रखे जा सकते हैं। संग्रहालयके साथ ही थोड़ी जमीन रखी जा सकती है, जिसमें कपासकी खेतीके प्रयोग किये जायें। इन प्रयोगोंमें हमारी दृष्टि कपास की खेतीसे गरीब गाँववालोंको लाभ पहुँचानेकी होगी; दुनियाके बाजारसे या शोषण–कुशल धनी व्यापारियोंको लाभ पहुँचानेसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होगा। सत्याग्रह आश्रममें स्वर्गीय मगनलाल ऐसे प्रयोग कर रहे थे। आश्रमकी यह कपास कतैयोंके बीच बहुत प्रिय हो गई है। मिलोंके उपयोगमें आनेवाली कपासको बहुत ज्यादा दबा दिया जाता है जिससे वह कमजोर हो जाती है। घरकी खेतीकी कपासमें इस<noinclude></noinclude> 2ri5moq0a9tko1cn5qdlkwvdmj1kuqx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७५ 250 186802 674904 645198 2026-08-29T11:02:00Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674904 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||हैदराबाद राज्यमें खादी|३४३}}</noinclude> क्रियाकी जरूरत नहीं होती और उसे सावधानी से चुना जाता है, अतः उसे धुननेमें कहीं ज्यादा आराम और वक्तकी बचत होती है तथा कतैया मजबूत सूत कात पाता है । अगर दाताओंने उदारता दिखलाई और कौंसिल द्वारा निश्चित इस न्यूनतम रकमसे ज्यादा रकम जमा हो सकी तो प्रस्तावित संग्रहालय में ये सब तथा और कई तरहके काम हो सकते हैं । इस योजनाको अ० भा० च० संघ अमलमें लायेगा, जो दिन दूनी रात चौगुनी बढ़नेवाली संस्था है और जिसमें ऐसे लोग हैं जो ठोस और रचनात्मक कार्य करनेके लिए कमर कसे हुए हैं। यह अभी तय नहीं हो पाया है कि संग्रहालय कहाँ बनाया जायेगा, क्योंकि कौंसिलके सामने कई एक स्थानोंके नाम हैं। जैसा कि स्वाभाविक है, साबरमतीका नाम सबसे पहले ध्यानमें आता है । और बाकी चीजोंको ध्यान में रखते हुए यदि साबरमती ही सबसे अधिक उपयुक्त स्थान लगा तो बेशक कौंसिल इस स्थानको ही चुनेगी। कौंसिलकी इच्छा है कि स्वर्गीय मगनलाल भाईकी तरह ही उनके स्मारक संग्रहालय में भी कामकाजकी दृष्टि ही प्रधान हो। इसलिए कौंसिलके सामने स्थानके चुनावमें किसी किस्मकी गलत भावनाका कोई महत्व नहीं होगा । सभी दानोंकी प्राप्ति-स्वीकृति इस पत्रमें छापी जायेगी । दान श्रीयुत शंकरलाल बैंकर, मन्त्री अ० भा० च० संघ, मिर्जापुर, अहमदाबाद या श्रीयुत सेठ जमनालाल बजाज, ३९५ कालबादेवी रोड, बम्बई या व्यवस्थापक सत्याग्रह आश्रम, साबरमतीके नाम भेजे जा सकते हैं । [अंग्रेजीसे] यंग इंडिया, १७-५-१९२८ {{c|{{larger|'''३८५. हैदराबाद राज्यमें खादी'''}}}} यह खुशीकी बात है कि भारतीय राजा राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्थामें खादीका स्थान स्वीकार करने लगे हैं। इस पंक्तिमें सबसे नया आनेवाला राज्य हैदराबाद है । इस राज्यके उद्योग विभागने अभी हालमें अपना एक निरीक्षक सत्याग्रह आश्रममें खादीकी कलाका अध्ययन करनेके लिए भेजा है और उसके साथ विभिन्न प्रक्रिया सीखने के लिए दो युवक भी भेजे हैं। आश्रमका जलवायु और सम्भवतः आश्रमका रहन-सहन उनके अनुकूल नहीं था । इसलिए ये युवक अपने पाठ्यक्रमको समाप्त नहीं कर सके हैं। मुख्य बात यह है कि काम आरम्भ कर दिया गया है। निरीक्षक मौलवी मुहम्मद अलीमें बहुत उत्साह था और ऐसा लगता था कि चरखेके महत्वको उन्होंने अब जितना समझा है उतना पहले कभी नहीं समझा था । मुझे आशा है कि राज्यका उद्योग विभाग अ० भा० च० संघके तकनीकी विभागसे सम्पर्क बनाये रखेगा और हैदराबादमें मैसूरकी तरह चरखेके कामकी सुनियोजित ढंगसे व्यवस्था करेगा। मैसूर में उस दिन राज्यके दीवान मिर्जा मुहम्मद इस्माइलने दलित वर्गोंमें खादीका जो कार्य<noinclude></noinclude> bmasjqnvx5z2i5qw7ssiugh0xi28rqp 674905 674904 2026-08-29T11:10:59Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||हैदराबाद राज्यमें खादी|३४३}}</noinclude> क्रियाकी जरूरत नहीं होती और उसे सावधानीसे चुना जाता है, अतः उसे धुननेमें कहीं ज्यादा आराम और वक्तकी बचत होती है तथा कतैया मजबूत सूत कात पाता है। अगर दाताओंने उदारता दिखलाई और कौंसिल द्वारा निश्चित इस न्यूनतम रकमसे ज्यादा रकम जमा हो सकी तो प्रस्तावित संग्रहालयमें ये सब तथा और कई तरहके काम हो सकते हैं। इस योजनाको अ॰ भा॰ च॰ संघ अमलमें लायेगा, जो दिन दूनी रात चौगुनी बढ़नेवाली संस्था है और जिसमें ऐसे लोग हैं जो ठोस और रचनात्मक कार्य करनेके लिए कमर कसे हुए हैं। यह अभी तय नहीं हो पाया है कि संग्रहालय कहाँ बनाया जायेगा, क्योंकि कौंसिलके सामने कई एक स्थानोंके नाम हैं। जैसा कि स्वाभाविक है, साबरमतीका नाम सबसे पहले ध्यानमें आता है। और बाकी चीजोंको ध्यानमें रखते हुए यदि साबरमती ही सबसे अधिक उपयुक्त स्थान लगा तो बेशक कौंसिल इस स्थानको ही चुनेगी। कौंसिलकी इच्छा है कि स्वर्गीय मगनलाल भाईकी तरह ही उनके स्मारक संग्रहालयमें भी कामकाजकी दृष्टि ही प्रधान हो। इसलिए कौंसिलके सामने स्थानके चुनावमें किसी किस्मकी गलत भावनाका कोई महत्व नहीं होगा। सभी दानोंकी प्राप्ति–स्वीकृति इस पत्रमें छापी जायेगी। दान श्रीयुत शंकरलाल बेंकर, मन्त्री अ॰ भा॰ च॰ संघ, मिर्जापुर, अहमदाबाद या श्रीयुत सेठ जमनालाल बजाज, ३९५ कालबादेवी रोड, बम्बई या व्यवस्थापक सत्याग्रह आश्रम, साबरमतीके नाम भेजे जा सकते हैं। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८ {{c|{{larger|'''३८५. हैदराबाद राज्यमें खादी'''}}}} यह खुशीकी बात है कि भारतीय राजा राष्ट्रीय अर्थ–व्यवस्थामें खादीका स्थान स्वीकार करने लगे हैं। इस पंक्तिमें सबसे नया आनेवाला राज्य हैदराबाद है। इस राज्यके उद्योग विभागने अभी हालमें अपना एक निरीक्षक सत्याग्रह आश्रममें खादीकी कलाका अध्ययन करनेके लिए भेजा है और उसके साथ विभिन्न प्रक्रिया सीखने के लिए दो युवक भी भेजे हैं। आश्रमका जलवायु और सम्भवतः आश्रमका रहन–सहन उनके अनुकूल नहीं था। इसलिए ये युवक अपने पाठ्यक्रमको समाप्त नहीं कर सके हैं। मुख्य बात यह है कि काम आरम्भ कर दिया गया है। निरीक्षक मौलवी मुहम्मद अलीमें बहुत उत्साह था और ऐसा लगता था कि चरखेके महत्वको उन्होंने अब जितना समझा है उतना पहले कभी नहीं समझा था। मुझे आशा है कि राज्यका उद्योग विभाग अ॰ भा॰ च॰ संघके तकनीकी विभागसे सम्पर्क बनाये रखेगा और हैदराबादमें मैसूरकी तरह चरखेके कामकी सुनियोजित ढंगसे व्यवस्था करेगा। मैसूरमें उस दिन 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दिये गये हैं, यदि मुझे यह विश्वास होता कि कुमारी मेयोकी इस निन्दापरक पुस्तकके पाठक, इस पुस्तकके खण्डनमें जो कुछ प्रकाशित हो चुका है और अभी हो रहा है, उसे पढ़ते हैं तो मुझे दीनबन्धु एण्ड्रयूजका उत्तर' प्रकाशित करनेमें कम संकोच होता । किन्तु मुझे आशंका है। कि ये खण्डन कुमारी मेयोके पाठकों तक नहीं पहुँचते और इसलिए उनका महत्व बहुत कुछ कम हो जाता है। कुमारी मेयो एक दूषित सिद्धान्तका प्रतिनिधित्व करती हैं। कोई भी राष्ट्र समस्त संसारके लिए अभिशाप नहीं हो सकता। भारत निश्चय ही वैसा राष्ट्र नहीं है । किन्तु 'मदर इंडिया' की लेखिका जैसे लेखक संसारके लिए अभिशाप हैं । और मैं निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि केवल खण्डनात्मक लेख लिखकर उनका मुकाबला किया जा सकता है फिर चाहे वे लेख कितनी ही शुद्ध मावनासे और योग्यतापूर्वक क्यों न लिखे जायें। दूसरे शब्दोंमें कहूँ तो जो प्रश्न मुझे व्यथित कर रहा है वह यह है कि भाषण या लेखनमें क्या महज सचाई झूठका प्रतिकार कर सकती है। यदि कुमारी मेयोका दूषित प्रचार सफलतापूर्वक रोकना हो तो क्या कोई इससे सर्वथा भिन्न और अधिक उदात्त कार्य करना आवश्यक नहीं है ? किन्तु मेरे पास पहलेसे तैयार और प्रभावकारी ऐसा कोई विकल्प नहीं है, जो दीन- बन्धु एन्ड्रयूजके जैसे लेखोंकी जगह ले सके । और चूंकि 'यंग इंडिया' जिस सिद्धान्तका अभिव्यंजक है उसे हम दोनों एक साथ स्वीकार करते हैं और दोबारा विचार करनेपर भी उनका यही खयाल है कि उनके इस खण्डनकी अब भी उपयोगिता है, इसलिए मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि यदि उनके इन लेखोंसे कुमारी मेयोके विकृत चित्रणमें विश्वास करनेवाले एक भी स्त्री या पुरुषका भ्रम निवारण हो जाये तो इससे उनको और मुझे भी निश्चित रूपसे सन्तोष हो जायेगा । :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८ १. सी० एफ० एण्ड्यूज के ये लेख यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> afybopxzgdysjz58gu4xnvg8urkuq4v 674907 674906 2026-08-29T11:20:40Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|३४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> किया जा रहा है उसका स्वयं निरीक्षण किया था। श्री पुजारी, जिन्होंने दीवान साहबके साथ रहकर उन्हें यह सारा कार्य दिखाया था, कहते हैं कि दीवानने कामकी प्रशंसा की और इस बातको महसूस किया कि चरखेसे किसानोंको सहायक धन्धा तो मिलता ही है, इसके अलावा उससे दलित वर्गीका पर्याप्त उत्थान भी होता है। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८ {{c|{{larger|'''३८६. भारतके सम्बन्धमें सत्य : कुमारी मेयोको उत्तर'''}}}} नीचे दिया जा रहा लेख और इसी मालाके जो अन्य लेख यहाँ बादमें दिये जायेंगे, उन्हें इस पत्रमें छापते हुए मुझे खेद ही नहीं, निश्चय ही संकोच भी हो रहा है। मुझे लगता है कि कुमारी मेयोको जरूरतसे ज्यादा जवाब दिये गये हैं, यदि मुझे यह विश्वास होता कि कुमारी मेयोकी इस निन्दापरक पुस्तकके पाठक, इस पुस्तकके खण्डनमें जो कुछ प्रकाशित हो चुका है और अभी हो रहा है, उसे पढ़ते हैं तो मुझे दीनबन्धु एण्ड्रयूजका उत्तर<ref>सी॰ एफ॰ एण्ड्यूजके ये लेख यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं।</ref> प्रकाशित करनेमें कम संकोच होता। किन्तु मुझे आशंका है कि ये खण्डन कुमारी मेयोके पाठकों तक नहीं पहुँचते और इसलिए उनका महत्व बहुत कुछ कम हो जाता है। कुमारी मेयो एक दूषित सिद्धान्तका प्रतिनिधित्व करती हैं। कोई भी राष्ट्र समस्त संसारके लिए अभिशाप नहीं हो सकता। भारत निश्चय ही वैसा राष्ट्र नहीं है। किन्तु 'मदर इंडिया' की लेखिका जैसे लेखक संसारके लिए अभिशाप हैं। और मैं निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि केवल खण्डनात्मक लेख लिखकर उनका मुकाबला किया जा सकता है फिर चाहे वे लेख कितनी ही शुद्ध भावनासे और योग्यतापूर्वक क्यों न लिखे जायें। दूसरे शब्दोंमें कहूँ तो जो प्रश्न मुझे व्यथित कर रहा है वह यह है कि भाषण या लेखनमें क्या महज सचाई झूठका प्रतिकार कर सकती है। यदि कुमारी मेयोका दूषित प्रचार सफलतापूर्वक रोकना हो तो क्या कोई इससे सर्वथा भिन्न और अधिक उदात्त कार्य करना आवश्यक नहीं है? किन्तु मेरे पास पहलेसे तैयार और प्रभावकारी ऐसा कोई विकल्प नहीं है, जो दीनबन्धु एन्ड्रयूजके जैसे लेखोंकी जगह ले सके। और चूंकि 'यंग इंडिया' जिस सिद्धान्तका अभिव्यंजक है उसे हम दोनों एक साथ स्वीकार करते हैं और दोबारा विचार करनेपर भी उनका यही खयाल है कि उनके इस खण्डनकी अब भी उपयोगिता है, इसलिए मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि यदि उनके इन लेखोंसे कुमारी मेयोके विकृत चित्रणमें विश्वास करनेवाले एक भी स्त्री या पुरुषका भ्रम निवारण हो जाये तो इससे उनको और मुझे भी निश्चित रूपसे सन्तोष हो जायेगा। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 2vx3nupeu1ff4bz0ped71l54z3za20s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७७ 250 186804 674908 645200 2026-08-29T11:27:00Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८७. पत्र : अजमल जामिया कोषके कोषाध्यक्षको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १८ मई, १९२८}} {{left|प्रिय महोदय,}} {{c|'''अजमल जामिया कोष'''}} आपका १० मईका पत्र मिला । २१-४-१९२८ को हमें भेजी गई सूचीमें जोड़की गलतीकी ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। आपने उसका जोड़ रु० ६९३५-१-० दिया है जब कि सही जोड़ करनेपर वह कुल ६८८४-९-० आता है । इस प्रकार उसमें रु० ५०-८-० का अन्तर है। कृपया इस सप्ताह 'यंग इंडिया' में छपे आँकड़ोंका मिलान अपनी बहीके आँकड़ोंसे कर लें और गलती ढूँढ़े और मुझे बतायें, जिससे कि अगले अंकमें इसे सही किया जा सके । " सप्ताह में एकत्र हुआ और दान" वाली सूचीमें निम्न नामों उनकी दानकी रकमको नहीं दिया गया है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि हमने आश्रमवासियोंके दानको एक मुश्त देना ही उचित समझा । मन्त्री आपको पूरी सूची भेज रहे हैं जिसमें आप छोड़े गये आँकड़े भी भर लें। जिनकी दानकी रकमें नहीं दी गई हैं उनके नाम : दुर्भाग्यसे इस सप्ताहके 'यंग इंडिया' में छपी सूचीके आँकड़ोंमें एक गलती हो गई है। जोड़में ८ आने बढ़ गये हैं। मैं प्रेसको भेजी गई मूल सूचीको देख रहा हूँ और गलतीको ढूंढनेकी तथा अगले अंकमें उसे ठीक करनेकी आशा करता हूँ । नई सूची भेजते समय आप कृपा करके पिछले अंकमें छपनेके लिए भेजी गई सूचीके अर्थात् उस सूचीके साथ जो आपने अपने १० मईके पत्रके बाद भेजी थी, पूरी सूची भेजें । व्यक्तियोंके नाममें छोटी-छोटी रकमें देनेके बजाय आश्रमके नाममें एक मुश्त देना अधिक अच्छा समझा गया । यदि आप सूचीको छपवाना चाहते हैं तो वह सोमवारसे पहले पहुँच जानी चाहिये। {{right|आपका विश्वस्त,}} {{left|कोषाध्यक्ष<br> अजमल जामिया कोष<br> ३९५, कालवा देवी रोड<br> बम्बई}} अंग्रेजी (एस० एन० १४९२३) की फोटो नकलसे । १. इसके बाद एक सूची दी गई थी जो यहीं नहीं दी जा रही हैं।<noinclude></noinclude> lj2496xbxtfwkmy499e9abcn226mmsk 674909 674908 2026-08-29T11:33:33Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674909 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८७. पत्र : अजमल जामिया कोषके कोषाध्यक्षको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १८ मई, १९२८}} {{left|प्रिय महोदय,}} {{c|'''अजमल जामिया कोष'''}} आपका १० मईका पत्र मिला। २१-४-१९२८ को हमें भेजी गई सूचीमें जोड़की गलतीकी ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। आपने उसका जोड़ रु॰ ६९३५—१—० दिया है जब कि सही जोड़ करनेपर वह कुल ६८८४—९—० आता है। इस प्रकार उसमें रु॰ ५०—८—० का अन्तर है। कृपया इस सप्ताह 'यंग इंडिया' में छपे आँकड़ोंका मिलान अपनी बहीके आँकड़ोंसे कर लें और गलती ढूँढ़े और मुझे बतायें, जिससे कि अगले अंकमें इसे सही किया जा सके। "सप्ताहमें एकत्र हुआ और दान" वाली सूचीमें निम्न नामों उनकी दानकी रकमको नहीं दिया गया है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि हमने आश्रमवासियोंके दानको एक मुश्त देना ही उचित समझा। मन्त्री आपको पूरी सूची भेज रहे हैं जिसमें आप छोड़े गये आँकड़े भी भर लें। जिनकी दानकी रकमें नहीं दी गई हैं उनके नाम :<ref>इसके बाद एक सूची दी गई थी जो यहीं नहीं दी जा रही हैं।</ref> दुर्भाग्यसे इस सप्ताहके 'यंग इंडिया' में छपी सूचीके आँकड़ोंमें एक गलती हो गई है। जोड़में ८ आने बढ़ गये हैं। मैं प्रेसको भेजी गई मूल सूचीको देख रहा हूँ और गलतीको ढूंढनेकी तथा अगले अंकमें उसे ठीक करनेकी आशा करता हूँ। नई सूची भेजते समय आप कृपा करके पिछले अंकमें छपनेके लिए भेजी गई सूचीके अर्थात् उस सूचीके साथ जो आपने अपने १० मईके पत्रके बाद भेजी थी, पूरी सूची भेजें। व्यक्तियोंके नाममें छोटी–छोटी रकमें देनेके बजाय आश्रमके नाममें एक मुश्त देना अधिक अच्छा समझा गया। यदि आप सूचीको छपवाना चाहते हैं तो वह सोमवारसे पहले पहुँच जानी चाहिये। {{right|आपका विश्वस्त,}} {{left|कोषाध्यक्ष<br> अजमल जामिया कोष<br> ३९५, कालबा देवी रोड<br> बम्बई}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४९२३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude> kupnph6czl2clibacp6f5j4ovgwayh5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७८ 250 186805 674910 645201 2026-08-29T11:36:35Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८८. तार : मुहम्मद अलीको'''}}}} [१९ मई, १९२८ या उसके पश्चात्]<ref></ref> आपका तार पाकर प्रसन्नता हुई। आशा है कि महाराजा साहब खादीकी प्रगति की गारंटी लेंगे। {{right|{{larger|गांधी}}}} अंग्रेजी (एस० एन० १३५९९) की माइक्रोफिल्मसे । {{c|{{larger|'''३८९. प्राथमिक शिक्षा - २'''}}}} यह एक बड़ा सवाल है कि जिस शिक्षाका हम पिछले अंकमें विचार कर चुके हैं, वह किस तरह दी जा सकती है या उसे देनेके लिए शिक्षक कहाँसे लाये जायें ? शिक्षाके बारेमें यही असली प्रश्न है । सरकारी प्रशिक्षण विद्यालयों (ट्रेनिंग कालेजों) ने इस सवालको हल नहीं किया। जिसे वे 'थ्री आर' यानी लिखना, पढ़ना और गणित कहते हैं, उन्होंने उसको भी हल नहीं किया। इन तीनोंका ज्ञान इतना कम दिया जाता है कि सीखनेवालेको या जनताको उनका बहुत लाभ नहीं मिलता। इसलिए यह काम राष्ट्रीय विद्यापीठको करना है। राष्ट्रीय विद्यापीठका धर्म और अधिकार ही शिक्षाके क्षेत्रमें राष्ट्रकी पोषक नवीन युक्तियाँ ढूंढ़ निकालना है । और मेरी अल्पबुद्धिके अनुसार ये युक्तियाँ यूरोपसे बहुत कम मात्रामें मिलेंगी; हिन्दुस्तानके मौजूदा हालात में उससे भी कम मिलेंगी। हर देशकी शिक्षा उसके स्वराज्यकी रक्षाके लिए होती है। इसलिए हमें अपनी शिक्षामें नये प्रयोग ही करने होंगे। उन्हें करनेमें मले ही हमें यूरोपके अनुभवको जानकारी भी हो जाये; मगर यह मानकर नहीं कि वहाँका सभी कुछ ठीक है, और न यह मानकर कि वहाँके हालातमें जो कुछ वहाँ ठीक है, वही यहाँ भी ठीक है। इससे एक चीज तो यह निकली कि सरकारी स्कूलोंमें जो कुछ होता है, उसे हमें शककी नजरसे देखना है। सरकारी शिक्षाके स्वराज्य और हमारी सभ्यताके लिए घातक होनेके कारण बहुत-से मामलोंमें हम सरकारी तरीके से उलटे चलेंगे तो हमें सीधा रास्ता मिलना सम्भव है। इसकी मिसाल लें : १. यह मुहम्मद अली, उद्योग निरीक्षक, औरंगाबादके १९ मईको मिले उस तारके उत्तरमें भेजा गया जो इस प्रकार था : आपके आशीर्वादसे खादी प्रदर्शनी और कताई प्रदर्शन सफल। महाराजा बहादुरने आपके सूतको चूमा, वे आपको बहुत-बहुत सलाम कहते हैं और कातनेका वायदा करते हैं। आपका आशीर्वाद चाहिए।<noinclude></noinclude> if11n5gty1t7pivumuk1mcddcfljrp9 674912 674910 2026-08-29T11:45:04Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674912 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude> {{c|{{larger|'''३८८. तार : मुहम्मद अलीको'''}}}} {{right|[१९ मई, १९२८ या उसके पश्चात्]<ref>यह मुहम्मद अली, उद्योग निरीक्षक, औरंगाबादके १९ मईको मिले उस तारके उत्तरमें भेजा गया जो इस प्रकार था : आपके आशीर्वादसे खादी प्रदर्शनी और कताई प्रदर्शन सफल। महाराजा बहादुरने आपके सूतको चूमा, वे आपको बहुत–बहुत सलाम कहते हैं और कातनेका वायदा करते हैं। आपका आशीर्वाद चाहिए।</ref>}} आपका तार पाकर प्रसन्नता हुई। आशा है कि महाराजा साहब खादीकी प्रगति की गारंटी लेंगे। {{right|{{larger|गांधी}}}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३५९९) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{larger|'''३८९. प्राथमिक शिक्षा — २'''}}}} यह एक बड़ा सवाल है कि जिस शिक्षाका हम पिछले अंकमें विचार कर चुके हैं, वह किस तरह दी जा सकती है या उसे देनेके लिए शिक्षक कहाँसे लाये जायें? शिक्षाके बारेमें यही असली प्रश्न है। सरकारी प्रशिक्षण विद्यालयों (ट्रेनिंग कालेजों) ने इस सवालको हल नहीं किया। जिसे वे 'थ्री आर' यानी लिखना, पढ़ना और गणित कहते हैं, उन्होंने उसको भी हल नहीं किया। इन तीनोंका ज्ञान इतना कम दिया जाता है कि सीखनेवालेको या जनताको उनका बहुत लाभ नहीं मिलता। इसलिए यह काम राष्ट्रीय विद्यापीठको करना है। राष्ट्रीय विद्यापीठका धर्म और अधिकार ही शिक्षाके क्षेत्रमें राष्ट्रकी पोषक नवीन युक्तियाँ ढूंढ़ निकालना है। और मेरी अल्पबुद्धिके अनुसार ये युक्तियाँ यूरोपसे बहुत कम मात्रामें मिलेंगी; हिन्दुस्तानके मौजूदा हालातमें उससे भी कम मिलेंगी। हर देशकी शिक्षा उसके स्वराज्यकी रक्षाके लिए होती है। इसलिए हमें अपनी शिक्षामें नये प्रयोग ही करने होंगे। उन्हें करनेमें भले ही हमें यूरोपके अनुभवको जानकारी भी हो जाये; मगर यह मानकर नहीं कि वहाँका सभी कुछ ठीक है, और न यह मानकर कि वहाँके हालातमें जो कुछ वहाँ ठीक है, वही यहाँ भी ठीक है। इससे एक चीज तो यह निकली कि सरकारी स्कूलोंमें जो कुछ होता है, उसे हमें शककी नजरसे देखना है। सरकारी शिक्षाके स्वराज्य और हमारी सभ्यताके लिए घातक होनेके कारण बहुत–से मामलोंमें हम सरकारी तरीकेसे उलटे चलेंगे तो हमें सीधा रास्ता मिलना सम्भव है। इसकी मिसाल लें :<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 74e60tqvn3t3rr0qhppcmqope3wbgmd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१३ 250 186939 674841 674707 2026-08-29T01:31:10Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674841 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||विनाश काले|४८१}}</noinclude>उद्योग और सात्विक पराक्रम असम्भव है। ब्रह्मचर्यके बिना मन बलवान्-सा भले ही लगे, मगर वह हजारों तरहके विकारों और प्रलोभनोंका गुलाम हो कर चलेगा। और ब्रह्मचर्यके बिना शरीर भले ही पुष्ट हो जाये, किन्तु वह वैद्यककी दृष्टिसे पूर्ण आरोग्य तो कभी पा ही नहीं सकता। शरीरकी चर्बी बढ़ाना, उसकी मांस-पेशियाँ मजबूत करना आवश्यक नहीं है। जो शरीर सूखी लकड़ी-सा होनेपर भी सर्दी, गर्मी वर्षा सभी सहन कर सकता है और जो सम्पूर्णतासे नीरोग रह सकता है, ऐसा आरोग्यवान् शरीर ब्रह्मचयंके बिना असम्भव है। यह मेरा थोड़े दिनोंका अनुभव नहीं है, किन्तु दीर्घकालका अनुभव है। मैं इसके असंख्य दृष्टान्त अपने जीवनमें से, अपने साथियोंके जीवनमेंसे दे सकता हूँ कि किस तरह एक-एक मनोविकारसे मनुष्य-शक्तिका, उसकी आत्माका हनन होता है। इसलिए मैं तो कहूँगा कि शरीर क्षीण हो तो हो जाये, तब भी आत्मार्थीको ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिए। हमारे विद्यार्थियोंके शरीरकी और मनकी दुर्बलताके कारण जुदा ही हैं। इनमें बाल-विवाह, हम सबके दुखका कारण बाल-विवाहसे उत्पन्न सन्तान कुटुम्ब-जालका बोझा, गरीबीके कारण सात्विक खुराककी अपूर्णता या अभाव वगैरा आते हैं। बाल-विवाहको अब्रह्मचर्यमें गिनकर निकाल डालनेकी मूलमें पाठक न पड़ें। विद्यार्थियोंमें बचपनसे जो कुटेवें घर कर गई हैं, उन कुटेवोंको निकालनेके लिए जबर्दस्त प्रयत्नकी जरूरत है। समाजके घातक रिवाज सुधारे जाने चाहिए, शिक्षाका कृत्रिम बोझ कम किया जाना चाहिए। किन्तु यह विषय ही दूसरा है। इसलिए इसकी चर्चा यहाँ नहीं करूँगा। इतना ही कह दूँगा कि केवल व्यायामसे ही हमारे विद्यार्थियोंका शरीर नहीं बन सकता। सभी दिशाओंमें एक-सा प्रयत्न जब हो तभी हम यथेच्छ परिणाम पैदा कर सकते हैं। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन''' २४-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|'''५२४. विनाश-काले'''}} सरकार बारडोली के सम्बन्धमें जिस नीतिका आश्रय ले रही है वह कहीं उसके विनाशकालकी सूचक न हो। गवर्नर साहबने श्री मुन्शीको जो पत्र लिखा है वह दुःखजनक, दयाजनक और हास्यजनक है। यदि कोई बड़ा अधिकारी ऐसे गोममोल और लम्बे-लम्बे पत्र अपने बचावमें लिखता है तो उसके इस कामका विचार करके दुःख होता है, फिर उसपर दया आती है और अन्तमें वह दयाके योग्य तो हो नहीं सकता, इसलिए उसपर हँसी आती है। माननीय गवर्नरने इस पत्रको लिखनेमें और युक्तियाँ देनेमें अपने पूर्वगामी गवर्नरोंको मात कर दिया है और वे ज्यों-ज्यों युक्तियाँ देते गये हैं, त्यों-त्यों फँसते गये हैं। अथवा यह कहना चाहिए कि उनके जिन सचिवोंने उस पत्रका मसविदा तैयार किया, वे उनको उत्तरोत्तर फँसाते गये हैं। ये महोदय लगान बढ़ानेका समर्थन {{left|३६–३१}}<noinclude></noinclude> 7ylmktjrzul199rye2aq2tiyrseq8oz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१४ 250 186940 674842 645337 2026-08-29T01:47:13Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674842 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करते हैं। इसके बजाय यदि वे लोगोंकी माँगके अनुसार जाँच -समितिको नियुक्ति कर दें तो उससे लोगोंका और उनके समर्थकोंका भ्रम दूर होगा। यदि कोई मनुष्य अपने पास किसी वस्तुके होनेका दावा करे और उसमें उसको दिखानेकी शक्ति हो, फिर भी वह दिखानेसे इन्कार करे, किन्तु साथ ही आग्रहपूर्वक यह भी कहता जाये कि उसके पास यह वस्तु अवश्य है तो सब लोग उसे ढोंगी कहकर उसकी हँसी उड़ायेगे। गवर्नर साहबके सम्बन्ध में भी ऐसा ही हो रहा है। गवर्नर साहबके समर्थक उनके प्रचार विभागके अधिकारीने तो और भी हद कर दी है। उन्होंने महादेव देसाईकी बताई हुई पठानोंकी अनुचित कार्रवाइयोंका ब्यौरेवार खण्डन करनेका प्रयत्न किया है। यदि लोगों पर अन्याय होता है, तो वे उसके विरुद्ध पुकार करते हैं यह सनातन पद्धति है। किन्तु राज्य इस पुकारकी तटस्थ होकर स्वतन्त्र जाँच करनेके बजाय अपराधियोंको अपने सामने बुलाता है, और उनका एकतर्फा जवाब सुनकर आरोप-कर्त्ताओंको भगा देता है और ऐसा करके अपने आपको कृतार्थ मानता है। इस समय इस राज्यका तरीका यही दिखाई देता है। लोगोंकी शिकायत सच्ची है या झूठी है वे इसकी जाँचके लिए स्वतन्त्र पंचकी माँग करते हैं। सरकार उनकी इस माँगको कैसे माने? अपराधी शासक ऐसे पंचकी नियुक्ति कैसे होने दें? कैसे इस माँगको मँजूर करने दें? सरकार कहती है कि बारडोलीके कुछ बनिए पठानोंको चौकीदारी आदिके लिए नौकर रखते हैं। उनके विरुद्ध तो कोई शिकायत नहीं करता। तब यदि सरकार उनको नौकर रखती है तो उसमें क्या दोष है? मानो एक अपराध दूसरे अपराधको ढक सकता है। फिर बनिए या कोई दूसरे लोग पठानोंको नौकर रखते हैं तो यह बात लोगोंको नहीं चुभती, यह सरकारने कैसे जाना? तथ्य यह है कि गुजरात में पठानोंको चौकीदारी आदि कामोंके लिए नौकर रखनेकी लोगोंकी आदत बढ़ती जाती है। इससे लोग त्रस्त हैं। इसका दण्ड अन्तमें उनको नौकर रखनेवाले लोगों और अन्योंको अवश्य भोगना होगा। सरकार यह कहती है कि सभी पठान विदेशी नहीं हैं, यह कथन तो उसका निरा भोलापन बताता है। लोगोंको पठान शब्द नहीं चुभता। उनको पठान जातिसे कोई विरोध नहीं है। लोगोंको विदेशियोंके विरुद्ध विदेशी होनेके कारण आपत्ति नहीं हो सकती। पठानोंमें बहुत-से लोग वीर और सज्जन हैं। उनका स्वागत लोग सदा करेंगे। किन्तु यहाँ पठानका अर्थ गुण्डा और हत्यारा है। दुर्भाग्यसे पठानोंमें ऐसे दुष्कर्मी लोग मौजूद हैं। वे अपने पहाड़ी प्रदेशसे घनकी खोजमें हिन्दुस्तानमें आते हैं। हिन्दुस्तानके लोग और उनमें विशेषतः गुजरातके निःशस्त्र, भीरु और शान्तिप्रिय लोग ऐसे पठानोंसे डरते हैं। अच्छे, वीर और सज्जन पठान दरबान या चौकीदारकी नौकरीकी खोजमें हिन्दुस्तान में नहीं आते। बनिए और दूसरे लोग पठान नौकर ढूँढ़ते और रखते हैं तो उनकी आतंककारी शक्तिके कारण ही। गुजराती गुजरातीका मुकाबला कर सकता है। इसलिए गुजरातीको नौकर रखनेसे डरपोक बनिएको सन्तोष नहीं होता। वह अपने आपको सुरक्षित नहीं मानता। इससे जो नुकसान होता है वह उसको अपनी संकुचित दृष्टिके कारण नहीं देख सकता। किन्तु<noinclude></noinclude> 1jzy901fvltqgn48wfy5hiqdeqlaztf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१५ 250 186941 674843 645338 2026-08-29T02:08:49Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674843 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||विनाश काले|४८३}}</noinclude>ब्रिटिश सरकार जैसी शक्तिशाली सरकार भीरु लोगोंका अनुकरण करके पठानोंको लोगोंके सिर पर खड़ा कर दे, इसका क्या अर्थ होता है? यह कहीं 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि' का उदाहरण तो नहीं है? इस सरकारने कभी ऐसा किया हो यह तो स्मरण नहीं आता। गवर्नर साहबकी चिट्ठी और प्रचार विभागके अधिकारीकी विज्ञप्तिसे भी बढ़कर है कलक्टर साहबकी "किसानोंसे शुभ सलाह।" इस "शुभ सलाह" पत्रिकामें किसानोंसे कहा गया है कि वे "सावधान रहें" और "फँस न जायें।" इसमें मुझे आरम्भसे लेकर अन्त तक असत्य ही भरा दिखाई देता है। इससे मुझे दुःख हुआ है। कलक्टर साहब सत्याग्रहको दुराग्रह रूप मानते हैं। वल्लभभाई आदि नेताओंके लिए इस शासकने शब्दोंका नया प्रयोग किया है। वल्लभभाई और उनके साथियोंके लिए उन्होंने कहा है "उनके पास खेतीकी कोई जमीन नहीं है, जिसके जानेका उन्हें डर हो।" कलक्टर साहब अपने पदके गर्वमें यह नहीं देख सकते कि इन नेताओंको जमीनसे हजार गुनी ज्यादा प्यारी अपनी इज्जत है और अपनी इज्जतसे भी ज्यादा प्यारी किसानोंकी भलाई है। कलक्टर साहबने नेताओंको झूठा बतानेका प्रयत्न किया है और जो बात उन्होंने नहीं कही है उसको कहनेका दोष उनपर लगाया है और उनका जितना हो सके उतना अपमान करनेके बाद बारडोली और वालोडके किसानोंको यह अशुभ सीख दी है कि वे तुरन्त लगान दे दें और उन्होंने जिस प्रतिज्ञाकी पुष्टि कई बार की है उसको भंग कर दें। बारडोली और वालोडके किसानोंको जो ऐसा अनीतिमय और पतनकारी दण्ड दिया गया है उसका कमसे कम जवाब यह है कि वे जबतक उनकी माँग स्वीकार नहीं की जाती तबतक लगान कदापि न दें। जमीन, घरबार, और ढोर-डंगर बहुत बार आते हैं और चले जाते हैं, किन्तु जो प्रतिज्ञा एक बार टूट जायेगी वह फिर नहीं सघ सकती, जैसे थूका हुआ फिर नहीं निगला जा सकता। सरकारकी विपरीत बुद्धिका सच्चा दर्शन हमें गवर्नर साहबके श्री मुन्शीके साथ किये हुए पत्र-व्यवहारमें हुआ है। उसके परिणामस्वरूप श्री मुन्शी बारडोली गये, वहाँ उन्होंने लोगोंकी स्थिति अपनी आँखोंसे देखी और गवर्नरको प्रभावकारी और सप्रमाण पत्र लिखा। वे इसके लिए धन्यवादके पात्र हैं। उन्होंने यह विचार प्रकट किया है कि यदि सरकार जाँच समिति नियुक्त न करेगी तो वे स्वयं ही एक समिति बनाकर जाँच करेंगे। उनका यह कदम बहुत अच्छा है। यदि समितिमें सभी मुख्य जातियोंके नेताओंको लेकर तुरन्त जाँच की जायेगी तो सत्याग्रहियोंको अपना मामला लोगोंके सम्मुख रखनेका एक उत्तम अवसर मिलेगा। यह वांछनीय है कि यह समिति सरकारकी दमन-नीतिके सम्बन्धमें जाँच करके ही सन्तुष्ट न हो जाये; बल्कि लोगोंकी लगान सम्बन्धी शिकायत के बारेमें भी जाँच करे। इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रकारकी समितिको जाँचसे इस प्रश्नके निर्णयमें बहुत सहायता मिलेगी। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन,''' २४-६-१९२८}}<noinclude></noinclude> ecgkkduyt9piep6866afc99uf3qo6tg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१६ 250 186942 674898 645339 2026-08-29T10:06:15Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674898 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५२५. पशु-सुधार'''}}}} आश्रम में एक दुग्धालय है और उसके अन्तर्गत पशु-सुधारका प्रयोग चल रहा है, पाठक इस बातको जानते हैं। इस प्रयोगका पूरा वर्णन प्रस्तुत करनेका समय अभी नहीं आया है। किन्तु इस प्रयोगका एक उद्देश्य अच्छे साँड़ तैयार करना भी है। ऐसे दो साँड़ इस समय आश्रम में तैयार हो चुके हैं। जिन्हें गो-सेवामें रुचि है अथवा जो अपनी गायोंकी नस्ल सुधारना चाहते हैं उनको मेरी सलाह है कि वे इन साँड़ोंको देखें और यदि उनको उनकी जरूरत हो तो मन्त्री से मिलकर उनकी कीमत वगैरा जानें। {{left|[गुजराती से]<br> '''नवजीवन,''' २४-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''५२६. शब्द-कोश'''}}}} एक आश्रमवासी, आश्रम नियमावली पढ़कर व्रतोंकी नीचे लिखी टीका करते हैं और फिर खुद 'शब्द-कोष' शीर्षक देकर अपनी बनाई व्याख्या देते हैं: '''आश्रमके व्रतोंकी व्याख्या सम्पूर्ण होनेपर भी वे सहज ही समझमें नहीं आते हैं। यह साफ दिखलाई नहीं पड़ता कि करना क्या है, इसलिए मैंने अपनी समझ के अनुसार उनके अर्थ लिखे हैं या यों कहिए कि शब्द-कोष बनाया है।''' '''सत्य––चाहे जहाँ हो, कृत्रिमताका त्याग करना। अपने मूल स्वभावकी खोज करनी।''' '''अहिंसा––क्या मनुष्य, और क्या पशु, किसीको कष्ट नहीं पहुँचाना। जब-जब झगड़ोंसे क्लेश पैदा हो, तब क्लेशमें दूसरोंको शामिल करने का प्रयत्न न करते हुए, अपने आप ही सारा क्लेश झेल लेना।''' '''ब्रह्मचर्य––स्थूल और सूक्ष्म सभी आवेगोंको उभरते ही जला डालना, दबा लेना। सर्वव प्रसन्न रहना। पवित्र वस्तुओंमें चौबीसों घंटे एकाग्र रहना।''' '''अस्वाद––कड़कती हुई भूख लगने पर खाने बैठना और आधे पेट ही उठ जाना। जिस खुराकको तैयार करने में बहुतोंकी मेहनत लगी हो, ऐसे भोजनके पास फटकना भी नहीं।''' '''अस्तेय––अपनी जरूरतें दिनों-दिन कमसे-कम करते जाना। कलसे आजकी जरूरतें कम होनी चाहिए।'''<noinclude></noinclude> f1ycvjh3akw2qhzdmaj0g56fribvjsj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१७ 250 186943 674901 645340 2026-08-29T10:19:52Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674901 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: सदानन्दको|४८५}}</noinclude>अपरिग्रह––हर होली या दिवालीको रु॰ २५ से अधिक जितने रुपये हों, वे सब अपने पाससे निकाल देना। एक सालसे अधिकका खर्च किसीके पास न रहना चाहिए। (एक सालका भी खर्च किस लिए? मो॰ क॰ गांधी) शारीरिक परिश्रम––कामचोरी न करना। स्वदेशी––पड़ोसियोंके प्रति बेवफा न बनना। अभय––यस्मान्नोद्विजते लोको, लोकान्नोद्विजते च यः। अस्पृश्यता निवारण––पामर, हीन-दीन जैसा लगने और गिने जानेवाला आदमी भी मुझसे अधिक हीन-दीन और पामर नहीं हैं––ऐसी तीव्र भावना। सहिष्णुता––इस अभिमानका त्याग कि जिसे में नहीं देखता वह हो ही नहीं सकता। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन,''' २४-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''५२७. पत्र: सदानन्दको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २४ जून, १९२८}} {{left|प्रिय सदानन्द,}} संलग्न पत्र सहित आपका पत्र मिला। मुझे असमके बागान-मालिकोंसे मिलनेका सौभाग्य तो अवश्य प्राप्त हुआ था। लेकिन मैंने उन्हें यह कहा हो कि मैं उनके मजदूरोंकी स्थितिसे सन्तुष्ट हूँ––यह तो मुझे बिलकुल याद नहीं आता। उलटे, मुझे याद है कि मैंने उन्हें कहा था कि यह यात्रा में जल्दीमें कर रहा हूँ, अतः मैं यहाँ बागानोंमें काम करनेवाले मजदूरोंकी स्थितिके बारेमें कोई सुनिश्चित राय देनेकी स्थितिमें नहीं हूँ और मैंने उन्हें यह बताया था कि मजदूरोंकी समुचित स्थितिका मेरा माप-दण्ड क्या है। मैं इस बात पर कभी सहमत नहीं हुआ और न ऐसी सहमतिका कभी कोई अवसर ही आया कि मैं मजदूरोंके बीच राजनीतिक आन्दोलनसे दूर रहूँ। कारण, मैंने हमेशा यह माना है कि मजदूरोंके बीच राजनीतिक आन्दोलन नहीं चलाना चाहिए। मजदूरोंके सम्बन्धमें मैं अपने-आपको उनकी निजी विशिष्ट शिकायतों तक ही सीमित रखता हूँ। चम्पारनमें और उसके बाद भारतके दूसरे भागों में जहां कहीं भी मुझे उनसे सम्बन्धित काम करनेका मौका आया है मैंने यही किया है। आप इस पत्रका जैसा चाहें उपयोग कर लें। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> jtoh3mfq0xmkvr0y0nkbmse959qif44 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१८ 250 186944 674903 645341 2026-08-29T10:35:59Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५२८. पत्र: लिली मुथुकृष्णाको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २४ जून, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} इसके साथ मुथुकृष्णाकी पत्नी और बच्चोंके पते<ref>पते उपलब्ध नहीं हैं।</ref> दे रहा हूँ। उनके बहनोई श्री पिल्लैने यह पते दिये थे। श्री पिल्लै डर्बन मजिस्ट्रेटकी कचहरीमें भारतीय दुभाषिया हैं। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३५) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५२९. पत्र: नीलकण्ठको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २४ जून, १९२८}} {{left|प्रिय नीलकण्ठ बाबू,}} छगनलालको शुक्रवारके दिन भेजनेका पूरा इन्तजाम कर लिया गया था। परन्तु उसी दिन एक आकस्मिक घटनाके कारण मैं उसे आपके पास न भेज सका। अब मैं उसे रोके हुए हूँ, परन्तु आशा है कि अनिश्चित काल तक नहीं रोक रखूँगा। ऐसी उम्मीद है कि घबराये हुए कार्यकर्त्ताओंको सान्त्वना देनेके लिए श्रीयुत अमृतलाल ठक्कर थोड़े समय तक आपके पास रहेंगे। परन्तु यदि मैं छगनलालको न भेज सकूँ, तो ऐसे दूसरे आदमीकी तलाश कर रहा हूँ जो उसकी जगह ले सके। परन्तु इस बीच आप मुझे बता दीजिए कि क्या आपको बरसातके मौसममें सचमुच ही किसीकी जरूरत होगी? क्या आप इस मौसममें चरखेका कुछ ज्यादा काम कर सकते हैं? कृपया तारसे उत्तर दीजिये कि क्या आप किसीको शीघ्र ही चाहते हैं और क्या आप छगनलाल गांधीकी जगह कोई दूसरा व्यक्ति ले सकते हैं? मुझे आशा है कि उस बड़ी विपत्तिकी चोटसे व्याकुल आप सब लोगोंका मन अब कुछ शान्त हुआ होगा और आप सब गोपबन्धुबाबूका काम और अधिक उत्साहसे कर रहे होंगे। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३६) की माइक्रोफिल्मसे। {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 8puemkdp8o9bitlwgk9amtyj3w39wn1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६२ 250 187101 674784 674493 2026-08-28T14:00:12Z आदेश यादव 3609 674784 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; ::{|width=100% |- | अध्याय || २ रा || यान्त्रिक ब्यौरे || |- | {{Ditto}} || ३ रा || मिलके कपड़े और खद्दरमें होड़ || |- | {{Ditto}} || ४ था || होड़को कम करनेवाले कारण || |- | {{Ditto}} || ५ वाँ || बढ़ी हुई क्रयशक्ति || |- | {{Ditto}} || ६ ठा || विकेन्द्रित उत्पादन और विवरण || |- | {{Ditto}} || ७ वाँ || बेकारी || |- | {{Ditto}} ||८ वाँ || वस्त्र–व्यवसायकी कुछ तकनीकी बातें || |- | {{Ditto}} || ९ वाँ || क्या यह चलता भी है? || |- | {{Ditto}} || १० वाँ || विविध आपत्तियाँ || |- | {{Ditto}} || ११ वाँ || खद्दर कार्यक्रमकी दूसरी योजनाओंसे तुलना || |- | {{Ditto}} || १२ वाँ || रुपयेमें कीमतका महत्व || |- | || || निष्कर्ष || |} :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ {{c|{{larger|'''२५६. खादीका स्थान'''}}}} खादी–प्रेमी अनेक सज्जन मुझे जोरोंसे चेतावनी देते हुए यह लिखते रहते हैं कि मिलवालोंसे इस आशामें मेलजोल बढ़ानेकी कोशिश करना कि विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन चलानेके लिए राष्ट्रके लिए हितकर शर्तोंपर उन्हें पक्षमें लेकर उनका सक्रिय सहयोग प्राप्त किया जा सकता है, व्यर्थकी आशा है। उनकी चेतावनीका महत्व मैं समझता हूँ। इनमें कुछ सज्जन तो खादीके मँजे हुए अनुभवी कार्यकर्त्ता हैं। फिर भी मैंने इस बातकी आशा नहीं छोड़ी है कि किसी दिन मिलवाले राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपना लेंगे। आखिरकार अहिंसाके सिद्धान्तका दृढ़ विश्वासी होनेके नाते जिस तरह मैं अंग्रेजोंको भारतवर्षके हितके सम्बन्धमें भारतीय दृष्टिकोण अपनानेके लिए राजी करनेका एक भी मौका नहीं छोड़ सकता उसी तरह मैं मिल–मालिकोंको भी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनानेके लिए राजी कर सकनेका कोई अवसर हाथसे नहीं जाने दे सकता। आखिरकार अगर हमें अहिंसाके रास्ते स्वतन्त्रता प्राप्त करनी है तो हमें उनके भी दरवाजे खटखटाने होंगे, जो हमारी स्वाधीनताके रास्तेमें रोड़े अटकाते हैं, और उनसे भी विनय करनी होगी कि आप रुकावटोंको दूर करें। जिस तरह खूनी क्रान्तिमें उन लोगोंको — रास्ता रोकनेवालोंको — चाहे वे स्वदेशवासी हों या विदेशी मरना ही पड़ता है उसी तरह अहिंसात्मक क्रान्तिमें वैसे लोगोंको जो कोई युक्ति नहीं सुनते और हठपूर्वक रास्ता रोकते हैं, सत्याग्रहका सामना करना ही पड़ेगा। इसलिए उन शर्तोंको जिनपर कि मिल–मालिक राष्ट्रका साथ दे सकते हैं, सामने रखनेमें मैं कोई हानि नहीं देखता। उन्हें उनके सामने न रखना ही अनुचित होता। अगर मिल मालिक ये शर्तें स्वीकार कर लें तो मेरी समझमें इससे खादीकी यानी<noinclude></noinclude> 3j5o0tsw9yvtrgr625mx0nq83j85nm6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१२ 250 187464 674794 674771 2026-08-28T16:08:14Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674794 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३९९. भाषण : आरनीमें'''<ref>महादेव देसाईके "साप्ताहिक पत्र" से।</ref>}}}} {{right|२ सितम्बर, १९२७}} आप मन्दिरोंमें कपड़ेका एक टुकड़ा, या नारियल या प्रसादके तौरपर कुछ भी पाकर प्रसन्न होते हैं। लेकिन अफसोस, मन्दिरोंसे सारी पवित्रता चली गई है। मैं तो आपसे यही कहूँगा कि आप प्रसादके बजाय खादीके लिए श्रद्धा और भक्तिकी भावना जगाइए। यह दरिद्रनारायणके जीवन्त मन्दिरमें काती और बुनी जाती है। हमारे धर्म और समाजमें मन्दिरोंके लिए उचित स्थान कहाँतक है जहाँ-तक वे हमें भारतके करोड़ों भूखे-नंगे लोगोंकी ओर मैत्री और भ्रातृत्वका हाथ बढ़ानेकी प्रेरणा देते हैं। लेकिन, यदि ये मन्दिर हमारे और सर्वसाधारणके बीच दीवारें बनकर खड़े होते हैं तो ये हमें बाँधनेवाली बेड़ीकी कड़ियाँ डालनेके साधन-मात्र हैं। यदि आप सच्ची भावनासे खादी पहनेंगे तो आप स्वयंको और इन मन्दिरोंको भी पवित्र बनायेंगे। आपको यह समझानेकी जरूरत नहीं है कि इससे किस प्रकार अनिवार्यतः अस्पृश्यता-निवारणमें सहायता मिलेगी। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया,''' ८-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४००. भाषण : अर्काटमें'''}}}} {{right|२ सितम्बर, १९२७}} आपके हार्दिक स्वागत और थैलीकी भेंटके लिए मैं आपका बड़ा आभारी हूँ। परन्तु मैं इतनी रकमसे सन्तुष्ट होनेवाला नहीं हूँ। मैं जानता हूँ कि इस सभामें अनेक लोग हैं, जिन्होंने हमारे गरीब भाइयोंके लिए जमा किये गये इस कोषमें कुछ भी नहीं दिया है। आपको खद्दर पहनकर कताईको प्रोत्साहन देना चाहिए। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि यहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों परस्पर सहयोगकी भावनासे एक साथ बैठते हैं। वे साम्प्रदायिक विद्वेषके शिकार उत्तर भारतके हिन्दुओं और मुसलमानोंके समान आचरण नहीं करते। कल जब मैं एक हिन्दू मन्दिर जा रहा था, रास्तेमें मुझे 'गुरुककल' पुजारीने प्रसाद दिया। मैंने उससे कहा कि मैं तो परिया हूँ और क्या आप किसी परियाको मन्दिरमें प्रवेश करने देंगे। वह हँसने लगा और उसने कहा कि वह धीरे-धीरे वैसा करने लगेगा। मैं यहाँ उपस्थित सभी स्त्री-पुरुषोंसे अनुरोध करता हूँ कि परिया लोगोंको बराबरीका दर्जा दीजिए और उनके साथ बेझिझक मिलिए-जुलिए।<noinclude></noinclude> t4nct01sy4ujyr9s5s93yuspagiqkb1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१३ 250 187465 674797 645897 2026-08-28T16:12:27Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674797 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : बलवंतराय मेहताको| ४७७}} चूँकि मेरे पास चाँदीकी इस तश्तरीको रखनेकी कोई जगह नहीं है, इसलिए मैं इसको नीलाम करूँगा। स्वयंसेवक लोग आपके बीच चन्दा लेने जायेंगे। आपसे जितना बन पड़े, उनको दीजिए। मुझे अभी एक दूसरी जगह भी जाना है, इसलिए मैं अपना भाषण समाप्त कर रहा हूँ। मैं आपको थैली और मानपत्रोंके लिए एक बार फिर धन्यवाद देता हूँ। :[अंग्रेजीसे] :'''हिन्दू,''' ५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४०१. पत्र : बलवन्तराय मेहताको'''}}}} {{right|[२ सितम्बर, १९२७ के पश्चात्]<ref>साधन-सूत्र में यह पत्र २ सितम्बरकी सामग्रीके बाद दिया गया है।</ref>}} तुम्हारा पत्र मिला। तुम विश्वास रखना कि मैं जल्दीमें कोई निर्णय नहीं करूँगा। अभी तो मेरे मनमें जो शंकाएँ उत्पन्न हुई हैं उन्हें मैं उन लोगोंको बता रहा हूँ जिन्हें उन्हें जानना चाहिए और इस तरह निर्णयपर पहुँचने के लिए आवश्यक सहायता प्राप्त कर रहा हूँ। का० और देवदासके बीच मेरे मनमें कोई भेद नहीं है। का०के विषयमें शंका करना मुझे अच्छा नहीं लगता। का० और का० तो कौटुम्बिक सम्बन्धकी दृष्टिसे मेरे बच्चों जैसे हैं। इसलिए यह तो हो ही नहीं सकता कि मैं जल्दीमें किसी निश्चयपर पहुँच जाऊँ। तुम्हारी दलीलमें मैं कोई वजन नहीं देखता। विषय-वासना युवा और वृद्धका भेद नहीं करती इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं स्वयं हूँ। आज भी मुझे अपनी रक्षाके लिए अपने आसपास अनेक तरहकी दीवारें खड़ी करनी पड़ती हैं। और इसके बावजूद अभी कुछ वर्ष हुए मैं ऐसी स्थितिमें जा पहुँचा था जिसमें गिरनेका भय था। इसके सिवा, विषय-वासना समयको भी नहीं देखती। यह मान लें कि भाई का०के ब्रह्मचर्य सम्बन्धी विचार शुद्ध थे तब भी वे वासनाके शिकार हो गये हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अपनी भूल स्वीकार करते हुए एक नवयुवकने अभी बंगलोरमें मुझे ऐसी ही एक घटना सुनाई थी। वह ब्रह्मचारी माना जाता है। अपने परिवारमें उसका आदर है। उसके विषयमें कोई एकाएक शंका नहीं कर सकता। इंटरमीडिएटमें पढ़ता है। वह अपने ही कुटुम्बकी एक विधवा स्त्रीसे नहीं बच सका। 'इस तापसे मेरा उद्धार कीजिए' ऐसा कहते हुए वह मेरे पास आया। अपने एक मित्रके पास प्रतिज्ञा लेनेके बाद भी वह फिर गिरा। इसलिए वह मेरी शरणमें आया। मैं उसे क्या शरण देता? लेकिन यह तो विषयान्तर हो गया। मैं जो समझा हूँ वह यह है : का०का का०के और उसके कुटुम्बके साथ जितना सामान्यतः होना चाहिए उससे कुछ अधिक हेलमेल हो गया। दोनोंको रोका गया और वे समझ भी गये तथा उन्होंने ज्यादा मिलना-जुलना बन्द करनेकी बात मान<noinclude></noinclude> jukfp9747l0r63k6btuhpllwmd05ty5 674799 674797 2026-08-28T16:13:13Z Somya Shaw 6839 674799 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : बलवंतराय मेहताको| ४७७}} {{Gap}}चूँकि मेरे पास चाँदीकी इस तश्तरीको रखनेकी कोई जगह नहीं है, इसलिए मैं इसको नीलाम करूँगा। स्वयंसेवक लोग आपके बीच चन्दा लेने जायेंगे। आपसे जितना बन पड़े, उनको दीजिए। मुझे अभी एक दूसरी जगह भी जाना है, इसलिए मैं अपना भाषण समाप्त कर रहा हूँ। मैं आपको थैली और मानपत्रोंके लिए एक बार फिर धन्यवाद देता हूँ। :[अंग्रेजीसे] :'''हिन्दू,''' ५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४०१. पत्र : बलवन्तराय मेहताको'''}}}} {{right|[२ सितम्बर, १९२७ के पश्चात्]<ref>साधन-सूत्र में यह पत्र २ सितम्बरकी सामग्रीके बाद दिया गया है।</ref>}} तुम्हारा पत्र मिला। तुम विश्वास रखना कि मैं जल्दीमें कोई निर्णय नहीं करूँगा। अभी तो मेरे मनमें जो शंकाएँ उत्पन्न हुई हैं उन्हें मैं उन लोगोंको बता रहा हूँ जिन्हें उन्हें जानना चाहिए और इस तरह निर्णयपर पहुँचने के लिए आवश्यक सहायता प्राप्त कर रहा हूँ। का० और देवदासके बीच मेरे मनमें कोई भेद नहीं है। का०के विषयमें शंका करना मुझे अच्छा नहीं लगता। का० और का० तो कौटुम्बिक सम्बन्धकी दृष्टिसे मेरे बच्चों जैसे हैं। इसलिए यह तो हो ही नहीं सकता कि मैं जल्दीमें किसी निश्चयपर पहुँच जाऊँ। तुम्हारी दलीलमें मैं कोई वजन नहीं देखता। विषय-वासना युवा और वृद्धका भेद नहीं करती इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं स्वयं हूँ। आज भी मुझे अपनी रक्षाके लिए अपने आसपास अनेक तरहकी दीवारें खड़ी करनी पड़ती हैं। और इसके बावजूद अभी कुछ वर्ष हुए मैं ऐसी स्थितिमें जा पहुँचा था जिसमें गिरनेका भय था। इसके सिवा, विषय-वासना समयको भी नहीं देखती। यह मान लें कि भाई का०के ब्रह्मचर्य सम्बन्धी विचार शुद्ध थे तब भी वे वासनाके शिकार हो गये हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अपनी भूल स्वीकार करते हुए एक नवयुवकने अभी बंगलोरमें मुझे ऐसी ही एक घटना सुनाई थी। वह ब्रह्मचारी माना जाता है। अपने परिवारमें उसका आदर है। उसके विषयमें कोई एकाएक शंका नहीं कर सकता। इंटरमीडिएटमें पढ़ता है। वह अपने ही कुटुम्बकी एक विधवा स्त्रीसे नहीं बच सका। 'इस तापसे मेरा उद्धार कीजिए' ऐसा कहते हुए वह मेरे पास आया। अपने एक मित्रके पास प्रतिज्ञा लेनेके बाद भी वह फिर गिरा। इसलिए वह मेरी शरणमें आया। मैं उसे क्या शरण देता? लेकिन यह तो विषयान्तर हो गया। मैं जो समझा हूँ वह यह है : का०का का०के और उसके कुटुम्बके साथ जितना सामान्यतः होना चाहिए उससे कुछ अधिक हेलमेल हो गया। दोनोंको रोका गया और वे समझ भी गये तथा उन्होंने ज्यादा मिलना-जुलना बन्द करनेकी बात मान<noinclude></noinclude> fuin3ka2mp4t9cndm9sjgijjrvvodkb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१४ 250 187466 674802 645898 2026-08-28T16:20:34Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674802 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४७८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} ली। किन्तु इसके बावजूद वे एकान्तमें मिलते हुए देखे गये। इसलिए मगनलालने उपवास किया। लेकिन तब भी वे छिपकर मिले। अब अगर ये सब बातें सही हैं तो मैं अपनी शंका दूर नहीं कर सकता। और यदि का०से भूल हो ही गई हो तो ऐसे आदमीको पैसेके लालचका शिकार होनेमें क्या देर लगती है? किन्तु ये सब एक ही बातके आधारपर बाँधे गये अनुमान-मात्र हैं। जो मनुष्य समझ-बूझकर असत्यका आचरण करता है उसके सम्बन्धमें मेरे मनमें अनेक प्रकारकी शंकाएँ आये बिना नहीं रहतीं। मैं अभी जाँच-पड़ताल कर रहा हूँ। तुमने मगनलालकी राय उद्धृत की है; मैं उससे अवगत हूँ। तुम यह तो जानते ही होगे कि उनकी विवेक-शक्तिपर मेरा बहुत विश्वास है। उनके साथ भी मैं पत्र-व्यवहार कर रहा हूँ। का०ने कोई रकम उड़ा ली हो तो तुम या उसके पिता उस रकमकी भरपाई कर देंगे, यह प्रश्न तो यहाँ उठता ही नहीं। मैं तो इस प्रश्नपर केवल नैतिक दृष्टिसे विचार कर रहा हूँ। 'नवजीवन' में यदि मैं अपनी कलमसे अभी कुछ लिखना चाहूँ तो उसमें कहीं-न-कहीं मेरी शंकाकी छाया आये बिना न रहेगी। इसलिए यदि तुम कोई मसविदा तैयार करके भेजो तो मैं उसपर विचार करूँगा और सम्भव हुआ तो छापूँगा। आत्महत्याको मैंने सस्ता नहीं बना दिया है। मेरी रायमें दो ही स्थितियाँ ऐसी हैं जब आत्महत्या धर्म हो सकती है। इस रायके लिए अनेक प्रमाण हैं। जब किसीपर विषय-वासना हावी हो गई हो और उसमें अपनेको रोक सकने जितना संयम तो न हो किन्तु आत्मघात कर सकने जितना भान बाकी हो तो उसे आत्मघात करना चाहिए। ऐसी स्थितिमें आत्मघात करना उसका कर्तव्य होगा। इसी तरह जब कोई नरपशु किसी स्त्रीपर बलात्कार करना चाहता हो [और स्त्री असहाय हो] तब स्त्रीका यह धर्म है कि वह आत्मघात करके अपनी रक्षा करे। इन दो उदाहरणोंकी चर्चा मैंने आश्रममें कई बार की है और मुझे लगता है कि मेरा यह विचार ठीक है। का०ने ऊपर उल्लिखित तीनों भूलें की हों तो भी आश्रमकी शिक्षाके अनुसार इसमें न तो आत्मघात करना धर्म सिद्ध होता है और न वहाँसे भाग जाना ही। उक्त स्थितिमें तो प्रायश्चित्त ही धर्म है। किन्तु का०के जो अनेक पत्र मेरे पास हैं उनसे तो यही जान पड़ता है कि आश्रममें स्वीकृत अनेक सिद्धान्तोंसे उसका विरोध था। {{right|मोहनदासके आशीर्वाद}} [गुजरातीसे] :महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी। :सौजन्य : नारायण देसाई<noinclude></noinclude> d3kwr0lmdyregu8ft0hfnwoyy3pxnlg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१५ 250 187467 674804 645899 2026-08-28T16:24:18Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674804 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४०२. तार : मीराबहनको'''}}}} {{right|मद्रास ३ सितम्बर, १९२७}} {{left|मीराबहन सत्याग्रहाश्रम, वर्धा}} अपेंडिक्स और परीक्षाके लिए बम्बई जा सकती हो। तार द्वारा अपना हाल बताओ। {{right|बापू}} :अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२६६) से। :सौजन्य : मीराबहन {{c|{{larger|'''४०३. तार : मीराबहनको'''}}}} {{right|मद्रास ३ सितम्बर, १९२७}} {{left|मीराबहन सत्याग्रहाश्रम, वर्धा}} तार मिला। बहुत चिन्तित। ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे। हर दिन अपना समाचार भेजती रहो। स्नेह। एन्ड्रयूज आ रहे हैं। {{right|बापू}} :अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२६७) से। :सौजन्य : मीराबहन<noinclude></noinclude> k0qhx8gf8u949wutoahi5wdemsza7sk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१६ 250 187468 674806 645900 2026-08-28T16:29:42Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674806 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४०४. भाषण : पेरावेल्लूरमें मजदूरोंके समक्ष'''}}}} {{right|३ सितम्बर, १९२७}} {{left|मित्रो,}} मानपत्र और दो थैलियोंके लिए धन्यवाद। खादीका काम आगे बढ़ानेके लिए आपने एक क्लब<ref>गांधी क्लब।</ref> खोला है। उसके लिए आपको मेरी बधाई। आप जिस विलक्षण ढंगसे उसका प्रचार कर रहे हैं, वह हम सबके लिए अनुकरणीय है। गरीब आदमीके लिए तो बिना सूदके कर्ज पानेका यह सबसे आसान तरीका है। पर जैसा कि अधिकांश कामोंमें होता है इस काममें भी सभी सदस्योंकी ईमानदारी एक अनिवार्य शर्त है। आप जानते ही हैं कि मैंने अपने-आपको भी मजदूर बना लिया है और पिछले पैंतीस वर्षोंसे मैं उनके बीच रहकर उनके साथ और उनके लिए काम करता आ रहा हूँ। इसलिए मुझे मजदूरोंसे ताल्लुक रखनेवाली हर चीजमें गहरी दिलचस्पी है। अभी मैं इस सवालकी चर्चा नहीं करना चाहता कि इस देशके और विशेषकर यहाँके मजदूर किन कठिनाइयों और असुविधाओंको झेलते हुए काम कर रहे हैं। सच तो यह है कि आपके विशेष कष्टों और विशिष्ट परिस्थितियोंके बारेमें मुझे कोई जानकारी नहीं। इस अवसरपर तो मैं सबसे ज्यादा जोर इसी बातपर देना चाहता हूँ कि मजदूर अपने लिए खुद क्या कर सकते हैं। मजदूरोंके लिए एक बड़ा अभिशाप यह है कि उनका समाज शराबखोरीकी लतसे बुरी तरह जकड़ा हुआ है। यदि आप लोग समय रहते इससे अपना पीछा नहीं छुड़ा लेंगे तो अपनी कब्रें आप ही खोदेंगे। शराबखोरीकी लत जब किसीपर हावी हो जाती है तो उसे पशु बना देती है। फिर उसे अपनी बहन और अपनी पत्नीमें कोई भेद नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए मेरी आप सबको यही सलाह है कि आप शराब पीना छोड़ दें। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि एक बार इसके चक्करमें फँस जानेवालेको इसका कितना बड़ा लालच हो जाता है; लेकिन ईश्वरने मानवको ऐसे लालच और ऐसी खामियोंपर काबू पानेकी क्षमता भी दी है। जरूरत सिर्फ इस बातकी है कि वह इस क्षमताका उपयोग करे। मैंने मजदूरोंमें दूसरी खराबी यह देखी है कि वे संगठनकी शक्ति नहीं पहचानते। मजदूरोंको अपने अन्दर यह समझ पैदा करनी चाहिए कि सबके कल्याणमें ही व्यक्तिका कल्याण है। इसलिए आप लोगोंको आपसमें भाईचारेकी वास्तविक भावना पैदा करनी चाहिए। मुझे मालूम है कि भारतके कई भागोंमें मजदूर अपना पैसा जुएमें बरबाद करते हैं। यह बड़ी बुरी आदत है। आपको इसे छोड़ देना चाहिए। भारतके कुछ हिस्सोंमें मजदूरोंमें नैतिकताकी भी वैसी भावना नहीं है, जैसी होनी चाहिए। यदि हम मजदूरोंकी हैसियतसे भारतीय समाजमें और राजनीतिक<noinclude></noinclude> 6epkisjcfvq35ddy7c1uw3innr73qfs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१७ 250 187469 674809 645901 2026-08-28T16:37:20Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674809 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : मद्रासमें विद्यार्थियोंके समक्ष| ४८१}} क्षेत्रमें अपनेको एक शक्तिके रूपमें प्रतिष्ठित करना चाहते हैं तो हमारे लिए यह बिलकुल जरूरी है कि हम विवाह-सूत्रकी अनिवार्य बाध्यताको स्वीकार करें और उसके कारण हमारे ऊपर जो दायित्व अनिवार्य रूपसे आ जाते हैं उन सभीको स्वीकार करें। खादीका काम आगे बढ़ानेके हेतु यह क्लब कायम करनेके लिए मैंने आपको बधाई दी है। पर इस क्लबके सदस्य केवल सौ नहीं रहने चाहिए, बल्कि आपमें से प्रत्येकको उसका सदस्य बन जाना चाहिए। याद रखिए कि खादी हमारा सम्बन्ध उन लोगोंके साथ जोड़ती है जो आपसे भी कहीं अधिक गरीब हैं। विदेशी वस्त्रों या मिलमें बने वस्त्रोंको भी उतार फेंकनेके लिए आपको कुछ खास नहीं करना पड़ेगा। आपको बस इतना ही करना पड़ेगा कि आप गाँवोंमें रहनेवाले, भूखसे पीड़ित अपने करोड़ों भाइयोंका खयाल करें। मैंने अभी-अभी इस स्थानपर जहाँ आधारशिला रखी थी<ref>पेराम्बुरके रेलवे मजदूर संघके भवनकी आधारशिला।</ref>, उससे मुझे बड़ी खुशी हासिल हुई है। ईश्वर आपको मेरे सुझाये हुए काम करनेकी शक्ति प्रदान करे। आप यदि इन कामोंको करें तो आप देखेंगे कि आपकी ज्यादातर कठिनाइयाँ अधिक प्रयासके बिना ही दूर हो जायेंगी। :[अंग्रेजीसे] :'''हिन्दू,''' ५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४०५. भाषण : मद्रासमें विद्यार्थियोंके समक्ष'''}}}} {{right|३ सितम्बर, १९२७}} आपका कहना है कि आपने एक छोटी-सी थैली भेंट की है, आप जितनी चाहते थे, उससे कहीं छोटी थैली दे पाये हैं। मैं भी आपकी इस भावनाकी ताईद करता हूँ कि मुझे भेंट की गई यह थैली<ref>केवल १,६०७ रुपये।</ref> मद्रासके विद्यार्थियोंके लिहाजसे सचमुच बहुत ही छोटी है। और फिर यह थैली दी भी गई है किस कामके लिए? जिन्हें जरूरत है ऐसे कुछ आधुनिक विद्यार्थियोंमें बाँटनेके लिए थोड़े-से कॉलर या टाइयाँ खरीदनेके लिए नहीं, किसी छोटे-मोटे कामके लिए नहीं। यह तो भारतके सात लाख गाँवोंमें भूखों मरते करोड़ों लोगोंके लिए दी गई है। और मुझे पूरा भरोसा है कि अगर आप विद्यार्थियोंने इन करोड़ों लोगोंकी भुखमरीका ठीक-ठीक अर्थ ग्रहण कर लिया होता तो आप इससे कहीं बड़ी रकम जमा कर लेते। यदि इन करोड़ों भूखे-नंगे इंसानोंकी हालतसे आप मेरी ही तरह वाकिफ होते, और मेरी तो आपसे यही अपेक्षा है कि आपको होना चाहिए, तो आप कहीं ज्यादा रुपये इकट्ठे करते। लेकिन आपको यह जानकर थोड़ी राहत मिलेगी कि अन्य नगरोंके विद्यार्थियोंकी तुलनामें आपने कुछ कम जमा नहीं किया। इतना ही नहीं कि अन्य स्थानोंके विद्यार्थियोंकी तुलनामें आपकी थैली छोटी नहीं है, बल्कि आपकी थैलीके साथ आपके सभापतिने मुझे यह आश्वासन भी दिया है कि आपकी भेंट की हुई थैली, मैं जो खादीका काम कर रहा हूँ, उसमें आपके<noinclude></noinclude> 8rvd84dg36sjygeqykl451apneufr5w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५१९ 250 187471 674812 645903 2026-08-28T17:09:26Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674812 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : मद्रासमें विद्यार्थियोंके समक्ष|४८३}} आप उसका खण्डन करने लगें। और यदि आपने खादीके इस सन्देशको समझ लिया हो तो आप तबतक चैनकी साँस नहीं लेंगे जबतक कि आप एक-एक इंच विदेशी कपड़ेको त्यागकर उसके बदले हाथकते सूतकी हाथबुनी खादी न अपना लें। परन्तु मैं बता चुका हूँ कि खादी तो वास्तवमें आपके कामका एक बहुत ही छोटा-सा अंग है। यह तो सेवाकी शुरुआत है और एक केन्द्रबिन्दु है जिसके चारों ओर दूसरी सभी प्रवृत्तियोंका आरम्भ और विकास किया जा सकता है। भारतके गाँवोंसे भयंकर गरीबीको दूर करनेके इस सवालको हल करनेके लिए आपको अपना चरित्र ऐसा बनाना पड़ेगा जिसपर कोई भी अँगुली न उठा सके। इस चरित्र-रूपी संयोजक तत्त्वके बिना आप समाजके बिखरे अवयवोंको जोड़ नहीं पायेंगे। मुझे भरोसा है कि मुझसे यह सुनकर आपकी आत्माको बड़ा बल मिलेगा कि आजकल गुजरातके विद्यार्थी बाढ़ग्रस्त क्षेत्रोंमें आश्चर्यजनक काम कर रहे हैं। यदि उनके हृदयमें विपत्तिग्रस्त लोगोंके लिए अपार प्रेम न उमड़ रहा होता और इस सेवाके पीछे उनकी सच्चरित्रता न होती तो वे यह सब नहीं कर सकते थे। इनमेंसे कुछ अपनी पढ़ाई छोड़कर, कंधोंपर कुदालियाँ, फावड़े और टोकरियाँ लेकर गाँवोंमें चले गये हैं और उन्होंने मृत पशुओं तथा सड़े अनाजकी दुर्गन्धसे भरे उन गाँवोंको फिरसे आदमियोंके रहने योग्य बना दिया है। उन्होंने इसका इन्तजार नहीं किया कि मरे हुए पशुओंको पंचमवर्णके भाई ही आकर उठायें, बल्कि खुद ही लाशोंको हटा दिया। और मैं जानता हूँ कि चन्द गुजराती विद्यार्थी जो कर सके हैं, अवसर मिलनेपर आपमेंसे हर युवक या युवतीके लिए भी वैसा करना सम्भव है। अब मुझे आपका ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहिए और न स्वयं इतना बोलना चाहिए कि मद्रास आनेके पहले ही दिन अपने-आपको बिलकुल थका लूँ। वैसे और भी बहुत-सी बातें हैं जिनके बारेमें मैं आपसे बात करना चाहता था। मैं तो चाहता था कि उनके विषयमें भी बात करनेका समय मेरे पास होता। पर मैं आपसे एक छोटा-सा अनुरोध अवश्य करूँगा। वेल्लूरके विद्यार्थियोंके समक्ष मैंने एक काफी सुविचारित भाषण दिया था<ref>देखिए “भाषण : वेल्लूरके वूरीज़ कालेजमें”, ३०-८-१९२७।</ref> और मुझे बताया गया है कि समाचारपत्रोंने उसे पूरा का पूरा, लगभग शब्दशः प्रकाशित किया है। आपमेंसे कुछने वह शायद पढ़ भी लिया होगा। पर जिन लोगोंने पढ़ लिया है उनको भी एक बार फिर सावधानीसे उसे पढ़ना चाहिए और जिन्होंने नहीं पढ़ा है, उनसे मेरा अनुरोध है कि किसीसे लेकर या खरीदकर उसे पढ़ अवश्य लें। भविष्यको आपसे बड़ी आशा है और मेरी बड़ी अभिलाषा है कि भारत-भरके विद्यार्थी यह महसूस करें कि इस देशमें जन्म लेनेके कारण ही नहीं, बल्कि दबे-पिसे गरीब ग्रामवासियोंके खून-पसीनेके पैसोंके बलपर शिक्षित बन पानेके कारण भी इस देशके प्रति उनका क्या कर्तव्य हो जाता है। जब भी स्वार्थ आपके ऊपर हावी होने लगे और आप देशको भुलाकर सिर्फ अपने स्वार्थकी बात सोचने लगें, उस समय आप मेरी इन बातोंको जरूर याद कर लीजिए — उन बातोंको जो मैंने आज शाम आपसे कही हैं। आप हमेशा याद रखिए कि शिक्षा प्राप्त करनेके दौरान आपके<noinclude></noinclude> 04ozq0lweycryfjdsayq8ojzgghjo0t पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२० 250 187472 674818 645904 2026-08-28T17:33:42Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674818 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} सिरपर देशका यह ऋण दिन-दिन कितना बढ़ता जा रहा है। इस ऋणको याद करके आप हर प्रलोभनसे ऊपर उठें, यही मेरी कामना है। :[अंग्रेजीसे] :'''हिन्दू,''' ५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४०६. बाढ़के बाद'''}}}} बाढ़-संकट-निवारणके सम्बन्धमें मेरे पास जो पत्र आते हैं और 'नवजीवन' में जो खबरें आती हैं उनसे मैं देखता हूँ कि स्वयंसेवक धीरजके साथ काम कर रहे हैं और अभी थके नहीं हैं। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हम सबको अभी मजूरीकी आदत नहीं पड़ी है। कुछ काम हमें अच्छे नहीं लगते और कुछ हमें सूझते नहीं हैं इसलिए वे रह जाते हैं अथवा उनके होनेमें विलम्ब या निरर्थक खर्च होता है। उदाहरणके लिए, अनेक स्वयंसेवकोंकी रिपोर्टें मेरे पास पड़ी हैं जिनमें मुझे निम्न वाक्य पढ़नेको मिले हैं : यहाँके कुएँका पानी बास देने लगा है। यहाँके कुएँकी जगत गिरने-गिरनेको हो रही है। यहाँके कुएँमें भैंस गिर गई है और पानी सड़ गया है। फिर भी बेचारे भंगी उसे काममें लाते हैं। यहाँ सड़ा हुआ अनाज पड़ा है और उससे दुर्गन्ध फैल रही है। लोग उसे भी खोद-खोदकर खाते हैं। हमने यहाँके भंगियोंको आलसी पाया; कहनेपर भी वे काम नहीं करते। ये वाक्य मैंने जहाँ-तहाँसे उठा लिये हैं सो भी लिखनेवालोंके शब्दोंमें नहीं। किन्तु अर्थ कहीं भी खण्डित नहीं हुआ है। मुझे लगता है कि हमारे कार्यमें जाँच या देखरेख करनेवाला और मजदूर अलग-अलग नहीं हो सकते। जाँच करनेवाला और मजदूर एक ही व्यक्ति हो तभी हमारा गरीब देश आगे बढ़ सकता है। आदेश देनेवालोंकी संख्या कमसे कम होनी चाहिए। बिना 'ओवरसियर' के हमारा आखिर गुजारा तो नहीं हो सकता लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि वह अधिकांशतः अप्रामाणिकताकी ही चौकसी करता है। स्वयंसेवकोंकी भी चौकसी करनी पड़ती है। यदि स्वयंसेवकोंपर कोई निगाह रखनेवाला न रखा गया हो तो उन्हें स्वयं इसकी माँग कर लेनी चाहिए। फिर भी चौकीदारीके चक्करसे हमें निकल जाना है। परन्तु चौकीदार और अन्य सब लोगोंके हाथमें कुदालियाँ और फावड़े तो होने ही चाहिए, न होनेपर हाथोंका जितना उपयोग सम्भव हो उतना तो किया ही जाये। इसलिए मैं तो ऐसी 'रिपोर्टों' की आशा रखता हूँ : गाँव 'क' में कुआँ दुर्गन्ध देता था। हमने डोल और रस्सी माँगकर गाँवके लोगोंके सहयोगसे कुएँको साफ किया। पासके अस्पतालसे थोड़ी-सी जन्तुनाशक लाल दवाई लेकर कुएँमें डाली और पानीको चखकर इस बातका इत्मीनान किया कि अब वह साफ है।<noinclude></noinclude> o2h2iv9xp3319uksciv7ie2nfk1xf0n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२२ 250 187474 674824 645906 2026-08-28T17:48:55Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674824 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} एक स्वयंसेवकके लिखनेका अभिप्राय इस प्रकार है : 'अब आप एकके बदले दो हो गये हैं। कारण, काकासाहब भी आपके पास आ गये हैं। क्या हमें इस संगमका कोई लाभ नहीं मिलेगा? इस बाढ़-रूपी प्रलयके अन्तमें नई सृष्टिका निर्माण करनेके लिए क्या आपमें से कोई कुछ न लिखेगा?' मैं काकासाहबकी कलमको उकसानेकी कोशिश कर रहा हूँ। मुझे तो यहाँ बैठे-बैठे नई सृष्टिकी कोई बात नहीं सूझती और जो सूझती है वह लिखने लायक नहीं लगती। इसलिए काममें जुटे हुए सेवकोंको मेरी तो यह सलाह है : दूर बैठे हुए हम बीमार लोग कोई सुझाव दें उसकी अपेक्षा यह बेहतर होगा कि वहाँ बैठे आप खुद ही विचार करें और तदनुसार कार्य करें और विचार अपने गाँवको ध्यानमें रखकर ही करें। समस्त गुजरातमें नई रचना होगी तभी हम भी कुछ करेंगे, ऐसा नहीं सोचना चाहिए, बल्कि गाँवके व्यक्ति मानें तो जितने सुधार आप कर सकते हों उतने शुरू कर दें। कुछ एक विधि-निषेध मैं यहाँ देता हूँ : :१. घरोंको अँधेरी कोठरियों-जैसा न बनायें। :२. टीनके पतरोंका उपयोग न करें। :३. अमेरिका अथवा इंग्लैंडकी नकल न करें; वहाँकी आबोहवा अलग है। :४. पत्थर-चूनेका कमसे कम उपयोग करें। :५. हमारे देशमें घास, लकड़ी और गारेके अच्छे घर बन सकते हैं। :६. जमीन साफ करके ही घर बनाये जाने चाहिए। :७. हवा और प्रकाशका प्रबन्ध होना ही चाहिए। :८. यदि जमीन काफी हो तो पशुओंके लिए अलग जगह रखी जाये। मेरी रायमें पशुओंको रखनेका सस्ता और सबसे स्वच्छ तरीका यह है कि उन्हें बिना बाँधे खुले बाड़ेमें रखा जाना चाहिए। लकड़ी अथवा कँटीली झाड़ियोंकी मजबूत बाड़ हो सकती है। बाड़ेमें एक छोटा छप्पर रखा जाना चाहिए ताकि जब मन हो तब पशु उसके नीचे आकर बैठ सकें। {{c|'''विविध'''}} दानमें मिलनेपर भी विदेशी काली टोपियाँ घरमें न लाई जायें। त्याज्य वस्तु दानमें भी नहीं ली जानी चाहिए। मुफ्त मिले मांसको निरामिषाहारी स्वीकार नहीं करता। जीना ही जीवनका उद्देश्य नहीं है। किसी उदात्त उद्देश्यके लिए शरीररूपी घरमें सोई हुई आत्माको जगानेके लिए जीना ही आदर्श है। धर्म और अधर्मका मुख्य भेद यही है। धार्मिक व्यक्ति मर्यादासे बाहर जाकर जीनेसे इनकार कर देगा। अधर्मीके लिए मर्यादा नहीं होती। जीनेके लोभमें वह अपनेको बेचेगा, स्त्री-पुत्रादिको बेचेगा, देशको बेचेगा। व्यापारी उबारते हैं और डुबाते हैं। गुजरातके व्यापारी अनजाने ही दोनों काम एक साथ कर रहे हैं। विलायती और मिलके बने कपड़ेकी वर्षा हो रही है, यह मैं देख रहा हूँ। अब लोग बाढ़के दुःखको कुछ भूलने लगे हैं, ऐसा<noinclude></noinclude> m5ql9kgfmew4ycpdfjhmovd1jt41sj1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२३ 250 187475 674826 645907 2026-08-28T17:51:03Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674826 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें|४८७}} समझकर मैं व्यापारियों और जनताको सावधान करता हूँ। विलायती कपड़ा बाजारमें है, इसके लिए गुजराती और मारवाड़ी उत्तरदायी हैं। यह बात दोनोंके लिए विचारणीय है। विलायती कपड़ेकी बाढ़ और अतिवृष्टिसे होनेवाली बाढ़में यदि कोई मुझे चुनाव करनेके लिए कहे तो मैं जानता हूँ कि मैं क्या पसन्द करूँगा। पाठकोंको जानना चाहिए कि जो बाढ़ शरीरका हनन करती है, वह सह्य है और उसका निवारण नहीं किया जा सकता। दूसरी बाढ़ जो आत्माका हनन करती है उसका निवारण किया जा सकता है। दो बाढ़ोंके इस महान् भेदको गुजरातको कौन समझाये? शरीरकी रक्षाके बारेमें मनुष्य सदा परतन्त्र है, आत्माकी रक्षाके विषयमें वह सदैव स्वतन्त्र है। इसीसे विभिन्न धर्म डंकेकी चोट कहते हैं : 'आत्मा ही आत्माका रक्षक और भक्षक है।' [गुजरातीसे] नवजीवन, ४-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४०७. भाषण : वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें'''<ref>यंग मैन्स क्रिश्चियन एसोसिएशनमें दिया गया यह भाषण "दो भाषण" शीर्षकसे प्रकाशित हुआ था।</ref>}}}} {{right|[४ सितम्बर, १९२७]<ref>हिन्दू, ५-९-१९२७ से।</ref>}} {{left|मित्रो,}} सभापति महोदयका अनुरोध है कि मैं यहाँ धार्मिक प्रवचन करूँ। मैं नहीं समझता कि मैंने कभी धार्मिक प्रवचन किया हो या दूसरी तरहसे कहिए तो मुझे अपना कोई भी ऐसा भाषण याद नहीं पड़ता कि जो धार्मिक न रहा हो। अगर यह मेरा भ्रम न हो तो मैं तो यह समझता हूँ कि मैंने अपने सार्वजनिक जीवनके आरम्भसे अबतक जो कुछ कहा है और जो कुछ किया है, उसके पीछे एक धार्मिक चेतना, धार्मिक उद्देश्य सदा रहा है। हो सकता है कि मेरे श्रोताओंको या जो पाठक शब्दोंके अर्थको नहीं, बल्कि सिर्फ शब्दोंको पढ़ते हैं, ऐसे लोगोंको मेरे लेख राजनीतिक, आर्थिक और अन्य कई तरहके लगे हों। पर मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरे इस कथनपर विश्वास करें कि मेरा प्रत्येक शब्द मूलतः और मुख्यतः धार्मिक उद्देश्यसे ही अनुप्राणित रहा है। और आज सुबह भी ऐसा ही रहेगा। मेरे यह पूछनेपर कि लोग मुझसे क्या सुननेकी आशा रखते हैं, मुझसे कहा गया कि मैं जिस विषयपर चाहूँ, बोलूँ। पर, यह सन्देश मुझे आज सुबह सभाके लिए आते समय ही मिला, इसलिए मैं कोई एक क्रम निश्चित किये बिना अपने विचार आपके सामने उसी रूपमें पेश करता हूँ जिस रूपमें वे मेरे दिमागमें आ रहे हैं।<noinclude></noinclude> t9wxry1fl3v8xfzje5b7o6lny6qbw4o पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२४ 250 187476 674829 645908 2026-08-28T18:01:37Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674829 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} वेल्लूरमें मुझे एक मिशनरी मित्रके साथ कुछ अत्यन्त ही मूल्यवान क्षण बितानेका अवसर मिला था। उस स्थानके विद्यार्थियोंके साथ दिल खोलकर मेरी बातचीत हुई। अगले दिन सुबह उन्होंने मेरे सामने कुछ इस प्रकारके उद्गार व्यक्त किये : 'आपका भाषण बड़ा अच्छा रहा। आपने आत्मासे सम्बन्धित बातें कहीं। परन्तु उन सबके बीच यह खादीका सवाल कहाँसे टपक पड़ा? क्या आप बतायेंगे कि खादीका आध्यात्मिकतासे क्या सम्बन्ध है?' फिर उन्होंने कहा : 'आपने शराबबन्दीकी बात की जिससे हमें खुशी हुई; वह सचमुच आध्यात्मिकतासे सम्बन्धित है। आपने अस्पृश्यताकी बात की, वह आध्यात्मिकतामें रुचि रखनेवाले श्रोताओंके सुननेका या आध्यात्मिक प्रवृत्तिके व्यक्तिके बोलनेका एक बड़ा सुन्दर विषय था। पर आपके भाषणमें ये दोनों बातें खादीके सन्देशके बाद ही आईं। हममें से कुछको यह ठीक नहीं लगीं।' मैंने उस बातचीतका सारांश आपको अपने शब्दोंमें ज्योंका-त्यों बतलाया है, अपनी ओरसे उसमें कोई पुट नहीं दिया है। उस समय मुझे जैसा सूझा वैसा उत्तर मैंने दे दिया था। अब आज सुबह मैं उसीकी विस्तारसे चर्चा कर रहा हूँ। बात बिलकुल सच है कि मैं खद्दरको सबसे पहले स्थानपर और अस्पृश्यता तथा शराबबन्दीको उसके बाद रखता हूँ। ये सब बातें मैंने वेल्लूरके विद्यार्थियोंके समक्ष दिये गये अपने उस भाषणके<ref>देखिए “भाषण : वेल्लूरके वूरीज़ कॉलेजमें”, ३०-८-१९२७।</ref> अन्तमें कही थीं जिसमें मैंने उनसे आग्रह किया था कि वे अपने जीवनमें पवित्रता लायें, क्योंकि पवित्रताके बिना उनका समूचा ज्ञान बिलकुल अनुपयोगी और शायद विश्वकी वास्तविक प्रगतिके लिए बाधारूप बन जायेगा। इसके बाद मैंने दृष्टान्तके तौरपर ये तीनों बातें और अन्य कई बातें कहीं। संसारके अनेक भागोंमें निरन्तर सार्वजनिक सेवाका पैंतीस वर्षका अनुभव रखनेके बाद भी मैं अभीतक यह नहीं समझ पाया कि कर्म और कर्मशीलतासे बिलकुल अलग-थलग कोई भी आध्यात्मिक या नैतिक मूल्य कैसे हो सकता है। मैं इस प्रकारकी सभाओंमें एक अत्यन्त सुन्दर वचन बहुधा सुनाता रहा हूँ। यह वचन जिस दिन मैंने पढ़ा था, उसी दिनसे सदा मेरे मनमें बसा रहता है। वह इस प्रकार है : "हर क्षण प्रभु-प्रभुकी रट लगानेवाला हर व्यक्ति स्वर्गमें प्रवेश नहीं पा जायेगा; वही प्रवेश पायेगा जो स्वर्गमें वास करनेवाले मेरे पिता (परमेश्वर) की इच्छाके अनुसार कर्म करेगा।"<ref>सेंट मैथ्यू ७-२१।</ref> मैं उसके शब्द ठीक क्रममें नहीं रख पाया हूँ, पर आप उसे जानते ही हैं और यह भी कि उसमें जो कहा गया है, बिलकुल सत्य कहा गया है। मुझे इंग्लैंडके सार्वजनिक नेताओंके दो बड़े शानदार उदाहरण याद आते हैं। दोनों ही अपने समयके बहुत बड़े सुधारक और आध्यात्मिकताके स्तम्भ माने जाते थे। मैं १८८९-९० की बात कर रहा हूँ। तब आपमें से अधिकांश पैदा भी नहीं हुए थे। मैं उन दिनों शराबबन्दीके सिलसिलेमें होनेवाली सभाओंमें भाग लिया करता था। उस सुधारमें मेरी रुचि थी। आध्यात्मिकताके वे दोनों स्तम्भ शराबबन्दीका काम करनेवाले महारथी कार्यकर्त्ता माने जाते थे। लेकिन वे भाषण-शूर थे। जब भी<noinclude></noinclude> g4zyqkhl711sq9zzhmdmxszbg8qjwrw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२६ 250 187478 674831 645910 2026-08-28T18:05:14Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674831 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४९०|संपूर्ण गांधी बंगायमय }} रूप में रखनेकी कोई गुंजाइश नहीं है। अर्थ-शास्त्र में गुलामीके लिए कोई गुंजाइश ही नहीं है । इसी आधारपर में आपसे कहता हूँ कि खादीको अपनाये बिना आपका काम नहीं चल सकता और खादीका क्षेत्र व्यापकतम है। नशाबन्दीके कामकी सीमा में कुछ थोड़े-से लोग आते हैं । यह शराबीसे शराबकी लत छुड़वा देनेवाले सुधारकको पवित्र बनाता है और समझानेपर अपनी लत छोड़ देनेवाले शराबीको तो पवित्र बनाता ही है। अस्पृश्यता निवारणके कामका असर इस अभागे देशके ज्यादासे ज्यादा सात करोड़ लोगोंपर होगा और हर आदमी तो इस काम में आ नहीं सकता। आप अस्पृश्यको शिक्षित बना सकते हैं, उसके लिए कुएँ और मन्दिर बनवा सकते हैं, लेकिन इनसे तो वह स्पृश्य नहीं बन जायेगा । यह तो तभी होगा जब तथाकथित स्पृश्य लोग अपनी श्रेष्ठताका दम्भ त्यागकर अस्पृश्योंको भाइयोंकी तरह मानने लगेंगे । इस तरह आप पायेंगे कि सामान्य स्त्री-पुरुषोंके लिए यह समस्या कुछ पेचीदा ही है। मैंने अपना सारा जीवन - चाहे वह कितना भी तुच्छ हो - केवल सत्यकी खोजके लिए ही अर्पित कर रखा है। इसलिए मैं एक ऐसे साधनकी खोज में लगा हुआ था जिसे हर व्यक्ति - यहाँ जितने लोग उपस्थित हैं वे सभी बिना किसी अपवादके अपना सकें और जो साथ ही भारत देशकी सबसे बड़ी और गहरी पैठी व्याधिका उपचार भी हो सके । और भारतकी सबसे गहरी पैठी बीमारी निश्चय ही शराबखोरी नहीं है और न अस्पृश्यता, यद्यपि ये बीमारियाँ अपने-आपमें काफी बड़ी हैं और जिन लोगोंको इन्हें भोगना पड़ रहा है उनके लिए शायद और भी बड़ी हैं। लेकिन, जब आप इस बातका जायजा लेंगे कि किस बीमारीसे कितने लोग पीड़ित हैं, यदि आप जन- गणनाके आँकड़ों अथवा इतिहासकी किसी प्रामाणिक पुस्तकको देखेंगे तो आप मेरे इस विचारसे अवश्य ही सहमत हो जायेंगे कि भारत की सबसे बड़ी बीमारी उसकी गरीबी है । प्रामाणिक इतिहास-पुस्तक के रूपमें आप सर विलियम हंटरकी पुस्तक ले सकते हैं, या चाहें तो अभी दो ही वर्ष पूर्व एक आयोगके सामने श्री हिगिनबाँटम द्वारा दिये बयानको भी देख सकते हैं। श्री हिगिनबाँटमने कहा था कि भारतके अधिक- तम लोग गरीबीके शिकार हैं। सर विलियम हंटर कहते हैं कि भारतकी आबादीके दशांशको मुश्किलसे एक वक्त और सो भी सूखी रोटी और चुटकी भर नमक खाकर रहना पड़ता है। आप और में तो इस भोजनको शायद स्पर्श भी नहीं करेंगे। आज यही भारतकी स्थिति है। यदि आप रेलमार्गसे दूर देहातके भीतरी हिस्सोंमें जायें तो मेरी ही तरह आप भी वहाँ देखेंगे कि गाँव, गाँव नहीं, कूड़ेके ढेर बनते जा रहे हैं; वहाँ ग्रामीण नहीं, चील और गिद्ध रहते हैं, क्योंकि ग्रामीण लोग अपने बलबूते अपना गुजारा भी नहीं कर सकते और वे जीती-जागती लाशें बनकर रह गये हैं । भारत गर्दन तोड़ बुखार (मेनिनजाइटिस) से पीड़ित है और अगर आप आवश्यक शल्य चिकित्सा करना चाहते हैं, भुखमरीसे पीड़ित करोड़ों लोगोंको थोड़ा-कुछ देना चाहते हैं, तो आपके पास उसका एकमात्र साधन खादी ही है । और यदि आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले लोगोंके रूपमें आपके मन में उन लोगोंके प्रति कोई हमदर्दी हो जो आपकी- Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> rl3hr42nf3f4nbhl2qw82prfgm5dgdy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२७ 250 187479 674832 645911 2026-08-28T18:09:09Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674832 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें|४९१}} जैसी अच्छी अवस्थामें नहीं हैं और जिनके पास इतना भी नहीं है कि वे गुजारा कर सकें और अपने तन ढँक सकें और यदि आप उनके साथ अपना अटूट सम्बन्ध जोड़ना चाहें, तो मैं एक बार फिर कहता हूँ कि खादीके अतिरिक्त उसका और कोई साधन नहीं है। लेकिन यह बात आपके कानोंको खटकती है और खटकनेका कारण यह है कि यह एक बिलकुल नया विचार है और कई लोगोंको यह मात्र एक काल्पनिक दिवा-स्वप्न जैसा लगता है। वेल्लूरके जिन मिशनरी मित्रका मैंने जिक्र किया है, उन्होंने बातचीतके अन्तमें मुझसे कहा था : "ठीक है, पर क्या आप आधुनिक प्रगतिके बढ़ते हुए चरण रोक सकते हैं? क्या आप घड़ीकी सुइयाँ पीछेकी ओर घुमा सकते हैं? क्या आप लोगोंको खादी अपनाकर चन्द कौड़ियोंके लिए काम करनेको राजी कर सकते हैं?" मैं इससे अधिक कुछ नहीं कह सका कि आप अपने भारत देशको बिलकुल नहीं जानते। वेल्लूरसे मैं अर्काट और आरनी गया। मुझे वहाँ लोगोंके अधिक सम्पर्कमें आनेका समय नहीं मिल पाया, पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने वहाँ गाँववालोंको इतना कम कपड़ा पहने देखा, जितना कम मेरे शरीरपर भी नहीं है। ऐसे दस-बीस नहीं, हजारों लोग मैंने देखे। वे चिथड़े पहने हुए थे और सालमें चार महीने उनको मजदूरीके नामपर एक पैसा भी नहीं मिलता। उन्होंने अपना पेट काटकर मुझे चन्दा दिया। मैं उनके दिये हुए दानको सतृष्ण नेत्रोंसे देख रहा था। उन्होंने मुझे चन्देमें पैसे नहीं, पाइयाँ दी थीं। नवम्बरमें आप मेरे साथ उड़ीसा चलकर वहाँ पुरीको देखिए। यह एक तीर्थ-स्थल है, जहाँ एक आरोग्यशाला (सेनेटोरियम) भी है। गर्मियोंमें वहाँ सैनिक और गवर्नर रहा करते हैं। उसी पुरीके इर्द-गिर्द दस मीलके अन्दर ही आपको चलते-फिरते नरकंकाल देखनेको मिलेंगे। इन्हीं हाथोंसे मैंने उन नरकंकालोंसे चन्देमें मोरचा लगी पाइयाँ इकट्ठी की हैं जिन्हें उन्होंने बड़े जतनसे अपने चिथड़ोंमें बाँध रखा था। कोल्हापुरमें [पक्षाघातका हलका-सा दौरा पड़नेपर] मेरे हाथ जितने काँप रहे थे, ये पाइयाँ देते हुए उनके हाथ कहीं अधिक काँप रहे थे। आप उनके सामने जरा आधुनिक प्रगतिकी बात करके तो देखिए। आप उनके सामने ईश्वरका नाम लेकर देखिए। वह उनके लिए कोई मतलब नहीं रखता, ईश्वरका नाम लेना उनका अपमान करना होगा। यदि मैं या आप उनके सामने ईश्वरकी बात करेंगे तो वे हमें दुष्ट और बदमाश कहेंगे। यदि वे किसी ईश्वरको जानते हैं तो उस ईश्वरको जो उनके लिए त्रासका कारण बना हुआ है, उनपर अपना क्रोध उतारता रहता है, और जो निष्ठुर और आततायी है। वे नहीं जानते कि प्रेम क्या चीज होती है। आप उनके लिए क्या कर सकते हैं? (उपस्थित स्त्रियोंकी ओर संकेत करते हुए) इन प्रसन्नवदना बहनोंको रेशमी साड़ियाँ छोड़कर उन काँपते हुए रुक्ष हाथोंसे बुनी खुरदरी खादी पहननेके लिए राजी कर पाना आपके लिए मुश्किल होगा। क्यों नहीं! खादी खुरदरी है, भारी है! रेशमका स्पर्श बड़ा सुखद होता है। रेशमी साड़ियाँ तो ९-९ गजकी पहनी जा सकती हैं! मगर खादी तो नहीं पहनी जा सकती। मगर उड़ीसाकी गरीब बहनोंके पास पहननेको साड़ियाँ नहीं, फटे-पुराने चिथड़े हैं। फिर भी<noinclude></noinclude> j6kuu9xty0wuie94r7h4ozg4vqi8hnt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२८ 250 187480 674846 645912 2026-08-29T03:52:19Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674846 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} उन्होंने अभी अपनी सारी शर्म-हया नहीं छोड़ी है, मगर मैं सच कहता हूँ, हमने छोड़ दी है। हम इतने सारे कपड़े पहनकर भी वास्तव में नंगे हैं, उन्होंने कोई कपड़ा न पहनकर भी अपनेको ढँक रखा है। इन्हीं बहनोंके लिए मैं जगह-जगह मारा-मारा फिर रहा हूँ, अपने देशवासियोंको खुश करनेकी कोशिश करता हूँ, अमेरिकी मित्रोंको प्रसन्न करनेका प्रयत्न करता हूँ। मैंने इसी तरह हारवर्डसे आये दो किशोरोंका मनोरंजन किया था। उन्होंने मुझसे मेरे हस्ताक्षर माँगे। मैंने कहा, "नहीं, मैं अमेरिकियोंको हस्ताक्षर नहीं देता।" आखिर हमने एक सौदा किया, "मैं आपको अपने हस्ताक्षर देता हूँ; बदलेमें आप खादीको अपनाइए।” उन्होंने मुझे वचन दिया है और अमेरिकियोंके वचनपर मुझे पूरा भरोसा है। उनमें से बहुत-से लोग यह काम कर रहे हैं — और आप भ्रममें न रहिए, वे इसे सचमुच पसन्द भी करते हैं। लेकिन मैं सन्तुष्ट नहीं हो सकता — तबतक नहीं जबतक कि भारतका एक-एक पुरुष, एक-एक स्त्री चरखा नहीं चलाने लग जाती। अगर आपको इसका इससे कोई अच्छा विकल्प मिल जाता है तो आप चरखेको जला दीजिए। यह एक ऐसा साधन, बल्कि एकमात्र ऐसा साधन है जो करोड़ों लोगोंकी जरूरतोंको पूरा कर सकता है और इस तरह कि उन्हें अपने घर-बार छोड़कर कहीं और जाना भी न पड़े। यह काम बहुत बड़ा है और मैं जानता हूँ कि मैं इसे नहीं कर सकता। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि ईश्वर इसे कर सकता है। बड़े से बड़ा और कठिन से कठिन काम भी, जब उसकी मर्जी हो, तो बहुत आसान बन जाता है। वह पलक झपकते सबको नष्ट कर सकता है, उसी तरह जिस तरह उसने अभी गुजरातमें हजारों घरोंको नष्ट कर दिया और जिस तरह कुछ साल पहले दक्षिण भारतमें हजारों घरोंको बरबाद कर दिया था। ईश्वरमें, अतएव उसकी सृष्टि मानवमें पूरा विश्वास रखकर, खादी और चरखेका यह सन्देश मैं आपके लिए लाया हूँ। आज आप चाहें तो मुझपर हँस सकते हैं। आप चाहें तो इसे तुच्छ काम कह सकते हैं। आप चाहें तो मुझमें अविश्वास भी कर सकते हैं और कह सकते हैं कि यह तो कोई राजनीतिक पैंतरेबाज है, जो वैसे कहनेको तो हमारे सामने खद्दरको पेश करने आया है, लेकिन इसकी आस्तीनमें और भी बहुत-बहुत चीजें छिपी हुई हैं। आप मुझे गलत भी समझ सकते हैं, मेरे सन्देशका गलत अर्थ भी लगा सकते हैं। आप कह सकते हैं : 'हम लोग इतने कमजोर हैं कि हमसे यह सब नहीं हो सकता, हम बहुत गरीब हैं।' मैं जानता हूँ कि आप तर्क देकर मुझे अवश कर सकते हैं, मेरा मुँह बन्द कर सकते हैं। लेकिन, जबतक ईश्वरमें मेरा विश्वास है, आपमें भी मैं अपना विश्वास नहीं त्याग सकता। ईश्वरमें विश्वास छोड़ना मेरे लिए असम्भव है और इसलिए खादी और चरखेमें भी मैं अपना विश्वास नहीं छोड़ सकता। यदि मैं अब भी अपने हृदयकी बात आपको नहीं समझा पाया हूँ, यदि मैं अब भी आपको खादीके सन्देशकी परम आध्यात्मिकताकी प्रतीति नहीं करा पाया हूँ तो मैं नहीं समझता कि अब और कभी वैसा कर पाऊँगा। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि मैं सफल होनेका इरादा लेकर ही चल रहा हूँ। मेरे होंठ यह सन्देश<noinclude></noinclude> 15s3bbxqbu2r7i0a08bprquc73cbqyx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५२९ 250 187481 674850 645913 2026-08-29T04:11:24Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674850 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : मद्रासकी सार्वजनिक सभामें|४९३}} सच्चे रूपमें न दे पाये हों लेकिन ईश्वर, जिसके नामपर मैंने आपको यह सन्देश दिया है, वह सच्चा सन्देश अवश्य देगा। ईश्वर आप सबका कल्याण करे। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया,''' १५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४०८. भाषण : मद्रासकी सार्वजनिक सभामें'''<ref>ट्रिप्लिकेन समुद्र-तटपर।</ref>}}}} {{right|४ सितम्बर, १९२७}} {{left|सभापति महोदय और मित्रो,}} आपकी भेंट की हुई कई थैलियों और मानपत्रोंके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। सभी थैलियोंकी राशि मिलाकर १३,२३५ रुपये २ आने ६ पाई होती है। इसके सिवा १०० रुपये पुरसवलकमके मजदूरों, ५२ रुपये ११ पाई इंडियन इण्डस्ट्रियल कम्पनीके कर्मचारियों, १३ रुपये जामबाजारकी ओरसे और १८ रुपये विद्यार्थियों द्वारा जमा किये हुए अतिरिक्त चन्देके रूपमें मिले हैं। इस सबके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। मेरी इच्छा तो थी कि मैं आजकल देश-सेवकोंके ध्यानमें जो विभिन्न विषय हैं, उन सबपर बोलूँ। उनमें से अधिकांश विषयोंके बारेमें मेरे अपने कुछ दृढ़ मत भी हैं, पर अभी मैं उनके बारेमें नहीं बोलूँगा। पर सभामें उपस्थित इस विशाल समुदायके सामने मैं अपना विश्वास दोहरा देना चाहता हूँ। अहिंसापूर्ण असहयोगमें मेरा विश्वास पहलेकी तरह ही दृढ़ है। मेरी अपनी समझके अनुसार हिंसाका बस यही — अहिंसापूर्ण असहयोग ही — एक विकल्प है। हिन्दू-मुसलमान एकताकी सम्भावना और आवश्यकतापर मेरा विश्वास पहलेके जितना ही दृढ़ है। परन्तु जहाँतक मेरे अपने योगदानकी बात है, मैं उसकी शीघ्र सफलताके लिए अपने समूचे हृदयसे प्रार्थना ही कर सकता हूँ। यहाँ उपस्थित इस विशाल समुदायसे मेरा अनुरोध है कि आप सब लोग आगामी ६ तारीखको<ref>दिल्लीमें।</ref> और बादमें शिमलामें होनेवाले हिन्दू-मुसलमान नेताओंके सम्मेलनकी सफलताके लिए प्रार्थना करें। अस्पृश्यता हिन्दू धर्मके लिए कलंक है और उसके निवारणकी आवश्यकतामें भी मेरा विश्वास पहलेकी तरह ही दृढ़ है। आपके यहाँके कुछ युवकोंकी ओरसे नीलकी मूर्ति हटवानेके लिए आन्दोलन किया जा रहा है। मैं उसे काफी दिलचस्पीसे देखता रहा हूँ। मुझे तो वह प्रचार-आन्दोलन उस बादलकी तरह लगता है, जिसका आकार अभी मुश्किलसे आदमीके हाथके अँगूठेके बराबर है। लेकिन अन्य बादलोंकी तरह इस बादलमें भी भारत देशके समूचे आकाशपर फैलकर छा जानेकी क्षमता मौजूद है। मुझे पूरी आशा {{Smallrefs}}<noinclude></noinclude> 1i6he0hyeziez0vfsklk4lht6ioe1tj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३० 250 187482 674851 645914 2026-08-29T04:15:49Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674851 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} है कि यह मूर्ति जिन लोगोंके अधिकारमें है, वे इस आन्दोलनके वास्तविक महत्त्वको समझेंगे, हालाँकि इस समय यह आन्दोलन सर्वथा नगण्य-सा लगता है। इस आन्दोलनको चलानेवाले युवकोंके बारेमें मुझे थोड़ी भी जानकारी नहीं है, पर उनसे मेरा अनुरोध है कि जल्दबाजीमें या अविवेकके कारण वे एक भी ऐसा काम न करें जो उनके इस सुन्दर उद्देश्यपर पानी फेर दे। आपने राष्ट्रीय कांग्रेसको इस वर्ष अपना अधिवेशन इसी महानगरमें करनेकी दावत दी है। मद्रासको यह अनोखा गौरव प्राप्त है कि इसके सबसे यशस्वी पुत्रोंमें से ही एक<ref>एस० श्रीनिवास अय्यंगार।</ref> इस महान् संस्थाके अध्यक्ष हैं। मैं बता नहीं सकता कि आज शाम मुझे उनकी अनुपस्थिति कितनी खल रही है। कांग्रेसके आगामी अधिवेशनको शानदार सफलता दिलानेकी जिम्मेदारी आप लोगों और मद्रासके हरएक नागरिकपर ही है। मैं जानता हूँ कि दुर्भाग्यसे यहाँ आप लोगोंके अन्दर ब्राह्मणों और अब्राह्मणोंके बीच वैमनस्य है। पर आप सब लोगोंसे मेरा आग्रह है कि आपके कंधोंपर जिस महान् कर्तव्यका भार आ गया है, उसे देखते हुए आपमें से प्रत्येकको यह कोशिश करनी चाहिए कि जहाँतक सम्भव है, वहाँतक यह वैमनस्य दूर हो जाये और उसको राष्ट्रीय सम्मेलनकी सफलताको सुनिश्चित बनानेके लिए की जानेवाली तैयारियोंके मार्गमें बाधक न बनने दिया जाये। मैं उस दिनकी राह देख रहा हूँ जब हम अपने बीच हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों, पारसियों इत्यादि, ब्राह्मणों, अब्राह्मणों और अस्पृश्यों इत्यादिको एक-दूसरेका विरोधी, एक-दूसरीसे जूझनेवाली जातियाँ नहीं समझेंगे। लेकिन जबतक हमारे बीच ये विविधताएँ मौजूद हैं, जबतक इनका लोप नहीं हो पाता, तबतक मैं उस दिनकी राह देख रहा हूँ जब हम सब एक-दूसरेको एक ही विशाल वृक्ष — अविभाज्य तथा अखण्ड भारतीय राष्ट्र — की ही विभिन्न शाखाएँ मानने लगेंगे। और मैं चाहता हूँ कि इस तथाकथित हतभागे प्रदेशका यह तथाकथित हतभागा नगर वांछनीय परिणाम लानेका श्रेय प्राप्त करे। अब मैं आपको बतलाता हूँ कि मैं मद्रास क्यों आया हूँ, और किस उद्देश्यसे मैं इस दक्षिणी प्रान्तके कोने-कोनेका दौरा करूँगा। मेरी बड़ी अभिलाषा है कि मैं किसी तरह आप सभीके दिमागमें अच्छी तरहसे बैठा सकूँ कि हम सबको एक सूत्रमें बाँधनेका काम वास्तवमें खादी ही कर सकती है। मेरी बड़ी अभिलाषा है कि मैं आप सभीके दिमागमें अच्छी तरह जमा दूँ कि छोटी-मोटी बातोंको लेकर झगड़नेमें हम उन करोड़ों मूक देशभाइयोंको एक तरहसे बिलकुल ही भुला देते हैं जिनका आज हम ठीक प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं। मैं आपके मनमें पूरी तरह यह बैठानेके लिए आया हूँ कि खादीको अपनानेसे हमें जो बहुत बड़े-बड़े लाभ हो सकते हैं, उन्हें न समझनेके आपके दुराग्रहके कारण खादी आन्दोलनकी प्रगति ही बुरी तरह मन्द पड़ गई है। खादीकी प्रगति मन्द हो जानेके कारण आपमें से कुछ लोग मुझसे झगड़ने लगते हैं, कहते हैं कि खादीमें कोई सार-तत्त्व ही नहीं है। आप अपने दुराग्रहकी ओर ध्यान न देकर केवल खादी आन्दोलनकी प्रगतिको ही धीमा नहीं<noinclude></noinclude> mitzukycva5o1jyu6459k0kh3253n8v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३१ 250 187483 674865 645915 2026-08-29T07:11:31Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674865 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>जी हाँ, चाहे अगला हिस्सा छोटा हो या कुछ ही पंक्तियों का हो, आप अगले पेज का टेक्स्ट या स्क्रीनशॉट भेज दीजिए। मैं उसे भी निर्धारित फॉर्मेट और वर्तनी शुद्धि के साथ तुरंत तैयार कर दूँगा।<noinclude></noinclude> 49xogssa4zoy19dy76q51d527s0gi7r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३३ 250 187485 674873 645917 2026-08-29T07:22:37Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674873 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : मीराबहनको|४९७}} ऐसा यज्ञ तो चरखेके अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता। लेकिन मैं आपको 'गीता' पर प्रवचन नहीं देना चाहता। मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि यदि आप आदिसे अन्ततक 'गीता' का अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि उसमें ईश्वर-भक्तके बुनियादी गुण बड़े ही सरल और सीधे शब्दोंमें गिनाये गये हैं — जैसे ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, अभय आदि। मैं अन्तमें यही परामर्श देता हूँ कि आपको 'गीता' का अध्ययन छिद्रान्वेषी बुद्धिसे नहीं, बल्कि प्रार्थनाके भावसे करना चाहिए और उसकी हिदायतोंपर अमल करना चाहिए। :[अंग्रेजीसे] हिन्दू, ५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४१०. तार : मीराबहनको'''}}}} {{right|मद्रास ५ सितम्बर, १९२७}} {{left|सेवामें मीराबहन सत्याग्रहाश्रम, वर्धा}} दुःख है बुखार हठीला सिद्ध हो रहा है। डाक्टर जो दवा बतायें अवश्य लो। सस्नेह। {{right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२६८) से। सौजन्य : मीराबहन {{c|{{larger|'''४११. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{right|५ सितम्बर, १९२७}} {{left|चि० मीरा,}} अभी-अभी जमनालालजीका तार मिला। लगता है, बुखार तो तुम्हारा पीछा छोड़नेका नाम ही नहीं लेता। डाक्टर जो दवा बतायें उन्हें लेनेमें आपत्ति न करना। यही तुम्हारे लिए अच्छा होगा। तुम आज जिन परिस्थितियोंमें हो उन परिस्थितियोंमें तुम्हें डाक्टर द्वारा बताई गई दवा लेनेमें आपत्ति क्यों नहीं करनी चाहिए, इसके बहुत-से सूक्ष्म कारण हैं। मुझे तो लगता है कि शायद तुम्हारे दिमागपर बहुत बोझ पड़ गया है। हो सकता है कि तुमने मासिक धर्मके दौरान अलगावकी बातको लेकर और आश्रम में{{rh||पत्र : मीराबहनको|४९७}} ऐसा यज्ञ तो चरखेके अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता। लेकिन मैं आपको 'गीता' पर प्रवचन नहीं देना चाहता। मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि यदि आप आदिसे अन्ततक 'गीता' का अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि उसमें ईश्वर-भक्तके बुनियादी गुण बड़े ही सरल और सीधे शब्दोंमें गिनाये गये हैं — जैसे ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, अभय आदि। मैं अन्तमें यही परामर्श देता हूँ कि आपको 'गीता' का अध्ययन छिद्रान्वेषी बुद्धिसे नहीं, बल्कि प्रार्थनाके भावसे करना चाहिए और उसकी हिदायतोंपर अमल करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] हिन्दू, ५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४१०. तार : मीराबहनको'''}}}} {{right|मद्रास ५ सितम्बर, १९२७}} {{left|सेवामें मीराबहन सत्याग्रहाश्रम, वर्धा}} दुःख है बुखार हठीला सिद्ध हो रहा है। डाक्टर जो दवा बतायें अवश्य लो। सस्नेह। {{right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२६८) से। सौजन्य : मीराबहन {{c|{{larger|'''४११. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{right|५ सितम्बर, १९२७}} {{left|चि० मीरा,}} अभी-अभी जमनालालजीका तार मिला। लगता है, बुखार तो तुम्हारा पीछा छोड़नेका नाम ही नहीं लेता। डाक्टर जो दवा बतायें उन्हें लेनेमें आपत्ति न करना। यही तुम्हारे लिए अच्छा होगा। तुम आज जिन परिस्थितियोंमें हो उन परिस्थितियोंमें तुम्हें डाक्टर द्वारा बताई गई दवा लेनेमें आपत्ति क्यों नहीं करनी चाहिए, इसके बहुत-से सूक्ष्म कारण हैं। मुझे तो लगता है कि शायद तुम्हारे दिमागपर बहुत बोझ पड़ गया है। हो सकता है कि तुमने मासिक धर्मके दौरान अलगावकी बातको लेकर और आश्रममें ३४-३२<noinclude></noinclude> synuu8h5ksjxfx115bfpc6lmrey87wg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३४ 250 187486 674876 645918 2026-08-29T07:30:10Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674876 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|४९८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} अपनी भावी योजनाओंके बारेमें बहुत ज्यादा सोचा हो। हमारा तो सिद्धान्त है कि किसी बातकी चिन्ता न करो। चिन्ता अनेक रोगोंको जन्म देती है। लेकिन कारण चाहे जो हो, शरीरमें जो खराबी आई है, उसका इलाज तो भौतिक उपायों — जैसे कि दवा आदि — द्वारा ही होने दो। लेकिन साथ-साथ अपने मनको वशमें रखने और चिन्तासे छुटकारा पानेकी आदत डालनेकी भी कोशिश करते रहना चाहिए। सबके साथ हिन्दीमें बोलनेके बारेमें फिक्र मत करो। मेरी सलाह और अपेक्षाएँ बराबर किसी-न-किसी शर्तके साथ होती हैं। और यह शर्त है 'क्षमताके अनुसार'। तुममें कितनी क्षमता है, इसका अन्तिम निर्णय तो तुम्हीं कर सकती हो। किसी भी कारणसे स्वास्थ्यको खतरेमें नहीं डालना चाहिए। आशा है, कृष्णदास और वालुंजकर तुम्हारी शुश्रूषा कर रहे होंगे। मेरा खयाल है, इस कष्ट और परीक्षाकी घड़ीमें तुम पूरी तरह प्रसन्नचित्त रहती होगी। ईश्वर तुम्हें सहारा और सहायता, शक्ति और जो कुछ भी अपेक्षित हो, वह सब दे। {{right|सस्नेह, बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२७०) से। सौजन्य : मीराबहन {{c|{{larger|'''४१२. पत्र : एक आश्रमवासीको'''}}}} {{right|५ सितम्बर, १९२७}} तुम्हारा पत्र मिला। तुमने पूरी हकीकत लिख भेजी, यह अच्छा किया। मुझे तुमपर शक हो ही नहीं सकता। जहाँ लोकाचारका नीतिसे विरोध न हो, वहाँ उसका पालन किया ही जाना चाहिए। ब्रह्मचर्यके नौ रक्षक घेरे कहे जाते हैं। यदि तुमने इनके बारेमें न पढ़ा हो, तो इन्हें रायचन्दभाईकी पुस्तकमें से पढ़ लेना। हम इन घेरोंमें से कुछकी अवज्ञा कर देते हैं। इसकी जिम्मेदारी मेरी है। मतलब यह कि इन घेरोंको हम प्रयोगके रूपमें तोड़ते हैं। फिर भी अपनी सगी बहनके साथ भी एकान्तमें न रहनेका नियम तो हम लोग पालते ही हैं। मैं इस बातकी पूरी-पूरी आवश्यकता समझता हूँ। इसमें दोनोंका बचाव है। ब्रह्मचारीके मनमें पूर्ण नम्रता और अपने प्रति अविश्वास होना चाहिए। अविश्वासके दो कारण हैं — एक तो यह कि वह इस प्रकार निर्मल बना रह सकता है और दूसरे, उसके सम्पर्कमें आनेवाली बहन स्वप्नमें भी विकारके वश नहीं हो सकती। ब्रह्मचारीके विषयमें सारे जगत्‌को शंका करनेका अधिकार है और होना चाहिए। जगत् ब्रह्मचर्यका पालन नहीं करता। जगत् जिन विकारोंपर विजय प्राप्त नहीं कर<noinclude></noinclude> 6yxqktlfame5ueablnfr6cgdov9v39e पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३५ 250 187487 674902 645919 2026-08-29T10:35:21Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : आश्रमकी बहनोंको|४९९}} पाता, वह ऐसा मानता है कि उन्हें कोई भी नहीं जीत सकता और यह ठीक है। इसलिए संसार द्वारा शक किये जानेपर हमें क्रोधित नहीं होना चाहिए। ऐसा मानना चाहिए कि वहाँ आश्रममें रहनेवाले सब लोग भी जगत्‌में आ जाते हैं। तुमने पवित्र मनसे जो छूट ली, वैसी ही छूटोंके कारण दूसरे लोगोंका पतन होते देखा गया है। शुरूमें वे लोग भी निर्दोष थे। यदि तुम उन लोगोंकी कोटिमें भी पहुँच गये हो जो कभी विकारवश नहीं होते, तो भी दूसरोंके हितकी दृष्टिसे तुम्हें मर्यादाका पालन करना चाहिए। ब्रह्मचर्यका दावा करनेवाले तो बहुत-से देखनेमें आते हैं। क्या हम उन सबको स्वतन्त्रता दे सकते हैं? मैं स्वयं अभीतक विकारोंको जीत नहीं पाया हूँ, तुम्हें यह मालूम है अथवा नहीं? यदि मैं अपने विषयमें स्वयंको अथवा जगत्‌को आश्वस्त नहीं कर सकता, तो फिर तुम्हें तो अपने विषयमें बहुत सावधान रहना चाहिए। काम बिच्छू है। वह कब डंक मार देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। वह तो अनंग है, इसलिए हम उसे देख नहीं सकते। हम चाहें तो भी उसे पकड़ नहीं सकते। इसीलिए ब्रह्मचारीको निरन्तर जागरूक रहना पड़ता है। तुम भाई छगनलाल जोशी इत्यादिके विषयमें जो कुछ लिखते हो, सो ठीक नहीं है। वे सब प्रयत्नशील हैं। हम जगत्‌से बाहर तो नहीं रहते, किन्तु फिर भी उसमें रहते हुए दूसरोंके विकारोंके प्रति द्वेष-दृष्टि न रखते हुए स्वयं निर्विकार बनने और रहनेकी इच्छा करते हैं। इसलिए तुम सावधान रहना। यदि तुम कुछ और भी पूछना चाहो, तो पूछना। :[गुजरातीसे] महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी। सौजन्य : नारायण देसाई {{c|{{larger|'''४१३. पत्र : आश्रमकी बहनोंको'''}}}} {{right|मौनवार [५ सितम्बर, १९२७]<ref>आश्रमकी मजदूरिनोंके निकट सम्पर्कमें आनेकी बातके आधारपर।</ref>}} {{left|बहनो,}} तुम्हारी चिट्ठी मिली। आश्रमकी मजदूरिनोंके निकट सम्पर्कमें आनेकी मेरी बातका रहस्य तुम लोगोंने समझ लिया होगा। उनसे संकट निवारणके लिए दो-चार कौड़ी प्राप्त कर लेना तो एक निमित्त-भर है। अभिप्राय यही है कि तुम लोग इस अवसरका लाभ उठाकर उनके साथ अपनेपनका सम्बन्ध बनाओ। वे हमें और हम उन्हें समझें और एक-दूसरेके<noinclude></noinclude> 9fhku8d4qseponn9n1n67rqk73s8chh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३६ 250 187488 674913 645920 2026-08-29T11:50:17Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674913 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} सुख-दुःखमें भाग लें। मेरा यह कहना नहीं है कि तुम लोग इस काममें अपना बहुत-सा समय दो। यह बात हृदय-परिवर्तन करनेकी है। हमें ऐसी इच्छा करनी चाहिए कि हम जो कुछ खाते हैं, सो वे खा सकें और हम जो कुछ पहनते हैं, सो वे पहन सकें। हमें ऐसी इच्छा रखनी चाहिए कि हमें जो अच्छा लगता है और हम जो प्राप्त करते हैं, वे सब भी उसके भागीदार हो सकें और जहाँ इस इच्छाके अनुसार अमल किया जा सके, वहाँ हमें उसके अनुसार अमल भी करना चाहिए। मैंने जो-कुछ कहा है उसका बढ़ा-चढ़ाकर अर्थ निकालकर भड़क न उठना। सभी बातोंके दो अर्थ होते हैं — एक कम-से-कम और एक व्यापक-से-व्यापक। व्यापक-से-व्यापक अर्थको समझकर संकीर्णतमपर अमल शुरू करना चाहिए। ऐसा करनेसे परेशानीका अनुभव नहीं होता। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ३६६४) की फोटो-नकलसे। {{c|{{larger|'''४१४. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{right|[५ सितम्बर, १९२७के पश्चात्]<ref>साधन-सूत्रमें यह पत्र ५-९-१९२७ के बाद लिया गया है।</ref>}} संसारमें बहादुरीके कई प्रकार हैं। स्वदेशी विक्टोरिया क्रॉस पानेके लिए बहादुरीका कोई स्वदेशी प्रकार होना चाहिए। अगर कोई गंगू तेली अपने बैलके साथ नित्य घूमता रहे और समाजके लिए तेल बनाता रहे और इसे निष्काम भावसे करे, तो क्या यह जबरदस्त बहादुरीका काम नहीं है? गंगू भक्त बहादुर होनेके कारण ही तो विख्यात हुआ। घेलो<ref>व्यक्तिगत नाम, जिसका अर्थ बुद्धू होता है।</ref> तेली विख्यात क्यों नहीं हुआ? [गुजरातीसे] महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी। सौजन्य : नारायण देसाई<noinclude></noinclude> 417q8jejexw1y3t2yno9imvj1bqys0n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३७ 250 187489 674914 645921 2026-08-29T11:52:28Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674914 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : मद्य-निषेधके बारेमें, मद्रासमें|५०१}} {{c|{{larger|'''४१५. भाषण : मद्य-निषेधके बारेमें, मद्रासमें'''<ref>ट्रिप्लिकेनके मणि अय्यर हॉलमें।</ref>}}}} {{right|६ सितम्बर, १९२७}} {{left|मित्रो,}} आज इस सुबहके समय मुझसे आपके सामने मद्य-निषेधके बारेमें बोलनेको कहा गया है। हालाँकि मैं जितना कट्टर खादीवादी हूँ उतना ही कट्टर मद्य-निषेधवादी भी हूँ, फिर भी मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने अपने जीवनमें सिवाय एक अवसरके और कभी किसी विशिष्ट श्रोतृसमुदायके समक्ष 'मद्य-निषेध' पर कोई भाषण किया हो। मेरे जीवनका सिलसिला कुछ ऐसा रहा है कि मुझे किसी विशिष्ट श्रोतृसमुदायसे ऐसे विषयोंपर बातचीत करनेका अवसर ही नहीं मिलता। इस खामीका एक कारण तो यह है कि मैं सनकी हूँ, या कहिए, सनकी माना जाता हूँ, और इसीलिए विशिष्ट श्रोताओंके बीच मुझे कुछ अटपटा लगने लगता है। सनकी लोग अतिवादी हुआ ही करते हैं, इसलिए दूसरे लोगोंको जहाँ जीवनकी खास-खास बातोंमें संयम और सावधानी इत्यादिकी जरूरत महसूस होती है, वहाँ मुझे लगता है कि मेरा कहीं कोई स्थान ही नहीं है। मुझसे जब कोई कहता है कि इस व्यवहार-कुशल संसारमें मुझे धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए तो मैं अपना धीरज खो बैठता हूँ और उससे कहता हूँ : “मद्य-निषेधके मामलेमें आप धीरे-धीरे कैसे चल सकते हैं? जिस स्त्रीका पति शराबी हो, उससे तो आप इस तरहकी बातें नहीं करेंगे।” मैं एक ऐसे परिवारके साथ रह चुका हूँ, जिसमें पति शराबी था। यह बात प्रिटोरियाकी है, १८९३ की। महिला किसी तरह घर चलानेकी कोशिश करती थी और उसे हमेशा यही खटका लगा रहता था कि जब उसका स्वामी घर लौटेगा तो क्या होगा। यदि मैं उस महिलासे कहता कि “इस व्यवहार-कुशल संसारमें धीरे-धीरे चलना चाहिए — सीढ़ी-दर-सीढ़ी,” तो वह मुझे अपने मकानमें किरायेदारकी तरह रहने भी न देती। आप मुझे भी उस महिलाकी-सी स्थितिमें मान सकते हैं, लेकिन इस फर्कके साथ कि मुझे उस तरहके किसी एक नहीं, बल्कि हजारों पतियोंके बीच रहना पड़ रहा है। तो फिर आप मुझसे रुक-रुककर, धीरे-धीरे चलनेके लिए कैसे कह सकते हैं? मैं ऐसी बातोंको सुनकर धीरज खो बैठता हूँ, मेरे मनमें क्रोध उमड़ आता है और अहिंसावादी होनेपर भी मेरी आँखोंमें आपको तीव्र आक्रोशकी झलक दिखने लगेगी। मैंने मद्य-निषेध संघके मन्त्री श्री एन्डर्सनसे भी यही बात कही थी। यह एक ऐसा विषय है जिसके बारेमें मैं बड़ी तीव्रतासे महसूस करता हूँ। कुछ और भी बातें हैं, जिनके बारेमें मेरी भावनाएँ इतनी तीव्र हैं, इतनी तीव्र कि मेरे शब्द उनकी तीव्रताको व्यक्त नहीं कर पाते। सचमुच वे इतनी पवित्र<noinclude></noinclude> fphf4j142v3k5gcb2c3zf5yusvxkdy7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३८ 250 187490 674915 645922 2026-08-29T11:55:26Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} मैं उनको अपने हृदयमें सँजोये रहता हूँ और अवसर मिलनेपर अपनी भावनाएँ इतनी तीव्रताके साथ व्यक्त करता हूँ कि दुनिया उन्हें समझनेमें कोई भूल नहीं कर सकती। मद्य-निषेधके इस मामलेमें कुछ अंग्रेज भी हमारे साथ हैं, इसलिए कि वे मिशनरी या ईसाई हैं। पता नहीं, दूसरे अंग्रेज भी इसमें हमारे साथ हैं या नहीं। वे सब किसी-न-किसी कारणसे जरूरतसे ज्यादा व्यावहारिक रवैया अपनाकर चलते हैं। वे कहते हैं कि हमें सरकारकी कठिनाइयाँ समझनी चाहिए। मैं इस मामलेमें सरकारकी कठिनाइयाँ क्यों समझूँ? अगर हैं तो सिर्फ आर्थिक कठिनाइयाँ ही हैं, और किसी तरहकी कठिनाइयाँ नहीं हैं। इस सिलसिलेमें तीन चीजें हैं जिनको बिलकुल एक खरी कसौटी बनाया जा सकता है। आजतक किसी भी अंग्रेजने मुझसे यह नहीं कहा कि भारतमें पूर्ण मद्य-निषेध असम्भव है। उन्होंने इसमें अगर कोई कठिनाई बतलाई है तो आर्थिक कठिनाई ही बतलाई है। हरएक कहता है : “जी, ठीक है। आप चाहते हैं कि मद्य-निषेध करके आपके बच्चोंकी शिक्षा आदिका खर्च पूरा करनेके लिए भारतपर करोंका अतिरिक्त भार लाद दिया जाये।” भारतमें लाखों-लाख शराबी हों, इससे तो अच्छा मैं यही समझता हूँ कि भारत अपने बच्चोंकी शिक्षाका खर्च पूरा करनेमें कंगाल बन जाये; या बच्चोंकी पढ़ाईकी कीमत चुकानेके लिए देशमें शराबखोर लोग हों, इसके बजाय मैं यह ज्यादा पसन्द करूँगा कि भारतके बच्चे अनपढ़ रहें। पर जब मुझसे कहा जाता है कि मैं अतिरिक्त कर लगानेका समर्थन करूँ तो मैं कहता हूँ “बस, खबरदार”; क्योंकि आमदनीके इस घाटेको पूरा करनेके और भी तो साधन हैं। मैं तो समझता हूँ कि सरकारने आबकारीको राज्यकी आमदनीका एक जरिया मानकर शुरूमें ही भयंकर भूल की है। इसे राज्यकी आमदनीका जरिया कभी मानना ही नहीं चाहिए था और न इसे आबकारीका जरिया होना ही चाहिए। मेरी शिकायत तो बिलकुल सीधी और साफ है, यह कि राज्यकी आमदनीके इस जरियेको शिक्षा और स्वास्थ्यका खर्च पूरा करनेके लिए हस्तान्तरित विभागोंको सौंप दिया गया है, जिसका नतीजा यह है कि हमारे मन्त्रियोंको आमदनीके इस अनैतिक, घृणित और पापपूर्ण साधनका सहारा लेना पड़ता है। इस प्रकारकी आमदनीसे बढ़कर पापपूर्ण दूसरी कोई आमदनी नहीं। इसे देखकर अपने ऊपर काबू रखना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है और इसीलिए मुझे आपके सामने ऐसे कटु शब्दोंका प्रयोग करना पड़ रहा है। मैं महसूस करता हूँ कि जहाँतक भारतकी बात है, यहाँ पूर्ण मद्य-निषेधके लिए जमीन तैयार है; यहाँ ऐसी परिपक्व परिस्थिति मौजूद है जिसमें मद्य-निषेधको एक या दो जिलोंमें आंशिक तौरपर नहीं, बल्कि समूचे देशमें पूरे तौरपर लागू किया जा सकता है। मैंने मद्रासके आबकारी विभागके मन्त्रीका भाषण पढ़ा है। दुःखके साथ कहना पड़ता है कि 'यंग इंडिया' के आगामी अंकके लिए मुझे उनके भाषणकी आलोचनामें कुछ लिखना पड़ा है।<ref>देखिए "पूर्ण मद्य-निषेध", ८-९-१९२७।</ref> एक या दो जिलोंमें परीक्षण कर<noinclude></noinclude> 0k1q92dsuqatfgejdcqw0yex6va88gh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५३९ 250 187491 674916 645923 2026-08-29T11:57:34Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : मद्य-निषेधके बारेमें, मद्रासमें|५०३}} देखनेकी बात मुझे जँचती नहीं। मुझे तो यही लगता है कि मन्त्री महोदय एक-दो जिलोंमें ऐसा परीक्षण करेंगे और यदि उसमें सफलता न मिली तो कहा जायेगा कि अब इसका कभी परीक्षण नहीं किया जायेगा, वह कभी भी सफल नहीं हो सकता। आप सही कामको गलत तरीकेसे करें और फिर गलत तरीकेको दोष देनेके बजाय सही काममें ही दोष दिखाने लगें, यह तो ठीक बात नहीं है। देश मद्य-निषेधके पक्षमें है। यदि मद्य-निषेधके पक्षमें लाखों-लाख लोगोंके हस्ताक्षर जमा करनेसे ही कोई बात सिद्ध होती हो, तो वह तो मात्र संगठनका सवाल है। मैंने तो देशमें कहीं किसी स्थानपर मद्य-निषेधके विरुद्ध जनताको आवाज उठाते नहीं सुना। हाँ, रुपये-पैसेके जोरपर कोई झूठ-मूठका आन्दोलन खड़ा कर दिखाये तो बात दूसरी है। ऐसे देशी राज्य हैं, जहाँ कुछ इलाकोंमें मद्य-निषेध कर दिया गया है, लेकिन उन इलाकोंमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं निकला जो आगे आकर कहता : "हम चाहते हैं कि कम-से-कम एक दुकान तो यहाँ खोली जाये।" एक राज्यमें ह्विस्की और ब्रांडीका सेवन करनेवाले यूरोपीयोंको मद्य-निषेधसे विमुक्ति दे दी गई है। पर इस मामलेमें हम एक बड़ी कठिन स्थितिमें पड़े हुए हैं, इसलिए कि हमारे शासक या गवर्नर लोग शराब पीना अपराधपूर्ण या अनैतिक नहीं मानते। मेरे भी कुछ अंग्रेज मित्र हैं जो मद्य-निषेधकी मेरी बातोंका मखौल उड़ाते हैं। मेरे दिलमें उनके लिए बड़ा सम्मान है। वे शायद समझते हैं कि अगर पीनेमें थोड़ा संयम रखें, ज्यादती न करें तो वे होश-हवास नहीं खोयेंगे और इंसानियत नहीं छोड़ेंगे। मैंने खुद देखा है कि मेरे ये मित्र होश-हवास खो बैठते हैं और इंसानियत छोड़कर पशु भी बन जाते हैं। मैंने अपने कई मित्रोंको शराब पीनेके दौरान उच्छृंखल होते देखा है। वैसे वे बहुत ही बढ़िया किस्मके आदमी हैं, पर पीकर वे निरे गधे बन जाते हैं। उत्तरी ध्रुवके पासके प्रदेशोंमें शराब जैसे गर्मी देनेवाले पेयका सेवन करना किसी हदतक माफ भी किया जा सकता है, लेकिन हमारे देशमें तो शराबकी कतई कोई जरूरत नहीं है। फिर भी यहाँ मद्य-निषेधके विरुद्ध एक तरहका आन्दोलन चल रहा है। [किसीने] मेरे पास मद्य-निषेधके विरुद्ध प्रकाशित ढेर-सी प्रचार-पुस्तिकाएँ भेजी थीं। उनमें लेखक इत्यादिका नाम नहीं दिया गया था। उनमें शराबकी प्रशस्ति-सी की गई थी। कायदेसे थोड़ी शराब पीनेके पक्षमें चिकित्सकों और विभिन्न धर्म-ग्रन्थोंके उद्धरण उनमें जुटाये गये हैं और सारी सामग्री इतने लुभावने और आकर्षक ढंगसे पेश की गई है कि समझसे काम न लेनेवाला व्यक्ति आसानीसे शराबखोरीके जालमें फँस सकता है। यदि मद्य-निषेधपर आपका विश्वास इतना ही कट्टर और अदम्य हो जितना मेरा है और आप देशके कोने-कोनेमें मद्य-निषेधके लिए प्रचार करने लगें तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी। हम लोगोंको आमद-खर्चकी दलीलके जालमें नहीं फँसना चाहिए। यह जाल हमारे लिए ही बिछाया गया है। हमारी स्थिति बिलकुल स्पष्ट होनी चाहिए। खर्चके लिए आमदनी जुटाना हमारा काम नहीं। शुरूमें ही जिन लोगोंने भयंकर भूल की है, उन्हींको अपने कदम पीछे हटाने चाहिए। आमद-खर्चकी<noinclude></noinclude> gnar1roe3ewggqh290ohs8ga4dtqhz0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/७२ 250 196491 674795 668876 2026-08-28T16:09:22Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 674795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>ले। जहाँतक बन सके मुझे तो सब कामोंसे अलग ही रखना चाहिए। तुम जो चाहो सो पूछ सकते हो। यदि सब लोग पहले मुझसे ही अनुमति माँगेंगे तो व्यवस्था बनाये रखना सम्भव नहीं होगा। यह तो पुरानी शिकायत है। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६४) की फोटो-नकलसे। {{c|{{x-larger|'''४२. तार : गुलजारीलाल नन्दाको<ref>यह तार गुलजारीलाल नन्दाके २२ अक्टूबरके इस तारके जवाब में था : सरपंचका आपसे यह कहना है कि मिलकी मौजूदा हालत इतनी अच्छी नहीं कि बढ़ौती करना उचित हो। आपके विचार अब भी आपके सहयोगीसे नहीं मिलते और आप १९२३ की कटौतीको अनुचित मानते हैं जिसका मतलब है कि कटौती समाप्त कर दी जानी चाहिए। यह असंगत लगता है। कृपया पूरी तरह समझाइए। सरपंच २५ को बम्बई से अहमदाबाद पहुँच रहे हैं।</ref>'''}}}} {{right|मसूरी<br> २३ अक्टूबर, १९२९}} <br>गुलजारीलाल <br>मजूर कार्यालय <br>अहमदाबाद <br>आपके तारसे मुझे अचम्भा हुआ। कटौती बहाल करनेकी माँगके लिए मजदूरों द्वारा प्रार्थना किये जानेके दो आधार थे। एक तो तथाकथित समृद्धिमें वृद्धि। यह आधार टिका नहीं। दूसरा यह कि कटौती हर हालत में बेजा थी क्योंकि उससे मजदूरी कम हो जाती है। मजदूरी तो पहले ही से रहन-सहनका खर्च पूरा करनेको काफी नहीं है। ये हालात अब भी चल रहे हैं इसलिए मेरा निर्णय यह है कि मजूरोंकी प्रार्थना मिलोंकी आर्थिक हालतका विचार किये बिना मान ली जानी चाहिए। अपना तार तथा यह पहले सेठ मंगलदासको दिखाइए फिर सरपंच को। {{right|{{larger|गांधी}}}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ९६४२) से। सौजन्य : गुलजारीलाल नन्दा Gandhi Heritage Portal<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> l55um5t7qxi3m0w5to9es0elbha358l 674796 674795 2026-08-28T16:09:55Z ऋतु मिश्रा 6631 सुधार 674796 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>ले। जहाँतक बन सके मुझे तो सब कामोंसे अलग ही रखना चाहिए। तुम जो चाहो सो पूछ सकते हो। यदि सब लोग पहले मुझसे ही अनुमति माँगेंगे तो व्यवस्था बनाये रखना सम्भव नहीं होगा। यह तो पुरानी शिकायत है। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६४) की फोटो-नकलसे। {{c|{{x-larger|'''४२. तार : गुलजारीलाल नन्दाको<ref>यह तार गुलजारीलाल नन्दाके २२ अक्टूबरके इस तारके जवाब में था : सरपंचका आपसे यह कहना है कि मिलकी मौजूदा हालत इतनी अच्छी नहीं कि बढ़ौती करना उचित हो। आपके विचार अब भी आपके सहयोगीसे नहीं मिलते और आप १९२३ की कटौतीको अनुचित मानते हैं जिसका मतलब है कि कटौती समाप्त कर दी जानी चाहिए। यह असंगत लगता है। कृपया पूरी तरह समझाइए। सरपंच २५ को बम्बई से अहमदाबाद पहुँच रहे हैं।</ref>'''}}}} {{right|मसूरी<br> २३ अक्टूबर, १९२९}} <br>गुलजारीलाल <br>मजूर कार्यालय <br>अहमदाबाद <br>आपके तारसे मुझे अचम्भा हुआ। कटौती बहाल करनेकी माँगके लिए मजदूरों द्वारा प्रार्थना किये जानेके दो आधार थे। एक तो तथाकथित समृद्धिमें वृद्धि। यह आधार टिका नहीं। दूसरा यह कि कटौती हर हालत में बेजा थी क्योंकि उससे मजदूरी कम हो जाती है। मजदूरी तो पहले ही से रहन-सहनका खर्च पूरा करनेको काफी नहीं है। ये हालात अब भी चल रहे हैं इसलिए मेरा निर्णय यह है कि मजूरोंकी प्रार्थना मिलोंकी आर्थिक हालतका विचार किये बिना मान ली जानी चाहिए। अपना तार तथा यह पहले सेठ मंगलदासको दिखाइए फिर सरपंच को। {{right|{{larger|गांधी}}}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ९६४२) से। सौजन्य : गुलजारीलाल नन्दा<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 2wmzf15uqaygh4qenlmr8t48fxe2p5h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५८ 250 197401 674772 674603 2026-08-28T12:19:01Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674772 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|अर्धरात्रि, सोमवार, २१ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, प्यारेलाल पहुँच गया है। तुम्हारा वक्तव्य तो काममें नहीं आया। मेरा लेख जब तुम पढ़ोगे तब तुम्हें मालूम होगा। भड़ौचमें जो घटनाएँ हो रही हैं और बिहार में जो घटनाएँ हुई हैं उन्हें देखते हुए धोलेरा और वीरमगांवमें हुई घटनाएँ कुछ भी नहीं लगतीं। अब चूंकि वहाँका उपद्रव शान्त हो गया है इसलिए अब इसकी ज्यादा चर्चा करनेसे क्या लाभ? तुमने अपनी साप्ताहिक चिट्ठीमें जो थोड़ा-कुछ लिख दिया है उसमें कोई हर्ज नहीं तुम्हारे वक्तव्यका कुछ भाग तो निकाल देने लायक लगा। ऐसा मुझे क्यों लगा, यह समझा सकनेका फिलहाल मेरे पास समय नहीं है। मैं पूरे दिन लिखता रहा। बादमें में नवसारी अस्पतालमें भरती एक व्यक्तिको देखने गया; उसे खजूरका वृक्ष काटते समय बड़ी जबरदस्त चोट आई थी और अब वह अन्तिम सासें गिन रहा है। वहांसे वापस आनेपर में कताई-यज्ञको पूरा कर रहा हूँ और तुम्हें यह पत्र लिखवा रहा हूँ। प्यारेलालको भड़ौच भेज रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि तुम तो पहले ही किसीको भेज चुके हो और अधिक सावधानीके तौरपर मैं प्यारेलालको भेज रहा हूँ। कल छोटेलालको वहाँ [तुम्हारे पास] भेजा है। उसको भेजने का उद्देश्य तो खादी-प्रचार में उससे काम लेना है। काकाको मैंने समझा दिया है। यों छोटेलालको शतावधानी कहा जाता है। तात्पर्य यह कि उससे जो काम लेना हो, लेना। अन्तिम निर्देश देनेकी दिशामें में विचार कर रहा हूँ। कह नहीं सकता, लेकिन एक-दो दिनमें किसी निश्चयपर पहुँच जाऊँगा। कल दोपहरको सूरत पहुँचूँगा और शामतक वहीं रहूँगा। शामको वापस आऊँगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनञ्च:] सारे हलफ़नामे भेज रहा हूँ। 'यंग इंडिया' का पुलिन्दा सीधे भेजा गया है। एक हलफनामेका अनुवाद मेरे लेखमें लिया गया है। प्यारेलालका अनुवाद अधूरा और दोषपूर्ण है। मैंने प्यारेलालको [भड़ौच] भेजनेका विचार त्याग दिया है। गुजराती (एस० एन० १६८२४) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> 2ksq3spvanigjukg35civ0taq62uvhu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५९ 250 197402 674773 674609 2026-08-28T12:39:11Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674773 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९९. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|नवसारी}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चटगाँवका समाचार पढ़कर मन व्यथित हो जाता है। इससे प्रकट होता है कि बंगाल में कमोवेश तादादमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो अहिंसामें विश्वास नहीं रखते न तो सिद्धान्त और न नीतिके रूपमें। मुझे यह तो मालूम ही था कि ऐसे लोग सारे देशमें हैं, लेकिन मैंने आशा यह की थी कि वे अहिंसाको एक मौका देंगे। कलकत्ता और कराचीकी घटनाओंको तो मैं किसी हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण नहीं, बल्कि आकस्मिक घटनाएँ मानता हूँ। लेकिन चटगांवकी घटनाएँ शायद हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण हैं और यदि ऐसा है तो यह बात बहुत गम्भीर है। लेकिन परिस्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो जाये, अब संघर्षको स्थगित नहीं किया जा सकता। हम अपना कदम पीछे नहीं हटा सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यॉम्बे क्रॉनिकल''', २२-४-१९३०<noinclude></noinclude> 8669eidrwjvpqojkpk0bnc0xxqasnee पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६० 250 197403 674808 669928 2026-08-28T16:37:04Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674808 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|३००. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} भाई सतीशबाबु, बंगालमें जो कुछ हो रहा है उसका सत्य वर्णन मुझे कहींसे मीलता नहि है। तुमारे संघका क्या चलता है उसका भी पता नहीं है। किसीको कह दो कि मुझको सच्ची हकीकत भेजते रहे। शरीर प्रवृत्ति कैसी है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} [पुनश्च] यह लिखनेके बाद उपवासका तार देखा। मैंने तार दिया है। उत्तरकी प्रतीक्षा कर रहा हू। जी० एन० १६१७ की फोटो नकलसे ३०१. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको प्रिय भगिनी, २२ अप्रैल, १९३० तुमारा खत कई दिनोंसे नहि है मुझे पता नहीं है कहां तक मुझे जेल बहार रखेंगे। कैसे हि हो मुझको लिखते रहो। जब जेलमें चला जाऊं तब देखा जाय । तुमारा शरीर अब कैसे रहता है ? जी० एन० १६६६ की फोटो नकलसे । १. अनुमानतः सेदपुरका भाश्रम। बापुके आशीर्वाद 2014<noinclude></noinclude> mfnyppvcxup709wf1xw71wiwqaebaso 674816 674808 2026-08-28T17:26:46Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674816 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३००. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} भाई सतीशबाबु, बंगालमें जो कुछ हो रहा है उसका सत्य वर्णन मुझे कहींसे मीलता नहि है। तुमारे संघका क्या चलता है उसका भी पता नहीं है। किसीको कह दो कि मुझको सच्ची हकीकत भेजते रहे। शरीर प्रवृत्ति कैसी है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} [पुनश्च] यह लिखनेके बाद उपवासका तार देखा। मैंने तार दिया है। उत्तरकी प्रतीक्षा कर रहा हू। जी० एन० १६१७ की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३०१. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} प्रिय भगिनी, तुमारा खत कई दिनोंसे नहि है मुझे पता नहीं है कहां तक मुझे जेल बहार रखेंगे। कैसे हि हो मुझको लिखते रहो। जब जेलमें चला जाऊं तब देखा जाय। तुमारा शरीर अब कैसे रहता है? {{Right| बापुके आशीर्वाद} जी० एन० १६६६ की फोटो नकलसे। १. अनुमानतः सेदपुरका श्रम<noinclude></noinclude> fn6kv6hfgjt8r0mtq7k13bll5iiymhj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६१ 250 197404 674774 674617 2026-08-28T12:43:35Z Kumari Arpana Sinha 2191 674774 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।<small><noinclude></noinclude> 0r2kzh3jvvtn87w9gwxz2r08aozsojj 674775 674774 2026-08-28T12:45:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 674775 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें 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समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।</small><noinclude></noinclude> a7t4bjioic3xss14hka0qlr6ioa1vom 674777 674776 2026-08-28T12:51:39Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674777 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।</small><noinclude></noinclude> 85qclbow595187bbc361tjcq1ak4rik 674778 674777 2026-08-28T12:52:21Z Kumari Arpana Sinha 2191 674778 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।</small><noinclude></noinclude> 2w8owps84ylh0xk0nzi43owhn7omi76 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६२ 250 197405 674798 674619 2026-08-28T16:12:41Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674798 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०४. पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} भाई हरिभाऊ, आपका पत्र मिला। आप सबके पकड़े जानेपर यदि मैं मुक्त रहा तो 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' में लिखूंगा। 'नवजीवन' में तो आज ही लिखना है। इसलिए कुछ लिख डालूंगा। रामनारायणने वहाँ आने की मांग की है और मैंने अपनी सम्मति भी दे दी है। लड़ाई खूब रंग पकड़ रही है। यदि हमारी ताकत ऐसी ही बनी रही तो मेरा विश्वास है कि हम थोड़े ही समय में अपने उद्देश्यको प्राप्त कर लेंगे। कल इतना लिखनेके बाद मुझे बाहर जाना पड़ा। नवसारीमें आपका तार मिला। आपका पत्र भी मिला। इस पत्रका ही उपयोग करते हुए मैंने 'हिन्दी नवजीवन 'में'लिखा है। 'यंग इंडिया' के आगामी अंकके लिए यदि मैं कुछ लिख सका तो लिखूगा। अपने शरीरका ध्यान रखना। शायद अगले सप्ताह में गिरफ्तार कर लिया जाऊँ। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६०७२) से। सौजन्य : हरिभाऊ उपाध्याय {{C|{{larger|'''३०५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}} {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Right|कराडी}} {{Right||२३ अप्रैल, १९३०}} चि० व्रजकृष्ण, तुम्हारा खत मिला। यहां बुलाकर मैं क्या करूं। दिल्लीके हाल मैं अच्छी तरह जानता हूं। जितना हो सके उतना किया जाय। अगर दिल्हीमें या उसके इर्द-गिर्दमे खद्दर उत्पतिका ज्यादा काम हो सके तो करो। बांसकी तकली बनाओ दूसरोंको बनानेका सिखा दो और सूतका संगठन करो और नायरसे मिलकर जो कुछ भी हो सकता है वह किया जाय। आश्रम स्थायी रखनेमें में कोई हानि देखता नहि हुँ ।लेकिन हमारी प्रतिज्ञामें विश्वास है तो जानो कि आश्रम वैसे ही स्थायी वन जाता है क्यूंकी यह लड़ाई आखरीका फैसला है इसलिये स्वराज्यकी स्थापना होने तक तो वो रहता ही है और स्वराज्य मिल जानेके बाद तो सब आश्रम वैसे ही स्थायी <small>१. देखिए "सलाम अथवा देत १ २४-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude> p9zdjnznxil0lwr1r844eti75tipqes 674801 674798 2026-08-28T16:15:32Z Kumari Arpana Sinha 2191 674801 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०४. पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} भाई हरिभाऊ, आपका पत्र मिला। आप सबके पकड़े जानेपर यदि मैं मुक्त रहा तो 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' में लिखूंगा। 'नवजीवन' में तो आज ही लिखना है। इसलिए कुछ लिख डालूंगा। रामनारायणने वहाँ आने की मांग की है और मैंने अपनी सम्मति भी दे दी है। लड़ाई खूब रंग पकड़ रही है। यदि हमारी ताकत ऐसी ही बनी रही तो मेरा विश्वास है कि हम थोड़े ही समय में अपने उद्देश्यको प्राप्त कर लेंगे। कल इतना लिखनेके बाद मुझे बाहर जाना पड़ा। नवसारीमें आपका तार मिला। आपका पत्र भी मिला। इस पत्रका ही उपयोग करते हुए मैंने 'हिन्दी नवजीवन 'में'लिखा है। 'यंग इंडिया' के आगामी अंकके लिए यदि मैं कुछ लिख सका तो लिखूगा। अपने शरीरका ध्यान रखना। शायद अगले सप्ताह में गिरफ्तार कर लिया जाऊँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६०७२) से। सौजन्य : हरिभाऊ उपाध्याय {{C|{{larger|'''३०५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right||२३ अप्रैल, १९३०}} चि० व्रजकृष्ण, तुम्हारा खत मिला। यहां बुलाकर मैं क्या करूं। दिल्लीके हाल मैं अच्छी तरह जानता हूं। जितना हो सके उतना किया जाय। अगर दिल्हीमें या उसके इर्द-गिर्दमे खद्दर उत्पतिका ज्यादा काम हो सके तो करो। बांसकी तकली बनाओ दूसरोंको बनानेका सिखा दो और सूतका संगठन करो और नायरसे मिलकर जो कुछ भी हो सकता है वह किया जाय। आश्रम स्थायी रखनेमें में कोई हानि देखता नहि हुँ। लेकिन हमारी प्रतिज्ञामें विश्वास है तो जानो कि आश्रम वैसे ही स्थायी वन जाता है क्यूंकी यह लड़ाई आखरीका फैसला है इसलिये स्वराज्यकी स्थापना होने तक तो वो रहता ही है और स्वराज्य मिल जानेके बाद तो सब आश्रम वैसे ही स्थायी <small>१. देखिए "सलाम अथवा देत १ २४-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude> 1nu8e7ei241jav4zey7r1ynk4q5c3jq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६३ 250 197406 674803 674637 2026-08-28T16:23:14Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674803 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र: विट्ठलदास जेराजाणीको|३१९}}</noinclude>हो जाते है। माताजी इत्यादिने खद्दर ग्रहण कर ली है वो बहोत अच्छी बात हुई। तुम्हारा शरीर कैसा है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} जी० एन० २३८१ की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३०६. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, इसके साथ चेक भेज रहा हूँ। इसका ब्योरा भी साथमें है। रसीद इलाहाबाद भेजना। अभी रातके दस बजे हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०४ ) से। सौजन्य:नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''३०७. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको'''}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} भाईश्री विट्ठलदास जेराजाणी, खादी आन्दोलन में और इसलिए तुम्हारे काममें समय-समयपर परिवर्तन होता आया है। मेरी मान्यता है कि जो परिवर्तन किये गये हैं वे सादीके लिए अर्थात् दरिद्रनारायणके लिए आवश्यक थे। हालांकि उस समय [कुछ लोगोंकी] बुद्धि इन परिवर्तनोंको स्वीकार नहीं करती थी। अभीतक तो अनुभव भी यही कहता है कि अन्ततः वे सारे परिवर्तन बुद्धिग्राह्य ही ठहरे और उनके उचित परिणाम निकले; तथा हमने देखा कि वे आवश्यक ही थे। मैं इस समय जिस परिवर्तनका सुझाव देने जा रहा हूँ वह मेरे विचारसे पहले परिवर्तनोंसे कहीं अधिक भय उपजानेवाला लगेगा। लेकिन मैं मानता हूँ कि खादी-प्रेमियोंको ऊपर-ऊपरसे विचार करनेपर यह परिवर्तन जितना खतरनाक जान पड़ेगा खादीके लिए यह उतना ही उपयोगी और आवश्यक है। विदेशी वस्त्रके बहिष्कार शास्त्रके समंज लोग इस परिवर्तनकी आवश्यकताको तुरन्त समझ लेंगे। अभी खादीकी जितनी मांग है उसके अनुरूप हमारे<noinclude></noinclude> kxkmazrov2jx31ulgpp4ru0mg6pv2gl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६४ 250 197407 674807 674732 2026-08-28T16:31:10Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674807 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पास खादीका भण्डार नहीं है। माँग रोज बढ़ती जाती है और हम उतनी खादी तैयार नहीं कर पाते। इसलिए यदि हम किसी तरहसे खादी तैयार करनेकी शक्ति पैदा नहीं करेंगे तो खादीकी तंगी हो जायेगी और यदि खादीकी तंगी हो गई तो बहिष्कार व्यर्थ जायेगा, यह बात हम अंकगणितके हिसाब से भी सिद्ध कर सकते हैं। इसलिए मेरा नया सुझाव यह है: जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी अर्थात् आज-कलमें ही तुम्हें बम्बईकी जनताको बता देना चाहिए कि जो लोग खादी चाहते हैं उन्हें खादी पैसोंसे नहीं मिल सकती। वे खादी हाथकता सूत देकर ही प्राप्त कर सकेंगे। ऐसा करनेसे ही लोग समझ सकेंगे कि खादी विदेशी वस्त्रका व्यापार करने जैसा सौदा नहीं है; बल्कि यह तो जनताकी शक्ति, उसकी भावनाका मापदण्ड है। खादीका शास्त्र तो ऐसा है कि जबतक कपास मिल सके तबतक खादीकी तंगी हो ही नहीं सकती। लेकिन उसके लिए लोगोंमें कातनेकी भावना पैदा होनी चाहिए। यदि इस कठिन और स्वराज्य की स्थापनाके समय कातनेकी भावना व्यापक नहीं हो सकती तो खादीका कोई अर्थ ही नहीं है। इसके अलावा इतने थोड़े समयमें हम एक करोड़ रतल वजनकी खादी तैयार कर ही नहीं सकते। इसलिए हमारा धर्म सरल और स्पष्ट है। यदि लोगोंमें सचमुच खादीकी भावना हो तो उन्हें कातना ही चाहिए। मेरा सुझाव ऊपर-ऊपरसे देखने में जितना डरावना जान पड़ता है वह वस्तुतः उतना डरावना नहीं है। क्योंकि खादी खरीदनेवाले से मांग यह नहीं है कि वह अपने हाथका कता हुआ सूत दे, बल्कि मांग खादीके बदले किसी भी व्यक्तिके हाथका कता हुआ सूत देनेकी है। इसलिए बम्बई निवासी जैसे चाहें वैसे कता हुआ सूत पैदा कर सकते हैं। उन्हें थोड़ी-सी तकलीफ तो उठानी ही पड़ेगी और यदि वे लोग इतना सा कष्ट भी नहीं उठा सकते तो उनका, खादीका और सबका हित इसीमें है कि वे खादीके बिना ही रहें। सूत किस प्रकारका होना चाहिए तथा कौन-कौनसी वस्तुएँ अब भी पैसे से दी जा सकती हैं, इन सब बातोंका तुम स्वयं ही विचार कर लोगे। मुझे उम्मीद है कि बम्बई के लोग, जो इस लड़ाईमें डटकर भाग ले रहे हैं, इतनी सरल बातको समझ जायेंगे और अपनी जरूरतकी खादी प्राप्त करनेमें उनपर प्रयास करनेका जो थोड़ा बोझ आ पड़ेगा, उसे झेल लेंगे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ९७७२ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> mwayix51cekuudc7jybs0kcogcc9lo9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६५ 250 197408 674854 669933 2026-08-29T05:47:34Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674854 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{|{{larger|३०८. हिन्दू-मुस्लिम एकता}} कौमी सवाल के बारेमें मेरे रुखको लेकर आजकल तरह-तरह की गलतफहमियाँ फैलाई जा रही हैं। अतएव यहाँ किसी तरहकी दलील न करके मैं जितने स्पष्टशब्दोंमें अपनी स्थिति बता सकता हूँ, बतानेकी चेष्टा करूंगा। १. पिछले चालीस वर्षोंसे इस बारे में जो विचार रखता आया हूँ, वे आज भी कायम हैं। २. मैं मानता हूँ कि और बातोंकी तरह ही, जिन्हें मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ, कौमी एकताके बिना भी स्वराज्य कायम नहीं हो सकता। ३. वर्तमान आन्दोलनका मंशा स्वतन्त्रता प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों में उसे पानेकी शक्ति उत्पन्न करना है। ४. जब यह शक्ति पैदा हो जायेगी और पूर्ण स्वराज्य कायम करनेका समय आयेगा, तब मुसलमानों और दूसरी सभी अल्पसंख्यक जातियोंके लोगोंको सन्तुष्ट करना होगा। अगर वे सन्तुष्ट न हुए तो आपसमें ही लड़ाई शुरू हो जायेगी। लेकिन मैं तो इसी आशापर जी रहा हूँ कि अगर हम यह ताकात पैदा करनेमें कामयाब हो गये तो हमारी आपसी फूट और एक-दूसरे के प्रति अविश्वासकी भावना अपने-आप मिट जायेगी। आज हममें ये दुर्गुण हमारी कमजोरीके कारण ही हैं। जब हममें ताकत आ जायेगी तो हम उन्हें सहज ही त्याग देंगे। ५. नेहरू संविधानके रद हो जानेसे कौमी सवालके निपटारेकी बात भी स्वभावतः रद हो गई है। लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावमें यह बात स्पष्ट कही गई है। कि सिखों और मुसलमानोंको नेहरू संविधानके अनुसार कौमी सवालके हलसे सन्तोष नहीं हुआ है, इसलिए सभी पक्षोंको सन्तुष्ट करनेके लिए इस सवाल पर फिरसे विचार करना होगा। ६. मैं जो एकमात्र अहिंसात्मक हल जानता हूँ वह यह है कि हिन्दू अल्पसंख्यक जातियोंको, ये जो चाहें लेने दें। मुझे तो अल्पसंख्यकोंके हाथों में देशके शासनको सौंपते हुए भी हिचकिचाहट न होगी। यह कोई कल्पना जगत्‌की बात नहीं है। मेरे विचारसे यह हल सब तरहके खतरोंसे बरी है, क्योंकि स्वतन्त्र राज्यमें वास्तविक सत्ता तो जनताके हाथोंमें रहेगी। जनताकी उस सत्ताका परिचय तो आज ही दिया जा रहा है। अगर जनता अपनी शक्तिका अनुभव करके संयमके साथ सार्वजनिक हितके लिए उसका उपयोग करे तो सरकार चाहे जितनी शक्तिशाली हो, वह उसके सामने सर्वथा निरुपाय बन जायेगी। गुजरातमें आज लोग जिस शक्ति और संगठनका परिचय दे रहे हैं यदि वह सच्चा है और उसका स्रोत कोई अन्धविश्वास नहीं है, तो कहना होगा कि यह कि लोग सफलताके निकटतक पहुँच चुके हैं। लोग यह याद रखें कि देशके शासनमें उसकी आबादीके मुकाबलेमें बहुत ही थोड़े लोग जिम्मेदारी और हुकूमतकी जगहोंपर काम किया करते हैं। सारी दुनियाका यही अनुभव रहा ४३-२१<noinclude></noinclude> k2zig59lrcqrizjt20ci2y4jtildij2 674855 674854 2026-08-29T05:48:41Z Kumari Arpana Sinha 2191 674855 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०८. हिन्दू-मुस्लिम एकता '''}} कौमी सवाल के बारेमें मेरे रुखको लेकर आजकल तरह-तरह की गलतफहमियाँ फैलाई जा रही हैं। अतएव यहाँ किसी तरहकी दलील न करके मैं जितने स्पष्टशब्दोंमें अपनी स्थिति बता सकता हूँ, बतानेकी चेष्टा करूंगा। १. पिछले चालीस वर्षोंसे इस बारे में जो विचार रखता आया हूँ, वे आज भी कायम हैं। २. मैं मानता हूँ कि और बातोंकी तरह ही, जिन्हें मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ, कौमी एकताके बिना भी स्वराज्य कायम नहीं हो सकता। ३. वर्तमान आन्दोलनका मंशा स्वतन्त्रता प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों में उसे पानेकी शक्ति उत्पन्न करना है। ४. जब यह शक्ति पैदा हो जायेगी और पूर्ण स्वराज्य कायम करनेका समय आयेगा, तब मुसलमानों और दूसरी सभी अल्पसंख्यक जातियोंके लोगोंको सन्तुष्ट करना होगा। अगर वे सन्तुष्ट न हुए तो आपसमें ही लड़ाई शुरू हो जायेगी। लेकिन मैं तो इसी आशापर जी रहा हूँ कि अगर हम यह ताकात पैदा करनेमें कामयाब हो गये तो हमारी आपसी फूट और एक-दूसरे के प्रति अविश्वासकी भावना अपने-आप मिट जायेगी। आज हममें ये दुर्गुण हमारी कमजोरीके कारण ही हैं। जब हममें ताकत आ जायेगी तो हम उन्हें सहज ही त्याग देंगे। ५. नेहरू संविधानके रद हो जानेसे कौमी सवालके निपटारेकी बात भी स्वभावतः रद हो गई है। लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावमें यह बात स्पष्ट कही गई है। कि सिखों और मुसलमानोंको नेहरू संविधानके अनुसार कौमी सवालके हलसे सन्तोष नहीं हुआ है, इसलिए सभी पक्षोंको सन्तुष्ट करनेके लिए इस सवाल पर फिरसे विचार करना होगा। ६. मैं जो एकमात्र अहिंसात्मक हल जानता हूँ वह यह है कि हिन्दू अल्पसंख्यक जातियोंको, ये जो चाहें लेने दें। मुझे तो अल्पसंख्यकोंके हाथों में देशके शासनको सौंपते हुए भी हिचकिचाहट न होगी। यह कोई कल्पना जगत्‌की बात नहीं है। मेरे विचारसे यह हल सब तरहके खतरोंसे बरी है, क्योंकि स्वतन्त्र राज्यमें वास्तविक सत्ता तो जनताके हाथोंमें रहेगी। जनताकी उस सत्ताका परिचय तो आज ही दिया जा रहा है। अगर जनता अपनी शक्तिका अनुभव करके संयमके साथ सार्वजनिक हितके लिए उसका उपयोग करे तो सरकार चाहे जितनी शक्तिशाली हो, वह उसके सामने सर्वथा निरुपाय बन जायेगी। गुजरातमें आज लोग जिस शक्ति और संगठनका परिचय दे रहे हैं यदि वह सच्चा है और उसका स्रोत कोई अन्धविश्वास नहीं है, तो कहना होगा कि यह कि लोग सफलताके निकटतक पहुँच चुके हैं। लोग यह याद रखें कि देशके शासनमें उसकी आबादीके मुकाबलेमें बहुत ही थोड़े लोग जिम्मेदारी और हुकूमतकी जगहोंपर काम किया करते हैं। सारी दुनियाका यही अनुभव रहा ४३-२१<noinclude></noinclude> jeh8o2kr0f1ydg5g9kz4szbd5fq0cl6 674856 674855 2026-08-29T05:49:21Z Kumari Arpana Sinha 2191 674856 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०८. हिन्दू-मुस्लिम एकता '''}}}} कौमी सवाल के बारेमें मेरे रुखको लेकर आजकल तरह-तरह की गलतफहमियाँ फैलाई जा रही हैं। अतएव यहाँ किसी तरहकी दलील न करके मैं जितने स्पष्टशब्दोंमें अपनी स्थिति बता सकता हूँ, बतानेकी चेष्टा करूंगा। १. पिछले चालीस वर्षोंसे इस बारे में जो विचार रखता आया हूँ, वे आज भी कायम हैं। २. मैं मानता हूँ कि और बातोंकी तरह ही, जिन्हें मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ, कौमी एकताके बिना भी स्वराज्य कायम नहीं हो सकता। ३. वर्तमान आन्दोलनका मंशा स्वतन्त्रता प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों में उसे पानेकी शक्ति उत्पन्न करना है। ४. जब यह शक्ति पैदा हो जायेगी और पूर्ण स्वराज्य कायम करनेका समय आयेगा, तब मुसलमानों और दूसरी सभी अल्पसंख्यक जातियोंके लोगोंको सन्तुष्ट करना होगा। अगर वे सन्तुष्ट न हुए तो आपसमें ही लड़ाई शुरू हो जायेगी। लेकिन मैं तो इसी आशापर जी रहा हूँ कि अगर हम यह ताकात पैदा करनेमें कामयाब हो गये तो हमारी आपसी फूट और एक-दूसरे के प्रति अविश्वासकी भावना अपने-आप मिट जायेगी। आज हममें ये दुर्गुण हमारी कमजोरीके कारण ही हैं। जब हममें ताकत आ जायेगी तो हम उन्हें सहज ही त्याग देंगे। ५. नेहरू संविधानके रद हो जानेसे कौमी सवालके निपटारेकी बात भी स्वभावतः रद हो गई है। लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावमें यह बात स्पष्ट कही गई है। कि सिखों और मुसलमानोंको नेहरू संविधानके अनुसार कौमी सवालके हलसे सन्तोष नहीं हुआ है, इसलिए सभी पक्षोंको सन्तुष्ट करनेके लिए इस सवाल पर फिरसे विचार करना होगा। ६. मैं जो एकमात्र अहिंसात्मक हल जानता हूँ वह यह है कि हिन्दू अल्पसंख्यक जातियोंको, ये जो चाहें लेने दें। मुझे तो अल्पसंख्यकोंके हाथों में देशके शासनको सौंपते हुए भी हिचकिचाहट न होगी। यह कोई कल्पना जगत्‌की बात नहीं है। मेरे विचारसे यह हल सब तरहके खतरोंसे बरी है, क्योंकि स्वतन्त्र राज्यमें वास्तविक सत्ता तो जनताके हाथोंमें रहेगी। जनताकी उस सत्ताका परिचय तो आज ही दिया जा रहा है। अगर जनता अपनी शक्तिका अनुभव करके संयमके साथ सार्वजनिक हितके लिए उसका उपयोग करे तो सरकार चाहे जितनी शक्तिशाली हो, वह उसके सामने सर्वथा निरुपाय बन जायेगी। गुजरातमें आज लोग जिस शक्ति और संगठनका परिचय दे रहे हैं यदि वह सच्चा है और उसका स्रोत कोई अन्धविश्वास नहीं है, तो कहना होगा कि यह कि लोग सफलताके निकटतक पहुँच चुके हैं। लोग यह याद रखें कि देशके शासनमें उसकी आबादीके मुकाबलेमें बहुत ही थोड़े लोग जिम्मेदारी और हुकूमतकी जगहोंपर काम किया करते हैं। सारी दुनियाका यही अनुभव रहा ४३-२१<noinclude></noinclude> kn25t8suqnu9oadgokffnvlmh38hfq1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६६ 250 197409 674857 669934 2026-08-29T05:55:26Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674857 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{|C{{larger|'''३२२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''}}}} है कि सच्ची ताकत और सम्पत्ति तो उन्हीं लोगोंके हाथोंमें होती है, जो शासनकी बागडोर थामनेवाले समूहसे बाहर होते हैं। हम लोग अपने देशमें सत्ताके पीछे इसलिए पागल बने हुए हैं कि हमारे देशवासी भोले हैं, और सहज ही उनका शोषण किया जा सकता है। आजकी सत्ता में ऊपरसे नीचेतक सड़ांध पैदा हो गई है। अहिंसात्मक शक्तिसे प्राप्त स्वतन्त्रता स्वभावतः ऐसी होगी कि वह इस तरहकी बुराइयोंको प्रायः मिटा देगी। अतएव ऊपर मैंने कौमी झगड़ोंको सुलझानेका जो तरीका बताया है, वह मेरी व्यावहारिक बुद्धिकी उपज है। सचाई यह है कि आज हम अपने वर्तमान अथवा विरासत में मिले अनुभवोंके खिलाफ कुछ सोचने में असमर्थ हैं तथापि इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है कि स्वतन्त्र भारत हमारे वर्तमान अनुभवोंकी परिधिसे बाहरकी ही कोई चीज होगा ? आलोचक चाहें तो कह सकते हैं कि अहिंसा और उसके द्वारा प्राप्त भारतकी स्वतन्त्रता केवल मेरे कल्पना जगत्की ही चीजें हैं। इसका मैं यही जवाब दूंगा कि अगर इस लड़ाईके बावजूद भारत गुलाम ही बना रहा अथवा यदि उसे हिंसाके बलपर तथाकथित स्वतन्त्रता ही मिली तो ईश्वर कृपासे मैं उस भारतको देखनेके लिए जीवित न रहूँगा। मैं यह कबूल करता हूँ कि हिंसात्मक तरीकेसे प्राप्त स्वराज्यमें अल्पसंख्यकोंको अपनी रक्षा आप ही करनी पड़ेगी। परन्तु इस सरकारकी कृपासे उन्हें इसके लिए विशेष परिश्रम नहीं करना होगा। क्योंकि वर्तमान सरकार तो एक जातिको दूसरी जाति या जातियोंसे भिड़ाकर ही अपना उल्लू सीधा करती रही है। मेरे आलोचकोंकी शंकाका कारण यही है कि वे या तो मेरे सिद्धान्तकी उपेक्षा कर देते हैं या उसमें उन्हें विश्वास नहीं है। लेकिन मैं तो अविचलित ही हूँ, क्योंकि अब अधिक समय तक वे उसकी उपेक्षा या उसमें अविश्वास नहीं कर सकेंगे। ७. मेरी मान्यताओंकी तथाकथित असंगतियां उन लोगोंके लिए असंगतियाँ नहीं हैं जो अहिंसाके फलितार्थीको बौद्धिक धरातलपर ही सही समझते हैं। ८. नमक-कर या शराब तथा मादक पदार्थोंकी बुराई अथवा अवांछनीय विदेशी वस्त्रोंके प्रतिरोध में तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, जिसपर शंका की जा सके। इसलिए मैं इस संघर्ष में हाथ बँटानेके लिए निस्संकोच भावसे सबको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग इसमें हाथ नहीं बेंटायेंगे, वे हर सम्भावित स्थितिमें बुराईका प्रतिरोध करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके एक अवसरसे अपने-आपको वंचित करेंगे। ९. मैंने अहिंसाके अतिरिक्त और कोई भी शर्त लगाये बिना सविनय अवज्ञा सिर्फ इसी सीधे-सादे और अनिवार्य कारणसे आरम्भ की है कि इस देशकी लड़ाई जो मोड़ ले रही थी उसमें तो खुद अहिंसाका ही वारा-न्यारा हो जानेका खतरा पैदा हो गया था। ऐसी आपदामय स्थितिकी आशंका हो और मैं चुपचाप बैठा रहूँ, यह मुझसे नहीं हो सकता था। मैंने तत्काल अनुभव किया कि अगर अहिंसा एक सक्रिय और बड़ी शक्ति है तो यह हिंसा के बीचसे भी अपना रास्ता बनाती हुई अन्तमें उसे पीछे छोड़ सकती है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> juoit01611j7dc3dwvn5afo50oqva7q 674858 674857 2026-08-29T05:56:08Z Kumari Arpana Sinha 2191 674858 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''}}}} है कि सच्ची ताकत और सम्पत्ति तो उन्हीं लोगोंके हाथोंमें होती है, जो शासनकी बागडोर थामनेवाले समूहसे बाहर होते हैं। हम लोग अपने देशमें सत्ताके पीछे इसलिए पागल बने हुए हैं कि हमारे देशवासी भोले हैं, और सहज ही उनका शोषण किया जा सकता है। आजकी सत्ता में ऊपरसे नीचेतक सड़ांध पैदा हो गई है। अहिंसात्मक शक्तिसे प्राप्त स्वतन्त्रता स्वभावतः ऐसी होगी कि वह इस तरहकी बुराइयोंको प्रायः मिटा देगी। अतएव ऊपर मैंने कौमी झगड़ोंको सुलझानेका जो तरीका बताया है, वह मेरी व्यावहारिक बुद्धिकी उपज है। सचाई यह है कि आज हम अपने वर्तमान अथवा विरासत में मिले अनुभवोंके खिलाफ कुछ सोचने में असमर्थ हैं तथापि इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है कि स्वतन्त्र भारत हमारे वर्तमान अनुभवोंकी परिधिसे बाहरकी ही कोई चीज होगा ? आलोचक चाहें तो कह सकते हैं कि अहिंसा और उसके द्वारा प्राप्त भारतकी स्वतन्त्रता केवल मेरे कल्पना जगत्की ही चीजें हैं। इसका मैं यही जवाब दूंगा कि अगर इस लड़ाईके बावजूद भारत गुलाम ही बना रहा अथवा यदि उसे हिंसाके बलपर तथाकथित स्वतन्त्रता ही मिली तो ईश्वर कृपासे मैं उस भारतको देखनेके लिए जीवित न रहूँगा। मैं यह कबूल करता हूँ कि हिंसात्मक तरीकेसे प्राप्त स्वराज्यमें अल्पसंख्यकोंको अपनी रक्षा आप ही करनी पड़ेगी। परन्तु इस सरकारकी कृपासे उन्हें इसके लिए विशेष परिश्रम नहीं करना होगा। क्योंकि वर्तमान सरकार तो एक जातिको दूसरी जाति या जातियोंसे भिड़ाकर ही अपना उल्लू सीधा करती रही है। मेरे आलोचकोंकी शंकाका कारण यही है कि वे या तो मेरे सिद्धान्तकी उपेक्षा कर देते हैं या उसमें उन्हें विश्वास नहीं है। लेकिन मैं तो अविचलित ही हूँ, क्योंकि अब अधिक समय तक वे उसकी उपेक्षा या उसमें अविश्वास नहीं कर सकेंगे। ७. मेरी मान्यताओंकी तथाकथित असंगतियां उन लोगोंके लिए असंगतियाँ नहीं हैं जो अहिंसाके फलितार्थीको बौद्धिक धरातलपर ही सही समझते हैं। ८. नमक-कर या शराब तथा मादक पदार्थोंकी बुराई अथवा अवांछनीय विदेशी वस्त्रोंके प्रतिरोध में तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, जिसपर शंका की जा सके। इसलिए मैं इस संघर्ष में हाथ बँटानेके लिए निस्संकोच भावसे सबको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग इसमें हाथ नहीं बेंटायेंगे, वे हर सम्भावित स्थितिमें बुराईका प्रतिरोध करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके एक अवसरसे अपने-आपको वंचित करेंगे। ९. मैंने अहिंसाके अतिरिक्त और कोई भी शर्त लगाये बिना सविनय अवज्ञा सिर्फ इसी सीधे-सादे और अनिवार्य कारणसे आरम्भ की है कि इस देशकी लड़ाई जो मोड़ ले रही थी उसमें तो खुद अहिंसाका ही वारा-न्यारा हो जानेका खतरा पैदा हो गया था। ऐसी आपदामय स्थितिकी आशंका हो और मैं चुपचाप बैठा रहूँ, यह मुझसे नहीं हो सकता था। मैंने तत्काल अनुभव किया कि अगर अहिंसा एक सक्रिय और बड़ी शक्ति है तो यह हिंसा के बीचसे भी अपना रास्ता बनाती हुई अन्तमें उसे पीछे छोड़ सकती है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> cgfnkrw6olmmjqo6eoo3sb1kazmg0yg 674859 674858 2026-08-29T06:11:17Z Kumari Arpana Sinha 2191 674859 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''}}}} है कि सच्ची ताकत और सम्पत्ति तो उन्हीं लोगोंके हाथोंमें होती है, जो शासनकी बागडोर थामनेवाले समूहसे बाहर होते हैं। हम लोग अपने देशमें सत्ताके पीछे इसलिए पागल बने हुए हैं कि हमारे देशवासी भोले हैं, और सहज ही उनका शोषण किया जा सकता है। आजकी सत्ता में ऊपरसे नीचेतक सड़ांध पैदा हो गई है। अहिंसात्मक शक्तिसे प्राप्त स्वतन्त्रता स्वभावतः ऐसी होगी कि वह इस तरहकी बुराइयोंको प्रायः मिटा देगी। अतएव ऊपर मैंने कौमी झगड़ोंको सुलझानेका जो तरीका बताया है, वह मेरी व्यावहारिक बुद्धिकी उपज है। सचाई यह है कि आज हम अपने वर्तमान अथवा विरासत में मिले अनुभवोंके खिलाफ कुछ सोचने में असमर्थ हैं तथापि इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है कि स्वतन्त्र भारत हमारे वर्तमान अनुभवोंकी परिधिसे बाहरकी ही कोई चीज होगा? आलोचक चाहें तो कह सकते हैं कि अहिंसा और उसके द्वारा प्राप्त भारतकी स्वतन्त्रता केवल मेरे कल्पना जगत्की ही चीजें हैं। इसका मैं यही जवाब दूंगा कि अगर इस लड़ाईके बावजूद भारत गुलाम ही बना रहा अथवा यदि उसे हिंसाके बलपर तथाकथित स्वतन्त्रता ही मिली तो ईश्वर कृपासे मैं उस भारतको देखनेके लिए जीवित न रहूँगा। मैं यह कबूल करता हूँ कि हिंसात्मक तरीकेसे प्राप्त स्वराज्यमें अल्पसंख्यकोंको अपनी रक्षा आप ही करनी पड़ेगी। परन्तु इस सरकारकी कृपासे उन्हें इसके लिए विशेष परिश्रम नहीं करना होगा। क्योंकि वर्तमान सरकार तो एक जातिको दूसरी जाति या जातियोंसे भिड़ाकर ही अपना उल्लू सीधा करती रही है। मेरे आलोचकोंकी शंकाका कारण यही है कि वे या तो मेरे सिद्धान्तकी उपेक्षा कर देते हैं या उसमें उन्हें विश्वास नहीं है। लेकिन मैं तो अविचलित ही हूँ, क्योंकि अब अधिक समय तक वे उसकी उपेक्षा या उसमें अविश्वास नहीं कर सकेंगे। ७. मेरी मान्यताओंकी तथाकथित असंगतियां उन लोगोंके लिए असंगतियाँ नहीं हैं जो अहिंसाके फलितार्थीको बौद्धिक धरातलपर ही सही समझते हैं। ८. नमक-कर या शराब तथा मादक पदार्थोंकी बुराई अथवा अवांछनीय विदेशी वस्त्रोंके प्रतिरोध में तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, जिसपर शंका की जा सके। इसलिए मैं इस संघर्ष में हाथ बँटानेके लिए निस्संकोच भावसे सबको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग इसमें हाथ नहीं बेंटायेंगे, वे हर सम्भावित स्थितिमें बुराईका प्रतिरोध करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके एक अवसरसे अपने-आपको वंचित करेंगे। ९. मैंने अहिंसाके अतिरिक्त और कोई भी शर्त लगाये बिना सविनय अवज्ञा सिर्फ इसी सीधे-सादे और अनिवार्य कारणसे आरम्भ की है कि इस देशकी लड़ाई जो मोड़ ले रही थी उसमें तो खुद अहिंसाका ही वारा-न्यारा हो जानेका खतरा पैदा हो गया था। ऐसी आपदामय स्थितिकी आशंका हो और मैं चुपचाप बैठा रहूँ, यह मुझसे नहीं हो सकता था। मैंने तत्काल अनुभव किया कि अगर अहिंसा एक सक्रिय और बड़ी शक्ति है तो यह हिंसा के बीचसे भी अपना रास्ता बनाती हुई अन्तमें उसे पीछे छोड़ सकती है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> 1eum23j86qfim30bin7q2fyc5htens3 674860 674859 2026-08-29T06:11:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 674860 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''}}}} है कि सच्ची ताकत और सम्पत्ति तो उन्हीं लोगोंके हाथोंमें होती है, जो शासनकी बागडोर थामनेवाले समूहसे बाहर होते हैं। हम लोग अपने देशमें सत्ताके पीछे इसलिए पागल बने हुए हैं कि हमारे देशवासी भोले हैं, और सहज ही उनका शोषण किया जा सकता है। आजकी सत्ता में ऊपरसे नीचेतक सड़ांध पैदा हो गई है। अहिंसात्मक शक्तिसे प्राप्त स्वतन्त्रता स्वभावतः ऐसी होगी कि वह इस तरहकी बुराइयोंको प्रायः मिटा देगी। अतएव ऊपर मैंने कौमी झगड़ोंको सुलझानेका जो तरीका बताया है, वह मेरी व्यावहारिक बुद्धिकी उपज है। सचाई यह है कि आज हम अपने वर्तमान अथवा विरासत में मिले अनुभवोंके खिलाफ कुछ सोचने में असमर्थ हैं तथापि इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है कि स्वतन्त्र भारत हमारे वर्तमान अनुभवोंकी परिधिसे बाहरकी ही कोई चीज होगा? आलोचक चाहें तो कह सकते हैं कि अहिंसा और उसके द्वारा प्राप्त भारतकी स्वतन्त्रता केवल मेरे कल्पना जगत्की ही चीजें हैं। इसका मैं यही जवाब दूंगा कि अगर इस लड़ाईके बावजूद भारत गुलाम ही बना रहा अथवा यदि उसे हिंसाके बलपर तथाकथित स्वतन्त्रता ही मिली तो ईश्वर कृपासे मैं उस भारतको देखनेके लिए जीवित न रहूँगा। मैं यह कबूल करता हूँ कि हिंसात्मक तरीकेसे प्राप्त स्वराज्यमें अल्पसंख्यकोंको अपनी रक्षा आप ही करनी पड़ेगी। परन्तु इस सरकारकी कृपासे उन्हें इसके लिए विशेष परिश्रम नहीं करना होगा। क्योंकि वर्तमान सरकार तो एक जातिको दूसरी जाति या जातियोंसे भिड़ाकर ही अपना उल्लू सीधा करती रही है। मेरे आलोचकोंकी शंकाका कारण यही है कि वे या तो मेरे सिद्धान्तकी उपेक्षा कर देते हैं या उसमें उन्हें विश्वास नहीं है। लेकिन मैं तो अविचलित ही हूँ, क्योंकि अब अधिक समय तक वे उसकी उपेक्षा या उसमें अविश्वास नहीं कर सकेंगे। ७. मेरी मान्यताओंकी तथाकथित असंगतियां उन लोगोंके लिए असंगतियाँ नहीं हैं जो अहिंसाके फलितार्थीको बौद्धिक धरातलपर ही सही समझते हैं। ८. नमक-कर या शराब तथा मादक पदार्थोंकी बुराई अथवा अवांछनीय विदेशी वस्त्रोंके प्रतिरोध में तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, जिसपर शंका की जा सके। इसलिए मैं इस संघर्ष में हाथ बँटानेके लिए निस्संकोच भावसे सबको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग इसमें हाथ नहीं बेंटायेंगे, वे हर सम्भावित स्थितिमें बुराईका प्रतिरोध करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके एक अवसरसे अपने-आपको वंचित करेंगे। ९. मैंने अहिंसाके अतिरिक्त और कोई भी शर्त लगाये बिना सविनय अवज्ञा सिर्फ इसी सीधे-सादे और अनिवार्य कारणसे आरम्भ की है कि इस देशकी लड़ाई जो मोड़ ले रही थी उसमें तो खुद अहिंसाका ही वारा-न्यारा हो जानेका खतरा पैदा हो गया था। ऐसी आपदामय स्थितिकी आशंका हो और मैं चुपचाप बैठा रहूँ, यह मुझसे नहीं हो सकता था। मैंने तत्काल अनुभव किया कि अगर अहिंसा एक सक्रिय और बड़ी शक्ति है तो यह हिंसा के बीचसे भी अपना रास्ता बनाती हुई अन्तमें उसे पीछे छोड़ सकती है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> 32sb4vpr5xdapecnkjuil9usm293v99 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६७ 250 197410 674862 669935 2026-08-29T06:45:53Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674862 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|larger|'''३०९. जन-आन्दोलन'''}}}} जन-आन्दोलनके अद्भुत कर्तृत्वसे प्रभावित होकर एक भाईने 'कॉमर्स ऐंड फाइनेन्स' में प्रकाशित सर मार्टिन कानवेके एक लेखका निम्नलिखित अंश भेजा है:१ '''कोई भी पीढ़ी आस्था और विकासके क्षेत्रमें जितना कुछ प्राप्त कर सकती है, वह पिछली पीढ़ियोंकी उपलब्धियोंको तुलनामें नगण्य ही होता है। यह बात मनुष्य द्वारा प्राप्त भौतिक समृद्धि और दुनियाकी कलात्मक निधिसे काफी स्पष्ट हो जाती है, लेकिन संसारने विचारोंकी दुनियामें जो कुछ प्राप्त करके दिखाया है, उससे तो यह बात और भी अधिक उजागर होती है। ये विचार ही उसकी सबसे मूल्यवान निधियां हैं, और इन विचारोंकी रक्षाके लिए संसार व्यक्तियोंका ऋणी नहीं है, चाहे वे कितने ही महान् क्यों न हों। इसके लिए वह ऋणी है जनसमुदायका। क्योंकि में एक बार फिर कहता हूँ कि विचारोंका निवास जनसमुदायके मानस होता है। वही इन्हें ग्रहण करता है। और वही मानवसमाजमें इसे धीरे-धीरे प्रचारित करता है। व्यक्ति भले ही किसी विचारका आविष्कार करे, लेकिन जबतक वह उसे जनमानसमें उतार नहीं देता तबतक वह निष्प्रभाव ही होता है और आविष्कर्त्ता के साथ ही दम तोड़ देता है। भीड़की असहिष्णुता, अहंकार, चंचलता, संयमका अभाव तथा उसके ऐसे ही उन अनेक दोषोंके लिए, जिनकी ओर हमारा ध्यान बहुत जल्दी जाता है, हम उसकी चाहे जितनी निन्दा करें, लेकिन इस सत्यसे इनकार नहीं कर सकते कि हमारे वैचारिक जीवनका आधार जन-समुदायपर ही है, उसीसे हमें जीवनमें कुछ करनेका उत्साह प्राप्त होता है, उसीसे हमें स्नेह और संक्षोभ, महिमा और महत्ताकी वे दीप्तियाँ प्राप्त होती है जो इस वास्तविकताको चरितार्थ करती हैं कि व्यक्तिका जीवन एक सुन्दर सुयोग है। जिस जन समुदायके सदस्य कभी एक स्थानपर सशरीर एकत्र न हुए हों, उस पूरे जन-समुदाय अथवा उसके एक अंशको भी यदि इस प्रकार एकत्र किया जा सके तो उसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। एक स्थानपर एकत्र ऐसे जनसमूहका देखनेवालों पर बड़ा आकर्षक प्रभाव पड़ता है। - वह आकर्षक प्रभाव जो हर जनसमूहमें मौजूद होता है। यदि यह जनसमूह स्वयं अपने को देख सके तो इसका जोश उबल पड़ेगा। जनसमूहके आकर्षण सिद्धान्तका एक और भी अधिक स्थूल एवं प्रत्यक्ष प्रयोग है जलूसोंका आयोजन। जलूस जितना ही बड़ा होगा, उसकी उपयोगिता १. इसके कुछ ही हिस्सोंका अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> ghyriarlbp7g9hd1q87mk9oh61dlmsi 674863 674862 2026-08-29T06:48:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 674863 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०९. जन-आन्दोलन'''}}}} जन-आन्दोलनके अद्भुत कर्तृत्वसे प्रभावित होकर एक भाईने 'कॉमर्स ऐंड फाइनेन्स' में प्रकाशित सर मार्टिन कानवेके एक लेखका निम्नलिखित अंश भेजा है:१ '''कोई भी पीढ़ी आस्था और विकासके क्षेत्रमें जितना कुछ प्राप्त कर सकती है, वह पिछली पीढ़ियोंकी उपलब्धियोंको तुलनामें नगण्य ही होता है। यह बात मनुष्य द्वारा प्राप्त भौतिक समृद्धि और दुनियाकी कलात्मक निधिसे काफी स्पष्ट हो जाती है, लेकिन संसारने विचारोंकी दुनियामें जो कुछ प्राप्त करके दिखाया है, उससे तो यह बात और भी अधिक उजागर होती है। ये विचार ही उसकी सबसे मूल्यवान निधियां हैं, और इन विचारोंकी रक्षाके लिए संसार व्यक्तियोंका ऋणी नहीं है, चाहे वे कितने ही महान् क्यों न हों। इसके लिए वह ऋणी है जनसमुदायका। क्योंकि में एक बार फिर कहता हूँ कि विचारोंका निवास जनसमुदायके मानस होता है। वही इन्हें ग्रहण करता है। और वही मानवसमाजमें इसे धीरे-धीरे प्रचारित करता है। व्यक्ति भले ही किसी विचारका आविष्कार करे, लेकिन जबतक वह उसे जनमानसमें उतार नहीं देता तबतक वह निष्प्रभाव ही होता है और आविष्कर्त्ता के साथ ही दम तोड़ देता है। भीड़की असहिष्णुता, अहंकार, चंचलता, संयमका अभाव तथा उसके ऐसे ही उन अनेक दोषोंके लिए, जिनकी ओर हमारा ध्यान बहुत जल्दी जाता है, हम उसकी चाहे जितनी निन्दा करें, लेकिन इस सत्यसे इनकार नहीं कर सकते कि हमारे वैचारिक जीवनका आधार जन-समुदायपर ही है, उसीसे हमें जीवनमें कुछ करनेका उत्साह प्राप्त होता है, उसीसे हमें स्नेह और संक्षोभ, महिमा और महत्ताकी वे दीप्तियाँ प्राप्त होती है जो इस वास्तविकताको चरितार्थ करती हैं कि व्यक्तिका जीवन एक सुन्दर सुयोग है।''' जिस जन-समुदायके सदस्य कभी एक स्थानपर सशरीर एकत्र न हुए हों, उस पूरे जन-समुदाय अथवा उसके एक अंशको भी यदि इस प्रकार एकत्र किया जा सके तो उसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। एक स्थानपर एकत्र ऐसे जनसमूहका देखनेवालों पर बड़ा आकर्षक प्रभाव पड़ता है। - वह आकर्षक प्रभाव जो हर जनसमूहमें मौजूद होता है। यदि यह जनसमूह स्वयं अपने को देख सके तो इसका जोश उबल पड़ेगा। ... '''जनसमूहके आकर्षण सिद्धान्तका एक और भी अधिक स्थूल एवं प्रत्यक्ष प्रयोग है जलूसोंका आयोजन। जलूस जितना ही बड़ा होगा, उसकी उपयोगिता''' <small>१. इसके कुछ ही हिस्सोंका अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है।<small><noinclude></noinclude> t08t3r2dc9eii2wnc2v5v0fkvtizx0s 674864 674863 2026-08-29T06:49:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 674864 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०९. जन-आन्दोलन'''}}}} जन-आन्दोलनके अद्भुत कर्तृत्वसे प्रभावित होकर एक भाईने 'कॉमर्स ऐंड फाइनेन्स' में प्रकाशित सर मार्टिन कानवेके एक लेखका निम्नलिखित अंश भेजा है:१ '''कोई भी पीढ़ी आस्था और विकासके क्षेत्रमें जितना कुछ प्राप्त कर सकती है, वह पिछली पीढ़ियोंकी उपलब्धियोंको तुलनामें नगण्य ही होता है। यह बात मनुष्य द्वारा प्राप्त भौतिक समृद्धि और दुनियाकी कलात्मक निधिसे काफी स्पष्ट हो जाती है, लेकिन संसारने विचारोंकी दुनियामें जो कुछ प्राप्त करके दिखाया है, उससे तो यह बात और भी अधिक उजागर होती है। ये विचार ही उसकी सबसे मूल्यवान निधियां हैं, और इन विचारोंकी रक्षाके लिए संसार व्यक्तियोंका ऋणी नहीं है, चाहे वे कितने ही महान् क्यों न हों। इसके लिए वह ऋणी है जनसमुदायका। क्योंकि में एक बार फिर कहता हूँ कि विचारोंका निवास जनसमुदायके मानस होता है। वही इन्हें ग्रहण करता है। और वही मानवसमाजमें इसे धीरे-धीरे प्रचारित करता है। व्यक्ति भले ही किसी विचारका आविष्कार करे, लेकिन जबतक वह उसे जनमानसमें उतार नहीं देता तबतक वह निष्प्रभाव ही होता है और आविष्कर्त्ता के साथ ही दम तोड़ देता है। भीड़की असहिष्णुता, अहंकार, चंचलता, संयमका अभाव तथा उसके ऐसे ही उन अनेक दोषोंके लिए, जिनकी ओर हमारा ध्यान बहुत जल्दी जाता है, हम उसकी चाहे जितनी निन्दा करें, लेकिन इस सत्यसे इनकार नहीं कर सकते कि हमारे वैचारिक जीवनका आधार जन-समुदायपर ही है, उसीसे हमें जीवनमें कुछ करनेका उत्साह प्राप्त होता है, उसीसे हमें स्नेह और संक्षोभ, महिमा और महत्ताकी वे दीप्तियाँ प्राप्त होती है जो इस वास्तविकताको चरितार्थ करती हैं कि व्यक्तिका जीवन एक सुन्दर सुयोग है।''' '''जिस जन-समुदायके सदस्य कभी एक स्थानपर सशरीर एकत्र न हुए हों, उस पूरे जन-समुदाय अथवा उसके एक अंशको भी यदि इस प्रकार एकत्र किया जा सके तो उसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। एक स्थानपर एकत्र ऐसे जनसमूहका देखनेवालों पर बड़ा आकर्षक प्रभाव पड़ता है। - वह आकर्षक प्रभाव जो हर जनसमूहमें मौजूद होता है। यदि यह जनसमूह स्वयं अपने को देख सके तो इसका जोश उबल पड़ेगा। ...''' '''जनसमूहके आकर्षण सिद्धान्तका एक और भी अधिक स्थूल एवं प्रत्यक्ष प्रयोग है जलूसोंका आयोजन। जलूस जितना ही बड़ा होगा, उसकी उपयोगिता''' <small>१. इसके कुछ ही हिस्सोंका अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है।<small><noinclude></noinclude> ksf0o4w8iwu5xlc2jh7ls92vfr2e47t पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६८ 250 197411 674866 669936 2026-08-29T07:16:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674866 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{C|{{३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>उतनी ही अधिक होगी और अलग से देखनेवालों के लिए उसका आकर्षण उतना ही अधिक होगा, उनपर उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा पड़ेगा... इंग्लैंड के किसी भी आन्दोलनकी सफलताकी शुरुआत उस दिनसे होती है जिस दिन अलबर्ट हॉल उस आन्दोलनके हिमायतियोंकी गरजती चीखती भीड़से भर जाता है। और यह तो एक प्रकट तथ्य है कि प्रचारकी दृष्टिसे जितनी फलदायी अलबर्ट हॉलमें सफलतापूर्वक और उत्साहके साथ आयोजित और सम्पन्न एक सभा होती है, उतनी फलदायी मामूली हॉलों और गिरजाघरोंमें आयोजित छोटी-छोटी बीस सभाएं भी नहीं हो सकतीं। इस समय इस लेखकी उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह अहिंसाकी प्रगतिका अनुमान लगाने में सहायता देता है। कोई विचार चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सफल हुआ तभी माना जायेगा जब वह जनमानस में अपना स्थान बना ले। भीड़ जो कुछ करती है, वह सब बराबर अच्छा ही हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अहिंसा तो अनिवार्यतः व्यक्तिका धर्म है, वह भी ठीक नहीं है। इसके विपरीत अहिंसा में किसीकी आस्थाकी सचाईका मापदण्ड यह है कि उसे जनसाधारण किस सीमा तक स्वीकार करता है। यदि अहिंसा जनसाधारणको प्रभावित नहीं कर सकती तो व्यक्तियों द्वारा उसकी उपासना करना बिलकुल बेकार है। अहिंसाको में ईश्वरकी सबसे बड़ी देन मानता हूँ। ईश्वरकी सारी देनपर उसकी सृष्टिके सभी प्राणियोंका समान अधिकार है। उसपर संसार त्यागी संन्यासियों और संन्यासिनियोंका एकाधिकार नहीं होता। वे अहिंसा में विशेषज्ञता भले ही प्राप्त कर लें, वे भले ही हमें इसके आश्चर्यजनक प्रभावोंसे अवगत करायें, लेकिन अगर उनकी खोज और उनका दावा सही है तो उसे जन-ग्राह्य भी होना चाहिए। यदि सत्य पर कुछ थोड़े-से लोगोंकी इजारेदारी नहीं हो सकती तो अहिंसा पर ही, जो सत्यका ही दूसरा रूप है, क्यों होनी चाहिए? मैंने दुनियाके धर्मग्रन्थोंका अध्ययन बड़ी श्रद्धापूर्वक किया है और उस अध्ययनके आधारपर मैं इसी निष्कर्षपर पहुंचा हूँ कि इन सभी धर्मग्रन्थोंमें इस बातके जोरदार और स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं कि अहिंसाका पालन सभी कर सकते हैं और सो भी अलग-अलग व्यक्तियोंके रूपमें ही नहीं, बल्कि एक समग्र समुदायके रूपमें भी सम्पूर्ण विनम्रताके साथ मैंने अकसर ऐसा अनुभव किया है कि चूंकि मुझे अपना कोई मतलब नहीं साधना है, इसलिए मैं हिन्दुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य धर्मावलम्बियों के धर्मग्रन्थोंकी औरोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सही व्याख्या करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस विनम्रतापूर्ण दावेके लिए सनातनी, ईसाई और मुसलमान भाई मुझे क्षमा करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> lmh29gh175qxiu5n6ozryuxfeef3rta 674867 674866 2026-08-29T07:17:34Z Kumari Arpana Sinha 2191 674867 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}} '''उतनी ही अधिक होगी और अलग से देखनेवालों के लिए उसका आकर्षण उतना ही अधिक होगा, उनपर उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा पड़ेगा... इंग्लैंड के किसी भी आन्दोलनकी सफलताकी शुरुआत उस दिनसे होती है जिस दिन अलबर्ट हॉल उस आन्दोलनके हिमायतियोंकी गरजती चीखती भीड़से भर जाता है। और यह तो एक प्रकट तथ्य है कि प्रचारकी दृष्टिसे जितनी फलदायी अलबर्ट हॉलमें सफलतापूर्वक और उत्साहके साथ आयोजित और सम्पन्न एक सभा होती है, उतनी फलदायी मामूली हॉलों और गिरजाघरोंमें आयोजित छोटी-छोटी बीस सभाएं भी नहीं हो सकतीं।''' इस समय इस लेखकी उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह अहिंसाकी प्रगतिका अनुमान लगाने में सहायता देता है। कोई विचार चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सफल हुआ तभी माना जायेगा जब वह जनमानस में अपना स्थान बना ले। भीड़ जो कुछ करती है, वह सब बराबर अच्छा ही हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अहिंसा तो अनिवार्यतः व्यक्तिका धर्म है, वह भी ठीक नहीं है। इसके विपरीत अहिंसा में किसीकी आस्थाकी सचाईका मापदण्ड यह है कि उसे जनसाधारण किस सीमा तक स्वीकार करता है। यदि अहिंसा जनसाधारणको प्रभावित नहीं कर सकती तो व्यक्तियों द्वारा उसकी उपासना करना बिलकुल बेकार है। अहिंसाको में ईश्वरकी सबसे बड़ी देन मानता हूँ। ईश्वरकी सारी देनपर उसकी सृष्टिके सभी प्राणियोंका समान अधिकार है। उसपर संसार त्यागी संन्यासियों और संन्यासिनियोंका एकाधिकार नहीं होता। वे अहिंसा में विशेषज्ञता भले ही प्राप्त कर लें, वे भले ही हमें इसके आश्चर्यजनक प्रभावोंसे अवगत करायें, लेकिन अगर उनकी खोज और उनका दावा सही है तो उसे जन-ग्राह्य भी होना चाहिए। यदि सत्य पर कुछ थोड़े-से लोगोंकी इजारेदारी नहीं हो सकती तो अहिंसा पर ही, जो सत्यका ही दूसरा रूप है, क्यों होनी चाहिए? मैंने दुनियाके धर्मग्रन्थोंका अध्ययन बड़ी श्रद्धापूर्वक किया है और उस अध्ययनके आधारपर मैं इसी निष्कर्षपर पहुंचा हूँ कि इन सभी धर्मग्रन्थोंमें इस बातके जोरदार और स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं कि अहिंसाका पालन सभी कर सकते हैं और सो भी अलग-अलग व्यक्तियोंके रूपमें ही नहीं, बल्कि एक समग्र समुदायके रूपमें भी सम्पूर्ण विनम्रताके साथ मैंने अकसर ऐसा अनुभव किया है कि चूंकि मुझे अपना कोई मतलब नहीं साधना है, इसलिए मैं हिन्दुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य धर्मावलम्बियों के धर्मग्रन्थोंकी औरोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सही व्याख्या करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस विनम्रतापूर्ण दावेके लिए सनातनी, ईसाई और मुसलमान भाई मुझे क्षमा करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> pun78bhu6hnobw03him2cgzrpohs6ik 674868 674867 2026-08-29T07:17:56Z Kumari Arpana Sinha 2191 674868 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}} '''उतनी ही अधिक होगी और अलग से देखनेवालों के लिए उसका आकर्षण उतना ही अधिक होगा, उनपर उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा पड़ेगा... इंग्लैंड के किसी भी आन्दोलनकी सफलताकी शुरुआत उस दिनसे होती है जिस दिन अलबर्ट हॉल उस आन्दोलनके हिमायतियोंकी गरजती चीखती भीड़से भर जाता है। और यह तो एक प्रकट तथ्य है कि प्रचारकी दृष्टिसे जितनी फलदायी अलबर्ट हॉलमें सफलतापूर्वक और उत्साहके साथ आयोजित और सम्पन्न एक सभा होती है, उतनी फलदायी मामूली हॉलों और गिरजाघरोंमें आयोजित छोटी-छोटी बीस सभाएं भी नहीं हो सकतीं।''' इस समय इस लेखकी उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह अहिंसाकी प्रगतिका अनुमान लगाने में सहायता देता है। कोई विचार चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सफल हुआ तभी माना जायेगा जब वह जनमानस में अपना स्थान बना ले। भीड़ जो कुछ करती है, वह सब बराबर अच्छा ही हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अहिंसा तो अनिवार्यतः व्यक्तिका धर्म है, वह भी ठीक नहीं है। इसके विपरीत अहिंसा में किसीकी आस्थाकी सचाईका मापदण्ड यह है कि उसे जनसाधारण किस सीमा तक स्वीकार करता है। यदि अहिंसा जनसाधारणको प्रभावित नहीं कर सकती तो व्यक्तियों द्वारा उसकी उपासना करना बिलकुल बेकार है। अहिंसाको में ईश्वरकी सबसे बड़ी देन मानता हूँ। ईश्वरकी सारी देनपर उसकी सृष्टिके सभी प्राणियोंका समान अधिकार है। उसपर संसार त्यागी संन्यासियों और संन्यासिनियोंका एकाधिकार नहीं होता। वे अहिंसा में विशेषज्ञता भले ही प्राप्त कर लें, वे भले ही हमें इसके आश्चर्यजनक प्रभावोंसे अवगत करायें, लेकिन अगर उनकी खोज और उनका दावा सही है तो उसे जन-ग्राह्य भी होना चाहिए। यदि सत्य पर कुछ थोड़े-से लोगोंकी इजारेदारी नहीं हो सकती तो अहिंसा पर ही, जो सत्यका ही दूसरा रूप है, क्यों होनी चाहिए? मैंने दुनियाके धर्मग्रन्थोंका अध्ययन बड़ी श्रद्धापूर्वक किया है और उस अध्ययनके आधारपर मैं इसी निष्कर्षपर पहुंचा हूँ कि इन सभी धर्मग्रन्थोंमें इस बातके जोरदार और स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं कि अहिंसाका पालन सभी कर सकते हैं और सो भी अलग-अलग व्यक्तियोंके रूपमें ही नहीं, बल्कि एक समग्र समुदायके रूपमें भी सम्पूर्ण विनम्रताके साथ मैंने अकसर ऐसा अनुभव किया है कि चूंकि मुझे अपना कोई मतलब नहीं साधना है, इसलिए मैं हिन्दुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य धर्मावलम्बियों के धर्मग्रन्थोंकी औरोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सही व्याख्या करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस विनम्रतापूर्ण दावेके लिए सनातनी, ईसाई और मुसलमान भाई मुझे क्षमा करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> r8a19dl1b1igllbqgcct37is8a0blxh 674869 674868 2026-08-29T07:19:51Z Kumari Arpana Sinha 2191 674869 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}} '''उतनी ही अधिक होगी और अलग से देखनेवालों के लिए उसका आकर्षण उतना ही अधिक होगा, उनपर उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा पड़ेगा... इंग्लैंड के किसी भी आन्दोलनकी सफलताकी शुरुआत उस दिनसे होती है जिस दिन अलबर्ट हॉल उस आन्दोलनके हिमायतियोंकी गरजती चीखती भीड़से भर जाता है। और यह तो एक प्रकट तथ्य है कि प्रचारकी दृष्टिसे जितनी फलदायी अलबर्ट हॉलमें सफलतापूर्वक और उत्साहके साथ आयोजित और सम्पन्न एक सभा होती है, उतनी फलदायी मामूली हॉलों और गिरजाघरोंमें आयोजित छोटी-छोटी बीस सभाएं भी नहीं हो सकतीं।''' इस समय इस लेखकी उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह अहिंसाकी प्रगतिका अनुमान लगाने में सहायता देता है। कोई विचार चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सफल हुआ तभी माना जायेगा जब वह जनमानस में अपना स्थान बना ले। भीड़ जो कुछ करती है, वह सब बराबर अच्छा ही हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अहिंसा तो अनिवार्यतः व्यक्तिका धर्म है, वह भी ठीक नहीं है। इसके विपरीत अहिंसा में किसीकी आस्थाकी सचाईका मापदण्ड यह है कि उसे जनसाधारण किस सीमा तक स्वीकार करता है। यदि अहिंसा जनसाधारणको प्रभावित नहीं कर सकती तो व्यक्तियों द्वारा उसकी उपासना करना बिलकुल बेकार है। अहिंसाको में ईश्वरकी सबसे बड़ी देन मानता हूँ। ईश्वरकी सारी देनपर उसकी सृष्टिके सभी प्राणियोंका समान अधिकार है। उसपर संसार त्यागी संन्यासियों और संन्यासिनियोंका एकाधिकार नहीं होता। वे अहिंसा में विशेषज्ञता भले ही प्राप्त कर लें, वे भले ही हमें इसके आश्चर्यजनक प्रभावोंसे अवगत करायें, लेकिन अगर उनकी खोज और उनका दावा सही है तो उसे जन-ग्राह्य भी होना चाहिए। यदि सत्य पर कुछ थोड़े-से लोगोंकी इजारेदारी नहीं हो सकती तो अहिंसा पर ही, जो सत्यका ही दूसरा रूप है, क्यों होनी चाहिए? मैंने दुनियाके धर्मग्रन्थोंका अध्ययन बड़ी श्रद्धापूर्वक किया है और उस अध्ययनके आधारपर मैं इसी निष्कर्षपर पहुंचा हूँ कि इन सभी धर्मग्रन्थोंमें इस बातके जोरदार और स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं कि अहिंसाका पालन सभी कर सकते हैं और सो भी अलग-अलग व्यक्तियोंके रूपमें ही नहीं, बल्कि एक समग्र समुदायके रूपमें भी सम्पूर्ण विनम्रताके साथ मैंने अकसर ऐसा अनुभव किया है कि चूंकि मुझे अपना कोई मतलब नहीं साधना है, इसलिए मैं हिन्दुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य धर्मावलम्बियों के धर्मग्रन्थोंकी औरोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सही व्याख्या करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस विनम्रतापूर्ण दावेके लिए सनातनी, ईसाई और मुसलमान भाई मुझे क्षमा करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> hoqsz4z8cpii6misctrrqch5z205gb5 674872 674869 2026-08-29T07:21:58Z Kumari Arpana Sinha 2191 674872 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''उतनी ही अधिक होगी और अलग से देखनेवालों के लिए उसका आकर्षण उतना ही अधिक होगा, उनपर उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा पड़ेगा... इंग्लैंड के किसी भी आन्दोलनकी सफलताकी शुरुआत उस दिनसे होती है जिस दिन अलबर्ट हॉल उस आन्दोलनके हिमायतियोंकी गरजती चीखती भीड़से भर जाता है। और यह तो एक प्रकट तथ्य है कि प्रचारकी दृष्टिसे जितनी फलदायी अलबर्ट हॉलमें सफलतापूर्वक और उत्साहके साथ आयोजित और सम्पन्न एक सभा होती है, उतनी फलदायी मामूली हॉलों और गिरजाघरोंमें आयोजित छोटी-छोटी बीस सभाएं भी नहीं हो सकतीं।''' इस समय इस लेखकी उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह अहिंसाकी प्रगतिका अनुमान लगाने में सहायता देता है। कोई विचार चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सफल हुआ तभी माना जायेगा जब वह जनमानस में अपना स्थान बना ले। भीड़ जो कुछ करती है, वह सब बराबर अच्छा ही हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अहिंसा तो अनिवार्यतः व्यक्तिका धर्म है, वह भी ठीक नहीं है। इसके विपरीत अहिंसा में किसीकी आस्थाकी सचाईका मापदण्ड यह है कि उसे जनसाधारण किस सीमा तक स्वीकार करता है। यदि अहिंसा जनसाधारणको प्रभावित नहीं कर सकती तो व्यक्तियों द्वारा उसकी उपासना करना बिलकुल बेकार है। अहिंसाको में ईश्वरकी सबसे बड़ी देन मानता हूँ। ईश्वरकी सारी देनपर उसकी सृष्टिके सभी प्राणियोंका समान अधिकार है। उसपर संसार त्यागी संन्यासियों और संन्यासिनियोंका एकाधिकार नहीं होता। वे अहिंसा में विशेषज्ञता भले ही प्राप्त कर लें, वे भले ही हमें इसके आश्चर्यजनक प्रभावोंसे अवगत करायें, लेकिन अगर उनकी खोज और उनका दावा सही है तो उसे जन-ग्राह्य भी होना चाहिए। यदि सत्य पर कुछ थोड़े-से लोगोंकी इजारेदारी नहीं हो सकती तो अहिंसा पर ही, जो सत्यका ही दूसरा रूप है, क्यों होनी चाहिए? मैंने दुनियाके धर्मग्रन्थोंका अध्ययन बड़ी श्रद्धापूर्वक किया है और उस अध्ययनके आधारपर मैं इसी निष्कर्षपर पहुंचा हूँ कि इन सभी धर्मग्रन्थोंमें इस बातके जोरदार और स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं कि अहिंसाका पालन सभी कर सकते हैं और सो भी अलग-अलग व्यक्तियोंके रूपमें ही नहीं, बल्कि एक समग्र समुदायके रूपमें भी सम्पूर्ण विनम्रताके साथ मैंने अकसर ऐसा अनुभव किया है कि चूंकि मुझे अपना कोई मतलब नहीं साधना है, इसलिए मैं हिन्दुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य धर्मावलम्बियों के धर्मग्रन्थोंकी औरोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सही व्याख्या करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस विनम्रतापूर्ण दावेके लिए सनातनी, ईसाई और मुसलमान भाई मुझे क्षमा करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> jbafdxhnf8wjy8e16apau84vcvfxf8e पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६९ 250 197412 674877 669937 2026-08-29T07:30:33Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674877 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|larger|३१०. खरा हिसाब रखनेकी जरूरत}}}} सीधे-सादे लोग नमक बेचनेवाले अथवा अन्य प्रकारसे चन्दा करनेवाले स्वयंसेवकोंकी झोलियोंमें अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसा, रुपया अथवा नोट डाल रहे हैं। जिन स्वयंसेवकोंको चन्दा इकट्ठा करने या उचितसे अधिक मूल्यपर नमक बेचनेका अधिकार न दिया गया हो, वे न तो चन्दा इकट्ठा करें और न इस तरह नमक ही बेचें। हिसाब ठीक-ठीक रखा जाये और उसे जब-तब प्रकाशित भी किया जाये। हिसाब किताबोंकी जांच हर हफ्ते लेखा-परीक्षकसे कराई जाये। यदि ऐसे धनाढ्य लोग, जिनकी ईमानदारी अच्छी तरहसे देखी-परखी हो, चन्दोंकी राशियोंके कोषाध्यक्ष बन जायें और कांग्रेसी स्वयंसेवकोंके साथ पूरा सहयोग करते हुए चन्दा इकट्ठा करें तो बहुत अच्छा हो। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को बड़ी तेजीसे गिरफ्तार किया जा रहा है और हो सकता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति आ जाये कि स्थानीय संस्थाओंके लिए चन्देका पैसा संभालना और उसका ठीक हिसाब रखना मुश्किल पड़ जाये। अभी तो स्थिति यह है कि जनताने इस आन्दोलनके खर्चका बोझ अपने सिर उठा लिया है। तो अब हमें इस कार्यको दायित्वको भावनाके साथ और व्यवस्थित ढंगसे सम्पन्न करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] यंग इंडिया, २४-४-१९१० {{C|{{larger|३११. शराबकी दुकानोंपर धरना}}}} एक पारसी भाई लिखते हैं१: यदि शरावके व्यापार से ज्यादा लाभ न हो तो पारसी इसे तुरन्त छोड़ देंगे और आपके सभी कार्यों में हाथ बँटाने लगेंगे। क्या आप कोई ऐसा उपाय निकाल सकते हैं जिससे शराब की दुकानोंकी आमदनी बहुत मामूली स्तर पर आ जाये? यह एक जाना-माना तथ्य है कि ये दुकानदार दो तरहसे इतना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। एक तो यह है कि ये नापमें जितनी चाहिए उससे कम शराब देते हैं, और दूसरे, ये मिलावट करते हैं। इस सबके लिए ये आबकारी विभाग के कर्मचारियोंको रिश्वत देकर मिलाये रहते हैं। विचौलियोंके इस मुनाफेको रोकनेका जो एकमात्र उपाय में सुझा सकता हूँ, वह यह है कि सरकारसे इन्दौर और ग्वालियर राज्योंकी तरह 'बोतल-प्रणाली ' शुरू करवाने का आग्रह किया जाये। <small>१. इसके कुछ अंशका ही अनुवाद दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> hreyxubnzwr122hu7891lkj2b2b3wdj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४६ 250 197845 674814 670575 2026-08-28T17:25:25Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674814 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२९४. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरेको'''}}}} {{right|११ अक्टूबर १९३०}} {{left|चि॰ पण्डितजी,}} तुम्हारा पत्र मिला। आशा है अब बुखार बिलकुल चला गया होगा। 'रामायण' प्रवचनके द्वारा ग्रामवासियोंके सम्पर्क में आनेका तुम्हारा सुझाव मुझे पसन्द है। किन्तु सम्पर्क में आनेको ही अपना उद्देश्य मत बना लेना। 'रामायण' तो इसी उद्देश्यसे बाँचनी है कि लोगोंको उपदेश मिले और ऐसा करते हुए यदि उनके सम्पर्क में आनेका अवसर मिले तो ठीक है। अर्थात् यह निश्चय करके तुम्हें 'रामायण' बाँचना आरम्भ करना चाहिए कि तुम उसे बीचमें बन्द नहीं करोगे या फिर लोगोंके सम्पर्क में आनेके लिए जैसे तुम अन्य बहुतसे काम करते हो वैसे ही बीच-बीचमें 'रामायण' बाँचोगे? इन दोनोंके भेदको समझ लेना गोखलेके संस्मरण में शायद ही लिख पाऊँ। चरखेकी लगन मुझे और कुछ करने ही नहीं देती। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २४०) की फोटो-नकलसे। सौजन्य: लक्ष्मीबाई खरे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२९५. पत्र: प्रभावतीको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ११ अक्टूबर १९३०}} {{left|चि॰ प्रभावती,}} तेरा पत्र मिला। मैंने पटनाके पते पर जो पोस्टकार्ड भेजा था, लगता है वह तुझे नहीं मिला क्योंकि उसमें मैंने तुझे एक तार भेजनेको कहा था; तार नहीं मिला। अब तो पत्र परसे पता चलता है कि तेरी सासका देहान्त हो गया है और तू तथा जयप्रकाश बहुत घबरा गये हो। जो मृत्यु छोटे, बड़े, सबके साथ लगी है, उससे घबराना कैसा? और फिर सासजी बीमार थीं। वे तो दुःखसे मुक्ति पा गई। अतएव पीछे रहनेवाले लोगोंका सन्ताप तो स्वार्थपूर्ण है। कर्तव्य तो अब यह है कि तू जल्द ही स्वस्थ हो जा। अभी तो रोगसे मुक्त हो गई नहीं जान पड़ती। अब तू मुझे सीधे पत्र लिख सकती है। आश्रमकी मारफत तो भेजती ही रहना। तुम सबको भगवान धीरज दे। मेरी तबीयत अच्छी है। वजन १०४ है, यह अच्छा कहा जा सकता है। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३३७२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> inqvtjgy9n68vafhaeyc5lzdzi6ytk5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४७ 250 197846 674815 670576 2026-08-28T17:26:30Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674815 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|''२९६. पत्र: मोतीबहन चोकसीको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १२ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ मोतीबहन,}} बहुत इन्तजार करवानेके बाद आखिरकार तुमने पत्र लिखा। जितने बच्चोंको तुम्हारी देखरेखमें रखा जाये उन सबकी तुम अपना ही मानकर चलना 'गीताजी' के कुछ अध्याय कण्ठस्थ कर लेनेसे तुम्हें अधिकाधिक शान्ति अनुभव होने लगेगी। एक-एक श्लोक करके भी कण्ठस्थ कर सकती हो। लोकका अर्थ भली-भाँति समझ लेने और उसका उच्चारण शुद्ध हो जानेके बाद उसे याद करना। विट्ठल, महावीर आदिको यह सब आता है। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३७४६) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२९७. पत्र: महावीर गिरिको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ११ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ महावीर,}} तेरा पत्र मिला। सिद्धपुरमें तेरे साथ और कौन है? तू जहाँ भी रहे वहाँसे मुझे पत्र तो लिखते ही रहना और छोटी-मोटी सभी खबरें देते रहना। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ६२१९) की फोटो-नकलसे। {{dhr|7em}} {{left|४४–१४}}<noinclude></noinclude> 7wt4sd3zju6xkr3i4s46te7mn7fkry6 674817 674815 2026-08-28T17:26:56Z रेखा साव 5914 674817 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२९६. पत्र: मोतीबहन चोकसीको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १२ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ मोतीबहन,}} बहुत इन्तजार करवानेके बाद आखिरकार तुमने पत्र लिखा। जितने बच्चोंको तुम्हारी देखरेखमें रखा जाये उन सबकी तुम अपना ही मानकर चलना 'गीताजी' के कुछ अध्याय कण्ठस्थ कर लेनेसे तुम्हें अधिकाधिक शान्ति अनुभव होने लगेगी। एक-एक श्लोक करके भी कण्ठस्थ कर सकती हो। लोकका अर्थ भली-भाँति समझ लेने और उसका उच्चारण शुद्ध हो जानेके बाद उसे याद करना। विट्ठल, महावीर आदिको यह सब आता है। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३७४६) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२९७. पत्र: महावीर गिरिको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ११ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ महावीर,}} तेरा पत्र मिला। सिद्धपुरमें तेरे साथ और कौन है? 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