विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.17 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५६ 250 102946 674962 368276 2026-08-29T16:01:35Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674962 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Multicol}} {{Rh|५६|'''कम्बोज'''}} किन्तु कोई-कोई खम्भातको कम्बोज कहता है। रघुवंशमें देखते—महाराज रघुने पारसीकों, सिन्धुनदतीरवासियों और हूणोंको हरा कम्बोजदेशीय राजाओंको जीता था। काम्बोजोंने उनके निकट प्रणत हो उत्कृष्ट अश्व और राशीकृत सुवर्ण उपढौकन-स्वरूप प्रदान किया। फिर रघु अश्वके साहाय्यसे गौरीगुरु पर्वतपर चढ़ गये। (रघुवंश ४ सर्ग) रघुवंशकी उक्त वर्णनासे समझ पड़ा—कम्बोज देश सिन्धुनदके तीर और गौरीगुरु पर्वतके निकट रहा। 'मार्कण्डेयपुराण', गौरग्रीव और महाभारतमें सुवास्तु नदीके साथ गौरीनदीका उल्लेख मिलता है। यह सुवास्तु और गौरीनदी वर्तमान पंजाबके उत्तरस्थ स्वात प्रदेशके उत्तर अवस्थित हैं। सुतरां रघुवंशका मत मानते वर्तमान सिन्धु और लन्दई नदीका उत्तरांश पूर्वकालमें कम्बोज नामक जनपद रहा। पहले कम्बोजवासी संस्कृत भाषा बोलते थे। (निरुक्त २।१।४) सो देखो। {{outdent|(वि०) ४ कम्बोजदेशवासी, खम्भातका रहनेवाला।}} {{outdent|'''कम्बोज (कम्बोडिया)'''—जनपदविशेष, एक मुल्क। यह अक्षा० ८°४७' से १५°३०' पर्यन्त विस्तृत है। इसके उत्तर लेयस देश, पूर्व कोचिन-चीन, दक्षिणमें—}} {{Rule}} :*''"विनीताध्वश्रमास्तस्य सिन्धुतीरविचेष्टनैः ।<br> दुधुवुर्वाजिनः स्कन्धाँल्लग्नकुङ्कुमकेसरान् ॥<br> काम्बोजाः समरे सोढुं तस्य वीर्यमनीश्वराः <br> गजारुणशिरोभ्रष्टै रुन्मुखाः प्रणिपत्य तैः ॥<br> तेषां सदश्वभूयिष्ठास्तुङ्गा द्रविणराशयः ।<br />उपदा विविशुः शश्वन्नोत्सेकाः कोशलेश्वरम् ॥<br />ततो गौरीगुरुं शैलमारुरोहाश्वसाधनः ॥"'' (रघु० ४ सर्ग) † मल्लिनाथने 'गौरीगुरु'का अर्थ हिमालय लगाया है। किन्तु इस स्थानपर गौरीगुरु एक स्वतन्त्र पर्वत समझ पड़ता है। सामान्य प्राचीन भौगोलिक टॉलेमीने 'गोरिया' (Goryaia) नामक एक जनपदका उल्लेख किया है। (Ptolemy, Bk. VII, ch. 1.) इसी जनपदके मध्य गौरीनदी प्रवाहित है। यह नदी वर्तमान काबुल नदीमें जा गिरी है। फिर उसे ऋक्संहिता और महाभारतमें भी गौरीनदी ही लिखा है। उसके चारों ओर पर्वतमाला खड़ी है। कालिदासने उसी पर्वतमालाको 'गौरीगुरु' कहा है। विशेषतः इस पर्वतसे ही गौरीनदी निकली है। इस पार्वतीय प्रदेशको ही टॉलेमीने 'गोरिया' बताया। {{multicol-break}} पहले स्वाधीन रहते समय कम्बोज राज्य बहुत दूर श्यामोपसागर एवं चीनसागर पार पश्चिम स्यामदेश पर्यन्त विस्तृत रहा। धर्मप्राण भारतीय राजा इस दूरदेश पर राजत्व करते थे। उनका कीर्तिस्तम्भ, धर्मानुराग, देवद्विजभक्तिभाव और असाधारण शौर्य-वीर्यका गौरव बहु शतवर्ष गत होते भी आज कम्बोजके नगर, कानन, पर्वतगह्वर, शिलाफलक तथा प्रकाण्ड-प्रकाण्ड देवमन्दिरादिक भग्नावशेषपर दैदीप्यमान है। इस देशके प्राचीन भारतीय राजाओंका इतिहास इतने दिन खनिगर्भमें मणिकी भांति छिपा था। किन्तु अन्तको फरासीसी पण्डितोंने अपनी गम्भीर गवेषणाके प्रभावसे उसे साधारण समक्ष खोल दिया। भारतीयोंके लिये यह न्यून गौरवका विषय नहीं। दीन-दरिद्र धर्मभीरु भारतीय अपने प्राचीन राजाओं द्वारा सुदूरवर्ती कम्बोज राज्यमें स्थापित अतुलनीय कीर्तिको अब समझ सकते हैं। जिसे हम भारतवर्षमें भी ढूँढ़ नहीं पाते, उसके अनेक उदाहरण इस सामान्य देशमें दिखाते हैं। पुरातत्व वर्तमान कम्बोजके बकु, वक, प्रोखिन, प्रोनम, फनम, चिसौर पर्वत, बोम्बङ्ग जिले (प्रान्त यह श्याम राज्यके अन्तर्गत है), फिमनक, कैदिकेर और भङ्ग धमनिक नामक स्थानमें प्राचीन कर्णाटी अक्षरके अनेक संस्कृत शिलालेख मिले हैं। उन शिलालेख पढ़नेसे समझ पड़ा—पूर्वकालको कम्बोज राज्य पश्चिम श्यामदेशसे पूर्व अनामके दक्षिणांश पर्यन्त विस्तृत रहा। इसके प्राचीन अधिवासी 'कम्बुज' वा 'काम्बोज' कहाते थे। उक्त काम्बोज वर्तमान कम्बोज राज्यके आदिम अधिवासी न रहे। प्रवाद है— "तक्षशिलासे अनतिदूर रोमविषयपर एक धर्मनिष्ठ विचक्षण नृपति राजत्व करते थे। उनके पुत्र युवराज 'फखग' किसी गर्हित कर्मके लिये राज्यसे निर्वासित हुये। उन्हीं राजकुमारने नाना स्थान घूमफिर इस कम्बोज राज्यमें आ उपनिवेश स्थापन कर दिया।..."* {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8fq93k23i6iy6q75fobu21x7hyo18v8 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५९ 250 102949 674964 368279 2026-08-29T16:04:42Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674964 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|६०|कम्बोज}} {{Multicol}} इसका ईश वृत्त मन्दिर अति भव्य ही देख पड़ता है। मन्दिरका आयतन कोयी आध कोश होगा। इसका परिधेटा प्रायोर १०८० × ११०० फीट पड़ता, जो चारो ओर २१० फीट विस्तृत खात द्वारा घिरता है। खातके ऊपर मन्दिर जानेके लिये सुदृढ़ सुरम्य स्तम्भ परिशोभित सेतु बंधा है। सेतुके द्वारो गोपुर हैं। इसके मध्यसे मन्दिरके वहिप्राङ्गणको जाना पड़ता है। नैऋतकोणके मन्दिरमें घुसनेपर वाम दिक् अपूर्व दृश्य नयनगोचर होता है। यहां भीष्मकी शरशय्या बनी है। मध्यस्थलमें कुरुपितामह भीष्म शरशय्यापर शयित हैं। उनकी दोनों ओर मुकुट एवं किरीट शोभित कुरु तथा पाण्डवप्रचीर वीर खड़े और गज एवं रथपर सेनाध्यक्ष महारथी चढ़े हैं। पितामह भीष्मसे अनतिदूर गजके ऊपर राजा दुर्योधन म्लानवदन उपेक्षा कर रहे हैं। शत शत वर्ष गत होते भी इन मूर्तियोंमें कोयी वैलक्षण्य नहीं पड़ा। यह प्रस्तरखोदित सकल मूर्ति दूरसे देखनेपर जीवन्त बोध होती हैं। मन्दिरके मध्य पश्चिमोत्तर रामायणका दृश्य है। राक्षस और वानर घोरतर युद्ध कर रहे हैं। विकट मूर्तिधारी राक्षसवीर रथपर बैठ वाण बरसाते हैं। मध्यस्थलमें राम हनुमान् पर चढ़ रावणके प्रति बाण निक्षेप करते हैं। उनके दोनों पार्श्व लक्ष्मण और विभीषण दण्डायमान हैं। सिंहयोजित रथपर रावण रामके शरपीड़नसे जर्ज्जरित हो बैठा है। उत्तर-पश्चिम भागमें देवासुरके समरका दृश्य है। विविध मूर्तिधारी मुकुटशोभित देव पक्षयोजित रथपर चढ़ बाण फेंकते हैं। विकट मूर्तिधारी असुर भी जो जोड़ लड़ रहे हैं। यहां की मूर्तियोंमें सूर्य और चन्द्रदेवकी ज्योतिर्मय मूर्ति अति सुन्दर है। देव स्व स्व वाहनपर आरूढ़ हैं। उत्तर पूर्व मञ्च—यहां भी देवासुरका युद्ध है। चतुरानन, पञ्चानन, षड़ानन और गरुड़ोपरि शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी विष्णु असुरदलन करते हैं। बहु शृङ्ग एवं बहु पुच्छाविशिष्ट देव अश्व, गज, सिंह वा गैंडेपर चढ़ {{multicol-break}} धनुर्बाण लिये युद्धमें व्यापृत हैं। युद्धस्थलके चतुर जटाजूटविलम्बित महादेवकी मूर्ति है। विप्रर्षि योगी वृद्धवारसे उनकी प्रार्थना कर रहे हैं। उत्तरभागके ईषत् पूर्वे दूसरा मञ्च है। यहांका शिल्पनैपुण्य और स्थापत्य कार्यादि यथोक्त शेष नहीं हुवा। सकल शौ मानो असमूर्ण पड़ा है। यहां भी पौराणिक दृश्य है। विष्णु गरुड़ोपरि आरोहण कर बिशी गजारोही असुरको मार रहे हैं। दूसरी भी अनेक देवासुरमूर्ति असम्यक अवस्थामें पड़ी हैं। पूर्बदक्षिण भागमें समुद्रके मन्थनका दृश्य है। क्या शिल्पककार्य्य, क्या चित्रकार्य्य, क्या स्थापत्यविद्या—सर्व्व विषयमें इस मञ्चने पराकाष्ठा पायी है। बोध होता—समुद्रके मन्थनका ऐसा जीवन्त दृश्य दूसरे स्थानपर कहीं नहीं। मध्यस्थलमें कूर्मके ऊपर मन्दराचल स्थापित है। उसके ऊपर विष्णु बैठे हैं। मन्दर वासुकी द्वारा वेष्टित है। नागराजके मुखकी ओर प्रायः एक शत विकटाकार दैत्य और पुच्छभागमें एक शत देवमूर्ति हैं। दैत्य खर्व्व, बलिष्ठ, शिरस्त्राण एवं कवचावृत, कर्णामें कुण्डल पहिने और लम्बी दाढ़ी रखे हैं। देवोंके मस्तकपर मुकुट, कण्ठमें हार, हस्तमें वलय, दो-दो चक्षुद और पद्मसूत्र शोभित है। यह दोनों ही मूर्ति एक भावसे खड़ी हैं। जहां समुद्र मथा जाता, उसके उपरिभागका दृश्य अति चमत्कार देखाता है। मानों शत शत स्वर्गविद्याधरी और अप्सरा आकाशके पथमें नृत्य करती हैं। फिर अधोभागमें सागरका दृश्य है। नाना प्रकार सामुद्रिक जीवजन्तु मत्स्यादि इस कथित समुद्रमें खेलते फिरते हैं। कच्छ सफ़िरमें केचे पोरे धीरे खौत चल रहा है। दक्षिणपूर्व भागमें दूसरा मञ्च है। यहां यमालयका दृश्य विद्यमान है। पापका निग्रह और पुण्यका पुरस्कार देख पड़ता है। स्वर्ग एवं नरक और सुख तथा दुःखका दृश्य प्रदर्शित हुवा है। नरक-यन्त्रणाकी ३६ मूर्तियां खोदी गयी हैं। प्रत्येक मूर्तिके नीचे खोदित लिपिमें लिखते—इस प्रकार पाप कर्म्मानुयार गमन सेवे सो नरकभोग करते हैं। {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> opchdcf5p39yevijzvgrs4z4nx4qypq पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/६० 250 102969 674974 368299 2026-08-29T16:16:28Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674974 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||कम्बोज|६१}} {{Multicol}} {{Gap}}उक्त मञ्चकी भीड़ थोड़ी दूर पश्चिम चलनेपर दूसरा वृहद् दृश्य मिलता है। यहां कम्बोजके राजाओं और उनके परिवारवालोंकी मूर्ति खुदी हैं। इस काष्ठकार्य्यका परिपाव्य देख चमत्कृत होना पड़ता है। ऐसा भड़कीला दृश्य कम्बोजमें दूसरे स्थानपर कहीं देख सकते हैं। कहीं पीनोन्नत-पयोधरा सुधांशुवदनी राजमहिषी विविध अलङ्कारसे विभूषित हो एक रथपर बैठी समारोहके साथ तीर्थपथको जा रही हैं। ऊपर विलायित छत्रकलाप दीखता है। फिर उनके पश्चात् दिव्यरूपधारिणी मनोज्ञोद्विग्नी राजकन्या नरवाहित रथपर चढ़ मानो किसी स्थानको गमन करती हैं। उनके साथ सखी पृष्यव्यजनकर उपचार देती हैं। दास और दासी दोनों निकटवर्ती फलप्रासी वृक्षसे फल तोड़कर छोटे छोटे बच्चोंको बांटते हैं। राजकन्याओंके पार्श्वपर सहचरियोंमें कोयी चामर डोलाती, कोई मस्तकपर छाता लगाती और कोई सुगन्ध पात्र लिये अपनी स्वामिनीको देखाती है। उसीके चतुर निर्जन उपवनका दृश्य है। गिरिगुहाके मध्य तपस्वी ध्यानमें रत हैं। तरुके सबलपर मृगता शिशु खेल रहा है। फिर तरुकी शाखापर शाखामृग पक्षी बैठे हैं। मञ्चके उपरिभागमें चक्रवाहत राजपुरुष, नर्त्तक और धातुषा दण्डायमान हैं। उनकी वेशभूषा भी राजसभाके लिये उपयोगी है। सम्मुख ही राजसभा है। कुण्डलधारी जटाकूट-विलम्बित ब्राह्मण गम्भीर भावसे समासीन हैं। राजा और राजकुमार पदोचित वेशभूषा बना यथायोग्य आसनपर उपविष्ट हैं। यज्ञाज्ञारी दीक्षा राजसभाको उज्ज्वल कर रही हैं। यह दृश्य देखनेसे धारणा पड़ती—प्राचीन भारतीय राजसभा किस भावसे जमती थी। परम वैष्णव जयवर्मा अहोरबटकी उक्त महाकीर्त्ति स्थापन कर गये हैं। अहोरबट नामक मन्दिरके दक्षिणपूर्व साढ़े-पांच कोश दूर दूसरे भी तीन पवित्र स्थान विद्यमान हैं। उनके नाम बकुकु, बकु और खोखि हैं। बकरे का मन्दिर अति प्राचीन है। यह देखनेमें Vol. IV. १६ {{multicol-break}} त्रिकोणाकार और छह तल्लेमें विभक्त है। प्रत्येक तल्लेमें निर्गम विद्यमान है। अपर तल्लेके ऊपर स्थापित दो मन्तकी इष्ट द्वारा कम्बोजके विष्णुने मन्दिररूप धारण किया है। प्रत्येक मध्यस्थलमें खिड़की है। उसमें जो बिंबमूर्ति खोदित रही, वह आजकल प्रायः देख नहीं पड़ती। निर्गमके प्रत्येक कोणमें गजमूर्ति विद्यमान है। मन्दिरके चारो ओर दृढ़अशनिर्मित क्षुद्र क्षुद्र आठ मन्दिर हैं। स्थानीय लोगोंके कथनानुसार यशोवन्त प्रधान मन्दिरकी सीमा बांधी गयी है। आठों मन्दिरके तोरण-प्राचीरमें संस्कृत भाषाके १२० पङ्क्ति लिपि खुदी हैं। इससे मन्दिरके निर्माताका कुछ परिचय मिलता है। कम्बोजके राजा इन्द्रवर्ममाने पुरोहितपूजाके लिये उक्त मन्दिर बनवाया था। बकु नामक स्थानमें पास ही पास छह शिवसन्दिर बने हैं। प्रत्येक प्रवेशद्वारके प्राचीरपर बकुकुके मन्दिरकी भांति संस्कृत भाषाकी लिपि खोदित है। बकुकुके मन्दिरसे केवल संस्कृत भाषाकी लिपि निकली, किन्तु बकुके मन्दिरमें संस्कृत एवं कम्बोत-प्रचलित खम भाषाकी लिपि भी मिली है। शिलालेखके अनुसार परमेश्वर और इन्द्रेश्वर नामपर उक्त देवमन्दिर उठाये किये गये हैं। बकुमें तीन प्रतिमन्दिर हैं। मन्दिरका काष्ठकार्य्य अति सुन्दर है। बकुके कोई पाव कोश उत्तर चलने पर खोखि नामक स्थान मिलता है। यहां इष्टकानिर्मित चार देवमन्दिर हैं। स्थान स्थानपर भस्म-खात पड़े हैं। उन्हें देखते ही समझ पड़ता—यहां कोई वृहद् देवकृत्य हुआ। आजकल मञ्चका और भित्तिका सामान्य अंशमात्रमात्र पड़ा है। प्रत्येक मन्दिरमें यामदिक् चतुष्कासशलिपि खोदित है। उसको पढ़नेसे समझ पाये—यशोधरराज यशोधर्मानि ४६५ यज्ञको शिव एवं भवानीके सेवामें उक्त मन्दिर बनवाये थे। वह अपने उत्तराधिकारियोंको देवसेवामें विशेष मनोयोग करनेके लिये पुनः पुनः आदेश दे गये हैं। ऊपर जिन के संक्षित विवरण दिये, उनको छोड़ दूसरे भी अनेक मन्दिर बने हैं। उनमें बेयोन-नगरका महामन्दिर ही सर्वप्रथम है। शिल्पशास्त्राविद् {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> qy2id22nwekhzonwed1lbw8qmmrmydd 674975 674974 2026-08-29T16:17:23Z Sweta rani Gupta 6713 674975 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||कम्बोज|६१}} {{Multicol}} {{Gap}}उक्त मञ्चकी भीड़ थोड़ी दूर पश्चिम चलनेपर दूसरा वृहद् दृश्य मिलता है। यहां कम्बोजके राजाओं और उनके परिवारवालोंकी मूर्ति खुदी हैं। इस काष्ठकार्य्यका परिपाव्य देख चमत्कृत होना पड़ता है। ऐसा भड़कीला दृश्य कम्बोजमें दूसरे स्थानपर कहीं देख सकते हैं। कहीं पीनोन्नत-पयोधरा सुधांशुवदनी राजमहिषी विविध अलङ्कारसे विभूषित हो एक रथपर बैठी समारोहके साथ तीर्थपथको जा रही हैं। ऊपर विलायित छत्रकलाप दीखता है। फिर उनके पश्चात् दिव्यरूपधारिणी मनोज्ञोद्विग्नी राजकन्या नरवाहित रथपर चढ़ मानो किसी स्थानको गमन करती हैं। उनके साथ सखी पृष्यव्यजनकर उपचार देती हैं। दास और दासी दोनों निकटवर्ती फलप्रासी वृक्षसे फल तोड़कर छोटे छोटे बच्चोंको बांटते हैं। राजकन्याओंके पार्श्वपर सहचरियोंमें कोयी चामर डोलाती, कोई मस्तकपर छाता लगाती और कोई सुगन्ध पात्र लिये अपनी स्वामिनीको देखाती है। उसीके चतुर निर्जन उपवनका दृश्य है। गिरिगुहाके मध्य तपस्वी ध्यानमें रत हैं। तरुके सबलपर मृगता शिशु खेल रहा है। फिर तरुकी शाखापर शाखामृग पक्षी बैठे हैं। मञ्चके उपरिभागमें चक्रवाहत राजपुरुष, नर्त्तक और धातुषा दण्डायमान हैं। उनकी वेशभूषा भी राजसभाके लिये उपयोगी है। सम्मुख ही राजसभा है। कुण्डलधारी जटाकूट-विलम्बित ब्राह्मण गम्भीर भावसे समासीन हैं। राजा और राजकुमार पदोचित वेशभूषा बना यथायोग्य आसनपर उपविष्ट हैं। यज्ञाज्ञारी दीक्षा राजसभाको उज्ज्वल कर रही हैं। यह दृश्य देखनेसे धारणा पड़ती—प्राचीन भारतीय राजसभा किस भावसे जमती थी। परम वैष्णव जयवर्मा अहोरबटकी उक्त महाकीर्त्ति स्थापन कर गये हैं। अहोरबट नामक मन्दिरके दक्षिणपूर्व साढ़े-पांच कोश दूर दूसरे भी तीन पवित्र स्थान विद्यमान हैं। उनके नाम बकुकु, बकु और खोखि हैं। बकरे का मन्दिर अति प्राचीन है। यह देखनेमें Vol. IV. १६ {{multicol-break}} त्रिकोणाकार और छह तल्लेमें विभक्त है। प्रत्येक तल्लेमें निर्गम विद्यमान है। अपर तल्लेके ऊपर स्थापित दो मन्तकी इष्ट द्वारा कम्बोजके विष्णुने मन्दिररूप धारण किया है। प्रत्येक मध्यस्थलमें खिड़की है। उसमें जो बिंबमूर्ति खोदित रही, वह आजकल प्रायः देख नहीं पड़ती। निर्गमके प्रत्येक कोणमें गजमूर्ति विद्यमान है। मन्दिरके चारो ओर दृढ़अशनिर्मित क्षुद्र क्षुद्र आठ मन्दिर हैं। स्थानीय लोगोंके कथनानुसार यशोवन्त प्रधान मन्दिरकी सीमा बांधी गयी है। आठों मन्दिरके तोरण-प्राचीरमें संस्कृत भाषाके १२० पङ्क्ति लिपि खुदी हैं। इससे मन्दिरके निर्माताका कुछ परिचय मिलता है। कम्बोजके राजा इन्द्रवर्ममाने पुरोहितपूजाके लिये उक्त मन्दिर बनवाया था। बकु नामक स्थानमें पास ही पास छह शिवसन्दिर बने हैं। प्रत्येक प्रवेशद्वारके प्राचीरपर बकुकुके मन्दिरकी भांति संस्कृत भाषाकी लिपि खोदित है। बकुकुके मन्दिरसे केवल संस्कृत भाषाकी लिपि निकली, किन्तु बकुके मन्दिरमें संस्कृत एवं कम्बोत-प्रचलित खम भाषाकी लिपि भी मिली है। शिलालेखके अनुसार परमेश्वर और इन्द्रेश्वर नामपर उक्त देवमन्दिर उठाये किये गये हैं। बकुमें तीन प्रतिमन्दिर हैं। मन्दिरका काष्ठकार्य्य अति सुन्दर है। बकुके कोई पाव कोश उत्तर चलने पर खोखि नामक स्थान मिलता है। यहां इष्टकानिर्मित चार देवमन्दिर हैं। स्थान स्थानपर भस्म-खात पड़े हैं। उन्हें देखते ही समझ पड़ता—यहां कोई वृहद् देवकृत्य हुआ। आजकल मञ्चका और भित्तिका सामान्य अंशमात्रमात्र पड़ा है। प्रत्येक मन्दिरमें यामदिक् चतुष्कासशलिपि खोदित है। उसको पढ़नेसे समझ पाये—यशोधरराज यशोधर्मानि ४६५ यज्ञको शिव एवं भवानीके सेवामें उक्त मन्दिर बनवाये थे। वह अपने उत्तराधिकारियोंको देवसेवामें विशेष मनोयोग करनेके लिये पुनः पुनः आदेश दे गये हैं। ऊपर जिन के संक्षित विवरण दिये, उनको छोड़ दूसरे भी अनेक मन्दिर बने हैं। उनमें बेयोन-नगरका महामन्दिर ही सर्वप्रथम है। शिल्पशास्त्राविद् {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8hxo2krob01k8lvnwz43l8hvvt23o85 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७३ 250 105971 674956 666473 2026-08-29T15:53:52Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674956 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" />{{rh|३७४|कादर-कादिर|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{Multicol}} हिन्दुवों में यह बहुत छोटे समझे जाते हैं। डोमों और हाड़ियों को छोड़ दूसरी कोई जाति इनका छुवा पानी नहीं पीती। कादर भुइयों और कहारोंका अन्न खा लेते हैं, किन्तु वह लोग इनका अन्न ग्रहण नहीं करते। यह लोग गोमांस, शूकरमांस, मुरगा तथा चूहा खाते और मद्यादि भी पी जाते हैं। कभी कभी कांते और कुल्हाड़ीकी पूजा होती है। कादर हिन्दू होते भी अपर असभ्य जातियोंकी भांति कुसंस्काराच्छन्न हैं। इनमें कितने ही लोग विश्वास करते कि कुछ विशेष शक्तिसम्पन्न अपदेवता उनकी चारोओर रहते हैं। उन देवताओंमें अनेक इनके पूर्व पुरुषों के आत्मा होते हैं। दूसरे लोगोंके विश्वासानुसार अपदेवता कहीं नहीं, फिर भी नदी पर्वतादिसे शक्ति उद्भूत होती है। उसकी कोई मूर्ति वा प्रतिमा मानी नहीं जाती। कहीं थोड़ीसी रंगी मृत्तिका और कहीं एक खण्ड सिन्दूरलेपित प्रस्तर खण्डमात्र भगवान्‌के उद्देशसे मार्गके मध्य प्रतिष्ठित रहता है। उक्त सकल प्रतिष्ठित देवतावोंमें कारूदानो, हर्दियादानो, सिमरादानो, पहाड़दानो, मोहन, दूया, लिलू, परदोना इत्यादि प्रधान हैं। इनके मतमें लोग समझ नहीं सकते उक्त अपदेवता कौन कौन शक्ति रखते हैं। कादरोंके कथनानुसार उक्त सकल अपदेवतावोंकी पूजामें अवहेला करनेसे देशमें नाना अमङ्गल होते हैं। पूजाके समय यह लोग शूकरशावक, छागल, कबूतर, और मुरगा काट कर चढ़ाते हैं। शस्यकी शिखा और घृतादिका उत्सर्ग किया जाता है। इनके देवता जहां स्थापित रहते, उन कुञ्जोंको सरना कहते हैं। नापित ही इनके पुरोहित हैं। उपासक पूजाका द्रव्य खाते हैं। यह अपनेको हिन्दू बताते और परमेश्वर महादेव, विष्णु प्रभृति नामोंपर विश्वास लाते हैं। दाक्षिणात्यके कादर पर्वत विभागमें वास करते हैं। वह पुलियार और मालय आरसार जातिपर प्रभुत्व चलाते हैं। कभी कभी तोप और युद्ध सज्जादि वहन करते भी दासादिके कार्य्यसे अलग रहते हैं। पल्लेदार कहनेसे बुरा मानते हैं। वह बड़े विश्वासी, सत्य- {{multicol-break}} वादी और बाध्य होते हैं। कुञ्चित केशोंका बंधाव रहता है। वनसे हरिद्रा, अदरक, मधु, मोम इलायची, रीठा, माजूफल इत्यादि संग्रह कर चावल और तम्बाकूके साथ बदलते हैं। वह अंगरेजी जंगलसे जो चीज लाते, उसका महसूल नहीं चुकाते। कोचिनराजके अधिकृत वनभागसे इलायची संग्रह करनेके लिये केवल वार्षिक १००) रु० राजस्व देते हैं। कादर वनमें पथ प्रदर्शक का कार्य्य करते हैं, किन्तु कभी बोझ नहीं ढोते। {{outdent|कादलेय (सं० त्रि०) कदलेन निर्वृत्तम्, कदल-ढञ्। कदल निर्मित, केलेका बना हुवा।}} {{outdent|कादा (हिं० पु०) जहाज़की एक पटरी। यह शहतीरों और कड़ियोंके नीचे लगती है।}} {{outdent|कादाचित्क (सं० त्रि०) कदाचित् भवम्, कदाचित्-ठञ्। समय पर होनेवाला, जो कभी कभी हो।}} {{outdent|कादाचित्कता (सं० स्त्री०) कादाचित्कस्य भावः, कादाचित्क-तल्-टाप्। कदाचित् उत्पत्ति।}} {{outdent|कादिपुर—अवध प्रदेशके सुलतानपुर जिलेकी एक तहसील। यह अक्षा० २५°५८' ३०" से २६°२३' उ० और देशा० ८२°९' से ८२°४४' पू० तक अवस्थित है। इसके उत्तर अकबरपुर तहसील, पूर्व आज़मगढ़ जिला, दक्षिण पट्टी तहसील और पश्चिम सुलतानपुर तहसील है। भूमिका परिमाण ४३९ वर्गमील है। यहां सुलतानपुर और जौनपुरकी सड़क आ मिली है। राजकुमार जमिन्दार हैं। ब्राह्मण बहुत रहते हैं। तहसीलको छोड़ थाना और स्कूल भी है। एक देहाती बैंक खुला है। बाज़ार बहुत छोटा है। भूमि समान-गुणविशिष्ट है। नाले चारो ओर लगे हैं। बड़ी नदी पर पुल बंधा है।}} {{outdent|कादियान—बोरनिओ द्वीपवासी एक अनार्य जाति। आजकल इस जातिने मुसलमान धर्म ग्रहण कर लिया है। कादियान ही बोरनियो द्वीपके आदिम आदिवासी हैं। यह सरल और शान्तिप्रिय हैं। इनकी स्त्रियाँ अधिक सुश्री होती हैं।}} {{outdent|कादिर—१ शैख़ अब्दुल क़ादिरका उपनाम। आलमगीरके पुत्र शहज़ादे मुहम्मद अकबरने इन्हें अपना}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> j3ozjsenpa6b2qydxcl0gu9g4j637f3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६१ 250 159709 675150 508935 2026-08-30T07:53:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675150 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''२०४. पत्र-लेखकोंसे'''}}}} '''पी॰ सिष्टा:''' वकीलोंसे सम्बन्धित कांग्रेसके प्रस्तावका<ref>इसमें वकीलोंसे अदालतोंका बहिष्कार करनेको कहा गया था।</ref> उद्देश्य यह था कि जिन न्यायालयोंके द्वारा सरकार अपनी सत्ताको मजबूत करती है उन न्यायालयोंकी प्रतिष्ठा कम हो जाये। '''एन॰ एच॰ मोदी:''' संविधानका विचार किये बिना जो लोग रसद और बेगार लेते हैं, उनको निश्चय ही कांग्रेस समितियोंमें पदाधिकारी नहीं बनना चाहिए। मेरी रायमें, कांग्रेसके प्रस्तावसे नामजद सदस्योंके पदाधिकारी बननेपर रोक लगती है। साथ ही कोई अवैतनिक मजिस्ट्रेट भी पदाधिकारी नहीं बन सकता। इक्कीस वर्षसे कम आयुके लोग निश्चय ही सदस्य नहीं बन सकते, भले ही वे कितने भी पढ़े-लिखे क्यों न हों। निजी रूपसे मैं इस बातमें विश्वास नहीं कर सकता कि सहयोगी असहयोगका कार्य सफलतासे चला सकते हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि जहाँ कार्य संगठित करनेके लिए कोई असहयोगी नहीं मिल सकता, वहाँ कार्य आरम्भ ही न किया जाये। असहयोगी मुसलमानको अवश्य ही विदेशमें बनी तुर्की टोपी नहीं पहननी चाहिए। जो व्यक्ति कांग्रेस समितियोंके चुनावमें अपने लिए मत माँगनेके लिए पैसे लेकर काम करनेवाले लोग नियुक्त करता है, मैं उसे अयोग्य उम्मीदवार समझता हूँ। मैं इस पत्र-लेखकसे और दूसरे लोगोंसे यह कहता हूँ कि अन्ततः इस बातका चुनाव करना तो मतदाताओंके हाथमें है। यदि असहयोगी मतदाता सहयोगियोंको या संदिग्ध चरित्रके लोगोंको चुनना तय करते है तो कोई भी संविधान उन्हें सार्वजनिक जीवनमें प्रवेश करनेसे नहीं रोक सकता। और चूँकि सहयोगियोंको भी कांग्रेसमें सम्मिलित होनेका अधिकार है, इसलिए यदि वे कांग्रेसमें आते हैं तो जहाँ उनका बहुमत होगा वहाँ वे निःसन्देह अपनी पसन्दके उम्मीदवारोंको चुनेंगे। कांग्रेसके संविधानमें दलोंका खयाल नहीं रखा गया है। हाँ, कांग्रेसके असहयोग-सम्बन्धी प्रस्तावमें, जो लगभग निर्विरोध पारित किया गया था, यह आवश्यक रखा गया है कि असहयोगी उन लोगोंको ही चुनें जो कांग्रेस कार्यक्रमका अधिकसे-अधिक दृढ़तासे पालन करते हों, जिससे प्रस्ताव ठीक तरह अमलमें लाया जा सके। '''के॰ बी॰ लाल गुप्त:''' इस बातका कभी भी दावा नहीं किया गया है कि चरखेसे किसी परिवारका निर्वाह हो सकता है। दावा केवल यही किया जाता है कि चरखेसे गरीबको भोजन मिल सकता है। किन्तु उसका सबसे बड़ा दावा तो यह है कि वह राष्ट्रको समृद्ध बनानेके लिए अनिवार्य है। '''बी॰ एस॰ एम॰:''' फौजदारी या दीवानीके झूठे मुकदमोंमें गवाही देनेके सम्बन्धमें आपसे मेरा कहना है कि आप कार्यकारिणी समितिके स्पष्टीकरण को देखें। जहाँ नगरपालिकाएँ स्कूलोंका राष्ट्रीयकरण कर दें, वहाँ भी यह अच्छा होगा कि कांग्रेसके<noinclude></noinclude> mey2rc8k90x2afuiluotd2b0xxvonol पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६२ 250 159717 675154 508943 2026-08-30T07:59:40Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675154 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>विशेषज्ञ उपलब्ध हों तो वे उन स्कूलोंको उनके नियन्त्रण एवं देखरेखमें रहने दें। खिलाफत और पंजाबके अन्यायोंका परिमार्जन हो जाये तो भी जबतक स्वराज्य नहीं मिलता, असहयोग बन्द नहीं किया जा सकता। मैंने अपनी शिमलाकी भेंट जनताको विस्तारसे नहीं बताई, यह गोपनीयता मेरी रायमें पाप नहीं है। जब कोई व्यक्ति अपने किसी मित्रकी विश्वास करके कही हुई बातको बतानेसे इनकार करता है तब वह पाप नहीं करता। विश्वासको कायम रखने और गोपनीयता न रखनेमें पूरी संगति है। हम दण्ड-भयसे या भावी अनिष्ट-भयसे किसी बातको गुप्त रखें, यह सम्भव है। '''तेजसिंह वर्मा''': फीजी और असमके लोगोंको लेनेका आपका कृपापूर्ण प्रस्ताव श्री एन्ड्र्यूजके पास भेज दिया गया है। उनका पता है—शान्तिनिकेतन, बोलपुर, पूर्व भारत रेलवे। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २१-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''२०५. सभ्यताका उपहास'''}}}} यद्यपि मैं साहित्य पढ़नेका प्रेमी हूँ, किन्तु मुझे किसी साहित्यिक कृतिको पढ़नेका अवसर कठिनाईसे ही मिलता है। 'नेशन' साप्ताहिकका पिछले बड़े दिनपर निकाला गया अंक मेरे पास महीनोंसे पड़ा है। उसमें 'लॉ ऐंड गॉस्पेल'<ref>मूल अंग्रेजी निबन्धके लिए देखिए अंग्रेजी खण्ड २०, परिशिष्ट ५।</ref> शीर्षकसे एक विचारपूर्ण निबन्ध है। यह निबन्ध वर्तमान आन्दोलनपर इतना अधिक लागू होता है कि 'यंग इंडिया'के जो अनेक पाठक उसे देख नहीं सके हैं उनके लाभके लिए मैं उसे किसी तरहका बहाना बताये बिना ज्योंका-त्यों पूरा उद्धृत करता हूँ। उस निबन्धके योग्य लेखकने विश्व-विद्रोहको तत्त्वतः धार्मिक आन्दोलन बताया है। पाठकोंको इस बातका निर्णय करना चाहिए कि क्या भारतीय असहयोग आन्दोलन, जो अहिंसाकी स्पष्ट मान्यतापर आधारित है (भले ही हम उस अहिंसाको व्यवहारमें लानेमें बहुत सफल न भी हों), उन सभी आन्दोलनोंमें सबसे अधिक धार्मिक नहीं है जो विश्वके विभिन्न भागोंमें मनुष्यको ऐसी प्रणालीकी दासतासे मुक्त करनेके लिए चलाये जा रहे हैं, जिसे हम झूठ-मूठ ही सभ्यता कहते हैं। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २१-७-१९२१|1em}} {{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude> m85brlo4yjvrzp9r3j2ie8gsjic38dn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६३ 250 159724 675155 508950 2026-08-30T08:00:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 675155 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''२०६. त्याग और उत्पादन'''}}}} पुरातनका त्याग और निर्माण——नाश और रचना -असहयोगके ये दो अंग हैं। हम इन दोनोंमें से एकके बिना भी काम नहीं चला सकते। हमने जो कदम उठा लिया है और जिस स्थानपर हम आ खड़े हुए है उसके अन्तर्गत ये दोनों अंग पूरी तरह आ जाते हैं और मेरी समझसे तो इनके बिना हम आगे बढ़ ही नहीं सकते। मैं किसी अन्य प्रकारसे अहिंसात्मक असह्योगके आन्दोलनको चलाना असम्भव समझता हूँ। हम स्वदेशीके बिना एक डग भी आगे नहीं बढ़ सकते, मुझे यह भासित होता ही रहता है। हमारी शक्तिका पूर्ण विकास इसी तरह हो सकता है। ज्ञानपूर्वक नाश और ज्ञानपूर्वक निर्माण इसके अन्तर्गत आ जाता है। इसीमें राष्ट्रके सब अंगोंका व्यायाम और उनकी शक्तिका परीक्षण हो जाता है। राष्ट्र अबतक किसी भी कार्यमें पूरे मनसे नहीं लगा है। स्वदेशीका सफल प्रयोग जी-जानसे जुटे बिना असम्भव है। जो राष्ट्र पूरे मनसे प्रयत्न करता है उसके लिए स्वराज्य हस्तामलकवत् है; और स्वदेशीके बिना स्वराज्यको आकाश कुसुमके समान समझना चाहिए। स्वदेशीकी सफलताके लिए हमें विदेशी कपड़ेका पूरा त्याग करना है और उसकी कमी नया देशी कपड़ा बनाकर पूरी करनी है। हम अभीतक तो नाश करनेसे डरते थे। अब हमें चरखेके रूपमें रत्नचिन्तामणि मिल गया है। इसका अर्थ यह है कि हमें उत्पादनका अचूक उपाय मालूम हो गया है। किन्तु हमें त्यागके सम्बन्धमें बहुत ध्यान देनेकी जरूरत है। उत्पादनकी गति एक निश्चित सीमातक ही बढ़ सकती है। बादमें तो वह सहज रूपसे बढ़ती रहेगी। नाशका कार्य एक क्षणमें किया जा सकता है। नाश करने के लिए भी विशेष भावनाकी आवश्यकता होती है। जब हमारे मन बदल जायें तब समझना चाहिए कि अब हम नाश करने के लिए तैयार हो गये हैं। त्याग वैराग्यके बिना नहीं टिकता यह बात बहुत अनुभवके आधारपर कही गई है। हमें विदेशी कपड़ेके प्रति इतनी विरक्ति, इतनी अप्रीति हो जानी चाहिए जितनी किसी मलिन वस्तुके प्रति होती है। जबतक हमारे मनमें इतनी विरक्ति उत्पन्न नहीं होती तबतक हमारा मन जापानकी साड़ी या मैनचेस्टरकी मलमलकी तरफ जाता रहेगा। और तबतक हम इस तरहकी चीजोंकी माँग करते रहेंगे एवं तबतक ऐसी चीजोंके बेचनेवाले हमें धोखा देकर इन चीजोंको हमारे सिर मढ़ते रहेंगे। इसलिए अभी तो हमें वैसी दिखनेवाली चीजोंको छूना भी नहीं चाहिए। कहीं हम धोखा न खा जायें, यह भय तो हमें लगता रहना चाहिए। इस तरहकी विरक्ति उत्पन्न करनेके लिए हमें यह भी स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि हमारी दासताका मूल विदेशी कपड़ा है। दूसरी सब चीजें उसके बाद ही आई है। ईस्ट इंडिया कम्पनीकी कोठी विदेशी कपड़ेके पीछे और उसीके लिए बनाई गई थी। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> e9k91c2shnutkv3pahq0ni3vkln67no 675185 675155 2026-08-30T10:30:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675185 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''२०६. त्याग और उत्पादन'''}}}} पुरातनका त्याग और निर्माण——नाश और रचना——असहयोगके ये दो अंग हैं। हम इन दोनोंमें से एकके बिना भी काम नहीं चला सकते। हमने जो कदम उठा लिया है और जिस स्थानपर हम आ खड़े हुए है उसके अन्तर्गत ये दोनों अंग पूरी तरह आ जाते हैं और मेरी समझसे तो इनके बिना हम आगे बढ़ ही नहीं सकते। मैं किसी अन्य प्रकारसे अहिंसात्मक असहयोगके आन्दोलनको चलाना असम्भव समझता हूँ। हम स्वदेशीके बिना एक डग भी आगे नहीं बढ़ सकते, मुझे यह भासित होता ही रहता है। हमारी शक्तिका पूर्ण विकास इसी तरह हो सकता है। ज्ञानपूर्वक नाश और ज्ञानपूर्वक निर्माण इसके अन्तर्गत आ जाता है। इसीमें राष्ट्रके सब अंगोंका व्यायाम और उनकी शक्तिका परीक्षण हो जाता है। राष्ट्र अबतक किसी भी कार्यमें पूरे मनसे नहीं लगा है। स्वदेशीका सफल प्रयोग जी-जानसे जुटे बिना असम्भव है। जो राष्ट्र पूरे मनसे प्रयत्न करता है उसके लिए स्वराज्य हस्तामलकवत् है; और स्वदेशीके बिना स्वराज्यको आकाश कुसुमके समान समझना चाहिए। स्वदेशीकी सफलताके लिए हमें विदेशी कपड़ेका पूरा त्याग करना है और उसकी कमी नया देशी कपड़ा बनाकर पूरी करनी है। हम अभीतक तो नाश करनेसे डरते थे। अब हमें चरखेके रूपमें रत्नचिन्तामणि मिल गया है। इसका अर्थ यह है कि हमें उत्पादनका अचूक उपाय मालूम हो गया है। किन्तु हमें त्यागके सम्बन्धमें बहुत ध्यान देनेकी जरूरत है। उत्पादनकी गति एक निश्चित सीमातक ही बढ़ सकती है। बादमें तो वह सहज रूपसे बढ़ती रहेगी। नाशका कार्य एक क्षणमें किया जा सकता है। नाश करनेके लिए भी विशेष भावनाकी आवश्यकता होती है। जब हमारे मन बदल जायें तब समझना चाहिए कि अब हम नाश करनेके लिए तैयार हो गये हैं। त्याग वैराग्यके बिना नहीं टिकता यह बात बहुत अनुभवके आधारपर कही गई है। हमें विदेशी कपड़ेके प्रति इतनी विरक्ति, इतनी अप्रीति हो जानी चाहिए जितनी किसी मलिन वस्तुके प्रति होती है। जबतक हमारे मनमें इतनी विरक्ति उत्पन्न नहीं होती तबतक हमारा मन जापानकी साड़ी या मैनचेस्टरकी मलमलकी तरफ जाता रहेगा। और तबतक हम इस तरहकी चीजोंकी माँग करते रहेंगे एवं तबतक ऐसी चीजोंके बेचनेवाले हमें धोखा देकर इन चीजोंको हमारे सिर मढ़ते रहेंगे। इसलिए अभी तो हमें वैसी दिखनेवाली चीजोंको छूना भी नहीं चाहिए। कहीं हम धोखा न खा जायें, यह भय तो हमें लगता रहना चाहिए। इस तरहकी विरक्ति उत्पन्न करनेके लिए हमें यह भी स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि हमारी दासताका मूल विदेशी कपड़ा है। दूसरी सब चीजें उसके बाद ही आई है। ईस्ट इंडिया कम्पनीकी कोठी विदेशी कपड़ेके पीछे और उसीके लिए बनाई गई थी।<noinclude></noinclude> eeounimbmsvt1qst3r8t4lodcl0iev8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/११ 250 168661 675204 528227 2026-08-30T11:33:19Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675204 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|'''भूमिका'''}} इस खण्डमें २१ जनवरीसे १५ जून, १९२७के बीच तककी सामग्री संगृहीत है। खण्डके प्रारम्भमें ही गांधीजी भारतमें १० वर्ष पहले प्रारम्भ किये गये अपने प्रथम सत्याग्रह संघर्षका उल्लेख करते हैं। मीराबहनको अपने पत्रमें उन्होंने लिखा है:"सारा ही [चम्पारनका] दौरा स्फूर्तिदायक है। मेरे लिए चम्पारन पवित्र स्मृतियोंसे जुड़ा ही है। दरअसल चम्पारनने ही हिन्दुस्तानसे मेरा परिचय कराया।" (पृष्ठ ५) इन दिनों चम्पारन और दूसरी जगहोंमें गांधीजी खादीसे सम्बन्धित दौरा कर रहे थे। इस दरम्यान वे कई बार भावुक हो उठे हैं। आश्रमकी बहनोंको उसी दिन पत्र लिखते हुए उन्होंने लिखा: "जान पड़ता है इस वर्ष में बहुत दिनोंतक आश्रममें नहीं रह सकूँगा। इसका मुझे दुःख है; किन्तु हमें तो दुःखमें ही सुख मानना है। खादीके कामके लिए मुझे भ्रमण करना ही पड़ेगा। लाखों लोगोंको खादीका मन्त्र इसी तरह घूम-घूमकर दिया जा सकता है।" (पृष्ठ ७) गांधीजीने खादीके विषयमें घूम-घूमकर लोगोंको जो-कुछ बताया, उसका लोगोंपर बड़ा प्रभाव पड़ा। जनताकी स्वतन्त्र होनेकी इच्छा इन भाषणोंसे "शक्ति एवं स्फूर्तिमें बदल गई।" (पृष्ठ १९२) गांधीजी लगातार बिहार, मध्य प्रदेश और बरार, महाराष्ट्र तथा उत्तर प्रदेशमें दौरा करते रहे। लगता है, उन्होंने जरूरतसे ज्यादा श्रम किया; फल यह हुआ कि २५ मार्चको उनका स्वास्थ्य एकाएक बहुत बिगड़ गया और उन्हें किसी पहाड़ी स्थानपर विश्राम करनेकी सलाह दी गई। (परिशिष्ट ३) इसे मानकर वे १९ अप्रैलसे ५ जूनतक मैसूरकी नन्दी पहाड़ीपर रहे। यह बीमारी बहुत ज्यादा शारीरिक श्रम और देशमें व्याप्त परिस्थितियोंके परिणामस्वरूप थी। गांधीजीने एक मित्रको लिखा: "मैंने अपने सहयोगियोंको यह सोचनेकी गुंजाइश दी और स्वयं भी मेरा यही खयाल था कि मेरा शरीर लादे गये भारको किसी तरह सहन कर लेगा... क्योंकि महाराष्ट्रका करूँगा दौरा समाप्त करनेके बाद मेरा विचार नया अध्याय आरम्भ करनेका था; और मैंने उपयुक्त सूचना राजगोपालाचारीको दे रखी थी कि मैं अब वैसी उतावली नहीं करूंगा...।" (पृष्ठ ४०२) ऐसा लगता था कि मनोवैज्ञानिक कारणोंपर नियन्त्रण रखना और भी कठिन है। डा० अन्सारीको लिखते हुए गांधीजीने स्पष्टीकरण दिया:“मेरी मुख्य कठिनाई है कि जबतक मैं पागलपनकी हालतमें न आ जाऊँ, तबतक अपने मनपर कैसे नियन्त्रण करूँ और उसे सोचनेसे कैसे रोकूं। परन्तु मैं नहीं समझता कि जो हिन्दू और मुसलमान इस तरहके काम कर रहे हैं, जिसके कारण मुझे बहुत जोर देकर सोचना पड़ता है, उसे कैसे रोक सकता हूँ। मैं यह भी नहीं जानता कि लाखों लोगोंकी जो मुखमरी बढ़ रही है, और जिसका मेरे मनपर असर हो रहा है, उसे कैसे रोकूं।" (पृष्ठ २९४-९५)। बहरहाल उन्हें बीमारीसे जो आध्यात्मिक शिक्षा मिली उसे उन्होंने उसी प्रकार विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर लिया जैसे कि उन्होंने एक बार पहले भी, अगस्त १९१८से जनवरी १९१९<noinclude></noinclude> 6rgcddzdx9aqv322pmflgfa8zltku76 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५० 250 176030 674993 644669 2026-08-29T16:54:49Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674993 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५१८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>है - असहयोगी है। हम यह दावा करते हैं कि महासभाके दफ्तरोंमें दर्ज लाखों आदमी हमारे साथ हैं - यही क्यों, दूसरे करोड़ों आदमियोंपर हमारा इतना प्रभाव हो गया है कि वे भी हमारे साथ ही हैं। हमारा ऐसा दावा करना उचित ही है। अगर लोग हमारे साथ न हों तो फिर स्वराज्य किसके लिए प्राप्त किया जाये ? अगर लोग सरकारके साथ हों तो क्या उनको बलपूर्वक आजाद किया जा सकता है ? हमारी स्वराज्यकी इस वर्तमान हलचलका, खिलाफत और पंजाबकी हलचलका आधार ही इस बातपर है कि हम लोगोंके दुःख-दर्दको प्रकट कर रहे हैं और उन्हीं साधनोंका उपयोग कर रहे हैं जिन्हें लोगोंने पसन्द किया । इसका अर्थ यह हुआ कि लोग शान्ति के साथ विजय प्राप्त करना चाहते हैं । अगर मेरी यह पूर्वोक्त बात गलत हो तो मैंने -- हमने -- बड़ी गहरी भूल की है। अगर हम, शान्तिको सच्चे दिलसे मानने और चाहनेवाले, मुट्ठीभर ही हों तो भी हम स्वराज्य प्राप्तिमें समर्थ हैं । परन्तु उस अवस्थामें हमारा संगठन दूसरे प्रकारसे होना चाहिए। फिर कोई असहयोगी चाहे जेल जाये, चाहे मर जाये, उसके पीछे झुण्ड- के-झुण्ड लोगोंको जेल नहीं जाना चाहिए। यदि सहयोगियोंकी तरह लोगोंमें हम भी अप्रतिष्ठित होते तो हम मनमानी अवज्ञा कर सकते थे। क्योंकि उस अवस्थामें हम पर होनेवाले अत्याचारके कारण उत्तेजित होकर कोई शान्ति भंग न करता । {{C|'''भेद'''}} गुजरातमें हम शीघ्र ही जिस सविनय अवज्ञाके मनसूबे बाँध रहे थे, वह सारे हिन्दुस्तानके लिए थी । उस अवज्ञाके बलपर हम खिलाफतको ताकत पहुँचानेकी और स्वराज्य प्राप्त करनेकी आशा रखते थे । अतएव सारे हिन्दुस्तानके लिए उसमें सहमत होने और शान्ति बनाये रखनेकी जरूरत है । यों स्थानीय कष्टों और दुःखोंके लिए हर व्यक्ति सविनय अवज्ञा कर सकता है, जैसा कि आज चिरला-पेरला और मूलशी पेठामें चल रहा है। उनके साथ हमारी हमदर्दी भी है, और हम उनकी सहायता भी कर सकते हैं। परन्तु यों हमें स्वयं तटस्थ ही रहना चाहिए। अशान्ति बड़ी जल्दी फैलती है। अगर हम चिरला पेरलाके नामपर बम्बईमें अशान्ति कर बैठे तो चिरला पेरलाको अधिक कष्ट भोगना पड़ेगा । {{C|'''बड़ी आवश्यकता'''}} इसलिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस समय हर जगह तत्काल ही शान्ति स्थापित करनेकी है। अगर खुद हमारे मनमें शान्तिकी आवश्यकताको लेकर कुछ शक बाकी रह गया हो तो हम उसे दूर कर डालें। पहले हमें उपद्रवियोंपर काबू पाना चाहिए। वे भी हमारे भाई हैं । हम उन्हें छोड़ नहीं सकते। किन्तु हम उनके हाथमें भी नहीं रह सकते। अगर हम उनकी मर्जीको चलने दें तो हिन्दुस्तानमें स्वराज्य नहीं, गुंडोंका राज होगा। गुंडोंका राज होने देना मानो उनकी और हमारी दोनोंकी मौत है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि गुंडोंके राज्यको लोग जरा भी सहन नहीं कर सकते । गुंडोंके राजमें रहनेवाले जानोमालके तात्कालिक नुकसानके भयको अंगीकार करने के बजाय सरकारके तात्कालिक रक्षणको खुशी-खुशी कबूल कर लेंगे । अतएव हमें चाहिए<noinclude></noinclude> r2x03jseixfpxpiy7s53lkpj5hc65ix पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६८६ 250 176891 674955 619881 2026-08-29T15:52:00Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674955 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{Rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाड़मय्}} {{Multicol}} {{outdent|१९८, २०२ पा० टि., २०६, २०८-१०, २२७-२८, २४५, २४६, २४९-५०, २५३-५४, २५७, २६८ पा० टि., २६९, २८१, २९२, ३३६ पा० टि., ३४०, ३४४-४६, ३४९, ३६३, ३६६, ३८४, ४०३, ४९०, ५६३; -का जीवन -सन्देश, २०४; -का देहान्त, २७; -का निबंध, १९३, १९७; -का महात्मा रूप, २०५; -का मार्गदर्शक तथा नेताके रूपमें उल्लेख, २, १०; -का राजनीतिज्ञ महात्माके रूपमें उल्लेख, ५४; -का स्वास्थ्य, २०७; -की मृत्युपर श्रद्धांजलि, २८; -के अन्तिम उद्गार, २०५; -के अपने स्मारकके सम्बन्धमें अन्तिम शब्द, २९; -के निधनपर शोक-सभा, ३५; -के विचार भारतीय चरित्रबलके सम्बन्धमें, ११९}} {{outdent|गोखले क्लब, ५३}} {{outdent|गोखले-स्मारक कोष, १५३-५४}} {{outdent|गोपालजी, १८८}} {{outdent|गोमतीबेन १७९}} {{outdent|गोरखप्रसाद बाबू, २७१, ३७४, ३९५}} {{outdent|गोरड़ियाभाई, ३६६}} {{outdent|गोरा जमींदार संघ, ३६९}} {{outdent|गोविन्दजी, डाहाभाई, ४७२}} {{outdent|गोविन्ददास, चतुर्भुजदास, ७१}} {{outdent|गोविन्ददास, लॉर्ड, ७१, १७०}} {{outdent|गौरी बाजी, १५०}} {{outdent|ग्रीन, ५२१}} {{outdent|ग्रेनी, २८३}} {{outdent|ग्रैहम, कुमारी, ३५९, ३६१, ३६६}} {{c|'''घ'''}} {{outdent|घोष, मोतीलाल, १८ पा० टि०}} {{c|'''च'''}} {{outdent|चंचलबेन, १३७, १८२}} {{outdent|चतुर, १८५}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}चंदावरकर, एम० जी० ३४३}} {{outdent|चन्दूलाल, १८६, १८८, ४३७}} {{outdent|चन्द्रमणि, १७७}} {{outdent|चन्द्रिकाप्रसाद, राय बहादुर, ३१३}} {{outdent|चम्पारन, ३६२, ३६६, ३७१, ३७५-७७, ३८९-९०, ३९२, ३९४-९५, ३९७, ४२१, ४५५, ४६४, ५१८, ६६८; -काश्तकारी जाँच समिति, ४७३ पा० टि.; -काश्तकारी विधेयक (चम्पारन एग्रेरियन बिल), ५७२ पा० टि.; -की गरीब रैयत, ५०४-५; -की स्थिति, ४११, ४३१, ४४९; -में आग लगानेकी घटना ४१२-१३, ४१५, ४२९; -में कमीशनकी स्थापना, ४१२; -में किसानोंकी हालत, ४४०-४२; -में जाँच कार्य, ४१५; -में भू-सम्बन्धी स्थिति, ४२८; -में सहकारिता, ५४२}} {{outdent|चम्पारन जाँच समिति, ४३९-४०; -की रिपोर्ट, ४४८ पा० टि., ४८०, ५०८, ५४७, पा० टि., ५४८, ५७२; -के संदर्भ-पद, ४४२}} {{outdent|चम्पारन समिति, ४२५, ४६९, ४९२, ४९४, ४९७, ५०५, ५१०, ५६६ पा० टि., ५७०; -की बैठक, ४८६, ४८८-८९, ५६३; -के सम्मुख गवाही, ४८४; -के सामने सुझाव, ५००-१}} {{outdent|चर्चिल, सर विंस्टन लियोनार्ड स्पेंसर, ५४०}} {{outdent|चापेकर, दामोदर हरि, २०९}} {{outdent|चाय, २२५, २३२}} {{outdent|चावड़ा, हीरजी भीमजी, १७४, १८१}} {{outdent|चितलिया, करसनदास, २७, १६३ पा० टि., २०४ पा० टि., २१०}} {{outdent|चित्रमय जगत्, ४७४ पा० टि०}} {{outdent|चिन्तामणि, सर चिरावुरी यज्ञेश्वर, १११, ३१९ पा० टि०}} {{outdent|चिन्तामणि सखाराम, १८६}} {{outdent|चिमनलाल, १३३, १५१}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> cxhcm2xus32pjjqsl150ggfi105vrve पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६८७ 250 176892 674961 619882 2026-08-29T15:59:21Z Koyal Singh 6351 /* 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{{outdent|देसाई, वालजी गोविन्दजी, १५५}} {{outdent|देसाई, हरिलाल माणिकलाल, ३८७ पा० टि०}} {{outdent|द्वारकादास, १०५}} {{c|'''ध'''}} {{outdent|धरणीधर, बाबू, ३९५}} {{outdent|धर्मसी, डी० जमनदास, २८४}} {{outdent|ध्रुव, आनन्दशंकर बापूभाई, १८५, ४०४, ४६२, ४६८, ४७८}} {{outdent|ध्रुव, दीवानबहादुर केशवलाल हर्षदराय, ४०४}} {{c|'''न'''}} {{outdent|नगीनदास, १४३, १६३}} {{outdent|नगीन, बाबू, ४३३}} {{outdent|नटराजन, १७५, १८३}} {{outdent|नटराजन, कामाक्षी, २०१}} {{outdent|नटेसन, जी० ए०, ५०, ५४, ६३, ७८ पा० टि., ८७, १०३, १६८, १७०-७१, १७३, ५६८-६९; -द्वारा निर्वासितोंकी सेवा, ८१}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}नटेसन, श्रीमती जी० ए०, ८७}} {{outdent|नन्दकोर, भाभी (गांधी), १५}} {{outdent|नन्दी, महाराजा मणीन्द्रचन्द्र, ३५६}} {{outdent|नर्मद कवि, देखिए, दवे, नर्मदाशंकर लालशंकर}} {{outdent|नवजीवन प्रकाशन संस्था, १४६ पा० टि०}} {{outdent|नवीन, ८८, १७९, १८२}} {{outdent|नागजी, स्वामी, १६१, १७७-७८, १८१-८२}} {{outdent|नागप्पन, ५५}} {{outdent|नानक, ३१५}} {{outdent|नानकचन्द, २६१}} {{outdent|नानचन्दजी, महाराज, १८७}} {{outdent|नानालाल, कवि, १४८-४९, १७२-७३, १७८}} {{outdent|नानूभाई, १८२}} {{outdent|नावकर, ८७-८८, १०२, १२९, १३०, १८६}} {{outdent|नायडू, बम्बी, १११-१२, १३९, २०३}} {{outdent|नायडू, फकीरी, ८८, १३७, १४१, १५४, १८४, २७७, ४६५}} {{outdent|नायडू, सरोजिनी, ३४७-४८, ३७३}} {{outdent|नायर, सर शंकरन, २६१, २८१}} {{outdent|नारणजी, कणबी, ८८, १८२, १८४, १८६}} {{outdent|नारसस्वामी, १४०, २६९}} {{outdent|नारायणस्वामी, प्रोफेसर, १७९}} {{outdent|नारी-शाला नवलराय हीरानन्द अकादमी, २५४}} {{outdent|नॉर्मन, जे० बी० ४९९, ५०१-२, ५१८, ५४८, ५५४, ५६३-६४, ५६६, ५७०}} {{outdent|निर्णयतत्त्वत, -की व्याख्या, ९७}} {{outdent|नीठाभाई, १८२}} {{outdent|नटाल, ५७, २५२, ३३९, ३४२, ३९७; -एक ब्रिटिश उपनिवेश, २२५; -में गिरमिट प्रथा, १५०}} {{outdent|नेपाल, बाबू, १६७}} {{outdent|नेपाली, ४२७}} {{outdent|नेशनलिस्ट दल, -और कांग्रेस, २७६}} {{outdent|नैतिकता-समिति संघ (यूनियन ऑफ एथिकल सोसाइटी), ३६८ पा० टि०}} {{outdent|नौरोजी, दादाभाई, ७, १४८, २७३ पा० टि०}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> m19nqxej4920f003k2n4837dpq3dehk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६९० 250 176895 675100 619885 2026-08-30T05:42:51Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 675100 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{rh|६५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Multicol}} {{outdent|न्यू इंडिया, २२० पा० टि., २३६ पा० टि., २४१, २८५, ३३०}} {{c|'''प'''}} {{outdent|पंड्या, कामेश्वर, ४३३, ४७३}} {{outdent|पटवारी रणछोड़लाल, १६, २१, ८८, ९५ पा० टि., १०५, १०७-८, १६२, १६४, १७२-७३, ४७२}} {{outdent|पटेल, अध्यापक, २० पा० टि.,}} {{outdent|पटेल, नानालाल दलपतराम, १७२}} {{outdent|पटेल, नारनदास, १४३}} {{outdent|पटेल, पुरुषोत्तम, १८०}} {{outdent|पटेल, मगनभाई, २०-२२, ३७, ८७-८८, १३७, १७३, १७५, १७९-८०, २६८-६९, २७७}} {{outdent|पट्टणी, सर प्रभाशंकर, १५३, १७६, ४७३}} {{outdent|पडियार, १६७}} {{outdent|पदमजी, सरदार नौरोजी, २३}} {{outdent|परमानन्ददास, १८८}} {{outdent|परमार, मूलचन्द, १८०, १८३}} {{outdent|परमार, रतनसिंह, १७८, १८०}} {{outdent|परमार, शिवसिंह, १७८}} {{outdent|परांजपे, आर० पी०, २४७}} {{outdent|परीख, नरहरि, 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पा० टि., १७४-७५, १८२, २६८, २९४, ३१०, ३४९, ३६५, ४५९}} {{outdent|पेटिट, श्रीमती, ५२५}} {{outdent|पेन्टर, १७८, १८५}} {{outdent|पोप, डॉ० जॉर्ज उग्लो, -की पुस्तकें, ८८}} {{outdent|पोपटलाल, १६६, १७३-७५, १८७-८८, ३४५, ४७३, ४९२}} {{outdent|पोलक, एच० एस० एल० ६०, ११२, १३२, १३८-३९, १४१, १७६, २९४, २९६, ३१०-११, ३३९ पा० टि., ३४०, ३४९, ३५९, ३६८, ३७१ पा० टि., ३७३, ४४५, ५२०, ५२५, ५४०}} {{outdent|पोलक, श्रीमती, ३६१, ४२३, ५२५}} {{outdent|पोशाक, -के बारेमें विचार, ४५५}} {{outdent|प्रकाशानन्द, १८३}} {{outdent|प्रजाबन्धु, १४७ पा० टि., २७१}} {{outdent|प्रताप, ४६५}} {{outdent|प्रभुदास, भगवानदास, १६}} {{outdent|प्रह्लाद, ९६, २२९, ५२७, ५३१, ५४०; -का दृष्टान्त, २२९}} {{outdent|प्रागजी, हंसराज, ९}} {{outdent|प्राणलाल, १६७}} {{outdent|प्रैट, १७७, १८१}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> l2c7w0o4yx09a935jlxa1pxmj4y2bl2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१४३ 250 182011 675200 628194 2026-08-30T11:18:36Z रितु कुमारी साव 6333 675200 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manisha yadav12" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''९२. भाषण: अहमदनगरमें'''<ref>यह भाषण नगरपालिका, जिला बोर्ड और हिन्दूसभा द्वारा दिये गये अभिनन्दनपत्रोंके उत्तरमें दिया गया था।</ref>}}}} {{right|१८ फरवरी, १९२७}} मैं अभी-अभी राष्ट्रीय पाठशाला होकर आया हूँ। मैंने लगभग एक घंटेतक एक कड़े निरीक्षककी तरह संस्थाके सारे प्रबन्ध और कार्य-प्रणालीका निरीक्षण किया है और उसे सन्तोषजनक पाया है। मैंने विद्यार्थियोंसे दिल खोलकर सोत्साह बातचीत करते हुए पूरी तरहसे उनको जाँच लिया है और उन्हें कुशाग्रबुद्धि तथा हाजिर जवाब पाया है। संक्षेपमें अहमदनगर राष्ट्रीय पाठशालाके रूपमें मैंने अन्धकारसे भरे बड़े मरुस्थलके बीच एक सुन्दर छोटा-सा नखलिस्तान ही देखा है।<ref>अहमदनगर राष्ट्रीय पाठशालाके प्रधानाचार्य एच॰ वी॰ हिरे द्वारा १९२८ में जारी की गई एक छपी पुस्तिकाकी माइक्रोफिल्म (एस॰ एन॰ १४८४१) से।</ref> '''[भाषण जारी रखते हुए] श्री गांधीने कहा कि यदि अहमदनगर जिला गरीब है, तो शेष भारत और भी गरीब है। सैकड़ों-हजारों स्त्री-पुरुषोंके पास किसी भी तरहका रोजगार नहीं है और वे लगभग भूखे रहते हैं। मेरे मनमें इसपर जरा भी सन्देह नहीं है कि केवल खादीका काम ही इन लोगोंको कुछ रोजगार और रोटी दे सकता है। उन्होंने सभी उपस्थित लोगोंसे अपील की कि आप अपनी शक्तिभर मेरे इस महान कार्यके लिए मुझे धन दें।''' {{left|[अंग्रेजीसे] <br>हिन्दू, १९-२-१९२७}} {{c|{{x-larger|'''९३. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{right|मीराजगाँव <br>१९ फरवरी, १९२७}} {{left|प्रिय सतीशबाबू,}} तो आप और हेमप्रभादेवी पूरी तरहसे कसौटीपर कसे जा रहे हैं। आप इस बहुत ही कठिन परीक्षाका<ref>अभिप्राय उनके पुत्र अनिलको मृत्युसे है।</ref> सामना कर लेंगे और उसमें सफल होकर निकलेंगे। 'भगवद्गीता' का दूसरा अध्याय बार-बार पढ़िये और सच्चे योद्धाओंकी तरह, जैसे कि आप हैं, संघर्षका सामना कीजिए। अब आप लोगोंपर अपना ध्यान रखनेकी जिम्मेदारी दुगुनी हो गई है। ईश्वरके उद्देश्योंके लिए जो-कुछ आपके पास न्यासके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> pjcvlltyogqa37pb26zyp9te0hbh03b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१० 250 182129 674976 628673 2026-08-29T16:17:41Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674976 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{dhr}} {{c|{{larger| '''जनवरी १९६५ (माघ १८८६)'''}}}} {{dhr|5em}} {{c|{{larger|'''© नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, १९६५'''}}}} {{dhr|5em}} {{c|{{larger|'''साढ़े सात रुपये'''}}}} {{dhr|8em}} {{c|{{x-larger|'''कापीराइट'''}}<br> {{larger|'''नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनूमतिसे'''}}}} {{dhr|10em}} {{c|{{x-larger|''' निदेशक, प्रकाशक विभाग, नई दिल्ली–६, द्वारा प्रकाशित}}<br> {{larger|'''और जीवणजी डाह्याभाई देसाई, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद–१४, द्वारा मुद्रित'''}}}}<noinclude></noinclude> 393d39ipqdp1yl1qw0u8z6wnf85k28s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/११ 250 182130 674981 628674 2026-08-29T16:26:08Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674981 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|{{x-larger|'''भूमिका'''}}}}</noinclude>गांधीजीके दक्षिण आफ्रिका-कालसे सम्बन्धित पुस्तक-मालाका यह अन्तिम खण्ड है । इसमें अप्रैल १९१३ से दिसम्बर १९१४ तक की सामग्रीका संग्रह किया गया है । अन्तिम सत्याग्रह-संघर्ष, स्मट्स-गांधी समझौता और उसके फलस्वरूप भारतीय राहत विधेयककी रचना और गांधीजीका मातृभूमि गमन इस कालकी मुख्य घटनाएँ हैं । केप सर्वोच्च न्यायालयके न्यायमूर्ति सर्लने १४ मार्च, १९१३को फैसला दिया था कि गैर-ईसाई विधिके अनुसार सम्पन्न या विवाह-अधिकारीके सामने अपॅजीयित भारतीय विवाहोंको दक्षिण आफ्रिका संघमें मान्यता नहीं दी जायेगी। इस फैसलेका नतीजा यह निकला कि हिन्दू और मुसलमान पत्नियोंका दर्जा एक तरह से रखैल औरतोंका और उनकी सन्तानका दर्जा अवैध सन्तानका बन गया । उससे भारतीयोंकी धार्मिक भावनाको गहरी ठेस लगी । नये प्रवासी विधेयकका मौजूदा अधिकारोंपर बुरा असर पड़ा; उसने नई-नई निर्योग्यताएँ भी थोप दीं। नेटाल-भारतीयोंके अधिवास-सम्बन्धी अधिकार गड़बड़ा गये; शिक्षित भारतीयोंकी पत्नियों और सन्तानको भी संघमें प्रवेश पाना मुश्किल हो गया । सन् १९११के अस्थायी समझौते (प्रॉवीजनल सेटलमेंट) में निहित समझौतेका सार तत्त्व ही था कि भारतीय प्रवासियोंपर ऐसी निर्योग्यताएँ नहीं थोपी जायेंगी जो अन्य जातियों, या संघके अन्य वर्गोंपर लागू होती हों । परन्तु हुआ यह कि प्रवासी विधेयकने भारतीयोंपर खुद कानूनमें ही जातीय भेदभावसे युक्त बाधा लाद दी। गांधीजीने उसे दक्षिण आफ्रिकासे निवासी एशियाइयोंको निकालनेकी एक जानी-बूझी कोशिश के रूप में देखा । गांधीजीने अप्रैल १९१३ में गृह मन्त्रालयको जो अभ्यावेदन-पत्र भेजे थे उनमें इन बातोंपर जोर दिया गया था कि सर्ल-निर्णयके फलस्वरूप उत्पन्न विषम परिस्थितिका निराकरण संघके विवाह सम्बन्धी कानूनों में रद्दोबदल करके ही किया जा सकेगा; वर्तमान अधिकारोंको बहाल करनेके लिए प्रवासी विधेयकको संशोधित किया जाना चाहिए; तीन पौंडी कर हटा दिया जाना चाहिए; ट्रान्सवालके कानूनमें मौजूद जातीय भेदभावके दोषको दूर किया जाना चाहिए, और मौजूदा कानूनोंके अमलमें उदारतासे काम लेना चाहिए। गांधीजीने स्पष्ट कर दिया था कि यदि सरकार इन माँगोंको स्वीकार करनेमें असमर्थता प्रकट करेगी, तो भारतीय समाजको सत्याग्रहका सहारा लेना पड़ेगा। इस बारका आन्दोलन थोड़े ही समय चलेगा और उसकी गति तेज होगी। वह समूचे संघ में चलाया जायेगा और उसमें पहली बार नारियाँ भी सत्याग्रहियोंके रूपमें भाग लेंगी। भारतीय नारी जो युगोंसे अपनी सामाजिक परम्पराओंके कारण घरकी चार दीवारीके भीतर रहती आई थी सर्ल-निर्णयकी चुनौती स्वीकार करनेके लिए तैयार हो गई और उसने सघर्ष में कूदनेका निश्चय कर लिया। प्रवासी विधेयकका<noinclude></noinclude> pbzfxk5f8k0nnu8ns0vh3q30bhx4khh 675037 674981 2026-08-29T21:05:22Z सीमा1 430 675037 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|{{x-larger|'''भूमिका'''}}}}</noinclude>गांधीजीके दक्षिण आफ्रिका-कालसे सम्बन्धित पुस्तक-मालाका यह अन्तिम खण्ड है । इसमें अप्रैल १९१३ से दिसम्बर १९१४ तक की सामग्रीका संग्रह किया गया है । अन्तिम सत्याग्रह-संघर्ष, स्मट्स-गांधी समझौता और उसके फलस्वरूप भारतीय राहत विधेयककी रचना और गांधीजीका मातृभूमि गमन इस कालकी मुख्य घटनाएँ हैं । केप सर्वोच्च न्यायालयके न्यायमूर्ति सर्लने १४ मार्च, १९१३को फैसला दिया था कि गैर-ईसाई विधिके अनुसार सम्पन्न या विवाह-अधिकारीके सामने अपॅजीयित भारतीय विवाहोंको दक्षिण आफ्रिका संघमें मान्यता नहीं दी जायेगी। इस फैसलेका नतीजा यह निकला कि हिन्दू और मुसलमान पत्नियोंका दर्जा एक तरह से रखैल औरतोंका और उनकी सन्तानका दर्जा अवैध सन्तानका बन गया । उससे भारतीयोंकी धार्मिक भावनाको गहरी ठेस लगी । नये प्रवासी विधेयकका मौजूदा अधिकारोंपर बुरा असर पड़ा; उसने नई-नई निर्योग्यताएँ भी थोप दीं। नेटाल-भारतीयोंके अधिवास-सम्बन्धी अधिकार गड़बड़ा गये; शिक्षित भारतीयोंकी पत्नियों और सन्तानको भी संघमें प्रवेश पाना मुश्किल हो गया । सन् १९११के अस्थायी समझौते (प्रॉवीजनल सेटलमेंट) में निहित समझौतेका सार तत्त्व ही था कि भारतीय प्रवासियोंपर ऐसी निर्योग्यताएँ नहीं थोपी जायेंगी जो अन्य जातियों, या संघके अन्य वर्गोंपर लागू होती हों । परन्तु हुआ यह कि प्रवासी विधेयकने भारतीयोंपर खुद कानूनमें ही जातीय भेदभावसे युक्त बाधा लाद दी। गांधीजीने उसे दक्षिण आफ्रिकासे निवासी एशियाइयोंको निकालनेकी एक जानी-बूझी कोशिश के रूप में देखा । गांधीजीने अप्रैल १९१३ में गृह मन्त्रालयको जो अभ्यावेदन-पत्र भेजे थे उनमें इन बातोंपर जोर दिया गया था कि सर्ल-निर्णयके फलस्वरूप उत्पन्न विषम परिस्थितिका निराकरण संघके विवाह सम्बन्धी कानूनों में रद्दोबदल करके ही किया जा सकेगा; वर्तमान अधिकारोंको बहाल करनेके लिए प्रवासी विधेयकको संशोधित किया जाना चाहिए; तीन पौंडी कर हटा दिया जाना चाहिए; ट्रान्सवालके कानूनमें मौजूद जातीय भेदभावके दोषको दूर किया जाना चाहिए, और मौजूदा कानूनोंके अमलमें उदारतासे काम लेना चाहिए। गांधीजीने स्पष्ट कर दिया था कि यदि सरकार इन माँगोंको स्वीकार करनेमें असमर्थता प्रकट करेगी, तो भारतीय समाजको सत्याग्रहका सहारा लेना पड़ेगा। इस बारका आन्दोलन थोड़े ही समय चलेगा और उसकी गति तेज होगी। वह समूचे संघ में चलाया जायेगा और उसमें पहली बार नारियाँ भी सत्याग्रहियोंके रूपमें भाग लेंगी। भारतीय नारी जो युगोंसे अपनी सामाजिक परम्पराओंके कारण घरकी चार दीवारीके भीतर रहती आई थी सर्ल-निर्णयकी चुनौती स्वीकार करनेके लिए तैयार हो गई और उसने सघर्ष में कूदनेका निश्चय कर लिया। प्रवासी विधेयकका<noinclude></noinclude> as02ixql0lykgdu11i1klhq4z82zmw6 675038 675037 2026-08-29T21:05:51Z सीमा1 430 675038 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|{{x-larger|'''भूमिका'''}}}}</noinclude>गांधीजीके दक्षिण आफ्रिका-कालसे सम्बन्धित पुस्तक-मालाका यह अन्तिम खण्ड है । इसमें अप्रैल १९१३ से दिसम्बर १९१४ तक की सामग्रीका संग्रह किया गया है । अन्तिम सत्याग्रह-संघर्ष, स्मट्स-गांधी समझौता और उसके फलस्वरूप भारतीय राहत विधेयककी रचना और गांधीजीका मातृभूमि गमन इस कालकी मुख्य घटनाएँ हैं । केप सर्वोच्च न्यायालयके न्यायमूर्ति सर्लने १४ मार्च, १९१३को फैसला दिया था कि गैर-ईसाई विधिके अनुसार सम्पन्न या विवाह-अधिकारीके सामने अपॅजीयित भारतीय विवाहोंको दक्षिण आफ्रिका संघमें मान्यता नहीं दी जायेगी। इस फैसलेका नतीजा यह निकला कि हिन्दू और मुसलमान पत्नियोंका दर्जा एक तरह से रखैल औरतोंका और उनकी सन्तानका दर्जा अवैध सन्तानका बन गया । उससे भारतीयोंकी धार्मिक भावनाको गहरी ठेस लगी । नये प्रवासी विधेयकका मौजूदा अधिकारोंपर बुरा असर पड़ा; उसने नई-नई निर्योग्यताएँ भी थोप दीं। नेटाल-भारतीयोंके अधिवास-सम्बन्धी अधिकार गड़बड़ा गये; शिक्षित भारतीयोंकी पत्नियों और सन्तानको भी संघमें प्रवेश पाना मुश्किल हो गया । सन् १९११के अस्थायी समझौते (प्रॉवीजनल सेटलमेंट) में निहित समझौतेका सार तत्त्व ही था कि भारतीय प्रवासियोंपर ऐसी निर्योग्यताएँ नहीं थोपी जायेंगी जो अन्य जातियों, या संघके अन्य वर्गोंपर लागू होती हों । परन्तु हुआ यह कि प्रवासी विधेयकने भारतीयोंपर खुद कानूनमें ही जातीय भेदभावसे युक्त बाधा लाद दी। गांधीजीने उसे दक्षिण आफ्रिकासे निवासी एशियाइयोंको 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विधेयकका<noinclude></noinclude> 1o3r6e3jbh620mmm9yda1nw6oq2adwy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१२ 250 182131 674984 628675 2026-08-29T16:33:50Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674984 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|छः|}}</noinclude>द्वितीय वाचन होते-होते, २६ अप्रैलको ही भारतीय नारियोंने अपना तीव्र विरोध और सत्याग्रह छेड़ने का संकल्प घोषित कर दिया था। सरकार इस सबपर भड़क उठी; उसने कहा कि यदि भारतीय समाज अपनी धमकीपर अमल करेगा, तो सरकारको विवश होकर बिना लाग-लपेटके अपनी बात साफ-साफ करनी पड़ेगी। गांधीजीने खुलासा किया कि आन्दोलन इस बातका प्रयास होगा कि ब्रिटिश संविधानकी “सुन्दर कल्पना में अपनी आस्था बनाये हुए" सत्याग्रही लोग " उसे चरितार्थ करनेके लिए संघर्ष करनेको या उस संघर्ष में मर मिटनेको तैयार हैं।” (पृष्ठ ७१ ) लगता है कि सरकारके रुखमें कुछ नरमी आई और वह केप तथा नेटालके कानूनोंके अन्तर्गत मौजूदा अधिकारोंको बहाल करने और कुछ बातों में प्रवासी विधेयकको संशोधित करनेपर राजी हो गई। परन्तु भारतीय विवाहोंसे सम्बन्धित अपने विचारों में थोड़ी भी रद्दोबदल करनेके लिए वह तैयार नहीं थी। गांधीजीने स्पष्टीकरण किया कि वे केवल भारतमें हिन्दू और मुसलमान धार्मिक विधिसे सम्पन्न हुए विवाहों को मान्यता दिलाना चाहते हैं। कानून में परिवर्तन करके उसे ट्रान्सवालके विवाह-सम्बन्धी कानूनके अनुरूप बनाया जा सकता है, जिसमें यूरोपीय विवाहोंको मान्यता दी गई है। सरकारने इसके लिए शर्त रखी कि तब भारतीयोंको विवाहके पंजीयन प्रमाणपत्र पेश करने चाहिए। गांधीजीने इसपर स्पष्ट कहा कि भारत में पंजीयनकी प्रथा न होनेसे न तो ऐसा सम्भव है और न आवश्यक ही, क्योंकि भारतमें विवाहकी विधियाँ समुचित सार्वजनिक समारोहके साथ सम्पन्न की जाती हैं। गांधीजीने प्रवासी विधेयकके संशोधनोंके लिए आग्रह करने में केप टाउनके चन्द यूरोपीय संसद सदस्योंकी मैत्री और सहानुभूति-पूर्ण भावनाओंका काफी उपयोग किया, लेकिन सरकारने जो संशोधन स्वीकार किये वे बहुत अपर्याप्त थे। गांधीजीने २ जूनको एक भेंटके दौरान घोषित किया कि यदि सरकार भारतीयोंकी माँगें नहीं मानती तो सत्याग्रह अनिवार्य हो जायेगा । लगता है कि सरकार सत्याग्रह फिर शुरू होने की सम्भावनासे काफी अधिक चिन्तित थी । संघके गवर्नर-जनरल लॉर्ड ग्लैड्स्टनने अपने एक गुप्त खरीतेमें उपनिवेश कार्यालयको लिखा था कि वह भारत सरकारको परिस्थितिकी गम्भीरता समझाये और इससे "गांधी तथा अन्य लोगोंपर अपना प्रभाव डालनेके लिए" कहे, जिससे कि संकट टाला जा सके। उन्होंने लिखा था कि वह तीन-पौंडी करको पूरी तौरपर रद कराने की भरसक कोशिश कर रहे हैं । जूनके प्रारम्भ में सरकारने केवल स्त्रियोंको करसे मुक्त करनेका फैसला किया। गांधीजीने बतलाया कि तीन-पौंडी कर रद करने का जो वचन गोखलेको दिया गया था उसमें स्त्री और पुरुषोंके बीच ऐसा कोई भेद नहीं किया गया था । प्रवासी विधेयक ११ जूनको पास हुआ और १३ जूनको गांधीजीने कहा कि यदि विधेयकपर सम्राट्की अनुमति मिलना नहीं रोका जाता और १९११के अस्थायी समझौते के सिलसिले में दिये गये आश्वासनको कार्यान्वित नहीं किया जाता तो स्त्री-पुरुष सत्याग्रह शुरू कर देंगे । १६ जूनको ब्रिटिश भारतीय संघने गवर्नर-जनरलसे औपचारिक रूपमें अनुरोध किया कि वह अधिनियमका अनुमोदन न करें । गांधीजीने मँडराते हुए संकटको टालनेकी एक आखिरी<noinclude></noinclude> fmpu8f8f616gs0rluehpff0xw0v9gpu 675039 674984 2026-08-29T21:06:54Z सीमा1 430 675039 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|छः|}}</noinclude>द्वितीय वाचन होते-होते, २६ अप्रैलको ही भारतीय नारियोंने अपना तीव्र विरोध और सत्याग्रह छेड़ने का संकल्प घोषित कर दिया था। सरकार इस सबपर भड़क उठी; उसने कहा कि यदि भारतीय समाज अपनी धमकीपर अमल करेगा, तो सरकारको विवश होकर बिना लाग-लपेटके अपनी बात साफ-साफ करनी पड़ेगी। गांधीजीने खुलासा किया कि आन्दोलन इस बातका प्रयास होगा कि ब्रिटिश संविधानकी “सुन्दर कल्पना में अपनी आस्था बनाये हुए "सत्याग्रही लोग" उसे चरितार्थ करनेके लिए संघर्ष करनेको या उस संघर्ष में मर मिटनेको तैयार हैं।” (पृष्ठ ७१ ) लगता है कि सरकारके रुखमें कुछ नरमी आई और वह केप तथा नेटालके कानूनोंके अन्तर्गत मौजूदा अधिकारोंको बहाल करने और कुछ बातों में प्रवासी विधेयकको संशोधित करनेपर राजी हो गई। परन्तु भारतीय विवाहोंसे सम्बन्धित अपने विचारों में थोड़ी भी रद्दोबदल करनेके लिए वह तैयार नहीं थी। गांधीजीने स्पष्टीकरण किया कि वे केवल भारतमें हिन्दू और मुसलमान धार्मिक विधिसे सम्पन्न हुए विवाहों को मान्यता दिलाना चाहते हैं। कानून में परिवर्तन करके उसे ट्रान्सवालके विवाह-सम्बन्धी कानूनके अनुरूप बनाया जा सकता है, जिसमें यूरोपीय विवाहोंको मान्यता दी गई है। सरकारने इसके लिए शर्त रखी कि तब भारतीयोंको विवाहके पंजीयन प्रमाणपत्र पेश करने चाहिए। गांधीजीने इसपर स्पष्ट कहा कि भारत में पंजीयनकी प्रथा न होनेसे न तो ऐसा सम्भव है और न आवश्यक ही, क्योंकि भारतमें विवाहकी विधियाँ समुचित सार्वजनिक समारोहके साथ सम्पन्न की जाती हैं। गांधीजीने प्रवासी विधेयकके संशोधनोंके लिए आग्रह करने में केप टाउनके चन्द यूरोपीय संसद सदस्योंकी मैत्री और सहानुभूति-पूर्ण भावनाओंका काफी उपयोग किया, लेकिन सरकारने जो संशोधन स्वीकार किये वे बहुत अपर्याप्त थे। गांधीजीने २ जूनको एक भेंटके दौरान घोषित किया कि यदि सरकार भारतीयोंकी माँगें नहीं मानती तो सत्याग्रह अनिवार्य हो जायेगा । लगता है कि सरकार सत्याग्रह फिर शुरू होने की सम्भावनासे काफी अधिक चिन्तित थी । संघके गवर्नर-जनरल लॉर्ड ग्लैड्स्टनने अपने एक गुप्त खरीतेमें उपनिवेश कार्यालयको लिखा था कि वह भारत सरकारको परिस्थितिकी गम्भीरता समझाये और इससे "गांधी तथा अन्य लोगोंपर अपना प्रभाव डालनेके लिए" कहे, जिससे कि संकट टाला जा सके। उन्होंने लिखा था कि वह तीन-पौंडी करको पूरी तौरपर रद कराने की भरसक कोशिश कर रहे हैं । जूनके प्रारम्भ में सरकारने केवल स्त्रियोंको करसे मुक्त करनेका फैसला किया। गांधीजीने बतलाया कि तीन-पौंडी कर रद करने का जो वचन गोखलेको दिया गया था उसमें स्त्री और पुरुषोंके बीच ऐसा कोई भेद नहीं किया गया था । प्रवासी विधेयक ११ जूनको पास हुआ और १३ जूनको गांधीजीने कहा कि यदि विधेयकपर सम्राट्की अनुमति मिलना नहीं रोका जाता और १९११के अस्थायी समझौते के सिलसिले में दिये गये आश्वासनको कार्यान्वित नहीं किया जाता तो स्त्री-पुरुष सत्याग्रह शुरू कर देंगे । १६ जूनको ब्रिटिश भारतीय संघने गवर्नर-जनरलसे औपचारिक रूपमें अनुरोध किया कि वह अधिनियमका अनुमोदन न करें । गांधीजीने मँडराते हुए संकटको टालनेकी एक आखिरी<noinclude></noinclude> s0ewjxa4aib2g2myqiil41usyo1r6e9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१३ 250 182132 674988 628676 2026-08-29T16:42:10Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674988 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|सात|}}</noinclude>{{gap}}कोशिश की। उन्होंने प्रिटोरिया जाकर २८ जूनको भारतीयोंका दृष्टिकोण पेश किया और यह आश्वासन माँगा कि कमसे कम अगले वर्ष तो कानून संशोधित कर दिया जायेगा। उन्होंने २ जुलाईको गृह-सचिवसे भेंट की और भारतीयोंकी ये बुनियादी माँगें पेश कीं : केप प्रान्तमें प्रवेश के अधिकारको मान्यता, नेटालमें अधिवास सम्बन्धी अधिकारोंकी रक्षा, फ्री स्टेटमें प्रवेशाथियोंसे भूमि, व्यापार, इत्यादिसे सम्बन्धित हलफनामेकी माँग न करना और कानूनके संशोधन द्वारा या विवाह-अधिकारियोंको प्रमाणीकरणकी शक्ति देकर भारतीय विवाहोंका वैधीकरण । उन्होंने कहा कि आखिरी माँगके अतिरिक्त अन्य सभी माँगोंको प्रशासकीय कार्रवाई द्वारा पूरा किया जा सकता है । (पृष्ठ १२०) । गांधीजी जनरल स्मट्ससे भी भेंट करनेके लिए तैयार थे, परन्तु जोहानिसबर्गके कोयला-खनिकों की हड़ताल के कारण जनरल स्मट्स लगातार व्यस्त बने रहे । गांधीजी ११ अगस्त तक भी औद्योगिक झगड़ा शान्त होनेपर जनरल स्मट्ससें भेंट कर पानेकी राह देखते रहे, परन्तु उनको इसी उत्तरपर सन्तोष करना पड़ा कि गृह मन्त्रालय उनके २ जुलाईके प्रस्तावोंपर विचार कर रहा है। गांधीजीने ३ सितम्बरको फिर अनुरोध करते हुए कहा कि अपनी माँगों में नरमी और संयम बरतने में उनका उद्देश्य समझौतेको आसान बनाने और यह दिखलानेका रहा है कि भारतीय लोग संघर्षकी पुनरावृत्तिके लिए 'उतावले' नहीं हो रहे हैं। परन्तु गृह मन्त्रालयने १० सितम्बरको ऐलान कर दिया कि वह अगले वर्ष भी संसदीय कार्रवाईके जरिये वर्तमान विवाह कानूनका आधार बदलनेका वचन नहीं दे सकता और उसने विचाराधीन मुकदमे को वापस लेनेसे इनकार कर दिया । इस प्रकार सत्याग्रह सर्वथा अनिवार्य हो गया; दूसरा कोई चारा नहीं था। गांधीजीके द्वारा इस अवसरपर व्यक्त किये गये इन उद्गारोंसे एक समूचे उस समाजकी मनोव्यथा टपकती है जिसे अधिकारियोंकी जिदके कारण संघर्ष छेड़ने के लिए लाचार होना पड़ा था... " एक प्रतिनिधित्वहीन समाज है और उसकी कोई सुनवाई नहीं होती; उसे अतीत में बहुत गलत समझा गया है; वह एक विचित्र किन्तु तीव्र प्रजातिगत विद्वेषके हाथों तबाह है, और इसलिए वह अपने गौरव और सम्मानकी रक्षा त्याग और कष्ट सहनके सिवा किसी अन्य उपायसे नहीं कर सकता।" (पृष्ठ १७९-८०) १२ सितम्बरको ब्रिटिश भारतीय संघने सरकारको सत्याग्रहकी पूर्व सूचना दे दी। इस बारका सत्याग्रह ट्रान्सवालकी सीमा में अनधिकृत प्रवेश तक ही सीमित नहीं रहना था, परवानोंके बिना ठेले लगाना या व्यापार करना और माँगे जानेपर भी परवाने दिखाने से इनकार करना भी उसमें शामिल था। स्वाभाविक तथा नैतिक आधारसे कानूनोंका खुले रूपसे उल्लंघन किया जाना था। आन्दोलनकी शुरुआत १५ सितम्बरको की गई थी। कस्तूरबाके नेतृत्वमें १२ पुरुषों और ४ स्त्रियोंका एक दल गिरफ्तार होनेके लिए डर्बनसे फोक्सरस्टको रवाना हुआ। एक शक्तिमान सरकारके विरुद्ध ... मुट्ठीभर" अल्पसंख्यकोंके दलका इस प्रकार भिड़ना एक प्रतीकात्मक कार्य था। (पृष्ठ १८६ ) २० सितम्बरको वे गिरफ्तार किये गये। तीन दिन बाद, कस्तुरबाको कठोर परिश्रम सहित तीन महीनेके कारावासकी और अन्य सत्याग्रहियोंको<noinclude></noinclude> 4s63fh23r03sxipd6bq3wz54a476nd7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१४ 250 182133 674997 628677 2026-08-29T17:01:22Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674997 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|आठ|}}</noinclude>एकसे तीन-तीन महीनेके कारावासकी सजा सुनाई गई। अधिकारियोंकी संघर्षको बदनाम करने और उसमें फूट डालनेकी कोशिशके बावजूद संघर्ष जारी रहा । १७ अक्तूबरको न्यू कैसिलकी कोयला खानोंके भारतीय श्रमिकोंने तीन पौंडी करके विरोध में हड़ताल कर दी। उस हड़तालके साथ ही, संघर्षका नया और क्रान्तिकारी दौर शुरू हो गया। गांधीजीने हड़तालियोंसे कहा कि वे मालिकों द्वारा दी जानेवाली खुराक लेनेसे इनकार कर दें और या तो अपनेको गिरफ्तार करा दें या फिर फोक्सरस्टकी सीमा की ओर प्रयाण करें। गांधीजीने खान-मालिकोंको पूरी बात समझानेके लिए उनकी सभा में भी भाषण किया । संघर्षका तीसरा दौर "महान कूच" के साथ ६ नवम्बरको शुरू हुआ, जब अन्यायपूर्ण तीन-पौंडी करके विरोध में दो हजार से अधिक हड़तालियोंका एक "शानदार जुलूस" उनके नेतृत्वमें ट्रान्सवालमें प्रविष्ट हुआ । ७ और ११ नवम्बरके बीच गांधीजीको तीन बार गिरफ्तार किया गया और दो बार उनको जमानतपर रिहा किया गया। अन्तमें उनको डंडीमें कठोर परिश्रम सहित नौ महीनेके कारावास या ६० पौंड जुर्मानेकी सजा सुना दी गई। उन्होंने जेल जाना पसन्द किया । १४ नवम्बरको उनपर दूसरा मुकदमा चलाया गया और अन्य अपराधोंके लिए तीन महीनेकी सजा दी गई। इस बीच हड़ताल कोयला खानोंसे बढ़कर रेल, चीनी साफ करनेकी फैक्टरियों, गोदी और निगम-कर्मचारियों तक फैल चुकी थी। ८ नवम्बरको ७,००० से ८,००० तक श्रमिकों के हड़तालमें शामिल होनेका समाचार था। अधिकारियोंने हिंसापूर्ण कार्रवाई भी की और इसके फलस्वरूप, जैसा कि अनिवार्य था, विदेशों में जनमत सत्याग्रहियोंके पक्षमें जाग्रत हुआ । वाइसराय लॉर्ड हार्डिजने २९ नवम्बरको मद्रासमें भाषण करते हुए सत्याग्रहियोंके प्रति अपनी चिन्ता और सहानुभूति व्यक्त की । इसके बाद कालमें भारतीयोंकी समस्याके बारेमें सरकारकी नीतिमें कब क्या परिवर्तन आया, यह अधिकारियोंके पत्र-व्यवहार में, विशेषकर गवर्नर-जनरलकी ओरसे ब्रिटिश उपनिवेश-कार्यालयको भेजे गये गुप्त खरीतों में देखा जा सकता है। अधिकारियोंके साथ हुई गांधीजीकी कुछ भेंटोंका विवरण तो केवल उनमें ही मिलता है। गांधीजीके जेल जानेके बादका घटना-क्रम और वास्तवमें तो १८९४ से १९९४ तक दक्षिण आफ्रिका में चलनेवाले भारतीयोंके समूचे संघर्षका एक संक्षिप्त सिंहावलोकन दिसम्बर १९१४के 'इंडियन ओपिनियन' के 'स्वर्ण अंक'में प्रकाशित एक प्रामाणिक सम्पादकीय में मिलता है (देखिए परिशिष्ट २८)। इसमें जैसे घटना क्रम बतलाते हुए कहा गया है 'मद्रासमें लॉर्ड हार्डिजका वह प्रसिद्ध भाषण, जिसमें उन्होंने भारतीय जनमतके स्वरमें स्वर मिलाकर उसका समर्थन किया और फिर उनकी जांच आयोगकी माँग; लॉर्ड ऍम्टहिलकी समितिके उत्साहपूर्ण प्रयत्न; साम्राज्य सरकारका तत्परताके साथ हस्तक्षेप करना; भारतीय समाजकी भावनाका कोई खयाल न करते हुए एक ऐसे आयोगकी नियुक्ति जिसके सदस्य भारतीयोंको कतई सन्तुष्ट नहीं कर सकते थे; नेताओंकी रिहाई; जिनकी आयोगकी उपेक्षा करनेकी सलाह लगभग पूर्णतः स्वीकार कर ली गई; श्री ऐन्ड्रयूज और पियर्सनका आगमन और समझौतेके लिए उनका अद्भुत कार्य; हरबतसिंह<noinclude></noinclude> quzkrf82n9y5f4fkbnq6eizufg5jm6f पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१५ 250 182134 675004 628678 2026-08-29T17:24:32Z सीमा1 430 /* शोधित */ 675004 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|नौ|}}</noinclude>और वलिअम्माकी मृत्यु; वह तनावपूर्ण स्थिति, जिसमें सिर्फ यूरोपीयोंकी दूसरी हड़तालके कारण ही हलकापन आ सका, क्योंकि श्री गांधीने एक बार फिर तय कर लिया कि जबतक सरकार इस नई मुसीबत में फँसी हुई है तबतक उसे परेशान न किया जाये; और सरकारके इस स्थितिपर काबू पा जानेपर, सौहार्द्र, विश्वास और सहयोगकी वह भावना, जो महान् भारतीय नेताकी उदारनीतिसे और अपने महान साम्राज्यीय उद्देश्यकी सफलताके लिए प्रयत्न करते हुए श्री ऐन्ड्र्यूजके उनपर स्नेहपूर्ण प्रभावसे निर्मित थी ।" गांधीजीने विदाईके अवसरपर भारतीय समाजके नाम अपने पत्रमें २६ जूनको पास हुए भारतीय राहत अधिनियम में समाविष्ट समझौतेको दक्षिण आफ्रिकामें भारतीय स्वातंत्र्यका "अधिकारपत्र" (मैग्ना कार्टा) कहा था, क्योंकि वह भारतीयोंके प्रति सरकारी नीतिके परिवर्तनका द्योतक था और उसमें भारतीयोंके इस अधिकारको मान्यता दी गई थी कि उनसे सम्बन्धित मामलों में उनकी राय ली जायेगी और उनकी उचित आकांक्षाओं का सम्मान किया जायेगा। इस प्रकार उनके लिए अपनी मातृभूमिके बाद सबसे अधिक पवित्र और प्रिय बन जानेवाले उप-महाद्वीप (पृष्ठ ४९६)-- दक्षिण आफ्रिकासे १८ जुलाईको विदाई लेते समय, गांधीजीके मन में यही भाव था कि उन्होंने जिस कामका बीड़ा उठाया था वह काम पूरा हो चुका है। गांधीजी ४ अगस्त से १८ सितम्बर तक लन्दन में रुके। उसी बीच प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया। गांधीजी कई बार बीमार पड़नेके बावजूद एक "भारतीय एम्बुलैंस कोर"के संगठन में सक्रिय रूपसे लगे रहे। उस संकटकी घड़ी में साम्राज्यके प्रति उनकी राजभक्तिका यह एक प्रतीक था। इस कार्य में भी एक बार उन्हें सत्याग्रह करनेका अवसर आ पड़ा था। प्रश्न था भारतीयोंके इस अधिकारका कि 'कोर'की टुकड़ियोंको तैनात करनेके बारेमें भारतीयोंसे परामर्श किया जाना चाहिए और वह भारतीयोंके आत्म-सम्मान से सम्बन्ध रखता था। गांधीने इसको लेकर सत्याग्रह किया और उनकी जीत हुई । गांधीजी १९ सितम्बरको भारतके लिए रवाना हुए—उस देशके लिए “जहाँ समूचे संसारके सुख एवं उत्थानके लिए आध्यात्मिक ज्ञानका विशालतम भण्डार मौजूद है।"उन्होंने भारत और ग्रेट ब्रिटेनके सम्बन्धोंको पारस्परिक आदान-प्रदान द्वारा (पृ० ५५६) और दृढ़ बनानेके लिए काम करनेपर जोर दिया--इस बातसे उनके तत्कालीन राजनीतिक दृष्टिकोणका पता चलता है। यात्रा-कालकी अपनी भावनाको उन्होंने वेस्टके नाम जहाजसे लिखे गये पत्रमें व्यक्त किया है।" इतनी बार मुझे भारत जाते-जाते रुक जाना पड़ा है कि एकाएक मनको विश्वास नहीं होता कि मैं भारत जानेवाले जहाजमें बैठा हूँ। और मेरी समझ में नहीं आता कि वहाँ पहुँचकर मुझे स्वयं क्या करना होगा? फिर भी 'हे सदय प्रकाश, घिरे हुए अन्धकारमें मुझे रास्ता दिखा; मुझे आगे ले चल' यही विचार मुझे ढाढस देता है..।" (पृ० ५५७-५८) इस खण्ड में मौजूद निजी पत्रोंसे पता चलता है कि संघर्षकी उथल-पुथलके बीच भी गांधीजी ईश्वर और मोक्षके प्रश्नोंपर विचार करते रहते थे। इन पत्रों में देखा<noinclude></noinclude> 1uwn1dkbmat6vbmx3c56e00j4avb2j5 675005 675004 2026-08-29T17:25:26Z सीमा1 430 675005 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|नौ|}}</noinclude>और वलिअम्माकी मृत्यु; वह तनावपूर्ण स्थिति, जिसमें सिर्फ यूरोपीयोंकी दूसरी हड़तालके कारण ही हलकापन आ सका, क्योंकि श्री गांधीने एक बार फिर तय कर लिया कि जबतक सरकार इस नई मुसीबत में फँसी हुई है तबतक उसे परेशान न किया जाये; और सरकारके इस स्थितिपर काबू पा जानेपर, सौहार्द्र, विश्वास और सहयोगकी वह भावना, जो महान् भारतीय नेताकी उदारनीतिसे और अपने महान साम्राज्यीय उद्देश्यकी सफलताके लिए प्रयत्न करते हुए श्री ऐन्ड्र्यूजके उनपर स्नेहपूर्ण प्रभावसे निर्मित थी ।" गांधीजीने विदाईके अवसरपर भारतीय समाजके नाम अपने पत्रमें २६ जूनको पास हुए भारतीय राहत अधिनियम में समाविष्ट समझौतेको दक्षिण आफ्रिकामें भारतीय स्वातंत्र्यका "अधिकारपत्र" (मैग्ना कार्टा) कहा था, क्योंकि वह भारतीयोंके प्रति सरकारी नीतिके परिवर्तनका द्योतक था और उसमें भारतीयोंके इस अधिकारको मान्यता दी गई थी कि उनसे सम्बन्धित मामलों में उनकी राय ली जायेगी और उनकी उचित आकांक्षाओं का सम्मान किया जायेगा। इस प्रकार उनके लिए अपनी मातृभूमिके बाद सबसे अधिक पवित्र और प्रिय बन जानेवाले उप-महाद्वीप (पृष्ठ ४९६)-- दक्षिण आफ्रिकासे १८ जुलाईको विदाई लेते समय, गांधीजीके मन में यही भाव था कि उन्होंने जिस कामका बीड़ा उठाया था वह काम पूरा हो चुका है। गांधीजी ४ अगस्त से १८ सितम्बर तक लन्दन में रुके। उसी बीच प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया। गांधीजी कई बार बीमार पड़नेके बावजूद एक "भारतीय एम्बुलैंस कोर"के संगठन में सक्रिय रूपसे लगे रहे। उस संकटकी घड़ी में साम्राज्यके प्रति उनकी राजभक्तिका यह एक प्रतीक था। इस कार्य में भी एक बार उन्हें सत्याग्रह करनेका अवसर आ पड़ा था। प्रश्न था भारतीयोंके इस अधिकारका कि 'कोर'की टुकड़ियोंको तैनात करनेके बारेमें भारतीयोंसे परामर्श किया जाना चाहिए और वह भारतीयोंके आत्म-सम्मान से सम्बन्ध रखता था। गांधीने इसको लेकर सत्याग्रह किया और उनकी जीत हुई । गांधीजी १९ सितम्बरको भारतके लिए रवाना हुए—उस देशके लिए “जहाँ समूचे संसारके सुख एवं उत्थानके लिए आध्यात्मिक ज्ञानका विशालतम भण्डार मौजूद है।"उन्होंने भारत और ग्रेट ब्रिटेनके सम्बन्धोंको पारस्परिक आदान-प्रदान द्वारा (पृ० ५५६) और दृढ़ बनानेके लिए काम करनेपर जोर दिया--इस बातसे उनके तत्कालीन राजनीतिक दृष्टिकोणका पता चलता है। यात्रा-कालकी अपनी भावनाको उन्होंने वेस्टके नाम जहाजसे लिखे गये पत्रमें व्यक्त किया है।" इतनी बार मुझे भारत जाते-जाते रुक जाना पड़ा है कि एकाएक मनको विश्वास नहीं होता कि मैं भारत जानेवाले जहाजमें बैठा हूँ। और मेरी समझ में नहीं आता कि वहाँ पहुँचकर मुझे स्वयं क्या करना होगा? फिर भी 'हे सदय प्रकाश, घिरे हुए अन्धकारमें मुझे रास्ता दिखा; मुझे आगे ले चल' यही विचार मुझे ढाढस देता है..।" (पृ० ५५७-५८) इस खण्ड में मौजूद निजी पत्रोंसे पता चलता है कि संघर्षकी उथल-पुथलके बीच भी गांधीजी ईश्वर और मोक्षके प्रश्नोंपर विचार करते रहते थे। इन पत्रों में देखा<noinclude></noinclude> kf1dri42rtdd8dfepukid1bm0zohe6u पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१६ 250 182135 675025 628679 2026-08-29T18:22:56Z सीमा1 430 /* शोधित */ 675025 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|दस|}}</noinclude>जा सकता है कि आश्रमकी जीवन-पद्धतिने उन्हें कितना प्रभावित किया था; वे अब भारत में भी इसी जीवन-पद्धतिको अपनाये रखना चाहते थे । यह भी पता चलता है कि अपने 'राजनीतिक गुरु', गोखलेके प्रति उनका लगाव कितना गहरा था। भारत भूमिपर पैर धरनेके बाद गोखलेके सुझावपर उनका वर्षभर तक केवल अध्ययन और निरीक्षण में लगे रहना तथा अपनी कोई राय न देना - इसका साक्षी है । दक्षिण आफ्रिका में गांधीजीके जीवन और उनकी सफलताओंके बारेमें- जिनसे सम्बन्धित साधन-सामग्री इन बारह खण्डों में संकलित की गई है - 'इंडियन ओपि- नियन'का 'स्वर्ण अंक' (परिशिष्ट २८) लिखता है: यहाँ यह बात महत्त्वपूर्ण है कि जैसे-जैसे सत्याग्रह-संघर्ष जोर पकड़ता गया और जैसे-जैसे वह पवित्रसे पवित्रतर होता गया, वैसे-वैसे वह यूरोपीय और भारतीय, दोनों समुदायोंके श्रेष्ठतम प्रतिनिधियोंको अधिकाधिक पास लाता गया। हर चरण अपने साथ एक नई विजय और नई मंत्री लेकर आता था । संघर्षका प्रारम्भ भारतीय समाजके प्रति सर्वत्र व्याप्त अविश्वास और तिरस्कारकी व्यापक भावनाके विरोधसे हुआ। अब उस अविश्वास और तिरस्कारका स्थान विश्वास और आदरकी भावनाने ले लिया है। .. यह आन्दोलन १९०७के ट्रान्सवाल अधिनियम २की मंसूखीकी माँग से प्रारम्भ हुआ । कानून मंसूख कर दिया गया और इसके समस्त दक्षिण आफ्रिकामें लागू कर दिये जानेकी जो आशंका उत्पन्न हो गई थी, उसका पूर्णतः निवा- रण हो गया । प्रारम्भमें भारतीयोंको इस उपनिवेश से निकाल बाहर करनेके उद्देश्यसे उनके विरुद्ध प्रजातिगत कानून बनाये जानेकी आशंका थी । समझौतेने साम्राज्यके किसी भी अंग में भारतीयोंके विरुद्ध प्रजातिगत कानून बनाये जानकी सारी सम्भावना समाप्त कर दी। गिरमिटिया मजदूरोंके रूपमें भारतीयोंका आव्रजन, जो दक्षिण आफ्रिकाके अर्थतंत्रका लगभग एक स्थायी अंग माना जाता था, समाप्त कर दिया गया है। घृणित तीन पौंडी कर समाप्त कर दिया गया है और उसके साथ ही उससे सम्बद्ध कष्टों और अपमानोंका भी अन्त हो गया है। निहित स्वार्थ- - जिनके सर्वत्र अस्त हो जानके आसार दिखाई दे रहे थे : - अब सुरक्षित और बरकरार रखे जानेको हैं । अधिकांश भारतीय विवाहोंको, जिन्हें पहले कभी भी दक्षिण आफ्रिकाके कानूनकी मान्यता प्राप्त नहीं थी, अब पूरी तरह कानूनी मान्यता दी जानेको है । परन्तु इन सबके अलावा जो बात सबसे महत्त्वपूर्ण है वह सत्याग्रहियोंकी कठिनाइयों, कष्टों और बलि- दानोंसे उद्भूत समझौते और मेलजोलकी नई भावना है। इस संघर्षने शक्तिकी तुलना में अधिकार, पशुबलकी तुलना में आत्म-बल और घृणा तथा अमर्षकी तुलना में प्रेम तथा विमर्शकी असीम श्रेष्ठताको अत्यन्त स्पष्ट रूपसे सिद्ध कर दिया है । " वैसे बादके इतिहासने यही सिद्ध किया कि दक्षिण आफ्रिकाकी जातीय समस्याका हल तब भी दूर था; लेकिन गांधीजीने आगे चलकर जिस अस्त्रके बलपर अपने देशकी जनताको मुक्ति दिलाई और साम्राज्यवादी युगकी परिसमाप्ति की, सत्याग्रहके उस अस्त्रका आविष्कार उन्होंने दक्षिण आफ्रिकामें ही किया और वहीं उसे कारगर बनाया था।<noinclude></noinclude> aysjdf9wp98qr7v8vib0uwxif3kbsl8 675040 675025 2026-08-29T21:11:16Z सीमा1 430 675040 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|दस|}}</noinclude>जा सकता है कि आश्रमकी जीवन-पद्धतिने उन्हें कितना प्रभावित किया था; वे अब भारत में भी इसी जीवन-पद्धतिको अपनाये रखना चाहते थे । यह भी पता चलता है कि अपने 'राजनीतिक गुरु', गोखलेके प्रति उनका लगाव कितना गहरा था। भारत भूमिपर पैर धरनेके बाद गोखलेके सुझावपर उनका वर्षभर तक केवल अध्ययन और निरीक्षण में लगे रहना तथा अपनी कोई राय न देना--इसका साक्षी है । दक्षिण आफ्रिका में गांधीजीके जीवन और उनकी सफलताओंके बारेमें--जिनसे सम्बन्धित साधन-सामग्री इन बारह खण्डों में संकलित की गई है--'इंडियन ओपिनियन'का 'स्वर्ण अंक' (परिशिष्ट २८) लिखता है: यहाँ यह बात महत्त्वपूर्ण है कि जैसे-जैसे सत्याग्रह-संघर्ष जोर पकड़ता गया और जैसे-जैसे वह पवित्रसे पवित्रतर होता गया, वैसे-वैसे वह यूरोपीय और भारतीय, दोनों समुदायोंके श्रेष्ठतम प्रतिनिधियोंको अधिकाधिक पास लाता गया। हर चरण अपने साथ एक नई विजय और नई मंत्री लेकर आता था । संघर्षका प्रारम्भ भारतीय समाजके प्रति सर्वत्र व्याप्त अविश्वास और तिरस्कारकी व्यापक भावनाके विरोधसे हुआ। अब उस अविश्वास और तिरस्कारका स्थान विश्वास और आदरकी भावनाने ले लिया है।... यह आन्दोलन १९०७के ट्रान्सवाल अधिनियम २की मंसूखीकी माँग से प्रारम्भ हुआ । कानून मंसूख कर दिया गया और इसके समस्त दक्षिण आफ्रिकामें लागू कर दिये जानेकी जो आशंका उत्पन्न हो गई थी, उसका पूर्णतः निवा- रण हो गया । प्रारम्भमें भारतीयोंको इस उपनिवेश से निकाल बाहर करनेके उद्देश्यसे उनके विरुद्ध प्रजातिगत कानून बनाये जानेकी आशंका थी । समझौतेने साम्राज्यके किसी भी अंग में भारतीयोंके विरुद्ध प्रजातिगत कानून बनाये जानकी सारी सम्भावना समाप्त कर दी। गिरमिटिया मजदूरोंके रूपमें भारतीयोंका आव्रजन, जो दक्षिण आफ्रिकाके अर्थतंत्रका लगभग एक स्थायी अंग माना जाता था, समाप्त कर दिया गया है। घृणित तीन पौंडी कर समाप्त कर दिया गया है और उसके साथ ही उससे सम्बद्ध कष्टों और अपमानोंका भी अन्त हो गया है। निहित स्वार्थ---जिनके सर्वत्र अस्त हो जानके आसार दिखाई दे रहे थे :--अब सुरक्षित और बरकरार रखे जानेको हैं । अधिकांश भारतीय विवाहोंको, जिन्हें पहले कभी भी दक्षिण आफ्रिकाके कानूनकी मान्यता प्राप्त नहीं थी, अब पूरी तरह कानूनी मान्यता दी जानेको है । परन्तु इन सबके अलावा जो बात सबसे महत्त्वपूर्ण है वह सत्याग्रहियोंकी कठिनाइयों, कष्टों और बलिदानोंसे उद्भूत समझौते और मेलजोलकी नई भावना है। इस संघर्षने शक्तिकी तुलना में अधिकार, पशुबलकी तुलना में आत्मबल और घृणा तथा अमर्षकी तुलना में प्रेम तथा विमर्शकी असीम श्रेष्ठताको अत्यन्त स्पष्ट रूपसे सिद्ध कर दिया है । " वैसे बादके इतिहासने यही सिद्ध किया कि दक्षिण आफ्रिकाकी जातीय समस्याका हल तब भी दूर था; लेकिन गांधीजीने आगे चलकर जिस अस्त्रके बलपर अपने देशकी जनताको मुक्ति दिलाई और साम्राज्यवादी युगकी परिसमाप्ति की, सत्याग्रहके उस अस्त्रका आविष्कार उन्होंने दक्षिण आफ्रिकामें ही किया और वहीं उसे कारगर बनाया था।<noinclude></noinclude> dgcdtsbk83iridtim3ygspuvejcc49e पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१७ 250 182136 675027 628680 2026-08-29T18:24:21Z सीमा1 430 /* शोधित */ 675027 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />&nbsp; {{c|{{larger|'''आभार'''}}}}</noinclude>इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास तथा संग्रहालय ( साबरमती आश्रम प्रिज़र्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट, ऐंड संग्रहालय ) ; नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ-संग्रहालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय और भारतका राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इंडिया), नई दिल्ली; भारत सेवक समिति ( सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी), पूना; उपनिवेश कार्यालय ( कलोनियल ऑफिस) तथा भारत कार्यालय ( इंडिया ऑफिस) पुस्तकालय, श्री छगनलाल गांधी, अहमदाबाद; श्री नारणदास गांधी, राजकोट; श्रीमती राधाबेन चौधरी, कलकत्ता; श्रीमती सुशीलाबेन गांधी, फीनिक्स, डर्बन, श्री विष्णुदत्त दयाल, श्री सी० एम० डोक; श्री लूइस फिशर; श्री ए० एच० वेस्टके तथा गांधीजीनी साधना, जीवन प्रभात, जीवनना झरना, जीवननुं परोढ और महात्मा गांधीना पत्रो, इन पुस्तकोंके प्रकाशकों, तथा इन समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओंके आभारी हैं : केप आर्गस, केप टाइम्स, हिन्दू, इंडिया, इंडियन ओपिनियन, नेटाल मर्क्युरी, प्रिटोरिया न्यूज, रैंड डेली मेल, स्टार, टाइम्स ऑफ इंडिया, और ट्रान्सवाल लीडर ।। लन्दन; अनुसन्धान और सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति पुस्तकालय, गांधी स्मारक संग्रहालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना और प्रसारण मन्त्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ इन्फर्मेशन ऐंड ब्राडकास्टिंग) का अनु- सन्धान तथा संदर्भ विभाग (रिसर्च ऐंड रेफरेंस डिवीज़न), नई दिल्ली, तथा प्रलेखोंकी फोटो- नकलें तैयार करने में सहायता देनेके लिए सूचना और प्रसारण मन्त्रालयका फोटो-विभाग; साबरमती संग्रहालय तथा गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद, श्री प्यारेलाल नय्यर, नई दिल्ली, हमारे धन्यवादके पात्र हैं। तथा<noinclude></noinclude> hqwc856adv0al534639r58o19l4rjb3 675041 675027 2026-08-29T21:18:06Z सीमा1 430 675041 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />&nbsp; {{c|{{larger|'''आभार'''}}}}</noinclude>इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास तथा संग्रहालय (साबरमती आश्रम प्रिज़र्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट, ऐंड संग्रहालय); नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ-संग्रहालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय और भारतका राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इंडिया), नई दिल्ली; भारत सेवक समिति (सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी), पूना; उपनिवेश कार्यालय (कलोनियल ऑफिस) तथा भारत कार्यालय (इंडिया ऑफिस) पुस्तकालय,लन्दन; श्री छगनलाल गांधी, अहमदाबाद; श्री नारणदास गांधी, राजकोट; श्रीमती राधाबेन चौधरी, कलकत्ता; श्रीमती सुशीलाबेन गांधी, फीनिक्स, डर्बन, श्री विष्णुदत्त दयाल, श्री सी० एम० डोक; श्री लूइस फिशर; श्री ए० एच० वेस्टके तथा '''गांधीजीनी साधना, जीवन प्रभात, जीवनना झरना, जीवननुं परोढ''' और '''महात्मा गांधीना पत्रो''', इन पुस्तकोंके प्रकाशकों, तथा इन समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओंके आभारी हैं : '''केप आर्गस, केप टाइम्स, हिन्दू, इंडिया, इंडियन ओपिनियन, नेटाल मर्क्युरी, प्रिटोरिया न्यूज, रैंड डेली मेल, स्टार, टाइम्स ऑफ इंडिया,''' और '''ट्रान्सवाल लीडर'''। अनुसन्धान और सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति पुस्तकालय, गांधी स्मारक संग्रहालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना और प्रसारण मन्त्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ इन्फर्मेशन ऐंड ब्राडकास्टिंग) का अनुसन्धान तथा संदर्भ विभाग (रिसर्च ऐंड रेफरेंस डिवीज़न), नई दिल्ली, तथा प्रलेखोंकी फोटोनकलें तैयार करने में सहायता देनेके लिए सूचना और प्रसारण मन्त्रालयका फोटो-विभाग; साबरमती संग्रहालय तथा गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद,तथा श्री प्यारेलाल नय्यर, नई दिल्ली, हमारे धन्यवादके पात्र हैं।<noinclude></noinclude> 8h03l67ih30htfz4x4born4wnl16kb0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/१८ 250 182137 675028 628681 2026-08-29T18:25:07Z सीमा1 430 /* शोधित */ 675028 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />&nbsp; {{c|{{Larger|'''पाठकोंको सूचना'''}}}}</noinclude>विभिन्न अधिकारियोंको लिखे गये प्रार्थनापत्र और निवेदन, अखबारोंको भेजे गये पत्र और सभाओं में स्वीकृत प्रस्ताव, जो इस खण्ड में सम्मिलित किये गये हैं, उनको गांधीजीका लिखा माननेके कारण वे ही हैं जिनका हवाला खण्ड १की भूमिका में दिया जा चुका है। जहाँ किसी लेखको सम्मिलित करनेके विशेष कारण हैं वहाँ वे पाद-टिप्पणी में बता दिये गये हैं । 'इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित गांधीजीके वे लेख जो लेखकका नाम दिये बिना छापे गये हैं, उनके 'आत्मकथा' सम्बन्धी लेखोंके सामान्य साक्षी, उनके सहयोगी श्री छगनलाल गांधी और हेनरी एस० एल० पोलककी सम्मति और अन्य उपलब्ध प्रमाणोंके आधारपर पहचाने गये हैं । अंग्रेजी और गुजरातीसे अनुवादको मूलके समीप रखनेका पूरा प्रयत्न किया गया है, किन्तु साथ ही अनुवादकी भाषा सुपाठ्य बनानेका भी पूरा ध्यान रखा गया है। अनुवाद छापेकी स्पष्ट भूलें सुधारनेके बाद किया गया है और मूलमें प्रयुक्त शब्दोंके • संक्षिप्त रूप यथासम्भव पूरे करके दिये गये हैं। यह ध्यान रखा गया है कि नामोंको सामान्यतः जैसा बोला जाता है वैसा ही रखा जाये। जिन नामोंके उच्चारण संदिग्ध हैं उनको वैसा ही लिखा गया है जैसा गांधीजीने अपने गुजराती लेखों में लिखा था । मूल 'सामग्री के बीच में चौकोर कोष्ठकों में दी गई सामग्री सम्पादकीय है। गांधीजीने किसी लेख, भाषण, वक्तव्य आदिका जो अंश मूलरूपमें उद्धृत किया है वह हाशिया छोड़कर गहरी स्याही में छापा गया है, किन्तु यदि ऐसा कोई अंश उन्होंने अनूदित करके दिया है, तो उसका हिन्दी अनुवाद हाशिया छोड़ कर, साधारण टाइपमें छापा गया है । भाषणों की परोक्ष रिपोर्ट, न्यायालयोंकी कार्यवाहियाँ तथा वे शब्द, जो गांधीजी के कहे हुए नहीं हैं, बिना हाशिया छोड़े गहरी स्याही में छापे गये हैं । शीर्षककी लेखन- तिथि जहाँ उपलब्ध है या जहाँ उसके बारेमें निर्णय किया जा सका है, वहाँ दायें कोने में दे दी गई है; किन्तु जहाँ वह उपलब्ध नहीं है वहाँ उसकी पूर्ति अनुमानसे चौकोर कोष्ठों में की गई है और आवश्यक हुआ है, उसका कारण स्पष्ट कर दिया है । हिन्दी और गुजराती पत्रोंमें जहाँ तिथि विक्रम संवत् के अनुसार दी गई है वहाँ ग्रेगोरियन पंचांगकी तदनुरूप तिथि भी दे दी गई है; कहीं-कहीं आन्त- रिक या बाह्य साक्ष्यपर वर्षका निर्णय किया गया है। शीर्षकके अन्त में सूत्रके साथ दी गई तिथि प्रकाशनकी है । 'सत्यना प्रयोगो अथवा आत्मकथा' और 'दक्षिण आफ्रिकाना सत्याग्रहनो इतिहास' के अनेक संस्करण होनेसे उनकी पृष्ठ संख्याएँ भिन्न हैं; इसलिए हवाला देनेमें केवल उनके भाग और अध्यायका ही उल्लेख किया गया ह<noinclude></noinclude> 99asyyuq2xe80opqvp0oqjmro7q31uy 675042 675028 2026-08-29T21:22:18Z सीमा1 430 675042 proofread-page 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सामान्यतः जैसा बोला जाता है वैसा ही रखा जाये। जिन नामोंके उच्चारण संदिग्ध हैं उनको वैसा ही लिखा गया है जैसा गांधीजीने अपने गुजराती लेखों में लिखा था । मूल 'सामग्री के बीच में चौकोर कोष्ठकों में दी गई सामग्री सम्पादकीय है। गांधीजीने किसी लेख, भाषण, वक्तव्य आदिका जो अंश मूलरूपमें उद्धृत किया है वह हाशिया छोड़कर गहरी स्याही में छापा गया है, किन्तु यदि ऐसा कोई अंश उन्होंने अनूदित करके दिया है, तो उसका हिन्दी अनुवाद हाशिया छोड़ कर, साधारण टाइपमें छापा गया है । भाषणों की परोक्ष रिपोर्ट, न्यायालयोंकी कार्यवाहियाँ तथा वे शब्द, जो गांधीजी के कहे हुए नहीं हैं, बिना हाशिया छोड़े गहरी स्याही में छापे गये हैं । शीर्षककी लेखनतिथि जहाँ उपलब्ध है या जहाँ उसके बारेमें निर्णय किया जा सका है, वहाँ दायें कोने में दे दी गई है; किन्तु जहाँ वह उपलब्ध नहीं है वहाँ उसकी पूर्ति अनुमानसे चौकोर कोष्ठों में की गई है और आवश्यक हुआ है, उसका कारण स्पष्ट कर दिया है । हिन्दी और गुजराती पत्रोंमें जहाँ तिथि विक्रम संवत् के अनुसार दी गई है वहाँ ग्रेगोरियन पंचांगकी तदनुरूप तिथि भी दे दी गई है; कहीं-कहीं आन्तरिक या बाह्य 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श्री छगनलाल गांधी और हेनरी एस० एल० पोलककी सम्मति और अन्य उपलब्ध प्रमाणोंके आधारपर पहचाने गये हैं । अंग्रेजी और गुजरातीसे अनुवादको मूलके समीप रखनेका पूरा प्रयत्न किया गया है, किन्तु साथ ही अनुवादकी भाषा सुपाठ्य बनानेका भी पूरा ध्यान रखा गया है। अनुवाद छापेकी स्पष्ट भूलें सुधारनेके बाद किया गया है और मूलमें प्रयुक्त शब्दोंके संक्षिप्त रूप यथासम्भव पूरे करके दिये गये हैं। यह ध्यान रखा गया है कि नामोंको सामान्यतः जैसा बोला जाता है वैसा ही रखा जाये। जिन नामोंके उच्चारण संदिग्ध हैं उनको वैसा ही लिखा गया है जैसा गांधीजीने अपने गुजराती लेखों में लिखा था । मूल 'सामग्री के बीच में चौकोर कोष्ठकों में दी गई सामग्री सम्पादकीय है। गांधीजीने किसी लेख, भाषण, वक्तव्य आदिका जो अंश मूलरूपमें उद्धृत किया है वह हाशिया छोड़कर गहरी स्याही में छापा गया है, किन्तु यदि ऐसा कोई अंश उन्होंने अनूदित करके दिया है, तो उसका हिन्दी अनुवाद हाशिया छोड़ कर, साधारण टाइपमें छापा गया है । भाषणों की परोक्ष रिपोर्ट, न्यायालयोंकी कार्यवाहियाँ तथा वे शब्द, जो गांधीजी के कहे हुए नहीं हैं, बिना हाशिया छोड़े गहरी स्याही में छापे 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एन० संकेत साबरमती संग्रहालय, अहमदाबादमें उपलब्ध सामग्रीका, जी० एन० गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली में उपलब्ध कागजपत्रोंका, और सी० डब्ल्यू० कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी (सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय) द्वारा संगृहीत पत्रोंका सूचक है । पृष्ठभूमिका परिचय देनेके लिए मूलसे सम्बद्ध कुछ सामग्री परिशिष्टोंमें दे दी गई है। साधनसूत्रोंकी सूची और इस खण्ड से सम्बन्धित कालकी तारीखवार घटनाएँ अन्तमें दी गई हैं ।<noinclude></noinclude> gbcjm9v4pfypcdajj5imwly8r6jguis 675044 675029 2026-08-29T21:23:21Z सीमा1 430 675044 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|तेरह|}}</noinclude> साधन सूत्रोंमें एस० एन० संकेत साबरमती संग्रहालय, अहमदाबादमें उपलब्ध सामग्रीका, जी० एन० गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली में उपलब्ध कागजपत्रोंका, और सी० डब्ल्यू० कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी (सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय) द्वारा संगृहीत पत्रोंका सूचक है । पृष्ठभूमिका परिचय देनेके लिए मूलसे सम्बद्ध कुछ सामग्री परिशिष्टोंमें दे दी गई है। साधनसूत्रोंकी सूची और इस खण्ड से सम्बन्धित 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पत्र : कर्नल आर० जे० बेकरको (१४-१०-१९१४) || ५३० |- |४००. || पत्र : सी० राबर्ट्सको (१६-१०-१९१४)|| ५३२ |- |४०१. || जे० ई० ऐंड्रयूजको लिखे पत्रका अंश (२०-१०-१९१४) || ५३४ |- |४०२. ||पत्र : सी० राबर्ट्सको (२२-१०-१९१४) || ५३४ |- |४०३. || पत्र : सी० राबर्ट्सको (२५-१०-१९१४) || ५३५ |- |४०४. ||पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-१०-१९१४) || ५३७ |- |४०५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-१०-१९१४) || ५३८ |- |४०६. ||पत्र : छगनलाल गांधीको (३१-१०-१९१४) || ५३९ |- |४०७. ||पत्र : 'इंडिया' को (४-११-१९१४) || ५३९ |- |४०८. || एक परिपत्र (४-११-१९१४) || ५४० |- |४०९. || पत्र: छगनलाल गांधीको (५-११-१९१४) || ५४१ |- |४१०. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (६-११-१९१४) || ५४२ |- |४११. || पत्र : मगनलाल गांधीको ( ६-११-१९१४) || ५४२ |- |४१२. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-११-१९१४) || ५४३ |- |४१३. || पत्र : जमनादास गांधीको (१३-११-१९१४) || ५४४ |- |४१४. || पत्र : प्रागजी देसाईको (१५-११-१९१४) || ५४५ |- |४१५. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२०-११-१९१४) || ५४७ |- |४१६. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२६-११-१९१४) || ५४९ |- |४१७. || पत्र : मगनलाल गांधीको 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|| पत्र : मगनलाल गांधीको ( ६-११-१९१४) || ५४२ |- |४१२. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-११-१९१४) || ५४३ |- |४१३. || पत्र : जमनादास गांधीको (१३-११-१९१४) || ५४४ |- |४१४. || पत्र : प्रागजी देसाईको (१५-११-१९१४) || ५४५ |- |४१५. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२०-११-१९१४) || ५४७ |- |४१६. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२६-११-१९१४) || ५४९ |- |४१७. || पत्र : मगनलाल गांधीको (४-१२-१९१४) || ५५० |- |४१८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१०-१२-१९१४) || ५५१ |- |४१९. || पत्र : छगनलाल गांधीको (१०-१२-१९१४ के आसपास) || ५५३ |- |४२०. || हिसाब : भारतीय आहत सहायक दलका (१८-१२-१९१४) || ५५४ |- |४२१. || भेंट : रायटरके प्रतिनिधिको (१८-१२-१९१४) || ५५५ |- |४२२. || भाषण : लन्दनके विदाई समारोहमें (१८-१२-१९१४) || ५५५ |- |४२३. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२३-१२-१९१४) || ५५७ |- |४२४. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२३-१२-१९१४) || ५५८ |- | || परिशिष्ट || |- | || {{Gap}}१. सलै निर्णयका पूरा पाठ (२१-६-१९१३) || ५५९ |- | || {{Gap}}२. प्रस्ताव : फ्रीडडॉपैकी सार्वजनिक सभामें (३०-३-१९१३)|| ५६१ |- | || {{Gap}}३. गृह मंत्रीका तार (१५-४-१९१३) || ५६२ |- | || {{Gap}}४. अ० मु० काछलियाका भाषण (२७-४-१९१३)|| ५६३ |- | || {{Gap}}५.|| (१) गृह-मंत्रीका तार (२९-५-१९१३) || ५६४ |- | || {{Gap}}|| (२) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२९-५-१९१३)|| ५६५ |- | || {{Gap}}६. प्रवास-नियमन विधेयक और अधिनियमका मसंविदा (२८-६-१९१३)||५६६ |- | || {{Gap}}७. प्रवासी अधिनियमके विनियम (२६-७-१९१३) || ५७३ |- | || {{Gap}}८. ई० एम० जॉर्जेसका पत्र (१९-८-१९१३) || ५७७ |- | ||{{Gap}}९. उपनिवेश कार्यालयको भेजे गये गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (२३-१०-१९१३)||५७९ |}<noinclude></noinclude> 6yf9k7785o9bi2hsup6sbltw069c57g पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३३ 250 182155 674968 628699 2026-08-29T16:08:38Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674968 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{|width=100% |- | || १०. उपनिवेश कार्यालयको भेजे गये गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (६-११-१९१३) || ५८० |- | || ११. महान कूच (८-११-१९१३) || ५८१ |- | ||१२. जनरल बोथाके भाषणका अंश (१-११-१९१३) || ५८३ |- | ||१३. लॉर्ड ऍम्टहिलके नाम पोलकका पत्र (१२-११-१९१३)||५८३ |- | ||१४.||(१) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (१-१२-१९१३) || ५८६ |- | || ||(२) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (१९-२२-१९१३) || ५८७ |- | ||१५.||(१) गृह विभागकी ओरसे पत्र (२४-१२-१९१३)|| ५८८ |- | || ||(२) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२२-१२-१९१३) ||५८९ |- | || ||(३) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२३-२२-१९१३) || ५९० |- | || १६.||लॉर्ड हार्डिजका भाषण (३-१२-१९१३) || ५९१ |- | ||१७.|| गो० कृ० गोखलेके नाम वाइसरायका तार (२८-१२-१९१३) || ५९२ |- | ||१८.||(१) गृह मंत्रीका तार (५-१-१९१४)|| ५९३ |- | || ||(२) गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (३१-१२-१९१३)||५९४ |- | ||१९.|| गो० कृ० गोखले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य (३१-१२-१९१३) || ५९५ |- | ||२०.|| गो० कृ० गोखलेके नाम वाइसरायका तार (२८-१२-१९१३) || ५९८ |- | ||२१.|| गृह-मंत्रीका पत्र (२१-१-१९१४)||६०० |- | ||२२.|| गवर्नर-जनरलसे ऐन्ड्यूजकी मुलाकात (१३-१-१९१४)||६०१ |- | ||२३.|| सॉलोमन-आयोगकी रिपोर्ट के अंश (२५-३-१९१४)||६०२ |- | ||२४.|| गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (५-६-१९१४)||६०८ |- | ||२५.|| भारतीय राहत अधिनियम (१९९४)||६१० |- | ||२६.|| ई० एम० जॉर्जेसका पत्र (३०-६-१९१४)||६१३ |- | ||२७.||(१)उपनिवेश कार्यालयके नाम गवर्नर-जनरलका खरीता (४-७-१९१४)|| ६१३ |- | || ||(२) उपनिवेश कार्यालयके नाम गवर्नर-जनरलका खरीता (१०-७-१९१४)||६१७ |- | ||२८.|| संघर्ष और उसके परिणाम (१९१४)||६१९ |- | ||२९.|| सी० रॉबर्ट्सका पत्र (१४-८-१९१४ के बाद)||६२८ |- |सामग्री के साधन-सूत्र||६३० |- |तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|६३२ |- |शीर्षक सांकेतिका|५५६ |- | सांकेतिका|५५९ |}<noinclude></noinclude> p2baweise7i02t4wnhf7owysa1ocjg3 674970 674968 2026-08-29T16:10:32Z सीमा1 430 674970 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|सत्ताईस|}}</noinclude>{|width=100% |- | || १०. उपनिवेश कार्यालयको भेजे गये गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (६-११-१९१३) || ५८० |- | || ११. महान कूच (८-११-१९१३) || ५८१ |- | ||१२. जनरल बोथाके भाषणका अंश (१-११-१९१३) || ५८३ |- | ||१३. लॉर्ड ऍम्टहिलके नाम पोलकका पत्र (१२-११-१९१३)||५८३ |- | ||१४.||(१) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (१-१२-१९१३) || ५८६ |- | || ||(२) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (१९-२२-१९१३) || ५८७ |- | ||१५.||(१) गृह विभागकी ओरसे पत्र (२४-१२-१९१३)|| ५८८ |- | || ||(२) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२२-१२-१९१३) ||५८९ |- | || ||(३) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२३-२२-१९१३) || ५९० |- | || १६.||लॉर्ड हार्डिजका भाषण (३-१२-१९१३) || ५९१ |- | ||१७.|| गो० कृ० गोखलेके नाम वाइसरायका तार (२८-१२-१९१३) || ५९२ |- | ||१८.||(१) गृह मंत्रीका तार (५-१-१९१४)|| ५९३ |- | || ||(२) गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (३१-१२-१९१३)||५९४ |- | ||१९.|| गो० कृ० गोखले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य (३१-१२-१९१३) || ५९५ |- | ||२०.|| गो० कृ० गोखलेके नाम वाइसरायका तार (२८-१२-१९१३) || ५९८ |- | ||२१.|| गृह-मंत्रीका पत्र (२१-१-१९१४)||६०० |- | ||२२.|| गवर्नर-जनरलसे ऐन्ड्यूजकी मुलाकात (१३-१-१९१४)||६०१ |- | ||२३.|| सॉलोमन-आयोगकी रिपोर्ट के अंश (२५-३-१९१४)||६०२ |- | ||२४.|| गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (५-६-१९१४)||६०८ |- | ||२५.|| भारतीय राहत अधिनियम (१९९४)||६१० |- | ||२६.|| ई० एम० जॉर्जेसका पत्र (३०-६-१९१४)||६१३ |- | ||२७.||(१)उपनिवेश कार्यालयके नाम गवर्नर-जनरलका खरीता (४-७-१९१४)|| ६१३ |- | || ||(२) 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||५८९ |- | || ||(३) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२३-२२-१९१३) || ५९० |- | || १६.||लॉर्ड हार्डिजका भाषण (३-१२-१९१३) || ५९१ |- | ||१७.|| गो० कृ० गोखलेके नाम वाइसरायका तार (२८-१२-१९१३) || ५९२ |- | ||१८.||(१) गृह मंत्रीका तार (५-१-१९१४)|| ५९३ |- | || ||(२) गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (३१-१२-१९१३)||५९४ |- | ||१९.|| गो० कृ० गोखले द्वारा जारी किया गया वक्तव्य (३१-१२-१९१३) || ५९५ |- | ||२०.|| गो० कृ० गोखलेके नाम वाइसरायका तार (२८-१२-१९१३) || ५९८ |- | ||२१.|| गृह-मंत्रीका पत्र (२१-१-१९१४)||६०० |- | ||२२.|| गवर्नर-जनरलसे ऐन्ड्यूजकी मुलाकात (१३-१-१९१४)||६०१ |- | ||२३.|| सॉलोमन-आयोगकी रिपोर्ट के अंश (२५-३-१९१४)||६०२ |- | ||२४.|| गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (५-६-१९१४)||६०८ |- | ||२५.|| भारतीय राहत अधिनियम (१९९४)||६१० |- | ||२६.|| ई० एम० जॉर्जेसका पत्र (३०-६-१९१४)||६१३ |- | ||२७.||(१)उपनिवेश कार्यालयके नाम गवर्नर-जनरलका खरीता (४-७-१९१४)|| ६१३ |- | || ||(२) उपनिवेश कार्यालयके नाम गवर्नर-जनरलका खरीता (१०-७-१९१४)||६१७ |- | ||२८.|| संघर्ष और उसके परिणाम (१९१४)||६१९ |- | ||२९.|| सी० रॉबर्ट्सका पत्र 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हुई जिससे पारस्परिक सद्भावनाका सुन्दर वातावरण निर्माण हुआ और यह उम्मीद बँध चली थी कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा। गांधीजी तो आफ्रिकासे छुट्टी पाकर भारत लौटनेकी बात भी सोचने लगे थे: “मैं यहाँसे मुक्त होते ही वहाँ आ जाऊँगा।” (पृष्ठ १६१)। अप्रैल १ को भारत सरकारने भी अधिकृत तौरसे घोषित कर दिया कि जुलाई १ से गिरमिटिया मजदूरोंका दक्षिण आफ्रिका भेजा जाना बन्द हो जायेगा। यह एक महान विजय थी--दक्षिण आफ्रिकामें गांधीजीकी ही नहीं बल्कि भारत-स्थित उनके सह-योगियोंकी भी जिनमें मद्रासकी दक्षिण आफ्रिकी लीगका नाम खास तौरसे उल्लेखनीय है। यह घटना भारत सरकारमें प्रवासी भारतीयोंके प्रति अपने कर्तव्यकी नई भावनाके उदयकी सूचक थी। गांधीजी प्रायः पूरा अप्रैल केप टाउनमें रहे। वे संघके प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकमें कुछ संशोधन कराना चाहते थे और इसी सिलसिलेमें संसदके सदस्योंसे मिलने-जुलने और उनका सहयोग प्राप्त करनेमें लगे हुए थे। परन्तु अपने इस व्यस्त कार्यक्रमकेबीच ट्रान्सवाल, नेटाल और केपमें जो-कुछ चल रहा था उससे भी वे अपना सम्पर्क बनाये हुए थे। श्री रिच जोहानिसबर्गमें थे और ब्रिटिश भारतीय संघके दफ्तरको सम्हाले हुए थे। श्री पोलक डर्बनमें काम कर रहे थे। और इस प्रकार गांधीजी केप टाउनमें समझोता वार्ताका नाजुक कार्य दक्षिण आफ्रिकी भारतीय समाजके सम्पूर्ण सह-योगके साथ चला रहे थे। गांधीजी और श्री रिच तथा पोलकके बीच विचारोंकी परिपूर्ण एकताके कारण ही ऐसा हो सका। भारतीयोंकी यह बुनियादी माँग कि संघके प्रवासी कानूनसे जातीय प्रभेद हटा दिया जाये। विधेयकमें स्वीकार-सी कर ली गई थी; किन्तु ऑरेंज फ्री स्टेटके विधान में यह जातीय प्रभेद अन्तर्निहित था और उसे कायम रखा जा रहा था। बेशक,भारतीयोंके मौजूदा अधिकारोंसे सम्बन्धित कुछ दूसरे मुद्दे भी थे। पर वे ऐसी समस्या उपस्थित नहीं कर रहे थे जिसका कोई हल ही न हो। असल कठिनाई ऑरेंज फ्री स्टेटके विधानमें अन्तर्निहित जातीय प्रभेदकी ही थी और जनरल स्मट्स या तो फ्रीस्टेटके सदस्योंको इस बातके लिए राजी नहीं कर पाये या करना ही नहीं चाहते थे कि<noinclude></noinclude> gubwlv2fs69w5n2g6wynfj2mqnwbxge पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६८ 250 184111 675046 673060 2026-08-29T21:44:18Z सीमा1 430 675046 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center> <center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र'''}}</center></noinclude>{{right|[ अडयार<br>नवम्बर १२, १९११]}} प्रिय श्री गांधी, न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६ दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ-सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि आप लौटे और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें {{right|आपका भाई,<br>जॉन एच० कॉडिज़}} :[ पुनश्च:] चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों–-श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको मेरा स्नेहाभिवादन कहें । मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> jdlkoqltuu2c00r102g6a1m89el2twj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७६ 250 184433 675158 674893 2026-08-30T08:20:33Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675158 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}नन्दको, १७७-८; –हकीम अजमलखाँ-काे, १९३-५, २८१; –हरनारायणको, २७७; –हरबर्ट ऐंडर्सनको, १९८, २३७-८; –हरसुखरायको, ९०; –हरिभाऊको, ८०-१; –हरिभाऊ गणेश पाठकको, ४९२; –हरिलालको, ५५०-१; –हासम हीरजीको ४१८-९; –हिन्दी साहित्य-सम्मेलनके प्रधान मन्त्रीको, ३७०; –हेनरी लारेंस-को, ३५०; –हेमप्रभा दासगुप्तको, ५१७; –हैरॉल्डमैनको, २५; –हेलेन हाउसडिंगको, २३९}} {{outdent|प्रस्ताव : दक्षिण आफ्रिकाके सम्बन्ध में, ४४१-२}} {{outdent|भाषण : एक विवाहमें, ६४-७; –संगीतके बारेमें, १७०-२}} {{outdent|भेंट : कृषि आयोगके सम्बन्धमें, ३६७; –दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलको, १९; –समाचारपत्रोंको, ५८६}} {{outdent|वक्तव्य : दक्षिण आफ्रिकाकी समस्यापर, ३७४-५; –मसूरी यात्रा स्थगित करने के सम्बन्धमें, ३४७; –रंगभेद विधेयकपर, ४८०}} {{outdent|सन्देश : अब्राह्मणोंको, ५०४; –जलियाँवाला बागके सम्बन्ध में, २९३-४; –त्रिवेन्द्रम-की एक सभाके लिए, २२५; –दक्षिण आफ्रिकासे एन्ड्रयूजकी वापसीपर, ४२२; –'फ्रीडम' को, ४२१; –भावनगर रियासत जन-परिषद्को, ४८१; –'लिबरेटर' को, १११-२; –वकीलों-के सम्मेलनको, २७५; –विद्यार्थियोंको, ६२२-४; –'हिन्दुस्तानी' को, ११३}} {{c|विविध}} {{outdent|{{Gap}}अखिल भारतीय गोरक्षा संघ, ५५५-६;}} {{outdent|अ° भा° च° संघसे ऋण लेनेके लिए}} {{outdent|इकरारनामेका मसविदा, ४२४-५; अखिल}} {{outdent|भारतीय देशबन्धु स्मारक, २५४-५; अज्ञान-}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}का जाला ४८४-८; अधिक लोग नहीं, गुणी और दृढ़ लोग चाहिए, ४०७-८; अपंग ढोरोंका क्या हो?, ६१९; अपने नग्न रूपमें ७८-८०; अब भी समस्यासे आँखें चुरा रहे हैं, ९८-९; अविश्वास या उचित सावधानी?, ११९-२०; सहयोग और राष्ट्रीय शिक्षा, ५४१-३; अहमदाबादके मिल मजदूरोंकी गृह-योजनाका मसविदा, ५३८-९; अहिंसाकी गुत्थी, ५७७-८; आजकी चर्चाका विषय, २६-८; आमुख, २७६; आशाको किरण, २८४-५; उनकी उलझन, १८२-३; उसका रहस्य, ५२२-६; एक अच्छा उदाहरण, ४९७; एक चरखा-प्रेमीका दुःख, १६१-२; एक नीरस परिसंवाद, १४४; एक पत्र, १०८ ९; एक प्रतिवाद, ७४-५; एक भारत-सेवक, १८४; एक विद्यार्थीके प्रश्न, ५०-३; एन्ड्रयूजकी व्यथा, ९६-७; कट्टरपन, ४७३-४; कताईमें सहयोग, ६०१-३; काठियावाड़ी खादी, ४३५-६; कुछ धार्मिक प्रश्न, २०५-८; कुटिल कानून, ५५६-८; कुरीतियोंके साम्राज्यमें क्या करें?, १२०-१; केवल परिमाणका भेद, १४५-७; कैथरीन मेयोके साथ हुई बातचीतका विवरण, १२७-३३, कैसा लगता है?, ३१०; क्या करें?, ३५८; क्या भारत मद्यनिषेध चाहता है?, २७३-५; खादीकी प्रगति, ३२-३, ५९६; खादीके पक्ष और विपक्षमें, ३६४-५; खादीके प्रति द्वेष, ३८९; खादी-सम्बन्धी चित्र-तालिका, ४९९; गलतफहमी, २८६-७; गश्ती पत्र, ३६९-७० ; गुजरातमें खादी, १८; गुजरात में खादीकी मासिक प्रगति, १६४-५; गुजरातमें चरखा, ५४३; गुरुकुल और खादी, २८५, गोरक्षा, ५०१-२; जड़ाऊ जूतियां बनाम चिथड़े, २२१-२; जाति-सुधार, १६४; जेल या अस्पताल?, २९-३१; 'तकली शिक्षक', ३०६-७; तमिलनाडुका एक गाँव, १८६-७; त्रैमासिक}}<noinclude></noinclude> l2xxvjjxlv4mey5b9d3r7cc4a8das34 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७७ 250 184434 675161 640367 2026-08-30T08:33:41Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675161 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||शीर्षक सांकेतिका|६४१}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}आंकड़े ५२२; दक्षिण आफ्रिका, ४०४-६; दोषको छोटा साबित करनेके लिए, ५३-४; नगर-सेवा, ४५६; निरर्थक आश्वासन, ५९७-८; निरामिषाहार अर्थात् अन्नाहार, २८५-६; पंजाबके तुलनात्मक आँकड़े, ४९४; पंडित नेहरू और खादी, ३०७-९; पशु-समस्या, ४७५-६; पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त-सम्बन्धी प्रस्तावोंका मसविदा, ५९; पहाड़ी जातियाँ, २५४; पाँच हजार मील दूर, ३१-२; प्रार्थना क्या है?, ५९९-६००; बंगालकी विशेषता, १६२-३; बंगाल सहायता समिति, ४१२; कताई एक कला है, ५२६-७; बदसे बदतर, ३४; बाकी पैसे से खादी खरीदिए, ३; बिहार विद्यापीठ, २२३; ब्रह्मचर्यके विषय में, २५०-२; भारत सेवक समाजकी क्षति, ५७७; भारतीय नारियोंकी सेवा संस्था, ७६-८; मजदूर भाइयोंके सम्बन्ध में, ४३७; मद्य-निषेधकी शर्ते, ६-७; महुधा खादी कार्यालय, ६१७-८; मादक पदार्थ, शराब और शैतान, ३५९-६१, मार्चके आँकड़े, ०४६, ४७४; मेरा राजनीतिक कार्यक्रम, २१९-२०; मेरी कामधेनु, ३३०-३;}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}मौन-सेवा, ४०, युद्ध या शान्ति, ४९५-७; राष्ट्रीय शिक्षा, ५५८-९; राष्ट्रीय सप्ताह, २४९-५०; रुईकी मांग, ७५-६; लेखा-चित्रकी आवश्यकता, २७३; विधवा-विवाह, ३८-४०; विवाह प्रथाको उठा दो, ३९०-३; विविध प्रश्न [-१] ३३५-७; [-२], ३३७-४०; [-३] ३४०-२; [-४] ३४२-४; [-५], ३४४-६; विशुद्ध धार्मिक विधिसे, ९०-३; शंका-समाधान, २६९-७२; सच्ची शिक्षा क्या है?, ६२-३; सत्ताका दुरुपयोग, ७; सत्य बनाम ब्रह्मचर्य, १५-८; सत्याग्रह सप्ताह, २५२-३; सत्याग्रह सप्ताह में आंशिक उपवास, २५३; सन्तोंका स्मरण, २५५; सम्राट्का गुस्सा, ६१-२; सुदूर अमेरिकासे, ४४४-७; सूत इकट्ठा करनेवालोंको चेतावनी, ३५७-८; सूत्रयज्ञ, ६०; स्वतन्त्र मजदूर दल और भारत, ४७७; स्वत्वाधिकारका आग्रह रखें, १८५-६; स्वाभाविक किसे कहेंगे?, ६१५-७; स्वीकृति, १६२; स्वीडनसे, ३-६; हमारा अपमान, ४९-५०; 'हमें रुई दो', ४८-९}}<noinclude>{{Dhr|17em}} {{Left|३०–४१}}</noinclude> ob0h3h9fgsnoefg4enptfa9jyyhb44i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७८ 250 184435 675162 640368 2026-08-30T08:35:45Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675162 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''सांकेतिका'''}}}} {{Multicol}} {{c|'''अ'''}} {{outdent|अंग्रेजी; –और देशी भाषाएँ, ५८५; –भारत और दुनिया के दूसरे देशोंके बीच होनेवाले व्यवहारकी भाषा, २४२}} {{outdent|अंडा; –खानेमें मांस खानेके मुकाबले कम हिंसा, ५४९}} {{outdent|अखिल बंगाल देशबन्धु स्मारक, १८०}} {{outdent|अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, ६८, ३९९, ४०१, ४१२, ४१५; –का दक्षिण आफ्रिकापर प्रस्ताव, ४४१-४२}} {{outdent|अखिल भारतीय गोरक्षा मण्डल, ५०१}} {{outdent|अखिल भारतीय चरखा संघ; –और कांग्रेस-सदस्यता, १०४; –और खादीकी बिक्री, २२४; –का पाठशालाओंमें तकलीपर कताईका सुझाव, २५९; –का विकेन्द्री-करणका इरादा, ५६१; –के बारेमें शिकायत, ५७९; –के युवक सदस्य, ७१-२, १०३, ३३२-३; –के लिए नियमोंकी पाबन्दी आवश्यक, ११९-२०; –से प्रवर्तक संघका ऋण लेना, ४२४-२५}} {{outdent|अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोष, ७६, १३९, २६६, २७५, ४०१, ५१८, ५९६; –में ट्रान्सवालका योगदान, २५४}} {{outdent|अजमल खाँ, हकीम, ८४, ८७, १७६, १९३, २५६, २८१, २९०, ३७२}} {{outdent|अणे, मा° श्री°, ३१९, ३२५}} {{outdent|अद्वैतवाद; –और द्वैतवाद, ४७०}} {{outdent|अध्यापक; –आत्मार्थीके रूपमें, ६३}} {{outdent|अनुसूयाबाई, १९५}} {{Multicol-break}} {{outdent|अन्तर्जातीय विवाह; –की कठिनाई, ५५०}} {{outdent|अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक सम्मेलन, ६८}} {{outdent|अन्त्यज; –और ऊँची जातियाँ, ३३४; –[ाें] की सेवा, ३८७-८८; –[ाें] के साथ अन्य वर्णोंके समान व्यवहार करनेकी आवश्यकता, २६३; –[ाें] के साथ अमरेली में दुर्व्यवहार, ५८१-२; देखिए अस्पृश्य भी}} {{outdent|अन्ना, देखिए शर्मा, हरिहर, ३७३}} {{outdent|अन्नाहार; –निरामिषाहारके लिए उपयुक्त शब्द, २८५-६, ३००}} {{outdent|अन्सारी, डॉ° मु° अ°, ८७}} {{outdent|अन्सारी (बेगम), ८७}} {{outdent|अपंग ; –[ाें] का पोषण समाजका धर्म, २६५}} {{outdent|अपरिग्रह; –का अभ्यास १६०; –समस्त संसार द्वारा अपनाये जाने योग्य आदर्श, ४१८}} {{outdent|अपर्णादेवी, ४११}} {{outdent|अप्पा साहब, २४}} {{outdent|अफीम; –की बुराईको विश्व-युद्ध द्वारा बढ़ावा, ३५९-६०}} {{outdent|अब्राह्मण; –[ाें] को गांधीजीका सन्देश, ५०४}} {{outdent|अमरेली खादी केन्द्र; –का काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् द्वारा अपने हाथों में लिया जाना, ४३५, ४८९-९०}} {{outdent|अमृतलाल सेठ, ५९५}} {{outdent|अमृतलाल बेचरदास, ३८६}} {{outdent|अमेरिका; –गांधीजीके –न जानेके कारण, १०१-२}} {{outdent|अम्बालाल, ८४, ४१४, ५०७}} {{outdent|अम्बालाल (श्रीमती), ८४, ५०७}}<noinclude></noinclude> eadwhme9ex3yu84pobzsnvbls5e80bo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७९ 250 184436 675163 640369 2026-08-30T08:37:39Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675163 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||सांकेतिका|६४३}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|अय्यंगार, एस° श्रीनिवास, ३६९, ३९९, ४९२}} {{outdent|अय्यंगार, रंगास्वामी, ३०८}} {{outdent|अय्यर, आर° एस°, ३२४}} {{outdent|अय्यर, एस° गोविन्दस्वामी, २८०}} {{outdent|अय्यर, डी° वी° रामस्वामी, १०६}} {{outdent|अय्यर, नटेसा, २१५}} {{outdent|अय्यर, पी° एस° एस° राम, २६०}} {{outdent|अरुण, ८७}} {{outdent|अरुणाचलम्, एस°, ५३१}} {{outdent|अली, मिर्जा कासिम, २३३}} {{outdent|अली, सैयद रजा, ५२९, ५५६-७}} {{outdent|अली-भाई (शौकत अली और मुहम्मद अली), २८८}} {{outdent|अलेक्जेंडर, एडम, ९४}} {{outdent|अलेक्जेंडर, रुथ एस°, ५८९}} {{outdent|अलेक्जेंडर, सी° ए°, २०१-२}} {{outdent|अवज्ञा; माता-पिताकी—कब उचित है, ५३६}} {{outdent|अष्टांगशरीर, २३३}} {{outdent|असहयोग, ३६५; –अहिंसक होनेपर आत्म-शुद्धिका आन्दोलन ६; –और त्याग, ३५५-६; –और शिक्षा, ५४१; और सहयोग, ५२३; –का प्रभाव, १४२-४३; –व्यक्तियोंसे नहीं, उनके कार्योंसे, ४३१}} {{outdent|अस्पृश्य; –[ाें] द्वारा मन्दिर प्रवेश, ९८-९९; देखिए अन्त्यज भी}} {{outdent|अस्पृश्यता, ४७३-७४; –और हिन्दू-धर्म, १३२, २२५; –के निवारणमें कांग्रेसियों-का विश्वास, २३; –कोचीन राज्यमें ४०९-१०; –को दूर करनेसे स्वराज्य-प्राप्ति में मदद, १८२}} {{outdent|अहमद, खान बहादुर मोहिउद्दीन, ५६०-६१}} {{outdent|अहमद मियाँ, ३९४}} {{outdent|अहिंसा; –अन्तिम धर्मके रूपमें, २२६; –और आजादी, ४९६; –और आत्म}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}दर्शन, ५०१; –और दूध, १६०; –और बन्दरों तथा कबूतरोंका नाश, १४९-५०; –और शरीर-बल ४४४-५; और सत्य, ६१४; और स्वराज्य, ५१२; –और हिंसा, ३४५, ५७७-८, ६१५-७; –की शक्तिका दृश्य प्रमाण, १०२; –प्रेमका मार्ग, ४३१}} {{c|'''आ'''}} {{outdent|आइज़क, मरियम, १९५}} {{outdent|आगरकर, ५७७}} {{outdent|आचार्य, एम° के°, ८८}} {{outdent|आजाद, अबुल कलाम, ४५१}} {{outdent|आठवले, ६२४}} {{outdent|आत्मकथा, ७३, ८६, १६९, ३८६ पा° टि°, ४८२; -के अध्याय सबकी सम्पत्ति, १८५-६; —के अनुवादकी अनुमति, ३५१; –में ब्रह्मचर्यपर विचार, ४३४}} {{outdent|आत्मदर्शन; -रागद्वेष आदिके नाशसे प्राप्य, २४६; –विवाहमें–और आत्मानुशासन, ३९२-३}} {{outdent|आत्मबल; –और सैन्य-बल, ४४६}} {{outdent|आत्मसंयम; –और समाधि, २०६}} {{outdent|आत्मा; –और शरीर, ५१७; –की उन्नति सेवा-भावसे, ५६; –के गुणोंको विकसित करना ही सच्ची शिक्षाका उद्देश्य, ६२-३}} {{outdent|आनन्दप्रिय, ११७}} {{outdent|आनन्दलाल, १७८, २६७}} {{outdent|आनन्दानन्द, स्वामी, ८७, १५९, २४८, ३२८, ३५४, ३९७, ४४०, ४५५, ४६६, ४८२, ५४५}} {{outdent|आनन्दी, २१५, ३६६}} {{outdent|ऑपरेशन; –गांधीजीका–जेल अधिकारियोंके दबावसे, ३३८}}<noinclude></noinclude> 7kc5ieiueopks2qqngsuwzs65pmexa7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६८० 250 184437 675164 640370 2026-08-30T08:40:11Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675164 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|आभूषण; –और विषय-भोगकी वासना, २९६}} {{outdent|आर्य भूषण प्रेस, ५७७}} {{outdent|आर्य वैद्यशाला, ११}} {{outdent|आर्यसमाज, ३९४}} {{outdent|आलम, शाह जमील, २३४}} {{outdent|आश्रमका न्यासपत्र, १९}} {{outdent|आसर, मणि, २१६, ५८४, ६०३}} {{outdent|आसर, लक्ष्मीदास पुरुषोत्तम, १८, २६, ९१, १५८, २०५, २९६, ३२७, ३६६, ४१९, ४५४, ४७९, ५४३, ५७५, ५८४; –का खादीपर प्रस्ताव, ४३५-६}} {{c|'''इ'''}} {{outdent|इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस, बंगलोर, ५४}} {{outdent|इंडियन ओपिनियन, १, २४४}} {{outdent|इंडियन रिव्यू, ३७१}} {{outdent|इंडियन सोशल रिफॉर्मर, २८८ पा° टि°}} {{outdent|इन्द्र विद्यालंकार, ५१२}} {{outdent|इयर बुक, १}} {{outdent|इर्बी, ए° २९२}} {{outdent|इर्विन लॉर्ड, २८८ पा° टि°}} {{outdent|इस्लाम, ८४}} {{c|'''ई'''}} {{outdent|ईशोपनिषद्, ३६}} {{outdent|ईश्वर; –अद्वैतवाद और द्वैतवादमें, ४७०; –और गुरु, ५५२; –और प्राकृतिक चिकित्सा, ३३८; –और प्रार्थनापूर्ण मनसे किया कार्य, ८६; –और शान्ति, ६०५-६; –का दासानुदास, १२०; –का साक्षात्कार, वह जैसा है, उस रूपमें करनेकी गांधीजीकी इच्छा, २४१; –की इच्छाके प्रति सहर्ष समर्पण, ५०५; –की प्राप्ति मध्यस्थकी सहायता के बिना}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{Gap}}सम्भव, २३०; –की प्रार्थना सर्वशक्ति-मात् प्रभुके रूपमें करनेका सुझाव, २६१; –की लीला अपरम्पार, ८६; –को जानना और बुद्धिपूर्वक उसकी पूजा करना मानव जीवनका चरम लक्ष्य, ६१५-६; –गुणातीत, ४१९; –में विश्वास और धैर्य, १९३; –सत्याग्रहका आवार, २८; –सर्वव्यापी और इसलिए हमारे सारे कर्मोंका साक्षी, ५३१; –से ही प्रार्थना की जा सकती है, २६०; –ही चिरन्तन है, ५९३-४}} {{outdent|ईसाई सेना; –और असभ्य जातियाँ, ३३३}} {{outdent|ईसा मसीह, २३०; –मानव जातिके एक}} {{outdent|{{Gap}}शिक्षक, किन्तु ईश्वरके एकमात्र पुत्र या अवतार नहीं, १३, ५०; –में अदृश्य परमात्मतत्त्वकी सबसे अच्छी अभिव्यक्ति, २५७}} {{c|'''उ'''}} {{outdent|उका, नारण, २५४}} {{outdent|उत्तमचन्द, ४५६}} {{outdent|उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रान्त, ७०}} {{outdent|उपनिषद्, १३२}} {{outdent|उपवास; –सिर-दर्द के लिए अच्छा, ३०१}} {{outdent|उमराव सिंह, १५२}} {{outdent|उमिया, ५५३}} {{outdent|उर्मिला, १७९}} {{outdent|'उर्मिलादेवी, १३६, ४१४, ५६४-५}} {{c|'''ऋ'''}} {{outdent|ऋष्यशृंग, ९०}} {{c|'''ए'''}} {{outdent|एकनाथ, २५५ पा° टि°}} {{outdent|एडगर, कुमारी, ३७९}}<noinclude></noinclude> 0enalujlgorgzkcbwfdskk6vj071pcp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४८ 250 184952 675090 641234 2026-08-30T04:56:03Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''भारतमें यही चलन रहा है। और जब जनता सरकार, ठेकेदारों तथा पियक्कड़ोंके चंगुलमें पड़ जाये तो परिस्थिति विषम तो होनी ही है; इसे टाला नहीं जा सकता। इसीलिए मैंने कहा है कि यदि ठेके बन्द नहीं किये गये तो सितम्बरमें खूनकी नदियाँ बहेंगी। अन्तमें श्री गांधीने ठेकेदारोंसे कहा कि वे ज्ञापनके सिलसिलेमें श्री भरूचासे मिलें और उनसे सलाह-मशविरा करें।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २०-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१९७. पत्र : के॰ पी॰ जगासिया ब्रदर्सको<ref>कराचीके आयात-निर्यात व्यापारी जगासिया ब्रदर्सने स्वदेशी आन्दोलनकी शिकायत करते हुए गांधीजीको लिखा था कि इसके कारण उनको व्यवसायमें खासा घाटा उठाना पड़ा है और उनके गोदामोंमें विदेशी वस्त्रोंका स्टॉक बेकार पड़ा है। उन्होंने गांधीजीसे सलाह माँगी थी कि वे अपने सिरपर पड़े भुगतानको कैसे चुकायें और पूछा था कि क्या वे अनबिके मालको खपानेके लिए लाटरीका तरीका अपनानेकी अनुमति देंगे।</ref>'''}}}} {{Right|बम्बई<br>[१९ जुलाई, १९२१के बाद]}} {{Left|प्रिय महोदय,}} आपके गत १९ जुलाईके पत्रके सिलसिलेमें मैं सिर्फ इतनी सलाह दे सकता हूँ कि आपको वही करना चाहिए जो हर एक व्यवसायी कर रहा है। लाटरीका सुझाव मुझे उचित नहीं जान पड़ता। {{Right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} अंग्रेजी पत्र (एस॰ एन॰ ७५८०) की फोटो-नकलसे। {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१९८. तार : बेलगाँवके धरनेदारोंको'''}}}} {{Right|२० जुलाई, १९२१}} धरनेके खिलाफ गैरकानूनी आदेशोंका भी पालन करें, क्योंकि उससे आगे चलकर सविनय अवज्ञा आन्दोलनको निश्चय ही बल मिलेगा। विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारकी जी तोड़ कोशिश करें। {{Left|[अंग्रेजीसे]|1em}} '''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स''', १९२१<noinclude></noinclude> mu5qvagsxbd2kg38uwdh1q87eqjxpsp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४९ 250 184953 675091 641235 2026-08-30T05:08:47Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१९९. भाषण : पूनाकी सार्वजनिक सभामें<ref>भाषणके पूर्व गांधीजीने लोकमान्यके चित्रका अनावरण किया और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने स्त्रियों तथा खिलाफत-कार्यकर्त्ताओंकी सभाओंमें भी भाषण दिये थे।</ref>'''}}}} {{Right|२० जुलाई, १९२१}} '''कैम्पकी एक आम सभामें बोलते हुए महात्मा गांधीने कहा कि विदेशसे अंगुल-भर कपड़ेका आयात नहीं होना चाहिए। कुछ जमाना हुआ भारत अपनी जरूरतसे भी ज्यादा कपड़ा तैयार किया करता था। भारतीय सूत उद्योगको ईस्ट इंडिया कम्पनीके कर्मचारियोंने नष्ट कर दिया। आयातित कपड़ेके लिए हमें प्रतिवर्ष ६०,००,००,००० रु॰ बाहर भेजने पड़ते हैं। हमें चाहिए कि हम स्वयं खादी पहनने और सूत कातनके लिए तैयार हों और बुनकरोंको कपड़ा बुननेके लिए हाथका कता सूत अपनानेके लिए प्रोत्साहित करें। स्वदेशी एक धर्म है। इस धर्मका पालन दृढ़ताके साथ किये बिना स्वराज्य पाना असम्भव है।''' '''धरनेकी चर्चा करते हुए गांधीजीने कहा कि धरना एक बड़ा और अच्छा आन्दोलन है, परन्तु मदिरापान करनेवालों को हरगिज मारना-पीटना नहीं चाहिए। उन्हें गालियाँ भी नहीं देनी चाहिए। [धरना देते समय] स्वयंसेवकोंको पूर्णतः अहिंसात्मक रहना चाहिए। शराबके व्यापारियोंको अपनी दूकानें बन्द कर देनी चाहिए। देश शराबसे छुटकारा पाना चाहता है; शराबने पीनेवालों को हैवान बना दिया है। अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधीजीने श्रोताओंसे अपील की कि स्वदेशीको पूरे दिलसे अपनायें।<ref>इसके आगेका अंश उसी दिनकी एक दूसरी सार्वजनिक सभामें गांधीजी द्वारा दिये गये भाषणका विवरण हैं।</ref>''' '''श्री गांधीने कहा कि विदेशी सूतसे बुना हुआ कपड़ा भी विदेशी ही माना जायेगा। मैं चाहता हूँ कि आप इस विषयमें बहुत ही सतर्क व सावधान रहें। स्वतंत्रता प्राप्तिके लिए लोकमान्यने जो त्याग किये उन्हें आप सब याद करें और उनके विचारोंको अपने जीवनमें उतारें। मुझे इस बातकी परवाह नहीं है कि स्कूलों व अदालतोंका बहिष्कार होता है या नहीं। उसका उद्देश्य तो सिद्ध हो ही गया है। लेकिन मैं हिन्दू-मुस्लिम एकता, अहिंसा और विशेष रूपसे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार जरूर चाहता हूँ; उसका पूरा आग्रह करता हूँ। यदि अगस्तके अन्ततक हम यह बहिष्कार सफलतापूर्वक कर सके तो स्वराज्य हमें मिल गया समझिए। उन्होंने महाराष्ट्रको प्रशंसा की और [इस कार्यक्रममें] अधिक आस्था रखनेको कहा।''' '''शनिवार वाड़ाके मैदानमें एक विशाल सार्वजनिक सभामें भाषण देते हुए गांधीजीने कहा कि आजका दिन एक पवित्र दिन है। हम लोग यहाँ तिलक महाराजकी'''<noinclude>{{Left|२०–२७|1em}}</noinclude> 3b42lidtfj6kif93bw318kkjgceasvf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५० 250 184954 675092 641236 2026-08-30T05:15:46Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''बरसी मनानेको इकट्ठे हुए हैं। उन्होंने हमें स्वराज्यके महामन्त्रकी दीक्षा दी थी। स्वराज्य पानेके लिए सबसे आसान और सम्भव उपाय स्वदेशी ही है। उससे नंगोंको वस्त्र और भूखोंको भोजन मिलेगा। २ करोड़ भारतीय आधा पेट खाकर बसर कर रहे हैं। महाराष्ट्र बुद्धिमान है, महाराष्ट्रमें विद्या है, महाराष्ट्र हर प्रकारका त्याग करनेको तैयार रहता है परन्तु उसमें विश्वासकी कमी है। यदि महाराष्ट्र स्वदेशी धर्मको अविचल विश्वाससे अपनाये तो साल-भरके अन्दर स्वराज्य मिलना निश्चित है। भाषण समाप्त करते हुए गांधीजीने आशा व्यक्त की कि महाराष्ट्र तिलक महाराजके योग्य साबित होगा।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २४-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''२००. भाषण : तिलक महाविद्यालयके उद्घाटनपर<ref>पूना में।</ref>'''}}}} {{Right|२० जुलाई, १९२१}} '''तिलक महाविद्यालयके भवनका उद्घाटन करते हुए विद्यालयके मन्त्री प्रोफेसर घारपुरे द्वारा परिचयात्मक भाषण दिये जानेके बाद महात्मा गांधीने कहा कि देशमें सभी जगह राष्ट्रीय स्कूल और कालेज खोले गये हैं। उन्होंने बिहारकी विशेष रूपसे प्रशंसा की, क्योंकि वह आलस्य और निद्राको एकदम त्यागकर असहयोग कार्यक्रमके लगभग सभी अंगोंको पूरा करनेमें सफल हुआ है। श्री चित्तरंजन दासने बंगालके असहयोगी विद्यार्थियोंके लिए व्यवस्था कर दी है। इस दिशामें उनका त्याग निश्चय ही अद्वितीय है। गुजरातमें भी एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है। परन्तु विश्वविद्यालय तो हमारी शिक्षा-प्रणाली कैसी हो यह सामने रखनेके लिए खोले गये हैं। मुझे यह देखकर खुशी हुई है कि तिलक महाविद्यालयमें औद्योगिक और व्यावसायिक प्रशिक्षणके लिए भी व्यवस्था की गई है। निःसन्देह यह इस संस्थाकी एक विशेषता है। इसलिए यह तथ्य कि ये महाविद्यालय सरकारी संस्थाओंकी कोरी नकल-भर नहीं हैं, भविष्यमें 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की नुक्ताचीनी बन्द कर देनेके लिए काफी होगा। गांधीजीने अन्तमें कहा, मैं आशा करता हूँ कि विद्यालय ऐसे विद्यार्थी तैयार करेगा जो उस महापुरुषके नामको उज्ज्वल करेंगे, जिसके नामपर यह खोला गया है।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २४-७-१९२१|1em}} {{Dhr|4em}}<noinclude></noinclude> nyfmtoa5yy1hdsvfy3ibfsqqcgp1lzk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५१ 250 184955 675095 641237 2026-08-30T05:21:11Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''२०१. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|'''इन स्थितियोंमें आप क्या करें?'''}} यदि आप बुनकर हैं और अपने देश, खिलाफत और पंजाबके बारेमें सोचते हैं तो— (१) आपको केवल हाथ-कते सूतका ही कपड़ा बुनना चाहिए, और उसका उतना ही पैसा लेना चाहिए जितने से कि आपकी जीविका चल जाये। आपको मोटा सूत बुननेकी दृष्टिसे अपने करघेमें आवश्यक परिवर्तन करनेसे सम्बन्धित सभी कठिनाइयोंका हल निकालना चाहिए। (२) यदि आपको तानेके लिए हाथका कता सूत काममें लानेमें कोई कठिनाई हो तो आपको उसके लिए भारतीय मिलों द्वारा काते गये सूतको और बानेके लिए हाथका कता सूत काममें लाना चाहिए। (३) जहाँ यह भी सम्भव न हो, वहाँ आप ताने और बाने दोनोंके लिए मिलका [देशी] सूत काममें लायें। पर आपको अबसे रेशमी या सूती सभी प्रकारका विदेशी सूत काममें लाना बन्द कर देना चाहिए। यदि आप कांग्रेसके अधिकारी या कार्यकर्त्ता हैं तो आप अपने कार्यक्षेत्रके बुनकरोंके सामने ऊपर बताये गये सुझाव रखकर उन्हें इस ढंगको अपनानेके लिए समझायें-बुझायें और उनकी भरसक सहायता करें। यदि आप खरीददार हैं तो केवल सबसे अच्छी किस्मका कपड़ा खरीदनेका आग्रह कीजिए। पर यदि आपको कपड़ेकी वैसी पहचान न हो या उतना मँहगा खरीदनेकी सामर्थ्य न हो तो उससे हलके दर्जेका—दूसरे या तीसरे दर्जेका—कपड़ा खरीदिए, पर किसी भी हालतमें विदेशी कपड़ा या विदेशी सूतसे भारतमें बुना कपड़ा न खरीदिए। यदि आप गृहस्थ हैं तो— (१) आपको अबसे किसी भी प्रकारका विदेशी कपड़ा न खरीदनेका दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए। (२) आपको अपने पड़ोसके बुनकरसे मिलना चाहिए और घरके कते सुतसे और उसके अभावमें भारतीय मिलके कते सूतसे अपने लिए पर्याप्त खादी तैयार करवा लेनी चाहिए। (३) आपको अपना सारा विदेशी कपड़ा कांग्रेस कमेटीको दे देना चाहिए। वह उसे नष्ट कर देगी या स्मरना या उसे भारतसे बाहर और कहीं भेज दिया जायेगा।<ref>देखिए "जलायें किसलिए?", १७-७-१९२१।</ref><noinclude></noinclude> pesukdqxl80zvr23ll0otugsb8ual88 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५२ 250 184956 675099 641238 2026-08-30T05:31:19Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>(४) यदि आपको अपने विदेशी कपड़े छोड़ देनेकी हिम्मत न हो तो आप उन्हें घरपर छोटे-मोटे काम करते समय पहनकर फाड़ डालें; पर घरसे बाहर कभी विदेशी कपड़े पहनकर न जायें। (५) यदि आपको थोड़ा भी अवकाश हो तो आप उसको राष्ट्रके लिए सम और ठीक बटदार सूत कातनेका काम सीखनेमें लगायें। यदि आप छात्र या छात्रा हैं तो स्वराज्यकी स्थापना होनेतक आपको कमसे-कम चार घंटे प्रतिदिन सूत कातना, रुई पींजना या कपड़ा बुनना चाहिए। आप इतना किये बिना पढ़ने-लिखनेको पाप समझें। {{C|'''कांग्रेस कमेटियाँ'''}} लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या कांग्रेसके रजिस्टरमें एक करोड़ सदस्य दर्ज हो गये हैं। मेरे सामने ठीक-ठीक आँकड़े तो नहीं हैं पर यदि हमें केवल औपचारिक पंजीयनसे ही सन्तोष होता हो तो यह मैं अवश्य जानता हूँ कि हमारी सदस्य-संख्या लगभग उतनी हो गई है। पर हमें उसका ठीक-ठीक अर्थ समझ लेना चाहिए। वह यह कि हमारे पास ऐसे एक करोड़ पुरुष और स्त्रियाँ हैं जो कांग्रेसके सिद्धान्तमें विश्वास करते हैं और उसके लिए काम करना चाहते हैं। विदेशी कपड़ेका बहिष्कार उसकी सच्ची कसौटी है। यदि हमारे साथ एक-से विचार रखनेवाले एक करोड़ पुरुष और स्त्रियाँ हों तो हमें उसका प्रत्यक्ष प्रमाण सड़कों और गाँवोंमें दिखाई देना चाहिए। क्या हमें चलते समय ऐसा दिखाई देता है कि हर तीस स्त्री-पुरुषोंमें से एकने खादीके या कमसे-कम स्वदेशी कपड़े पहन रखे हैं? क्या हमें दिखाई देनेवाले अधिकांश व्यक्तियोंके पहनावे आदिमें स्वदेशीपन दिखाई देता है? इसका उत्तर अनिच्छासे ही सही किन्तु होगा नकारात्मक ही। इसलिए मैं कांग्रेसके सभी संगठनोंको यह सलाह दूँगा कि जबतक हम विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण बहिष्कार न कर दें तबतक हमें स्वदेशीके अतिरिक्त और किसी बातपर ध्यान ही नहीं देना चाहिए। इसके लिए यही उपयुक्त समय है। हर एक कांग्रेसी कार्यकर्त्ताको खद्दरके कपड़े पहनने चाहिए। यह तो स्वराज्यके सैनिककी पोशाक ही बन जानी चाहिए। मैं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी आगामी बैठककी ओर इस आशासे दृष्टि लगाये हूँ कि सभी सदस्य वहाँ सैनिककी इस पोशाकसे सुसज्जित हो कर आयेंगे। यदि हमें ३१ अगस्ततक विदेशी कपड़ेका पूर्ण बहिष्कार कर देना है तो कांग्रेसी संगठनोंको पींजने, कातने और बुननेवाली संस्थाओंका रूप ले लेना चाहिए। कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओंको पींजने, कातने और बुननेके काममें प्रवीण हो जाना चाहिए। उन्हें लाचारीके भावसे साबरमती आश्रमको सूचना और मार्गदर्शन प्राप्त करनेके लिए नहीं लिखना चाहिए। ईश्वरकी कृपासे अब हर एक प्रान्तमें इससे सम्बन्धित प्रक्रियाओंका थोड़ा-बहुत ज्ञान हो गया है। हर एक प्रान्तमें कार्यकर्त्ताओंको पिंजारों, कतियों और बुनकरोंका सहयोगी बनना चाहिए, उनके धन्धेको सीखना चाहिए ताकि स्वयं कार्यकर्त्तागण उस धन्धेको संरक्षण दे सकें; उन्हें उनके साथ किसी प्रकारकी होड़ नहीं करनी है। उन्हें चरखों और तकलियोंके लिए बढ़इयों और लुहारोंके सहयोगीके रूपमें भी काम करना चाहिए। इस तरह पर्याप्त खादीका भण्डार बनाकर<noinclude></noinclude> p1bu9ln94lu28oryigt8o9xn03plmwy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०७ 250 185190 674921 643265 2026-08-29T12:27:12Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|६७१}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|मोहर्रिर, वामन राव, ५२५}} {{outdent|मोहानी, हसरत, १३३, १४४, १५७, २१७, ३८६, ४८६, ४९२, ५२८-२९}} {{outdent|'''म्यूजिंग्स ऑफ सेंट टेरेसा''', ९१}} {{C|}}'''य''' {{outdent|'''यंग इंडिया''', ११, १०७, ११७-१८, १२७, १४०, १५४-५५, १५९, १६२, १७६- ७९, १८२, २०५, २१६, २४८, २५५, २७५, २८४, २९९, ३१२, ३२३, ३३९, ३४६, ३५३, ३९१, ३९६, ४१४, ४२२, ४२५, ४३१, ४५६, ४७५, ४८८, ४९३, ५३५, ५४९, ५८२, ५९०, ६०८}} {{outdent|'''यंग क्रूसेडर''', ८९}} {{outdent|यहूदी, ५५-५६, ६२, २०२ पा॰ टि॰, २९८, ३९७}} {{outdent|यहूदी-धर्म, २३७}} {{outdent|याकूब, मुहम्मद, ३६५}} {{outdent|याज्ञिक, इन्दुलाल, ११६; -की सराहना, ५६९}} {{outdent|याल्गी, गोविन्द वैंकटेश, ५२५}} {{outdent|युधिष्ठिर, ७, ९४, १००, ११७, ६०१}} {{outdent|'''यूरोपीयन मॉरल्स''', ९१}} {{outdent|'''यूरोपीयन सिविलिजेशन''', ९१}} {{outdent|यूरोपीय; -[ों] का भारत के प्रति रवैया, ३१६}} {{outdent|'''योगदर्शन''', ९०}} {{outdent|'''योग वाशिष्ठ''', २५२}} {{outdent|'''योग सूत्र''', २५३}} {{c|'''र'''}} {{outdent|'''रं'''गाचारियर, टी॰, ३६५}} {{outdent|रतनशी, ६३}} {{outdent|रत्नचन्द, ४५०}} {{outdent|रसिक, ७०, ३४५}} {{outdent|रहमान, डाक्टर, अब्दुल, २१५, २३१}} {{Multicol-break}} {{outdent|'''राइज ऑफ द डच रिपब्लिक''', ९१}} {{outdent|राजगोपालाचारी, चक्रवर्ती, ३७, १०५, १४०, १५८, १८९, २७७, ३२९ पा॰ टि॰, ३३८, ३४५, ३६५, ५२९, ५७७; -का चरखेपर वक्तव्य, ६२२}} {{outdent|राजचन्द्र, ९०}} {{outdent|राजनीति, -और धर्म, ५५-५६, ३८१; -की परिभाषा, ५९९-६००}} {{outdent|राजम् अय्यर, ९१}} {{outdent|'''राजयोग''', ९१}} {{outdent|रानडे, न्यायमूर्ति, ३५८}} {{outdent|राम, ७, ३६, १००, ११७, १९०-९१, १९६, २१५, २४१, ३४२, ३४७, ३७८, ३९७, ४४३, ५४२, ५९२, ६०१,६०७; -और कृष्ण, ९०; -नामजपका प्रभाव, ११९}} {{outdent|रामकृष्ण (परमहंस) ४५८}} {{outdent|(श्री) '''रामकृष्णकी जीवनी (लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण)''', ४५८}} {{outdent|रामचन्द्रन, जी॰, -के साथ बातचीत, २६४- ७४}} {{outdent|रामनारायण, ३८४}} {{outdent|रामराज्य, ३६, ५९२}} {{outdent|'''रामायण''', ८९, ९३, १९२, २५२, २६०, २९७, ५००}} {{outdent|राय, डॉ॰ प्र॰ चं॰, २१, ५२, १२१, ४०१}} {{outdent|राय, बाबू सतीश, ५५८}} {{outdent|राय, मा॰ ना॰, १९ पा॰ टि॰; -का बोलशेविज्मपर लेख, ५६५; -द्वारा चरखे की आलोचना, २१-२२}} {{outdent|राय साहब, १३८}} {{outdent|रायचन्द भाईना लेखो, २५२}} {{outdent|राव, एम॰ रामचन्द्र, ३६५}} {{outdent|राष्ट्र-ऋण, -की देयतापर कांग्रेस प्रस्ताव, ३३८, ३९२-९३}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> seg76cau85nt2cn2elzl2ak84jz9jz1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०८ 250 185191 674954 643274 2026-08-29T15:42:17Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674954 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|राष्ट्रभाषा, देखिए भाषा}} {{outdent|राष्ट्रवाद, -यूरोपीय, ३९३; -हिंसक और अहिंसक-, ३९४}} {{outdent|राष्ट्रीय एकता;--को बढ़ावा देनेकी जरूरत, ३६६-६७}} {{outdent|राष्ट्रीय पाठशाला, ६, ५७, ९९, १३०, १४९, ३३६, ३४४, ३६०, ५८०; -[ओं] का असहयोग कार्यक्रम रद्द किये जाने के बाद कार्य, ३६०, ३६८, ३७०-७२, ४०४-४, ४७७-७९, ५१८-२०, ५३७-३८; —के लिए शर्तें, ६१८- १९; -पर कांग्रेस प्रस्ताव, ५३७}} {{outdent|राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन, १२२-२३}} {{outdent|राष्ट्रीयकरण, २६९}} {{outdent|रीडिंग, लॉर्ड, ३९१, ४३३, ४७३, ५२१, ५५८, ६१२}} {{outdent|रुखी, ७२, १८६}} {{outdent|रुद्र, ११७}} {{outdent|रुस्तमजी, पारसी, देखिए घोरखोदू रुस्तमजी जीवनजी {{outdent|रेड्डी, ५८०}} {{outdent|रेनॉल्ड्स, ३४२, ६११}} {{outdent|रोजबरी, लॉर्ड, ९०, १३६}} {{outdent|रोटी-व्यवहार, -और अस्पृश्यता, ५४६-४७}} {{outdent|रोम, ९०}} {{outdent|रोलाँ, रोमाँ, ३४१, ३८३}} {{outdent|'''रोसी क्रुसीयन मिस्ट्रीज''', ९१}} {{c|'''ल'''}} {{outdent|लक्ष्मी, १९३, ३२२, ३४५, ५७५}} {{outdent|लक्ष्मी नरसिंह, एम॰, ८५}} {{outdent|लखनऊ-समझौता, -[ते]में संशोधनकी आवश्यकता, ४४७}} {{outdent|'''लाइफ ऑफ कोलम्बस''', ९०}} {{outdent|'''लाइफ ऑफ जान हॉवर्ड''', ९०}} {{outdent|'''लाइफ ऑफ पिट''', ९०, १३६}} {{outdent|'''लाइफ ऑफ रामानुज''', ९०}} {{Multicol-break}} {{outdent|'''लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण''', ४५८}} {{outdent|लॉज, ९१}} {{outdent|लाजपतराय, लाला, २८३, २८६, ३२६, ३५१-५२, ३६५, ३८५, ४३१, ४३८, ४४४, ४४७, ४५०, ५०१, ५४२; -के खिलाफ लगाये गये आरोपोंपर क्षोभ, ४३०; -के बारेमें गलत रिपोर्ट, ४६६-६७}} {{outdent|लावेल, १६४}} {{outdent|लिटन, लॉर्ड, ४४, ३९१, ४७३, ५२१, ६२५}} {{outdent|लिबरल दलवाले, देखिए नरम दलवाले}} {{outdent|लीलामणि, २६१}} {{outdent|लूशियन, ८९, ९१}} {{outdent|लेकी, ९१}} {{outdent|'''लेक्चर्स ऑन बुद्धिज्म''', ९१}} {{outdent|'''लेज ऑफ एन्शेंट रोम''', ९०}} {{C|}}'''व''' {{outdent|वझे, एस॰ ए॰, ३९; -की सराहना, ५३३}} {{outdent|वरदन, ए॰, ४६०}} {{outdent|'''वर्ल्ड टुमारो''', ३४३}} {{outdent|वाइकोम सत्याग्रह, देखिए सत्याग्रह}} {{outdent|वाइल्ड, आस्कर, २६६}} {{outdent|वाचस्पति, इन्द्र, १३८}} {{outdent|वाचा, सर दिनशा ४९१}} {{outdent|वाजपेयी, बालमुकुन्द, १३९}} {{outdent|वाडिया, ९०}} {{outdent|वामनराव, ५७०}} {{outdent|वाल्मीकि, ९०}} {{outdent|विज़डम ऑफ द एन्शेंट्स, ९०}} {{outdent|विदुर, ४३६}} {{outdent|विदेशी कपड़े, -का बहिष्कार, देखिए बहिष्कार}} {{outdent|विद्यार्थी, -और असहयोगका स्थगन, ४७६-७९; -और शारीरिक श्रम, ४}} {{outdent|विलबरफोर्स, ९०}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> gcetxh5jdhb4krqbc1t0xfw457exv2h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७०९ 250 185192 675171 643275 2026-08-30T09:07:41Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 675171 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|६७३}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|विप्लववादी, देखिए अराजकतावादी}} {{outdent|विलिंग्डन लॉर्ड, ५११}} {{outdent|'''विलियम द साइलेंट''', १३६}} {{outdent|विवाह, -मोक्ष प्राप्तिमें बाधा, २७०-७१}} {{outdent|विवेकानन्द, ९१}} {{outdent|'''विश्वभारती''', १०}} {{outdent|विश्वामित्र, २४१}} {{outdent|विश्वास, सुरेन्द्रनाथ, ६२१}} {{outdent|विष्णु, ११७}} {{outdent|वुडरुफ, ९१}} {{outdent|'''वे टु बिगिन लाइफ''', ८९}} {{outdent|'''वेद,''' ९१}} {{outdent|वेदान्त, ९१}} {{outdent|'''वेराइटीज, ऑफ रीलीजियस एक्सपीरियन्स,''' ९०-९१}} {{outdent|वेल्स, एच॰ जी॰, ९०}} {{outdent|वेस्टकोट, बिशप, २४९}} {{outdent|वैद्य, ९०}} {{outdent|वैद्य, गंगाबहन, २११, २४६, २५२, २९०}} {{outdent|वैंकटप्पैय्या, कौंड, २६४, ३२९ पा॰ टि॰, ३६१}} {{outdent|व्यास, बालकृष्ण, २५२}} {{outdent|'''व्हाट क्रिश्चियनिटी मीन्स टु मी,''' ९०}} {{c|'''श'''}} {{outdent|'''शं'''करलाल, लाला, ४६७}} {{outdent|शम्भुनाथ, ८८}} {{outdent|शर्मा, आर॰, ३४४}} {{outdent|शर्मा, नाथूराम, ९०}} {{outdent|'''शांकरभाष्य''', 'गीता' ९०, ९३, ५४३}} {{outdent|'''शाक्त ऐंड शक्ति''', ९१}} {{outdent|शास्त्री, रामकृष्ण, ५४०}} {{outdent|शास्त्री, वी॰ एस॰ श्रीनिवास, ६२, ६४, २००, ३२३, ३६५, ५९६}} {{outdent|शाह, फूलचन्द कस्तूरचन्द, १४०, ३२२, ४६२, ५७४}} {{outdent|शाह, शाहमुल्ला, १६४}} {{outdent|शाहजहाँ, १६४}} {{outdent|शिक्षा, -आधुनिक, ४३१-३२, ५००; -का उद्देश्य, ६०९-११, ६१८-१९; -प्राथ- {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}मिकमें मौखिक रूपसे सिखाने की आवश्यकता, २६०-६१, ३४५; -राष्ट्रीय, ४५०}} {{outdent|शिन्दे, ३६५}} {{outdent|शिबली, ९१, १३४, २९७}} {{outdent|शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक समिति, १२५}} {{outdent|शिव, १७३, १८८, २१३, २४१}} {{outdent|शिवम्, सी॰ वी॰ पी॰, ५२५}} {{outdent|शिवलालभाई, ७२, १४०, ३२२}} {{outdent|शेक्सपीयर, ४३२}} {{outdent|शौकत अली, ५, ४८, १६६, १८० पा॰ टि॰, १८७-८८, १९४, १९६-९७, ३५५, ३६१, ३९७, ३९८, ४३९, ४४१-४३, ४५५-५६, ४७२, ५००, ५०३, ५३०, ५३४, ५४०, ५४२, ५५२, ६०६, ६०८; -के विचार हिन्दू-मुस्लिम एकतापर, ५०३, ५११; -द्वारा कताई, १५, २०२}} {{outdent|श्याम बाबू, १४०, ३१२}} {{outdent|श्रद्धानन्द, स्वामी, ४, २४५, २५४, ५६०}} {{outdent|श्रम; -का मानवीय पक्ष, २६८-६९; -शारीरिक, की महत्ता, ४३१, ५९५-९६}} {{outdent|श्रीनिवासचारी, ५४०}} {{c|'''स'''}} {{outdent|संगीत; -का महत्व, २३९}} {{outdent|संघाणी, नारणदास, ६०३}} {{outdent|सतीश बाबू, ५६१}} {{outdent|सत्य, २०, ३६, ६३, १०१, १३६, १९१, २११, २३७, ४५२; -और अहिंसा, ३४३, ५२४; -और ईश्वर, २०१, ५२४; -और मोक्ष, २९; -और सत्याग्रह, ६२२; -और सुन्दरता, २६६-६७, २७३-७४}} {{outdent|सत्यदेव स्वामी, ५४७}} {{outdent|सत्यपाल, डॉ॰, ३२६, ३९५}} {{outdent|सत्याग्रह, ६२, ६५, ७५-७६, १०६, २७७; -और असहयोग, ८९, ४२७, ५२४;}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> g8i4uj7haksrf29xbicov473wr1kjtx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७१० 250 185193 675183 643276 2026-08-30T10:21:36Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 675183 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}-और सत्य, ६२२; -और सविनय अवज्ञा, ५२४, ६२२; -का स्थान, १२२; -राजनीतिक परिणाम, १३७; -देशी राज्योंमें, ५९३-९४; -मुलशीपेटामें, १३७; -वाइकोम में, ६७ पा॰ टि॰, १६२, १७४-७५, ३८२; -के गुण, १७४-७५; -पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार, ५२५}} {{outdent|'''सत्यार्थ प्रकाश''', ९०}} {{outdent|सदस्यता; -के लिए स्वराज्य के अन्दर योग्यता, ५१४}} {{outdent|सन्तानम्, के॰, १२४, २६३}} {{outdent|सन्मुखराय, १४२}} {{outdent|सप्रू, डॉ॰ तेजबहादुर, ३२३ पा॰ टि॰, ३६५}} {{outdent|सभ्यता, पाश्चात्य-, ३४२, ४८१, ४९४; -भारतीय, ३४२}} {{outdent|समाजवाद, २६९}} {{outdent|सर, साहिब मौलाना, ५४१}} {{outdent|'''सरमन ऑन द माउण्ट''', ९२}} {{outdent|'''सरस्वतीचन्द्र''', ९०}} {{outdent|सर्वदलीय परिषद्, ३६५, ३८५, ५१२, ५२१, ५५५; -और स्वराज्यवादियों और गांधीजी में समझौता, ४१०-११; -का बंगाल-दमनके प्रतिरोध में प्रस्ताव, ३६२-६३}} {{outdent|सविनय अवज्ञा, ६२, ७६, २९९, ३१६, ३७५, ३८१, ५११, ५२२; -और असहयोग, ५२४; -और सत्याग्रह, ५२४, ६२२; -का अर्थ, ३९०, ४००-१}} {{outdent|सहदेव, ९४}} {{outdent|'''साँझ वर्तमान''', १०१}} {{outdent|'''साइंस ऑफ पीस''', ९०}} {{outdent|साठे, डा॰, ७०}} {{outdent|साधन और साध्य, ५१४}} {{outdent|'''साधना''', ९०}} {{outdent|'''साबरमती''', ६१८}} {{outdent|साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व; -हिन्दू-मुस्लिम तनावको शान्त करनेके लिए, ४४७-४८}} {{Multicol-break}} {{outdent|साम्यवाद, देखिए बोलशेविज्म}} {{outdent|साम्राज्यवाद, २०, ३९४}} {{outdent|सावरकर, वी॰ डी॰ १२४}} {{outdent|सिंगर, २६९}} {{outdent|सिंह, मंगल, १५९, ३६५, ४२६, ४४१, ५७७-७८}} {{outdent|सिंह, मनजीत, ३०२}} {{outdent|सिंह, माखन, ४५५, ४७०}} {{outdent|सिंह, रघुवीर, २८०}} {{outdent|[द] '''सिक्स सिस्टम्स''', ९०}} {{outdent|सिख, ९०, १२५, १५९, १६५, २०२, ४२७, ४३९, ५७८}} {{outdent|सिख धर्म; -और हिन्दूधर्म, १६५}} {{outdent|सिडेनहम, लॉर्ड, ३७९}} {{outdent|सिन्धी, १७७}} {{outdent|सिन्हा, गया प्रसाद, ४२२}} {{outdent|सिन्हा, लॉर्ड, ६०५}} {{outdent|सिन्हा, सत्यनारायण, ५४०}} {{outdent|'''सीकर्स आफ्टर गॉड''', ८९, ९१}} {{outdent|'''सीता''', ७, ५९२}} {{outdent|'''सीताहरण''', ९०}} {{outdent|सुकरात, २६७}} {{outdent|सुकुमार, बाबू, ३४२}} {{outdent|सुखदेव, डॉ॰, ३८४, ५६७}} {{outdent|सुदामा, ११७, ४३६, ५१४, ६०३}} {{outdent|सुधन्वा, ३७२}} {{outdent|सुन्दरलाल, ३०, ४१, ५३४, ५३७}} {{outdent|'''सुपरसेन्सुअल लाइफ''', ९०, १६३}} {{outdent|सुब्रह्मण्यम्, ४६०}} {{outdent|सुब्रह्मण्यम्, बी॰, ३२३}} {{outdent|सुभद्रा कुमारी, ८६}} {{outdent|सुभान अली, ५४१}} {{outdent|सुहरावर्दी, २९}} {{outdent|सूरदास, २७६}} {{outdent|सूर्य नारायण, के॰, ८५}} {{outdent|'''सैन्ट पॉल इन ग्रीस''', ९०}} {{outdent|सेनेका, ९१}} {{outdent|'''सेन्ट्स ऑफ इस्लाम''', ९०}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 3gfhxiet9airarsl4l4xx240kcfm6zl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५३ 250 186090 675103 644404 2026-08-30T06:15:14Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675103 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४२१}}</noinclude>उसे लागत दामपर बेचना चाहिए; इस लागतमें भण्डार चलानेका खर्च शामिल होना चाहिए। दूसरे शब्दोंमें फिलहाल हर एक कांग्रेस कार्यालयको शान्तिपूर्ण अस्त्रोंके संग्रह और निर्माणका आगार बन जाना चाहिए। क्या यह असंगत या असम्भव माँग है? क्या युद्धके समय इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनीमें प्रत्येक काम कर सकनेवाला व्यक्ति युद्धके उद्देश्योंको आगे बढ़ानेके लिए काम नहीं करता था? यदि हम यह विश्वास करते हैं कि स्वराज्य स्वदेशीके बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता तो क्या उसका निष्कर्ष यह नहीं निकलता कि हमें सतत और बुद्धिमत्तापूर्वक अपना ध्यान अन्य सभी बातोंकी ओरसे हटाकर केवल बहिष्कार करने, विनिर्माण करने और वितरण करनेकी ओर लगाना चाहिए। सभाएँ और सभाओंमें होनेवाले भावुकतापूर्ण ओजस्वी भाषण बन्द कर दिये जाने चाहिए। हमें शासकोंके विषयमें सोचनेकी अपेक्षा अपनी कमजोरियों और कमियोंके विषयमें सोचना चाहिए। शासकोंके विषयमें सोचनेसे तो केवल घृणा, दुर्बलता और विवशता ही उत्पन्न होगी। अपनी कमजोरियों और कमियोंके विषयमें सोचने और तदनुसार कार्य करनेसे हममें साहस, शक्ति और आशा जागेगी। इसलिए यदि हम सभाएँ या बैठकें करें तो वे बहिष्कार और विनिर्माणकी आवश्यकताको प्रदर्शित करने, तथा उसके लिए मार्ग दिखानेके लिए केवल कार्रवाई सम्बन्धी बैठकें होनी चाहिए। {{C|'''अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी आगामी बैठक'''}} अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी होनेवाली बैठकपर बहुत-कुछ निर्भर है। वाद-विवाद या व्यर्थकी बातचीतके लिए हमारे पास समय नहीं है। हमें यह कहनेमें समर्थ होना चाहिए कि क्या भारतको अगले कुछ महीनोंमें स्वराज्यकी स्थापना और खिलाफत तथा पंजाबमें हुए गलत कामोंके प्रतिकारके लिए संगठित किया जा सकता है; क्या हम सफलता सम्बन्धी आवश्यक बातोंके लिए एकमत हैं, और क्या हम उसके लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर काम करनेके लिए तैयार हैं? आशा है कि उत्तरदायी अधिकारी अपने-अपने प्रान्तोंके विषयमें निम्नलिखित आँकड़े लेकर आयेंगे : (क) तिलक स्वराज्य-कोषकी राशि, (ख) कांग्रेस-रजिस्टरमें दर्ज सदस्योंकी संख्या, (ग) चालू चरखोंकी संख्या और उनसे आजतक हुआ उत्पादन, (घ) पींजनेवालों की संख्या, (ङ) (१) हाथसे कते सूत, (२) भारतीय मिलोंमें कते सूत, और (३) विदेशी सूतके बुनकरोंकी संख्या, (च) विदेशी वस्त्रोंका आयात करनेवालों की संख्या। साथ ही वे नागरिक सविनय अवज्ञा और करबन्दी आन्दोलनकी सम्भावनाओंके सम्बन्धमें आवश्यक सूचना देनेकी तैयारीसे भी आयेंगे। मुझे आशा है कि कमेटीकी यह बैठक कार्रवाई पूरी करनेके लिए होगी और इसमें निरर्थक वाद-विवादके द्वारा राष्ट्रीय समयका एक भी क्षण नष्ट न होने देनेकी सावधानी रखी जायेगी।<noinclude></noinclude> pgkn7i5c24imlf8hym9lzlpxuvqr63k पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५४ 250 186091 675107 644405 2026-08-30T06:27:34Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675107 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{C|'''मिलोंमें बनी खादी'''}} एक संवाददाताने इस तथ्यकी ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया है कि बाजारमें अब हमारे यहाँके मिलोंमें बनी हुई और जापानसे खरीदी हुई खादी मिल रही है। इसपर विश्वास करनेको जी नहीं होता। क्या वाणिज्य-व्यापारका स्तर इतना गिर गया है कि इस अनुल्लंघनीय क्षेत्रका ऐसा उल्लंघन करें। हमारी मिलोंके पास अपनी मशीनोंके लिए निश्चिय ही इतना काम है कि उन्हें झोंपड़ियोंमें रहनेवाले गरीब काम-गारोंके मुँहसे उनकी रोटी छीननेकी जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। फिर भी उपभोक्ताको तो सावधान हो ही जाना चाहिए। हाथसे कते सूतके बने कपड़ेको पहचाननेमें कभी गलती नहीं होती, विशेष रूपसे जब वह बिना कलफ लगा हुआ और बिना धुला हो। जो कपड़ा मिलका बना हुआ दिखाई देता हो और फिर भी जिसे हाथसे कता और हाथसे बुना हुआ कहा जाता हो उसके बारेमें सतर्क हो जाना चाहिए। सच तो यह है कि हाथसे कते और बुने कपड़ेकी अपनी विशेषता होती है; होनी भी चाहिए। तैयार होनेपर उसमें एक विशेष प्रकारका निखार होना चाहिए, और उसमें मिलके बने हुए कपड़ेकी बेजान बाहरी चमक-दमक नहीं होनी चाहिए। हाथकी कती खादीमें एक खुरदरापन होता है जो तापहर होता है। हाथसे बनी खादी पसीना सोखनेवाली, हलकी, देखनेमें अच्छी लगनेवाली होती है, और बुननेवाले और कातनेवाले दोनोंके पसीना बहाये बिना यह चार आने प्रति गजके हिसाबसे तैयार नहीं की जा सकती। यह इससे कममें केवल तभी तैयार की जा सकती है जब यह केवल बेकार सूतसे बनाई जाये, पर तब जल्दी जीर्ण हो जायेगी और कुछ ही बार धोनेसे फट जायेगी। जिन भण्डारोंसे हम परिचित हैं केवल वहींसे खादी खरीदना ठीक होगा। बम्बई और अहमदाबादकी कांग्रेस समितियोंने ऐसे प्रामाणिक भण्डार बना दिये हैं जहाँ शुद्ध खादी उचित दामोंपर मिल सकती है। खादी केवल वही है जिसका ताना-बाना हाथका कता हो और जो हाथसे बुनी हो। {{C|'''कृपाण'''}} 'सिख यंग मैंस एसोसिएशन'के मन्त्रीके अनुसार कृपाणका सिखोंके लिए वहीं महत्त्व है जो ब्राह्मणोंके लिए यज्ञोपवीतका होता है। और अब पंजाब सरकार कृपाणकी लम्बाई और चौड़ाई निश्चित करके सिखोंको अपने पवित्र अधिकारसे वंचित करनेका प्रयत्न कर रही है। जिस प्रकार मैं शस्त्र रखने या उनका उपयोग करनेको घृणित समझता हूँ, उसपर जबरदस्ती रोक लगानेकी बातको मैं उससे भी अधिक घृणित मानता हूँ। जैसा कि मैंने तीन वर्ष पहले कहा था, किसी जातिको जबरदस्ती निःशस्त्र करनेके कामको इतिहासमें ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतके प्रति किये गये जघन्य कृत्यके रूपमें माना जायेगा। यदि लोग शस्त्र रखना चाहते हैं तो उन्हें बिना किसी बाधाके शस्त्र रखने देना चाहिए। अबतक तो सिखोंके पास कृपाण बिना किसी रोक-टोकके रही है; इसलिए अब उसपर रोक लगाना उनके प्रति और भी घोर अन्याय होगा। मन्त्रीको यह सिद्ध करनेमें कोई कठिनाई नहीं हैं कि कृपाणके विरुद्ध छेड़े गये इस संघर्षके साथ-साथ इस बहादुर जातिके दमनके प्रयत्न किये जा रहे हैं। इसका कारण भी<noinclude></noinclude> rywbwgtwrip29thzgcd5yli5gr4rw9b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५५ 250 186092 675111 644406 2026-08-30T06:41:20Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675111 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४२३}}</noinclude>स्पष्ट है। सिखोंमें राजनीतिक जागृति आ गई है। वे केवल अपने अधिकारियोंके कहनेपर मार-काटके कामसे ही सन्तुष्ट नहीं हो जाते। जिस कारणसे उन्हें लड़नेके लिए कहा जाता है उसके सब पहलुओंपर वे विचार करना चाहते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे यह जानना चाहते हैं कि उनकी 'स्थिति क्या है।' वे हर एक काममें बराबरीके भागीदार बनना चाहते हैं। सरकारको यह असहनीय है, और इसलिए वह उनको दबा देनेपर तुली हुई है। सरकारके विचारमें जो उनमें सबसे अधिक वीर हैं, उनकी जबानपर ताला डाल दिया गया है। मैं केवल यह आशा कर सकता हूँ कि सिख अपने पवित्र शस्त्रको छोड़ देनेकी अपेक्षा सत्याग्रहका मार्ग अपनायेंगे। हम जोर-जबरदस्तीसे अनुशासन नहीं सीख सकते। शस्त्र रखनेका अधिकार होते हुए भी हम उनका प्रयोग न करने या दायित्व तथा आत्मसंयमके साथ उनका प्रयोग करना सीखें। {{C|'''कितना सुन्दर!'''}} पं॰ मोतीलाल नेहरूकी अनुमतिसे मैं रामगढ़में, जहाँ वे इन दिनों स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं, व्यतीत किये हुए उनके जीवनका निम्नलिखित शिक्षाप्रद और मनोरंजक वर्णन शब्दश: उद्धृत कर रहा हूँ:—— :'''{{Gap}}जिस छोटी पहाड़ीपर मैं अकेला केवल अपने एक नौकरके साथ आराम कर रहा हूँ, वहाँका जलवायु और वातावरण मेरे लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हो रहा है। कुछ दमा और खांसी अब भी शेष है, पर स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त होनेके साथ-साथ वह अवश्य ही दूर हो जायेगी। दुःखकी बात केवल यही है कि बीमारीके बादकी देखभालके लिए मेरे पास पर्याप्त समय नहीं है; और यह व्यावसायिक जीवनकी पिछली बुराइयोंके कारण है जो अब भी मेरे पीछे पड़ी हुई हैं। जब मैंने वकालत छोड़ी तब मेरे पास जो सैकड़ों मुकदमे थे उनमें से दो को मैं छोड़ नहीं सका था। इनमें से एक मामला सरूपके<ref>विजयलक्ष्मी, उनकी बड़ी पुत्री।</ref> विवाहके ठीक पहले आया था, और कुछ सीमातक मेरे स्वास्थ्यके खराब होनेका कारण यह भी था, और अब यह दूसरा मामला मेरे स्वास्थ्यके लिए आवश्यक आराममें आड़े आ रहा है। यह एक लम्बा और नया मुकदमा है और ५ जुलाईको शुरू होगा, जिसके लिए पहलेसे तीन या चार दिनका अध्ययन आवश्यक होगा। मैं इसे लखनऊमें होनेवाली अखिल भारतीय बैठकके बाद लेनेका प्रयत्न कर रहा हूँ, पर मैंने फिलहाल रामगढ़से रवाना होनेकी तारीख ३० जून निश्चित कर ली है। यदि मुझे केवल कुछ ही सप्ताहोंका समय और मिल जाये तो मैं आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि मेरे अन्दर एक बैल-जितनी शक्ति आ जायेगी। पर अहिंसावादी असहयोगी व्यक्तिके लिए शारीरिक दृष्टिसे इतना अधिक शक्ति-शाली होना शायद निरापद नहीं है।''' :'''{{Gap}}मैं जिस प्रकारका जीवन यहाँ व्यतीत कर रहा हूँ, आप उसके बारेमें जानना चाहेंगे। अतीतके उन सुखद (?) दिनोंमें जब मैं पहाड़ोंपर आया करता'''<noinclude></noinclude> dxu2tl9r1zpfzt44wi1auk1ntgzng6j 675113 675111 2026-08-30T06:41:57Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 675113 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४२३}}</noinclude>स्पष्ट है। सिखोंमें राजनीतिक जागृति आ गई है। वे केवल अपने अधिकारियोंके कहनेपर मार-काटके कामसे ही सन्तुष्ट नहीं हो जाते। जिस कारणसे उन्हें लड़नेके लिए कहा जाता है उसके सब पहलुओंपर वे विचार करना चाहते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे यह जानना चाहते हैं कि उनकी 'स्थिति क्या है।' वे हर एक काममें बराबरीके भागीदार बनना चाहते हैं। सरकारको यह असहनीय है, और इसलिए वह उनको दबा देनेपर तुली हुई है। सरकारके विचारमें जो उनमें सबसे अधिक वीर हैं, उनकी जबानपर ताला डाल दिया गया है। मैं केवल यह आशा कर सकता हूँ कि सिख अपने पवित्र शस्त्रको छोड़ देनेकी अपेक्षा सत्याग्रहका मार्ग अपनायेंगे। हम जोर-जबरदस्तीसे अनुशासन नहीं सीख सकते। शस्त्र रखनेका अधिकार होते हुए भी हम उनका प्रयोग न करने या दायित्व तथा आत्मसंयमके साथ उनका प्रयोग करना सीखें। {{C|'''कितना सुन्दर!'''}} पं॰ मोतीलाल नेहरूकी अनुमतिसे मैं रामगढ़में, जहाँ वे इन दिनों स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं, व्यतीत किये हुए उनके जीवनका निम्नलिखित शिक्षाप्रद और मनोरंजक वर्णन शब्दश: उद्धृत कर रहा हूँ:—— :'''{{Gap}}जिस छोटी पहाड़ीपर मैं अकेला केवल अपने एक नौकरके साथ आराम कर रहा हूँ, वहाँका जलवायु और वातावरण मेरे लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हो रहा है। कुछ दमा और खांसी अब भी शेष है, पर स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त होनेके साथ-साथ वह अवश्य ही दूर हो जायेगी। दुःखकी बात केवल यही है कि बीमारीके बादकी देखभालके लिए मेरे पास पर्याप्त समय नहीं है; और यह व्यावसायिक जीवनकी पिछली बुराइयोंके कारण है जो अब भी मेरे पीछे पड़ी हुई हैं। जब मैंने वकालत छोड़ी तब मेरे पास जो सैकड़ों मुकदमे थे उनमें से दो को मैं छोड़ नहीं सका था। इनमें से एक मामला सरूपके<ref>विजयलक्ष्मी, उनकी बड़ी पुत्री।</ref> विवाहके ठीक पहले आया था, और कुछ सीमातक मेरे स्वास्थ्यके खराब होनेका कारण यह भी था, और अब यह दूसरा मामला मेरे स्वास्थ्यके लिए आवश्यक आराममें आड़े आ रहा है। यह एक लम्बा और नया मुकदमा है और ५ जुलाईको शुरू होगा, जिसके लिए पहलेसे तीन या चार दिनका अध्ययन आवश्यक होगा। मैं इसे लखनऊमें होनेवाली अखिल भारतीय बैठकके बाद लेनेका प्रयत्न कर रहा हूँ, पर मैंने फिलहाल रामगढ़से रवाना होनेकी तारीख ३० जून निश्चित कर ली है। यदि मुझे केवल कुछ ही सप्ताहोंका समय और मिल जाये तो मैं आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि मेरे अन्दर एक बैल-जितनी शक्ति आ जायेगी। पर अहिंसावादी असहयोगी व्यक्तिके लिए शारीरिक दृष्टिसे इतना अधिक शक्ति-शाली होना शायद निरापद नहीं है।''' :'''{{Gap}}मैं जिस प्रकारका जीवन यहाँ व्यतीत कर रहा हूँ, आप उसके बारेमें जानना चाहेंगे। अतीतके उन सुखद (?) दिनोंमें जब मैं पहाड़ोंपर आया करता'''<noinclude></noinclude> nn8s6ame4unowtwf4xejeev89ydzx9y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५६ 250 186093 675119 644407 2026-08-30T06:51:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675119 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>:'''था, तब मेरे साथ दो प्रकारका भोजन बनानेकी व्यवस्था रहा करती थी——एक अंग्रेजी और दूसरी भारतीय। शिविरमें छोटी हाजरीके बाद, हम जंगलकी और रवाना होते और हमारे साथ राइफलों, छोटी बन्दूकों और कारतूसोंका पूरा इन्तजाम रहता, और कभी-कभी तो हमारे साथ हाँका करनेवालों की एक छोटी-सी फौज ही रहती थी। हम दिन ढलेतक अपने रास्तेमें आनेवाले भोले-भाले जानवरोंको मारते रहते थे। इस बीच हमें जंगलमें घरके समान ही बिलकुल समयपर बाकायदा खाना और चाय मिल जाती थी। शिविरमें लौटनेपर हमारे लिए बढ़िया भोजन तैयार मिलता; हम डटकर भोजन करते और निश्चिन्ततासे गाढ़ी नींद सोते थे। शान्त रूपसे चलनेवाले जीवन-क्रममें अव्यवस्था उत्पन्न करनेवाली कोई बात नहीं होती थी; हाँ, असावधानीसे निशाना चूक जानेपर किसी गरीब जानवरकी जान बच जाती थी तो जरूर नाराज होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता था! और अब पीतलके कुकरने (जिसे हमने तिब्बिया कालेजके उद्घाटनके समय खरीदा था) उक्त दो भोजन-व्यवस्थाओंकी जगह ले लो है; परिचारकोंके दलके बदले अब केवल एक ही नौकर रह गया है जिसे बहुत होशियार नहीं कहा जा सकता। पहले जहाँ हम अपना सामान खच्चरोंपर लादकर ले जाते थे वहाँ अब चावल, दाल और मसालेके तीन छोटे-छोटे थँले——जिन्हें खादीके बदले विदेशी कपड़ेका बनानेके लिए मैं कमलाको<ref>जवाहरलाल नेहरूकी पत्नी।</ref> कभी क्षमा न करूँगा——ही रह गये हैं। जहाँ पहले अंग्रेजोंकी तरह नाश्ता, दोपहरका और रातका भोजन करते और साथ ही सुबह-शामकी चायके साथ बहुत-सारे फल लेते थे और कभी-कभी उपलब्ध होनेपर एक या दो अंडे मिल जाते थे, वहाँ अब दोपहरमें मुख्य भोजनके रूपमें केवल चावल, दाल और सब्जी ही लेते हैं, अलबत्ता कभी-कभी खीर भी होती है। शिकारकी जगह लम्बे सैर-सपाटोंने ले ली है और राइफलोंकी जगह पुस्तकों, पत्रिकाओं और समाचार-पत्रोंने (पुस्तकोंमें मेरी प्रिय पुस्तक है एडविन अर्नाल्डकी "सांग सिलेश्चियल",<ref>'''भगवद् गीता'''का अंग्रेजी अनुवाद।</ref> जिसे अब मैं तीसरी बार पढ़ रहा हूँ)। जब जोरकी वर्षा होती है, जैसी कि इस समय हो रही है, तब इस प्रकारके ऊल-जलूल पत्र लिखनेके अतिरिक्त और कोई काम नहीं रह जाता। [शेक्सपियरके शब्दोंमें कहूँ तो] "क्यासे क्या हो गया?" पर वास्तवमें जीवनका जितना रस मुझे इसमें मिल रहा है उतना पहले कभी नहीं मिला। केवल चावल समाप्त हो गये हैं, और मैंने ब्राह्मणके समान इस समय पासमें विद्यमान जगतनारायणके<ref>प्रमुख वकील, हंटर कमेटीके सदस्य; देखिए खण्ड १६।</ref> राजसी भण्डारसे चावलके धर्मार्थ दानके लिए प्रार्थना की है।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २१-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}}<noinclude></noinclude> lesuxsy4z6ifj5rfzcyd0d3gpe36134 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५७ 250 186094 675128 644408 2026-08-30T07:10:25Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675128 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''२०२. शिमलाकी छाया'''}}}} यह बात बिलकुल साफ है कि असहयोग आन्दोलन न ब्रिटिश-विरोधी है और न ईसाई-विरोधी, लेकिन यदि इसका प्रमाण ही चाहिए तो श्री स्टोक्सका उदाहरण हमारे सामने है। वे अंग्रेज हैं और भारतमें बस गये हैं। वे कट्टर ईसाई हैं। उन्होंने अपना सर्वस्व बेगारीकी कुप्रथाको दूर करनेमें लगा दिया है। ये श्री स्टोक्स पक्के असहयोगी और कांग्रेसी हैं। मेरे विचारमें मेरा यह कहना ठीक है कि वे धीरे-धीरे विचारपूर्वक उसके अनुयायी बने हैं। श्री स्टोक्स सरकारसे जितना संघर्ष कर रहे हैं, उतना कोई भारतीय भी नहीं कर रहा है। वे पर्वतीय लोगोंके सच्चे मार्गदर्शक, दार्शनिक और मित्र बन गये हैं। पाठकको यह जानना चाहिए कि बेगार शिमलामें ही, कहा जाये तो वाइसरायकी नाकके बिलकुल नीचे, चल रही है; और लॉर्ड रीडिंग फिर भी इस बुराईको दूर करनेमें असमर्थ हैं। मुझे इस बातमें सन्देह नहीं कि उनके मनमें इसे दूर करनेकी पर्याप्त इच्छा तो है, पर वे जिला अधिकारियों और अन्य अधिकारियोंको अपनी इच्छाके मुताबिक नहीं चला पाते। कुछ अधिकारी इतने निर्लज्ज हैं कि यदि वे ब्रिटिश सरकारके सीधे प्रशासनमें रहनेवाले प्रदेशोंमें मनमानी नहीं कर पाते हैं तो देशी रियासतोंके द्वारा करा लेते हैं। शिमलाके पासके पहाड़ी भागोंमें छोटी-छोटी देशी रियासतें हैं जिनमें ब्रिटिश अधिकारी ही सर्वशक्तिमान् होता है। वह अपने अधिकार-क्षेत्रमें वाइसरायसे भी अधिक शक्ति-सम्पन्न होता है। वह रियासतोंसे अपनी इच्छाके अनुसार काम करवा सकता है, और इतने पर भी कह सकता है कि उन रियासतोंके कामोंमें उसका कोई हाथ नहीं है। प्रतिपालक अधिकरण (कोर्ट ऑफ वार्ड्स) के अन्तर्गत एक ऐसी रियासत है जहाँ शिमलाके उप-आयुक्त (डिप्टी कमिश्नर) के इशारेपर बेगार-आन्दोलनको दबानेका प्रयत्न चल रहा है। मेरे एक पारसी मित्रने मेरी बातको सुधारते हुए ठीक ही कहा है कि यह समस्या ब्रिटिश शासनके समयसे नहीं, आदिकालसे, मानव-इतिहासके आरम्भसे ही चली आ रही है। और दमन करनेवालों का विशेष प्रिय तरीका यही है कि आन्दोलनके मुख्य-मुख्य व्यक्तियोंको जनताके बीचसे हटा दिया जाये। जड़पर ही कुठाराघात होना चाहिए और इसीलिए गरीब पर्वतीय लोगोंके सबसे अधिक कार्यक्षम और सुसंस्कृत व्यक्ति कपूरसिंहको बन्द कर दिया गया है। सबूत किस ढंगसे इकट्ठा किया गया था, इसका एक विशद वर्णन इस प्रकार है : :'''{{gap}}जनताको पूरी तौरपर आतंकित कर दिया गया था। शिमलासे पुलिस बुलाई गई और कई लोग गिरफ्तार कर लिये गये। सभी लोगोंको मशीनगनोंसे उड़ाने और कालापानी भेज देनेकी धमकियाँ देकर डराया गया...ऐसे वातावरणमें मुकदमेके लिए सबूत इकट्ठा किया गया।''' इससे पंजाबके मार्शल लॉके दिनोंकी याद हो आती है।<noinclude></noinclude> nrin2phhzd5mq5965b6afq3nrfl7wba पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५८ 250 186095 675134 644409 2026-08-30T07:21:16Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675134 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पर्वतीय लोगोंको अपने विश्वसनीय नेतापर किये गये इस अत्याचारके विषयमें बुरा लगना स्वाभाविक है। आशा है कि जबतक उनके नेताको छोड़ नहीं दिया जायेगा तबतक वे श्री स्टोक्सके नेतृत्वमें चलकर किसी भी तरहकी बेगार करनेसे दृढ़तापूर्वक इनकार कर देंगे; फिर उसके लिए उनको पूरे पैसे भी क्यों न मिलें? उन्हें कमजोर नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि एक संकल्प करके स्वयं ही अधिकारियोंके क्रोधका सामना करनेके लिए डट जाना चाहिए और अपने नेताके समान जेलकी सजाका सामना करना चाहिए। बेगार कायम रखनेके लिए यह हठ क्यों किया जाता है? अधिकारियोंकी सत्ता, शान और सुविधाके लिए। और इसलिए कि अधिकारियोंका काम बेगारसे ही चलता है। बेगारके बिना वे हिमालयके जंगलोंमें शिकार नहीं खेल सकते। यदि बेगार बन्द हो गई होती तो ड्यूकको पहाड़ी किलोंमें शिकारके लिए नहीं ले जाया जा सकता था। यदि इसे लुत्फ माना जाये तो शेरों और भोले-भाले जानवरोंके शिकार करनेका लुत्फ उठानेके लिए हजारों अनिच्छुक गाँववालों के परिश्रमके बलपर वहाँतक एक नया रास्ता तैयार कराना पड़ा था। यदि पशुओंके पास हमारी समझमें आने लायक वाणी होती तो वे अपना पक्ष ऐसे शब्दोंमें प्रस्तुत करते कि मानवता स्तब्ध रह जाती। जो जंगली जानवर हमें परेशान करने आते हैं, उनको मारनेकी बात तो मैं समझ सकता हूँ, पर मनुष्यकी रक्त-पिपासा शान्त करनेके लिए किये जानेवाले आयोजनोंपर बहुत पैसा लुटानेके पक्षमें जो तर्क दिये जाते हैं उनमें से कोई भी मुझे ठीक नहीं जँचता। यदि बेगार-प्रथा न होती तो अधिकारियों या पर्यटकोंके मनोरंजनके लिए शिकारके आयोजन भी न हो पाते। मुझे भारतीय राजाओंके रीति-रिवाज और महाभारतके दृष्टान्त बतलानेकी कोई जरूरत नहीं है। जिन दृष्टान्तों या रीति-रिवाजोंको मैं ठीक नहीं समझता या जिनका नैतिक आधारपर समर्थन नहीं कर सकता, मैं उनका दास बननेके लिए तैयार नहीं हूँ। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २१-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''२०३. स्त्रियोंकी स्थिति'''}}}} कटककी श्रीमती सरलादेवी लिखती हैं :—— :'''{{gap}}क्या आप यह नहीं मानते कि स्त्रियोंके प्रति किया जानेवाला दुर्व्यवहार भी अस्पृश्यताकी तरह व्यापक रोग है। मैं जिन तरुण 'राष्ट्रवादियों' के सम्पर्कमें आई हूँ उनमें से नब्बे प्रतिशतका दृष्टिकोण मैंने इस मामलेमें पशुवत् पाया है। भारतमें कितने असहयोगी हैं जो स्त्रियोंको केवल भोगकी वस्तु नहीं समझते? क्या स्त्रियोंके प्रति अपने दृष्टिकोणमें परिवर्तन किये बिना भी सफलताकी आवश्यक शर्त——आत्मशुद्धि——सम्भव है?<noinclude></noinclude> myepetdda7bmx0mj4d89f7n3bcsnx4q पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४५९ 250 186096 675139 644410 2026-08-30T07:33:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675139 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||स्त्रियोंकी स्थिति|४२७}}</noinclude>मैं इस मतसे सहमत नहीं हो सकता कि स्त्रियोंके साथ किया जानेवाला दुर्व्यवहार अस्पृश्यता-जितना व्यापक रोग है। श्रीमती सरलादेवीने इस बुराईको बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा है। और न ही असहयोगियोंके विरुद्ध लगाये गये इस आरोपको सिद्ध किया जा सकता है कि स्त्रियोंके प्रति उनका दृष्टिकोण मात्र वासना-पूर्तिका है। उद्देश्य कोई भी हो, नमक-मिर्च मिलाकर पेश करनेसे बात कमजोर हो जाती है। पर साथ ही, मुझे इस बातको स्वीकार करनेमें जरा भी हिचक नहीं है कि अपने-आपको सच्चे स्वराज्यके योग्य बनानेके लिए पुरुषोंको अपने मनमें स्त्रियों और उनकी पवित्रताके प्रति कहीं अधिक सम्मानकी भावना पैदा करनी चाहिए। श्री एन्ड्र्यूजने इस सम्बन्धमें जो बात कही है उसमें इन महिलाकी बातकी अपेक्षा कहीं अधिक सचाईह है। उन्होंने बहुत तीखे शब्दोंमें कहा है कि हमारी पतिता बहनोंकी लज्जाजनक स्थिति हमारे लिए दुःखकी ही बात हो सकती है; हम किसी भी तरह अपने अहंकारके पोषणके लिए उसका उपयोग करें, यह बहुत गलत है। कोई असहयोगी आनन्द और उत्साहके साथ यह कहे कि इन गुमराह बहनोंमें से कुछ ऐसी हैं जो अपना शरीर सिर्फ असहयोगियोंको ही देती हैं, तो यह बहुत ही गिरानेवाला विचार है। हमारे नैतिक कल्याणके विषय अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं और इस मामलेमें असहयोगियों और सहयोगियोंमें कोई भेद नहीं किया जा सकता। जबतक एक भी ऐसी स्त्री मौजूद है जिसे हम अपनी वासना-तृप्तिके लिए रखते हैं, हम सभी पुरुषोंके मस्तक लज्जासे झुक जाने चाहिए। हम ईश्वरकी सर्वश्रेष्ठ कृतिको अपनी वासना-तृप्तिका साधन बनाकर स्वयंको पशुवत् बनायें, इसकी अपेक्षा तो मैं यही पसन्द करूँगा कि समूची मानवजाति ही नष्ट हो जाये। पर यह समस्या केवल भारतकी नहीं है। यह तो संसार-भरकी समस्या है। मैं शारीरिक सुखोंके पीछे दौड़नेवाले आधुनिक कृत्रिम जीवनको त्यागनेका प्रचार इसीलिए करता हूँ और स्त्री-पुरुषोंसे सादगीका जीवन अपनानेके लिए इसीलिए कहता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि पशुताके स्तरसे नीचे उतरनेसे अपनेको बचानेका केवल यही एक मार्ग रह गया है कि हम समझ-बूझकर सादगीकी ओर लौट चलें। चरखा इस सादगीका ही प्रतीक है। मेरी उत्कट इच्छा है कि भारतीय नारियोंको अधिकसे-अधिक स्वतन्त्रता मिले। मैं बाल-विवाहोंसे घृणा करता हूँ। मैं बाल-विधवाको देखकर सहम जाता हूँ, और जब मैं किसी पतिको अपनी पत्नीके मरते ही एक बर्बर उदासीन भावसे दूसरा विवाह रचाते देखता हूँ तो क्रोधसे काँपने लगता हूँ। मैं उन माता-पिताओंकी अपराधपूर्ण उदासीनताकी निन्दा करता हूँ जो अपनी पुत्रियोंको बिलकुल अज्ञानी और निरक्षर रखते हैं और किसी सम्पन्न युवकसे विवाह कर देने मात्रके उद्देश्यसे ही उनको पालते-पोसते हैं। इस दुःख और क्रोधके होते हुए भी मैं इस समस्याकी कठिनाईको समझता हूँ। स्त्रियोंको मतदानका अधिकार होना चाहिए और कानूनी तौरपर उनका दर्जा पुरुषोंके बराबर होना चाहिए। पर समस्या यहीं समाप्त नहीं हो जाती। यह तो शुरू ही तब होती है जब नारियाँ देशकी राजनीतिक गति-विधियोंमें हाथ बँटाने लगती हैं। मेरे एक बड़े अच्छे मुसलमान मित्रने लन्दनमें नारी-आन्दोलनके प्रमुख कार्यकर्त्ताके साथ हुई अपनी बातचीतका वर्णन बड़े सुन्दर ढंगसे किया था। उसको मैं यहाँ अपना आशय स्पष्ट करनेके लिए प्रस्तुत करता हूँ। वे मित्र नारी स्वातंत्र्य आन्दोलनकी एक<noinclude></noinclude> 5dxsvlc5h1t35g6cewd35n4v3srxkdz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६० 250 186097 675144 644411 2026-08-30T07:43:12Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 675144 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बैठकमें भाग ले रहे थे। वहाँ एक महिला मित्रको बैठकमें एक मुसलमानको देखकर आश्चर्य हुआ। उसने उनसे पूछा कि वे बैठकमें कैसे पहुँच गये? मेरे मित्रने उनको बतलाया कि बैठकमें उपस्थित होनेके दो बड़े-बड़े और दो छोटे-छोटे कारण थे। बहुत छोटी आयुमें ही उनके पिता मर गये थे और वे जो-कुछ भी बन पाये हैं वह सब अपनी माताके कारण ही। फिर उनका विवाह भी ऐसी स्त्रीसे हुआ जो जीवनमें उनकी वास्तविक सहभागिनी सिद्ध हुई। और उनके कोई पुत्र नहीं था, केवल चार पुत्रियाँ हैं और वे सभी छोटी-छोटी हैं और वे स्वयं एक पिताके नाते चाहते हैं कि वे अधिकसे-अधिक उन्नति करें। ऐसी स्थितिमें नारी-आन्दोलनमें उनके भाग लेनेपर किसीको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि मुसलमानोंपर यह दोषारोपण किया जाता है कि वे स्त्रियोंके प्रति उदासीन रहते हैं। इससे अधिक गलत और अपमानपूर्ण कथन हो ही नहीं सकता। इस्लामी कानूनमें स्त्रियोंको समान अधिकार दिये गये थे। पर उनके खयालसे पुरुषने ही अपनी वासनाके लिए स्त्रीको पतिता बना दिया है। उसने स्त्रीकी आत्माकी प्रशस्ति करनेके बजाय उसके शरीरकी प्रशस्ति आरम्भ कर दी, और वह अपनी इस चालमें इतना ज्यादा सफल रहा कि आज स्वयं स्त्री यह महसूस नहीं कर पाती कि वह भी मात्र शारीरिक श्रृंगारसे प्रेम करने लगी है जो एक तरहसे उसकी दासताकी ही निशानी है। और यह कहते-कहते उनका गला रुँध गया कि यदि ऐसा नहीं तो क्यों बहनोंको अपने शरीरका साज-श्रृंगार करनेमें ही सबसे अधिक आनन्द आता है? क्या हम पुरुषोंने उन स्त्रियोंकी आत्माको ही बिलकुल कुचल नहीं दिया है? नहीं, उन्होंने अपने ऊपर काबू पाते हुए कहा कि वे सिर्फ इतना ही नहीं चाहते कि नारियाँ औपचारिक स्वतन्त्रता प्राप्त करके ही रह जायें, बल्कि उन्हें अपने बन्धनोंको भी तोड़नेमें समर्थ होना चाहिए, जिनमें उन्होंने स्वयंको अपनी इच्छासे जकड़ लिया है और इसीलिए उन्होंने तय कर लिया है कि वे अपनी पुत्रियोंको बड़ी होनेके बाद स्वतन्त्र रूपसे कोई काम करने योग्य बनायेंगे। इस सुविचारपूर्ण वार्ताका और अधिक ब्यौरा देनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं पत्र-लेखिकासे यही कहूँगा कि वे मुसलमान मित्रकी इस वार्ताके मुख्य विचारके विषयमें मनन करें और इस समस्याको हल करनेकी कोशिश करें। स्त्रीको स्वयंको पुरुषकी वासना-तृप्तिका साधन समझना बन्द कर देना चाहिए। इसका इलाज उसके अपने ही हाथमें ज्यादा है। यदि वह पुरुषके समान उसकी सहभागिनी बनना चाहती है तो उसे पुरुषके लिए और अपने पतिके लिए भी अपने शरीरका साज-श्रृंगार करनेसे इनकार कर देना चाहिए। मैं सीताके विषयमें इस प्रकार कभी सोच भी नहीं सकता कि उन्होंने रामको रिझानेके लिए शारीरिक साज-श्रृंगारपर एक क्षण भी नष्ट किया होगा। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २१-७-१९२१|1em}} {{Dhr|4em}}<noinclude></noinclude> bezu6aehbbmrqo2belsf30jnhhbsv7c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४६ 250 186314 674958 644665 2026-08-29T15:55:08Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674958 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''२१२. पत्र : बारडोली और आनन्दके निवासियोंके नाम'''}}}} {{Left|बारडोली और आनन्दके भाई-बहनो,}} मैं जानता हूँ कि आपके दुःखकी सीमा नहीं रही। आपने बड़ी आशा की थी। आपने इसी वर्षके भीतर अपने यज्ञ, अपने बलिदानके द्वारा स्वराज्य प्राप्त करने, मुसलमान-भाइयों तथा पंजाबके घावोंको भरने और अली-भाई इत्यादि कैदियोंको छुड़वानेका जिम्मा लिया था । पर ईश्वरने कुछ और ही सोचा था । भक्त नरसिंहने<ref>१४१४-१४७९; गुजरातके सन्त कवि ।</ref> सच ही कहा है 'बने नरसे तो कोई न रहे दुःखी' । किन्तु फल हमारे हाथमें कहाँ है ? हमें तो अपने उद्देश्यकी दिशामें परिश्रम ही करना चाहिए । जब श्री रामचन्द्र-जैसोंको राजगद्दी मिलने के समय वनवास मिला तो फिर हमारी क्या बिसात है ? मैं अपने परम मित्रकी<ref>अब्बास तैयबजी ।</ref> बात सोचता हूँ । उन्होंने पंजाबमें मेरे साथ काम किया था। वे पंजाब के दुःखको देख कर रो पड़ते थे। सारी जिन्दगी वे ऐश-आराममें रहे। उन्होंने मेरी बात सुनकर आराम छोड़ दिया है, जवानोंकी तरह काममें जुट गये हैं और उसमें सुख मान लिया है। उन्हें यह सोचकर बड़ी पीड़ा होती है कि वे आज अपने खेड़ा जिले और उसमें भी आनन्द ताल्लुकेके लोगोंको तुरन्त जेल नहीं भेज पा रहे हैं । किन्तु मैं उनको और आप सबको इस बातका विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि सब्र का फल मीठा ही होगा । अभी कुछ बिगड़ा नहीं है। हम बाजी हार नहीं गये हैं। बल्कि हम तो दुःखमेंसे सुख पैदा करनेमें समर्थ हुए हैं। अशान्ति हुई अवश्य, परन्तु ऐसा मालूम होता है कि उसमें से हमने शान्ति प्राप्त की । ईश्वरने छोटा-सा दुःख देकर हमें बड़े दुःखसे बचा लिया है । बारडोलीसे मुझे एक पत्र मिला है। बारडोली के बारेमें भी एक अन्य पत्र आया है और खेड़ाके बारेमें भी एक पत्र मैंने देखा है । उन सबसे यही जान पड़ता है कि आप अच्छी तरह तैयार नहीं हैं । न शान्तिके मामलेमें, न स्वदेशी के मामलेमें। एक पत्र में व्यौरा दे कर कहा गया है कि बारडोलीमें बलप्रयोग किया गया। जबर्दस्ती विदेशी टोपियाँ छीनी गईं और शराबके दूकानदारोंके प्रति भी बलका प्रयोग किया गया और उन्हें गालियाँ दी गईं। इन दोनों जिलोंमें बहुतसे लोग दिखावे के लिए खादी पहनते हैं । बहुतसे ऐसे लोग हैं जो घर के बाहर तो खादी पहनकर निकलते हैं मगर जिनके घरोंमें विदेशी कपड़ेसे सन्दूकें भरी हैं और खूंटियोंपर भी विदेशी कपड़े टॅगे हुए हैं। औरतोंमें तो मरदोंसे भी कम स्वदेशी वस्त्रोंका चलन है । खेड़ासे प्राप्त पत्रमें कहा गया है कि सब-कुछ खरा ही खरा नहीं है - खोटा या तो आँखोंकी<noinclude>{{dhr|}} {{Smallrefs}}</noinclude> 7oadpn5wcu2c5785fpfbk1eubtfwyxi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४७ 250 186315 674963 644666 2026-08-29T16:04:41Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674963 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||पत्र : बारडोली और आनन्दके निवासियोंके नाम| ५१५}}</noinclude>ओट रखा जाता है या उसपर मुलम्मा चढ़ा दिया गया है । अगर कोई बोले तो उसे चुप करवा दिया जाता है । मैं यह नहीं कहता कि ये सारी बातें ठीक ही हैं। थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति इसमें होगी। किन्तु हम आलोचकोंसे काफी कुछ सीख ले सकते हैं। अगर हम उनकी नजरोंसे अपनेको देखना सीख लें तो देखते-ही-देखते अपने दोषोंसे मुक्त हो जायें। अपनी पीठ हम स्वयं नहीं देख सकते - वह तो दूसरेको ही दिखती है । आपसे मैं शुद्धसे-शुद्ध यज्ञकी अपेक्षा करता हूँ । ईश्वरके दरबारमें शुद्ध बलिदान ही मंजूर होता है। बिना माँगे जो अवसर हाथ लगा है उसमें अपने तमाम ऐबोंको ढूंढ-ढूंढ़ कर निकाल दो । सब चरखा धर्मका खूब पालन करो। ऐसी तजवीज करो कि हर घरमें अच्छा, मजबूत, बिना गर्दका सूत रोज कते, कोई भूखों न मरे, किसी के घरमें विदेशी कपड़ेकी गंदगी न रहे। मेरे सुझाए हुए आँकड़े इकट्ठे करो । अगर किसीके कपड़े जबरदस्ती छीने गये हों तो हम उससे माफी माँगें । सहयोगियोंके प्रति मनमें जरा गुस्सा न रखें। उनके दुःखमें उनकी सेवा करें। हम सरकारी कर्मचारियोंकी न खुशामद करें, न उनसे डरें । पुलिसका डर छोड़ दें । उन्हें भी अपना भाई समझकर उनपर प्रेम करें। आपके बच्चे यदि आज भी सरकारी मदरसोंमें जाते हों तो उन्हें वहाँसे उठा लें और असहयोग आन्दोलनको बढ़ाते हुए बल प्रयोग न करें। गाँवमें एक भी सहयोगी बच गया हो तो उसके साथ भी वैरभाव न रखें; बल्कि यह समझें कि हमें अपने मतपर दृढ़ रहनेका जितना हक है उतना ही उसे भी है । यदि गाँवोंमें आपसमें दुश्मनी हो तो उसे हटा दें । सत्याग्रही गाँवोंमें वैरभावके लिए जगह ही नहीं है। मनमें अगर भंगी-चमारोंके प्रति तिरस्कारकी भावना रही हो तो उसे निकाल दें । उनके लड़कोंको अपने मदरसोंमें प्रेमके साथ रखें और बुलाकर भरती करें। उनके रहने के स्थानोंकी देखभाल करें और पानी आदिकी सुविधा न हो तो करें। उन्हें जूठन न देकर उसके बदले कच्चा, बिना पका हुआ अन्न दें या वेतन बढ़ा दें । गाँवोंमें जो लोग शराब पीते हों, उन्हें प्रेमपूर्वक कह सुनकर, समझा-बुझाकर, उनकी यह बुरी आदत छुड़ायें । न मानें तो उनकी मर्जी । शराबकी दूकान हो तो दूकानदारको भी नम्रतापूर्वक ही समझायें । उसपर रोष न करें। उसपर ममता रखें। गाँवोंमें कोई बदमाश, उपद्रवी या चोर-डाकू रहता हो तो उससे न तो खुद डरें और न उसे डरायें । उसे भी अपना भाई समझकर मिलें और उसकी हालत समझकर उसकी आदत छुड़ायें तथा ऐसे चोर डाकुओंके दिलको बदलनेका प्रयत्न करें और साथ ही उसके जोर-जुल्मसे स्वयं बचने और बाल-बच्चों तथा अपने धनमालकी रक्षा करनेकी शक्ति प्राप्त करें। इसके लिए आप अपने ही चौकीदार रख सकते हैं। उन्हें चोरोंके साथ लड़नेकी जरूरत नहीं पड़ेगी । पहरा हो तो चोर नहीं आते। 'जागतेको भय नहीं' यह कहावत बिलकुल सही है; तो भी सम्भव है कोई हाथ मार जाये । तो उससे निडर रहना । अपनी तहसीलके बदमाश लोगोंका आपको पता तो होना ही चाहिए।<noinclude></noinclude> fste7qpvoqzppv6ix3emdie2l958s4b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४८ 250 186316 674982 644667 2026-08-29T16:26:09Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674982 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{gap}}आनन्दमें तो डाकोरजी विराजमान हैं। मैं इस विषयमें एक बार लिख चुका हूँ ।<ref>देखिए खण्ड १६, पृष्ठ २८४-८६ ।</ref> यदि आप लोग आनन्द ताल्लुकेकी बाहरी और भीतरी व्यवस्थामें सुधार कर डालें तो यह जिला वास्तवमें योग्यता प्राप्त कर ले। क्या मन्दिरका टंटा समाप्त हो गया है ? तालाब साफ कर लिया गया है ? जो यात्री यहाँ आते हैं वे केवल नामके ही तीर्थयात्री न रहकर शुद्ध तीर्थ यात्री बने ? क्या अत्याचार होने बन्द हुए? डाकोरमें सर्वत्र स्वच्छता छाई ? मन्दिरसे विदेशी कपड़ेका बहिष्कार हो चुका ? क्या जिलेके लोग आज भी अपने मतभेद लेकर अदालतोंमें ही जाते हैं ? आप निश्चय रखिए कि यदि असहयोगी सच्चे हो जायें, उनमें परस्पर प्रेम उत्पन्न हो जाये तो सब लोग उस प्रेमके वशमें हो जायेंगे। मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि यदि आपकी दोनों तहसीलें असहयोगके समस्त अंगोंका अब भी सर्वाशमें पालन कर सकें तो आप इसी वर्ष में स्वराज्य ले लेंगे । और अगर आप निश्चय कर लें तो उसका पालन करना तनिक भी कठिन नहीं है। अगर यह बात आप सबके मनमें लग गई है तो फिर उसका आचरण बिलकुल ही आसान है । अगर आप बिना समझे और द्वेषभावसे काम कर रहे होंगे तो बात मुश्किल है । मैं कितनी ही बार कह चुका हूँ कि असह्योगका मूल प्रेम है, वैर नहीं । आत्मबल प्रेमबल है और जगत् इसी बलके अधीन है। यदि अपने बलसे भारतको मुक्त करना है तो आप सब प्रेमकी वर्षा करें। आपको परदुःखभंजन कहलाना हो तो आपके मनमें सहनशीलता, शौर्य, सत्य इत्यादि मूर्तिमान होने चाहिए । केवल दिखावेसे स्वराज्य नहीं मिलेगा । बम्बई में हुई भूलोंके बावजूद यदि आपको इसी वर्ष स्वराज्य प्राप्त करना है तो आपको आजकी अपेक्षा बहुत ही अधिक आत्मशुद्धि करनी पड़ेगी । अर्थात् आपको सच्चा हिन्दू, सच्चा मुसलमान, सच्चा पारसी और सच्चा ईसाई होना पड़ेगा । आप अपने यहाँके पारसियों और ईसाइयोंसे मिलते-जुलते रहनेकी बात कभी न भूलें और उन्हें अपने प्रेमके बलपर निर्भय कर दें । आप मेरी आशा न छोड़ें और स्वयं भी ऐसा करते जायें कि मुझे आपकी आशा न छोड़नी पड़े। मैं आपसे शीघ्र ही मिलने आऊँगा । इस बीच आप अपनी तैयारीमें लगे रहें । {{right|{{larger|आपका सेवक, मोहनदास करमचन्द गांधी}}}} {{Left|[ गुजरातीसे ]<br> '''नवजीवन''', २७-११-१९२१}}<noinclude>{{dhr|4em}} {{Smallrefs}}</noinclude> d5x5v0fnl5z8zh48qu9x1f5bggpsmb5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४९ 250 186317 674990 644668 2026-08-29T16:46:53Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674990 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१३. टिप्पणियाँ'''}}} {{C|'''उपवासके बाद'''}} यह टिप्पणी मैं अपने उपवास छोड़ने के बाद लिख रहा हूँ । 'यंग इंडिया' के बहुतेरे लेख उपवासकी अवधिमें ही लिखे गये हैं । उन दिनोंके मेरे विचार और आजके अपने विचारोंमें मुझे कोई अन्तर नजर नहीं आता । उपवासके पहलेके मेरे विचार ज्योंके -त्यों बने हुए हैं। {{C|'''एक परिवर्तन'''}} सिर्फ एक बातमें परिवर्तन हुआ है । परन्तु इसका कारण उपवास नहीं है बल्कि इसका कारण जो दृश्य मैंने १० ता० गुरुवारको बम्बई में देखा तथा शुक्रवार और शनिवारको जिन दुर्घटनाओंका हाल मैंने सुना, वे हैं । अब मैं यह देख पा रहा हूँ कि सविनय अवज्ञा के लिए हम अभी तैयार नहीं हैं। ऐसी अवस्थामें बारडोलीमें सविनय- अवज्ञा शुरू करनेका अर्थ अपनी बाजी हारना ही है । उसका प्रयोजन स्वराज्यकी प्राप्ति, खिलाफतका निपटारा और पंजाबके प्रश्नपर सरकारसे माफी मँगवाना है । वर्तमान अवस्थामें कानून-भंग करनेसे इन तीनमें से किसी भी उद्देश्यकी पूर्ति नहीं हो सकती । बम्बई और बारडोली-आनन्दका परस्पर इतना निकटका सम्बन्ध है कि वे एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैं और उनमें यह शक्ति विद्यमान भी है। इधर हम बारडोली और आनन्दमें सविनय अवज्ञा शुरू करें और उधर बम्बई में हिंसापर उतारू हो जायें तो, थोड़ा भी सोचनेसे यह बात ध्यानमें आ सकती है कि बम्बईसे हमको मदद नहीं मिल पायेगी यही नहीं, बम्बई हमारे संग्रामको हानि भी पहुँचा सकती है । कानूनके मनमाने भंगका अर्थ तो सरकारके साथ पूरे सहयोगके सिवा दूसरा कुछ नहीं हो सकता । क्या हम अभीतक यह भी नहीं समझे हैं कि सरकार महज हमारी कमजोरियोंपर, कानूनको मनमाने तौरपर भंग करनेकी हमारी आदतपर, हमारी मारकाटपर टिकी हुई है ? वकीलोंके असहयोगसे सरकार जितनी कमजोर हुई है उससे अधिक कमजोर वह हमारी शान्तिकी बदौलत हुई है। वकीलवर्ग के सहयोगसे सरकारको जितना बल मिलता है उससे अधिक बल उसे हमारे शान्तिभंग करने से मिलता है। क्योंकि इससे सरकारको अत्याचार करके, लोगोंको भयभीत करके, अपनी सत्ता अधिक मजबूत करनेका मौका मिल जाता है। अतएव एक जगह अविनय और दूसरी जगह विनय हो तो वह पहाड़ खोदकर चूहा निकालने जैसा है, नहा-धोकर फिर कीचड़में कूदने जैसा है। फूटे लौटे में चाहे कितना पानी क्यों न डाला जाये, वह उसमें कभी ठहर नहीं सकता। इसी प्रकार विनय रहित वायुमण्डलमें चाहे विजयकी कितनी ही कोशिश करते रहिए, वह व्यर्थ गये बिना नहीं रह सकती। पहले तो हमें सारे हिन्दुस्तानमें विनयपूर्ण शान्त वायुमण्डल तैयार करना चाहिए। सौभाग्य अथवा दुर्भाग्यसे हम तो यह दावा करते हैं कि सारा हिन्दुस्तान हमारे साथ<noinclude></noinclude> d8orkibz52g0k5n2oq9eoqfwwvm0n9a 674991 674990 2026-08-29T16:47:27Z Shivaniya shaw 4129 674991 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१३. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|'''उपवासके बाद'''}} {{Gap}}यह टिप्पणी मैं अपने उपवास छोड़ने के बाद लिख रहा हूँ । 'यंग इंडिया' के बहुतेरे लेख उपवासकी अवधिमें ही लिखे गये हैं । उन दिनोंके मेरे विचार और आजके अपने विचारोंमें मुझे कोई अन्तर नजर नहीं आता । उपवासके पहलेके मेरे विचार ज्योंके -त्यों बने हुए हैं। {{C|'''एक परिवर्तन'''}} सिर्फ एक बातमें परिवर्तन हुआ है । परन्तु इसका कारण उपवास नहीं है बल्कि इसका कारण जो दृश्य मैंने १० ता० गुरुवारको बम्बई में देखा तथा शुक्रवार और शनिवारको जिन दुर्घटनाओंका हाल मैंने सुना, वे हैं । अब मैं यह देख पा रहा हूँ कि सविनय अवज्ञा के लिए हम अभी तैयार नहीं हैं। ऐसी अवस्थामें बारडोलीमें सविनय- अवज्ञा शुरू करनेका अर्थ अपनी बाजी हारना ही है । उसका प्रयोजन स्वराज्यकी प्राप्ति, खिलाफतका निपटारा और पंजाबके प्रश्नपर सरकारसे माफी मँगवाना है । वर्तमान अवस्थामें कानून-भंग करनेसे इन तीनमें से किसी भी उद्देश्यकी पूर्ति नहीं हो सकती । बम्बई और बारडोली-आनन्दका परस्पर इतना निकटका सम्बन्ध है कि वे एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैं और उनमें यह शक्ति विद्यमान भी है। इधर हम बारडोली और आनन्दमें सविनय अवज्ञा शुरू करें और उधर बम्बई में हिंसापर उतारू हो जायें तो, थोड़ा भी सोचनेसे यह बात ध्यानमें आ सकती है कि बम्बईसे हमको मदद नहीं मिल पायेगी यही नहीं, बम्बई हमारे संग्रामको हानि भी पहुँचा सकती है । कानूनके मनमाने भंगका अर्थ तो सरकारके साथ पूरे सहयोगके सिवा दूसरा कुछ नहीं हो सकता । क्या हम अभीतक यह भी नहीं समझे हैं कि सरकार महज हमारी कमजोरियोंपर, कानूनको मनमाने तौरपर भंग करनेकी हमारी आदतपर, हमारी मारकाटपर टिकी हुई है ? वकीलोंके असहयोगसे सरकार जितनी कमजोर हुई है उससे अधिक कमजोर वह हमारी शान्तिकी बदौलत हुई है। वकीलवर्ग के सहयोगसे सरकारको जितना बल मिलता है उससे अधिक बल उसे हमारे शान्तिभंग करने से मिलता है। क्योंकि इससे सरकारको अत्याचार करके, लोगोंको भयभीत करके, अपनी सत्ता अधिक मजबूत करनेका मौका मिल जाता है। अतएव एक जगह अविनय और दूसरी जगह विनय हो तो वह पहाड़ खोदकर चूहा निकालने जैसा है, नहा-धोकर फिर कीचड़में कूदने जैसा है। फूटे लौटे में चाहे कितना पानी क्यों न डाला जाये, वह उसमें कभी ठहर नहीं सकता। इसी प्रकार विनय रहित वायुमण्डलमें चाहे विजयकी कितनी ही कोशिश करते रहिए, वह व्यर्थ गये बिना नहीं रह सकती। पहले तो हमें सारे हिन्दुस्तानमें विनयपूर्ण शान्त वायुमण्डल तैयार करना चाहिए। सौभाग्य अथवा दुर्भाग्यसे हम तो यह दावा करते हैं कि सारा हिन्दुस्तान हमारे साथ<noinclude></noinclude> pmas8c6sdj5u1qgusf8w6xi931fc1of पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५१ 250 186318 674995 644670 2026-08-29T16:59:03Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674995 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ५१९}}</noinclude>कि हम इन उपद्रवी लोगोंसे मिलें, बातचीत करें, उन्हें धर्मका और देशका हित समझायें और उनसे कहें कि भाई, अपनी अशान्तिके द्वारा देशके कार्यमें विघ्न न डालो। यह कोई बड़ा लम्बा कार्यक्रम नहीं है । बम्बई में यह काम सिर्फ पन्द्रह दिनोंमें हो सकता है। उपद्रवी लोगोंको मैं सीधे-सादे, परन्तु भ्रमवश उलटा मार्ग पकड़ लेने- वाले भाई मानता हूँ। उन्हें हमने अपने किसी अन्ध स्वार्थके लिए बुरा बनाया अथवा बना रखा है । अतएव ऐसी स्थिति भी सहज ही बनाई जा सकती है जिसमें वे हमारे धर्मयुद्ध में रुकावट न डालें । असहयोगके समय उन्हें अपनी मारकाटकी या लूटमारकी कुटेवका प्रयोग न करना चाहिए। अगर हम उनपर अपना इतना भी असर न डाल सकें तो हम स्वराज्य के अयोग्य सिद्ध होंगे। मान लीजिए कि अंग्रेजी सत्ता हिन्दुस्तानसे चली गई, तो फिर इन उपद्रवी लोगोंकी आदतोंसे हमें कौन बचायेगा ? यह शुद्धि स्वराज्यके बाद नहीं होगी, बल्कि यह शुद्धि होना तो स्वराज्य प्राप्तिकी एक शर्त है । यदि हम उन्हें अपने प्रेमके द्वारा अपने वशमें न कर सके तो उन्हें वश करने के लिए आवश्यक तलवार-बल तो हमारे पास है ही नहीं । और मुझ जैसे लोग तो उनकी तलवारसे टुकड़े-टुकड़े हो जाना पसन्द करेंगे; पर उन्हें तलवारके घाट उतारकर स्वयं जिन्दा रहनेका प्रयत्नतक न करेंगे । {{C|'''बाधाएँ'''}} यह सुधार होना है तो आसान, पर हमारे रास्तेमें बाधाएँ हैं । हमारे देशमें आज छ: मत प्रचलित हैं : (१) जो यह मानते हैं कि हिंसा के बिना स्वराज्य कभी नहीं मिल सकता । इसलिए वे शान्तिका उपयोग अशान्ति फैलाने के काममें करते हैं । (२) जो यह समझते हैं कि शान्ति और अशान्ति दोनोंको एक-साथ जारी रखने में ही कल्याण है । इससे वे अशान्तिका भी स्वागत करते हैं। इनका हेतु आत्म- शुद्धि नहीं, बल्कि केवल सरकारको परेशान करना है । (३) वह वर्ग जो अशान्तिको रोकते हुए भी, लेकिन अगर वह जारी ही रहे तो भी, शान्तिके किसी प्रयोगको बन्द करनेकी इच्छा नहीं रखता । (४) यह माननेवाले कि जितना सरकारके साथ रहकर किया जा सके उतना ही काम करना उचित है । (५) जो शान्तिका प्रयोगके तौरपर या नीतिके तौरपर प्रचार करते हैं और जब उसका प्रयोग शुरू कर दिया जाता है तब मनमें दुःखी होते हैं । (६) जो शान्तिको ही हिन्दुस्तानकी मुक्ति और हिन्दू-मुस्लिम एकताका मार्ग समझकर काम करते हैं और इसलिए अनजानमें भी लोगोंकी तरफसे होनेवाले उपद्रवोंको पसन्द नहीं करते । थोड़ा भी विचार करनेसे हम यह देख सकते हैं कि पाँचवें और छठे वर्गके लोग ही हमारे सहायक हैं और केवल इन्हीं लोगोंसे हमारा काम चल सकता है। शेष सब मतोंके लोग हमें नुकसान पहुँचानेवाले हैं। उन्हें हमें विनयसे, दलीलसे, सेवासे अपना बना लेना है । परन्तु चौथा अर्थात् सहयोगियोंका वर्ग बहुत भयानक नहीं है । वह हमें<noinclude></noinclude> iuxwxd47n9ca39qmq67c0fhcoz8c3eg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५२ 250 186319 674998 644671 2026-08-29T17:04:02Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674998 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|५२०| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा सकता। फिर हम उस वर्गको पहचानते हैं । उसका संघ है । उसकी हलचल प्रकट रूपसे होती है। पहले तीन मतके लोगोंका कोई संघ नहीं है । उनकी कोई संस्था नहीं, कोई मण्डल नहीं। वे सब देशमें दूर-दूर बिखरे हुए हैं और जब मौका देखते हैं तभी लोगोंपर अपना असर डालते हैं। ये लोग बिखरे हुए हैं, इसलिए उनतक पहुँचना भी मुश्किल है । परन्तु जब-जब उपद्रव होते हैं तब वे मैदान में आते हैं और लोगोंमें अशान्ति फैलाते हैं । इनमें से कितने ही लोग शुद्ध हेतुसे, परन्तु अज्ञानवश, असहयोगी मण्डलोंमें सम्मिलित होकर अपने मतको फैलाने का भी प्रयत्न करते हैं । उस हालतमें उनकी यह हलचल अधिक हानिकारक सिद्ध होती है । ये सब पागल लोग बम्बई में गुरुवारसे रविवारतक काम कर रहे थे । इसी कारण हमने तरह-तरहकी अफवाहें सुनीं। और जो लोग सिर्फ इन लोगोंकी बात सुनकर अपने-अपने कामपर चले जाना चाहते थे वे भी बहकावे में आकर दोबारा मुँह फेरकर खड़े हो गये । {{C|'''खुफिया पुलिस'''}} कुछ लोग कहते हैं कि यह सब काम खुफिया पुलिसका ही था । मैं यह बात बिलकुल नहीं मानता। हाँ, यह ठीक है कि खुफिया पुलिसका थोड़ा-बहुत इसमें हाथ था। खुफिया पुलिसके कितने ही लोगोंको उपद्रव न हो तो चैन ही नहीं पड़ती। परन्तु खुफिया पुलिस के लोगोंके सिवा कुछ ऐसे लोग भी जिनका खुदका मत अशान्तिके पक्षमें था, काम कर रहे थे । उन लोगों में ऐसे उपद्रवी लोग भी थे जिनका पेशा लूटना आदि ही है । इसलिए वे तो बिलकुल ही झूठी अफवाहें उड़ा उड़ाकर अपना काम बना रहे थे । {{C|'''एकमात्र उपाय'''}} इसके लिए अपने पास एक ही उपाय है। हमारा रास्ता सीधा है। हमें इन सबके ऊपर अपना असर डालना चाहिए । जब दूसरे सभी लोग जनताको अपने हाथ- का पांसा बना रहे हों तब अगर उसकी समझमें यह बात बैठ जाये कि उसे तो असहयोगियोंकी बात ही माननी है तो वह ऐसे उपद्रवोंमें शामिल नहीं होगी। हम यदि जनताको अपनी बात समझा सकें तो शान्ति फैल सकेगी; और शान्तिका फैल जाना इस बातको जाहिर करेगा कि हममें शान्ति की स्थापना और उसकी रक्षा करनेकी शक्ति है । किन्तु इसके लिए हमारा सच्चा और उद्यमी होना जरूरी है। अपने साधनोंमें हमें पूरा विश्वास होना चाहिए और सदा सावधान रहना चाहिए। बम्बईके कार्यकर्त्ता सावधान नहीं रहे। वे गफलत में पड़े रहे। उन्होंने मान लिया था कि अब तो लोग हमारी बातको इतनी अच्छी तरह समझ गये हैं कि उपद्रव हो ही नहीं सकते । इससे उन्होंने युवराज- के स्वागतके बहिष्कारकी तैयारियाँ तो खूब कीं; परन्तु पूर्ण शान्तिकी रक्षाके लिए जितने प्रयत्न कर रखने थे, वे न कर पाये । परिणाम जो हुआ सो हमने देखा ही है । चाहे जो हो, पुलिसकी उलटी कोशिश होते हुए भी जब हम शान्ति रक्षा करनेमें समर्थ बन जायें तभी हम सरकारसे बढ़े-चढ़े और स्वराज्यके लायक माने जा सकते हैं । दोष<noinclude></noinclude> meq8j7v8c48nsjqy05z4bby4bdzttwp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५३ 250 186320 674999 644672 2026-08-29T17:07:32Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ| ५२१}}</noinclude>पुलिसके माथे मढ़कर अगर हम अपनेको बहलाते रहें तो हम हार जायेंगे । दुश्मन हमें छका दे, ऐसा कुछ कर गुजरे जो हमारे ध्यानमें ही नहीं आया हो और तब यदि हम ऐसा कहें कि “ दुश्मन तो हमें जीतने ही नहीं देता, हमें दम ही नहीं लेने देता", तो फिर हम काहेके योद्धा ? दुश्मन जो चाहे किया करे, तथापि जब हम यह सिद्ध कर दिखायें कि हममें लड़नेकी शक्ति है, तभी हम जीतनेकी आशा रख सकते हैं। सरकार चाहे जो कुछ करे फिर भी हम शान्तिकी रक्षा कर सकते हैं। जबतक हम ऐसा न कर सकेंगे तबतक जीतनेकी आशा ही नहीं रखनी चाहिए । {{C|'''आत्म निरीक्षण'''}} अतएव पुलिस के ऐब निकालनेकी बनिस्बत हमारा धर्म तो यही है कि हम अपना ही ऐब ढूँढें । हमने क्योंकर एकदम भोले बनकर हर तरहकी अफवाहें मान लीं ? सवाल है, हमने जबरदस्ती की या नहीं, विदेशी टोपियाँ जबरन छीनी या नहीं, ट्रामगाड़िया जलाई कि नहीं, शराबकी दुकानोंमें आग लगाई या नहीं, दूसरोंकी देखा- देखी जानमालको नुकसान पहुँचाया या नहीं ? हमने अपने मनमें मैल रखा या नहीं ? सहयोगियों के प्रति मनमें वैर भाव रखा या नहीं ? अगर हमने यह सब किया हो - और मैंने देखा है कि हमने ऐसा किया है. तो हमें ईश्वरके नजदीक हाथ जोड़कर माफी मांगनी चाहिए, आत्मशुद्धि करनी चाहिए और अब आगे ऐसा न करनेकी प्रतिज्ञा करनी चाहिए। आप भले तो जग भला' इस कहावतमें एक बड़ा सिद्धान्त छिपा हुआ है। हमारे दिलमें मैल है और हम डरपोक हैं तभी तो हम हरएक हाकिम और पुलिसको अपना दुश्मन मानते हैं । हम अगर डरको निकालकर दूर रख दें तो छिपी या खुली किसी भी पुलिससे न डरें और न किसीके बहकानेसे बहकें। हम तो केवल अपने आंतरिक बलके सहारे ही जूझना चाहते हैं; और वह बल किसीके दियेसे हमें नहीं मिल सकता। वह तो ईश्वरसे ही मिल सकता है। बस अपनी कमजोरियोंको जीतनेकी देर है कि स्वराज्य हथेली में रखा है। :[ गुजरातीसे ] :'''नवजीवन,'''२७-११-१९२१<noinclude></noinclude> e4yzh5fme3rdjfxx81flxalgndt00hv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५४ 250 186321 675024 644673 2026-08-29T18:21:28Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675024 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{x-larger|'''२१४. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''सफेद झूठ'''}} बम्बई में हालके उपद्रवके सम्बन्ध में मैंने वक्तव्य<ref>देखिए " गहरा कलंक", १८-११-१९२१ ।</ref> दिया था कि उसमें पुलिस और फौजने पक्षपात किया और उन्होंने नहीं, बल्कि बम्बईके निवासियोंने शान्ति स्थापित की है। बम्बई सरकारने मेरे इस वक्तव्यका प्रतिवाद किया है। उसके इस प्रतिवादपर मुझे दुःख है । मैंने इसकी आशा नहीं की थी। अब तो मैं उन आरोपोंमें एक आरोप और जोड़कर सारे चित्रको पूरा किये देता हूँ। पुलिस या फौज लोगोंके जान-मालकी रक्षा करनेमें असमर्थ थी । सत्रह तारीखको मैंने देखा कि वह जलती हुई ट्राम और मोटर गाड़ियोंको बचा नहीं सकी । भिंडी बाजारमें शराबकी दुकान जला कर खाक कर दी गई, लेकिन पुलिस या फौज उसके बचावका कोई प्रबन्ध न कर सकी । और १८ तथा १९ तारीखको भी उन्होंने इससे बेहतर कुछ नहीं किया। आगजनी और लूट-मार जारी रही, पर पुलिस और फौज मुँह ताकती रही। जब किसीने कुछ मदद चाही, तो उससे साफ कह दिया गया कि हमारे पास अब अधिक जवान नहीं हैं; तमाम लोग युवराजके स्वागतके इन्तजाममें लगे हुए हैं । पुलिस या फौज जब उपद्रव ग्रस्त स्थानोंपर किसीके भी जान-मालकी रक्षातक न कर पाई, तब उसके लिए शान्तिकी स्थापना करना क्या सम्भव था? शान्तिकी स्थापनाका श्रेय अकेले असहयोगियोंको ही नहीं दिया जा रहा है। मैं तो इसका श्रेय सहयोगी-असहयोगी, हिन्दू-मुसलमान, पारसी-ईसाई सभीको देता हूँ और ईसाइयोंमें अंग्रेज भी शामिल हैं। यदि बम्बईके तमाम शान्ति प्रिय लोग साथ न देते तो शान्तिकी स्थापना नहीं हो पाती। इसका श्रेय मैं मियाँ छोटानीको देता हूँ। २० तारीख को सर फिरोज सेठनाके ही प्रयत्नसे फौज एक भीड़पर गोली चलानेसे रुकी; और डा० पावरी तथा श्री बैंकरकी कोशिशोंके फलस्वरूप वह भीड़ पाँच मिनटमें ही छँट गई । मैं कितने ही ऐसे उदाहरण दे सकता हूँ जिनमें बम्बई के लोगोंने इस तरह भीड़को तितर-बितर किया है। इसमें सभी मतों, सभी दलोंके लोगोंका हाथ था । श्रीमती सरोजिनी नायडूसे तो फौजके लोगोंने कई बार कहा था कि भीड़ हटाने में हमें मदद दीजिए। इसमें कोई शक नहीं कि सहयोगी और असहयोगी दोनों ही प्रकारके पारसियोंने यदि सहायता न दी होती, तो शान्तिकी स्थापना असम्भव थी । शान्तिकी स्थापनाके बाद जिस दिन बम्बईके कितने ही सज्जनोंके साथ मैंने फलाहार किया था, उस दिन श्री एच० पी० मोदीने भी शान्ति स्थापनाके लिए नगरवासियोंको ही श्रेय प्रदान किया। श्री पुरुषोत्तमदासने यद्यपि असहयोगियोंको आरम्भिक उत्तेजनाके लिए बड़ी शिष्टताके साथ उलाहना दिया, तथापि उन्होंने भी इस बातको अस्वीकार नहीं किया कि जनताने ही शान्तिकी स्थापना की। श्री नटराजन्ने भी उन लोगोंकी मुक्त-<noinclude></noinclude> saegjseg1a1orhykjtisz3g68inqy43 675026 675024 2026-08-29T18:23:05Z Shivaniya shaw 4129 675026 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{x-larger|'''२१४. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''सफेद झूठ'''}} {{Gap}}बम्बई में हालके उपद्रवके सम्बन्ध में मैंने वक्तव्य<ref>देखिए " गहरा कलंक", १८-११-१९२१ ।</ref> दिया था कि उसमें पुलिस और फौजने पक्षपात किया और उन्होंने नहीं, बल्कि बम्बईके निवासियोंने शान्ति स्थापित की है। बम्बई सरकारने मेरे इस वक्तव्यका प्रतिवाद किया है। उसके इस प्रतिवादपर मुझे दुःख है । मैंने इसकी आशा नहीं की थी। अब तो मैं उन आरोपोंमें एक आरोप और जोड़कर सारे चित्रको पूरा किये देता हूँ। पुलिस या फौज लोगोंके जान-मालकी रक्षा करनेमें असमर्थ थी । सत्रह तारीखको मैंने देखा कि वह जलती हुई ट्राम और मोटर गाड़ियोंको बचा नहीं सकी । भिंडी बाजारमें शराबकी दुकान जला कर खाक कर दी गई, लेकिन पुलिस या फौज उसके बचावका कोई प्रबन्ध न कर सकी । और १८ तथा १९ तारीखको भी उन्होंने इससे बेहतर कुछ नहीं किया। आगजनी और लूट-मार जारी रही, पर पुलिस और फौज मुँह ताकती रही। जब किसीने कुछ मदद चाही, तो उससे साफ कह दिया गया कि हमारे पास अब अधिक जवान नहीं हैं; तमाम लोग युवराजके स्वागतके इन्तजाममें लगे हुए हैं । पुलिस या फौज जब उपद्रव ग्रस्त स्थानोंपर किसीके भी जान-मालकी रक्षातक न कर पाई, तब उसके लिए शान्तिकी स्थापना करना क्या सम्भव था? शान्तिकी स्थापनाका श्रेय अकेले असहयोगियोंको ही नहीं दिया जा रहा है। मैं तो इसका श्रेय सहयोगी-असहयोगी, हिन्दू-मुसलमान, पारसी-ईसाई सभीको देता हूँ और ईसाइयोंमें अंग्रेज भी शामिल हैं। यदि बम्बईके तमाम शान्ति प्रिय लोग साथ न देते तो शान्तिकी स्थापना नहीं हो पाती। इसका श्रेय मैं मियाँ छोटानीको देता हूँ। २० तारीख को सर फिरोज सेठनाके ही प्रयत्नसे फौज एक भीड़पर गोली चलानेसे रुकी; और डा० पावरी तथा श्री बैंकरकी कोशिशोंके फलस्वरूप वह भीड़ पाँच मिनटमें ही छँट गई । मैं कितने ही ऐसे उदाहरण दे सकता हूँ जिनमें बम्बई के लोगोंने इस तरह भीड़को तितर-बितर किया है। इसमें सभी मतों, सभी दलोंके लोगोंका हाथ था । श्रीमती सरोजिनी नायडूसे तो फौजके लोगोंने कई बार कहा था कि भीड़ हटाने में हमें मदद दीजिए। इसमें कोई शक नहीं कि सहयोगी और असहयोगी दोनों ही प्रकारके पारसियोंने यदि सहायता न दी होती, तो शान्तिकी स्थापना असम्भव थी । शान्तिकी स्थापनाके बाद जिस दिन बम्बईके कितने ही सज्जनोंके साथ मैंने फलाहार किया था, उस दिन श्री एच० पी० मोदीने भी शान्ति स्थापनाके लिए नगरवासियोंको ही श्रेय प्रदान किया। श्री पुरुषोत्तमदासने यद्यपि असहयोगियोंको आरम्भिक उत्तेजनाके लिए बड़ी शिष्टताके साथ उलाहना दिया, तथापि उन्होंने भी इस बातको अस्वीकार नहीं किया कि जनताने ही शान्तिकी स्थापना की। श्री नटराजन्ने भी उन लोगोंकी मुक्त-<noinclude>{{dhr|}} {{Smallrefs}}</noinclude> sx2lkekx5o4iox1lgwbiyc9mmlxva57 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५५ 250 186322 675033 644674 2026-08-29T18:29:57Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675033 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५२३||टिप्पणियाँ}}</noinclude>कंठसे प्रशंसा की, जिन्होंने अतिवांछित शान्ति स्थापित की थी। श्री के० टी० पॉल और श्री डगलसने भी उनकी कुछ कम तारीफ नहीं की। श्री वीमादलालने अन्तमें धन्यवाद देते हुए मियाँ छोटानीका उल्लेख खास तौरपर किया था । अब पक्षपातके विषयको लीजिए। एक और जहाँ पुलिस पारसियोंकी रक्षा करनेमें असमर्थ रही, वहीं दूसरी ओर कितने ही पारसियोंने मुझसे कहा है कि जब पारसी हुल्लड़बाज उपद्रव मचा रहे थे तब पुलिस खड़ी खड़ी तमाशा देखती रही। लेकिन मैं इस बातपर ज्यादा जोर नहीं देना चाहता। मेरी इच्छा नहीं है कि मैं पुलिस या फौजके आदमियोंपर व्यक्तिके नाते दोषारोपण करूँ । मुझे आशा है कि एक-न-एक दिन मैं उन्हें सत्यके मार्गपर चलनेवाले निर्दोष लोगोंके पक्षमें ले आऊँगा । उनमें अधिकांश हिन्दुस्तानी हैं । और मैं तो अंग्रेज लोगोंके बारेमें भी आशा करता हूँ कि अन्तमें उनपर भी अनुकूल प्रतिक्रिया अवश्य होगी, बशर्ते कि असहयोगी लोग अपने अहिंसा-धर्मका पालन सच्चे हृदयसे करें । हाँ, पुलिस और फौजवालोंको इतना श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने अन्धान्धुध तरीकेसे लोगोंकी जानें नहीं ली हैं; उन्होंने आतंक स्थापित करनेकी कोशिश नहीं की। अब मैं मलाबार और मद्रासका उदाहरण देकर इस अध्यायको समाप्त करता हूँ । चूंकि लोगोंको मलाबारमें काम करनेके लिए नहीं जाने दिया जाता है, इसलिए वहाँ अभीतक झगड़ा चल रहा है। इसी तरह मद्रासमें भी कोई दो महीने तक हड़तालवाले स्थानोंमें जो मार-काट जारी रही, उसका यही कारण था कि वहाँ भी लोगोंको काम नहीं करने दिया गया या वे कर नहीं पाये । हाँ, बम्बई-सरकार, अगर चाहे तो, यह श्रेय ले सकती है कि जब लोग शान्ति स्थापनाकी चेष्टा कर रहे थे तब उसने उनके काममें किसी तरह हस्तक्षेप नहीं किया । {{c|'''इसकी जड़में कौन था ?'''}} ऐसे लोगोंकी कमी नहीं है जो कहते हैं कि यह सारी गड़बड़ी खुफिया पुलिसकी खड़ी की हुई थी और उसीने इसको कायम रखा। मुझे यहाँ, भारतमें, रहते कोई छ: साल हो गये हैं । और इस अवधि में मैं बराबर खुफिया पुलिसके खिलाफ ऐसी शिकायत सुनता रहा हूँ । खुद मुझपर भी उसकी नजर रही है। लेकिन मैं उन तमाम बेबुनियाद अफवाहोंको मानने में असमर्थ हूँ जो उसके विषयमें चारों ओर फैलाई जा रही हैं। मैं मानता हूँ कि वह भ्रष्ट है और उसपर लगाये जानेवाले बहुतसे इल्जाम सही साबित किये जा सकते हैं; पर उनमें अतिरंजना बहुत है । अगर ये तमाम आरोप सच हों, तब तो बड़ी भयंकर बात होगी; और वह हमारी पहले दर्जेकी कायरताका सबूत होगा । इस महकमे के सम्बन्धमें जितनी गन्दी बातें सुनी जाती हैं, वे उन्हीं लोगोंके बीच सम्भव हो सकती हैं, जिनमें न तो बहादुरी हो और न आत्म-सम्मानकी भावना । बम्बईके उपद्रवके दिनोंमें कई जिम्मेदार और प्रतिष्ठित आदमियोंने कहा कि श्रीमती सरोजिनी नायडू तथा मेरे और दूसरे लोगोंपर हमला होनेकी तथा मस्जिदों, गिरजाघरों आदिको नुकसान पहुँचानेकी अफवाहें खुफिया पुलिसवालोंने ही फैलाई थीं। यह कहा गया कि आगजनी और ट्रामगाड़ियोंकी तोड़फोड़ भी उन्होंने कराई । मैं इन सब बातोंपर विश्वास करनेमें असमर्थ हूँ। और अगर वे सच हों तो कहना होगा<noinclude></noinclude> 71opgyllevjsdpks52r2np76xrjhx30 675034 675033 2026-08-29T18:30:15Z Shivaniya shaw 4129 675034 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५२३|टिप्पणियाँ}}</noinclude>कंठसे प्रशंसा की, जिन्होंने अतिवांछित शान्ति स्थापित की थी। श्री के० टी० पॉल और श्री डगलसने भी उनकी कुछ कम तारीफ नहीं की। श्री वीमादलालने अन्तमें धन्यवाद देते हुए मियाँ छोटानीका उल्लेख खास तौरपर किया था । अब पक्षपातके विषयको लीजिए। एक और जहाँ पुलिस पारसियोंकी रक्षा करनेमें असमर्थ रही, वहीं दूसरी ओर कितने ही पारसियोंने मुझसे कहा है कि जब पारसी हुल्लड़बाज उपद्रव मचा रहे थे तब पुलिस खड़ी खड़ी तमाशा देखती रही। लेकिन मैं इस बातपर ज्यादा जोर नहीं देना चाहता। मेरी इच्छा नहीं है कि मैं पुलिस या फौजके आदमियोंपर व्यक्तिके नाते दोषारोपण करूँ । मुझे आशा है कि एक-न-एक दिन मैं उन्हें सत्यके मार्गपर चलनेवाले निर्दोष लोगोंके पक्षमें ले आऊँगा । उनमें अधिकांश हिन्दुस्तानी हैं । और मैं तो अंग्रेज लोगोंके बारेमें भी आशा करता हूँ कि अन्तमें उनपर भी अनुकूल प्रतिक्रिया अवश्य होगी, बशर्ते कि असहयोगी लोग अपने अहिंसा-धर्मका पालन सच्चे हृदयसे करें । हाँ, पुलिस और फौजवालोंको इतना श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने अन्धान्धुध तरीकेसे लोगोंकी जानें नहीं ली हैं; उन्होंने आतंक स्थापित करनेकी कोशिश नहीं की। अब मैं मलाबार और मद्रासका उदाहरण देकर इस अध्यायको समाप्त करता हूँ । चूंकि लोगोंको मलाबारमें काम करनेके लिए नहीं जाने दिया जाता है, इसलिए वहाँ अभीतक झगड़ा चल रहा है। इसी तरह मद्रासमें भी कोई दो महीने तक हड़तालवाले स्थानोंमें जो मार-काट जारी रही, उसका यही कारण था कि वहाँ भी लोगोंको काम नहीं करने दिया गया या वे कर नहीं पाये । हाँ, बम्बई-सरकार, अगर चाहे तो, यह श्रेय ले सकती है कि जब लोग शान्ति स्थापनाकी चेष्टा कर रहे थे तब उसने उनके काममें किसी तरह हस्तक्षेप नहीं किया । {{c|'''इसकी जड़में कौन था ?'''}} ऐसे लोगोंकी कमी नहीं है जो कहते हैं कि यह सारी गड़बड़ी खुफिया पुलिसकी खड़ी की हुई थी और उसीने इसको कायम रखा। मुझे यहाँ, भारतमें, रहते कोई छ: साल हो गये हैं । और इस अवधि में मैं बराबर खुफिया पुलिसके खिलाफ ऐसी शिकायत सुनता रहा हूँ । खुद मुझपर भी उसकी नजर रही है। लेकिन मैं उन तमाम बेबुनियाद अफवाहोंको मानने में असमर्थ हूँ जो उसके विषयमें चारों ओर फैलाई जा रही हैं। मैं मानता हूँ कि वह भ्रष्ट है और उसपर लगाये जानेवाले बहुतसे इल्जाम सही साबित किये जा सकते हैं; पर उनमें अतिरंजना बहुत है । अगर ये तमाम आरोप सच हों, तब तो बड़ी भयंकर बात होगी; और वह हमारी पहले दर्जेकी कायरताका सबूत होगा । इस महकमे के सम्बन्धमें जितनी गन्दी बातें सुनी जाती हैं, वे उन्हीं लोगोंके बीच सम्भव हो सकती हैं, जिनमें न तो बहादुरी हो और न आत्म-सम्मानकी भावना । बम्बईके उपद्रवके दिनोंमें कई जिम्मेदार और प्रतिष्ठित आदमियोंने कहा कि श्रीमती सरोजिनी नायडू तथा मेरे और दूसरे लोगोंपर हमला होनेकी तथा मस्जिदों, गिरजाघरों आदिको नुकसान पहुँचानेकी अफवाहें खुफिया पुलिसवालोंने ही फैलाई थीं। यह कहा गया कि आगजनी और ट्रामगाड़ियोंकी तोड़फोड़ भी उन्होंने कराई । मैं इन सब बातोंपर विश्वास करनेमें असमर्थ हूँ। और अगर वे सच हों तो कहना होगा<noinclude></noinclude> ktaqzp53nvydqcdd35yfs5j06fl0fuk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५६ 250 186323 675048 644675 2026-08-30T02:40:37Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675048 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कि बम्बई के लोग बड़ी आसानीसे झाँसेमें आ जाते हैं, और अपने नागरिक अधिकारोंका उपयोग करने लायक भी नहीं हैं। स्वराज्य-प्राप्ति के योग्य बनने के लिए हमें जिन गुणोंकी जरूरत है, उनमें एक यह गुण भी आवश्यक है कि हममें खुफिया पुलिसको मात देनेकी योग्यता हो । अगर हम ऐसे काम करनेके लिए आसानीसे उकसाये जा सकते हों जिनसे हमें हानि पहुँचती हो, या उन बातोंपर हमारा विश्वास कराया जा सके, जिनको हमें न मानना चाहिए, तो हम अपने लक्ष्यतक कभी नहीं पहुँच सकते। यदि हम खुल्लमखुल्ला और सच्चे दिलसे अहिंसक बने रहें, तो हम गलत रास्तेपर नहीं भटक सकते। हमारे बीच जो उपद्रवी लोग हैं उनपर या तो हमारा नियन्त्रण रहेगा या फिर खुफिया पुलिसका । यदि हम उन्हें काबू में नहीं रख सकते तो हमें निकट भविष्यमें स्वराज्य पानेके खयालको बस नमस्कार ही कर लेना चाहिए । {{c|'''अफवाहोंसे होशियार'''}} इन घटनाओंसे हमें अनेक सीखें मिलती हैं। उनमें एक यह है कि हमें अफवाहोंपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए और हरएक बड़े-बड़े मुहल्ले और बड़ी-बड़ी सड़कोंपर कांग्रेस और खिलाफतका एक-एक दफ्तर होना चाहिए, जहाँ जाकर लोग अफवाहोंकी सचाई और झुठाईका इत्मीनान कर सकें। यदि सफल होना है तो हम सबको बिल्कुल एक होकर एक दिलसे काम करना जरूरी है, और इसके लिए हमें यह जरूर जानना चाहिए कि महज अफवाहोंके भरोसे बिना सोचे-समझे कोई काम न करें। सनसनी फैलानेमें तीन-चौथाई हाथ शरारतभरी अफवाहोंका ही था। अगर लोग सुनें कि कुछ मन्दिर आदि तोड़ दिये गये हैं और कुछ बड़े नेता मारे गये या घायल हुए हैं तो भी क्या हुआ ? उन्हें बिना सलाह-मशविरे के काम न करना चाहिए। क्या कोई सैनिक अपने सेना-नायककी मृत्युकी अथवा अपनी मसजिद या मन्दिरकी पवित्रता भंग की जानेकी खबर सुनकर मनमाने ढंगसे आचरण करने लगता है? यदि वह ऐसा करे तो अपने उद्देश्यको हानि पहुँचायेगा और गोलीतक मार देनेके लायक समझा जायेगा। फिर हम तो शान्ति सेनाके सैनिक हैं। अपनी ही खुशीसे हम इसमें दाखिल हुए हैं । शस्त्र-सज्जित सैनिकोंकी अपेक्षा हममें आत्मसंयमकी क्षमता अधिक है। फिर हमें कोई एकाध लड़ाई तो नहीं लड़नी है, हमें देश और धर्मकी आजादी हासिल करनी है। तब तो हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम पूरी तरह मिल-जुलकर काम करें। {{c|'''आवश्यक अतिरंजना'''}} अतिरंजना हमेशा ही निन्दनीय होती है; परन्तु इस नियममें सिर्फ एक ही अपवाद है । स्वयं अपने दोषोंके सम्बन्ध में अतिरंजना अवश्य करनी चाहिए। हमें अपने दोष बहुत छोटे दिखाई देते हैं और जब हम उन्हें हजार गुना बड़ा बनाकर देखेंगे तभी उनका सच्चा रूप हमारी नजर में आयेगा । परन्तु दूसरोंके दोष हमें हमेशा बड़े ही नजर आते हैं । अतएव यह आवश्यक है कि हम दूसरोंके दोषोंको कम करके देखें | और यदि हम इन दोनों प्रक्रियाओंको एक ही साथ और विवेकपूर्वक लागू करें तो हम वांछित<noinclude></noinclude> qb2v0vkfmxk78eiwf593832plzc0104 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५७ 250 186324 675054 644676 2026-08-30T03:19:29Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675054 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ| ५२५}}</noinclude>और सुन्दर मध्यबिन्दुतक पहुँच सकते हैं। मेरे इस कथनपर कि इस दंगे में मुसलमान भाइयोंने ही पहल की है, कुछ मुसलमान मित्रोंने मुझसे शिकायत की है । और मेरे इस वक्तव्यपर कि हिन्दुओं और मुसलमानोंने पहले आक्रमण किया है अतएव दोषके भागी वही हैं, हिन्दू और मुसलमान दोनोंने एतराज किया है । इन दोनों आक्षेपोंपर मैंने खूब अच्छी तरह विचार किया है, और फिर भी मैं इसी नतीजेपर पहुँचा कि मुझे अपने पहले ही कथनपर दृढ़ रहना चाहिए। जबतक हमें अपने खिलाफ पड़नेवाली तमाम बातें ठीक-ठीक मालूम न होंगी, तबतक हम अपनेको शुद्ध नहीं बना सकते अपने दोषोंको अपने अन्दरसे निकाल नहीं सकते। मैं जो कुछ जानता या अनुभव करता हूँ उसे यदि मैं न कहूँ तो मैं मुसलमान भाइयोंके साथ बेईमानी करूँगा और यदि मैं हिन्दुओंका प्रेम खोनेके डरसे अथवा किसी दूसरे कारणसे, सच बात न कहूँ तो मैं हिन्दू न रहूँगा । यह कहनेकी तो आवश्यकता ही नहीं कि कानूनकी दृष्टिसे ऐसे कथनका क्या परिणाम होगा। यह सोचना मेरा काम नहीं । सरकार जो चाहे सो करे । यदि पारसी और ईसाई लोग समझदार होंगे तो वे उसके हाथके खिलौने न बनेंगे । परन्तु एक असहयोगीकी हैसियतसे मुझे कानूनी नतीजोंसे कोई वास्ता नहीं । जिन लोगोंने जान-माल का नुकसान किया, वे या तो असहयोगी थे, या उनसे हमदर्दी रखनेवाले या महज शरारती लोग थे। पहले दो लोग तो, यदि बेकुसूर होते हुए सजा पायें तो उन्हें खुशी ही होनी चाहिए; क्योंकि हम निर्दोष होते हुए जेल जानेको ही महत्व देते हैं । पर यदि उन्होंने वास्तवमें गलती की हो तो फिर उन्हें दण्ड पानेपर रंज करनेकी जरूरत ही नहीं है । और शरारती लोग तो मुझसे किसी तरहके बचावकी आशा ही न करें। अतएव मेरे पास जो अच्छेसे अच्छा रक्षाका साधन है और जो अच्छी से अच्छी सेवा मैं कर सकता हूँ वह यही है कि नतीजेका खयाल किये बिना सच बात कह दूं। यह एक महान् संघर्ष है। करोड़ों आदमियोंका ताल्लुक इससे है । इसमें नित नई स्थिति और अनिश्चित बातें पैदा होती रहती हैं, और उनका सामना करना पड़ता है। ऐसे विकट संघर्षका संचालन किसी दूसरे प्रकारसे सम्भव ही नहीं है । ऐसी अनिश्चित अवस्थाओंमें हमारे पास अगर कोई अमोघ अस्त्र है तो वह सत्य और अहिंसा ही है । {{C|'''जेलका डर'''}} यद्यपि हमने जेलके डरको बहुत-कुछ दूर भगा दिया है; फिर भी आगे बढ़कर जेल जाने में कुछ हिचक और उसको टालनेकी चिन्ता अभी भी है। हमें एक ओर जहाँ नेक और सच्चे तथा अहिंसापूर्ण रहना चाहिए, वहीं दूसरी ओर हमें सरकारी जेलोंके अन्दर पहुँचने के लिए प्रायः उत्सुक भी रहना चाहिए। जिस सरकारको हम सुधारना या मिटाना चाहते हैं उसकी अधीनतामें मिलनेवाली इस नाम मात्रकी आजादीका उपयोग करना हमें निश्चय ही यदि कष्टकर नहीं तो अटपटा अवश्य लगना चाहिए। हमें यह अनुभव करना चाहिए कि अपनी आजादीको कायम रखने के लिए हमें कुछ गैर-मुनासिब या भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। अतएव यदि हम निरपराध होते हुए जेल भेजे जायें तो हमें हर्ष होना चाहिए; क्योंकि इससे जरूर ही हमारे मनमें यह भाव उठना चाहिए कि अब आजादी नजदीक है। जो सैकड़ों लोग अपनी मातृ-<noinclude></noinclude> jjm9pa81vrsy9m3v53z4dslfi2pgz8a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५८ 250 186325 675058 644677 2026-08-30T03:30:06Z Shivaniya shaw 4129 /* अशोधित */ 675058 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५२६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>भूमिके लिए हँसते हुए कैद भोग रहे हैं, क्या उनके कारण आजादी पहलेसे ज्यादा नज- दीक नहीं आ गई है ? बम्बईके असहयोगियोंके लिए इससे बेहतर बात और क्या हो सकती है कि निरपराध होते हुए भी उन्हें अपराधियोंके बदले जेल भेज दिया जाये ? {{C|'''खरा हृदय'''}} लेकिन मेरे ये उद्गार उन्हीं लोगोंको अच्छे मालूम होंगे जिन्होंने अपने दिलको बदल दिया है - उन हिन्दू और मुसलमान भाइयोंको नहीं, जो अब भी यह मानते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानोंकी बनिस्बत पारसियों और ईसाइयोंका ही अधिक दोष है । मेरे कथनके विरोधमें मेरे पास कितने ही पत्र आये हैं। उनसे मालूम होता है कि बहुतेरे हिन्दू और मुसलमान भाइयोंका यह विश्वास है कि पहला वार पारसियों और ईसाइयोंने ही किया था । पर यद्यपि मेरी जानकारी इसके प्रतिकूल है, तथापि मैं यह मानने के लिए तैयार हूँ कि आरम्भ उन्हींकी ओरसे हुआ; तो भी क्या हिन्दू और मुसलमान अपनी प्रतिज्ञाके कारण, अपनी बड़ी संख्या और अपने धर्मके कारण बदला न लेने तथा उनसे मेल-जोल करने और उनकी रक्षा करनेके लिए बाध्य नहीं हैं ? फिर ऐसा करनेके लिए उन्हें विशेष प्रयत्न भी करना पड़े, तो कोई हर्ज नहीं । {{C|'''मौलाना बारीका फतवा'''}} अब मौलाना अब्दुल बारीकी बात सुनिए । बम्बईके उपद्रवोंका सविस्तर हाल जाननेपर उन्होंने एक फतवा जारी किया था; उसे यहाँ उद्धृत करनेके लिए कोई सफाई देना मैं जरूरी नहीं समझता : :'''हम यह हरगिज नहीं चाहते कि युवराजकी बेइज्जती की जाये, या उनको कोई जिस्मानी नुकसान पहुँचाया जाये । हम तो सिर्फ उन्हें नौकर '''शाहीके रुतबेक धोखसे बचाना चाहते हैं और हिन्दुस्तानके और यहाँके लोगोंके सच्चे जजबातस उनको बाखबर करना चाहते हैं। इसके लिए जो जरिया हमने तजवीज किया है वह है हड़ताल, ऐसी हड़ताल जिसमें हिंसाका नामोनिशान तक न हो ।''' :'''...हम बम्बईके दंगे-फसादको अपने सियासी उसूलोंके ही नहीं, मजहब उसूलोंके भी खिलाफ मानते हैं।... आगे चलकर अगर ऐसी गड़बड़ियोंकी रोकथाम न की गई तो अकलियतके लोग हिन्दुस्तानी जम्हूरियतपर कभी यकीन नहीं ला सकेंगे। ... {{C|'''अल्पसंख्यकोंके अधिकार'''}} इसलिए जबतक हम पारसियों, ईसाइयों या यहूदियोंके बारेमें अपने दिलमें रत्ती भर भी बुरा खयाल रहने देंगे तबतक हम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते । अल्प-संख्यक जातियोंके लोग हमारी राजनीतिक अथवा दूसरी बातोंको मानें, तभी हम उनकी रक्षा करें, यह शर्त नहीं लगाई जा सकती। इसे रक्षा नहीं कहते । सच्ची रक्षा तो वही है जो मतभेद होते हुए और यहाँतक कि अल्पसंख्यक जातियोंका विरोध होते हुए भी की जाये। अगर हम इस देशमें पूर्ण स्वातन्त्र्य चाहते हैं, तो हमें अल्प-<noinclude></noinclude> flz80p91k2aiwtq9damvjcwqx9326ye 675073 675058 2026-08-30T04:09:12Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675073 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५२६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>भूमिके लिए हँसते हुए कैद भोग रहे हैं, क्या उनके कारण आजादी पहलेसे ज्यादा नज- दीक नहीं आ गई है ? बम्बईके असहयोगियोंके लिए इससे बेहतर बात और क्या हो सकती है कि निरपराध होते हुए भी उन्हें अपराधियोंके बदले जेल भेज दिया जाये ? {{C|'''खरा हृदय'''}} लेकिन मेरे ये उद्गार उन्हीं लोगोंको अच्छे मालूम होंगे जिन्होंने अपने दिलको बदल दिया है - उन हिन्दू और मुसलमान भाइयोंको नहीं, जो अब भी यह मानते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानोंकी बनिस्बत पारसियों और ईसाइयोंका ही अधिक दोष है । मेरे कथनके विरोधमें मेरे पास कितने ही पत्र आये हैं। उनसे मालूम होता है कि बहुतेरे हिन्दू और मुसलमान भाइयोंका यह विश्वास है कि पहला वार पारसियों और ईसाइयोंने ही किया था । पर यद्यपि मेरी जानकारी इसके प्रतिकूल है, तथापि मैं यह मानने के लिए तैयार हूँ कि आरम्भ उन्हींकी ओरसे हुआ; तो भी क्या हिन्दू और मुसलमान अपनी प्रतिज्ञाके कारण, अपनी बड़ी संख्या और अपने धर्मके कारण बदला न लेने तथा उनसे मेल-जोल करने और उनकी रक्षा करनेके लिए बाध्य नहीं हैं ? फिर ऐसा करनेके लिए उन्हें विशेष प्रयत्न भी करना पड़े, तो कोई हर्ज नहीं । {{C|'''मौलाना बारीका फतवा'''}} अब मौलाना अब्दुल बारीकी बात सुनिए । बम्बईके उपद्रवोंका सविस्तर हाल जाननेपर उन्होंने एक फतवा जारी किया था; उसे यहाँ उद्धृत करनेके लिए कोई सफाई देना मैं जरूरी नहीं समझता : :'''हम यह हरगिज नहीं चाहते कि युवराजकी बेइज्जती की जाये, या उनको कोई जिस्मानी नुकसान पहुँचाया जाये । हम तो सिर्फ उन्हें नौकर '''शाहीके रुतबेक धोखसे बचाना चाहते हैं और हिन्दुस्तानके और यहाँके लोगोंके सच्चे जजबातस उनको बाखबर करना चाहते हैं। इसके लिए जो जरिया हमने तजवीज किया है वह है हड़ताल, ऐसी हड़ताल जिसमें हिंसाका नामोनिशान तक न हो ।''' :'''...हम बम्बईके दंगे-फसादको अपने सियासी उसूलोंके ही नहीं, मजहब उसूलोंके भी खिलाफ मानते हैं।... आगे चलकर अगर ऐसी गड़बड़ियोंकी रोकथाम न की गई तो अकलियतके लोग हिन्दुस्तानी जम्हूरियतपर कभी यकीन नहीं ला सकेंगे। ... {{C|'''अल्पसंख्यकोंके अधिकार'''}} इसलिए जबतक हम पारसियों, ईसाइयों या यहूदियोंके बारेमें अपने दिलमें रत्ती भर भी बुरा खयाल रहने देंगे तबतक हम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते । अल्प-संख्यक जातियोंके लोग हमारी राजनीतिक अथवा दूसरी बातोंको मानें, तभी हम उनकी रक्षा करें, यह शर्त नहीं लगाई जा सकती। इसे रक्षा नहीं कहते । सच्ची रक्षा तो वही है जो मतभेद होते हुए और यहाँतक कि अल्पसंख्यक जातियोंका विरोध होते हुए भी की जाये। अगर हम इस देशमें पूर्ण स्वातन्त्र्य चाहते हैं, तो हमें अल्प-<noinclude></noinclude> 4vu1ow2kw6eb4659t6woc81vigkhw13 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५५९ 250 186326 675078 644678 2026-08-30T04:18:08Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ५२७}}</noinclude>संख्यक जातियोंके स्वत्वोंकी रक्षा सबसे पहले करनी चाहिए । यहाँतक कि एक बच्चा भी अपनी राय बेरोक-टोक प्रकट कर सके । बहुमतका शासन अल्पसंख्यक जातियोंको कुचलने के काम में लाया जाये तो यह बर्बरता है । स्वतन्त्र भारतमें हम यह नहीं चाहते कि लोग दबकर समान रूप हो जायें । यह तो निर्जीव समानता होगी। हम तो यह चाहते हैं कि लोग अपनी जुदा-जुदा रायें रखें, उनके व्यवहारमें भी भिन्नता रहे, परन्तु उनमें बोलबाला उसीका हो जिसकी बात सबसे अच्छी और लाभदायक हो; सो भी लाठी के बलपर नहीं, बल्कि न्यायके बलपर । सत्ताके भारके नीचे तो हम बहुत दिनोंसे कराह रहे हैं; और बहुसंख्यक लोगोंके दबावमें उतनी ही पशुता हो सकती है जितनी कि अल्पसंख्यक लोगोंकी गोलियोंमें है । अतएव यदि हम आजाद होना चाहते हों, तो हमें अपने पारसी और ईसाई- भाइयोंके साथ धीरजसे पेश आनेकी जरूरत है । पारसियों और ईसाइयोंके सम्बन्धमें जो अन्ध दुर्भाव दिखाई देता है, वह तो मुझे खुद हिन्दू-मुस्लिम एकताके लिए भी हानिकारक मालूम होता है। यदि हम पारसियों, या ईसाइयोंके मतभेद आदिको सहन नहीं कर सकते तो इस बातका क्या इत्मीनान है कि हिन्दू भी, जब वे पाशविक शक्तिमें अपनेको बढ़कर पायेंगे तब, अल्पसंख्यक मुसलमानोंपर अपनी इच्छा न थोप देंगे, या जब मुसलमान अपनेको अपेक्षाकृत अधिक पशु-बलका प्रयोग करनेकी अवस्थामें पायेंगे तब वे कमजोर हिन्दुओंको, उनकी संख्या अधिक होनेपर भी, न धर दबायेंगे ? {{C|'''बंगालसे आई एक प्रतिध्वनि'''}} {{gap}}बंगालसे एक मित्रने पत्र लिखा है । पत्र - प्रेषक महाशय इस विषयके जानकार हैं। वे कहते हैं : :{{gap}}'''मैं आपसे यह कह देना चाहता हूँ कि यदि पूर्वी बंगालमें सविनय अवज्ञा शुरू हुई तो इसका नतीजा और भी ज्यादा बुरा होगा। वहाँ मुसलमानोंकी तादाद ७० फी सदीसे भी ज्यादा है। उनमें ज्यादातर लोग हुल्लड़बाज हैं । जहाँ ये लोग जोशपर चढ़ कि हिन्दुओंपर टूट पड़ेंगे, बड़ा जोरोजुल्म कर बैठेंगे और हिन्दू जमींदारों और सेठ साहूकारोंको आतंकित कर देंगे। उनमें जो समझदार और शरीफ लोग हैं, वे उनको काबूमें न रख सकेंगे। हिन्दू-मुस्लिम एकता जरा-से धक्केसे भरभरा जायेगी। कलकत्तामें भी हालत बहुत ही खराब हो जायेगी । में आपसे सच्चे दिलसे अनुरोध करता हूँ कि आप हिन्दुस्तानके लोगोंसे और यहाँके हालातके बारेमें बहुत ज्यादा उम्मीद न रखें। आप दक्षिण आफ्रिकाकी परिस्थितियों और वहाँके लोगोंको जितना अधिक पहचानते हैं उतना इस भारतभूमि और यहाँके लोगोंको नहीं पहचानते । इस स्पष्टोक्ति के लिए मुझे माफ कीजिएगा। अभी आप सविनय अवज्ञा शुरू करनेके खिलाफ जान पड़ते हैं। पर यदि आपने अपना इरादा बदल दिया, तो मुझे इसके सिवा दूसरा नतीजा नहीं दिखाई देता कि चारों ओर भय और आतंक छा जायेगा । आपके उच्चतम आदर्श चौपट हो जायेंगे और देश और भी अधिक उत्पीड़न और'''<noinclude></noinclude> krjv7s9xhig61jirmnd7fb96c4t3lz2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६० 250 186327 675085 644679 2026-08-30T04:47:45Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675085 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५२८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>:'''विपत्तियोंका शिकार हो जायेगा। इन वर्षोंमें आपने जो कुछ भी किया है, वह सब मिट्टीमें मिल जायेगा ।''' {{Gap}}इस किस्मकी यह एक ही चेतावनी मुझे नहीं मिली है। बम्बई देशका एक सबसे बड़ा केन्द्र है । अतएव उसकी बदौलत लोगोंमें उथल-पुथल होना स्वाभाविक है । अल्पसंख्यक लोगोंके अधिकारोंकी रक्षाका अर्थ है, कमजोरोंकी रक्षा, और कमजोरोंकी रक्षाके मानी हैं, बूढ़ों, बालकों और अबलाओं तथा उन सब लोगोंकी रक्षा जो दीन- दुःखी हैं। और यदि आज हिन्दुओं और मुसलमानोंकी एकताका उपयोग पारसियों और ईसाइयोंके खिलाफ किया जाता है तो कल ही वह एकता लोभ-लालचंके अथवा मिथ्या धार्मिकताके दबावसे टूट सकती है। यह किसी भी तरह स्वराज्यका कोई अच्छा चित्र तो नहीं है । भारतको यदि स्वतन्त्र होना है, तो इसके लिए पूर्ण और सच्ची अहिंसा के सिवा दूसरा मार्ग ही नहीं है। अतएव अहिंसाका उपयोग हिंसाकी तैयारीके लिए बिलकुल न होना चाहिए। इसको समझना स्वराज्यका और स्वधर्मका साक्षात्कार करना है। हिन्दू और मुसलमान सावधान रहें, 'गीता' और 'कुरान'का गलत अर्थ न लगायें। और आजमाइशके तौरपर वे अपने संयुक्त बलको अल्पसंख्यक जातियोंकी रक्षामें लगायें। इससे वे एक-दूसरेकी रक्षा करना सीखेंगे । {{C|'''नीति नहीं बल्कि धर्म'''}} और यह तबतक नहीं किया जा सकता जबतक कि इस सालके अनुभवसे हम यह न सीख लें कि “भारतकी स्वतन्त्रता और भारतके सभी धर्मों और सम्प्र- दायोंकी एकता प्राप्त करनेके लिए और उसे कायम रखने के लिए, अहिंसाको हमें अपना एकमात्र धर्म मानना चाहिए।" इसके बाद भी हर सम्प्रदायको अपने धर्मकी रक्षाके लिए, और सबको मिलकर भारतकी प्रतिरक्षाके लिए, लड़नेकी स्वतन्त्रता रह जाती है । किन्तु अहिंसाको एक ऐसी नीति या तरकीब नहीं समझना चाहिए जिसे हमें भारतकी स्वतन्त्रता प्राप्त करने या उसे मजबूत बनानेके लिए आजमाना है । इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानोंको शुभारम्भके तौरपर पारसियों, यहूदियों और ईसाइयोंसे, जिनमें अंग्रेज भी शामिल हैं, चाहे वे सहयोगी हों या असहयोगी, प्रेम करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए। और यदि हमें ऐसा करना है तो हमारी वाणीमें कटुता नहीं होनी चाहिए और, लोगोंसे अपना मत स्वीकार करानेकी प्रक्रियामें, किसी बच्चेपर भी उसकी टोपी उतारनेके लिए - हाथ नहीं लगाना चाहिए, और न ही शराबियोंके साथ उनकी शराबकी लत छुड़ाने के लिए जोर- जबर्दस्ती करनी चाहिए। हमारा ध्येय केवल यह होना चाहिए कि हमारी अपील उनके विवेकके लिए, दिमागके लिए और हृदयके लिए हो। हमें कभी भी, वचनों द्वारा या शारीरिक रूपसे, पाशविक शक्तिका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जब भारतके लाखों-करोड़ों लोग स्वेच्छासे और अपनी समझसे हमारे पक्षमें हो जायेंगे, तो हम स्वराज्य प्राप्त कर लेंगे। सहयोगियोंको सबसे बड़ा भय यह है कि अहिंसा हिंसाके लिए एक पर्दा है और नेक नीयत लोगोंकी कोशिशके बावजूद यह आन्दोलन अन्तमें उच्छृंखल और उपद्रवी लोगोंके हाथमें चला जायेगा । हम इस भयको तर्कसे दूर नहीं कर सकते। ऐसे<noinclude></noinclude> 648la3yzesi47lv0yutiy0p2rt08w2z पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६१ 250 186328 675094 644680 2026-08-30T05:17:55Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ| ५२९}}</noinclude>निर्विवाद तथ्योंका एक लगातार सिलसिला ही उसे दूर कर सकता है, जिनके लिए प्रमाणकी कोई जरूरत नहीं हो। हमने बहुत प्रगति की है, पर हम यह दावा नहीं कर सकते कि हमारी वाणी या कर्ममें कोई गलती नहीं रही है । प्रेम, उदारता, विनम्रता, कोमलता, इनके लिए किसी स्पष्ट प्रमाणकी आवश्यकता नहीं । इसलिए हमें अहिंसापर ज्यादा और असहयोगपर कम जोर देना चाहिए। अहिंसा ही असहयोग है । सरकारका एकमात्र सहारा हिंसा है। क्या हमारा एकमात्र सहारा अहिंसा है ? क्या हमने खुदको हिंसाकी उसकी विचारधारासे पूरी तरह अलग कर लिया है? उसकी सबसे बड़ी शिक्षा-संस्था तो हिंसा ही है । जिस दिन हम हिंसाकी प्रतिष्ठा पूरी तरह मिटा देंगे, उस दिन हम स्वराज्य स्थापित कर लेंगे । और ऐसा करने के योग्य बननेके लिए हमें यह सीखना चाहिए कि अंग्रेजकी उस प्रणालीसे घृणा करते हुए भी जिसके अधीन वह भारतपर शासन करनेका दम भरता है, हमें अंग्रेजसे प्रेम करना है। मौलाना अब्दुल बारीके शब्दोंमें, हमारी अंग्रेजसे कोई लड़ाई नहीं है, हमारी लड़ाई तो उसके जोर-जबर्दस्तीके शासनसे है । {{C|'''व्यावहारिक सुझाव'''}} तब यदि हम अपने विरोधियोंसे प्रेम करते हैं तो हमारा प्रेम हमारे कार्यों में प्रकट होना चाहिए। हमें उन्हें अपनी सभाओंमें बुलाना चाहिए और उनकी बात धैर्य और शिष्टतासे सुननी चाहिए। उनके बारेमें बोलते हुए हमें उन्हें बुरा-भला नहीं कहना चाहिए। उनका नाम सुनकर हमें “शर्म, शर्म" के नारे नहीं लगाने चाहिए । हमें उनकी उसी तरह निःसंकोच सामाजिक सेवा करनी चाहिए जिस तरह हम अपने पक्षवालोंकी करते हैं। हमें केवल उनकी राजनीतिक सेवा नहीं करनी है या उन्हें राजनीतिक सहायता नहीं देनी है। हमें सभी प्रकारके उत्तेजनात्मक भाषणों और तमाम नारोंसे बचना चाहिए । महात्मा गांधीकी जय" और अन्य नारे बिलकुल बन्द कर देने चाहिए। हमें अपनी सभाएँ इस तरहके नारोंके बिना ही चलानी चाहिए । और यदि हम इस तरहके नारोंके बिना भारी भीड़ इकट्ठी न कर सकें, तो उसका न होना हमारे लिए बेहतर ही होगा । जिस जिले या तहसीलमें इस तरहका नियन्त्रण कायम नहीं किया जा सकेगा, उसे मैं सविनय अवज्ञा आन्दोलनके योग्य नहीं समझँगा । धरने को बहुत ही शंकाकी दृष्टिसे देखना चाहिए। निःसन्देह यह हर कहीं पूर्णतया अहिंसात्मक नहीं रहा है। इसमें वाणीकी हिंसा या हिंसाका दिखावा होता रहा है । इसलिए धरना देना कमसे कम फिलहाल, या जबतक कि हममें बहुत अधिक आत्म- नियन्त्रण न आ जाये और हम बहुत अनुभव न प्राप्त कर लें, रोक देना चाहिए । हम अपना ध्यान अभी शराबियोंके बीच काम करने तक सीमित रख सकते हैं । {{C|'''हड़तालें'''}} यदि पूर्ण शान्तिकी गारण्टी की जा सके और हर तरहकी जोर-जबर्दस्तीसे बचा जा सके, तो जहाँ-जहाँ युवराजको ले जाया जा रहा है, वहाँ-वहाँ हड़तालोंका ऐलान किया जा सकता है। यदि ट्रामें चलती हैं, तो हमें उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । {{Left|२१-३४}}<noinclude></noinclude> f31zdxtp4ao2gj5zsyp5vdemejnz86c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६२ 250 186329 675105 644681 2026-08-30T06:24:26Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५३०| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यदि लोग ट्राम-गाड़ियोंका उपयोग करते हैं तो हमें यह जान लेना चाहिए कि वे हमारे साथ शामिल नहीं होना चाहते । यदि एक भी आदमी अपनी दुकान खुली रखना चाहता है, तो हमें उसकी इस स्वतन्त्रताकी रक्षा करनी चाहिए। हड़तालका बहुत अधिक महत्व है लेकिन तभी जब यह पूर्णतया स्वेच्छासे हो । {{C|'''पारसी और ईसाई'''}} बम्बईके पारसियों और ईसाइयोंके लिए यह भारी परीक्षा और प्रलोभनकी घड़ी है । बहुत सम्भव है कि उन्हें हिन्दुओं और मुसलमानोंके खिलाफ दावे दायर करनेका लोभ दिखाया जाये । इस लोभमें फँसना एक घातक गलती होगी। उन्हें अपने-आपको इस अवसरके योग्य सिद्ध करना चाहिए; और अदालतोंके जरिये राहत या हर्जाने हासिल करनेकी कोशिश नहीं करनी चाहिए। पूरी सतर्कताके बावजूद कभी-कभी झगड़े रोके नहीं जा सकते। वे जानते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानोंमें जो सबसे समझदार हैं उन्हें इस दुर्भाग्यपूर्ण झगड़ेसे गहरा दुःख पहुँचा है और वे हिन्दुओं और मुसलमानों द्वारा किये गये आक्रमणपर लज्जित हैं। पारसियों और ईसाइयोंको अब सिर्फ ऐसी राहतके लिए ही कोशिश करनी चाहिए, जो उन्हें एक गैर-सरकारी समितिके जरिये मिल सकती है। यह सच है कि यदि वे सरकारके जरिये भी हर्जाना हासिल करनेकी कोशिश करें तो भी हिन्दुओं और मुसलमानोंको अपना दिमाग ठंडा रखना चाहिए। पर यदि उन्होंने गैर-सरकारी कार्यवाहीकी जगह सरकारी कार्यवाही ही पसन्द की, तो मानव-स्वभावको देखते हुए लोगोंके लिए अपने-आपको ठंडा रखना कठिन तो हो ही जायेगा । {{C|'''सरकारके बारेमें'''}} पत्र लिखनेवालोंने जहाँ मुझे पारसियों, ईसाइयों और यहूदियोंसे क्षमा माँगने के लिए बधाई दी है, वहीं सरकारसे क्षमा न माँगने के लिए फटकारा भी है। किन्तु यह फटकार बताते हुए उन्होंने क्षमा-याचनाकी मुख्य बातको नहीं देखा । कोई प्रणाली झगड़ोंके लिए यदि अधिक नहीं तो असहयोगियों जितनी ही जिम्मेदार हो, तो मैं उस प्रणालीसे या उसके प्रशासकोंसे क्षमा नहीं माँग सकता । अपनी बातको मैं इस धारणाके साथ शुरू करता हूँ कि इस प्रणालीके प्रशासकोंको इन झगड़ोंमें आनन्द आता है और वे उन्हें खुद बुलावा देते हैं। इसके लिए वे एक तो अप्रिय कार्यों द्वारा उत्ते- जना पैदा करते हैं और दूसरे जनताके क्रोधके उबालको दबाने के लिए भयावह तैया- रियाँ करते हैं। ईसाइयों, अंग्रेजों और सहयोगियोंसे जो क्षमा माँगी गई है, उसमें व्यक्तियोंकी हैसियतसे प्रशासकोंसे भी क्षमा-याचना शामिल है। मैंने कहा है कि यदि असहयोगियोंने युवराजके स्वागतमें शामिल होनेवाले एक भी व्यक्तिका अपमान किया है, तो उन्होंने युवराजका अपमान किया है और अहिंसाकी प्रतिज्ञा तोड़ी है। मैं नहीं समझता कि असहयोगियोंने इन तीन शर्मनाक दिनोंमें सरकारको किसी भी रूपमें या किसी भी तरहसे चोट पहुँचाई है । इसके विपरीत, मैं यह महसूस करता हूँ और जानता हूँ कि गुमराह शरारतियोंसे सरकारको और बल मिला है। इस तरह, पाठक यह देखेंगे कि एक ऐसी सरकारसे क्षमा माँगना, जिसका इन घटनाओंसे हित सिद्ध<noinclude></noinclude> neqid8l3hsxnz5cbddorfljd5jaaqhp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६३ 250 186330 675112 644682 2026-08-30T06:41:33Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675112 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ५३१}}</noinclude> हुआ हो या जिसे लाभ पहुँचा हो, कोई उपयुक्त कार्य नहीं होगा । मेरा एक लघु उद्देश्य एक प्रणालीके रूपमें सरकारको, और इसलिए उसके प्रशासकोंकी प्रतिष्ठाको, चोट पहुँचाना भी है । लेकिन मैं यह काम पूरी तरह अहिंसात्मक रहकर और हर सम्भव व अहिंसात्मक तरीकेसे उससे कोई सम्पर्क न रखकर तथा दूसरोंको भी ऐसा ही करनेके लिए प्रेरित करके करता हूँ । वस्तुतः यदि अहिंसा सरकार और जनता दोनोंका समान धर्म बन जाये, तो किसी भी झगड़ेकी कतई गुंजाइश नहीं रहेगी और तब असह्योगका प्रश्न ही नहीं उठेगा । कुछ और उल्लेखनीय व्यक्ति जेलम मौलाना शरर मद्रास अहातेके एक प्रभावशाली वक्ता और खिलाफत के कट्टर कार्यकर्त्ता हैं । वे एक अच्छे लेखक भी हैं । मद्रास सरकारने उनकी आवाज एक सालके लिए बन्द कर दी है। पंजाब सरकारने पण्डित नेकीराम शर्माको गिरफ्तार कर लिया है । बम्बईकी जनता उनसे अपरिचित नहीं है । १७ तारीखको जब भिण्डी बाजारमें शराबकी एक दुकान जलाकर खाक कर दी गई थी तब उन्होंने कई जानें बचाई थीं । श्री गंगाधरराव देशपाण्डेको छः मासका साधारण कारावास दिया गया है। मैं आशा करता था कि उन्हें तथा और लोगोंको इस सालके आखिरसे अधिक समयतक आराम करनेका मौका नहीं मिलेगा । बम्बईकी घटनाओंने, लगता है, मेरी आशाएँ धूलमें मिला दी हैं। उससे पहले मुझे यह यकीन था कि या तो हम जेलके दरवाजे खुलवा सकेंगे, या कमसे कम खुद भी अपने साथियोंके पास उनके आराम घरोंमें पहुँच जायेंगे। लेकिन अब ईश्वर ही जानता है, क्या होगा ? बहादुर सिक्खोंकी गिरफ्तारी 'बॉम्बे क्रॉनिकल 'में छपे एक तारसे पता चलता है कि पंजाब सरकारने सिखों- को सविनय अवज्ञाके लिए उत्तेजित किया है। अमृतसरमें होनेवाले एक सिख दीवान- पर सरकारने पाबन्दी लगा दी थी। सिखोंको यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने दीवान किया, और फलस्वरूप ग्यारह सुप्रसिद्ध सिख गिरफ्तार कर लिये गये। उनमें गुरुद्वारा कमेटीके प्रधान, पुराने नेता सरदार खड़गसिंह हैं। दूसरे हैं सरदार बहादुर मेहताब- सिंह, जिन्होंने हाल ही में गुरुद्वारेके प्रश्नपर पंजाब विधान परिषदके उपाध्यक्ष-पदसे तथा सरकारी वकीलके पदसे त्यागपत्र दिया है। तीसरे व्यक्ति अमृतसर नगर कांग्रेस कमेटीके प्रधान सरदार दानसिंह हैं। यदि सिख बराबर शान्त किन्तु दृढ़ बने रहे, तो सिख नेताओंका कारावास गुरुद्वारेके प्रश्नका वांछित समाधान करके रहेगा । {{C|'''हड़तालें'''}} हड़ताल होनेपर जिन मिल मजदूरों और अन्य कर्मचारियोंको अपने सहानुभूति न रखनेवाले या विदेशी मालिकोंसे छुट्टी नहीं मिल सकती, उन्हें क्या करना चाहिए ? अहिंसाकी दृष्टिसे इसका केवल एक ही उत्तर हो सकता है। जो कर्मचारी अपने-आप छुट्टी करता है, वह हिंसा करता है, क्योंकि वह अपनी नौकरी का करार तोड़नेका अपराध करता है । अपने मालिककी इजाजत बिना वह गैरहाजिर नहीं हो सकता ।<noinclude></noinclude> 1ioab9m0t5x6ohtb9iefab9ff5t3f55 675114 675112 2026-08-30T06:42:09Z Shivaniya shaw 4129 675114 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ५३१}}</noinclude>हुआ हो या जिसे लाभ पहुँचा हो, कोई उपयुक्त कार्य नहीं होगा । मेरा एक लघु उद्देश्य एक प्रणालीके रूपमें सरकारको, और इसलिए उसके प्रशासकोंकी प्रतिष्ठाको, चोट पहुँचाना भी है । लेकिन मैं यह काम पूरी तरह अहिंसात्मक रहकर और हर सम्भव व अहिंसात्मक तरीकेसे उससे कोई सम्पर्क न रखकर तथा दूसरोंको भी ऐसा ही करनेके लिए प्रेरित करके करता हूँ । वस्तुतः यदि अहिंसा सरकार और जनता दोनोंका समान धर्म बन जाये, तो किसी भी झगड़ेकी कतई गुंजाइश नहीं रहेगी और तब असह्योगका प्रश्न ही नहीं उठेगा । {{C|'''कुछ और उल्लेखनीय व्यक्ति जेलम'''}} मौलाना शरर मद्रास अहातेके एक प्रभावशाली वक्ता और खिलाफत के कट्टर कार्यकर्त्ता हैं । वे एक अच्छे लेखक भी हैं । मद्रास सरकारने उनकी आवाज एक सालके लिए बन्द कर दी है। पंजाब सरकारने पण्डित नेकीराम शर्माको गिरफ्तार कर लिया है । बम्बईकी जनता उनसे अपरिचित नहीं है । १७ तारीखको जब भिण्डी बाजारमें शराबकी एक दुकान जलाकर खाक कर दी गई थी तब उन्होंने कई जानें बचाई थीं । श्री गंगाधरराव देशपाण्डेको छः मासका साधारण कारावास दिया गया है। मैं आशा करता था कि उन्हें तथा और लोगोंको इस सालके आखिरसे अधिक समयतक आराम करनेका मौका नहीं मिलेगा । बम्बईकी घटनाओंने, लगता है, मेरी आशाएँ धूलमें मिला दी हैं। उससे पहले मुझे यह यकीन था कि या तो हम जेलके दरवाजे खुलवा सकेंगे, या कमसे कम खुद भी अपने साथियोंके पास उनके आराम घरोंमें पहुँच जायेंगे। लेकिन अब ईश्वर ही जानता है, क्या होगा ? बहादुर सिक्खोंकी गिरफ्तारी 'बॉम्बे क्रॉनिकल 'में छपे एक तारसे पता चलता है कि पंजाब सरकारने सिखों- को सविनय अवज्ञाके लिए उत्तेजित किया है। अमृतसरमें होनेवाले एक सिख दीवान- पर सरकारने पाबन्दी लगा दी थी। सिखोंको यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने दीवान किया, और फलस्वरूप ग्यारह सुप्रसिद्ध सिख गिरफ्तार कर लिये गये। उनमें गुरुद्वारा कमेटीके प्रधान, पुराने नेता सरदार खड़गसिंह हैं। दूसरे हैं सरदार बहादुर मेहताब- सिंह, जिन्होंने हाल ही में गुरुद्वारेके प्रश्नपर पंजाब विधान परिषदके उपाध्यक्ष-पदसे तथा सरकारी वकीलके पदसे त्यागपत्र दिया है। तीसरे व्यक्ति अमृतसर नगर कांग्रेस कमेटीके प्रधान सरदार दानसिंह हैं। यदि सिख बराबर शान्त किन्तु दृढ़ बने रहे, तो सिख नेताओंका कारावास गुरुद्वारेके प्रश्नका वांछित समाधान करके रहेगा । {{C|'''हड़तालें'''}} हड़ताल होनेपर जिन मिल मजदूरों और अन्य कर्मचारियोंको अपने सहानुभूति न रखनेवाले या विदेशी मालिकोंसे छुट्टी नहीं मिल सकती, उन्हें क्या करना चाहिए ? अहिंसाकी दृष्टिसे इसका केवल एक ही उत्तर हो सकता है। जो कर्मचारी अपने-आप छुट्टी करता है, वह हिंसा करता है, क्योंकि वह अपनी नौकरी का करार तोड़नेका अपराध करता है । अपने मालिककी इजाजत बिना वह गैरहाजिर नहीं हो सकता ।<noinclude></noinclude> a8hd4t1yixu17xciqk8er1tpthiocqr 675115 675114 2026-08-30T06:42:37Z Shivaniya shaw 4129 675115 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ५३१}}</noinclude>हुआ हो या जिसे लाभ पहुँचा हो, कोई उपयुक्त कार्य नहीं होगा । मेरा एक लघु उद्देश्य एक प्रणालीके रूपमें सरकारको, और इसलिए उसके प्रशासकोंकी प्रतिष्ठाको, चोट पहुँचाना भी है । लेकिन मैं यह काम पूरी तरह अहिंसात्मक रहकर और हर सम्भव व अहिंसात्मक तरीकेसे उससे कोई सम्पर्क न रखकर तथा दूसरोंको भी ऐसा ही करनेके लिए प्रेरित करके करता हूँ । वस्तुतः यदि अहिंसा सरकार और जनता दोनोंका समान धर्म बन जाये, तो किसी भी झगड़ेकी कतई गुंजाइश नहीं रहेगी और तब असह्योगका प्रश्न ही नहीं उठेगा । {{C|'''कुछ और उल्लेखनीय व्यक्ति जेलम'''}} मौलाना शरर मद्रास अहातेके एक प्रभावशाली वक्ता और खिलाफत के कट्टर कार्यकर्त्ता हैं । वे एक अच्छे लेखक भी हैं । मद्रास सरकारने उनकी आवाज एक सालके लिए बन्द कर दी है। पंजाब सरकारने पण्डित नेकीराम शर्माको गिरफ्तार कर लिया है । बम्बईकी जनता उनसे अपरिचित नहीं है । १७ तारीखको जब भिण्डी बाजारमें शराबकी एक दुकान जलाकर खाक कर दी गई थी तब उन्होंने कई जानें बचाई थीं । श्री गंगाधरराव देशपाण्डेको छः मासका साधारण कारावास दिया गया है। मैं आशा करता था कि उन्हें तथा और लोगोंको इस सालके आखिरसे अधिक समयतक आराम करनेका मौका नहीं मिलेगा । बम्बईकी घटनाओंने, लगता है, मेरी आशाएँ धूलमें मिला दी हैं। उससे पहले मुझे यह यकीन था कि या तो हम जेलके दरवाजे खुलवा सकेंगे, या कमसे कम खुद भी अपने साथियोंके पास उनके आराम घरोंमें पहुँच जायेंगे। लेकिन अब ईश्वर ही जानता है, क्या होगा ? {{C|'''बहादुर सिक्खोंकी गिरफ्तारी'''}} 'बॉम्बे क्रॉनिकल 'में छपे एक तारसे पता चलता है कि पंजाब सरकारने सिखों- को सविनय अवज्ञाके लिए उत्तेजित किया है। अमृतसरमें होनेवाले एक सिख दीवान- पर सरकारने पाबन्दी लगा दी थी। सिखोंको यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने दीवान किया, और फलस्वरूप ग्यारह सुप्रसिद्ध सिख गिरफ्तार कर लिये गये। उनमें गुरुद्वारा कमेटीके प्रधान, पुराने नेता सरदार खड़गसिंह हैं। दूसरे हैं सरदार बहादुर मेहताब- सिंह, जिन्होंने हाल ही में गुरुद्वारेके प्रश्नपर पंजाब विधान परिषदके उपाध्यक्ष-पदसे तथा सरकारी वकीलके पदसे त्यागपत्र दिया है। तीसरे व्यक्ति अमृतसर नगर कांग्रेस कमेटीके प्रधान सरदार दानसिंह हैं। यदि सिख बराबर शान्त किन्तु दृढ़ बने रहे, तो सिख नेताओंका कारावास गुरुद्वारेके प्रश्नका वांछित समाधान करके रहेगा । {{C|'''हड़तालें'''}} हड़ताल होनेपर जिन मिल मजदूरों और अन्य कर्मचारियोंको अपने सहानुभूति न रखनेवाले या विदेशी मालिकोंसे छुट्टी नहीं मिल सकती, उन्हें क्या करना चाहिए ? अहिंसाकी दृष्टिसे इसका केवल एक ही उत्तर हो सकता है। जो कर्मचारी अपने-आप छुट्टी करता है, वह हिंसा करता है, क्योंकि वह अपनी नौकरी का करार तोड़नेका अपराध करता है । अपने मालिककी इजाजत बिना वह गैरहाजिर नहीं हो सकता ।<noinclude></noinclude> d0ddp9jbmdc73711msgpcok0lati38i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६४ 250 186331 675131 644683 2026-08-30T07:14:54Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675131 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५३२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यदि वह अपने मालिकसे सन्तुष्ट न हो तो वह केवल इस्तीफा दे सकता है । परन्तु कर्मचारियोंका समूचा समुदाय तो इकबारगी ऐसा भी नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी राजनीतिक रायको मनवाने के लिए वे बिना वाजिब नोटिसके काम छोड़नेकी धमकी नहीं दे सकते । संक्षेपमें, मिल-मजदूरों और ऐसे अन्य कर्मचारियोंको इस बात के लिए नहीं उकसाना चाहिए कि वे अपने मालिकोंपर छुट्टी देनेके लिए दबाव डालें । अहिंसा- त्मक कार्यवाही उतनी आसान नहीं है जितनी कि बहुतसे लोग समझते हैं। मैंने लोगोंको यह कहते सुना है कि शराबकी दुकानोंपर जानेवालोंकी कसकर टाँगें पकड़ लेना अहिंसा है । इसी तरह लड़कोंने शराब बेचनेवालोंको गन्दी गालियाँ देना अहिंसात्मक कार्य मान रखा है। यह भाषाके साथ सिर्फ खिलवाड़ है और बम्बई में इसका कड़वा फल चखनेको मिला है। यदि हम अहिंसाको अच्छी तरह आजमाना चाहते हैं तो हमें स्वयं अपने प्रति सच्चा होना चाहिए। यदि हम अपने विचारोंको अहिंसात्मक न बना सकें, तो भी हमें अपने वचन और कर्मको तो इतना संयमित करना ही चाहिए कि वे पूर्णतया अहिंसात्मक हो जायें । यदि हमें व्यवहारमें यह चीज असम्भव या अत्यन्त कठिन लगती हो, तो हमें कोशिश छोड़ देनी चाहिए। किन्तु हमें अपनी असमर्थता- के बदले जीवनके इस महानतम सिद्धान्तको दोषी नहीं ठहराना चाहिए। यदि हमें असफलता ही मिलनी है, तो वह अहिंसाकी असफलता नहीं होगी, बल्कि अहिंसाके पालन में हिंसक लोगोंकी असफलता होगी । {{C|'''आन्ध्र द्वारा की गई परिभाषा'''}} स्वराज्यकी विभिन्न परिभाषाएँ की गई हैं। श्री गोपाल कृष्णयाने, जिनपर दूसरी बार मुकदमा चलाया गया है और जिन्हें और सजा दी गई है, जो कि पहलीके साथ- साथ ही चलेगी, मजिस्ट्रेटके सामने एक लम्बा वक्तव्य दिया है। यह उनके राजनीतिक मतकी विज्ञप्तिसे अधिक उनके विश्वासका आध्यात्मिक विवेचन है । इससे निश्चय ही यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस भाषणपर मुकदमा चलाया गया है उसमें न तो हिंसा थी और न हिंसाके लिए उकसानेकी ही बात थी । लेकिन मेरी दिलचस्पी यहाँ केवल स्वराज्यकी उनकी रोचक परिभाषामें है । वह यहाँ दी जा रही है : :'''फारसके हमलोंसे जैसे पुराने यूनानियोंमें एकता आ गई थी, उसी तरह समान राजनीतिक यातना हिन्दू और मुसलमानोंको एक नहीं कर सकेगी, बल्कि वह एकता एक दूसरेके धर्म के लिए सम्मान, आदर और प्रेम रखनेसे तथा उनके अपने-अपने रूपको आवश्यक समझने से ही स्थापित हो सकेगी। इसलिए स्वराज्य-का अर्थ हिन्दूधर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, पारसी धर्म, सिख धर्म संक्षेपमें सबके स्वधर्मकी रक्षा और सबका एक संयुक्त संघ है। सभी धर्मोंको आज प्रत्यक्षवादी नास्तिक दर्शन, औद्योगिक अराजकता और आध्यात्मिक दिवालिया- पनसे, जो इस समय संसारको घेरे हुए है, विनाशका खतरा है।''' चरित्रवान व्यक्तियोंको जब उनके धार्मिक विश्वासके लिए कारावास दिया जा रहा हो, तो निश्चय ही इसका अर्थ यह है कि हम अपने लक्ष्यके निकट पहुँच रहे हैं ।<noinclude></noinclude> 94dx3tum0eilr700ht8mdmugfs8wikm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५१९ 250 186945 674926 645342 2026-08-29T13:03:18Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५३०. पत्र: के॰ नटराजनको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २४ जून, १९२८}} {{left|प्रिय श्री नटराजन,}} ... 'इंडियन डेली मेल'में आपकी सम्पादकीय टिप्पणीके सम्बन्धमें मात्र इतना कहना चाहूँगा: आपने कृपापूर्वक बारडोली-निधिके लिए चन्दा दिया उस वक्त हमारी आपसी बातचीतकी आपके मन पर जो भी छाप रह गई हो मैं आपको कभी यह सूचित नहीं करना चाहता था कि मैं केवल बारडोली-पीड़ितोंके लिए धन-संग्रह कर रहा हूँ। हाँ, मैं उनमें बारडोली पीड़ितोंकी भी गिनती अवश्य कर रहा था। परन्तु श्री वल्लभभाईने मुझे बताया है कि अभी तक जिन्हें पीड़ित कहा जा सके ऐसे कोई बारडोली-पीड़ित हैं ही नहीं। उन्होंने कहा है कि बारडोलीके किसान इतने स्वाभिमानी हैं कि जबतक वे काम चला सकें तबतक सहायता स्वीकार नहीं करेंगे। निस्सन्देह संघर्षकी प्रारम्भिक दशामें उन्होंने ही उन असंख्य कार्यकर्त्ताओंका बोझ सँभाला है, जो श्री स्मार्टकी भाषामें "बारडोलीके गरीब लोगोंपर आश्रित आन्दोलनकारियोंके जमघट" से ज्यादा कुछ नहीं थे। परन्तु जब संघर्षने जोर पकड़ा और जब्तियाँ प्रतिदिनकी बात हो गई और जब भैंसें भी, जो किसानोंका वास्तविक धन और उनकी खेतीका प्रधान आधार थीं, जब्ती अधिकारियोंकी शिकार होने लगीं, तब बारडोली और वालोड ताल्लुकोंके लोगोंके लिए यह रोज-रोज बढ़ता हुआ खर्च उठाना असम्भव हो गया। यही कारण था कि श्री वल्लभभाईने आर्थिक सहायताके लिए जनतासे अपील की, जिसका हमारे देशवासियोंने तत्काल और इतना उदार उत्तर दिया है। परन्तु श्री वल्लभभाई चाहते हैं कि उन लोगोंसे, जिनकी संघर्षके साथ कोई सहानुभूति नहीं है और जो अपने दानको पीड़ितों तक ही सीमित रखना चाहते हैं, चन्दा न लिया जाये। क्योंकि उनका यह दृढ़ मत है कि उस दशामें ऐसी सहायता लेना गलत होगा जब कि चन्देका अधिकतम भाग प्रचार कार्यालयका काम चलानेके लिए और उन बहुतसे स्वयंसेवकोंके पालन-पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाना है, जिन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलती और जो कोई तनख्वाह नहीं माँगते, परन्तु जिनका पेट अवश्य भरना है। इसलिए मुझे इच्छा न रहते हुए भी आपको यह सूचित करना पड़ रहा है कि जबतक आपने अपनी सहायताकी जो सीमा बाँधी है उसे हटानेकी बात आप नहीं सोचते और संघर्षका उसके गुणोंके आधार पर समर्थन नहीं करते, मैं आपका चन्दा स्वीकार नहीं कर सकता। मैं यह भी कह दूँ कि आपका लेख पढ़नेके बाद मैं निजी तौरपर चन्दा देनेवाले अधिकांश मुख्य दाताओंसे मिल चुका हूँ और उन्होंने मुझसे कहा है कि उनकी ऐसी कोई धारणा नहीं है कि उनके चन्देके उपयोगपर इस<noinclude></noinclude> 3necaof72qugpvqz5a31lpmezi81k4a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२० 250 186946 674983 645343 2026-08-29T16:26:10Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674983 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>तरहकी रोक लगाई जायेगी और उन्होंने मेरे इस विचारका समर्थन किया है कि वे जानते थे कि चन्देका उपयोग उपर्युक्त उद्देश्यके लिए ही किया जाना है और उन्होंने चन्दा इसीलिए दिया है, क्योंकि उन्हें संघर्षके साथ पूरी सहानुभूति है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत के॰ नटराजन<br> सम्पादक<br> 'इंडियन डेली मेल'<br> बम्बई}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४४४६) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३१. पत्र: विट्ठलभाई पटेलको'''}}}} {{right|२५ जून, १९२८}} {{left|भाईश्री विट्ठलभाई,}} आपका पत्र मिला। आपको मालूम होना चाहिए कि आपके पत्र एक दिन देरसे मिलते हैं। छोटा पत्र शनिवारको और बड़ा कल रविवारको मिलना चाहिए था, किन्तु दोनों देरसे मिले। डाक यहाँ [पोस्ट] आफिसमें खोली तो नहीं जाती, लेकिन यदि ऐसा होता हो तो यह जानना जरूरी ही है कि वहाँ से पत्र डाकमें देरीसे तो नहीं डाले गये थे? आपने बड़े पत्रमें जो लिखा है वह मुझे बहुत अच्छा लगा है। सरदारकी आबरू योग्य रीतिसे रखी जा सके तो जरूर रखें, पर लोकहित खोकर नहीं। आपकी तरह मैं भी मानता हूँ कि अब समझोता किये बिना सरकारका निस्तार नहीं है। 'स्टेट्समैन' का लेख आपने देखा है? उसमें सरकारके पक्षकी निर्बलता कबूल की गई है। आप स्पीकर रहते हुए जो करें, अभी वही काफी है। मुझे नहीं लगता कि इस समय इस पदको छोड़ना ठीक होगा। आपके पत्र देरसे आनेका कारण मालूम हो गया है। आप ठिकाना अहमदाबाद लिखते हैं, होना चाहिए साबरमती। {{right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} गुजराती (एस॰ एन॰ १४४४७) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> ilipgbd5kuu3qebvvbnuyzoysa6bp4s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२१ 250 186947 675001 645344 2026-08-29T17:13:43Z अनुश्री साव 80 /* अशोधित */ 675001 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५३२. पत्र: रामनाथको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला । दुर्भाग्यसे यह सही है । परन्तु अभी हम नहीं पहुँच सके हैं कि हम खादीका धागा बना सकें। इसमें कुछ ऐसी स्थिति पर वक्त लगेगा । {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत रामनाथ<br> ओबरसियर<br> डा॰ शेखवाइन<br> बहावलपुर रियासत}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३२) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३३. पत्र: गोवर्धनभाई आई॰ पटेलको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय गोवर्धनभाई,}} आपका पत्र' मिला। इसमें आपके और मेरे बीच और उसके बाद सेठ मंगलदास और मेरे बीच हुई बातचीतका सार तो आ जाता है किन्तु इस सम्बन्ध में मैं अपने विचार इस भाषामें रखना चाहूँगा : १. गोवर्धनभाई आई० पटेलने अपने पत्रमें दूसरी बातोंके साथ यह लिखा था : आपके साथ हुई निजी चर्चाओंसे मैंने और सेठ मंगलदासने यह समझा है कि आपको संयुक्त प्रशासनके सम्बन्धमें कुछ सैद्धान्तिक आपत्तियाँ हैं... साथ ही मैं यह समझा हूँ कि आप हमें यह सलाह देते हैं कि हम अपनी समिति बनायें, जिसका नाम निरीक्षण समिति रखा जाये और उसे यह अधिकार हो कि वह मजदूर संघके स्कूलोंकी कार्य विधि और खर्च की. छानबीन और निरीक्षण करे। यह समिति समय-समयपर जो शर्त रखे और सुझाव देवे मजदूर संघ द्वारा कार्यान्वित किये जायेंगे और यदि मजदूर संघ उनका पालन नहीं करेगा तो उक्त स्कूलों को अनुदान मिलना अपने-आप बन्द हो जायेगा । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> dntm7cbrkqlbjwuhb7mo0dvgks9r7r0 675011 675001 2026-08-29T17:36:21Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५३२. पत्र: रामनाथको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। दुर्भाग्यसे यह सही है। परन्तु अभी हम नहीं पहुँच सके हैं कि हम खादीका धागा बना सकें। इसमें कुछ ऐसी स्थिति पर वक्त लगेगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत रामनाथ<br> ओबरसियर<br> डा॰ शेखवाइन<br> बहावलपुर रियासत}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३२) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३३. पत्र: गोवर्धनभाई आई॰ पटेलको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय गोवर्धनभाई,}} आपका पत्र<ref> गोवर्धनभाई आई॰ पटेलने अपने पत्रमें दूसरी बातोंके साथ यह लिखा था: आपके साथ हुई निजी चर्चाओंसे मैंने और सेठ मंगलदासने यह समझा है कि आपको संयुक्त प्रशासनके सम्बन्धमें कुछ सैद्धान्तिक आपत्तियाँ हैं...साथ ही मैं यह समझा हूँ कि आप हमें यह सलाह देते हैं कि हम अपनी समिति बनायें, जिसका नाम निरीक्षण समिति रखा जाये और उसे यह अधिकार हो कि वह मजदूर संघके स्कूलोंकी कार्य-विधि और खर्चकी-छानबीन और निरीक्षण करे। यह समिति समय-समयपर जो शर्त रखे और सुझाव देवे मजदूर संघ द्वारा कार्यान्वित किये जायेंगे और यदि मजदूर संघ उनका पालन नहीं करेगा तो उक्त स्कूलों को अनुदान मिलना अपने-आप बन्द हो जायेगा।</ref> मिला। इसमें आपके और मेरे बीच और उसके बाद सेठ मंगलदास और मेरे बीच हुई बातचीतका सार तो आ जाता है किन्तु इस सम्बन्ध में मैं अपने विचार इस भाषामें रखना चाहूँगा: {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> p1uy105c8l8w3fy6294je8m2v86lk2h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२२ 250 186948 675015 645345 2026-08-29T17:56:15Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>दान देनेवालोंको इस बातकी छूट है और मजदूर संघ स्वयं भी उन्हें इसके लिए आमन्त्रित करता है कि वे एक निरीक्षण समिति नियुक्त करें, जिसे संघ द्वारा चलाये गये स्कूलोंकी कार्य-विधि और खर्चकी छानबीन करने और निरीक्षण करनेका अधिकार होगा। और समितिसे निरीक्षणकी रिपोर्ट मिलनेपर दान देनेवालोंको स्कूलोंके सम्बन्धमें शर्ते लगाने या सुझाव देनेका और यदि मजदूर संघ इन शर्तो और सुझावोंको कार्यान्वित न करे, तो स्कूलोंको दिये जानेवाले अनुदानको स्थगित कर देनेका भी अधिकार होगा। परन्तु इसमें शर्त यह होगी कि दान देनेवाले इस तरहके अनुदानको रोकनेसे पहले, यदि मजदूर संघ उन शर्तों और सुझावोंको कार्यान्वित न कर सके और उसके सम्बन्धमें कोई स्पष्टीकरण देना चाहे, तो उसे सुन लें। {{right|हृदयसे आपका,}} {{dhr}} {{left|श्रीयुत गोवर्धनभाई आई॰ पटेल<br> सदस्य, अहमदाबाद मिल तिलक स्वराज्य-कोष समिति<br> लालावासाकी गली<br> साँकड़ीसेरी, अहमदाबाद}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३९) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३४. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय सतीशबाबू,}} आपका पत्र मिला। गांधीवाद विरोधी भावनाको रोकनेकी आपकी आतुरताको मैं समझता हूँ, परन्तु आपको इसका विरोध गांधीवादी भावनासे ही करना होगा और वह यह है कि आप विरोधी शक्तिको बिना प्रतिरोधके अपने आप चुक जाने दीजिए। मेरा अभिप्राय क्या है, यह मैं पत्र-व्यवहार द्वारा नहीं समझा सकूँगा। मुझे निश्चय है कि आपका काम यह नहीं है कि आप अपनी शक्ति प्रतिरोध में नष्ट हो जाने दें, बल्कि यह है कि इसे अपने रचनात्मक कार्यको सँजोनेमें लगायें। आपने जो प्रश्न उठाया है यह नया नहीं है। जब मैंने बेलगाँवमें अध्यक्षता की थी, यह उस वक्त मी उठा था और श्यामबाबू तथा कुछ-एक दूसरे लोगोंके विरोधके बावजूद मैंने असहयोगियोंसे कहा था कि वे बिलकुल प्रतिरोध न करें। मुझे तबसे कोई ऐसी चीज नहीं दिखाई दी, जिससे कि मेरा विचार बदल जाता। परन्तु हमें इस सवाल पर, जब हम मिलें, तब चर्चा करनी चाहिए। जब मुझे महसूस होगा कि वक्त आ गया है, तब मैं इसपर निश्चय ही लिखूँगा।<noinclude></noinclude> 77izpwkc2cejs1vc78i52hvcnv9w78o पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२३ 250 186949 675049 645346 2026-08-30T02:48:43Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675049 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: आर॰ बी॰ ग्रेगको|४९१}}</noinclude>मुझे क्षितीशबाबूका पत्र बहुत पसन्द आया। उसमें एक भी अनावश्यक शब्द नहीं है। मैंने जिस अप्रतिरोधका सुझाव दिया है, उसमें सर्व-साधारण जनताके लिए इस तरहके अनुदेश शामिल नहीं हैं। सस्नेह, {{right|बापू}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९१८) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३५. पत्र: आर॰ बी॰ ग्रेगको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय गोविन्द,}} तुम्हारा पत्र मिला। संविधानके<ref>आश्रमका।</ref> विषयमें तुम्हारे सुझावके सम्बन्ध में मैं तुम्हारा पत्र नारायणदासके पास भेज रहा हूँ और उसकी एक प्रति शंकरलालको भी भेज रहा हूँ। महादेव अभी रोगशय्या पर पड़ा हुआ है। और अभी कुछ वक्त वैसा ही रहेगा। उसे तकलीफवाले हिस्सेमें रह-रहकर उठनेवाला तीव्र दर्द होता है। कमसे-कम अक्तूबरसे पहले मेरे आश्रमसे बाहर जानेकी सम्भावना नहीं है। और तब भी अगर जा सका तो। {{right|हृदयसे तुम्हारा,}} {{left|[पुनश्चः]}} तुम्हारी महान् कृतिमें<ref>'''इकोनोमिक्स ऑफ खद्दर।'''</ref> मुझे सांकेतिकाका अभाव खटकता है। पता नहीं तुम्हारे पास उसके लिए समय है या नहीं। मैं समझता हूँ कि मुझे यह काम तुमपर नहीं थोपना चाहिए। परन्तु जबतक मैं वरदाचारी या महादेवसे, जो फिलहाल कामके बोझसे लदे हैं, न कहूँ, मेरी समझमें नहीं आता कि मैं और किसके पास जाऊँ। हर बार जब मैं पुस्तककी तरफ देखता हूँ, मुझे सांकेतिकाका अभाव खटकता है। अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३४) की फोटो-नकलसे। {{dhr|3em}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 7yvhnu5vy9q2yl2io9h3rqe4xff8kne 675050 675049 2026-08-30T02:49:20Z अनुश्री साव 80 675050 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: आर॰ बी॰ ग्रेगको|४९१}}</noinclude>मुझे क्षितीशबाबूका पत्र बहुत पसन्द आया। उसमें एक भी अनावश्यक शब्द नहीं है। मैंने जिस अप्रतिरोधका सुझाव दिया है, उसमें सर्व-साधारण जनताके लिए इस तरहके अनुदेश शामिल नहीं हैं। सस्नेह, {{right|बापू}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९१८) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३५. पत्र: आर॰ बी॰ ग्रेगको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २७ जून, १९२८}} {{left|प्रिय गोविन्द,}} तुम्हारा पत्र मिला। संविधानके<ref>आश्रमका।</ref> विषयमें तुम्हारे सुझावके सम्बन्ध में मैं तुम्हारा पत्र नारायणदासके पास भेज रहा हूँ और उसकी एक प्रति शंकरलालको भी भेज रहा हूँ। महादेव अभी रोगशय्या पर पड़ा हुआ है। और अभी कुछ वक्त वैसा ही रहेगा। उसे तकलीफवाले हिस्सेमें रह-रहकर उठनेवाला तीव्र दर्द होता है। कमसे-कम अक्तूबरसे पहले मेरे आश्रमसे बाहर जानेकी सम्भावना नहीं है। और तब भी अगर जा सका तो। {{right|हृदयसे तुम्हारा,}} {{left|[पुनश्चः]}} तुम्हारी महान् कृतिमें<ref>'''इकोनोमिक्स ऑफ खद्दर।'''</ref> मुझे सांकेतिकाका अभाव खटकता है। पता नहीं तुम्हारे पास उसके लिए समय है या नहीं। मैं समझता हूँ कि मुझे यह काम तुमपर नहीं थोपना चाहिए। परन्तु जबतक मैं वरदाचारी या महादेवसे, जो फिलहाल कामके बोझसे लदे हैं, न कहूँ, मेरी समझमें नहीं आता कि मैं और किसके पास जाऊँ। हर बार जब मैं पुस्तककी तरफ देखता हूँ, मुझे सांकेतिकाका अभाव खटकता है। अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३४) की फोटो-नकलसे। {{dhr|5em}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> o098t67i0ga5paog78eutvnou7t2q59 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२४ 250 186950 675056 645347 2026-08-30T03:28:46Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675056 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५३६. एक संशोधन'''}}}} कुमारी श्लेसिन, जिनका उल्लेख मैंने अपनी 'आत्मकथा 'के अध्यायोंमें<ref>भाग ४, अध्याय २२।</ref> किया है, किसी कन्या महाविद्यालयकी आचार्या नहीं है, बल्कि एक विद्यालय में शिक्षिका है, मैंने उन्हें आचार्या बताया है। इस भूलसे उन्हें दुःख हुआ है। इसका मुझे खेद है। मैं निस्संकोच कह सकता हूँ कि इस मूलके लिए वे किसी भी तरह जिम्मेदार नहीं है। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' २८-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३७. पर्दा दूर हुआ समझो'''}}}} बिहारके कई एक अत्यन्त प्रभावशाली पुरुषों और करीब उतनी ही महिलाओंके हस्ताक्षरसे युक्त एक तर्कसंगत अपील अभी हाल ही में बिहारमें निकली है जिसमें पर्दा पूरी तरह हटा देनेकी सलाह दी गई है। उसपर कोई पचाससे भी अधिक महिलाओंने हस्ताक्षर किये हैं, इस तथ्यसे यह जाहिर है कि अगर जोरोंसे काम चलता रहा तो बिहारमें पर्दा एक पुरानी कहानीके रूपमें ही रह जायेगा। यह भी उल्लेखनीय है कि हस्ताक्षर करनेवाली महिलाएँ अंग्रेजियतके रंगमें रंगी हुई नहीं, बल्कि धर्मपरायण हिन्दू महिलाएँ हैं। इस अपीलमें निश्चयपूर्वक कहा गया है कि: '''हम यह चाहते हैं कि हमारे प्रान्तको महिलाएँ घूमने-फिरने और सामाजिक जीवनमें सब तरहसे न्यायोचित भाग लेनेमें कर्नाटक, महाराष्ट्र और मद्रासकी बहनोंकी तरह स्वतन्त्र हों। परन्तु उनका यह रहन-सहन पूरी तरहसे भारतीय ढंगका होना चाहिए और उसे अंग्रेजीयत लाने की सब कोशिशों से बचना चाहिए। क्योंकि जहाँ हम यह महसूस करते हैं कि महिलाओंपर लादे गये एकान्तवासको पूरी तरह अंग्रेजी रहन-सहनमें बदलने का अर्थ होगा––खजूरसे गिरा झाड़में अटका वहाँ हम भी महसूस करते हैं कि यदि हम चाहते हैं कि हमारी महिलाएँ भारतीय आदर्शोंके अनुरूप उन्नति करें, तो पर्दा अवश्य हट जाना चाहिए। यदि हम यह चाहते हैं कि वे हमारे सामाजिक जीवनमें शोभा और सौन्दर्य लायें और इसके नैतिक स्तरको ऊँचा उठायें, यदि हम चाहते हैं कि वे घरकी कुशल प्रबन्धक हों, अपने पतियोंकी सहायक सहचरियाँ हों और समाजकी उपयोगी सदस्य हों, तो पर्दा जैसा कि यह इस वक्त मौजूद है अवश्य हट जाना चाहिए। वास्तवमें उनके कल्याणके लिए तबतक और कोई गम्भीर कदम नहीं उठाया जा''' {{dhr}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> kgkaysaddnhwyc0qazlhnb2kgss25fw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२५ 250 186951 675067 645348 2026-08-30T03:56:52Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675067 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पर्दा दूर हुआ समझो|४९३}}</noinclude>'''सकता जबतक घूँघट फाड़ कर फेंक न दिया जाये। और यह हमारा विश्वास कि यदि हमारी आधी जनसंख्याको शक्तिको, जो बनावटी तरीकेसे बन्द करके रखी गई है, मुक्त कर दी जाये तो इससे वह शक्ति पैदा होगी जो, यदि उसे सही निर्देशन दिया जाये, तो हमारे प्रान्त के लिए असीम हितकर होगी।''' मैं बिहार में पर्देके बुरे परिणामोंको जानता हूँ। इस आन्दोलनको शुरू करनेमें जरा भी जल्दबाजी नहीं की गई है। इस आन्दोलनकी शुरूआत जरा विचित्र ढंगसे हुई। श्री रामनन्दन मिश्र खादी कार्यकर्त्ता हैं। वे अपनी पत्नीको पर्देके कैदखानेसे छुड़ाना चाहते थे। चूँकि उनके सम्बन्धी उनकी पत्नीको आश्रम में नहीं आने देते थे, वे आश्रमसे दो लड़कियोंको उसके साथ रहने के लिए ले गये। उनमें से एक, स्व॰ मगनलाल गांधीकी लड़की राधा बहनको उसे शिक्षा देनेका काम करना था। उसके साथ स्व॰ श्री दलबहादुर गिरिकी लड़की दुर्गादेवी गई थी। आश्रमकी लड़कियोंकी, श्रीमती मिश्रसे पर्दा छुड़वानेकी कोशिश इस बालिका-पत्नीके माता-पिताको बुरी लगी। इन लड़कियोंने सभी कठिनाइयोंका सामना बड़ी बहादुरीसे किया। इसी बीच मगनलाल गांधी अपनी पुत्रीसे भेंट करने और सारी कठिनाइयोंके बावजूद अपनी कोशिश जारी रखनेके लिए उसका दिल मजबूत करने के लिए वहाँ गये। जिस गाँव में राधाबहन काम करती थी, वहीं वे बीमार पड़े और पटनामें आकर उनका देहान्त हो गया। इसलिए बिहारके मित्रोंने पर्देके विरुद्ध युद्ध ठानना अपनी आनका मामला बना लिया। राधाबहन अपनी शिष्याको यहाँ आश्रममें ले आई। उसके आश्रम में आनेसे और भी हलचल मची और उसके पतिके लिए, जो पहलेसे ही तैयार थे, इस आन्दोलनमें और भी उत्साहसे भाग लेना लाजिमी हो गया। इस तरह आशा है कि यह आन्दोलन जिसमें थोड़ा-सा व्यक्तिगत रंग है, जोरोंसे चल निकलेगा। इसके नेता बिहारके पुराने मंजे हुए सैनिक, बहुतसे संघर्षोके नायक बाबू ब्रजकिशोरप्रसाद हैं। मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी किसी आन्दोलनमें नेतृत्व किया हो, और फिर वह आन्दोलन बन्द हो गया हो। अपीलमें इस पर्दा-प्रथाके विरुद्ध जो कि आज बिहारकी आधी मानव-जाति पर समाज-सेवा न करनेका क्रूर अंकुश लगाये हुए है और कई मामलोंमें इसे स्वतन्त्रतासे तथा प्रकाश और स्वच्छ वायुके सेवनसे भी वंचित रखती है, जोरोंसे आन्दोलन शुरू करनेके लिए अगली ८ जुलाईका दिन निश्चित किया गया है। जितनी जल्दी हम समझ लें कि हमारी बहुत-सी सामाजिक कुरीतियाँ हमारे स्वराज्यका रास्ता रोक रही हैं, उतनी ही तेजीसे हम अपने प्रिय ध्येयकी ओर आगे बढ़ेंगे। स्वराज्य-प्राप्ति तक समाज-सुधारको स्थगित रखनेका अर्थ है कि हम स्वराज्यका मतलब ही नहीं जानते। यदि हम अपनी अर्द्धागिनियोंको निष्क्रिय और निष्प्राण-सी रहने दें तो हम न तो अपनी रक्षा ही कर सकेंगे और न दूसरे देशोंके साथ स्वस्थ प्रतियोगिता ही कर सकेंगे।<noinclude></noinclude> ejw3xxaa6m3iaeef1nw56vevp7zjvyq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२६ 250 186952 675075 645349 2026-08-30T04:15:36Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्गय}}</noinclude>इसलिए मैं बिहारके नेताओंको, सच्ची लगनके साथ पर्देके विरुद्ध संघर्ष शुरू करनेके लिए बधाई देता हूँ। सामान्यतः सभी सुधारोंकी सफलता कार्यकर्त्ताओंके चरित्रकी पवित्रता पर निर्भर होती है। यह बात इस सुधारके बारेमें तो विशेष रूपसे लागू होती है। अतः इस अपीलपर हस्ताक्षर करनेवाली महिलाओंपर बहुत कुछ निर्भर है। अगर वे पर्दा छोड़ देने पर भी भारतीय स्त्रीत्वका असली शील और विनय बनाये रखें, और बड़ी-बड़ी कठिनाइयोंके सामने भी साहस और दृढ़ निश्चय दिखायें तो उन्हें सफलता शीघ्र ही मिलेगी। पर्देके विरुद्ध आन्दोलन अगर ठीक-ठीक चलाया जाये तो यह बिहारकी स्त्रियों और पुरुषों, दोनोंके लिए सही किस्मकी सार्वजनिक शिक्षाका साधन बन जायेगा। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' २८-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''५३८. पत्र: पार्वतीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ३० जून, १९२८}} {{left|चि॰ पार्वती,}} दक्षिण आफ्रिकासे तार मिला है कि प्रागजी केस जीत गये हैं। तुम्हारी तबीयत अच्छी रहती होगी। कभी-कभी खत लिखा करो। सुख-दुःखमें भाग नहीं ले सकता तब भी तुम्हारा हाल मालूम हो यह इच्छा तो होती ही है। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५०३२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> pnpb58xnxbx2jjox2f26dhgsptt3l8k पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२७ 250 186953 675080 645350 2026-08-30T04:33:06Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675080 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५३९. पत्र: मथुरादास त्रिकमजीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> [३० जून, १९२८]<ref>साधन-सूत्र के अनुसार।</ref>}} मुझे लगता है कि बारडोलीके बारेमें अब सरकार समझौता करके ही छूट सकती है। मुझे ...<ref>नाम यहाँ नहीं दिया जा रहा हैं।</ref> मिल गया है। उसने यह वचन तो दिया था कि हमारी माँगको कम करनेके लिए वह कोई कदम नहीं लेगा। इस समय क्या हो रहा है इसकी खबर नहीं है। किन्तु सत्याग्रहके मूल में ही लोगोंकी हिम्मत, दृढ़ता और शान्तिकी कसौटी है न? {{left|[गुजरातीसे]<br> '''बापुनी प्रसादी'''}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''५४०. पत्र: ताराबहन जसवानीको'''}}}} {{right|३० जून, १९२८}} {{left|चि॰ ताराबहन,}} तुमने रंगून पहुँचनेके बाद बिलकुल पत्र नहीं लिखा। तुम्हें पेटीवाला चरखा भेजने के लिए दीवालीने लिखा है, वह भेजनेके लिए कह दिया है। वहाँ एक चरखा तो होना ही चाहिए। तबीयत ठीक रहती है न? खूब परिश्रम करते रहनेकी जरूरत है। इन दिनों यहाँ आश्रममें बहुतसे फेरफार हो गये हैं। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ८७८२) की फोटो-नकलसे। {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 0z0j8jbksolt5htyrktiiyscr2yrav2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१५८ 250 186991 675179 671534 2026-08-30T09:51:43Z आदेश यादव 3609 675179 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१३५. पत्र : जाल खभ्भाताको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १९ मार्च, १९२८}} {{left|चि॰ जाल,}} तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा न होनेकी खबर पढ़कर दुख हुआ है। ईश्वरके हुक्मके बिना एक पत्ता भी नहीं गिरता, यह सोचकर ईश्वर पर भरोसा रखते हुए उसीका ध्यान करो और धीरज रखो। उसकी मरजी होगी तो ठीक हो जाओगे। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ५०१३) से। सौजन्य : तहमीना खम्माता {{c|{{larger|'''१३६. पत्र : बहरामजी खम्भाताको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १९ मार्च, १९२८}} {{left|भाईश्री खम्भाता,}} तुम्हारा पत्र आज ही मिला। बेटेके लिए मेरा आशीर्वाद तो है ही। लेकिन घबराहटमें यूरोप जानेकी मुझे कोई जरूरत दिखाई नहीं देती। हम ईश्वर पर ही सब कुछ छोड़ दें। वहाँ कोई अच्छा डाक्टर जोखम लेनेको तैयार हो तो ऑपरेशन कराने में कोई हानि नहीं है। छोटे देशमुखको तुमने दिखाया है? चि॰ जालसे कहना कि हिम्मत न हारे। मुझे भी समाचार लिखते रहना। तुम्हारा स्वास्थ्य अब कैसा चल रहा है? यदि वहाँ कोई डाक्टर हिम्मत न करे और तुम्हें शान्ति न मिले तो यूरोप अवश्य चले जाना। मेरे पत्रको मनाहीका हुक्म मत समझना। हम जल्दबाजी में कुछ न करें और यह देह क्षणभंगुर है इसलिए इसके प्रति ज्यादा मोह नहीं रखना चाहिए, मैं तो इतना ही समझाना चाहता हूँ। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ५०१२) से। सौजन्य : तहमीना खम्भाता<noinclude></noinclude> rb73f56bijg3q5zbzlej9ljp57v8zlm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१५९ 250 186992 675184 671546 2026-08-30T10:28:18Z आदेश यादव 3609 675184 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१३७. पत्र : रैहाना तैयबजीको'''}}}} {{right|१९ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय रैहाना,}} निःसन्देह तुम जब आना चाहो आ सकती हो और जितने दिन यहाँ रहना चाहो रह सकती हो। :सस्नेह, {{right|बापू}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६०७) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१३८. पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}} {{right|साबरमती<br> आश्रम<br> १९ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय च॰ रा॰,}} आपका पत्र मिला। आपने चूँकि बादामों और बेचारी मूँगफलियोंको हिमालयकी पहाड़ी जातियोंका आहार बताते हुए व्यर्थका विरोध प्रकट करते हुए लम्बी चौड़ी हाँकी है, इसलिए पथ्य–विज्ञानके सम्बन्धमें आपकी कोई सुनवाई नहीं हो सकती। ध्यान रखियेगा कि यह प्रयोग मात्र इसलिए स्थगित किया गया है कि मैं तथाकथित डाक्टरी रायके दबावमें न आकर फिरसे इसे चालू कर सकूँ। मैंने कमसे–कम छः साल तक कच्ची मूंगफलियों पर निर्वाह किया है। मुझे तो ऐसा कोई कष्ट कभी नहीं हुआ जैसा आपने बताया है। खैर, इसके बारेमें फिर लिखूंगा। यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है? मैं रोलाँसे मिलनेके लिए उत्सुक हूँ। वह मुझे यूरोपके सबसे अधिक बुद्धिमान् व्यक्ति लगते हैं। वह मुझमें बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि उन्हें ऐसा लगे कि किसी एक चीजमें भी मेरी राय गलत है, तो इससे उन्हें बड़ा कष्ट होता है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम न मिल सके तो यह बड़े दुःखकी बात होगी। यही एक कारण है जो मुझे दूसरी सारी चीजोंसे अधिक विचलित किये हुए है। शेष सब गौण हैं। मुझे नहीं मालूम कि एन्ड्रयूजने आपको क्या लिखा है। परन्तु आपकी रायका मेरे लिये उतना ही महत्व होगा जितना एन्ड्रयूजकी रायका। इसलिए आप निडर होकर कहिये कि आप मुझसे क्या करनेकी आशा करते हैं।<noinclude></noinclude> 79sf9w79xxumffhmjtfnn37u668hna5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६० 250 186994 675190 671545 2026-08-30T11:03:58Z आदेश यादव 3609 675190 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; बहुतसे लोगोंको बड़ा दुःख हुआ कि मैं १७ तारीखको नहीं मरा... शायद मैं भी उनमें से एक हूँ। एक तरहकी मौत तो शायद मैं मर ही चुका। आगे देखें क्या होता है। अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१११) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१३९. पत्र : एम॰ आर॰ माधव वारियरको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। इतनी दूरीसे आपका दिशा–निर्देशन कर सकना कठिन है। परन्तु मेरा सुझाव है कि आप जहाँ तक हो सके धीमी गतिसे लेकिन सावधानी से अपना काम बराबर करते रहें। यदि आप महत्वाकांक्षापूर्ण किसी योजनापर काम शुरू कर देंगे तो आप देखेंगे कि आगे चलकर वह आपके लिए झंझट बन जायेगी। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत एम॰ आर॰ माधव वारियर<br> बी॰ ए॰ एल॰ एल॰ बी॰<br> अध्यक्ष, नगरपालिका परिषद्<br> क्विलन<br> त्रावणकोर}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११५) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude> 0gkhxp3ks3b0gnr7v0wakt6rrongmut पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६१ 250 186996 675191 671550 2026-08-30T11:05:47Z आदेश यादव 3609 675191 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४०. पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मलकानी,}} तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें मेरा तार<ref> देखिए "तार : ना॰ र॰ मलकानीको", १९-३-१९२८।</ref> अवश्य मिला होगा। मैं अपने आपको इस बातके लिए राजी नहीं कर पाता कि तुम सिर्फ अपने गुजारेके लिए कालेजमें रहो। बाढ़ सहायता कोषसे तुम्हें निर्वाहके लिए कुछ दिया जाये, इसमें मुझे कोई दोष नहीं दिखाई देता। इस सम्बन्धमें मैं ठक्कर बापासे लिखा–पढ़ी कर रहा हूँ और अगर तुम्हारी वर्तमान स्थितिमें किसी प्रकारका कोई फेरफार किये बिना ऐसा किया जा सके, तो अवश्य किया जाना चाहिए। तुम्हें रुपया चाहे मुझसे मिले अथवा बाढ़ सहायता कोषसे, होगा वह सार्वजनिक कोष में से ही। "अवैतनिक" शब्दको जिस अर्थमें हम प्रयुक्त करते हैं उस प्रकारकी अवैतनिक सेवाके बदलेमें कुछ लेनेमें शर्म नहीं करनी चाहिए। मजदूरको अपनी मजदूरी मिलनी ही चाहिए और जब सेवक अपनी मजदूरीसे ज्यादा कुछ नहीं लेता तब उसकी सारी सेवाएँ अवैतनिक ही हैं। भारतके अन्य हिस्सोंमें तुम्हारी सेवाओंके लिए सामान्यसे अधिक देना होगा; यह दुर्भाग्यकी बात है, लेकिन अपरिहार्य है। यदि तुम्हें सुविधापूर्वक बाढ़ कोषसे मानदेय न दिया जा सके तो उसके भुगतानकी जिम्मेदारी मेरी होगी। परन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बताओ कि तुम्हें कितनेकी आवश्यकता होगी। ठक्कर बापाने मुझे बताया है कि वे भी आश्रमसे तुम्हारे पास एक अच्छा कार्यकर्त्ता भेजनेवाले हैं तथा एक वे तुम्हारे पास पहले ही छोड़ आये थे। पर यदि तुम्हारे मनमें किसी व्यक्ति विशेषका नाम हो, तो उसे बतानेमें कृपया संकोच मत करना; मैं देखूंगा कि क्या वह तुम्हें दिया जा सकता है। {{right|हृदयसे तुम्हारा<br> {{larger|बापू}}}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८८४) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}} {{left|३६-९}}</noinclude> bxbbnfn9c39f4v2zx8hfi1yokqlcjww पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६२ 250 186997 675192 671554 2026-08-30T11:06:54Z आदेश यादव 3609 675192 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४१. पत्र : सुरेशचन्द्र बनर्जीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय सुरेश बाबू,}} जितने कतैयोंकी आप सेवा करते हैं, उसके सम्बन्धमें मन्त्रीका पत्र मैंने देखा है। क्या आप कतैयोंके पास स्वयं जाना उतना ही आवश्यक नहीं समझते जितना कि आप अपनी किताबों को पूरी तरहसे व्यवस्थित रूपमें रखना आवश्यक समझते हैं? यदि आप यह सावधानी नहीं बरतते तो एक दिन आपकी यह संस्था ताशके पत्तोंके घरकी तरह ढह जायेगी। सप्ताहके किसी विशेष दिन किसका सूत आपको मिला, यह महत्वकी बात नहीं है; यह बात अवश्य महत्वकी हैं कि आप उन लोगोंके पास, जो वास्तव में कातते हैं, किसी विश्वसनीय व्यक्तिको भेजें, जो उनसे बात करके उनकी कठिनाइयोंका पता लगाए। और निश्चय ही यह न तो असम्भव कार्य है और न कोई बहुत बड़ा काम। आपका काम तो इतना ही है कि जब कतैये अपना सूत दलालको बेचकर वापस जा रहे हों, आप उनके पीछे–पीछे उनके घर तक चले जायें। हो सकता है कि वे आपसे एक बार कतरा जायें, पर वे हमेशा आपसे नहीं कतरायेंगे। ज्यों ही आप परसे उनका अविश्वास दूर हो जायेगा, वे आप पर भरोसा करने लगेंगे। आपके पास कमसे–कम कुछ ऐसे ईमानदार दलाल अवश्य होने चाहिए जो आपके सन्देशवाहकको ऐसे हर घरमें जहाँसे वे सूत खरीदते हैं, ले जानेपर कोई एतराज न करें। और यदि यह इतनी आसान बात आपकी सामर्थ्यसे बाहर है, तो जाहिर है कि आप पूरी तरहसे दलालोंकी दयापर निर्भर हैं; वे तो चाहें जब अपना यह काम बन्द कर सकते हैं अथवा ऐसी शर्तें लगा सकते हैं, जिनको मानना या तो असम्भव होगा या वे आपके स्वाभिमानको ठेस पहुँचानेवाली होंगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेरे कहनेपर समय–समय पर श्री बैंकर जो सलाह देते रहे हैं, आप उसका महत्व महसूस करें। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude> nf8tnjnchmmrpz35f6jynfrzx1esyc4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६३ 250 186999 675193 671556 2026-08-30T11:08:55Z आदेश यादव 3609 675193 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय जवाहर,}} मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले हैं। मैं यह पत्र तुम्हारे द्वारा उल्लिखित मित्रको सन्देश<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> भेजने का वायदा पूरा करनेके लिए लिख रहा हूँ। उन्होंने अब सीधा मुझे पत्र लिखा है पर चूँकि सन्देश भेजनेका वायदा मैंने तुमसे किया था, मैं पत्रके साथ सन्देश तुम्हें ही भेज रहा हूँ; आशा है कि बहिष्कार और मिलों सम्बन्धी मेरे लेख तुम ध्यानसे पढ़ रहे होगे। मैं मिल–मालिकोंसे भी सलाह मश्विरा कर रहा हूँ। वे किसी फैसलेपर पहुँचेंगे भी या नहीं, मैं नहीं जानता। पर यदि तुम्हें कहीं भी गलती या कमजोरी नजर आये तो मुझे अवश्य बताना। कमला कैसी चल रही है? गर्मियोंमें तुम उसे कहाँ रखनेका इरादा कर रहे हो? {{right|हृदयसे तुम्हारा}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११६) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१४३. सन्देश<ref>पिछले शीर्षकका सह–पत्र।</ref>'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} जबतक मुख्य कारण अर्थात् सशक्तों द्वारा अशक्तोंके शोषणको समाप्त नहीं किया जाता, तबतक विभिन्न जातियों और राष्ट्रोंमें परस्पर जीवन्त सामंजस्य नहीं स्थापित हो सकता। 'योग्यतम ही टिकता है' इस तथा कथित सिद्धान्तकी व्याख्यामें संशोधन अवश्य किया जाना चाहिए। {{right|{{larger|(ह॰) मो॰ क॰ गांधी}}}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११७) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> ap6i06drm6cgz0ferhpfj67x0bm58ys पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६४ 250 187001 675197 671558 2026-08-30T11:11:19Z आदेश यादव 3609 675197 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४४. पत्र : मॉर्सेल केपीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। पत्रके मिलनेसे पहले मुझे हम दोनोंके ही मित्र पण्डित जवाहरलाल नेहरूके जरिये आपका सन्देश मिल चुका था। चूँकि मैंने आपका पत्र आनेसे पहले ही उनसे वायदा कर लिया था, मैंने अपना सन्देश<ref>देखिए पिछला शीर्षक</ref> उनकी मार्फत भेज दिया है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|मॉर्सेल केपी<br> ७८ रूई डि एजोम्पशन<br> पेरिस (फ्रान्स)}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६४) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१४५. पत्र : वि॰ च॰ रायको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय डा॰ राय,}} आपका पत्र मिला; उसके लिए धन्यवाद। डा॰ अन्सारीके आगमनसे सम्बन्धित अखबारोंमें छपा समाचार बिलकुल ही निन्दात्मक है। इसके कारण मेरे बहुतसे मित्रोंको चिन्ता हुई और मुझे जोहानिसबर्ग और श्याम तकसे आये समुद्री तारोंका उत्तर देना पड़ा। आपने शायद अब सही बात जान ली होगी कि डा० अन्सारीके आगमनका मेरे स्वास्थ्यसे बिलकुल सरोकार नहीं था। यदि ऐसा होता तो आपको भी, जो मेरे शरीरके रक्षकोंमें से एक हैं, इस सम्बन्धमें अवश्य ही आश्रमसे सीधे कुछन–कुछ खबर मिल गई होती। जमनालालजी और डा॰ जाकिर हुसैनके साथ डा॰ अन्सारी केवल राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय के सिलसिले में ही यहाँ आये थे और चूंकि वे आये ही थे और अपने साथ डाक्टरीके परीक्षण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> plv7gndjcs68ugqjvuwmygzv5kij54w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६५ 250 187002 675198 671566 2026-08-30T11:13:23Z आदेश यादव 3609 675198 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : जाकिर हुसैनसे|१३३}}</noinclude>यन्त्र लेते ही आये थे उनका मेरी जाँच कर लेना स्वाभाविक ही था। जाँच करने पर उन्होंने मेरा स्वास्थ्य संतोषजनक पाया; सवेरे हृदयका आकुंचन १४९ तथा स्फुरण ९२ था तथा शामको आकुंचन १५२ और स्फुरण ९८। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|डा॰ वि॰ च॰ राय<br> कलकत्ता}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२०) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१४६. पत्र : जाकिर हुसैनको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय जाकिर,}} आपका पत्र और लॉर्ड इर्विनके पत्रकी<ref>१७ मार्चके अपने पत्रके साथ जाकिर हुसैनने डॉ॰ अन्सारीको लिखे तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड इर्विनके १६ मार्चके पत्रकी एक प्रति गांधीजीको भेजी थी। वाइसरायने अपने पत्र हकीम अजमल खाँका स्मारक बनानेकी सराहना की थी तथा अपना सहयोग देनेकी भी बात लिखी थी।</ref> प्रति मिली। ज्यादातर लॉर्ड इविनके पत्रकी वजहसे मेरे मसविदेके<ref>उपलब्ध नहीं है।</ref> अनुरूप ही पत्र भेजना दुगुना लाभप्रद होगा। निश्चय ही कुछ आवश्यक रद्दोबदल करने होंगे। आशा है डा॰ अन्सारी अन्तमें जो पत्र भेजेंगे, उसकी एक प्रति आप मुझे भेज देंगे। मुझे नहीं मालूम कि देवदासने आपका ध्यान क्वार्टरोंकी सफाई व्यवस्थाकी उचित देखभाल किये जानेकी आवश्यकताकी ओर दिलाया है या नहीं। मैं चाहूँगा आप देवदासको कहें कि उसने जो कमियाँ देखी हैं, उन्हें बता दे। आशा है कि आप निमन्त्रण–पत्र<ref>जाकिर हुसैनने अपने पत्र लिखा था : ज्यों ही डॉ॰ अन्सारी लौट आयेंगे आशा है कि मैं जामिया संस्थापना समितिके सदस्योंको निमन्त्रण पत्र भेज सकूँगा। (एस॰ एन॰ १४९१३)।</ref> भेजने और आश्रममें हम दोनोंने चर्चा करने के बाद जो कार्यक्रम तय किया था उसके अनुसार कार्य करनेमें देरी नहीं करेंगे। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११९) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> efprau82iirnhoe2f8cm80g7r4bkb20 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६६ 250 187003 675199 671568 2026-08-30T11:16:05Z आदेश यादव 3609 675199 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय सतीश बाबू,}} यह बहिष्कार आन्दोलन एक खेदका विषय है। मैं चाहता हूँ कि मिलों और बहिष्कार पर लिखा मेरा लेख<ref>देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती हैं?", १५-३-१९२८।</ref> आप ध्यान से पढ़ें। मैं मिल–मालिकोंसे भी अपना सम्पर्क रख रहा हूँ। यदि मेरे तर्कमें आपको कोई कमी दिखाई दे तो उसकी ओर मेरा ध्यान दिलाने में आप तनिक भी संकोच न करें। मेरे स्वास्थ्यसे सम्बन्धित तार इस बार बिलकुल ही निन्दात्मक<ref>देखिए, "पत्र : वि॰ च॰ रायको", २०-३-१९२८।</ref> था, क्योंकि उसका कोई आधार ही नहीं था। जहाँतक मैं जानता हूँ मेरा स्वास्थ्य कभी इससे अच्छा नहीं रहा। डा॰ अन्सारी और जमनालालजी राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालयसे सम्बन्धित अजमल खाँ स्मारकके सम्बन्धमें चर्चा करने आये थे, उसके अतिरिक्त उन्हें और कोई काम नहीं था। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२१) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१४८. पत्र : राधा गांधीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> मंगलवार [२० मार्च, १९२८]<ref>ढाककी मुहरसे।</ref>}} {{left|चि॰ राधिका,}} तुम्हारे सुन्दर पोस्टकार्ड मिल गये हैं। मैंने जो कहा था वह सब याद रखना। शरीरका खूब ध्यान रखना और सबपर प्रेम रखना। रूखी अच्छी हो रही है। पर अभी हिलती–डुलती है तो थोड़ा खून झलक आता है। डॉक्टर देख गया है। इस तरफकी कोई चिन्ता मत करना। दुर्गाको भी पत्र लिखनेको कहना और लिखवा देना। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} :गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ८६६८) से। :सौजन्य : राधाबहन चौधरी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> nemwkunz3fmvqu0sspgjwd1h6x5a84p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३० 250 187069 675187 673757 2026-08-30T10:44:41Z आदेश यादव 3609 675187 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२१५. बाघात रियासत और जनेऊ'''}}}} गत २२ मार्चके 'यंग इंडिया' में बाघात रियासतमें कोलियोंके साथ वर्तावपर, मेरी टिप्पणीके<ref>देखिए "टिप्पणियाँ", २२-३-१९२८ का उप–शीर्षक "क्या यह सच हो सकता है"।</ref> सिलसिलेमें नई दिल्ली आर्य–समाजके सभापति लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>— पत्र–लेखक सभापति महोदय, और कोई नहीं, दिल्लीके नामी परोपकारी समाज–सेवी कार्यकर्त्ता राय साहब लाला गंगाराम हैं। लाला गंगारामके पत्रसे तो इन पृष्ठोंमें प्रकाशित पत्रमें लगाये गये इल्जामोंकी सच्चाईके बारेमें कोई शक नहीं रह जाता है। मैंने आशा की थी कि शायद उनको सूचना देनेवाले लोगोंने बाघात रियासतमें हुई वारदातोंको बढ़ा–चढ़ा कर कहा हो और तथाकथित अछूतोंको जनेऊ पहनना रियासतने गुनाह करार न दिया हो। मेरे सामने रियासतके प्रधान–मन्त्री द्वारा लाला गंगारामके नाम लिखे पत्रकी नकल है। पत्र इस प्रकार है : ::{{gap}}'''१० जनवरी, १९२८ के आपके पत्रके जवाबमें मुझे खेदके साथ कहना पड़ता है कि इस मुकदमेमें चूंकि आर्य–समाज एक पक्ष नहीं था, इसलिए आपको रियासतकी ओरसे उस फैसलेकी नकल नहीं दी जा सकती।''' मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि जवाब देनेका ढंग बहुत ही बुरा है। वह कुछ अंग्रेज अफसरोंके अत्यन्त नपे–तुले और एक ही ढर्रेके पत्रोंकी भौंड़ी नकल है, जो जरा टेढ़े सवाल पूछनेवालोंको भेजे जाते हैं। परन्तु ये माननीय सज्जन साधारणतः प्रतिष्ठा और पद की इज्जत करते हैं तथा जवाब देनेसे बचनेके लिए भद्दे तौरपर नई बातें पैदा नहीं करते हैं। बाघात रियासतके प्रधानमन्त्रीने समाजमें लाला गंगारामकी स्थिति (मेरा मतलब उपाधिको छोड़कर उनकी स्थितिसे है) की उपेक्षा करनेका दुःसाहस किया है और उन्हें अपमानित करनेके लिए वैसी बातोंकी कल्पना कर ली है, जिनका जिक्र तक लाला गंगारामने अपने पत्रमें नहीं किया था। क्योंकि उन्होंने न तो फैसलेकी नकल मांगी थी और न बेचारे कोलियों के मुकदमें में शरीक होने का ही दावा किया था। यह मामला दर असल हिन्दू महासभाको अपने हाथोंमें लेना चाहिए। मुझे पता नहीं है कि महासभा तथाकथित अछूतोंका जनेऊ पहनना पसन्द करती है या नहीं। वह पसन्द करे या न करे, किन्तु पहननेवालोंपर अत्याचार किया जाना तो वह कभी पसन्द नहीं कर सकती। यज्ञोपवीत ज्यों ही कुछ खास लोगोंका इजारा हो जाता है तथा उस इजारेको भंग करनेवालोंको दण्ड दिया जाता है, उसकी पवित्रता नष्ट हो जाती है। यह पवित्र तब था और इसलिए था कि इसे धारण करनेवाले पुरुष विद्वान और पवित्र होते थे। अगर बाघात रियासतकी जो बात कही जाती है उसका असर दूसरोंपर भी पड़ने लग जाये तो फिर शीघ्र ही यह अवनतिका चिह्न बन जायेगा। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', ५-४-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> pkrem5z46z2fa21h74ibwcpz7j68gx5 675188 675187 2026-08-30T10:45:15Z आदेश यादव 3609 675188 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२१५. बाघात रियासत और जनेऊ'''}}}} गत २२ मार्चके 'यंग इंडिया' में बाघात रियासतमें कोलियोंके साथ वर्तावपर, मेरी टिप्पणीके<ref>देखिए "टिप्पणियाँ", २२-३-१९२८ का उप–शीर्षक "क्या यह सच हो सकता है"।</ref> सिलसिलेमें नई दिल्ली आर्य–समाजके सभापति लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>— पत्र–लेखक सभापति महोदय, और कोई नहीं, दिल्लीके नामी परोपकारी समाज–सेवी कार्यकर्त्ता राय साहब लाला गंगाराम हैं। लाला गंगारामके पत्रसे तो इन पृष्ठोंमें प्रकाशित पत्रमें लगाये गये इल्जामोंकी सच्चाईके बारेमें कोई शक नहीं रह जाता है। मैंने आशा की थी कि शायद उनको सूचना देनेवाले लोगोंने बाघात रियासतमें हुई वारदातोंको बढ़ा–चढ़ा कर कहा हो और तथाकथित अछूतोंको जनेऊ पहनना रियासतने गुनाह करार न दिया हो। मेरे सामने रियासतके प्रधान–मन्त्री द्वारा लाला गंगारामके नाम लिखे पत्रकी नकल है। पत्र इस प्रकार है : :{{gap}}'''१० जनवरी, १९२८ के आपके पत्रके जवाबमें मुझे खेदके साथ कहना पड़ता है कि इस मुकदमेमें चूंकि आर्य–समाज एक पक्ष नहीं था, इसलिए आपको रियासतकी ओरसे उस फैसलेकी नकल नहीं दी जा सकती।''' मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि जवाब देनेका ढंग बहुत ही बुरा है। वह कुछ अंग्रेज अफसरोंके अत्यन्त नपे–तुले और एक ही ढर्रेके पत्रोंकी भौंड़ी नकल है, जो जरा टेढ़े सवाल पूछनेवालोंको भेजे जाते हैं। परन्तु ये माननीय सज्जन साधारणतः प्रतिष्ठा और पद की इज्जत करते हैं तथा जवाब देनेसे बचनेके लिए भद्दे तौरपर नई बातें पैदा नहीं करते हैं। बाघात रियासतके प्रधानमन्त्रीने समाजमें लाला गंगारामकी स्थिति (मेरा मतलब उपाधिको छोड़कर उनकी स्थितिसे है) की उपेक्षा करनेका दुःसाहस किया है और उन्हें अपमानित करनेके लिए वैसी बातोंकी कल्पना कर ली है, जिनका जिक्र तक लाला गंगारामने अपने पत्रमें नहीं किया था। क्योंकि उन्होंने न तो फैसलेकी नकल मांगी थी और न बेचारे कोलियों के मुकदमें में शरीक होने का ही दावा किया था। यह मामला दर असल हिन्दू महासभाको अपने हाथोंमें लेना चाहिए। मुझे पता नहीं है कि महासभा तथाकथित अछूतोंका जनेऊ पहनना पसन्द करती है या नहीं। वह पसन्द करे या न करे, किन्तु पहननेवालोंपर अत्याचार किया जाना तो वह कभी पसन्द नहीं कर सकती। यज्ञोपवीत ज्यों ही कुछ खास लोगोंका इजारा हो जाता है तथा उस इजारेको भंग करनेवालोंको दण्ड दिया जाता है, उसकी पवित्रता नष्ट हो जाती है। यह पवित्र तब था और इसलिए था कि इसे धारण करनेवाले पुरुष विद्वान और पवित्र होते थे। अगर बाघात रियासतकी जो बात कही जाती है उसका असर दूसरोंपर भी पड़ने लग जाये तो फिर शीघ्र ही यह अवनतिका चिह्न बन जायेगा। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', ५-४-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> hrmt8rh9uwi7slt2439l9iei7vys4py पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२० 250 187124 675121 670283 2026-08-30T06:58:41Z आदेश यादव 3609 675121 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|सोलह}}</noinclude>{|width=100% |- |९९. || श्रद्धांजलियाँ (८-३-१९२८) || ९६ |- |१००. || बारडोली और सरकार (८-३-१९२८) || ९६ |- |१०१. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (८-३-१९२८) || ९९ |- |१०२. || पत्र : सर डेनियल एम॰ हेमिल्टनको (९-३-१९२८) || ९९ |- |१०३. || पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको (९-२-१९२८) || १०० |- |१०४. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (९-३-१९२८) || १०१ |- |१०५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-३-१९२८) || १०१ |- |१०६. || पत्र : एडा एस॰ स्कडरको (१०-३-१९२८) || १०२ |- |१०७. || पत्र : दुनीचन्दको (१०-३-१९२८) || १०३ |- |१०८. || पत्र : भूपेन्द्र नारायण सेनको (१०-३-१९२८) || १०३ |- |१०९. || पत्र : वि॰ च॰ रायको (१०-३-१९२८) || १०४ |- |११०. || पत्र : ए॰ एस॰ मण्णाडि नायरको (१०-३-१९२८) || १०५ |- |१११. || पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (१०-३-१९२८) || १०५ |- |११२. || पत्र : रामी गांधीको (१०-३-१९२८) || १०६ |- |११३. || टिप्पणियाँ : दिवंगत रमणभाई; लॉर्ड सिन्हा (११-३-१९२८) || ११३ |- |११४. || अन्त्यजोंकी हुण्डी कौन सकारेगा? (११-३-१९२८) || १०८ |- |११५. || पत्र : जेन हॉवर्डको (१२-३-१९२८) || १०८ |- |११६. || पत्र : बी॰ डब्ल्यू॰ टकरको (१२-३-१९२८) || ११० |- |११७. || पत्र : जे॰ बी॰ कृपलानीको (१२-३-१९२८) || १११ |- ||११८. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१२-३-१९२८) || ११२ |- |११९. || पत्र : अजमल जामिया कोषके खजांचीको (१३-३-१९२८) || ११३ |- |१२०. || हमारी मिलें क्या कर सकती हैं? (१५-३-१९२८) || ११४ |- |१२१. || यह कैसे करें? (१५-३-१९२८) || ११५ |- |१२२. || टिप्पणियाँ : अखिल भारतीय चरखा संघकी सदस्यता; बोधक आँकड़े (१५-३-१९२८) || ११६ |- |१२३. || फिर वही चर्चा (१५-३-१९२८) || ११७ |- |१२४. || पत्र : सर नीलरतन सरकारको (१६-३-१९२८) || ११९ |- |१२५. || पत्र : मधुसूदनदासको (१६-३-१९२८) || ११९ |- |१२६. || पत्र : अ॰ टे॰ गिडवानीको (१६-३-१९२८) || १२१ |- |१२७. || पत्र : वी॰ एस० भास्करन्को (१६-३-१९२८) || १२१ |- |१२८. || पत्र : शंकरको (१६-३-१९२८) || १२२ |- |१२९. || पत्र : वायलेटको (१७-३-१९२८) || १२२ |- |१३०. || पत्र : एन॰ डी॰ भोंसलेको (१७-३-१९२८) || १२३ |- |१३१. || तार : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४ |- |१३२. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४ |- |१३३. || बहिष्कारका शस्त्र ( १८-३-१९२८) || १२५ |}<noinclude></noinclude> 2oa2cdzrku57wi5wp6gwiujqwv4etks पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१ 250 187125 675124 670300 2026-08-30T07:00:42Z आदेश यादव 3609 675124 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|सत्रह}}</noinclude>{|width=100% |- |१३४. || तार : ना॰ र॰ मलकानीको || १२५ |- |१३५. || पत्र : जाल खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६ |- |१३६. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६ |- |१३७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-३-१९२८) || १२७ |- |१३८. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१९-३-१९२८) || १२७ |- |१३९. || पत्र : एम॰ आर॰ माधव वारियरको (२०-३-१९२८) || १२८ |- |१४०. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (२०-३-१९२८) || १२९ |- |१४१. || पत्र : सुरेश बाबूको (२०-३-१९२८) || १३० |- |१४२. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२०-३-१९२८) || १३१ |- |१४३. || सन्देश (२०-३-१९२८) || १३१ |- |१४४. || पत्र : मार्सेल केपीको (२०-३-१९२८) || १३२ |- |१४५. || पत्र: वि॰ च॰ रायको (२०-३-१९२८) || १३२ |- |१४६. || पत्र : जाकिर हुसेनको (२०-३-१९२८) || १३३ |- |१४७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-३-१९२८) || १३४ |- |१४८. || पत्र : राधा गांधीको (२०-३-१९२८) || १३४ |- |१४९. || भेंट : एलिस शैलेकसे (२०-३-१९२८) || १३५ |- |१५०. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे (२०-३-१९२८) || १३९ |- |१५१. || पत्र : फेन्ज रोनाको (२१-३-१९२८) || १३९ |- |१५२. || पत्र : टी॰ डि॰ मन्जीयरलीको (२१-३-१९२८) || १४० |- |१५३. || पत्र : जौजेफ ए॰ ब्रॉनको (२१-३-१९२८) || १४० |- |१५४. || पत्र : पूंजाभाईको (२१-३-१९२८) || १४१ |- |१५५. || टिप्पणियाँ: चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता; क्या यह सच हो सकता हैं? (२२-३-१९२८) || १४१ |- |१५६. || विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न (२२-३-१९२८) || १४४ |- |१५७. || मतभेद (२२-३-१९२८) || १४६ |- |१५८. || फीजी फीजीवालोंके लिए (२२-३-१९२८) || १४८ |- |१५९. || पत्र : पी॰ के॰ मैथ्यूको (२२-३-१९२८) || १४८ |- |१६०. || वृद्ध–विवाह बनाम बाल–विवाह ( २५-३-१९२८) || १४९ |- |१६१. || पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (२६-३-१९२८) || १५० |- |१६२. || पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको (२६-३-१९२८) || १५१ |- |१६३. || पत्र : एन॰ राम रावको (२६-३-१९२८) || १५२ |- |१६४. || पत्र : एच॰ एम॰ पेरीराको (२६-३-१९२८) || १५२ |- |१६५. || पत्र: पी॰ एस॰ किचूलको (२६-३-१९२८) || १५३ |- |१६६. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२६-३-१९२८) || १५३ |- |१६७. || पत्र : प्रताप एस॰ पण्डितको (२६-३-१९२८) || १५४ |- |१६८. || पत्र : एम॰ पिगॉटको (२७-३-१९२८) || १५५ |}<noinclude></noinclude> oqpmmjve54jmqxsas25jstqi3ihf8zj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२ 250 187126 675156 671019 2026-08-30T08:15:38Z आदेश यादव 3609 675156 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|अठारह}}</noinclude>{|width=100% |- |१६९. || मोतीलाल नेहरूको (२७-३-१९२८) || १५५ |- |१७०. || भाषण : हरिजनोंकी सभा में (२७-३-१९२८) || १५६ |- |१७१. || पत्र : टी॰ के॰ माधवनको (२८-३-१९२८) || १५८ |- |१७२. || पत्र : एस॰ देवनदास नारायणदासको (२८-३-१९२८) || १५८ |- |१७३. || पत्र : रामी गांधीको (२८-३-१९२८) || १५९ |- |१७४. || पत्र : एच॰ एन॰ वेनको (२८-३-१९२८) || १६० |- |१७५. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२८-३-१९२८) || १६० |- |१७६. || पत्र : अरुलमणि पिचमुथूको (२८-३-१९२८) || १६२ |- |१७७. || पत्र : सैम हिगिनबाँटमको (२८-३-१९२८) ||१६२ |- |१७८. || जाति विद्वेषकी जीत (२९-३-१९२८)|| १६३ |- |१७९. || आतंकवादका सिद्धान्त (२९-३-१९२८) ||१६३ |- |१८०. || राष्ट्रीय सप्ताह (२९-३-१९२८) ||१६४ |- |१८१. || टिप्पणियाँ : खास राष्ट्रीय सप्ताहके लिए; बंगालमें खादीके सिलसिलेमें दौरा; बहिष्कार और विद्यार्थी; मेकॉलेका सपना; संघर्षके बीच शान्ति; (२९-३-१९२८) ||१६६ |- |१८२. || उपवासकी महिमा (२९-३-१९२८) ||१७० |- |१८३. || दो संशोधन (२९-३-१९२८) ||१७१ |- |१८४. || पत्र: उर्मिला देवीको (३०-३-१९२८) ||१७१ |- |१८५. || पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके सचिवको (३०-३-१९२८) ||१७२ |- |१८६. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३०-३-१९२८) ||१७३ |- |१८७. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (३०-३-१९२८) ||१७३ |- |१८८. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (३०-३-१९२८) ||१७४ |- |१८९. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (३०-३-१९२८) ||१७५ |- |१९०. || मोक्षदाता राम ||१७६ |- |१९१. || भाषण विद्यार्थियों और अध्यापकों की सभा में (३१-३-१९२८) ||१७८ |- |१९२. || पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको (३१-३-१९२८) ||१७९ |- |१९३. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३१-३-१९२८) ||१८० |- |१९४. || पत्र : राय हरेन्द्रनाथको (३१-३-१९२८) ||१८१ |- |१९५. || सत्याग्रहियों सावधान (१-४-१९२८) ||१८२ |- |१९६. || राष्ट्रीय सप्ताह (१-४-१९२८) ||१८३ |- |१९७. || टिप्पणियाँ : उड़ीसा की दुर्दशा; सस्ती खादी; (१-४-१९२८) ||१८४ |- |१९८. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१-४-१९२८) ||१८५ |- |१९९. || पत्र: उत्तम भिक्खुको (१-४-१९२८) ||१८५ |- |२००. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१-४-१९२८) ||१८६ |- |२०१. || पत्र : एच॰ एम॰ अहमदको (१-४-१९२८) ||१८७ |- |२०२. || पत्र : शुएब कुरैशीको (१-४-१९२८) ||१८७ |}<noinclude></noinclude> 5frjzzeuy17sbbf9rox4t8we2honpwn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३ 250 187127 675157 671023 2026-08-30T08:19:39Z आदेश यादव 3609 675157 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|उन्नीस}}</noinclude>{|width=100% |- |२०३. || पत्र : सदाशिवम्को (१-४-१९२८) || १८८ |- |२०४. || पत्र : सी॰ एफ॰ एण्ड्रयूजको (१-४-१९२८) || १८८ |- |२०५. || पत्र : रामजीदास जैनीको (१-४-१९२८) ||१८९ |- |२०६. || पत्र : रेमिंगटन टाइपराइटर कम्पनीको (१-४-१९२८) || १९० |- |२०७. || पत्र : सत्यानन्दको ( ३-४-१९२८) || १९० |- |२०८. || पत्र : रामी गांधीको (३-४-१९२८) || १९१ |- |२०९. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (४-४-१९२८) || १९१ |- |२१०. || पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको (४-४-१९२८) || १९३ |- |२११. || पत्र : बी॰ शिवा रावको (४-४-१९२८) || १९४ |- |२१२. || सन्देश : 'न्यू इंडिया'को (४-४-१९२८) || १९४ |- |२१३. || भाषण : आश्रमकी प्रार्थना सभा में (४-४-१९२८) || १९५ |- |२१४. || अछूतोंको याद रखो (५-४-१९२८) || १९७ |- |२१५. || बाघात रियासत और जनेऊ (५-४-१९२८) || १९८ |- |२१६. || अ॰ भा॰ च॰ संघकी वार्षिक रिपोर्ट (५-४-१९२८) || १९९ |- |२१७. || श्री शास्त्रीका आत्म–त्याग (५-४-१९२८) || २०० |- |२१८. || बहिष्कार पर एक मिल–मालिक (५-४-१९२८) || २०१ |- |२१९. || टिप्पणियाँ : आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी; स्त्रियाँ और गहने; कर्वे जयन्ती (५-४-१९२८) || २०३ |- |२२०. || पत्र : डा॰ सी॰ मुथुको (५-४-१९२८) || २०६ |- |२२१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (५-४-१९२८) || २०७ |- |२२२. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-४-१९२८) || २०७ |- |२२३. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (६-४-१९२८) || २०८ |- |२२४. || पत्र : डा॰ और श्रीमती स्टेंडेनथको (६-४-१९२८) || २०८ |- |२२५. || पत्र : सरदारनी एम॰ एम॰ सिंहको (६-४-१९२८) || २०९ |- |२२६. || पत्र : एम॰ दीवान नारायणदासको (६-४-१९२८) || २०९ |- |२२७. || वाई॰ आर॰ गायतोंडेको ( ६-४-१९२८) || २१० |- |२२८. || पत्र : गंगारामको ( ६-४-१९२८) || २११ |- |२२९. || पत्र : एस॰ राधाकृष्णनको (६-४-१९२८) || २११ |- |२३०. || पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंगटनको (६-४-१९२८) || २१२ |- |२३१. || पत्र : जी॰ रामचन्द्रनको (६-४-१९२८) || २१३ |- |२३२. || पत्र : चार्ली यू॰ मॉर्सेलोको (६-४-१९२८) || २१३ |- |२३३. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (७-४-१९२८) || २१४ |- |२३४. || पत्र : आई॰ पी॰ दुराईरत्नम्को (७-४-१९२८) || २१५ |- |२३५. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (७-४-१९२८) || २१५ |- |२३६. || पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (७-४-१९२८) || २१६ |- |२३७. || पत्र : श्रीमती सेम हिगिनबाँटमको (७-४-१९२८) || २१७ |}<noinclude></noinclude> ili5976dh6h4z16njvr3jkfg55eh7n3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४ 250 187128 675159 671097 2026-08-30T08:27:31Z आदेश यादव 3609 675159 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|बीस}}</noinclude>{|width=100% |- |२३८. || पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको (७-४-१९२८) || २१७ |- |२३९. || सन्देश : 'न्यूज शीट' को (७-४-१९२८) || २१८ |- |२४०. || पत्र : जोजेफको (७-४-१९२८) || २१८ |- |२४१. || पत्र : एस॰ गणेशनको (७-४-१९२८) || २१९ |- |२४२. || पत्र : एलिस शैलेकको (७-४-१९२८) || २१९ |- |२४३. || पत्र : एस॰ ए॰ वेजको (८-४-१९२८) || २२० |- |२४४. || पत्र : नारायणको (८-४-१९२८) || २२० |- |२४५. || पत्र : जे॰ बी॰ कृपलानीको (८-४-१९२८) || २२१ |- |२४६. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (८-४-१९२८) || २२२ |- |२४७. || पत्र : शंकरनको (८-४-१९२८) || २२३ |- |२४८. || पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८ से पूर्व) || २२४ |- |२४९. || पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८) || २२५ |- |२५०. || पत्र : अल्बर्ट गोडमुनेको (११-४-१९२८) || २२६ |- |२५१. || पत्र : च॰ राजगोपालचारीको (११-४-१९२८) || २२६ |- |२५२. || पत्र : आर॰ आर॰ एथनको (११-४-१९२८) || २२७ |- |२५३. || पत्र : सदाशिव रावको (११-४-१९२८) || २२७ |- |२५४. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (११-४-१९२८) || २२८ |- |२५५. || एक समयानुकूल किताब (१२-४-१९२८) || २२८ |- |२५६. || खादीका स्थान (१२-४-१९२८) ||२३० |- |२५७. || टिप्पणियाँ: वचन भंग, माजोरका मानवीय कताई यन्त्र (१२-४-१९२८) || २३२ |- |२५८. || दक्षिण आफ्रिकी भारतीय (१२-४-१९२८) || २३३ |- |२५९. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-४-१९२८) || २३४ |- |२६०. || पत्र : देवचन्द पारेखको (१२-४-१९२८) || २३५ |- |२६१. || भाषण: खादी विद्यालयके विद्यार्थियोंके समक्ष (१३-४-१९२८ से पूर्व) || २३५ |- |२६२. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१३-४-१९२८) || २३८ |- |२६३. || पत्र : ए॰ एलिंग्सको (१३-४-१९२८) || २३८ |- |२६४. || श्रीमती ब्लेयरको (१३-४-१९२८) || २३९ |- |२६५. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (१३-४-१९२८) || २४० |- |२६७. || पत्र : रामनाथनको (१३-४-१९२८) || २४० |- |२६८. || एक पत्र (१३-४-१९२८) || २४१ |- |२६६. || पत्र : टी॰ नागेश रावको (१३-४-१९२८) || २४२ |- |२६९. || पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (१४-४-१९२८) || २४२ |- |२७०. || पत्र : विट्ठलभाई जेराजाणीको (१४-४-१९२८) || २४३ |- |२७१. || पत्र : देवचन्द पारेखको (१४-४-१९२८) || २४४ |- |२७२.|| दलितोंकी सेवा (१५-४-१९२८) || २४५ |- |२७३. || पत्र: मणिबहन पटेलको (१५-४-१९२८) || २४७ |}<noinclude></noinclude> f7x3sa3gv7id06m54nfwstva9b99n1n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५ 250 187129 675160 671106 2026-08-30T08:32:06Z आदेश यादव 3609 675160 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|इक्कीस}}</noinclude>{|width=100% |- |२७४. || पत्र : सरोजिनी नायडूको (१६-४-१९२८) || २४८ |- |२७५. || पत्र : एनी बेसेंटको (१६-४-१९२८) || २४८ |- |२७६. || पत्र : उ॰ राजगोपाल कृष्णैयाको (१६-४-१९२८) || २४९ |- |२७७. || तार : राजेन्द्रप्रसादको (१६-४-१९२८ या उसके पश्चात) || २४९ |- |२७८. || तार : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (१७-४-१९२८) || २५० |- |२७९. || पत्र : के॰ माधवन नायरको (१७-४-१९२८) || २५१ |- |२८०. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१७-४-१९२८) || २५२ |- |२८१. || पत्र : डेनियल हेमिल्टनको (१७-४-१९२८) || २५२ |- |२८२. || पत्र : हेंस कोहूको (१७-४-१९२८) || २५३ |- |२८३. || सन्देश : लंकाकी विद्यार्थी परिषदको (१८-४-१९२८) || २५३ |- |२८४. || गलत पदचिह्नों पर (१९-४-१९२८) || २५४ |- |२८५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-४-१९२८) || २५८ |- |२८६. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२०-४-१९२८) || २५८ |- |२८७. || पत्र : देवचन्द पारेखको (२०-४-१९२८) || २६० |- |२८८. || पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (२०-४-१९२८) || २६० |- |२८९. || पत्र : पेट मेटॉफको (२०-४-१९२८) || २६१ |- |२९०. || पत्र : एस॰ गणेशनको (२१-४-१९२८) || २६२ |- |२९१. || पत्र : शंकरनको (२१-४-१९२८) || २६३ |- |२९२. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२१-४-१९२८) || २६४ |- |२९३. || तार : डबलडे डोरन कं॰को (२१-४-१९२८) || २६४ |- |२९४. || पत्र : जूलिया इजब्रूकरको (२२-४-१९२८ से पूर्व) || २६५ |- |२९५. || दफ्तरके बाबूका नाम कारीगर (२२-४-१९२८) || २६२ |- |२९६. || पत्र : एलिजाबेथ नडसनको (२२-४-१९२८) || २६६ |- |२९७. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२२-४-१९२८) || २६७ |- |२९८. || पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (२२-४-१९२८) || २६९ |- |२९९. || तार : मथुराप्रसादको (२३-४-१९२८ से पूर्व) || २६९ |- |३००. || पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (२३-४-१९२८) || २६९ |- |३०१. || तार : ब्रजकिशार प्रसादको (२३-४-१९२८) || २७० |- |३०२. || तार : देवदास गांधीको (२३-४-१९२८) || २७१ |- |२०३. || तार : राधा गांधीको (२३-४-१९२८) || २७१ |- |३०४. || तार : खुशालचन्द गांधीको ( २३-४-१९२८) || २७१ |- |३०५. || तार : छगनलाल गांधीको (२३-४-१९२८) || २७२ |- |३०६. || तार : जमनादास गांधीको (२३-४-१९२८) || २७२ |- |३०७. || पत्र : श्रीनाथ सिंहको (२३-४-१९२८) || २७३ |- |३०८. || पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२३-४-१९२८) || २७३ |- |३०९. || पत्र : सन्तोक गांधीको (२३-४-१९२८) || २७४ |}<noinclude></noinclude> 2vxoz5h9wzpk8hfjaomlqkouij78u2s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६ 250 187130 675165 671116 2026-08-30T08:44:57Z आदेश यादव 3609 675165 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|बाईस}}</noinclude>{|width=100% |- |३१०. || पत्र : तुलसी मेहरको (२३-४-१९२८के पश्चात) || २७४ |- |३११. || तार : दक्षिण आफ्रिकी भारतीयको (२४-४-१९२८) || २७५ |- |३१२. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२४-४-१९२८) || २७५ |- |३१३. || पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२४-४-१९२८) || २७६ |- |३१४. || तार : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ( २५-४-१९२८) || २७७ |- |३१५. || तार : देवदास गांधीको (२५-४-१९२८) || २७७ |- |३१६. || तार : च॰ राजगोपालाचारीको (२५-४-१९२८) || २७८ |- |३१७. || मेरा सबसे अच्छा सहयोगी चला गया (२६-४-१९२८) || २७८ |- |३१८. || धर्मसंकट (२६-४-१९२८) || २८१ |- |३१९. || यूरोपीय मित्रोंसे (२६-४-१९२८) || २८३ |- |३२०. || चार महीनेका काम (२६-४-१९२८) || २८५ |- |३२१. || तार : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-४-१९२८) || २८६ |- |३२२. || पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२६-४-१९२८) || २८७ |- |३२३. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२६-४-१९२७) || २८७ |- |३२४. || पत्र : एस॰ गणेशनको (२६-४-१९२८) || २८८ |- |३२५. || पत्र : लॉर्ड इर्विनको (२६-४-१९२८) || २८९ |- |३२६. || पत्र : जे॰ बी॰ पेटिटको (२६-४-१९२८) || २८९ |- |३२७. || पत्र : जुगलकिशोरको (२७-४-१९२८) || २९० |- |३२८. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२७-४-१९२८) || २९२ |- |३२९. || पत्र : फेड्रिक और फ्रान्सिस्का स्टेंडनथको (२७-४-१९२८) || २९२ |- |३३०. || एक सन्देश (२७-४-१९२८) || २९३ |- |३३१. || पत्र : कल्याणजी मेहताको (२८-४-१९२८) || २९४ |- |३३२. || स्वेच्छा–स्वीकृत दारिद्र्यका अर्थ (२९-४-१९२८) || २९४ |- |३३३. || आश्रमके प्राण (२९-४-१९२८) || २९६ |- |३३४. || पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२९-४-१९२८) || २९८ |- |३३५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९२८) || २९९ |- |३३६. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (२९-४-१९२८) || ३०० |- |३३७. || पत्र : लाजपतरायको (२९-४-१९२८) || ३०० |- |३३८. || पत्र : रविशंकर महाराजको (३०-४-१९२८) || ३०२ |- |३३९. || पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-४-१९२८) || ३०२ |- |३४०. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (१-५-१९२८) || ३०३ |- |३४१. || पत्र : एस॰ रामनाथनको (१-५-१९२८) || ३०३ |- |३४२. || पत्र : वि॰ च॰ रायको (१-५-१९२८) || ३०५ |- |३४३. || भाषण : अहमदाबादमें, बालभवनके उद्घाटनपर (१-५-१९२८) || ३०६ |- |३४४. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२-५-१९२८) || ३०९ |- |३४५. || नियम पालनकी आवश्यकता ( ३-५-१९२८) || ३०९ |}<noinclude></noinclude> 9hk55t84e4l3ozuya68qtyxxfg3aw5v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२७ 250 187131 675172 671222 2026-08-30T09:30:28Z आदेश यादव 3609 675172 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|तेईस}}</noinclude>{|width=100% |- |३४६. || धन्यवाद (३-५-१९२८) || ३११ |- |३४७. || पत्र : वीरूमल हेमराजको (४-५-१९२८) || ३११ |- |३४८. || पत्र : पी॰ तिरुकूटसुन्दरम् पिल्लैको (४-५-१९२८) || ३१२ |- |३४९. || पत्र : एल॰ क्रेनाको (४-५-१९२८) || ३१३ |- |३५०. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (४-५-१९२८) || ३१३ |- |३५१. || भक्तिके नामपर भोग (६-५-१९२८) || ३१४ |- |३५२. || पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (७-५-१९२८) || ३१६ |- |३५३. || पत्र : मीरा बहनको (७-५-१९२८) || ३१६ |- |३५४. || पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (७-५-१९२८) || ३१७ |- |३५५. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (८-५-१९२८) || ३१७ |- |३५६. || पत्र : मीरा बहनको (९-५-१९२८) || ३१९ |- ||३५७. || मिलोंका कपड़ा बनाम खादी (१०-५-१९२८) || ३१९ |- |३५८. || मिल मालिकोंका लोभ (१०-५-१९२८) || ३२१ |- |३५९. || सभ्यताकी विनाशकारी गति (१०-५-१९२८) || ३२२ |- |३६०. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१०-५-१९२८) || ३२२ |- |३६१. || पत्र : ई॰ बियरमको (१०-५-१९२८) || ३२३ |- |३६२. || पत्र : मेरी जे॰ कैम्बेलको (११-५-१९२८) || ३२५ |- |३६३. || पत्र : एस॰ गणेशनको (११-५-१९२८) || ३२५ |- |३६४. || पत्र : एन॰ मेरी पीटर्सनको (११-५-१९२८) || ३२६ |- |३६५. || पत्र : शचीन्द्र नाथ मित्रको (११-५-१९२८) || ३२७ |- |३६६. || पत्र : देवचन्द पारेखको (११-५-१९२८) || ३२७ |- |३६७. || पत्र : मीरा बहनको (११-५-१९२८) || ३२८ |- |३६८. || पत्र : टी॰ बी॰ केशवरावको (१२-५-१९२८) || ३२८ |- |३६९. || पत्र : निरंजन सिंहको (१२-५-१९२८) || ३२९ |- |३७०. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-५-१९२८) || ३२९ |- |३७१. || पत्र : शंकरनको (१२-५-१९२८) || ३३० |- |३७२. || पत्र : लाजपतरायको (१२-५-१९२८) || ३३० |- |३७३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१२-५-१९२८) || ३३१ |- |३७४. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१२-५-१९२८) || ३३२ |- |३७५. || पत्र : भगवानजीको (१२-५-१९२८) || ३३३ |- |३७६. || तपका उद्यापन (१३-५-१९२८) || ३३३ |- |३७७. || बारडोलीका यज्ञ (१३-५-१९२८) || ३३४ |- |३७८. || प्राथमिक शिक्षा — १ (१३-५-१९२८) || ३३५ |- |३७९. || पत्र: पी॰ वी॰ कर्मचन्दानीको (१३-५-१९२८) || ३३६ |- |३८०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (१३-५-१९२८) || ३३७ |- |३८१. || पत्र : लॉर्ड इर्विनको (१६-५-१९२८) || ३३७ |}<noinclude></noinclude> lkpg49eg9jb15yupfciclveud3h97or पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२८ 250 187132 675173 671227 2026-08-30T09:35:22Z आदेश यादव 3609 675173 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|चौबीस}}</noinclude>{|width=100% |- |३८२. || पत्र : सवाल तो यह है (१७-५-१९२८) || ३३८ |- |३८३. || दलित वर्ग और बाघात रियासत (१७-५-१९२८) || ३४१ |- |३८४. || मगनलाल गांधी स्मारक (१७-५-१९२८) || ३४२ |- |३८५. || हैदराबाद राज्यमें खादी (१७-५-१९२८) || ३४३ |- |३८६. || भारतके सम्बन्धमें सत्य : कुमारी मेयोको उत्तर (१७-५-१९२८) || ३४४ |- |३८७. || पत्र : अजमल जामिया कोषके कोषाध्यक्षको (१८-५-१९२८) || ३४५ |- |३८८. || तार : महमूद अलीको (१९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) || ३४६ |- |३८९. || प्राथमिक शिक्षा — २ (२०-५-१९२८) || ३४६ |- |३९०. || पत्र: मणिबहन पटेलको (२१-५-१९२८) || ३४८ |- |३९१. || जाकिर हुसैनको (२३-५-१९२८) || ३४८ |- |३९२. || दक्षिण आफ्रिकी सत्याग्रहका इतिहास (२४-५-१९२८) || ३४९ |- |३९३. || एन्ड्रयूजकी श्रद्धांजलि (२४-५-१९२८) || ३५० |- |३९४. || पुण्यका सौदा (२४-५-१९२८) || ३५० |- |३९५. || नगरपालिकाके स्कूलोंमें खादी (२४-५-१९२८) || ३५२ |- |३९६. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) || ३५३ |- |३९७. || पत्र : जे॰ एम॰ सेनगुप्तको (२४-५-१९२८) || ३५३ |- |३९८. || पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२४-५-१९२८) || ३५४ |- |३९९. || पत्र : टी॰ प्रकाशम्को (२४-५-१९२८) || ३५४ |- |४००. || एक पत्र (२४-५-१९२८) || ३५५ |- |४०१. || पत्र : एस॰ रामनाथनको (२४-५-१९२८) || ३५६ |- |४०२. || पत्र : मेहर सिंह रेतको (२४-५-१९२८) || ३५६ |- |४०३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) || ३५७ |- |४०४. || पत्र : एफ॰ एच॰ ब्राउनको ( २५-५-१९२८) || ३५७ |- |४०५. || पत्र : जनकधारी प्रसादको (२५-५-१९२८) || ३५८ |- |४०६. || पत्र : हेनरी और मिली पोलकको (२५-५-१९२८) || ३५९ |- |४०७. || पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (२५-५-१९२८) || ३६० |- |४०८. || तार : हरिलाल देसाईको (२५-५-१९२५ के पश्चात्) || ३६१ |- |४०९. || पत्र : महादेव देसाईको (२६-५-१९२८) || ३६१ |- |४१०. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूज को (२६-५-१९२८) || ३६२ |- |४११. || पत्र : सेम्युअल आर॰ पेरीको (२६-५-१९२८के पश्चात्) || ३६३ |- |४१२. || प्राथमिक शिक्षा — ३ (२७-५-१९२८) || ३६३ |- |४१३. || पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२७-५-१९२८) || ३६६ |- |४१४. || पत्र : वाई॰ अंजप्पाको (२७-५-१९२८) || ३६६ |- |४१५. || पत्र : सत्यानन्द बोसको (२७-५-१९२८) || ३६७ |- |४१६. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२७-५-१९२८) || ३६७ |- |४१७. || पत्र : सी॰ रंगनाथ रावको (२७-५-१९२८) || ३६८ |}<noinclude></noinclude> 5ts7z8c5p63vl0b2lj5qkvv30o98isf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२९ 250 187133 675174 671236 2026-08-30T09:39:29Z आदेश यादव 3609 675174 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|पच्चीस}}</noinclude>{|width=100% |- |४१८. || पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) || ३६९ |- |४१९. || पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) || ३६९ |- |४२०. || पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) || ३७० |- |४२१. || हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) || ३७० |- |४२२. || तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) || ३७१ |- |४२३. || पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) || ३७२ |- |४२४. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (३०-५-१९२८) || ३७२ |- |४२५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३०-५-१९२८) || ३७३ |- |४२६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-५-१९२८) || ३७४ |- |४२७. || बारडोलीकी परीक्षा (३१-५-१९२८) || ३७४ |- |४२८. || दक्षिणमें अस्पृश्यता (३१-५-१९२८) || ३७६ |- |४२९. || पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) || ३७७ |- |४३०. || पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (३१-५-१९२८) || ३७८ |- |४३१. || पत्र : अ॰ टे॰ गिडवानीको (३१-५-१९२८) || ३७९ |- |४३२. || पत्र : इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबादके प्रबन्धकको (१-६-१९२८) || ३८० |- |४३३. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१-६-१९२८) || ३८० |- |४३४. || पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१-६-१९२८) || ३८१ |- |४३५. || पत्र : केवलरामको (२-६-१९२८) || ३८१ |- |४३६. || बारडोलीका माहात्म्य ( ३-६-१९२८) || ३८२ |- |४३७. || शिक्षा–विषयक प्रश्न — १ (३-६-१९२८) || ३८३ |- |४३८. || पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) || ३८४ |- |४३९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (४-६-१९२८) || ३८५ |- |४४०. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२८) || ३८६ |- |४४१. || बारडोली दिवस (५-६-१९२८) || ३८६ |- |४४२. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) || ३८७ |- |४४३. || पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (६-६-१९२८) || ३८७ |- |४४४. || पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) || ३८८ |- |४४५. || पत्र : वसुमती पण्डितको (६-६-१९२८) || ३८९ |- |४४६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (६-६-१९२८) || ३८९ |- |४४७. || पत्र : चीमनलाल वोराको (६-६-१९२८) || ३९० |- |४४८. || दोनों पहलू (७-६-१९२८) || ३९० |- |४४९. || नौ नकदन तेरह उधार (७-६-१९२८) || ३९३ |- |४५०. || दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय (७-६-१९२८) || ३९४ |- |४५१. || पत्र : कृष्णप्रसादको (७-६-१९२८) || ३९५ |}<noinclude></noinclude> edhwwmbqjnsmxvw645ormbxqenkmo06 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३० 250 187134 675175 671242 2026-08-30T09:43:02Z आदेश यादव 3609 675175 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|छब्बीस}}</noinclude>{|width=100% |- |४५२. || लेस्ली विलसनको लिखे गये पत्रका मसविदा (७-६-१९२८) || ३९६ |- |४५३. || पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (७-६-१९२८) || ३९८ |- |४५४. || पत्र : महादेव देसाईको (७-६-१९२८के पश्चात्) || ३९८ |- |४५५. || पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंग्टनको (८-६-१९२८) || ३९९ |- |४५६. || पत्र : स्वेन्सका किरकान्सको (८-६-१९२८) || ४०० |- |४५७. || पत्र : श्रीमती टी॰ मंजीयरलीको (८-६-१९२८) || ४०० |- |४५८. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-६-१९२८) || ४०१ |- |४५९. || पत्र : श्रीमती रचेल एम॰ रटरको (८-६-१९२८) || ४०१ |- |४६०. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-६-१९२८) || ४०२ |- |४६१. || पत्र : वसुमती पण्डितको (९-६-१९२८) || ४०२ |- |४६२. || पत्र : तैयब अलीको (९-६-१९२८) || ४०३ |- |४६३. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (९-६-१९२८) || ४०४ |- |४६४. || पत्र : केदारनाथ बनर्जीको (९-६-१९२८ के पश्चात्) || ४०४ |- |४६५. || शिक्षा–विषयक प्रश्न — २ (१०-६-१९२८) || ४०५ |- |४६६. || बारडोली यज्ञ (१०-६-१९२८) || ४०६ |- |४६७. || बारडोली दिवस (१०-६-१९२८) || ४०८ |- |४६८. || गोविन्द बड़े या गुरु? (१०-६-१९२८) || ४०९ |- |४६९. || संयमकी आवश्यकता किसे? ( १०-६-१९२८) || ४१० |- |४७०. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (१०-६-१९२८) || ४११ |- |४७१. || पत्र : जनकधारी प्रसादको (१०-६-१९२८) || ४१२ |- |४७२. || पत्र : आर्थर मूरको (१०-६-१९२८) || ४१३ |- |४७३. || पत्र : सदानन्दको (१०-६-१९२८) || ४१४ |- |४७४. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-६-१९२८) || ४१४ |- |४७५. || भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष (११-६-१९२८) || ४१५ |- |४७६. || पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (११-६-१९२८) || ४१८ |- |४७७. || पत्र : एस॰ मुराटोरीको (१३-६-१९२८) || ४१९ |- |४७८. || सत्याग्रह आश्रम || ४१९ |- |४७९. || बारडोलीकी बलि (१४-६-१९२८) || ४३२ |- |४८०. || बारडोलीका मामला क्या है? (१४-६-१९२८) || ४३३ |- |४८१. || अ॰ भा॰ च॰ संघकी सदस्यता (१४-६-१९२८) || ४३४ |- |४८२. || पत्र : रामदेवको (१५-६-१९२८) || ४३४ |- |४८३. || पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (१५-६-१९२८) || ४३५ |- |४८४. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१५-६-१९२८) || ४३६ |- |४८५. || पत्र : एस॰ रामनाथनको (१६-६-१९२८) || ४३६ |- |४८६. || पत्र : जी॰ रामचन्द्रनको (१६-६-१९२८) || ४३७ |- |४८७. || छुट्टियोंमें खादी सेवा (१७-६-१९२८) || ४३८ |}<noinclude></noinclude> 4z7zysooqg7cw7pc66w7f5igc8frl8c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३१ 250 187135 675178 671251 2026-08-30T09:46:34Z आदेश यादव 3609 675178 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|सताईस}}</noinclude>{|width=100% |- |४८८. || टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) || ४३८ |- |४८९. || गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) || ४४० |- |४९०. || शिक्षा विषयक प्रश्न — ३ (१७-६-१९२८) || ४४२ |- |४९१. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१७-६-१९२८) || ४४४ |- |४९२. || पत्र : सुरेन्द्रनाथ विश्वासको (१७-६-१९२८) || ४४५ |- |४९३. || पत्र : फ्लोरेंस के॰ क्रेब्सको (१७-६-१९२८) || ४४६ |- |४९४. || पत्र : एन॰ सी॰ बारदोलाईको (१७-६-१९२८) || ४४६ |- |४९५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-६-१९२८) || ४४७ |- |४९६. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१७-६-१९२८) || ४४८ |- |४९७. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (१७-६-१९२८) || ४४९ |- |४९८. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१७-६-१९२८) || ४५० |- |४९९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-६-१९२८) || ४५१ |- |५००. || पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१७-६-१९२८) || ४५१ |- |५०१. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (१८-६-१९२८) || ४५२ |- |५०२. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१८-६-१९२८) || ४५२ |- |५०३. || पत्र: मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१९-६-१९२८) || ४५३ |- |५०४. || पत्र : प्यारेलाल नैयरको (१९-६-१९२८) || ४५४ |- |५०५. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१९-६-१९२८) || ४५५ |- |५०६. || पत्र : के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम्को (१९-६-१९२८) || ४५५ |- |५०७. || पत्र : शंकरन्‌को (२०-६-१९२८) || ४५६ |- |५०८. || मुल्जिम न्यायाधीश बन बैठा (२१-६-१९२८) || ४५७ |- |५०९. || बारडोलीका घपला (२१-६-१९२८) || ४६२ |- |५१०. || टिप्पणियाँ: स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू; युवकोंके लिए लज्जास्पद; एक प्रशस्ति (२१-६-१९२८) || ४६६ |- |५११. || पत्र : जे॰ एम॰ सेनगुप्तको (२१-६-१९२८) || ४६८ |- |५१२. || पत्र : ईथल एंगसको (२२-६-१९२८) || ४६९ |- |५१३. || पत्र : रामलाल बलराम वाजपेयीको (२२-६-१९२८) || ४६९ |- |५१४. || पत्र : के॰ श्रीनिवासनको (२२-६-१९२८) || ४७० |- |५१५. || पत्र : देवी वेस्टको (२२-६-१९२८) || ४७१ |- |५१६. || पत्र : होरेस जी॰ अलेक्जेंडरको (२२-६-१९२८) || ४७१ |- |५१७. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२२-६-१९२८) || ४७३ |- |५१८. || पत्र : एस्थर मेननको (२२-६-१९२८) || ४७३ |- |५१९. || पत्र : बेन एम॰ चेरिंग्टनको (२२-६-१९२८) || ४७४ |- |५२०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२३-६-१९२८) || ४७६ |- |५२१. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२३-६-१९२८) || ४७६ |- |५२२. || पत्र : बेचर परमारको (२३-६-१९२८) || ४७७ |}<noinclude></noinclude> hisv61oc1ptonci9iodmk8a9l8ru2sn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३२ 250 187136 675182 671429 2026-08-30T10:15:00Z आदेश यादव 3609 675182 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|अठाईस}}</noinclude>{|width=100% |- |५२३. || शिक्षा विषयक प्रश्न — ४ (२४-६-१९२८) || ४७८ |- |५२४. || विनाशकाले (२४-६-१९२८) || ४८१ |- |५२५. || पशु–सुधार (२४-६-१९२८) || ४८४ |- |५२६. || शब्दकोष (२४-६-१९२८) || ४८४ |- |५२७. || पत्र : सदानन्दको (२४-६-१९२८) || ४८५ |- |५२८. || पत्र : लिली मुथु कृष्णाको (२४-६-१९२८) || ४८६ |- |५२९. || पत्र : नीलकण्ठ बाबूको (२४-६-१९२८) || ४८६ |- |५३०. || पत्र : के॰ नटराजन्को (२४-६-१९२८) || ४८७ |- |५३१. || पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (२५-६-१९२८) || ४८८ |- |५३२. || पत्र : रामनाथको (२७-६-१९२८) || ४८९ |- |५३३. || पत्र : गोवर्धनभाई आई॰ पटेलको (२७-६-१९२८) || ४८९ |- |५३४. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२७-६-१९२८) || ४९० |- |५३५. || पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (२७-६-१९२८) || ४९१ |- |५३६. || एक संशोधन (२८-६-१९२८) || ४९२ |- |५३७. || पर्दा दूर हुआ समझो (२८-६-१९२८) || ४९२ |- |५३८. || पत्र : पार्वतीको (३०-६-१९२८) || ४९४ |- |५३९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३०-६-१९२८) || ४९५ |- |५४०. || पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-६-१९२८) || ४९५ |- |५४१. || पत्र : कुवलयानन्दको || ४९६ |- | || परिशिष्ट |- | ||{{gap|1em}}१. विदेशोंमे प्रचार || ४९७ |- | ||{{gap|1em}}२. वी॰ ए॰ श्री निवास शास्त्रीका समुद्रीतार || ५०० |- | ||{{gap|1em}}३. बारडोलीका मामला क्या है? || ५०२ |- | || सामग्री के साधन–सूत्र || ५०५ |- | || तारीखवार जीवन–वृत्तान्त || ५०६ |- | || शीर्षक–सांकेतिका |- | || सांकेतिका |}<noinclude></noinclude> azewb596aemxbzh68zu86mr50s2rcqw 675186 675182 2026-08-30T10:31:10Z आदेश यादव 3609 675186 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|अठाईस}}</noinclude>{|width=100% |- |५२३. || शिक्षा विषयक प्रश्न — ४ (२४-६-१९२८) || ४७८ |- |५२४. || विनाशकाले (२४-६-१९२८) || ४८१ |- |५२५. || पशु–सुधार (२४-६-१९२८) || ४८४ |- |५२६. || शब्दकोष (२४-६-१९२८) || ४८४ |- |५२७. || पत्र : सदानन्दको (२४-६-१९२८) || ४८५ |- |५२८. || पत्र : लिली मुथु कृष्णाको (२४-६-१९२८) || ४८६ |- |५२९. || पत्र : नीलकण्ठ बाबूको (२४-६-१९२८) || ४८६ |- |५३०. || पत्र : के॰ नटराजन्को (२४-६-१९२८) || ४८७ |- |५३१. || पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (२५-६-१९२८) || ४८८ |- |५३२. || पत्र : रामनाथको (२७-६-१९२८) || ४८९ |- |५३३. || पत्र : गोवर्धनभाई आई॰ पटेलको (२७-६-१९२८) || ४८९ |- |५३४. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२७-६-१९२८) || ४९० |- |५३५. || पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (२७-६-१९२८) || ४९१ |- |५३६. || एक संशोधन (२८-६-१९२८) || ४९२ |- |५३७. || पर्दा दूर हुआ समझो (२८-६-१९२८) || ४९२ |- |५३८. || पत्र : पार्वतीको (३०-६-१९२८) || ४९४ |- |५३९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३०-६-१९२८) || ४९५ |- |५४०. || पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-६-१९२८) || ४९५ |- |५४१. || पत्र : कुवलयानन्दको || ४९६ |- | || परिशिष्ट || |- | ||{{gap|1em}}१. विदेशोंमे प्रचार || ४९७ |- | ||{{gap|1em}}२. वी॰ ए॰ श्री निवास शास्त्रीका समुद्रीतार || ५०० |- | ||{{gap|1em}}३. बारडोलीका मामला क्या है? || ५०२ |- | || सामग्री के साधन–सूत्र || ५०५ |- | || तारीखवार जीवन–वृत्तान्त || ५०६ |- | || शीर्षक–सांकेतिका || |- | || सांकेतिका || |}<noinclude></noinclude> 70wvuyz97dueiqhcccoy87fcg4qijmr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६४ 250 187244 675202 671382 2026-08-30T11:19:45Z रितु कुमारी साव 6333 675202 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''११७. पत्र : के० राजगोपालाचारीको'''}}}} {{Right|दौरेपर<br>२३ फरवरी, १९२७}} {{Left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। मंसूखीके दस्तावेजकी साफ प्रति ठीकसे हस्ताक्षर करके में इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ। {{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो० क० गांधी'''}} सहपत्र : १<br>श्रीयुत के० राजगोपालाचारी<br>खद्दर स्टोर<br>गांधी स्ट्रीट <br>तिरुपति<br>(जिला चित्तूर) {{Left|अंग्रेजी (जी० एन० ५६७०) की फोटो नकलसे।|2em}} {{C|{{larger|'''११८. भाषण : पंढरपुरमें'''<ref>महादेव देसाईंकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}} {{Right|[२३ फरवरी, १९२७]<ref>गांधीजी इस तारीख को पंढरपुरमें थे। देखिए “पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको”, २१-२-१९२७। </ref>}} '''पंढरपुरके मंदिरके अधिकारियोंको किसी प्रकार यह खबर लग गई थी कि गांधीजी वहाँ किसी यूरोपीय मित्रके साथ आ रहे हैं और वे इस सोचमें पड़े थे कि अगर वे बनारसको तरह यहाँ भी उस यूरोपीय मित्रको साथ लेकर मन्दिरमें प्रवेश करना चाहेंगे, तो हम क्या करेंगे। मण्डलीमें किसी यूरोपीय को न देखकर जरूर ही उनके दिलका बोझ उतर गया होगा। मगर गांधीजीने अपने भाषण में इस बातकी चर्चा खास तौरपर की। उन्होंने कहा:''' मुझे खेद है कि आज मेरे साथ न तो वह बौद्ध बहन है जो बनारसमें थी और न वह अछूत लड़की ही, जिसे मैंने गोद लिया है। मगर आप लोग विश्वास रखें कि अगर वे मेरे साथ होतीं, तो में उनके बिना अकेला मन्दिरमें न जाता। अगर में उन्हें<noinclude></noinclude> 4h6uf9m7dcnrl2qmo0jqx5sorua4olk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५६९ 250 187413 674989 645833 2026-08-29T16:43:43Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674989 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}}} {{Multicol}} {{outdent|अपील, -दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंसे, ३५२-५३; - भारतीय जनताके नाम, ३९८-४००}} {{outdent|एक पत्र, २४५, ३७३, ४३५, ४४२, ४७९}} {{outdent|गाय और भैंस, ३७९-८०; की रक्षा कैसे करें ? ४४५; - बनाम भैंस, ३१५-१८}} {{outdent|गोरक्षा, की शर्तें, २१३-१५; -कैसे करें ? ४२१-२३}} {{outdent|टिप्पणियाँ, २३-२५, १३०-३५, २९३-९४, ३२९-३२, ३५४, ४००-१, ४८७}} {{outdent|तार, –घनश्यामदास बिड़लाको, ३०९; -चित्तरंजन अस्पतालके मन्त्रीको, ५०९; -जमनालाल बजाजको, ४०; -ब्रिटिश भारतीय संघको, ४६५; -मीराबहनको, ३०४, ४७२, ४९७; - लुइस डाएलको, ३५२; - सत्याग्रह आश्रमको, ३१०, ४७९}} {{outdent|दीक्षान्त भाषण, -बिहार विद्यापीठ, पटनामें, २९-३२}} {{outdent|पत्र, -अ० भा० च० संघके मन्त्रीको, ४५७, ४६०-६१, ५१५-१६; -अब्बास तैयबजीको, ५६, ३८२-८३; -अमृतलालको, २४१-४२; - अमृतलाल वि० ठक्करको, १२३, २२४-२५; - अमेरिकी बैप्टिस्ट मिशनके मैनेजरको, ५००; -आनन्दी, मणि, तारा, चन्दनको, ५३; - आयुर्वेदिक सम्मेलनके मन्त्रीको, ३१२-१३; -आर० बी० ग्रेगको, २७९-८२, ३४२, ४०५-९, ४२५-२७; {{multicol-break}} -आर० सुब्रह्मण्यमको, ५०२; -आश्रमकी बहनोंको, ६-७, ३८, ५८-५९, १११, ११८, १३९, १९३-९४, २१७, २४८-४९, २६२, २७५, ३०६-७, ३२७, ३५९-६०, ३९०, ४२९, ४७०, ५०७-८; - आश्रमके बच्चोंको, २२१, २३१, ३९०; -आश्रमवासियोंको, ११७-१८; - इंडियन इन्फोरमेशन सेंटरके मन्त्रीको, ५०९-१०;}} {{outdent|-इकारोजको, १०९; - इम्पीरियल इंडियन सिटिजनशिप एसोसिएशनके मन्त्रीको, ४३०-३१; - ईजाबेल बमलेटको, ३२६-२७, ३८१; -उत्तम भिक्षुको, ५०१; -एच० कैलेनबेकको, ३३९-४०; -एच० क्लेटनको, ३४२, ३९५-९६, ४९८-९९; -एच० हरकोर्टको, ४३८-३९; - एन० एच० तेलंगको, ३५७; - एम० एम० गिडवानीको, ४५१; -एम० एस० केलकरको, ४१६-१७, ४५८; - एम० के० सहस्रबुद्धेको, ४९६; - एस० टी० शेपर्डको, ४९८; - एस० डी० नादकर्णीको, ४६१-६२; - एस० श्रीनिवास आयंगारको, ३७०-७१; -एस्थर मेननको, २०९; -कुमीको, ४७०-७१, ४८६; -कुवलयानन्दको, २६२-६३, ४८५; -के० टी० पालको, ४२८-२९; -के० राजगोपालाचारीको, १२६; - क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको, ७९-८०, १०८, १६९, २७८-७९; - खानचन्द ऐदास आर० कोबको, ४३३; - गंगादेवी सनाढ्यको, ३६१; - गंगाधर}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> ew4pyqddac0ivpd1zua0i3mzo2k2vgo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५७० 250 187414 674994 645834 2026-08-29T16:55:04Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674994 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|५३२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} {{Multicol}} {{outdent|शास्त्री जोशीको, ४६९; –गंगाबहन झवेरीको, ३५१; –गंगाबहन वैद्यको, ७, १८७-८८, २३६, २४६, २६१; –गंगारामको, ३२०-२१; –गंगूबहनको, ४५८-५९; –गुलजारीलाल नन्दाको, ४१२-१४; ५१२-१४; –गोकलभाईको, २४०; –गोपालदासको, ५०२-३; –गोसी बहनको, ४५१-५२; –घनश्यामदास बिड़लाको, ९, ११९-२०, १२०, १८८-८९, ३७७, ४४०-४२, ४९४-९५; –च० राजगोपालाचारीको, ११२; –चन्द त्यागीको, २२३; –चिनाईको, ३४९-५०; –चीनी छात्र संघको, ३४१; –छगनलाल गांधीको, २७५-७६, ३७१; –जगजीवनदास नारायणदास मेहताको, २९९; –जमनाबहनको, २८६; –जमनालाल बजाजको, ७२, ९७, १०६-७, ११९, २१९, ४८०; –जयरामदास दौलतरामको, ४३६; –जवाहरलाल नेहरूको, ३९२-९४; –जानकीदेवी बजाजको, ७४, २२९-३०; –जॉर्जेस मिग्ननको, ३७४; –जी० ए० नटेसनको, १७०; –जी० के० तिलकको, १९३; –जुगलकिशोरको, ४३०; –जे० डब्ल्यू० पेटावेलको, ५१४; –जे० पी० भणसालीको, ४३९-४०; –जे० फंड लॉजको, ५१०; –जे० भीमरावको, ५००-१; –जेठालालको, ३४५; –जेन हॉवर्डको, ४०३; –टी० एन० शर्माको, ४२७; –डा० थॉमसनको, ५११-१२; –डा० बी० एस० मुंजेको, ३४७-४८; –तरुणचन्द्र सिन्हाको, ४३४; –तारा मोदीको, ३६०, ४१८; –तारिणी-}} {{multicol-break}} {{outdent|प्रसाद सिन्हाको, २६९, ३१२; –तुलसी मेहरको, ४३७, ४८६-८७; –तोताराम सनाढ्यको, ३९६; –द० बा० कालेलकरको, २२०; –दामोदर लक्ष्मीदासको, २४५; –देवचन्द पारेखको, ३११; –देवेश्वर सिद्धान्तालंकारको, ३८६-८८; –धनगोपाल मुखर्जीको, ४१४; –नरगिस कैप्टेनको, ४२४; –नर्मदाको, ३८८; –ना० मो० खरेको, १३९-४०; –नानाभाई इ० मशरूवालाको, ८२-८३, ९२-९३, ११५, १४१-४२; –नानाभाईको, २४०; –नानालाल कविको, २३९; –नारणदास गांधीको, ९५-९६, १३५, २४३-४४, २७३-७४; –नीमूको, ३००-१; –पी० ए० वाडियाको, ८१, १४७-४८; –पी० जे० रेड्डीको, ३४०-४१; –पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको, १२१; –प्यारेलाल नैयरको, २१९; –प्रभावतीको, ४१, ४२, १३६, २५७; –प्रभुदयालको, १०७; –फीरोज पी० एस० तलियारखाँको, ४७७; –फूलचन्द शाहको, ७३-७४, १८६-८७, २३४-३५, २८२-८४, ३२८-२९, ३७२; –फ्रांसिस्का स्टेंडेनथको, ४०३-४; –बनारसीदास चतुर्वेदीको, ३५७-५८; –बसन्तकुमार राहाको, ४३४-३५; –बी० एफ० मदानको, ८०-८१, १२२; –बेसिल मैथ्यूजको, ४८३; –ब्रजकिशोरप्रसादको, ४१-४२; –ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको, ९०, १२३-२४; –मगनलाल गांधीको, ८, ११, ३९, ४०, ४२-४३, ४३-४४, ५४, ५७, ५८, ९०, ११५-१७, १७१, १७३, २१६-१७, २२९, २७६-७७,}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8vbh8zysm9n0cpnhawwwodixwgulyur पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५७१ 250 187415 674996 645835 2026-08-29T16:59:06Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 674996 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||शीर्षक सांकेतिका| ५३३}} {{Multicol}} {{outdent|२८६, ४०९-१०; –मणिबहन पटेलको, ५२-५३, ७१, ९४-९५, २११, २१८, २७४, २९८, ३०६, ३०७-८, ३४४-४५, ३७६; –मणिलाल और सुशीला गांधीको, २२२, ३२८, ४७६; –मणिलाल गांधीको, ६०-६१, ९१-९४, ११४, १४०-४१, १५४, १६०; –मणिलाल नथुभाई दोषीको, ४४२-४४; –मथुरादास त्रिकमजीको, १०९, ३०८, ३२३, ३४९; –ममा डी० सारेवाको, १६७, १८६; –महाराजा नाभाको, ४१५; –मीराबहनको, ५-६, ३६-३७, ५५-५६, ७८-७९, ८८-८९, ९६, ११३, १३७-३८, १५८, १६८, १७०, १९४-९५, २२३, २२८, २४६-४७, २४९-५०, २६०-६१, २६९-७०, २७८, २८५, २९७-९८, ३०३, ३०४-५, ३१४, ३१९-२०, ३२३, ३३८, ३५८-५९, ३८९, ४१०-१२, ४२३-२४, ४५२-५४, ४७३-७४, ४८१-८२, ५०३-४; –मु० अ० अन्सारीको, २९४-९६, ३७५; –मूलचन्द अग्रवालको, ३६३; –मोतीलाल नेहरूको, ३४६-४७, ३९४; –मूरियल लेस्टरको, १८१, २७१-७३, ४८२; –राधाको, २१८, ३९१; –रामदासको, २३०; –रामदास गांधीको, ५९, ३०२, ४६२-६३; –रामेश्वरदास पोद्दारको, ९४, ४६५-६६, ५०७; –रुस्तमजीको, ४७८; –रेवरेंड जॉन होम्सको, ३२२; –रेवरेंड स्टेनली जोन्सको, १८५; –रेहाना तैयबजीको, ४५६-५७; –लक्ष्मीदासको, ४१९; –लाजपतरायको, ३०२, ३०३; –लारा आई०}} {{multicol-break}} {{outdent|फिचको, १३७; –लालचन्द जयचन्द वोराको, १; –वल्लभभाई पटेलको, २-३; –वसुमती पण्डितको, ३७४, ४१७, ४९७; –वा० गो० देसाईको, २१५-१६; –वि० ल० फड़केको, १८४-८५, ३९१-९२; –विट्ठलदास जेराजाणीको, ३९; –विलियम स्मिथको, ५०८-९; –वो० ए० सुन्दरमको, ५९; –वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको, २३२, २५५, ३१३, ३५५, ४३८, ४६१; –वेलावहनको, २२१; –व्यास रावको, ४५५; –शम्भुलालको, २४३; –शापुरजी सकलातवालाको, ३२४-२६, ३७२; –शारदाबहन कोटकको, ४६३-६४; –श्री० दा० सातवलेकरको, २३३-३४, २४८, २५६-५७, ४५९-६०; –श्रीप्रकाशको, ४०४, ५११; –सतकोड़ीपति रायको, ३६८-७०, ५०४-६; –सतीशचन्द्र दासगुप्तको, १०१, १०५-६, १०७-८, १५७, १६९-७०, २११-१२, २३९, २७१, ३१०, ३६१-६३, ४०१-२, ४३१-३२, ४९५-९६; –सतीशचन्द्र मुखर्जीको, २१५; –सी० एफ० एन्ड्रयूजको, ४७४-७६; –सी० नारायणरावको ३५६; –सी० विजयराघवाचारियरको, ४३२-३३; –सीताराम पुरुषोत्तम पटवर्धनको, ३०१; –सुमन्त मेहताको, २९९; –सुरेन्द्रको, २५०; –सुशीलाबहन मशरूवालाको, ८२, ८७, १४२-४३; –सैम हिगिनबाटमको, ४२८, ४९९-५००; –सोंजा श्लेसिनको, ३८१-८५; –हरिइच्छा तथा अन्य लोगोंको, १५६, २५८; –हरिभाऊ}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> g4ho9g43mt2af8ra4xv7dyvabz4omyu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३ 250 187435 675207 645855 2026-08-30T11:45:19Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675207 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || तेरह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || पन्द्रह |- | १. || पत्र : लालचन्द जयचन्द वोराको ||(२१-१-१९२७) || १ |- । २. || भाषण : मोतीहारीमें || (२२-१-१९२७) || २ |- ३. पत्र : वल्लभभाई पटेलको (२३-१-१९२७) ४. भाषण : बेतियामें (२३-१-१९२७) ५. पत्र : मीराबहनको (२४-१-१९२७) ६. पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२४-१-१९२७) ७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२४-१-१९२७) ८. पत्र : मगनलाल गांधीको (२४-१-१९२७) ९. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२४-१-१९२७) १०. प्रश्नोंके उत्तर (२४-१-१९२७ के पश्चात् ) ११. पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-१-१९२७) 8826 १२. भेंट : 'फ्री प्रेस ऑफ इंडिया' के प्रतिनिधिसे ( २५-१-१९२७) १३. भाषण : मुजफ्फरपुरके मिशन स्कूलमें ( २५-१-१९२७) १४. भाषण : मुजफ्फरपुरके तिलक मैदानमें ( २५-१-१९२७) १५. भाषण : मुजफ्फरपुरके विद्यार्थियोंकी सभायें (२५-१-१९२७) १६. भाषण : बेगुसरायकी सार्वजनिक सभामें (२६-१-१९२७) १७. राष्ट्रीय शालाएँ (२७-१-१९२७) १८. टिप्पणियाँ: एक भली अंग्रेज महिला; अस्पतालोंमें खादी; खादी कार्य- कर्त्ताओंसे बिना ज्ञानके समझना ( २७-१-१९२७) , १९. भाषण : खड़गपुरमें (२७-१-१९२७) पृष्ठ पाँच तेरह पन्द्रह १ २ २ ३ ५. १० ११ १२ १२ १३ १६ १९ २१ २३ २५ २०. भाषण : जमुई में ( २७-१-१९२७) २७ २१. सम्मति: वनिता विश्राम, शाहबादकी दर्शक पुस्तिका में (२८-१-१९२७) २८ २२. दीक्षान्त भाषण : बिहार विद्यापीठ, पटनामें (३०-१-१९२७) २९ २३. भाषण : पटनामें, खादी प्रदर्शनीके उद्घाटनपर (३०-१-१९२७) ३३ २४. पत्र : मीराबहनको (३१-१-१९२७) २५. पत्र : आश्रमकी बहनोंको (३१-१-१९२७) ३६ 32 m wr w ३८ बंगाल. अमावा- १३. M1 DEC 160 Gandhi heritage Portal<noinclude></noinclude> nywt3iipa7ym8v91id1q8ep83h8d9gx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४० 250 187492 674917 645924 2026-08-29T12:01:14Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} समस्यासे निकलनेका भी एक उपाय है। आप फौजपर खर्च होनेवाले करोड़ों-करोड़ रुपयेमें से २५ करोड़ निकाल दें। फौजपर होनेवाला खर्च दिनों-दिन बढ़ता ही रहा है। आप यदि एक सारणी बनाकर देखें तो पता चलेगा कि इस खर्चमें किस तरह बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। उस खर्चमें आप काफी कटौती कर सकते हैं। मैं इसके राजनीतिक इतिहासकी बात यहाँ नहीं करूँगा। आबकारीसे होनेवाली आमदनीमें जितना भी घाटा पड़े, उसकी पूर्ति फौजपर होनेवाले खर्चकी कटौतीसे ही होनी चाहिए, अन्य किसी मदसे नहीं। इसके लिए अतिरिक्त कर नहीं लगाये जाने चाहिए। उसका नतीजा यह होगा कि दस सालके अरसेमें ही सरकारकी आमदनीमें काफी अधिक वृद्धि हो जायेगी। मद्य-निषेधका प्रयोग करनेवाले देशोंका भी यही अनुभव है। मद्यपान कायम रहनेसे जिनका स्वार्थ-साधन होता है, वे अखबारोंमें इस आशयके लेखादि प्रकाशित करवाते रहते हैं कि अमेरिकामें पूर्ण मद्य-निषेध सर्वथा असफल रहा है। आप उनपर विश्वास मत कीजिए। भारतमें जो अमेरिकी आते हैं उनमें शायद ही कोई ऐसा हो जो मुझसे मिले बिना देश लौटता हो। इन अमेरिकी लोगों और वहाँकी मद्य-निषेध लीगद्वारा प्रकाशित साहित्यसे इस बातका पूरा प्रमाण मिलता है कि मद्य-निषेधका परिणाम देशके लिए कुल मिलाकर लाभदायक रहा है। हाँ, यह सच है कि उसके उतने शानदार, बड़े-बड़े परिणाम नहीं निकल पाये जितने उन्होंने सोच रखे थे। अमेरिकामें लोकमतका कोई भी हिस्सा मद्य-निषेध उठा लिये जानेका समर्थक नहीं है। उनकी अपनी सरकार है और लोग वहाँकी वस्तुस्थितिसे सन्तुष्ट हैं। वहाँका मजदूर संयम और ईमानदारीका जीवन बिताता है। क्या राजस्वकी हानिका औचित्य ठहरानेके लिए इतना पर्याप्त नहीं? संसारके एक अन्य भागमें ऐसी परिस्थिति है, पर दुर्भाग्यकी बात कि भारतमें नहीं है। मद्य-निषेधका परीक्षण करनेवाले देशोंका अनुभव यह है कि उससे लोग पहलेकी अपेक्षा ज्यादा अच्छे बन गये और देशको कोई बहुत बड़ी आर्थिक हानि भी नहीं हुई। यदि भारतमें मद्य-निषेध कर दिया जाये तो यहाँ भी कोई मुसीबत, कोई आर्थिक संकट नहीं आ जायेगा। हममें से प्रत्येकका यह पवित्र कर्त्तव्य है कि हमसे बन पड़े तो हम देशसे शराबखोरीको बिलकुल ही दूर कर दें। यदि मेरे हाथमें शक्ति होती और मेरी चलती तो मैं आज ही ऐसा कर दिखाता। अब मैं धरनेका प्रश्न लेता हूँ। मैं मानता हूँ कि कुछ धरनोंमें हिंसासे काम लिया गया था; लेकिन सरकारने धरनोंको बरदाश्त नहीं किया, इसका असली कारण यही था कि उससे उसकी आमदनी घटती थी। बिहारके लोगोंने एकाएक शराब छोड़ दी और निष्ठापूर्वक धरनेका समर्थन करने लगे। असममें भी यही हुआ। कुछ दिनोंके लिए अफीमचियोंके अड्डोंपर ताले पड़ गये। सरकार यह सब भला चुप बैठी कैसे देख सकती थी? धरने उपयोगी और आवश्यक थे, और इससे भारतको काफी लाभ हुआ, इस बातके काफी प्रमाण मौजूद थे। इसने सिद्ध कर दिया कि मद्य-निषेध सम्भव है। अमेरिकामें मद्य-निषेधने जबरदस्त आध्यात्मिक जागृतिको जन्म दिया है। लेकिन अमेरिकामें वह आध्यात्मिक चेतना पैदा करनेका काम काफी कठिन था।<noinclude></noinclude> a526np5rbiszbsrkyvtzez7eyyfhmgc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४१ 250 187493 674918 645925 2026-08-29T12:05:57Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : हिन्दी प्रचार कार्यालयमें|५०५}} परन्तु भारतमें तो उस कठिनाईका सौवाँ भाग भी हमारे सामने नहीं है। उनको तो अमेरिकी लोगोंके सहज स्वभावपर विजय पानी थी। पर हमारे यहाँ तो वैसी बात नहीं। यहाँ तो वातावरण मद्य-निषेधके पक्षमें है। इसलिए यहाँ उतनी सावधानीसे चलनेकी जरूरत नहीं। आरामकुर्सियोंमें घर बैठे-बैठे राजनीति बघारनेवाले राजनीतिज्ञोंको देशकी हालतकी कोई जानकारी नहीं रहती और इसीलिए वे अमेरिकी और भारतीय जीवनके तौर-तरीकोंमें कोई भेद नहीं देख पाते। वे यह नहीं समझ पाते कि इस देशमें मद्य-निषेध सम्पन्न करनेके लिए बस इतना ही दरकार है कि हमारे अन्दर सच्ची इच्छा और साहस हो। मैं शराब और अफीममें एक भेद मानता हूँ। अफीम आदमीको काहिल और मूर्ख बना देती है और शराब उसे पशु बना देती है। स्त्री यह ज्यादा पसन्द करेगी कि उसका पति बजाय शराबी होनेके मूर्ख हो। चिकित्साके कामके लिए ब्रांडी या किसी किस्मकी शराबके प्रयोगकी छूट देनेके लिए मैं राजी हूँ। मैं इंग्लैंड और भारतमें भी भेद करता हूँ। इंग्लैंडके लिए जो चीज अच्छी है, वह भारतके लिए भी अच्छी हो, यह जरूरी नहीं। यदि हम शराबखोरीके इस अभिशापको बरकरार रहने देंगे तो भावी पीढ़ियाँ हमें कोसेंगी। :[अंग्रेजीसे] :'''हिन्दू,''' ६-९-१९२७}} {{c|{{larger|'''४१६. भाषण : हिन्दी प्रचार कार्यालयमें'''<ref>यह भाषण दो मानपत्रोंके उत्तरमें दिया गया था। इनमें से एक हिन्दी प्रेमी मण्डलके सदस्यों और दूसरा हिन्दी प्रचार प्रेसके कर्मचारियोंने भेंट किया था।</ref>}}}} {{right|६ सितम्बर, १९२७}} गांधीजीने कहा कि इस संस्थासे कोई मानपत्र ग्रहण करना मेरे लिए बेमानी है, क्योंकि इसे तो मैं अपनी ही संस्था मानता हूँ। फिर भी इस विषयमें मैं आपके विचारको समझता हूँ। अबतक यह एक ऐसा बच्चा था, जिसका लालन-पालन और देख-भाल उत्तरके उदार लोग करते थे। अब यह एक ऐसा नौजवान बन गया है, जिसको अपनी देख-भाल खुद करनी चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए। मेरा मतलब यह है कि अबसे दक्षिण भारतके लोग दक्षिणसे ही पर्याप्त पैसा इकट्ठा करें जिससे यह संस्था आत्मनिर्भर बन सके। मैं मारवाड़ियों, गुजरातियों और उत्तरके दूसरे जो लोग यहाँ रहते हैं, उन सबसे यह अनुरोध करता हूँ कि वे इस संस्थाको अपनी संस्था मानें और हर तरहसे इस कामकी ओर अधिक ध्यान दें। मारवाड़ी लोग स्वभावसे ही व्यापारी होते हैं और मैं चाहता हूँ कि वे इस संस्थाके कार्यकर्त्ताओंमें व्यापार-बुद्धि जगाकर इसे समृद्ध और सफल बनानेमें सहायता दें। मैं चाहूँगा कि वे इसके हिसाब-किताबको, जिसको<noinclude></noinclude> 53yb07bqpm5qxmx6i89pq27j8s07y1c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४२ 250 187494 674919 645926 2026-08-29T12:10:12Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} देखनेकी जनताको पूरी छूट है, जाँच करें और यदि उसमें किसी प्रकारके सुधारके लिए कोई सुझाव देना जरूरी हो तो दें। अन्तमें मैं प्रचारकोंसे यह कहना चाहता हूँ कि इस तरहके अन्य कार्योंकी तरह ही हिन्दी-प्रचारके कार्यमें वे तभी सफल हो सकते हैं जब आदर्श जीवन व्यतीत करें और उनमें चारित्रिक दृढ़ता हो। इस तरहके कार्यकर्त्ताओंके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि उनमें अपने कामको सफल बनानेके लिए जुटे रहनेकी दृढ़ता और संकल्पका गुण हो। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि अबतक सभी प्रचारकोंने इसे अपने जीवनका परम उद्देश्य नहीं बना लिया हो तो अब वे अवश्य बना लेंगे। :[अंग्रेजीसे] :'''हिन्दू,''' ६-९-१९२७}} {{c|{{larger|'''४१७. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{right|[७ सितम्बर, १९२७]<ref>इसे स्पष्ट करते हुए मीराबहनने लिखा है : "उस समय मुझे मलेरियाका तेज बुखार आ रहा था; मेरा तापक्रम १०५° से भी अधिक हो गया था।"</ref>}} {{left|चि० मीरा,}} मैं बड़ी आकुलतासे तुम्हारे तारोंकी राह देखता हूँ। तार आते भी हैं, लेकिन उनमें मुझे मनको आश्वस्त करनेवाला समाचार नहीं मिलता। लेकिन हमको शिकायत नहीं होनी चाहिए। रुग्णताका भी कुछ लाभ उठाना चाहिए और उसे प्रसन्नतापूर्वक झेलना चाहिए। तुम्हारा आखिरी तार अभी-अभी मिला। उसमें बताया गया है कि अब शायद ज्वर काबूमें आ गया है। ईश्वर करे, ऐसा ही हो। मैं अक्सर तुम्हें तार देनेकी सोचता हूँ, लेकिन फिर अपने मनसे कहता हूँ कि मुझे ऐसा करनेका अधिकार नहीं है। लेकिन मेरी शुभकामनाएँ और मेरे आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ हैं। सुख और दुःखको समभावसे स्वीकार करना, यही 'गीता' की सीख है। {{right|सस्नेह, बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२७१) से। सौजन्य : मीराबहन<noinclude></noinclude> gwpq5xknczi9163dzsqixsfc8hmq19p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४३ 250 187495 674920 645927 2026-08-29T12:15:09Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेवाले स्वयंसेवकोंसे|५०७}} {{c|{{larger|'''४१८. बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे'''}}}} {{right|मद्रास ६ और ७ सितम्बर, १९२७}} आज हम महात्मा गांधीकी स्वीकृतिसे नीलकी मूर्ति हटानेके आन्दोलनसे सम्बन्धित स्वयंसेवकोंकी उनके साथ हुई बातचीतकी पूरी रिपोर्ट छाप रहे हैं। बातचीत मद्रासमें मंगलवार और बुधवारको हुई थी। 'हिन्दू' का प्रतिनिधि बातचीतके दौरान उपस्थित था। उसने वहीं-के-वहीं सारी बातचीतको दर्ज कर लिया था। फिर उसकी लिखी चीजका महात्मा गांधीने संशोधन किया। तमिलनाड स्वयंसेवक दलके कोई २० सदस्योंने, जो इन दिनों नगरसे नीलकी मूर्ति हटवानेके आन्दोलनमें लगे हुए हैं, मंगलवारको तीसरे पहर इस विषयपर घंटे-भरसे कुछ अधिक समयतक महात्मा गांधीसे बातचीत की। उस दिन बातचीत खत्म नहीं हो सकी और फिर उन्होंने अगले दिन भी बातचीत की। श्री के० कुलन्दाईने इन नौजवानोंके नेताके रूपमें महात्माजीको अपना परिचय देते हुए बताया कि वे इस आन्दोलनमें कैसे पड़े। उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेटने इन युवकोंको जो अमानवीय दण्ड सुनाया उससे उनका मन बहुत त्रस्त और व्यथित हो गया और उन्हें लगा कि एक कांग्रेसी और जिला कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीके नाते इन्हें सहायता और सलाह देना उनके लिए जरूरी है। उन्होंने बताया कि वे किसी प्रतिज्ञासे बँधे हुए नहीं हैं और अपनेको गिरफ्तार भी नहीं करवा रहे हैं। गांधीजी : इस सम्बन्धमें शायद एक या दो लोगोंको दो-दो वर्षके कठोर कारावासका दण्ड दिया गया है न? श्री कुलन्दाईने इसका उत्तर 'हाँ' में देते हुए कहा कि हमारे हस्तक्षेपके परिणामस्वरूप बहुत कठोर दण्ड नहीं दिया गया। कुलन्दाई : अबतक इस सम्बन्धमें २७ लोग जेल जा चुके हैं, जिनमें से दो महिलाएँ हैं। इनमें से अधिकांशने मदुरामें, तलवार सत्याग्रहके नामसे प्रसिद्ध आन्दोलनमें भाग लिया था। इस दलमें कुल २०० व्यक्ति शामिल हैं। ये मुख्यतः मदुरा और रामनाड जिलोंके हैं। नीलकी मूर्तिको तोड़नेकी बात पहले-पहल किसके मनमें आई? उत्तरमें बताया गया कि यह बात पहले-पहल सोमयाजुलु और श्रीनिवास-वरदनके मनमें आई। यह मदुरा आन्दोलनकी विफलताके बादकी बात है न?<noinclude></noinclude> if9nfadk0npxq1k9sz4t5zs5owjdamm 674972 674920 2026-08-29T16:12:03Z Somya Shaw 6839 674972 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude> {{c|{{larger|'''४१८.बातचीत:नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवालेस्वयंसेवकोंसे'''}}}} {{right|मद्रास<br> ६ और ७ सितम्बर, १९२७}} '''आज हम महात्मा गांधीकी स्वीकृतिसे नीलकी मूर्ति हटानेके आन्दोलनसे सम्बन्धित स्वयंसेवकोंकी उनके साथ हुई बातचीतकी पूरी रिपोर्ट छाप रहे हैं। बातचीत मद्रासमें मंगलवार और बुधवारको हुई थी। 'हिन्दू' का प्रतिनिधि बातचीतके दौरान उपस्थित था। उसने वहीं-के-वहीं सारी बातचीतको दर्ज कर लिया था। फिर उसकी लिखी चीजका महात्मा गांधीने संशोधन किया।''' '''तमिलनाड स्वयंसेवक दलके कोई २० सदस्योंने, जो इन दिनों नगरसे नीलकी मूर्ति हटवानेके आन्दोलनमें लगे हुए हैं, मंगलवारको तीसरे पहर इस विषयपर घंटे-भरसे कुछ अधिक समयतक महात्मा गांधीसे बातचीत की। उस दिन बातचीत खत्म नहीं हो सकी और फिर उन्होंने अगले दिन भी बातचीत की।''' '''श्री के० कुलन्दाईने इन नौजवानोंके नेताके रूपमें महात्माजीको अपना परिचय देते हुए बताया कि वे इस आन्दोलनमें कैसे पड़े। उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेटने इन युवकोंको जो अमानवीय दण्ड सुनाया उससे उनका मन बहुत त्रस्त और व्यथित हो गया और उन्हें लगा कि एक कांग्रेसी और जिला कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीके नाते इन्हें सहायता और सलाह देना उनके लिए जरूरी है। उन्होंने बताया कि वे किसी प्रतिज्ञासे बँधे हुए नहीं हैं और अपनेको गिरफ्तार भी नहीं करवा रहे हैं।''' गांधीजी : इस सम्बन्धमें शायद एक या दो लोगोंको दो-दो वर्षके कठोर कारावासका दण्ड दिया गया है न? '''श्री कुलन्दाईने इसका उत्तर 'हाँ' में देते हुए कहा कि हमारे हस्तक्षेपके परिणामस्वरूप बहुत कठोर दण्ड नहीं दिया गया।''' '''कुलन्दाई : अबतक इस सम्बन्धमें २७ लोग जेल जा चुके हैं, जिनमें से दो महिलाएँ हैं। इनमें से अधिकांशने मदुरामें, तलवार सत्याग्रहके नामसे प्रसिद्ध आन्दोलनमें भाग लिया था। इस दलमें कुल २०० व्यक्ति शामिल हैं। ये मुख्यतः मदुरा और रामनाड जिलोंके हैं।''' नीलकी मूर्तिको तोड़नेकी बात पहले-पहल किसके मनमें आई? '''उत्तरमें बताया गया कि यह बात पहले-पहल सोमयाजुलु और श्रीनिवास-वरदनके मनमें आई।''' यह मदुरा आन्दोलनकी विफलताके बादकी बात है न?<noinclude></noinclude> 784jvs8ppcc2jticfyfcj9d6vtih48z पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४४ 250 187496 674966 645928 2026-08-29T16:07:50Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674966 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} '''एक स्वयंसेवक : हम मदुरामें विफल तो नहीं हुए। हम लोग खुले-आम सड़कोंपर तलवार लेकर निकलते थे और हमें किसीने गिरफ्तार नहीं किया। इस तरह हमने शस्त्र-अधिनियमको सफलतापूर्वक तोड़ा।''' '''इसपर महात्माजी अपनी हँसी नहीं रोक पाये और उन्होंने उनसे कहा कि आप इस भ्रममें न रहिए कि आपका वह आन्दोलन सफल हुआ।''' जब सरकारने देखा कि आप लोग जो तलवारें लेकर निकलते हैं, वे तो महज टीनकी तलवारें हैं और आपको जनताका समर्थन प्राप्त नहीं है, तो फिर उसने यही सोचा कि आपको रोककर वह व्यर्थ ही आपको विज्ञापन और महत्त्व क्यों दे। सो उसने आपको अपने मनकी करने दी। इसलिए यह कहना बेकार है कि चूंकि आपको गिरफ्तार नहीं किया गया इसलिए आप सफल रहे। आपका उद्देश्य तो तब पूरा हो जब सरकार शस्त्र-अधिनियमको हटा दे और हर भारतीयके लिए शस्त्र लेकर चलना सम्भव हो जाये। लेकिन, याद रखिए कि यह कभी होनेवाला नहीं है। स्वराज्य सरकारका काम भी शस्त्र-अधिनियमके बिना नहीं चल सकता। कुछ-न-कुछ अंकुश तो रहना ही चाहिए। इसलिए मैं तो कहूँगा कि आप यही मानें कि मदुरा सत्याग्रह विफल हो गया। भविष्यमें हम सफल हो सकें, इसके लिए अपनी पहलेकी विफलताको स्वीकार कर लेना अच्छा है। '''इसके बाद महात्माजीने स्वयंसेवकोंको सत्याग्रहकी समझको परखनेके लिए एक-दो स्वयंसेवकोंसे एक-दो सवाल पूछे।''' इसीलिए मैंने आपसे सत्याग्रहकी परिभाषा बतानेको कहा। जबतक आप उसकी 'यंग इंडिया' में बताई परिभाषाको स्वीकार नहीं करते और उसे सीख नहीं लेते तबतक आप सत्याग्रह-संघर्षमें सफल होनेवाले नहीं हैं। यदि आप सत्याग्रहकी सच्ची भावनासे ओतप्रोत होंगे तो मैं आपका समर्थन करूँगा; बल्कि सारा देश आपके साथ रहेगा। इस सम्बन्धमें मैं आपको व्यावहारिक महत्त्वकी एक बात बता दूँ। आप इस समय सार्वजनिक संगठनोंसे ऐसी अपेक्षा न रखें कि वे आपका मार्गदर्शन करेंगे या सत्याग्रहके मामलेमें आपका साथ देंगे... '''इसपर उपस्थित स्वयंसेवकोंमें से एकने पूछा : क्या इन संगठनोंमें कांग्रेस कमेटियाँ भी शामिल हैं?''' हाँ, इस समय तो हैं ही। और मैं बताता हूँ कि क्यों हैं। अभी कांग्रेसके सामने एक बहुत कठिन कार्य पड़ा हुआ है; और छोटे-छोटे समूहोंसे सम्बद्ध आन्दोलनोंका संचालन करना उसके लिए सम्भव नहीं है। छोटे-छोटे समूहोंसे सम्बद्ध आन्दोलनोंका मतलब आप साम्प्रदायिक आन्दोलन न लगायें। यदि कांग्रेस ऐसे आन्दोलनोंमें सहायता देगी तो वह कहींकी नहीं रह जायेगी। कांग्रेसकी अपनी प्रतिष्ठा है, उसकी एक कीर्ति है, जिसे खोनेका भय उसे बना रहता है। इसलिए आप नौजवान लोग कांग्रेस अथवा अन्य सार्वजनिक संस्थाओंसे तत्काल यह भार अपने सिर लेनेकी अपेक्षा न रखें, यही बेहतर है।<noinclude></noinclude> 9jsfrahrr1hdd0138dv0o0rokknuibz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४५ 250 187497 674977 645929 2026-08-29T16:18:57Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674977 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे|५०९}} {{Gap}}आप चिरला-पेरला आन्दोलन<ref>देखिए खण्ड २१, पृष्ठ १६-१८।</ref> के बारेमें तो जानते हैं। उस आन्दोलनके साथ मेरी पूरी सहानुभूति थी। मैं बराबर उसकी प्रगतिका जायजा लेता रहता था। मैं वहाँ गया भी था, क्योंकि उसके बारेमें मेरे खयाल बहुत ऊँचे थे। वहाँ एक विशाल सार्वजनिक सभामें मैंने भाषण भी दिया था। उन दिनों कांग्रेसपर मेरा प्रभाव था, जो आज नहीं रहा। उन दिनों तो मैंने जहाँ यह कहा कि कांग्रेसको ऐसा करना चाहिए, वह अपने-आप वैसा करने लगती थी; और किसी तरहकी दलील-बहसकी जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन, तब भी मैंने चिरला-पेरलाके लोगोंसे कहा था कि कांग्रेस आप लोगोंके आन्दोलनका भार अपने सिर लेने नहीं जा रही है। जब कांग्रेस सविनय अवज्ञाके लिए तैयार हो जायेगी तो वह अपनी ओरसे ही उसे आरम्भ करेगी। लेकिन दूसरोंके द्वारा शुरू किये गये किसी आन्दोलनका सूत्र-संचालन, चाहे वह आन्दोलन जितना भी महान् हो और उसे जितने भी अच्छे ढंगसे चलाया जा रहा हो, अपने हाथोंमें नहीं ले सकती। वह तो उसे अलग खड़े रहकर ही देख सकती है। अगर आन्दोलन सफल हो जाता है तो वह उस सफलताके श्रेयकी भागीदार बन सकती है, लेकिन उसके विफल होनेपर वह उसकी बदनामीकी भागीदार नहीं बन सकती। '''इसके बाद महात्मा गांधीने उन दिनोंके एक प्रसंगकी चर्चा की जब वे दक्षिण आफ्रिकामें थे।''' मैं ब्रिटिश भारतीय संघका मन्त्री था। उस संघकी स्थापना भी मैंने ही की थी। लेकिन जब मैंने वहाँ सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ किया तब मुझे संघको बचानेकी चिन्ता हुई। संघमें तरह-तरहके विचारोंके लोग थे और उस आन्दोलनमें उसे शरीक करके और इस तरह उसकी प्रतिष्ठाको खतरेमें डालकर मैं उसे तोड़ना नहीं चाहता था। इसलिए बिलकुल शुरूसे ही संघको सत्याग्रह आन्दोलनसे अलग रखा गया। अतः सत्याग्रह संघ नामसे एक नये संगठनकी स्थापना की गई, जिसका अपना अलग कोष था, जिसके अपने अलग पदाधिकारी थे। जब पूरी विजय हासिल हो गई तो ब्रिटिश भारतीय संघने उसका श्रेय लिया। इस संघको उस आन्दोलनसे अलग रखनेका ही यह परिणाम था कि मैं आन्दोलनको बिना किसी विशेष कठिनाईके सफल बना सका। वैसे कठिनाइयाँ तो थीं ही। मुझपर इतनी मार पड़ी कि मैं मरते-मरते बचा। यदि मैंने ब्रिटिश भारतीय संघको उस आन्दोलनमें घसीट लेनेकी भारी भूल की होती तो संघ छिन्न-भिन्न हो जाता और दक्षिण आफ्रिकामें हमें जो विजय मिली वह न मिल पाती और तब तो मैं महात्माकी उपाधिसे भी वंचित ही रह जाता। इसलिए आपको कांग्रेसवालोंसे खुद ही कहना चाहिए कि 'आप लोग अलग रहें और इस आन्दोलनमें हमें अपना जोर आजमाकर देखने दीजिए। आप हमारी सफलताके भागीदार बन सकते हैं, लेकिन यदि हम विफल हो जाते हैं तो विफलताकी अपकीर्तिसे आप अलग रहेंगे।' आज सुबह जब मैं श्री सत्यमूर्तिसे मिला तो मैंने उनसे भी कहा कि कांग्रेस अभी तो इस आन्दोलनको नहीं अपना सकती। उसे इस आन्दोलनको<noinclude></noinclude> 8x7yp7f0jgk15q76tk54w84cdbl654a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४६ 250 187498 674980 645930 2026-08-29T16:24:32Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 674980 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} और इसमें लगे लोगोंको ठोंक-बजाकर देख लेना होगा। जल्दबाजी या अविवेकसे काम लेकर हमें कांग्रेसके उज्ज्वल नामको मलिन नहीं करना चाहिए। लेकिन मैं आपको यह भी बता दूँ कि जब आप कसौटीपर खरे उतरेंगे और अपना पानी दिखा देंगे तो कांग्रेस निश्चय ही आपका समर्थन करेगी। तब अगर कांग्रेस आपका साथ नहीं देगी तो मैं सबसे आगे बढ़कर उसकी निन्दा करूँगा। इस बीच मैं यही चाहता हूँ कि आप खुद अपने प्रति सच्चे बने रहिए। कुछ लोगोंने मुझसे कहा कि "अरे, आप नहीं जानते कि ये कैसे लोग हैं। इनके पास जीविकाका कोई और जरिया नहीं है, इसीलिए ये लोग यह सब कर रहे हैं कि इस तरह कुछ तो मिलेगा।" किन लोगोंने यह बात कही होगी, इसका अनुमान लगानेकी कोशिश न करें, आप नाराज भी न हों। इसके विपरीत आप ऐसा आचरण करें जिससे उनका आरोप झूठा साबित हो। '''इसी समय किसीने एक पर्ची भेजकर सूचित किया कि जिन दो नौजवानोंने सत्याग्रह किया था उन्होंने मजिस्ट्रेटके सामने अपने व्यवहारके लिए खेद प्रकट किया है और उनसे कुछ जुर्माना लेकर उन्हें छोड़ दिया गया है।''' '''इसपर उपस्थित लोगोंमें से एक चीख उठा, “ये लोग नकली स्वयंसेवक हैं।”''' आप सब-के-सब रुपयेमें सोलहों आने खरे उतरें, ऐसी अपेक्षा तो मैं आपसे नहीं रखता। कुछ लोगोंमें सिर्फ पाई-भर सचाई हो सकती है और कुछमें शायद वह भी नहीं। इसलिए उन दोनोंके माफी माँग लेनेसे मुझे तो कोई परेशानी नहीं होती। और अगर वे लोग नकली थे तब तो फिर उनके बारेमें आपको कोई सफाई देनेकी जरूरत ही नहीं है। '''श्री कुलन्दाई : महात्माजी, मेरे मनमें एक शंका है, जिसका समाधान मैं आपसे चाहता हूँ। मान लीजिए, सरकार और जनताको यह मालूम हो जाये कि कांग्रेस इस आन्दोलनका समर्थन नहीं कर रही है, तब तो सम्भावना इसी बातकी है कि इन लड़कोंको सरकार ज्यादा सख्त सजाएँ देगी और जनता इनका बहुत कम समर्थन करेगी। जैसा कि मैंने कहा, मैं इस आन्दोलनमें इसलिए पड़ा कि जिला कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीकी हैसियतसे मुझे कांग्रेसके सम्मान और प्रतिष्ठाकी रक्षा करनेकी चिन्ता थी और उसकी रक्षा करनेका तरीका यही था कि इन लोगोंको बिना किसी सहानुभूति या समर्थनके दुविधाकी स्थितिमें न छोड़ा जाये।''' मैं तो आपको एक उदाहरण दे ही चुका हूँ कि दक्षिण आफ्रिकामें ब्रिटिश भारतीय संघके मन्त्रीकी हैसियतसे मैंने क्या किया। '''कुलन्दाई : यदि सरकारको यह मालूम हो जायेगा कि इस आन्दोलनसे कांग्रेसको कोई सहानुभूति नहीं है तो ये सभी लड़के जेलमें बन्द कर दिये जायेंगे।''' उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। '''कुलन्दाई : लेकिन सिर्फ यही तो नहीं है; उस हालतमें उन्हें जनताकी सहानुभूति भी तो नहीं मिलेगी।'''<noinclude></noinclude> rdnklyunpgqyhnpixy5a3r2e4amgfy0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४७ 250 187499 675055 645931 2026-08-30T03:20:48Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675055 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे|५११}} {{Gap}}ठीक है, और मैं भी यही चाहता हूँ कि इस तरह आप स्वतन्त्र और आत्मनिर्भर बनकर अपना काम करने लायक बन सकें। लेकिन, जबतक हमें सफलता नहीं मिल जाती तबतक हम इसमें कांग्रेसका नाम नहीं घसीटेंगे। हमारे विजेताओंके इतिहाससे आप एक उदाहरण ले सकते हैं। ईस्ट इंडिया कम्पनीको लीजिए। वह ब्रिटिश सरकारकी मिल्कियत नहीं थी। ब्रिटिश सरकार तो उसके मामलोंमें बादमें पड़ी। इसलिए, मैं कहता हूँ कि इस आन्दोलनको कांग्रेसके नामपर और उसकी इजाजतसे नहीं चलाना चाहिए। हाँ, एक व्यक्तिके रूपमें आप कांग्रेसी होते हुए भी इस संघर्षको चला सकते हैं। सत्याग्रही जल्दीमें कोई कदम नहीं उठाता; वह पहले अन्य सारे उपायोंको आजमाकर देख लेता है और उन सबके विफल होनेपर ही सविनय अवज्ञाका सहारा लेता है। और 'सविनय अवज्ञा' शब्दका प्रयोग भी तभी ठीक माना जा सकता है। आपका आन्दोलन सविनय अवज्ञा भले ही हो, लेकिन यदि आपने यह कदम जल्दीमें उठाया हो और दूसरे सभी उपायोंको आजमाकर न देख लिया हो तो मैं कहूँगा कि आप अपना आन्दोलन स्थगित कर दीजिए। मैं आपको यह सलाह इसलिए दे रहा हूँ कि आपके पक्षमें संगठित जनमत तैयार हो सके और आप सच्चे सत्याग्रही बन सकें। आप पहले जनताको मूर्तिको हटवानेके लिए जो भी उपाय सम्भव हो सबको अपने तरीकेसे आजमाकर देख लेने दीजिए, और यह देखिए कि सरकार इस सम्बन्धमें कुछ करती है या नहीं। यदि वह नहीं करती तब आप सत्याग्रह शुरू कीजिए। अगर आप मुझसे यह बतानेको कहें कि आप लोगोंको क्या करना चाहिए तो मैं कहूँगा कि आपका आन्दोलन करना उचित है, बशर्ते कि आप उन शर्तोंको पूरा करते हों जो मैंने बताई हैं। आपके प्रति मुझे बहुत सहानुभूति है। मैंने 'हिन्दू' से आपके और आपके आन्दोलनके बारेमें जाना और यह जानकारी मिलते ही मैंने 'यंग इंडिया' में जैसा उचित समझा वैसा लिख दिया।<ref>देखिए “टिप्पणियाँ”, २५-८-१९२७ का उपशीर्षक “ये धृष्ट स्मारक”।</ref> अब तो आपसे मिलने और बातचीत करनेका भी मौका मिल गया है, इसलिए मैं और अधिक करनेकी कोशिश करूँगा। लेकिन, वैसा मैं तभी कर सकता हूँ जब मुझे इस बातका विश्वास हो जाये कि कम-से-कम आन्दोलनके नेता लोग कभी बेईमानीसे काम नहीं लेंगे और वे सिर्फ अपनी शोहरत बढ़ानेके लिए कुछ नहीं करेंगे। नेता चाहे मोची हो या दर्जी, उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। मैं इस ओरसे आश्वस्त हो जाना चाहता हूँ कि आपके नेता शुद्ध और खरे हैं और उन्हें किसी आर्थिक लाभका लोभ नहीं है। सत्याग्रहीकी सफलता या विफलता उसकी अपनी इच्छा-शक्तिपर निर्भर होती है। अभी मुझे अपना उत्तर न दीजिए। मैं आपको मुलाकातका एक और अवसर दूँगा। मैंने जो कुछ कहा है, उसपर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिए और जब दोबारा मिलने आइए तो बताइए कि अब आपकी क्या योजना है। आपके पास जितने भी स्वयंसेवक हैं, सबकी सूची मुझे दीजिए। उसमें उनकी उम्र, पता और पेशा, सब दर्ज<noinclude></noinclude> bzeyg97m3u8w1ilie2jb4vekwigu301 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४८ 250 187500 675057 645932 2026-08-30T03:28:48Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675057 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} रहने चाहिए। और मैं चाहूँगा कि जरूरत हो तो एक कांग्रेसीकी हैसियतसे श्री कुलन्दाई आन्दोलनकी सचाई और इसमें लगे लोगोंकी विश्वसनीयताका एक प्रमाण दें। यदि आप इस साधारण-सी परीक्षामें मुझे सन्तुष्ट नहीं कर सके तो आप आगे नहीं बढ़ सकते। आपने जमीन तो तैयार कर ही दी है। नीलकी मूर्तिको आज-न-कल हटना ही है। सफलता खुद हमारी शक्तिपर निर्भर होगी। आप अपनी गति धीमी कर दें तो उसमें कोई बुराई नहीं है। '''श्री एम० एस० सुब्रह्मण्य अय्यरको उत्तर देते हुए महात्माजीने कहा :''' जो तरीका अपनाया गया है, वह सत्याग्रहपूर्ण तरीका भी हो सकता है और हिंसापूर्ण तरीका भी। सब कुछ इस बातपर निर्भर है कि यह किस भावनासे किया जा रहा है। उस भावनाके अनुसार ही यह तय किया जा सकता है कि यह काम कैसा है। किसी निष्प्राण वस्तुको नुकसान पहुँचाना या उसे नष्ट करना सदा हिंसात्मक कार्यकी ही श्रेणीमें नहीं आता। '''श्री पावलार : तो क्या आपकी यह सलाह है कि आन्दोलन स्थगित कर दिया जाये?''' हाँ, अगर आपमें सच्चा बल न हो। लेकिन, कृपया इसपर भली भाँति विचार करके कल मुझे बताइए कि आप क्या सोचते हैं। '''जब बुधवारको तीसरे पहर बातचीत फिर आरम्भ हुई तो एक स्वयंसेवकने उन लोगोंकी राय बतानेके लिए एक बयान पढ़ा। पिछली रात और बुधवारकी सुबह उन लोगोंने महात्माजीकी सलाहको ध्यानमें रखकर आपसमें विचार-विमर्श किया था। इस बयानमें उसका निष्कर्ष बताया गया था। बयान निम्न प्रकार था :''' '''आपने कल हमें जो सलाह दी थी, उसपर हमने बहुत ध्यानपूर्वक विचार किया। रात श्री एस० सत्यमूर्तिसे भी हमारी बातचीत हुई थी। इसके बाद हमने सारे मामलेपर आज पुनः विचार किया है। हम यह महसूस करते हैं कि परिस्थिति बहुत कठिन और पेचीदा है। इसलिए हम चाहेंगे, अब आप ही बताइए कि हमें क्या करना चाहिए। हम आपकी सलाहके मुताबिक चलेंगे। हम बहुत सोच-विचारकर कुछ निष्कर्षोंपर पहुँचे हैं और हम उन्हें आपके विचारार्थ आपके सामने रखना चाहेंगे। हमें इस बातकी बहुत चिन्ता लगी हुई है कि आन्दोलनसे जो उत्साह जगा है, उसे यों ही मन्द नहीं पड़ने देना चाहिए। हम यह स्वीकार करते हैं कि इस संघर्षको सफल बनानेके लिए यह जरूरी है कि हम पहले मूर्ति हटवानेके अन्य सारे तरीकोंको आजमाकर देख लें, जनतामें उत्साह भरें और अपने-आपको ठीक ढंगसे संगठित करें। हमें ऐसी आशंका है कि यदि आन्दोलनके लिए ठीक संगठन कायम करने और मूर्तिको हटवानेके दूसरे सभी उपायोंको आजमाकर देख लेनेके लिए आन्दोलनको स्थगित कर दिया गया और जनताके उत्साहको कायम रखनेके लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई तो हो सकता है कि यह आन्दोलन प्रेरणाके अभावमें चुक जाये। इस-'''<noinclude></noinclude> lfs8lj5t6i8pr2q8kvitfvonu1zjsnr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५४९ 250 187501 675076 645933 2026-08-30T04:15:37Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे|५१३}} '''लिए हम चाहते हैं कि आज जो उत्साह जगा है उसे हर उचित और शान्तिपूर्ण तरीकेसे कायम रखा जाये और यदि आन्दोलन स्थगित किया जाये तो सार्वजनिक रूपसे यह जाहिर करके किया जाये कि आपकी ऐसी ही सलाह है। इसके अलावा, आन्दोलन स्पष्ट रूपसे इसी उद्देश्यसे स्थगित किया जाना चाहिए कि यदि आवश्यकता होगी तो ठीक समय आनेपर इसे फिरसे आरम्भ किया जायेगा।''' '''इस उद्देश्यको ध्यानमें रखते हुए हमारा नम्र सुझाव है कि आप 'यंग इंडिया' में इस आन्दोलनके सम्बन्धमें हर सप्ताह एक अनुच्छेद जरूर लिखें और तमिलनाडुके दौरेमें इसके बारेमें बोलें भी। इसके अतिरिक्त, हम यह भी चाहेंगे कि आप कोई ऐसा आश्वासन देकर हमें बल दें कि यदि और सभी उपाय विफल हो जाते हैं तो उपयुक्त समय आनेपर आप खुद ही इस आन्दोलनमें हमें हर सम्भव तरीकेसे सहायता देंगे।''' '''यदि इन चीजोंपर आपकी स्वीकृति मिल जाती है तो आपके सुझावके अनुसार हम आन्दोलनको तीन महीनेके लिए स्थगित कर देनेको तैयार हैं। हमारा अनुरोध है कि इस बीच आप यहाँके कांग्रेसी नेताओंसे मूर्तिको हटवानेके आन्दोलनको चालू रखनेके लिए हमें आवश्यक सहायता देनेको कहें।''' यह आवश्यक सहायता क्या है? '''स्वयंसेवक : भाषण देना, स्वयंसेवक भरती करना और हमारी आर्थिक स्थितिको दृढ़ करना — इन्हींके सम्बन्धमें हम आपसे सहायताकी अपेक्षा रखते हैं।''' आर्थिक सहायता किस बातके लिए? '''स्वयंसेवकने उत्तर दिया कि हममें से कोई सौ स्वयंसेवक मदुरा और रामनाड जिलोंके विभिन्न हिस्सोंके लोग हैं। उनके रहने, खाने-पीने और उन्हें मद्रास लानेके लिए पैसेकी जरूरत है।''' फिलहाल तो वे अपना खर्च खुद ही चला रहे हैं? :'''स्वयंसेवक : हाँ।''' तो फिलहाल उनके खर्चके लिए पैसेकी जरूरत नहीं है? '''इसका भी स्वीकारात्मक उत्तर ही दिया गया।''' तब तो मुझे ऐसा समझना चाहिए कि भविष्यमें भी उनके खर्चके लिए पैसेकी जरूरत नहीं पड़ेगी? '''स्वयंसेवक : हम प्रचार-कार्यके लिए पैसा चाहते हैं।''' किस प्रचार-कार्यके लिए? '''स्वयंसेवक : स्वयंसेवकोंकी भरतीके लिए सभा आदि आयोजित करनेके लिए।''' लेकिन यदि सभा आदि कांग्रेस करे, तब तो आपको पैसेकी जरूरत नहीं होगी। लेकिन असलमें जेल जानेका मौका आनेपर ही तो आपका काम शुरू होगा। स्वयंसेवकोंको मद्रास लानेकी बात तो बहुत मामूली है। आप यह तो नहीं चाहते कि ३४-३३<noinclude></noinclude> 6efk1tgbb8zexx7ic5xgqqrgtutqspj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५० 250 187502 675079 645934 2026-08-30T04:32:26Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} हजार-के-हजार स्वयंसेवक, अगर यह मान लें कि स्वयंसेवकोंकी संख्या इतनी बड़ी है तो, एक साथ मद्रास पहुँच जायें। आप अधिक-से-अधिक एक साथ दो-दोकी संख्यामें गिरफ्तार होंगे। जो सच्चा सत्याग्रही स्वेच्छासे गिरफ्तार होने जा रहा है और जो मरनेके लिए भी तैयार होगा, वह आपसे रेलगाड़ीके किरायेके पैसोंकी माँग नहीं करेगा। निश्चय ही वह रेल-भाड़ेकी व्यवस्था खुद कर लेगा। अगर उसके पास पैसे नहीं हैं तो उसके यहाँके लोग उसके लिए पैसे अवश्य जुटा देंगे। और जहाँतक प्रचार-कार्यकी बात है, वह काम आपको खुद नहीं करना है। उसे तो दूसरे लोग करेंगे। गरज यह कि आपको पैसेकी चिन्ता बिलकुल नहीं करनी चाहिए। जब जरूरत होगी, आपको पैसे मिलेंगे ही। लेकिन, आपको इसका आग्रह नहीं करना चाहिए। और आपको उतना ही करना चाहिए जितना आपके बसका हो। आपके काममें मैं इसलिए दिलचस्पी ले रहा हूँ क्योंकि यह मेरा मनपसन्द काम है। मैं नहीं चाहता कि यह काम किसी प्रकारकी बदनामीका शिकार हो। इसीलिए मैंने कल आपको एक घंटा दिया और आज फिर एक घंटा दे रहा हूँ। मैं एक बार फिर कहता हूँ कि आप पैसेकी चिन्ता बिलकुल न करें; अन्यथा सब कुछ बिखर जायेगा। यदि आप इस संघर्षको दृढ़ताके साथ चलाना चाहते हैं तो इसे अधिक-से-अधिक नम्रता बरतते हुए चलाइए। आपको पूरी तरह ईमानदार और अनुशासित होना चाहिए; किसी प्रकारकी शेखी या हिंसासे काम नहीं लेना चाहिए। आपको सत्याग्रहके सहज बलका ही भरोसा रखना चाहिए। किसी-न-किसी दिन यह ऐसी शक्ति दिखायेगा ही जिसकी राह कोई नहीं रोक सकेगा। यदि आप ऐसा सोचें कि आपमें अपेक्षित शक्ति या धैर्य नहीं है, तो तत्काल इसे छोड़ दें। आपको इस क्षेत्रमें जितना करना था उतना आप कर चुके हैं। आपने नींव डाल दी है। संघर्ष जारी रहेगा और यह मूर्ति भी अवश्य हटाई जायेगी, क्योंकि यह एक बहुत ही बुरे ढंगके आतंकवादको स्थायित्व प्रदान करनेके लिए वहाँ स्थापित है। इसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान समुद्रकी गहराई है। हाँ, अगर इसे इंग्लैंड या किसी कबाड़खानेमें डाल दिया जाये तो बात और है। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि आपको ऐसा खतरा हो कि आन्दोलन स्थगित कर देनेसे आपका संगठन और एकता खत्म हो जायेगी तो मैं नहीं चाहता कि आप अपना कदम वापस लें। लेकिन, अगर आपको ऐसा कोई भय न हो और लगता हो कि तीन महीने बाद आप फिर एकजुट होकर काम कर सकेंगे तो आप एक घोषणा-पत्र जारी कीजिए और उसमें कहिए कि हमने संघर्ष स्थगित कर दिया है, क्योंकि हमें यही ठीक लगा और इसीलिए हमने ऐसा किया है। अब हम कांग्रेस तथा अन्य सभी सार्वजनिक संगठनोंसे इस कामको हाथमें लेने और मूर्तिको हटवानेके लिए उनसे जो भी बने वैसा करनेकी आशा रखते हैं। जब यह बात भलीभाँति स्पष्ट हो जाये कि इस तरहके आन्दोलनका सरकारपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा तब हमारे कष्ट-सहनकी बारी आयेगी। तब हमारे खिलाफ कोई यह न कहे कि हमने जल्दबाजीमें काम किया और एक बार उस मूर्तिकी ओर<noinclude></noinclude> gw6sbr6x4o0yeio3hj025wr1xcvodha पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६४४ 250 187596 675194 646028 2026-08-30T11:08:56Z सीमा1 430 /* शोधित */ 675194 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|अपील : तमिलनाडसे, ४००-१; एक अपील, ३३०-३१}} {{outdent|टिप्पणी, ८६-८८; -बेलूर मन्दिरकी दर्शक- पुस्तिकामें, ४०९ - [णियां ], ५-७, ५३-५५, १२८-३०, २२७-२९, ३५०- ५४, ४२९-३१;}} {{outdent|तार : अब्राह्मणोंकी परिषद्को, ४५५; -जमना- लाल बजाजको, ३१७; - मीराबहनको, ३११, ४७९, ४९७, ५४८; -मोतीलाल नेहरूको, ४२५ - रामेश्वरदास पोद्दार- को, ५५; - वल्लभभाई पटेलको, ३१८; - सरोजिनी नायडूको, ३१८}} {{outdent|(एक) पत्र, ३६-३७, ६९, १२७-२८, १५२- ५३, १७३, २४५, २५७, ४०५-६}} {{outdent|पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको, २९-३०; - अब्बास तैयबजी को, ३७-३८; - अलवीको, ७८-७९ ; -आनन्दीबाईको, ४१७; -आर० बी० ग्रेगको १५-१६, २९७; - आश्रमकी बहनोंको, ४२, ६८-६९, ११४, १६३-६४, २१४-१५, २५२, २९२-९३, ३२५, ३८४, ४१४, ४५६-५७, ४९९-५००, ५६८-६९; - ई० एस० पटवर्धनको, ३२७; - उत्तम भिक्खुको, १९७; -ए० आई० काजीको १९५, ३७५; - ए० ए० पॉलको, १३, ३७९; - ए० फेनर ब्रॉकवेको, १२०-२१; - ए० बकीको, ३५६-५७; - ए० रंगस्वामी अय्यंगार- को, १४, २९६; - एक आश्रमवासीको, ४९८-९९; - एक गुजराती विद्यार्थीको, ४२४; - एकनाथ श्रीपाद पटवर्धनको, २८५-८६ -एच० जी० पाठकको,२७७-७९; {{multicol-break}} - एच० हारकोर्टको, ४६-४७, ३०६; - एन० आर० मलकानीको, ६८, १४८-४९, २४१-४२, २४२-४३, ३९८; - एन० वी० थडानीको, २०६-८; - एन० शंकर अय्यरको,२७६; - एन० सेतुरमणको, ४०४; - एम० अब्दुल गनीको, ३५५; -एम० एफ० खानको, ३७९-८० (डॉ०) एम० एस० केलकरको १२, ७१, २१० ; - एस० गणेशन्को, ३७७-७८; - एस० जी० वझेको, ४७३-७४; - एस० डी० नाडकर्णीको, २७३-७४, ४०१-२; - एस० रामनाथन्को, १७२, २६९; - एस० वी० कोजलगीको,२३४-३५, २७१; - एस० श्रीनिवास अय्यंगारको, ३३५-३६; -ओ० ० विलार्डको, ५७८; -कमला दासगुप्तको २८४, ४२१-२२;-कान्ति गांधीको, २०-२१; - कुँवरजी पारेखको, २५३; -कुवलयानन्दको, १८-१९, ७७, २४६-४७, ४१९-२०; - कुसुमबहन देसाईको, २३७,२७९; - कृष्णदासको, २९७-९८,३५९, ३७८, ४२२; -के० एस० कारन्तको, २०८-९; के० एस० नटराजन्‌को, ११६, ३२६; के० केलप्पनको, ६५-६६; - के० जे० नारायणन नम्बूद्रिपादको, १९८; के० टी० चक्रवर्तीको, २४४-४५; के० पी० पद्म- नाभ अय्यरको, २३५-३६, ४०२-३ ; - (डॉ०) कैलाशनाथ काटजूको, ४७०-७२; - कोण्डा वेंकटप्पैयाको, ३२७;- खुर्शीदको २४६; - गंगाधर शास्त्री जोशीको, २११-१२; गंगाबहनको,४१६-१७, - गंगाबहन झवेरीको, ५६९;}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ouumrvylxhxfyuynpvt63bqboe1uk05 675195 675194 2026-08-30T11:09:50Z सीमा1 430 675195 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|अपील : तमिलनाडसे, ४००-१; एक अपील, ३३०-३१}} {{outdent|टिप्पणी, ८६-८८; -बेलूर मन्दिरकी दर्शक-पुस्तिकामें, ४०९ - [णियां ], ५-७,५३-५५, १२८-३०, २२७-२९, ३५०-५४, ४२९-३१;}} {{outdent|तार : अब्राह्मणोंकी परिषद्को, ४५५; -जमना- लाल बजाजको, ३१७; - मीराबहनको,३११, ४७९, ४९७, ५४८; -मोतीलाल नेहरूको, ४२५ - रामेश्वरदास पोद्दारको, ५५; - वल्लभभाई पटेलको,३१८; - सरोजिनी नायडूको, ३१८}} {{outdent|(एक) 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कोजलगीको,२३४-३५, २७१; - एस० श्रीनिवास अय्यंगारको, ३३५-३६; -ओ० ० विलार्डको, ५७८; -कमला दासगुप्तको २८४, ४२१-२२;-कान्ति गांधीको, २०-२१; - कुँवरजी पारेखको, २५३; -कुवलयानन्दको, १८-१९, ७७, २४६-४७, ४१९-२०; - कुसुमबहन देसाईको, २३७,२७९; - कृष्णदासको, २९७-९८,३५९, ३७८, ४२२; -के० एस० कारन्तको, २०८-९; के० एस० नटराजन्‌को, ११६, ३२६; के० केलप्पनको, ६५-६६; - के० जे० नारायणन नम्बूद्रिपादको, १९८; के० टी० चक्रवर्तीको, २४४-४५; के० पी० पद्म- नाभ अय्यरको, २३५-३६, ४०२-३ ; - (डॉ०) कैलाशनाथ काटजूको, ४७०-७२; - कोण्डा वेंकटप्पैयाको, ३२७;- खुर्शीदको २४६; - गंगाधर शास्त्री जोशीको, २११-१२; गंगाबहनको,४१६-१७, - गंगाबहन झवेरीको, ५६९;}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> bkflz53s8yhvskme0alnsg3zsq71mso 675196 675195 2026-08-30T11:11:07Z सीमा1 430 675196 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|अपील : तमिलनाडसे, ४००-१; एक अपील, ३३०-३१}} {{outdent|टिप्पणी, ८६-८८; -बेलूर मन्दिरकी दर्शक-पुस्तिकामें, ४०९ - [णियां ], 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- एन० शंकर अय्यरको,२७६; - एन० सेतुरमणको, ४०४; - एम० अब्दुल गनीको, ३५५; -एम० एफ० खानको, ३७९-८० (डॉ०) एम० एस० केलकरको १२, ७१, २१० ; - एस० गणेशन्को, ३७७-७८; - एस० जी० वझेको, ४७३-७४; - एस० डी० नाडकर्णीको, २७३-७४, ४०१-२; - एस० रामनाथन्को, १७२, २६९; - एस० वी० कोजलगीको,२३४-३५, २७१; - एस० श्रीनिवास अय्यंगारको, ३३५-३६; -ओ० ० विलार्डको, ५७८; -कमला दासगुप्तको २८४, ४२१-२२;-कान्ति गांधीको, २०-२१; - कुँवरजी पारेखको, २५३; -कुवलयानन्दको, १८-१९, ७७, २४६-४७, ४१९-२०; - कुसुमबहन देसाईको, २३७,२७९;- कृष्णदासको, २९७-९८,३५९, ३७८, ४२२; -के० एस० कारन्तको, २०८-९; के० एस० नटराजन्‌को, ११६, ३२६; के० केलप्पनको, ६५-६६; - के० जे० नारायणन नम्बूद्रिपादको, १९८; के० टी० चक्रवर्तीको, २४४-४५; के० पी० पद्मनाभ अय्यरको, २३५-३६, ४०२-३ ;- (डॉ०) कैलाशनाथ काटजूको, ४७०-७२; -कोण्डा वेंकटप्पैयाको, ३२७;- खुर्शीदको २४६; -गंगाधर शास्त्री जोशीको, २११-१२; गंगाबहनको,४१६-१७,-गंगाबहन झवेरीको,५६९;}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 1bfy0bfyftxmstjlfkjip0p3fbswpgg 675211 675196 2026-08-30T11:54:22Z सीमा1 430 675211 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|अपील : तमिलनाडसे, ४००-१; एक अपील, ३३०-३१}} {{outdent|टिप्पणी, ८६-८८; -बेलूर मन्दिरकी दर्शक-पुस्तिकामें, ४०९ - [णियां ], ५-७,५३-५५, १२८-३०, २२७-२९, ३५०-५४, ४२९-३१;}} {{outdent|तार : अब्राह्मणोंकी परिषद्को, ४५५; -जमना- लाल बजाजको, ३१७; - मीराबहनको,३११, ४७९, ४९७, ५४८; -मोतीलाल नेहरूको, ४२५ - रामेश्वरदास पोद्दारको, ५५; - वल्लभभाई पटेलको,३१८; - सरोजिनी नायडूको, ३१८}} {{outdent|(एक) पत्र, ३६-३७, ६९, १२७-२८, १५२- ५३, १७३, २४५, २५७, ४०५-६}} {{outdent|पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको, २९-३०; - अब्बास तैयबजी को, ३७-३८; - अलवीको, ७८-७९ ; -आनन्दीबाईको, ४१७; -आर० बी० ग्रेगको १५-१६, २९७; - आश्रमकी बहनोंको, ४२, ६८-६९, ११४, १६३-६४, २१४-१५, २५२, २९२-९३, ३२५, ३८४, ४१४, ४५६-५७, ४९९-५००, ५६८-६९; - ई० एस० पटवर्धनको, ३२७; - उत्तम भिक्खुको, १९७; -ए० आई० काजीको १९५, ३७५; - ए० ए० पॉलको, १३, ३७९; - ए० फेनर ब्रॉकवेको, १२०-२१; - ए० बकीको, ३५६-५७; - ए० रंगस्वामी अय्यंगार- को, १४, २९६; {{multicol-break}} - एक आश्रमवासीको, ४९८-९९; - एक गुजराती विद्यार्थीको, ४२४; - एकनाथ श्रीपाद पटवर्धनको, २८५-८६ -एच० जी० पाठकको,२७७-७९; - एच० हारकोर्टको, ४६-४७, ३०६; - एन० आर० मलकानीको, ६८, १४८-४९, २४१-४२, २४२-४३, ३९८; - एन० वी० थडानीको, २०६-८; - एन० शंकर अय्यरको,२७६; - एन० सेतुरमणको, ४०४; - एम० अब्दुल गनीको, ३५५; -एम० एफ० खानको, ३७९-८० (डॉ०) एम० एस० केलकरको १२, ७१, २१० ; - एस० गणेशन्को, ३७७-७८; - एस० जी० वझेको, ४७३-७४; - एस० डी० नाडकर्णीको, २७३-७४, ४०१-२; - एस० रामनाथन्को, १७२, २६९; - एस० वी० कोजलगीको,२३४-३५, २७१; - एस० श्रीनिवास अय्यंगारको, ३३५-३६; -ओ० ० विलार्डको, ५७८; -कमला दासगुप्तको २८४, ४२१-२२;-कान्ति गांधीको, २०-२१; - कुँवरजी पारेखको, २५३; -कुवलयानन्दको, १८-१९, ७७, २४६-४७, ४१९-२०; - कुसुमबहन देसाईको, २३७,२७९;- कृष्णदासको, २९७-९८,३५९, ३७८, ४२२; -के० एस० कारन्तको, २०८-९; के० एस० नटराजन्‌को, ११६, ३२६; के० केलप्पनको, ६५-६६; - के० जे० नारायणन नम्बूद्रिपादको, १९८; के० टी० चक्रवर्तीको, २४४-४५; के० पी० पद्मनाभ अय्यरको, २३५-३६, ४०२-३ ;- (डॉ०) कैलाशनाथ काटजूको, ४७०-७२; -कोण्डा 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दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले 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(न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४५, २८ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था। ##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १६:२८, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४२, २८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] llbpf3t72uwd2j948usjz67a9bb8f4s 674992 674922 2026-08-29T16:49:39Z अनिरुद्ध कुमार 25 प्रतिलिपि तर्क हटाया 674992 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४५, २८ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १६:२८, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४२, २८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] jr2w5vf2mjdlidg3n2vloi32kf582lk 675000 674992 2026-08-29T17:11:05Z अनिरुद्ध कुमार 25 /* पुस्तक सूची */ 675000 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४५, २८ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३८ से पृष्ठ संख्या ४७८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ११ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १६:२८, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४२, २८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 26jz8bf0s8w0539aormjx1nh2khvtt1 675002 675000 2026-08-29T17:15:23Z Manikantkmr 5554 /* पुस्तक सूची */ 675002 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४५, २८ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३८ से पृष्ठ संख्या ४७८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) — [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १७:१४, २९ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ११ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १६:२८, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४२, २८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 83yxs9y9grtfa5pxrf313cxjbj5i1yb 675003 675002 2026-08-29T17:20:44Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* पुस्तक सूची */ 675003 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४५, २८ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३८ से पृष्ठ संख्या ४७८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) — [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १७:१४, २९ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ११ अंक) — [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) १७:२०, २९ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १६:२८, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४२, २८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] aat3o5hvimfur2yhq6ejf74u3gh8m68 675047 675003 2026-08-29T22:00:48Z सीमा1 430 /* पुस्तक सूची */ 675047 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४५, २८ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) २२:००, २९ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३८ से पृष्ठ संख्या ४७८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) — [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १७:१४, २९ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ११ अंक) — [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) १७:२०, २९ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १६:२८, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी 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मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Somya Shaw|Somya Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Somya Shaw|वार्ता]]) ११:४२, २८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 72d2agvme75egtxxck6qsq86rrsngzz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६५ 250 197408 674925 674856 2026-08-29T12:59:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०८. हिन्दू-मुस्लिम एकता '''}}}} कौमी सवाल के बारेमें मेरे रुखको लेकर आजकल तरह-तरह की गलतफहमियाँ फैलाई जा रही हैं। अतएव यहाँ किसी तरहकी दलील न करके मैं जितने स्पष्टशब्दोंमें अपनी स्थिति बता सकता हूँ, बतानेकी चेष्टा करूंगा। १. पिछले चालीस वर्षोंसे इस बारे में जो विचार रखता आया हूँ, वे आज भी कायम हैं। २. मैं मानता हूँ कि और बातोंकी तरह ही, जिन्हें मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ, कौमी एकताके बिना भी स्वराज्य कायम नहीं हो सकता। ३. वर्तमान आन्दोलनका मंशा स्वतन्त्रता प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों में उसे पानेकी शक्ति उत्पन्न करना है। ४. जब यह शक्ति पैदा हो जायेगी और पूर्ण स्वराज्य कायम करनेका समय आयेगा, तब मुसलमानों और दूसरी सभी अल्पसंख्यक जातियोंके लोगोंको सन्तुष्ट करना होगा। अगर वे सन्तुष्ट न हुए तो आपसमें ही लड़ाई शुरू हो जायेगी। लेकिन मैं तो इसी आशापर जी रहा हूँ कि अगर हम यह ताकात पैदा करनेमें कामयाब हो गये तो हमारी आपसी फूट और एक-दूसरे के प्रति अविश्वासकी भावना अपने-आप मिट जायेगी। आज हममें ये दुर्गुण हमारी कमजोरीके कारण ही हैं। जब हममें ताकत आ जायेगी तो हम उन्हें सहज ही त्याग देंगे। ५. नेहरू संविधानके रद हो जानेसे कौमी सवालके निपटारेकी बात भी स्वभावतः रद हो गई है। लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावमें यह बात स्पष्ट कही गई है। कि सिखों और मुसलमानोंको नेहरू संविधानके अनुसार कौमी सवालके हलसे सन्तोष नहीं हुआ है, इसलिए सभी पक्षोंको सन्तुष्ट करनेके लिए इस सवाल पर फिरसे विचार करना होगा। ६. मैं जो एकमात्र अहिंसात्मक हल जानता हूँ वह यह है कि हिन्दू अल्पसंख्यक जातियोंको, ये जो चाहें लेने दें। मुझे तो अल्पसंख्यकोंके हाथों में देशके शासनको सौंपते हुए भी हिचकिचाहट न होगी। यह कोई कल्पना जगत्‌की बात नहीं है। मेरे विचारसे यह हल सब तरहके खतरोंसे बरी है, क्योंकि स्वतन्त्र राज्यमें वास्तविक सत्ता तो जनताके हाथोंमें रहेगी। जनताकी उस सत्ताका परिचय तो आज ही दिया जा रहा है। अगर जनता अपनी शक्तिका अनुभव करके संयमके साथ सार्वजनिक हितके लिए उसका उपयोग करे तो सरकार चाहे जितनी शक्तिशाली हो, वह उसके सामने सर्वथा निरुपाय बन जायेगी। गुजरातमें आज लोग जिस शक्ति और संगठनका परिचय दे रहे हैं यदि वह सच्चा है और उसका स्रोत कोई अन्धविश्वास नहीं है, तो कहना होगा कि यहां के लोग सफलताके निकटतक पहुँच चुके हैं। लोग यह याद रखें कि देशके शासनमें उसकी आबादीके मुकाबलेमें बहुत ही थोड़े लोग जिम्मेदारी और हुकूमतकी जगहोंपर काम किया करते हैं। सारी दुनियाका यही अनुभव रहा ४३-२१<noinclude></noinclude> 5xcs030ng4js5ng9olq99uncjld11jf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६६ 250 197409 674927 674860 2026-08-29T13:21:17Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674927 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''}}}} है कि सच्ची ताकत और सम्पत्ति तो उन्हीं लोगोंके हाथोंमें होती है, जो शासनकी बागडोर थामनेवाले समूहसे बाहर होते हैं। हम लोग अपने देशमें सत्ताके पीछे इसलिए पागल बने हुए हैं कि हमारे देशवासी भोले हैं, और सहज ही उनका शोषण किया जा सकता है। आजकी सत्ता में ऊपरसे नीचेतक सड़ांध पैदा हो गई है। अहिंसात्मक शक्तिसे प्राप्त स्वतन्त्रता स्वभावतः ऐसी होगी कि वह इस तरहकी बुराइयोंको प्रायः मिटा देगी। अतएव ऊपर मैंने कौमी झगड़ोंको सुलझानेका जो तरीका बताया है, वह मेरी व्यावहारिक बुद्धिकी उपज है। सचाई यह है कि आज हम अपने वर्तमान अथवा विरासत में मिले अनुभवोंके खिलाफ कुछ सोचने में असमर्थ हैं तथापि इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है कि स्वतन्त्र भारत हमारे वर्तमान अनुभवोंकी परिधिसे बाहरकी ही कोई चीज होगा? आलोचक चाहें तो कह सकते हैं कि अहिंसा और उसके द्वारा प्राप्त भारतकी स्वतन्त्रता केवल मेरे कल्पना जगत्की ही चीजें हैं। इसका मैं यही जवाब दूंगा कि अगर इस लड़ाईके बावजूद भारत गुलाम ही बना रहा अथवा यदि उसे हिंसाके बलपर तथाकथित स्वतन्त्रता ही मिली तो ईश्वर कृपासे मैं उस भारतको देखनेके लिए जीवित न रहूँगा। मैं यह कबूल करता हूँ कि हिंसात्मक तरीकेसे प्राप्त स्वराज्यमें अल्पसंख्यकोंको अपनी रक्षा आप ही करनी पड़ेगी। परन्तु इस सरकारकी कृपासे उन्हें इसके लिए विशेष परिश्रम नहीं करना होगा। क्योंकि वर्तमान सरकार तो एक जातिको दूसरी जाति या जातियोंसे भिड़ाकर ही अपना उल्लू सीधा करती रही है। मेरे आलोचकोंकी शंकाका कारण यही है कि वे या तो मेरे सिद्धान्तकी उपेक्षा कर देते हैं या उसमें उन्हें विश्वास नहीं है। लेकिन मैं तो अविचलित ही हूँ, क्योंकि अब अधिक समय तक वे उसकी उपेक्षा या उसमें अविश्वास नहीं कर सकेंगे। ७. मेरी मान्यताओंकी तथाकथित असंगतियां उन लोगोंके लिए असंगतियाँ नहीं हैं जो अहिंसाके फलितार्थीको--बौद्धिक धरातलपर ही सही--समझते हैं। ८. नमक-कर या शराब तथा मादक पदार्थोंकी बुराई अथवा अवांछनीय विदेशी वस्त्रोंके प्रतिरोध में तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, जिसपर शंका की जा सके। इसलिए मैं इस संघर्ष में हाथ बँटानेके लिए निस्संकोच भावसे सबको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग इसमें हाथ नहीं बेंटायेंगे, वे हर सम्भावित स्थितिमें बुराईका प्रतिरोध करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके एक अवसरसे अपने-आपको वंचित करेंगे। ९. मैंने अहिंसाके अतिरिक्त और कोई भी शर्त लगाये बिना सविनय अवज्ञा सिर्फ इसी सीधे-सादे और अनिवार्य कारणसे आरम्भ की है कि इस देशकी लड़ाई जो मोड़ ले रही थी उसमें तो खुद अहिंसाका ही वारा-न्यारा हो जानेका खतरा पैदा हो गया था। ऐसी आपदामय स्थितिकी आशंका हो और मैं चुपचाप बैठा रहूँ, यह मुझसे नहीं हो सकता था। मैंने तत्काल अनुभव किया कि अगर अहिंसा एक सक्रिय और बड़ी शक्ति है तो यह हिंसा के बीचसे भी अपना रास्ता बनाती हुई अन्तमें उसे पीछे छोड़ सकती है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> 5ycsgvociuoexcaml3hg1tx356025xo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६७ 250 197410 674928 674864 2026-08-29T13:28:37Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०९. जन-आन्दोलन'''}}}} जन-आन्दोलनके अद्भुत कर्तृत्वसे प्रभावित होकर एक भाईने 'कॉमर्स ऐंड फाइनेन्स' में प्रकाशित सर मार्टिन कानवेके एक लेखका निम्नलिखित अंश भेजा है:१ '''कोई भी पीढ़ी आस्था और विकासके क्षेत्रमें जितना कुछ प्राप्त कर सकती है, वह पिछली पीढ़ियोंकी उपलब्धियोंकी तुलनामें नगण्य ही होता है। यह बात मनुष्य द्वारा प्राप्त भौतिक समृद्धि और दुनियाकी कलात्मक निधिसे काफी स्पष्ट हो जाती है, लेकिन संसारने विचारोंकी दुनियामें जो कुछ प्राप्त करके दिखाया है, उससे तो यह बात और भी अधिक उजागर होती है। ये विचार ही उसकी सबसे मूल्यवान निधियां हैं, और इन विचारोंकी रक्षाके लिए संसार व्यक्तियोंका ऋणी नहीं है, चाहे वे कितने ही महान् क्यों न हों। इसके लिए वह ऋणी है जनसमुदायका। क्योंकि मैं एक बार फिर कहता हूँ कि विचारोंका निवास जनसमुदायके मानसमे होता है। वही इन्हें ग्रहण करता है। और वही मानवसमाजमें इसे धीरे-धीरे प्रचारित करता है। व्यक्ति भले ही किसी विचारका आविष्कार करे, लेकिन जबतक वह उसे जनमानसमें उतार नहीं देता तबतक वह निष्प्रभाव ही होता है और आविष्कर्त्ता के साथ ही दम तोड़ देता है। भीड़की असहिष्णुता, अहंकार, चंचलता, संयमका अभाव तथा उसके ऐसे ही उन अनेक दोषोंके लिए, जिनकी ओर हमारा ध्यान बहुत जल्दी जाता है, हम उसकी चाहे जितनी निन्दा करें, लेकिन इस सत्यसे इनकार नहीं कर सकते कि हमारे वैचारिक जीवनका आधार जन-समुदायपर ही है, उसीसे हमें जीवनमें कुछ करनेका उत्साह प्राप्त होता है, उसीसे हमें स्नेह और संक्षोभ, महिमा और महत्ताकी वे दीप्तियाँ प्राप्त होती है जो इस वास्तविकताको चरितार्थ करती हैं कि व्यक्तिका जीवन एक सुन्दर सुयोग है।''' '''जिस जन-समुदायके सदस्य कभी एक स्थानपर सशरीर एकत्र न हुए हों, उस पूरे जन-समुदाय अथवा उसके एक अंशको भी यदि इस प्रकार एकत्र किया जा सके तो उसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। एक स्थानपर एकत्र ऐसे जनसमूहका देखनेवालों पर बड़ा आकर्षक प्रभाव पड़ता है।--वह आकर्षक प्रभाव जो हर जनसमूहमें मौजूद होता है। यदि यह जनसमूह स्वयं अपने को देख सके तो इसका जोश उबल पड़ेगा। ...''' '''जनसमूहके आकर्षण सिद्धान्तका एक और भी अधिक स्थूल एवं प्रत्यक्ष प्रयोग है जलूसोंका आयोजन। जलूस जितना ही बड़ा होगा, उसकी उपयोगिता''' <small>१. इसके कुछ ही हिस्सोंका अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है।<small><noinclude></noinclude> nf5ir707372wxpt29e4fzi1lhgpzx2z पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६८ 250 197411 674929 674872 2026-08-29T13:36:06Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''उतनी ही अधिक होगी और अलग से देखनेवालों के लिए उसका आकर्षण उतना ही अधिक होगा, उनपर उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा पड़ेगा... इंग्लैंड के किसी भी आन्दोलनकी सफलताकी शुरुआत उस दिनसे होती है जिस दिन अलबर्ट हॉल उस आन्दोलनके हिमायतियोंकी गरजती चीखती भीड़से भर जाता है। और यह तो एक प्रकट तथ्य है कि प्रचारकी दृष्टिसे जितनी फलदायी अलबर्ट हॉलमें सफलतापूर्वक और उत्साहके साथ आयोजित और सम्पन्न एक सभा होती है, उतनी फलदायी मामूली हॉलों और गिरजाघरोंमें आयोजित छोटी-छोटी बीस सभाएं भी नहीं हो सकतीं।''' इस समय इस लेखकी उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह अहिंसाकी प्रगतिका अनुमान लगाने में सहायता देता है। कोई विचार चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सफल हुआ तभी माना जायेगा जब वह जनमानस में अपना स्थान बना ले। भीड़ जो कुछ करती है, वह सब बराबर अच्छा ही हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अहिंसा तो अनिवार्यतः व्यक्तिका धर्म है, वह भी ठीक नहीं है। इसके विपरीत अहिंसा में किसीकी आस्थाकी सचाईका मापदण्ड यह है कि उसे जनसाधारण किस सीमा तक स्वीकार करता है। यदि अहिंसा जनसाधारणको प्रभावित नहीं कर सकती तो व्यक्तियों द्वारा उसकी उपासना करना बिलकुल बेकार है। अहिंसाको मैंं ईश्वरकी सबसे बड़ी देन मानता हूँ। ईश्वरकी सारी देनपर उसकी सृष्टिके सभी प्राणियोंका समान अधिकार है। उसपर संसार त्यागी संन्यासियों और संन्यासिनियोंका एकाधिकार नहीं होता। वे अहिंसा में विशेषज्ञता भले ही प्राप्त कर लें, वे भले ही हमें इसके आश्चर्यजनक प्रभावोंसे अवगत करायें, लेकिन अगर उनकी खोज और उनका दावा सही है तो उसे जन-ग्राह्य भी होना चाहिए। यदि सत्य पर कुछ थोड़े-से लोगोंकी इजारेदारी नहीं हो सकती तो अहिंसा पर ही, जो सत्यका ही दूसरा रूप है, क्यों होनी चाहिए? मैंने दुनियाके धर्मग्रन्थोंका अध्ययन बड़ी श्रद्धापूर्वक किया है और उस अध्ययनके आधारपर मैं इसी निष्कर्षपर पहुंचा हूँ कि इन सभी धर्मग्रन्थोंमें इस बातके जोरदार और स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं कि अहिंसाका पालन सभी कर सकते हैं और सो भी अलग-अलग व्यक्तियोंके रूपमें ही नहीं, बल्कि एक समग्र समुदायके रूपमें भी सम्पूर्ण विनम्रताके साथ मैंने अकसर ऐसा अनुभव किया है कि चूंकि मुझे अपना कोई मतलब नहीं साधना है, इसलिए मैं हिन्दुओं, ईसाइयों, मुसलमानों या अन्य धर्मावलम्बियों के धर्मग्रन्थोंकी औरोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सही व्याख्या करता हूँ। मुझे आशा है कि मेरे इस विनम्रतापूर्ण दावेके लिए सनातनी, ईसाई और मुसलमान भाई मुझे क्षमा करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३०<noinclude></noinclude> 99i2umnymy091z3b7huwbl9zvi59g4k पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६९ 250 197412 674930 674877 2026-08-29T13:37:33Z Kumari Arpana Sinha 2191 674930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३१०. खरा हिसाब रखनेकी जरूरत'''}}}} सीधे-सादे लोग नमक बेचनेवाले अथवा अन्य प्रकारसे चन्दा करनेवाले स्वयंसेवकोंकी झोलियोंमें अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसा, रुपया अथवा नोट डाल रहे हैं। जिन स्वयंसेवकोंको चन्दा इकट्ठा करने या उचितसे अधिक मूल्यपर नमक बेचनेका अधिकार न दिया गया हो, वे न तो चन्दा इकट्ठा करें और न इस तरह नमक ही बेचें। हिसाब ठीक-ठीक रखा जाये और उसे जब-तब प्रकाशित भी किया जाये। हिसाब किताबोंकी जांच हर हफ्ते लेखा-परीक्षकसे कराई जाये। यदि ऐसे धनाढ्य लोग, जिनकी ईमानदारी अच्छी तरहसे देखी-परखी हो, चन्दोंकी राशियोंके कोषाध्यक्ष बन जायें और कांग्रेसी स्वयंसेवकोंके साथ पूरा सहयोग करते हुए चन्दा इकट्ठा करें तो बहुत अच्छा हो। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को बड़ी तेजीसे गिरफ्तार किया जा रहा है और हो सकता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति आ जाये कि स्थानीय संस्थाओंके लिए चन्देका पैसा संभालना और उसका ठीक हिसाब रखना मुश्किल पड़ जाये। अभी तो स्थिति यह है कि जनताने इस आन्दोलनके खर्चका बोझ अपने सिर उठा लिया है। तो अब हमें इस कार्यको दायित्वको भावनाके साथ और व्यवस्थित ढंगसे सम्पन्न करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९१० {{C|{{larger|३११. शराबकी दुकानोंपर धरना}}}} एक पारसी भाई लिखते हैं१: यदि शरावके व्यापार से ज्यादा लाभ न हो तो पारसी इसे तुरन्त छोड़ देंगे और आपके सभी कार्यों में हाथ बँटाने लगेंगे। क्या आप कोई ऐसा उपाय निकाल सकते हैं जिससे शराब की दुकानोंकी आमदनी बहुत मामूली स्तर पर आ जाये? यह एक जाना-माना तथ्य है कि ये दुकानदार दो तरहसे इतना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। एक तो यह है कि ये नापमें जितनी चाहिए उससे कम शराब देते हैं, और दूसरे, ये मिलावट करते हैं। इस सबके लिए ये आबकारी विभाग के कर्मचारियोंको रिश्वत देकर मिलाये रहते हैं। विचौलियोंके इस मुनाफेको रोकनेका जो एकमात्र उपाय में सुझा सकता हूँ, वह यह है कि सरकारसे इन्दौर और ग्वालियर राज्योंकी तरह 'बोतल-प्रणाली ' शुरू करवाने का आग्रह किया जाये। <small>१. इसके कुछ अंशका ही अनुवाद दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> 6omfwwlu05wvek2f02xucjuzf3fexda 674931 674930 2026-08-29T13:40:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 674931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३१०. खरा हिसाब रखनेकी जरूरत'''}}}} सीधे-सादे लोग नमक बेचनेवाले अथवा अन्य प्रकारसे चन्दा करनेवाले स्वयंसेवकोंकी झोलियोंमें अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसा, रुपया अथवा नोट डाल रहे हैं। जिन स्वयंसेवकोंको चन्दा इकट्ठा करने या उचितसे अधिक मूल्यपर नमक बेचनेका अधिकार न दिया गया हो, वे न तो चन्दा इकट्ठा करें और न इस तरह नमक ही बेचें। हिसाब ठीक-ठीक रखा जाये और उसे जब-तब प्रकाशित भी किया जाये। हिसाब किताबोंकी जांच हर हफ्ते लेखा-परीक्षकसे कराई जाये। यदि ऐसे धनाढ्य लोग, जिनकी ईमानदारी अच्छी तरहसे देखी-परखी हो, चन्दोंकी राशियोंके कोषाध्यक्ष बन जायें और कांग्रेसी स्वयंसेवकोंके साथ पूरा सहयोग करते हुए चन्दा इकट्ठा करें तो बहुत अच्छा हो। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को बड़ी तेजीसे गिरफ्तार किया जा रहा है और हो सकता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति आ जाये कि स्थानीय संस्थाओंके लिए चन्देका पैसा संभालना और उसका ठीक हिसाब रखना मुश्किल पड़ जाये। अभी तो स्थिति यह है कि जनताने इस आन्दोलनके खर्चका बोझ अपने सिर उठा लिया है। तो अब हमें इस कार्यको दायित्वको भावनाके साथ और व्यवस्थित ढंगसे सम्पन्न करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९१० {{C|{{larger|'''३११. शराबकी दुकानोंपर धरना'''}}}} एक पारसी भाई लिखते हैं१: यदि शरावके व्यापार से ज्यादा लाभ न हो तो पारसी इसे तुरन्त छोड़ देंगे और आपके सभी कार्यों में हाथ बँटाने लगेंगे। क्या आप कोई ऐसा उपाय निकाल सकते हैं जिससे शराब की दुकानोंकी आमदनी बहुत मामूली स्तर पर आ जाये? यह एक जाना-माना तथ्य है कि ये दुकानदार दो तरहसे इतना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। एक तो यह है कि ये नापमें जितनी चाहिए उससे कम शराब देते हैं, और दूसरे, ये मिलावट करते हैं। इस सबके लिए ये आबकारी विभाग के कर्मचारियोंको रिश्वत देकर मिलाये रहते हैं। विचौलियोंके इस मुनाफेको रोकनेका जो एकमात्र उपाय मैं सुझा सकता हूँ, वह यह है कि सरकारसे इन्दौर और ग्वालियर राज्योंकी तरह 'बोतल-प्रणाली ' शुरू करवाने का आग्रह किया जाये। <small>१. इसके कुछ अंशका ही अनुवाद दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> fiew4pmbcg2q5qis63ikdmb02ruu2yp 674932 674931 2026-08-29T13:42:00Z Kumari Arpana Sinha 2191 674932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३१०. खरा हिसाब रखनेकी जरूरत'''}}}} सीधे-सादे लोग नमक बेचनेवाले अथवा अन्य प्रकारसे चन्दा करनेवाले स्वयंसेवकोंकी झोलियोंमें अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसा, रुपया अथवा नोट डाल रहे हैं। जिन स्वयंसेवकोंको चन्दा इकट्ठा करने या उचितसे अधिक मूल्यपर नमक बेचनेका अधिकार न दिया गया हो, वे न तो चन्दा इकट्ठा करें और न इस तरह नमक ही बेचें। हिसाब ठीक-ठीक रखा जाये और उसे जब-तब प्रकाशित भी किया जाये। हिसाब किताबोंकी जांच हर हफ्ते लेखा-परीक्षकसे कराई जाये। यदि ऐसे धनाढ्य लोग, जिनकी ईमानदारी अच्छी तरहसे देखी-परखी हो, चन्दोंकी राशियोंके कोषाध्यक्ष बन जायें और कांग्रेसी स्वयंसेवकोंके साथ पूरा सहयोग करते हुए चन्दा इकट्ठा करें तो बहुत अच्छा हो। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को बड़ी तेजीसे गिरफ्तार किया जा रहा है और हो सकता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति आ जाये कि स्थानीय संस्थाओंके लिए चन्देका पैसा संभालना और उसका ठीक हिसाब रखना मुश्किल पड़ जाये। अभी तो स्थिति यह है कि जनताने इस आन्दोलनके खर्चका बोझ अपने सिर उठा लिया है। तो अब हमें इस कार्यको दायित्वको भावनाके साथ और व्यवस्थित ढंगसे सम्पन्न करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९१० {{C|{{larger|'''३११. शराबकी दुकानोंपर धरना'''}}}} एक पारसी भाई लिखते हैं१: '''यदि शरावके व्यापार से ज्यादा लाभ न हो तो पारसी इसे तुरन्त छोड़ देंगे और आपके सभी कार्यों में हाथ बँटाने लगेंगे। क्या आप कोई ऐसा उपाय निकाल सकते हैं जिससे शराब की दुकानोंकी आमदनी बहुत मामूली स्तर पर आ जाये? यह एक जाना-माना तथ्य है कि ये दुकानदार दो तरहसे इतना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। एक तो यह है कि ये नापमें जितनी चाहिए उससे कम शराब देते हैं, और दूसरे, ये मिलावट करते हैं। इस सबके लिए ये आबकारी विभाग के कर्मचारियोंको रिश्वत देकर मिलाये रहते हैं।''' '''विचौलियोंके इस मुनाफेको रोकनेका जो एकमात्र उपाय मैं सुझा सकता हूँ, वह यह है कि सरकारसे इन्दौर और ग्वालियर राज्योंकी तरह 'बोतल-प्रणाली ' शुरू करवाने का आग्रह किया जाये।...''' <small>१. इसके कुछ अंशका ही अनुवाद दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> 861v3wo0ykm8teqn3cvmyga3wje9b9f 674933 674932 2026-08-29T13:46:40Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३१०. खरा हिसाब रखनेकी जरूरत'''}}}} सीधे-सादे लोग नमक बेचनेवाले अथवा अन्य प्रकारसे चन्दा करनेवाले स्वयंसेवकोंकी झोलियोंमें अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसा, रुपया अथवा नोट डाल रहे हैं। जिन स्वयंसेवकोंको चन्दा इकट्ठा करने या उचितसे अधिक मूल्यपर नमक बेचनेका अधिकार न दिया गया हो, वे न तो चन्दा इकट्ठा करें और न इस तरह नमक ही बेचें। हिसाब ठीक-ठीक रखा जाये और उसे जब-तब प्रकाशित भी किया जाये। हिसाब किताबोंकी जांच हर हफ्ते लेखा-परीक्षकसे कराई जाये। यदि ऐसे धनाढ्य लोग, जिनकी ईमानदारी अच्छी तरहसे देखी-परखी हो, चन्दोंकी राशियोंके कोषाध्यक्ष बन जायें और कांग्रेसी स्वयंसेवकोंके साथ पूरा सहयोग करते हुए चन्दा इकट्ठा करें तो बहुत अच्छा हो। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को बड़ी तेजीसे गिरफ्तार किया जा रहा है और हो सकता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति आ जाये कि स्थानीय संस्थाओंके लिए चन्देका पैसा संभालना और उसका ठीक हिसाब रखना मुश्किल पड़ जाये। अभी तो स्थिति यह है कि जनताने इस आन्दोलनके खर्चका बोझ अपने सिर उठा लिया है। तो अब हमें इस कार्यको दायित्वकी भावनाके साथ और व्यवस्थित ढंगसे सम्पन्न करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९१० {{C|{{larger|'''३११. शराबकी दुकानोंपर धरना'''}}}} एक पारसी भाई लिखते हैं१: '''यदि शरावके व्यापार से ज्यादा लाभ न हो तो पारसी इसे तुरन्त छोड़ देंगे और आपके सभी कार्यों में हाथ बँटाने लगेंगे। क्या आप कोई ऐसा उपाय निकाल सकते हैं जिससे शराब की दुकानोंकी आमदनी बहुत मामूली स्तर पर आ जाये? यह एक जाना-माना तथ्य है कि ये दुकानदार दो तरहसे इतना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। एक तो यह है कि ये नापमें जितनी चाहिए उससे कम शराब देते हैं, और दूसरे, ये मिलावट करते हैं। इस सबके लिए ये आबकारी विभाग के कर्मचारियोंको रिश्वत देकर मिलाये रहते हैं।''' '''विचौलियोंके इस मुनाफेको रोकनेका जो एकमात्र उपाय मैं सुझा सकता हूँ, वह यह है कि सरकारसे इन्दौर और ग्वालियर राज्योंकी तरह 'बोतल-प्रणाली' शुरू करवाने का आग्रह किया जाये।...''' <small>१. इसके कुछ अंशका ही अनुवाद दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> s5ljiixfk0od4raijys4sb3i0k318pl 674934 674933 2026-08-29T13:47:15Z Kumari Arpana Sinha 2191 674934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३१०. खरा हिसाब रखनेकी जरूरत'''}}}} सीधे-सादे लोग नमक बेचनेवाले अथवा अन्य प्रकारसे चन्दा करनेवाले स्वयंसेवकोंकी झोलियोंमें अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसा, रुपया अथवा नोट डाल रहे हैं। जिन स्वयंसेवकोंको चन्दा इकट्ठा करने या उचितसे अधिक मूल्यपर नमक बेचनेका अधिकार न दिया गया हो, वे न तो चन्दा इकट्ठा करें और न इस तरह नमक ही बेचें। हिसाब ठीक-ठीक रखा जाये और उसे जब-तब प्रकाशित भी किया जाये। हिसाब किताबोंकी जांच हर हफ्ते लेखा-परीक्षकसे कराई जाये। यदि ऐसे धनाढ्य लोग, जिनकी ईमानदारी अच्छी तरहसे देखी-परखी हो, चन्दोंकी राशियोंके कोषाध्यक्ष बन जायें और कांग्रेसी स्वयंसेवकोंके साथ पूरा सहयोग करते हुए चन्दा इकट्ठा करें तो बहुत अच्छा हो। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को बड़ी तेजीसे गिरफ्तार किया जा रहा है और हो सकता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति आ जाये कि स्थानीय संस्थाओंके लिए चन्देका पैसा संभालना और उसका ठीक हिसाब रखना मुश्किल पड़ जाये। अभी तो स्थिति यह है कि जनताने इस आन्दोलनके खर्चका बोझ अपने सिर उठा लिया है। तो अब हमें इस कार्यको दायित्वकी भावनाके साथ और व्यवस्थित ढंगसे सम्पन्न करना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९१० {{C|{{larger|'''३११. शराबकी दुकानोंपर धरना'''}}}} एक पारसी भाई लिखते हैं१: '''यदि शरावके व्यापार से ज्यादा लाभ न हो तो पारसी इसे तुरन्त छोड़ देंगे और आपके सभी कार्यों में हाथ बँटाने लगेंगे। क्या आप कोई ऐसा उपाय निकाल सकते हैं जिससे शराब की दुकानोंकी आमदनी बहुत मामूली स्तर पर आ जाये? यह एक जाना-माना तथ्य है कि ये दुकानदार दो तरहसे इतना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। एक तो यह है कि ये नापमें जितनी चाहिए उससे कम शराब देते हैं, और दूसरे, ये मिलावट करते हैं। इस सबके लिए ये आबकारी विभाग के कर्मचारियोंको रिश्वत देकर मिलाये रहते हैं।''' '''विचौलियोंके इस मुनाफेको रोकनेका जो एकमात्र उपाय मैं सुझा सकता हूँ, वह यह है कि सरकारसे इन्दौर और ग्वालियर राज्योंकी तरह 'बोतल-प्रणाली' शुरू करवाने का आग्रह किया जाये।...''' <small>१. इसके कुछ अंशका ही अनुवाद दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude> jc08lvb7tf6y09whekdgm3r0eq05gd7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७० 250 197413 674935 669938 2026-08-29T13:54:05Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''दूसरी बात यह है कि आजकल नासिकमें जो शराब तैयार की जाती है, वह आदमीके पीने लायक नहीं होती । सरकारको समान शक्ति(जैसे ३५ से लेकर ४५ तक) की शराब तैयार करानी चाहिए और उसे नासिकमें बोतलबन्द करके बिक्रीके लिए वितरित कर देना चाहिए।...''' '''मेरा तीसरा सुझाव यह है कि शराबकी दुकानोंपर शान्तिपूर्ण ढंगसे धरना देना कठिन है। फिर ऐसा क्यों न किया जाये कि सभी बड़े शहरों और कुछ बड़े-बड़े गाँवोंमें चित्रक्षेपी लालटेनकी पद्धति अथवा सिनेमाके द्वारा लोगोंको शराबके हानि-लाभ समझाये जायें ? ऐसे मद्य-निषेध आन्दो लनका प्रभाव अवश्य होगा। सरकार भी ऐसे आयोजनोंको नहीं रोक सकती और इससे मद्य-निषेध सम्पन्न हो सकेगा।''' यह पत्र सच्चे मनसे लिखा गया है। इसमें इस बातको साफ तौर पर स्वीकार किया गया है कि यदि पारसियोंको शराबका व्यापार छोड़नेपर राजी किया जा सके तो सारे भारतमें नहीं तो कमसे कम बम्बईकी हदतक तो मद्यपानकी समस्याका समाधान बहुत आसान हो जायेगा। लेकिन पत्र लेखकने जो उपाय सुझाये हैं, उनसे काम नहीं चलेगा। चाहे कुछ भी किया जाये, दुनियाके हर कोनेमें शराबका व्यापार अनैतिक ही माना जायेगा। इसलिए इसका एकमात्र सच्चा उपाय मय-निषेध ही है। जिस प्रकार निषेधके बिना चोरीको नहीं रोका जा सकता उसी प्रकार मद्य-निषेधके बिना शराबके व्यापारका नियमन नहीं किया जा सकता। इसमें सन्देह नहीं कि धरना देनेमें हिंसा भड़कने का खतरा मौजूद है। मगर इसीलिए तो मैंने भारतकी बहनोंसे इस कामको अपने हाथोंमें लेनेका अनुरोध किया है। यदि पढ़ी-लिखी बहनें भय और अविश्वास त्याग दें तो अन्य बहनें भी निश्चय ही उनका अनुसरण करेंगी। और जहाँतक पारसी शराब विक्रेताओंका सम्बन्ध है, परोपकारी और दानवीर पारसी लोग उनका भार अपने सिर ले सकते हैं और उनके लिए उपयुक्त धन्धेकी व्यवस्था कर सकते हैं। पारसी नेता इस व्यापारके खिलाफ वातावरण तैयार करके धरना देने के कामको आसान बना सकते हैं। जो भी हो, अगर आत्म शुद्धिकी इस लहरके साथ ही इस व्यापारका अन्त नहीं हो जाता तो मुझे आश्चर्य होगा। इसके लिए जरूरत बस इतनी ही है कि बहनें जुटकर थोड़ा-सा प्रयत्न करें। श्रमिक संघ द्वारा धरना देनेके परिणामस्वरूप अहमदाबादके छः मद्य गृहों में, जहाँ मजदूर लोग पीने आते हैं, अब पहलेकी अपेक्षा सिर्फ १९ प्रतिशत रोजगार चल पाता है। यद्यपि मेरे पास ठीक आंकड़े नहीं हैं, लेकिन मीठूबाईके कार्य क्षेत्र में भी शराबका व्यापार काफी कम हो गया है। और मुझे मालूम है कि इन दोनों स्थानोंमें धरना देनेका काम बड़े ही शान्तिपूर्ण ढंगसे चलता रहा है। कहते हैं, सूरतमें हजारों लोगोंने स्वेच्छा-से आगे आकर शराब न पीनेकी कसम ली है। मीठूबाई पेटिटके उल्लेखसे मुझे मय-निषेधके क्षेत्र में काम करनेवाले दो अन्य पारसियोंका भी स्मरण हो आता है। लोगोंके बीच दरबारी साधु या भिक्षु अथवा<noinclude></noinclude> lw5rsbm3zjdszn1djd1yy11ocia1i1n 674937 674935 2026-08-29T14:01:48Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''दूसरी बात यह है कि आजकल नासिकमें जो शराब तैयार की जाती है, वह आदमीके पीने लायक नहीं होती । सरकारको समान शक्ति(जैसे ३५ से लेकर ४५ तक) की शराब तैयार करानी चाहिए और उसे नासिकमें बोतलबन्द करके बिक्रीके लिए वितरित कर देना चाहिए।...''' '''मेरा तीसरा सुझाव यह है कि शराबकी दुकानोंपर शान्तिपूर्ण ढंगसे धरना देना कठिन है। फिर ऐसा क्यों न किया जाये कि सभी बड़े शहरों और कुछ बड़े-बड़े गाँवोंमें चित्रक्षेपी लालटेनकी पद्धति अथवा सिनेमाके द्वारा लोगोंको शराबके हानि-लाभ समझाये जायें? ऐसे मद्य-निषेध आन्दोलनका प्रभाव अवश्य होगा। सरकार भी ऐसे आयोजनोंको नहीं रोक सकती और इससे मद्य-निषेध सम्पन्न हो सकेगा।''' यह पत्र सच्चे मनसे लिखा गया है। इसमें इस बातको साफ तौर पर स्वीकार किया गया है कि यदि पारसियोंको शराबका व्यापार छोड़नेपर राजी किया जा सके तो सारे भारतमें नहीं तो कमसे कम बम्बईकी हदतक तो मद्यपानकी समस्याका समाधान बहुत आसान हो जायेगा। लेकिन पत्र लेखकने जो उपाय सुझाये हैं, उनसे काम नहीं चलेगा। चाहे कुछ भी किया जाये, दुनियाके हर कोनेमें शराबका व्यापार अनैतिक ही माना जायेगा। इसलिए इसका एकमात्र सच्चा उपाय मध-निषेध ही है। जिस प्रकार निषेधके बिना चोरीको नहीं रोका जा सकता उसी प्रकार मद्य-निषेधके बिना शराबके व्यापारका नियमन नहीं किया जा सकता। इसमें सन्देह नहीं कि धरना देनेमें हिंसा भड़कने का खतरा मौजूद है। मगर इसीलिए तो मैंने भारतकी बहनोंसे इस कामको अपने हाथोंमें लेनेका अनुरोध किया है। यदि पढ़ी-लिखी बहनें भय और अविश्वास त्याग दें तो अन्य बहनें भी निश्चय ही उनका अनुसरण करेंगी। और जहाँतक पारसी शराब विक्रेताओंका सम्बन्ध है, परोपकारी और दानवीर पारसी लोग उनका भार अपने सिर ले सकते हैं और उनके लिए उपयुक्त धन्धेकी व्यवस्था कर सकते हैं। पारसी नेता इस व्यापारके खिलाफ वातावरण तैयार करके धरना देने के कामको आसान बना सकते हैं। जो भी हो, अगर आत्म शुद्धिकी इस लहरके साथ ही इस व्यापारका अन्त नहीं हो जाता तो मुझे आश्चर्य होगा। इसके लिए जरूरत बस इतनी ही है कि बहनें जुटकर थोड़ा-सा प्रयत्न करें। श्रमिक संघ द्वारा धरना देनेके परिणामस्वरूप अहमदाबादके छः मद्य गृहों में, जहाँ मजदूर लोग पीने आते हैं, अब पहलेकी अपेक्षा सिर्फ १९ प्रतिशत रोजगार चल पाता है। यद्यपि मेरे पास ठीक आंकड़े नहीं हैं, लेकिन मीठूबाईके कार्य क्षेत्र में भी शराबका व्यापार काफी कम हो गया है। और मुझे मालूम है कि इन दोनों स्थानोंमें धरना देनेका काम बड़े ही शान्तिपूर्ण ढंगसे चलता रहा है। कहते हैं, सूरतमें हजारों लोगोंने स्वेच्छा-से आगे आकर शराब न पीनेकी कसम ली है। मीठूबाई पेटिटके 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काम कर रही हैं, वह उनके उदारमना पितामहके योग्य ही है। इस काम में निःस्वार्थ भावसे मदद देनेवाले और भी बहुत-से पारसी भाइयोंके नाम में गिना सकता हूँ। इसलिए मुझे पूरी आशा है कि पारसी शराब विक्रेता अपनी बहनोंके अनुरोधको ठुकरायेंगे नहीं। नमक करकी तरह ही शराबके व्यापारका भी अन्त निश्चित है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|३१२. धरना कैसे दें}}}} १. किसी भी शराब अथवा विदेशी कपड़े की दुकानपर धरना देनेके लिए कमसे कम दस स्त्रियोंका होना आवश्यक है। इन दसोंको अपने में से एकको नेता चुन लेना चाहिए। २. इनको सबसे पहले तो एक शिष्टमण्डलके रूपमें विक्रेतासे मिलकर उससे अपना व्यापार बन्द करनेका अनुरोध करना चाहिए और यदि वह शरावका व्यापारीहो तो शराब से सम्बन्धित और विदेशी कपड़ोंका व्यापारी हो तो विदेशी कपड़ोंसे सम्बन्धित तथ्यों तथा आंकड़ोंसे युक्त पर्चे देने चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि पर्चे ऐसी भाषामें होने चाहिए जिसे व्यापारी समझता हो। ३. यदि व्यापारी व्यापार बन्द करने को तैयार न हो तो स्वयंसेविकाओंको दुकानमें जानेके रास्तेको छोड़कर दुकानकी चौकसी करनी चाहिए और जो लोग यहाँ शराब अथवा विदेशी कपड़े खरीदने की इच्छासे आयें उनसे व्यक्तिगत रूपसे वैसा न करनेका अनुरोध करना चाहिए। ४. स्वयंसेविकाओंको अपने हाथोंमें ऐसी प्रचार पताकाएँ अथवा गत्ते आदिके हलके प्रचार- फलक रखने चाहिए जिनपर यदि वे शराबकी दुकानपर धरना दे रही हों तो शराबके खिलाफ और विदेशी कपड़ोंकी दुकानपर धरना दे रही हों तो विदेशी कपड़ोंके खिलाफ, बड़े-बड़े अक्षरोंमें चेतावनियाँ लिखी हों। ५. यथासम्भव स्वयंसेविकाओंको वर्दी पहने हुए होना चाहिए। ६. उन्हें बीच-बीचमें अपने विषयसे सम्बन्धित उपयुक्त भजन गाते रहना चाहिए। ७. यदि पुरुष उनकी ओरसे जोर-जबरदस्ती अथवा दस्तन्दाजी करें तो उन्हें उनको रोकना चाहिए।<noinclude></noinclude> pt0p6elk2jd3peq20hce3os3ghmhbmo 674940 674939 2026-08-29T14:26:40Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||धरना कैसे दें|३२७}}</noinclude>संन्यासीके नामसे विख्यात धनजी शाह, जो अब नमक- कानूनके अधीन जेल चले गये हैं, जहाँ में यह लेख लिख रहा हूँ, उस गांवमें कई वर्षोंसे काम करते रहे हैं। मैंने जो दांडीसे कराडी 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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७२ 250 197415 674941 669940 2026-08-29T14:35:38Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित नहीं */ 674941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>८. किसी भी हालत में अश्लील भाषा, गाली-गलौज, धमकियों अथवा अशोभन भाषाका प्रयोग नहीं करना चाहिए। ९. लोगोंको अपनी बात डरा-धमकाकर या जोर-जबरदस्ती नहीं, बल्कि अनुनय-विनय और तर्कके द्वारा समझानी चाहिए। १०. जहाँ धरना दिया जा रहा हो, वहाँ पुरुषोंको किसी भी कारणसे एकत्र न होना चाहिए और न आने-जानेका रास्ता ही रोकना चाहिए। इसके विपरीत उन्हें आम तौर पर आसपास के क्षेत्रोंमें विदेशी कपड़ों और शराबके खिलाफ प्रचार करना चाहिए। उन्हें स्त्रियोंके ऐसे जलूस निकालने चाहिए और इस तरहके जलूस निकालने में मदद करनी चाहिए जो आसपासके इलाकों में घूम-घूमकर मद्य निषेध और खादीका सन्देश पहुँचायें तथा लोगोंको शराब और विदेशी कपड़ोंके त्यागकी आवश्यकता समझायें। ११. इन धरना एकांशोंके पीछे ऐसे संगठनोंका एक पूरा जाल-सा बिछा होना चाहिए जो तकली और चरखेका सन्देश फैलायें और सोच-सोचकर नये-नये पर्चे और प्रचारके नये-नये तरीके निकालें। १२. सारी आमदनी और खर्चका बिलकुल ठीक-ठीक और व्यवस्थित हिसाव रखना चाहिए। इस हिसाबको समय-समयपर लेखा परीक्षकसे जँचवा लिया जाये। यह काम भी स्त्रियोंकी देख-रेख में पुरुष ही करें। इस सारी योजनाकी अवधारणा यह मानकर की गई है कि पुरुष स्त्रियोंके प्रति सच्चे आदर भावसे काम लेंगे और उनकी उन्नतिकी सच्ची भावनासे अनुप्राणित होंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१३. हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार'''}}}} यदि हम अपना कर्त्तव्य पूरा करेंगे और विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके उद्देश्य और उसकी सफलताकी शर्तोंको समझनेकी कोशिश करेंगे तो यह बहिष्कार अब सम्पन्न होने ही वाला है। नीचे मैं अपनी जो मान्यताएँ प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, ये किन तर्कों पर आधारित है, इसका विचार मैं यहाँ नहीं करूँगा। वे तर्क तो इन स्तम्भों में कई बार पेश किये जा चुके हैं। छापनेके लिए आँकड़े में तैयार करवा रहा हूँ। लेकिन इस समय तो मैं जिन लोगोंकी मेरे निष्कर्षो में रुचि हो उनके लिए अपने निष्कर्ष ही दे रहा हूँ। पक्ष-विपक्ष के सभी कारणों और दलीलोंपर निष्पक्ष भावसे विचार करनेके बाद ही मैंने ये निष्कर्ष निकाले है: १. हम सम्पूर्ण बहिष्कारके जितने समयमें सम्पन्न हो जानेकी आशा रखते हैं, उतने समय में देशी मिलें अपनी क्षमता इतनी बढ़ा लेंगी कि वे बहिष्कारके परिणाम- स्वरूप होनेवाली कपड़ेकी कमीको पूरा कर पायेंगी, यह सम्भव नहीं है।<noinclude></noinclude> gdfs8nsr5clrycnb1k367qao5x6m587 674942 674941 2026-08-29T14:37:58Z Kumari Arpana Sinha 2191 674942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>८. किसी भी हालत में अश्लील भाषा, गाली-गलौज, धमकियों अथवा अशोभन भाषाका प्रयोग नहीं करना चाहिए। ९. लोगोंको अपनी बात डरा-धमकाकर या जोर-जबरदस्ती नहीं, बल्कि अनुनय-विनय और तर्कके द्वारा समझानी चाहिए। १०. जहाँ धरना दिया जा रहा हो, वहाँ पुरुषोंको किसी भी कारणसे एकत्र न होना चाहिए और न आने-जानेका रास्ता ही रोकना चाहिए। इसके विपरीत उन्हें आम तौर पर आसपास के क्षेत्रोंमें विदेशी कपड़ों और शराबके खिलाफ प्रचार करना चाहिए। उन्हें 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प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, ये किन तर्कों पर आधारित है, इसका विचार मैं यहाँ नहीं करूँगा। वे तर्क तो इन स्तम्भों में कई बार पेश किये जा चुके हैं। छापनेके लिए आँकड़े में तैयार करवा रहा हूँ। लेकिन इस समय तो मैं जिन लोगोंकी मेरे निष्कर्षो में रुचि हो उनके लिए अपने निष्कर्ष ही दे रहा हूँ। पक्ष-विपक्ष के सभी कारणों और दलीलोंपर निष्पक्ष भावसे विचार करनेके बाद ही मैंने ये निष्कर्ष निकाले है: १. हम सम्पूर्ण बहिष्कारके जितने समयमें सम्पन्न हो जानेकी आशा रखते हैं, उतने समय में देशी मिलें अपनी क्षमता इतनी बढ़ा लेंगी कि वे बहिष्कारके परिणाम- स्वरूप होनेवाली कपड़ेकी कमीको पूरा कर पायेंगी, यह सम्भव नहीं है।<noinclude></noinclude> hcchd52d9tk5xm11mhwd5co677k0jcu 674978 674942 2026-08-29T16:19:50Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674978 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>८. किसी भी हालत में अश्लील भाषा, गाली-गलौज, धमकियों अथवा अशोभन भाषाका प्रयोग नहीं करना चाहिए। ९. लोगोंको अपनी बात डरा-धमकाकर या 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सूझ-बूझ तथा ईमानदारीके भरोसे काम करनेकछोड़ दें। ८. यह अन्तिम बात तभी सम्भव हो सकती है जब हम बहिष्कारसे हुई कपड़ेकी कमीको ऐसे कपड़ोंसे पूरा कर सकें जो हमारी मिलोंके बने हुए न हों। यह कमी तो सादीसे ही पूरी की जा सकती है। ९. यदि लोगोंमें खादीकी भावना और खादी तैयार करनेका संकल्प जगा दिया जाये तो महीने भरके अन्दर बिना किसी कठिनाईके बेशुमार खादी तैयार की जा सकती है। १०. कुशल बुनकर सारे भारतमें मिल सकते हैं। समस्या सिर्फ बुनाईकी है। ११. जिनमें सीखने की इच्छा और मेहनत करनेकी तत्परता हो वे कताई तथा उससे सम्बन्धित सारी प्रक्रिया हफ्ते भरमें सीख सकते हैं। १२. भारत जितनी रुई पैदा करता है, वह उसकी तमाम जरूरतोंके लिए काफी है। १३. इसलिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके लिए काम करनेवाले सभी लोगोंको अपना ध्यान हाथ कलाई द्वारा खादी उत्पादनपर केन्द्रित करना चाहिए। इसका मतलब कोई स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंका बहिष्कार न लगाये। यह तो बस बुद्धिपूर्वक इस तथ्यको स्वीकार करना ही है कि मिलोंको अपने कपड़े बेचने के लिए किसी खास कोशिशको जरूरत नहीं है और बहिष्कार आन्दोलनसे स्वदेशी मिलोंको मदद भी काफी मिलती है, क्योंकि इसका उद्देश्य अपने देशके बाजारसे उस विदेशी कपड़ेको हटाना है जो स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंसे होड़ लेता है और उसका दम उसी तरह घोट रहा है जिस तरह उसने चरखेका सफाया कर दिया। इसलिए मिलोंके लिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको सम्पन्न करानेसे अधिक कुछ करने का मतलब खादीको नुकसान पहुँचाना होगा।<noinclude></noinclude> ehqwdy9i7t6lfznymba2chi586t8s8t 674979 674943 2026-08-29T16:23:14Z Kumari Arpana Sinha 2191 674979 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार|३२९}}</noinclude>२. भारतमें बड़ी सभी मिलें स्वदेशी नहीं हैं। कुछ तो उतनी ही विदेशी ह जितनी विदेशी यह सरकार है; सो इस तरह कि वे देशके धनको विदेशमें ले जानेके साधनका काम कर रही है। ये यूरोपीयोंकी स्वार्थ सिद्धिके गढ़ हैं, जहाँ भारतीय केवल मजदूरोंकी हैसियतसे ही काम करते हैं। ३. अधिकांश स्वदेशी मिलें केवल-या मुख्य रूपसे भी राष्ट्रीय हितोंके लिए काम नहीं करेंगी। ४. अगर वे करेंगी भी तो सरकार उन्हें तरह-तरहसे कुचल दे सकती है। ५. अधिकांश मिलें वर्तमान अनुकूल अवसरसे 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खादी उत्पादनपर केन्द्रित करना चाहिए। इसका मतलब कोई स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंका बहिष्कार न लगाये। यह तो बस बुद्धिपूर्वक इस तथ्यको स्वीकार करना ही है कि मिलोंको अपने कपड़े बेचने के लिए किसी खास कोशिशको जरूरत नहीं है और बहिष्कार आन्दोलनसे स्वदेशी मिलोंको मदद भी काफी मिलती है, क्योंकि इसका उद्देश्य अपने देशके बाजारसे उस विदेशी कपड़ेको हटाना है जो स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंसे होड़ लेता है और उसका दम उसी तरह घोट रहा है जिस तरह उसने चरखेका सफाया कर दिया। इसलिए मिलोंके लिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको सम्पन्न करानेसे अधिक कुछ करने का मतलब खादीको नुकसान पहुँचाना होगा।<noinclude></noinclude> 0plkyjdcbu5f98t337nqltzwbvhgl53 674986 674979 2026-08-29T16:41:47Z Kumari Arpana Sinha 2191 674986 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार|३२९}}</noinclude>२. भारतमें बड़ी सभी मिलें स्वदेशी नहीं हैं। कुछ तो उतनी ही विदेशी ह जितनी विदेशी यह सरकार है; सो इस तरह कि वे देशके धनको विदेशमें ले जानेके साधनका काम कर रही है। ये यूरोपीयोंकी स्वार्थ सिद्धिके गढ़ हैं, जहाँ भारतीय केवल मजदूरोंकी हैसियतसे ही काम करते हैं। ३. अधिकांश स्वदेशी मिलें केवल-या मुख्य रूपसे भी राष्ट्रीय हितोंके लिए काम नहीं करेंगी। ४. अगर वे करेंगी भी तो सरकार उन्हें तरह-तरहसे कुचल दे सकती है। ५. अधिकांश मिलें वर्तमान अनुकूल अवसरसे नाजायज फायदा उठानेका लोभ संवरण नहीं कर पायेंगी। ६. बहुत-सी मिलें बुनाईके लिए- विशेष रूपसे किनारोंके लिए सूत इस्तेमाल करती हैं। ७. मिलोंका उपयोग हमारे लिए तभी है जब हम यह मानकर चलें कि बहिष्कारसे होनेवाली कपड़ेकी कमी पूरी करना उनके बसकी बात नहीं है और ऐसा समझकर हम उन्हें अपनी शक्ति और सूझ-बूझ तथा ईमानदारीके भरोसे काम करनेकछोड़ दें। ८. यह अन्तिम बात तभी सम्भव हो सकती है जब हम बहिष्कारसे हुई कपड़ेकी कमीको ऐसे कपड़ोंसे पूरा कर सकें जो हमारी मिलोंके बने हुए न हों। यह कमी तो खादीसे ही पूरी की जा सकती है। ९. यदि लोगोंमें खादीकी भावना और खादी तैयार करनेका संकल्प जगा दिया जाये तो महीने भरके अन्दर बिना किसी कठिनाईके बेशुमार खादी तैयार की जा सकती है। १०. कुशल बुनकर सारे भारतमें मिल सकते हैं। समस्या सिर्फ बुनाईकी है। ११. जिनमें सीखने की इच्छा और मेहनत करनेकी तत्परता हो वे कताई तथा उससे सम्बन्धित सारी प्रक्रिया हफ्ते भरमें सीख सकते हैं।{{x-smaller|}} १२. भारत जितनी रुई पैदा करता है, वह उसकी तमाम जरूरतोंके लिए काफी है। १३. इसलिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके लिए काम करनेवाले सभी लोगोंको अपना ध्यान हाथ कलाई द्वारा खादी उत्पादनपर केन्द्रित करना चाहिए। इसका मतलब कोई स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंका बहिष्कार न लगाये। यह तो बस बुद्धिपूर्वक इस तथ्यको स्वीकार करना ही है कि मिलोंको अपने कपड़े बेचने के लिए किसी खास कोशिशकी जरूरत नहीं है और बहिष्कार आन्दोलनसे स्वदेशी मिलोंको मदद भी काफी मिलती है, क्योंकि इसका उद्देश्य अपने देशके बाजारसे उस विदेशी कपड़ेको हटाना है जो स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंसे होड़ लेता है और उसका दम उसी तरह घोट रहा है जिस तरह उसने चरखेका सफाया कर दिया। इसलिए मिलोंके लिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको सम्पन्न करानेसे अधिक कुछ करने का मतलब खादीको नुकसान पहुँचाना होगा।<noinclude></noinclude> n0dwvmu49u7h9j8t5182lyeyotd8lgq 674987 674986 2026-08-29T16:42:06Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674987 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार|३२९}}</noinclude>२. भारतमें बड़ी सभी मिलें स्वदेशी नहीं हैं। कुछ तो उतनी ही विदेशी ह जितनी विदेशी यह सरकार है; सो इस तरह कि वे देशके धनको विदेशमें ले जानेके साधनका काम कर रही है। ये यूरोपीयोंकी स्वार्थ सिद्धिके गढ़ हैं, जहाँ भारतीय केवल मजदूरोंकी हैसियतसे ही काम करते हैं। ३. अधिकांश स्वदेशी मिलें केवल-या मुख्य रूपसे भी राष्ट्रीय हितोंके लिए काम नहीं करेंगी। ४. अगर वे करेंगी भी तो सरकार उन्हें तरह-तरहसे कुचल दे सकती है। ५. अधिकांश मिलें वर्तमान अनुकूल अवसरसे नाजायज फायदा उठानेका लोभ संवरण नहीं कर पायेंगी। ६. बहुत-सी मिलें बुनाईके लिए- विशेष रूपसे किनारोंके लिए सूत इस्तेमाल करती हैं। ७. मिलोंका उपयोग हमारे लिए तभी है जब हम यह मानकर चलें कि बहिष्कारसे होनेवाली कपड़ेकी कमी पूरी करना उनके बसकी बात नहीं है और ऐसा समझकर हम उन्हें अपनी शक्ति और सूझ-बूझ तथा ईमानदारीके भरोसे काम करनेकछोड़ दें। ८. यह अन्तिम बात तभी सम्भव हो सकती है जब हम बहिष्कारसे हुई कपड़ेकी कमीको ऐसे कपड़ोंसे पूरा कर सकें जो हमारी मिलोंके बने हुए न हों। यह कमी तो खादीसे ही पूरी की जा सकती है। ९. यदि लोगोंमें खादीकी भावना और खादी तैयार करनेका संकल्प जगा दिया जाये तो महीने भरके अन्दर बिना किसी कठिनाईके बेशुमार खादी तैयार की जा सकती है। १०. कुशल बुनकर सारे भारतमें मिल सकते हैं। समस्या सिर्फ बुनाईकी है। ११. जिनमें सीखने की इच्छा और मेहनत करनेकी तत्परता हो वे कताई तथा उससे सम्बन्धित सारी प्रक्रिया हफ्ते भरमें सीख सकते हैं।{{x-smaller|}} १२. भारत जितनी रुई पैदा करता है, वह उसकी तमाम जरूरतोंके लिए काफी है। १३. इसलिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके लिए काम करनेवाले सभी लोगोंको अपना ध्यान हाथ कलाई द्वारा खादी उत्पादनपर केन्द्रित करना चाहिए। इसका मतलब कोई स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंका बहिष्कार न लगाये। यह तो बस बुद्धिपूर्वक इस तथ्यको स्वीकार करना ही है कि मिलोंको अपने कपड़े बेचने के लिए किसी खास कोशिशकी जरूरत नहीं है और बहिष्कार आन्दोलनसे स्वदेशी मिलोंको मदद भी काफी मिलती है, क्योंकि इसका उद्देश्य अपने देशके बाजारसे उस विदेशी कपड़ेको हटाना है जो स्वदेशी मिलोंके कपड़ोंसे होड़ लेता है और उसका दम उसी तरह घोट रहा है जिस तरह उसने चरखेका सफाया कर दिया। इसलिए मिलोंके लिए विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको सम्पन्न करानेसे अधिक कुछ करने का मतलब खादीको नुकसान पहुँचाना होगा।<noinclude></noinclude> r3cejfqujn0ta9dt9lrtwamiryuvx0k पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७४ 250 197417 674944 669942 2026-08-29T15:04:56Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>३३० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय यदि मिल मालिक चाहें तो जिन मिलोंका स्वामित्व, नियन्त्रण और प्रबन्ध भारतीयोंके हाथों में है, जो बुनाईके लिए विदेशी सूतका उपयोग बिलकुल नहीं करतीं,जो खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा तैयार नहीं करेंगी, अपने कपड़ोंके लिए खादी नामका इस्तेमाल न करेंगी और न अपने कपड़ोंपर चिपकाये जानेवाले लेवलोंपर चरखेकी तसवीर ही छापेंगी तथा जो मूल्योंमें भी वृद्धि नहीं करेंगी, ऐसी मिलोंकी सूची प्रकाशित करके खादीके बलपर बहिष्कारकी योजनाको सफल बनाने में सहायता दे सकते हैं। मेरा यह निश्चित मत है कि जो लोग बहिष्कार के लिए प्रचार तो करते हैं, लेकिन इस बातपर जोर नहीं देते कि बहिष्कार करनेवाले लोगोंको खुद सूत कात-कर अथवा अन्य लोगोंको कातनेके लिए राजी करके खादी उत्पादनमें सहायता देनी चाहिए और इस प्रकार जो लोग स्वदेशीके अर्थोको पूरी तरह समझे बिना उसकी बात करते रहते हैं, वे इस आन्दोलनको यदि वास्तवमें हानि नहीं पहुँचाते तो इसकी प्रगति के मार्ग में बाधक तो जरूर होते हैं। वहिष्कार करनेवालों को अपने निश्चित मार्गसे विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही फिलहाल वे खादीकी माँग पूरी करनेमें असमर्थ ही क्यों न हों। वे यह याद रखें कि यही क्षण खादीके उत्पादनके लिए सबसे उपयुक्त है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। आवश्यकता किसी नियमको नहीं जानती, क्योंकि वह तो नये नियमोंका आविष्कार करती है। यदि लोग कातनेको कहे जानेपर विदेशी कपड़ेको त्यागनेसे इनकार कर दें तो इसपर उन्हें चिन्ता नहीं होनी चाहिए। यह संयम बहिष्कार आन्दोलनको वास्तवमें गति देगा। यह कोई थोथा सिद्धान्त नहीं है। जिस प्रकार हम स्वराज्य अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि इसलिए चाहते हैं कि हम उसके बिना जी नहीं सकते, उसी प्रकार हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार भी अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि करोड़ों क्षुधार्त्त लोगोंको चरखेके द्वारा काम और इस प्रकार भोजन देनेके लिए करना है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१४. तकलीके द्वारा बहिष्कार'''}}}} डॉ० पट्टाभि सीतारमैया वर्षोंसे सहकारी बैंकिंग में दिलचस्पी रखते आये हैं और इसके सिवा वे आन्ध्रमें खादीके विशेषज्ञ हैं; अतः यह माना जा सकता है कि उन्होंने जो आंकड़े दिये हैं वे सोच-समझकर दिये हैं। उन्होंने हिसाब लगाया है कि ५० लाख चरखोंपर प्रतिदिन पांच घंटेके हिसाब से इतना सूत काता जा सकता है जिससे उस सारे विदेशी वस्त्रकी कमी पूरी की जा सकती है जिसका हमें बहिष्कार करना है। उनका विचार है कि भारतके घरोंमें पहलेसे ही इतने चरखे विद्यमान हैं। लेकिन उन चरखोंको प्रकाशमें लाने और उनपर कताई शुरू करवाने में अभी हमें थोड़ा समय लगेगा । कताईके वातावरणसे उत्पन्न होनेवाली मांगको पूरा करनेके लिए हमें जितनी जल्दी नये चरसे बना सकने चाहिए उतनी जल्दी हम नहीं बना सकते। और फिर<noinclude></noinclude> gaab6dvyoblvzhpcat8oyhmed01io99 674945 674944 2026-08-29T15:06:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 674945 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यदि मिल मालिक चाहें तो जिन मिलोंका स्वामित्व, नियन्त्रण और प्रबन्ध भारतीयोंके हाथों में है, जो बुनाईके लिए विदेशी सूतका उपयोग बिलकुल नहीं करतीं,जो खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा तैयार नहीं करेंगी, अपने कपड़ोंके लिए खादी नामका इस्तेमाल न करेंगी और न अपने कपड़ोंपर चिपकाये जानेवाले लेवलोंपर चरखेकी तसवीर ही छापेंगी तथा जो मूल्योंमें भी वृद्धि नहीं करेंगी, ऐसी मिलोंकी सूची प्रकाशित करके खादीके बलपर बहिष्कारकी योजनाको सफल बनाने में सहायता दे सकते हैं। मेरा यह निश्चित मत है कि जो लोग बहिष्कार के लिए प्रचार तो करते हैं, लेकिन इस बातपर जोर नहीं देते कि बहिष्कार करनेवाले लोगोंको खुद सूत कात-कर अथवा अन्य लोगोंको कातनेके लिए राजी करके खादी उत्पादनमें सहायता देनी चाहिए और इस प्रकार जो लोग स्वदेशीके अर्थोको पूरी तरह समझे बिना उसकी बात करते रहते हैं, वे इस आन्दोलनको यदि वास्तवमें हानि नहीं पहुँचाते तो इसकी प्रगति के मार्ग में बाधक तो जरूर होते हैं। वहिष्कार करनेवालों को अपने निश्चित मार्गसे विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही फिलहाल वे खादीकी माँग पूरी करनेमें असमर्थ ही क्यों न हों। वे यह याद रखें कि यही क्षण खादीके उत्पादनके लिए सबसे उपयुक्त है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। आवश्यकता किसी नियमको नहीं जानती, क्योंकि वह तो नये नियमोंका आविष्कार करती है। यदि लोग कातनेको कहे जानेपर विदेशी कपड़ेको त्यागनेसे इनकार कर दें तो इसपर उन्हें चिन्ता नहीं होनी चाहिए। यह संयम बहिष्कार आन्दोलनको वास्तवमें गति देगा। यह कोई थोथा सिद्धान्त नहीं है। जिस प्रकार हम स्वराज्य अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि इसलिए चाहते हैं कि हम उसके बिना जी नहीं सकते, उसी प्रकार हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार भी अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि करोड़ों क्षुधार्त्त लोगोंको चरखेके द्वारा काम और इस प्रकार भोजन देनेके लिए करना है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१४. तकलीके द्वारा बहिष्कार'''}}}} डॉ० पट्टाभि सीतारमैया वर्षोंसे सहकारी बैंकिंग में दिलचस्पी रखते आये हैं और इसके सिवा वे आन्ध्रमें खादीके विशेषज्ञ हैं; अतः यह माना जा सकता है कि उन्होंने जो आंकड़े दिये हैं वे सोच-समझकर दिये हैं। उन्होंने हिसाब लगाया है कि ५० लाख चरखोंपर प्रतिदिन पांच घंटेके हिसाब से इतना सूत काता जा सकता है जिससे उस सारे विदेशी वस्त्रकी कमी पूरी की जा सकती है जिसका हमें बहिष्कार करना है। उनका विचार है कि भारतके घरोंमें पहलेसे ही इतने चरखे विद्यमान हैं। लेकिन उन चरखोंको प्रकाशमें लाने और उनपर कताई शुरू करवाने में अभी हमें थोड़ा समय लगेगा । कताईके वातावरणसे उत्पन्न होनेवाली मांगको पूरा करनेके लिए हमें जितनी जल्दी नये चरसे बना सकने चाहिए उतनी जल्दी हम नहीं बना सकते। और फिर<noinclude></noinclude> 6crvhn5zlkf41u9hj1fp204vos6hrzc 674946 674945 2026-08-29T15:07:05Z Kumari Arpana Sinha 2191 674946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यदि मिल मालिक चाहें तो जिन मिलोंका स्वामित्व, नियन्त्रण और प्रबन्ध भारतीयोंके हाथों में है, जो बुनाईके लिए विदेशी सूतका उपयोग बिलकुल नहीं करतीं,जो खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा तैयार नहीं करेंगी, अपने कपड़ोंके लिए खादी नामका इस्तेमाल न करेंगी और न अपने कपड़ोंपर चिपकाये जानेवाले लेवलोंपर चरखेकी तसवीर ही छापेंगी तथा जो मूल्योंमें भी वृद्धि नहीं करेंगी, ऐसी मिलोंकी सूची प्रकाशित करके खादीके बलपर बहिष्कारकी योजनाको सफल बनाने में सहायता दे सकते हैं। मेरा यह निश्चित मत है कि जो लोग बहिष्कार के लिए प्रचार तो करते हैं, लेकिन इस बातपर जोर नहीं देते कि बहिष्कार करनेवाले लोगोंको खुद सूत कात-कर अथवा अन्य लोगोंको कातनेके लिए राजी करके खादी उत्पादनमें सहायता देनी चाहिए और इस प्रकार जो लोग स्वदेशीके अर्थोको पूरी तरह समझे बिना उसकी बात करते रहते हैं, वे इस आन्दोलनको यदि वास्तवमें हानि नहीं पहुँचाते तो इसकी प्रगति के मार्ग में बाधक तो जरूर होते हैं। वहिष्कार करनेवालों को अपने निश्चित मार्गसे विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही फिलहाल वे खादीकी माँग पूरी करनेमें असमर्थ ही क्यों न हों। वे यह याद रखें कि यही क्षण खादीके उत्पादनके लिए सबसे उपयुक्त है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। आवश्यकता किसी नियमको नहीं जानती, क्योंकि वह तो नये नियमोंका आविष्कार करती है। यदि लोग कातनेको कहे जानेपर विदेशी कपड़ेको त्यागनेसे इनकार कर दें तो इसपर उन्हें चिन्ता नहीं होनी चाहिए। 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करके खादी उत्पादनमें सहायता देनी चाहिए और इस प्रकार जो लोग स्वदेशीके अर्थोको पूरी तरह समझे बिना उसकी बात करते रहते हैं, वे इस आन्दोलनको यदि वास्तवमें हानि नहीं पहुँचाते तो इसकी प्रगति के मार्ग में बाधक तो जरूर होते हैं। वहिष्कार करनेवालों को अपने निश्चित मार्गसे विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही फिलहाल वे खादीकी माँग पूरी करनेमें असमर्थ ही क्यों न हों। वे यह याद रखें कि यही क्षण खादीके उत्पादनके लिए सबसे उपयुक्त है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। आवश्यकता किसी नियमको नहीं जानती, क्योंकि वह तो नये नियमोंका आविष्कार करती है। यदि लोग कातनेको कहे जानेपर विदेशी कपड़ेको त्यागनेसे इनकार कर दें तो इसपर उन्हें चिन्ता नहीं होनी चाहिए। यह संयम बहिष्कार आन्दोलनको वास्तवमें गति देगा। यह कोई थोथा सिद्धान्त नहीं है। जिस प्रकार हम स्वराज्य अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि इसलिए चाहते हैं कि हम उसके बिना जी नहीं सकते, उसी प्रकार हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार भी अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि करोड़ों क्षुधार्त्त लोगोंको चरखेके द्वारा काम और इस प्रकार भोजन देनेके लिए करना है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१४. तकलीके द्वारा बहिष्कार'''}}}} डॉ० पट्टाभि सीतारमैया वर्षोंसे सहकारी बैंकिंग में दिलचस्पी रखते आये हैं और इसके सिवा वे आन्ध्रमें खादीके विशेषज्ञ हैं; अतः यह माना जा सकता है कि उन्होंने जो आंकड़े दिये हैं वे सोच-समझकर दिये हैं। उन्होंने हिसाब लगाया है कि ५० लाख चरखोंपर प्रतिदिन पांच घंटेके हिसाब से इतना सूत काता जा सकता है जिससे उस सारे विदेशी वस्त्रकी कमी पूरी की जा सकती है जिसका हमें बहिष्कार करना है। उनका विचार है कि भारतके घरोंमें पहलेसे ही इतने चरखे विद्यमान हैं। लेकिन उन चरखोंको प्रकाशमें लाने और उनपर कताई शुरू करवाने में अभी हमें थोड़ा समय लगेगा । कताईके वातावरणसे उत्पन्न होनेवाली मांगको पूरा करनेके लिए हमें जितनी जल्दी नये चरसे बना सकने चाहिए उतनी जल्दी हम नहीं बना सकते। और फिर<noinclude></noinclude> to928ny3cpv2d3xfklb5qzg29bx92ou पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७५ 250 197418 674947 669943 2026-08-29T15:12:17Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी । यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: तकली कैसे बनायें १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जा सकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छील- कर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये I Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 9tskzh0k8yokbcnjjyhmpa2za4xjnpf 674948 674947 2026-08-29T15:32:42Z Kumari Arpana Sinha 2191 674948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{'''larger|तकली कैसे बनायें'''}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> 4yfwd5q4ytr9vkzacr4iseqs4msrrvm 674949 674948 2026-08-29T15:33:19Z Kumari Arpana Sinha 2191 674949 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{'''larger|तकली कैसे बनायें'''}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ 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काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{'''larger|तकली कैसे बनायें'''}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> 3lqh5mper4oy5vr98r0vhz44npzah1h 674951 674950 2026-08-29T15:39:38Z Kumari Arpana Sinha 2191 674951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{larger|'''तकली कैसे बनायें'''}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> 6f7zvnmp6njyq4iikg1zrxl2ytn30sb 674952 674951 2026-08-29T15:40:29Z Kumari Arpana Sinha 2191 674952 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{larger|'''तकली कैसे बनायें'''}}}}£ १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> j2wj3vx0l4hf5lkdsbzlg13s5h3adzh 674953 674952 2026-08-29T15:41:14Z Kumari Arpana Sinha 2191 674953 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रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{larger|'''तकली कैसे बनायें'''}}}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> jl6th58qaae39shieh8gp440jb6iuv2 675141 674953 2026-08-30T07:34:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675141 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्ति- की कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे ही हमारा तो सिर एक घंटा काम कर इसमें कोई अनोखी जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अनेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{larger|'''तकली कैसे बनायें'''}}}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसे आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जासकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूला चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> aaq2g6bikrg0u9tl7k52qsmfja1pd2y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७६ 250 197419 674957 669944 2026-08-29T15:54:58Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674957 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>५. तकलीकी जांच करनेके लिए उसे समतल जगहपर घुमायें। अगर यह लट्टूके समान घूमती हो तब तो यह ठीक है। अगर नहीं घूमती तो समझ लें कि या तो छेद सीधा नहीं है अथवा टिकुलीके बीचों-बीच नहीं है अथवा बाँसकी छड़की नोक एक जैसी नहीं है। तकलीके दोषका पता लगाना और उसे ठीक करना बहुत आसान है। तकलीपर लगातार एक सप्ताह तक अभ्यास करनेके बाद जो सबसे ज्यादा सूत काता गया वह प्रति घंटा ११० गज था और तकली बनाने में केवल आधा घंटा लगता है। तकली बनाना समय व्यापनका अच्छा साधन है और कातना एक रचनात्मक मनोरंजन। यह व्यथित हृदयको शान्ति प्रदान करता है और एक मूक साथी है। चरखा गुंजन करता है और इसलिए कह सकते हैं, वह आपका ध्यान बँटाता है। तकलीमें कोई आवाज नहीं होती, यह उसकी एक खूबी है और इस तरह यह शायद करोड़ों मूक प्राणियोंका सही प्रतिनिधित्व करती है। आप भी इसे चलायें और आप भी उसी प्रसन्नताका अनुभव करेंगे जिस प्रसन्नताका अनुभव हममें से कई लोग करते हैं। कुछ भी हो, जो भी स्त्री अथवा पुरुष चरखा चलाता है वह देशकी सम्पत्ति में वृद्धि करता है और बहिष्कार आन्दोलनको गति प्रदान करता है तथा इस तरह स्वराज्यको दिन-प्रति-दिन निकट लाता है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|३१५. विदेशी कपड़ोंके व्यापारी}}}} मैंने विदेशी वस्त्र- बहिष्कारके प्रश्नके सम्बन्धमें पत्र- प्रतिनिधियोंके सम्मुख अपने विचार रख दिये हैं। व्यापारियोंमें जो घबराहट पाई जाती है उससे देशके प्रति उनके विश्वासका अभाव सूचित होता है। यदि उन्हें इस बातका पूरा यकीन है कि निकट भविष्य में स्वराज्य आनेवाला है तो वे शतकी और समय दिये जानेकी माँग क्यों करते है? वे बिना किसी शर्तके आगे क्यों नहीं आते और इसे ज्यादा निश्चित क्यों नहीं बना देते ? अनिश्चयकी यह स्थिति स्वराज्य के वातावरणको बल प्रदान करनेके स्थानपर कमजोर बनाती है और लोगोंके हृदयोंमें सन्देह उत्पन्न करती है। यह आन्दोलन मुख्य रूपसे विश्वासपर आधारित है। हममें ऐसा कोई मूलभूत दोष नहीं है जिससे हम स्वराज्यके अनुपयुक्त ठहरते हों। यह तो हमारा भ्रम है, जो हमें, तीस करोड़की आबादीवाले इस राष्ट्रको असहाय और अपनी क्षमताके विषयमें शंकालु बनाता है। विदेशी कपड़े व्यापारी अपनी गोलमोल बातोंके द्वारा इस भ्रमको पुष्ट न करें। उन्हें अपने-आपको इससे मुक्त करना चाहिए तथा उसे दूर करनेमें औरोंकी भी सहायता करनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें<noinclude></noinclude> btx78a4pkkd0ywu3qxo7lnmpggblj5j 674959 674957 2026-08-29T15:55:29Z Kumari Arpana Sinha 2191 674959 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>५. तकलीकी जांच करनेके लिए उसे समतल जगहपर घुमायें। अगर यह लट्टूके समान घूमती हो तब तो यह ठीक है। अगर नहीं घूमती तो समझ लें कि या तो छेद सीधा नहीं है अथवा टिकुलीके बीचों-बीच नहीं है अथवा बाँसकी छड़की नोक एक जैसी नहीं है। तकलीके दोषका पता लगाना और उसे ठीक करना बहुत आसान है। तकलीपर लगातार एक सप्ताह तक अभ्यास करनेके बाद जो सबसे ज्यादा सूत काता गया वह प्रति घंटा ११० गज था और तकली बनाने में केवल आधा घंटा लगता है। तकली बनाना समय व्यापनका अच्छा साधन है और कातना एक रचनात्मक मनोरंजन। यह व्यथित हृदयको शान्ति प्रदान करता है और एक मूक साथी है। चरखा गुंजन करता है और इसलिए कह सकते हैं, वह आपका ध्यान बँटाता है। तकलीमें कोई आवाज नहीं होती, यह उसकी एक खूबी है और इस तरह यह शायद करोड़ों मूक प्राणियोंका सही प्रतिनिधित्व करती है। आप भी इसे चलायें और आप भी उसी प्रसन्नताका अनुभव करेंगे जिस प्रसन्नताका अनुभव हममें से कई लोग करते हैं। कुछ भी हो, जो भी स्त्री अथवा पुरुष चरखा चलाता है वह देशकी सम्पत्ति में वृद्धि करता है और बहिष्कार आन्दोलनको गति प्रदान करता है तथा इस तरह स्वराज्यको दिन-प्रति-दिन निकट लाता है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|३१५. विदेशी कपड़ोंके व्यापारी}}}} मैंने विदेशी वस्त्र- बहिष्कारके प्रश्नके सम्बन्धमें पत्र- प्रतिनिधियोंके सम्मुख अपने विचार रख दिये हैं। व्यापारियोंमें जो घबराहट पाई जाती है उससे देशके प्रति उनके विश्वासका अभाव सूचित होता है। यदि उन्हें इस बातका पूरा यकीन है कि निकट भविष्य में स्वराज्य आनेवाला है तो वे शतकी और समय दिये जानेकी माँग क्यों करते है? वे बिना किसी शर्तके आगे क्यों नहीं आते और इसे ज्यादा निश्चित क्यों नहीं बना देते ? अनिश्चयकी यह स्थिति स्वराज्य के वातावरणको बल प्रदान करनेके स्थानपर कमजोर बनाती है और लोगोंके हृदयोंमें सन्देह उत्पन्न करती है। यह आन्दोलन मुख्य रूपसे विश्वासपर आधारित है। हममें ऐसा कोई मूलभूत दोष नहीं है जिससे हम स्वराज्यके अनुपयुक्त ठहरते हों। यह तो हमारा भ्रम है, जो हमें, तीस करोड़की आबादीवाले इस राष्ट्रको असहाय और अपनी क्षमताके विषयमें शंकालु बनाता है। विदेशी कपड़े व्यापारी अपनी गोलमोल बातोंके द्वारा इस भ्रमको पुष्ट न करें। उन्हें अपने-आपको इससे मुक्त करना चाहिए तथा उसे दूर करनेमें औरोंकी भी सहायता करनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें<noinclude></noinclude> nqh9g388zeeut47af3h7oukmjperdw4 674960 674959 2026-08-29T15:56:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 674960 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>५. तकलीकी जांच करनेके लिए उसे समतल जगहपर घुमायें। अगर यह लट्टूके समान घूमती हो तब तो यह ठीक है। अगर नहीं घूमती तो समझ लें कि या तो छेद सीधा नहीं है अथवा टिकुलीके बीचों-बीच नहीं है अथवा बाँसकी छड़की नोक एक जैसी नहीं है। तकलीके दोषका पता लगाना और उसे ठीक करना बहुत आसान है। तकलीपर लगातार एक सप्ताह तक अभ्यास करनेके बाद जो सबसे ज्यादा सूत काता गया वह प्रति घंटा ११० गज था और तकली बनाने में केवल आधा घंटा लगता है। तकली बनाना समय व्यापनका अच्छा साधन है और कातना एक रचनात्मक मनोरंजन। यह व्यथित हृदयको शान्ति प्रदान करता है और एक मूक साथी है। चरखा गुंजन करता है और इसलिए कह सकते हैं, वह आपका ध्यान बँटाता है। तकलीमें कोई आवाज नहीं होती, यह उसकी एक खूबी है और इस तरह यह शायद करोड़ों मूक प्राणियोंका सही प्रतिनिधित्व करती है। आप भी इसे चलायें और आप भी उसी प्रसन्नताका अनुभव करेंगे जिस प्रसन्नताका अनुभव हममें से कई लोग करते हैं। कुछ भी हो, जो भी स्त्री अथवा पुरुष चरखा चलाता है वह देशकी सम्पत्ति में वृद्धि करता है और बहिष्कार आन्दोलनको गति प्रदान करता है तथा इस तरह स्वराज्यको दिन-प्रति-दिन निकट लाता है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१५. विदेशी कपड़ोंके व्यापारी'''}}}} मैंने विदेशी वस्त्र- बहिष्कारके प्रश्नके सम्बन्धमें पत्र- प्रतिनिधियोंके सम्मुख अपने विचार रख दिये हैं। व्यापारियोंमें जो घबराहट पाई जाती है उससे देशके प्रति उनके विश्वासका अभाव सूचित होता है। यदि उन्हें इस बातका पूरा यकीन है कि निकट भविष्य में स्वराज्य आनेवाला है तो वे शतकी और समय दिये जानेकी माँग क्यों करते है? वे बिना किसी शर्तके आगे क्यों नहीं आते और इसे ज्यादा निश्चित क्यों नहीं बना देते ? अनिश्चयकी यह स्थिति स्वराज्य के वातावरणको बल प्रदान करनेके स्थानपर कमजोर बनाती है और लोगोंके हृदयोंमें सन्देह उत्पन्न करती है। यह आन्दोलन मुख्य रूपसे विश्वासपर आधारित है। हममें ऐसा कोई मूलभूत दोष नहीं है जिससे हम स्वराज्यके अनुपयुक्त ठहरते हों। यह तो हमारा भ्रम है, जो हमें, तीस करोड़की आबादीवाले इस राष्ट्रको असहाय और अपनी क्षमताके विषयमें शंकालु बनाता है। विदेशी कपड़े व्यापारी अपनी गोलमोल बातोंके द्वारा इस भ्रमको पुष्ट न करें। उन्हें अपने-आपको इससे मुक्त करना चाहिए तथा उसे दूर करनेमें औरोंकी भी सहायता करनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें<noinclude></noinclude> md2w30hlxt1jkg9msg4tg6fswehwb92 675142 674960 2026-08-30T07:34:53Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675142 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>५. तकलीकी जांच करनेके लिए उसे समतल जगहपर घुमायें। अगर यह लट्टूके समान घूमती हो तब तो यह ठीक है। अगर नहीं घूमती तो समझ लें कि या तो छेद सीधा नहीं है अथवा टिकुलीके बीचों-बीच नहीं है अथवा बाँसकी छड़की नोक एक जैसी नहीं है। तकलीके दोषका पता लगाना और उसे ठीक करना बहुत आसान है। तकलीपर लगातार एक सप्ताह तक अभ्यास करनेके बाद जो सबसे ज्यादा सूत काता गया वह प्रति घंटा ११० गज था और तकली बनाने में केवल आधा घंटा लगता है। तकली बनाना समय व्यापनका अच्छा साधन है और कातना एक रचनात्मक मनोरंजन। यह व्यथित हृदयको शान्ति प्रदान करता है और एक मूक साथी है। चरखा गुंजन करता है और इसलिए कह सकते हैं, वह आपका ध्यान बँटाता है। तकलीमें कोई आवाज नहीं होती, यह उसकी एक खूबी है और इस तरह यह शायद करोड़ों मूक प्राणियोंका सही प्रतिनिधित्व करती है। आप भी इसे चलायें और आप भी उसी प्रसन्नताका अनुभव करेंगे जिस प्रसन्नताका अनुभव हममें से कई लोग करते हैं। कुछ भी हो, जो भी स्त्री अथवा पुरुष चरखा चलाता है वह देशकी सम्पत्ति में वृद्धि करता है और बहिष्कार आन्दोलनको गति प्रदान करता है तथा इस तरह स्वराज्यको दिन-प्रति-दिन निकट लाता है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१५. विदेशी कपड़ोंके व्यापारी'''}}}} मैंने विदेशी वस्त्र- बहिष्कारके प्रश्नके सम्बन्धमें पत्र- प्रतिनिधियोंके सम्मुख अपने विचार रख दिये हैं। व्यापारियोंमें जो घबराहट पाई जाती है उससे देशके प्रति उनके विश्वासका अभाव सूचित होता है। यदि उन्हें इस बातका पूरा यकीन है कि निकट भविष्य में स्वराज्य आनेवाला है तो वे शतकी और समय दिये जानेकी माँग क्यों करते है? वे बिना किसी शर्तके आगे क्यों नहीं आते और इसे ज्यादा निश्चित क्यों नहीं बना देते ? अनिश्चयकी यह स्थिति स्वराज्य के वातावरणको बल प्रदान करनेके स्थानपर कमजोर बनाती है और लोगोंके हृदयोंमें सन्देह उत्पन्न करती है। यह आन्दोलन मुख्य रूपसे विश्वासपर आधारित है। हममें ऐसा कोई मूलभूत दोष नहीं है जिससे हम स्वराज्यके अनुपयुक्त ठहरते हों। यह तो हमारा भ्रम है, जो हमें, तीस करोड़की आबादीवाले इस राष्ट्रको असहाय और अपनी क्षमताके विषयमें शंकालु बनाता है। विदेशी कपड़े व्यापारी अपनी गोलमोल बातोंके द्वारा इस भ्रमको पुष्ट न करें। उन्हें अपने-आपको इससे मुक्त करना चाहिए तथा उसे दूर करनेमें औरोंकी भी सहायता करनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें<noinclude></noinclude> fvl0cbz4h1vxv554bip33brl91lsavr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७७ 250 197420 674965 669945 2026-08-29T16:07:33Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674965 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|सलाम अथवा बेंत?|३३३}}</noinclude>कोई शर्तें नहीं रखनी चाहिए, अपितु साहसपूर्वक यह कह देना चाहिए कि वे विदेशी कपड़ोंका व्यापार बन्द नहीं करेंगे। जो लोग कमजोर हैं और जिन्हें स्वराज्यकी प्राप्ति के बारेमें सन्देह है उन्हें मैं एक ठोस सुझाव देता हूँ। अभी जो माल आया नहीं है उसे ये न मँगवायें। यदि स्वराज्य नहीं मिलेगा और यदि वे अपने पुराने धन्धेमें वापस जाना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा करनेसे दुनियाकी कोई ताकत नहीं रोक सकेगी। उनके पास इस समय जो विदेशी माल मौजूद है उसे तबतकके लिए सन्दुकमें बन्द करके रख देना चाहिए जबतक वे उसे बाहर विदेशोंमें बेचनेकी व्यवस्था नहीं कर लेते और जो व्यापारी अपेक्षाकृत गरीब हैं उन्हें स्वराज्य सरकार पर भरोसा रखना चाहिए कि वह उनकी जितनी आवश्यक समझेगी उतनी क्षतिपूर्ति कर देगी। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे अपने पास पड़े मालकी एक तालिका बना लें और उसे ऐसे स्वयंसेवकोंसे प्रमाणित करवा लें जिन्हें ऐसा करनेका अधिकार प्राप्त हो। धनाढ्य व्यापारियोंको किसी क्षतिपूर्तिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें जो नुकसान होगा वह राष्ट्रके प्रति किये गये उनके पापका आंशिक प्रायश्चित होगा। और अन्तमें, हालांकि यह अन्तिम सुझाव एक बुरा सुझाव है, वे लोग अपना माल सुरक्षित रखें और जब विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका यह सार्वजनिक आन्दोलन पर्याप्त समर्थनके अभाव में सत्म हो जाये अथवा बलपूर्वक उसका दमन कर दिया जाये तब अपने मालको बाहर निकालकर बेचें। किन्तु भगवान् न करे कि वर्तमान उत्साह पानीका एक बुलबुला-मात्र ही सिद्ध हो अथवा उम्र दमनके द्वारा उसे दबाना संभव हो जाये! इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आन्दोलनका चाहे जो भी परिणाम क्यों न हो, विदेशी कपड़े व्यापारियोंको स्पष्ट रूपसे यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं ये हमारे उद्देश्यके लिए हानिकारक हैं और यह कि शतके बिना भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया है। उनमें देशभक्तिकी इतनी भावना तो होनी चाहिए कि वे कसौटीपर खरे उतरें; उन्हें अपनी ओरसे विदेशी कपड़ेकी बिक्री बन्द कर देनी चाहिए जिससे धरना देनेकी जरूरत ही न रह जाये। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|३१६. सलाम अथवा बेंत?}}}}} अजमेरसे श्री हरिभाऊ उपाध्याय लिखते है:१ यदि हरिभाऊजी को मिली हुई सबर सच है तो जेलमें भी सत्याग्रह करनेका काफी सामान मौजूद है। आम तौर पर कैदीका जेलरको सलाम करना ही अच्छा है। परन्तु यदि कोई सत्याग्रही सलाम न करे तो उसके साथ जबरदस्ती कभी न की <small>]१. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है पत्र लेखकका कहना था कि जेलके अधिकारियोंको 'सलाम' न करने के कारण सत्याग्रही बाबा नृसिंहदासको काल कोठारीमें डाल दिया गया है और शायद उन्हें त भी लगाये जायें।<small><noinclude></noinclude> fv3uufr2yj35j41l7zzsarlbi61f3fp 674967 674965 2026-08-29T16:08:06Z Kumari Arpana Sinha 2191 674967 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सलाम अथवा बेंत?|३३३}}</noinclude>कोई शर्तें नहीं रखनी चाहिए, अपितु साहसपूर्वक यह कह देना चाहिए कि वे विदेशी कपड़ोंका व्यापार बन्द नहीं करेंगे। जो लोग कमजोर हैं और जिन्हें स्वराज्यकी प्राप्ति के बारेमें सन्देह है उन्हें मैं एक ठोस सुझाव देता हूँ। अभी जो माल आया नहीं है उसे ये न मँगवायें। यदि स्वराज्य नहीं मिलेगा और यदि वे अपने पुराने धन्धेमें वापस जाना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा करनेसे दुनियाकी कोई ताकत नहीं रोक सकेगी। उनके पास इस समय जो विदेशी माल मौजूद है उसे तबतकके लिए सन्दुकमें बन्द करके रख देना चाहिए जबतक वे उसे बाहर विदेशोंमें बेचनेकी व्यवस्था नहीं कर लेते और जो व्यापारी अपेक्षाकृत गरीब हैं उन्हें स्वराज्य सरकार पर भरोसा रखना चाहिए कि वह उनकी जितनी आवश्यक समझेगी उतनी क्षतिपूर्ति कर देगी। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे अपने पास पड़े मालकी एक तालिका बना लें और उसे ऐसे स्वयंसेवकोंसे प्रमाणित करवा लें जिन्हें ऐसा करनेका अधिकार प्राप्त हो। धनाढ्य व्यापारियोंको किसी क्षतिपूर्तिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें जो नुकसान होगा वह राष्ट्रके प्रति किये गये उनके पापका आंशिक प्रायश्चित होगा। और अन्तमें, हालांकि यह अन्तिम सुझाव एक बुरा सुझाव है, वे लोग अपना माल सुरक्षित रखें और जब विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका यह सार्वजनिक आन्दोलन पर्याप्त समर्थनके अभाव में सत्म हो जाये अथवा बलपूर्वक उसका दमन कर दिया जाये तब अपने मालको बाहर निकालकर बेचें। किन्तु भगवान् न करे कि वर्तमान उत्साह पानीका एक बुलबुला-मात्र ही सिद्ध हो अथवा उम्र दमनके द्वारा उसे दबाना संभव हो जाये! इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आन्दोलनका चाहे जो भी परिणाम क्यों न हो, विदेशी कपड़े व्यापारियोंको स्पष्ट रूपसे यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं ये हमारे उद्देश्यके लिए हानिकारक हैं और यह कि शतके बिना भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया है। उनमें देशभक्तिकी इतनी भावना तो होनी चाहिए कि वे कसौटीपर खरे उतरें; उन्हें अपनी ओरसे विदेशी कपड़ेकी बिक्री बन्द कर देनी चाहिए जिससे धरना देनेकी जरूरत ही न रह जाये। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|३१६. सलाम अथवा बेंत?}}}}} अजमेरसे श्री हरिभाऊ उपाध्याय लिखते है:१ यदि हरिभाऊजी को मिली हुई सबर सच है तो जेलमें भी सत्याग्रह करनेका काफी सामान मौजूद है। आम तौर पर कैदीका जेलरको सलाम करना ही अच्छा है। परन्तु यदि कोई सत्याग्रही सलाम न करे तो उसके साथ जबरदस्ती कभी न की <small>]१. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है पत्र लेखकका कहना था कि जेलके अधिकारियोंको 'सलाम' न करने के कारण सत्याग्रही बाबा नृसिंहदासको काल कोठारीमें डाल दिया गया है और शायद उन्हें त भी लगाये जायें।<small><noinclude></noinclude> bifax0qq1vaabb4piqy66o9f9e5sxlc 674969 674967 2026-08-29T16:10:13Z Kumari Arpana Sinha 2191 674969 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सलाम अथवा बेंत?|३३३}}</noinclude>कोई शर्तें नहीं रखनी चाहिए, अपितु साहसपूर्वक यह कह देना चाहिए कि वे विदेशी कपड़ोंका व्यापार बन्द नहीं करेंगे। जो लोग कमजोर हैं और जिन्हें स्वराज्यकी प्राप्ति के बारेमें सन्देह है उन्हें मैं एक ठोस सुझाव देता हूँ। अभी जो माल आया नहीं है उसे ये न मँगवायें। यदि स्वराज्य नहीं मिलेगा और यदि वे अपने पुराने धन्धेमें वापस जाना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा करनेसे दुनियाकी कोई ताकत नहीं रोक सकेगी। उनके पास इस समय जो विदेशी माल मौजूद है उसे तबतकके लिए सन्दुकमें बन्द करके रख देना चाहिए जबतक वे उसे बाहर विदेशोंमें बेचनेकी व्यवस्था नहीं कर लेते और जो व्यापारी अपेक्षाकृत गरीब हैं उन्हें स्वराज्य सरकार पर भरोसा रखना चाहिए कि वह उनकी जितनी आवश्यक समझेगी उतनी क्षतिपूर्ति कर देगी। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे अपने पास पड़े मालकी एक तालिका बना लें और उसे ऐसे स्वयंसेवकोंसे प्रमाणित करवा लें जिन्हें ऐसा करनेका अधिकार प्राप्त हो। धनाढ्य व्यापारियोंको किसी क्षतिपूर्तिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें जो नुकसान होगा वह राष्ट्रके प्रति किये गये उनके पापका आंशिक प्रायश्चित होगा। और अन्तमें, हालांकि यह अन्तिम सुझाव एक बुरा सुझाव है, वे लोग अपना माल सुरक्षित रखें और जब विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका यह सार्वजनिक आन्दोलन पर्याप्त समर्थनके अभाव में सत्म हो जाये अथवा बलपूर्वक उसका दमन कर दिया जाये तब अपने मालको बाहर निकालकर बेचें। किन्तु भगवान् न करे कि वर्तमान उत्साह पानीका एक बुलबुला-मात्र ही सिद्ध हो अथवा उम्र दमनके द्वारा उसे दबाना संभव हो जाये! इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आन्दोलनका चाहे जो भी परिणाम क्यों न हो, विदेशी कपड़े व्यापारियोंको स्पष्ट रूपसे यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं ये हमारे उद्देश्यके लिए हानिकारक हैं और यह कि शतके बिना भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया है। उनमें देशभक्तिकी इतनी भावना तो होनी चाहिए कि वे कसौटीपर खरे उतरें; उन्हें अपनी ओरसे विदेशी कपड़ेकी बिक्री बन्द कर देनी चाहिए जिससे धरना देनेकी जरूरत ही न रह जाये। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१६. सलाम अथवा बेंत?'''}}}}} अजमेरसे श्री हरिभाऊ उपाध्याय लिखते है:१ यदि हरिभाऊजी को मिली हुई सबर सच है तो जेलमें भी सत्याग्रह करनेका काफी सामान मौजूद है। आम तौर पर कैदीका जेलरको सलाम करना ही अच्छा है। परन्तु यदि कोई सत्याग्रही सलाम न करे तो उसके साथ जबरदस्ती कभी न की <small>१. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है पत्र लेखकका कहना था कि जेलके अधिकारियोंको 'सलाम' न करने के कारण सत्याग्रही बाबा नृसिंहदासको काल कोठारीमें डाल दिया गया है और शायद उन्हें त भी लगाये जायें।<small><noinclude></noinclude> 0nbuw8e911swqv801f9i3fjndmrvrp7 674971 674969 2026-08-29T16:11:08Z Kumari Arpana Sinha 2191 674971 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सलाम अथवा बेंत?|३३३}}</noinclude>कोई शर्तें नहीं रखनी चाहिए, अपितु साहसपूर्वक यह कह देना चाहिए कि वे विदेशी कपड़ोंका व्यापार बन्द नहीं करेंगे। जो लोग कमजोर हैं और जिन्हें स्वराज्यकी प्राप्ति के बारेमें सन्देह है उन्हें मैं एक ठोस सुझाव देता हूँ। अभी जो माल आया नहीं है उसे ये न मँगवायें। यदि स्वराज्य नहीं मिलेगा और यदि वे अपने पुराने धन्धेमें वापस जाना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा करनेसे दुनियाकी कोई ताकत नहीं रोक सकेगी। उनके पास इस समय जो विदेशी माल मौजूद है उसे तबतकके लिए सन्दुकमें बन्द करके रख देना चाहिए जबतक वे उसे बाहर विदेशोंमें बेचनेकी व्यवस्था नहीं कर लेते और जो व्यापारी अपेक्षाकृत गरीब हैं उन्हें स्वराज्य सरकार पर भरोसा रखना चाहिए कि वह उनकी जितनी आवश्यक समझेगी उतनी क्षतिपूर्ति कर देगी। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे अपने पास पड़े मालकी एक तालिका बना लें और उसे ऐसे स्वयंसेवकोंसे प्रमाणित करवा लें जिन्हें ऐसा करनेका अधिकार प्राप्त हो। धनाढ्य व्यापारियोंको किसी क्षतिपूर्तिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें जो नुकसान होगा वह राष्ट्रके प्रति किये गये उनके पापका आंशिक प्रायश्चित होगा। और अन्तमें, हालांकि यह अन्तिम सुझाव एक बुरा सुझाव है, वे लोग अपना माल सुरक्षित रखें और जब विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका यह सार्वजनिक आन्दोलन पर्याप्त समर्थनके अभाव में सत्म हो जाये अथवा बलपूर्वक उसका दमन कर दिया जाये तब अपने मालको बाहर निकालकर बेचें। किन्तु भगवान् न करे कि वर्तमान उत्साह पानीका एक बुलबुला-मात्र ही सिद्ध हो अथवा उम्र दमनके द्वारा उसे दबाना संभव हो जाये! इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आन्दोलनका चाहे जो भी परिणाम क्यों न हो, विदेशी कपड़े व्यापारियोंको स्पष्ट रूपसे यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं ये हमारे उद्देश्यके लिए हानिकारक हैं और यह कि शतके बिना भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया है। उनमें देशभक्तिकी इतनी भावना तो होनी चाहिए कि वे कसौटीपर खरे उतरें; उन्हें अपनी ओरसे विदेशी कपड़ेकी बिक्री बन्द कर देनी चाहिए जिससे धरना देनेकी जरूरत ही न रह जाये। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१६. सलाम अथवा बेंत?'''}}}} अजमेरसे श्री हरिभाऊ उपाध्याय लिखते है:१ यदि हरिभाऊजी को मिली हुई सबर सच है तो जेलमें भी सत्याग्रह करनेका काफी 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विदेशी माल मौजूद है उसे तबतकके लिए सन्दुकमें बन्द करके रख देना चाहिए जबतक वे उसे बाहर विदेशोंमें बेचनेकी व्यवस्था नहीं कर लेते और जो व्यापारी अपेक्षाकृत गरीब हैं उन्हें स्वराज्य सरकार पर भरोसा रखना चाहिए कि वह उनकी जितनी आवश्यक समझेगी उतनी क्षतिपूर्ति कर देगी। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे अपने पास पड़े मालकी एक तालिका बना लें और उसे ऐसे स्वयंसेवकोंसे प्रमाणित करवा लें जिन्हें ऐसा करनेका अधिकार प्राप्त हो। धनाढ्य व्यापारियोंको किसी क्षतिपूर्तिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें जो नुकसान होगा वह राष्ट्रके प्रति किये गये उनके पापका आंशिक प्रायश्चित होगा। और अन्तमें, हालांकि यह अन्तिम सुझाव एक बुरा सुझाव है, वे लोग अपना माल सुरक्षित रखें और जब विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका यह सार्वजनिक आन्दोलन पर्याप्त समर्थनके अभाव में सत्म हो जाये अथवा बलपूर्वक उसका दमन कर दिया जाये तब अपने मालको बाहर निकालकर बेचें। किन्तु भगवान् न करे कि वर्तमान उत्साह पानीका एक बुलबुला-मात्र ही सिद्ध हो अथवा उम्र दमनके द्वारा उसे दबाना संभव हो जाये! इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आन्दोलनका चाहे जो भी परिणाम क्यों न हो, विदेशी कपड़े व्यापारियोंको स्पष्ट रूपसे यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं ये हमारे उद्देश्यके लिए हानिकारक हैं और यह कि शतके बिना भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया है। उनमें देशभक्तिकी इतनी भावना तो होनी चाहिए कि वे कसौटीपर खरे उतरें; उन्हें अपनी ओरसे विदेशी कपड़ेकी बिक्री बन्द कर देनी चाहिए जिससे धरना देनेकी जरूरत ही न रह जाये। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१६. सलाम अथवा बेंत?'''}}}} अजमेरसे श्री हरिभाऊ उपाध्याय लिखते है:१ यदि हरिभाऊजी को मिली हुई सबर सच है तो जेलमें भी सत्याग्रह करनेका काफी सामान मौजूद है। आम तौर पर कैदीका जेलरको सलाम करना ही अच्छा है। परन्तु यदि कोई सत्याग्रही सलाम न करे तो उसके साथ जबरदस्ती कभी न की <small>१. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है पत्र लेखकका कहना था कि जेलके अधिकारियोंको 'सलाम' न करने के कारण सत्याग्रही बाबा नृसिंहदासको काल कोठारीमें डाल दिया गया है और शायद उन्हें त भी लगाये जायें।<small><noinclude></noinclude> hth1kt0gwhgilv464ezrzomx770r7m4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७८ 250 197421 675137 669946 2026-08-30T07:32:44Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675137 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जानी चाहिए। अतएव जब सलाम करानेके लिए किसीके साथ जबरदस्ती की जाये तो दूसरोंका भी धर्म हो सकता है कि वे भी सलाम न करें। आश्चर्य यह भी है कि कई जगहों में सत्याग्रही कैदियोंको जो रियायतें दी गई हैं वे इन कैदियोंको नहीं मिली हैं। मेरे विचारसे तो किसी भी सत्याग्रही कैदीको अन्य कैदियोंसे अलग न माना जाना चाहिए। परन्तु यदि एक सत्याग्रहीके साथ खास बरताव किया जाता है तो दूसरोंके साथ भी वैसा ही बरताव किया जाना चाहिए। कांग्रेसके नजदीक तो पथिकजी और नृसिंहदासजी का वही स्थान है, जो राष्ट्रपतिका। परन्तु कोई इस सल्तनतसे न्याय बुद्धिकी इन्साफकी अपेक्षा कैसे रख सकता है? '''हिन्दी नवजीवन,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१७. भेंट : 'हिन्दू' के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|२४ अप्रैल, १९३०}} '''मैंने श्री प्रकाशम्की गिरफ्तारी और डा० पट्टाभिको सजा दिये जानेका समाचार सुनाया।''' हाँ, सभी प्रमुख व्यक्तियोंको गिरफ्तार किया जा रहा है और यह संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। आप सब लोग तो जेलसे बाहर रहेंगे। '''थोड़ा रुककर गांधीजी ने हँसते हुए कहा कि यह बात उन्होंने पत्र- प्रतिनिधियोंके लिए कही थी। इसपर मैंने उनसे कहा कि लगता है आपको इस समय तो सरकार भी गिरफ्तार करनेका इरादा नहीं रखती; इसलिए आप भी मुक्त रहेंगे।''' हाँ, मैं भी पत्रकार हूँ। हम सब पत्रकार मुक्त रहेंगे। '''इसके बाद बातचीत रासमें 'कर नहीं देंगे' का जो संघर्ष छेड़ने का विचार चल रहा है, उसकी ओर मुड़ गई। गांधीजी का कहना था कि यदि रास संघर्षके लिए पूरी तरहसे तैयार हो और वहाँके लोगोंको अपनी सफलताके बारेमें पूरा विश्वास हो तो गांधीजी उनके रास्तेमें नहीं आयेंगे। उन्होंने आगे कहा:''' बेशक, उन्होंने संघर्ष आरम्भ करनेसे पूर्व मुझे सूचना भेजी है और मैंने उन्हें ऐसा करनेकी अनुमति दी है, लेकिन उन्हें संघर्षको अपने-आप चला सकना चाहिए। यदि वे इसके लिए तैयार हों तो भले शुरू कर दें। [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू,''' २५-४-१९३०<noinclude></noinclude> hh27a26zky0hg0o1ualor6jpavxx13o 675138 675137 2026-08-30T07:33:21Z Kumari Arpana Sinha 2191 675138 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जानी चाहिए। अतएव जब सलाम करानेके लिए किसीके साथ जबरदस्ती की जाये तो दूसरोंका भी धर्म हो सकता है कि वे भी सलाम न करें। आश्चर्य यह भी है कि कई जगहों में सत्याग्रही कैदियोंको जो रियायतें दी गई हैं वे इन कैदियोंको नहीं मिली हैं। मेरे विचारसे तो किसी भी सत्याग्रही कैदीको अन्य कैदियोंसे अलग न माना जाना चाहिए। परन्तु यदि एक सत्याग्रहीके साथ खास बरताव किया जाता है तो दूसरोंके साथ भी वैसा ही बरताव किया जाना चाहिए। कांग्रेसके नजदीक तो पथिकजी और नृसिंहदासजी का वही स्थान है, जो राष्ट्रपतिका। परन्तु कोई इस सल्तनतसे न्याय बुद्धिकी इन्साफकी अपेक्षा कैसे रख सकता है? 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बालकोवासे मुझे पत्र लिखनेको कहना । उसे दूध और फल अवश्य लेने चाहिए। मैं अन्तिम उपायपर२ विचार कर रहा हूँ, जिससे कुछ निर्णयात्मक कार्यवाही अनिवार्य हो जाये। लेकिन सब कुछ भगवान् के हाथमें है। सस्नेह, {Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८५) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ५३८५ से भी। <small>१. महादेवके बारेमें समाचार' से तात्पर्य सम्भवत: २४ अप्रैको अहमदाबादमें उनकी गिरफ्तारीसे है।<small> <small>२. आता है 'अन्तिम उपाय से तात्पर्य धरासणाके नमक डिपोपर प्रस्तावित धरनेसे है; देखिए "पत्र: बाइसरायको" ४-५-१९३०।<small><noinclude></noinclude> slym6z31ah3l40yz3uhvcsfdyclu71w 675146 675145 2026-08-30T07:45:39Z Kumari Arpana Sinha 2191 675146 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger| '''३१८. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|११ बजे रात, २४ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेनॉल्ड्स, सिर्फ एक पंक्ति। देखना है, महादेवकी अनुपस्थितिमें अब तुम 'यंग इंडिया का कार्य भार कैसे निभाते हो? उम्मीद है, तुम स्वस्थ एवं प्रसन्न होगे। सस्नेह, 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अवश्य लेने चाहिए। मैं अन्तिम उपायपर२ विचार कर रहा हूँ, जिससे कुछ निर्णयात्मक कार्यवाही अनिवार्य हो जाये। लेकिन सब कुछ भगवान् के हाथमें है। सस्नेह, {Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८५) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ५३८५ से भी। <small>१. महादेवके बारेमें समाचार' से तात्पर्य सम्भवत: २४ अप्रैको अहमदाबादमें उनकी गिरफ्तारीसे है।<small> <small>२. आता है 'अन्तिम उपाय से तात्पर्य धरासणाके नमक डिपोपर प्रस्तावित धरनेसे है; देखिए "पत्र: बाइसरायको" ४-५-१९३०।<small><noinclude></noinclude> ci75nhl3pmk84bxqggdh6eltrpq9zx2 675149 675148 2026-08-30T07:48:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 675149 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger| '''३१८. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|११ बजे रात, २४ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेनॉल्ड्स, सिर्फ एक पंक्ति। देखना है, महादेवकी अनुपस्थितिमें अब तुम 'यंग इंडिया का कार्य भार कैसे निभाते हो? उम्मीद है, तुम स्वस्थ एवं प्रसन्न होगे। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३५ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य : स्वार्थ मोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''३१९. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|[२४ अप्रैल, १९३० के बाद]१}} तुम्हारा पत्र अभी-अभी मिला, उसी डाकसे जिस डाकसे महादेवके बारेमें समाचार मिला है। हाँ, तुम छोटेलालके साथ खादी कार्यमें लगना चाहो तो लग जाओ। बालकोवासे मुझे पत्र लिखनेको कहना । उसे दूध और फल अवश्य लेने चाहिए। मैं अन्तिम उपायपर२ विचार कर रहा हूँ, जिससे कुछ निर्णयात्मक कार्यवाही अनिवार्य हो जाये। लेकिन सब कुछ भगवान् के हाथमें है। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८५) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ५३८५ से भी। <small>१. महादेवके बारेमें समाचार' से तात्पर्य सम्भवत: २४ अप्रैको अहमदाबादमें उनकी गिरफ्तारीसे है।<small> <small>२. आता है 'अन्तिम उपाय से तात्पर्य धरासणाके नमक डिपोपर प्रस्तावित धरनेसे है; देखिए "पत्र: बाइसरायको" ४-५-१९३०।<small><noinclude></noinclude> thbubemttzmuhy5sd8wl6rj4hxjr62k पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८० 250 197423 675166 669948 2026-08-30T08:50:46Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675166 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२०. पत्र : डोरोथी डि' सूवाको'''}}}} {{Right|मुकाम कराठी}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} प्यारी बच्ची, जलूसवालों के किसी भी कामसे तुम डरो मत। वे तुमको कोई भी नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते और यदि तुम ईश्वर पर भरोसा रखती हो तो फिर तुमको किसी भी चीज या आदमीसे डरनेकी कोई जरूरत ही नहीं। फिर भी मैं जरूरतके मुताबिक कार्रवाई करूँगा। {{Right| हृदयसे तुम्हारा,}} {{Right|मो० क० गांधी}} कुमारी डोरोथी दि सूवा नं० ४७, गॉफ रोड आगरा (सं० प्रा०) अंग्रेजी (जी० एन० १३६९ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३२१. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}} {{Right|२५ अप्रैल १९३०}} प्यारे सफेद दाढ़ीवाले, लो, अब मणिबन भी आपके पास आ रही है। उम्मीद है, उसके आगमनसे आपको, रावजीभाईको तथा अन्य लोगोंको हार्दिक प्रसन्नता होगी। खेड़ाकी स्त्रियोंमें जागृति लानेके लिए उसकी सेवाओंका बेरहमी से प्रयोग करना। हमीदा१ ओलपाडमें अद्भुत काम कर रही है। वह अपने पिताके समान ही होनहार है। भगवान् उसका भला करे। सस्नेह, {{Right|मो० क० गां०}} अंग्रेजी (एस० एन० ९५७१ ) की फोटो नकलसे। <small>१. अम्बास तैयबजीकी पुत्री।<small><noinclude></noinclude> 7y1c50kmk179hycet4o0vylgy3y4woo 675167 675166 2026-08-30T08:51:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 675167 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२०. पत्र : डोरोथी डि' सूवाको'''}}}} {{Right|मुकाम कराठी}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} प्यारी बच्ची, जलूसवालों के किसी भी कामसे तुम डरो मत। वे तुमको कोई भी नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते और यदि तुम ईश्वर पर भरोसा रखती हो तो फिर तुमको किसी भी चीज या आदमीसे डरनेकी कोई जरूरत ही नहीं। फिर भी मैं जरूरतके मुताबिक कार्रवाई करूँगा। {{Right|हृदयसे तुम्हारा,}} {{Right|मो० क० गांधी}} कुमारी डोरोथी दि सूवा नं० ४७, गॉफ रोड आगरा (सं० प्रा०) अंग्रेजी (जी० एन० १३६९ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३२१. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}} {{Right|२५ अप्रैल १९३०}} प्यारे सफेद दाढ़ीवाले, लो, अब मणिबन भी आपके पास आ रही है। उम्मीद है, उसके आगमनसे आपको, रावजीभाईको तथा अन्य लोगोंको हार्दिक प्रसन्नता होगी। खेड़ाकी स्त्रियोंमें जागृति लानेके लिए उसकी सेवाओंका बेरहमी से प्रयोग करना। हमीदा१ ओलपाडमें अद्भुत काम कर रही है। वह अपने पिताके समान ही होनहार है। भगवान् उसका भला करे। सस्नेह, {{Right|मो० क० गां०}} अंग्रेजी (एस० एन० ९५७१ ) की फोटो नकलसे। <small>१. अम्बास तैयबजीकी पुत्री।<small><noinclude></noinclude> s5pvhkdfes67dvdet8zddzto9kz02v1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८१ 250 197424 675151 669949 2026-08-30T07:56:36Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675151 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|३२२. पत्र : महादेव देसाईको}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, तुम्हें मेरा आशीर्वाद तो है ही तुम्हारा लारीसे यात्रा किये बिना काम नहीं चल सकता था; फिर भी मेरी दृष्टिसे दोष तो हुआ ही है। यह दोषदर्शन वस्तुतः अन्य लोगोंके हितके लिए है, लेकिन तुम्हारे लिए भी हो तो हर्ज नहीं। मोटर जन्त होना जरूरी नहीं था। मैंने तो सोचा था कि जैसे गंगाजल कांवरमें [पैदल] लाया जाता है, तुम नमक ले जानेकी वही पद्धति अपनाओगे और मुझे यह बात पसन्द भी बहुत आई थी। मान लो कि पांच-पांच मीलपर अथवा लगभग इतनी ही दूरीपर पड़ाव रखें और हर पड़ावमें २५ व्यक्ति हो। २५ लोगोंकी टुकड़ीमें हर व्यक्ति पांच-पांच सेर लेकर निकले तो उसका मतलब होगा तीन मन, पाँच सेर नमक। वह टुकड़ी दूसरे मुकामपर नमक पहुँचा दे और वहीं रहे। वहाँकी टुकड़ी तीसरे मुकामपर पहुँचाये। दूसरी टुकड़ी वापस आये और पहली टुकड़ी धोलेरा पहुँचे। इससे तो लोगोंको बहुत कुछ तालीम मिल जाती और नमक भी अच्छी तरह पहुँचता और किसी किस्मका नुकसान भी न होता । तुमने जो किया उसमें गाड़ी जब्त होने की आशंका तो थी ही; और [नमककी] बोरी तो जब्त होती ही। फिर इसमें कुछ छिपाकर रखनेकी बात भी थी; तुम्हारी विजय भी उसमें छिपानेकी कलापर अवलम्बित थी जब कि हमारे पास इस तरह छिपाने लायक तो कोई बात होनी ही नहीं चाहिए। इस तरह छिपा रखना सामान्य युद्धकी चतुराईके अन्तर्गत आता है। यह हमारे लिए वर्जित है। फिर, बोरीमें रखे हुए नमकको कब्जे में लेने के लिए पुलिसको काफी शक्ति लगानी पड़ेगी । ऐसा हमें अकारण ही नहीं करना चाहिए। फलत: तुम्हारी इस योजनामें बहादुरी तो खूब थी, चतुराई भी थी; लेकिन उसमें शुद्ध अहिंसाका अभाव था। किन्तु आजके वातावरणमें तुम्हें यह वस्तु सूझ नहीं सकती थी। सम्भव है, में स्वयं भी कहीं भूल कर जाता होऊँगा। अलबत्ता, मैं एक भी कदम बिना सोचे-विचारे नहीं उठाता और प्रत्येक नया कदम उठाने के समय मुझे सोचने-विचारनेका समय मिलता है । आजकल में जो विचार करता हूँ वह केवल प्रार्थना रूप है। इसमें मैं बुद्धिका प्रयोग नहीं करता। केवल अपने हृदयको टटोलकर देख लेता हूँ। स्वामीने भायन्दरसे नमक ले जानेकी बात सोची थी। उसमें भी यही दोष आ जाता। धारासणा मेरी नजर में है, लेकिन मैं किसीको उसके पास भी नहीं फटकने देता। अन्ततः यदि उसपर कब्जा करनेका निश्चय किया गया तो संघ प्रकट रूपसे नोटिस देकर निकलेगा। <small>मैंने जो कुछ लिखा है उसे पढ़कर तनिक भी पश्चात्ताप न करना, दु:ख मत मानना। मैंने तो यह इसलिए लिखा है, जिससे तुम्हें जेलमें अहिंसाका सूक्ष्म १. तीर्दथयात्रियों का दल।<small> ४३-२२<noinclude></noinclude> hestxipiv6rm1w0ak3jz0a83rax7xi5 675152 675151 2026-08-30T07:57:13Z Kumari Arpana Sinha 2191 675152 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|३२२. पत्र : महादेव देसाईको}}}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, तुम्हें मेरा आशीर्वाद तो है ही तुम्हारा लारीसे यात्रा किये बिना काम नहीं चल सकता था; फिर भी मेरी दृष्टिसे दोष तो हुआ ही है। यह दोषदर्शन वस्तुतः अन्य लोगोंके हितके लिए है, लेकिन तुम्हारे लिए भी हो तो हर्ज नहीं। मोटर जन्त होना जरूरी नहीं था। मैंने तो सोचा था कि जैसे गंगाजल कांवरमें [पैदल] लाया जाता है, तुम नमक ले जानेकी वही पद्धति अपनाओगे और मुझे यह बात पसन्द भी बहुत आई थी। मान लो कि पांच-पांच मीलपर अथवा लगभग इतनी ही दूरीपर पड़ाव रखें और हर पड़ावमें २५ व्यक्ति हो। २५ लोगोंकी टुकड़ीमें हर व्यक्ति पांच-पांच सेर लेकर निकले तो उसका मतलब होगा तीन मन, पाँच सेर नमक। वह टुकड़ी दूसरे मुकामपर नमक पहुँचा दे और वहीं रहे। वहाँकी टुकड़ी तीसरे मुकामपर पहुँचाये। दूसरी टुकड़ी वापस आये और पहली टुकड़ी धोलेरा पहुँचे। इससे तो लोगोंको बहुत कुछ तालीम मिल जाती और नमक भी अच्छी तरह पहुँचता और किसी किस्मका नुकसान भी न होता । तुमने जो किया उसमें गाड़ी जब्त होने की आशंका तो थी ही; और [नमककी] बोरी तो जब्त होती ही। फिर इसमें कुछ छिपाकर रखनेकी बात भी थी; तुम्हारी विजय भी उसमें छिपानेकी कलापर अवलम्बित थी जब कि हमारे पास इस तरह छिपाने लायक तो कोई बात होनी ही नहीं चाहिए। इस तरह छिपा रखना सामान्य युद्धकी चतुराईके अन्तर्गत आता है। यह हमारे लिए वर्जित है। फिर, बोरीमें रखे हुए नमकको कब्जे में लेने के लिए पुलिसको काफी शक्ति लगानी पड़ेगी । ऐसा हमें अकारण ही नहीं करना चाहिए। फलत: तुम्हारी इस योजनामें बहादुरी तो खूब थी, चतुराई भी थी; लेकिन उसमें शुद्ध अहिंसाका अभाव था। किन्तु आजके वातावरणमें तुम्हें यह वस्तु सूझ नहीं सकती थी। सम्भव है, में स्वयं भी कहीं भूल कर जाता होऊँगा। अलबत्ता, मैं एक भी कदम बिना सोचे-विचारे नहीं उठाता और प्रत्येक नया कदम उठाने के समय मुझे सोचने-विचारनेका समय मिलता है । आजकल में जो विचार करता हूँ वह केवल प्रार्थना रूप है। इसमें मैं बुद्धिका प्रयोग नहीं करता। केवल अपने हृदयको टटोलकर देख लेता हूँ। स्वामीने भायन्दरसे नमक ले जानेकी बात सोची थी। उसमें भी यही दोष आ जाता। धारासणा मेरी नजर में है, लेकिन मैं किसीको उसके पास भी नहीं फटकने देता। अन्ततः यदि उसपर कब्जा करनेका निश्चय किया गया तो संघ प्रकट रूपसे नोटिस देकर निकलेगा। <small>मैंने जो कुछ लिखा है उसे पढ़कर तनिक भी पश्चात्ताप न करना, दु:ख मत मानना। मैंने तो यह इसलिए लिखा है, जिससे तुम्हें जेलमें अहिंसाका सूक्ष्म १. तीर्दथयात्रियों का दल।<small> ४३-२२<noinclude></noinclude> tucakkxk9amxpaxpw5lrf1n5pd6wdn2 675153 675152 2026-08-30T07:58:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 675153 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२२. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, तुम्हें मेरा आशीर्वाद तो है ही तुम्हारा लारीसे यात्रा किये बिना काम नहीं चल सकता था; फिर भी मेरी दृष्टिसे दोष तो हुआ ही है। यह दोषदर्शन वस्तुतः अन्य लोगोंके हितके लिए है, लेकिन तुम्हारे लिए भी हो तो हर्ज नहीं। मोटर जन्त होना जरूरी नहीं था। मैंने तो सोचा था कि जैसे गंगाजल कांवरमें [पैदल] लाया जाता है, तुम नमक ले जानेकी वही पद्धति अपनाओगे और मुझे यह बात पसन्द भी बहुत आई थी। मान लो कि पांच-पांच मीलपर अथवा लगभग इतनी ही दूरीपर पड़ाव रखें और हर पड़ावमें २५ व्यक्ति हो। २५ लोगोंकी टुकड़ीमें हर व्यक्ति पांच-पांच सेर लेकर निकले तो उसका मतलब होगा तीन मन, पाँच सेर नमक। वह टुकड़ी दूसरे मुकामपर नमक पहुँचा दे और वहीं रहे। वहाँकी टुकड़ी तीसरे मुकामपर पहुँचाये। दूसरी टुकड़ी वापस आये और पहली टुकड़ी धोलेरा पहुँचे। इससे तो लोगोंको बहुत कुछ तालीम मिल जाती और नमक भी अच्छी तरह पहुँचता और किसी किस्मका नुकसान भी न होता । तुमने जो किया उसमें गाड़ी जब्त होने की आशंका तो थी ही; और [नमककी] बोरी तो जब्त होती ही। फिर इसमें कुछ छिपाकर रखनेकी बात भी थी; तुम्हारी विजय भी उसमें छिपानेकी कलापर अवलम्बित थी जब कि हमारे पास इस तरह छिपाने लायक तो कोई बात होनी ही नहीं चाहिए। इस तरह छिपा रखना सामान्य युद्धकी चतुराईके अन्तर्गत आता है। यह हमारे लिए वर्जित है। फिर, बोरीमें रखे हुए नमकको कब्जे में लेने के लिए पुलिसको काफी शक्ति लगानी पड़ेगी । ऐसा हमें अकारण ही नहीं करना चाहिए। फलत: तुम्हारी इस योजनामें बहादुरी तो खूब थी, चतुराई भी थी; लेकिन उसमें शुद्ध अहिंसाका अभाव था। किन्तु आजके वातावरणमें तुम्हें यह वस्तु सूझ नहीं सकती थी। सम्भव है, में स्वयं भी कहीं भूल कर जाता होऊँगा। अलबत्ता, मैं एक भी कदम बिना सोचे-विचारे नहीं उठाता और प्रत्येक नया कदम उठाने के समय मुझे सोचने-विचारनेका समय मिलता है । आजकल में जो विचार करता हूँ वह केवल प्रार्थना रूप है। इसमें मैं बुद्धिका प्रयोग नहीं करता। केवल अपने हृदयको टटोलकर देख लेता हूँ। स्वामीने भायन्दरसे नमक ले जानेकी बात सोची थी। उसमें भी यही दोष आ जाता। धारासणा मेरी नजर में है, लेकिन मैं किसीको उसके पास भी नहीं फटकने देता। अन्ततः यदि उसपर कब्जा करनेका निश्चय किया गया तो संघ प्रकट रूपसे नोटिस देकर निकलेगा। मैंने जो कुछ लिखा है उसे पढ़कर तनिक भी पश्चात्ताप न करना, दु:ख मत मानना। मैंने तो यह इसलिए लिखा है, जिससे तुम्हें जेलमें अहिंसाका सूक्ष्म <small>१. तीर्दथयात्रियों का दल।<small> ४३-२२<noinclude></noinclude> n74joafi53cgikjo047b9mhys3k8ugc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५६ 250 197499 674923 670027 2026-08-29T12:44:18Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 674923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४१२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>सविनय अवज्ञाका अन्त हिंसाके रूपमें ही होगा तो इतिहासका फतवा यह होगा कि ब्रिटिश सरकार चूंकि अहिंसाको समझती नहीं थी इसलिए वह उसे बरदाश्त नहीं कर सकी और परिणामतः लोगोंको हिंसाके लिए उकसाया, क्योंकि हिंसाको यह समझती थी और इसलिए उससे निबट सकती थी। लेकिन मैं तो यही आशा रखूंगा कि आपके उकसाने भड़कानेके बावजूद ईश्वर भारतके लोगोंको ऐसी शक्ति देगा जिससे हिंसात्मक तरीका अपनाने के तमाम प्रलोभन और उत्तेजनाएँ उनपर बेकार साबित होंगी। इसलिए अगर आपसे नमक कर को समाप्त करते और निजी तौरपर नमक बनाने पर लगे प्रतिबन्धोंको हटाते नहीं बना तो मुझे लाचार होकर वह कूच आरम्भ कर ही देनी होगी जिसका उल्लेख मैंने पत्रके प्रारम्भिक अनुच्छेदमें किया है। {{Right|आपका सच्चा मित्र,<br> मो० क० गांधी}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,''' ८-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३९४. पत्र : डा० सैयद महमूदको'''}}}} {{Right|डाकपर-- जलालपुर<br> ४ मई, १९३०}} {{Left|प्रिय डॉ० महमूद,}} ऐसी साफगोईके साथ लिखी आपकी चिट्ठी पाकर मुझे बड़ी खुशी हुई। निराशा तभी होती जब आपने अपना विचार छिपाया होता । मैं अपना अपराध स्वीकार नहीं करता। मैंने उदासीनता नहीं बरती। मुझसे मिलने आनेवाले एक-एक मुसलमानका मैने पूरा-पूरा खयाल रखा। उनमें से कई मुलाकातियोंके साथ मैंने घंटों बिताये। यह कोई प्रदर्शनकी चीज नहीं है। मैने तो वही किया जो मैं अपनी आदतके अनुसार हमेशा करता हूँ। उसमें कोई खास बात नहीं थी। लेकिन आपके साथ मैंने कोई शिष्टाचार नहीं बरता। मुझे लगा कि आपकी ओर खास ध्यान देनेकी मुझे क्या जरूरत है। मैं यह उम्मीद रखता था कि जिस किसी मुद्दे में आलोचना या परिवर्तनकी गुंजाइश होगी, उसके सम्बन्धमें तो आप मुझसे बात करेंगे ही। आपको शायद मालूम नहीं कि जो लोग मुझे जानते हैं और जिनको मैं जानता हूँ तथा जिनके साथ काम करता हूँ उनकी ओर में बहुत अधिक ध्यान नहीं देता। मेरे सामने जो काम है, उसे किसी और तरीकेसे मैं निबटा भी नहीं सकता। पता नहीं, मेरी बात आपकी समझमें आई या नहीं और आपको अय भी तसल्ली हुई या नहीं। अगर न हुई हो तो कृपया मुझे फिर लिखें। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 0c0gi750uu6px3evwgg95fdt5em7yib पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५७ 250 197500 674924 670028 2026-08-29T12:52:45Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 674924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र पद्मावतीको|४१३}}</noinclude>आपने एक अपील भेजने की बात कही थी, जो अभी तक नहीं मिली। लेकिन मैंने उसका उल्लेख अवश्य देखा है। फिर भी, मैं कोई फार्मूला तैयार कर रहा हूँ और अगर तैयार कर पाया तो उसे 'यंग इंडिया' में प्रकाशित कर दूंगा । कार्य समितिकी<ref>१. कांग्रेसी कार्य समिति; देखिए "तार मोतीलाल नेहरूको", ४-५-१९३० ।</ref> बैठक के दौरान आपसे मिलने की आशा रखता हूँ, बशर्ते कि मैं तबतक गिरफ्तार न हुआ । {{Right|हृदयसे आपका<br> मो० क० गांधी}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} इस पत्रको मैंने तीन जगहों में लिखकर पूरा किया है--कैम्प में, रेलगाड़ीमें और फिर सूरत में । अंग्रेजी (जी० एन० ५०८२) की फोटो-नकलसे । {{C|{{larger|'''३९५. पत्र : पद्मावतीको'''}}}} {{Right|४ मई, १९३०}} {{Left|चि० पद्मावती,}} तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई। तुम्हारे साथ हुई बातचीत मुझे अच्छी तरह याद है। ली हुई प्रतिज्ञाका पालन करना। वहाँके कार्य में खूब व्यस्त हो जाना। निर्भय हो बाहर निकलना, तभी और बहनें भी निकलेंगी। गुजराती, मद्रासी आदिका भेद भूल जाना और द्रौपदीके समान ईश्वर पर विश्वास रखकर भय मात्रको त्याग देना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ४५८७ ) की फोटो नकलसे। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> dn0k1qba158f3n3g7q9yte6lpcffnw2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५८ 250 197501 675063 670029 2026-08-30T03:45:46Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675063 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३९६. भेंट : जे० बी० कृपलानीको'''<ref>१. जे० बी० कृपलानी गांधीजी की गिरफ्तारीसे कुछ ही घंटे पहले उनसे मिले थे। यह उनके साथ हुई गांधीजी की बातचीतके एक विवरणपर आधारित हैं। </ref>}}}} {{Right|४ मई, १९३०}} महात्माजी ने कहा कि आज जो स्थिति सामने आई है, उसका अनुमान मैंने पहले ही लगा लिया था। में अच्छी तरह जानता था कि मेरे सहायक मुझसे अलग कर दिये जायेंगे और यह देखकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ कि नौजवानोंका जोश पहलेको ही तरह कायम है और वे ज्यादा काम करनेको आकुल हैं। लेकिन मुझे इस बातकी बड़ी फिक्र है कि इस शक्तिका उपयोग रचनात्मक कार्यके लिए किया जाये। यदि सरकार स्वयंसेवकोंको गिरफ्तार नहीं करती तो मुझे लगता है कि उन्हें रचनात्मक कार्यों --जैसे कि अधिक सूत तैयार करने और चरखा तथा तकलीको लोकप्रिय बनाने के लिए विस्तृत प्रचार कार्य -- में लग जाना चाहिए। यह भी चाहता हूँ कि वे शिविर-जीवन जीना और सिपाहियोंकी तरह रहना सीखें। सिपाही सफाईका काम खुद करते हैं, अपने जूतों पर खुद पालिश करते हैं, कृत्रिम युद्धका अभ्यास करते हैं और लाभदायक खेलकूदमें भाग लेते हैं। स्वयंसेवकोंको भी ऐसा ही करना चाहिए। उन्हें कवायदकी उपेक्षा तो कभी नहीं करनी चाहिए। अनुशासनका मतलब होगा आधी लड़ाई जीत लेना । महात्माजी का खयाल था कि सरकार की चाल यह है कि साधारण अवज्ञाकारियों को गिरफ्तार न करके वे जो कुछ कर रहे हैं, उन्हें यह सब तबतक करने दिया जाये जबतक कि ये थक न जायें। स्वयंसेवकोंको धीरजसे काम लेना चाहिए, अन्यथा सरकारकी चाल सफल हो जायेगी। राष्ट्रीय पुननिर्माणके हर क्षेत्रमें --जैसे खादी- उत्पादन के क्षेत्रमें जो बहिष्कारके फलस्वरूप होनेवाले कपड़की कमी के कारण और अधिक जरूरी होगा-- काम करते जायें। उन्हें मद्य निषेधके गहन कार्यक्रमको सफल बनाने के लिए भी जुटकर काम करना चाहिए। इसके लिए उन्हें प्रचार करना चाहिए, धरना देना चाहिए और खजूरके पेड़ोंको काट गिराना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि यह सब केवल औरतें ही करें---विशेषकर बिहार और संयुक्त प्रान्तमें, जहाँ इस कामको करनेवाली स्त्रियोंकी संख्या बहुत कम है। ऐसे प्रान्तों में पुरुषोंको स्त्रियोंकी मदद करनी चाहिए। इन प्रान्तोंमें पुरुषोंको ही पहल करनी चाहिए। • • • महात्माजी का यह भी खयाल था कि जहाँ-कहीं ऐसी सुविधा हो, वहाँ लोगोंको दूसरे कानून भी तोड़ने चाहिए। मगर नमक-कानूनको तो हर हालत में तोड़ना Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 6sxa3urgyqg1ewklendw1a5zygrk4ys पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५९ 250 197502 675065 670030 2026-08-30T03:50:15Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675065 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||भेंट : जे० बी० कृपलानीको|४१५}}</noinclude>ही है। महात्माजी का खयाल था कि दूसरे कानूनोंको तोड़नेका काम विशेषकर उन प्रान्तों में करना चाहिए जहाँ नमक बनाना आर्थिक दृष्टिसे लाभकर नहीं है या जहाँ नमक बनानेकी सुविधा ही नहीं है। इस सम्बन्धमें महात्माजी के मनमें बिहारका चौकीदारी कर और मध्य प्रान्तके जंगल कानून थे । महात्माजी का यह भी विचार था कि घरासणामें की जानेवाली कार्रवाई बहुत-से स्वयंसेवकोंको खपा लेगी, क्योंकि अगर सरकारने "आक्रमणकारियों" को गिरफ्तार किया तो वहाँ देशके दूसरे हिस्सों से भी स्वयंसेवकोंकी जरूरत हो सकती है। उन्होंने कहा कि घराणा गुरुका दूसरा बाग साबित हो सकता है। मुझे लगता है, वह स्थिति आ गई है कि रचनात्मक कार्य कर सकनेवाले लोगोंके लिए जेल जानकी आवश्यकता नहीं रह गई है। यदि वर्तमान उत्साहका उपयोग देशके स्थायी लाभके लिए करना हो तो उस उत्साहको रचनात्मक दिशामें उसी प्रकार मोड़ देना चाहिए जिस प्रकार डाइनमोके जरिये विद्युत्प्रवाहको इच्छित दिशा दी जाती है। धरना देने के सवाल के बारेमें आचार्य कृपलानीने कहा कि मेने उनको ऐसी बुकानोंपर धरना देने का अपना अनुभव बताया जहां विदेशी और स्वदेशी दोनों तरहके कपड़े बिकते हैं। बहुत-से व्यापारी खद्दर बताकर बाजारमें मिलके कपड़ोंकी भरमार कर रहे हैं। इसके उत्तर में महात्माजोने कहा कि में जानता था कि धरना देना पूरी तरहसे कारगर साबित नहीं होगा, लेकिन स्वदेशीके लिए वातावरण तैयार करना आवश्यक है और स्वदेशी तो बहुत बड़े पैमानेपर खादीके उत्पादनसे ही सम्भव है। इसमें मिल एजेंट भी मदद कर सकते हैं। इसका तरीका यह है कि वे राजनीतिक कार्यकर्ताओंके साथ सहयोग करें और एक खास अंकसे कम अंकोंके सूतका कपड़ा न बनायें तथा इस प्रकार हाथ कताईको प्रोत्साहन दें। महात्माजी ने कहा कि मैंने इस सम्बन्धमें सेठ अम्बालाल साराभाई और श्री बिड़लासे कई बार बातचीत की है। श्री बिड़लाने मेरा दृष्टिकोण समझ लिया है और मारवाड़ में अपने गाँवके पास अपनी देख-रेखमें एक खादी संगठन खोलनका निश्चय किया है। सेठ अम्बालालन भी मेरा दृष्टिकोण लगभग समझ लिया। लेकिन लगता है अन्य मिल मालिक मेरा उपयोग केवल अपने विज्ञापन एजेंटकी तरह करना चाहते हैं। मुझे ऐसी आशंका है कि यदि व्यापक पैमाने पर तत्काल हाथ कलाई शुरू नहीं हुई तो खादी पर्याप्त उत्पादनके अभाव में स्वदेशी आन्दोलन विफल हो जायेगा और व्यापारियोंके लिए जनताको ठगना सम्भव होगा। जब जनता एक बार यह जान लेगी कि वह सन्देहास्पद मालके लिए ऊँची कीमतें दे रही है तो राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओंपर से उसका विश्वास इस तरह उठ जायेगा कि वह फिर कभी उनकी बात नहीं सुनेगी, बल्कि उनका विरोध भी करने लगेगी। इसलिए मिल मालिकोंके लिए लंकाशायर और जापानका मुकाबला करनेका एकमात्र उपाय यही है कि वे एक खास Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> b6hmg7xpjzohm7itrckucp1famyrn1h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६० 250 197503 675066 670031 2026-08-30T03:55:16Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675066 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''अंकसे कम अंकोंके सूतसे कपड़ा बुनना बन्द करके राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओंके साथ सहयोग करें और इतनी ही महत्वपूर्ण यह बात भी है कि ये कीमतोंपर नियन्त्रण रखें।''' {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''हिन्दू,''' १४-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३९७. भाषण : सूरतमें'''}}}} {{Right|४ मई, १९३०}} हम अपना व्रत अपनी बौद्धिक क्षमताके बलपर नहीं निभा सकते।<ref>१. सूरत नगरकी पंचायतोंने अपने-अपने समाजके लोगों मद्यपान छोड़ देनेका अनुरोध करते हुए प्रस्ताव पास किये थे।</ref> उसके लिए सम्पूर्ण हृदय परिवर्तन और ईश्वरमें आस्था आवश्यक है। यही आस्था हमें अपने व्रतका निर्वाह करनेके लिए आवश्यक शक्ति दे सकती है। हम पुरुष तो मद्य-निषेध आन्दोलन में विफल हो गये हैं। इसलिए अब मैंने स्त्रियोंसे इसमें सहायता देनेको कहा है। अगर कोई शराबियोंके हृदयको पिघला सकता है तो वह स्त्री ही है। मैंने आबकारी विभागके मन्त्रियोंसे अक्सर शराबका व्यापार बन्द करनेको कहा है। उनका उत्तर यह होता है कि तो फिर राजस्वका कोई नया स्रोत बताइए। मैं उनसे बच्चोंको शिक्षा देना बन्द करनेको कहता हूँ तो यह सुझाव माननेको वे तैयार नहीं होते । यदि स्वराज्यके अन्तर्गत हम शराबका व्यापार करेंगे तो हमारे राष्ट्राध्यक्षको भी आगे चलकर ऐसी ही समस्याका सामना करना पड़ेगा। हम अमरीकियोंकी तरह साहसी और उद्यमी भी नहीं हैं। वे लोग अमेरिकामें नशाबन्दीका काम सफलतापूर्वक चला रहे हैं। हमारा पौरुष चुक गया है और इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि सबसे पहले इस समस्याका हल निकालिए । यह समय इस काम के लिए सबसे अधिक उपयुक्त और शुभ है। मैं आपसे पूरे आग्रहके साथ अनुरोध करता हूँ कि आपने जो प्रतिज्ञा ली है, उसका आप पालन करें। मुझे धोखा न दें। अगर आप मद्यपान न छोड़ सकते हों तो मुझे साफ-साफ वैसा बतायें। मैं उसके लिए भी आपको बधाई दंगा । खुद मेरा लड़का ईमान- दारीके साथ यह कहता है कि उससे शराब छोड़ते नहीं बनता और में उसकी इस सत्यवादिताके लिए उसे बधाई देता हूँ। इसी तरह आपको भी सत्यवादितासे काम लेना चाहिए ताकि स्थितिका अनुमान लगाने में मुझसे गलती न हो। मेरे लड़के और मद्यपान छोड़ने में असमर्थ आप लोगोंकी सहायता भगवान् ही करेगा। अगर आप मुझे धोखा देते है तो उसका मतलब यह होगा कि आप अपने समाज और देशको धोखा दे रहे हैं। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> oet76swzweodo2o3kq7x7w3weqa14to पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६१ 250 197504 675069 670032 2026-08-30T04:03:15Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675069 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||अल्पसंख्यकोंकी समस्या|४१७}}</noinclude>'''कुछ स्थानोंमें धरना देनेवाली कतिपय महिलाओंके अपमानित किये जानेकी चर्चा करते हुए गांधीजी ने कहा कि यदि लोग उन्हें मदोंके लिए काम करनेवाला निम्नतर कोटिका प्राणी न समझते और वासनाकी पूर्तिका साधन मात्र न मानते होते तो कोई भी उन महिलाओंका स्पर्श करनेकी हिम्मत न करता ।''' लेकिन वे यदि उन महिलाओंपर पत्थर बरसायेंगे तब भी वे धरना देती ही रहेंगी। 'पुसीफुट' को अमेरिकामें मद्य निषेध करानेके लिए अपनी आँखसे हाथ धोना पड़ा, लेकिन तब भी उसने प्रयत्न करना नहीं छोड़ा। भारतकी महिलाओंके साथ किये गये एक-एक अपमानके लिए भारतको जवाबदेह होना पड़ेगा। यह मेरी आखिरी बाजी है और मैं अपना सब कुछ दाँवपर लगा देने को तैयार हूँ। लेकिन यह सब में भारतकी मुक्ति के लिए कर रहा हूँ। अगर एक भी जिला तैयार हो तो हमें स्वराज्य मिलकर रहेगा। आपको स्वयंको शुद्ध बनाना चाहिए; आपको उद्यमी होना चाहिए। स्वराज्य प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ६-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३९८. अल्पसंख्यकोंकी समस्या'''}}}} {{Right|[५ मई, १९३० के पूर्व ]<ref>१. यह स्पष्टत: ५ मईको गांधीजी की गिरफ्तारीके पूर्व लिखा गया था।</ref>}} पण्डित जवाहरलाल नेहरूने १६ मार्चको महादेव देसाईको निम्नलिखित पत्र<ref>२. देखिए परिशिष्ट-३ ।</ref> भेजा है। महादेव देसाई बहुत व्यस्त थे, इसलिए वे इस सम्बन्धमें कार्रवाई नहीं कर सके। अब वह पत्र मुझे भेज दिया गया है और अल्पसंख्यकोंके उलझे हुए सवाल पर मैं अध्यक्ष के विचार जनताके सामने बेहिचक पेश कर रहा हूँ। अब चूंकि वे जेल चले गये हैं, इसलिए उनके इन विचारोंका महत्त्व और भी बढ़ गया है। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,''' १५-५-१९३०}} ४३-२७ Gandhi Heritage oral<noinclude></noinclude> 44xuclxd3lj5ezgpp2vlk0erlmzlyof पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६२ 250 197505 675074 670033 2026-08-30T04:12:15Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675074 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३९९. टिप्पणी : जे० बी० पेनिंगटनके पत्रपर'''<ref>१. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>}}}} {{Right|[५ मई, १९३० के पूर्व ]}} मुझ जैसे अनुभवी व्यक्तिके मनपर श्री पेनिंगटनके पत्रका कोई असर नहीं हो सकता । अनुभवकी कोई बात किये बिना दलीलोंका पहाड़ खड़ा कर दिया गया है। स्वर्गीय सर टी० महादेव रावके प्रति मेरे मनमें बड़ा सम्मान है, लेकिन मैं विनम्रता-पूर्वक कहूँगा कि ब्रिटिश शासनकी उन्होंने जो प्रशस्ति की है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ। किसी समय मेरे विचार भी इन दिवंगत राजनयिकके विचारोंके ही समान थे । लेकिन कटु अनुभवोंने मुझे वास्तविकताका बोध करा दिया। श्री पेनिंगटन द्वारा दी गई एक-एक दलीलका जवाब इन पृष्ठोंमें दिया जा चुका है। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,''' ८-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''४००. पत्र : बम्बईकी सत्याग्रह-समितिको'''}}}} {{Right|[५ मई, १९३० के पूर्व ]}} बहुत-से बम्बई निवासी मित्र मुझसे मिलने आये हैं और यह मानते हुए कि धरासणापर हम निश्चित रूपसे 'आक्रमण' करनेवाले हैं, मुझसे कहा है कि मैं आक्रमणकारी-दल कराड़ीके बजाय बम्बईसे लेकर चलूँ। यदि कुछ प्रारम्भिक शर्तों पूरी हो जायें तो उस आक्रमणका नेतृत्व करनेमें में अपना गौरव और सौभाग्य मानूंगा। देखता हूँ, इस आक्रमणकी योजनाके सम्बन्ध में बहुत-सी गलत धारणाएँ फैली हुई हैं। इन गलतफहमियोंका कारण 'आक्रमण' (रेड) शब्दका प्रयोग है। बात यह है कि गुजरातमें तो मैं अपने सभी भाषण गुजरातीमें ही देता रहा हूँ। इसलिए 'रेड' शब्दका प्रयोग मैंने नहीं किया। लेकिन में यह स्वीकार करता हूँ कि यह ठीक अनुवाद है। लेकिन मेरे श्रोताओंको मालूम था कि मूल शब्द 'धाड़' था और इसका उपयोग मैंने धरासणाके 'धार' अंशके साथ तुक मिलानेके लिए कौतुकवश किया था। इसे सौभाग्य कहिए या दुर्भाग्य, अहिंसक लड़ाईके लिए भी सैनिक शब्दावलीका प्रयोग करना ही पड़ता है। लेकिन जिस प्रकार ऐसे शब्दोंके प्रयोगसे किसीके मनमें कोई भ्रम पैदा नहीं होता, उसी प्रकार यदि 'आक्रमण' को विनयपूर्ण अहिंसक या सत्याग्रही होना हो तो इस शब्दके प्रयोगसे किसीको परेशान होनेकी जरूरत नहीं है। उस महत्त्वपूर्ण विशेषणके प्रयोगसे सारी योजनाका रूप ही Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> t5cuhez64ujllzqcfn4oyq9mr58ea2q पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६३ 250 197506 675077 670034 2026-08-30T04:16:41Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र : बम्बईकी सत्याग्रह-समितिको|४१९}}</noinclude>बदल जाता है, लेकिन यह आक्रमण चाहे जितना निर्दोष हो, यदि सचमुच आक्रमण किया गया तो वह हिंसक आक्रमणके परिणामोंसे भी अधिक गम्भीर परिणामोंकी सम्भावनासे आपूरित होगा। इसलिए इस प्रस्तावित आक्रमणमें शामिल होनेकी इच्छा रखनेवालों को कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी और चूंकि इस संघर्षका उद्देश्य केवल नमक- कर की समाप्ति नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज्यकी स्थापना है, इसलिए शर्ते उसी उद्देश्यके अनुकूल होनी हैं। वे तीन शर्तें इस प्रकार है: १. पूर्ण अनुशासनका पालन । २. मद्यपानका पूर्ण त्याग और कभी भी मयका स्पर्श न करनेकी स्थायी प्रतिज्ञा लेना । ३. हाथ कते सूतसे बुनी खादीके प्रयोगके लिए भी स्थायी प्रतिज्ञा लेना और सिवा उस स्थितिके जब कि कोई समयाभाव अथवा शारीरिक अक्षमताके कारण कातनेमें असमर्थ हो, प्रतिदिन कमसे कम एक घंटे तकलीपर सूत कातना। यदि बम्बईमें ऐसे एक लाख व्यक्ति भी हों तो मुझे उनका नेतृत्व करनेमें कोई हिचक नहीं होगी। मैं जानता हूँ कि बम्बईके नागरिक मेरी इन शर्तोंपर हँसेंगे नहीं और न वे इन्हें पूरा करना असम्भव ही मानेंगे। उन्हें यदि कोई कठिनाई हो सकती है तो सिर्फ तकलीके सम्बन्धमें हो सकती है। निश्चय ही यदि बम्बईके एक लाख लोगोंमें कातने- की सच्ची इच्छा उत्पन्न हो जाये तो तकलीपर कातना तो बच्चोंके खेलके समान आसान है । बम्बईके आरामतलब नागरिकोंको प्रतिदिन नियमित रूपसे काम करना शायद कठिन मालूम पड़ सकता है, लेकिन तब यह भी सच है कि आजादीकी लड़ाई कभी भी आरामतलब लोगोंने नहीं जीती। मैंने ऐसी शर्तें रखी हैं, इसपर किसीको मुझसे चिढ़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ये शर्तें किसी भी तरह बन्धनकारी तो नहीं हैं। ये तो एक ऐसे अनुबन्धकी शर्तोंके रूपमें विचारार्थ ही पेश की गई हैं, जिस अनुबन्धमें शामिल होना या न होना लोगोंकी मर्जीपर निर्भर है। बम्बईके लोग चाहें तो मेरी शर्तोंको अस्वीकार करके अपनी इच्छानुसार बरतनेको स्वतन्त्र हैं। इन शर्तोंको अस्वीकार कर देनेसे वे आजकी अपेक्षा कुछ कम कांग्रेसी बन जायेंगे, ऐसी बात भी नहीं है । {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ५-५-१९३०}} Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> nzyy8e37yk8m3s9avgqww9ic2xxafka पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६४ 250 197507 675084 670035 2026-08-30T04:47:18Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४०१. मध्यरात्रि में गिरफ्तारी'''}}}} {{Right|कराड़ी<br> ५ मई, १९३०}} '''मजिस्ट्रेटने गांधीजी की झोंपड़ीमें पहुँचकर उन्हें जगाया।<ref>१. पुलिस सुपरिटेंडेंट और २० सशस्त्र सिपाहियोंके साथ मजिस्ट्रेट १२-४५ पर गांधीजी के शिविर में पहुँचा। उस समय वे सो रहे थे।</ref> उसने कहा : " में आपकी गिरफ्तारी का वारंट लेकर आया हूँ ।" इसपर गांधीजी ने विनम्रतापूर्वक कहा :''' मुझे इसका कोई आश्चर्य नहीं है, लेकिन क्या आप वारंट पढ़कर मुझे सुनायेंगे ? '''मजिस्ट्रेटने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और वारंट पढ़कर सुनाया। यह बम्बई के गवर्नर सर फ्रेड्रिक साइक्सके हस्ताक्षरसे जारी किया गया था। वारंट इस प्रकार था :''' '''चूंकि सरकार श्री मो० क० गांधीकी गति-विधियोंको बड़ी चिन्ताकी दृष्टिसे देखती है, इसलिए उसका निर्देश है कि १८२७ के विनियम २५ के अधीन उनपर रोक लगाई जाये और जबतक सरकार उचित समझे तबतक उन्हें कंदमें रखा जाये तथा उन्हें तत्काल परवडा केन्द्रीय जेल भेज दिया जाये। "''' '''जब वारंट पढ़ा जा रहा था तो गांधीजी मुसकरा रहे थे। उन्होंने पूछा:''' मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ, लेकिन क्या आप मुझे हाथ मुंह धो लेनेकी इजाजत देंगे ? '''मजिस्ट्रेटने कहा: 'बेशक ।' ''' '''इस बीच आश्रमके सभी लोग जाग चुके थे। सभी विदाईके समय गांधीजी के दर्शन करनेको उत्सुक थे। गांधीजी प्रार्थना करनेके लिए अपनी झोंपड़ीसे बाहर आये। सभी आश्रमवासी प्रार्थना करनेके लिए घुटनोंके बल बैठ गये और पुलिस अधिकारी उनकी निगरानी करते रहे। प्रार्थना गांधीजी न स्वयं कराई; इसके बाद उन्होंने अपने कागजात इकट्ठा करके एक स्वयंसेवकके सुपुर्व कर दिये। इसी स्वयंसेवकको उन्होंने अपने कारावास कालके लिए नायक चुना था ।''' {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ६-५-१९३०}} Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> rsfds8qfpwg6pow5sz0tkjfetyt5k7k पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६५ 250 197508 675089 670036 2026-08-30T04:55:58Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४०२. भेंट : 'डेली टेलीग्राफ' के प्रतिनिधिको'''<ref>१. गांधीजी को रेलगाड़ी में बैठाकर बोरीवली के जाया गया और वहाँ से मोटर गाड़ी परवडा देखिए परिशिष्ट-४ |</ref>}}}} {{Right|बोरीवली<br> ५ मई, १९३०}} '''मुझे और मेरे साथीको देखकर गांधीजी के चेहरेपर आश्चर्यका भाव उमड़ आया जान पड़ा, क्योंकि ये हम दोनोंको पहलेसे जानते थे। उन्होंने अत्यन्त सौहार्द- पूर्वक हमारा स्वागत किया।''' '''मैंने पूछा :" श्री गांधी, क्या आप कोई विदाई सन्देश देना चाहेंगे ?" उनका उत्तर था:''' अभी दूँ या कुछ समय बाद ? '''मैंने कहा "अभी दें तो अच्छा रहे।"''' '''वे कुछ देर चुपचाप सोचते रहे। ऐसा जान पड़ा कि घटना क्रमसे वे कुछ स्तम्भित हो गये हैं और अपनी बात कहनेको उन्हें ठीक शब्द नहीं मिल रहे हैं। लेकिन कुछ देर रुककर उन्होंने कहा :''' आप अमेरिकाके लोगोंसे कहें कि वे इस संघर्षसे सम्बन्धित सवालोंका निकटसे अध्ययन करें और उनके गुण-दोषोंके आधारपर ही उनके विषयमें कोई राय कायम करें। '''मैंने पूछा : " आपके मनमें किसीके प्रति कोई कटुता या दुर्भावना तो नहीं है ?"''' नहीं, किसीके प्रति नहीं गिरफ्तारीका इन्तजार तो मैं बहुत पहलेसे ही कर रहा था। '''क्या आप ऐसा मानते हैं कि आपको गिरफ्तारीसे भारत-भरमें काफी उपद्रव होंगे ?''' नहीं, मैं तो ऐसा नहीं समझता। जो भी हो, इतना तो मैं ईमानदारीसे कह सकता हूँ कि उपद्रवोंको रोकनेके लिए मैंने हर सम्भव पूर्वोपाय किया है। '''तो आपको किसी उपद्रवकी आशंका नहीं है ?''' '''यह सवाल सुनकर महात्माजी कुछ क्षण संकोच विकोचमें पड़े रहे और फिर उन्होंने उत्तर दिया:''' उम्मीद तो यही करता हूँ कि उपद्रव नहीं होंगे। मैंने उन्हें रोकनेकी भरसक व्यवस्था की है। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 9eqabzeo3xweo6o0r1ongi7j847gnmh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६६ 250 197509 675093 670037 2026-08-30T05:17:53Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''हमारी इतनी ही बातचीत हो पाई थी कि बीचमें कानूनी कार्रवाईकी अड़चन आ पड़ी। इन्स्पेक्टर गार्डनने कहा : " श्री गांधी, अब अगर आप तैयार हों तो कृपया चलें।" रेलगाड़ीमें गांधीजी के साथ केवल एक ही सज्जन आये। वे थे भारतीय चिकित्सा सेवाके एक डाक्टर। वे बराबर एक मूक दर्शककी भाँति चुप रहे। अब वे महात्माजी की बगलमें बैठ गये और इन्स्पेक्टर गार्डन शोफरकी बगलमें ।''' {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''हिन्दू,''' २७-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''४०३. पत्र : ई० ई० डॉयलको'''<ref>१. पलने इसका पाठ १२ मईको गृह-विभागको भेज दिया था।</ref>}}}} {{Right|यरवडा<br> १० मई, १९३०}} {{Left|प्रिय मेजर डॉयल,}} हमारे बीच हुई बातचीतपर विचार करनेके बाद में इस निष्कर्षपर पहुँचा हूँ कि सरकार मुझे जो विशेष सुविधाएँ देने को तैयार है, उनका लाभ मुझे यथासम्भव नहीं लेना चाहिए। मैं सरकारकी मार्फत किताबें और अखबार लेना नहीं चाहता। अगर मुझे इजाजत मिली तो अखबारोंमें से तो मैं निम्नलिखित मँगवाऊँगा : 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'टाइम्स ऑफ इंडिया', 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर', मॉडर्न रिव्यू', 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' (हिन्दी तथा गुजराती) अगर ये पत्र-पत्रिकाएँ मँगानेकी इजाजत दी जाती है तो मैं यह माने लेता हूँ कि उनमें कोई कतर उपत नहीं की जायेगी । सरकारने १०० रुपये मासिक भत्ता देनेकी बात कही है। मुझे उम्मीद है कि मुझे इतने पैसोंकी जरूरत नहीं होगी। मैं जानता हूँ कि मेरा आहार व्ययसाध्य है। इस बातका मुझे दुःख है, लेकिन अब तो यह मेरे शरीरके लिए आवश्यक हो गया है। मैं जो इन सारी सुविधाओंको स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ उसके लिए, मुझे उम्मीद है, सरकार या आप मुझको कृतघ्न न मानेंगे। मेरे मनपर तो यह चीज ( अगर ऐसा कहा जा सकता हो तो कहिए) एक भूतकी तरह छाई हुई है कि हम सब करोड़ों मेहनतकश लोगोंको चूसकर सुखका जीवन जी रहे हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी मितव्ययितासे होनेवाली बचत, मैं अपने चारों ओर जो फिजूलखर्ची और Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> spv8w1bvaz9qqiovssj04gfq37ac0fo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६७ 250 197510 675097 670038 2026-08-30T05:23:35Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र : मीराबहनको|४२३}}</noinclude>बरवादी होते देख रहा हूँ -- चाहे वह जेलमें हो या जेलके बाहर-- और बाहर तो और भी अधिक हो रही है, उस विशाल समुद्र में बूंदके समान है। लेकिन मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मनुष्यके बूतेका तो बहुत थोड़ा करना ही है। मगर उस थोड़ेकी उपेक्षा उसे हरगिज न करनी चाहिए। इसके अलावा जेलमें किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्ध में भी मेरे विचार बड़े तीव्र है। हालमें कैदियोंका जो वर्गीकरण किया गया है, वह मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। मैं मानता हूँ कि किसी हत्यारेको अपनी आवश्यकताएँ पूरी करवानेका उतना ही हक है जितना किसी अन्य कैदीको । इसलिए जरूरत यान्त्रिक ढंगकी कामचलाऊ व्यवस्थाकी नहीं, बल्कि इस समस्याको मानवीय दृष्टिसे हल करनेकी है। एक बात मुझे अवश्य कह देनी चाहिए। इस जेलमें जो सत्याग्रही कैदी हैं, मुझे उनसे सम्पर्क स्थापित करने की जरूरत महसूस होती है। मुझे उनसे अलग रखना बिलकुल अनावश्यक और क्रूरतापूर्ण है। {{Right|भवदीय,<br> मो० क० गांधी}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे सीक्रेट ऐक्स्ट्रैक्ट्स,''' ७५० (५) - ए तथा एस० एन० १९९७१ से भी ।}} {{C|{{larger|'''४०४. पत्र : मीराबहनको'''<ref>१. यह पत्र वास्तवमे १६ मईको डाकमें डाला गया था; देखिए "पत्रः मोराबहन को ", १८-५-१९३० ।</ref>}}}} {{Right|यरवडा<br> १२ मई, १९३०}} {{Left|चि० मीरा,}} जेलसे सबसे पहले तुम्हींको पत्र लिख रहा हूँ और वह भी मौनवारको । मैं बिलकुल स्वस्थ सानन्द हैं। बहुत दिनोंसे आराम नहीं मिला था, सो अब खूब आराम कर रहा हूँ। यहाँकी रातें ठंडी होती हैं और मुझे खुलेमें रखा जाता है। इसलिए नींद अच्छी आती है और उठनेपर खूब ताजगी महसूस होती है। भोजन-पद्धति में जो परिवर्तन किया है, उसकी जानकारी तुम्हें सबके नाम लिखे सामान्य पत्रसे मिल जायेगी । चरखा इतनी समझदारीसे और उसके साथकी चीजें इतनी सावधानी से बांधकर भेजी गई हैं कि उसे देखकर तबीयत खुश हो गई। जेल अधीक्षकने बताया है कि धुनकी तो, जो भाई उसे यहां ला रहे थे, उन्होंने रास्तेमें ही खो दी। लेकिन अभी मुझे उसकी जल्दी भी नहीं है। तुमने खूब सारी पूनियां भेज दी हैं । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> qispnd1do6pexsa6a2z8oojsns6xdlf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६८ 250 197511 675120 670039 2026-08-30T06:57:45Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675120 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४२४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>पता नहीं, पुस्तकें मुझे किसने भेजीं। ये तो ये नहीं हैं जिन्हें मैं चाहता था । इन पुस्तकोंको तो वापस पुस्तकालय में भेजना था। मुझे जो पुस्तकें भेजनी थीं, उनकी सूची मैंने गिरफ्तार होनेपर कुसुमको दे दी थी। लेकिन लगता है, कौन-सी पुस्तकें भेजनी हैं, यह हिदायत किसीको दिये बिना वह आश्रमसे चली गई या अगर उसने हिदायत दी तो गलत दी। फिर भी, इस भूलके कारण मुझे कोई खास कठिनाई नहीं हो रही है, क्योंकि अभी मुझे उनकी कमी नहीं खलती। इस समय तो मैं जितना भी समय हो सकता है उतना तकलीको दे रहा हूँ। देखता हूँ, उसमें तो मेरी कोई गति ही नहीं है। घंटे भरमें मुश्किलसे ३० तार निकाल पाता हूँ। पहले दिन तो मैंने सात घंटे लगाये और इतने समयमें कुल १६० तार ही निकाल पाया। और इतना करते-करते में थककर चूर हो गया। मुझे अधिक गति पानेकी युक्ति सीखनी है। इसलिए मुझे पुस्तकें पानेकी जल्दी नहीं है। आशा है, तुम्हें माताजी से उनके स्वास्थ्य और दूसरी बातोंके बारेमें शुभ समाचार मिले ही होंगे। जेल अधिकारी बड़े भले हैं और मेरा खूब खयाल रखते हैं। {{Left|सस्नेह,}} {{Right|बापू}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} लगता है, मुझे आश्रमसे डाक प्राप्त करनेकी सुविधा दी जायेगी। इसलिए तुम आश्रमकी डाकके साथ हर हफ्ते एक पत्र भेज सकती हो। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९५ ) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२९ से भी । {{C|{{larger|'''४०५. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|[१२ मई, १९३० ]<ref>१. तारीख बापुना पत्रो-९ : श्री नारणदास गांधीने, भाग १ से ली गई है।</ref>}} {{Left|चि० नारणदास,}} यह पत्र सबको पढ़वा देना ताकि मुझे एक ही चीज बार-बार न लिखनी पड़े। बहुत करके मैं हर सप्ताह एक पत्र लिख सकूंगा और तुम मुझे उत्तर लिख सकोगे । मेरी तबीयत ठीक रहती है। यहाँ आश्रमके नियमानुसार ही सवेरे उठता और नित्य कर्म आदि करता हूँ। चूंकि बिजली है इसलिए 'गीता' के अध्यायका पाठ भी नियमपूर्वक करता हूँ। मैं आजकल बहुत दिनोंकी थकान उतार रहा हूँ इसलिए दिनमें करीब दो-तीन घंटे सोता हूँ। सामान्यतः मैं सवेरे आठ बजेके करीब और दोपहरको बारह बजे के आसपास सोता हूँ। कूलमें नारंगीको छुट्टी दे दी थी, उसे फिरसे लेना शुरू कर दिया है। पहले दिन ठण्डा दूध लिया था इसलिए अभी तक Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> pxvpsp6b4d7a26pufhzaqjnjl0wtgol पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६९ 250 197512 675125 670040 2026-08-30T07:02:52Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675125 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र नारणदास गांधीको|४२५}}</noinclude>तो ठण्डा दूध ही लेता हूँ। लगभग तीन सेर दूध पीता हूँ कुछ कम करना पड़ेगा; अथवा दही बना लूंगा। सवेरे भी गरम पानी पीनेके बदले ठण्डा पानी पी लेता हूँ। यह तो प्रयोगके लिए है। जेल अधिकारियोंने पानी गरम करनेकी पूरी सुविधा दे रखी है। लेकिन यदि ठण्डे पानीसे शरीर अच्छा रहे तो गरम पानीकी झंझटमें क्यों पड़ा जाये ? शहद छोड़ दिया है। नहाना भी मैंने ठण्डे पानीसे शुरू कर दिया था परन्तु कलसे गरम पानीसे नहानेका निश्चय किया है। बकरीको मेरे सामने लाकर उसका दूध दुहा जाता है इससे दूधकी स्वच्छताके बारेमें कुछ कहने की गुंजाइश नहीं रह जाती । ठण्डे दूधसे काम नहीं चलेगा तो अवश्य ही गरम दूध लेने लगूंगा। वर्तन आदि साफ करनेके लिए मुझे एक व्यक्ति दिया गया है। खजूर और मुनक्का तो खुराकमें हैं ही मेरी खुराकके बारेमें किसीको चिन्ता करनेका कोई कारण नहीं है। जमनावन आदिको लिख देना कि मुझे फलादि भेजनेकी कतई जरूरत नहीं है; ये यह सब भेजने के झमेलेमें न पड़ें। यदि जरूरत हुई तो यहींसे मिल जायेंगे । अनसूयावह्नसे कहना कि यहाँ पहलेकी तरह कोई पैसे न दे। उसकी कोई जरूरत नहीं है। हमारे पास किसी वस्तुकी अनावश्यक सँभाल करनेका समय नहीं है और न होना चाहिए। अनावश्यक खर्च करनेके लिए पैसा नहीं है, न होना ही चाहिए। यहाँकी हवा अच्छी मानी जाती है। मुझे वहाँकी तरह यहाँ भी खुले आकाशके नीचे सोनेको मिलता है । कातनेका काम तो नियमपूर्वक चलता ही है। मैं रोज जितना कातता हूँ उसकी आंटी बना लेता हूँ। मुझे 'वणाटशास्त्र' और 'तकली - शिक्षक' ये दोनों पुस्तकें अन्य पुस्तकोंके साथ भेजना। मैंने आश्रमसे बाहर तकलीपर अपनी गतिकी जाँच कभी नहीं की, यहां करनेपर पता चला कि एक घंटे में मुश्किलसे ३० तार होते हैं । मुझे अपनी इस गतिपर शर्म आनी चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ, मैंने काता तो जरूर लेकिन उसकी कलाको नहीं जाना । अब तो प्रयोगके द्वारा ही उस कलाको जानूंगा। इसलिए उसे जितना चाहिए उतना समय देता हूँ अभ्यास बाँसकी तकली पर करता हूँ। सबको तकलीपर पूरा अधिकार कर लेना चाहिए। यदि कोई बतानेवाला व्यक्ति होता तो आसानीसे अधिकार प्राप्त किया जा सकता है। मैं कराडीमें बालकोंको खेल-खेल में तार निकालते देखता था। उन्हें उसमें दिलचस्पी होनी चाहिए। उसमें रस उत्पन्न होना चाहिए। वर्धा में लोग आध घंटेमें ८० तारकी गतितक पहुँच गये हैं। कान्तिलाल पारेख इतना कातता है, ऐसा कहा जाता था। वहाँ जो अच्छी तरहसे सीख गये हैं वे अपनी गतिकी जाँच करें और उसके बारेमें तुम मुझे लिखो । पुरुषोत्तमकी तबीयत कैसी रहती है ? कनु क्या करता है ? खुशालभाईका समाचार लिखना उन्हें मैंने पत्र लिखा था । क्या मैथ्यूका मन शान्त है ? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११० ) से । सौजन्य : नारणदास गांधी Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> iffzl6x1d19xkt8akmdg7npjbrpfizd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७० 250 197513 675127 670041 2026-08-30T07:08:40Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675127 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४०६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}} {{Right|यरवडा<br> मौनवार, १२ मई, १९३०}} {{Left|चि० प्रेमा,}} तूने तो पत्र लिखना ही बन्द कर दिया था। लेकिन मैं समझ गया था कि मेरा समय बचाने के लिए तू नहीं लिखती और तेरे पास भी समय नहीं होगा। लेकिन तेरे समाचार तो मैं प्राप्त कर ही लेता था। तेरा संयम मुझे बहुत पसन्द आया । मुझे तुझसे ऐसी आशा नहीं थी। अब तो हर हफ्ते मुझे पत्र अवश्य लिखना । मेरे समाचार नारणदासके पत्रसे मिल जायेंगे । कुसुमने आश्रमसे जाते समय मेरी चीजें किसे सौंपी थीं? मेरे जेल चले जाने पर जो पुस्तकें मुझे भेजी जानी थी वे उसने तुझे सोंपी थीं क्या? उनमें 'रामायण', 'कुरान' वगैरा पुस्तकें थीं। इस बारे में पता लगाना और पुस्तकें आसानीसे मिल जायें तो भेज देना। मुझे जल्दी नहीं है। वहाँ कौन-कौन हैं और क्या करते हैं, मुझे लिखना तेरा खास काम क्या है ? मेरे बारेमें किसीको चिन्ता करनी ही नहीं चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} पुस्तकालय कौन सँभालता है ? गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६६९ ) की फोटो नकलसे । सौजन्य : प्रेमावहन कंटक {{C|{{larger|'''४०७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|यरवडा<br> मौनवार, १२ मई, १९३०}} {{Left|चि० गंगाबहन,}} आशा है, तुम निश्चिन्त होगी। तुम्हारी याद आती रहती है। मुझे पत्र लिखना । नाथ आ गया क्या ? अब कितने लोगोंकी रसोई करनी पड़ती है? अन्य बहनोंको मैं आज पत्र नहीं लिख रहा हूँ । मेरा हाल चाल तुम्हें नारणदासको लिखे पत्रसे मालूम होगा। कमलनयन विद्यापीठमें है। उसकी तबीयत कैसी रहती है, यह नरहरिसे मालूम करके मुझे लिखना । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> dxei6dufxsivorf3vpqo9sre7ylpxaj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७१ 250 197514 675130 670042 2026-08-30T07:14:44Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675130 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र : आश्रमके बालकोंको|४२७}}</noinclude>हरी और विमलाकी सार-संभाल विशेष रूपसे कौन करता है ? लक्ष्मी कैसी है ? हरी और विमलाकी सार-संभालमें हमारे प्रेमकी कसौटी है । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ३०८३) की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''४०८. पत्र : आश्रमके बालकोंको'''}}}} {{Right|यरवडा महल<br> मौनवार [१२ मई, १९३० ]<ref>१. साधन-सूत्र की तारीख १८ मई १९३० है अतः उससे पहले सोमवारकी तारीख १२ मई, १९३० ठहरती है।</ref>}} {{Left|पंछियो,}} सच्चे अर्थों में पंछी तो वही है जो बिना पंखके उड़ सके। पंख हों तो सभी उड़ सकते हैं। यदि बिना पंखके उड़ना तुम्हें आता हो तो तनिक भी नहीं घबराना चाहिए। इस तरह उड़ते-उड़ते ही तुम सीखोगे। देखो न, मेरे पंख नहीं हैं, फिर भी मैं हर रोज उड़कर तुम्हारे पास आ जाता हूँ; क्योंकि मैं विचारोंसे तुम्हारे पास होता हूँ। वह रही विमला, ये रहे हरि, मनु और धर्मकुमार । तुम भी खयालोंमें उड़कर मेरे पास पहुँच सकते हो। जिसे विचार करना आता हो उसे अध्यापककी ज्यादा जरूरत नहीं । अध्यापक तो हमें दिशा- ज्ञान करा सकता है, विचार-शक्ति प्रदान नहीं कर सकता। विचार तो हममें होते ही हैं। समझदार बच्चेको हमेशा अच्छे विचार ही आयेंगे। तुममें से प्रभुभाईके<ref>२. साधन-सूत्र में नाम छोड़ दिया गया है। यहाँ पर नाम २२५-१९३० के यंग इंडियामें प्रकाशित मीराबहन द्वारा अनूदित पत्रसे लिया गया है।</ref> साथ ठीक तरहसे प्रार्थना कौन नहीं करता ? सबके हस्ताक्षरोंसे युक्त पत्र भेजना। जो बच्चा हस्ताक्षर नहीं कर सकता वह स्वस्तिक बनाये । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} १८-५-१९३० के गुजराती आश्रम समाचारको माइक्रोफिल्मसे एस० एन० १६८३४-ए । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 22eljsjlt1fapmzex5fw9pzup7t59vy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७२ 250 197515 675133 670043 2026-08-30T07:21:08Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675133 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४०९. पत्र : बलभद्रको'''<ref>१. देखिए खण्ड ४४</ref>}}}} {{Right|[ १२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]<ref>२. गांधीजी ने १२ मई, १९३० के बाद जेसे पत्र लिखना शुरू किया था।</ref>}} {{Left|चि० बुद्धिचक्र,}} तुम्हारा बुद्धिचक नाम तो स्थायी हो गया ही जानो। यह कोई खराब नाम नहीं जिसकी बुद्धि चक्के समान है, वह सम्पूर्ण व्यक्ति है; कारण कि चक हमेशा सम्पूर्ण होता है। सीधी रेखाके समान उसका आदि अन्त नहीं होता, और फिर भी जिसकी वृत्ति अन्तर्मुखी होती है उसे भी चक्र समान मानते हैं। बुद्धि वही अच्छी होती है, जो अन्तर्मुख बनाती है । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} १८-५-१९३० के गुजराती आश्रम समाचारकी माइक्रोफिल्मसे एस० एन० १६८३४-ए । {{C|{{larger|'''४१०. पत्र : कस्तूरबा गांधीको'''<ref>३. साधन-सूत्र में यह नहीं बताया गया कि पत्र किसे लिखा गया था, परन्तु २२-५-१९३० के यंग इंडिया रिते हुए मीराबहने कहा है कि यह पत्र कस्तूरबा गांधीको लिखा गया था।</ref>}}}} {{Right|[१२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]}} इस पत्रको सबके लिए समझना। कितना अच्छा हुआ कि रविवारकी रातको मैं तुम सबसे मिल लिया और तुम्हें तुम्हारे कैम्प तक पहुँचा आया; ऐसा करके मुझे बहुत अच्छा लगा! ईश्वरकी कृपाका मेह बरस रहा है। सब बहनें मुझे पत्र लिखें। सभी पत्र एक ही लिफाफे में होने चाहिए। मुझे पत्र मिलेगा तो अवश्य नहीं मिला तो भी चिन्ता नहीं। तुम सब घबराना नहीं। स्त्रियोंकी प्रार्थनाके श्लोक सोच-समझकर रखे गये हैं। पहले श्लोकमें ही बहुत कुछ आ जाता है। 'गीता' के जो अन्तिम तीन श्लोक इसमें रखे गये हैं उनसे इसके सौन्दर्यमें निखार आ गया है। मन्दिरके ऊपरके कलश जिस तरह मन्दिरकी शोभामें चार चाँद लगाते हैं उसी तरह 'गीता के ये तीन इलोक प्रार्थनाको और भी सुन्दर बना देते हैं। उम्मीद है, रोज सबेरे मनोयोगपूर्वक इन श्लोकोंका पाठ किया जाता होगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} १८-५-१९३० के गुजराती आश्रम समाचारकी माइक्रोफिल्मसे एस० एन० १६८३४-ए । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> b55rqeftbkn93vbwni4nqi463objn7v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७३ 250 197516 675136 670044 2026-08-30T07:29:16Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675136 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४११. आश्रमवासियोंको लिखे गये पत्रोंके अंश'''<ref>१. ये पत्र जिन लड़कियोंको लिखे गये थे उनके नाम मालूम नहीं हो सके।</ref>}}}} {{Right|[ १२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]}} {{C|(१)}} यह पत्र सब लड़कियोंके लिए है। तुम सब ठीक तरहसे रहती हो न ? काम करती हो? क्या गंगाबहन तुम्हें प्रमाणपत्र देंगी ? जल्दी उठनेकी आदत जारी है। क्या ? भूल गई हो तो फिरसे शुरू करना । {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{C|(२)}} {{Left|चि०}} मैं सुनता रहता था कि तू आश्रमसे बाहर जाने और काम करनेके लिए अधीर हो रही है। तू अब समझदार हैं। हमारे ऊपर जो काम आ पड़े उसे हमें पूरे उत्तर- दायित्व के साथ करना चाहिए। बाहर निकलें तो क्या, अन्दर रहें तो क्या ? {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{C|(३)}} {{Left|चि०}} तेरी घबराहट तुरन्त दूर हो गई होगी। मैं तुझे ऐसी लड़की नहीं समझता था जो तुरन्त ही घबरा उठे। लेकिन कोई हर्ज नहीं तू और कस्तूरबहन दोनों अभी साथ-साथ हो या अलग हो गई हो ? हमेशा साथ रहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए और स्वतन्त्र रूपसे जिम्मेदारी उठानी आनी चाहिए। {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} १८-५-१९३० के गुजराती आश्रम समाचारको माइक्रोफिल्मसे: एस० एन० १६८३४-ए । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> lgoisb2m7x279ts879ulzsgmsn1fcxe पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७४ 250 197517 675176 670045 2026-08-30T09:45:11Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675176 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४१२. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर<br> [ १२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]}} {{Left|चि० कुसुम (बड़ी),}} तुम बड़ी हो, इसका क्या मतलब! बड़े होनेसे खोटा होना चाहिए या खरा ? तुमने आश्रम छोड़ दिया, परन्तु सेवा-धर्मके मार्गको न छोड़ना। मुझे पत्र लिखती रहना। ईश्वर तुम्हारा भला करे । {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी० एन० १७९९ ) की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''४१३. पत्र : रमाबहन जोशीको'''}}}} {{Right|यरवडा मंदिर<br> मौनवार [१२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]<ref>१. वर्षे बापुना पत्रो-७ श्री आनलाल जोशीने से किया गया है। </ref>}} {{Left|चि० रमा,}} तुम्हें देखकर मैं बहुत खुश होता था। तुम इतने धैर्य और साहसका परिचय दोगी, ऐसा मैंने नहीं सोचा था । महालक्ष्मी कैसी है? दोनों डाहीबहनें कैसी है ? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ५३२१ ) की फोटो नकलसे। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 3q5uy5icl7hvdynm3n7c0ckba8wvmra 675177 675176 2026-08-30T09:45:58Z अंजली राजभर 4516 675177 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४१२. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर<br> [ १२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]}} {{Left|चि० कुसुम (बड़ी),}} तुम बड़ी हो, इसका क्या मतलब! बड़े होनेसे खोटा होना चाहिए या खरा ? तुमने आश्रम छोड़ दिया, परन्तु सेवा-धर्मके मार्गको न छोड़ना। मुझे पत्र लिखती रहना। ईश्वर तुम्हारा भला करे । {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी० एन० १७९९ ) की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''४१३. पत्र : रमाबहन जोशीको'''}}}} {{Right|यरवडा मंदिर<br> मौनवार [१२ मई, १९३० या उसके पश्चात् ]<ref>१. वर्षे बापुना पत्रो-७ श्री आनलाल जोशीने से किया गया है। </ref>}} {{Left|चि० रमा,}} तुम्हें देखकर मैं बहुत खुश होता था। तुम इतने धैर्य और साहसका परिचय दोगी, ऐसा मैंने नहीं सोचा था । महालक्ष्मी कैसी है? दोनों डाहीबहनें कैसी है ? {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी० एन० ५३२१ ) की फोटो नकलसे। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> sqs7c11mlclb5qfl2mutad145c2uiou पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७५ 250 197518 675180 670046 2026-08-30T09:52:41Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675180 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४१४. देवदास गांधीको लिखे पत्रका अंश'''<ref>१. २२-५-१९३० के यंग इंडिया में मीराबदन लिखती है कि यह पत्र देवदास गांधीको लिखा गया था।</ref> {{Right|परवडा मन्दिर<br> १३ मई, १९३०}} {{Left|चि०,}} तू कहाँ है, इसकी मुझे खबर न होनेके कारण यह पत्र में आश्रमके पतेपर लिख रहा हूँ। अब सारी फिक्र करनेवाला ईश्वर है। इसलिए हमें एक-दूसरेकी फिक्र नहीं करनी चाहिए। मेरे बारेमें तो तू जानता ही है। मुझे तो कहीं कोई भी दिक्कत नहीं होती । ईश्वर रास्ता साफ कर देता है। उसके जैसा भंगी जगत् में क्या कोई दूसरा मिल सकता है? यदि वह हमारा मानसिक मैल साफ न करता होता तो संसार कभीका सड़ गया होता। बाहरका मैल तो मानसिक मैलका सूचक भर है। जयतक अन्तरको नहीं धोते तबतक अपनेको बाहरसे हम कितना भी साफ क्यों न करें, कुछ भी नहीं होगा। यह विचार मुझे बहुत ढाढ़स बँधाता है। . . .<ref>२. साधन-सूत्र के अनुसार ।</ref> {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} १८-५-१९३० के गुजराती आश्रम समाचारकी माइक्रोफिल्मसे: एस० एन० १६८३४-ए । {{C|{{larger|'''४१५. पत्र : वाइसरायको'''}}}} {{Right|परवडा सदर जेल<br> १८ मई, १९३०<ref>३. पत्रका मसविदा १२ मईको तैयार किया गया था, अन्तिम रूप १८ मईको दिया गया और अगले दिन यह जेल अधीक्षक मेजर मार्टिनको सौंप दिया गया।</ref>}} {{Left|सेवामें<br> भारतके परमश्रेष्ठ वाइसराय महोदय}} {{Left|प्रिय मित्र,}} अधिकारियोंने मुझे अलवारोंके उपयोगकी अनुमति दे दी है, इसलिए देशमें क्या कुछ हो रहा है, इसकी थोड़ी-बहुत जानकारी मुझे रहती है। अगर आपके ताजा Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> pzrvtohn8zygkp7xsk0owyivcg18551 675181 675180 2026-08-30T09:53:23Z अंजली राजभर 4516 675181 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४१४. देवदास गांधीको लिखे पत्रका अंश'''<ref>१. २२-५-१९३० के यंग इंडिया में मीराबदन लिखती है कि यह पत्र देवदास गांधीको लिखा गया था।</ref>}}}} {{Right|परवडा मन्दिर<br> १३ मई, १९३०}} {{Left|चि०,}} तू कहाँ है, इसकी मुझे खबर न होनेके कारण यह पत्र में आश्रमके पतेपर लिख रहा हूँ। अब सारी फिक्र करनेवाला ईश्वर है। इसलिए हमें एक-दूसरेकी फिक्र नहीं करनी चाहिए। मेरे बारेमें तो तू जानता ही है। मुझे तो कहीं कोई भी दिक्कत नहीं होती । ईश्वर रास्ता साफ कर देता है। उसके जैसा भंगी जगत् में क्या कोई दूसरा मिल सकता है? यदि वह हमारा मानसिक मैल साफ न करता होता तो संसार कभीका सड़ गया होता। बाहरका मैल तो मानसिक मैलका सूचक भर है। जयतक अन्तरको नहीं धोते तबतक अपनेको बाहरसे हम कितना भी साफ क्यों न करें, कुछ भी नहीं होगा। यह विचार मुझे बहुत ढाढ़स बँधाता है। . . .<ref>२. साधन-सूत्र के अनुसार ।</ref> {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} १८-५-१९३० के गुजराती आश्रम समाचारकी माइक्रोफिल्मसे: एस० एन० १६८३४-ए । {{C|{{larger|'''४१५. पत्र : वाइसरायको'''}}}} {{Right|परवडा सदर जेल<br> १८ मई, १९३०<ref>३. पत्रका मसविदा १२ मईको तैयार किया गया था, अन्तिम रूप १८ मईको दिया गया और अगले दिन यह जेल अधीक्षक मेजर मार्टिनको सौंप दिया गया।</ref>}} {{Left|सेवामें<br> भारतके परमश्रेष्ठ वाइसराय महोदय}} {{Left|प्रिय मित्र,}} अधिकारियोंने मुझे अलवारोंके उपयोगकी अनुमति दे दी है, इसलिए देशमें क्या कुछ हो रहा है, इसकी थोड़ी-बहुत जानकारी मुझे रहती है। अगर आपके ताजा Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 9x3mdp6jd23y4hwhqex9nukbz6pc3wv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८२ 250 197525 675006 670053 2026-08-29T17:30:48Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>मैं तो आशावादी आदमी हूँ। चालीस वर्षोंके संघर्ष में मुझसे बार-बार ऐसा कहा गया है कि मैं असम्भवकी प्राप्तिके लिए प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन मैंने बराबर यह सिद्ध कर दिया है कि बात ऐसी नहीं है। फिर भी, बातचीत करके कोई हल निकालने से उन्हें कोई इनकार नहीं है। मेरा जीवन तो समझौतोंकी एक लम्बी गाथा ही है। अगर सरकार सचमुच भारतको सन्तुष्ट करना चाहती है तो उसे वाइसरायके नाम लिखे मेरे अन्तिम पत्र में पेश की गई ग्यारह माँगें स्वीकार कर लेनी चाहिए। मैं तो वृक्ष कैसा है, यह उसके फलको देखकर ही कह सकता हूँ। जबतक हमें सन्तुष्ट नहीं किया जाता, हम अन्ततक लड़ेंगे और अगर भारतकी आजादीके लिए हमारे प्राण देनेकी आवश्यकता हुई तो हम वह भी देंगे। हम भारतकी सारी जेलोंको सत्याग्रहियों और नमक- कानून भंग करनेवालों से भर देंगे और हम अपने विरोधके द्वारा प्रशासनको बिलकुल असम्भव बना देंगे। लेकिन में यह स्वीकार करता हूँ कि जब हमें विजय मिलेगी -- जो अभी बहुत दूर है तब भी सरकारसे सुलहवार्त्ता आवश्यक होगी और यदि रक्तपात और कष्ट सहनसे बचनेसे भारतके असली राष्ट्रीय हितोंकी हानि नहीं होती तो उससे बचनेके लिए में सब कुछ करनेके लिए तैयार हूँ। आगे गांधीजी से मेरी जो बातचीत हुई उससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस कठिन घड़ोमें भी समझौता सम्भव है और श्री गांधी निम्नलिखित शर्तोंपर कांग्रेसले सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द करने और गोलमेज परिषद् सहयोग करनेकी सिफारिश कर सकते हैं: (१) गोलमेज परिषद् के विचारार्थं जो मुद्दे सौंपे जायें उनमें भारतके लिए एक ऐसा संविधान बनानेकी भी बात हो जिससे उसे 'सार रूपमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके। (२) श्री गांधीको तीन मांगों अर्थात् नमक- करकी समाप्ति, मद्य-निषेध और विदेशी कपड़ोंपर रोक लगानेके सम्बन्धमें उन्हें सन्तुष्ट किया जाये। (३) राजनीतिक अपराधोंके लिए सजा भोग रहे कैदियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनकी समाप्ति के साथ ही रिहा कर दिया जाये। (४) वाइसरायके नाम श्री गांधीके पत्र में उठाये गये शेष सात मुद्दोंको भावी वार्ता के लिए छोड़ दिया जाये। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-५-१<noinclude></noinclude> dhfq5ex4674a3sbs29ehmru941g4i09 675007 675006 2026-08-29T17:33:11Z Manikantkmr 5554 675007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>मैं तो आशावादी आदमी हूँ। चालीस वर्षोंके संघर्ष में मुझसे बार-बार ऐसा कहा गया है कि मैं असम्भवकी प्राप्तिके लिए प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन मैंने बराबर यह सिद्ध कर दिया है कि बात ऐसी नहीं है। '''फिर भी, बातचीत करके कोई हल निकालने से उन्हें कोई इनकार नहीं है।''' मेरा जीवन तो समझौतोंकी एक लम्बी गाथा ही है। अगर सरकार सचमुच भारतको सन्तुष्ट करना चाहती है तो उसे वाइसरायके नाम लिखे मेरे अन्तिम पत्र में पेश की गई ग्यारह माँगें स्वीकार कर लेनी चाहिए। मैं तो वृक्ष कैसा है, यह उसके फलको देखकर ही कह सकता हूँ। जबतक हमें सन्तुष्ट नहीं किया जाता, हम अन्ततक लड़ेंगे और अगर भारतकी आजादीके लिए हमारे प्राण देनेकी आवश्यकता हुई तो हम वह भी देंगे। हम भारतकी सारी जेलोंको सत्याग्रहियों और नमक- कानून भंग करनेवालों से भर देंगे और हम अपने विरोधके द्वारा प्रशासनको बिलकुल असम्भव बना देंगे। '''लेकिन में यह स्वीकार करता हूँ कि जब हमें विजय मिलेगी -- जो अभी बहुत दूर है तब भी सरकारसे सुलहवार्त्ता आवश्यक होगी और यदि रक्तपात और कष्ट सहनसे बचनेसे भारतके असली राष्ट्रीय हितोंकी हानि नहीं होती तो उससे बचनेके लिए में सब कुछ करनेके लिए तैयार हूँ।''' '''आगे गांधीजी से मेरी जो बातचीत हुई उससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस कठिन घड़ोमें भी समझौता सम्भव है और श्री गांधी निम्नलिखित शर्तोंपर कांग्रेसले सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द करने और गोलमेज परिषद् सहयोग करनेकी सिफारिश कर सकते हैं:''' '''(१) गोलमेज परिषद् के विचारार्थं जो मुद्दे सौंपे जायें उनमें भारतके लिए एक ऐसा संविधान बनानेकी भी बात हो जिससे उसे 'सार रूपमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके।''' '''(२) श्री गांधीको तीन मांगों अर्थात् नमक- करकी समाप्ति, मद्य-निषेध और विदेशी कपड़ोंपर रोक लगानेके सम्बन्धमें उन्हें सन्तुष्ट किया जाये।''' '''(३) राजनीतिक अपराधोंके लिए सजा भोग रहे कैदियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनकी समाप्ति के साथ ही रिहा कर दिया जाये।''' '''(४) वाइसरायके नाम श्री गांधीके पत्र में उठाये गये शेष सात मुद्दोंको भावी वार्ता के लिए छोड़ दिया जाये।''' [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-५-१<noinclude></noinclude> 6p5avkmwwitiq3ytqaea4dltql7794g 675008 675007 2026-08-29T17:33:59Z Manikantkmr 5554 675008 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>मैं तो आशावादी आदमी हूँ। चालीस वर्षोंके संघर्ष में मुझसे बार-बार ऐसा कहा गया है कि मैं असम्भवकी प्राप्तिके लिए प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन मैंने बराबर यह सिद्ध कर दिया है कि बात ऐसी नहीं है। '''फिर भी, बातचीत करके कोई हल निकालने से उन्हें कोई इनकार नहीं है।''' मेरा जीवन तो समझौतोंकी एक लम्बी गाथा ही है। अगर सरकार सचमुच भारतको सन्तुष्ट करना चाहती है तो उसे वाइसरायके नाम लिखे मेरे अन्तिम पत्र में पेश की गई ग्यारह माँगें स्वीकार कर लेनी चाहिए। मैं तो वृक्ष कैसा है, यह उसके फलको देखकर ही कह सकता हूँ। जबतक हमें सन्तुष्ट नहीं किया जाता, हम अन्ततक लड़ेंगे और अगर भारतकी आजादीके लिए हमारे प्राण देनेकी आवश्यकता हुई तो हम वह भी देंगे। हम भारतकी सारी जेलोंको सत्याग्रहियों और नमक- कानून भंग करनेवालों से भर देंगे और हम अपने विरोधके द्वारा प्रशासनको बिलकुल असम्भव बना देंगे। '''लेकिन में यह स्वीकार करता हूँ कि जब हमें विजय मिलेगी -- जो अभी बहुत दूर है तब भी सरकारसे सुलहवार्त्ता आवश्यक होगी और यदि रक्तपात और कष्ट सहनसे बचनेसे भारतके असली राष्ट्रीय हितोंकी हानि नहीं होती तो उससे बचनेके लिए में सब कुछ करनेके लिए तैयार हूँ।''' '''आगे गांधीजी से मेरी जो बातचीत हुई उससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस कठिन घड़ोमें भी समझौता सम्भव है और श्री गांधी निम्नलिखित शर्तोंपर कांग्रेसले सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द करने और गोलमेज परिषद् सहयोग करनेकी सिफारिश कर सकते 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आन्दोलन बन्द करने और गोलमेज परिषद् सहयोग करनेकी सिफारिश कर सकते हैं:''' '''(१) गोलमेज परिषद् के विचारार्थं जो मुद्दे सौंपे जायें उनमें भारतके लिए एक ऐसा संविधान बनानेकी भी बात हो जिससे उसे 'सार रूपमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके।''' '''(२) श्री गांधीको तीन मांगों अर्थात् नमक- करकी समाप्ति, मद्य-निषेध और विदेशी कपड़ोंपर रोक लगानेके सम्बन्धमें उन्हें सन्तुष्ट किया जाये।''' '''(३) राजनीतिक अपराधोंके लिए सजा भोग रहे कैदियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनकी समाप्ति के साथ ही रिहा कर दिया जाये।''' '''(४) वाइसरायके नाम श्री गांधीके पत्र में उठाये गये शेष सात मुद्दोंको भावी वार्ता के लिए छोड़ दिया जाये।''' [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-५-१<noinclude></noinclude> dicf9h4okmi4ue7q45md9ehtjtwh1bp 675010 675009 2026-08-29T17:35:54Z Manikantkmr 5554 675010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>मैं तो आशावादी आदमी हूँ। चालीस वर्षोंके संघर्ष में मुझसे बार-बार ऐसा कहा गया है कि मैं असम्भवकी प्राप्तिके लिए प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन मैंने बराबर यह सिद्ध कर दिया है कि बात ऐसी नहीं है। '''फिर भी, बातचीत करके कोई हल निकालने से उन्हें कोई इनकार नहीं है।''' मेरा जीवन तो समझौतोंकी एक लम्बी गाथा ही है। अगर सरकार सचमुच भारतको सन्तुष्ट करना चाहती है तो उसे वाइसरायके नाम लिखे मेरे अन्तिम पत्र में पेश की गई ग्यारह माँगें स्वीकार कर लेनी चाहिए। मैं तो वृक्ष कैसा है, यह उसके फलको देखकर ही कह सकता हूँ। जबतक हमें सन्तुष्ट नहीं किया जाता, हम अन्ततक लड़ेंगे और अगर भारतकी आजादीके लिए हमारे प्राण देनेकी आवश्यकता हुई तो हम वह भी देंगे। हम भारतकी सारी जेलोंको सत्याग्रहियों और नमक- कानून भंग करनेवालों से भर देंगे और हम अपने विरोधके द्वारा प्रशासनको बिलकुल असम्भव बना देंगे। '''लेकिन में यह स्वीकार करता हूँ कि जब हमें विजय मिलेगी -- जो अभी बहुत दूर है तब भी सरकारसे सुलहवार्त्ता आवश्यक होगी और यदि रक्तपात और कष्ट सहनसे बचनेसे भारतके असली राष्ट्रीय हितोंकी हानि नहीं होती तो उससे बचनेके लिए में सब कुछ करनेके लिए तैयार हूँ।''' '''आगे गांधीजी से मेरी जो बातचीत हुई उससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस कठिन घड़ोमें भी समझौता सम्भव है और श्री गांधी निम्नलिखित शर्तोंपर कांग्रेसले सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द करने और गोलमेज परिषद् सहयोग करनेकी सिफारिश कर सकते हैं:''' '''(१) गोलमेज परिषद् के विचारार्थं जो मुद्दे सौंपे जायें उनमें भारतके लिए एक ऐसा संविधान बनानेकी भी बात हो जिससे उसे 'सार रूपमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके।''' '''(२) श्री गांधीको तीन मांगों अर्थात् नमक- करकी समाप्ति, मद्य-निषेध और विदेशी कपड़ोंपर रोक लगानेके सम्बन्धमें उन्हें सन्तुष्ट किया जाये।''' '''(३) राजनीतिक अपराधोंके लिए सजा भोग रहे कैदियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनकी समाप्ति के साथ ही रिहा कर दिया जाये।''' '''(४) वाइसरायके नाम श्री गांधीके पत्र में उठाये गये शेष सात मुद्दोंको भावी वार्ता के लिए छोड़ दिया जाये।''' [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-५-१<noinclude></noinclude> kcwomc0aj420dm1vau3odilv3fn4e23 675051 675010 2026-08-30T02:54:42Z Manikantkmr 5554 675051 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>मैं तो आशावादी आदमी हूँ। चालीस वर्षोंके संघर्ष में मुझसे बार-बार ऐसा कहा गया है कि मैं असम्भवकी प्राप्तिके लिए प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन मैंने बराबर यह सिद्ध कर दिया है कि बात ऐसी नहीं है। '''फिर भी, बातचीत करके कोई हल निकालने से उन्हें कोई इनकार नहीं है।''' मेरा जीवन तो समझौतोंकी एक लम्बी गाथा ही है। अगर सरकार सचमुच भारतको सन्तुष्ट करना चाहती है तो उसे वाइसरायके नाम लिखे मेरे अन्तिम पत्र में पेश की गई ग्यारह माँगें स्वीकार कर लेनी चाहिए। मैं तो वृक्ष कैसा है, यह उसके फलको देखकर ही कह सकता हूँ। जबतक हमें सन्तुष्ट नहीं किया जाता, हम अन्ततक लड़ेंगे और अगर भारतकी आजादीके लिए हमारे प्राण देनेकी आवश्यकता हुई तो हम वह भी देंगे। हम भारतकी सारी जेलोंको सत्याग्रहियों और नमक-कानून भंग करनेवालों से भर देंगे और हम अपने विरोधके द्वारा प्रशासनको बिलकुल असम्भव बना देंगे। '''लेकिन में यह स्वीकार करता हूँ कि जब हमें विजय मिलेगी -- जो अभी बहुत दूर है तब भी सरकारसे सुलहवार्त्ता आवश्यक होगी और यदि रक्तपात और कष्ट सहनसे बचनेसे भारतके असली राष्ट्रीय हितोंकी हानि नहीं होती तो उससे बचनेके लिए मैं सब कुछ करनेके लिए तैयार हूँ।''' '''आगे गांधीजी से मेरी जो बातचीत हुई उससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस कठिन घड़ीमें भी समझौता सम्भव है और श्री गांधी निम्नलिखित शर्तोंपर कांग्रेसले सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द करने और गोलमेज परिषद् सहयोग करनेकी सिफारिश कर सकते हैं:''' '''(१) गोलमेज परिषद् के विचारार्थं जो मुद्दे सौंपे जायें उनमें भारतके लिए एक ऐसा संविधान बनानेकी भी बात हो जिससे उसे 'सार रूपमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके।''' '''(२) श्री गांधीको तीन मांगों अर्थात् नमक-करकी समाप्ति, मद्य-निषेध और विदेशी कपड़ोंपर रोक लगानेके सम्बन्धमें उन्हें सन्तुष्ट किया जाये।''' '''(३) राजनीतिक अपराधोंके लिए सजा भोग रहे कैदियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनकी समाप्ति के साथ ही रिहा कर दिया जाये।''' '''(४) वाइसरायके नाम श्री गांधीके पत्र में उठाये गये शेष सात मुद्दोंको भावी वार्ता के लिए छोड़ दिया जाये।''' [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-५-१<noinclude></noinclude> gu1tecl4arip8pns5b0hzckfto1m495 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८३ 250 197526 675012 670054 2026-08-29T17:38:11Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२३. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}} यरवडा मन्दिर १८/२१ मई, १९३० चि० नारणदास, गत सोमवारको मैंने तुम्हें पत्र लिखा था लेकिन लगता है कि वह शुक्रवारको ही डाकमें डाला जा सका। ऐसा न हो तो जेल किसे कहें ? मेरे पत्रोंको कहीं प्रकाशित न होने देना । ठक्कर artist forकर पूछना कि अन्त्यजोंके लिए कूओंका काम तो जारी ही है न ? यदि पैसे कम पड़ जायें तो हमारे पास जो पैसे हैं उनमें से दे देना । मतलब यह कि जो हमने जमनालालजीको दिये हैं उनमें से । मेरा समय इस तरहसे बँटा हुआ है दातुन, शौच, स्नान दो बारकी प्रार्थना १ घंटा दिनको सोना १३ घंटा • भोजन और उसकी तैयारी ३ घंटे चरखेकी मरम्मत और सफाई आदि २३ घंटे तकली २३ घंटे सैर १३ घंटा पढ़ना और जेलरसे मिलना २ घंटे सवेरे ४ बजेसे रातके ९ बजेतक १७ घंटे मैंने अनुभवसे देखा है कि नारंगीकी जरूरत नहीं है। इसलिए फिलहाल तो नारंगियोंको छुट्टी दे दी है। आजकल मेरी खुराक खजूर, मुनक्का, दूध, दही, खट्टा नीबू और सोडा है। यदि जरूरत महसूस हुई तो नारंगी भी शामिल कर लूंगा । कच्चे दूधमें दही लगा देनेसे दही अच्छी तरह जम जाता है, यह बात मैंने आज ही देखी है। कल मैंने कच्चे दूधका दही जमाया था। दूध तो मैं अभी कच्चा ही लेता हूँ। मेरी तबीयत अच्छी रहती है, वजन लिया था, कम नहीं हुआ है। जहाँतक पढ़नेका सवाल है में आजकल एडविन अर्नाल्डकी लाइट आफ एशिया' पढ़ रहा हूँ। अखबार तो आता ही है, 'टाइम्स' [ ऑफ इंडिया ] अब [बॉम्बे ] 'क्रॉनिकल' भी आया करेगा। 'यंग इंडिया' तथा 'नवजीवन', माडर्न रिव्यू' एवं 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर की अनुमति मिल गई है। अगर मैं चाहूँ तो पढ़नेके लिए और पत्र-पत्रिकाएँ भी मिल सकती हैं। मैंने गरम पानीसे स्नान करना शुरू कर दिया है, यह बात में पहले ही लिख चुका हूँ। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 8b42zdxzq37afuvfl5vlxgzupotvco5 675032 675012 2026-08-29T18:29:40Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675032 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२३. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}} यरवडा मन्दिर १८/२१ मई, १९३० चि० नारणदास, गत सोमवारको मैंने तुम्हें पत्र लिखा था लेकिन लगता है कि वह शुक्रवारको ही डाकमें डाला जा सका। ऐसा न हो तो जेल किसे कहें ? मेरे पत्रोंको कहीं प्रकाशित न होने देना । ठक्कर artist forकर पूछना कि अन्त्यजोंके लिए कूओंका काम तो जारी ही है न ? यदि पैसे कम पड़ जायें तो हमारे पास जो पैसे हैं उनमें से दे देना । मतलब यह कि जो हमने जमनालालजीको दिये हैं उनमें से । मेरा समय इस तरहसे बँटा हुआ है दातुन, शौच, स्नान दो बारकी प्रार्थना १ घंटा दिनको सोना १३ घंटा • भोजन और उसकी तैयारी ३ घंटे चरखेकी मरम्मत और सफाई आदि २३ घंटे तकली २३ घंटे सैर १३ घंटा पढ़ना और जेलरसे मिलना २ घंटे सवेरे ४ बजेसे रातके ९ बजेतक १७ घंटे मैंने अनुभवसे देखा है कि नारंगीकी जरूरत नहीं है। इसलिए फिलहाल तो नारंगियोंको छुट्टी दे दी है। आजकल मेरी खुराक खजूर, मुनक्का, दूध, दही, खट्टा नीबू और सोडा है। यदि जरूरत महसूस हुई तो नारंगी भी शामिल कर लूंगा । कच्चे दूधमें दही लगा देनेसे दही अच्छी तरह जम जाता है, यह बात मैंने आज ही देखी है। कल मैंने कच्चे दूधका दही जमाया था। दूध तो मैं अभी कच्चा ही लेता हूँ। मेरी तबीयत अच्छी रहती है, वजन लिया था, कम नहीं हुआ है। जहाँतक पढ़नेका सवाल है में आजकल एडविन अर्नाल्डकी लाइट आफ एशिया' पढ़ रहा हूँ। अखबार तो आता 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इस तरहसे बँटा हुआ है दातुन, शौच, स्नान दो बारकी प्रार्थना दिनको सोना भोजन और उसकी तैयारी चरखेकी मरम्मत और सफाई आदि तकली पढ़ना और जेलरसे मिलना सवेरे ४ बजेसे रातके ९ बजेतक सैर १ घंटा १३ घंटा ३ घंटे २३ घंटे २३ घंटे २ घंटे १७ घंटे मैंने अनुभवसे देखा है कि नारंगीकी जरूरत नहीं है। इसलिए फिलहाल तो नारंगियोंको छुट्टी दे दी है। आजकल मेरी खुराक खजूर, मुनक्का, दूध, दही, खट्टा नीबू और सोडा है। यदि जरूरत महसूस हुई तो नारंगी भी शामिल कर लूंगा। कच्चे दूधमें दही लगा देनेसे दही अच्छी तरह जम जाता है, यह बात मैंने आज ही देखी है। कल मैंने कच्चे दूधका दही जमाया था। दूध तो मैं अभी कच्चा ही लेता हूँ। मेरी तबीयत अच्छी रहती है, वजन लिया था, कम नहीं हुआ है। जहाँतक पढ़नेका सवाल है में आजकल एडविन अर्नाल्डकी लाइट आफ एशिया' पढ़ रहा हूँ। अखबार तो आता ही है, 'टाइम्स' [ऑफ इंडिया] अब [बॉम्बे] 'क्रॉनिकल' भी आया करेगा। 'यंग इंडिया' तथा 'नवजीवन', माडर्न रिव्यू' एवं 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर की अनुमति मिल गई है। अगर मैं चाहूँ तो पढ़नेके लिए और पत्र-पत्रिकाएँ भी मिल सकती हैं। मैंने गरम पानीसे स्नान करना शुरू कर दिया है, यह बात 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नारंगियोंको छुट्टी दे दी है। आजकल मेरी खुराक खजूर, मुनक्का, दूध, दही, खट्टा नीबू और सोडा है। यदि जरूरत महसूस हुई तो नारंगी भी शामिल कर लूंगा। कच्चे दूधमें दही लगा देनेसे दही अच्छी तरह जम जाता है, यह बात मैंने आज ही देखी है। कल मैंने कच्चे दूधका दही जमाया था। दूध तो मैं अभी कच्चा ही लेता हूँ। मेरी तबीयत अच्छी रहती है, वजन लिया था, कम नहीं हुआ है। जहाँतक पढ़नेका सवाल है में आजकल एडविन अर्नाल्डकी लाइट आफ एशिया' पढ़ रहा हूँ। अखबार तो आता ही है, 'टाइम्स' [ऑफ इंडिया] अब [बॉम्बे] 'क्रॉनिकल' भी आया करेगा। 'यंग इंडिया' तथा 'नवजीवन', माडर्न रिव्यू' एवं 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर की अनुमति मिल गई है। अगर मैं चाहूँ तो पढ़नेके लिए और पत्र-पत्रिकाएँ भी मिल सकती हैं। मैंने गरम पानीसे स्नान करना शुरू कर दिया है, यह बात मैं पहले ही लिख चुका हूँ।<noinclude></noinclude> ch9d8qzph85vum9tmh7ll7cath3d2hb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८४ 250 197527 675013 670055 2026-08-29T17:46:55Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरी चिन्ता करनेकी कोई जरूरत नहीं । आजकल तो जेल जाना सुखोपभोग करना है। 'यंग इंडिया' में कुमारप्पाका नाम देखकर बड़ी खुशी हुई। वह निस्सन्देह एक योग्य व्यक्ति है। तुम मुझे सामान्य जानकारीसे भरा पत्र लिख सकते हो और उसके साथ उसी तरहके अन्य पत्र भी भेज सकते हो। मैं तुम्हें राजनीति सम्बन्धी सन्देश नहीं दे सकता। सबकी खबर तुम ही वे सकते हो। रुका पत्र आता है क्या? वह कैसी है? उमियाका पत्र आता है? छोटी कुसुमसे कहना कि उसने मेरे विशेष पत्रका उत्तर नहीं दिया। वह बहुत पशैतानहै। उम्मीद है, नवीन और धीरू सानन्द होंगे। बालक और बालिकाएँ, सभी मुझे पत्र लिख सकते हैं। जिन डा० कानुगाके लिए आश्रमसे ही हरी सब्जियाँ जाती हैं उनकी तबीयत कैसी है? अमीनाकी प्रसूतिके लिए ठीक व्यवस्था कर दी होगी? इमाम साहब कहाँ है? कैसे हैं? जिन चार लड़कोंको छोटा जानकर सजा नहीं दी गई, वे कौन हैं और अब कहाँ है? बहनें अलग-अलग कहाँ कहाँ बिखरी हुई हैं? दुग्धालय, चर्मालय और खेती कैसी चल रही है? कितने करघे चल रहे हैं ? आफिसके पासवाले कूऍकी सफाई होनेवाली थी। यदि अभी तक सफाई न हुई हो और सफाई करवाई जा सके तो करवा लेना। केशू शान्त है क्या ? उसकी तबीयत कैसी है? राधासे पत्र लिखने को कहना। मैं उसे अलगसे नहीं लिख रहा हूँ। यों तो बहुतों को लिखनेका मन करता है, लेकिन सबको कैसे लिखा जा सकता है?१ {Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] कच्चे दूधसे दही जमानेका प्रयोग पूर्णतः सफल नहीं हुआ। पहले दिन तो ठीक लगा था। दही लगानेकी मात्रामें कुछ दोष है अथवा कोई और दोष है; लेकिनपहले दिनके बाद दूध अच्छी तरह नहीं जमा। फिर भी प्रयोग तो अभी चालू ही है। {Right|बापू}} [पुनश्च :] प्रभावतीका पता यह है अ० भा० कां० क० कार्यालय, इलाहाबाद। गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१११ ) से। सौजन्य: नारणदास गांधी १.यहांतक का अंश १८/१९ मई को लिखा गया था। पुनश्च वाले अंश २१ मई को लिखे गये थे।<noinclude></noinclude> h35h3p1t169o82g84k4vqoxsc6i0p1m 675053 675013 2026-08-30T03:14:29Z Manikantkmr 5554 675053 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरी चिन्ता करनेकी कोई जरूरत नहीं आजकल तो जेल जाना सुखोपभोग करना है। 'यंग इंडिया' में कुमारप्पाका नाम देखकर बड़ी खुशी हुई। वह निस्सन्देह एक योग्य व्यक्ति है। तुम मुझे सामान्य जानकारीसे भरा पत्र लिख सकते हो और उसके साथ उसी तरहके अन्य पत्र भी भेज सकते हो। मैं तुम्हें राजनीति सम्बन्धी सन्देश नहीं दे सकता। सबकी खबर तुम ही दे सकते हो। रुखीका पत्र आता है क्या? वह कैसी है? उमियाका पत्र आता है? छोटी कुसुमसे कहना कि उसने मेरे विशेष पत्रका उत्तर नहीं दिया। वह बहुत पशैतान है। उम्मीद है, नवीन और धीरू सानन्द होंगे। बालक और बालिकाएँ, सभी मुझे पत्र लिख सकते हैं। जिन डा० कानुगाके लिए आश्रमसे ही हरी सब्जियाँ जाती हैं उनकी तबीयत कैसी है? अमीनाकी प्रसूतिके लिए ठीक व्यवस्था कर दी होगी? इमाम साहब कहाँ है? कैसे हैं? जिन चार लड़कोंको छोटा जानकर सजा नहीं दी गई, वे कौन हैं और अब कहाँ है? बहनें अलग-अलग कहाँ कहाँ बिखरी हुई हैं? दुग्धालय, चर्मालय और खेती कैसी चल रही है? कितने करघे चल रहे हैं ? आफिसके पासवाले कूऍकी सफाई होनेवाली थी। यदि अभी तक सफाई न हुई हो और सफाई करवाई जा सके तो करवा लेना। केशू शान्त है क्या? उसकी तबीयत कैसी है? राधासे पत्र लिखने को कहना। मैं उसे अलगसे नहीं लिख रहा हूँ। यों तो बहुतों को लिखनेका मन करता है, लेकिन सबको कैसे लिखा जा सकता है?१ {Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] कच्चे दूधसे दही जमानेका प्रयोग पूर्णतः सफल नहीं हुआ। पहले दिन तो ठीक लगा था। दही लगानेकी मात्रामें कुछ दोष है अथवा कोई और दोष है; लेकिनपहले दिनके बाद दूध अच्छी तरह नहीं जमा। फिर भी प्रयोग तो अभी चालू ही है। {Right|बापू}} [पुनश्च :] प्रभावतीका पता यह है अ० भा० कां० क० कार्यालय, इलाहाबाद। गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१११ ) से। सौजन्य: नारणदास गांधी १.यहांतक का अंश १८/१९ मई को लिखा गया था। पुनश्च वाले अंश २१ मई को लिखे गये थे।<noinclude></noinclude> idbjbzsrv9215hmdxmt7hxhqnl8g8fb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८५ 250 197528 675014 670056 2026-08-29T17:55:49Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२४. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} प्रिय रेनॉल्ड्स, {{Right|२२ मई, १९३०}} मुझे तुम्हारा प्रेम-पत्र मिला और मीरासे तुम्हारे बारेमें समाचार भी मिले। तुम बखूबी जाओ। जानेसे पहले यदि तुम्हारी यहां आने और मुझसे मिलनेकी इच्छा हो तो जरूर आना। मुझसे मिलनेमें तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी। जहाँ कहीं भी रहो, ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च :] मैं तुम्हारी मँगेतरको पत्र लिखना चाहता था, लेकिन नहीं लिख सका। लेकिन यदि तुम मुझे उसका पता भेज दो तो मैं उसे अब भी लिखनेकी कोशिश करूँगा। उससे कहना कि मुझे उसका पत्र अपने गिरफ्तार होनेके दिन मिला था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३६ ) से। सौजन्य : स्वार्थमोर कॉलेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{|'''४२५. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|यरवडा आनन्द भवन}} {{Right|२५ मई, १९३०}} चि० मीरा, इस बार भी मैं पत्र रविवारको मौन धारण करने और शामकी प्रार्थनाके बाद शुरू कर रहा हूँ। जब तुम मिलने आई थीं, तब मालूम हो रहा था जैसे समय तेजीसे भागा जा रहा है। इसीलिए मैंने स्वयं बात करने और बहुत से सवाल पूछने के बजाय तुम्ही को बोलने दिया। तुम अच्छी नहीं दीख रही थीं। तुम दुबली मालूम होती थीं। यह नहीं चलेगा। तुम्हें उचित भोजन और उचित व्यायाम करना ही चाहिए। तुम्हें जितने भी फलोंकी जरूरत हो उतने लेने चाहिए और तन्दुरुस्त रहना चाहिए। मैं अब पहलेसे कहीं ज्यादा अनुभव कर रहा हूँ कि बड़ी धुनकी लगानेके बारेमें सब बातें न सीखकर मैंने कितनी लापरवाही बरती। चूंकि मुझमें थोड़ी-सी यान्त्रिक योग्यता है, मैंने उसे लटका लिया है और पिछले गुरुवारसे उसपर काम कर रहा हूँ। मेरे पास पूनियोंका खासा ढेर हो गया है; लेकिन धुनकी लटकाने में कुछ-न-कुछ खामी जरूर है। लम्बी रस्सी छतसे लटकती है। बाँससे दो रस्सियाँ<noinclude></noinclude> pg49k1rufepg63bb98r7di27iu72hvn 675016 675014 2026-08-29T17:56:33Z Manikantkmr 5554 675016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२४. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} प्रिय रेनॉल्ड्स, {{Right|२२ मई, १९३०}} मुझे तुम्हारा प्रेम-पत्र मिला और मीरासे तुम्हारे बारेमें समाचार भी मिले। तुम बखूबी जाओ। जानेसे पहले यदि तुम्हारी यहां आने और मुझसे मिलनेकी इच्छा हो तो जरूर आना। मुझसे मिलनेमें तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी। जहाँ कहीं भी रहो, ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च :] मैं तुम्हारी मँगेतरको पत्र लिखना चाहता था, लेकिन नहीं लिख सका। लेकिन यदि तुम मुझे उसका पता भेज दो तो मैं उसे अब भी लिखनेकी कोशिश करूँगा। उससे कहना कि मुझे उसका पत्र अपने गिरफ्तार होनेके दिन मिला था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३६ ) से। सौजन्य : स्वार्थमोर कॉलेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''४२५. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|यरवडा आनन्द भवन}} {{Right|२५ मई, १९३०}} चि० मीरा, इस बार भी मैं पत्र रविवारको मौन धारण करने और शामकी प्रार्थनाके बाद शुरू कर रहा हूँ। जब तुम मिलने आई थीं, तब मालूम हो रहा था जैसे समय तेजीसे भागा जा रहा है। इसीलिए मैंने स्वयं बात करने और बहुत से सवाल पूछने के बजाय तुम्ही को बोलने दिया। तुम अच्छी नहीं दीख रही थीं। तुम दुबली मालूम होती थीं। यह नहीं चलेगा। तुम्हें उचित भोजन और उचित व्यायाम करना ही चाहिए। तुम्हें जितने भी फलोंकी जरूरत हो उतने लेने चाहिए और तन्दुरुस्त रहना चाहिए। मैं अब पहलेसे कहीं ज्यादा अनुभव कर रहा हूँ कि बड़ी धुनकी लगानेके बारेमें सब बातें न सीखकर मैंने कितनी लापरवाही बरती। चूंकि मुझमें थोड़ी-सी यान्त्रिक योग्यता है, मैंने उसे लटका लिया है और पिछले गुरुवारसे उसपर काम कर रहा हूँ। मेरे पास पूनियोंका खासा ढेर 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मैं टूटनेके डरके बिना तार निकालूंगा, तब मेरी गति और भी बढ़ जायेगी। A - 'भजनावली का एक श्लोक रोजाना अनुवाद करनेका मेरा काम जारी है। काश, मैं अधिक कर सकता। लेकिन कताई और धुनाईके बाद ज्यादा समय बचता ही नहीं। और अब मुझे सोनेकी मशीनके लिए समय निकालना पड़ेगा। तुम्हारे आनेसे मुझे बड़ी खुशी हुई। सस्नेह, [ पुनश्च : ] से भी । तकुएकी गिरीं ढीली हो जाये तो तुम उसे कसती कैसे हो ? बापू अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९७) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३१ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> bdw80voi2aq34pa1xopo4905lahxeri 675036 675031 2026-08-29T18:46:11Z Manikantkmr 5554 675036 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लटकती हैं। मैंने उन दोनोंको जोड़ दिया है और जुड़ी हुई रस्सियों पर पतली डोरी इस तरह लगा देता हूँ : बाँस स्थिर नहीं रह पाता, बल्कि घूम-घूम जाता है। अलबत्ता, दीवार उसे रोकती है। लेकिन मेरे खयालसे अगर रोकनेको दीवार न हो, तो भी उसे घूमना बिलकुल न चाहिए। मैंने जो वर्णन किया है, उसे तुमने समझ लिया हो और उसमें कोई त्रुटि हो तो मुझे बताना। तुम्हारी तकली अच्छी बनी है, लेकिन वह बारीक कताईके लिए बहुत भारी है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि इसके लिए बाँस ही सही चीज है। मेरी गति अब पहलेसे अच्छी है। मैंने आज डेढ़ घंटे ६५ तार काते हैं इतना मेरे लिए बुरा नहीं है। जब मेरी घबराहट मिट जायेगी और मैं टूटनेके डरके बिना तार निकालूंगा, तब मेरी गति और भी बढ़ जायेगी। 'भजनावली' का एक श्लोक रोजाना अनुवाद करनेका मेरा काम जारी है। काश, मैं अधिक कर सकता। लेकिन कताई और धुनाईके बाद ज्यादा समय बचता ही नहीं। और अब मुझे सोनेकी मशीनके लिए समय निकालना पड़ेगा। तुम्हारे आनेसे मुझे बड़ी खुशी हुई। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च :] तकुएकी गिर्रीं ढीली हो जाये तो तुम उसे कसती कैसे हो? अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९७) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३१ से भी।<noinclude></noinclude> so7fjc8gyyr9nit1ecygr6xvqeezntz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८७ 250 197530 675017 670058 2026-08-29T18:08:42Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२६. पत्र : सरलादेवीको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय बहन, आपके भेजे फल मुझे मिल गये। मुझसे कहा गया है कि मैं आपको लिख दूँ कि अब आगेसे आप फल न भेजें। मुझे जितने भी फलोंकी जरूरत होती है यहाँसे मिल जाते हैं। आम और संतरे जेलरको खानेके लिए दे दिये जाते हैं। जब चारों तरफ आग लगी हो तब मैं मजेमें आम कैसे खा सकता हूँ? दो या चार दिन मैंने संतरे लिये, फिर छोड़ दिया। मुझे उनकी जरूरत महसूस नहीं होती। जरूरत महसूस होनेपर निश्चय ही में लेने लगूंगा। फल भेजने के पीछे जो प्रेम-भाव है, उसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। आशा है सभी बच्चे भले- चंगे होंगे। मोहनदासके वन्देमातरम् [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७४ । {{C|larger|'''४२७. पत्र : चन्द्रशंकर शुक्लको२'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय चन्द्रशंकर, जेल सुपरिटेंडेंटने तुम्हारा पत्र मुझे दिखा दिया है। फिलहाल मैं कोई भी पुस्तक नहीं मँगाऊँगा। यहाँ जो पुस्तकें मौजूद हैं, वे भी यों ही पड़ी हैं। अवकाश का सारा समय कताई और पिजाईमें खप जाता है। थोड़ा समय पढ़ने में लगाता हूँ। आशा है, तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक होगा। यदि न हो तो उसे सुधारो। [जुदाईकी] पीड़ा तो अब तुम भूल चुके होगे। काकासे मुलाकात होती होगी। कमलनयन कहाँ है? वहाँ हो तो पत्र लिखनेको कहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फोडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७३। १ व २. ये अंग्रेज़ीमें अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<noinclude></noinclude> 89tvi87rugv2nf8ggoul4pnmeqdm6bj 675018 675017 2026-08-29T18:10:01Z Manikantkmr 5554 675018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२६. पत्र : सरलादेवीको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय बहन, आपके भेजे फल मुझे मिल गये। मुझसे कहा गया है कि मैं आपको लिख दूँ कि अब आगेसे आप फल न भेजें। मुझे जितने भी फलोंकी जरूरत होती है यहाँसे मिल जाते हैं। आम और संतरे जेलरको खानेके लिए दे दिये जाते हैं। जब चारों तरफ आग लगी हो तब मैं मजेमें आम कैसे खा सकता हूँ? दो या चार दिन मैंने संतरे लिये, फिर छोड़ दिया। मुझे उनकी जरूरत महसूस नहीं होती। जरूरत महसूस होनेपर निश्चय ही में लेने लगूंगा। फल भेजने के पीछे जो प्रेम-भाव है, उसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। आशा है सभी बच्चे भले- चंगे होंगे। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७४ । {{C|larger|'''४२७. पत्र : चन्द्रशंकर शुक्लको२'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय चन्द्रशंकर, जेल सुपरिटेंडेंटने तुम्हारा पत्र मुझे दिखा दिया है। फिलहाल मैं कोई भी पुस्तक नहीं मँगाऊँगा। यहाँ जो पुस्तकें मौजूद हैं, वे भी यों ही पड़ी हैं। अवकाश का सारा समय कताई और पिजाईमें खप जाता है। थोड़ा समय पढ़ने में लगाता हूँ। आशा है, तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक होगा। यदि न हो तो उसे सुधारो। [जुदाईकी] पीड़ा तो अब तुम भूल चुके होगे। काकासे मुलाकात होती होगी। कमलनयन कहाँ है? वहाँ हो तो पत्र लिखनेको कहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फोडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७३। १ व २. ये अंग्रेज़ीमें अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<noinclude></noinclude> cjs6e4amb6vpq07p229b6x9onhww23z 675019 675018 2026-08-29T18:10:52Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२६. पत्र : सरलादेवीको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय बहन, आपके भेजे फल मुझे मिल गये। मुझसे कहा गया है कि मैं आपको लिख दूँ कि अब आगेसे आप फल न भेजें। मुझे जितने भी फलोंकी जरूरत होती है यहाँसे मिल जाते हैं। आम और संतरे जेलरको खानेके लिए दे दिये जाते हैं। जब चारों तरफ आग लगी हो तब मैं मजेमें आम कैसे खा सकता हूँ? दो या चार दिन मैंने संतरे लिये, फिर छोड़ दिया। मुझे उनकी जरूरत महसूस नहीं होती। जरूरत महसूस होनेपर निश्चय ही में लेने लगूंगा। फल भेजने के पीछे जो प्रेम-भाव है, उसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। आशा है सभी बच्चे भले- चंगे होंगे। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [अंग्रेजीसे] 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मँगाऊँगा। यहाँ जो पुस्तकें मौजूद हैं, वे भी यों ही पड़ी हैं। अवकाश का सारा समय कताई और पिजाईमें खप जाता है। थोड़ा समय पढ़ने में लगाता हूँ। आशा है, तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक होगा। यदि न हो तो उसे सुधारो। [जुदाईकी] पीड़ा तो अब तुम भूल चुके होगे। काकासे मुलाकात होती होगी। कमलनयन कहाँ है? वहाँ हो तो पत्र लिखनेको कहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७३। <small>१ व २. ये अंग्रेज़ीमें अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> bg0uf5qgv5psfdk6nlr0cyzxj428r70 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८८ 250 197531 675020 670059 2026-08-29T18:12:24Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{right|'''४२८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}} यरवडा मन्दिर २६ मई, १९३० चि० सुशीला, तुझे मैंने कैसा पति दिया है? लेकिन मैंने कहाँ दिया है? पसन्द तो तेरी अपनी है। इसलिए तू मुझसे कुछ नहीं कह सकती। मैंने तो तुझे खूब चेता दिया था; सो याद है न लेकिन जब तू खुद ही सेर पर सवा सेर-जैसी है, तो कहनेको रह ही क्या जाता है? आशा है सीता उर्फ धैर्यबाला मजे में होगी । ? बापूके आशीर्वाद गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११८०) की फोटो नकलसे; सौजन्य : सुशीला गांधी; जी० एन० ४७६८ से भी । ४२९. पत्र : नारणदास गांधीको परवडा मन्दिर २६ मई, १९३० चि० नारणदास, गुजराती पत्र पिछले सप्ताह यहाँ आ गये थे; लेकिन वे अभी तक मुझे नहीं दिये गये हैं। मीराबहन और मैथ्यूके पत्र मिल गये क्योंकि वे अंग्रेजीमें थे। ऐसी परिस्थिति है ? लेकिन यदि ईश्वरकी कृपा हुई तो यह हाल अब अधिक दिनों तक नहीं चलेगा। कह सकते हैं, मेरा वजन ठीक उतना ही है। कदाचित् आधा पौंड बढ़ गया हो । खुराक भी वही है। अब कच्चे दूधमें दही मिलानेसे अच्छा दही जमता है। यह दही २४ घंटेमें जमता है। दही ठीक मात्रामें मिलाया था । पढ़ाईमें 'लाइट ऑफ एशिया' और 'सेंट्स ऑफ इस्लाम' ये दो पुस्तकें खत्म की हैं। अब किसी मित्रने पंजाबके जेल अधीक्षक द्वारा जेलखाने पर लिखी एक पुस्तक भेजी है, उसे पढ़ रहा हूँ। पढ़नेका समय ही कहाँ है ? सात घंटे तो चरखा, तकली और पीजनेमें चले जाते हैं। किसी दिन जब चरखेमें कुछ मरम्मत नहीं करनी होती तो कम समय लगता है और किसी दिन ज्यादा समय चला जाता है। मुझे इसका दुःख नहीं। मुझे काम करना अच्छा लगता है। सब कुछ खुद ही करना पड़ता है; इससे सुभीता होता है और सूक्ष्म दोष दिखाई पड़ जाते हैं और उन्हें दूर भी कर देता हूँ। तकलीके सूतमें बहुत सुधार हुआ है और अब रफ्तार भी बढ़ गई है। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> l3a8r8nyq14qzlgo7vk32iiiaimp6vq 675021 675020 2026-08-29T18:13:01Z Manikantkmr 5554 675021 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{Right|'''४२८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}} यरवडा मन्दिर २६ मई, १९३० चि० सुशीला, तुझे मैंने कैसा पति दिया है? लेकिन मैंने कहाँ दिया है? पसन्द तो तेरी अपनी है। इसलिए तू मुझसे कुछ नहीं कह सकती। मैंने तो तुझे खूब चेता दिया था; सो याद है न लेकिन जब तू खुद ही सेर पर सवा सेर-जैसी है, तो कहनेको रह ही क्या जाता है? आशा है सीता उर्फ धैर्यबाला मजे में होगी । ? बापूके आशीर्वाद गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११८०) की फोटो नकलसे; सौजन्य : सुशीला गांधी; जी० एन० ४७६८ से भी । ४२९. पत्र : नारणदास गांधीको परवडा मन्दिर २६ मई, १९३० चि० नारणदास, गुजराती पत्र पिछले सप्ताह यहाँ आ गये थे; लेकिन वे अभी तक मुझे नहीं दिये गये हैं। मीराबहन और मैथ्यूके पत्र मिल गये क्योंकि वे अंग्रेजीमें थे। ऐसी परिस्थिति है ? लेकिन यदि ईश्वरकी कृपा हुई तो यह हाल अब अधिक दिनों तक नहीं चलेगा। कह सकते हैं, मेरा वजन ठीक उतना ही है। कदाचित् आधा पौंड बढ़ गया हो । खुराक भी वही है। अब कच्चे दूधमें दही मिलानेसे अच्छा दही जमता है। यह दही २४ घंटेमें जमता है। दही ठीक मात्रामें मिलाया था । पढ़ाईमें 'लाइट ऑफ एशिया' और 'सेंट्स ऑफ इस्लाम' ये दो पुस्तकें खत्म की हैं। अब किसी मित्रने पंजाबके जेल अधीक्षक द्वारा जेलखाने पर लिखी एक पुस्तक भेजी है, उसे पढ़ रहा हूँ। पढ़नेका समय ही कहाँ है ? सात घंटे तो चरखा, तकली और पीजनेमें चले जाते हैं। किसी दिन जब चरखेमें कुछ मरम्मत नहीं करनी होती तो कम समय लगता है और किसी दिन ज्यादा समय चला जाता है। मुझे इसका दुःख नहीं। मुझे काम करना अच्छा लगता है। सब कुछ खुद ही करना पड़ता है; इससे सुभीता होता है और सूक्ष्म दोष दिखाई पड़ जाते हैं और उन्हें दूर भी कर देता हूँ। तकलीके सूतमें बहुत सुधार हुआ है और अब रफ्तार भी बढ़ गई है। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 59pzv14b6kuvdvmnfl8q5jvpc38yxaa 675022 675021 2026-08-29T18:16:47Z Manikantkmr 5554 675022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}} यरवडा मन्दिर २६ मई, १९३० चि० सुशीला, तुझे मैंने कैसा पति दिया है? लेकिन मैंने कहाँ दिया है? पसन्द तो तेरी अपनी है। इसलिए तू मुझसे कुछ नहीं कह सकती। मैंने तो तुझे खूब चेता दिया था; सो याद है न लेकिन जब तू खुद ही सेर पर सवा सेर-जैसी है, तो कहनेको रह ही क्या जाता? है? आशा है सीता उर्फ धैर्यबाला मजे में होगी। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११८०) की फोटो नकलसे; सौजन्य : सुशीला गांधी; जी० एन० ४७६८ से भी । {{C|{{larger|'''४२९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} परवडा मन्दिर २६ मई, १९३० चि० नारणदास, गुजराती पत्र पिछले सप्ताह यहाँ आ गये थे; लेकिन वे अभी तक मुझे नहीं दिये गये हैं। मीराबहन और मैथ्यूके 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675023 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} चि० सुशीला, तुझे मैंने कैसा पति दिया है? लेकिन मैंने कहाँ दिया है? पसन्द तो तेरी अपनी है। इसलिए तू मुझसे कुछ नहीं कह सकती। मैंने तो तुझे खूब चेता दिया था; सो याद है न लेकिन जब तू खुद ही सेर पर सवा सेर-जैसी है, तो कहनेको रह ही क्या जाता? है? आशा है सीता उर्फ धैर्यबाला मजे में होगी। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११८०) की फोटो नकलसे; सौजन्य : सुशीला गांधी; जी० एन० ४७६८ से भी । {{C|{{larger|'''४२९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} चि० नारणदास, गुजराती पत्र पिछले सप्ताह यहाँ आ गये थे; लेकिन वे अभी तक मुझे नहीं दिये गये हैं। मीराबहन और मैथ्यूके पत्र मिल गये क्योंकि वे अंग्रेजीमें थे। ऐसी परिस्थिति है? लेकिन यदि ईश्वरकी कृपा हुई तो यह हाल अब अधिक दिनों तक नहीं चलेगा। कह सकते हैं, मेरा वजन ठीक उतना ही है। कदाचित् आधा पौंड बढ़ गया हो। खुराक भी वही है। अब कच्चे दूधमें दही मिलानेसे अच्छा दही जमता है। यह दही २४ घंटेमें जमता है। दही ठीक मात्रामें मिलाया था। पढ़ाईमें 'लाइट ऑफ एशिया' और 'सेंट्स ऑफ इस्लाम' ये दो पुस्तकें खत्म की हैं। अब किसी मित्रने पंजाबके जेल अधीक्षक द्वारा जेलखाने पर लिखी एक पुस्तक भेजी है, उसे पढ़ रहा हूँ। पढ़नेका समय ही कहाँ है ? सात घंटे तो चरखा, तकली और पीजनेमें चले जाते हैं। किसी दिन जब चरखेमें कुछ मरम्मत नहीं करनी होती तो कम समय लगता है और किसी दिन ज्यादा समय चला जाता है। मुझे इसका दुःख नहीं। मुझे काम करना अच्छा लगता है। सब कुछ खुद ही करना पड़ता है; इससे सुभीता होता है और सूक्ष्म दोष दिखाई पड़ जाते हैं और उन्हें दूर भी कर देता हूँ। तकलीके सूतमें बहुत सुधार हुआ है और अब रफ्तार भी बढ़ गई है।<noinclude></noinclude> 856040i7a781apff7h1u20c19yztjez 675082 675023 2026-08-30T04:43:14Z Manikantkmr 5554 675082 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} चि० सुशीला, तुझे 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जेल अधीक्षक द्वारा जेलखाने पर लिखी एक पुस्तक भेजी है, उसे पढ़ रहा हूँ। पढ़नेका समय ही कहाँ है ? सात घंटे तो चरखा, तकली और पींजनेमें चले जाते हैं। किसी दिन जब चरखेमें कुछ मरम्मत नहीं करनी होती तो कम समय लगता है और किसी दिन ज्यादा समय चला जाता है। मुझे इसका दुःख नहीं। मुझे काम करना अच्छा लगता है। सब कुछ खुद ही करना पड़ता है; इससे सुभीता होता है और सूक्ष्म दोष दिखाई पड़ जाते हैं और उन्हें दूर भी कर देता हूँ। तकलीके सूतमें बहुत सुधार हुआ है और अब रफ्तार भी बढ़ गई है।<noinclude></noinclude> 935gwy4pib67wokf32impn8wl73x9ja पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८९ 250 197532 675030 670060 2026-08-29T18:27:10Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675030 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र : जानकीदेवी बजाजको|४४५}}</noinclude>बाहरका विचार बहुत कम आता है। काममें विचारको अवकाश नहीं है। 'गीता' के मध्यविन्दु पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता हूँ। इससे शान्ति रहती है। नहीं तो समाचार-पत्रोंसे सब कुछ जाननेके बाद शान्ति बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। दोनों समय प्रार्थना और 'गीता' का पाठ मेरे लिए एक बहुत बड़ा आधार है। कृष्णन् नायर, सूरजभान और जयन्तीप्रकाशकी क्या कोई खबर है? सतीश बाबू कैसे हैं? तुम जिन-जिनको पत्र लिखो उन्हें लिख देना कि पत्र प्रकाशित नहीं किये जाने चाहिए। हाँ, मित्र मण्डलको अवश्य पढ़वा सकते हैं। जमनाकी तबीयत कैसी है? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४३०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय जानकीबहन, कैसी हो? आशा है, तुम्हारा साहस नहीं छूटा होगा। मदालसा कैसी है? कमलनयनके बारेमें चिन्ता मत करो। क्या विनोबाके गीता प्रवचन सुनकर तुम इतना भी नहीं समझ पाई कि हमें किसी भी वातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७५ ॥ <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> 4m00f6csv7pdbkthpvh2toeqvlon7ha 675083 675030 2026-08-30T04:47:01Z Manikantkmr 5554 675083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र : जानकीदेवी बजाजको|४४५}}</noinclude>बाहरका विचार बहुत कम आता है। काममें विचारको अवकाश नहीं है। 'गीता' के मध्यविन्दु पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता हूँ। इससे शान्ति रहती है। नहीं तो समाचार-पत्रोंसे सब कुछ जाननेके बाद शान्ति बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। दोनों समय प्रार्थना और 'गीता' का पाठ मेरे लिए एक बहुत बड़ा आधार है। कृष्णन् नायर, सूरजभान और जयन्तीप्रकाशकी क्या कोई खबर है? सतीश बाबू कैसे हैं? तुम जिन-जिनको पत्र लिखो उन्हें लिख देना कि पत्र प्रकाशित नहीं किये जाने चाहिए। हाँ, मित्र मण्डलको अवश्य पढ़वा सकते हैं। जमनाकी तबीयत कैसी है? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४३०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय जानकीबहन, कैसी 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चिन्तित नहीं होना चाहिए। मैं रोज ही तुम सबकी याद कर लेता हूँ। मेरे नाम एक पत्र लिखवाकर उसे आश्रमके जरिये भिजवा दो। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ {{C|{{larger|'''४३२. पत्र : निर्मला गांधीको२'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय निमु, बा ने बतलाया है कि तुम और तुम्हारी माताजी दोनों आश्रम में लौट आई है। यह अच्छा हुआ। लेकिन तुम्हारी कब्जकी शिकायत अब कैसी है? क्या तुम बहादुर नहीं? सावित्री कैसी है? उसे इसी नामसे बुलाते हैं या किसी दूसरे नामसे? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७६। गया है। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के स्थानपर यह शायद भूसे लिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> pjlc3qm1sdon4euuq97ic9bul3rv7lj 675060 675059 2026-08-30T03:41:40Z Manikantkmr 5554 675060 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|४३१. पत्र : जमनाबहन गांधीको १}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]}} प्रिय जमनाबहन, यह पत्र तुमसे यह कहनेके लिए लिख रहा हूँ कि मेरे बारेमें किसी भी बहनको चिन्तित नहीं होना चाहिए। मैं रोज ही तुम सबकी याद कर लेता हूँ। मेरे नाम एक पत्र लिखवाकर उसे आश्रमके जरिये भिजवा दो। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ {{C|{{larger|'''४३२. पत्र : निर्मला गांधीको२'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय निमु, बा ने बतलाया है कि तुम और तुम्हारी माताजी दोनों आश्रम में लौट आई है। यह अच्छा हुआ। लेकिन तुम्हारी कब्जकी शिकायत अब कैसी है? क्या तुम बहादुर नहीं? सावित्री कैसी है? उसे इसी नामसे बुलाते हैं या किसी दूसरे नामसे? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७६। गया है। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के स्थानपर यह शायद भूसे लिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> 0acxybocaw9p8h2gynwb6x06m8z1rux 675061 675060 2026-08-30T03:43:56Z Manikantkmr 5554 675061 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|४३१. पत्र : जमनाबहन गांधीको १}}}} 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उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के स्थानपर यह शायद भूलसे लिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> 3k9cztz67untlt1d0y903tgr6y5qhhp 675062 675061 2026-08-30T03:45:19Z Manikantkmr 5554 675062 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|४३१. पत्र : जमनाबहन गांधीको १}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]}} प्रिय जमनाबहन, यह पत्र तुमसे यह कहनेके लिए लिख रहा हूँ कि मेरे बारेमें किसी भी बहनको चिन्तित नहीं होना चाहिए। मैं रोज ही तुम सबकी याद कर लेता हूँ। मेरे नाम एक पत्र लिखवाकर उसे आश्रमके जरिये भिजवा दो। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ {{C|{{larger|'''४३२. पत्र : 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proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३१. पत्र : जमनाबहन गांधीको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय जमनाबहन, यह पत्र तुमसे यह कहनेके लिए लिख रहा हूँ कि मेरे बारेमें किसी भी बहनको चिन्तित नहीं होना चाहिए। मैं रोज ही तुम सबकी याद कर लेता हूँ। मेरे नाम एक पत्र लिखवाकर उसे आश्रमके जरिये भिजवा दो। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ {{C|{{larger|'''४३२. पत्र : निर्मला गांधीको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय निमु, बा ने बतलाया है कि तुम और तुम्हारी माताजी दोनों आश्रम में लौट आई है। यह अच्छा हुआ। लेकिन तुम्हारी कब्जकी शिकायत अब कैसी है? क्या तुम बहादुर नहीं? सावित्री५ कैसी है? उसे इसी नामसे बुलाते हैं या किसी दूसरे नामसे? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७६। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के स्थानपर यह शायद भूलसे लिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> 6z2dozsramh6bxs7cdemosso8jws91l 675086 675064 2026-08-30T04:48:59Z Manikantkmr 5554 675086 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३१. पत्र : जमनाबहन गांधीको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय जमनाबहन, यह पत्र तुमसे यह कहनेके लिए लिख रहा हूँ कि मेरे बारेमें किसी भी बहनको चिन्तित नहीं होना चाहिए। मैं रोज ही तुम सबकी याद कर लेता हूँ। मेरे नाम एक पत्र लिखवाकर उसे आश्रमके जरिये भिजवा दो। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ {{C|{{larger|'''४३२. पत्र : निर्मला गांधीको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय निमु, बा ने बतलाया है कि तुम और तुम्हारी माताजी दोनों आश्रम में लौट आई है। यह अच्छा हुआ। लेकिन तुम्हारी कब्जकी शिकायत अब कैसी है? क्या तुम बहादुर नहीं? सावित्री५ कैसी है? उसे इसी नामसे बुलाते हैं या किसी दूसरे नामसे? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७६। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के 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हैं या किसी दूसरे नामसे? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७६। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के स्थानपर यह शायद भूलसे लिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> hqolrgwg26mpod1oukck37o0c5vb3my पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९१ 250 197534 675068 670062 2026-08-30T04:01:50Z Manikantkmr 5554 /* शोधित नहीं */ 675068 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३३. पत्र : राधा गांधीको१'''}}}} मौनवार [२६ मई, १९३०]२ प्रिय राधा, तुम्हारा पत्र मुझे मिला नहीं यह डाकमें ही होगा। तुमने यदि मुझे अबतक कोई पत्र न लिखा हो, तो अब लिखना और सारे समाचार देना। रुखी कहाँ है? कैसी है? बड़ी जल्दी में हूँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७८। {{C|{{larger|'''४३४. पत्र : मंत्री गिरिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]४}} प्रिय मैत्री, कुछ समझदारी आई तुझमें? अपने पिताका नाम ऊँचा करो। कृष्णमैयादेवी कैसी है? मुझे पत्र लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। १. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। २. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है। ३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। ४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया 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मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> nf7g40caetjctgqxz0k1wpjeyejhchp 675071 675070 2026-08-30T04:04:50Z Manikantkmr 5554 675071 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३३. पत्र : राधा गांधीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय राधा, तुम्हारा पत्र मुझे मिला नहीं यह डाकमें ही होगा। तुमने यदि मुझे अबतक कोई पत्र न लिखा हो, तो अब लिखना और सारे समाचार देना। रुखी कहाँ है? कैसी है? बड़ी जल्दी में हूँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७८। {{C|{{larger|'''४३४. पत्र : मंत्री गिरिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]४}} प्रिय मैत्री, कुछ समझदारी आई तुझमें? अपने पिताका नाम ऊँचा करो। कृष्णमैयादेवी कैसी है? मुझे पत्र लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> 53whah8j4sqj7qghp6dz1l3w2samfoh 675072 675071 2026-08-30T04:05:11Z Manikantkmr 5554 675072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३३. पत्र : राधा गांधीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय राधा, तुम्हारा पत्र मुझे मिला नहीं यह डाकमें ही होगा। तुमने यदि मुझे अबतक कोई पत्र न लिखा हो, तो अब लिखना और सारे समाचार देना। रुखी कहाँ है? कैसी है? बड़ी जल्दी में हूँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७८। {{C|{{larger|'''४३४. पत्र : मंत्री गिरिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]४}} प्रिय मैत्री, कुछ समझदारी आई तुझमें? अपने पिताका नाम ऊँचा करो। कृष्णमैयादेवी कैसी है? मुझे पत्र लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया 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इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ । {{C|{{larger|'''४३६. पत्र : गोमती मशरूवालाको२'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय गोमती, मैंने सुना है कि किशोरलालका स्वास्थ्य अच्छा है। विस्तारसे लिखो। तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? तारी कहाँ है? यहीं हो तो उससे मुझे पत्र लिखनेको कहना। नाथू कहाँ है? क्या वह आश्रम जाता है? वहां कौन-कौनसी बहनें हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ । <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. सामन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगायागया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> cv8rgyacbgq0oj99fthi2qt7k0bqi8z 675102 675101 2026-08-30T06:09:50Z Manikantkmr 5554 675102 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पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. सामन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगायागया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> 8l3xmh30xp02gty1eeetjeclllar5mb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९३ 250 197536 675104 670064 2026-08-30T06:23:30Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675104 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३७. पत्र : मोतीबहनको १'''}}}} मौनवार [ २६ मई, १९३०]२ प्रिय मोतीबहन, ३ बा ने बतलाया कि तुम उदास रहती हो। ऐसा क्यों? 'गीता' का पाठ करनेवालेको उदासी घेर हो नहीं सकती। नित्य प्रति ईश्वरका ध्यान करने और उसे अपने हृदयमें प्रतिष्ठित माननेवाला कोई व्यक्ति उदास हो ही कैसे सकता है? उदासीको मार भगाओ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|'''४३८. पत्र : डा० प्राणजीवनदास मेहताको'''}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय प्राणजीवन भाई, जेलमें अकसर आपकी याद आती रही है। आप भले-चंगे तो होंगे ही। मेरे बारेमें चिन्तित न हों। मोहनदासके वन्देमातरम् [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ । <Small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> <Small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममे रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<Small> <Small>३. मथुरादास पुरुषोत्तमकी पत्नी।<Small> <Small>४. अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> ४३-२९<noinclude></noinclude> gn02cppj4mfxfovyh57idu0y9fdyv1o 675106 675104 2026-08-30T06:26:49Z Manikantkmr 5554 675106 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३७. पत्र : मोतीबहनको १'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय मोतीबहन, ३ बा ने बतलाया कि तुम उदास रहती हो। ऐसा क्यों? 'गीता' का पाठ करनेवालेको उदासी घेर हो नहीं सकती। नित्य प्रति ईश्वरका ध्यान करने और उसे अपने हृदयमें प्रतिष्ठित माननेवाला कोई व्यक्ति उदास हो ही कैसे सकता है? उदासीको मार भगाओ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|'''४३८. पत्र : डा० प्राणजीवनदास मेहताको'''}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय प्राणजीवन भाई, जेलमें अकसर आपकी याद आती रही है। आप भले-चंगे तो होंगे ही। मेरे बारेमें चिन्तित न हों। मोहनदासके वन्देमातरम् [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ । <Small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> <Small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममे रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<Small> <Small>३. मथुरादास पुरुषोत्तमकी पत्नी।<Small> <Small>४. अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> ४३-२९<noinclude></noinclude> h1atcg84fshhob6ru9ob1fuozpr0rw4 675108 675106 2026-08-30T06:32:38Z Manikantkmr 5554 675108 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३७. पत्र : मोतीबहनको १'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय मोतीबहन, ३ बा ने बतलाया कि तुम उदास रहती हो। ऐसा क्यों? 'गीता' का पाठ करनेवालेको उदासी घेर ही नहीं सकती। नित्य प्रति ईश्वरका ध्यान करने और उसे अपने हृदयमें प्रतिष्ठित माननेवाला कोई व्यक्ति उदास हो ही कैसे सकता है? उदासीको मार भगाओ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|'''४३८. पत्र : डा० प्राणजीवनदास मेहताको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय प्राणजीवन भाई, जेलमें अकसर आपकी याद आती रही है। आप भले-चंगे तो होंगे ही। मेरे बारेमें चिन्तित न हों। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ । <Small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> <Small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममे रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<Small> <Small>३. मथुरादास पुरुषोत्तमकी पत्नी।<Small> <Small>४. अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> ४३-२९<noinclude></noinclude> fao15oaayo1sr1faarfe58kyh64g0yw 675109 675108 2026-08-30T06:33:51Z Manikantkmr 5554 675109 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३७. पत्र : मोतीबहनको १'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय मोतीबहन, ३ बा ने बतलाया कि तुम उदास रहती हो। ऐसा क्यों? 'गीता' का पाठ करनेवालेको उदासी घेर ही नहीं सकती। नित्य प्रति ईश्वरका ध्यान करने और उसे अपने हृदयमें प्रतिष्ठित माननेवाला कोई व्यक्ति उदास हो ही कैसे सकता है? उदासीको मार भगाओ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|'''४३८. पत्र : डा० प्राणजीवनदास मेहताको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय प्राणजीवन भाई, जेलमें अकसर आपकी याद आती रही है। आप भले-चंगे तो होंगे ही। मेरे बारेमें चिन्तित न हों। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ । <Small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> <Small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममे रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<Small> <Small>३. मथुरादास पुरुषोत्तमकी पत्नी।<Small> <Small>४. अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<Small> ४३-२९<noinclude></noinclude> ie4vd3llg1f11euqd924alx83rjo0ix 675110 675109 2026-08-30T06:34:54Z Manikantkmr 5554 675110 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३७. पत्र : मोतीबहनको १'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय मोतीबहन, ३ बा ने बतलाया कि तुम उदास रहती हो। ऐसा क्यों? 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[अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ <small> १. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. रतिलालके पिता डा० प्राणजीवन मेहता।<small> <small>३. यह अंग्रेजीसे अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> f8zama84yahuyvubmx6jh6v3o0tlzbj 675118 675117 2026-08-30T06:47:13Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675118 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. पत्र : रतिलाल मेहताको१'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय रतिलाल, चम्पाके किरायेका तुमने क्या किया? तुम क्या काम करते हो? क्या तुम बापूको२ पत्र लिखते हो? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४०. पत्र: मणिबहन परीखको३'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मणिबहन, नरहरि आखिर जेल पहुँच ही गया। उसने 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हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६। ४४२. पत्र : अमीना कुरैशीको२ {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय अमीना, इमाम साहब आखिर जेल-महलमें पहुँच ही गये। शायद कुरैशी भी [जेल] चला गया हो। क्या तुम्हारी सेहत ठीक है? जापके लिए क्या इंतजाम किया गया है? बच्चे कैसे हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१२. ये अंग्रेजी अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> a2okah2nfdkqergigc4di01roouxbb5 675169 675168 2026-08-30T09:05:05Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675169 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४१. पत्र : मीठूबहन पेटिटको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मीठूबहन, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन 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पत्र : अमीना कुरैशीको२'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय अमीना, इमाम साहब आखिर जेल-महलमें पहुँच ही गये। शायद कुरैशी भी [जेल] चला गया हो। क्या तुम्हारी सेहत ठीक है? जापेके लिए क्या इंतजाम किया गया है? बच्चे कैसे हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१२. ये अंग्रेजी अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> ers42ttt6di3y37x79pabedeavznosg 675206 675205 2026-08-30T11:34:19Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675206 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४१. पत्र : मीठूबहन पेटिटको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मीठूबहन, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६। {{C|{{larger|'''४४२. पत्र : अमीना कुरैशीको२'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय अमीना, इमाम साहब आखिर जेल-महलमें पहुँच ही गये। शायद कुरैशी भी [जेल] चला गया हो। क्या तुम्हारी सेहत ठीक है? जापेके लिए क्या इंतजाम किया गया है? बच्चे कैसे हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१२. ये अंग्रेजी अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> rdpd3ivbekpx08khr0pirqh7epvz7ch पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९६ 250 197539 675201 670067 2026-08-30T11:18:49Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675201 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|४४३. पत्र : शान्ताको१}}}} {{Right|मौनवार[२६ मई, १९३०]२}} प्रिय शान्ता, कैसी हो, मन अब बिलकुल शान्त तो है न ? हो सकता है कि डाकमें तुम्हारा कोई पत्र हो, जो मुझे न मिल पाया हो। तुमने यदि कोई पत्र लिखा ही न हो तो अब लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४४. पत्र : सोनामणिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय सोनामणि, तुम दोनों बहनें कैसी हो? हिन्दी अच्छी तरह सीस ली है? सारे समाचार देना। [ अंग्रेजी से ] बापूके आशीर्वाद महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ ॥ गया है। १. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। २. साधन इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया ३. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। ४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<noinclude></noinclude> 31d6fybau1970stof1trwmh6j2t4knm 675203 675201 2026-08-30T11:31:26Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675203 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|४४३. पत्र : शान्ताको१}}}} {{Right|मौनवार[२६ मई, १९३०]२}} प्रिय शान्ता, कैसी हो, मन अब बिलकुल शान्त तो है न ? हो सकता है कि डाकमें तुम्हारा कोई पत्र हो, जो मुझे न मिल पाया हो। तुमने यदि कोई पत्र लिखा ही न हो तो अब लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४४. पत्र : सोनामणिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय सोनामणि, तुम दोनों बहनें कैसी हो? हिन्दी अच्छी तरह सीस ली है? सारे समाचार देना। [अंग्रेजी से] {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ ॥ <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> 2qwx99sluyg11g2qdv3aptv1akazehi 675214 675203 2026-08-30T11:58:57Z Manikantkmr 5554 675214 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|४४३. पत्र : शान्ताको१}}}} {{Right|मौनवार[२६ मई, १९३०]२}} प्रिय शान्ता, कैसी हो, मन अब बिलकुल शान्त तो है न ? हो सकता है कि डाकमें तुम्हारा कोई पत्र हो, जो मुझे न मिल पाया हो। तुमने यदि कोई पत्र लिखा ही न हो तो अब लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४४. पत्र : सोनामणिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय सोनामणि, तुम दोनों बहनें कैसी हो? हिन्दी अच्छी तरह सीख ली है? सारे समाचार देना। [अंग्रेजी से] {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ ॥ <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> toe3tevi5otk4a6cse7heodjw0yzmae पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९७ 250 197540 675208 670068 2026-08-30T11:52:22Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675208 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude> {{C|{{larger|'''४४५. पत्र : कलावती त्रिवेदीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]}} प्रिय कलावती, तुम्हारे पत्रका इंतजार है। इन दिनों तुम्हारी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या कर रही हो? मुझे अपना सारा हाल लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५। {{C|{{larger|'''४४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ३'''}}}} {{Right|[२६ मई, १९३०] ४}} प्रिय गंगाबहन (बड़ी), बारहवाँ और तेरहवां अध्याय पढ़ते समय मुझे तुम्हारी याद आई। अपेक्षाकृत छोटे-से बारहवें अध्यायके अनुवादके शीर्ष पर मैंने लिख दिया है कि यह सब लोगों को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए यदि संस्कृतमें नहीं तो कमसे कम गुजरातीमें अवश्य कर लेना चाहिए। गुजरातीमें उसे समझना आसान है। उसमें बतलाये गये भक्ति मार्गको समझ लेनेके बाद जाननेके लिए कुछ रह ही नहीं जाता। निस्सन्देह तुमने पत्र लिखा होगा, लेकिन अबतक वह मेरे पास नहीं पहुँचा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ ॥ <small>. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है।<small> <small>४. साधन-सूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें लगाया गया है।<small> <small>५. अनासक्तियोगके; देखिए खण्ड ४१ मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान<small><noinclude></noinclude> 3gtatdmmeot9bloh0chbxlhwp8yudf5 675209 675208 2026-08-30T11:53:13Z Manikantkmr 5554 675209 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude> {{C|{{larger|'''४४५. पत्र : कलावती त्रिवेदीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]}} प्रिय कलावती, तुम्हारे पत्रका इंतजार है। इन दिनों तुम्हारी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या कर रही हो? मुझे अपना सारा हाल लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५। {{C|{{larger|'''४४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ३'''}}}} {{Right|[२६ मई, १९३०] ४}} प्रिय गंगाबहन (बड़ी), बारहवाँ और तेरहवां अध्याय पढ़ते समय मुझे तुम्हारी याद आई। अपेक्षाकृत छोटे-से बारहवें अध्यायके अनुवादके शीर्ष पर मैंने लिख दिया है कि यह सब लोगों को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए यदि संस्कृतमें नहीं तो कमसे कम गुजरातीमें अवश्य कर लेना चाहिए। गुजरातीमें उसे समझना आसान है। उसमें बतलाये गये भक्ति मार्गको समझ लेनेके बाद जाननेके लिए कुछ रह ही नहीं जाता। निस्सन्देह तुमने पत्र लिखा होगा, लेकिन अबतक वह मेरे पास नहीं पहुँचा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ <small>. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है।<small> <small>४. साधन-सूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें लगाया गया है।<small> <small>५. अनासक्तियोगके; देखिए खण्ड ४१ मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान<small><noinclude></noinclude> meb49rdxq2r1g1f0rtt4ss08yfsldzl 675210 675209 2026-08-30T11:54:19Z Manikantkmr 5554 675210 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude> {{C|{{larger|'''४४५. पत्र : कलावती त्रिवेदीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]}} प्रिय कलावती, तुम्हारे पत्रका इंतजार है। इन दिनों तुम्हारी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या कर रही हो? मुझे अपना सारा हाल लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५। {{C|{{larger|'''४४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ३'''}}}} {{Right|[२६ मई, १९३०] ४}} प्रिय गंगाबहन (बड़ी), बारहवाँ और तेरहवां अध्याय पढ़ते समय मुझे तुम्हारी याद आई। अपेक्षाकृत छोटे-से बारहवें अध्यायके अनुवादके शीर्ष पर मैंने लिख दिया है कि यह सब लोगों को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए यदि संस्कृतमें नहीं तो कमसे कम गुजरातीमें अवश्य कर लेना चाहिए। गुजरातीमें उसे समझना आसान है। उसमें बतलाये गये भक्ति मार्गको समझ लेनेके बाद जाननेके लिए कुछ रह ही नहीं जाता। निस्सन्देह तुमने पत्र लिखा होगा, लेकिन अबतक वह मेरे पास नहीं पहुँचा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है।<small> <small>४. साधन-सूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें लगाया गया है।<small> <small>५. अनासक्तियोगके; देखिए खण्ड ४१ मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान<small><noinclude></noinclude> 60uu70mz1wxv68rag9x1s2st5p55eeq 675212 675210 2026-08-30T11:54:55Z Manikantkmr 5554 675212 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude> {{C|{{larger|'''४४५. पत्र : कलावती त्रिवेदीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय कलावती, तुम्हारे पत्रका इंतजार है। इन दिनों तुम्हारी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या कर रही हो? मुझे अपना सारा हाल लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५। {{C|{{larger|'''४४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ३'''}}}} {{Right|[२६ मई, १९३०] ४}} प्रिय गंगाबहन (बड़ी), बारहवाँ और तेरहवां अध्याय पढ़ते समय मुझे तुम्हारी याद आई। अपेक्षाकृत छोटे-से बारहवें अध्यायके अनुवादके शीर्ष पर मैंने लिख दिया है कि यह सब लोगों को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए यदि संस्कृतमें नहीं तो कमसे कम गुजरातीमें अवश्य कर लेना चाहिए। गुजरातीमें उसे समझना आसान है। उसमें बतलाये गये भक्ति मार्गको समझ लेनेके बाद जाननेके लिए कुछ रह ही नहीं जाता। निस्सन्देह तुमने पत्र लिखा होगा, लेकिन अबतक वह मेरे पास नहीं पहुँचा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है।<small> <small>४. साधन-सूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें लगाया गया है।<small> <small>५. अनासक्तियोगके; देखिए खण्ड ४१ मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान<small><noinclude></noinclude> qxz6xgsthicpfs623mv82adhxvmucr0 675213 675212 2026-08-30T11:57:44Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675213 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude> {{C|{{larger|'''४४५. पत्र : कलावती त्रिवेदीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय कलावती, तुम्हारे पत्रका इंतजार है। इन दिनों तुम्हारी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या कर रही हो? मुझे अपना सारा हाल लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५। {{C|{{larger|'''४४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ३'''}}}} {{Right|[२६ मई, १९३०] ४}} प्रिय गंगाबहन (बड़ी), बारहवाँ और तेरहवां अध्याय पढ़ते समय मुझे तुम्हारी याद आई। अपेक्षाकृत छोटे-से बारहवें अध्यायके अनुवादके शीर्ष पर मैंने लिख दिया है कि यह सब लोगों को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए यदि संस्कृतमें नहीं तो कमसे कम गुजरातीमें अवश्य कर लेना चाहिए। गुजरातीमें उसे समझना आसान है। उसमें बतलाये गये भक्ति मार्गको समझ लेनेके बाद जाननेके लिए कुछ रह ही नहीं जाता। 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विषय में जवाहरलाल नेहरूकी टिप्पणी१}}}} भारतीय रंगमंचका पर्दा फिर उठ गया है और सारी दुनिया हमारी आजादीकी लड़ाईको देख रही है। यह एक अलग ढंगकी लड़ाई है और हमारे तरीके नये हैं। लेकिन साथ ही यह एक कठिन लड़ाई भी है और जो प्रतिज्ञा भारतने २६ जनवरी को स्वतन्त्रता दिवसपर ली थी उसे कभी भुलाया नहीं जायेगा। हमारे महान् नेताने साबरमती के किनारे जो चिनगारी छिटकाई थी वह सूखी घाससे भरे किसी सपाट मैदानमें लगी आगकी तरह तेजीसे सारे देशमें फैलती जा रही है और अब बहुत जल्दी ही पूरा देश उस प्रतिज्ञाको पूरा करनेका प्रयत्न करेगा। उस विशाल रंगमंचपर भारतकी स्वतन्त्रताके रूपमें अन्तिम रूपसे पटाक्षेप होनेके पूर्व अनेक दुःखद दृश्य अभिनीत किये जायेंगे, अनेक अभिनेता कष्ट और यातनाएँ सहेंगे। लेकिन जब यह संघर्ष अपनी सम्पूर्ण भयंकरता के साथ चल रहा होगा और हमारी सारी शक्तिका नियोजन उसीमें हो रहा होगा, उस समय भी हमें यह याद रखना होगा कि हमारी समस्याओंका सच्चा समाधान तभी प्राप्त होगा जब हम अल्पसंख्यकों को अपने पक्षमें करके चल सकेंगे और उन्हें पूरा सन्तोष देंगे। किन्तु दुर्भाग्यसे आज तथ्य यह है कि उनमें से कुछ बहुसंख्यकोंसे भयभीत हैं और इस स्वातन्त्र्य संग्रामसे किनारा किये बैठे हैं। यह बड़े दुःखका विषय है कि आज ऐसे कुछ लोग हमारे साथ नहीं हैं जो दस साल पूर्व हमारे संघर्षके साथी थे। हममें से जिन लोगोंको तब उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था वे कभी नहीं भूल सकते कि उन्होंने कैसी वीरतापूर्ण भूमिका निभाई थी और कैसे त्याग बलिदान किये थे। उस स्मृतिको हमने अपने मनमें प्रेमसे सहेजकर रखा है और हमें भरोसा है कि जब संघर्ष गम्भीर रूप धारण करेगा, उस समय वे निश्चय ही आगेकी पंक्ति में आकर उस स्थानको ग्रहण करेंगे जिसके वे अधिकारी हैं। भारत तथा यूरोपके अनेक देशोंके इतिहासने यह बात सिद्ध कर दी है कि जबतक किसी देश में अल्पसंख्यकोंको कुचलने या उन्हें बहुसंख्यकोंके तौर-तरीकोंको अपनानेपर विवश करने के प्रयत्न जारी रहते हैं तबतक वहाँ कोई स्थायी व्यवस्था और सन्तुलन कायम नहीं हो सकता और जिस चीजसे अल्पसंख्यकोंके क्षुब्ध होने और फलत: अपने-आपको शेष राष्ट्रसे अलग रखकर चलनेकी सबसे अधिक आशंका रहती है, वह है ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना जिनके कारण उन्हें लगे कि उनको अपने तौर-तरीकोंपर कायम रहने की स्वतन्त्रता नहीं मिली हुई है। दमन और बलप्रयोग द्वारा किसी अल्पसंख्यक समुदायको कभी दबाया नहीं जा सकता। इससे तो वह अपनी अस्मिता के प्रति और भी जागरुक हो उठता है और जिस चीजको वह अपना मानता <small>१. देखिए अल्पसंख्यकों की समस्या ", १४४१७।<small><noinclude></noinclude> 0thgptu14qhw9lhhulevgdkjcilwu29 675123 675122 2026-08-30T06:59:38Z Kumari Arpana Sinha 2191 675123 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''परिशिष्ट ३'''}}}} {{C|{{larger|'''अल्पसंख्यकोंके विषय में जवाहरलाल नेहरूकी टिप्पणी१'''}}}} भारतीय रंगमंचका पर्दा फिर उठ गया है और सारी दुनिया हमारी आजादीकी लड़ाईको देख रही है। यह एक अलग ढंगकी लड़ाई है और हमारे तरीके नये हैं। लेकिन साथ ही यह एक कठिन लड़ाई भी है और जो प्रतिज्ञा भारतने २६ जनवरी को स्वतन्त्रता दिवसपर ली थी उसे कभी भुलाया नहीं जायेगा। हमारे महान् नेताने साबरमती के किनारे जो चिनगारी छिटकाई थी वह सूखी घाससे भरे किसी सपाट मैदानमें लगी आगकी तरह तेजीसे सारे देशमें फैलती जा रही है और अब बहुत जल्दी ही पूरा देश उस प्रतिज्ञाको पूरा करनेका प्रयत्न करेगा। उस विशाल रंगमंचपर भारतकी स्वतन्त्रताके रूपमें अन्तिम रूपसे पटाक्षेप होनेके पूर्व अनेक दुःखद दृश्य अभिनीत किये जायेंगे, अनेक अभिनेता कष्ट और यातनाएँ सहेंगे। लेकिन जब यह संघर्ष अपनी सम्पूर्ण भयंकरता के साथ चल रहा होगा और हमारी सारी शक्तिका नियोजन उसीमें हो रहा होगा, उस समय भी हमें यह याद रखना होगा कि हमारी समस्याओंका सच्चा समाधान तभी प्राप्त होगा जब हम अल्पसंख्यकों को अपने पक्षमें करके चल सकेंगे और उन्हें पूरा सन्तोष देंगे। किन्तु दुर्भाग्यसे आज तथ्य यह है कि उनमें से कुछ बहुसंख्यकोंसे भयभीत हैं और इस स्वातन्त्र्य संग्रामसे किनारा किये बैठे हैं। यह बड़े दुःखका विषय है कि आज ऐसे कुछ लोग हमारे साथ नहीं हैं जो दस साल पूर्व हमारे संघर्षके साथी थे। हममें से जिन लोगोंको तब उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था वे कभी नहीं भूल सकते कि उन्होंने कैसी वीरतापूर्ण भूमिका निभाई थी और कैसे त्याग बलिदान किये थे। उस स्मृतिको हमने अपने मनमें प्रेमसे सहेजकर रखा है और हमें भरोसा है कि जब संघर्ष गम्भीर रूप धारण करेगा, उस समय वे निश्चय ही आगेकी पंक्ति में आकर उस स्थानको ग्रहण करेंगे जिसके वे अधिकारी हैं। भारत तथा यूरोपके अनेक देशोंके इतिहासने यह बात सिद्ध कर दी है कि जबतक किसी देश में अल्पसंख्यकोंको कुचलने या उन्हें बहुसंख्यकोंके तौर-तरीकोंको अपनानेपर विवश करने के प्रयत्न जारी रहते हैं तबतक वहाँ कोई स्थायी व्यवस्था और सन्तुलन कायम नहीं हो सकता और जिस चीजसे अल्पसंख्यकोंके क्षुब्ध होने और फलत: अपने-आपको शेष राष्ट्रसे अलग रखकर चलनेकी सबसे अधिक आशंका रहती है, वह है ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना जिनके कारण उन्हें लगे कि उनको अपने तौर-तरीकोंपर कायम रहने की स्वतन्त्रता नहीं मिली हुई है। दमन और बलप्रयोग द्वारा किसी अल्पसंख्यक समुदायको कभी दबाया नहीं जा सकता। इससे तो वह अपनी अस्मिता के प्रति और भी जागरुक हो उठता है और जिस चीजको वह अपना मानता <small>१. देखिए अल्पसंख्यकों की समस्या ", १४४१७।<small><noinclude></noinclude> 03ka8hm1aobxe0y8g0vc3iczrh9fyrq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२३ 250 197566 675126 670094 2026-08-30T07:05:33Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675126 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||परिशिष्ट|४७९}}</noinclude>है उसको प्रेम और सम्मानको दृष्टिसे देखने तथा उससे चिपटे रहने को और भी कृतसंकल्प हो जाता है। युक्ति उसके पक्ष में है या नहीं अथवा उसकी संस्कृति-विशेष इतने त्याग बलिदानके योग्य है या नहीं, इसका तो कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता। बस उसे खोनेका भय ही उसके मनमें उसके लिए मोह जगा देता है। उसे कायम रखनेकी स्वतन्त्रता दी जाये तो उसकी दृष्टिमें उसका मूल्य अपने-आप कम हो जायेगा। नये रूसने अपने यहाँके प्रत्येक अल्पसंख्यक समुदायको सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं भाषा विषयक पूरी स्वतन्त्रता देकर इस समस्याको हल करने में काफी सफलता प्राप्त की है। इसलिए हम भारतवासियोंको सबके सामने यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि हमारी नीति अल्पसंख्यक समुदायों को यह स्वतन्त्रता देनेकी आधारशिला पर खड़ी है और उनका दमन या उनके साथ बल प्रयोग सहन नहीं किया जायेगा। यों तो अल्पसंख्यक समुदायोंपर ऐसे समुदायोंके रूपमें आर्थिक प्रश्नोंका कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़नेकी आशंका नहीं है, लेकिन अगर हो भी तो हम इस बातको भी अपनी सुविचारित नीति के रूपमें स्पष्टतापूर्वक निर्धारित कर दे सकते हैं कि अल्पसंख्यकों के साथ इस दृष्टिसे कोई अनुचित व्यवहार नहीं किया जायेगा। सच तो यह है कि हम इससे भी एक कदम आगे बढ़कर कहना चाहेंगे कि अल्पसंख्यकों और पिछड़े समुदायोंके साथ विशेष कृपापूर्ण व्यवहार करना राज्यका कर्तव्य होगा। स्वतन्त्र भारतमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो राष्ट्रीय दृष्टिकोणसे ही हो सकता है। मैं चाहूंगा कि यह प्रतिनिधित्व आर्थिक आधार पर हो, क्योंकि यह आधुनिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्वकी अपेक्षा बहुत अधिक उपयुक्त होगा और वह समाजका साम्प्रदायिक आधारपर विभाजन करनेवाली रेखाओंको भी अपने-आप मिटा देगा। इस तरह जब धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषा विषयक स्वतन्त्रता दे दी जायेगी तब हमारे विधान मण्डलोंमें जो प्रश्न उठेंगे वे मुख्यतः अधिक होंगे और उन पर मत विभाजन साम्प्रदायिक आधार पर होनेकी सम्भावना समाप्त हो जायेगी। बहरहाल, प्रतिनिधित्वका चाहे जो भी तरीका अपनाया जाये, वह ऐसा होना चाहिए जिसे अल्पसंख्यक समुदायोंकी सद्भावना और समर्थन भी प्राप्त हो। यदि ये सिद्धान्त स्वीकार कर लिये जाते हैं और इनका पालन किया जाता है तो मैं नहीं समझता कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदायको कोई शिकायत हो सकती है या ऐसा लग सकता है कि उसकी उपेक्षा की जा रही है। लेकिन सम्भव है, इन सिद्धान्तोंको स्वीकार करनेमें अल्पसंख्यक समुदायोंके मनमें बहुसंख्यकों द्वारा इन पर अमल किये जानेके बारेमें शंका उठे। इस शंकाका ठीक-ठीक निवारण तो इन सिद्धान्तों पर अमल करके ही किया जा सकता है दुर्भाग्यकी बात है कि इन पर अमल करनेकी सामर्थ्य हममें राज- सत्ता प्राप्त करनेके बाद ही आ सकती है। यदि बहुसंख्यकोंकी प्रामाणिकतामें सन्देह किया जाता है और बहुत सम्भव है कि सन्देह किया जाये तो समझौतों आदिका भी कोई मतलब नहीं रह जायेगा। कुछ मोटे सिद्धान्तोंको आमतौर पर सारे देशके स्वीकार कर लेनेसे ऐसा प्रबल लोकमत तैयार हो सकता है जो आक्रामक और बदनीयत बहुसंख्यक समुदायको भी मनमानी न<noinclude></noinclude> 3bk73emu6pb1gxykykb1au1qw6d4t0y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२४ 250 197567 675129 670095 2026-08-30T07:12:15Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675129 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|४८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>करने दे। लेकिन व्यक्तियों या प्रतिनिधियोंके बीच हुए अस्थायी ढंगके समझौतोंका भी ऐसा महत्व नहीं हो सकता। ये सिद्धान्त सभी अल्पसंख्यक समुदायों पर लागू होने चाहिए मुसलमानों पर भी, जो भारतमें इतनी बड़ी संख्या में हैं कि किसी बहुसंख्यक समुदाय द्वारा उनके दबाये जा सकनेकी कल्पना ही नहीं की जा सकती, इसी तरह सिलों पर, जो संख्यामें कम होते हुए भी बड़े शक्तिशाली और संगठित हैं; साथ ही पारसियों पर और आंग्ल-भारतीयों या यूरेशियाइयों पर, जो धीरे-धीरे राष्ट्रीयताकी और खिचते आ रहे हैं; तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायोंपर भी। इस अत्यधिक महत्त्वपूर्ण समस्या के बारेमें कांग्रेसका वर्तमान दृष्टिकोण क्या है? नेहरू रिपोर्टकी मियाद अब खत्म हो चुकी है, परन्तु उसके वे अंश जिन पर कोई मतभेद नहीं है, निश्चय ही आज भी कायम है। उसमें निरूपित मूलभूत अधिकारोंमें धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई और शैक्षणिक स्वतन्त्रता शामिल थी। उसकी यह घोषणा आज भी मान्य रहनी चाहिए और इससे एक अल्पसंख्यक समुदायकी सभी बड़ी-बड़ी शंकाओंका पूर्ण समाधान हो जाता है। जहाँतक अन्य विषयोंकी बात है, उनसे अल्पसंख्यक समुदाय, अल्पसंख्यकोंके रूपमें तो प्रभावित नहीं होंगे; और लाहौर कांग्रेसने यह घोषणा कर ही दी है कि स्वतन्त्र भारतमें ऐसी समस्याओंको पूर्णतः राष्ट्रीय दृष्टिसे ही हल किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, उसमें इससे भी आगे बढ़कर मुसलमानों, सिखों तथा अन्य अल्पसंख्यकोंको आश्वस्त कर दिया गया है कि भविष्यमें यदि किसी साम्प्रदायिक समस्याका कोई हल पेश किया गया तो कांग्रेस उसे तबतक स्वीकार नहीं करेगी जबतक कि सम्बन्धित पक्षको उस हलसे पूरा सन्तोष नहीं होगा। इससे बड़ी कोई गारन्टी हो भी नहीं सकती और यदि कांग्रेस अपने वचनके पालनपर दृढ़ रहती है तो किसी भी अल्पसंख्यक समुदायको शंका करनेकी तनिक भी गुंजाइश नहीं रह जाती। कांग्रेसने इस प्रकार उन सिद्धान्तोंको अमली रूप देनेकी कोशिश की है जिनके आधारपर अल्पसंख्यकोंके प्रति व्यवहार किया जाना चाहिए। यदि इसके बाद भी कुछ लोगोंके मनमें कांग्रेसके प्रति कुछ शंकाएँ हैं, तो इसका कारण यह नहीं कि कांग्रेसने कुछ ऐसा किया है जिससे शंकाएं उत्पन्न हुई हैं, बल्कि इसका कारण विश्वासका अभाव और अनुचित भय ही है। मुझे भरोसा है कि कांग्रेस इन सिद्धान्तोंके प्रति वफादार रहेगी और देशवासियोंके सामने सिद्ध कर दिखाएगी कि साम्प्रदायिक मामलोंमें वह न तो दाहिनी ओर झुकेगी न बायीं ओर, वह निष्पक्षताके साथ मध्यम मार्गपर ही दृढ़ रहेगी। मुझे आशा है कि वह अल्पसंख्यक समुदायोंको पूरा विश्वास दिला सकेगी कि हम जिसकी प्राप्तिके लिए प्रयत्नशील है उस स्वतन्त्र भारतमें उनको एक सम्मानपूर्ण तथा विशेष सुविधापूर्ण स्थान प्राप्त होगा; और वह स्वतन्त्रता-संग्राम में अपने बलिदानों तथा अपने अडिग साहसके बलपर सभी लोगोंको अपनी सदाशयताका कायल कर देगी। '''यंग इंडिया,''' १५-५-१९३०<noinclude></noinclude> 50s4is88wff1ox97fuxyon4x7g831k1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२५ 250 197568 675132 670096 2026-08-30T07:18:21Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675132 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude> {{C|{{larger|'''परिशिष्ट ४'''}}}} {{C|{{larger|''''डेली टेलीग्राफ' के विवरणसे उद्धरण१'''}}}} 'डेली टेलीग्राफ' के विशेष सम्वाददाता, श्री अश्मीड बार्टलेट उसके इसी महीनेकी ६ तारीखके अंकमें लिखते हैं: पैगम्बर अब आजाद नहीं रह गया, उसे बड़ी हिफाजतसे पूनाके पास 'प्रेसीडेंसी' की सबसे आरामदेह जेल, यरवडामें नजरबन्द किया जा चुका है। उनके अनुयायियोंपर स्पष्ट अभियोग लगाये गये हैं, लेकिन गांधीके साथ ऐसा नहीं किया जायेगा । उनको १८२७ के अध्यादेश २५ के तहत, बिना कोई मुकदमा चलाये, बम्बई में नजरबंद रखा जायेगा। इस अध्यादेशकी शब्दावली ऐसी सामान्य रखी गई है कि सरकार उसके बल पर जिस किसीको भी ऐसे किसी भी अभियोगमें नजरबन्द कर सकती है जिसका किसी तरह यह अर्थ लगाया जा सके कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग होनेका अंदेशा है, या वह आंतरिक उपद्रव रोकनेके लिए नजरबन्द कर सकती है। इस अध्यादेशका प्रयोग आखिरी बार १९०६ में ट्रान्सवाल- हत्याकांडके वाद नाटू भाइयोंको नजरबन्द करनेके लिए किया गया था। उनकी गिरफ्तारी भी रातके सन्नाटेमें बहुत ही गुपचुप ढंगसे की गई। महात्मा सूरतके पास कराढीमें अपने शिविरमें गहरी नींद सो रहे थे। रातमें करीब १ बजे जिला पुलिस सुपरिटेंडेंटने जिला मजिस्ट्रेट और पुलिसके बीस सशस्त्र सिपाहियोंके साथ उनके कमरेमें प्रवेश किया। उन्होंने उनपर टार्चकी रोशनी डाली। महात्मा तुरन्त जाग गये। गांधी इस सबपर बहुत ही शांत चित्त बने रहे। उन्होंने बस इतना कहा कि वारंट उनको पढ़कर सुना दिया जाये और उनको अपने दांत साफ करनेकी अनुमति दी जाये। हिन्दुओंमें सोकर उठनेपर यह एक अनिवार्य धार्मिक कर्म होता है। दोनों अनुरोध मान लिये गये। थोड़ी ही देर बाद उनको एक लारीमें बैठा दिया गया। लारी पुलिसवालोंके साथ रेलवे स्टेशनकी ओर चल दी। यहाँ वे अपने पहरेदारोंके साथ अहमदाबाद-बम्बई एक्सप्रेस में लगे विशेष डिब्बेमें बोरीवलीके लिए सवार हुए, जहाँसे उनको मोटर द्वारा यरवडा जेल पहुँचाया जाना था। जेल पहुँचनेपर, वे अत्यन्त ही स्वस्थ तथा प्रफुल्लित दिख रहे थे और उन्होंने अपनी यात्राके सुप्रबन्धके लिए कृतज्ञता प्रकट की। कल समूची बम्बई नगरीमें यह एक आम चर्चा थी कि गांधीजी बस गिरफ्तार होने ही वाले हैं; और दोपहर बाद सरकारने अपनी कार्रवाईकी योजनाका ब्योरा <small>१. देखिए पृष्ठ ४२१-२२।<small> ४३-३१<noinclude></noinclude> byt8qq0eyubauk83of6djgrui5pg4k9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२६ 250 197569 675135 670097 2026-08-30T07:24:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 675135 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{Right|४८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>विदेशी सम्वाददाताओंको बतला दिया था, लेकिन पिछले तीन दिनोंके सख्त सेंसरके कारण उसके बारेमें एक शब्द भी तार द्वारा देशसे बाहर नहीं भेजा जा सका था।... सरकारका मुख्य उद्देश्य यह था कि आम जनताको इसकी खबर लगनेसे पहले ही गांधीको जेलमें बन्द कर दिया जाये, जिससे कि पूना तक उनकी यात्राके दौरान प्रदर्शनोंके फलस्वरूप दंगों और रक्तपातसे बचा जा सके। तार कार्यालयसे विदेशी समाचार-पत्रोंको तार द्वारा यह खबर भेजे जानेसे ही बम्बई भरके लोगोंको सरकारी योजनाकी जानकारी हो जाती। गांधीकी गिरफ्तारीका निर्णय अन्तिम रूपसे कुछ ही दिन पहले शिमलामें राज्य परिषद् (काउन्सिल ऑफ स्टेट) की बैठकमें किया गया था और तब ४ मईको गिरफ्तार करनेकी योजना थी। लेकिन उस दिन रविवार पड़नेके कारण उसे बदलनेका निर्णय किया गया और इसलिए सोमवारको रातके एक बजे (भारतीय समय) अर्थात् रविवारकी रातके १२ बजेके बाद सोमवार शुरू होनेपर सूरतमें उनको गिरफ्तार करनेका निर्णय किया गया था। श्री हाट्सनने मुझे अपना कार्यक्रम सूचित करनेकी कृपा की। उसके अनुसार गांधीको बम्बई से १३ मीलकी दूरी पर बोरीवली नामक एक छोटे-से स्टेशनपर उतार- कर वहाँसे कार द्वारा उनको पूना भेजा जाना था।... [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू,''' २७-५-१९३०<noinclude></noinclude> d1vravf88hr53ykm4k59vgf6mo06n7a