विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.17 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी 3 40 675468 643272 2026-08-30T19:46:04Z ~2026-47216-61 6844 675468 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} {{स्वागत}} [[सदस्य:अनिरुद्ध!|अनिरुद्ध!]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध!|वार्ता]]) २०:५१, १ अक्टूबर २०१९ (UTC) तेरे पाप का घड़ा एक दिन जरूर फुटेगा ==कोड स्वराज== अजीत जी आप का [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%A1_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C.pdf/%E0%A5%A9%E0%A5%A9&diff=216649&oldid=216648 यहाँ] अनुवाद देखा। दरसल किताब में ही वैसे '''आप''' शब्द लिखा हुआ हैं और अंग्रेजी में किताब जैसा ही करते हैं| हमें इन सब चीजों पर नीति बनानी चाहिए। --[[सदस्य:Abhinav619|Abhinav619]] ([[सदस्य वार्ता:Abhinav619|वार्ता]]) ०७:०८, १५ अक्टूबर २०१९ (UTC) :अभिनव जी, किताब में तो '''आज''' ही लिखा है और अंग्रेजी में स्पेलिंग गलत हो सकती है लेकिन ये स्पेलिंग की दिक्कत नहीं है। यूनीकोड में गलत कमांड से कई बार ऐसा हो जाता है कि मात्रा साथ में न लगकर अलग दिखती है ( जैसे - डॉ की जगह ड ॉ)। ऐसी बातों को कॉमनसेंस से ठीक करना ही सही रहेगा। हां प्रूफरीडिंग से संबंधित नीतियां अभी बनानी तो हैं ही। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०७:५४, १५ अक्टूबर २०१९ (UTC) :: अजीत जी, कॉमनसेंस वाली बात ठीक है आप कि। अंग्रेजी पर (henry को he-nr-y) जैसे किसी किताब में देखे था तो सोचा लिख देता हूँ। --[[सदस्य:Abhinav619|Abhinav619]] ([[सदस्य वार्ता:Abhinav619|वार्ता]]) ०८:४७, १५ अक्टूबर २०१९ (UTC) ==विकिस्रोत:खाता हेतु निवेदन== @ नमस्ते [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, यूँ तो आप काफी अनुभवी सदस्य हैं किंतु मैं जानना चाहती हूँ कि आपने [[विकिस्रोत:खाता हेतु निवेदन]] पृष्ठ को क्यों मिटाया है, जबकि वह विकिस्रोत पर त्वरित गति से मिटाई जाने वाली पुस्तकों के संबंध में बनाया गया था। यदि पृष्ठ का नाम गलत है तो उसका मात्र नाम भी बदला जा सकता है। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०४:५२, ७ मार्च २०२० (UTC) :{{ping|नीलम}} जी, नमस्ते। विकिस्रोत:शीघ्र हटाएँ अथवा विकिस्रोत:हटाने हेतु नीति के अंतर्गत पृष्ठ बनाए जाने चाहिए थे। उक्त नाम का औचित्य समझ नहीं आया। नाम मिलते जुलते शीर्षक से बदले जाने चाहिए। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०६:२७, ७ मार्च २०२० (UTC) == Indic Wikisource Proofreadthon == {{clear}} ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' <div style="align:center; width:90%;float:left;{{#ifeq:{{#titleparts:{{FULLPAGENAME}}|2}}||background:#F9ED94;|}}border:0.5em solid #000000; padding:1em;"> <div class="plainlinks mw-content-ltr" lang="en" dir="ltr"> [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Hello, As '''[[:m:COVID-19|COVID-19]]''' has forced the Wikimedia communities to stay at home and like many other affiliates, CIS-A2K has decided to suspend all offline activities till 15th September 2020 (or till further notice). I present to you for an online training session for future coming months. The CIS-A2K have conducted a [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon|Online Indic Wikisource Proofreadthon]] to enrich our Indian classic literature in digital format. '''WHAT DO YOU NEED''' * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some classical literature your language. The book should not be available in any third party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Book list|event page book list]]. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Participants|Participants]] section if you wish to participate this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community member, please spread the news to all social media channel, we always try to convince it your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://wscontest.toolforge.org/ Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from 01 May 2020 00.01 to 10 May 2020 23.59 * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic_Wikisource_Proofreadthon/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisources will be present this year at-home lockdown. Thanks for your attention<br/> '''[[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]] १७:४०, १७ अप्रैल २०२० (UTC)'''<br/> ''Wikisource Advisor, CIS-A2K'' </div> </div> {{clear}} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlist&oldid=19991757 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सार्वभौमिक आचार संहिता (यूनिवर्सल कोड ऑफ कंडक्ट) पर आपके महत्वपूर्ण विचार == प्रिय मित्र, [[:m:Universal_Code_of_Conduct/hi|सार्वभौमिक आचार संहिता]] (यूनिवर्सल कोड ऑफ कंडक्ट) जिसका उद्देश्य विकिपीडिया पर ऐसा वातावरण बनाने में मदद करना है जहाँ कोई भी, '''बिना किसी उत्पीड़न अथवा भय के''', सुरक्षित रूप से अपना योगदान दे सके। इस विषय पर विभिन्न समुदाय के सदस्यों से उनके विचार एकत्रित किए जा रहे हैं। चूँकि आप समुदाय के एक '''महत्वपूर्ण सदस्य''' हैं, आपके दिए विचार तथा सुझाव हमारे लिए '''अति महत्वपूर्ण''' है जो की इस सार्वभौमिक आचार संहिता को बनाने में न केवल सहायक होंगे अपितु '''हमारे विकिपीडिया समुदाय का प्रतिनिधित्व''' भी करेंगे। आपके लिए इस आचार संहिता की भाषा और सामग्री को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने, उत्पीड़न मुक्त स्थान बनाने तथा विकी आंदोलन को आगे बढ़ाने में योगदान करने का '''प्रमुख अवसर''' है। '''[https://docs.google.com/forms/u/1/d/e/1FAIpQLSefDi72TbTsVERmsVnfjzHxSs9LE_9NAOarPun5Wv9vpVqabg/viewform?usp=send_form आपकी सुविधा हेतु एक गूगल प्रपत्र]''' (फॉर्म ) (कुछ ही मिनटों में भरने योग्य) भी तैयार किया गया है जिसके भरनेकी '''अंतिम तिथि 25 अप्रेल 2020''' है, इस प्रपत्र को भरकर इस विषय पर अपने विचार/सुझाव देवें इसके अतिरिक्त आप अपने विचार चौपाल, [[:m:User_talk:Suyash_(WMF)|मेरे वार्ता पृष्ठ]], अथवा सीधे ई-मेल (suyash-ctr [at] wikimedia [.] org) के माध्यम से भी दे सकते है, धन्यवाद! ''यह संदेश 'मास-मैसेज' संदेश सुविधा के माध्यम से दिया गया है।'' --[[:m:User:Suyash (WMF)|Suyash (WMF)]], {{<includeonly>subst:</includeonly>#time:l G:i, d F Y||hi}} (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Suyash_(WMF)/WS-lists&oldid=19993086 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Suyash (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ==बधाई== <span style="font-size:14pt">प्रिय {{PAGENAME}}, हिन्दी विकिस्रोत को '''एक लाख''' पुस्तक पृष्ठ के लक्ष्य तक पहुँचाने में योगदान के लिए आपका धन्यवाद। हम आशा करते हैं कि आप इसी तरह हिन्दी विकिस्रोत को अधिक उपयोगी और समृद्ध बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।</span> बधाई हो! [[File:Animated flower.GIF|thumb|left]] --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०४:५४, १३ जुलाई २०२० (UTC) :आपको भी बधाई। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०५:०४, १३ जुलाई २०२० (UTC) == पुस्तक परापूर्ण (transclude) करना == {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} सर [[कर्मभूमि]] पुस्तक को परापूर्ण तो कर दिया गया है पर इसमें कुछ समस्या है। [[कर्मभूमि/पहला भाग 1०| भाग १०]] के बाद [[कर्मभूमि/पहला भाग ११|भाग ११]] में तो कुछ है भी नहीं। सर, कर्मभूमि में कुल ५ इकाई है, जो पुस्तक में भी भाग १-२ करके दिया हुआ है। मेरा विचार है कि इसी आधार पर‌ हम ५ अध्यायों में इसे परापूर्ण करें तो अच्छा रहेगा। अगर आपको उचित लगे तो मैं कर सकता हूँ?-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १२:००, १५ जुलाई २०२० (UTC) ::{{सुनो|रोहित साव27}} जी, आपका कहना सही है कि इस पुस्तक के परापूर्णन में कई समस्याएँ हैं अभी। आप देख सकते हैं कि यह कार्य उस दौर में किया गया है जब पुराने डोमेन से नए डोमेन में विकिस्रोत आया ही था। इसमें दो परापूर्णन के दो अलग-अलग तरीक़ों का इस्तेमाल किया गया है और पब्लिक डोमेन लाइसेंस को भी अद्यतन करने की आवश्यकता है। अगर हम केवल इकाई के आधार पर अध्याय विभाजन करेंगे तब भी संतुलन बिगड़ जाएगा, क्योंकि २५० पृष्ठ की छपाई वाले संस्करण में भी पहला भाग लगभग ९० पृष्ठ का है तो कुछ भाग ३० और ५० पृष्ठों में सीमित हैं। ऐसे में यह तरीक़ा अपनाना उचित नहीं होगा। हमारा ध्यान इस बात पर भी रहना चाहिए कि कोई पुस्तक मोबाइल पर भी आसानी से पढ़ी जा सके। अगर हम ९०-१०० पृष्ठ का एक अध्याय बना देंगे तो उसे पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। मैं इस पर विचार कर रहा हूँ कि कैसे इसे छोटे-छोटे अध्यायों में बाँटकर भी इकाई का ध्यान रखा जा सके। आप फ़िलहाल उसी पुस्तक पर कार्य करें जिसे निर्वाचित होने के लिए नामांकन किया है। उसमें अभी कुछ अशुद्धियाँ छूट गई हैं। आपने वर्तनी अशुद्धियों के साथ ही दो अध्याय बना दिए थे जिन्हें मैंने पुनर्निर्देश छोड़े बिना सही वर्तनी पर स्थानांतरित कर दिया था। आप अपने विवेक के अनुसार कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं जिससे परियोजना को कोई क्षति न पहुँचे। बावजूद इसके आपको यही सलाह दी जाती है कि पहले ध्यानपूर्वक एक काम को पूरा कर लें तभी दूसरे काम में हाथ डालें। एक और बात का ध्यान रखें कि विकि प्रकल्पों पर 'सर/मैम/' कहने की परंपरा नहीं है, इसलिए इससे संबोधन न करें (कम से कम मेरे साथ तो नहीं), जी लगाना भी आपके विवेक और इच्छा पर निर्भर है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:२१, १५ जुलाई २०२० (UTC) {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी ठीक है।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १५:२४, १५ जुलाई २०२० (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}}, इसका परापूर्णन इकाई और भाग को मिलाकर पहले से ही किया गया था। भाग १० के बाद हाइपरलिंक और दो तरह के अंकों की दिक़्क़त थी जो कि अब ठीक हो गई है। कम से कम अब परापूर्णन की समस्या नहीं है, उसके तरीक़े पर विचार किया जा सकता है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:५९, १५ जुलाई २०२० (UTC) :{{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी। एक सहायता और चाहता हूँ, आप [[प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ]] पृष्ठ को हटा दें ताकि मैं [[प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियां]] पृष्ठ को उस पर स्थानांतरित कर पाऊं।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] ०७:४१, १७ जुलाई २०२० (UTC) ::{{सुनो|रोहित साव27}} जी, पृष्ठ हटाने की कोई आवश्यकता नहीं है। आम तौर पर ऐसे मामलों में उचित/लक्ष्य पृष्ठ पर पुनर्निर्देश कर देना ही पर्याप्त है। बाद के अध्याय वाले पन्ने चूँकि बने नहीं है इसलिए उन्हें स्थानांतरित किया जा सकता है। प्राक्कथन को अलग से रखने की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी आप जिसे हटाने को कह रहे हैं, उसका इतिहास पुराना है। ऐसी स्थिति में पुराने इतिहास वाले पृष्ठ को तभी हटाया जाना चाहिए जब वह ग़लत/अशुद्ध हो। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०८:४७, १७ जुलाई २०२० (UTC) {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी ठीक है।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] ०९:१४, १७ जुलाई २०२० (UTC) ==माधवराव सप्रे की कहानियाँ== [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी नमस्ते। मेरा यह अनुरोध है कि आप बताएँ [[पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/१३]] में किए गए संपादन को पूर्ववत क्यों किया गया है? .css में हुए बदलाव के बाद क्या अधूरे वाक्यों को मिलाने के लिए <nowiki><br/></nowiki> साँचे का उपयोग करना पूर्णतः अनुपयोगी है? --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) १७:५०, २२ जुलाई २०२० (UTC) :जी हाँ, यह अनुपयोगी है। इंडेक्स आधारित परापूर्णन वाले साँचे में यह वैसे भी अनुपयोगी था। दूसरे वाले साँचे में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। पूर्ववत करने से पहले कारण बताया था (संबंधित टिप्पणी में टैग करके) और अपने वाले बदलाव करने का संपादन सारांश भी दिया था। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १८:०२, २२ जुलाई २०२० (UTC) ::[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी [[माधवराव सप्रे की कहानियाँ/स्पष्टीकरण के दो शब्द]] पृष्ठ पर अगले अध्याय को जोड़ने में शायद ग़लती हुई है। अगला अध्याय [[माधवराव सप्रे की कहानियाँ/अन्तर्भाष्य-समीक्षा|अन्तर्भाष्य-समीक्षा]] होना चाहिए जबकि पृष्ठ पर अगला अध्याय [[माधवराव सप्रे की कहानियाँ/अपनी बात|अपनी बात]] दिया हुआ है।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १०:१८, ३० जुलाई २०२० (UTC) :ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद। कड़ी सुधार दी गयी है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १०:२७, ३० जुलाई २०२० (UTC) ==लॉगिन समस्या== [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी मेरे एक मित्र के लॉगिन करने में समस्या आ रही है। बार बार यह "ऐसा प्रतीत होता है कि आपके लॉगिन सत्र के साथ कोई समस्या है। सत्र अपहरण से बचाने के लिए सावधानी के तौर पर आपका यह क्रियाकलाप रद्द कर दिया गया है। कृपया प्रपत्र दोबारा जमा करें" दिखा रहा है। पासवर्ड बदलने का भी प्रयास किया गया पर कुछ नहीं हुआ। चूंकि वह अपना खाता नहीं खोल पा रही इसलिए वह पूछ भी नहीं पा रही। कृपया सहायता करें।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १२:०९, २४ जुलाई २०२० (UTC) :सुरक्षा कारणों से ऐसा सामान्यतः होता है बीच-बीच में। कई बार स्वतः सत्र लॉगआउट भी हो जाता है। इस संदेश से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। ऐसे में ध्यान से सदस्यनाम और पासवर्ड भरकर सामान्य सुरक्षा निर्देशों का पालन करते जाना चाहिए। पासवर्ड बदलने का प्रयास भी किया जा सकता है यदि पासवर्ड ग़लत बताया जाय। कुछ देर बाद प्रयास करने से लॉगिन हो जाना चाहिए। अधिक दिक़्क़त हो तो आप 1997kB जी से संपर्क कीजिए। वे ग्लोबल सदस्य खातों से संबंधित कार्य देखते हैं। वे आपको उचित सहायता प्रदान कर सकते हैं। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:११, २४ जुलाई २०२० (UTC) :जी धन्यवाद 2-3 दिन से ऐसा ही हो रहा था तो थोड़ी चिंता हो रही थी। अंत में Fire Fox ब्राउज़र डाउनलोड करके खोलने पर खाता खुल गया किन्तु Chrome में अभी भी नहीं खुल रहा। शायद दो तीन दिन में Chrome में भी समस्या स्वतः हल हो जाए। आपका बहुत बहुत धन्यवाद :-)-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १६:५३, २४ जुलाई २०२० (UTC) ::कैश (cache) क्लीन करने से क्रोम में भी हो जाएगा। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:४२, २४ जुलाई २०२० (UTC) ==पृष्ठ प्रगति स्तर परिवर्तन में सावधानी== [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, कृप्या [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:प्रसाद_वाङ्मय_रचनावली_खंड_2.djvu/७२४&diff=412618&oldid=412416 इसे] देखें और अन्य सदस्यों की अपेक्षा रंग परिवर्तन के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतें। --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०९:३१, २८ अगस्त २०२० (UTC) == कोड के संदर्भ में == {{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}} जी मैं [[भारत का संविधान/भाग १७ राजभाषा]] को शोधित करना चाहता हूँ किन्तु इसके पृष्ठ पर दाएँ और बाएँ ओर कुछ लिखा है जैसे [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8_(%E0%A5%A7%E0%A5%AF%E0%A5%AB%E0%A5%AD).djvu/%E0%A5%A8%E0%A5%AF%E0%A5%AF इस] पृष्ठ पर दाएँ ओर "संघ की राजभाषा" लिखा है। इन्हें मैं किस कोड का प्रयोग करके शोधित करूं यह समझ नहीं पा रहा हूँ।---[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १०:४१, ८ सितम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}}, इसके लिए <nowiki>{{overfloat right/left|depth=em(जितना मुख्य पन्ने से दूर रखना हो)|पाठ(जिसे मुख्य पन्ने से अलग दिखना हो)}}</nowiki> प्रयोग करें। अगर कोई दिक्कत होगी तो मैं एक पन्ना कर दूँगा। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १२:२६, ८ सितम्बर २०२० (UTC) ::{{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}} जी मैंने [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8_(%E0%A5%A7%E0%A5%AF%E0%A5%AB%E0%A5%AD).djvu/%E0%A5%A8%E0%A5%AF%E0%A5%AE कोशिश] की पर शायद इससे अच्छा किया जा सकता है। आप उदाहरण स्वरूप एक कर दें तो अच्छा रहेगा।---[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] २२:३२, ८ सितम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}} [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:भारत_का_संविधान_(१९५७).djvu/२९९&action=submit इसे] देखिए। सहेजने के बाद पन्ने पर दाहिनी तरफ का ओवरफ्लोट पाठ नहीं दिखाई देगा क्योंकि स्कैन पन्ना आड़े आ रहा है। हालांकि जब आप संपादन झलक देखेंगे तो अंतर साफ दिखेगा और सबसे जरूर बात यह है कि अंतिम परिणाम के रूप में ट्रांस्क्लूडेड पन्ने को ध्यान में रखिए। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०७:५२, ९ सितम्बर २०२० (UTC) ::जी धन्यवाद:-)---[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] २२:१७, ९ सितम्बर २०२० (UTC) == शोधित पृष्ठों का परापूर्णन पूर्ण == प्रिय अजीत जी, [[भ्रमरगीत-सार]] के शोधित पृष्ठों का परापूर्णन पूर्ण हो चुका है। इसके १७२ के बाद के पृष्ठ शोधित नहीं हैं। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २२:४९, १२ सितम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|अनिरुद्ध कुमार}} कार्य पुनः प्रगति पर है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:४९, १३ सितम्बर २०२० (UTC) {{clear}} == Indic Wikisource Proofreadthon II == {{clear}} ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' <div style="align:center; width:90%;float:left;{{#ifeq:{{#titleparts:{{FULLPAGENAME}}|2}}||background:#F9ED94;|}}border:0.5em solid #000000; padding:1em;"> <div class="plainlinks mw-content-ltr" lang="en" dir="ltr"> [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Hello Proofreader, After successfull first [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon|Online Indic Wikisource Proofreadthon]] hosted and organised by CIS-A2K in May 2020, again we are planning to conduct one more [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020|Indic Wikisource Proofreadthon II]].I would request to you, please submit your opinion about the dates of contest and help us to fix the dates. Please vote for your choice below. {{Clickable button 2|Click here to Submit Your Vote|class=mw-ui-progressive|url=https://strawpoll.com/jf8p2sf79}} '''Last date of submit of your vote on 24th September 2020, 11:59 PM''' I really hope many Indic Wikisource proofreader will be present this time. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Advisor, CIS-A2K <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlistSept2020-A&oldid=20459409 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> </div> </div> {{clear}} == Indic Wikisource Proofreadthon II == {{clear}} ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' <div style="align:center; width:90%;float:left;{{#ifeq:{{#titleparts:{{FULLPAGENAME}}|2}}||background:#F9ED94;|}}border:0.5em solid #000000; padding:1em;"> <div class="plainlinks mw-content-ltr" lang="en" dir="ltr"> [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] [[File:Indic Wikisource Proofreadthon 2020 Poll result with Valid Vote.svg|frameless|right|125px|Valid Vote share]] Hello Proofreader, Thank you for participating at [https://strawpoll.com/jf8p2sf79/r Pool] for date selection. But Unfortunately out of 130 votes [[:File:Indic Wikisource Proofreadthon 2020 - with Valid Vote.png|69 vote is invalid]] due to the below reason either the User ID was invalid or User contribution at Page: namespace less than 200. {| class="wikitable" ! Dates slot !! Valid Vote !! % |- | 1 Oct - 15 Oct 2020 || 26 || 34.21% |- | 16 Oct - 31 Oct 2020 || 8 || 10.53% |- | 1 Nov - 15 Nov 2020 || 30 || 39.47% |- | 16 Nov - 30 Nov 2020 || 12 || 15.79% |} After 61 valid votes counted, the majority vote sharing for 1st November to 15 November 2020. So we have decided to conduct the contest from '''1st November to 15 November 2020'''.<br/> '''WHAT DO YOU NEED''' * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some books in your language. The book should not be available in any third party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Book list|event page book list]]. Before adding the books, please check the pagination order and other stuff are ok in all respect. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants|Participants]] section if you wish to participate this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince it your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' This time we have decided to give the award up to 10 participants in each language group. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://wscontest.toolforge.org/ Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from '''01 November 2020 00.01 to 15 November 2020 23.59''' * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic_Wikisource_Proofreadthon 2020/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisource proofread will be present in this contest too. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Advisor, CIS-A2K </div> </div> {{clear}} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlistSept2020-A&oldid=20459409 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Regarding protection of a page in Page-Namespace == {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} Ji, I want you to remove protection from a [[Page:भारतवर्ष का इतिहास.djvu/५|page]]. For the future, I want to suggest you not to change the protections of Page-Namespace pages. This seems no point to me to protect pages in that namespace because Wikisource is a free library that anyone can edit. Thank you-[[सदस्य:Benipal hardarshan|Benipal hardarshan]] ([[सदस्य वार्ता:Benipal hardarshan|वार्ता]]) ०७:०५, १९ अक्टूबर २०२० (UTC) == Indic Wikisource Proofreadthon II 2020 - Collect your book == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |- |[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}}, Thank you and congratulation to you for your participation and support of our 1st Proofreadthon.The CIS-A2K has conducted again 2nd [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020|Online Indic Wikisource Proofreadthon 2020 II]] to enrich our Indian classic literature in digital format in this festive season. '''WHAT DO YOU NEED''' * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some book your language. The book should not be available on any third party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Book list|event page book list]]. You should follow the copyright guideline describes [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Book list|here]]. After finding the book, you should check the pages of the book and create Pagelist. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants|Participants]] section if you wish to participate this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince it your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://indic-wscontest.toolforge.org/ Indic Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from 01 Nov 2020 00.01 to 15 Nov 2020 23.59 * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic_Wikisource_Proofreadthon 2020/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisources will be present this year at-home lockdown. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K |} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlistOct2020&oldid=20484797 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == संपादन पूर्ववर्त करने हेतु == @ नमस्ते {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी, मैं जानना चाहती हूं कि आपने मेरे उपयोगितावाद पुस्तक में लिए हुए संपादन को पूर्ववर्त क्यों किया। मुझे समझ नहीं आ रहा, जब पृष्ठ में कोई वर्तनी गलत नहीं थी तो मेरी गलती क्या थी। कृपया मुझे मेरी गलती बताइए। --[[सदस्य: अम्बिका साव|<span style="text-shadow: yellow 3px 3px 2px;color: green">'''अम्बिका साव'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: अम्बिका साव|<span style="text-shadow: yellow 3px 3px 2px;color: green">(📋🖊️)</span>]] २०:०५, ३ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|अम्बिका साव}} अपने वार्ता पृष्ठ पर उत्तर देखें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:१४, ४ नवम्बर २०२० (UTC) == Templates == सुप्रभात अजीत जी, क्या आप [https://en.wikisource.org/wiki/Template:Hyphenated_word_start hws] तथा [https://en.wikisource.org/wiki/Template:Hyphenated_word_end hwe] टेम्पलेट को यहां इंपोर्ट कर सकते है। [[सदस्य:1997kB|1997kB]] ([[सदस्य वार्ता:1997kB|वार्ता]]) ०३:५६, ५ नवम्बर २०२० (UTC) : जी हाँ, कर देता हूँ। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०४:३३, ५ नवम्बर २०२० (UTC) ::धन्यवाद। [[सदस्य:1997kB|1997kB]] ([[सदस्य वार्ता:1997kB|वार्ता]]) ०५:००, ५ नवम्बर २०२० (UTC) == प्रतिभागी सहयोग == {{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}}: सर, मैं भारतेंदु नाटकावली पुस्तक पर कार्यरत हूँ परन्तु प्रूफरीड के समय साँचो से सम्बन्धित परेशानी हो रही है। मैं जिन साँचो से अवगत हूँ उसका प्रयोग कर रही हूँ। साँचा ग़लत होने पर अंक क्या नहीं मिलेंगे।-[[सदस्य:Manisha yadav12|मनिषा यादव]] ([[सदस्य वार्ता:Manisha yadav12|वार्ता]]) १०:३८, ७ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|Manisha yadav12}} उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर देखें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:०६, ७ नवम्बर २०२० (UTC) {{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}} : सर, मैं साफ़ माथे का समाज पुस्तक पर कार्य कर सकती हूँ।-[[सदस्य:Manisha yadav12|मनिषा यादव]] ([[सदस्य वार्ता:Manisha yadav12|वार्ता]]) ०५:३१, ११ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|Manisha yadav12}} अपने वार्ता पृष्ठ पर उत्तर प्राप्त करें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०५:३९, ११ नवम्बर २०२० (UTC) {{Ping|अजीत कुमार तिवारी}}:सर, एक सहायता चाहिए,[[विषयसूची:राजा और प्रजा.pdf|राजा और प्रजा]] में पन्ने के ऊपरी भाग में कौन सा नियम लगेगा। सर rh इस साँचे का प्रयोग करने से गलती हो रही है शायद। -- <small>यह अहस्ताक्षरित संदेश [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] द्वारा लिखा गया है।</small> :{{सुनो|अमृता कुमारी पाण्डेय}} उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर प्राप्त करें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १६:४३, ११ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}}:सर, मैंने जिस पुस्तक का चयन‌किया है उस पुस्तक के कुछ पन्ने अधूरे छपे हुए एवं उसको शोधित करने में दिक्कत हो रही है सर आपकी मदद चाहिए।--[[सदस्य:Manisha yadav12|मनिषा यादव]] ([[सदस्य वार्ता:Manisha yadav12|वार्ता]]) ::{{सुनो|Manisha yadav12}}, जिन पन्नों की छपाई ग़लत है उन्हें आप फ़िलहाल छोड़ सकती हैं। मूल किताब देखकर उनको शोधित कर लिया जाएगा। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १२:३७, १६ अगस्त २०२१ (UTC) == Thank you for your participation and support == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |- |[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}},<br/> Greetings!<br/> It has been 15 days since Indic Wikisource Proofreadthon 2020 online proofreading contest has started and all 12 communities have been performing extremely well. <br/> However, the 15 days contest comes to end on today, '''15 November 2020 at 11.59 PM IST'''. We thank you for your contribution tirelessly for the last 15 days and we wish you continue the same in future events!<br/> *See more stats at https://indic-wscontest.toolforge.org/contest/ Apart from this contest end date, we will declare the final result on '''20th November 2020'''. We are requesting you, please re-check your contribution once again. This extra-time will be for re-checking the whole contest for admin/reviewer. The contest admin/reviewer has a right revert any proofread/validation as per your language community standard. We accept and respect different language community and their different community proofreading standards. Each Indic Wikisource language community user (including admins or sysops) have the responsibility to maintain their quality of proofreading what they have set. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K |} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Proofreadthon_2020/All-Participants&oldid=20666529 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == टिप्पणी के लिए अनुरोध-प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता == नमस्ते दोस्तो, मैंने [[Indic Wikisource Community/Requests for comment/Indic Wikisource Proofreadthon|यहां चर्चा और सलाह के लिए]] अनुरोध शुरू किया है। पिछले साल हमने दो प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता आयोजित की थी। भारतीय भाषा विकीसोर्स के भविष्य के विजन को सेट करने के लिए आपकी प्रतिक्रिया और टिप्पणियों की बहुत आवश्यकता है। चर्चा करने के लिए अंग्रेजी एक आम भाषा हो सकती है, पर अगर आप अपनी मूल भाषा में लिखना चाहते है तो आपका स्वागत है। इंडिक विकिसोर्स कम्युनिटी की ओर से जयंता नाथ १०:४७, २३ जनवरी २०२१ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=20964662 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == टिप्पणी के लिए अनुरोध-प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता == नमस्ते दोस्तो, मैंने [[:m:Indic Wikisource Community/Requests for comment/Indic Wikisource Proofreadthon|यहां चर्चा और सलाह के लिए]] अनुरोध शुरू किया है। पिछले साल हमने दो प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता आयोजित की थी। भारतीय भाषा विकीसोर्स के भविष्य के विजन को सेट करने के लिए आपकी प्रतिक्रिया और टिप्पणियों की बहुत आवश्यकता है। चर्चा करने के लिए अंग्रेजी एक आम भाषा हो सकती है, पर अगर आप अपनी मूल भाषा में लिखना चाहते है तो आपका स्वागत है। इंडिक विकिसोर्स कम्युनिटी की ओर से जयंता नाथ ११:०४, २३ जनवरी २०२१ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=20964662 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Requests for comments : Indic wikisource community 2021 == (Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it)<br> Dear Wiki-librarian,<br> Coming two years CIS-A2K will focus on the Indic languages Wikisource project. To design the programs based on the needs of the community and volunteers, we invite your valuable suggestions/opinion and thoughts to [[:m:Indic Wikisource Community/Requests for comment/Needs assessment 2021|Requests for comments]]. We would like to improve our working continuously taking into consideration the responses/feedback about the events conducted previously. We request you to go through the various sections in the RfC and respond. Your response will help us to decide to plan accordingly your needs.<br> Please write in detail, and avoid brief comments without explanations.<br> Jayanta Nath<br> On behalf<br> Centre for Internet & Society's Access to Knowledge Programme (CIS-A2K) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=20964662 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == मदद == मुझे और मेरे कुछ साथियोंं को हिंदी विकिस्रोत की संपादन तकनीक और उपयोग की जानकारी लेनी है। आप अगर मदद करने की स्थिति में हैं, तो मुझसे संपर्क कर लें। धन्यवाद। [[सदस्य:Mulkh Singh|Mulkh Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Mulkh Singh|वार्ता]]) ११:४९, २७ मई २०२१ (UTC) :संपादन तकनीक और उपयोग के मामले में हिंदी विकिस्रोत अन्य विकिस्रोत की तरह ही है। आप और आपके साथी हिंदी टाइप कर लेते हैं तो किसी किताब पर संपादन आरंभ करें। कोई समस्या होगी तो यथासंभव सहायता की जाएगी। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:४६, २७ मई २०२१ (UTC) == इंडिक विकिसोर्स प्रूफ्रेडथॉन अगस्त २०२१ == प्यारे संपादकों, पिछले साल प्रूफरीडथॉन में आपकी भागीदारी और समर्थन के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। CIS-A2K ने इस साल फिर से ऑनलाइन [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021|इंडिक विकिसोर्स प्रूफरीडथॉन अगस्त 2021]] का आयोजन किया है ताकि इस भारतीय स्वतंत्रता के सीजन में हमारे भारतीय क्लासिक साहित्य को डिजिटल प्रारूप में समृद्ध किया जा सके। '''आपको किस चीज़ की जरूरत है; ''' '''बुकलिस्ट:''' प्रूफरीड की जाने वाली किताबों के संग्रह दी ज़रूरत। कृपया अपनी भाषा में कोई पुस्तक खोजने में हमारी सहायता करें। पुस्तक किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट पर यूनिकोड स्वरूपित पाठ के साथ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। कृपया पुस्तकें एकत्र करें और हमारे इवेंट की [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Book list|पृष्ठ पुस्तक सूची]] में जोड़ें। आपको यहां बताए गए कॉपीराइट दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। पुस्तक खोजने के बाद, आपको पुस्तक के पृष्ठों की जांच करनी चाहिए और <पेजलिस्ट/> बनाना चाहिए। '''प्रतिभागी:''' यदि आप इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो कृपया प्रतिभागी अनुभाग में अपने नाम पर [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Participants|हस्ताक्षर]] करें। '''समीक्षक:''' कृपया इस प्रूफरीडथॉन के [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Participants#Administrator/Reviewer|व्यवस्थापक/समीक्षक]] के रूप में स्वयं को बढ़ावा दें और अपना प्रस्ताव यहां जोड़ें। व्यवस्थापक/समीक्षक इस प्रूफरीडथॉन में भाग ले सकते हैं। '''मीडिया कवरेज:''' हम सभी इंडिक विकिसोर्स समुदाय के सदस्यों से अनुरोध करते हैं, कृपया सभी सोशल मीडिया चैनलों में जानकारी पहुंचाइए, हम हमेशा आपके विकिपीडिया/विकिसोर्स को साइटनोटिस का उपयोग करने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। बेशक, आपको अपने स्वयं के विकिसोर्स साइटनोटिस का भी उपयोग करना चाहिए। कुछ पुरस्कार: CIS-A2K द्वारा कुछ पुरस्कार दिए जा सकते हैं। मान्य और प्रूफरीड पृष्ठों की गणना करने का एक तरीका:इंडिक विकिसोर्स कॉन्टेस्ट टूल्स <https://indic-wscontest.toolforge.org/> '''समय :''' 15 अगस्त 2021 से 00.01 से 31 अगस्त 2021 तक 23.59 (IST) '''नियम और दिशानिर्देश:''' मूल नियम और [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Rules|दिशानिर्देश]] यहां वर्णित हैं। '''स्कोरिंग:''' विवरण [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Rules#Scoring_system|स्कोरिंग]] विधि का वर्णन यहां किया गया है। हम आशा करता हूं कि इस वर्ष लॉकडाउन में कई भारतीय विकी स्रोत शामिल। होंगे। आप के प्रति वफादार जयंत नाथ <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सहायता == जैसा की आपने बताया की "प्रारूप अनुसार प्रूफरीड स्तर सही नहीं", यहाँ पर 'प्रूफरीड' का क्या मतलब है? इसे किस प्रकार ठीक किया जा सकता है? क्या आप मुझे एक उदाहरण दे सकते हैं? और मुझे ये भी बताये की शोधित किया गया पृष्ठ मूल पृष्ठ के पूर्ण रूप से समान लगना चाहिए या भाषा त्रुटि को सही करने के लिए थोड़ा बदलाव किया जा सकता है? [[सदस्य:Dineshswamiin|Dineshswamiin]] ([[सदस्य वार्ता:Dineshswamiin|वार्ता]]) ०९:४१, २१ अगस्त २०२१ (UTC) :{{सुनो|Dineshswamiin}} जी, उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर प्राप्त करें। धन्यवाद। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १४:०६, २१ अगस्त २०२१ (UTC) == अशोधित (चिह्नित) करने के संबंद्ध में == अजीत जी नमस्ते। आपने हाल ही में मेरे शोधित पृष्ठों को अशोधित किया है परन्तु कारण मुझे समझ नहीं आया। क्या gap कोड के प्रयोग करने के कारण ऐसा किया गया है? अगर ऐसा है तो आप मुझे सूचित कर देते मैं अपने पृष्ठों को सुधार देता। क्या कोई अन्य कारण है तो वह भी बताएँ।--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १७:१०, २५ अगस्त २०२१ (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}} जी, आप संपादन का इतिहास देखकर पता कर सकते हैं कि क्या सुधार किया गया है। पुनरीक्षण के दौरान आपके प्रत्येक पृष्ठ में स्वीकार्य स्तर से अधिक की ग़लतियाँ मिल रही हैं। केवल <nowiki>{{Gap}}</nowiki> की गलती नहीं है। आप संपादन का इतिहास न देख पा रहे हों तो [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ%3Aचन्द्रगुप्त_मौर्य्य.pdf%2F१८&type=revision&diff=492587&oldid=489914 इसे] देखें। आपको आरंभ में ही सूचित किया गया था, साथ ही आपको २४ घंटे से अधिक का समय भी दिया गया। चूंकि आप औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त सदस्य हैं इसलिए आपको हर छोटी-छोटी बात के लिए टोका नहीं जाएगा। आगे भी पन्नों को शोधित करते हुए सावधानी बरतें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:२१, २५ अगस्त २०२१ (UTC) ::जी बताने के लिए शुक्रिया। मैं अनुस्वार का प्रयोग कई जगह पर इसलिए नहीं कर रहा था क्योंकि स्रोत पाठ में भी अनुस्वार नहीं दिख रहें थें, इसलिए स्रोत पाठ से भिन्न ना हो जाए सम्पादन पृष्ठ इसलिए उनका प्रयोग करने से हिचक रहा था। इसे तर्क ना समझिएगा क्योंकि मैं मुझे अपनी गलती स्वीकार है।--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १७:३९, २५ अगस्त २०२१ (UTC) :::कृपया एक प्रश्न का उत्तर और दे दें कि क्या इन पृष्ठों को सुधार कर मैं दोबारा शोधित कर सकता हूँ? कोई समस्या तो नहीं होगी?--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १७:४७, २५ अगस्त २०२१ (UTC) ::::{{सुनो|रोहित साव27}} जी, सुधारने के बाद आप उन पन्नों को पुनः शोधित कर सकते हैं, इसमें कोई समस्या नहीं है। हालाँकि इन पन्नों में केवल अनुस्वार और अनुनासिक की ग़लतियाँ ही नहीं हैं। आप अभी तक लाघव चिह्न और शून्य के बीच भी अंतर नहीं कर पा रहे हैं। वर्तनियों की अशुद्धियाँ भी पर्याप्त मात्रा में हुई हैं। जब आप स्वयं संपादन सारांश ('कोड लगाना बाकि है') में 'बाकी' को बार-बार 'बाकि' लिख रहे थे तो वर्तनी अशुद्धि के लिए ख़राब स्कैन का तर्क वैसे भी बेमानी हो गया। ख़ैर, आपने मेहनत की है इसलिए तीन-चार संशोधनों के बाद मैंने पुनः शोधित करना बंद कर दिया ताकि आप चाहें तो उन्हें सुधार कर दुबारा शोधित कर सकें। ध्यान रहे कि ग़लतियाँ छूट गईं तो पन्नों की शोधित स्थिति फिर से बदल दी जाएगी। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०४:३१, २६ अगस्त २०२१ (UTC) ::जी धन्यावाद। कृपया इन पृष्ठों को देखें [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8D%E0%A4%AF.pdf/%E0%A5%AB%E0%A5%AF १] [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8D%E0%A4%AF.pdf/%E0%A5%AC%E0%A5%A8 २] [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8D%E0%A4%AF.pdf/%E0%A5%AC%E0%A5%A6 ३] क्या अब इन्हें शोधित स्तर पर लाया जा सकता है?--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> ०४:४५, २६ अगस्त २०२१ (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}} जी, मुझे जितना संकेत करना था कर चुका, अब 'अथ से आरंभ' की अपेक्षा न रखें। आप अपने विवेक से जो करना चाहें कर सकते हैं। मैं पुनरीक्षण करके बता दूँगा कि वह सही है अथवा नहीं। अभी मैंने आपके द्वारा पुनः संशोधित दो पन्नों को 'अशोधित चिह्नित' किया है तथा एक में सुधार भी किया है। आप इस बात का भी ध्यान रखें कि मैंने आपके द्वारा 'शोधित चिह्नित' पन्नों को 'अशोधित चिह्नित' किया है न कि 'शोधित' को 'अशोधित'। आपके शीर्षक से ऐसा लग रहा था कि जैसे मैंने आपके शोधित कार्य को बिगाड़कर अशोधित कर दिया। यही कारण है कि मैंने कोष्ठक में चिह्नित जोड़ दिया ताकि संवाद के विषय की स्पष्टता बनी रहे। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ११:५६, २६ अगस्त २०२१ (UTC) ::जी ठीक है। परन्तु आप '''dhr''' कोड का प्रयोग कब और क्यों करते है, यह बता सकते हैं? मुझे इसके सम्बन्ध में अभी कोई जानकारी नहीं है।--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १२:१०, २६ अगस्त २०२१ (UTC) :::<nowiki>{{dhr}}</nowiki> कोड नहीं साँचा है, जिसके बारे में आप [https://hi.wikisource.org/wiki/साँचा:Dhr यहाँ] पढ़ सकते हैं। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १२:४३, २६ अगस्त २०२१ (UTC) == विकिमीडिया फाउंडेशन के वर्ष 2021 के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चुनावों में मतदान करना भूलिएगा नही == आपका अजीत कुमार तिवारी, यह संदेश आपको इसलिए भेजा जा रहा है क्योंकि आप विकिमीडिया फाउंडेशन के वर्ष 2021 के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चुनावों में मतदान करने के योग्य हैं। इस बार चुनाव 18 अगस्त, 2021 को शुरू होंगे और 31 अगस्त, 2021 को बंद होंगे। विकिमीडिया फाउंडेशन, हिन्दी विकिस्रोत जैसी परियोजनाओं का संचालन करता है और इसके संचालन की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के हाथों में है। बोर्ड विकिमीडिया फाउंडेशन का निर्णय लेने वाला निकाय है। [[:m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Overview|बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के बारे में अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें]]। इस साल कम्युनिटी के वोटों के आधार पर चार सीटों का चयन किया जाएगा। इन सीटों के लिए दुनिया भर से 19 उम्मीदवार मैदान में हैं। [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Candidates#Candidate_Table|बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के वर्ष 2021 के उम्मीदवारों के बारे में अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें]]। कम्युनिटी के लगभग 70,000 सदस्यों को मतदान के लिए आमंत्रण दिया गया है। जिसमें आप भी शामिल हैं! मतदान केवल 31 अगस्त 23:59 UTC तक जारी रहेगी। *[[:hi:Special:SecurePoll/vote/Wikimedia_Foundation_Board_Elections_2021|'''हिन्दी विकिस्रोत के सुरक्षित निर्वाचन पर जाकर मतदान करें''']]। अगर आप पहले ही मतदान कर चुके हैं, तो मतदान करने के लिए धन्यवाद और कृपया इस ई-मेल को नज़रअंदाज़ करें। लोग केवल एक बार वोट कर सकते हैं, भले ही उनके पास कितने भी अकाउंट हों। [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021|इस चुनाव के बारे में अधिक जानकारी यहां से पढ़ें]]। [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ११:२८, २६ अगस्त २०२१ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:KCVelaga_(WMF)/Targets/Temp&oldid=21937902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ==सूचना== नमस्कार। ‎बिपिन बिहारी साव २३ अंतिम अपडेट में बारहवें स्थान पर रहे हैं इसलिए उनके लिए बीस पृष्ठ छोड़कर मैं उनके द्वारा चयनित पुस्तक पर शोधन कर रही हूँ। --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ००:०९, ३१ अगस्त २०२१ (UTC) :उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर प्राप्त करें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ००:३४, ३१ अगस्त २०२१ (UTC) == Thank you for your participation and support == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |- |[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}},<br/> Greetings!<br/> the results of the [[:meta:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Result|Indic Wikisource Proofreadthon August 2021]] have been published. All 10 communities have been performing extremely well. Thank you for your work as a reviewer, as we know that how painful it was. <br/> To send the honour a gift to you, [[:meta:CIS-A2K|The Centre for Internet & Society (CIS-A2K)]] will need to fill out the required information in this [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfohOv0mI4AijwPre73IyEC9hZ3-GWibfxj4Zo9gK6hW6siWg/viewform Google form] to send the [[:meta:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Prize|contest awards]] to your address. We assure you that this information will be kept completely [https://wikimediafoundation.org/wiki/Privacy_policy confidential]. Thanks <br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]] १५:३३, २५ सितम्बर २०२१ (UTC)<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K |} == How we will see unregistered users == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <section begin=content/> Hi! You get this message because you are an admin on a Wikimedia wiki. When someone edits a Wikimedia wiki without being logged in today, we show their IP address. As you may already know, we will not be able to do this in the future. This is a decision by the Wikimedia Foundation Legal department, because norms and regulations for privacy online have changed. Instead of the IP we will show a masked identity. You as an admin '''will still be able to access the IP'''. There will also be a new user right for those who need to see the full IPs of unregistered users to fight vandalism, harassment and spam without being admins. Patrollers will also see part of the IP even without this user right. We are also working on [[m:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation/Improving tools|better tools]] to help. If you have not seen it before, you can [[m:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation|read more on Meta]]. If you want to make sure you don’t miss technical changes on the Wikimedia wikis, you can [[m:Global message delivery/Targets/Tech ambassadors|subscribe]] to [[m:Tech/News|the weekly technical newsletter]]. We have [[m:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation#IP Masking Implementation Approaches (FAQ)|two suggested ways]] this identity could work. '''We would appreciate your feedback''' on which way you think would work best for you and your wiki, now and in the future. You can [[m:Talk:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation|let us know on the talk page]]. You can write in your language. The suggestions were posted in October and we will decide after 17 January. Thank you. /[[m:User:Johan (WMF)|Johan (WMF)]]<section end=content/> </div> १८:१५, ४ जनवरी २०२२ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Johan_(WMF)/Target_lists/Admins2022(4)&oldid=22532508 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Johan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == इंडिक विकिसोर्स प्रूफ्रेडथॉन मार्च २०२२ == प्यारे संपादकों, पिछले साल प्रूफरीडथॉन में आपकी भागीदारी और समर्थन के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। CIS-A2K ने इस साल फिर से ऑनलाइन [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022|इंडिक विकिसोर्स प्रूफरीडथॉन मार्च 2022]] का आयोजन किया है ताकि इस भारतीय स्वतंत्रता के सीजन में हमारे भारतीय क्लासिक साहित्य को डिजिटल प्रारूप में समृद्ध किया जा सके। '''आपको किस चीज़ की जरूरत है; ''' '''बुकलिस्ट:''' प्रूफरीड की जाने वाली किताबों के संग्रह दी ज़रूरत। कृपया अपनी भाषा में कोई पुस्तक खोजने में हमारी सहायता करें। पुस्तक किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट पर यूनिकोड स्वरूपित पाठ के साथ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। कृपया पुस्तकें एकत्र करें और हमारे इवेंट की [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Book list|पृष्ठ पुस्तक सूची]] में जोड़ें। आपको यहां बताए गए कॉपीराइट दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। पुस्तक खोजने के बाद, आपको पुस्तक के पृष्ठों की जांच करनी चाहिए और <पेजलिस्ट/> बनाना चाहिए। '''प्रतिभागी:''' यदि आप इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो कृपया प्रतिभागी अनुभाग में अपने नाम पर [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Participants|हस्ताक्षर]] करें। '''समीक्षक:''' कृपया इस प्रूफरीडथॉन के [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Participants#Administrator/Reviewer|व्यवस्थापक/समीक्षक]] के रूप में स्वयं को बढ़ावा दें और अपना प्रस्ताव यहां जोड़ें। व्यवस्थापक/समीक्षक इस प्रूफरीडथॉन में भाग ले सकते हैं। '''मीडिया कवरेज:''' हम सभी इंडिक विकिसोर्स समुदाय के सदस्यों से अनुरोध करते हैं, कृपया सभी सोशल मीडिया चैनलों में जानकारी पहुंचाइए, हम हमेशा आपके विकिपीडिया/विकिसोर्स को साइटनोटिस का उपयोग करने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। बेशक, आपको अपने स्वयं के विकिसोर्स साइटनोटिस का भी उपयोग करना चाहिए। कुछ पुरस्कार: CIS-A2K द्वारा कुछ पुरस्कार दिए जा सकते हैं। मान्य और प्रूफरीड पृष्ठों की गणना करने का एक तरीका: [https://indic-wscontest.toolforge.org/ इंडिक विकिसोर्स कॉन्टेस्ट टूल्स] '''समय :''' 01 मार्च 2022 से 00.01 से 16 मार्च 2022 तक 23.59 (IST) '''नियम और दिशानिर्देश:''' मूल नियम और [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Rules|दिशानिर्देश]] यहां वर्णित हैं। '''स्कोरिंग:''' विवरण [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Rules#Scoring_system|स्कोरिंग]] विधि का वर्णन यहां किया गया है। हम आशा करता हूं कि इस वर्ष लॉकडाउन में कई भारतीय विकी स्रोत शामिल। होंगे। आप के प्रति वफादार जयंत नाथ. १७:५४, १० फ़रवरी २०२२ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ==[https://hi.m.wikipedia.org/wiki/जमुना_किनारे]== {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} कृपया उपर्युक्त पृष्ठ को प्रबंधक स्तर तक सुरक्षित करने की कृपा करें। [https://hi.m.wikipedia.org/wiki/स:जैस_चौधरी] ने नया खाता बना लिया है। वह उत्पात कर सकता है। [[विशेष:योगदान/117.225.11.39|117.225.11.39]] ०५:२९, १ मई २०२२ (UTC) == चांदी की डिबिया == {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} आपने आज मेरे द्वारा कुछ 'प्रमाणित' पृष्ठों को 'शोधित' में परिवर्तित किया। क्या आप कारण समझा सकते हैं ताकि मैं भूल सुधार सकूं? [[सदस्य:Seomelono|Seomelono]] ([[सदस्य वार्ता:Seomelono|वार्ता]]) १८:२४, ६ अगस्त २०२२ (UTC) :{{सुनिए|Seomelono}} जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ%3Aचाँदी_की_डिबिया.djvu%2F१०४&type=revision&diff=517531&oldid=517509 इसे] देखें। प्रारूप और वर्तनी के कारण आपके प्रमाणित संपादन पूर्ववत कर दिए गए थे। आपके लिए सुझाव है कि कोई भी पृष्ठ प्रमाणित न करें। यदि वर्तनी संपादन करें तो केवल शोधित ही चिह्नित करें ताकि उसमें सुधार किया जा सके। धन्यवाद। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १८:३०, ८ अगस्त २०२२ (UTC) == Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022 == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translate it'' [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}},<br> Thank you and congratulation to you for your participation and support last year. The CIS-A2K has been conducted again this year [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022|Online Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022]] to enrich our Indian classic literature in digital format. <u>'''WHAT DO YOU NEED'''</u> * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some books in your language. The book should not be available on any third-party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Book list|event page book list]]. You should follow the copyright guideline described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Book list|here]]. After finding the book, you should check the pages of the book and create [[:m:Wikisource Pagelist Widget|<nowiki><pagelist/></nowiki>]]. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Participants|Participants]] section if you wish to participate in this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://indic-wscontest.toolforge.org/ Indic Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from 14 November 2022 00.01 to 30 Novemeber 2022 23.59 (IST) * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisources will be present this time. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]- 9 November 2022 (UTC)<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023: Program submissions and Scholarships form are now open == Dear Wikimedian, We are really glad to inform you that '''[[:m:WikiConference India 2023|WikiConference India 2023]]''' has been successfully funded and it will take place from 3 to 5 March 2023. The theme of the conference will be '''Strengthening the Bonds'''. We also have exciting updates about the Program and Scholarships. The applications for scholarships and program submissions are already open! You can find the form for scholarship '''[[:m:WikiConference India 2023/Scholarships|here]]''' and for program you can go '''[[:m:WikiConference India 2023/Program Submissions|here]]'''. For more information and regular updates please visit the Conference [[:m:WikiConference India 2023|Meta page]]. If you have something in mind you can write on [[:m:Talk:WikiConference India 2023|talk page]]. ‘‘‘Note’’’: Scholarship form and the Program submissions will be open from '''11 November 2022, 00:00 IST''' and the last date to submit is '''27 November 2022, 23:59 IST'''. Regards [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ११:२५, १६ नवम्बर २०२२ (UTC) (on behalf of the WCI Organizing Committee) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_scholarships_and_program&oldid=24082246 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023: Help us organize! == Dear Wikimedian, You may already know that the third iteration of [[:m:WikiConference_India_2023|WikiConference India]] is happening in March 2023. We have recently opened [[:m:WikiConference_India_2023/Scholarships|scholarship applications]] and [[:WikiConference_India_2023/Program_Submissions|session submissions for the program]]. As it is a huge conference, we will definitely need help with organizing. As you have been significantly involved in contributing to Wikimedia projects related to Indic languages, we wanted to reach out to you and see if you are interested in helping us. We have different teams that might interest you, such as communications, scholarships, programs, event management etc. If you are interested, please fill in [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdN7EpOETVPQJ6IG6OX_fTUwilh7MKKVX75DZs6Oj6SgbP9yA/viewform?usp=sf_link this form]. Let us know if you have any questions on the [[:m:Talk: WikiConference_India_2023|event talk page]]. Thank you [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १५:२१, १८ नवम्बर २०२२ (UTC) (on behalf of the WCI Organizing Committee) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_organizing_teams&oldid=24094749 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023: Open Community Call and Extension of program and scholarship submissions deadline == Dear Wikimedian, Thank you for supporting Wiki Conference India 2023. We are humbled by the number of applications we have received and hope to learn more about the work that you all have been doing to take the movement forward. In order to offer flexibility, we have recently extended our deadline for the Program and Scholarships submission- you can find all the details on our [[:m:WikiConference India 2023|Meta Page]]. COT is working hard to ensure we bring together a conference that is truly meaningful and impactful for our movement and one that brings us all together. With an intent to be inclusive and transparent in our process, we are committed to organizing community sessions at regular intervals for sharing updates and to offer an opportunity to the community for engagement and review. Following the same, we are hosting the first Open Community Call on the 3rd of December, 2022. We wish to use this space to discuss the progress and answer any questions, concerns or clarifications, about the conference and the Program/Scholarships. Please add the following to your respective calendars and we look forward to seeing you on the call * '''WCI 2023 Open Community Call''' * '''Date''': 3rd December 2022 * '''Time''': 1800-1900 (IST) * '''Google Link'''': https://meet.google.com/cwa-bgwi-ryx Furthermore, we are pleased to share the email id of the conference contact@wikiconferenceindia.org which is where you could share any thoughts, inputs, suggestions, or questions and someone from the COT will reach out to you. Alternatively, leave us a message on the Conference [[:m:Talk:WikiConference India 2023|talk page]]. Regards [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १६:२१, २ दिसम्बर २०२२ (UTC) On Behalf of, WCI 2023 Core organizing team. <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_scholarships_and_program&oldid=24083503 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023:WCI2023 Open Community call on 18 December 2022 == Dear Wikimedian, As you may know, we are hosting regular calls with the communities for [[:m:WikiConference India 2023|WikiConference India 2023]]. This message is for the second Open Community Call which is scheduled on the 18th of December, 2022 (Today) from 7:00 to 8:00 pm to answer any questions, concerns, or clarifications, take inputs from the communities, and give a few updates related to the conference from our end. Please add the following to your respective calendars and we look forward to seeing you on the call. * [WCI 2023] Open Community Call * Date: 18 December 2022 * Time: 1900-2000 [7 pm to 8 pm] (IST) * Google Link: https://meet.google.com/wpm-ofpx-vei Furthermore, we are pleased to share the telegram group created for the community members who are interested to be a part of WikiConference India 2023 and share any thoughts, inputs, suggestions, or questions. Link to join the telegram group: https://t.me/+X9RLByiOxpAyNDZl. Alternatively, you can also leave us a message on the [[:m:Talk:WikiConference India 2023|Conference talk page]]. Regards [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ०८:११, १८ दिसम्बर २०२२ (UTC) <small> On Behalf of, WCI 2023 Organizing team </small> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_organizing_teams&oldid=24099166 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला रजिस्ट्रेशन == नमस्कार, हम आशा करते हैं कि आप सब तंदरुस्त होंगे। आपको सूचित किया जा रहा है कि आज से यानी कि 8 फरवरी 2023 से हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला के रजिस्ट्रेशन ऑपन हो गई है जो 15 फरवरी 2023 तक जारी रहेगी। कृपया अपना कुछ कीमती समय निकाल कर [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSck0SZ_TNpa5j9z3X_IJ8Y4PAIKNxjd3bRPmkeP_s9_vkwp7g/viewform इस फार्म] को ज़रूर भरें। बहुत शुक्रिया --[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १०:३४, ९ फ़रवरी २०२३ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:CIS-A2K/Events/Hindi_Wikisource_Community_skill-building_workshop&oldid=24472896 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Need your input on a policy impacting gadgets and UserJS == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> Dear interface administrator, This is Samuel from the Security team and I hope my message finds you well. There is an [[m:Talk:Third-party resources policy|ongoing discussion]] on a proposed policy governing the use of external resources in gadgets and UserJS. The proposed [[m:Special:MyLanguage/Third-party resources policy|Third-party resources policy]] aims at making the UserJS and Gadgets landscape a bit safer by encouraging best practices around external resources. After an initial non-public conversation with a small number of interface admins and staff, we've launched a much larger, public consultation to get a wider pool of feedback for improving the policy proposal. Based on the ideas received so far, the proposed policy now includes some of the risks related to user scripts and gadgets loading third-party resources, best practices for gadgets and UserJS developers, and exemptions requirements such as code transparency and inspectability. As an interface administrator, your feedback and suggestions are warmly welcome until July 17, 2023 on the [[m:Talk:Third-party resources policy|policy talk page]]. Have a great day!</div> <bdi lang="en" dir="ltr">[[m:User:Samuel (WMF)|Samuel (WMF)]], on behalf of the Foundation's Security team</bdi> २३:०२, ७ जुलाई २०२३ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Samuel_(WMF)/IAdmins_MassMessage_list_1&oldid=25272788 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Samuel (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == स्थानांतरण अनुरोध [[सदस्य:SM7/भविष्य में करने हेतु काम]] == नमस्ते अजीत जी, कृप्य उक्त पृष्ठ को [[सदस्य:SM7/TODO]] पर बिना पुनर्प्रेषण छोड़े स्थानांतरित कर दें। अग्रिम धन्यवाद। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> १५:३८, २१ जुलाई २०२३ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में आयोजक के रूप में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:२८, २२ मार्च २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में आयोजक/निर्णायक के रूप में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें।</span> --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०८:०५, ७ सितम्बर २०२४ (UTC) 349cowbe9ufzl4foyhldvnju8b6pc6s 675505 675468 2026-08-31T02:11:12Z सौरभ तिवारी 05 49 [[Special:Contributions/~2026-47216-61|~2026-47216-61]] ([[User talk:~2026-47216-61|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:ममता साव9|ममता साव9]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 643272 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} {{स्वागत}} [[सदस्य:अनिरुद्ध!|अनिरुद्ध!]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध!|वार्ता]]) २०:५१, १ अक्टूबर २०१९ (UTC) ==कोड स्वराज== अजीत जी आप का [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%A1_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C.pdf/%E0%A5%A9%E0%A5%A9&diff=216649&oldid=216648 यहाँ] अनुवाद देखा। दरसल किताब में ही वैसे '''आप''' शब्द लिखा हुआ हैं और अंग्रेजी में किताब जैसा ही करते हैं| हमें इन सब चीजों पर नीति बनानी चाहिए। --[[सदस्य:Abhinav619|Abhinav619]] ([[सदस्य वार्ता:Abhinav619|वार्ता]]) ०७:०८, १५ अक्टूबर २०१९ (UTC) :अभिनव जी, किताब में तो '''आज''' ही लिखा है और अंग्रेजी में स्पेलिंग गलत हो सकती है लेकिन ये स्पेलिंग की दिक्कत नहीं है। यूनीकोड में गलत कमांड से कई बार ऐसा हो जाता है कि मात्रा साथ में न लगकर अलग दिखती है ( जैसे - डॉ की जगह ड ॉ)। ऐसी बातों को कॉमनसेंस से ठीक करना ही सही रहेगा। हां प्रूफरीडिंग से संबंधित नीतियां अभी बनानी तो हैं ही। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०७:५४, १५ अक्टूबर २०१९ (UTC) :: अजीत जी, कॉमनसेंस वाली बात ठीक है आप कि। अंग्रेजी पर (henry को he-nr-y) जैसे किसी किताब में देखे था तो सोचा लिख देता हूँ। --[[सदस्य:Abhinav619|Abhinav619]] ([[सदस्य वार्ता:Abhinav619|वार्ता]]) ०८:४७, १५ अक्टूबर २०१९ (UTC) ==विकिस्रोत:खाता हेतु निवेदन== @ नमस्ते [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, यूँ तो आप काफी अनुभवी सदस्य हैं किंतु मैं जानना चाहती हूँ कि आपने [[विकिस्रोत:खाता हेतु निवेदन]] पृष्ठ को क्यों मिटाया है, जबकि वह विकिस्रोत पर त्वरित गति से मिटाई जाने वाली पुस्तकों के संबंध में बनाया गया था। यदि पृष्ठ का नाम गलत है तो उसका मात्र नाम भी बदला जा सकता है। [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०४:५२, ७ मार्च २०२० (UTC) :{{ping|नीलम}} जी, नमस्ते। विकिस्रोत:शीघ्र हटाएँ अथवा विकिस्रोत:हटाने हेतु नीति के अंतर्गत पृष्ठ बनाए जाने चाहिए थे। उक्त नाम का औचित्य समझ नहीं आया। नाम मिलते जुलते शीर्षक से बदले जाने चाहिए। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०६:२७, ७ मार्च २०२० (UTC) == Indic Wikisource Proofreadthon == {{clear}} ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' <div style="align:center; width:90%;float:left;{{#ifeq:{{#titleparts:{{FULLPAGENAME}}|2}}||background:#F9ED94;|}}border:0.5em solid #000000; padding:1em;"> <div class="plainlinks mw-content-ltr" lang="en" dir="ltr"> [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Hello, As '''[[:m:COVID-19|COVID-19]]''' has forced the Wikimedia communities to stay at home and like many other affiliates, CIS-A2K has decided to suspend all offline activities till 15th September 2020 (or till further notice). I present to you for an online training session for future coming months. The CIS-A2K have conducted a [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon|Online Indic Wikisource Proofreadthon]] to enrich our Indian classic literature in digital format. '''WHAT DO YOU NEED''' * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some classical literature your language. The book should not be available in any third party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Book list|event page book list]]. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Participants|Participants]] section if you wish to participate this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community member, please spread the news to all social media channel, we always try to convince it your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://wscontest.toolforge.org/ Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from 01 May 2020 00.01 to 10 May 2020 23.59 * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic_Wikisource_Proofreadthon/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisources will be present this year at-home lockdown. Thanks for your attention<br/> '''[[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]] १७:४०, १७ अप्रैल २०२० (UTC)'''<br/> ''Wikisource Advisor, CIS-A2K'' </div> </div> {{clear}} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlist&oldid=19991757 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सार्वभौमिक आचार संहिता (यूनिवर्सल कोड ऑफ कंडक्ट) पर आपके महत्वपूर्ण विचार == प्रिय मित्र, [[:m:Universal_Code_of_Conduct/hi|सार्वभौमिक आचार संहिता]] (यूनिवर्सल कोड ऑफ कंडक्ट) जिसका उद्देश्य विकिपीडिया पर ऐसा वातावरण बनाने में मदद करना है जहाँ कोई भी, '''बिना किसी उत्पीड़न अथवा भय के''', सुरक्षित रूप से अपना योगदान दे सके। इस विषय पर विभिन्न समुदाय के सदस्यों से उनके विचार एकत्रित किए जा रहे हैं। चूँकि आप समुदाय के एक '''महत्वपूर्ण सदस्य''' हैं, आपके दिए विचार तथा सुझाव हमारे लिए '''अति महत्वपूर्ण''' है जो की इस सार्वभौमिक आचार संहिता को बनाने में न केवल सहायक होंगे अपितु '''हमारे विकिपीडिया समुदाय का प्रतिनिधित्व''' भी करेंगे। आपके लिए इस आचार संहिता की भाषा और सामग्री को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने, उत्पीड़न मुक्त स्थान बनाने तथा विकी आंदोलन को आगे बढ़ाने में योगदान करने का '''प्रमुख अवसर''' है। '''[https://docs.google.com/forms/u/1/d/e/1FAIpQLSefDi72TbTsVERmsVnfjzHxSs9LE_9NAOarPun5Wv9vpVqabg/viewform?usp=send_form आपकी सुविधा हेतु एक गूगल प्रपत्र]''' (फॉर्म ) (कुछ ही मिनटों में भरने योग्य) भी तैयार किया गया है जिसके भरनेकी '''अंतिम तिथि 25 अप्रेल 2020''' है, इस प्रपत्र को भरकर इस विषय पर अपने विचार/सुझाव देवें इसके अतिरिक्त आप अपने विचार चौपाल, [[:m:User_talk:Suyash_(WMF)|मेरे वार्ता पृष्ठ]], अथवा सीधे ई-मेल (suyash-ctr [at] wikimedia [.] org) के माध्यम से भी दे सकते है, धन्यवाद! ''यह संदेश 'मास-मैसेज' संदेश सुविधा के माध्यम से दिया गया है।'' --[[:m:User:Suyash (WMF)|Suyash (WMF)]], {{<includeonly>subst:</includeonly>#time:l G:i, d F Y||hi}} (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Suyash_(WMF)/WS-lists&oldid=19993086 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Suyash (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ==बधाई== <span style="font-size:14pt">प्रिय {{PAGENAME}}, हिन्दी विकिस्रोत को '''एक लाख''' पुस्तक पृष्ठ के लक्ष्य तक पहुँचाने में योगदान के लिए आपका धन्यवाद। हम आशा करते हैं कि आप इसी तरह हिन्दी विकिस्रोत को अधिक उपयोगी और समृद्ध बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।</span> बधाई हो! [[File:Animated flower.GIF|thumb|left]] --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०४:५४, १३ जुलाई २०२० (UTC) :आपको भी बधाई। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०५:०४, १३ जुलाई २०२० (UTC) == पुस्तक परापूर्ण (transclude) करना == {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} सर [[कर्मभूमि]] पुस्तक को परापूर्ण तो कर दिया गया है पर इसमें कुछ समस्या है। [[कर्मभूमि/पहला भाग 1०| भाग १०]] के बाद [[कर्मभूमि/पहला भाग ११|भाग ११]] में तो कुछ है भी नहीं। सर, कर्मभूमि में कुल ५ इकाई है, जो पुस्तक में भी भाग १-२ करके दिया हुआ है। मेरा विचार है कि इसी आधार पर‌ हम ५ अध्यायों में इसे परापूर्ण करें तो अच्छा रहेगा। अगर आपको उचित लगे तो मैं कर सकता हूँ?-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १२:००, १५ जुलाई २०२० (UTC) ::{{सुनो|रोहित साव27}} जी, आपका कहना सही है कि इस पुस्तक के परापूर्णन में कई समस्याएँ हैं अभी। आप देख सकते हैं कि यह कार्य उस दौर में किया गया है जब पुराने डोमेन से नए डोमेन में विकिस्रोत आया ही था। इसमें दो परापूर्णन के दो अलग-अलग तरीक़ों का इस्तेमाल किया गया है और पब्लिक डोमेन लाइसेंस को भी अद्यतन करने की आवश्यकता है। अगर हम केवल इकाई के आधार पर अध्याय विभाजन करेंगे तब भी संतुलन बिगड़ जाएगा, क्योंकि २५० पृष्ठ की छपाई वाले संस्करण में भी पहला भाग लगभग ९० पृष्ठ का है तो कुछ भाग ३० और ५० पृष्ठों में सीमित हैं। ऐसे में यह तरीक़ा अपनाना उचित नहीं होगा। हमारा ध्यान इस बात पर भी रहना चाहिए कि कोई पुस्तक मोबाइल पर भी आसानी से पढ़ी जा सके। अगर हम ९०-१०० पृष्ठ का एक अध्याय बना देंगे तो उसे पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। मैं इस पर विचार कर रहा हूँ कि कैसे इसे छोटे-छोटे अध्यायों में बाँटकर भी इकाई का ध्यान रखा जा सके। आप फ़िलहाल उसी पुस्तक पर कार्य करें जिसे निर्वाचित होने के लिए नामांकन किया है। उसमें अभी कुछ अशुद्धियाँ छूट गई हैं। आपने वर्तनी अशुद्धियों के साथ ही दो अध्याय बना दिए थे जिन्हें मैंने पुनर्निर्देश छोड़े बिना सही वर्तनी पर स्थानांतरित कर दिया था। आप अपने विवेक के अनुसार कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं जिससे परियोजना को कोई क्षति न पहुँचे। बावजूद इसके आपको यही सलाह दी जाती है कि पहले ध्यानपूर्वक एक काम को पूरा कर लें तभी दूसरे काम में हाथ डालें। एक और बात का ध्यान रखें कि विकि प्रकल्पों पर 'सर/मैम/' कहने की परंपरा नहीं है, इसलिए इससे संबोधन न करें (कम से कम मेरे साथ तो नहीं), जी लगाना भी आपके विवेक और इच्छा पर निर्भर है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:२१, १५ जुलाई २०२० (UTC) {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी ठीक है।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १५:२४, १५ जुलाई २०२० (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}}, इसका परापूर्णन इकाई और भाग को मिलाकर पहले से ही किया गया था। भाग १० के बाद हाइपरलिंक और दो तरह के अंकों की दिक़्क़त थी जो कि अब ठीक हो गई है। कम से कम अब परापूर्णन की समस्या नहीं है, उसके तरीक़े पर विचार किया जा सकता है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:५९, १५ जुलाई २०२० (UTC) :{{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी। एक सहायता और चाहता हूँ, आप [[प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ]] पृष्ठ को हटा दें ताकि मैं [[प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियां]] पृष्ठ को उस पर स्थानांतरित कर पाऊं।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] ०७:४१, १७ जुलाई २०२० (UTC) ::{{सुनो|रोहित साव27}} जी, पृष्ठ हटाने की कोई आवश्यकता नहीं है। आम तौर पर ऐसे मामलों में उचित/लक्ष्य पृष्ठ पर पुनर्निर्देश कर देना ही पर्याप्त है। बाद के अध्याय वाले पन्ने चूँकि बने नहीं है इसलिए उन्हें स्थानांतरित किया जा सकता है। प्राक्कथन को अलग से रखने की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी आप जिसे हटाने को कह रहे हैं, उसका इतिहास पुराना है। ऐसी स्थिति में पुराने इतिहास वाले पृष्ठ को तभी हटाया जाना चाहिए जब वह ग़लत/अशुद्ध हो। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०८:४७, १७ जुलाई २०२० (UTC) {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी ठीक है।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] ०९:१४, १७ जुलाई २०२० (UTC) ==माधवराव सप्रे की कहानियाँ== [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी नमस्ते। मेरा यह अनुरोध है कि आप बताएँ [[पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/१३]] में किए गए संपादन को पूर्ववत क्यों किया गया है? .css में हुए बदलाव के बाद क्या अधूरे वाक्यों को मिलाने के लिए <nowiki><br/></nowiki> साँचे का उपयोग करना पूर्णतः अनुपयोगी है? --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) १७:५०, २२ जुलाई २०२० (UTC) :जी हाँ, यह अनुपयोगी है। इंडेक्स आधारित परापूर्णन वाले साँचे में यह वैसे भी अनुपयोगी था। दूसरे वाले साँचे में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। पूर्ववत करने से पहले कारण बताया था (संबंधित टिप्पणी में टैग करके) और अपने वाले बदलाव करने का संपादन सारांश भी दिया था। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १८:०२, २२ जुलाई २०२० (UTC) ::[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी [[माधवराव सप्रे की कहानियाँ/स्पष्टीकरण के दो शब्द]] पृष्ठ पर अगले अध्याय को जोड़ने में शायद ग़लती हुई है। अगला अध्याय [[माधवराव सप्रे की कहानियाँ/अन्तर्भाष्य-समीक्षा|अन्तर्भाष्य-समीक्षा]] होना चाहिए जबकि पृष्ठ पर अगला अध्याय [[माधवराव सप्रे की कहानियाँ/अपनी बात|अपनी बात]] दिया हुआ है।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १०:१८, ३० जुलाई २०२० (UTC) :ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद। कड़ी सुधार दी गयी है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १०:२७, ३० जुलाई २०२० (UTC) ==लॉगिन समस्या== [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी मेरे एक मित्र के लॉगिन करने में समस्या आ रही है। बार बार यह "ऐसा प्रतीत होता है कि आपके लॉगिन सत्र के साथ कोई समस्या है। सत्र अपहरण से बचाने के लिए सावधानी के तौर पर आपका यह क्रियाकलाप रद्द कर दिया गया है। कृपया प्रपत्र दोबारा जमा करें" दिखा रहा है। पासवर्ड बदलने का भी प्रयास किया गया पर कुछ नहीं हुआ। चूंकि वह अपना खाता नहीं खोल पा रही इसलिए वह पूछ भी नहीं पा रही। कृपया सहायता करें।-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १२:०९, २४ जुलाई २०२० (UTC) :सुरक्षा कारणों से ऐसा सामान्यतः होता है बीच-बीच में। कई बार स्वतः सत्र लॉगआउट भी हो जाता है। इस संदेश से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। ऐसे में ध्यान से सदस्यनाम और पासवर्ड भरकर सामान्य सुरक्षा निर्देशों का पालन करते जाना चाहिए। पासवर्ड बदलने का प्रयास भी किया जा सकता है यदि पासवर्ड ग़लत बताया जाय। कुछ देर बाद प्रयास करने से लॉगिन हो जाना चाहिए। अधिक दिक़्क़त हो तो आप 1997kB जी से संपर्क कीजिए। वे ग्लोबल सदस्य खातों से संबंधित कार्य देखते हैं। वे आपको उचित सहायता प्रदान कर सकते हैं। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:११, २४ जुलाई २०२० (UTC) :जी धन्यवाद 2-3 दिन से ऐसा ही हो रहा था तो थोड़ी चिंता हो रही थी। अंत में Fire Fox ब्राउज़र डाउनलोड करके खोलने पर खाता खुल गया किन्तु Chrome में अभी भी नहीं खुल रहा। शायद दो तीन दिन में Chrome में भी समस्या स्वतः हल हो जाए। आपका बहुत बहुत धन्यवाद :-)-[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १६:५३, २४ जुलाई २०२० (UTC) ::कैश (cache) क्लीन करने से क्रोम में भी हो जाएगा। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:४२, २४ जुलाई २०२० (UTC) ==पृष्ठ प्रगति स्तर परिवर्तन में सावधानी== [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, कृप्या [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:प्रसाद_वाङ्मय_रचनावली_खंड_2.djvu/७२४&diff=412618&oldid=412416 इसे] देखें और अन्य सदस्यों की अपेक्षा रंग परिवर्तन के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतें। --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०९:३१, २८ अगस्त २०२० (UTC) == कोड के संदर्भ में == {{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}} जी मैं [[भारत का संविधान/भाग १७ राजभाषा]] को शोधित करना चाहता हूँ किन्तु इसके पृष्ठ पर दाएँ और बाएँ ओर कुछ लिखा है जैसे [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8_(%E0%A5%A7%E0%A5%AF%E0%A5%AB%E0%A5%AD).djvu/%E0%A5%A8%E0%A5%AF%E0%A5%AF इस] पृष्ठ पर दाएँ ओर "संघ की राजभाषा" लिखा है। इन्हें मैं किस कोड का प्रयोग करके शोधित करूं यह समझ नहीं पा रहा हूँ।---[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] १०:४१, ८ सितम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}}, इसके लिए <nowiki>{{overfloat right/left|depth=em(जितना मुख्य पन्ने से दूर रखना हो)|पाठ(जिसे मुख्य पन्ने से अलग दिखना हो)}}</nowiki> प्रयोग करें। अगर कोई दिक्कत होगी तो मैं एक पन्ना कर दूँगा। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १२:२६, ८ सितम्बर २०२० (UTC) ::{{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}} जी मैंने [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8_(%E0%A5%A7%E0%A5%AF%E0%A5%AB%E0%A5%AD).djvu/%E0%A5%A8%E0%A5%AF%E0%A5%AE कोशिश] की पर शायद इससे अच्छा किया जा सकता है। आप उदाहरण स्वरूप एक कर दें तो अच्छा रहेगा।---[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] २२:३२, ८ सितम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}} [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:भारत_का_संविधान_(१९५७).djvu/२९९&action=submit इसे] देखिए। सहेजने के बाद पन्ने पर दाहिनी तरफ का ओवरफ्लोट पाठ नहीं दिखाई देगा क्योंकि स्कैन पन्ना आड़े आ रहा है। हालांकि जब आप संपादन झलक देखेंगे तो अंतर साफ दिखेगा और सबसे जरूर बात यह है कि अंतिम परिणाम के रूप में ट्रांस्क्लूडेड पन्ने को ध्यान में रखिए। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०७:५२, ९ सितम्बर २०२० (UTC) ::जी धन्यवाद:-)---[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''(💌)'''</span>]] २२:१७, ९ सितम्बर २०२० (UTC) == शोधित पृष्ठों का परापूर्णन पूर्ण == प्रिय अजीत जी, [[भ्रमरगीत-सार]] के शोधित पृष्ठों का परापूर्णन पूर्ण हो चुका है। इसके १७२ के बाद के पृष्ठ शोधित नहीं हैं। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २२:४९, १२ सितम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|अनिरुद्ध कुमार}} कार्य पुनः प्रगति पर है। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:४९, १३ सितम्बर २०२० (UTC) {{clear}} == Indic Wikisource Proofreadthon II == {{clear}} ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' <div style="align:center; width:90%;float:left;{{#ifeq:{{#titleparts:{{FULLPAGENAME}}|2}}||background:#F9ED94;|}}border:0.5em solid #000000; padding:1em;"> <div class="plainlinks mw-content-ltr" lang="en" dir="ltr"> [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Hello Proofreader, After successfull first [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon|Online Indic Wikisource Proofreadthon]] hosted and organised by CIS-A2K in May 2020, again we are planning to conduct one more [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020|Indic Wikisource Proofreadthon II]].I would request to you, please submit your opinion about the dates of contest and help us to fix the dates. Please vote for your choice below. {{Clickable button 2|Click here to Submit Your Vote|class=mw-ui-progressive|url=https://strawpoll.com/jf8p2sf79}} '''Last date of submit of your vote on 24th September 2020, 11:59 PM''' I really hope many Indic Wikisource proofreader will be present this time. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Advisor, CIS-A2K <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlistSept2020-A&oldid=20459409 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> </div> </div> {{clear}} == Indic Wikisource Proofreadthon II == {{clear}} ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' <div style="align:center; width:90%;float:left;{{#ifeq:{{#titleparts:{{FULLPAGENAME}}|2}}||background:#F9ED94;|}}border:0.5em solid #000000; padding:1em;"> <div class="plainlinks mw-content-ltr" lang="en" dir="ltr"> [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] [[File:Indic Wikisource Proofreadthon 2020 Poll result with Valid Vote.svg|frameless|right|125px|Valid Vote share]] Hello Proofreader, Thank you for participating at [https://strawpoll.com/jf8p2sf79/r Pool] for date selection. But Unfortunately out of 130 votes [[:File:Indic Wikisource Proofreadthon 2020 - with Valid Vote.png|69 vote is invalid]] due to the below reason either the User ID was invalid or User contribution at Page: namespace less than 200. {| class="wikitable" ! Dates slot !! Valid Vote !! % |- | 1 Oct - 15 Oct 2020 || 26 || 34.21% |- | 16 Oct - 31 Oct 2020 || 8 || 10.53% |- | 1 Nov - 15 Nov 2020 || 30 || 39.47% |- | 16 Nov - 30 Nov 2020 || 12 || 15.79% |} After 61 valid votes counted, the majority vote sharing for 1st November to 15 November 2020. So we have decided to conduct the contest from '''1st November to 15 November 2020'''.<br/> '''WHAT DO YOU NEED''' * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some books in your language. The book should not be available in any third party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Book list|event page book list]]. Before adding the books, please check the pagination order and other stuff are ok in all respect. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants|Participants]] section if you wish to participate this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince it your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' This time we have decided to give the award up to 10 participants in each language group. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://wscontest.toolforge.org/ Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from '''01 November 2020 00.01 to 15 November 2020 23.59''' * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic_Wikisource_Proofreadthon 2020/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisource proofread will be present in this contest too. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Advisor, CIS-A2K </div> </div> {{clear}} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlistSept2020-A&oldid=20459409 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Regarding protection of a page in Page-Namespace == {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} Ji, I want you to remove protection from a [[Page:भारतवर्ष का इतिहास.djvu/५|page]]. For the future, I want to suggest you not to change the protections of Page-Namespace pages. This seems no point to me to protect pages in that namespace because Wikisource is a free library that anyone can edit. Thank you-[[सदस्य:Benipal hardarshan|Benipal hardarshan]] ([[सदस्य वार्ता:Benipal hardarshan|वार्ता]]) ०७:०५, १९ अक्टूबर २०२० (UTC) == Indic Wikisource Proofreadthon II 2020 - Collect your book == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |- |[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}}, Thank you and congratulation to you for your participation and support of our 1st Proofreadthon.The CIS-A2K has conducted again 2nd [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020|Online Indic Wikisource Proofreadthon 2020 II]] to enrich our Indian classic literature in digital format in this festive season. '''WHAT DO YOU NEED''' * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some book your language. The book should not be available on any third party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Book list|event page book list]]. You should follow the copyright guideline describes [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Book list|here]]. After finding the book, you should check the pages of the book and create Pagelist. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants|Participants]] section if you wish to participate this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince it your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://indic-wscontest.toolforge.org/ Indic Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from 01 Nov 2020 00.01 to 15 Nov 2020 23.59 * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon 2020/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic_Wikisource_Proofreadthon 2020/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisources will be present this year at-home lockdown. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K |} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Helpdesk/ActiveUserlistOct2020&oldid=20484797 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == संपादन पूर्ववर्त करने हेतु == @ नमस्ते {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} जी, मैं जानना चाहती हूं कि आपने मेरे उपयोगितावाद पुस्तक में लिए हुए संपादन को पूर्ववर्त क्यों किया। मुझे समझ नहीं आ रहा, जब पृष्ठ में कोई वर्तनी गलत नहीं थी तो मेरी गलती क्या थी। कृपया मुझे मेरी गलती बताइए। --[[सदस्य: अम्बिका साव|<span style="text-shadow: yellow 3px 3px 2px;color: green">'''अम्बिका साव'''</span>]][[सदस्य_वार्ता: अम्बिका साव|<span style="text-shadow: yellow 3px 3px 2px;color: green">(📋🖊️)</span>]] २०:०५, ३ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|अम्बिका साव}} अपने वार्ता पृष्ठ पर उत्तर देखें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:१४, ४ नवम्बर २०२० (UTC) == Templates == सुप्रभात अजीत जी, क्या आप [https://en.wikisource.org/wiki/Template:Hyphenated_word_start hws] तथा [https://en.wikisource.org/wiki/Template:Hyphenated_word_end hwe] टेम्पलेट को यहां इंपोर्ट कर सकते है। [[सदस्य:1997kB|1997kB]] ([[सदस्य वार्ता:1997kB|वार्ता]]) ०३:५६, ५ नवम्बर २०२० (UTC) : जी हाँ, कर देता हूँ। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०४:३३, ५ नवम्बर २०२० (UTC) ::धन्यवाद। [[सदस्य:1997kB|1997kB]] ([[सदस्य वार्ता:1997kB|वार्ता]]) ०५:००, ५ नवम्बर २०२० (UTC) == प्रतिभागी सहयोग == {{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}}: सर, मैं भारतेंदु नाटकावली पुस्तक पर कार्यरत हूँ परन्तु प्रूफरीड के समय साँचो से सम्बन्धित परेशानी हो रही है। मैं जिन साँचो से अवगत हूँ उसका प्रयोग कर रही हूँ। साँचा ग़लत होने पर अंक क्या नहीं मिलेंगे।-[[सदस्य:Manisha yadav12|मनिषा यादव]] ([[सदस्य वार्ता:Manisha yadav12|वार्ता]]) १०:३८, ७ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|Manisha yadav12}} उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर देखें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:०६, ७ नवम्बर २०२० (UTC) {{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}} : सर, मैं साफ़ माथे का समाज पुस्तक पर कार्य कर सकती हूँ।-[[सदस्य:Manisha yadav12|मनिषा यादव]] ([[सदस्य वार्ता:Manisha yadav12|वार्ता]]) ०५:३१, ११ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|Manisha yadav12}} अपने वार्ता पृष्ठ पर उत्तर प्राप्त करें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०५:३९, ११ नवम्बर २०२० (UTC) {{Ping|अजीत कुमार तिवारी}}:सर, एक सहायता चाहिए,[[विषयसूची:राजा और प्रजा.pdf|राजा और प्रजा]] में पन्ने के ऊपरी भाग में कौन सा नियम लगेगा। सर rh इस साँचे का प्रयोग करने से गलती हो रही है शायद। -- <small>यह अहस्ताक्षरित संदेश [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] द्वारा लिखा गया है।</small> :{{सुनो|अमृता कुमारी पाण्डेय}} उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर प्राप्त करें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १६:४३, ११ नवम्बर २०२० (UTC) :{{सुनो|अजीत कुमार तिवारी}}:सर, मैंने जिस पुस्तक का चयन‌किया है उस पुस्तक के कुछ पन्ने अधूरे छपे हुए एवं उसको शोधित करने में दिक्कत हो रही है सर आपकी मदद चाहिए।--[[सदस्य:Manisha yadav12|मनिषा यादव]] ([[सदस्य वार्ता:Manisha yadav12|वार्ता]]) ::{{सुनो|Manisha yadav12}}, जिन पन्नों की छपाई ग़लत है उन्हें आप फ़िलहाल छोड़ सकती हैं। मूल किताब देखकर उनको शोधित कर लिया जाएगा। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १२:३७, १६ अगस्त २०२१ (UTC) == Thank you for your participation and support == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |- |[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}},<br/> Greetings!<br/> It has been 15 days since Indic Wikisource Proofreadthon 2020 online proofreading contest has started and all 12 communities have been performing extremely well. <br/> However, the 15 days contest comes to end on today, '''15 November 2020 at 11.59 PM IST'''. We thank you for your contribution tirelessly for the last 15 days and we wish you continue the same in future events!<br/> *See more stats at https://indic-wscontest.toolforge.org/contest/ Apart from this contest end date, we will declare the final result on '''20th November 2020'''. We are requesting you, please re-check your contribution once again. This extra-time will be for re-checking the whole contest for admin/reviewer. The contest admin/reviewer has a right revert any proofread/validation as per your language community standard. We accept and respect different language community and their different community proofreading standards. Each Indic Wikisource language community user (including admins or sysops) have the responsibility to maintain their quality of proofreading what they have set. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K |} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Proofreadthon_2020/All-Participants&oldid=20666529 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == टिप्पणी के लिए अनुरोध-प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता == नमस्ते दोस्तो, मैंने [[Indic Wikisource Community/Requests for comment/Indic Wikisource Proofreadthon|यहां चर्चा और सलाह के लिए]] अनुरोध शुरू किया है। पिछले साल हमने दो प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता आयोजित की थी। भारतीय भाषा विकीसोर्स के भविष्य के विजन को सेट करने के लिए आपकी प्रतिक्रिया और टिप्पणियों की बहुत आवश्यकता है। चर्चा करने के लिए अंग्रेजी एक आम भाषा हो सकती है, पर अगर आप अपनी मूल भाषा में लिखना चाहते है तो आपका स्वागत है। इंडिक विकिसोर्स कम्युनिटी की ओर से जयंता नाथ १०:४७, २३ जनवरी २०२१ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=20964662 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == टिप्पणी के लिए अनुरोध-प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता == नमस्ते दोस्तो, मैंने [[:m:Indic Wikisource Community/Requests for comment/Indic Wikisource Proofreadthon|यहां चर्चा और सलाह के लिए]] अनुरोध शुरू किया है। पिछले साल हमने दो प्रूफरीड-ए-थान प्रतियोगिता आयोजित की थी। भारतीय भाषा विकीसोर्स के भविष्य के विजन को सेट करने के लिए आपकी प्रतिक्रिया और टिप्पणियों की बहुत आवश्यकता है। चर्चा करने के लिए अंग्रेजी एक आम भाषा हो सकती है, पर अगर आप अपनी मूल भाषा में लिखना चाहते है तो आपका स्वागत है। इंडिक विकिसोर्स कम्युनिटी की ओर से जयंता नाथ ११:०४, २३ जनवरी २०२१ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=20964662 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Requests for comments : Indic wikisource community 2021 == (Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it)<br> Dear Wiki-librarian,<br> Coming two years CIS-A2K will focus on the Indic languages Wikisource project. To design the programs based on the needs of the community and volunteers, we invite your valuable suggestions/opinion and thoughts to [[:m:Indic Wikisource Community/Requests for comment/Needs assessment 2021|Requests for comments]]. We would like to improve our working continuously taking into consideration the responses/feedback about the events conducted previously. We request you to go through the various sections in the RfC and respond. Your response will help us to decide to plan accordingly your needs.<br> Please write in detail, and avoid brief comments without explanations.<br> Jayanta Nath<br> On behalf<br> Centre for Internet & Society's Access to Knowledge Programme (CIS-A2K) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=20964662 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == मदद == मुझे और मेरे कुछ साथियोंं को हिंदी विकिस्रोत की संपादन तकनीक और उपयोग की जानकारी लेनी है। आप अगर मदद करने की स्थिति में हैं, तो मुझसे संपर्क कर लें। धन्यवाद। [[सदस्य:Mulkh Singh|Mulkh Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Mulkh Singh|वार्ता]]) ११:४९, २७ मई २०२१ (UTC) :संपादन तकनीक और उपयोग के मामले में हिंदी विकिस्रोत अन्य विकिस्रोत की तरह ही है। आप और आपके साथी हिंदी टाइप कर लेते हैं तो किसी किताब पर संपादन आरंभ करें। कोई समस्या होगी तो यथासंभव सहायता की जाएगी। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १३:४६, २७ मई २०२१ (UTC) == इंडिक विकिसोर्स प्रूफ्रेडथॉन अगस्त २०२१ == प्यारे संपादकों, पिछले साल प्रूफरीडथॉन में आपकी भागीदारी और समर्थन के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। CIS-A2K ने इस साल फिर से ऑनलाइन [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021|इंडिक विकिसोर्स प्रूफरीडथॉन अगस्त 2021]] का आयोजन किया है ताकि इस भारतीय स्वतंत्रता के सीजन में हमारे भारतीय क्लासिक साहित्य को डिजिटल प्रारूप में समृद्ध किया जा सके। '''आपको किस चीज़ की जरूरत है; ''' '''बुकलिस्ट:''' प्रूफरीड की जाने वाली किताबों के संग्रह दी ज़रूरत। कृपया अपनी भाषा में कोई पुस्तक खोजने में हमारी सहायता करें। पुस्तक किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट पर यूनिकोड स्वरूपित पाठ के साथ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। कृपया पुस्तकें एकत्र करें और हमारे इवेंट की [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Book list|पृष्ठ पुस्तक सूची]] में जोड़ें। आपको यहां बताए गए कॉपीराइट दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। पुस्तक खोजने के बाद, आपको पुस्तक के पृष्ठों की जांच करनी चाहिए और <पेजलिस्ट/> बनाना चाहिए। '''प्रतिभागी:''' यदि आप इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो कृपया प्रतिभागी अनुभाग में अपने नाम पर [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Participants|हस्ताक्षर]] करें। '''समीक्षक:''' कृपया इस प्रूफरीडथॉन के [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Participants#Administrator/Reviewer|व्यवस्थापक/समीक्षक]] के रूप में स्वयं को बढ़ावा दें और अपना प्रस्ताव यहां जोड़ें। व्यवस्थापक/समीक्षक इस प्रूफरीडथॉन में भाग ले सकते हैं। '''मीडिया कवरेज:''' हम सभी इंडिक विकिसोर्स समुदाय के सदस्यों से अनुरोध करते हैं, कृपया सभी सोशल मीडिया चैनलों में जानकारी पहुंचाइए, हम हमेशा आपके विकिपीडिया/विकिसोर्स को साइटनोटिस का उपयोग करने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। बेशक, आपको अपने स्वयं के विकिसोर्स साइटनोटिस का भी उपयोग करना चाहिए। कुछ पुरस्कार: CIS-A2K द्वारा कुछ पुरस्कार दिए जा सकते हैं। मान्य और प्रूफरीड पृष्ठों की गणना करने का एक तरीका:इंडिक विकिसोर्स कॉन्टेस्ट टूल्स <https://indic-wscontest.toolforge.org/> '''समय :''' 15 अगस्त 2021 से 00.01 से 31 अगस्त 2021 तक 23.59 (IST) '''नियम और दिशानिर्देश:''' मूल नियम और [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Rules|दिशानिर्देश]] यहां वर्णित हैं। '''स्कोरिंग:''' विवरण [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Rules#Scoring_system|स्कोरिंग]] विधि का वर्णन यहां किया गया है। हम आशा करता हूं कि इस वर्ष लॉकडाउन में कई भारतीय विकी स्रोत शामिल। होंगे। आप के प्रति वफादार जयंत नाथ <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == सहायता == जैसा की आपने बताया की "प्रारूप अनुसार प्रूफरीड स्तर सही नहीं", यहाँ पर 'प्रूफरीड' का क्या मतलब है? इसे किस प्रकार ठीक किया जा सकता है? क्या आप मुझे एक उदाहरण दे सकते हैं? और मुझे ये भी बताये की शोधित किया गया पृष्ठ मूल पृष्ठ के पूर्ण रूप से समान लगना चाहिए या भाषा त्रुटि को सही करने के लिए थोड़ा बदलाव किया जा सकता है? [[सदस्य:Dineshswamiin|Dineshswamiin]] ([[सदस्य वार्ता:Dineshswamiin|वार्ता]]) ०९:४१, २१ अगस्त २०२१ (UTC) :{{सुनो|Dineshswamiin}} जी, उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर प्राप्त करें। धन्यवाद। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १४:०६, २१ अगस्त २०२१ (UTC) == अशोधित (चिह्नित) करने के संबंद्ध में == अजीत जी नमस्ते। आपने हाल ही में मेरे शोधित पृष्ठों को अशोधित किया है परन्तु कारण मुझे समझ नहीं आया। क्या gap कोड के प्रयोग करने के कारण ऐसा किया गया है? अगर ऐसा है तो आप मुझे सूचित कर देते मैं अपने पृष्ठों को सुधार देता। क्या कोई अन्य कारण है तो वह भी बताएँ।--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १७:१०, २५ अगस्त २०२१ (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}} जी, आप संपादन का इतिहास देखकर पता कर सकते हैं कि क्या सुधार किया गया है। पुनरीक्षण के दौरान आपके प्रत्येक पृष्ठ में स्वीकार्य स्तर से अधिक की ग़लतियाँ मिल रही हैं। केवल <nowiki>{{Gap}}</nowiki> की गलती नहीं है। आप संपादन का इतिहास न देख पा रहे हों तो [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ%3Aचन्द्रगुप्त_मौर्य्य.pdf%2F१८&type=revision&diff=492587&oldid=489914 इसे] देखें। आपको आरंभ में ही सूचित किया गया था, साथ ही आपको २४ घंटे से अधिक का समय भी दिया गया। चूंकि आप औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त सदस्य हैं इसलिए आपको हर छोटी-छोटी बात के लिए टोका नहीं जाएगा। आगे भी पन्नों को शोधित करते हुए सावधानी बरतें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १७:२१, २५ अगस्त २०२१ (UTC) ::जी बताने के लिए शुक्रिया। मैं अनुस्वार का प्रयोग कई जगह पर इसलिए नहीं कर रहा था क्योंकि स्रोत पाठ में भी अनुस्वार नहीं दिख रहें थें, इसलिए स्रोत पाठ से भिन्न ना हो जाए सम्पादन पृष्ठ इसलिए उनका प्रयोग करने से हिचक रहा था। इसे तर्क ना समझिएगा क्योंकि मैं मुझे अपनी गलती स्वीकार है।--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १७:३९, २५ अगस्त २०२१ (UTC) :::कृपया एक प्रश्न का उत्तर और दे दें कि क्या इन पृष्ठों को सुधार कर मैं दोबारा शोधित कर सकता हूँ? कोई समस्या तो नहीं होगी?--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १७:४७, २५ अगस्त २०२१ (UTC) ::::{{सुनो|रोहित साव27}} जी, सुधारने के बाद आप उन पन्नों को पुनः शोधित कर सकते हैं, इसमें कोई समस्या नहीं है। हालाँकि इन पन्नों में केवल अनुस्वार और अनुनासिक की ग़लतियाँ ही नहीं हैं। आप अभी तक लाघव चिह्न और शून्य के बीच भी अंतर नहीं कर पा रहे हैं। वर्तनियों की अशुद्धियाँ भी पर्याप्त मात्रा में हुई हैं। जब आप स्वयं संपादन सारांश ('कोड लगाना बाकि है') में 'बाकी' को बार-बार 'बाकि' लिख रहे थे तो वर्तनी अशुद्धि के लिए ख़राब स्कैन का तर्क वैसे भी बेमानी हो गया। ख़ैर, आपने मेहनत की है इसलिए तीन-चार संशोधनों के बाद मैंने पुनः शोधित करना बंद कर दिया ताकि आप चाहें तो उन्हें सुधार कर दुबारा शोधित कर सकें। ध्यान रहे कि ग़लतियाँ छूट गईं तो पन्नों की शोधित स्थिति फिर से बदल दी जाएगी। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०४:३१, २६ अगस्त २०२१ (UTC) ::जी धन्यावाद। कृपया इन पृष्ठों को देखें [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8D%E0%A4%AF.pdf/%E0%A5%AB%E0%A5%AF १] [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8D%E0%A4%AF.pdf/%E0%A5%AC%E0%A5%A8 २] [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8D%E0%A4%AF.pdf/%E0%A5%AC%E0%A5%A6 ३] क्या अब इन्हें शोधित स्तर पर लाया जा सकता है?--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> ०४:४५, २६ अगस्त २०२१ (UTC) :{{सुनो|रोहित साव27}} जी, मुझे जितना संकेत करना था कर चुका, अब 'अथ से आरंभ' की अपेक्षा न रखें। आप अपने विवेक से जो करना चाहें कर सकते हैं। मैं पुनरीक्षण करके बता दूँगा कि वह सही है अथवा नहीं। अभी मैंने आपके द्वारा पुनः संशोधित दो पन्नों को 'अशोधित चिह्नित' किया है तथा एक में सुधार भी किया है। आप इस बात का भी ध्यान रखें कि मैंने आपके द्वारा 'शोधित चिह्नित' पन्नों को 'अशोधित चिह्नित' किया है न कि 'शोधित' को 'अशोधित'। आपके शीर्षक से ऐसा लग रहा था कि जैसे मैंने आपके शोधित कार्य को बिगाड़कर अशोधित कर दिया। यही कारण है कि मैंने कोष्ठक में चिह्नित जोड़ दिया ताकि संवाद के विषय की स्पष्टता बनी रहे। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ११:५६, २६ अगस्त २०२१ (UTC) ::जी ठीक है। परन्तु आप '''dhr''' कोड का प्रयोग कब और क्यों करते है, यह बता सकते हैं? मुझे इसके सम्बन्ध में अभी कोई जानकारी नहीं है।--[[सदस्य: रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''रोहित'''</span>]]<sup>[[User talk:रोहित साव27|<span style="text-shadow:gray 3px 3px 2px;color: black">'''बातचीत'''</span>]][[चित्र:Animalibrí.gif|20px]]</sup> १२:१०, २६ अगस्त २०२१ (UTC) :::<nowiki>{{dhr}}</nowiki> कोड नहीं साँचा है, जिसके बारे में आप [https://hi.wikisource.org/wiki/साँचा:Dhr यहाँ] पढ़ सकते हैं। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १२:४३, २६ अगस्त २०२१ (UTC) == विकिमीडिया फाउंडेशन के वर्ष 2021 के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चुनावों में मतदान करना भूलिएगा नही == आपका अजीत कुमार तिवारी, यह संदेश आपको इसलिए भेजा जा रहा है क्योंकि आप विकिमीडिया फाउंडेशन के वर्ष 2021 के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चुनावों में मतदान करने के योग्य हैं। इस बार चुनाव 18 अगस्त, 2021 को शुरू होंगे और 31 अगस्त, 2021 को बंद होंगे। विकिमीडिया फाउंडेशन, हिन्दी विकिस्रोत जैसी परियोजनाओं का संचालन करता है और इसके संचालन की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के हाथों में है। बोर्ड विकिमीडिया फाउंडेशन का निर्णय लेने वाला निकाय है। [[:m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Overview|बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के बारे में अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें]]। इस साल कम्युनिटी के वोटों के आधार पर चार सीटों का चयन किया जाएगा। इन सीटों के लिए दुनिया भर से 19 उम्मीदवार मैदान में हैं। [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Candidates#Candidate_Table|बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के वर्ष 2021 के उम्मीदवारों के बारे में अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें]]। कम्युनिटी के लगभग 70,000 सदस्यों को मतदान के लिए आमंत्रण दिया गया है। जिसमें आप भी शामिल हैं! मतदान केवल 31 अगस्त 23:59 UTC तक जारी रहेगी। *[[:hi:Special:SecurePoll/vote/Wikimedia_Foundation_Board_Elections_2021|'''हिन्दी विकिस्रोत के सुरक्षित निर्वाचन पर जाकर मतदान करें''']]। अगर आप पहले ही मतदान कर चुके हैं, तो मतदान करने के लिए धन्यवाद और कृपया इस ई-मेल को नज़रअंदाज़ करें। लोग केवल एक बार वोट कर सकते हैं, भले ही उनके पास कितने भी अकाउंट हों। [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021|इस चुनाव के बारे में अधिक जानकारी यहां से पढ़ें]]। [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ११:२८, २६ अगस्त २०२१ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:KCVelaga_(WMF)/Targets/Temp&oldid=21937902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ==सूचना== नमस्कार। ‎बिपिन बिहारी साव २३ अंतिम अपडेट में बारहवें स्थान पर रहे हैं इसलिए उनके लिए बीस पृष्ठ छोड़कर मैं उनके द्वारा चयनित पुस्तक पर शोधन कर रही हूँ। --[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ००:०९, ३१ अगस्त २०२१ (UTC) :उत्तर अपने वार्ता पृष्ठ पर प्राप्त करें। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ००:३४, ३१ अगस्त २०२१ (UTC) == Thank you for your participation and support == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |- |[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}},<br/> Greetings!<br/> the results of the [[:meta:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Result|Indic Wikisource Proofreadthon August 2021]] have been published. All 10 communities have been performing extremely well. Thank you for your work as a reviewer, as we know that how painful it was. <br/> To send the honour a gift to you, [[:meta:CIS-A2K|The Centre for Internet & Society (CIS-A2K)]] will need to fill out the required information in this [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfohOv0mI4AijwPre73IyEC9hZ3-GWibfxj4Zo9gK6hW6siWg/viewform Google form] to send the [[:meta:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Prize|contest awards]] to your address. We assure you that this information will be kept completely [https://wikimediafoundation.org/wiki/Privacy_policy confidential]. Thanks <br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]] १५:३३, २५ सितम्बर २०२१ (UTC)<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K |} == How we will see unregistered users == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> <section begin=content/> Hi! You get this message because you are an admin on a Wikimedia wiki. When someone edits a Wikimedia wiki without being logged in today, we show their IP address. As you may already know, we will not be able to do this in the future. This is a decision by the Wikimedia Foundation Legal department, because norms and regulations for privacy online have changed. Instead of the IP we will show a masked identity. You as an admin '''will still be able to access the IP'''. There will also be a new user right for those who need to see the full IPs of unregistered users to fight vandalism, harassment and spam without being admins. Patrollers will also see part of the IP even without this user right. We are also working on [[m:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation/Improving tools|better tools]] to help. If you have not seen it before, you can [[m:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation|read more on Meta]]. If you want to make sure you don’t miss technical changes on the Wikimedia wikis, you can [[m:Global message delivery/Targets/Tech ambassadors|subscribe]] to [[m:Tech/News|the weekly technical newsletter]]. We have [[m:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation#IP Masking Implementation Approaches (FAQ)|two suggested ways]] this identity could work. '''We would appreciate your feedback''' on which way you think would work best for you and your wiki, now and in the future. You can [[m:Talk:IP Editing: Privacy Enhancement and Abuse Mitigation|let us know on the talk page]]. You can write in your language. The suggestions were posted in October and we will decide after 17 January. Thank you. /[[m:User:Johan (WMF)|Johan (WMF)]]<section end=content/> </div> १८:१५, ४ जनवरी २०२२ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Johan_(WMF)/Target_lists/Admins2022(4)&oldid=22532508 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Johan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == इंडिक विकिसोर्स प्रूफ्रेडथॉन मार्च २०२२ == प्यारे संपादकों, पिछले साल प्रूफरीडथॉन में आपकी भागीदारी और समर्थन के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। CIS-A2K ने इस साल फिर से ऑनलाइन [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022|इंडिक विकिसोर्स प्रूफरीडथॉन मार्च 2022]] का आयोजन किया है ताकि इस भारतीय स्वतंत्रता के सीजन में हमारे भारतीय क्लासिक साहित्य को डिजिटल प्रारूप में समृद्ध किया जा सके। '''आपको किस चीज़ की जरूरत है; ''' '''बुकलिस्ट:''' प्रूफरीड की जाने वाली किताबों के संग्रह दी ज़रूरत। कृपया अपनी भाषा में कोई पुस्तक खोजने में हमारी सहायता करें। पुस्तक किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट पर यूनिकोड स्वरूपित पाठ के साथ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। कृपया पुस्तकें एकत्र करें और हमारे इवेंट की [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Book list|पृष्ठ पुस्तक सूची]] में जोड़ें। आपको यहां बताए गए कॉपीराइट दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। पुस्तक खोजने के बाद, आपको पुस्तक के पृष्ठों की जांच करनी चाहिए और <पेजलिस्ट/> बनाना चाहिए। '''प्रतिभागी:''' यदि आप इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो कृपया प्रतिभागी अनुभाग में अपने नाम पर [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Participants|हस्ताक्षर]] करें। '''समीक्षक:''' कृपया इस प्रूफरीडथॉन के [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Participants#Administrator/Reviewer|व्यवस्थापक/समीक्षक]] के रूप में स्वयं को बढ़ावा दें और अपना प्रस्ताव यहां जोड़ें। व्यवस्थापक/समीक्षक इस प्रूफरीडथॉन में भाग ले सकते हैं। '''मीडिया कवरेज:''' हम सभी इंडिक विकिसोर्स समुदाय के सदस्यों से अनुरोध करते हैं, कृपया सभी सोशल मीडिया चैनलों में जानकारी पहुंचाइए, हम हमेशा आपके विकिपीडिया/विकिसोर्स को साइटनोटिस का उपयोग करने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। बेशक, आपको अपने स्वयं के विकिसोर्स साइटनोटिस का भी उपयोग करना चाहिए। कुछ पुरस्कार: CIS-A2K द्वारा कुछ पुरस्कार दिए जा सकते हैं। मान्य और प्रूफरीड पृष्ठों की गणना करने का एक तरीका: [https://indic-wscontest.toolforge.org/ इंडिक विकिसोर्स कॉन्टेस्ट टूल्स] '''समय :''' 01 मार्च 2022 से 00.01 से 16 मार्च 2022 तक 23.59 (IST) '''नियम और दिशानिर्देश:''' मूल नियम और [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Rules|दिशानिर्देश]] यहां वर्णित हैं। '''स्कोरिंग:''' विवरण [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Rules#Scoring_system|स्कोरिंग]] विधि का वर्णन यहां किया गया है। हम आशा करता हूं कि इस वर्ष लॉकडाउन में कई भारतीय विकी स्रोत शामिल। होंगे। आप के प्रति वफादार जयंत नाथ. १७:५४, १० फ़रवरी २०२२ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ==[https://hi.m.wikipedia.org/wiki/जमुना_किनारे]== {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} कृपया उपर्युक्त पृष्ठ को प्रबंधक स्तर तक सुरक्षित करने की कृपा करें। [https://hi.m.wikipedia.org/wiki/स:जैस_चौधरी] ने नया खाता बना लिया है। वह उत्पात कर सकता है। [[विशेष:योगदान/117.225.11.39|117.225.11.39]] ०५:२९, १ मई २०२२ (UTC) == चांदी की डिबिया == {{ping|अजीत कुमार तिवारी}} आपने आज मेरे द्वारा कुछ 'प्रमाणित' पृष्ठों को 'शोधित' में परिवर्तित किया। क्या आप कारण समझा सकते हैं ताकि मैं भूल सुधार सकूं? [[सदस्य:Seomelono|Seomelono]] ([[सदस्य वार्ता:Seomelono|वार्ता]]) १८:२४, ६ अगस्त २०२२ (UTC) :{{सुनिए|Seomelono}} जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ%3Aचाँदी_की_डिबिया.djvu%2F१०४&type=revision&diff=517531&oldid=517509 इसे] देखें। प्रारूप और वर्तनी के कारण आपके प्रमाणित संपादन पूर्ववत कर दिए गए थे। आपके लिए सुझाव है कि कोई भी पृष्ठ प्रमाणित न करें। यदि वर्तनी संपादन करें तो केवल शोधित ही चिह्नित करें ताकि उसमें सुधार किया जा सके। धन्यवाद। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १८:३०, ८ अगस्त २०२२ (UTC) == Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022 == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translate it'' [[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]] Dear {{BASEPAGENAME}},<br> Thank you and congratulation to you for your participation and support last year. The CIS-A2K has been conducted again this year [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022|Online Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022]] to enrich our Indian classic literature in digital format. <u>'''WHAT DO YOU NEED'''</u> * '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some books in your language. The book should not be available on any third-party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Book list|event page book list]]. You should follow the copyright guideline described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Book list|here]]. After finding the book, you should check the pages of the book and create [[:m:Wikisource Pagelist Widget|<nowiki><pagelist/></nowiki>]]. *'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Participants|Participants]] section if you wish to participate in this event. *'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon. * '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice. * '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K. * '''A way to count validated and proofread pages''':[https://indic-wscontest.toolforge.org/ Indic Wikisource Contest Tools] * '''Time ''': Proofreadthon will run: from 14 November 2022 00.01 to 30 Novemeber 2022 23.59 (IST) * '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Rules|here]] * '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Rules#Scoring_system|here]] I really hope many Indic Wikisources will be present this time. Thanks for your attention<br/> [[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]- 9 November 2022 (UTC)<br/> Wikisource Program officer, CIS-A2K <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023: Program submissions and Scholarships form are now open == Dear Wikimedian, We are really glad to inform you that '''[[:m:WikiConference India 2023|WikiConference India 2023]]''' has been successfully funded and it will take place from 3 to 5 March 2023. The theme of the conference will be '''Strengthening the Bonds'''. We also have exciting updates about the Program and Scholarships. The applications for scholarships and program submissions are already open! You can find the form for scholarship '''[[:m:WikiConference India 2023/Scholarships|here]]''' and for program you can go '''[[:m:WikiConference India 2023/Program Submissions|here]]'''. For more information and regular updates please visit the Conference [[:m:WikiConference India 2023|Meta page]]. If you have something in mind you can write on [[:m:Talk:WikiConference India 2023|talk page]]. ‘‘‘Note’’’: Scholarship form and the Program submissions will be open from '''11 November 2022, 00:00 IST''' and the last date to submit is '''27 November 2022, 23:59 IST'''. Regards [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ११:२५, १६ नवम्बर २०२२ (UTC) (on behalf of the WCI Organizing Committee) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_scholarships_and_program&oldid=24082246 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023: Help us organize! == Dear Wikimedian, You may already know that the third iteration of [[:m:WikiConference_India_2023|WikiConference India]] is happening in March 2023. We have recently opened [[:m:WikiConference_India_2023/Scholarships|scholarship applications]] and [[:WikiConference_India_2023/Program_Submissions|session submissions for the program]]. As it is a huge conference, we will definitely need help with organizing. As you have been significantly involved in contributing to Wikimedia projects related to Indic languages, we wanted to reach out to you and see if you are interested in helping us. We have different teams that might interest you, such as communications, scholarships, programs, event management etc. If you are interested, please fill in [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdN7EpOETVPQJ6IG6OX_fTUwilh7MKKVX75DZs6Oj6SgbP9yA/viewform?usp=sf_link this form]. Let us know if you have any questions on the [[:m:Talk: WikiConference_India_2023|event talk page]]. Thank you [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १५:२१, १८ नवम्बर २०२२ (UTC) (on behalf of the WCI Organizing Committee) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_organizing_teams&oldid=24094749 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023: Open Community Call and Extension of program and scholarship submissions deadline == Dear Wikimedian, Thank you for supporting Wiki Conference India 2023. We are humbled by the number of applications we have received and hope to learn more about the work that you all have been doing to take the movement forward. In order to offer flexibility, we have recently extended our deadline for the Program and Scholarships submission- you can find all the details on our [[:m:WikiConference India 2023|Meta Page]]. COT is working hard to ensure we bring together a conference that is truly meaningful and impactful for our movement and one that brings us all together. With an intent to be inclusive and transparent in our process, we are committed to organizing community sessions at regular intervals for sharing updates and to offer an opportunity to the community for engagement and review. Following the same, we are hosting the first Open Community Call on the 3rd of December, 2022. We wish to use this space to discuss the progress and answer any questions, concerns or clarifications, about the conference and the Program/Scholarships. Please add the following to your respective calendars and we look forward to seeing you on the call * '''WCI 2023 Open Community Call''' * '''Date''': 3rd December 2022 * '''Time''': 1800-1900 (IST) * '''Google Link'''': https://meet.google.com/cwa-bgwi-ryx Furthermore, we are pleased to share the email id of the conference contact@wikiconferenceindia.org which is where you could share any thoughts, inputs, suggestions, or questions and someone from the COT will reach out to you. Alternatively, leave us a message on the Conference [[:m:Talk:WikiConference India 2023|talk page]]. Regards [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १६:२१, २ दिसम्बर २०२२ (UTC) On Behalf of, WCI 2023 Core organizing team. <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_scholarships_and_program&oldid=24083503 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == WikiConference India 2023:WCI2023 Open Community call on 18 December 2022 == Dear Wikimedian, As you may know, we are hosting regular calls with the communities for [[:m:WikiConference India 2023|WikiConference India 2023]]. This message is for the second Open Community Call which is scheduled on the 18th of December, 2022 (Today) from 7:00 to 8:00 pm to answer any questions, concerns, or clarifications, take inputs from the communities, and give a few updates related to the conference from our end. Please add the following to your respective calendars and we look forward to seeing you on the call. * [WCI 2023] Open Community Call * Date: 18 December 2022 * Time: 1900-2000 [7 pm to 8 pm] (IST) * Google Link: https://meet.google.com/wpm-ofpx-vei Furthermore, we are pleased to share the telegram group created for the community members who are interested to be a part of WikiConference India 2023 and share any thoughts, inputs, suggestions, or questions. Link to join the telegram group: https://t.me/+X9RLByiOxpAyNDZl. Alternatively, you can also leave us a message on the [[:m:Talk:WikiConference India 2023|Conference talk page]]. Regards [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ०८:११, १८ दिसम्बर २०२२ (UTC) <small> On Behalf of, WCI 2023 Organizing team </small> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/WCI_2023_active_users,_organizing_teams&oldid=24099166 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Nitesh Gill@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला रजिस्ट्रेशन == नमस्कार, हम आशा करते हैं कि आप सब तंदरुस्त होंगे। आपको सूचित किया जा रहा है कि आज से यानी कि 8 फरवरी 2023 से हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला के रजिस्ट्रेशन ऑपन हो गई है जो 15 फरवरी 2023 तक जारी रहेगी। कृपया अपना कुछ कीमती समय निकाल कर [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSck0SZ_TNpa5j9z3X_IJ8Y4PAIKNxjd3bRPmkeP_s9_vkwp7g/viewform इस फार्म] को ज़रूर भरें। बहुत शुक्रिया --[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १०:३४, ९ फ़रवरी २०२३ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:CIS-A2K/Events/Hindi_Wikisource_Community_skill-building_workshop&oldid=24472896 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Need your input on a policy impacting gadgets and UserJS == <div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> Dear interface administrator, This is Samuel from the Security team and I hope my message finds you well. There is an [[m:Talk:Third-party resources policy|ongoing discussion]] on a proposed policy governing the use of external resources in gadgets and UserJS. The proposed [[m:Special:MyLanguage/Third-party resources policy|Third-party resources policy]] aims at making the UserJS and Gadgets landscape a bit safer by encouraging best practices around external resources. After an initial non-public conversation with a small number of interface admins and staff, we've launched a much larger, public consultation to get a wider pool of feedback for improving the policy proposal. Based on the ideas received so far, the proposed policy now includes some of the risks related to user scripts and gadgets loading third-party resources, best practices for gadgets and UserJS developers, and exemptions requirements such as code transparency and inspectability. As an interface administrator, your feedback and suggestions are warmly welcome until July 17, 2023 on the [[m:Talk:Third-party resources policy|policy talk page]]. Have a great day!</div> <bdi lang="en" dir="ltr">[[m:User:Samuel (WMF)|Samuel (WMF)]], on behalf of the Foundation's Security team</bdi> २३:०२, ७ जुलाई २०२३ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Samuel_(WMF)/IAdmins_MassMessage_list_1&oldid=25272788 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Samuel (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == स्थानांतरण अनुरोध [[सदस्य:SM7/भविष्य में करने हेतु काम]] == नमस्ते अजीत जी, कृप्य उक्त पृष्ठ को [[सदस्य:SM7/TODO]] पर बिना पुनर्प्रेषण छोड़े स्थानांतरित कर दें। अग्रिम धन्यवाद। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> १५:३८, २१ जुलाई २०२३ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में आयोजक के रूप में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:२८, २२ मार्च २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में आयोजक/निर्णायक के रूप में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें।</span> --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०८:०५, ७ सितम्बर २०२४ (UTC) 337ps7qfeohjmnbz9gwnwfdnrxrll7i मीडियाविकि:Sitenotice 8 57542 675506 669536 2026-08-31T02:15:51Z सौरभ तिवारी 05 49 प्रतियोगिता समाप्त। 675506 wikitext text/x-wiki phoiac9h4m842xq45sp7s6u21eteeq1 पृष्ठ:मुद्राराक्षस.djvu/१८७ 250 69145 675507 600940 2026-08-31T04:06:27Z ~2026-47239-63 6846 675507 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>११६ मुद्राराक्षस नारक थे। जमरट जर्थात् चित्र जिममें जमसबंधी चित्र थे। हर्षचरित पृ. १७० में जमपट्टिका का उल्लेख है। ११५सर्वज्ञता-सभी विषयों को समान रूप से जानना। ११७-चंद्र से चंद्रगुप्त को इंगित करता है। १२२-१२३-याप कमन्न सुंदर होता है पर वह चंद्र से विरोध करता है। साथही तात्पर्य यह है कि चंद्रगुप्त के अभ्युदय को न सहन करनेवाले भी पुरुष हैं। १४४-१४५कौन अपना जीवन नहीं सह सकते-अर्थात् चंद्रगुप्त की श्रीवृद्धि को नहीं सह सकना तथा जीवित नहीं रहना बराबर है। "१६७-जौहरी[फा० गौहर शब्द का अर्थ मोती है, जिसका अरबी स्वरूप जौहर है] जौहर+ई =जो जौहर अर्थात मोतीरत्न आदि का व्यापार करे। मूल में मणि कार श्रेष्ठी है, जिसका अर्थ भीरत्नों का व्यापारी है। १७३-मोहर की अंगूठी-[फा० मुह] मुद्रा जो अँगूठो पर रत्न जड़ने के स्थान पर खोदी जाती है। इसे अंगुलीमुद्रा या मुह की अँगूठी कहते हैं। १८५-१९१-मूल पाठ यों है-तब पाँच वर्ष का एक सुदर बालक शिशुसुलभ कौतूहल से उत्फुल्ललोचन होकर एक छोटे द्वार से बाहर निकलने लगा इस पर स्त्रियों द्वारा 'बाहर निकला, बाहर निकला, का भयव्यंजक कलकल द्वार के भीतर से सुनाई पड़ा, जिसके अनंतर एक स्त्रो द्वार से मुख कुछ बाहर निकालकर कोमल हाथों से उस बालक को भत्सना करते हुए पकड़ ले गई। बालक को पड़ने में व्यग्र होने के कारण पुरुष की अगली के नाप की होने से यह अंगठी उसके चंचल अंगुली से निकल कर देहली पर गिर पड़ी और छटककर मेरे पैरों के पास प्रणाम करती हुई कुलवधू के समान आकर निश्चल हो गई। मैंने भी उसपर राहस का नाम अंकित देखकर आपके पैरों के पास ना रखा। अँगूठी पाने का यही वृत्तांत है।<noinclude></noinclude> 71edywnmh85dkdd57hzk8ke4l54p6qr पृष्ठ:मुद्राराक्षस.djvu/१८ 250 69314 675508 600932 2026-08-31T04:10:32Z ~2026-47239-63 6846 675508 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Neha Tanti" />{{rh||'''( १२ )'''}}</noinclude>नाटक के कथावस्तु का निर्वाह भी विवेचनीय है। इसका प्रासंगिक कथावस्तु सर्वदा गौण तथा आधिकारिक कथावस्तु की सौंदर्य -वृद्ध में महाया रहा। इसके दृश्य और घटनाक्रम ऐसी बुद्धिमानी और कुशलता से सङ्गठित किए गए हैं कि वे कहीं उखड़े से या असंबद्ध नहीं ज्ञात होते। कथावस्तु का प्रारम्भ, मध्य की अवस्थाएँ तथा अन्त भी बड़ी योग्यता से रखे गए हैं, जिससे वे कहीं बेडौल या भद्दे नहीं मालूम पड़ते। प्रथम अङ्क में चाणक्य का आकर कुछ पूर्वेतिहास कहना और नाटक का उद्देश्य बतलाना तथा उसी के साथ ही की मुद्रा की प्राप्ति उसे फंसाने का प्रबन्ध करना दिखलाकर दर्शकों को नाटक की घटना का पूरा ज्ञान करा दिया गया। इसके अनन्तर द्वितीय अङ्क में राक्षस के प्रयत्नों का निष्फल होना तथा तय अङ्क में चन्द्रगुप्त और चाणक्य का झूठा झगहा दिखलाना उद्देश्य पूर्ति का यत्न है। चतुर्थ और पंचम अङ्क में मलयकेत का राक्षस के अति शंकोत्पत्ति से लेकर अन्त में सत्य कलह दिखलाना प्राप्त्याशा है । छठे में गदस का वधस्थान को जाना नियताप्ति और सातवे में मंत्रित्व ग्रहण करना फलागम है। इस प्रकार विवेचना करने पर स्पष्ट ज्ञान होता है कि मुद्राराक्षस रूपक का प्रथम भेद नाटक है और नाट्यकला के अनुसार नाटकके सभी लक्षणों मे युक्त है। {{c|'''७--नाटकीय कथावस्तु का समय'''}} नन्दवंश के नाश, चन्द्रगुप्त के राज्याधिकार, पर्वतक और सर्वार्थसिद्धि के मारे जाने तथा राक्षन के मलयकेतु के गस चले जाने से लेकर उसके फिर से चन्द्रगुप्त का मन्त्रित्व ग्रहण करने तक लगभग एक वर्ष का समय व्यतीत हुश्रा या। चतुर्थ श्रङ्क पंक्ति ४५-४६ में मलयकेतु का कथन है कि श्राज पिता को मरे दस महीने हुए और पर्वतक के मारे जाने के बाद ही राक्षस मलयकेत के पास गया था। नाटक का प्रारंभ उस दिन से होता है जब जीवसिद्धि, पर्वतक पर विषकन्या के प्रयोग करने के दण्ड में राज्य से निर्वासित किया ..ता है और यह दन्ड पर्व तक के घात के दो ही चार दिन के अनन्तर दिया गया होगा। जिस दिन मलयकेतु ने पूर्वोक्त बात कही थी, उस दिन मार्ग-<noinclude></noinclude> s1uur505zr11c1cx131q013o547ji6z 675509 675508 2026-08-31T04:12:19Z ~2026-47239-63 6846 675509 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Neha Tanti" />{{rh||'''( १२ )'''}}</noinclude>नाटक के कथावस्तु का निर्वाह भी विवेचनीय है। इसका प्रासंगिक कथावस्तु सर्वदा गौण तथा आधिकारिक कथावस्तु की सौंदर्य -वृद्ध में महाया रहा। इसके दृश्य और घटनाक्रम ऐसी बुद्धिमानी और कुशलता से सङ्गठित किए गए हैं कि वे कहीं उखड़े से या असंबद्ध नहीं ज्ञात होते। कथावस्तु का प्रारम्भ, मध्य की अवस्थाएँ तथा अन्त भी बड़ी योग्यता से रखे गए हैं, जिससे वे कहीं बेडौल या भद्दे नहीं मालूम पड़ते। प्रथम अङ्क में चाणक्य का आकर कुछ पूर्वेतिहास कहना और नाटक का उद्देश्य बतलाना तथा उसी के साथ ही की मुद्रा की प्राप्ति उसे फंसाने का प्रबन्ध करना दिखलाकर दर्शकों को नाटक की घटना का पूरा ज्ञान करा दिया गया। इसके अनन्तर द्वितीय अङ्क में राक्षस के प्रयत्नों का निष्फल होना तथा तय अङ्क में चन्द्रगुप्त और चाणक्य का झूठा झगहा दिखलाना उद्देश्य पूर्ति का यत्न है। चतुर्थ और पंचम अङ्क में मलयकेत का राक्षस के अति शंकोत्पत्ति से लेकर अन्त में सत्य कलह दिखलाना प्राप्त्याशा है । छठे में गदस का वधस्थान को जाना नियताप्ति और सातवे में मंत्रित्व ग्रहण करना फलागम है। इस प्रकार विवेचना करने पर स्पष्ट ज्ञान होता है कि मुद्राराक्षस रूपक का प्रथम भेद नाटक है और नाट्यकला के अनुसार नाटकके सभी लक्षणों मे युक्त है। {{c|'''७--नाटकीय कथावस्तु का समय'''}} नन्दवंश के नाश, चन्द्रगुप्त के राज्याधिकार, पर्वतक और सर्वार्थसिद्धि के मारे जाने तथा राक्षन के मलयकेतु के गस चले जाने से लेकर उसके फिर से चन्द्रगुप्त का मन्त्रित्व ग्रहण करने तक लगभग एक वर्ष का समय व्यतीत हुश्रा या। चतुर्थ श्रङ्क पंक्ति ४५-४६ में मलयकेतु का कथन है कि श्राज पिता को मरे दस महीने हुए और पर्वतक के मारे जाने के बाद ही मलयकेत के पास गया था। नाटक का प्रारंभ उस दिन से होता है जब जीवसिद्धि, पर्वतक पर विषकन्या के प्रयोग करने के दण्ड में राज्य से निर्वासित किया ..ता है और यह दन्ड पर्व तक के घात के दो ही चार दिन के अनन्तर दिया गया होगा। जिस दिन मलयकेतु ने पूर्वोक्त बात कही थी, उस दिन मार्ग-<noinclude></noinclude> h4vdfgtqr71tzey0xmw0einqopas4ov 675527 675509 2026-08-31T10:14:42Z सौरभ तिवारी 05 49 [[Special:Contributions/~2026-47239-63|~2026-47239-63]] ([[User talk:~2026-47239-63|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:SM7Bot|SM7Bot]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 600932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Neha Tanti" />{{rh||'''( १२ )'''}}</noinclude>नाटक के कथावस्तु का निर्वाह भी विवेचनीय है। इसका प्रासंगिक कथावस्तु सर्वदा गौण तथा आधिकारिक कथावस्तु की सौंदर्य -वृद्ध में महाया रहा। इसके दृश्य और घटनाक्रम ऐसी बुद्धिमानी और कुशलता से सङ्गठित किए गए हैं कि वे कहीं उखड़े से या असंबद्ध नहीं ज्ञात होते। कथावस्तु का प्रारम्भ, मध्य की अवस्थाएँ तथा अन्त भी बड़ी योग्यता से रखे गए हैं, जिससे वे कहीं बेडौल या भद्दे नहीं मालूम पड़ते। प्रथम अङ्क में चाणक्य का आकर कुछ पूर्वेतिहास कहना और नाटक का उद्देश्य बतलाना तथा उसी के साथ ही राक्षस की मुद्रा की प्राप्ति उसे फंसाने का प्रबन्ध करना दिखलाकर दर्शकों को नाटक की घटना का पूरा ज्ञान करा दिया गया। इसके अनन्तर द्वितीय अङ्क में राक्षस के प्रयत्नों का निष्फल होना तथा तय अङ्क में चन्द्रगुप्त और चाणक्य का झूठा झगहा 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बात कही थी, उस दिन मार्ग-<noinclude></noinclude> 7eyfhtkja4wq5ae6umxmvga19lhftqr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/८ 250 159236 675514 508388 2026-08-31T09:05:26Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675514 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>[[File:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 20 (२).png|फ़्रेमहीन|400px]] {{center|१९२१ में}} {{gap}}<noinclude></noinclude> 3swj306n9hkreu5myljsmftect4gl2x पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/२९ 250 159251 675517 508910 2026-08-31T09:21:07Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675517 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|'''चित्र-सूची'''}} {|width=100% |- | १९२१ में || मुखचित्र |- | पत्र : न॰ चि॰ केलकरको, (४-७-१९२१) || ३३६-३७ के सामने |}<noinclude></noinclude> 54vavow1w90jkrbc56ajnctagn471g3 675518 675517 2026-08-31T09:22:14Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675518 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality 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Gandhi, vol. 20.pdf/३६८ 250 159668 675510 508861 2026-08-31T08:45:57Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675510 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>[[चित्र:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 20.png|400px|center|फ़्रेमहीन]] {{center|चित्र : न॰ चि॰ केलकरको}}<noinclude></noinclude> b0yjjt85sd8cpq0iy19yrir15mw7mxb 675511 675510 2026-08-31T08:48:43Z AMAN KUMAR 6475 आकार अद्यतन 675511 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{gap}} [[चित्र:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 20.png|350px|center|फ़्रेमहीन]] {{center|चित्र : न॰ चि॰ केलकरको}} {{gap}}<noinclude></noinclude> 1ybtjj0a84iv8odrr3zznsgsvwgg2fn 675512 675511 2026-08-31T08:57:07Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675512 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{gap}} [[चित्र:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 20.png|350px|center|फ़्रेमहीन]] {{center|पत्र : न॰ चि॰ केलकरको}} {{gap}}<noinclude></noinclude> ckn9o9lb7teelb99zhsc9kuu1biq8en पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३६७ 250 159669 675513 508862 2026-08-31T08:57:33Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675513 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{gap}} [[File:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 20 (१).png|center|350px]] {{center|पत्र : न॰ चि॰ केलकरको (४-७-१९२१)}} {{gap}}<noinclude></noinclude> 3tns8lnboqmafbq9wcq31s8m0v1m3zy 675515 675513 2026-08-31T09:11:00Z AMAN KUMAR 6475 , लगाया 675515 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{gap}} [[File:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 20 (१).png|center|350px]] {{center|पत्र : न॰ चि॰ केलकरको, (४-७-१९२१)}} {{gap}}<noinclude></noinclude> h2loqf7zvanvr3lzxg4mvr9x1aj2lza पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६४० 250 166743 675529 523374 2026-08-31T11:56:33Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 675529 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>अपने लिए दयाकी भीख नहीं माँगता, दयाकी भीख तो मैं ईश्वरसे ही माँगता हूँ लेकिन आपसे मैं सच्चे सैनिककी प्रतिज्ञा माँगता हूँ और कहता हूँ कि यदि आप प्रतिज्ञा करेंगे तो आपको उसका पालन करना ही पड़ेगा। बिना विचारे प्रतिज्ञा करेंगे तो मैं आपको बहुत भारी पड़ूँगा, क्योंकि मैं आपसे प्रतिज्ञाका पालन करवा कर रहूँगा। इसलिए कल यहाँ आप बहुत सोच-विचारकर और सावधान होकर आना। मुझे तीस मिनट लेने थे, लेकिन मैंने ३५ मिनट ले लिये हैं। ये पाँच मिनट लेनेका मुझे अधिकार नहीं था लेकिन भंगीके हितार्थ आपने मुझे यह छूट दी है और मैंने आपसे ली है। :[गुजराती से] :'''नवजीवन''', परिशिष्ट, १८-१-१९२५ {{c|{{x-larger|'''४२५. समापन भाषण : काठियावाड़ राजनीतिक परिषद्‌में'''}}}} {{right|[९ जनवरी, १९२५]<ref>साधन-सूत्रसे।</ref>}} मैं जब-जब काठियावाड़ आया हूँ तब-तब मैंने अपने प्रति काठियावाड़के अपूर्व प्रेमका अनुभव किया है। इसी प्रेमका अनुभव मैंने इस बार भी किया है और इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं। हिन्दुस्तान में मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ वहाँ-वहाँ मुझे काठियावाड़ ही दिखाई देता है--मुझपर प्रेमकी ऐसी ही वर्षा की जाती है। लेकिन मैं तो आपसे [इस प्रेमसे बड़ी] एक दिव्य वस्तु माँगता हूँ। आपके प्रेमसे मैं घबरा जाता हूँ, कारण आप जिस बातको स्वीकार करें उसपर यदि अमल न करें तो मेरे लिए आपका प्रेम पोषक नहीं, वरन् घातक होगा। इस प्रेमसे मेरी उन्नति नहीं हो सकती बल्कि मुझे आलस्य घेरेगा। और यदि मैं जागृत न रहूँ तो मेरी अधोगति हो सकती है। प्रेमसे मैं फूल उठूँ ऐसा मेरा स्वभाव नहीं है, लेकिन यदि वह प्रेम कार्यरूपमें परिणत न हो तो आपके और मेरे बीचके सम्बन्धका क्या होगा? यह सम्बन्ध सार्वजनिक है, व्यक्तिगत नहीं। आपकी सेवा के लिए आपसे मेरा सम्बन्ध है, आप मुझे निजी रूपसे निमन्त्रण दें तो कदाचित् मैं उसे स्वीकार न कर सकूँ, लेकिन आप मुझे सार्वजनिक सेवाके लिए जब चाहें तब बुला सकते हैं। इसलिए जबतक आपका प्रेम सार्वजनिक कार्य में परिवर्तित नहीं होता, तबतक इस प्रेमकी कोई कीमत नहीं। इस प्रेमकी ईश्वरके दरबारमें भले ही कीमत हो लेकिन मैं तो कुछ करना चाहता हूँ और हमारी यह मित्रता उसी कार्यके लिए है। अतः मैं आपसे ऐसे प्रेमकी अपेक्षा करता हूँ जो उस कार्य में सहायक हो। मैं तो प्राकृत मनुष्य ठहरा, मुझमें राग-द्वेष है; भावनाओंको दबाना मेरा धर्म है। हमेशा चित्तवृत्तिके निरोधका प्रयत्न करता रहता हूँ, इसलिए प्रेम भी ऐसा चाहता हूँ, उसे ऐसा रूप देनेका प्रयत्न करता हूँ, जिससे चित्तवृत्ति शान्त हो, जिससे कि मैं जलूँ नहीं। प्रेम अग्निके समान<noinclude></noinclude> b9ahadtl4f1bkgv8kf9wg3knz1zfivm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१२ 250 168662 675233 528228 2026-08-30T12:38:20Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675233 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||छः|}}</noinclude>तककी लम्बी बीमारीके दौरान किया था। (खण्ड १५) दक्षिण आफ्रिका संघर्षके दौरान एक जर्मन सहयोगी कैलेनबेकको लिखते हुए उन्होंने कहा: "मुझे आशा है कि मैं इस दण्डको उचित विनम्रतासे स्वीकार कर रहा हूँ और यदि वह मुझे बीमारीसे फिर उठने दे, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने आचरणको सुधार लूंगा, उसकी इच्छा जाननेका और अधिक प्रयत्न करूँगा और उसके अनुकूल कार्य करूंगा।" (पृष्ठ ३४०) जैसा कि डा० वेन्लेस (पृष्ठ २०९-१०) और जीवराज मेहता (पृष्ठ २२६-२७) से हुई बातचीतसे स्पष्ट है -- गांधीजी काम करते रहनेके लिए अत्यन्त उत्सुक थे, परन्तु उन्होंने काफी हदतक तटस्थता अपना ली थी और सेवाके लिए भी जीवनके मोहसे चिपके रहना नहीं चाहते थे। इस वक्त लिखे गये एकके बाद दूसरे पत्रमे गांधीजीने अत्यन्त शान्त मानसिक अवस्थामें अपनी जीवन-समाप्तिको सम्भावनाका जिक्र किया है। "मैं १३ अप्रैल, १९२८ से आगे किसी तरह भी चल सकनेकी आशा नहीं रखता। मुझे और कुछ नई बात कहने या लिखनेको नहीं। हाँ, यह सम्भव है कि मैं कुछ और इकट्ठा कर लूँ, कुछ और अधिक सुझाव बता दूं या एक पैबन्द वहाँ लगा दूं और एक यहाँ लगा दूं। परन्तु वास्तवमें मेरा समय आ गया है।" (पृष्ठ २११) उसी पत्रलेखकको लिखे गये दूसरे पत्रमें उन्होंने कहा: “और तब सारी असाधारण सतर्कताके बावजूद वह [प्रकृति] एक दिन अपना दूत भेज देगी; जो रातमें चोरकी तरह चुपकेसे सबकी नजर बचाकर ऐसी खुराक देगा जो मुझे चिर-निद्रामें सुला देगी। (पृष्ठ ४३२) इस वक्त गांधीजीका मुख्य काम खादीका रहा; और उन्होंने कांग्रेसके राजनीतिक कार्यक्रमको पूरी तरह मोतीलाल नेहरूके नेतृत्वमें चलनेवाली स्वराज्य पार्टीकी देख-रेखमें छोड़ दिया था। यद्यपि कांग्रेसने खादी कार्यक्रम सार्वजनिक रूपमें स्वीकार कर लिया था और खादीकार्यका संगठन करनेके लिए अखिल भारतीय चरखा संघ नामकी नई संस्था स्थापित हो गई थी तो भी बड़ी संख्यामें कांग्रेसियोंने इस कार्यक्रमके समर्थनमें उत्साह नहीं दिखाया। वे गौहाटी कांग्रेसमें स्वीकार की गई खादी सदस्यताके विरोधी बने रहे। ऐसा लगता है कि गांधीजीने इस परिस्थितिसे समझौता कर लिया था। कांग्रेस अध्यक्ष श्री एस० श्रीनिवास आयंगार द्वारा सदस्यताके मामलेपर झुक जानेके लिए दिये गये तर्कपर टिप्पणी करते हुए गांधीजीने कहा: "जहाँ बहुसंख्यक[समुदाय] अल्पसंख्यकों द्वारा गहराईसे महसूस की जानेवाली किसी रायकी अपनी संख्याके बलपर पूर्ण अवहेलना करता हुआ आगे बढ़ता है वहाँ हिंसाकी गंध आने लगती है।... इसलिए मुझे अध्यक्ष महोदयसे यह साफ-साफ कह देनेमें कोई झिझक नहीं हुई कि यदि अल्पसंख्यक सदस्य इस शर्तका पालन करनेको राजी न हों तो उन्हें उस शर्तको हटा देनेमें मदद करनी चाहिए।" (पृष्ठ ४८९) उन्होंने आगे कहा कि उन्हें [गांधीजीको] इस धाराके बारेमें अपनी राय बनाये रखने देनी चाहिए--यद्यपि इस रायका महत्त्व किसी भी दूसरे कांग्रेसी सदस्यकी रायसे ज्यादा नहीं होगा।<noinclude></noinclude> e8rfg2j6llezpe97eg1qq0whxh9fwkn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१३ 250 168664 675236 528230 2026-08-30T12:47:10Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675236 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||सात|}}</noinclude>५ फरवरीको श्री सकलातवाला गांधीजीसे यवतमालमें मिले और दूसरे महीनेमें उन्होंने गांधीजीको एक खुली चिट्ठी लिखी। (परिशिष्ट १) इस पत्रमें उन्होंने कहा कि गांधीजीको मजदूर और किसानोंके संगठनमें कम्युनिस्टोंका हाथ बँटाना चाहिए और महात्मा होनेका स्वाँग छोड़ देना चाहिए। गांधीजीने उत्तरमें कहा कि श्री सकलातवालाके मनमें देशभक्ति और मानवताके प्रति प्रेम किन्तु जिसे श्री सकलातवाला मेरी गलती बताते हैं, वह स्वयं मेरी समझमें गलती नहीं है; मैं तो उसे अपने मनको सान्त्वना देते रहनेवाली एक संरक्षक शक्ति ही समझता हूँ। उन्होंने कहा: पूँजीपतियोंको मजदूरोंका शत्रु नहीं मानता। मेरी समझमें तो उन दोनोंके बीच निश्चय ही पारस्परिक सहयोग सम्भव है।" (पृष्ठ १८० ) ' बॉम्बे क्रॉनिकल 'को भेंट देते हुए गांधीजीने इसी विचारको और भी स्पष्ट करते हुए कहा: "मैं चाहता हूँ कि पूंजी और श्रमके बीच सच्चा सहयोग हो।... राजनीतिक आन्दोलनकी तरह मैं मजदूरोंके आन्दोलनमें भी आन्तरिक सुधारपर अर्थात् उनमें आत्मसन्तोषकी भावना भरनेपर विश्वास करता हूँ।... मजदूरोंको आत्मबलका विकास करना चाहिए। तब पूंजी सचमुच श्रमकी दासी बन जायेगी।" (पृष्ठ २०४) गांधीजीको जिस तरह सिद्धान्तके रूपमें संघर्ष उचित नहीं लगता था, उसी तरह उन्हें बड़े पैमानेपर की गई चीजें भी पसन्द नहीं आती थीं। अखिल भारतीय मजदूर संघसे अहमदाबादके मजदूरोंको अलग रखनेके रुखका समर्थन करते हुए गांधीजीने अपनी श्रम-नीतिको इस तरह स्पष्ट किया: "उद्देश्य मजदूरोंके लिए पूंजीका उचित भाग लिया जाना ही है।... श्रमिकोंको इस प्रकार शिक्षित किया जाये कि अपने नेतृत्वका विकास स्वयं करें।... इसका (आन्दोलनका) स्पष्ट उद्देश्य है, आन्तरिक सुधार एवं आन्तरिक शक्तिका विकास।..."मजदूरोंको राजनीतिज्ञोंके दाँव-पेचके मुहरे कभी नहीं बनना चाहिए।(पृष्ठ ३२५) गांधीजी जब श्रमिकों द्वारा पूंजीमें से “उचित भाग" लेनेकी बात करते थे, तब निश्चय ही वे "धनिकों और मजदूरोंके रहन-सहनमें हम जो अन्यायपूर्ण अन्तर देखते हैं" (पृष्ठ २९२) उसका विरोध कर रहे होते थे। गरीबकी झोंपड़ी और धनवानके महलका 'भयंकर अन्तर' भी उन्हें सह्य नहीं था। सकलातवालाके साथ गांधीजीकी इस विषयपर जो चर्चा हुई, उसमें उन्होंने अपने मानवतावादी सूत्रको इस प्रकार प्रस्तुत किया: "हम सबकी धारणाएँ बिलकुल एक नहीं हो सकतीं। फिर भी अपने साथियोंके कामों और मतोंके प्रति हम वही आदरभाव रख सकते हैं, जिस प्रकारके आदरभावकी आशा हम अपने कामों और मतोंके प्रति दूसरोंसे रखते हैं।" (पृष्ठ ३२६) गोरक्षासे सम्बन्धित अपने लेखोंमें गांधीजीने उसकी सफलताके आधारोंको बड़ी स्पष्टतासे रखा और उसमें यथार्थ परिस्थितियोंको कदापि आँखोंसे ओझल नहीं होने दिया। "गाय और भैंस दोनोंको एक-साथ बचा सकना असम्भव है।" (पृष्ठ २१४) उन्होंने कहा: “गोशालाओंको शास्त्रीय ढंगसे चलाया जाना चाहिए और साथ ही आदर्श दुग्धालय और आदर्श चर्मालय भी खोले और चलाये जाने चाहिए। उनके संचालनका आधार होना चाहिए: न लाभ न हानि। "जो धर्म आर्थिक दृष्टिसे<noinclude></noinclude> pwspqnf06tkewato3fqgz6rfp6gnydc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१४ 250 168665 675238 528231 2026-08-30T12:52:49Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675238 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{||आठ|}}</noinclude>मेल नहीं खाता, वह धर्म नहीं है। " (पृष्ठ ४२१) इसी सन्दर्भमें गांधीजीने प्रत्येक युगमें समाजके विचारों और जीवनमें परिवर्तनकी आवश्यकतापर जोर दिया और हमारी भयंकर मानसिक जड़ता तथा सामाजिक गतिरोध और सिद्धान्तोंको आँख मूंदकर अपना लेनेकी प्रवृत्तिकी आलोचना की। स्वदेशी विचार तकको बिना सोचे- समझे पकड़कर बैठ जाना उन्हें पसन्द नहीं था। अगर हम कपड़ा सीनेकी सुई गांवमें न बना सकते हों और आस्ट्रियाकी बनी सुई सस्ती मिलती हो, तो उसके प्रति हमारे मनमें कोई विरोध-भाव नहीं होना चाहिए। मैं अच्छी और अपनाई जा सकनेवाली चीज लेनेमें कोई दोष नहीं देखता।...भले ही वह चीज बाहरकी ही क्यों न हो।" (पृष्ठ ३८०) गांधीजी किसी भी प्रकारकी कट्टरताके खिलाफ थे, यह बात सतीशचन्द्र दासगुप्तको लिखे गये एक पत्रसे भी स्पष्ट होती है, जिसमें उन्होंने सतीशबाबूके बिगड़ते हुए स्वास्थ्यको देखते हुए उन्हें पुन: मांसाहार प्रारम्भ कर देनेकी सलाह दी थी। (पृष्ठ ३६१-६२) व्यक्तिको आदर्श और उपलब्धिके बीच थोड़ी-बहुत गुंजाइश तो छोड़नी ही पड़ती है। बकरीका दूध भी तो आखिरकार पशुसे प्राप्त होनेवाला खाद्य पदार्थ है। इसे लेना वे एक कमजोरी मानते थे; (पृष्ठ २८०) किन्तु वे यह भी कहते थे कि आदर्शसे इस प्रकार हटनेकी बात अपवादस्वरूप ही होनी चाहिए,नियमस्वरूप नहीं। मीराबहनके नाम पत्रमें उन्होंने इसे स्पष्ट किया है। "व्रतोंके बारेमें नियम यह है कि जब शंका हो, तब अपने विपक्षमें पड़नेवाला अर्थ लगाओ अर्थात् अपने ऊपर और अधिक प्रतिबन्ध रखो।" (पृष्ठ २९८) यदि कोई अपने मान्य-धर्मके अनुसार आचरण करना चाहता है, तो केवल उस विषयमें बातचीत करना या उसका उपदेश करना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए आवश्यक है कि हम निरन्तर आत्मनिरीक्षण करते रहें, अपनी असफलताओंको देखते, समझते और प्रगट करते रहें---इसके बिना निश्चित आदर्शोंको प्राप्त करना सम्भव नहीं है। प्राणपणसे प्रयत्न करना ही उनतक पहुँचनेका मार्ग है। आदमी एक विकास-शील प्राणी है। वह अपनी सत्ताको तभी चरितार्थ कर सकता है जब वह अपनी हृदयगत शक्तियोंका नित्य प्रस्फुटन करता चला जाये। "मनुष्यको सच्चा मनुष्य बननेके लिए अपना संस्कार करना चाहिए। हिन्दू इस संस्कारको द्विज बनना कहते हैं और ईसाई इसीको दुबारा पैदा होना कहते हैं।" (पृष्ठ २६७) डा० मुंजेने हिन्दू धर्मके विषयमें शास्त्रोंका शाब्दिक अर्थ लेकर जो रूप समझा था, उसे उन्होंने 'विकृत' कहा। गांधीजी कहते हैं: "मैं बड़ी नम्रतासे यह दावा करता हूँ कि मैंने सदा हिन्दू धर्मका पालन किया है।" (पृष्ठ ३४८) धर्म किन्हीं बाहरी जमी-जमाई मान्यताओं अथवा निश्चित विधि-निषेधोंसे प्राप्त होनेवाली वस्तु नहीं है; वह तो हमारे अन्तरका एक अनुक्षण होनेवाला विकास है। "वेद कागजपर लिखे हुए अक्षरोंका नाम नहीं है।" (पृष्ठ ९९-१००) जब हम अपने ज्ञानके अनुसार आचरण करते हैं, तभी हममें ज्ञानके अंकुर फूटते हैं। "बगैर अमलके अध्ययन निरर्थक हो जाता है और वह मनुष्यमें घमंड पैदा करता है। इसलिए<noinclude></noinclude> t0zdxpp8wuk1oahgffirx5f1kuttfms पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५ 250 168717 675245 528359 2026-08-30T13:16:42Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675245 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||नौ|}}</noinclude>जो कुछ भी पढ़ा जाये, उसपर जल्दीसे-जल्दी अमल शुरू कर देना चाहिए।" (पृष्ठ ४५८) यदि हम वेद अथवा अन्य शास्त्रोंका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहते हैं, तो "आधुनिक अनुभवके साथ मिलाकर खूब सात्त्विक निरीक्षण करके, शुद्ध दोहन करना आवश्यक है।" (पृष्ठ ४६०) यदि कोई व्यक्ति अपने अनुभवके आधारपर शास्त्रोंकी पुनर्व्याख्या करता है तो कई बार ऐसा भी होता है कि समकालीन सत्यान्वेषकोंमें अप्रत्याशित रूपसे उन्हीं निर्णयोंपर पहुँचनेवाले लोग मिल जाते हैं। उदाहरणके लिए 'सेंट मैथ्यु', अध्याय ५-२२के अधिकृत संस्करणमें "अकारण" (विदाउट ए काज) शब्दोंको गांधीजीने सत्य और अहिंसाके सिद्धान्तसे बेमेल पाया और इसीलिए उन्हें स्वीकार नहीं किया। बादमें उन्होंने देखा कि परवर्ती अनुवादकोंने उन शब्दोंको छोड़ दिया है। (पृष्ठ ३८४) "मनुष्यको अपने पूर्वजों द्वारा अपनाये गये धर्ममें आत्ममुक्तिका उपाय स्वयं खोजना चाहिए, क्योंकि सत्यकी खोज करनेवाला इस निष्कर्षपर पहुँचता है कि सारे धर्म घुल-मिलकर ईश्वरमें समा जाते हैं, उस ईश्वरमें जो एक है और अपने बनाये सभी जीवधारियोंके लिए समान है।" (पृष्ठ ३८१) यदि कोई व्यक्ति इस बातको ध्यानमें रखकर प्राचीन धर्मोकी नवीन व्याख्या करनेकी स्वतन्त्रता ले तो उसमें लगभग कोई खतरा नहीं बचता और न किसी प्रकारकी हानि ही होती है। गांधीजी पुराणोंकी सारगर्भित और काव्यपूर्ण प्रेरणासे भली-भाँति अवगत थे। वे यह भी जानते थे कि उनके आधारपर धर्मके प्रति प्रेम जगाया जा सकता है। (पृष्ठ २५७) उन्होंने कहा कि स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता, शुद्धि और मुक्तिके लिए सीता और द्रौपदीके उदाहरण हमारे आजकी परदा आदि प्रथाओंके विरोध में प्रमाण हैं। इनसे स्त्रियोंकी उन्नति हो सकती है और परदा आदि प्रथाएँ तो नष्ट कर देनेके योग्य ही हैं। (पृष्ठ ५०) प्राचीन महाकाव्य हमारे सामने जिस धर्मको प्रस्तुत करते हैं, वह समाजको नीतिवान बनाये रख सकता है; उसे भली-भांति समझा जाना चाहिए और तदनुसार आचरण किया जाना चाहिए। हमारी परम्परा एक जीवन्त परम्परा है और इसमें प्रत्येक व्यक्तिको आत्मनिरीक्षणके द्वारा विकास करते रहना चाहिए। कर्म-सिद्धान्तका वास्तविक अर्थ सारे दुष्कर्मोको निकाल फेंकना है। "जो अपने सब दुष्कर्मों का हिसाब नहीं रखता, वह मानव-जातिमें गिने जाने योग्य नहीं है।"(पृष्ठ ४२६) शास्त्रीय अथवा वैज्ञानिक विचारकी तरह नैतिक विचार भी एक पुँजीभूत सम्पत्ति है। इसमें सिद्धान्त और आचरण दोनों शामिल हैं और इसका विकास अमलके बाद आये हुए परिणामोंको एक-दूसरेसे मिलाकर फैलाते रहनेपर ही होता है। "मैं एक नम्र किन्तु दृढ़ सत्यान्वेषी हूँ और अपने सत्यान्वेषणके दौरान सभी सत्यान्वेषियोंके सामने अपनी सारी बातें साफ तौरपर रखता रहता हूँ ताकि अपनी गलतियाँ समझ सकूँ और उन्हें सुधार लूं।" "(पृष्ठ २६५) यह समझना आसान नहीं है और कदा- चित् यह निर्णय लेना मी आवश्यक नहीं है कि हमारे समकालीन सत्यान्वेषियोंमें से हम किसे अपने प्रयोगोंसे अवगत करें और उनके विषयमें किससे सलाह लें। "हम<noinclude></noinclude> dyfqpsg2pu0ct1t5wsmllordvehteaf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६ 250 168718 675247 528360 2026-08-30T13:23:32Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675247 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||दस|}}</noinclude>अपना हृदय तो वहीं उँडेल सकते हैं जहाँ ऐसा करना हमारे लिए सम्भव है किन्तु (उँडेल देनेके बाद) पानी चाहे जहाँ वह सकता है।" (पृष्ठ ६) इस खण्डमें शामिल किये गये पत्रोंमें, मणिलाल और उनकी पत्नी सुशीला,आश्रमकी बहनों और मीराबहनको लिखे गये पत्र खास दिलचस्प हैं। उनसे गांधीजी ऐसे शिक्षकके रूपमें सामने आते हैं जिसके लिए, व्यक्तिके लिए भी "वैसे ही संरक्षण और देखरेखकी जरूरत है जैसी कि स्वराज्यके पूरे मसलेके लिए..."। (पृष्ठ ४८१) वह आदर्शपर जमे रहनेके लिए दृढ़ प्रतीत होते थे परन्तु मानव व्यक्तित्वके प्रति सदा आदर-भाव रखते थे। उन्होंने अत्यन्त स्पष्टता और बिना रत्तीभर संकोचके मणिलाल और सुशीला गांधीको विवाहित अवस्थामें आत्मसंयमकी आवश्यकता समझाई (पृष्ठ ६०-६१, १४२-४३) आश्रमकी बहनोंको, जिनमें से बहुत-सी महिलाओंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लिखे गये अपने पत्रोंमें गांधीजीने राष्ट्रीय पुनरुत्थानमें महिलाओंका महत्त्व समझाया और उन्हें दिलचस्प लगनेवाले समाचार सुनाये; आश्रमके मामलोंकी चर्चा की और उनसे अनुरोध किया कि वे अपनी हृदयकी दुर्बलताको छोड़ दें और अपने-आपको देशकी सेवाके लिए तैयार रखें। जब इनमें से बहुत-सी महिलाएँ १९३०-३२ के सत्याग्रह आन्दोलनमें जेल गईं और उन्होंने पुलिसके अत्याचारोंका भी सामना किया तब धैर्यपूर्वक किये गये इस प्रयत्नका फल पर्याप्त रूपमें सामने आया। परन्तु गांधीजीके इस स्वभावका सबसे अच्छा रूप मीराबहनको लिखे गये पत्रोंमें ही दिखाई देता है कि वे अपने प्रति स्नेहके बन्धनमें बँधे लोगोंसे किस तरह समयके अनुरूप कठोर या कोमल व्यवहार करते थे। मीराबहन १९२५ के अन्तमें आश्रममें आईं थीं। मीराबहनने गांधीजीसे मुलाकात होनेसे पहले ही अपना जीवन उन्हें समर्पित कर दिया था। (परिशिष्ट ५) उन्हें निजी तौर पर गांधीजीसे बहुत ज्यादा लगाव था और उनकी आवश्यकताओंकी पूर्ति करनेके लिए वह सदा उनके पास रहना चाहती थीं। परन्तु गांधीजी चाहते थे कि मीराहबनकी उनके प्रति श्रद्धा उनके कामके प्रति श्रद्धामें बदल जाये। “तुम मेरे कामको अपना ही समझकर करनेसे रोज मेरे सम्पर्कमें आती हो ..। तुम मेरे पास मेरी खातिर नहीं, बल्कि मेरे उन आदर्शोंकी खातिर, जिस हदतक मैं उनका पालन करता हूँ, आई हो।... काम करते हुए भगवान हमें निकट ला दे तो अच्छा ही है, लेकिन समान उद्देश्यकी पूर्तिमें वह हमें अलग-अलग रखे तो भी ठीक है।" (पृष्ठ ३२०) वह चाहते थे कि मीराबहन सब प्रकारसे एक कुशल महिला बने परन्तु उन्होंने उनसे कहा "तुम्हें अपने ही ढंगसे विकास करना चाहिए।...चाहे कुछ भी हो तुम्हें अपना व्यक्तित्व अवश्य कायम रखना चाहिए। जहां आवश्यक हो, मेरी बात तुम्हें नहीं माननी चाहिए।" (पृष्ठ १९४-९५) गांधीजीके अचानक बीमार पड़ जानेकी खबरसे मीराबहन घबरा गई और यह स्वाभाविक ही था कि वह उनके पास रहनेके लिए उत्सुक होती। गांधीजीने उनकी मनःस्थितिके परिवर्तनोंको तत्काल समझ लिया और मानवताके नाते उन्हें सान्त्वना देनेकी भरसक कोशिशकी परन्तु उन्हें स्वेच्छासे काम करनेके लिए स्वतन्त्र रखा।<noinclude></noinclude> ch71yxxcm5vl0z5c7ym69ptdg9m4cle पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७ 250 168720 675248 528363 2026-08-30T13:25:49Z रितु कुमारी साव 6333 675248 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="शीतल सिन्हा" />{{rh||ग्यारह|}}</noinclude>''''वर्ल्डस यूथ' के सम्पादकके सन्देश मांगने पर उन्होंने लिखा: सत्य और प्रेम संयुक्त रूपसे मेरे जीवनके पथ-प्रदर्शक सिद्धान्त रहे हैं। जिस परमेश्वरकी व्याख्या नहीं की जा सकती, यदि कदाचित् उसका कुछ भी निरूपण किया जा सकता हो, तो मैं यही कहूँगा कि ईश्वर सत्य है। सिवाय प्रेमके उसतक पहुँच पाना असम्भव हैं। प्रेम पूर्णरूपेण अभिव्यक्त तभी हो सकता है, जब मनुष्य अपनी खुदीको शून्य कर डाले, शून्यवत् होनेकी यह प्रक्रिया ही किसी स्त्री या पुरुष द्वारा किया जा सकनेवाला सर्वोत्तम प्रयत्न है। यही एकमात्र एक ऐसा प्रयत्न है जो करणीय है और यह केवल उत्तरोत्तर वर्द्धमान आत्मसंयम द्वारा ही सम्भव हो सकता है।" (पृष्ठ ४८३)'''<noinclude></noinclude> epwh76gth16ovkr477giafpsz3hpusd 675249 675248 2026-08-30T13:26:04Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675249 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||ग्यारह|}}</noinclude>''''वर्ल्डस यूथ' के सम्पादकके सन्देश मांगने पर उन्होंने लिखा: सत्य और प्रेम संयुक्त रूपसे मेरे जीवनके पथ-प्रदर्शक सिद्धान्त रहे हैं। जिस परमेश्वरकी व्याख्या नहीं की जा सकती, यदि कदाचित् उसका कुछ भी निरूपण किया जा सकता हो, तो मैं यही कहूँगा कि ईश्वर सत्य है। सिवाय प्रेमके उसतक पहुँच पाना असम्भव हैं। प्रेम पूर्णरूपेण अभिव्यक्त तभी हो सकता है, जब मनुष्य अपनी खुदीको शून्य कर डाले, शून्यवत् होनेकी यह प्रक्रिया ही किसी स्त्री या पुरुष द्वारा किया जा सकनेवाला सर्वोत्तम प्रयत्न है। यही एकमात्र एक ऐसा प्रयत्न है जो करणीय है और यह केवल उत्तरोत्तर वर्द्धमान आत्मसंयम द्वारा ही सम्भव हो सकता है।" (पृष्ठ ४८३)'''<noinclude></noinclude> 2ee1271pqqilfxeryqhbzreqvc3dje0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९ 250 168782 675253 528543 2026-08-30T13:32:01Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675253 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''आभार'''}} इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास (साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट) और संग्रहालय; नवजीवन ट्रस्ट; गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद, गांधी स्मारक निधि व संग्रहालय, नई दिल्ली; नेशनल आर्काइव्ज ऑफ इंडिया, नई दिल्ली; म्युनिसिपल म्यूजियम, इलाहाबाद;श्री लालचन्द वोरा, बगसरा; श्रीमती मीराबहन, गाडेन, ऑस्ट्रिया; श्रीमती गंगाबहन वैद्य, बोचासन; श्रीमती राधाबहन चौधरी, कलकत्ता; श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्रीमती हरिइच्छाबहन कामदार, बड़ौदा; श्रीमती सुशीलाबहन गांधी, फीनिक्स, डर्बन, श्रीमती शारदाबहन शाह, सुरेन्द्रनगर; श्री नारणदास गांधी, राजकोट, श्रीमती लक्ष्मीबहन खरे, अहमदाबाद; श्री पुरुषोत्तम डी॰ सरैया, बम्बई; श्री चन्द त्यागी, जसपुर, जिला नैनीताल; श्री के॰ पी॰ एस॰ मलानी, वाराणसी; श्री नारायण देसाई, बारडोली; श्री वालजीभाई देसाई, पूना; श्री जमनादास गांधी; श्री छगनलाल गांधी, अहमदाबाद; श्रीमती कार्लाइल बमलेट, बैक्सहिल, ससेक्स; श्री रमणीकलाल मोदी, अहमदाबाद; श्रीमती वसुमती पण्डित, सूरत, श्री गुलजारीलाल नन्दा, नई दिल्ली; 'द इम्मॉर्टल महात्मा', 'ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स', 'पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद', 'बापुना पत्रो -- ४ : मणिबहेन पटेलने', 'बापुना पत्रो -- २ : सरदार वल्लभभाई पटेलने', 'बापुनी प्रसादी', 'बापूज लेटर्स टु मीरा', 'माई डियर चाइल्ड', 'लाला लाजपतराय - एक जीवनी', 'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री', पुस्तकोंके प्रकाशकों तथा निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाओंके आभारी हैं: 'अमृतबाजार पत्रिका', 'आज', 'नवजीवन', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'मॉडर्न रिव्यू', 'यंग इंडिया', 'लीडर', 'सर्चलाइट', 'हिन्दुस्तान टाइम्स' और 'हिन्दू'। अनुसन्धान व सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयके अनुसन्धान और सन्दर्भ विभाग (रिसर्च ऐंड रेफेरेंस डिविजन), नई दिल्ली; और श्री प्यारेलाल नैयर हमारे धन्यवादके पात्र हैं। प्रलेखोंकी फोटो-नकल तैयार करने में मदद देनेके लिए हम सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयके फोटो विभाग, नई दिल्लीके आभारी हैं।<noinclude></noinclude> rp04seyzjkh5vibhuzec5l7ps1n1y03 675254 675253 2026-08-30T13:32:19Z रितु कुमारी साव 6333 675254 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''आभार'''}}}} इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास (साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट) और संग्रहालय; नवजीवन ट्रस्ट; गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद, गांधी स्मारक निधि व संग्रहालय, नई दिल्ली; नेशनल आर्काइव्ज ऑफ इंडिया, नई दिल्ली; म्युनिसिपल म्यूजियम, इलाहाबाद;श्री लालचन्द वोरा, बगसरा; श्रीमती मीराबहन, गाडेन, ऑस्ट्रिया; श्रीमती गंगाबहन वैद्य, बोचासन; श्रीमती राधाबहन चौधरी, कलकत्ता; श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्रीमती हरिइच्छाबहन कामदार, बड़ौदा; श्रीमती सुशीलाबहन गांधी, फीनिक्स, डर्बन, श्रीमती शारदाबहन शाह, सुरेन्द्रनगर; श्री नारणदास गांधी, राजकोट, श्रीमती लक्ष्मीबहन खरे, अहमदाबाद; श्री पुरुषोत्तम डी॰ सरैया, बम्बई; श्री चन्द त्यागी, जसपुर, जिला नैनीताल; श्री के॰ पी॰ एस॰ मलानी, वाराणसी; श्री नारायण देसाई, बारडोली; श्री वालजीभाई देसाई, पूना; श्री जमनादास गांधी; श्री छगनलाल गांधी, अहमदाबाद; श्रीमती कार्लाइल बमलेट, बैक्सहिल, ससेक्स; श्री रमणीकलाल मोदी, अहमदाबाद; श्रीमती वसुमती पण्डित, सूरत, श्री गुलजारीलाल नन्दा, नई दिल्ली; 'द इम्मॉर्टल महात्मा', 'ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स', 'पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद', 'बापुना पत्रो -- ४ : मणिबहेन पटेलने', 'बापुना पत्रो -- २ : सरदार वल्लभभाई पटेलने', 'बापुनी प्रसादी', 'बापूज लेटर्स टु मीरा', 'माई डियर चाइल्ड', 'लाला लाजपतराय - एक जीवनी', 'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री', पुस्तकोंके प्रकाशकों तथा निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाओंके आभारी हैं: 'अमृतबाजार पत्रिका', 'आज', 'नवजीवन', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'मॉडर्न रिव्यू', 'यंग इंडिया', 'लीडर', 'सर्चलाइट', 'हिन्दुस्तान टाइम्स' और 'हिन्दू'। अनुसन्धान व सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयके अनुसन्धान और सन्दर्भ विभाग (रिसर्च ऐंड रेफेरेंस डिविजन), नई दिल्ली; और श्री प्यारेलाल नैयर हमारे धन्यवादके पात्र हैं। प्रलेखोंकी फोटो-नकल तैयार करने में मदद देनेके लिए हम सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयके फोटो विभाग, नई दिल्लीके आभारी हैं।<noinclude></noinclude> 1x94lo46uqnvimverfd7z03msg37vlw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६९२ 250 176161 675269 615854 2026-08-30T14:21:44Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 675269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{rh|६५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Multicol}} {{outdent|बोस, एच०, १६६}} {{outdent|बोस, सत्यानन्द, ५४०}} {{outdent|ब्रज किशोर प्रसाद, बाबू, ३७२, ३८२, ३९५}} {{outdent|ब्रह्मचर्य, १७, ३६, ५३, १६९; -व्रतकी व्याख्या, ९६, १००}} {{outdent|ब्रह्मचारी, १०९}} {{outdent|ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेवीगेशन कम्पनी, ४३}} {{outdent|ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेवीगेशन सर्विस, ४८१}} {{outdent|ब्रिटिश भारतीय, ११४}} {{outdent|ब्रिटिश संविधान, ११३}} {{c|'''भ'''}} {{outdent|भगत, बापूजी, १४३, १८५, १८८}} {{outdent|भगवद्गीता, ७४, १६९, २०४ पा० टि., २२२, २२५, २३३, २७३, ४३७ पा० टि०}} {{outdent|भगवानजी अनूपचन्द वकील, ५३६, ५७२}} {{outdent|भगवान लाल, १६२}} {{outdent|भगा, ३१०}} {{outdent|भगिनी-समाज, २०४ पा० टि०}} {{outdent|भण्डारकर, सर रामकृष्ण गोपाल, २३, २४०}} {{outdent|भरत, ३६७}} {{outdent|भाईचन्द, १८१}} {{outdent|भागवत, १८०, १९१}} {{outdent|भाजेकर, १७७}} {{outdent|भारत, -की गरीबीके कारण, ८४; -की जनतासे सहायता, दक्षिण आफ्रिकी संघर्षको, १; -में गांधीजीकी विदेशसे वापसी १; -म स्थायी रूपसे रहनेका इरादा, २}} {{outdent|भारत उपमन्त्री, -ने गांधीजीको पोलकके कारण भारत लौटनेके लिए लिखा, १}} {{outdent|भारत प्रतिरक्षा कानून, ३०६}} {{outdent|भारत सेवक, २०२ पा० टि०}} {{outdent|भारत सेवक मण्डल, -देखिए भारत सेवक समाज}} {{outdent|भारत सेवक समाज (सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी), ९, २१, ६७, ८३, ९३ पा० टि., १२१ पा० टि., १४३ पा० टि० १५२-५३, १५६, १६२, १६४, १८३}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}पा० टि., १८९, २०५, २२८, २४६, २५३-५४, २५७, २६८ पा० टि., ३३६, ३४९, ४५५, ४६३; -की सदस्यताका प्रश्न, २१; -की सदस्यताका प्रार्थनापत्र वापस लिया, २०२ पा० टि०}} {{outdent|भारतीय ईसाई, ६७}} {{outdent|भारतीय गिरमिटिया, २५१}} {{outdent|भारतीय दक्षिण आफ्रिकी संघ, ७९, ८१, १७१ पा० टि०}} {{outdent|भारतीय दलित वर्ग संघ, ७२, १७० पा० टि०}} {{outdent|भारतीय प्रतिरक्षा विधेयक, ३५४}} {{outdent|भारतीय भाषाओंका महत्त्व, ५७; -की दरिद्रता, ४६७; -को सीखनेकी सलाह, १२३}} {{outdent|भारतीय महिला विश्वविद्यालय, २४७}} {{outdent|भारतीय राहत विधेयक (१९१४), २ पा० टि.; -में दक्षिण अफ्रीकाके भारतीयोंकी सन्तोष, २}} {{outdent|भारतीय व्यवस्थापिका सभा, १४६}} {{outdent|भालचन्द्र कृष्ण, सर, ९}} {{outdent|भावे, आचार्य विनोबा, २८२}} {{outdent|भावे, नरहरि शम्भुराव, २८२}} {{outdent|भीमजी, अली मुहम्मद, ९}} {{outdent|भीमजी, हरिजन (चावडा), १७४}} {{outdent|भूपेन, बाबू, १६५}} {{outdent|भोजा भगत, १४८}} {{c|'''म'''}} {{outdent|मंगल, १७८-७९}} {{outdent|मंगलनाथ, १६७}} {{outdent|गगन, ८८}} {{outdent|मजुमदार, १५७}} {{outdent|मधुरदास, त्रिकमजी, १९, ३३, १२२-२३, १४१-४२, ३५८, ४९३}} {{outdent|'''मद्रास मेल''', ५३, ५७}} {{outdent|मधुबन, ५०६}} {{outdent|मनसुखभाई, १७३}} {{outdent|मनसुखलाल, १७९, ४७३}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> cypdkk6e50yw57wuhd8b60dx8wl3u2x पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३६ 250 176293 675265 616694 2026-08-30T14:11:20Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 675265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|बत्तीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |६७७.|| पत्र: कोंडा वेंकटप्पैया गारूको (१२-६-१९२६)|| ६११ |- |६७८.|| पत्र : सी० वी० कृष्णको (१२-६-१९२६)|| ६११ |- |६७९.|| पत्र : 'फॉरवर्ड' के सम्पादकको (१२-६-१९२६)|| ६१२ |- |६८०.|| पत्र : गंगाबहन मजमुदारको (१२-६-१९२६)|| ६१३ |- |६८१.|| पत्र : मूलशंकर कानजी भट्टको (१२-६-१९२६)|| ६१३ |- |६८२.|| पत्र: सोमनाथ पुरुषोत्तमको (१२-६-१९२६)|| ६१४ |- |६८३.|| पत्र: जगजीवनदास नारणदास मेहताको (१२-६-१९२६)|| ६१४ |- |६८४.|| स्वाभाविक किसे कहेंगे? (१३-६-१९२६)|| ६१५ |- |६८५.|| महुधा खादी कार्यालय (१३-६-१९२६)|| ६१७ |- |६८६.|| अपंग ढोरोंका क्या हो? (१३-६-१९२६)|| ६१९ |- |६८७.|| पत्र: एन० एस० वरदाचारीको (१३-६-१९२६)|| ६१९ |- |६८८.|| पत्र: वी० लॉरेंसको (१३-६-१९२६)|| ६२० |- |६८९.|| पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (१३-६-१९२६)|| ६२१ |- |६९०.|| पत्र : कासम अलीको (१३-६-१९२६)|| ६२२ |- |६९१.|| सन्देश : विद्यार्थियोंको (१४-६-१९२६ या उसके पूर्व)|| ६२२ |- | || '''परिशिष्ट''' || |- | || {{gap|1em}}१. गांधीजीके नाम विट्ठलभाई पटेलका पत्र|| ६२५ |- | || {{gap|1em}}२. साबरमती-समझौता || ६२६ |- | || सामग्री के साधन-सूत्र || ६३० |- | || तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ६३१ |- | || शीर्षक-सांकेतिका || ६३५ |- | || सांकेतिका || ६४२ |}<noinclude></noinclude> t23rbtwphjwencd9mmm9pl9jn24aq1m पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/६९१ 250 176896 675264 619886 2026-08-30T14:03:40Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 675264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>  {{c|{{x-larger|सांकेतिका}}}} {{rh|||६५५}} {{Multicol}} {{c|'''फ'''}} {{outdent|फकीरा, ४६५}} {{outdent|फकीरी, ८८, १६४, १८४}} {{outdent|फड़के, मामा, १७६, १८१, १८७, २७७, ४३५, ४३७-३८}} {{outdent|फर्ग्यूसन कॉलेज, २०६, २४७}} {{outdent|फिरदौस, ३०५ पा० टि०}} {{outdent|फ़ौजी, २४९, ३४०-४२, ३५५, ३९७, ५२२-२३}} {{outdent|फीनिक्स आश्रम, ५३, ५७, ६१, १११, ११५, १२५, १३८, २८३; -का आदर्श, ५२}} {{outdent|फुली, १६१}} {{outdent|फैरिग, कुमारी एस्थर, ३२९, ३३१, ३५९, ३६१, ३६६, ३७३, ३८५, ३८८, ४०७, ४२३, ४४५, ४४७, ४५१, ४५७-५८, ४६०, ४७१, ४७७, ४९०, ५०७, ५३४-३५, ५७२}} {{c|'''ब'''}} {{outdent|बंगाल काश्तकारी कानून, ४०६-०७, ५५६}} {{outdent|बंगाल भू-धारण अधिनियम, ५१४, ५१६}} {{outdent|बंगाली (बंगला), ५}} {{outdent|'''बंगाली''', ४७३}} {{outdent|बजाज, जमनालाल, १८४, ४८८, ५१८, ५६२}} {{outdent|बढई, भरथुल, ठाकुर, ४०१}} {{outdent|बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ, ३८ पा० टि०}} {{outdent|बनारस, -की घटनाका उल्लेख, २४१}} {{outdent|बनारस हिन्दू-यूनिवर्सिटी, २१८-१९, २२० पा० टि., २४२, २४९ पा० टि., ४०२; -का उद्घाटन-समारोह, २१२}} {{outdent|वरवे, प्रो०, २०, १६१}} {{outdent|बर्कले, जे०, ४०५}} {{outdent|बलवन्तराय, १६३}} {{outdent|बसु, डॉक्टर जगदीशचन्द्र, २११, २१४, २२४}} {{outdent|बहादुरजी, श्रीमती, ९}} {{outdent|बाइबिल, २२२-२३}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}बापूभाई, दोलतराय, १६२, १७६}} {{outdent|बामन ५६७}} {{outdent|'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १, २४६ पा० टि०, २५५ पा० टि., २८३, ३२०}} {{outdent|बान्के, ३५३}} {{outdent|बालकृष्ण, १६३}} {{outdent|बाला, ८८, २६९}} {{outdent|बालफ़र, आर्थर जेम्स, १३६}} {{outdent|बावज़ीर, इमाम अब्दुल कादिर, १३१ पा० टि., १२९, १९९, २४९, २६८-६९ २९६, ३७३, ५२५}} {{outdent|बिटमैन, श्री, ४५७}} {{outdent|बिहार प्लान्टर्स एसोसिएशन, ३९४}} {{outdent|बुद्ध, गौतम, ४९, २७९-८०, २९३, २९९-३००, ३१५}} {{outdent|बूथ, कैनन, ६७}} {{outdent|बेचरभाई, १६१, १८५, ४१८}} {{outdent|बेचरलाल कालीदास, ४७२}} {{outdent|बेजनजी, ३५२}} {{outdent|बैनरमैन सर हेनरी कैम्बेल, २५०}} {{outdent|बेंजामिन, डॉ०, १८४}} {{outdent|बेयर्स, जनरल, ६३}} {{outdent|बेलची, डी० बी०, २७६ पा० टि०}} {{outdent|बेलराम, दीवान वाधूमल, २५४}} {{outdent|बेसेंट, श्रीमती एनी, ५४, ७८, १०२-३, १६८, १७०, २०३, २१७-१८, २२०, २४१-४४, २८५, ३०६-७, ४५८, ४६० पा० टि., ४६९-७० ४७३, ५१९ पा० टि., ५२९, ५३३-३४, ५३९ पा० टि., ५७१; -द्वारा गांधीजीके अराजकता सम्बन्धी भाषणपर आपत्ति, २१९}} {{outdent|बैंकर, शंकरलाल, ४७३, ५२७}} {{outdent|बैप्टिस्टा, जे ९, २७६ पा० टि०}} {{outdent|बोअर, ३३८; -युद्ध, २१८, २९१; -सरकार, १२०}} {{outdent|बोधा, लुई, ३ पा० टि., २०८}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ogn2o9yg1s4s5tewzl5qvymandzdfgw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/६३ 250 180072 675523 625372 2026-08-31T09:39:19Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675523 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{gap}} [[File:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 5 (१).png|center|350px|फ़्रेमहीन]] {{center|पत्र : छगनलाल गांधीको}} {{gap}}<noinclude></noinclude> hfqp0i0xartlza253mzwblh90dtwk32 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/६४ 250 180073 675524 625373 2026-08-31T09:45:05Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675524 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{gap}} [[File:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 5 (२).png|center|350px]] {{center|पत्र : कुमारी बिसिक्सको}} {{gap}}<noinclude></noinclude> 8e7tut64es4m5v59iq366oym1ulrgxn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/८ 250 184391 675516 640323 2026-08-31T09:14:08Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675516 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{c|मार्च १९६९ (चैत्र १८९१)}} {{Dhr|5em}} {{c|© नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, १९६९}} {{Dhr|5em}} {{c|'''साढ़े सात रुपये'''}} {{Dhr|5em}} {{c|कापीराइट<br>नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनुमति से}} {{Dhr|15em}} {{c|निदेशक, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली–१ द्वारा प्रकाशित<br>और शान्तिलाल हरजीवन शाह, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद-१४ द्वारा मुद्रित}}<noinclude></noinclude> 0v4qckvsjnqahdo76cz5tiq1xpanrio पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/६७७ 250 184434 675318 675161 2026-08-30T15:57:06Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 675318 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||शीर्षक सांकेतिका|६४१}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|{{gap}}आंकड़े ५२२; दक्षिण आफ्रिका, ४०४-६; दोषको छोटा साबित करनेके लिए, ५३-४; नगर-सेवा, ४५६; निरर्थक आश्वासन, ५९७-८; निरामिषाहार अर्थात् अन्नाहार, २८५-६; पंजाबके तुलनात्मक आँकड़े, ४९४; पंडित नेहरू और खादी, ३०७-९; पशु-समस्या, ४७५-६; पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त-सम्बन्धी प्रस्तावोंका मसविदा, ५९; पहाड़ी जातियाँ, २५४; पाँच हजार मील दूर, ३१-२; प्रार्थना क्या है?, ५९९-६००; बंगालकी विशेषता, १६२-३; बंगाल सहायता समिति, ४१२; कताई एक कला है, ५२६-७; बदसे बदतर, ३४; बाकी पैसे से खादी खरीदिए, ३; बिहार विद्यापीठ, २२३; ब्रह्मचर्यके विषय में, २५०-२; भारत सेवक समाजकी क्षति, ५७७; भारतीय नारियोंकी सेवा संस्था, ७६-८; मजदूर भाइयोंके सम्बन्ध में, ४३७; मद्य-निषेधकी शर्ते, ६-७; महुधा खादी कार्यालय, ६१७-८; मादक पदार्थ, शराब और शैतान, ३५९-६१, मार्चके आँकड़े, ०४६, ४७४; मेरा राजनीतिक कार्यक्रम, २१९-२०; मेरी कामधेनु, ३३०-३;}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}मौन-सेवा, ४०, युद्ध या शान्ति, ४९५-७; राष्ट्रीय शिक्षा, ५५८-९; राष्ट्रीय सप्ताह, २४९-५०; रुईकी मांग, ७५-६; लेखा-चित्रकी आवश्यकता, २७३; विधवा-विवाह, ३८-४०; विवाह प्रथाको उठा दो, ३९०-३; विविध प्रश्न [-१] ३३५-७; [-२], ३३७-४०; [-३] ३४०-२; [-४] ३४२-४; [-५], ३४४-६; विशुद्ध धार्मिक विधिसे, ९०-३; शंका-समाधान, २६९-७२; सच्ची शिक्षा क्या है?, ६२-३; सत्ताका दुरुपयोग, ७; सत्य बनाम ब्रह्मचर्य, १५-८; सत्याग्रह सप्ताह, २५२-३; सत्याग्रह सप्ताह में आंशिक उपवास, २५३; सन्तोंका स्मरण, २५५; सम्राट्का गुस्सा, ६१-२; सुदूर अमेरिकासे, ४४४-७; सूत इकट्ठा करनेवालोंको चेतावनी, ३५७-८; सूत्रयज्ञ, ६०; स्वतन्त्र मजदूर दल और भारत, ४७७; स्वत्वाधिकारका आग्रह रखें, १८५-६; स्वाभाविक किसे कहेंगे?, ६१५-७; स्वीकृति, १६२; स्वीडनसे, ३-६; हमारा अपमान, ४९-५०; 'हमें रुई दो', ४८-९}} {{Multicol-end}}<noinclude>{{Dhr|6em}} {{left|३०–४१|2em}}</noinclude> 438db6equpvzl26mnwxk5kh0sw9amc3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३५ 250 184463 675258 640396 2026-08-30T13:51:53Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 675258 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|इकतीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |६४७.|| पत्र : वी० सुन्दरम्‌को (६-६-१९२६)|| ५८३ |- |६४८.|| पत्र : मोतीबहन चौकसीको (६-६-१९२६)|| ५८४ |- |६४९.|| तार : के० टी० पॉलको (७-६-१९२६)|| ५८४ |- |६५०.|| पत्र : डॉ० बी० एस० मुंजेको (७-६-१९२६)|| ५८५ |- |६५१.|| भेंट : समाचारपत्रोंको (८-६-१९२६ या उसके पूर्व)|| ५८६ |- |६५२.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (८-६-१९२६)|| ५८७ |- |६५३.|| पत्र : अब्बास तैयबजीको (८-६-१९२६)|| ५८८ |- |६५४.|| पत्र : रुथ एस० एलेक्जैंडरको (८-६-१९२६)|| ५८९ |- |६५५.|| पत्र : प्यारेलाल नैयरको (८-६-१९२६)|| ५८९ |- |६५६.|| पत्र : एच० के० वीरन्ना गौड़को (८-६-१९२६)|| ५९० |- |६५७.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (८-६-१९२६)|| ५९० |- |६५८.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-६-१९२६)|| ५९१ |- |६५९.|| पत्र : राय प्रभुदास भीखाभाईको (८-६-१९२६)|| ५९२ |- |६६०.|| पत्र : पेरीन कैप्टेनको (९-६-१९२६)|| ५९३ |- |६६१.|| टिप्पणियाँ : भारत सेवक समाज (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी); मैसूर में चरखा; अकालसे राहत के लिए कताई; खादी प्रदर्शनियाँ (१०-६-१९२६)|| ५९३ |- |६६२.|| खादीकी प्रगति (१०-६-१९२६)|| ५९६ |- |६६३.|| निरर्थक आश्वासन (१०-६-१९२६)|| ५९७ |- |६६४.|| प्रार्थना क्या है? (१०-६-१९२६)|| ५९९ |- |६६५.|| कताई में सहयोग (१०-६-१९२६)|| ६०१ |- |६६६.|| पत्र: जमनालाल बजाजको (१०-६-१९२६)|| ६०३ |- |६६७.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (११-६-१९२६)|| ६०४ |- |६६८.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (११-६-१९२६)|| ६०५ |- |६६९.|| पत्र : अमियचन्द्र चक्रवर्तीको (११-६-१९२६)|| ६०५ |- |६७०.|| पत्र : जेठालाल हरिकृष्ण जोशीको (११-६-१९२६)|| ६०६ |- |६७१.|| पत्र : फूलचन्द कस्तूरचन्द शाहको (११-६-१९२६)|| ६०६ |- |६७२.|| पत्र : चुन्नीलाल डी० गांधीको (११-६-१९२६)|| ६०७ |- |६७३.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (११-६-१९२६)|| ६०८ |- |६७४.|| पत्र : कान्तिलाल ह० पारेखको (११-६-१९२६)|| ६०८ |- |६७५.|| पत्र : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको (१२-६-१९२६)|| ६०९ |- |६७६.|| पत्र : फेनर ब्रॉकवेको (१२-६-१९२६)|| ६१०<noinclude></noinclude> 8g8qaf19lrtup6yyr0z20ruzgt1uaov पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३७ 250 184464 675519 643495 2026-08-31T09:25:30Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675519 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१. टिप्पणियाँ'''}}<br>'''विश्वासघात'''}} जिस एशियाई विधेयकके पेश किये जाने की आशंका है, वह समस्त दक्षिण आफ्रिका बारेमें गांधी-स्मट्स समझौते का उल्लंघन है और नेटालके सम्बन्धमें तोविश्वासघात भी है। यह विश्वासघात कैसे है, यह बात दक्षिण आफ्रिकाके अखबारों को लिखे अपने एक पत्रमें श्री एन्ड्रयूजने स्पष्ट बताई है। अभी-अभी 'इंडियन ओपिनियन' का जो अंक प्राप्त हुआ है, उसमें भी वह पत्र उद्धृत किया गया है। उसका प्रासंगिक अंश निम्न प्रकार है : {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''१८६० से नेटाल सरकार इकरारनामेके अधीन बहुत-से भारतीयोंको भारतसे दक्षिण आफ्रिका लाई। उन लोगोंके भारतसे प्रस्थान करने से पहले भारत सरकार और नेटाल सरकार के बीच तय पाया गया था कि अगर वे गनके खेतों में काम करनेका अपना पाँचसाला इकरार पूरा कर दें तो उन्हें नेटालमें कुछ अधिकार दिये जायें, जिनमें जमीन और अचल सम्पत्ति खरीदने की खुली छूटके साथ-साथ अधिवासका अधिकार भी शामिल था। नेटाल सरकार भारतीय गिरमिटिया मजदूर पानके लिए बहुत आकुल थी, सो उस समय उसने यह भी स्वीकार कर लिया कि इन मजदूरोंके साथ-साथ स्वतन्त्र भारतीयोंके रूपमें भारतीय व्यापारियोंको भी नेटाल आने दिया जाये।'''}} {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''इन भारतीय मजदूरोंने बहुत भारी कीमत चुकाकर इन अधिकारोंका सौदा किया था। कारण, पाँचसाला गिरमिट प्रथा ऐसे गम्भीर नैतिक दोषोंसे भरी हुई थी कि अब इसे एक भ्रष्ट श्रम-प्रणाली मानकर बिलकुल समाप्त कर दिया गया है। नेटाल सरकार अभी-अभी बिलकुल हालतक अपनी ओरसे अनुबन्धको शर्तों का पालन करनेकी भरसक कोशिश करती रही है। दक्षिण आफ्रिका अधिनियम खण्ड १४८ से स्पष्ट है कि नेटाल सरकार द्वारा किये गये करार संघपर भी लागू होते हैं। ('इयर बुक,' पृष्ठ ७४)'''}} {{c|'''आर्थिक भ्रान्ति'''}} भारतीय प्रवासियोंके खिलाफ अकसर जो आर्थिक दलील दी जाती है, उसका समाधान करते हुए उसी पत्रमें श्री एन्ड्रयूज कहते हैं : {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''दक्षिण आफ्रिका अधिकांश लोगोंके मनपर यह छाप डाल दी गई है। कि भारतीय प्रश्न आर्थिक दृष्टिसे एक बहुत गम्भीर समस्या है, किन्तु वास्तवमें यह उतनी गम्भीर नहीं है। सच तो यह है कि इसका समाधान पहले ही हो चुका है, क्योंकि [व्यापारके क्षेत्रमें] भारतीयोंकी स्पर्धा बढ़ नहीं रही है, बल्कि'''}}<noinclude>{{left|३०–१}}</noinclude> fkgq61j920shvz4lnbhc6e9deask45j पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३८ 250 184465 675522 643496 2026-08-31T09:34:14Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675522 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude> {{Outdent|{{Gap}}'''कम होती जा रही है। डर्बन-जैसे नगरमें, जहाँ भारतीयोंकी आबादी सबसे अधिक है, १९२१ से १९२५ तक भारतीयोंकी सम्पत्तिमें कुल मिलाकर मोटे तौरपर सिर्फ ढाई लाख रुपये की मालियतकी वृद्धि हुई, जबकि यूरोपीयोंकी सम्पत्ति में चालीस लाख रुपयेकी मालियतकी वृद्धि हुई। किन्तु डर्बन और उसके आस-पासके क्षेत्रों में भारतीयों और यूरोपीयोंका अनुपात ४ : ५ का है। मैं पहले ही बता चुका हूँ और यहाँ फिर बताना चाहूँगा कि १९२१ की जनगणना के अनुसार प्रतिवर्ष जहाँ यूरोपीयोंकी आबादीमें ३९.८ प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहाँ भारतीयोंकी आबादीमें सिर्फ ६.१ प्रतिशत की ही वृद्धि हुई। भारतीय बहुत बड़ी तादाद में उस देशको, फिर कभी वापस न जानेके इरादेसे, छोड़ रहे हैं। जो भारतीय वहाँ पहलेसे ही हैं, उनके अलावा औरोंको तो आने ही नहीं दिया जाता। दक्षिण आफ्रिका संघमें भारतीय पुरुषोंकी संख्या स्त्रियोंसे ज्यादा है। इसलिए जन्म-दरके ऊँचे होने की सम्भावना भी नहीं है। १९२१ में संघ में कुल मिलाकर केवल १,६१,००० भारतीय थे। अगर कहीं-कहीं भारतीय दुकानोंकी संख्या बढ़ रही है तो मैंने अपनी आँखों देखा है कि कुछ दूसरी जगहों में वह उतनी ही घट भी रही है। इसलिए आर्थिक भयका कारण ही क्या हो सकता है? अगर जल्दबाजी न की जाये तो यह समस्या अपने-आप हल हो जायेगी; और जैसे-जैसे समृद्धि-सम्पन्नता बढ़ती जायेगी (व्यापारको वृद्धिके साथ-साथ इसका बढ़ना भी निश्चित ही है) श्रमिकोंका अभाव सर्वत्र महसूस किया जाने लगेगा और फिर तो इस देशको खुद ही उन अधिकांश भारतीयोंकी आवश्यकता अनुभव होने लगेगी जो अब भी उद्योग और कृषिके क्षेत्रमें वहाँ उपयोगी और ठोस काम कर रहे हैं। ऐसे समय में इतने लाभदायक श्रमिकों को देशसे बाहर निकालना, वास्तवमें लगभग एक अनर्गल बात जान पड़ती है।'''}} श्री एन्ड्रयूज इतना और कहते तो ठीक ही होता कि दक्षिण आफ्रिका के अन्य हिस्सों में एक भारतीयकी स्थिति डर्बनमें बसे भारतीयसे लाख दर्जे बुरी है। संघके अधिकांश हिस्सों में वह भूमिहीन है और उसे सिर्फ यूरोपीय भू-स्वामियोंकी कृपापर जीना पड़ता है। उसका एकमात्र अपराध यही है कि श्रमिक होने के साथ-साथ वह व्यापार भी करता है और इस तरह ईमानदारीसे रोटी कमाता है। अगर निष्पक्ष दृष्टिसे देखा जाये तो एशियाइयोंके विरुद्ध जो चीख-पुकार मचाई जा रही है, उसका कारण सिर्फ विवेकशून्य सगभेद और क्षुद्र व्यापारिक स्पर्धा ही है। {{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ११-२-१९२६|1em}}<noinclude></noinclude> rks3swhjd14zl9nv8e9mwaan837qx93 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/३९ 250 184466 675525 640399 2026-08-31T09:46:16Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675525 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२. बाकी पैसेसे खादी खरीदिए'''<ref>तीसरे दर्जेमें सफर के बारेमें लिखे च° राजगोपालाचारीके इस लेखके सिर्फ उसी प्रासंगिक अंशका अनुवाद यहाँ दिपा गया है, जिसपर गांधीजीने टिप्पणी की थी।</ref>}}}} {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''. . . जो भी हो, आप देखेंगे कि तीसरे बजेंमें सफर करनेसे कितना पैसा बच जाता है। उस बचे हुए पैसेसे आप खावी खरीद सकते हैं।'''}} {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''अब इसपर मुझे यह याद आ जाता है कि मैंने [यात्राकी] यह कहानी क्यों शुरू की। में तीसरे दर्जे में सफर कर रहा था। मैं सोच रहा था अभी-अभी दो भिखारी बच्चोंने कितना सुन्दर गाना गाया है और यदि टिकट कलक्टर इन आवारा बच्चोंको गाड़ीमें चढ़ने ही न दे तो ऐसे साहित्यका क्या होगा। तभी एक सज्जन, जो शिक्षित थे और साफ-सुथरे लिवासमें थे और मेरी ही तरह अपने हिस्से-भर की जगहसे ज्यादा घेरे हुए थे, उठ बैठे और मुझसे पूछा "श्रीमन्! यदि मैं आपसे एक सवाल पूछूं तो आप बुरा तो नहीं मानेंगे?"'''}} {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''और उन्होंने सवाल एक नहीं अनेक किये। मुझे उन्हें तरह-तरहसे अनेक बार खादीका औचित्य समझाना पड़ा। यह सब बहुत दिलचस्प था और एक अद्भुत बात यह हुई कि उनकी शंकाओंका समाधान करते-करते इस विषय में खुद मेरे ही विचार बहुत साफ हो गये।'''}} पिछले कुछ वर्षोंसे सम्पादक तीसरे दर्जे की यात्राके सुख-दुःखसे अपरिचित रहा है, इसलिए उसे तीसरे दर्जेसे सम्बन्धित अच्छे ढंगसे कही गई कहानियोंको अंकमें स्थान देते हुए बड़ा हर्ष होता है—विशेषकर तब जब कि उन कहानियोंका सम्बन्ध जन-साधारणके भाग्यचक्रसे होता है। {{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ११-२-१९२६|1em}} {{Dhr}} {{C|{{larger|'''३. स्वीडनसे'''}}}} एक स्वीडन निवासी सज्जन लिखते हैं : {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''हर हफ्ते आपका अखबार पाकर मुझे अतीव प्रसन्नता होती है और ऐसा लगता है, मानो में बराबर आपके सम्पर्क में हूँ। 'यंग इंडिया' में में देखता हूँ कि आप सुदूरवर्ती देशोंके लोगोंके प्रश्नोंके भी उत्तर देते हैं और इससे मेरे मनमें यह खयाल आता है कि क्या आप मेरे प्रश्नोंके भी उत्तर देंगे। . . . क्या आप अपने अखबार के जरिये मुझे यह बतायेंगे कि अपने पहले कार्यक्रमकी'''}}<noinclude>{{Dhr}} {{Smallrefs}}</noinclude> bmn8h6n3rz2m3lndj76ls4u4l8ngxpt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/७० 250 184467 675526 640400 2026-08-31T10:00:29Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 675526 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३५. बद से बदतर'''}}}} मद्राससे प्रकाशित 'हिन्दू' अखबार में दक्षिण आफ्रिकी एशियाई विधेयकके खण्ड १० के प्रस्तावित संशोधनका पूरा पाठ छपा है। नीचे में समानान्तर स्तम्भों में प्रस्तावित संशोधन और मूल खण्ड, दोनों उद्धृत कर रहा हूँ : {{Multicol}} {{c|'''मूल खण्ड १०, उप-खण्ड २ :'''}} {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''गवर्नर जनरल 'गजट' में घोषणा करके विज्ञापित कर सकता है कि उस तिथिसे या उसके बाद, जो कि घोषणामें निर्धारित की जाये, घोषणामें बताई गई किसी भी जातिका कोई सदस्य इस खण्डके उप-खण्ड (२) में वर्णित तटीय क्षेत्रको छोड़कर नेटाल प्रान्तमें अन्यत्र कहीं भी कोई अचल सम्पत्ति स्वायत्त नहीं करेगा, ऐसी सम्पत्ति पट्टेपर भी नहीं लेगा और न ऐसी सम्पत्तिका पट्टा नया ही करवायेगा, किन्तु इस खण्डकी कोई भी व्यवस्था ऐसी अचल सम्पत्तिका पट्टा नया करानेसे किसी व्यक्तिको नहीं रोकेगी जो इस अधिनियमके लागू होनेके समय उस व्यक्तिके अधिकारमें हो।'''}} {{Multicol-break}} {{c|'''संशोधित खण्ड'''}} {{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''गवर्नर जनरल 'गजट' में घोषणा करके विज्ञापित कर सकता है कि घोषणामें निर्धारित तिथिसे या उसके बाद—किन्तु यह तिथि अगस्त, १९२५ से पहले की नहीं होगी—घोषणा-पत्रमें बताये गये किसी भी वर्गका कोई व्यक्ति एक तो इस संघकी सीमामें कहीं भी अचल सम्पत्तिको किरायपर नहीं लेगा, न उसको अपने कब्जे में लेगा और न पट्टेदारकी हैसियतसे पाँच सालसे अधिक अवधिके लिए पट्टा ही नया करवायेगा; और दूसरे, केप ऑफ गुड होप और नेटालमें वह कोई अचल सम्पत्ति स्वायत्त नहीं कर सकेगा। हाँ, वह निवासके प्रयोजनोंके लिए वर्गनिवास क्षेत्रमें या व्यापारिक प्रयोजनोंके लिए वर्गव्यापार क्षेत्रमें अथवा किसी भी प्रयोजनके लिए वर्गनिवास और व्यापार क्षेत्र में अचल सम्पत्ति अर्जित कर सकेगा।'''}} {{Multicol-end}} मूल खण्ड और संशोधनपर जरा-सी नजर डालनेसे किसी साधारण पाठकको भी स्पष्ट हो जायेगा कि संशोधन मूल खण्डसे लाख दर्जे बुरा है। इस तरह इसमें किसी तरह के समझौतेके लिए प्रयत्नतक नहीं किया गया है, बजाय इसके यह भारतीय लोकमतको, और दरअसल तो भारत सरकारको भी, एक चुनौती है। संघ सरकारका यह रवैया उस प्रबल आन्दोलनके अनुरूप ही है, जो दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके विरुद्ध भड़काया गया है। {{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १८-२-१९२६|1em}}<noinclude></noinclude> byd7wq66kefjsrcltfbxa1dkkfb3khx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/८१ 250 184468 675528 640401 2026-08-31T10:33:56Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 675528 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''४८. पत्र : एस° आर° स्कॉटको'''}}}} {{Right|साबरमती आश्रम<br>२३ फरवरी, १९२६}} {{Left|प्रिय मित्र,}} मैंने अभीतक आपके इस १७ तारीखके पत्रका उत्तर इसलिए नहीं दिया कि मैं आशा करता था कि आपके १२ तारीखके पत्रके उत्तरमें मैंने जो पत्र<ref>देखिए "पत्र : एस° आर° स्कॉटको", १६-२-१९२६।</ref> आपको भेजा है, उसका जवाब आप देंगे। गुजराती कवितापर आपके निबन्धको प्रतियोंके लिए धन्यवाद। मुझे वह बहुत पसन्द आया। मेरे पिछले पत्रको ध्यान में रखते हुए आप यह बतानेकी कृपा करेंगे कि क्या आप चाहते हैं कि आपका १२ तारीखका पत्र<ref name="Gandhi"/> में प्रकाशित कर दूं। यदि ऐसा चाहते हैं तो स्वाभाविक है कि उसमें पाद-टिप्पणीके<ref name="Gandhi">देखिए "एक प्रतिवाद", ४-३-१९२६।</ref> रूपमें मैं कुछ उसी ढंगकी बात कहूँ जो मैं आपको अपने पिछले पत्रमें लिख चुका हूँ। {{Right|हृदयसे आपका,}} {{Left|रेवरेंड एस° आर° स्कॉट<br>मिशन प्रेस<br>सुरत}} अंग्रेजी प्रति (एस° एन° १४११५) की फोटो-नकलसे। {{dhr|6em}} {{Rule}} जब कहा जाये तो भारत सरकारका शिष्टमण्डल सिद्धान्तके सवालपर भारतीयोंका पक्ष तैयार कर सके और सिर्फ उस सिद्धान्तकी पुष्टि करनेके लिए उसे जो सबूत दरकार हों वे उसे मिल सकें, इस दृष्टिसे वे लोग शिष्टमण्डलको सहायता करें। लेकिन, वे तफसीलकी बातोंकी किसी चर्चामें न पड़ें और न उनके बारेमें कोई गवाही ही दें तथा गोलमेज सम्मेलनपर आग्रह रखें। क्या आपको यह सुझाव पसन्द? कृपया शीघ्र उत्तर दें—सोराबजी सेवाथ होटल।"<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude> bca1659a9ml9snkadxb5axgi6wmlsxu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७११ 250 185194 675217 643277 2026-08-30T12:03:11Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 675217 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|६७५}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|सैलिसबरी, लॉर्ड, ३३८}} {{outdent|सोडम, ३८३}} {{outdent|सोबानी, आजाद, ५२८}} {{outdent|सोराबजी, ३९८}} {{outdent|सोवियत कांग्रेस-का संविधान और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, २१७-१८}} {{outdent|'''सोशल इवोल्यूशन''', १०}} {{outdent|'''सोशल एफिशिएन्शी''', ९०}} {{outdent|सौन्दर्य; -सत्य, २६६-६७, २७३-७४}} {{outdent|'''स्टेट्समैन''', २४२}} {{outdent|स्टेड, डब्ल्यू॰ टी॰, ४१८}} {{outdent|'''स्टेप्स टु क्रिश्चियनिटी''', ९०}} {{outdent|स्टोक्स, -द्वारा अनिवार्य कताईका विरोध, ३३७, ४१७}} {{outdent|'''स्टोरीज फ्रॉम द हिस्ट्री ऑफ रोम''', ८९}} {{outdent|'''[द] स्ट्रेंज केस ऑफ डॉ॰ जेकिल ऐंड मि॰ हाइड''', ९०}} {{outdent|'''स्पिरिट ऑफ इस्लाम''', ९१}} {{outdent|स्पेन्सर, ९०}} {{outdent|स्मट्स, जनरल, १८, ९८, २२६}} {{outdent|'''स्याद्वाद मंजरी''', ९१}} {{outdent|स्लेड, कुमारी मेडिलिन, देखिए मीराबहन}} {{outdent|स्वतन्त्रता, देखिए स्वराज्य}} {{outdent|स्वदेशी, ३, ५३२; -की पेचीदगियाँ, ३९४}} {{outdent|स्वयंसेवक, -के गुण, ६३४-३५}} {{outdent|स्वराज्य, १६, ६०, ६४, ७१, ७९, ९६, ९९, ११७, १४५, १४७, १४९, १६०, २१९, २३३, २५०, २७५, २८१, २९८, ३०७, ३२७, ३३६, ३५४, ३७४, ३८३, ३९६, ४३१, ४३३४७२, ४७६-७७, ५४९, ५७१, ६१४; -औपनिवेशिक, ३६४; और अस्पृश्यता, ५१३, ५४८; -और अहिंसा, २१; -और कताई, ३१०, ३१७, ३६०, ४३२; -और चरखा, ३६७, ४०३, ४६६, ४९८; -और रामराज्य, ५९२ और हिन्दू-मुस्लिम, एकता, २, २२, ३६७, ३९७; -की गांधीजीकी योजना, ५१४-१५;}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}-की शर्तें, ५४४, ५६९-७०; -के अन्तर्गत देशी राज्योंकी स्थिति, ५८६-८७, ५९८; -के अन्तर्गत सम्भावित बुराइयाँ, ६०७; -के लिए योजना, १३१, १७१, ३६५, ५१४-१६; -संसद, ४१२; -साम्राज्यके अन्तर्गत, ३८६, ५१६; -हमारा जन्मसिद्ध अधिकार, ४९८}} {{outdent|स्वराज्यवादी, २९, ६२, ८१, १०४-५, १३७, १४०, १४८-४९, १५४, २७७, २८८, ३१९, ३८०, ३८६-८७, ४०२, ४१८-१९, ४६८, ४८२, ६२४; -और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ५८, १२९-३१, १५७-५८, २७९, ३०७-८, ३१३, ३५८-५९, ३७३-७५, ३८६, ४८९-९२, ५१६-१८; -और हिंसा, ३५८; -[दियों] और गांधीजीके बीच समझौता, ३०७-८, ३१०, ३१५, ३१९-२०, ३३४-३५, ३४९, ३८५, ४८४; -के विरुद्ध बंगालमें दमन, ३०७-८, ३१५, ३३१, ५२०; -पर आक्षेपोंके उत्तर, ३२९-३०, ३५७-६०; -पर बेलगाँव कांग्रेसका प्रस्ताव, ५२६-२८}} {{outdent|स्वशासनवादी, ३८०, ३८५, ४१९, ५२४}} {{c|'''ह'''}} {{outdent|'''हजरत उमरकी जीवनी''', ९०}} {{outdent|हनीफ, मोहम्मद, ८८}} {{outdent|हन्टर, ६३४}} {{outdent|हब्शी, २८}} {{outdent|'''हमदर्द''', ११४, ११७, २९८, ३६९, ३९७}} {{outdent|हयात, १०५, ११४}} {{outdent|हरकिशनलाल, ३५८, ३६५, ५४०}} {{outdent|हरनामसिंह, २०९}} {{outdent|हरनामसिंह (श्रीमती) २०९}} {{outdent|हरिप्रसाद, डॉ॰ ४२}} {{outdent|हरिश्चन्द्र, ९४, ४९८}} {{outdent|हलाज, मन्सूरी, १६४}} {{outdent|हसन, ९०}} {{outdent|हस्वी, आरिफ, १५}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> mscqopwep2d8k1764eg6pdo8hiac5t9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/७१२ 250 185195 675242 643278 2026-08-30T13:06:33Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 675242 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|हाजकिन्सन, श्रीमती, २३३}} {{outdent|हार्डिंग, लॉर्ड, ५५८}} {{outdent|हार्डिकर, डॉ॰, १२२, ५४५, ५५८}} {{outdent|हॉपकिन्स, ९१}} {{outdent|हारूँ-अल-रशीद, १९२}} {{outdent|हिंसा, १८८, २८१, २९४-९५, ३१३, ३३५, ४०३, ४३९; -और बोलशेविज्म, ४५३; -और स्वराज्यवादी, ३५७; -जरूरी है, २०८}} {{outdent|'''हिन्द स्वराज्य''', ५५०, ६३६}} {{outdent|'''हिन्दी नवजीवन''', १२}} {{outdent|'''हिन्दुस्तान टाइम्स''', १५९}} {{outdent|हिन्दुस्तानी, -राज्यभाषा, ५१५}} {{outdent|'''हिन्दुस्तानी शिक्षक''', २९६}} {{outdent|हिन्दू, ५, १६, ५५-५६, ६०, ६२-६३, ७५, ८१, १००, १०५, १११, १४३-४८, १८२-८३, १८७, १९४, २०२ पा॰ टि॰, २२५, २३२, २५५-५६, २५८, २९८, ३३५, ३५५, ३८१, ३९०, ४२७, ५९७, ६००, ६०९; -इलाहाबाद और जबलपुरमें, २५४; -और सरकारी पद, ५५८; -की परिभाषा, ५४९-५०; -कोहाटमें २१३, २५४, ४४२, ४५५- ५६, ४७०-७२; -[ओं] और मुसलमानोंके बीच तनाव, ४१, १०१, ११८, १२१, १६०, २०८, २१३, २४५-४६, २८७-८८, २९९, ४३२; -के कारण, ४३८-३९; -के हलके लिए प्रस्ताव, १४३-४६, १९०-९२, २१५, ४४७- ४८; -कोहाटमें, २१३, २५४, ४४२, ४७०-७२; --गुलबर्गा में, ४८-५०; -दिल्लीमें, १८१; -नागपुरमें, ६५, ८३, १७७; -पंजाबमें, ४३८-४१; -लखनऊमें, १३९; -[दुओं]को उर्दू पढ़नी चाहिए, १३३}} {{outdent|हिन्दू, (लाहौर), १६०}} {{Multicol-break}} {{outdent|हिन्दू धर्म, १००, १३५, १४५, १८०, २१५, २२०, ३५४, ३६९, ६०९; -और अस्पृश्यता, १२२, ४३६, ५४२, ५४६- ४८, ५६७-६९, ५९७, ६००-३; -और इस्लाम, १९०-९२, २३७, २४०, २९८; -और गोरक्षा, १९०, ४६७, ५४९-५२–और सिख धर्म, १६५; -की परिभाषा, ५४९-५०}} {{outdent|हिन्दू-मुस्लिम एकता, १६-१७, २०, ३१, ४९, ५७, ७१, ९७, १००, १०५, ११७, १३०, १४९, १७८, १९७, २२०, २४०, २४२, २५१, २७५, ३०३, ३०७, ३१२, ३४९, ३६९, ३८१, ३९६, ४०५, ४२७-३०, ४३९, ४४१, ४४३, ४५०, ४६७, ४७९, ४८३, ५००, ५१८, ५४४, ५४९, ५५८, ५६९-७०, ५९७, ६१८, ६३७; -और गोरक्षा, १४४-४५; -और स्वराज्य, १४३, २२२, ३६७, ३७८-७९; -का महत्व, ५११-१३; -को उत्तेजन देनेके लिए सम्मेलन, २२४, २८१; -को उत्तेजन देनेके लिए मोतीलाल नेहरू के प्रयत्न, ४४५-४६; -पर एकता सम्मेलन में प्रस्ताव, २२९-३०; -पर शौकत अली के विचार, ५०२, ५११}} {{outdent|'''हिमालयनो प्रवास''', ९०}} {{outdent|'''हिस्ट्री ऑफ द सैरासिन्स''', ९१}} {{outdent|'''हिस्ट्री ऑफ सत्याग्रह इन साउथ आफ्रिका''', ३४६}} {{outdent|'''हिस्ट्री ऑफ सिविलिजेशन''', ९०}} {{outdent|हुलियालकर, डॉ॰ डी॰ आर॰, ८७}} {{outdent|हेली, सर मैलकम, ४२७, ४३३}} {{outdent|हैकेल, ९१}} {{outdent|होता, बिकनचरन, ८८}} {{outdent|होमरूलवादी, देखिए स्वशासनवादी}} {{outdent|होम्स, ९१}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> l00csomy3zgkg7jmqo7uj1yfwf4swv8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६५ 250 186332 675304 644684 2026-08-30T15:38:27Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ|५३३}}</noinclude>{{c|'''सरदार गुरुदत्तसिंह'''}} {{Gap}}सात साल तक छिपे रहना और पुलिस के हाथ न आना और उसके बाद अपने को खुलेआम पुलिस के हाथ सौंप देना कोई मामूली बात नहीं है। परन्तु सरदार गुरुदत्तसिंह ने ऐसा ही आश्चर्यजनक काम किया है। मेरे सामने उनका खुला पत्र और दूसरे कागज़ात हैं। अपनी अन्य व्यस्तताओं के कारण मैं इन पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ। परन्तु मैं सिखों को इस बात के लिए बधाई दिए बिना नहीं रह सकता कि जब सरदार गुरुदत्तसिंह ने आत्मसमर्पण किया और मजिस्ट्रेट ने उन्हें हिरासत में लिया, उस समय उन्होंने शान्ति रखी। अहिंसा के बारे में हमें इतना दृढ़ होना चाहिए कि हम बड़े से बड़े साहस के कदम भी पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उठा सकें। अहिंसात्मक बनने के लिए स्वदेशी से बढ़कर और कोई चीज़ नहीं। एक व्यक्ति ने मुझे लम्बा पत्र भेजा है जिसमें यह कहा गया है कि मुझे इस बात पर आग्रह करना चाहिए कि स्वदेशी का कार्यक्रम पूरा होने से पहले कोई भी तहसील सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू न करे। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। मैं यह जानता हूँ कि यदि समस्त भारत स्वदेशी को अपना ले, अर्थात् अपनी करोड़ों कुटियों में खादी तैयार करके विदेशी वस्त्र का पूर्ण बहिष्कार कर दे, तो हिंसा असम्भव हो जायेगी। मैं चाहूँगा कि सिख और अन्य भारतीय अपना सारा ध्यान हाथ से सूत कातने और कपड़ा बुनने पर लगायें। {{C|'''खादी टोपी के लिए दस दिन की सजा'''}} बम्बई के पिछले दंगे में खादी टोपी की बहुत चर्चा रही। डॉ० साठे पर अपनी खादी टोपी न उतारने के कारण बुरी तरह हमला किया गया। अब मैंने सुना है कि फोर्ट के नाविकों ने बहुत-से निर्दोष व्यक्तियों की खादी टोपियाँ ज़बरदस्ती छीनी हैं। मैं तो यही आशा करता हूँ कि इस निरर्थक अत्याचार से राष्ट्र का संकल्प और दृढ़ होगा और हजारों लोग खादी टोपी के लिए, जो तेजी के साथ स्वदेशी और स्वराज्य का एक स्पष्ट प्रतीक बनती जा रही है, मरने को तैयार हो जायेंगे। परन्तु इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बंगाल से मिला है। बंगाल के कोमिल्ला जिले में ब्राह्मण-बाड़ी के एस० डी० ओ० श्री टी० एच० एलिस ने १६ तारीख को यह नोटिस जारी किया : :{{gap}}'''सरकार ने यह फैसला किया है कि तथाकथित गांधी टोपियाँ पहनना भारतीय दण्ड संहिता की धारा २२८ के अधीन एक अपराध है। भद्र लोगों को यह चेतावनी दी जाती है कि आदेश लागू किया जायेगा।''' परिणामस्वरूप, एक स्वयंसेवक पर, इस आदेश के बावजूद खादी टोपी पहनने पर, दस रुपया जुर्माना किया गया। उसने जुर्माना अदा करने से इनकार कर दिया और दस दिन जेल में रहना पसन्द किया। मैं यहाँ धारा २२८ उद्धृत कर रहा हूँ : :{{gap}}'''जो भी कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी का, जब कि वह सरकारी कर्मचारी अदालती कार्रवाई की किसी भी स्थिति में बैठा हो, जानबूझकर अपमान करेगा या उसको किसी प्रकार की बाधा पहुँचायेगा, उसे छः मास तक के साधारण कारावास की या एक हजार रुपये तक के जुर्माने की अथवा दोनों की सजा दी जायेगी।'''<noinclude></noinclude> sa54hzc94emmq12xfouwjyr4k8trxz3 675330 675304 2026-08-30T16:57:19Z Shivaniya shaw 4129 675330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ|५३३}}</noinclude>{{c|'''सरदार गुरुदत्तसिंह'''}} {{Gap}}सात साल तक छिपे रहना और पुलिस के हाथ न आना और उसके बाद अपने को खुलेआम पुलिस के हाथ सौंप देना कोई मामूली बात नहीं है। परन्तु सरदार गुरुदत्तसिंह ने ऐसा ही आश्चर्यजनक काम किया है। मेरे सामने उनका खुला पत्र और दूसरे कागज़ात हैं। अपनी अन्य व्यस्तताओं के कारण मैं इन पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ। परन्तु मैं सिखों को इस बात के लिए बधाई दिए बिना नहीं रह सकता कि जब सरदार गुरुदत्तसिंह ने आत्मसमर्पण किया और मजिस्ट्रेट ने उन्हें हिरासत में लिया, उस समय उन्होंने शान्ति रखी। अहिंसा के बारे में हमें इतना दृढ़ होना चाहिए कि हम बड़े से बड़े साहस के कदम भी पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उठा सकें। अहिंसात्मक बनने के लिए स्वदेशी से बढ़कर और कोई चीज़ नहीं। एक व्यक्ति ने मुझे लम्बा पत्र भेजा है जिसमें यह कहा गया है कि मुझे इस बात पर आग्रह करना चाहिए कि स्वदेशी का कार्यक्रम पूरा होने से पहले कोई भी तहसील सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू न करे। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। मैं यह जानता हूँ कि यदि समस्त भारत स्वदेशी को अपना ले, अर्थात् अपनी करोड़ों कुटियों में खादी तैयार करके विदेशी वस्त्र का पूर्ण बहिष्कार कर दे, तो हिंसा असम्भव हो जायेगी। मैं चाहूँगा कि सिख और अन्य भारतीय अपना सारा ध्यान हाथ से सूत कातने और कपड़ा बुनने पर लगायें। {{C|'''खादी टोपी के लिए दस दिन की सजा'''}} बम्बई के पिछले दंगे में खादी टोपी की बहुत चर्चा रही। डॉ० साठे पर अपनी खादी टोपी न उतारने के कारण बुरी तरह हमला किया गया। अब मैंने सुना है कि फोर्ट के नाविकों ने बहुत-से निर्दोष व्यक्तियों की खादी टोपियाँ ज़बरदस्ती छीनी हैं। मैं तो यही आशा करता हूँ कि इस निरर्थक अत्याचार से राष्ट्र का संकल्प और दृढ़ होगा और हजारों लोग खादी टोपी के लिए, जो तेजी के साथ स्वदेशी और स्वराज्य का एक स्पष्ट प्रतीक बनती जा रही है, मरने को तैयार हो जायेंगे। परन्तु इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बंगाल से मिला है। बंगाल के कोमिल्ला जिले में ब्राह्मण-बाड़ी के एस० डी० ओ० श्री टी० एच० एलिस ने १६ तारीख को यह नोटिस जारी किया : :{{gap}}'''सरकार ने यह फैसला किया है कि तथाकथित गांधी टोपियाँ पहनना भारतीय दण्ड संहिता की धारा २२८ के अधीन एक अपराध है। भद्र लोगों को यह चेतावनी दी जाती है कि आदेश लागू किया जायेगा।''' परिणामस्वरूप, एक स्वयंसेवक पर, इस आदेश के बावजूद खादी टोपी पहनने पर, दस रुपया जुर्माना किया गया। उसने जुर्माना अदा करने से इनकार कर दिया और दस दिन जेल में रहना पसन्द किया। मैं यहाँ धारा २२८ उद्धृत कर रहा हूँ : :{{gap}}'''जो भी कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी का, जब कि वह सरकारी कर्मचारी अदालती कार्रवाई की किसी भी स्थिति में बैठा हो, जानबूझकर अपमान करेगा या उसको किसी प्रकार की बाधा पहुँचायेगा, उसे छः मास तक के साधारण कारावास की या एक हजार रुपये तक के जुर्माने की अथवा दोनों की सजा दी जायेगी।'''<noinclude></noinclude> 7p52ocm0hobabf11qpsg5p3iiog349y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६६ 250 186333 675332 644685 2026-08-30T16:58:42Z Shivaniya shaw 4129 /* अशोधित */ 675332 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५३४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इस प्रकार खादी टोपी पहनना अबसे बंगालमें सरकारी कर्मचारीका अपमान माना जायेगा । मैं समझता हूँ कि इस एस० डी० ओ०ने खुद वे अधिकार हथिया लिये हैं जो बंगाल सरकार द्वारा उसे या किसी भी अन्य मजिस्ट्रेटको कभी भी दिये नहीं गये थे । कुछ भी हो, यदि यह आदेश आम है तो वैसे नंगे सिर रहनेवाले बंगाली सिर्फ आत्म-सम्मानकी भावनाके कारण शीघ्र ही खादी टोपियाँ पहनना शुरू कर देंगे । मैं इस स्वयंसेवकको, जो खादी टोपी पहननेके अपराधपर कारावासका सम्मान प्राप्त करनेवाला पहला व्यक्ति है, बधाई देता हूँ । {{C|'''मद्य निषेधकका प्रमाण-पत्र'''}} मद्य-निषेधकका निम्नलिखित पत्र प्राप्त कर मुझे हर्ष और आश्चर्य हुआ। मुझे आशा थी कि डा० जॉन्सनसे भेंटका सौभाग्य मिलेगा, परन्तु हमारे कार्यक्रमोंकी पटरी नहीं बैठ सकी। इसलिए उनका एक पत्र पाकर, जिसमें मद्य-निषेधके हमारे कार्यको उन्होंने मान्यता दी है, विशेष सन्तोष मिला : प्रिय श्री गांधी, आपके देशसे विदा होते हुए, मेरा मन बार-बार उस शानदार कामकी ही बात सोच रहा है जो आप मद्य-निषेधके ध्येयके लिए भारत और परिणामतः समस्त संसारके लिए कर रहे हैं। . "अपनी धर्मपत्नीको कृपया मेरा सस्नेह स्मरण करा दें और अपने भाईको भी, जिनसे कुछ देर भेंटका सौभाग्य मुझे मिला था । जहाजसे १९ नवम्बर, १९२१ सस्नेह आपका, डब्ल्यू० ई० जॉन्सन " इस पत्रको पाठकोंके सम्मुख निःसंकोच में केवल इसीलिए रख पा रहा हूँ कि जिस कामको डा० जॉन्सनने सचमुच शानदार बताया है उसका श्रेय मैं अपनेको नहीं दे सकता। जो कार्य हुआ है उसमें दो वर्ष भी नहीं लगे हैं। परन्तु इसका श्रेय उन अज्ञात कार्यकर्त्ताओंके विशाल समूहको है जिन्होंने इस आन्दोलनकी धार्मिकतासे अनु- प्राणित होकर मद्यनिषेधका कार्य स्वयं आगे बढ़कर किया है । मैं चाहता था कि इस तरहका गौरवपूर्ण कार्य बम्बईमें शराबकी दूकानोंको जलानेकी उच्छृंखल और हिंसात्मक कार्रवाइयोंसे लांछित न होता। मुझे आशा है कि जोर-जबर्दस्तीका लेश भी इस सुधारमें नहीं रहेगा और भारत शीघ्र ही स्वेच्छासे मद्यका परित्याग कर देगा । अस्पृश्यता निवारणका अर्थ एक बंगाली मित्रने अपने पत्रमें लिखा है : अस्पृश्यता निवारणको आपने राष्ट्रीय कार्यक्रममें मुख्य स्थान दिया है। परन्तु जहाँतक मुझे ज्ञात है, आपने इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> hopfqpt3kkuqgzj1s4zpopsv49yxkbg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५६७ 250 186334 675407 644686 2026-08-30T18:01:57Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675407 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||एक प्रतिवाद| ५३५}}</noinclude>:'''कि इससे आपका ठीक-ठीक आशय क्या है । अन्तर्जातीय विवाहके प्रश्नसे अलग, इससे इन तीन सम्भव अर्थोंमें से कोई भी निकाला जा सकता है। इसका अर्थ या तो मनुष्यके स्पर्शको धार्मिक दृष्टिसे अपवित्र न मानना हो सकता है, या उसके हाथसे जल स्वीकार करना हो सकता है, या उसके साथ भोजन करनेमें-विशेषकर उसके हाथका पका भात खानमें आपत्ति न होना हो सकता है।''' {{Gap}}इस प्रश्नका उत्तर सामान्यतः मैं यह कहकर दे सकता हूँ कि अस्पृश्यता- निवारणका अर्थ पंचम वर्णकी समाप्ति है। इसलिए इसका अर्थ कमसे कम तो यह है कि मनुष्यका स्पर्श मात्र अपवित्र न समझा जाये । तथाकथित अस्पृश्योंको वैसी ही स्वतन्त्रता होनी चाहिए जैसी कि स्पृश्योंको है । इसलिए, आमतौरपर, अभीतक अस्पृश्य समझे जानेवालोंके हाथके जलको अपवित्र नहीं समझा जायेगा। अस्पृश्यता निवारणके अन्तर्गत किसी अस्पृश्यके या और किसीके हाथका पका भात या अन्य भोजन खाना नहीं आता । यह जाति प्रथामें होनेवाले सुधारका विषय है और अस्पृश्यता सम्बन्धी कार्य- क्रमके अन्तर्गत नहीं है । विवाह और सहभोज सम्बन्धी प्रतिबन्ध अवांछनीय सकते और उनमें परिवर्तन आवश्यक हो सकता है । परन्तु मैं उन्हें हिन्दू-धर्मका कलंक नहीं मानता, जैसा कि मैं अस्पृश्यताको मानता हूँ । अस्पृश्यता लोगोंके एक वर्गको सामाजिक सेवाकी परिधिसे बाहर कर देती है और इसलिए वह एक अमानवीय प्रथा है । :[ अंग्रेजीसे ]<br> :'''यंग इंडिया,''' १-१२-१९२१ {{C|'''२१५. एक प्रतिवाद'''}} {{Left|'''सम्पादक,'''<br> ''''यंग इंडिया''''<br> '''मान्यवर,'''}} :{{gap}}'''१० तारीखको 'यंग इंडिया' में आपने मुझे जो कड़ी फटकार<ref>१. देखिए " अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ”,१०-११-१९२१ । बताई है, उसे मैंने ठीक इस भावनासे ग्रहण किया है मानो कोई बुद्धिमान और दूरदर्शी सेनापति किसी गलती करनेवाले सैनिकको फटकार रहा हो । परन्तु कृपया मुझे विनम्रतापूर्ण प्रतिवादके कुछ शब्द कहने की अनुमति दीजिए। आपकी सख्त टिप्पणियाँ पढ़ने में बहुत सुखकर नहीं थीं । यह देखकर तो निश्चय ही बहुत दुःख हुआ कि आपने जिस ढंगसे मेरे बारेमें लिखा है उसमें आपने स्वयं अपनी महानताके प्रति अन्याय किया है। शान्त गरिमा, बड़ेसे-बड़े शत्रुके प्रति भी अति सतर्क न्यायपरायणता, निर्बाध उदारता और मधुर युक्तिपूर्णता, आपकी बहसकी"'''<noinclude>{{dhr|1em}} {{Smallrefs}}</noinclude> 6tsh8mwzy9nyp3auzjmbz87v4aoe63d पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७२ 250 186799 675426 674835 2026-08-30T18:16:02Z आदेश यादव 3609 675426 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|३४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> चाहे, बिना यथोचित जाँचके लगानमें कुछ भी बढ़ती कर सकती है। मैं यह भी कह दूँ कि यह आन्दोलन किसी राजनीतिक उद्देश्यके लिए किया गया लगान बंदीका आन्दोलन नहीं है। यह आन्दोलन एक ऐसी स्पष्ट निर्धारित शिकायत के विरुद्ध है, जिसका एक ताल्लुकेके सभी लोगों पर असर पड़ता है। इसलिए आयुक्तका यह कहना शेखी और झूठकी हद है कि : :{{gap}}'''मुझसे अधिक इस बातके लिए कोई और चिन्तित नहीं है कि गरीब किसानोंको, उनपर जीनेवाले आन्दोलनकारियोंका गिरोह गलत रास्ते ले जाकर उनका सर्वनाश न करा दे।'''}} :{{gap}}'''खेड़ा जिलेमें पाँच ताल्लुके हैं जहाँसे ये आन्दोलनकारी आते हैं। बाढ़के कारण वहाँके लगानमें रद्दोबदल दो वर्षोंके लिए मुल्तवी कर दिया गया है। पिछले ७—८ महीनोंमें सरकारने बाढ़ संकट–निवारणके लिए खेड़ा जिलेमें कोई ५० लाख तकका तकावी कर्ज दिया है। अगर इन आन्दोलनकारियोंको बारडोलीमें सफलता मिल गई तो खेड़ा जिलेमें लगान और तकावीका वसूल होना खतरे में पड़ जायेगा।'''}} अगर आन्दोलनकारियोंको सफलता मिली तो खेड़ाका तकावी कर्ज वसूल होना खतरेमें नहीं पड़ेगा। अगर कर्ज लेनेवालोंने उसे लौटानेमें आनाकानी की तो सरकार देखेगी कि आन्दोलनकारियोंके मुखिया वल्लभभाई पटेल उसके अवैतनिक पटवारी बनकर कर्ज वसूल करते फिरेंगे। आन्दोलनकारियोंकी सफलतासे यह अवश्य होगा कि सरकारी अफसरोंको सम्मानित लोक–सेवकोंका अपमान करनेका साहस न होगा, झूठी बातें कहनेकी हिम्मत न होगी, जैसी कि हिम्मत गुजरातके उत्तरी खण्डके आयुक्तने दिखलाई है; और लोग, बारडोलीके बारेमें जिस अत्यन्त अनुचित और अन्यायपूर्ण लगान लगाये जानेकी बात कही जा रही हैं, वैसे लगानसे राहत पा सकेंगे। जनतासे भी एक बात कहनी है। सरकारने अपनी बुद्धिमानीसे, और इस बातपर जोर देनेके लिए कि शासनकी सफलता प्रजामें फूट डालनेपर निर्भर है, बारडोली जैसे हिन्दू बहुल प्रदेशमें मुसलमान अफसरों और पठानोंको ला बुलाया है। बतौर सत्याग्रहीके, लोग चाहें तो सहज ही सरकारको मात दे सकते हैं। वे अफसरों और पठानोंके साथ मित्रताका बरताव करें। वे उनपर न तो अविश्वास करें, न उनसे जरा भी डरें और न उन्हें तकलीफ पहुँचायें। अफसर तो हमारे देशबन्धु हैं और पठान पड़ोसी हैं। शीघ्र ही सरकार अपनी मूल देख लेगी और जान जायेगी कि हिन्दुओंकी इज्जत मुसलमानोंको भी वैसी ही प्यारी है जैसी मुसलमानोंकी हिन्दुओंको बारडोलीवालोंको यह बात कार्यरूपमें व्यक्त कर दिखानेका अवसर मिला है। वे सत्याग्रहके उस नियमकी सफलताको सिद्ध करें जो कि प्रेमका नियम है, जो एक स्वेच्छाचारी आयुक्तके पाषाण हृदयको भी पिघला सकता है। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> 1jjh8qehb7u7a8npyeyzjz3uejtbu6v 675430 675426 2026-08-30T18:17:19Z आदेश यादव 3609 675430 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|३४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> चाहे, बिना यथोचित जाँचके लगानमें कुछ भी बढ़ती कर सकती है। मैं यह भी कह दूँ कि यह आन्दोलन किसी राजनीतिक उद्देश्यके लिए किया गया लगान बंदीका आन्दोलन नहीं है। यह आन्दोलन एक ऐसी स्पष्ट निर्धारित शिकायत के विरुद्ध है, जिसका एक ताल्लुकेके सभी लोगों पर असर पड़ता है। इसलिए आयुक्तका यह कहना शेखी और झूठकी हद है कि : :{{gap}}'''मुझसे अधिक इस बातके लिए कोई और चिन्तित नहीं है कि गरीब किसानोंको, उनपर जीनेवाले आन्दोलनकारियोंका गिरोह गलत रास्ते ले जाकर उनका सर्वनाश न करा दे।''' :{{gap}}'''खेड़ा जिलेमें पाँच ताल्लुके हैं जहाँसे ये आन्दोलनकारी आते हैं। बाढ़के कारण वहाँके लगानमें रद्दोबदल दो वर्षोंके लिए मुल्तवी कर दिया गया है। पिछले ७—८ महीनोंमें सरकारने बाढ़ संकट–निवारणके लिए खेड़ा जिलेमें कोई ५० लाख तकका तकावी कर्ज दिया है। अगर इन आन्दोलनकारियोंको बारडोलीमें सफलता मिल गई तो खेड़ा जिलेमें लगान और तकावीका वसूल होना खतरे में पड़ जायेगा।''' अगर आन्दोलनकारियोंको सफलता मिली तो खेड़ाका तकावी कर्ज वसूल होना खतरेमें नहीं पड़ेगा। अगर कर्ज लेनेवालोंने उसे लौटानेमें आनाकानी की तो सरकार देखेगी कि आन्दोलनकारियोंके मुखिया वल्लभभाई पटेल उसके अवैतनिक पटवारी बनकर कर्ज वसूल करते फिरेंगे। आन्दोलनकारियोंकी सफलतासे यह अवश्य होगा कि सरकारी अफसरोंको सम्मानित लोक–सेवकोंका अपमान करनेका साहस न होगा, झूठी बातें कहनेकी हिम्मत न होगी, जैसी कि हिम्मत गुजरातके उत्तरी खण्डके आयुक्तने दिखलाई है; और लोग, बारडोलीके बारेमें जिस अत्यन्त अनुचित और अन्यायपूर्ण लगान लगाये जानेकी बात कही जा रही हैं, वैसे लगानसे राहत पा सकेंगे। जनतासे भी एक बात कहनी है। सरकारने अपनी बुद्धिमानीसे, और इस बातपर जोर देनेके लिए कि शासनकी सफलता प्रजामें फूट डालनेपर निर्भर है, बारडोली जैसे हिन्दू बहुल प्रदेशमें मुसलमान अफसरों और पठानोंको ला बुलाया है। बतौर सत्याग्रहीके, लोग चाहें तो सहज ही सरकारको मात दे सकते हैं। वे अफसरों और पठानोंके साथ मित्रताका बरताव करें। वे उनपर न तो अविश्वास करें, न उनसे जरा भी डरें और न उन्हें तकलीफ पहुँचायें। अफसर तो हमारे देशबन्धु हैं और पठान पड़ोसी हैं। शीघ्र ही सरकार अपनी मूल देख लेगी और जान जायेगी कि हिन्दुओंकी इज्जत मुसलमानोंको भी वैसी ही प्यारी है जैसी मुसलमानोंकी हिन्दुओंको बारडोलीवालोंको यह बात कार्यरूपमें व्यक्त कर दिखानेका अवसर मिला है। वे सत्याग्रहके उस नियमकी सफलताको सिद्ध करें जो कि प्रेमका नियम है, जो एक स्वेच्छाचारी आयुक्तके पाषाण हृदयको भी पिघला सकता है। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> aqz7y4yj689zubjzzla1tu41kdcifyb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७३ 250 186800 675427 674887 2026-08-30T18:16:30Z आदेश यादव 3609 675427 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८३. दलित–वर्ग और बाघात रियासत'''}}}} आखिर गत ५ तारीखको बाघात रियासतके राणा साहबने आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाबकी ओरसे जो शिष्टमण्डल उनसे मिलनेके लिए गया था उससे भेंट की और आर्यसमाज द्वारा शुद्ध किये कोलियोंके यज्ञोपवीत धारण करनेके मामलेमें रियासतके व्यवहारसे पैदा हुई स्थितिपर चर्चा की। इस शिष्ट मण्डलमें राय साहब लाला गंगाराम, पंडित चमूपति, एम॰ ए॰, लुधियानाके दीवान रामशरणदास, पण्डित धर्मवीर वेदालंकार और शिमलाके एडवोकेट लाला शंकरनाथ शामिल थे। शिष्टमण्डलको, भेंटके दौरान जो कुछ हुआ उसके बारेमें निम्नलिखित बयान देनेकी इजाजत मिली है : :{{gap}}'''शिष्टमण्डलके सदस्योंने राणा साहबको सौहार्दपूर्ण अतिथिसत्कारके लिए धन्यवाद दिया और प्रस्तुत प्रश्नके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी तथा आर्य प्रतिनिधि सभाकी स्थिति स्पष्ट की। राणा साहबने मण्डलकी बात धैर्यसे सुनी तथा उसे यकीन दिलाया कि उनकी रियासतमें सभी सुस्थापित धार्मिक समाजोंको धर्म–प्रचारकी पूरी स्वतन्त्रता है। मण्डलने उनका ज्ञापन शिष्टतासे सुननेके लिए तथा उत्साहवर्धक जवाब देने के लिए राणा साहबको धन्यवाद दिया और उनसे विदा ली।''' इस संयुक्त बयानमें अत्यधिक सतर्कता तथा राज्यकी भीरुताकी झलक दिखलाई पड़ती है। दलितोंके प्रति किये गये अन्याय तथा एक महान् धार्मिक संस्थाके अपमानको साफ तौरपर स्वीकार करनेसे रियासतकी इज्जत जनताके मनमें बहुत बढ़ जाती। खैर थोड़ा–बहुत जो भी हुआ उसीके लिए धन्यवाद देना चाहिए। अगर राणा साहबकी प्रतिज्ञाका पूर्ण पालन हुआ तो अन्याय और अपमानकी बातको लोग भूल जायेंगे। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १७-५-१९२८<noinclude></noinclude> hn1cy5b5qinjazyosxvf8u1rxc0p5yc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७४ 250 186801 675432 674890 2026-08-30T18:18:15Z आदेश यादव 3609 675432 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८४. मगनलाल गांधी स्मारक'''}}}} अ॰ भा॰ च॰ संघकी कौंसिलने अपनी १२ ता॰ की बैठकमें यह प्रस्ताव स्वीकार किया है : :{{gap}}'''यह कौंसिल निश्चय करती है कि स्व॰ श्रीयुत मगनलाल गांधीकी स्मृतिमें एक खादी संग्रहालय बनाया जाये। उसके लिए एक लाख रुपयोंकी अपील की जाये। कौंसिल यह निर्णय करेगी कि स्मारक कहाँ बनाया जाये तथा उसकी व्यवस्था किस तरह की जाये।''' मेरे पास भारतवर्षमें दूर–दूरसे तथा सुदूर दक्षिण आफ्रिकासे जो संवेदना सन्देश आये हैं, उनसे विदित होता है कि मगनलालका लोगोंके हृदयमें क्या स्थान था। उनके जैसे सज्जन, लोकप्रिय और चुपचाप काम करनेवाले कार्यकर्ताका स्मारक बनाना उचित ही है। खूब सोच विचारके बाद अ॰ भा॰ च॰ संघकी कौंसिलने निश्चय किया कि उनका इससे अच्छा स्मारक कोई दूसरा नहीं हो सकता कि किसी उपयुक्त स्थान पर एक खादी–संग्रहालय खोला जाये। संग्रहालय खोलनेकी कल्पना तो मगनलालकी ही थी और उन्होंने अपने स्वभावके अनुसार सत्याग्रह आश्रमके एक कमरेमें छोटा–सा संग्रहालय बनाया भी था। किन्तु खादीने जो उन्नति की है, उसे देखते हुए हमें उसके लिए एक स्थायी और बड़े मकानकी और वहाँ वस्तुओंका ऐसा संग्रह करनेकी जरूरत है, जो दिवंगतकी प्रतिष्ठाके अनुरूप हो। ऐसा संग्रहालय एक लाख रुपयोंसे कममें बन ही नहीं सकता। इसलिए संघने कमसे–कम एक लाख रुपयोंकी रकम निश्चित की है। गम्भीर अध्ययन और शिक्षणके लिए जो खादी संग्रहालय बनाया जाये, उसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं हो सकती। एक लाख रुपयोंसे कौंसिल केवल बहुत मामूली, मगर काफी अच्छी शुरुआत कर सकने तथा स्वर्गीय व्यक्तिकी कल्पनाको स्थायी रूप दे सकने भरकी आशा रखती है। जनता जैसी सहायता दे, उसके अनुसार संग्रहालयमें कपासकी खेती पहले जमानेमें किस तरह होती थी और आजकल किस तरह होती है, इससे सम्बन्धित तमाम किताबें रखी जा सकती हैं, पुराने जमानेकी तथा आजकलकी अच्छी–अच्छी, महीनसे–महीन तथा मोटी–मोटी खादीके नमूने रखे जा सकते हैं, और धुनकी, ओटनी, चरखे तथा करघेके पुरानेसे–पुराने तथा नए–नए नमूने रखे जा सकते हैं। संग्रहालयके साथ ही थोड़ी जमीन रखी जा सकती है, जिसमें कपासकी खेतीके प्रयोग किये जायें। इन प्रयोगोंमें हमारी दृष्टि कपास की खेतीसे गरीब गाँववालोंको लाभ पहुँचानेकी होगी; दुनियाके बाजारसे या शोषण–कुशल धनी व्यापारियोंको लाभ पहुँचानेसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होगा। सत्याग्रह आश्रममें स्वर्गीय मगनलाल ऐसे प्रयोग कर रहे थे। आश्रमकी यह कपास कतैयोंके बीच बहुत प्रिय हो गई है। मिलोंके उपयोगमें आनेवाली कपासको बहुत ज्यादा दबा दिया जाता है जिससे वह कमजोर हो जाती है। घरकी खेतीकी कपासमें इस<noinclude></noinclude> agdbnm7a4i0entkq3963flqufo6ya50 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२८ 250 186954 675321 645351 2026-08-30T16:31:45Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५४१. पत्र: कुवलयानन्दको'''}}}} {{right|३ फरवरी, १९२८<ref>साधन-सूत्रमें "३-१-१९२८" दिया है। लगता है कि गलतीसे ३-२-१९२८ के बजाय यह तारीख दे दी गई है। गांधीजीने ३१ दिसम्बर १९२७ को आश्रम लौटनेके बाद खूराक सम्बन्धी प्रयोग शुरू किया होगा। एक महीनेसे चल रहे प्रयोगके उल्लेखसे लगता है कि यद पत्र ३ फरवरी, १९२८ को लिखा गया था।</ref>}} {{left|प्रिय भाई,}} आपका कृपा पत्र मिला। मैंने यौगिक क्रियाएं कतई नहीं छोड़ी हैं। शायद शवासन में योग्य प्रकारसे नहीं कर पाता। मैं श्वास तो उसी प्रकार लेता हूँ जैसा कि आपने बताया है लेकिन मैंने अपनी खुराकमें आमूल परिवर्तन कर दिया है। धार्मिक कारणोंसे दूधके प्रति मेरी नापसन्दगी आप जानते हैं। यात्रा आदिकी बात न होनेसे मैं आहारमें मेवों और फलोंका प्रयोग करके देख रहा हूँ। इसे लगभग एक महीना हो गया है। मैं दिनमें तीन बार एक तोला दूध जैसा बारीक पिसा हुआ बादाम, अघसिके सन्तरों या मुनक्कोंके साथ लेता हूँ। दो बार आधा आधा नारियल पीसकर और निचोड़कर उसका दूध निकालकर अधसिके कच्चे पपीते या कच्चे केलेके साथ लेता हूँ। कच्चा केला मैंने आज ही शुरू किया है। इस परिवर्तनके बादसे मैंने कोई सारक दवा नहीं ली है और कोठा पहलेसे कहीं अच्छा है। शायद आप यह परिवर्तन पसन्द नहीं करते। लेकिन यदि आप मुझे बर्दाश्त करके मेरा मार्गदर्शन कर सकें तो कृपया अवश्य करें। यदि आप कोई और आसन सुझाना चाहते हों तो कृपया सूचित करें। डा॰ मुथुकी सलाह पर मैंने एक महीनेसे रक्तचापकी जाँच बिलकुल करवाई ही नहीं है। {{right|हृदयसे आपका,<br> मो॰ क॰ गांधी}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ५०५४) की फोटो-नकलसे। {{dhr|10em}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> pto3id20sw1a13bypzok7lleays1205 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५२९ 250 186955 675324 645352 2026-08-30T16:41:44Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''परिशिष्ट'''}}}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''परिशिष्ट १'''}}}} {{c|'''विदेशोंमें प्रचार'''}} असहयोग आन्दोलनसे पूर्व भारतकी राजनैतिक गतिविधि अधिकतर ब्रिटेनमें प्रचार-कार्य तक ही सीमित थी। अपेक्षाकृत काफी धन इस काम पर खर्च होता था और उसे अच्छे ढंगसे खर्च किया गया समझा जाता था। जब गांधीजीने हमारे राष्ट्रीय कार्योका निर्देशन अपने हाथोंमें लिया तब दृष्टिकोणमें परिवर्तन आ गया। उनके कार्यक्रमका पहला फल यह हुआ कि राष्ट्रीय शक्तिके लिए आवश्यक बातें समझमें आई और इससे हमारी सारी राजनैतिक विचारधारा उस समय प्रभावित हुई। राष्ट्रीय माँगोंको अहिंसात्मक ढंगसे लागू करनेके लिए जरूरी बातोंका नियमन करनेवाले प्राकृतिक नियमोंको हमने समझा। हमने उन प्राकृतिक नियमोंको समझा जिनका राष्ट्रीय माँगोंको लागू करनेके लिए अपेक्षित सिद्धान्तोंपर असर पड़ता है और इससे स्वाभाविक परिणाम-स्वरूप लगभग पूर्ण आत्मनिर्भरताकी भावनाका उदय हुआ। ग्रेट ब्रिटेन सहित विदेशोंमें अनुकूल जनमत तैयार करनेका सही मूल्य आँका गया और उसके लिए अलग से किये जानेवाले विशेष प्रयत्न लगभग त्याग दिये गये और जब कभी यह प्रश्न उठाया गया, उसका जोर-शोरसे विरोध किया गया। भारतमें कार्य इतने जोरसे हुआ और उसके परिणाम भी इतने स्पष्ट दिखाई दिये कि शीघ्र ही स्थिति विपरीत हो गई और बजाय इसके कि भारतीय ब्रिटेन में और विदेशों में प्रचार करनेके लिए जाते, अनगिनत विदेशी यात्री भारतके प्रति आकृष्ट हुए और ब्रिटिश सरकारको मजबूरन विदेशोंमें जवाबी प्रचार करना पड़ा। भारतमें भी सरकार आत्म-विश्वास खो बैठी और सरकारने राष्ट्रीय जागृतिको रोकने या कमसे कम कुछ मुल्तवी करनेके उद्देश्यसे लोगोंमें स्वयं प्रचार-कार्यका संगठन किया। किन्तु आक्रामक असहयोग बन्द होने के साथ भारतीय विचारधारामें फिरसे परिवर्तन आ गया है। विदेशोंमें प्रचारके लिए धीरे-धीरे लेकिन फिरसे आवाज़ बराबर बढ़ती जा रही है। अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति अर्थात् राष्ट्रकी संगठित और संयुक्त कार्यवाहीकी कठिनाइयोंके कारण स्वभावतः लोग विदेशोंमें कार्य करनेके लिए आसान तरीके अपनाने लगे हैं। उन लोगोंके लिए जो असहयोगके सिद्धान्तपर अब भी अटल हैं और केवल देशके भीतरसे ही मुक्तिकी आशा करते हैं, राष्ट्र द्वारा पूर्व और पश्चिमके देशोंका मुँह देखना शक्तिका अपव्यय, बढ़ती हुई निर्बलताका लक्षण और चिन्ताका कारण है। दिशा विकर्षकी इस प्रवृत्तिसे दृष्टि धूमिल पड़ जायेगी और रचनात्मक प्रयत्नोंपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इससे न केवल ध्यान ही बँटेगा बल्कि {{left|३६–३२}}<noinclude></noinclude> i3c1xpyq9014xgi0vydvpcuodfemjo1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५३० 250 186956 675326 645353 2026-08-30T16:49:21Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४९८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कुछ सर्वोत्तम कार्यकर्ता इस अपेक्षाकृत अधिक रोचक परन्तु व्यर्थके काम में तन [मन] से लग जायेंगे। असहयोगसे पहलेका विदेशोंमें प्रचारकार्य मुख्य रूपसे ब्रिटेन तक ही सीमित था। लेकिन इन आठ वर्षोके प्रयत्नोंका एक स्थायी परिणाम यह हुआ है कि ब्रिटेन भी विश्वास खो बैठा है। जो-कुछ रहा सहा विश्वास ब्रिटिश मजदूर दलको था, वह भी खत्म हो गया है। इसलिए विदेशों में प्रचारकी मांगका वर्तमान स्वर इंग्लैंडमें प्रचारके लिए नहीं बल्कि अन्य विदेशी राष्ट्रोंसे सम्पर्क और मंत्री बढ़ानेके लिए है। हमें बताया जाता है कि जर्मन और रूसी लोगोंसे घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित करना नितान्त वांछनीय है। हमें बताया जाता है कि यूरोपकी लैटिन जातियोंमें प्रचारके लिए अनुकूल क्षेत्र है। फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगालका उल्लेख किया जाता है। महत्वपूर्ण निष्पक्ष क्षेत्र होनेके कारण स्केन्डिनेवियाको भी नहीं भुलाया जाता। फिर हमें यह भी बताया जाता है कि यह आजकी मांग है कि भारतका उन देशोंसे नाता जोड़ा जाये जो इसी तरहके साम्राज्यवादी शोषणसे कष्ट भोग रहे हैं। हमें आश्वासन दिया जाता है कि भारतकी आशा ऐसे संघ-बद्ध एशियामें निहित है जो पश्चिमी आधिपत्यके विरुद्ध सिर उठाये। विदेशोंमें प्रचार सम्बन्धी रुखमें हुई इस तबदीलीकी प्रतिध्वनिका अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी कार्यवाहियोंमें सुनाई देना स्वाभाविक था, जहाँ वातावरणमें विदेशी मामलोंकी प्रधानता थी। वहाँ कई ऐसे प्रस्ताव स्वीकार किये गये जो अन्तर्राष्ट्रीय मैत्रीकी नींव डालने के उद्देश्यसे प्रस्तुत किये गये थे। यदि हमारे हालात बेहतर हों और हम अन्य राष्ट्रोंसे मेलजोल रखनेसे इनकार कर दें तो वास्तवमें यह हमारी संकुचित मनोवृत्ति होगी। इससे यह व्यक्त होगा कि हममें, संस्कृति और भाई चारेकी भावनाकी कमी है। लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में जो चीज सभ्यता और संस्कृति तथा उदार मनोवृत्तिकी द्योतक होगी वही मौजूदा हालातों में केवल विवशताको प्रकट करेगी और उससे कुछ लाभ नहीं होगा। अन्य राष्ट्रोंसे मैत्री केवल तभी बढ़ सकती है और लाभप्रद हो सकती है, जब जैसा कि व्यक्तिगत मैत्रीमें भी होता है, एक ही पक्ष द्वारा सारे लाभ पानेकी आशा उसका आधार न हो। यदि हम अन्य लोगोंसे सम्मानजनक मंत्री चाहते हैं तो जहां हम उनसे कुछ पाना चाहते हैं वहां उन्हें देनेके लिए हमारे पास भी कुछ होना चाहिए। यदि हम वास्तवमें दूसरोंकी मदद नहीं कर सकते और केवल उनसे ही कुछ पाना चाहते हैं तो पारस्परिक आदरभाव नहीं बढ़ेगा और न स्वस्थ मैत्री ही पनप सकती है। यदि हम सचमुच दूसरोंकी मदद कर सकते हैं तो वह केवल राष्ट्रीय अधिकारों की दृढ़तापूर्वक मांग करनेके लिए महान प्रयत्नके बाद ही सम्भव है। और यदि सही दिग्दर्शन कराया जाये तो इससे स्वदेशमें प्रभावशाली परिणाम निकल सकते है और अवश्य निकलेंगे। जिन राष्ट्रोंसे हम मंत्री चाहते हैं उन्हें हमारे निकट सम्बन्धसे सीख सकने लायक कुछ दिखाई देना चाहिए या कुछ लाभकी सम्भावना होनी चाहिए। यदि हमारे बीच कोई बहुत बड़े महत्वका आन्दोलन चल रहा हो या कोई क्रान्तिकारी प्रयत्न हो रहा हो या कोई ऐसा बड़ा रचनात्मक काम हो रहा हो<noinclude></noinclude> tpxb3r1tjk701a6eisqs08aeomca1lk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५३१ 250 186957 675331 645354 2026-08-30T16:57:48Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||परिशिष्ट|४९९}}</noinclude>जिससे दूसरा कुछ सीख सके या जिसका अध्ययन कर सके तो यदि हम बराबरीके दर्जेकी नहीं तो सम्मानजनक शर्तोंपर मैत्रीकी अपेक्षा कर सकते हैं। लेकिन हम सदैव अपनी पुरातन संस्कृति या गांधीवादी आन्दोलनके इतिहासपर ही आश्रित नहीं रह सकते। केवल दासताके सूत्र पर मैत्रीके सच्ची या लाभप्रद होनेकी सम्भावना नहीं है। हम रूस, चीन या तुर्कीकी तरफ क्यों झुकते हैं? केवल इन राष्ट्रोंके विगत इतिहासकी महानता ही हमें आकर्षित नहीं करती। यदि उनकी केवल यही देन हो तो उनमें हमारी दिलचस्पी नहीं बचेगी। लेकिन, चूँकि हमारा यह विश्वास है कि उन देशोंमें आजकल महान आन्दोलन चल रहे हैं जिनमें हमें उपयोगी अव्ययनकी सामग्री मिलती है। या उनकी किन्हीं चीजोंपर गौर करें तो हम उनपर मुग्ध हो सकते हैं, इसलिए हमारे कुछ लोग उन देशोंको जाते हैं। इसी तरह यदि हम ऐसे राष्ट्रोंसे अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री चाहते हैं तो हमारे पास उन्हें देनेको कुछ मूल्यवान वस्तु होनी चाहिए। अन्यथा हम केवल भिखारी होंगे और हमें अपने साथ किसी भिखारी से किये जानेवाले बर्ताव से बेहतर बर्तावकी आशा नहीं करनी चाहिए। लेकिन फिर यह कहा जा सकता है कि यह तो विश्व-राजनीतिकी उपेक्षा करना है। युद्ध हो रहे हैं। विश्वके राष्ट्र बराबर एक दूसरेकी योजनाओंको निष्फल बनानेको तत्पर हैं और इस फलकपर भारत एक महत्वपूर्ण मोहरा है। हम अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिसे उतने लाचार नहीं हैं जितने आन्तरिक दृष्टिसे अपने खुदके मामलोंमें हैं। इसके लिए आवश्यकता उलझनें मिटाने और सीधी-सच्ची बातचीत करनेकी है। क्या हम युद्ध करना चाहते हैं और क्या हम उन लोगोंसे मैत्री करना चाहते हैं जो इंग्लैंड से युद्ध कर सकते हैं या क्या हम अन्य राष्ट्रोंसे आशा करते हैं कि वे हमारी खातिर युद्ध करेंगे। यदि विदेशी शक्तियाँ युद्ध करती हैं तो वे उसमें गोला-बारूद तथा जहाजोंका भी उपयोग करेंगी। क्या कभी ऐसे युद्धमें एक राष्ट्रके रूपमें उपयोगी ढंगसे हमारे भाग लेनेकी सम्भावना है? क्या ऐसी कोई कल्पना की गई है कि भारत तथा पूर्वके अन्य गुलाम राष्ट्र भविष्य में किसी भी समय ऐसी संधि कर सकते हैं जिसके द्वारा एक दूसरेकी सहायता करते हुए वे सबके समान शत्रुके प्रति विद्रोह कर दें? क्या भारत ऐसी आशा कर सकता है कि यदि विश्व-युद्ध में ऐसी कोई जरूरत पड़े तो वह इंग्लैंडके विरुद्ध युद्ध करनेवाली किसी शक्तिको सक्रिय सहायता देगा? और क्या एक ही दलील दें तो हमारे इस तरहकी कोई बात हासिल कर पानेकी गुंजाइश है? इस स्थितिमें जब कि हम निशस्त्र हैं, क्या इसे थोड़ी-सी भी व्यावहारिक राजनीति कह सकते हैं? शायद इस पर यह कहा जाये कि हम शस्त्र नहीं चाहते; हम निष्क्रिय प्रतिरोध द्वारा बहुत कुछ कर सकते हैं। युद्ध अथवा शान्ति कालमें ब्रिटिश सरकारसे असहयोग करना ही हमारे हाथमें एक मात्र अस्त्र है। तब फिर हम अपनी पुरानी स्थितिपर वापस आ जाते हैं। इंग्लैंडके विरुद्ध भारतका युद्ध यदि अहिंसात्मक उपायोंसे ही होना है तो इसका अर्थ यह है कि वह पूर्णतया देशकी अपनी ताकत पर निर्भर<noinclude></noinclude> dmb1191hyxxicf2p4v3jn1fflmemrbk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५३२ 250 186958 675346 645355 2026-08-30T17:24:26Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|५००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करता है और इसे अन्तर्राष्ट्रीय मामला कभी नहीं बनाया जा सकता। अहिंसात्मक संघर्ष में विदेशोंसे कोई ठोस मदद पाना कदाचित् सम्भव भी हो, किन्तु वह आसान नहीं है। उस संघर्षकी कल्पना संगठन और कार्यान्वयन सर्वथा आत्मनिर्भरताके आधार पर किये जाने चाहिए। ऊपरी नैतिक मदद हमें विदेशोंसे मिल सकती है। यह हमें विदेशों में या स्वदेशमें किये गए प्रचारसे नहीं मिलेगी। यह मदद उसी हद तक मिलेगी जिस हदतक हम ठोस रचनात्मक कार्य करेंगे और अपनी आन्तरिक शक्ति बढ़ायेंगे। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' १-३-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}} {{c|{{larger|वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीका समुद्री तार}}}} {{right|मेरिब्जवर्ग<br> २४ अप्रैल १९२८}} {{left|गांधी,<br> साबरमती।<br> गोपनीय}} जोहानिसबर्गसे द॰ आ॰ भा॰ स॰<ref>दक्षिण आफ्रीकी भारतीय समिति।</ref> के समुद्री तारसे आप बेकार चिन्तित हो गये। नेटाल कांग्रेस नेता इसका अनुमोदन नहीं करते। उनकी मन्शा निश्चित प्रश्न पूछना ही था। क्या स्मट्ससे हुए आपके समझोतेका यह भी अंग था कि उस समय प्रमाणपत्र रखनेवालों पर, चाहे उन्होंने प्रमाणपत्र चालबाजीसे हासिल किये हों, आपत्ति नहीं उठाई जानी चाहिए? यदि ऐसा हो तो, मैं नहीं समझ सकता कि सरकारने १९१५ में माफी योजना क्यों प्रकाशितकी और पहली अगस्त १९१० के पहले से प्रवेश पाये लोगोंको संरक्षणके कागजात देते हुए उसे १९१६ तक क्यों जारी रखा। ऐसा लगता है कि पोलकने सच्चे दिलसे सलाह दी थी कि प्रस्तावका पूरा लाभ उठाया जाये; लेकिन केवल कुछ ही लोगोंने वैसा किया। विभाग इस बात के लिए राजी है कि एक बार माफ कर दिये गये लोगोंको अब फिर माफीकी अर्जी देनेकी जरूरत नहीं है। लेकिन ट्रान्सवाल कांग्रेस के नेता मांग करते हैं कि १९१४ के समझौतेके वक्तके छलपूर्ण प्रमाण-पत्रोंपर कोई आंच नहीं आनी चाहिए चाहे उनके रखनेवालोंने १९१५ की विज्ञप्तिके अधीन माफी हासिल की हो या नहीं। यदि आपके साथ हुए समझोतेका यह अंग था तो कृपया तुरन्त वैसा तार दीजिए। मलान, श्मिट, वेन और प्रिंगको जहांतक मैं निजी तौरपर जानता हूं, मैं पूरे विश्वाससे कह सकता हूँ कि इस समय उनके इरादे नेक हैं। वे जानबूझकर पहले वायदे से मुंह नहीं मोड़ेंगे। {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 0kielm8r1vxnf7gs5oo9vafimvi4va2 675348 675346 2026-08-30T17:25:00Z अनुश्री साव 80 675348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|५००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करता है और इसे अन्तर्राष्ट्रीय मामला कभी नहीं बनाया जा सकता। अहिंसात्मक संघर्ष में विदेशोंसे कोई ठोस मदद पाना कदाचित् सम्भव भी हो, किन्तु वह आसान नहीं है। उस संघर्षकी कल्पना संगठन और कार्यान्वयन सर्वथा आत्मनिर्भरताके आधार पर किये जाने चाहिए। ऊपरी नैतिक मदद हमें विदेशोंसे मिल सकती है। यह हमें विदेशों में या स्वदेशमें किये गए प्रचारसे नहीं मिलेगी। यह मदद उसी हद तक मिलेगी जिस हदतक हम ठोस रचनात्मक कार्य करेंगे और अपनी आन्तरिक शक्ति बढ़ायेंगे। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' १-३-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}} {{c|{{larger|'''वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीका समुद्री तार'''}}}} {{right|मेरिब्जवर्ग<br> २४ अप्रैल १९२८}} {{left|गांधी,<br> साबरमती।<br> गोपनीय}} जोहानिसबर्गसे द॰ आ॰ भा॰ स॰<ref>दक्षिण आफ्रीकी भारतीय समिति।</ref> के समुद्री तारसे आप बेकार चिन्तित हो गये। नेटाल कांग्रेस नेता इसका अनुमोदन नहीं करते। उनकी मन्शा निश्चित प्रश्न पूछना ही था। क्या स्मट्ससे हुए आपके समझोतेका यह भी अंग था कि उस समय प्रमाणपत्र रखनेवालों पर, चाहे उन्होंने प्रमाणपत्र चालबाजीसे हासिल किये हों, आपत्ति नहीं उठाई जानी चाहिए? यदि ऐसा हो तो, मैं नहीं समझ सकता कि सरकारने १९१५ में माफी योजना क्यों प्रकाशितकी और पहली अगस्त १९१० के पहले से प्रवेश पाये लोगोंको संरक्षणके कागजात देते हुए उसे १९१६ तक क्यों जारी रखा। ऐसा लगता है कि पोलकने सच्चे दिलसे सलाह दी थी कि प्रस्तावका पूरा लाभ उठाया जाये; लेकिन केवल कुछ ही लोगोंने वैसा किया। विभाग इस बात के लिए राजी है कि एक बार माफ कर दिये गये लोगोंको अब फिर माफीकी अर्जी देनेकी जरूरत नहीं है। लेकिन ट्रान्सवाल कांग्रेस के नेता मांग करते हैं कि १९१४ के समझौतेके वक्तके छलपूर्ण प्रमाण-पत्रोंपर कोई आंच नहीं आनी चाहिए चाहे उनके रखनेवालोंने १९१५ की विज्ञप्तिके अधीन माफी हासिल की हो या नहीं। यदि आपके साथ हुए समझोतेका यह अंग था तो कृपया तुरन्त वैसा तार दीजिए। मलान, श्मिट, वेन और प्रिंगको जहांतक मैं निजी तौरपर जानता हूं, मैं पूरे विश्वाससे कह सकता हूँ कि इस समय उनके इरादे नेक हैं। वे जानबूझकर पहले वायदे से मुंह नहीं मोड़ेंगे। {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 867zgab8qljb2n9mmomzv8fdqdxt5ma पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५३३ 250 186959 675390 645356 2026-08-30T17:48:11Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 675390 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||परिशिष्ट|५०१}}</noinclude>जहांतक परिवारोंके प्रवेशका सम्बन्ध है, १९१४ से पहले परिवारोंके बिना प्रवेश करनेवालोंकी संख्या अब भी कम ही होगी। इस बात के लिए भी कोई एक दलील नहीं है कि यदि १९१४ के बाद चालबाजीसे प्रवेश करनेवाले बिना परिवारोंके रहते हैं तो १९१४ से पहलेवालोंको उस अपात्रतासे क्यों बरी कर दिया जाना चाहिये। विभाग पूछता है कि १९१४ से पहले नेटाल और केपमें छलसे प्रवेश करनेवालोंके साथ ट्रान्सवालमें उसी प्रकारके लोगोंकी अपेक्षा बुरा बर्ताव क्यों किया जाना चाहिए। उन्हें यह भी आशंका है कि इन प्रान्तोंमें कोई पंजीयन प्रमाणपत्र न होनेसे किसी भी व्यक्तिके लिए यह कहना आसान है कि वह १९१४ से पहले आया है। स्मरण रहे कि इससे पहले कि धारा ५ किसीके विरुद्ध लगाई जा सके, जालसाजी प्रमाणित करनेका भार सरकार पर होगा। यह सच नहीं है कि संरक्षण प्रमाणपत्रोंके बदले में पंजीयनके तथा अन्य प्रमाणपत्र दे दिये जाने चाहिए। स्पष्ट व्यवस्था द्वारा सम्बद्ध पक्षोंको ये दस्तावेज रखने की अनुमति दी गई है। यह सच है कि संरक्षण प्रमाणपत्र १९१३ के उस प्रवास कानून की धारा २५ के अधीन उस विनियममें आ जायेंगे जो अस्थायी परमिटोंके लिए अनुमति प्रदान करता है। विभागोंको कानून अधिकारियों द्वारा सलाह दी जाती है कि धारा २५ के अधीन स्थायी परवानों पर मंत्री प्रतिबन्धात्मक शर्तें नहीं लगा सकते; लेकिन यदि परवाने अस्थायी हों तो वैसा कर सकते हैं। प्रस्तावित संरक्षण प्रमाण-पत्रोंमें एक वायदा है कि जबतक प्रमाण-पत्र रखने वालों पर निर्वासन योग्य अपराध करनेका जुर्म न हो तबतक मंत्री उन्हें रद नहीं करेंगे। विभाग का तर्क है कि यह व्यवस्था वास्तव में प्रमाण-पत्रोंको स्थायी बना देती है। प्रमाणपत्रके स्वरूपका प्रश्न अब भी विचाराधीन है और यदि मौजूदा स्वरूप पर कानूनी राय विपरीत हो तो उस दशामें मुझे विभागसे सन्तोषप्रद व्यवहारकी आशा है। मैंने डाकसे लम्बा स्मरण-पत्र भेजा है। जबतक आप उसे पढ़ न लें तबतक के लिए कोई निष्कर्ष न निकालें। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि यह माफी योजना निष्क्रिय प्रतिरोध संघर्षके परिणामोंको किस प्रकार विफल बनाये दे रही है। कृपया इस समुद्री तार तथा द॰ आ॰ भा॰ स॰ के समुद्री तारकी प्रति तथा आपके और मेरे बीच जिस तारका आदान प्रदान हुआ है उसकी प्रति भी सर मुहम्मद हबीबुल्लाको डाकसे भेज दीजिए। {{right|शास्त्री}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९७४) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> eex9uukdefaxr3pf7zkfnob6u9yqu67 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६६ 250 187003 675218 675199 2026-08-30T12:07:01Z आदेश यादव 3609 675218 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय सतीश बाबू,}} यह बहिष्कार आन्दोलन एक खेदका विषय है। मैं चाहता हूँ कि मिलों और बहिष्कार पर लिखा मेरा लेख<ref>देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती हैं?", १५-३-१९२८।</ref> आप ध्यान से पढ़ें। मैं मिल–मालिकोंसे भी अपना सम्पर्क रख रहा हूँ। यदि मेरे तर्कमें आपको कोई कमी दिखाई दे तो उसकी ओर मेरा ध्यान दिलानेमें आप तनिक भी संकोच न करें। मेरे स्वास्थ्यसे सम्बन्धित तार इस बार बिलकुल ही निन्दात्मक<ref>देखिए, "पत्र : वि॰ च॰ रायको", २०-३-१९२८।</ref> था, क्योंकि उसका कोई आधार ही नहीं था। जहाँतक मैं जानता हूँ मेरा स्वास्थ्य कभी इससे अच्छा नहीं रहा। डा॰ अन्सारी और जमनालालजी राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालयसे सम्बन्धित अजमल खाँ स्मारकके सम्बन्धमें चर्चा करने आये थे, उसके अतिरिक्त उन्हें और कोई काम नहीं था। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२१) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१४८. पत्र : राधा गांधीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> मंगलवार [२० मार्च, १९२८]<ref>ढाककी मुहरसे।</ref>}} {{left|चि॰ राधिका,}} तुम्हारे सुन्दर पोस्टकार्ड मिल गये हैं। मैंने जो कहा था वह सब याद रखना। शरीरका खूब ध्यान रखना और सबपर प्रेम रखना। रूखी अच्छी हो रही है। पर अभी हिलती–डुलती है तो थोड़ा खून झलक आता है। डॉक्टर देख गया है। इस तरफकी कोई चिन्ता मत करना। दुर्गाको भी पत्र लिखनेको कहना और लिखवा देना। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} :गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ८६६८) से। :सौजन्य : राधाबहन चौधरी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> em5cmpadvwnlith2o5z0ddlv4hi6a9f 675271 675218 2026-08-30T14:41:10Z आदेश यादव 3609 675271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} 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1mf1dvhlftjw5qeyp27kqu1iwz4uxae पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६७ 250 187005 675277 671612 2026-08-30T14:51:15Z आदेश यादव 3609 675277 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे'''}}}} {{right|२० मार्च, १९२८}} '''महात्मा गांधीने २० मार्च को आश्रममें चार बजे कुमारी एलिस शैलेकसे भेंट की। जब वे अन्दर आई उन्होंने कहा :''' बैठे रहनेके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगी, मैं खड़ा नहीं हो सकता। '''कु॰ शैलेक : क्या मैं कुछ प्रश्न पूछ सकती हूँ?''' गांधीजी : अवश्य, कृपया पूछिए। '''आपका प्रभाव बढ़ रहा है या घट रहा है?''' यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना बड़ा कठिन है, लेकिन जहाँतक जनताका सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि प्रभाव बढ़ रहा है। '''क्या यह सच है कि आपके विचारसे अंग्रेजोंने भारतका कुछ भी भला नहीं किया है? यहाँतक कि आप रेलोंको भी हानिकारक मानते हैं?''' कुछ हद तक यह सही है। कुल मिलाकर ब्रिटिश राज्यका भारत पर केवल बुरा प्रभाव ही पड़ा है। रेलोंने भलाईके बजाय हानि अधिक पहुँचाई है। '''क्या वे अकालके मौकोंपर लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं?''' वे अस्थाई तौरपर लाभदायक हो सकती हैं। परन्तु सामान्यतः उन्होंने ग्रामीणोंसे उन चीजोंको छीननेका ही काम किया है, जिनकी उन्हें खुद अपने लिये जरूरत रहती है। '''लेकिन उसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है।''' परन्तु पैसा तो वे खा नहीं सकते। यदि आप सहाराके रेगिस्तान में हों और आपके पास अपनेको जीवित रखने भरके लिए ही पानी हो, तो क्या आप किसी भी कीमत पर उसे बेचेंगी? '''परन्तु क्या वे पैदावारका सिर्फ वही भाग नहीं बेचते जो फाजिल है?''' अपनी पैदावारको कच्चे मालके रूपमें बेचना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचना है। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उसके प्रयोगका दूसरा कोई बेहतर उपाय मालूम नहीं। यदि आप मनसे मेरी भलाई चाहती हैं तो क्या आप मुझे खाल बेचकर आपसे, बने हुए जूते खरीदने अथवा अपना कपास आपको बेचकर बुना हुआ कपड़ा खरीदनेकी सलाह देंगी? मैं अपने देशवासियोंसे अपना कपास जमा कर रखने और उसकी रूईसे सूत कातकर अपना कपड़ा खुद तैयार करनेको कहता हूँ। '''कहते हैं कि जहाँ रेले हैं वहाँ भुखमरी नहीं है। अकालके मौकेपर रेलें उन जगहोंसे जहाँ खाद्यान्न अधिक होता है, उन जगहोंपर, जहाँ उनकी आवश्यकता हो, बहुत तेजी से ले जाती हैं।'''<noinclude></noinclude> 7z9td0tpdz1d8ilr1dukp9fj720656c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६८ 250 187006 675279 671611 2026-08-30T14:52:42Z आदेश यादव 3609 675279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; जिन्होंने रेलें बिछाईं उन्होंने लोगोंका लाभ नहीं सोचा था। उन्होंने अपने दूर बैठे हुए हिस्सेदारों और मालिकोंके लाभकी ही बात सोची थी। अकालके समय रेलोंसे जो लाभ होता है वह उससे होनेवाली हानियोंकी बात सोचे तो पासंग पर चढ़ जाता है। यह तो ऐसा है जैसे कि कोई लुटेरा पहले मेरा सब कुछ लूट ले और फिर मुझे कुछ थोड़ा–सा वापस दे दे। '''रेलें न होनेपर क्या भारतकी स्थिति अधिक अच्छी होती?''' मुझे इस बात में जरा भी सन्देह नहीं है कि भारतकी दशा अधिक अच्छी होती बशर्ते कि अन्य अपेक्षित बातें पूरी हो जातीं। '''रेलें लाभदायक कैसे बनाई जा सकती हैं?''' रेलों सम्बन्धी नीति लोगोंके वास्तविक लाभको ध्यानमें रखकर बनाई जानी चाहिए अर्थात् वे लोगोंको उसी तरह स्वावलम्बी बना रहने दें जैसे कि वे रेलोंके आगमनसे पहले थे। आजकल उन्हें बुद्धि और स्वास्थ्य दोनोंमें दिवालिया बनाया जा रहा है। वे अपने कच्चे मालका अच्छेसे अच्छा इस्तेमाल करना जानते थे। वे अपनी रूईसे कपड़ा बनाते थे, खालोंसे जूते बनाते थे और अनाजसे रोटी बनाते थे। पर आजकल इसका उलटा होता है। इससे अधिक बुरी कोई बात मैं मान ही नहीं सकता कि करोड़ों लोगोंको अपना कच्चा माल, जिससे वे स्वयं उत्पादन कर सकते हैं, विदेशोंको निर्यात करना पड़े और उससे बने मालका आयात करना पड़े। रेलें लाभप्रद ढंगसे ग्रामीणों द्वारा बनाई चीजें देशके एक भागसे दूसरे भागमें पहुँचा सकती हैं। '''लोगोंको यह सब सिखानेके लिए बहुत बड़े आन्दोलनकी आवश्यकता है।''' पहले भी काफी मात्रामें अन्तर्प्रान्तीय व्यापार होता था। '''क्या विदेशी तरीका अधिक सस्ता नहीं है?''' नहीं। और यदि वह सस्ता होता तो भी ज्यादा कीमतपर भी हमारा अपना उत्पादन उससे सस्ता पड़ता। उदाहरणार्थ आश्रम में जब हमने सब्जी पैदा करनी शुरू की तो प्रारम्भमें वह बाजारसे महँगी पड़ी। पर अब वह बाजारकी सब्जीसे अच्छी और सस्ती होती है तथा हमारे आश्रमवासियोंको काम भी मिल जाता है। '''क्या मैं स्पष्ट कहूँ? बंगालमें मुझे बताया गया कि खद्दर ब्रिटिश कपड़े से अधिक मंहगा और खुरदरा होता है और जो औरतें खद्दर पहननेका प्रण करती हैं वे विदेशी कपड़ेके बने अधो वस्त्र पहननती हैं।''' खद्दर खुरदरा है; किन्तु देशभक्ति इतना त्याग तो माँगती ही है। इसमें कोई शक नहीं कि जितनी खादी हम कुछ वर्ष पहले पैदा करते थे उससे अब कहीं ज्यादा पैदा करते हैं और काफी हदतक कीमतें कम करनेमें भी सफल हो गये हैं। आपको जिन महिलाओंके बारेमें बताया गया है, उनके सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि यदि उन्होंने खादी पहननेका व्रत लिया है तो उनके लिए किसी भी विदेशी कपड़ेका इस्तेमाल करना उचित नहीं है। '''आपके उद्देश्य और आदर्श क्या है?''' मैं अहिंसा और सत्यके द्वारा अपने देशकी पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता हूँ।<noinclude></noinclude> nvf1deztbm7486hqy2pmsq51on57045 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६९ 250 187007 675280 671617 2026-08-30T14:53:40Z आदेश यादव 3609 675280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||भेंट : एलिस शैलेकसे|१३७}}</noinclude>&nbsp; '''क्या आप यह सोचते हैं कि आप अहिंसा और सत्यके द्वारा अपने देशको स्वतंत्र करा सकेंगे?''' मेरा अपना विश्वास तो यही है कि हम स्वतन्त्रता केवल अहिंसाके द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं, किसी और तरीकेसे नहीं। मैं हिंसाके बजाय अहिंसाके द्वारा इसकी प्राप्ति अधिक सम्भाव्य मानता हूँ। '''स्वतन्त्रतासे आपका क्या अभिप्राय है?''' मैं गलती करने और उसको सुधारनेकी तथा पूरी ऊँचाई तक ऊपर उठने और गिरने की स्वतन्त्रता चाहता हूँ। मैं बैसाखीके सहारे नहीं चलना चाहता। '''क्या आप यह नहीं समझते कि अंग्रेजोंने भारतका बहुत उपकार किया है?''' सभी आवश्यक मामलोंमें उन्होंने जबर्दस्त हानि पहुँचाई है। 'उन्होंने ' से मेरा मतलब है ब्रिटिश सरकारने। '''पर आप ऐसा क्यों मानते हैं?''' क्यों कि वे जनताकी आर्थिक, बौद्धिक और नैतिक उन्नतिका धीरे–धीरे ह्रास करते चले गये। '''क्या आप यह नहीं मानते कि उन्होंने भारतकी आर्थिक उन्नतिमें मदद की है?''' स्वयं सरकारी अधिकारियोंकी अपनी रिपोर्टके अनुसार भारत अब ५० साल पहले से ज्यादा गरीब है। कुछ व्यक्ति भले ही सम्पन्न हो गये हों, लेकिन सामान्यतः गरीबी बढ़ ही रही है। सम्पत्तिका कुछ स्थानान्तरण हुआ है; लेकिन सामान्य तौरपर देशकी समृद्धि नहीं हुई है। '''सरकारका कहना है कि चीजें पहले कभी इतनी नहीं खरीदी जाती थीं।''' यदि वे यह समझते हैं कि लोग पहले चीजें खरीद नहीं सकते थे जबकि अब खरीद सकते हैं, तो उनका ऐसा समझना गलत है। ऐसा समझना इस अर्थमें तो सही है कि लोग उन दिनों ज्यादा वस्तुएँ नहीं खरीदते थे, अब वे खरीदते हैं और अब खरीदनेके लिए [बाजारमें] ज्यादा वस्तुएँ हैं। '''ब्रिटिश मालका बहिष्कार करनेमें क्या तुक है? इंग्लैंड अपने मालको ही तो तरजीह नहीं देता। यहाँ संसारके सब राष्ट्रोंको प्रतियोगिताकी पूरी छूट है।''' नहीं यह गलत है। खुली प्रतियोगिता तो केवल एक दिखावा है। इंग्लैंड कितने ही प्रकारके छल–प्रपंचों द्वारा अपने मालको तरजीह जरूर देता है। दिखावटी तौर पर [हर राष्ट्रको अपना माल बेचनेकी] स्वतन्त्रता है पर सच्ची स्वतन्त्रता नहीं है। और यदि ब्रिटिश, विदेशियोंका पक्ष लेनेमें निष्पक्ष हों तो भी मेरा उनसे झगड़ा ही रहेगा। मैं चाहता हूँ कि भारतीय हितोंको तरजीह दी जाये। '''कैसे?''' सभी प्रकारके विदेशी कपड़ेका आयात बन्द करके, और उन सभी आयात की हुई वस्तुओंपर, जिनका उत्पादन यहाँ किया जा सकता है, भारी कर लगाकर।<noinclude></noinclude> 2odxanembjv104vez59q98jxx4hpxxs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७० 250 187008 675282 671625 2026-08-30T14:54:56Z आदेश यादव 3609 675282 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; '''परन्तु आपका उत्पादन व्यय बहुत अधिक होगा।''' कीमतोंका नीचा या ऊँचा होना किसी देशके उत्कर्ष या अपकर्षका परिचायक नहीं होता। कीमतके कुछ अधिक होनेपर भी किसी दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय यदि मैं अपनी सब्जी आप उगाता हूँ तो वह निश्चय ही कहीं ज्यादा अच्छा है। बादमें मैं किफायत और सुव्यवस्थाका सहारा लेकर कीमतको कम करनेका प्रयत्न करूँगा। सब्जी उगाने में कुशलता प्राप्त करने, उससे मिलनेवाले सुख, और इस बोधसे कि अपनी सब्जी हम स्वयं उगाते हैं, जो लाभ होता है, वह उस थोड़ेसे लाभसे कहीं अधिक है जो हमें अहमदाबादसे सस्ती सब्जी खरीदने पर मिल सकता है। कपड़ा उत्पादनके सम्बन्धमें भी हम यह सब थोड़े ही समय में कर सकते हैं बशर्ते कि हमें अपने ही साधनोंको इस्तेमाल करने दिया जाये। '''संसारमें कोई भी देश विदेशी प्रतियोगितासे बरी नहीं है।''' क्षमा करें। जर्मनीमें परिस्थिति दूसरी है। जर्मनीने जबर्दस्त कर लगाकर विदेशी चीनीको अपने यहाँ आनेसे रोका और फिर बड़ी सफलताके साथ चुकन्दरसे चीनी बनाई। प्रत्येक राष्ट्र अपने नव–उद्योगकी रक्षा अनुदान देकर और तटकर लगाकर करता है। '''आपके कहनेका मतलब है कि सभी विदेशी आयात बन्द कर दिया जाये और भारतमें केवल देशमें बना माल ही प्रयोगमें लाया जाये?''' हम वह सब सामान विदेशोंसे मँगा सकते हैं जिन्हें हम नहीं बना सकते जैसे कि हम आयोडीन ब्रिटेन या जर्मनीसे, मोती अरबसे, हीरे जोहानिसबर्गसे, लीवरकी घड़ियाँ इंग्लैंडसे तथा पढ़ने योग्य अच्छी पुस्तकें इंग्लैंड, अमेरिका तथा संसारके सब देशोंसे मँगा सकते। बेशक सुइयाँ और पिनें दोनों ही खतरनाक चीजें — मैं विदेशोंसे मँगाना चाहूँगा। इसके अतिरिक्त अन्य बहुत–सी वस्तुएँ मैं गिना सकता हूँ जिनको दूसरे देशोंसे मँगाना चाहिए। और हम उन चीजोंको, जिनकी उन्हें आवश्यकता है, मुनाफे पर निर्यात करें, पर हमें किसी पर कोई चीज लादनी नहीं चाहिए। उदाहरणार्थ मैं अफीमका उत्पादन भले ही करूँ, पर उसे अमेरिका और चीन पर लादनेका विचार मुझे नहीं करना चाहिए। '''लेकिन यदि आप अपनी जरूरतकी चीजें आप ही बनायेंगे तो क्या आपको श्रम–सम्बन्धी सवालोंका सामना नहीं करना पड़ेगा?''' क्यों? यदि वे उठेंगे तो स्वयं ही सुलझ भी जायेंगे। '''आप यह सब पूँजीवादके आधारपर करेंगे या साम्यवादके आधारपर?''' लोगोंकी भलाईको दृष्टिमें रखकर राष्ट्रीय आधारपर। '''पर उद्योगोंमें पूँजी कौन लगायेगा?''' हम स्वयं। हमारी पूँजी तो हमारे पुरुष और हमारी महिलाएँ हैं, और वे हमारे यहाँ करोड़ोंकी संख्या में हैं।<noinclude></noinclude> 6ub8ry0ldt2lk98zvclfk4ga4gp2l1s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७१ 250 187009 675283 671631 2026-08-30T14:57:28Z आदेश यादव 3609 675283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : फ्रेन्ज रोनोको|१३९}}</noinclude>&nbsp; '''आपके उद्योगोंकी व्यवस्था राज्य करेगा या देश?''' यदि इन उद्योगोंसे करोड़ोंकी भलाई होती हैं, किसी एक वर्गकी नहीं तो यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि इसकी व्यवस्था कैसे की जाये। और यदि यह अभिप्राय सिद्ध हो जाता है तो मुझे इस बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि कौन इसकी व्यवस्था करता है। अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२८४) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१५०. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे'''}}}} {{right|अहमदाबाद<br> २० मार्च, १९२८}} दिल्लीसे प्राप्त इस खबरके सम्बन्धमें कि महात्मा गांधीने वियनामें होनेवाली युवक परिषद में जानेका निमन्त्रण एक प्रकारसे स्वीकार कर लिया है और वे शीघ्र ही यूरोप जानेवाले हैं, भेंट किये जानेपर उन्होंने कहा कि यह बात कुछ तय होनेसे पहले ही प्रचारित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि अभी कुछ तय नहीं हुआ है और मुझे जाना चाहिए या नहीं, इस सम्बन्धमें मैं स्वयं कुछ निश्चय नहीं कर पाया हूँ। :[अंग्रेजीसे] :'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २२-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१५१. पत्र : फ्रेन्ज रोनोको<ref> "वर्ल्ड फेडेरेशन ऑफ यूथ फॉर पीस" की आस्ट्रियाकी शाखाके सचिव। १० मार्चके अपने पत्रमें उन्होंने गांधीजीसे दिशा–निर्देशनके रूपमें कुछ लिख भेजने को कहा था। (एस॰ एन॰ १४२२५)।</ref>'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २१ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके पत्रके लिए धन्यवाद। मैं युवकोंसे मात्र इतना ही कह सकता हूँ कि वे अपने यौवनकी अदम्य शक्तिका उपयोग सेवाके पवित्र काममें करें। और उसे भाषणों और लेखों तथा ऐसी ही चीजोंमें नष्ट न करें, जिनका कि आजकल अत्यधिक फैशन है। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६५) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> khk8di7ub2wzgfk8gzjfe69jdxwkii1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७२ 250 187010 675287 671639 2026-08-30T15:02:46Z आदेश यादव 3609 675287 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१५२. पत्र : टी॰ डि मंजीयरलीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २१ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} इतने दिनों बाद आपका पत्र पाकर प्रसन्नता हुई। आपने जिन दो पुस्तकोंका उल्लेख किया है, वे दोनों 'हैंड स्पिनिंग ऐसे', और 'द गाइड टु हेल्थ' तथा एक तीसरी पुस्तक 'तकली टीचर' अपनी ओरसे भेज रहा हूँ। अपने पत्रके दूसरे अनुच्छेदमें आपने जो कुछ कहा है<ref>टी॰ डि मंजीयरलीने अपने २७ दिसम्बर, १९२७ के पत्रमें लिखा था, "...आप जानते ही हैं कि मैं किस कदर यह चाहता हूँ कि मनुष्य और अधिक सादा रहनेकी आवश्यकताको समझे ताकि उसके पास अधिक सच्चे कामोंमें लगानेके लिए और अधिक समय और शक्ति रहे।</ref> उसके सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि जीवनमें सादगीका परम भक्त होनेके साथ–साथ मैंने यह भी जान लिया है कि सादगीकी यह ध्वनि जबतक हृदयसे नहीं निकलती, तबतक वह बेकार है। तथाकथित सभ्य जीवनके इस आधुनिक व्यवस्थित बनावटीपनकी हृदयकी सच्ची सादगीसे कोई संगति नहीं बैठ सकती। जहाँ इन दोनोंमें सामंजस्य नहीं होता वहाँ हमेशा या तो घोर आत्मवंचना होती है या पाखण्ड। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीमती टी॰ डि मंजीयरली<br> २१, रुई डु चेमिन वर्ट<br> कोबैवोई<br> सेन}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६७) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१५३. पत्र : जोजेफ ए॰ ब्रॉनको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २१ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} श्रीमती शरमनके मार्फत ७० रु॰ का जो चैक आपने मुझे भेजा है, वह आपकी और आपके क्लबके सदस्योंकी विचारशीलताका द्योतक है। सहृदयताकी जिस<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> t203i0q2gzrnujn3z0k0r0ljv9xymzq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७३ 250 187012 675289 671646 2026-08-30T15:05:27Z आदेश यादव 3609 675289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४१}}</noinclude>भावनासे प्रेरित होकर आपने यह भेंट भेजी है उसकी दृष्टिसे मैं इसकी बहुत कद्र करता हूँ। मैं इसका उपयोग एक ऐसे व्यक्तिकी आवश्यकताओंकी पूर्ति करनेमें कर रहा हूँ जिसने अपने आपको चरखेके प्रचारके लिए समर्पित कर दिया था। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीमती जोजेफ ए॰ ब्रॉन<br> आर॰—एफ॰—डी॰ ३<br> बर्मिंघम<br> मिशिगन, सं॰ रा॰ अ॰}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६८) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१५४. पत्र : पूँजाभाईको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २१ मार्च, १९२८}} {{left|चि॰ पूॅंजाभाई,}} तुम्हारा पोस्टकार्ड मिला। शनिवारकी शामको जरूर आ जाओ। यदि शामको समय न दे सका तो रविवारको दूंगा और तुम जिस समय चाहोगे उसी समय रवाना हो जाने दूंगा। तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक हो गया होगा। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ४००९) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१५५. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता'''}} संयुक्त प्रान्त<ref>आजका उत्तरप्रदेश।</ref> में अकबरपुर एक छोटी–सी जगह है, जहाँ आचार्य कृपलानीके खादी–कार्यकर्त्ताओंके दलने सात साल तक काम किया है। कुछ कारणोंसे जिनका यहाँ जिक्र करनेकी कोई जरूरत नहीं है, इस दलको वहाँसे हट जाना पड़ा है। उसके हट जानेपर वहाँ जो करुण दृश्य देखनेमें आये और आखिर किसी–न–किसी तरह इस केन्द्रको क्यों जारी रखना पड़ा, इस सबका वर्णन पं॰ जवाहरलाल नेहरुने अ॰ भा॰ चरखा संघके नाम अपने निम्नलिखित रोचक पत्र में यों किया है :— '''मैं आपको पहले ही लिख चुका हूँ कि गांधी आश्रम अकबरपुरसे हट गया है। हमने अस्थायी रूपसे उसका भार ले लिया है, क्योंकि हमें ऐसा लगा'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> mofe4fpqskf941zd8lwmn08qsrimfkw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७४ 250 187013 675291 672282 2026-08-30T15:08:10Z आदेश यादव 3609 675291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>:'''कि आपका फैसला आने तक हमें काम चलाना ही चाहिए। अगर हम लोगोंने यह भार नहीं उठाया होता तो यहाँका काम बन्द हो जाता और फिरसे काम शुरू करना ज्यादा मुश्किल होता। इसके अलावा कुछ भावनात्मक कारणों से भी उसे छोड़ देना मुश्किल था। कई सालोंसे यह केन्द्र प्रसिद्ध है और बहुत–से कतैयों और बुनकरोंका इससे गहरा सम्बन्ध है। इसे अचानक छोड़ देनेसे आसपासके सभी स्थानोंमें बहुत बुरा असर पड़ता और इसपर निर्भर बहुत–से गरीब आर्थिक कष्टमें पड़ जाते। हमें यह बताया गया था कि गांधी आश्रमके अपना काम बन्द करनेकी घोषणा करनेपर बहुत ही हृदय–द्रावक दृश्य देखनेमें आये थे। बहुतसी बूढ़ी औरतें जो अपना सुत दूर–दूर के केन्द्रोंमें बेचा करती थीं, उन्हें बन्द पाकर कई मील चलकर इस मुख्य केन्द्रमें आई और यह सुनकर कि उनका सूत नहीं लिया जायेगा, रोने लगीं। बहुत–से बुनकर अपने बाल–बच्चोंके साथ अकबरपुर कार्यालय दौड़े आये और कहने लगे, "वाह, सात साल तक हमने आश्रमके लिए काम किया, और अब आप हमें पेड़पर चढ़ाकर सीढ़ी लिये भागे जा रहे हैं। नहीं, यह नहीं हो सकता। हम सत्याग्रह करेंगे।" अब आप समझ सकते हैं कि ऐसी परिस्थितिमें वहाँका काम अपने सिर ले लेने से इनकार करना हमारे लिए कितना मुश्किल था। मगर, आखिर केवल भावनाके वश होकर ही तो कुछ निर्णय किया नहीं जा सकता था। अकबरपुरमें कुछ खास सुविधाएँ हैं और साथ ही एक बहुत बड़ी असुविधा भी है। बुनाईके लिए यह केन्द्र विख्यात है और इसके पास हो, टाँडामें हिन्दुस्तानकी अच्छीसे–अच्छी बुनाई होती है। दुर्भाग्यवश यह महीन बुनाई जिसे जामदानी कहा जाता है विलायती सूतसे की जाती है। दूसरी ओर अकबरपुर के आसपास बहुत कम सूत काता जाता है और अगर इस केन्द्रको चलाना है तो कहीं न कहीं बाहरसे ही सूत मँगाना पड़ेगा। मेरा खयाल है कि गांधी आश्रमवाले, मुख्यतः अपने प्रदेशकी सीमाके उस ओर से, बिहारसे और मुजफ्फरनगरसे भी सूत मँगाते थे। हमारे लिए संयुक्त प्रान्तके उत्तरी जिलोंसे, जैसे कि मुरादाबाद, बिजनौर वगैरहसे सूत मँगाना सहज होगा। सूत भेजनेका खर्च कुछ अधिक नहीं है।''' अगर खादी भी घी या अनाज जैसी प्रचलित हो जाये तो किसी केन्द्रसे हटने का विचार करने की भी कभी जरूरत न पड़े। अगर हमारे पास धन और कार्यकर्त्ता हों तो हमारे प्रतिनिधि सिर्फ १,६०० नहीं, बल्कि ७ लाख गाँवोंमें होंगे। यह कोई अव्यावहारिक महत्वाकांक्षा नहीं है। आखिर, हरएक गाँवमें विदेशी सरकारके कमसे–कम दो प्रतिनिधि तो हैं ही। अगर अंग्रेजोंके आनेके पहले कोई ऐसी बात कहता तो उसकी बात हँसीमें ही उड़ा दी जाती। मगर विचार करने पर मालूम हो जाना चाहिए कि १७वीं शताब्दी में हिन्दुस्तानके पंचायती गाँवोंमें साम्राज्यवादी ब्रिटेनके दो–दो प्रतिनिधियोंके होनेकी सम्भावना जितनी हास्यास्पद होती हर गाँवमें चरखेकी<noinclude></noinclude> t6i8k526nojxbutsjc8hjgunb918608 675292 675291 2026-08-30T15:09:25Z आदेश यादव 3609 675292 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> :'''कि आपका फैसला आने तक हमें काम चलाना ही चाहिए। अगर हम लोगोंने यह भार नहीं उठाया होता तो यहाँका काम बन्द हो जाता और फिरसे काम शुरू करना ज्यादा मुश्किल होता। इसके अलावा कुछ भावनात्मक कारणों से भी उसे छोड़ देना मुश्किल था। कई सालोंसे यह केन्द्र प्रसिद्ध है और बहुत–से कतैयों और बुनकरोंका इससे गहरा सम्बन्ध है। इसे अचानक छोड़ देनेसे आसपासके सभी स्थानोंमें बहुत बुरा असर पड़ता और इसपर निर्भर बहुत–से गरीब आर्थिक कष्टमें पड़ जाते। हमें यह बताया गया था कि गांधी आश्रमके अपना काम बन्द करनेकी घोषणा करनेपर बहुत ही हृदय–द्रावक दृश्य देखनेमें आये थे। बहुतसी बूढ़ी औरतें जो अपना सुत दूर–दूर के केन्द्रोंमें बेचा करती थीं, उन्हें बन्द पाकर कई मील चलकर इस मुख्य केन्द्रमें आई और यह सुनकर कि उनका सूत नहीं लिया जायेगा, रोने लगीं। बहुत–से बुनकर अपने बाल–बच्चोंके साथ अकबरपुर कार्यालय दौड़े आये और कहने लगे, "वाह, सात साल तक हमने आश्रमके लिए काम किया, और अब आप हमें पेड़पर चढ़ाकर सीढ़ी लिये भागे जा रहे हैं। नहीं, यह नहीं हो सकता। हम सत्याग्रह करेंगे।" अब आप समझ सकते हैं कि ऐसी परिस्थितिमें वहाँका काम अपने सिर ले लेने से इनकार करना हमारे लिए कितना मुश्किल था। मगर, आखिर केवल भावनाके वश होकर ही तो कुछ निर्णय किया नहीं जा सकता था। अकबरपुरमें कुछ खास सुविधाएँ हैं और साथ ही एक बहुत बड़ी असुविधा भी है। बुनाईके लिए यह केन्द्र विख्यात है और इसके पास हो, टाँडामें हिन्दुस्तानकी अच्छीसे–अच्छी बुनाई होती है। दुर्भाग्यवश यह महीन बुनाई जिसे जामदानी कहा जाता है विलायती सूतसे की जाती है। दूसरी ओर अकबरपुर के आसपास बहुत कम सूत काता जाता है और अगर इस केन्द्रको चलाना है तो कहीं न कहीं बाहरसे ही सूत मँगाना पड़ेगा। मेरा खयाल है कि गांधी आश्रमवाले, मुख्यतः अपने प्रदेशकी सीमाके उस ओर से, बिहारसे और मुजफ्फरनगरसे भी सूत मँगाते थे। हमारे लिए संयुक्त प्रान्तके उत्तरी जिलोंसे, जैसे कि मुरादाबाद, बिजनौर वगैरहसे सूत मँगाना सहज होगा। सूत भेजनेका खर्च कुछ अधिक नहीं है।''' अगर खादी भी घी या अनाज जैसी प्रचलित हो जाये तो किसी केन्द्रसे हटने का विचार करने की भी कभी जरूरत न पड़े। अगर हमारे पास धन और कार्यकर्त्ता हों तो हमारे प्रतिनिधि सिर्फ १,६०० नहीं, बल्कि ७ लाख गाँवोंमें होंगे। यह कोई अव्यावहारिक महत्वाकांक्षा नहीं है। आखिर, हरएक गाँवमें विदेशी सरकारके कमसे–कम दो प्रतिनिधि तो हैं ही। अगर अंग्रेजोंके आनेके पहले कोई ऐसी बात कहता तो उसकी बात हँसीमें ही उड़ा दी जाती। मगर विचार करने पर मालूम हो जाना चाहिए कि १७वीं शताब्दी में हिन्दुस्तानके पंचायती गाँवोंमें साम्राज्यवादी ब्रिटेनके दो–दो प्रतिनिधियोंके होनेकी सम्भावना जितनी हास्यास्पद होती हर गाँवमें चरखेकी<noinclude></noinclude> ts3g4qrem9cfytybimd2op830xcknic पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७५ 250 187014 675296 672289 2026-08-30T15:15:04Z आदेश यादव 3609 675296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude> पुनः प्रतिष्ठाका खयाल उससे आधा भी हास्यास्पद नहीं है। अकबरपुरकी स्त्रियोंकी कही जो बात बताई जाती है, वह जाहिर करती है कि चरखा इस प्राचीन देशके हर गाँव में कितनी बड़ी जरूरत पूरी करता है, या कर सकता है। हमारी देशभक्तिके लिए यह कोई गौरवका विषय नहीं है कि अकबरपुरके चतुर बुनकरोंको दूर–दूर तक प्रख्यात जामदानीके लिए विलायती सूतका आश्रय लेना पड़े, जबकि सिर्फ पचास साल पहले वे अपनी ही पड़ोसिन बहनोंके पवित्र हाथोंके कते सूतसे उसे बनाते थे। हमें आशा है कि कुछ ही दिनोंमें हमारी कत्तिनें, आज बाजारमें भरे हुए किसी भी किस्मके विदेशी सूतसे कहीं ज्यादा महीन और मजबूत सूत कातने लगेंगी। {{c|'''क्या यह सच हो सकता है?'''}} नई दिल्ली आर्य–समाजके सभापति लिखते हैं :— '''शिमलाकी पहाड़ियोंमें बाघात रियासत है। इसके राजा जागरूक हिन्दू हैं। ... राज्यकी आबादी कोई दस हजारकी है। यहाँ मुख्यतः राजपूत, कानेत और ब्राह्मण ही बसते हैं। दूसरी जातियाँ कोली, चमार वगैरह हैं। जिन्हें नीच समझा जाता है। यद्यपि कोलियोंकी गुजर मुख्यतः खेती से होती है, मगर उन्हें बहुत–सी सामाजिक कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। ... उन्हें अपने हिन्दू भाइयोंके अमानुषिक व्यवहारसे पीड़ित देखकर शिमला आर्य समाजने, इनकी स्थिति ऊँची करने के लिए इन्हें अपनाया, और चूंकि ये वैश्यका धन्धा करते हैं उन्हें जनेउ पहनाया। ... औपचारिक शुद्धीरकणके बाद से इन्होंने मांसाहार, शराबखोरी जैसी बुरी आदतें छोड़ दी हैं और अछूत कहनेपर बहुत बुरा मानते हैं। जान पड़ता है कि इससे ऊँची जातिके हिन्दुओंका पारा चढ़ गया और उन्होंने यज्ञोपवीत लेनके इनके अधिकारका विरोध किया। फलतः गत ६ जनवरी, १९२८ को इसपर स्वयं महाराजा साहबने उनके मामलेकी सरसरी तौरपर सुनवाई की और पुराने रीति–रिवाजोंके बहाने बेचारे १० कोलियोंको ६ महीने की कैद और ऊपरसे दो–दो सौ रुपये जुर्माने की सजा दे दी गई। न तो इन अभागोंको अपना बचाव करनेका मौका दिया गया और न वहाँपर उपस्थित आर्य समाजके पण्डितको ही इस मामलेमें आर्यसमाजका दृष्टिकोण समझाने का अवसर दिया गया। अब खबर है कि यज्ञोपवीत उतारनेके लिए जेलमें उनपर जुल्म किया जा रहा है।<ref>केवल कुछ उद्धरण ही यहाँ दिये गये हैं।'''</ref> ऊपरके पत्रमें लिखी बातें मुझे तो अविश्वसनीय–सी जान पड़ती हैं। कोलियोंको किसी तरह अछूत या दलित या पिछड़ी हुई जातिका नहीं गिना जा सकता। अगर वे अपने खेत आप जोतते हैं, तो वर्णकी परिभाषाके अनुसार उनका जन्म वैश्य वर्ण में<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> hncczhi5bbu5vlk4wqhbfs5jpxkc335 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७६ 250 187015 675297 672664 2026-08-30T15:19:39Z आदेश यादव 3609 675297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गिना जायेगा और उन्हें यज्ञोपवीत पहननेके सभी अधिकार प्राप्त हैं। मगर मान भी लें कि उन्हें यज्ञोपवीत पहननेका धार्मिक अधिकार प्राप्त नहीं है, तो भी मैं यह सुनने को कभी तैयार नहीं था कि किसी रियासत में कानूनकी दृष्टिसे जनेऊ पहनना दण्डनीय अपराध माना जायेगा। और उतनी ही अकल्पनीय बात यह है कि जिन अभागे आदमियोंने सोचा था कि हमारा कोई ऐसा धार्मिक संस्कार हो रहा है, जो वांछनीय होगा या उनके लिए पुण्यप्रद होगा, उन्हें अपना बचाव करने, अपने गवाह तक पेश करनेका अधिकार नहीं दिया गया। अगर सजा और न्यायके इस ढकोसलेके बारेमें जो कुछ कहा गया है वह सच हो, तो मुझे यह जानकर कोई ताज्जुब नहीं होगा कि उनके शरीर परसे जनेऊ जबरन उतार लिये गये हैं। मैं आर्य समाज के सभापतिको आमन्त्रण देता हूँ कि वे बाघात रियासतके विरुद्ध अपने लगाये इल्जामोंके समर्थनमें और भी व्यौरेसे लिखें और अगर रियासत के अधिकारी चाहें तो उन्हें भी आमन्त्रण देता हूँ कि वे इस मामलेका अपना बयान भी भेजें जिसे मैं खुशी से छापूँगा। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१५६. विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न'''}}}} एक मित्र, जिनका मिलोंसे गहरा सम्बन्ध है और जो विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन में हमारी मिलोंको पूरा हिस्सा लेते देखना चाहते हैं, पूछते हैं :— :{{gap}}'''१. आप किस आधार पर मालकी एक जैसी कीमत रखना चाहते हैं? क्योंकि याद रखिये कि सभी मिलें एक सरीखी नहीं हैं; कुछ अच्छी हैं और कुछ बुरी, कुछ अन्य मिलोंकी अपेक्षा माँड़ आदि लगाकर अपने कपड़ेको ज्यादा सँवारती हैं; कुछका संचित कोष बड़ा है, कुछका कम; बम्बईकी मिलोंको और जगहोंकी मिलोंसे कम नफा होता है। ऐसे और भी बहुतसे अन्तर दिखलाये जा सकते हैं। ये तो केवल नमूने भर हैं।''' इसका एक सामान्य जवाब यह दिया जा सकता है कि 'जहाँ चाह है वहाँ राह भी है।' मिलें अपने हिस्सेका काम तभी पूरा कर सकेंगी, जब वे निष्कर्मण्यता छोड़ देंगी, खूब ध्यानसे सोचेंगी, और वह भी राष्ट्रके हानि–लाभकी दृष्टिसे, महज हिस्सेदारों, डाइरेक्टरों या एजेन्टोंकी ही जेबें भरनेकी दृष्टिसे नहीं। मगर इस बारे में अपना मत स्पष्ट करनेके लिए मैं कह सकता हूँ कि उन सभी मिलोंको, जो बहिष्कार आन्दोलन में शामिल हों, सारा फर्क मिटाकर, एक समान कीमत निर्धारित करनी होगी, जिसका परिणाम यह होगा कि उनके मौजूदा नफेका एक बहुत बड़ा हिस्सा जाता रहेगा — कमसे–कम कुछ मिलोंका तो जरूर ही। अगर उनकी देशभक्ति सच्ची और प्रगतिशील हो तो मुनाफेमें चलनेवाली मिलें, नुकसान उठानेवाली मिलोंको सँभाल<noinclude></noinclude> k8bmsb2yy2zdkv19cv2zhb1mdgadrw3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७७ 250 187016 675299 672666 2026-08-30T15:23:46Z आदेश यादव 3609 675299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न|१४५}}</noinclude>लेंगी और जो फर्क मिटाने योग्य होंगे, उन्हें मिटा दिया जायेगा। मेरी दृष्टिमें जो योजना है, उसके अनुसार तो अन्तमें मिलोंको कुल मिलाकर हानि होनी ही नहीं चाहिए और न ही ग्राहकोंके मत्थे उन्हें नफा उठाना चाहिए। :{{gap}}'''२. खादी न बनाने का निश्चय तो इनी–गिनी ही मिलें करेंगी मगर उनका क्या होगा जो केवल मोटा सूत ही कातती हैं? खादीकी जाँचकी आपकी कसौटी क्या है?''' यह तो खादी संस्थाओं और मिलोंके बीच सामान्य ईमानदारी और व्यवस्थाका सवाल है। हालमें तो, मुझे कहते खेद होता है कि गाँवों में खादीके प्रति बढ़ रहे अनुकूल वातावरणका नाजायज लाभ उठाने के लिए कुछ अच्छी मिलें भी अपने कपड़ों पर खादीकी छाप मारनेमें शर्माती नहीं हैं। अगर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बन सकी तो मुझे आशा है कि कमसे–कम फिलहाल तो यह स्पष्ट निश्चित हो जायेगा कि कौनसे कपड़े मिलें बनाएंगी और कौनसे खादीवाले केन्द्र। अकसर लड़ाईके जमाने में कपड़े के उत्पादन पर जैसा अंकुश रहता है, वैसा ही इस समय रखा जायेगा। हिंसाके आधारपर होनेवाली लड़ाईमें जो कुछ जबरन कराया जाता है, वह अहिंसा पर आधारित इस लड़ाईमें हम स्वेच्छासे करेंगे। हममें अगर कुछ अहिंसा हो तो, स्वेच्छापूर्वक यानी महज लोकमतके दबावसे बहिष्कार इत्यादि कर सकनेकी हमारी योग्यता, उसकी बाहरी किन्तु लाजिमी कसौटी होगी। :{{gap}}'''३. नफेपर किस तरह अंकुश रखा जायेगा? आप भी तो हमारी तरह बखूबी जानते हैं कि रुईकी कीमतोंमें बहुत ही खिझा डालनेवाले अनियमित ढंगसे घटी–बढ़ी होती रहती है।''' इसमें यह मान लिया गया हैं कि हम रुईके बाजारका नियन्त्रण नहीं कर सकेंगे। निश्चय ही, अगर देशके बड़ेसे–बड़े मिल–मालिक इस राष्ट्रीय कार्यमें एक हो जायें तो वे रुईके बाजारका नियन्त्रण कर सकेंगे। अमेरिका हमारी रुईके बाजार पर हावी है, क्योंकि हम मूर्खतासे बिना विचारे और स्वार्थान्ध होकर अपनी रुई बाहर भेज देते हैं। किन्तु बहिष्कारका तो अर्थ ही यह है कि जैसे हम और बहुतसी चीजोंका नियन्त्रण करेंगे, वैसे ही रुईके आवागमनका भी। तभी तो बहिष्कारको पूरा सफल बना सकेंगे। और अगर हमने सच्ची राष्ट्रीय भावना पैदा कर ली है। और हमें अपने आपमें और राष्ट्रमें विश्वास है, तो वह नियन्त्रण हमें करना ही होगा। :{{gap}}'''४. अगर आप ईमानदारी, सतत प्रयत्न, पारस्परिक विश्वास आदिपर बहुत जोर देंगे तो आपकी असफलता निश्चित है।''' चूँकि मेरे पास तलवार नहीं है और मिल भी सके तो मैं उसे नहीं लूँगा, इसलिए, मुझे इन्हीं गुणों पर जोर देना पड़ेगा, जिनकी कीमत के बारेमें इस मित्रको शंका है। मगर मुझे ऐसी कोई शंका नहीं है। वल्कि मुझे तो इतना काफी धैर्य है कि अगर वे गुण आज यथेष्ट मात्रा में मिलते हों तो उनके विकसित होने तक मैं<noinclude>{{left|३६-१०}}</noinclude> rkwyktr8iljiqs5tg5agnadqjhag6uq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७८ 250 187017 675301 672676 2026-08-30T15:26:25Z आदेश यादव 3609 675301 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठहरने को भी तैयार हूँ। क्योंकि यह राष्ट्र तबतक स्वतन्त्र नहीं होगा, जबतक कि हमारे सारे राष्ट्रमें ये गुण नहीं आ जाते। मैं यह भी जानता हूँ कि पशुबल, धोखेबाजी इत्यादि सीखने में सत्य, अहिंसा और उनमें समाविष्ट अन्य सारे गुणोंका अभ्यास करनेकी अपेक्षा कहीं अधिक समय लगेगा। इसके बाद ये मित्र इस बातपर मेरा ध्यान दिलाते हैं कि मेरे पिछले लेखमें<ref>देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती हैं?", १५-३-१९२८।</ref> निम्नलिखित बातें छूट गई हैं : (क) जो मिलें इस योजनामें शामिल हों उन्हें विदेशी सूत या विलायती नकली रेशमका प्रयोग त्यागना होगा जैसा कि आज बहुत–सी मिलें कर रही हैं। (ख) वे विदेशी कम्पनियोंके यहाँ बीमा न करायेंगी। (ग) वे विदेशी कपड़ा मँगाकर उसपर स्वदेशीका छापा नहीं लगायेंगी। मैंने तो मान लिया था कि (क) और (ग) पहलेसे ही निश्चित हैं। अगर (ख) पर जोर देनेसे प्रस्तावित संयुक्त योजनाको पूरा करनेमें कठिनाई हो तो मैं उसपर जोर नहीं दूंगा। मैं चाहूँगा तो कि बीमेका काम करनेके लिए स्वदेशी बीमा कम्पनियाँ हों किन्तु मुझे विश्वास है कि जिस तरह विलायती कपड़ा हमारा रास्ता रोके हुए हैं, उस तरह और कोई चीज नहीं रोकती। अगर यह बहुत बड़ी बाधा दूर हो गई तो छोटी–मोटी बाधाएँ हम चुटकी बजाते दूर कर लेंगे। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', २२-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१५७. मतभेद'''}}}} मैं उपर्युक्त पत्र<ref>कैम्ब्रिज मिशनके श्री डब्ल्यू॰ एफ॰ आयरलैंडका पत्र यहाँ नहीं दिया गया है।</ref> सहर्ष प्रकाशित कर रहा हूँ। अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुत्व संघ (इन्टरनेशनल फेलोशिप) की बैठकोंमें मैने स्पष्ट कर दिया<ref>देखिए "बंधुत्व विषयक चर्चा", १५-१-१९२८ से पूर्व।</ref> था कि मेरा आशय जगतके मुख्य धर्मोसे था। और मैंने कहा था कि इन सभी मुख्य धर्मोमें कम या ज्यादा सच्चाई है, किन्तु अपूर्ण तो सभी हैं ही। इसलिए इस बात में मेरी श्री आयरलैंडसे सहमति है। किन्तु श्री आयरलैंडके पत्रसे मनपर यह असर पड़ता है कि धर्म–परिवर्तनके बारेमें, भले ही उसे किसी नामसे पुकारा जाये उनके और मेरे विचारोंमें तात्विक भेद है। उपमानें त्रुटि तो होती ही है, किन्तु मैं सुगंधकी उपमाको थोड़ा समझाकर बताता हूँ। गुलाब अपनी सुगन्ध अनेक तरहसे नहीं, किन्तु एक ही तरहसे फैलाता है। जिन लोगों में घ्राण–शक्ति ही न हो, उन्हें यह सुगन्ध मिलनेसे रही। इस सुगन्धको आप जीभ, कान या त्वचासे तो नहीं महसूस कर सकते। इसी तरह आध्यात्मिकताकी अनुभूति भी आप आध्यात्मिक अनुभवकी शक्ति द्वारा ही कर सकते<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> mzukvmkwzy3ixoajb7roxire4ogo1fa पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८० 250 187019 675305 672684 2026-08-30T15:40:56Z आदेश यादव 3609 675305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp {{c|{{larger|'''१५८. फीजी फीजीवालोंके लिए<ref>सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजका इस शीर्षकका लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है</ref>'''}}}} यद्यपि दीनबन्धुने जो कुछ कहा है वह सत्य और मात्र सत्य है; किन्तु मुझे आशंका है कि यदि अंग्रेज साम्राज्यवादी शासक भारतीय प्रवासियोंको संसारके किसी भी भाग में आनेके लिए पर्याप्त प्रलोभन दें, तो भारतीय प्रवासी उसमें फँस जायेंगे और यह मान बैठेंगे कि वे 'समान भागीदार' हैं। उनकी समझमें यह नहीं आयेगा कि उनकी स्थिति मात्र 'श्रृगाल'की है। किन्तु हम तो यही आशा करते हैं कि साम्राज्यवादी इतना प्रलोभन कभी न देंगे और भारतीय प्रवासी अपनी सहज बुद्धि द्वारा साम्राज्यवादियोंकी इस मायाके झीने आवरणके उस पार जो वास्तविकता है उसे साफ देख लेंगे। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१५९. पत्र : पी॰ के॰ मैथ्यूको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २२ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} मुझे खेद है कि मैं अबतक आपके पत्रका जवाब नहीं दे पाया। मैं चाहूँगा कि स्कूलोंके लिए चरखे उपयोगी नहीं हैं, इस चीजको समझने के लिए आप 'यंग इंडिया' के पिछले अंक पढ़ें। स्कूलोंमें तकलियोंका प्रचलन शुरू किया जाना चाहिए। अनुभवसे यह जाहिर हो गया है कि चरखेकी अपेक्षा तकलियाँ कुछ कारणोंसे, जो 'यंग इंडिया'<ref>देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ २७।</ref> में बताय गये हैं, हर दृष्टिसे ज्यादा अच्छा काम करती हैं उनके लिए आपको किन्हीं खास इमारतोंकी या कहने लायक जैसे खर्चकी जरूरत नहीं होती। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री पी॰ के॰ मैथ्यू, बी॰ ए॰, बी॰ एल॰<br> क्रिस्टावा महिलायम्<br> अलवाई (त्रावणकोर)}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२४) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 73mm9rvigz238m8598raa0r7fiezltr 675306 675305 2026-08-30T15:41:32Z आदेश यादव 3609 675306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१५८. फीजी फीजीवालोंके लिए<ref>सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजका इस शीर्षकका लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है</ref>'''}}}} यद्यपि दीनबन्धुने जो कुछ कहा है वह सत्य और मात्र सत्य है; किन्तु मुझे आशंका है कि यदि अंग्रेज साम्राज्यवादी शासक भारतीय प्रवासियोंको संसारके किसी भी भाग में आनेके लिए पर्याप्त प्रलोभन दें, तो भारतीय प्रवासी उसमें फँस जायेंगे और यह मान बैठेंगे कि वे 'समान भागीदार' हैं। उनकी समझमें यह नहीं आयेगा कि उनकी स्थिति मात्र 'श्रृगाल'की है। किन्तु हम तो यही आशा करते हैं कि साम्राज्यवादी इतना प्रलोभन कभी न देंगे और भारतीय प्रवासी अपनी सहज बुद्धि द्वारा साम्राज्यवादियोंकी इस मायाके झीने आवरणके उस पार जो वास्तविकता है उसे साफ देख लेंगे। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१५९. पत्र : पी॰ के॰ मैथ्यूको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २२ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} मुझे खेद है कि मैं अबतक आपके पत्रका जवाब नहीं दे पाया। मैं चाहूँगा कि स्कूलोंके लिए चरखे उपयोगी नहीं हैं, इस चीजको समझने के लिए आप 'यंग इंडिया' के पिछले अंक पढ़ें। स्कूलोंमें तकलियोंका प्रचलन शुरू किया जाना चाहिए। अनुभवसे यह जाहिर हो गया है कि चरखेकी अपेक्षा तकलियाँ कुछ कारणोंसे, जो 'यंग इंडिया'<ref>देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ २७।</ref> में बताय गये हैं, हर दृष्टिसे ज्यादा अच्छा काम करती हैं उनके लिए आपको किन्हीं खास इमारतोंकी या कहने लायक जैसे खर्चकी जरूरत नहीं होती। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री पी॰ के॰ मैथ्यू, बी॰ ए॰, बी॰ एल॰<br> क्रिस्टावा महिलायम्<br> अलवाई (त्रावणकोर)}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२४) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 7muypci705foin4p7ypfpph2a5ghps8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८३ 250 187022 675308 672864 2026-08-30T15:47:24Z आदेश यादव 3609 675308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको|१५१}}</noinclude>&nbsp; गणेशनके यहाँ तुम्हारी किताबकी छपाईका काम कैसा चल रहा है? उसके कब तक तैयार हो जानेकी उम्मीद है? तुम सबको सस्नेह, {{right|हृदयसे तुम्हारा,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२८) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१६२. पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २६ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। सादगी तो हृदयकी चीज है। लेकिन इसकी आड़ में हम स्वयं अपनेको धोखा न देने लगें अतः आदर्श यह है कि कोई भी ऐसी चीज जिसे संसारका गरीब से गरीब व्यक्ति न रखता हो, हम अपने पास न रखें। आप अपनी पत्नीको उसकी इच्छाके विरुद्ध गहने त्याग देनेके लिए मजबूर नहीं कर सकते। लेकिन आपको अपने वासनाविहीन निस्स्वार्थ प्रेमके द्वारा और अपने दिन–ब–दिन बढ़ते आत्मनिग्रहके द्वारा उसे राजी कर लेनेकी कोशिश करनी चाहिए। अपने पिताका त्याग किये बिना और हमेशा उनकी सेवा करनेके लिए तैयार रहते हुए भी आप उनसे अलग रह सकते हैं और एक अछूत बच्चेको उस तरह पाल सकते हैं जिस तरह आपने सुझाव रखा है। मुझे खेद है कि मैं आपकी बहनको नहीं ले सकूंगा क्योंकि वह हिन्दुस्तानी नहीं जानती होगी। आप उसे वहाँ वह सब प्रशिक्षण दें, जिसकी उसे जरूरत है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|'''श्रीयुत के॰ एस॰ आचार्य'''<br> '''सहायक अध्यापक'''<br> '''गवर्नमेंट हाईस्कूल'''<br> '''देवनगिरी'''}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२७) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> p7s42l6m7n9a1qj6r3gjwbyzxb3l3c3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८४ 250 187023 675312 672874 2026-08-30T15:50:09Z आदेश यादव 3609 675312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१६३. पत्र : एन॰ राम रावको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २६ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय महोदय,}} बडनावल कताई केन्द्र पर श्रीयुत पुजारीकी रिपोर्टके साथ प्रेषित आपके पत्रके लिए धन्यवाद। उसकी चर्चा 'यंग इंडिया' के पृष्ठोंमें की गई।<ref>८ मार्च, १९२८ के अंकमें प्रकाशित च॰ राजगोपालाचारीके लेख 'एक राजकीय खादी केन्द्र' में इसकी चर्चा थी।</ref> {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री एन॰ राम राव<br> सचिव,<br> विकास विभाग<br> सचिवालय, बंगलोर}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३०) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{larger|'''१६४. पत्र : एच॰ एम॰ पेरीराको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २६ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय पेरीरा,}} पता वही है जैसा ऊपर छपा है। कोई दूसरा सांकेतिक पता नहीं है। गांधी, साबरमती लिखनेसे भी पत्र मुझे मिल जायेगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री एच॰ एम॰ पेरीरा<br> २२५, ओक स्ट्रीट<br> बेलौर, एल॰ आई॰।}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२७१) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 9gh5k4lxx07nklvdehllr8m2wmk79b9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८५ 250 187024 675316 672880 2026-08-30T15:53:41Z आदेश यादव 3609 675316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१६५. पत्र : पी॰ एस॰ किचलूको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २६ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका हार्दिक निमन्त्रण मिला। लेकिन और नहीं तो केवल स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणोंसे ही मुझे परिषद् में शरीक नहीं होना चाहिए। यदि आपकी यह भविष्यवाणी सच हो जाये और पंजाबके हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिखोंमें दिली एकता स्थापित हो जाये, तो मेरे मनको खुशी होगी। मैं जानता हूँ कि तब हिन्दू–मुस्लिम एकता हो जानेका भरोसा हो जायेगा और उस एकताकी शक्तिमें मेरा इतना विश्वास है कि मैं कहूँगा कि फिर स्वराज्य मिलना भी पक्का हो जायेगा। खैर, मैं आशा करता हूँ कि परिषद खादीको नहीं भूलेगी और न ही उसकी उपेक्षा करेगी। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|डा॰ पी॰ एस॰ किचलू<br> अध्यक्ष<br> स्वागत समिति<br> १३वीं पंजाब प्रान्तीय परिषद<br> अमृतसर}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२९) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१६६. पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २६ मार्च, १९२८}} आपका पत्र मिला। कुछ फैसला करनेसे पहले मैं रोमाँ रोलाँके पत्रकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। आपने महादेवको लिखे अपने पत्रमें जो दलील पेश की है उसका मैंने पहलेसे ही अन्दाज लगा लिया था। लेकिन यह पत्र कोई प्रेम–पत्र नहीं है। यह तो आपको डा॰ एम॰ ई॰ नायडू से प्राप्त संलग्न पत्र भेजने के लिए लिखा है। कृपया<noinclude></noinclude> 652kn49x6wpq739dwfcowmk33gjy52e पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८६ 250 187025 675344 672884 2026-08-30T17:23:52Z आदेश यादव 3609 675344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इसपर स्वयं तुरन्त यथोचित कार्यवाही कीजिये। मैंने उन्हें बता दिया है कि आप इस पत्रका जवाब देंगे। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|सह–पत्र — १<br> श्रीयुत च॰ राजगोपालाचारी<br> गांधी आश्रम<br> तिरुचेन्गोड}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३१) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१६७. पत्र : प्रताप एस॰ पण्डितको'''}}}} {{right|सत्याग्रह<br> साबरमती<br> २६ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय प्रताप,}} मैं आपसे तो अपने लिये चर्मालय नहीं बनवा सका, लेकिन फिर भी मेरे यहाँ अब एक चर्मालय जैसा कुछ हो गया है; क्योंकि मुझे मेरे ही जैसा सनकी एक व्यक्ति मिल गया है जो चमड़े कामकी बाबत काम चलानेके लायक काफी जानता है। मैं चाहूँगा कि आप जब अहमदाबाद आयें तो इसपर भी एक नजर डालें। लेकिन मैं चाहूँगा कि आप मुझे चमड़ा कमानेके सम्बन्धमें कुछ ऐसा साहित्य भेज दें जिसे एक मामूली आदमी भी समझ सके और उसके सहारे कुछ कर सके, या मुझे बताइए कि ऐसा साहित्य मुझे कहाँसे मिल सकता है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|प्रताप एस॰ पण्डित}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५३६३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude> 2fx6w56fylqn1uo3mrab6n66fmdh5bo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८७ 250 187026 675347 672892 2026-08-30T17:24:44Z आदेश यादव 3609 675347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१६८. पत्र : एम॰ पिगॉटको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती,<br> २७ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। आपने लिखा है कि ३००० रु॰ मेरे लिये बहुत छोटी‌ रकम है और उक्त विधवा तथा उसके बच्चे के लिए वह बहुत बड़ी है। आपको यह नहीं मालूम है कि मैं इस विधवासे भी ज्यादा गरीब हूँ क्योंकि मेरे पास कोई ऐसी सम्पत्ति नहीं जिसके लिए मैं किसी अदालतमें जा सकूं और प्रिवी कौंसिल तो और भी नहीं जा सकता। मेरे पास खुदका कोई पैसा नहीं है। मैं तो एक मामूली न्यासी हूँ जिसके पास कतिपय सुनिश्चित न्यासोंके लिए कुछ कोष रहते हैं। मैं अपनेमें निहित विश्वासको भंग करनेका जोखिम उठाये बिना उन कोषोंको निर्धारित कामोंके अलावा अन्य कामोंमें नहीं लगा सकता। आपको इस सम्बन्धमें किसी धनवान व्यक्ति से कहना–सुनना चाहिए। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री एम॰ पिगॉट<br> हैदराबाद (सिन्ध)}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३२) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१६९. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}}} {{right|आश्रम,<br> साबरमती,<br> २७ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मोतीलालजी,}} जिस पत्रकी आशा थी, वह चूँकि रजिस्ट्रीसे भेजा गया था इसलिए आज ही मिला है। यह एक लम्बा पत्र है। वह<ref>रोमाॅं रोलाॅं।</ref> चाहेंगे कि मैं यूरोप जाऊँ, लेकिन खुद जूनसे पहले अपनी जगहपर उनके रहनेकी सम्भावना नहीं है। मैं एक और पत्रके जवाबमें उनके पत्रकी आशा कर रहा हूँ। मुझे जानेकी कोई जल्दी नहीं है। इसलिए मैं उनसे और खबर पानेका इन्तजार करूँगा। जाने क्यों इस प्रस्तावित यात्राके लिए मैं मनसे राजी नहीं हो पा रहा हूँ। मेरा मन तो बहिष्कारमें रखा है। अगर बहिष्कारको<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 6ndteemfeguqgqd7c4e7n35htf9qacx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८८ 250 187027 675349 672906 2026-08-30T17:26:31Z आदेश यादव 3609 675349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कार्यान्वित करना सम्भव सिद्ध न हो तो मैं खादी कार्यक्रमको आगे बढ़ाने में भी बिलकुल सन्तुष्ट हूँ। मैं चाहूँगा कि खादी आन्दोलनने जो शानदार असर पैदा किया है, उसे आप महसूस करें। अगर मिल मालिक ईमानदार रहते, तो हम बहुत कुछ आगे बढ़ गये होते। मिलोंके खादी उत्पादनके आँकड़े अब मुझे मिल गये हैं। तीन वर्षोंके आँकड़े इस प्रकार हैं : ये आँकड़े दिसम्बर तकके ९ महीनोंके हैं<ref>देखिए "बहिष्कार पर एक मिल मालिक", ५-४-१९२८।</ref> ::{|width=100% |- || || १९२५ || १९२६ || १९२६ || |- || पौण्ड || २२८८७९७० ||२७२३६३३७ ||३३९७७८५१ || |- || गज || ६५०४८४८७ || ७४३१३२३० || ८४३८०३६८ || |} आप देखेंगे कि मिलें कितनी तीव्र गतिसे खादीकी दिशामें आगे बढ़ती रही हैं। एक सालमें ९४.३ गज! इसका अर्थ यह है वह सारा पैसा कंगालोंकी जेबोंसे छीना गया है। यह खादी आन्दोलनकी शक्तिको भी जाहिर करता है। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३३) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१७०. भाषण : हरिजनों को सभामें<ref>यह सभा ७.३० बजे शामको मगनवाड़ी में हुई थी। कस्तूरबा गांधी, वल्लभभाई पटेल और अनसूया बहन साराभाई भी सभामें उपस्थित थे। कार्यक्रमके प्रारम्भमें भजन गाये गये थे।</ref>'''}}}} {{right|२७ मार्च, १९२८}} अभी जो भजन गाये गये हैं उन्हें सुननेके बाद मुझे ऐसा प्रतीत हुआ है कि आपके और मेरे बीच किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। अभी मेरा स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि मैं किसी भी सभामें भाग ले सकूं। और डाक्टरोंने भी मुझे सभाओंमें जानेके लिए मना किया है। आज मैं आया हूँ इससे आप यह न मान लें कि मेरी तबीयत बिलकुल ठीक है। काफी समयके बाद और अहमदाबाद आनेके बाद मैं आज पहली बार इस सभामें आया हूँ, क्योंकि श्री बैंकर और दूसरे लोग बहुत दिनोंसे अनुरोध कर रहे थे कि मुझे शहरके भंगी भाइयोंको भी कुछ समझाना चाहिए। ठीक–ठीक देखा जाये तो आप लोग ही उच्च वर्णके हिन्दू हैं। आपने बहुत त्याग किया है। यदि आपमें कुछ बुराइयाँ हैं तो उनके लिए आपसे ज्यादा तथाकथित उच्च वर्णके हिन्दू ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने आपको त्याग दिया इसीलिए ये बुराइयाँ आप लोगोंमें आईं। अब मैं यही चाहता हूँ कि आप अपने इन दोषोंको दूर करें।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 676hp81b78jvsn8gbbhcck3vxmbz4wv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८९ 250 187028 675351 672912 2026-08-30T17:27:54Z आदेश यादव 3609 675351 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||भाषण : हरिजनोंकी सभामें|१५७}}</noinclude>मैं आपकी अपेक्षा पाखाना ज्यादा अच्छी तरह साफ कर सकता हूँ, परन्तु आप मुझे वैसा नहीं करने देते। यह ठीक नहीं है। आपको दूसरोंको यह काम करनेसे क्यों रोकना चाहिए? उच्च वर्णके लोग आपके कामको हीन–हलका मानते हैं; परन्तु मेरी यह दृढ़ धारणा है कि आपका काम सबसे अच्छा है। हम जबतक यह काम अच्छी तरह नहीं कर सकते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि हमने ठीक–ठीक सेवा की है। आज अहमदाबादकी सड़कों और गलियोंकी क्या हालत है? मैं तो सभी कुछ अपने हाथसे साफ करनेवाला हूँ इसलिए यह सब आपसे कहता हूँ। आपको तो मनमें यह सोचना चाहिए कि इस कार्यके द्वारा आप शहरकी सबसे बड़ी और जरूरी सेवा कर रहे हैं। इस सेवा कार्यमें दूसरे लोग भी भाग लें, इसमें आपको क्या आपत्ति हो सकती है? यदि मेरे वश में हो तो अहमदाबादकी गलियाँ और पाखानें हाई स्कूलके विद्यार्थियोंसे साफ कराऊँ और अहमदाबादको इतना सुन्दर शहर बना दूं कि दूसरोंसे कह सकूं कि हमारे शहरको देखो। इसकी चाबी तो आपके हाथ में है। आप इसे सेवा कार्य समझें और इसे मनसे करें, क्योंकि शहरकी तन्दुरुस्ती मुख्यत: इसीपर निर्भर है। यदि आप यह बात समझ लें तो श्री वल्लभभाईकी<ref>वल्लभभाई इन दिनों अहमदाबादमें नगरपालिकाके प्रधान थे।</ref> बहुत–सी समस्याएँ हल हो जायें और शहर निवासी आपकी प्रशंसा करें। आप अपने कार्यसे बड़े लोगोंको भी लज्जित कर सकते हैं। शराबका व्यसन कम हो गया इस बातपर मुझे विश्वास नहीं आता। मैं यह मानता हूँ कि न पीनेवाले दो आना और पीनेवाले १४ आना है। मैं आपसे शराबकी लत छोड़ देनेकी सिफारिश करता हूँ। मैं यह नहीं मान सकता कि कोई मनुष्य भोजनके लिए कर्ज लेगा। यह तो सिर्फ मौज–मजा उड़ानेके लिए ही किया जाता है। आपको अपने सभी व्यसनोंका त्याग करना चाहिए। अन्तमें मैं आप सबसे यही कहूँगा कि जूठनका त्याग करें और अपने बच्चोंको भी यही सिखायें। उनके साथ आप भी यही प्रतिज्ञा करें। जो वस्तु बिना अपमानके सहज ढंगसे प्राप्त हो उसीको लें। ऐसा करके आप अपने बालकोंको अच्छी शिक्षा दे सकेंगे। चाहे आपको पढ़ना न आता हो, तो भी आप गिनती तो सीख ही लें, ताकि कोई आपको धोखा न दे सके। आपको शौच–शुद्धिके नियम भी समझ लेने चाहिए और समाजके नेताओंसे आत्म–शुद्धि करना सीखना होगा। उसके लिए आपको अपने सभी व्यसन छोड़ देने होंगे। खादीकी टोपी पहन लेनेपर भी यदि आपमें यह दुर्व्यसन विद्यमान हों तो यह खादीकी टोपीके लिए शर्मकी बात है। आप जहाँ जो कुछ भी करेंगे उसीमें आपको नगरपालिका और अहमदाबादके समाजके अगुओंसे अच्छी सहायता प्राप्त करवाऊँगा। :[गुजरातीसे] :'''प्रजाबन्धु''', १-४-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 98filopcklzcta0lkms4v0hd2fauhk7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९० 250 187029 675352 672917 2026-08-30T17:28:22Z आदेश यादव 3609 675352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७१. पत्र : एम॰ टी॰ के॰ माधवन्‌को'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २८ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय माधवन्,}} आपका पत्र मिला। आपने मुझे वहाँके हालातोंकी निराशाजनक तस्वीर भेजी है। अभी फिलहाल आपके लिए मेरी सलाह यह है कि आप वहाँ चुपचाप जनमत तैयार करते रहिये। आपने जो कुछ लिखा है उससे मुझे ऐसा लगता है कि सरकारका रवैया सहानुभूति–शून्य नहीं है, लेकिन उसमें साहसकी कमी है और उसपर कट्टर सनातनी मतका बहुत ज्यादा असर होता है। आपको मुझे यह भी बताना चाहिए कि क्या आप शुचिन्द्रम या थिरूवारप्पूमें सत्याग्रह करनेके लिए तैयार हैं। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत टी॰ के॰ माधवन्<br> एस॰ एन॰ डी॰ पी॰ योगम्<br> वाइकोम<br> (त्रावणकोर राज्य)}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १२८९३—ए) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{larger|'''१७२. पत्र : एम॰ देवनदास नारायणदासको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २८ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके दो पत्र मिले। आपका नाम मैं प्रबन्धक मण्डलके सामने रख सकूँ, इसके पहले मुझे उतनी जानकारीसे कहीं ज्यादाकी जरूरत होगी, जितनी कि आपने अपने पत्रमें दी है। आपको अपनी उम्र, आपके माता–पिता जीवित हैं अथवा नहीं, आपका भावी लक्ष्य क्या है, जरूर लिखना चाहिए। जबतक आपने कराचीमें कमसे–कम ६ महीने तक निम्नलिखित कामोंमें अपनी परीक्षा न ले ली हो, आप किसी भी तरहसे दाखिल नहीं किये जा सकते।<noinclude></noinclude> dfaxqsqmg8iz7jwjo4zq044hj43kp76 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९२ 250 187031 675355 672965 2026-08-30T17:29:35Z आदेश यादव 3609 675355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७४. पत्र : एच॰ एन॰ वेनको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २८ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका सुखद पत्र मिला। श्री एण्ड्रयूज मुझे आपके आश्रम आकर मुझे मिलने के इरादेकी बात बताना भूल गये। ८ अप्रैलको आपसे मिलकर मुझे खुशी होगी। यदि इससे आपके लिए कोई फर्क न पड़ता हो तो ५ के बजाय शामके ४ बजेका समय रखिये। लेकिन आपके लिए मैं ५ बजे भी तैयार रहूँगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री एच॰ एन॰ वेन<br> मेडेन्स होटल<br> दिल्ली}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९७०) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१७५. पत्र : राजगोपालाचारीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २८ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय च॰ रा॰}} प्रस्तावित यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपका पत्र मुझे मिला। खुद मेरा मन भी उसके लिए राजी नहीं है और न ही मुझे खुद अपने–आपमें ऐसा विश्वास है कि मैं उसे सफल बना सकूंगा; लेकिन रोमाँ रोलाँसे मुलाकातका एक आकर्षण अब भी है। पश्चिममें मेरी जितनी भी ख्याति है, वह उनके ही कारण है और मुझे लगता है कि अगर मैं उनसे आमने–सामने मिलूँ तो कई बातोंमें निराशा हो सकती है। यह भी हो सकता है कि हम एक–दूसरेके इतने करीब खिंच जायें जितने कि पहले कभी नहीं थे। मैं इस चीजको जरूर काफी महत्वकी मानता हूँ कि हम एक–दूसरेको जितना जानते हैं उससे ज्यादा अच्छी तरहसे जानें। मैं आपकी इस बातसे बिलकुल सहमत हूँ कि स्वास्थ्यकी दृष्टिसे कुछ लाभ नहीं होनेवाला है। हो सकता है कि मुझे कुछ कष्ट ही मिले और इस प्रस्तावित यात्राके<noinclude></noinclude> t0dkc8hjotfenzyoys3r9qmrwncw7w0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९३ 250 187032 675357 672968 2026-08-30T17:30:48Z आदेश यादव 3609 675357 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको|१६१}}</noinclude>पीछे स्वास्थ्यका कोई विचार नहीं है। उस दृष्टिसे तो भारतका कोई पर्वतीय स्थान मेरे लिये कहीं ज्यादा अच्छा रहेगा। आपकी तरह मुझे भी ऐसा लगता है कि मेरी अनुपस्थितिके कारण हमारा कार्य यहाँ कुछ डगमगा सकता है, खास करके बारडोलीमें। मेरी नामौजूदगी में विदेशी वस्त्र बहिष्कार निश्चय ही खास आगे नहीं बढ़ सकता है। लेकिन अब चूंकि आप सब लोग कलकत्तेमें एक–साथ इकट्ठा हो ही रहे हैं, मैं चाहूँगा कि आप कौंसिलकी बैठक में प्रस्तावित यात्रापर चर्चा करें। मैं चाहता हूँ कि मिलने–जुलनेके मामलेमें मेरा दायरा बहुत ही इने–गिने व्यक्तियों तक सीमित न हो जाये। और मैं इतना नम्र रहूँ कि सत्य तक पहुँच सकूं, चाहे वह किसी भी स्रोतसे क्यों न आये। पैसा हड़पनेके मामलोंके लिए मुझे खेद है, लेकिन मैं आपकी इस चेतावनीको मानूंगा कि मैं स्वयंको परेशानीमें न डालूं और न ही उनकी चर्चा करूँ। रामचन्द्रके बारेमें आप जो कुछ कहते हैं, मैं समझ गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप उन्हें एक स्नेह–भरा पत्र लिखें और उनको अपनी तरफ खींचनेके लिए हर तरहसे प्रयत्न करें। वह एक तरहके 'चेट्टी' भी हैं। क्योंकि उन्होंने जामिया में खादीके लिए बहुत अच्छा काम किया था। आपने पैसा हड़पनेके जिन मामलोंका उल्लेख किया है, उनके बारेमें मुझे एक बात लिखना बिलकुल नहीं भूल जाना चाहिए। यदि दोषी व्यक्ति आपको ५०० रु॰ दे देता है और प्रकाशनके लिए एक लिखित क्षमा याचना आपको दे देता है, तो आपको पूरी तरह सन्तोष हो जाना चाहिए। लेकिन यह तो एक सामान्य व्यक्तिकी बिना विचारे दी गई राय है। केवल दूध पर रहनेके मेरे इस साहसपूर्ण प्रयोगके बारेमें आपको क्या कहना है? हाँ मैं यह नहीं सुनना चाहता कि इस खबरको सुनकर कि वह वास्तव में दूध और पानीका ही प्रयोग है, आप सचमुच मूर्छित हो गये {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२३) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{left|३६–११}}</noinclude> 44vy9z7ax006osdnbp3rv91levu490b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९४ 250 187033 675359 672971 2026-08-30T17:31:40Z आदेश यादव 3609 675359 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७६. पत्र : अरुलमणि पिचमुथुको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती,<br> २८ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका बीमा शुदा छोटा–सा पार्सल आपके पत्रसे पहले मिला और मैं सोच रहा था कि यह किसने भेजा है। महादेवने ठीक अन्दाज लगा लिया था। आपने बहुमूल्य जवाहरातोंका जिस ढंगसे उपयोग किया, उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि किसी तरीकेसे किसी रूपमें मैं इस उपहारकी, आपका नाम जाहिर न करते हुए 'यंग इंडिया'<ref>देखिये "टिप्पणियाँ", ५-४-१९२८, को उपशीर्षक "स्त्रियाँ और गहने"।</ref> के पृष्ठोंमें चर्चा करूँगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|डा॰ अरुलमणि पिचमुथु<br> पंथाडी नं॰ १, मदुरा}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३४) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१७७. पत्र : सैम हिगिनबॉटमको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २८ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} जब जमुना किनारेका आपका फॉर्म देखनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था, ऐसा याद पड़ता है कि तब मैंने एक ऐसा साधन देखा था जिसके जरिये आप सूर्यकी गर्मीसे अपना पानी गरम करते थे। क्या आप कृपया मुझे बतायेंगे कि वह आपकी इमारतके ऊपर बना हुआ मात्र एक हौज था जो पूरी तरह धूपमें खुला रहता था या कि आप किसी यान्त्रिक विधिसे सूर्यकी किरणोंको हौजपर संकेन्द्रित करते थे। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|सैम हिगिनबॉटम महोदय ऐग्रीकल्चरल इन्स्टीटयूट इलाहाबाद}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३७) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> pzfyukvmz75u1n4k5328jymuy2g6004 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९५ 250 187034 675360 672975 2026-08-30T17:32:37Z आदेश यादव 3609 675360 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७८. जाति विद्वेषकी जीत<ref>सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजका यह लेख जिसपर गांधीजी टिप्पणी कर रहे हैं, यहां नहीं दिया जा रहा है उन्होंने लिखा था कि यूरोपमें इन्टरनेशनल लेबर मूवमेंटने अपने 'द ट्रायम्फ ऑफ रेस हेट्रेड" शीर्षक बुलेटिनमें गोरे मजदूरोंके दक्षिण आफ्रिकी मजदूर संघकी इस बातके लिए निन्दाकी थी कि उन्होंने रंगदार मजदूरोंके उस औद्योगिक और व्यवसायिक कर्मचारी संघको अपने साथ सम्बद्ध करनेसे इन्कार कर दिया जो पहले ही से ऐम्सटर्डम इन्टरनेशनल यानी कि सभी राष्ट्रोंके मजदूर संघों के संगठनमें शामिल था। अपने इस लेख में एन्ड्यूजने रेम्जे मैक्डॉनल्ड और इंग्लैंडके संसदीय मजदूर दलके लोगों द्वारा जातीय आधारपर साइमन कमीशनकी नियुक्तिमें चुपचाप अपनी सम्मति दे देनेपर भी खेद व्यक्त किया था।</ref>'''}}}} मुझे विश्वास है कि यदि ऐम्स्टर्डम इन्टरनेशनल भी वैसी ही स्थितिमें होता जैसी जोहानिसबर्गके गोरे मजदूर संघकी है, तो जैसा व्यवहार इस गोरे मजदूर संघने किया है वैसा ही व्यवहार वह भी करता और इसीलिए यदि इसके सदस्य श्री रैम्जे मैकडोनल्ड या श्री लैन्सबरीकी स्थिति में होते तो उनका व्यवहार भी इन लोगोंके व्यवहारसे भिन्न न होता। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१७९. आतंकवादका सिद्धान्त'''}}}} जनरल डायरने हंटर कमेटीके एक सदस्यके प्रश्नका उत्तर देते हुए यह स्वीकार किया था कि जलियाँवाला बागकी योजना आतंक उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे की गई थी। यह स्वीकारोक्ति करके स्वर्गीय जनरलने किसी नये सिद्धान्तका प्रतिपादन नहीं किया था। असल बात यह है कि संसारकी इस 'योग्यतम शासन सेवा' ने अपनी महानताका निर्माण आतंकवादकी नींव पर ही किया है। इस अंकको छपनेके लिए देते समय जो समाचार मिले हैं उनके अनुसार ऐसा जान पड़ता है कि इस सुविदित ब्रिटिश नीतिके अनुसार बारडोलीमें किसानोंको झुकानेके लिए उनके विरुद्ध फौरी कार्रवाईकी जा रही है, क्योंकि बारडोलीके कुछ सत्याग्रहियों पर जब्तीके आठ शुरुआती नोटिस तामील किये गये हैं। इन लोगोंके नाम सावधानीसे चुने गये जान पड़ते हैं, क्योंकि संयोगसे वे सभी प्रमुख बनिये हैं। यह चुनाव शायद इस आशासे किया गया है कि बनिये जो कमजोर डरपोक समझे जाते हैं जब्तीके नोटिस देनेसे जल्दी घुटने टेक देंगे। अधिकारी सोचते होंगे कि इससे अधिक स्वाभाविक और क्या होगा कि बनियोंके कमजोर हो जानेपर दूसरे भी कमजोर हो जायें। सत्याग्रहियोंको आतंकवादके इस प्रथम प्रदर्शनसे चकित होनेकी आवश्यकता नहीं है। उनसे बार–बार कहा जाता रहा है कि उन्हें जब्ती या इससे<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> lpdza7tn7i0rz9mw1789qfjnh4v83nv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९७ 250 187036 675362 672984 2026-08-30T17:34:18Z आदेश यादव 3609 675362 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||राष्ट्रीय सप्ताह|१६५}}</noinclude>&nbsp; अच्छा हो यदि ब्रिटिश मालके बहिष्कारकी पुकारका समर्थन करनेवाले लोग अपने कार्यक्रम पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें और जरूरत जान पड़नेपर अपनी योजनाको बदलें और इस हार्दिक विश्वासके साथ खादी आन्दोलनमें शरीक हों, कि केवल खादीसे ही, सिर्फ ब्रिटिश कपड़ेका ही नहीं, सभी तरहके विदेशी कपड़ेका पूरा–पूरा बहिष्कार निष्पन्न हो सकता है? वे यह करें या न करें, मुझे विश्वास है कि वे ब्रिटिश कपड़ेके सिवाय अन्य विदेशी कपड़े के समर्थनको सिद्धान्त बनाकर नहीं बैठे हैं। अगर मेरी यह मान्यता ठीक हो तो, उनको चाहिए कि वे राष्ट्रीय सप्ताहमें खादीकी बिक्रीका समर्थन करें। अगर वे सिर्फ पिछले सात वर्षोंमें हुई खादी आन्दोलनकी प्रगतिका अध्ययन करें तो वे इतना जरूर ही समझ जायेंगे कि चरखेमें कल्पनानीत शक्ति है। अगर देशके राजनीतिक दृष्टिसे जागृत लोग उसका पूरे मनसे सक्रिय समर्थन करें तो वह मिलोंकी सहायताके बिना भी विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार सफल करनेमें समर्थ हो सकती है। मिलोंकी सक्रिय और संगठित सहायतासे तो विदेशी वस्त्रका बहिष्कार बहुत ही सहज काम हो जाता है। सच पूछिए तो इसकी कुंजी मिलवालोंके हाथमें है, अलबत्ता उन्हें राष्ट्रके हितकी दृष्टिसे काम करना चाहिए। उनके साथमें एक बना बनाया और व्यापक संगठन है, जिसका उपयोग अगर वे राष्ट्रकी सेवाके लिए करें तो वह बहिष्कार आन्दोलनको बहुत कुछ आसान बना सकता है और राष्ट्रको ऐसी शक्ति दे सकता है, जिसकी उसे बड़ी जरूरत है। फिर हिन्दू तथा मुसलमानोंको भी उन बहुमूल्य सात दिनोंकी याद क्यों नहीं करनी चाहिए और क्यों सारे भय, पारस्परिक अविश्वास तथा निर्बलताको तिलांजलि नहीं दे देनी चाहिए? मुझे उन अछूतोंकी बात भी नहीं भूलनी चाहिए, हम हिन्दू लोग जिन्हें आज तक दबाते रहनेका अपराध करते आये हैं। क्या हम यह नहीं देख सकेंगे कि अपने छठवें अंशको (भले ही यह संख्या इससे कम या ज्यादा हो) गिराकर हमने अपने आपको ही नीचे गिराया है? कोई आदमी खुद गड्ढेमें उतरे बिना और स्वयं पापका भागी हुए बिना दूसरेको गिरा नहीं सकता। दलित लोग पापके भागी नहीं हैं। दबाने के पापका जवाब तलब किया जायेगा तो उन्हीं लोगोंसे जो दूसरोंको नीचे दबाकर रखे हुए हैं। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८<noinclude></noinclude> 8pjr1qrp3084gi9ovslk4ct5svyydg0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९८ 250 187037 675364 673256 2026-08-30T17:35:08Z आदेश यादव 3609 675364 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१८१. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''राष्ट्रीय सप्ताहके लिए विशेष'''}} श्रीयुत विट्ठलदास जेराजाणी (खादी भंडार, प्रिन्सेस स्ट्रीट, बम्बई) लिखते हैं :<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र–लेखकने १९२२ से १९२७ तकके राष्ट्रीय सप्ताहोंगे खादी बिक्री आंकड़े दिये थे और यह आशा व्यक्तकी थी कि विविध और अच्छी किस्मकी खादी और स्वदेशीको भावनाका विकास देखते हुए आगामी राष्ट्रीय सप्ताह में अधिक बिक्री होगी, उन्होंने १ से १५ तारीख तक के लिए खादीकी खरीददारीपर रुपये में एक आने छूटकी भी घोषणा की थी। देखिए "राष्ट्रीय सप्ताह", १-४-१९२२ भी।</ref> मुझे पूरी आशा है कि खादी श्रीयुत जेराजाणीकी समुचित इच्छा और आशाके अनुरूप ही यथेष्ट बिकेगी। बम्बई पर राष्ट्रके मनोभावोंका हमेशा ही असर पड़ता आया है। बम्बईने पहला खादी भण्डार खोलकर राष्ट्रीय खादी आन्दोलनकी नींव डाली थी। पत्रमें दिये गये आँकड़े भी शिक्षाप्रद हैं। १९२५ में इतनी मंदी आ जानेका कारण कालवादेवी रोडमें एक और खादीका बड़ा भण्डार खुलना बतलाया जा सकता है। तो भी दूसरे बरसोंके आँकड़े यह स्पष्ट सिद्ध करते हैं कि बम्बई राजनीतिक दृष्टिसे जागृत हिन्दुस्तानकी स्थितिका सच्चा परिचायक है। १९२७ के अंकोंसे तो १९२६ की बनिस्बत बिक्रीमें काफी बढ़ोतरी दिखलाई पड़ती है। क्या बम्बई फिर १९२२ की जैसी बिक्री करेगा? मगर इसका यह मतलब नहीं है कि १९२२ की जैसी बिक्री करनेसे ही यह बहिष्कार सफल हो सकेगा। हम इसे सफल करना चाहते हैं और अगर हममें केवल आवश्यक त्याग और दृढ़ संकल्प हो तो उसे सफल कर भी सकते हैं। दूसरी एक और विज्ञप्ति शुद्ध खादी भण्डार, रिची रोड, अहमदाबादसे मेरे पास आई है। यह भण्डार भी कपड़ेकी किस्मके अनुसार, रुपये पीछे एकसे लेकर चार आने तककी छूट देगा। मैं आशा करता हूँ कि सभी खादी भण्डार चाहे वे चरखा संघके हों, या उससे प्रमाणपत्र–प्राप्त हों, जनताका ध्यान खादीकी ओर दिलानेकी खास कोशिश करेंगे और सर्व साधारण भी पर्याप्त खादी खरीदेंगे। {{c|'''खादीके सिलसिलेमें बंगालका दौरा'''}} बंगाल में शायद इस बातको जोर देकर कहने की जरूरत है कि श्रीयुत सतीश चन्द्र दासगुप्तने जिस खादी सम्बन्धी दौरेका आयोजन किया है वह दौरा अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषके सिलसिले में भी है। बंगालके बेताजके राजा स्व॰ देशबन्धु चित्तरंजन दासकी स्मृतिमें खोले गये अ॰ भा॰ देशबन्धु स्मारक कोषके लिए, जो खादीके लिए इकट्ठा किया जा रहा है, सेठ जमनालाल बजाज, श्रीयुत राजगोपालाचारी, श्रीयुत मणिलाल कोठारी और श्रीयुत शंकरलाल बैंकर अगले महीनेकी ५<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 3x5u6i4m10y1b2yst9xczhey8rddnce पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९९ 250 187038 675365 673259 2026-08-30T17:36:16Z आदेश यादव 3609 675365 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१६७}}</noinclude>तारीखसे बंगालमें दौरा करनेवाले हैं। हालमें बंगालमें स्वदेशीकी एक लहर चल रही है। मगर मुझे लगता है कि शायद इस सीधे–सादे जीवनदायी स्वदेशी शब्दके चारों ओरके शब्दाडम्बरमें पड़कर हम उसका सच्चा अर्थ भूलते जा रहे हैं। हमें चाहिए कि इसके शब्दार्थको ही पकड़े रहें; तब फिर हमें उसमें खादीके सिवाय और दूसरा कुछ नहीं मिलेगा। स्वदेशीका अर्थ है 'अपने देशका'। गाँववालोंके रोजमर्राके इस्तेमालकी चीजोंमें सिर्फ कपड़ा ही एक ऐसी चीज है जो 'अपने देशकी' नहीं है। और जो चीज वे सहज ही तैयार कर सकते हैं, वह भी कपड़ा ही है। इसलिए स्वदेशीका जो काम वे सहज ही पूरा कर सकते हैं, और जिसके बिना उन्हें भूखों ही मरना पड़ेगा, वह केवल खादी ही का काम है और कुछ नहीं। इसलिए सिर्फ खादीका काम सभी देशभक्तोंके लिए सच्चा स्वदेशीका काम है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि सेठ जमनालालजी और उनके साथी जहाँ कहीं जायेंगे, बंगालके लोग पूरे मनसे उनकी सहायता करेंगे। एक गज भी खादी खरीदनेसे और स्मारक कोषमें दिये गये छोटे–से–छोटे दानसे बहिष्कार आन्दोलनको और देशके गरीब से गरीब लोगोंको बहुत सहायता मिलेगी। {{c|'''बहिष्कार और विद्यार्थी'''}} एक कालेजके प्रधानाचार्य लिखते हैं :<ref>पत्रके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं।</ref> :{{gap}}'''बहिष्कार आन्दोलनके संचालक विद्यार्थियोंको अपने आन्दोलनमें खींच रहे हैं। जब लड़के अपने स्कूल और कालेज छोड़कर किसी प्रदर्शनमें शामिल होते हैं, तब वे वहाँके हुल्लड़बाज लोगोंमें मिल जाते हैं और उन्हें बदमाशोंकी सभी ज्यादतियोंके लिए जिम्मेदार होना पड़ता है तथा अक्सर पुलिस के डंडे पहले उन्हें ही खाने होते हैं। इसके अलावा वे स्कूल या कालेजमें अधिकारियोंके कोप भाजन बन जाते हैं। और उन्हें दण्ड सहनेपर मजबूर होना पड़ता है; वे अपने अभिभावकों की हुक्म उदूली करते हैं; अभिभावक उन्हें आगे खर्च देनेसे इन्कार कर सकते हैं और इस तरह उनका सत्यानाश हो सकता है। मैं ऐसे युवक आन्दोलनोंकी बात तो समझ सकता हूँ कि लड़के छुट्टीके दिनोंमें निरक्षर किसानोंको पढ़ाने, उन्हें सफाईके नियम सिखलाने इत्यादिके काम करें; मगर यह देखकर तो कष्ट होता है कि वे अपने ही माँ–बाप और शिक्षकोंका विरोध करें और बुरे लोगोंके साथ सड़कोंपर घूमते फिरें और नियम और शान्तिभंग करनेमें हाथ बँटावें। क्या मैं आपसे राजनीतिज्ञोंको यह सलाह देनेकी विनती कर सकता हूँ कि वे अपने प्रदर्शनोंको ज्यादा बाअसर बनानेके लिए विद्यार्थियों को उनके सही कामसे न खींच ले जायें?''' पत्र–लेखकने इस आशासे पत्र लिखा है, कि मैं विद्यार्थियोंके सक्रिय राजनीतिक कामों में शरीक होनेका विरोध करूँगा। मगर खेद हैं कि मुझे उन्हें निराश करना<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> spwd1krvfxq8j72j9uxc80glsg1pv84 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०० 250 187039 675366 673262 2026-08-30T17:37:31Z आदेश यादव 3609 675366 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पड़ रहा है। उन्हें मालूम होना चाहिए था कि सन् १९२०-२१ में विद्यार्थियों को उनके स्कूलों, कालेजोंसे बाहर निकालने और ऐसा राजनीतिक काम करनेको कहनेमें जिसमें जेल जानेका भी खतरा था, मेरा हाथ कुछ कम नहीं था। मेरी समझमें अपने देशके राजनीतिक आन्दोलनमें आगे बढ़कर हिस्सा लेना उनका स्पष्ट कर्त्तव्य है। सारे संसारमें विद्यार्थी ऐसा ही कर रहे हैं। हिन्दुस्तानमें जहाँकि अभी हाल तक राजनीतिक जागृति दुर्भाग्यवश केवल थोड़े–से अंग्रेजीदां लोगों तक ही सीमित रही है, यह उनके लिए और भी कर्त्तव्य रूप बन जाता है। चीन और मिस्रमें तो राष्ट्रीय आन्दोलन विद्यार्थियोंकी ही बदौलत चल सके हैं। हिन्दुस्तानमें भी वे कुछ कम काम नहीं कर सकते हैं। प्रधानाचार्य महोदय इस बात पर जोर दे सकते थे कि विद्यार्थियोंके लिए अहिंसाके नियमोंका पालन करना तथा हुल्लड़बाजोंके कहनेमें चलनेके बदले उनको काबू में रखना जरूरी है। {{c|'''मैकॉलेका सपना'''}} मैकॉलेका 'जीवन चरित्र और पत्र' नामकी अंग्रेजी पुस्तकमें से एक मित्रने मेरे पास नीचे लिखा उद्धरण भेजा है :<ref>केवल अंशःत उद्धृत। उद्धरणके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं।</ref> :{{gap}}'''हिन्दुस्तान के वतनी लोगोंमें यूरोपीय साहित्य और विज्ञानका प्रचार–प्रसार करना ब्रिटिश सरकारका महान ध्येय होना चाहिए — यह निश्चय लॉर्ड विलियम बेंटिकने ७ मार्च, १८३५ को किया। और मेकॉलेने अध्यक्षके रूपमें अपना काम शुरू कर दिया।''' :{{gap}}'''लॉर्ड मेकॉलेने कहा कि, हमारी अंग्रेजी शालाएँ आश्चर्यजनक ढंगसे प्रगति कर रही हैं ... हिन्दुओंपर इस शिक्षासे होनेवाले असर की सीमा नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा पाया हुआ एक भी हिन्दू कभी अपने धर्ममें श्रद्धावान् नहीं रहता। ... कुछ लोग एक युक्तिके तौरपर उसका नाम लेते रहते हैं; मगर ज्यादातर लोग धर्मके मामलेमें अपनेको बिलकुल स्वतन्त्र कहते हैं और कुछ ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं। मेरा यह पक्का विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षाकी योजनाओंपर अमल किया गया, तो आजसे ३० साल बाद बंगालके प्रतिष्ठित वर्गोंमें एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा। ..."''' मैं नहीं कह सकता कि मैकॉलेका यह सपना कि अंग्रेजी शिक्षा पाया हुआ हिन्दुस्तान अपने धार्मिक विश्वास छोड़ देगा अथवा नहीं; सच्चा निकला है या नहीं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि उनका एक और सपना था — अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए हिन्दुस्तान द्वारा अंग्रेज हाकिमोंके लिए कारकून वगैरा तैयार करना। यह सपना सचमुच उनकी आशाओंसे भी अधिक सच निकला है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> k27fvymxrpnhxlkz47u7c17zmnyhbv7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०१ 250 187040 675369 673265 2026-08-30T17:38:38Z आदेश यादव 3609 675369 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१६९}}</noinclude>&nbsp; {{c|'''संघर्षके बीच शान्ति'''}} एक मित्र समय–समय पर मेरे सोमवारके मौन दिवसके लिए जो सुन्दर चीजें भेजते हैं, उनमें से कुछ मैंने पहले भी पाठकोंके लिए छापी हैं। मैं उनके लिए एक और किश्त जो बहुत दिनोंसे मेरी बंडीमें पड़ी है प्रकाशित करनेको लालायित हूँ। अन्तिम दो को छोड़कर शेष सब बौद्ध लेखोंके उद्धरण हैं। अन्तिममें से पहला इमर्सनकी उक्ति है और अन्तिम एक हिन्दू कहावत है। उस मनुष्यके सुन्दर वचन जो स्वयं तदनुसार आचरण नहीं करता वैसे ही निरर्थक हैं, जैसे कि सुन्दर रंगवाला निर्गन्ध फूल। जीवनके उलट–फेरसे अविचलित, शोक एवं आवेशसे असंक्षुब्ध मन सबसे बड़ा वरदान है। जिसकी सदा ही प्रशंसा की जाती हो या जिसकी सदा ही निन्दा की जाती हो ऐसा व्यक्ति न कभी हुआ है और न कभी होगा। जैसे एक दृढ़ चट्टान वायुसे चलायमान नहीं होती, इसी प्रकार बुद्धिमान लोग निन्दा अथवा स्तुतिसे विचलित नहीं होते। जो हमसे घृणा करते हैं, उनसे घृणा न करके हम प्रसन्नता से रहें। घृणा करनेवालोंके बीच घृणासे विमुक्त होकर रहें। हमें दुखितोंके बीच दुःखसे विमुक्त होकर सुखसे रहना चाहिए। मनमें सन्तप्त लोगों के बीच मनस्तापसे विमुक्त होकर रहना चाहिए। व्यस्त लोगोंके बीच चिन्तासे विमुक्त होकर प्रसन्नता से रहें। चिन्तित लोगोंके बीच कामनाओंसे विमुक्त होकर रहें। यद्यपि हम किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानते, फिर भी हम प्रसन्नतासे रहें। हम उन दीप्तिमान देवताओंके समान बन जायेंगे जो आनन्दका उपभोग करते हैं। सबसे बड़ी प्रार्थना धैर्य है। इस संसार में घृणा कभी घृणासे शान्त नहीं होती। घृणा प्रेमसे शान्त होती है : यह सदा इसका स्वभाव है। मान एवं विनम्रता सन्तोष एवं कृतज्ञता, उपयुक्त समय पर ईश्वरकी वाणी सुनना सबसे महान् वरदान है। जैसे कोई माता अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी अपने पुत्र — अपने इकलौते पुत्रकी रक्षा करती है, इसी तरह मनुष्यको सब प्राणियोंके बीच असीम सद्भाव बढ़ाना चाहिए। मनुष्य सारे संसारके प्रति, छोटे बड़ोंके प्रति असीम सद्भाव बढ़ाये; वह सद्भाव अपरिसीमित हो; इसमें विभिन्न या विरोधी हितोंका भाव न हो। मानव जितनी देर जागृत अवस्थामें रहे, चाहे वह खड़ा हो, चल रहा हो, बैठा हो या लेटा हुआ हो, सारे समय दृढ़तासे उसी मानसिक स्थितिमें रहे, मनकी यह स्थिति संसारमें सबसे अच्छी स्थिति है।<noinclude></noinclude> pxkr4pbox7buldobhemsry6g5tpfvef पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०२ 250 187041 675371 673270 2026-08-30T17:39:11Z आदेश यादव 3609 675371 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; तत्परता, निग्रह और संयमसे अपने आपको चैतन्य रखते हुए बुद्धिमान मनुष्य अपने लिए ऐसा द्वीप बना ले जिसे कोई भी प्रलय तबाह न कर सके। जैसे मधुमक्खी फूलके रंग और गन्धको क्षति पहुँचाये बिना उसका रस लेकर उड़ जाती है, इसी तरह बुद्धिमान मनुष्यको सत्यपर स्थिर रहना चाहिए। तूने मेरे होठोंको जहाँ एक वाणी दी है वहाँ हजार बार मौन रहना सिखाया है। एक बार बुद्ध भी गाड़ीका घोड़ा बने थे और उन्होंने दूसरोंका बोझा ढोया था। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१८२. उपवासकी महिमा'''}}}} पाठक उस पोलिश प्रोफेसरके पत्रोंसे परिचित हैं जिनके उद्धरण में जब तब इस पत्रके स्तम्भोंमें प्रकाशित करता रहा हूँ।<ref>देखिए खण्ड ३३ "सत्य एक है", २१-४-१९२७ और खण्ड ३४ "अनेकता में एकता", ११-८-१९२७।</ref> अपने एक पत्रमें मेरे उपवासोंके सम्बन्धमें वे लिखते हैं:<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र–लेखकने उपवासके अपने अनुभव लिखे थे और कहा था कि उससे न केवल शारीरिक स्फूर्ति बढ़ती है, वरन् आध्यात्मिक लाभ भी अधिक होता है।</ref> मैं यह पत्र ऐसी खोजोंमें रुचि रखनेवाले पाठकोंके लिए उपयोगी समझकर छाप रहा हूँ। उपवाससे होनेवाले शारीरिक और नैतिक लाभोंको लोग दिनोंदिन अधिकाधिक मानते जा रहे हैं। बनिस्बत तरह–तरह की दवाओं और भयंकर इन्जेक्शनोंके — भयंकर इसीलिए नहीं कि उनसे तकलीफ होती है किन्तु इसलिए कि उनके फलस्वरूप अक्सर और दूसरे रोग हो जाते हैं — विवेकपूर्वक किये गये उपवासके द्वारा बहुतसे रोगोंका इलाज कहीं ज्यादा अच्छा और अक्सीर होता है। दवाओंसे होनेवाली बहुतेरी हानियोंको हम जानते ही नहीं हैं। मगर उपवाससे हुई हानिके उदाहरण विरल ही हो सकते हों। उपवास करनेवाले प्रायः सभी आदमियोंका अनुभव है कि इससे स्फूर्ति बढ़ जाती है, क्योंकि मन और शरीरको सच्चा आराम तो केवल उपवासमें ही मिल सकता है। अगर जरूरतसे ज्यादा भरा और शक्तिके बाहर काम करनेवाला पेट आराम न पावे तो महज शारीरिक काम बन्द कर देनेसे ही शरीरको आराम नहीं मिलता। उपवाससे आत्मिक लाभ भी पर्याप्त होते हैं किन्तु वे इस तरह सहज ही नहीं दिखलाये जा सकते।<ref>पत्र–लेखकने लिखा था कि जब कभी मेरे सामने नैतिक या बौद्धिक कठिनाई पेश होती है, मैं उपवास करता हूँ ... एक बार छापाखाना वाला अन्य अधिक पैसा देनेवाली अन्य चीजें छापता रहा और उसने मेरे काममें देर लगा दी। मैंने उपवास किया और उनकी मनोवृत्ति बदलने में समर्थ हो सका...।</ref> आत्मिक लाभ तभी होंगे, जब मन और देहका पूरा मेल हो। किन्तु इसमें आत्म–प्रवचनाका खतरा है। मुझे ऐसे बहुतसे उदाहरण मालूम हैं जबकि आत्मिक लाभके लिए किये गये उपवास जरूरतसे अधिक दिनों तक चलाये जाते रहे। अगर उपवासी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 7q5labl9rnm8m6l38lllf4m13zqnrfi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०३ 250 187042 675373 673276 2026-08-30T17:40:11Z आदेश यादव 3609 675373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : उर्मिलादेवीको|१७१}}</noinclude> अपना उद्देश्य और साधन ठीक–ठीक पहचानता हो तो सीमामें रहकर उपवास करनेसे बहुत आत्मिक लाभ होता है। मुहम्मद साहबने अपने अनुयायियोंको कहा था कि 'रमजानके उपवासके अलावा, और उपवासोंमें मेरी नकल मत करना। मेरा सिरजनहार मेरे उपवासके दिनोंमें मेरे लिये पूरी खुराक भेज दिया करता है।' इस उपदेशमें भी बहुत कुछ सार है। उस धार्मिक उपवाससे लाभ ही क्या जिसमें शरीरको जितना ही भूखों मारो, मन तरह–तरहके व्यंजनोंकी ओर उतना ही दौड़ा करे? :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१८३. दो संशोधन'''}}}} इसी २२ तारीखके 'यंग इंडिया' में ६३ पृष्ठपर छपे श्री आयरलैण्डके पत्रकी पाद–टिप्पणीमें<ref>देखिए, "मतभेद", २-३-१९२८।</ref> दो खेदजनक गलतियाँ रह गई हैं। स्तम्भके लगभग बीचमें मिलेगा कि "ईश्वर पृथ्वी तक ऐसे करोड़ों तरीकोंसे पहुँचता है जिन्हें हम समझ नहीं पाते;" इस वाक्यमें संकेत लिपि–लेखकने 'हम' की जगह 'पृथ्वी' सुन लिया। इसके आगे छठी पंक्ति में लिखा है "यह कई दूसरी चीजोंकी तरह है जिन्हें हम देख सकते हैं, आदि प्रसंगसे पता चलता है कि इस वाक्यमें 'तरह' के बाद 'नहीं' शब्द छूट गया है। होना ऐसा चाहिए था : वह कई दूसरी चीजोंकी तरह नहीं है' आदि। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८ {{c|{{larger|'''१८४. पत्र : उर्मिलादेवीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> ३० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} आपका पत्र मिला। मुसीबतें आपका पीछा नहीं छोड़तीं। परन्तु मानना चाहिए कि वे कुछ सिखाने आती हैं। धीरेनके मामलेमें सलाह देना कठिन है।<ref>उर्मिला देवीने लिखा था ... "धीरेनेके बारेमें भी परेशानी है। सरकार उसे बंगालसे निकाल देना चाहती है। मैं नहीं समझती कि इस भयंकर विपत्तिको टाला जा सकता है। वह आदेशपर हस्ताक्षर करना अस्वीकार तो कर सकता है, परन्तु ऐसी स्थितिमें उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसका परिणाम तीन वर्षंका कठिन कारावास हो सकता है ... (एस॰ एन॰ १३१२६)</ref> आदर्श की दृष्टिसे तो उसे निष्कासन अथवा नजरबन्दी के प्रत्येक आदेशका उल्लंघन करना चाहिए और बदले में जो भी दण्ड दिया जाये उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। परन्तु यह मामला उनके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> sxdzadiwtqki6pk93mylonx3ir4xoy4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०४ 250 187043 675376 673279 2026-08-30T17:41:39Z आदेश यादव 3609 675376 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> स्वयं निर्णय करनेका है। इससे पहले कि वह, जैसा कि मेरे मनमें है, आदेशका उल्लंघन करें, उन्हें यह आन्तरिक विश्वास अवश्य होना चाहिये कि आदेशका उल्लंघन कर्त्तव्य है और आदेशके उल्लंघनके लिए कारावास कोई बोझ नहीं अपितु हर्षका विषय है। और यह तभी सम्भव है जब ऐसे कारावास कोई व्यक्ति अपने लिये और राष्ट्रीय उत्थानके लिए प्रेरणा देनेवाला समझे। परन्तु वास्तवमें किया क्या जाना चाहिए, इस विषय में मैं पूरे भरोसेके साथ कुछ नहीं कह सकता। आप धीरेनको मुझसे ज्यादा अच्छी तरह जानती हैं। फिर भी धीरेन ज्यादातर तो वही करेंगे जैसा कि आप उनसे करवाना चाहेंगी। आप यह भी अवश्य सोच समझ लें कि आप उनके कारावास और कष्टोंको किस हदतक बर्दाश्त करेंगी; इसके बाद ही कोई निर्णय करें। यदि धीरेन निष्कासनके आदेशको स्वीकार कर लें तो वह निश्चय ही आश्रममें आयें और वह जबतक उनकी इच्छा हो यहाँ रहें। उन जैसे युवकोंके लिए यहाँ हमेशा ही काम रहता है। प्रस्तावित यात्रा के बारेमें अभी कुछ निश्चित नहीं है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीमती उर्मिला देवी<br> ४ ए नफर कुण्डु रोड<br> कालीघाट, कलकत्ता}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२६) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१८५. पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघ के सचिवको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम साबरमती ३० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय महोदय,}} निजी एजेन्सियोंके सम्बन्धमें लिखे गये, आपके २८ मार्च पत्र संख्या २१६९ के सन्दर्भ में, एकदम कोई राय दे पाना कठिन है। मैं इसे आवश्यक मानता हूँ कि निजी एजेन्सियोंपर अधिक अंकुश लगानेकी शक्ति प्राप्त कर ली जाये। इससे पहले कि मैं कुछ सलाह दूँ, यह अच्छा रहेगा कि तमिलनाड एजेन्सीसे ठोस सुझाव प्राप्त कर लिये जायें। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|सचिव अ॰ भा॰ च॰ संघ अहमदाबाद}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३९) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> fpf7egde3hvljjxjg89kgiytbate8gj 675378 675376 2026-08-30T17:42:12Z आदेश यादव 3609 675378 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> स्वयं निर्णय करनेका है। इससे पहले कि वह, जैसा कि मेरे मनमें है, आदेशका उल्लंघन करें, उन्हें यह आन्तरिक विश्वास अवश्य होना चाहिये कि आदेशका उल्लंघन कर्त्तव्य है और आदेशके उल्लंघनके लिए कारावास कोई बोझ नहीं अपितु हर्षका विषय है। और यह तभी सम्भव है जब ऐसे कारावास कोई व्यक्ति अपने लिये और राष्ट्रीय उत्थानके लिए प्रेरणा देनेवाला समझे। परन्तु वास्तवमें किया क्या जाना चाहिए, इस विषय में मैं पूरे भरोसेके साथ कुछ नहीं कह सकता। आप धीरेनको मुझसे ज्यादा अच्छी तरह जानती हैं। फिर भी धीरेन ज्यादातर तो वही करेंगे जैसा कि आप उनसे करवाना चाहेंगी। आप यह भी अवश्य सोच समझ लें कि आप उनके कारावास और कष्टोंको किस हदतक बर्दाश्त करेंगी; इसके बाद ही कोई निर्णय करें। यदि धीरेन निष्कासनके आदेशको स्वीकार कर लें तो वह निश्चय ही आश्रममें आयें और वह जबतक उनकी इच्छा हो यहाँ रहें। उन जैसे युवकोंके लिए यहाँ हमेशा ही काम रहता है। प्रस्तावित यात्रा के बारेमें अभी कुछ निश्चित नहीं है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीमती उर्मिला देवी<br> ४ ए नफर कुण्डु रोड<br> कालीघाट, कलकत्ता}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२६) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१८५. पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघ के सचिवको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> ३० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय महोदय,}} निजी एजेन्सियोंके सम्बन्धमें लिखे गये, आपके २८ मार्च पत्र संख्या २१६९ के सन्दर्भ में, एकदम कोई राय दे पाना कठिन है। मैं इसे आवश्यक मानता हूँ कि निजी एजेन्सियोंपर अधिक अंकुश लगानेकी शक्ति प्राप्त कर ली जाये। इससे पहले कि मैं कुछ सलाह दूँ, यह अच्छा रहेगा कि तमिलनाड एजेन्सीसे ठोस सुझाव प्राप्त कर लिये जायें। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|सचिव अ॰ भा॰ च॰ संघ अहमदाबाद}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३९) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> aodfboayimgqcbzite1mpr58bw2ay6p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०५ 250 187044 675380 673287 2026-08-30T17:43:02Z आदेश यादव 3609 675380 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१८६. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> ३० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय शान्तिकुमार,}} आप मुझे सारे नये अतिरिक्त तथ्य और आँकड़े अवश्य भेजते रहिये। उस दिन आपने जो संयुक्त पक्का चिट्ठा भेजा है, उसे मैं इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८६) की फोटो–नकलसे तथा एस॰ एन॰ १३१२५ से भी। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी {{c|{{larger|'''१८७. पत्रः ना॰ र॰ मलकानीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> ३० मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय मलकानी,}} तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें अपनी आवश्यकताओं और अन्य किसी भी मामलेमें मुझे लिखनेमें बिलकुल संकोच नहीं करना चाहिए। जहाँतक हो सकेगा मैं तुमसे मिलनेकी कोशिश करूँगा, परन्तु तुम्हें मुसीबत बर्दाश्त करनेके लिए तैयार करना चाहिए। गृह कलह भी राष्ट्र सेवकके भाग्य में बदा हो सकता है। ठक्कर बापा आपके वेतनके बारेमें सर पुरुषोत्तमदाससे मिले थे। आपको केन्द्रीय समितिसे वेतन मिलनेकी बातको सर पुरुषोत्तमदास अत्यन्त स्वाभाविक और रु॰ १५० बिलकुल ठीक मानते हैं। अब मुझे रु॰ २०० माँगने पड़ेंगे। मुझे कोई कठिनाई दिखाई नहीं देती है। मैं यह पता लगानेकी कोशिशमें हूँ कि क्या जेठालाल या पर्शतलाल कुछ दिनोंके लिए भेजे जा सकते हैं। कल्याणजी और नरहरि भाईको भेज सकना असम्भव है। नरहरिने अपने लिये कामकी योजना स्वयं बना रखी है। और कल्याणजी बारडोलीमें अवश्य ही व्यस्त होंगे। परन्तु मेरे पास एक ऐसे योग्य व्यापारी हैं, जो इस वक्त ऐसे<noinclude></noinclude> 1sy8ep289f7wul0zohh8xtshqg28jd5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०६ 250 187045 675384 673302 2026-08-30T17:44:28Z आदेश यादव 3609 675384 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कामके लिए खाली हैं। वह जयसुखलाल गांधी<ref>परन्तु जयसुखलाल गांधीकी जगह मथुरा व्यासको भेजा गया है। देखिए "पत्र: ना० र॰ मलकानी", ४-४-१९२८।</ref> है। वह अमरेली खादी कार्यालयके अधिकारी थे। अब इसकी फिरसे व्यवस्था की जा रही है और जयसुखलालको अवकाश दिया जा रहा है। उत्तराधीन तुम्हारा पत्र बिलकुल ठीक समयपर आया है और उन्हें खाली रखा जा सकता है। परन्तु यह जरूरी है कि उन्हें मुख्य कार्यालयको समेटने और सारा सामान यहां भेज देनेके लिये पहले अमरेली भेजा जाये। इसमें एक पखवाड़ा लग जानेकी सम्भावना है। अभी मैंने उनसे बातकी कि क्या वे यह करनेके लिए तैयार हैं। वे रजामन्द हैं, बशर्ते कि मैं पहले उन्हें सीधा अमरेली जाकर वहाँका काम समेट लेने दूं। आज मैंने उन्हें तार<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> भेजा है। यदि मुझे तुम्हारा उत्तर तुरन्त न मिला, तो तुम्हें अपने अन्तिम उत्तरके यहाँ मिलनेके बादसे एक पखवाड़े तकका समय देना पड़ेगा। {{right|हृदयसे तुम्हारा,<br> {{larger|बापू}}}} {{left|श्रीयुत ना॰ र॰ मलकानी पीपल्स फ्लड रिलीफ कमेटी हैदराबाद (सिन्ध)}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ९५१) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''१८८. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको'''}}}} {{right|३० मार्च, १९२८}} मैंने आपके समुद्री तारका उत्तर दे दिया है। अभीतक कुछ निश्चित नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए, यह बात मेरे अपने मनमें स्पष्ट नहीं है। मैं एम॰ रोमाँ रोलाॅंसे पत्र–व्यवहार कर रहा। मुझे उनके अन्तिम उत्तरसे किसी निश्चयपर पहुँचनेमें सहायता मिलेगी। यदि यूरोपकी यात्राका निश्चय हो जाये और यदि मैं समयपर पहुँच जाऊँ तो मुझे समारोह का उद्घाटन<ref>७ जुलाईको; हस्तकला कक्षका उद्घाटन।</ref> करनेमें प्रसन्नता होगी। परन्तु जहाँतक मैं समझ सकता हूँ, मैं सम्भवतः समयपर नहीं पहुँच सकता। यदि भारत छोड़ना सम्भव हुआ भी तो मईसे पहले भारतसे निकलनेकी कोई गुंजाइश नहीं दिखाई देती। इसलिए मेरा सुझाव है कि आप कोई दूसरा प्रबन्ध कर लें।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 65rwc3f492hs622tcpahed6hmeovtbm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०९ 250 187048 675387 673314 2026-08-30T17:46:16Z आदेश यादव 3609 675387 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||मोक्षदाता राम|१७७}}</noinclude>&nbsp; रामनवमीका पर्व इसीलिए मनाया गया कि इसके निमित्त हम कुछ संयमका पालन करें, लड़के कुछ निर्दोष आनन्द लें और 'रामायण' पढ़कर कुछ सीखें। देहधारी मनुष्य परमेश्वरको दूसरे तरीकेसे सहज ही नहीं पहचान सकता। उसकी कल्पना अधिक दूर नहीं दौड़ सकती और इसलिए वह मानता है कि परमेश्वरने मनुष्यके रूपमें अवतार लिया था। हिन्दू धर्ममें उदारताका पार नहीं है। इसलिए वर्णन किया है कि परमेश्वरने मछली के रूप में वराहके रूपमें और नरसिंहके रूपमें अवतार लिया था। यों मनुष्यने देहाध्याससे ईश्वरकी कल्पना देहधारीके रूपमें की है और जब तब उसके अवतार लेनेकी कल्पना की है। कहा है कि जब धर्मका पतन हो और अधर्म फैल जाये तो ईश्वर धर्मकी रक्षा करनेके लिए अवतार लेता है। यह बात भी उसी तरह और उतनी ही हद तक सच्ची है, जितनी मैंने कही है। नहीं तो अजन्माका अवतार ही कैसा? यह मानने का कोई कारण नहीं है कि कोई ऐतिहासिक पुरुष ईश्वरके रूपमें या ईश्वर किसी ऐतिहासिक पुरुषके रूपमें अवतार लेता है। ईश्वरके सभी गुण किसी मनुष्यमें हों तो यह माना जाता है कि ईश्वरने अवतार लिया। जो–जो महापुरुष हो गये हैं, उनके गुण देखकर मनुष्योंने उन्हें पूर्ण अथवा अंशावतार माना। और यह जानते हुए भी बाल्मीकिके या तुलसीदासके रामके निमित्तसे विभिन्न उपासक अपने ही भगवान्की महिमा गाते हैं। उनके उस भावनासे पूर्ण भजनोंको गाने में कोई दोष नहीं है। किन्तु मैंने जो बात पहले कही है आप उसे याद रखें तो भ्रमजालमें पड़नेका कोई कारण न रहे। हमारे सामने अगर कोई शंकाएँ रखकर हमें उलझनमें डालना चाहे तो उसे कहें कि हम किसी देहधारी रामकी पूजा नहीं करते हैं। हम तो अपने निरंजन, निराकार रामको पूजते हैं। हम उसके पास सीधे नहीं पहुँच सकते, इसलिए जिनमें ईश्वरकी मूर्तिमन्त कल्पना की गई है, उन भजनोंको गाते हैं। जबतक हम देहकी दीवारके पार नहीं देख सकते, तबतक सत्य और अहिंसा के गुण हममें पूरे–पूरे प्रकट होनेवाले नहीं हैं। जब सत्यके पालनका विचार करें तब देहाध्यास छोड़ना ही चाहिए, क्योंकि सत्यके पालनके लिए मरना जरूरी होगा। अहिंसाकी भी यही बात है। देह तो अभिमानका मूल है। देहके बारेमें जिसका मोह बना हुआ है, वह अभिमानसे मुक्त हो ही नहीं सकता। जबतक मेरे मन में यह विचार है कि देह मेरी है, तबतक मैं सर्वथा हिंसामुक्त हो ही नहीं सकता हूँ। जिसकी अभिलाषा ईश्वरको देखनेकी है, उसे देहके पार जाना पड़ेगा, अपनी देहका तिरस्कार करना पड़ेगा, मौतसे भेंट करनी पड़ेगी। जब ये दो गुण मिलें तभी हम तर सकेंगे। ब्रह्मचर्यादिका पालन कर सकेंगे। अगर उनका पालन करना चाहें तो सत्यके बिना कैसे चलेगा? सत्यका मुख तो सुवर्णमय पात्रसे<ref>ईशोपनिषद, ५-१५।</ref> ढँका हुआ है। सत्य बोलने, सत्यके आचरण करनेका डर क्यों हो? असत्यरूपी चमकीला ढक्कन जबतक दूर न करें तबतक सत्यकी झाँकी क्योंकर होगी? कोई कसूर करे तो उस पर क्रोध करनेके बदले प्रेम करना क्या हमें रुचता है, हम संसारको असार कहकर गाते हैं सही, मगर क्या उसे असार समझते भी हैं?<noinclude>{{smallrefs}} {{left|३६—१२}}</noinclude> 7av9kf4rqg54144pdu5ueiz5mb3cnae पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१२ 250 187051 675391 673659 2026-08-30T17:48:29Z आदेश यादव 3609 675391 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१९३. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ३१ मार्च, १९२८}} {{left|प्रिय शान्तिकुमार,}} आपका पत्र मिला। वे शर्तें जो मेरी समझमें मिल–मालिकोंको मान लेनी चाहिए, निम्नलिखित हैं : (१) कीमतोंका नियमन सब हितोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली विशेष समिति द्वारा किया जाना चाहिए। (२) किस किस्मका और कितना उत्पादन हो, इसकी व्यवस्था भी उसी समिति द्वारा की जानी चाहिए। (३) मिलें खादीके नामपर बना कोई भी मिलका कपड़ा बेचना बन्द कर दें। वे शर्तोंके स्वीकार करनेकी तारीखसे ज्यादासे ज्यादा तीन महीनोंके अन्दर ऐसा कोई भी कपड़ा बनाना भी बन्द कर दें जो खादीसे मुकाबला कर सके और इस उद्देश्यसे समिति समय–समयपर यह निश्चय करती रहेगी कि मिलोंको कैसा कपड़ा नहीं बनाना चाहिए। (४) मिलें केवल मिल–कपड़े विक्रय ही का प्रबन्ध नहीं करेंगी परन्तु वे इस प्रकारसे चलाई गई एजेंसियों द्वारा खादी भी बेचेंगी। (५) मिलें विदेशी सूत, विदेशी रेशम, विदेशी ऊन और नकली रेशम इस्तेमाल नहीं करेंगी। (६) मिलें विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलनसे पूरी तरह एकात्मता स्थापित कर लेंगी और इस उद्देश्यके लिए कपड़ा व्यापारियों, दूसरे दलालों और रूईके बाजार पर जहाँतक हो सकेगा अधिकार प्राप्त करनेमें अपनी पूरी शक्ति लगायेंगी। (७) यदि मिलोंके साथ स्पष्ट समझौता हो जाये तो खादी भण्डार स्वाभाविक रूपसे, उक्त समिति द्वारा नियत शर्तोंके आधार पर मिल कपड़ेकी विक्रीकी एजेंसियाँ बन जायेंगे। (८) मिलें उस समितिको वह निधि सौंप दें, जिसकी समय–समय पर प्रचारके लिए आवश्यकता पड़ती रहेगी। मेरे विचारमें यह रकम एक लाख रुपयेसे ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यह पत्र जल्दीमें लिखवाया जा रहा है। इसलिए यदि इन शर्तोंमें कोई कमी रह गई हो तो उसे आप कृपया 'यंग इंडिया' के दो अंकोंमें<ref>देखिए "हमारी मिले क्या कर सकती है?" १५-३-१९२८ और "विदेशी–वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न", २२-३-१९२८।</ref> बताई गई शर्तोंसे पूरा<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> a08j4yavdor9alyj5937gx3hvbulzqj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२३ 250 187062 675400 673696 2026-08-30T17:53:24Z आदेश यादव 3609 675400 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२०८. पत्र : रामी गांधीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> ३ अप्रैल, १९२८}} {{left|चि॰ रामी,}} तुम्हारा पत्र मिला। इस बार तुम्हारे अक्षर सुन्दर नहीं कहे जा सकते। पंक्तियाँ टेढ़ी हैं। कुसुमका स्वास्थ्य सुधरना चाहिए। राष्ट्रीय सप्ताहमें खादी के लिए विशेष कामका प्रयत्न करना। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (एस॰ एन॰ ९७०७) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२०९. पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ४ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मलकानी,}} तुम्हारा तार मिला। मैं जयसुखलाल गांधीको नहीं लेकिन मथुरादासको, जो यह पत्र ला रहे हैं, भेज रहा हूँ। सम्भवतः वे इस कामके लिए ज्यादा उपयुक्त हैं, क्योंकि उनका अंग्रेजीका ज्ञान ज्यादा अच्छा है और कच्छ–निवासी होनेके कारण वह वहाँके बहुतसे लोगोंकी भाषा और आदतोंको जानते हैं। निस्सन्देह वह मंजे हुए कार्यकर्त्ता हैं। वह इधर कई सालोंसे खादीका काम करते आ रहे हैं और उन्हें कपड़ेके व्यापारका विस्तृत ज्ञान है। उनका जन्म और पालन–पोषण मलाबारमें हुआ है। वास्तवमें वह लक्ष्मीदासके साथ आये थे। अभी–अभी उन्हें विद्यापीठमें चरखेका काम बढ़ाने के लिए काका साहबने ले लिया है। इसलिए वह तुम्हें विद्यापीठसे कुछ समयके लिए दिये जा रहे हैं। उनका मानदेय विद्यापीठसे दिया जायेगा। फिलहाल उनकी यात्राका खर्च तुम्हारे खातेमें से अर्थात् समितिके खातेसे दिया जा रहा है। परन्तु यदि रेल–यात्राके खर्चेकी अदायगीमें कोई कठिनाई हो, तो तुम मुझे बताना। मैं ऐसा मानता हूँ कि तुम उन्हें १५ मईके बाद नहीं रखना चाहोगे। यदि उसके बाद भी तुम्हें किसी व्यक्तिकी जरूरत हो, तो मुझे कोई दूसरा आदमी भेजना पड़ेगा, क्योंकि<noinclude></noinclude> rbb7v85dnnv6ye6jywx87n3vaeqq55z पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२५ 250 187064 675401 673702 2026-08-30T17:54:47Z आदेश यादव 3609 675401 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२१०. पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ४ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय राजन्,}} आपने मुझसे बड़ा कठिन प्रश्न पूछा। परन्तु आपकी पूरी दलीलपर बड़े ध्यानसे गौर करनेके बाद मेरा यह मत है कि फैलोशिपसे सम्बन्धित तमाम अवधिके कामके लिए आपको मानदेय स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि आपका ध्यान दो न्यासोंके बीच बटा रहा, तो आप इसमें अपना चित्त नहीं लगा सकेंगे। एक या दूसरेकी या दोनोंकी हानि ही होगी, विशेष कर जब दोनोंमें अक्सर संघर्ष होनेकी सम्भावना हो। इस सिद्धान्तके आधारपर कि मजदूरको उसकी मजदूरी मिलनी चाहिए, अपने फैलोशिपके कामके लिए आपके मानदेय स्वीकार कर लेनेमें मुझे कोई नैतिक आपत्ति नहीं दिखती। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत ए॰ ए॰ पॉल<br> ७ मिलर रोड<br> किल्पॉक<br> मद्रास}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६०) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{left|३६—१३}}</noinclude> 1kkl40c3qkp9xye406ldvgu8s5757tk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२९ 250 187068 675403 673752 2026-08-30T17:57:04Z आदेश यादव 3609 675403 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२१४. अछूतोंको याद रखो'''}}}} इस अंक के प्रकाशित होनेके बाद दो दिनोंके भीतर राष्ट्रीय सप्ताह आ जायेगा। आत्मशुद्धिकी प्रक्रियामें हम किसी समय शराब–ताड़ीकी दुकानों पर धरना देते थे। कोयम्बटूरकी आदि द्राविड़ सभाके सदस्यों द्वारा दिये गये मानपत्रके इस अंश<ref>केवल कुछ अंश ही यहां दिये जा रहे हैं।</ref> को पढ़ते समय मेरे मनमें (सन् १९२१ के) उसी जमानेकी याद हो आती है : :{{gap}}'''...मगर पुरानी हालत जरा भी नहीं बदली है। दूसरे हिन्दू हमारी आत्मासे भी घृणा करते हैं। यहाँ तक कि हम लोग मन्दिरोंमें परमात्माकी पूजा भी नहीं कर पाते। ...हमारे लिये गिरजाघरों और मस्जिदोंके दरवाजे बराबर खुले हैं और उनकी देखरेख करनेवाले मिशनरी हमारा खुले दिलसे स्वागत करते हैं। हम लोगोंके रहने की जगहों, 'चेरियों' के भीतर ही या उनके निकट शराब की दुकानें खोलकर सरकार हमारे नवयुवकोंको प्रलोभनमें डालती है। अगर इन दुकानोंके बदले उद्योगशालाएँ खुल जायें, और आबकारी ठेकेदारोंके बदले समाज–सेवक लोग हमपर कृपादृष्टि डालें, तो हमें जरा भी शक नहीं है कि हमारी दशा बहुत थोड़े ही समयमें सुधर जायेगी। इसलिए हम आपसे हार्दिक आग्रह करते हैं कि आप हमारी जातिको सर्वनाशसे बचानेके लिए हमारी चेरियोंके भीतर या उनके निकट औद्योगिक शालाएँ खुलवानेमें मदद करें।''' राष्ट्रीय सप्ताहमें हमें इस बातपर विचार करनेकी जरूरत नहीं है कि सरकारने क्या किया है और क्या नहीं किया है। किन्तु हमें इसपर जरूर विचार करता है कि हमने क्या किया है और क्या कुछ और कर सकते हैं। इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि अस्पृश्यताके विरुद्ध लोकमत दिनों–दिन बढ़ता जा रहा है, फिर भी उस दिशामें सार्वजनिक प्रयत्न अभी निर्बल ही हैं। अभी तक हम पुजारियोंको दलित वर्गोंके लिए सार्वजनिक मन्दिरोंके दरवाजे खोलनेके लिए भी राजी नहीं कर सके हैं, और न एक भी शराब या ताड़ीकी दुकानके बदले औद्योगिक शाला या ऐसा जलपान–गृह खोल सके हैं, जहाँपर उन्हें उस गर्म, उत्तेजक शराबके बदले पौष्टिक पेय और स्वच्छ परिस्थितियोंमें स्वास्थ्यकर वस्तुएँ खानेको मिल सकें। :[अंग्रेजी से] :'''यंग इंडिया''' ५-४-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 4a00037iof8njp25nkgs12cjt09d8nd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३४ 250 187073 675404 673912 2026-08-30T17:58:41Z आदेश यादव 3609 675404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ही करना चाहिए — वह है विदेशी सूत और कपड़ा; इसे हमारी जनता अपनी झोंपड़ियोंमें स्वयं कात और बुन सकती है। स्वदेशी मिलोंका कपड़ा भी अगर इस जनताको दूसरा ऐसा ही काम दिये बिना उनकी रोजी छीन ले, तो हम उसे भी सहन न करें। राष्ट्रीय जीवनकी अर्थ–व्यवस्थामें मिलोंका इतना ही स्थान है कि वे करोड़ों घरोंमें चलनेवाले हाथ–कताईके हमारे राष्ट्रीय उद्योगके शेष कामकी पूर्ति करें। मिलें अगर उन्हींसे मुकाबला करने लगें और उनकी जगह लेने लगें, तो वे बाधा–स्वरूप बन जायेंगी। उनकी स्वाभाविक प्रकृति तो गाँव कतैयों और बुनकरोंकी जगह ले लेनेकी ही है। मिल–मालिक, मिल–एजेंट और उनके हिस्सेदार जिस दिन सच्चे अर्थोंमें राष्ट्रीय बन जायेंगे और जनताको लूटनेके लिए नहीं, बल्कि उनके हितको पहला और अपने लाभको दूसरा स्थान देकर अपना धन्धा चलायेंगे, उसी दिन वे बहिष्कार आन्दोलनका अर्थ समझ सकेंगे और तब उसमें वे न सिर्फ शरीक ही हो सकेंगे बल्कि उस आन्दोलनका नेतृत्व करेंगे। यह तो ऊपरके पत्रमें स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर वे दूरदर्शितासे काम लें तो उन्हें हानि तो कुछ होगी नहीं, लाभ बहुत कुछ होगा। सचमुचमें यह एक स्वयं–सिद्ध बात है। विदेशी कपड़ेके बहिष्कारसे अगर जनताको निरन्तर काम मिलते जाना निश्चित हो जाता है तो उससे आगे चलकर मिलोंको भी लाभ होना निश्चित हो जाता है। मगर कमसे–कम पिछले सात सालोंमें जन आन्दोलन के दौरान मिल–व्यवसायके इतिहासको देखनेसे तो यह आशा बहुत नहीं बँधती कि मिलें अवसर पड़नेपर सही काम कर दिखलायेंगी और राष्ट्रके प्रति अपना कर्तव्य समझेंगी। चाहिए तो यह था कि वे खादीपर स्नेह–दृष्टि रखतीं और उसका पोषण करतीं और हुआ यह है कि वे खादीके साथ अनुचित, देश–द्रोहपूर्ण और अवैध प्रतियोगिता करने लगी हैं। पिछले वर्षोंमें हमारी मिलोंने क्रमश: इतनी 'खादी' बनाई : :{|width=100% |- | || १९२५ || १९२६ || १९२७ || |- |पौण्ड || २,२८,८७,९७० || २,७२,३६,३३७ || ३,३९,७७,८५१ || |- |गज|| ६,५०,४८,४८७ || ७,४३,१३,२८० || ९,४३,८०,३६८ || |} इतना अधिक मोटा कपड़ा उन्होंने खद्दरके नामपर बेचा है और कुछने तो कांग्रेस संस्थाओं द्वारा तैयार किये गये खादीके अनुकूल वातावरणसे जान बूझकर लाभ उठानेके लिए बेशर्मी से चरखेकी छाप आदिका भी उपयोग किया है। यह कहते हुए कष्ट होता है कि जिन मिलोंने इस तरहका मोटा कपड़ा बनाकर उसे खद्दरके नामपर बेचा, उन्होंने स्पष्ट देश–द्रोह किया है। अगर उनकी आँखें अब भी खुल जायें और राष्ट्रका उन्होंने जो अहित किया है उसका मुआवजा देनेके लिए ही मिल–मालिक मेरी या दूसरोंकी सुझाई हुई उतनी ही प्रभावपूर्ण शर्तोंपर बहिष्कार आन्दोलनके अगुआ बनें या कमसे–कम उसमें शरीक हों तो क्या ही अच्छा हो।<noinclude></noinclude> pi29wqvzu1c22joh3de6cbcd7o6zvh7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३६ 250 187075 675406 673918 2026-08-30T18:00:27Z आदेश यादव 3609 675406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> व्यक्त करनेपर हम उनका खण्डन कर सकने योग्य नहीं रह जायेंगे। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि दक्षिण आफ्रिकाके गोरे अपनी नफरत और पक्षपातको कार्यरूपमें परिणत कर सकते हैं, जब कि दक्षिण आफ्रिकी लोगोंके प्रति हमारे ये विचार हमारे लिये ही प्रतिकूल पड़ेंगे। {{c|'''स्त्रियाँ और गहने'''}} तमिलनाडसे एक महिला डाक्टरने मुझे एक पत्र तथा साथमें उल्लेखसहित (गहनोंका) उपहार भेजा है। चूंकि मेरी रायमें उपहारके साथके पत्रसे भेंटका महत्व बढ़ जाता है और वह पत्र चूँकि दूसरोंके लिए उदाहरणका काम करेगा, इसलिए उपहार देनेवाले, सम्बन्धित राजा और स्थानका नाम दिये बिना मैं पत्रका सारांश नीचे देता हूँ : :{{gap}}मैं ये चन्द पंक्तियाँ आपको सिर्फ यह बतानेके लिए लिख रही हूँ कि कल मैंने आपकी सेवामें एक जोड़ी कानकी बालियाँ और हीरेकी जो एक अँगूठी भेजी थी, सो मुझे १२ वर्ष हुए राजमहलमें महाराजासाहबके उत्तराधिकारीके जन्मके अवसरपर की गई सेवाके स्मृति चिह्न के रूपमें मिली थीं। जब मुझे यह मालूम हुआ कि आपके यहाँसे गुजरते समय महाराजा साहबने सरकारके डरसे आपको अपने यहाँ निमन्त्रण तक देनेका साहस नहीं किया, तो मुझे बहुत दु:ख हुआ। आप कल्पना कर सकते हैं कि पहले जो गहने मेरे साथ ही रहते थे, उन्हें इस तरह आपके चले जानेके बाद पास देखकर मेरे मनमें क्या भावनाएँ उठी होंगी। तब उन्हें देखकर मेरे दिलमें कड़वाहट भर गई, फिर उन भूखे करोड़ों लोगोंके प्रति गहरी सहानुभूति होने लगी, जिनके बारेमें आपने अपने भाषणमें यहाँपर चर्चाकी थी। मैंने मन ही मन कहा, "क्या ये गहने लोगोंके ही धनसे नहीं बने हैं? तब उन्हें अपने मानकर रखे रहने का मुझे क्या अधिकार है?" और ऐसा सोचकर मैंने उन्हें आपके पास भेज देनेका निश्चय किया है। खादी कार्यके लिए आप उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। और इस तरह करोड़ों भूखों मरनेवालोंमें से कुछकी मदद कर सकते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे सन्दूकके एक कोने में पड़े रहनेकी बनिस्बत उनका यह ज्यादा अच्छा उपयोग है। एक मित्रने उनकी कीमत ५०० रु॰ आँकी है। इसलिए ५०० रु॰ के लिए उनका बीमा कराया गया है। मैं आशा करती हूँ कि कोई उदार सज्जन, उस परिस्थितिको समझकर, जिसमें कि ये गहने आपके पास भेजे जा रहे हैं, आपको उनकी असली कीमतसे अधिक देंगे। आप इस पत्रका जो भी उपयोग करना चाहें, कर सकते हैं।}} यह भी अचरजकी बात है कि भयका कोई कारण न होते हुए भी हम किस तरह भयकी कल्पना कर लिया करते हैं। कितने राजाओं, महाराजाओंने खुल्लमखुल्ला और खुशीसे खादीका और उसकी मार्फत जैसा कि पत्र–लेखिकाने भी लिखा है और ठीक लिखा है, उन गरीबोंके हितका समर्थन किया है, जिनसे उन्हें आखिरकार<noinclude></noinclude> n3or2cd8al42wrm9lb1s6noe5byhwaa पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४१ 250 187080 675408 674029 2026-08-30T18:03:02Z आदेश यादव 3609 675408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२२५. पत्र : सरदारनी एम॰ एम॰ सिंहको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ६ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} आपका पत्र मिला। ऐसे लोगोंको आश्रममें लेनेका आम तौरपर प्रचलन नहीं है, जो किसी भी सदस्यके परिचित न हों। इसलिए मैं चाहूँगा कि यदि आप सचमुच आश्रममें रहना चाहती हैं, तो अपना सारा हवाला देते हुए प्रबन्धक–मण्डलके सचिवको पत्र लिखें। मैं आपको यह भी सूचना दे दूँ कि फिलहाल आश्रम बहुत ज्यादा भरा हुआ है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|सरदारनी एम॰ एम॰ सिंह<br> अपटन हाउस<br> न्यू कैंट रोड<br> देहरादून}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६३) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{larger|'''२२६. पत्र : एम॰ दीवान नारायणदासको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ६ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। यदि मानवीय सम्बन्ध गणितके नियमोंके अनुसार चलते होते तो जो आप सुझा रहे हैं, ठीक होता। परन्तु जैसे तीस बारका खाना दस बारमें खा लेनेका वही फल नहीं होगा जो तीस बारके खानेको नियमित रूपसे एक–एक दिन करके खाये जानेपर होगा, इसी तरह यदि छः महीनेकी कताई पन्द्रह दिनोंमें की जाये तो उससे काम नहीं चलेगा। भाव यह है कि व्यक्तिकी लगन और अनुशासनकी शक्तियोंका परीक्षण किया जाये।<noinclude> :३६—१४</noinclude> tmbhwj9h9jjq72celcnmf3evpmdvd47 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४९ 250 187088 675412 674089 2026-08-30T18:04:53Z आदेश यादव 3609 675412 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२३७. पत्र : श्रीमती सेम हिगिनबॉटमको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ७ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} यह आपका सौजन्य है कि आपने अपने पतिके<ref>देखिए "पत्र : सेम हिगिनवटमको", २८-३-१९२८।</ref> नामपर भेजी गई पूछताछका इतनी जल्दी उत्तर दे दिया। जब आप उन्हें पत्र लिखें, कृपया उन्हें मेरा नमस्कार लिखिएगा। मेरी प्रस्तावित यूरोप यात्राके सम्बन्धमें अभी कुछ निश्चित नहीं है। परन्तु यदि मैं गया भी तो समझ नहीं पाता कि उन चन्द महीनों में जो मैं इस यात्रामें लगा सकता हूँ, यूरोप और अमेरिका दोनोंकी यात्रा कैसे कर सकूँगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीमती सेम हिगिनबॉटम<br> इलाहाबाद कृषि संस्थान<br> इलाहाबाद}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७१) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२३८. पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ७ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय राजन,}} 'न्यूज शीट'<ref>अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुस्व सम्बन्धी समाचार–पत्र।</ref> के मई महीनेके अंकके लिए मेरा सन्देश<ref>देखिए अगला शीर्षक</ref> पत्रके साथ है। यदि मैंने प्रत्येक अंकके लिए सन्देश देना स्वीकार किया हो, तो मैं तब जरूर ही नशेकी हालतमें रहा होऊँगा, और ऐसी हालतमें किये गये वायदोंकी कोई कीमत नहीं होती। मुझे बिलकुल पता नहीं था कि जोजेफ के बहनोईकी मृत्यु हो गई है। जो आपने मुझे यह सूचना दी वह ठीक ही किया।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> jdr0csfd1pzqh9rsdz8kzu6cvobfik9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६१ 250 187100 675416 674456 2026-08-30T18:08:31Z आदेश यादव 3609 675416 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||एक समयानुकूल किताब|२२९}}</noinclude> निकाले हैं। इसके प्रकाशक हैं एस॰ गणेशन, १८ पाइक्राफ्ट्स रोड, ट्रिप्लिकेन, मद्रास। कीमत है १।।) रु॰ । कुल २२५ पृष्ठ हैं, जिनमें पृष्ठ १६५ से लेकर पृष्ठ २२५ तक सात परिशिष्ट हैं। किताबमें कुल १२ अध्याय हैं। पाठक यह भी समझ लें कि श्री ग्रेग भारतीय गाँवोंके बारेमें जो कुछ लिखते हैं, थोड़ा–बहुत आप देखा लिखते हैं। प्रस्तावनाके पहले तीन अनुच्छेदोंसे पाठकों को पता चल जायेगा कि श्री ग्रेगने किस तरहसे पुस्तक तैयार की है<ref>उपर्युक्त अनुच्छेद यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं ग्रेग्रने उनमें लिखा था कि "पहले जमानेमें हिन्दुस्तान बहुत ही धनी देश समझा जाता था। कमसे–कम मुसलमानोंके आक्रमणके पहले तक तो देशका धन लोगोंमें सम्यक रूपसे बँटा हुआ था। लेकिन यद्यपि हिन्दुस्तान अब भी धनका निधान समझा जाता है, हिन्दुस्तानके बाशिन्दे दुनियाके दरिद्र लोगोंमें गिने जाते हैं, जैसा कि मद्रास विश्वविद्यालयके प्राध्यापक गिलबर्ड स्लेटर कहते हैं कि भारतवर्षकी कंगाली एक भयानक तथ्य है।"</ref> :— इसी गरीबीको दूर करनेके लिए श्री ग्रेगने इस उद्देश्यसे तैयार की गई विविध योजनाओंकी परीक्षा की और अन्तमें उन्हें लाचार होकर इसी निष्कर्ष पर आना पड़ा कि चरखा ही इसका एकमात्र सच्चा उपाय है। लेखक कहते हैं :<ref>केवल कुछ अंश यहाँ दिया जा रहा है।</ref> :{{gap}}'''इस छोटी–सी किताबमें यही दिया गया है कि मेरे जैसे आदमीको, जिसे अमेरिकाकी औद्योगिक और मजदूरोंसे सम्बंन्धित समस्याओंका ७ वर्षका व्यवहारिक ज्ञान है (जिसमें अधिकांश कपड़ेकी मिलोंका ही है) और साथ ही जिसने हिन्दुस्तानमें खद्दर आन्दोलनका ढाई वर्ष तक अध्ययन किया है, और वह भी गाँवोंमें तथा आन्दोलनके मुख्य केन्द्रमें, यह योजना कैसी जान पड़ती है। मुख्यतः अपने ही विचारोंको ठीकसे समझ लेनेके लिए यह खोज शुरू की गई थी।'''}} श्री ग्रेग द्वारा समस्याके अध्ययनकी नवीनता यही है कि उन्होंनें यन्त्र शास्त्रके पहलूको ध्यानमें रखते हुए समस्या पर विचार किया है। पुस्तकके प्रथम अध्यायका शीर्षक भी यही है। उन्हें यह साबित करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई है कि किसी भी देशकी भौतिक उन्नति केवल विद्युत या यन्त्र शक्ति अथवा मशीनें संचित कर लेनेसे ही नहीं, बल्कि उनके सही इस्तेमालसे होती है। वे अपनी दलील यों शुरू करते हैं :<ref>यह उद्धरण यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसके मूलके लिए देखिए हमारा अंग्रेजी खंड ३६।</ref> अब दूसरे अध्यायोंसे उद्धरण देनेका लोभ तो मुझे संवरण करना ही पड़ेगा। मगर ऊपर दिये गये उद्धरण अगर पाठकको जरा भी रुचिकर लगे हों तो मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आगेके अध्याय नितान्त रोचक और बहुत ही शिक्षा–प्रद हैं। अब मैं शेष ११ अध्यायोंके शीर्षक देकर जल्दबाजीमें लिखी गई यह समालोचना समाप्त करता हूँ। इतना तो सभी मानेंगे कि शीर्षक काफी व्यंजना–पूर्ण हैं।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> sjr48duiff5x81bx0xgtslfzowyuzgu 675417 675416 2026-08-30T18:08:43Z आदेश यादव 3609 675417 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||एक समयानुकूल किताब|२२९}}</noinclude> निकाले हैं। इसके प्रकाशक हैं एस॰ गणेशन, १८ पाइक्राफ्ट्स रोड, ट्रिप्लिकेन, मद्रास। कीमत है १।।) रु॰ । कुल २२५ पृष्ठ हैं, जिनमें पृष्ठ १६५ से लेकर पृष्ठ २२५ तक सात परिशिष्ट हैं। किताबमें कुल १२ अध्याय हैं। पाठक यह भी समझ लें कि श्री ग्रेग भारतीय गाँवोंके बारेमें जो कुछ लिखते हैं, थोड़ा–बहुत आप देखा लिखते हैं। प्रस्तावनाके पहले तीन अनुच्छेदोंसे पाठकों को पता चल जायेगा कि श्री ग्रेगने किस तरहसे पुस्तक तैयार की है<ref>उपर्युक्त अनुच्छेद यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं ग्रेग्रने उनमें लिखा था कि "पहले जमानेमें हिन्दुस्तान बहुत ही धनी देश समझा जाता था। कमसे–कम मुसलमानोंके आक्रमणके पहले तक तो देशका धन लोगोंमें सम्यक रूपसे बँटा हुआ था। लेकिन यद्यपि हिन्दुस्तान अब भी धनका निधान समझा जाता है, हिन्दुस्तानके बाशिन्दे दुनियाके दरिद्र लोगोंमें गिने जाते हैं, जैसा कि मद्रास विश्वविद्यालयके प्राध्यापक गिलबर्ड स्लेटर कहते हैं कि भारतवर्षकी कंगाली एक भयानक तथ्य है।"</ref> :— इसी गरीबीको दूर करनेके लिए श्री ग्रेगने इस उद्देश्यसे तैयार की गई विविध योजनाओंकी परीक्षा की और अन्तमें उन्हें लाचार होकर इसी निष्कर्ष पर आना पड़ा कि चरखा ही इसका एकमात्र सच्चा उपाय है। लेखक कहते हैं :<ref>केवल कुछ अंश यहाँ दिया जा रहा है।</ref> :{{gap}}'''इस छोटी–सी किताबमें यही दिया गया है कि मेरे जैसे आदमीको, जिसे अमेरिकाकी औद्योगिक और मजदूरोंसे सम्बंन्धित समस्याओंका ७ वर्षका व्यवहारिक ज्ञान है (जिसमें अधिकांश कपड़ेकी मिलोंका ही है) और साथ ही जिसने हिन्दुस्तानमें खद्दर आन्दोलनका ढाई वर्ष तक अध्ययन किया है, और वह भी गाँवोंमें तथा आन्दोलनके मुख्य केन्द्रमें, यह योजना कैसी जान पड़ती है। मुख्यतः अपने ही विचारोंको ठीकसे समझ लेनेके लिए यह खोज शुरू की गई थी।''' श्री ग्रेग द्वारा समस्याके अध्ययनकी नवीनता यही है कि उन्होंनें यन्त्र शास्त्रके पहलूको ध्यानमें रखते हुए समस्या पर विचार किया है। पुस्तकके प्रथम अध्यायका शीर्षक भी यही है। उन्हें यह साबित करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई है कि किसी भी देशकी भौतिक उन्नति केवल विद्युत या यन्त्र शक्ति अथवा मशीनें संचित कर लेनेसे ही नहीं, बल्कि उनके सही इस्तेमालसे होती है। वे अपनी दलील यों शुरू करते हैं :<ref>यह उद्धरण यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसके मूलके लिए देखिए हमारा अंग्रेजी खंड ३६।</ref> अब दूसरे अध्यायोंसे उद्धरण देनेका लोभ तो मुझे संवरण करना ही पड़ेगा। मगर ऊपर दिये गये उद्धरण अगर पाठकको जरा भी रुचिकर लगे हों तो मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आगेके अध्याय नितान्त रोचक और बहुत ही शिक्षा–प्रद हैं। अब मैं शेष ११ अध्यायोंके शीर्षक देकर जल्दबाजीमें लिखी गई यह समालोचना समाप्त करता हूँ। इतना तो सभी मानेंगे कि शीर्षक काफी व्यंजना–पूर्ण हैं।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> jpc97ozql4kbpligep4jnct4awb10eg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२८१ 250 187120 675419 674759 2026-08-30T18:12:44Z आदेश यादव 3609 675419 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२७६. पत्र : उ॰ राजगोपाल कृष्णैयाको'''}}}} {{right|१६ अप्रैल, १९२८}} {{left|भाई राजगोपाल,}} भगवान सर्व शक्तिमान होनेके कारण सब कुछ कर सकता है। हिंसाका उत्तर हिंसासे नहीं होना चाहिये। महाभारतका अैतिहासिक अर्थ करनेसे धर्मका ज्ञान नहीं मिल सकता। और 'महाभारत' इतिहास तो है ही नहीं। {{right|आपका,<br> {{larger|मोहनदास गांधी}}}} सी॰ डब्ल्यू॰ ९२३८ से। सौजन्य : उ॰ राजगोपाल कृष्णैया {{c|{{larger|'''२७७. तार : राजेन्द्रप्रसादको'''}}}} {{right|[१६ अप्रैल, १९२८ या उसके पश्चात्]<ref>यह समुद्री तार १६ अप्रैलको प्राप्त समुद्री तारके उतरमें भेजा गया था, जिसमें युवक सम्मेलनके लिए सन्देश माँगा गया था।</ref>}} {{left|राजेन्द्रप्रसाद<br> जयवती<br> लन्दन<br> सम्मेलन सफल हो।}} {{right|'''गांधी'''}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३८१) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> jdr6g65759vc8bi7agfrvsluijv9ajh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३ 250 187435 675262 675207 2026-08-30T13:59:40Z रितु कुमारी साव 6333 675262 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || तेरह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || पन्द्रह |- | १. || पत्र : लालचन्द जयचन्द वोराको ||(२१-१-१९२७) || १ |- | २. || भाषण : मोतीहारीमें || (२२-१-१९२७) || २ |- | ३. || पत्र : वल्लभभाई पटेलको || (२३-१-१९२७) || २ |- | ४. || भाषण : बेतियामें || (२३-१-१९२७) || ३ |- | ५. || पत्र : मीराबहनको || (२४-१-१९२७) || ५ |- | ६. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको ||(२४-१-१९२७) || ६ |- | ७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको || (२४-१-१९२७) || ७ |- | ८. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (२४-१-१९२७) || ८ |- |९. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको || (२४-१-१९२७) || ९ |- | १०. || प्रश्नोंके उत्तर || (२४-१-१९२७ के पश्चात् ) || १० |- | ११. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (२५-१-१९२७) || ११ |- | १२. || भेंट : 'फ्री प्रेस ऑफ इंडिया' के प्रतिनिधिसे || ( २५-१-१९२७) || १२ |- | १३.|| भाषण : मुजफ्फरपुरके मिशन स्कूलमें || ( २५-१-१९२७) || १२ |- | १४. || भाषण : मुजफ्फरपुरके तिलक मैदानमें || ( २५-१-१९२७) || १३ |- | १५. || भाषण : मुजफ्फरपुरके विद्यार्थियोंकी सभायें || (२५-१-१९२७) || १६ |- | १६.|| भाषण : बेगुसरायकी सार्वजनिक सभामें || (२६-१-१९२७) || १९ |- | १७. || राष्ट्रीय शालाएँ || (२७-१-१९२७) || २१ |- | १८. || टिप्पणियाँ: एक भली अंग्रेज महिला; अस्पतालोंमें खादी; खादी कार्य-कर्त्ताओंसे बिना ज्ञानके समझना || ( २७-१-१९२७) || २३ |- , | १९. || भाषण : खड़गपुरमें || (२७-१-१९२७) || १५ |- | २०. || भाषण : जमुईमें || ( २७-१-१९२७) || २७ |- | २१. || सम्मति: वनिता विश्राम, शाहबादकी दर्शक पुस्तिकामें || (२८-१-१९२७) || २८ |- | २२. || दीक्षान्त भाषण : बिहार विद्यापीठ, पटनामें || (३०-१-१९२७) || २९ |- | २३. || भाषण : पटनामें, खादी प्रदर्शनीके उद्घाटनपर || (३०-१-१९२७) || ३३ |- | २४. || पत्र : मीराबहनको || (३१-१-१९२७) || ३६ |- | २५. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको || (३१-१-१९२७) || ३७<noinclude></noinclude> 4jdlcigenleqdqsg5qqozfdrt82no3d पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४ 250 187437 675354 645857 2026-08-30T17:29:07Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 675354 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||अठारह|}}</noinclude>{width=100% |- | २६. || पत्र : मगनलाल गांधीको (३१-१-१९२७) || ३९ |- | २७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको || (३१-१-१९२७) || ३९ |- | २८. || सन्देश : 'रिव्यू ऑफ नेशन्स' को || (१-२-१९२७ से पूर्व) || ३९ |- | २९. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (१-२-१९२७) || ४० |- | ३०. || तार : जमनालाल बजाजको || (१-२-१९२७) || ४० |- | ३१. || पत्र : प्रभावतीको || (२-२-१९२७ से पूर्व) || ४१ | ३२. || पत्र : ब्रजकिशोर प्रसादको || (२-२-१९२७) || ४१ |- | ३३. || पत्र : प्रभावतीको || (२-२-१९२७) || ४२ |- | ३४. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (२-२-१९२७) || ४२ |- | ३५. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (२-२-१९२७) || ४३ |- | ३६. || भाषण : तुमसरमें || ( २-२-१९२७) || ४४ |- | ३७. || अ० भा० चरखा संघके समाचार || ( ३-२-१९२७) || ४४ |- | ३८. || हमारी बेबसी || ( ३-२-१९२७) || ४६ |- | ३९. || गयामें गन्दगी || ( ३-२-१९२७) || ४८ |- | ४०. || पर्देको समाप्त कीजिए || ( ३-२-१९२७) || ४९ |- | ४१. || भाषण : चाँदामें || (४-२-१९२७) || ५१ |- | ४३. || पत्र : मणिबहन पटेलको || (६-२-१९२७) || ५१ |- | ४२. || भेंट : शापुरजी सकलातवालासे || ( ५-२-१९२७) || ५२ |- | ४४. || पत्र : आनन्दी, मणि, तारा, चन्दनको || (६-२-१९२७) || ५२ |- | ४५. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (६-२-१९२७) || ५३ |- | ४६. || भाषण : अस्पृश्यतापर, अकोलामें || ( ६-२-१९२७) || ५४ |- | ४७. || पत्र : मीराबहनको || (७-२-१९२७) || ५४ |- | ४८. || पत्र : अब्बास तैयबजीको || (७-२-१९२७) || ५५ |- | ४९. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (७-२-१९२७) || ५६ |- | ५०. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (७-२-१९२७) || ५७ |- | ५१. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको || (७-२-१९२७) || ५८ |- | ५२. || पत्र : रामदास गांधीको || (७-२-१९२७ ) || ५८ |- | ५३. || पत्र : वी० ए० सुन्दरम्‌को || (८-२-१९२७) || ५९ |- | ५४. || पत्र : मणिलाल गांधीको || (८-२-१९२७) || ५९ |- | ५५. || भाषण : राष्ट्रीय पाठशाला, खामगाँवमें || (८-२-१९२७) || ६० |- | ५६. || भाषण : अस्पृश्यतापर, खामगाँवमें || (८-२-१९२७) || ६१ |- | ५७. || भाषण : पाचोरामें, तिलक स्वराज्य कोषपर || (८-२-१९२७) || ६३ |- | ५८. || समय न चूकें || (१०-२-१९२७) || ६३ |- | ५९. || राष्ट्र-भाषा || (१०-२-१९२७) || ६७ |-<noinclude></noinclude> okp7mntdiar7nkrprpj72809w1dmk4n 675356 675354 2026-08-30T17:29:47Z रितु कुमारी साव 6333 675356 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||अठारह|}}</noinclude>{width=100% |- | २६. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (३१-१-१९२७) || ३९ |- | २७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको || (३१-१-१९२७) || ३९ |- | २८. || सन्देश : 'रिव्यू ऑफ नेशन्स' को || (१-२-१९२७ से पूर्व) || ३९ |- | २९. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (१-२-१९२७) || ४० |- | ३०. || तार : जमनालाल बजाजको || (१-२-१९२७) || ४० |- | ३१. || पत्र : प्रभावतीको || (२-२-१९२७ से पूर्व) || ४१ | ३२. || पत्र : ब्रजकिशोर प्रसादको || (२-२-१९२७) || ४१ |- | ३३. || पत्र : प्रभावतीको || (२-२-१९२७) || ४२ |- | ३४. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (२-२-१९२७) || ४२ |- | ३५. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (२-२-१९२७) || ४३ |- | ३६. || भाषण : तुमसरमें || ( २-२-१९२७) || ४४ |- | ३७. || अ० भा० चरखा संघके समाचार || ( ३-२-१९२७) || ४४ |- | ३८. || हमारी बेबसी || ( ३-२-१९२७) || ४६ |- | ३९. || गयामें गन्दगी || ( ३-२-१९२७) || ४८ |- | ४०. || पर्देको समाप्त कीजिए || ( ३-२-१९२७) || ४९ |- | ४१. || भाषण : चाँदामें || (४-२-१९२७) || ५१ |- | ४३. || पत्र : मणिबहन पटेलको || (६-२-१९२७) || ५१ |- | ४२. || भेंट : शापुरजी सकलातवालासे || ( ५-२-१९२७) || ५२ |- | ४४. || पत्र : आनन्दी, मणि, तारा, चन्दनको || (६-२-१९२७) || ५२ |- | ४५. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (६-२-१९२७) || ५३ |- | ४६. || भाषण : अस्पृश्यतापर, अकोलामें || ( ६-२-१९२७) || ५४ |- | ४७. || पत्र : मीराबहनको || (७-२-१९२७) || ५४ |- | ४८. || पत्र : अब्बास तैयबजीको || (७-२-१९२७) || ५५ |- | ४९. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (७-२-१९२७) || ५६ |- | ५०. || पत्र : मगनलाल गांधीको || (७-२-१९२७) || ५७ |- | ५१. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको || (७-२-१९२७) || ५८ |- | ५२. || पत्र : रामदास गांधीको || (७-२-१९२७ ) || ५८ |- | ५३. || पत्र : वी० ए० सुन्दरम्‌को || (८-२-१९२७) || ५९ |- | ५४. || पत्र : मणिलाल गांधीको || (८-२-१९२७) || ५९ |- | ५५. || भाषण : राष्ट्रीय पाठशाला, खामगाँवमें || (८-२-१९२७) || ६० |- | ५६. || भाषण : अस्पृश्यतापर, खामगाँवमें || (८-२-१९२७) || ६१ |- | ५७. || भाषण : पाचोरामें, तिलक स्वराज्य कोषपर || (८-२-१९२७) || ६३ |- | ५८. || समय न चूकें || (१०-२-१९२७) || ६३ |- | ५९. || राष्ट्र-भाषा || (१०-२-१९२७) || ६७ |-<noinclude></noinclude> hv20oq8eg13lrrw3k89zgkyomi18u4s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५२ 250 187504 675223 645936 2026-08-30T12:21:16Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675223 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} '''सत्यमूर्ति : कांग्रेसकी भूमिकाकी हदतक भी आप ऐसा ही कहेंगे?''' '''कुलन्दाई : दक्षिण भारतवालोंका स्वभाव कुछ ऐसा है कि यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो सब-कुछ भापकी तरह उड़ जायेगा। मेरा अपना व्यक्तिगत विचार यही है और ऐसा मैं हृदयसे अनुभव करता हूँ। यदि बहुमत इस पक्षमें हो कि अभी इसे स्थगित कर दिया जाये और तीन महीने बाद फिर शुरू किया जाये और यदि कांग्रेस कमेटियाँ प्रचार-कार्य उतनी ही मुस्तैदीसे करती हैं जितनी मुस्तैदीसे वे यह काम करती आई हैं...''' '''सत्यमूर्ति : यह तो जिला कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीकी हैसियतसे आपपर निर्भर करता है।''' '''कुलन्दाई : यदि आप मुझसे पूछते हैं तो मेरी सच्ची राय यह है कि जिस क्षण हम सत्याग्रह बन्द कर देंगे, उसी क्षण यह आन्दोलन सदाके लिए समाप्त हो जायेगा। तीन महीनेका मतलब है, फिर कभी नहीं। इस प्रान्तमें अभी जो उत्साह जगा है, वह सच्चा उत्साह है और उसे मन्द नहीं होने देना चाहिए। महात्माजी, यहाँके लोगोंका स्वभाव उत्तर भारतवालों-जैसा नहीं है।''' मैं नहीं समझता कि इस मामलेमें उत्तर भारत दक्षिणसे किसी भी तरह बेहतर है। हम सब एक ही पेड़के पत्ते-पत्ते हैं। हममें कहीं कोई फर्क नहीं है। '''एक स्वयंसेवक : हमें भय तो सिर्फ उसका है, जो-कुछ दो दिन पूर्व घटित हुआ। हममें से प्रत्येक शायद पूरा और सच्चा सत्याग्रही न हो। हम नहीं चाहते कि हममें कोई पस्ती आये। हम अपने-आपको ठीक ढंगसे संगठित करना चाहते हैं; और हम जोर-से आन्दोलन और प्रचार करके स्वयंसेवकोंकी संख्या बढ़ाना चाहते हैं। हम नहीं जानते कि हममें से कौन-से लोग सच्चे सत्याग्रही हैं। हमने आन्दोलन एकाएक ही आरम्भ कर दिया।''' आप जो जो-कुछ कहते हैं, वह सत्याग्रह स्थगित करनेका एक अतिरिक्त कारण ही प्रस्तुत करता है। '''स्वयंसेवक : लेकिन साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि सरकारको चैन लेने दिया जाये। मूर्तिको हटवानेके लिए आन्दोलनको दूसरे तरीकोंसे चलाते ही रहना चाहिए। हम तो सिर्फ युद्ध-कौशलका खयाल करके पीछे हट रहे हैं, अपने हथियार नहीं डाल रहे हैं। इस स्थगनका मतलब यही है कि हम अवसर आनेपर फिर दुगुनी रफ्तारसे आगे बढ़ें। हम अपनी असमर्थता नहीं स्वीकार करना चाहते, क्योंकि उससे लोगोंमें पस्ती आयेगी।''' यह तो एक नई बात हुई। इस तरह तो आप वास्तवमें मेरे नामकी आड़में अपनी असमर्थताको छिपाना चाह रहे हैं।<noinclude></noinclude> n9756pbte5zvr0us5mc1bqhp54n0kp7 675224 675223 2026-08-30T12:21:44Z Somya Shaw 6839 675224 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}'''सत्यमूर्ति : कांग्रेसकी भूमिकाकी हदतक भी आप ऐसा ही कहेंगे?''' '''कुलन्दाई : दक्षिण भारतवालोंका स्वभाव कुछ ऐसा है कि यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो सब-कुछ भापकी तरह उड़ जायेगा। मेरा अपना व्यक्तिगत विचार यही है और ऐसा मैं हृदयसे अनुभव करता हूँ। यदि बहुमत इस पक्षमें हो कि अभी इसे स्थगित कर दिया जाये और तीन महीने बाद फिर शुरू किया जाये और यदि कांग्रेस कमेटियाँ प्रचार-कार्य उतनी ही मुस्तैदीसे करती हैं जितनी मुस्तैदीसे वे यह काम करती आई हैं...''' '''सत्यमूर्ति : यह तो जिला कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीकी हैसियतसे आपपर निर्भर करता है।''' '''कुलन्दाई : यदि आप मुझसे पूछते हैं तो मेरी सच्ची राय यह है कि जिस क्षण हम सत्याग्रह बन्द कर देंगे, उसी क्षण यह आन्दोलन सदाके लिए समाप्त हो जायेगा। तीन महीनेका मतलब है, फिर कभी नहीं। इस प्रान्तमें अभी जो उत्साह जगा है, वह सच्चा उत्साह है और उसे मन्द नहीं होने देना चाहिए। महात्माजी, यहाँके लोगोंका स्वभाव उत्तर भारतवालों-जैसा नहीं है।''' मैं नहीं समझता कि इस मामलेमें उत्तर भारत दक्षिणसे किसी भी तरह बेहतर है। हम सब एक ही पेड़के पत्ते-पत्ते हैं। हममें कहीं कोई फर्क नहीं है। '''एक स्वयंसेवक : हमें भय तो सिर्फ उसका है, जो-कुछ दो दिन पूर्व घटित हुआ। हममें से प्रत्येक शायद पूरा और सच्चा सत्याग्रही न हो। हम नहीं चाहते कि हममें कोई पस्ती आये। हम अपने-आपको ठीक ढंगसे संगठित करना चाहते हैं; और हम जोर-से आन्दोलन और प्रचार करके स्वयंसेवकोंकी संख्या बढ़ाना चाहते हैं। हम नहीं जानते कि हममें से कौन-से लोग सच्चे सत्याग्रही हैं। हमने आन्दोलन एकाएक ही आरम्भ कर दिया।''' आप जो जो-कुछ कहते हैं, वह सत्याग्रह स्थगित करनेका एक अतिरिक्त कारण ही प्रस्तुत करता है। '''स्वयंसेवक : लेकिन साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि सरकारको चैन लेने दिया जाये। मूर्तिको हटवानेके लिए आन्दोलनको दूसरे तरीकोंसे चलाते ही रहना चाहिए। हम तो सिर्फ युद्ध-कौशलका खयाल करके पीछे हट रहे हैं, अपने हथियार नहीं डाल रहे हैं। इस स्थगनका मतलब यही है कि हम अवसर आनेपर फिर दुगुनी रफ्तारसे आगे बढ़ें। हम अपनी असमर्थता नहीं स्वीकार करना चाहते, क्योंकि उससे लोगोंमें पस्ती आयेगी।''' यह तो एक नई बात हुई। इस तरह तो आप वास्तवमें मेरे नामकी आड़में अपनी असमर्थताको छिपाना चाह रहे हैं।<noinclude></noinclude> r9scv68xdf08u77p0dt3f86etzd6q13 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५३ 250 187505 675227 645937 2026-08-30T12:25:49Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675227 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयं सेवकोंसे |५१७}} {{Gap}}'''स्वयंसेवक : नहीं, हम सिर्फ महात्माजीको राय और सलाहकी इज्जत कर रहे हैं; और हम उनकी राय और सलाहके मुताबिक इस भयसे चल रहे हैं कि कहीं ऐसा न हो कि महात्माजी हमारी भर्त्सना करें और फलतः हम सच्चे सत्याग्रहियोंका सहयोग खो बैठें।''' लेकिन जैसा आपने कहा, उसके मुताबिक तो इसका मतलब युद्ध-कौशलकी दृष्टिसे अपना कदम पीछे हटाना भी हो सकता है। यदि ऐसा है तो इससे प्रकट होता है कि अभी आप लोगोंका दल सच्चे सत्याग्रहियोंका एक सुसंगठित दल नहीं है । आप कह सकते हैं कि यह विचार तो आपके मनमें मुझसे बातचीत करनेके बाद आया; और अब आप दूसरी तमाम बातोंका खयाल छोड़कर इस दोषको दूर करनेके लिए आन्दोलनको स्थगित करना चाहते हैं । सत्याग्रहमें प्रामाणिक युद्ध-कौशलके लिए गुंजाइश है। इसे स्थगित करनेकी घोषणा करते हुए आप कह सकते हैं कि हमने गांधीजीसे बातचीत करनेके बाद पाया कि उन्होंने हमारे सामने सत्याग्रहके लिए जो शर्त रखी उसे पूरा करनेकी स्थिति में हम अभी नहीं हैं और यह देखते हुए कि जबतक हम उस शर्तको पूरा नहीं कर पाते तबतक आन्दोलन सफल नहीं हो सकता, हम इसे तीन महीनेके लिए स्थगित करते हैं और इस अवधि में हमारा इरादा उस शर्तको पूरा करनेकी दृष्टिसे अपने-आपको तैयार कर लेनेका है और यदि इस बीच आँखोंको खटकनेवाली यह मूर्ति हटाई नहीं जाती तो बादमें हम फिरसे सत्याग्रह प्रारम्भ करेंगे। यह सत्याग्रहकी सही अवस्था होगी। या कि आप मानते हैं कि आप अब भी इसके लिए तैयार हैं ? '''स्वयंसेवक : हम नीलकी मूर्तिको हटवाना चाहते हैं । हमारे साथ जो सौ स्वयं-सेवक हैं, वे सब यदि गिरफ्तार कर लिये जायेंगे तो आन्दोलन अपने-आप बन्द हो जायेगा। लेकिन तब भी शायद मूर्ति जहाँ-की-तहाँ बनी रहे। इस तरह हमारा उद्देश्य विफल हो जायेगा । हम चाहते हैं कि जबतक मूर्ति हटाई नहीं जाती तबतक स्वयं-सेवकोंका स्रोत चुकने न पाये।''' तो आप सत्याग्रहको इसलिए स्थगित करेंगे कि स्वयंसेवकोंका स्रोत चुकने न पाये। इसलिए, इस कारण से सत्याग्रह स्थगित करना जरूरी है। इसके विपरीत यदि आपको लगता है कि जो सौ या बीस स्वयंसेवक हैं, उन सबके चुक जानेतक तो आपको सत्याग्रह चलाना ही चाहिए तो आप वैसा कीजिए ताकि यह कहनेका मौका न रह जाये कि सत्याग्रह स्थगित करके आपके उत्साहको मन्द पड़ जाने दिया गया । लेकिन, में आपको फिर बता दूं कि सत्याग्रहमें अपना कदम रोकनेके भी अवसर आते हैं। क्या मैंने वाइकोम सत्याग्रहके समय ऐसा ही नहीं किया था ? आप कहते हैं कि यदि आप यह बताकर कि आप अभी तैयार नहीं हैं; सत्या- ग्रहको स्थगित करेंगे तो उससे पस्ती आयेगी । सत्याग्रहमें पस्ती नामकी कोई चीज ही नहीं होती । सत्याग्रही अपने आन्तरिक बलपर निर्भर करता है, बाहरी सहायतापर नहीं। लेकिन तीन महीने बाद भी आप तैयार न हो सकें और मूर्ति जहाँ-की-तहाँ दिखे - और वह तो दिखेगी ही, क्योंकि आप जानते हैं कि जबरदस्त संघर्ष किये बिना सरकार अपनी जिद यों ही छोड़नेवाली तो है नहीं तो इससे मुझे बहुत दुःख होगा ।<noinclude></noinclude> ssm13mns0q9xcdv9qa50u8u979wptv6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५४ 250 187506 675231 645938 2026-08-30T12:31:13Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675231 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}यदि सचमच आपको संघर्षके विफल हो जानेकी आशंका हो तो सत्याग्रह स्थगित न कीजिए। यदि आप इसे स्थगित करना चाहते हैं तो साफ-साफ यह स्वीकार करते हुए कीजिए कि अभी मैंने जो कारण बताये हैं उन कारणोंसे आप सत्याग्रहको स्थगित करना चाहते हैं । '''एक स्वयंसेवक : लेकिन हम संघर्षको जारी ही क्यों न रखें ?''' हाँ, मैं आपमें से किसीके उत्साहपर कोई अंकुश नहीं लगाना चाहता । इस मामलेमें मैं जरा सावधानीसे ही काम लेना चाहता हूँ । '''एक स्वयंसेवक : हम आपसे एक सवाल पूछना चाहते हैं । वह यह कि महात्माजी हमें अपना समर्थन तो देंगे न ?''' बेशक; जबतक मैं आपको ठीक रास्तेपर चलते देखूंगा तबतक आपका समर्थन अवश्य करूँगा । अगर आप चाहें तो में एक और काम करनेको तैयार हूँ । कलकी बातचीतका पूरा विवरण मेरे पास लिखा हुआ है और मेरा खयाल है कि आजकी बातचीतको भी दर्ज किया जा रहा है। यदि आप चाहें तो में उसे प्रकाशित करवा दूं । जनताको इसके बारेमें बता देना आपके लिए ठीक ही रहेगा। यदि आप इसे प्रकाशित न करवाना चाहते हों तो में नहीं करवाऊँगा । लेकिन, मैं यह बता दूं कि यहाँ हमारी जो बातचीत हुई है, उसे प्रकाशित करनेमें कोई हर्ज नहीं है और उसमें कुछ गोपनीय भी नहीं है । तो क्या मैं इसे प्रकाशित करवाऊँ ? '''कई लोग एक साथ : जी हाँ, जी हाँ । '''एक स्वयंसेवक : हम तो इस बातका निर्णय आप ही पर छोड़ देना चाहेंगे कि हम संघर्षको जारी रखें या छोड़ दें।''' यदि आपकी जगह में होऊँ तो मैं तो यह स्वीकार करते हुए आन्दोलनको स्थगित कर दूं कि हम अभी पूरी तरह से तैयार और सशक्त नहीं हैं। यदि आप यह स्वीकार करते हों कि आप अभी पूरी तरह तैयार और सशक्त नहीं हैं तो आपको आन्दोलनको अवश्य स्थगित कर देना चाहिए । '''पावलार : कुछ लोग आशंकित हैं और कुछ नहीं भी हैं। वे आपकी सलाह चाहते हैं, महात्माजी ।''' मैं तो कह ही चुका हूँ कि यदि आपकी जगह में होऊँ तो आन्दोलन स्थगित कर दूँ । '''एक स्वयंसेवक : लेकिन क्या आप हमें अपना संघर्ष जारी रखनेकी इजाजत देते हैं ?''' मैं आपको रोकता नहीं और इस अर्थ में, समझ लीजिए, आपको मेरी इजाजत भी है ही । '''एक स्वयंसेवक : आप आन्दोलनको अपना आशीर्वाद तो देंगे ?''' आशीर्वाद तो पहले भी मिला हुआ ही था; अब फिर दे दूंगा ।<noinclude></noinclude> 791a5x9x5lke0iyedpw5ocsp72fcaoj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५५ 250 187507 675232 645939 2026-08-30T12:37:22Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675232 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे|५१९}} {{Gap}}'''दूसरा स्वयंसेवक : और जहाँतक आन्दोलनको स्थगित करनेका सवाल है, अगर आप ऐसी सलाह दें तो हम स्थगित करनेको तैयार हैं।''' मैं कोई जिम्मेदारी नहीं ले सकता। आपको किसी दूसरेका खयाल करके आन्दोलन स्थगित नहीं करना चाहिए। स्थगित तभी कीजिए जब आपकी अन्तरात्मा वैसा करनेको कहे। '''एक स्वयंसेवक : हमारी अन्तरात्मा तो हमसे स्थगित करनेको नहीं कहती।''' तो फिर आगे बढ़िए। '''स्वयंसेवक : हम आज आन्दोलनको जिस ढंगसे चला रहे हैं, उसी ढंगसे चलायेंगे। इस बीच आप हमें अपना समर्थन दें, यह हमारा निवेदन है। हम आन्दोलनको पूर्ण रूपसे सत्याग्रहकी भावना और अनुशासित ढंगसे चलायेंगे। लेकिन यदि दूसरे लोग अपनी मर्जीसे बीचमें आते हैं और उपद्रव करते हैं तो आपसे प्रार्थना यह है कि आप हमें दोष न दें। इसके अलावा हम चाहते हैं कि आप 'यंग इंडिया' में इसके बारेमें लिखें।''' हाँ-हाँ, वह तो करूँगा ही। '''स्वयंसेवक : और हमारी यह भी प्रार्थना है कि आप यहाँके कुछ कांग्रेसियोंको हमारे लिए प्रचार-कार्य करनेकी सलाह दें।''' मैं बेशक सलाह दूंगा। मैंने श्री सत्यमूर्ति के साथ पूरे मामलेपर विचार-विमर्श किया है। मेरा खयाल है, वे उनसे कह देंगे। मैं खुले तौरपर कांग्रेसियोंको वैसी सलाह दूंगा; और मैंने जिन टिप्पणियोंका उल्लेख किया है, उनमें भी आप यह चीज देखेंगे। आप निर्भीक भावसे आगे बढ़िए। हाँ, स्थितिको उलझाइए मत। हिंसा या असत्यको प्रश्रय मत दीजिए। इनमें से कोई भी उद्देश्यके लिए घातक सिद्ध होगा। '''एक दूसरे स्वयंसेवकके प्रश्नके उत्तरमें महात्माजीने कहा :''' आप मुझे स्वयंसेवकोंकी एक सूची दे दीजिए। उसमें हर स्वयंसेवककी उम्र, पता और पेशा लिखा होना चाहिए। मैं सूचीको ध्यान से पढ़ेगा। जनताको यह विदित करानेके लिए कि कौन-से लोग अधिकृत स्वयंसेवक हैं, आपको सूची प्रकाशित भी करनी चाहिए। यदि कोई सत्याग्रह करता है तो अपनी जिम्मेदारीपर करेगा। यदि आपको और लोग मिलें तो उनके नाम भी प्रकाशित कीजिए। जब आप मूर्तिको पास जायें तो जनताको उधर आकृष्ट न करें। वहाँ रातमें, जरूरत हो तो ठीक आधी रातमें जाइए, ताकि वहाँ भीड़ इकट्ठी न होने पाये। लेकिन पुलिसको सूचित कर दीजिए कि आप अमुक समयपर वहाँ जा रहे हैं। यदि आपको ऐसा कुछ मालूम हो कि पुलिस जनताको या जिनके द्वारा वह गड़बड़ी पैदा कराना चाहती है, उन लोगोंको जानकारी दे देती है तो आप पुलिसको कोई सूचना न दें। ऐसा करें जिससे जनता आपके काममें हस्तक्षेप न करे। यदि वह इसमें भाग लेना ही चाहे तो वह अन्यत्र सभाएँ करके, प्रस्ताव पास करके अपनी भावनाका प्रदर्शन करे। '''इसके साथ ही बातचीत समाप्त हो गई और स्वयंसेवक लोग वहाँसे चले गये।''' [अंग्रेजीसे] हिन्दू, १०-९-१९२७<noinclude></noinclude> 3z038tfoqwtnqdaqq6hnpu5jvyy4r0r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५६ 250 187508 675329 645940 2026-08-30T16:56:51Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675329 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} {{c|{{larger|'''४१९. भाषण : पचैयप्पा कॉलेज, मद्रासमें'''<ref>यह "दो भाषण" शीर्षकके अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था।</ref>}}}} {{right|७ सितम्बर, १९२७<ref>७-९-१९२७ के 'हिन्दू' से।</ref>}} {{left|प्रधानाचार्य महोदय, विद्यार्थियों और मित्रो,<ref>७-९-१९२७ के 'हिन्दू' से।</ref>}} दरिद्रनारायणके लिए आपने मुझे जो उपहार दिये हैं, उनके लिए मैं आपको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ। मैं इस भवनमें पहली बार नहीं आया हूँ। मैं इस भवनमें पहली बार १८९६ में दक्षिण आफ्रिकाके संघर्षके सिलसिलेमें आया था। उस सभाकी अध्यक्षता सभीके आदरणीय स्वर्गीय डॉ० सुब्रह्मण्य अय्यरने की थी। उस सभाकी स्मृति मेरे मनमें इसलिए बनी हुई है कि भारतीय विद्यार्थियोंके साथ परिचय प्राप्त करनेका वह मेरा पहला अवसर था। आप शायद जानते होंगे कि मैं मैट्रिक पास आदमी हूँ और इसलिए भारतमें कहने लायक कॉलेजी शिक्षा मैंने कभी नहीं पाई। हाँ, तो उस सभामें मानपत्र भेंट किये जाने और उसके लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट कर देनेके बाद, मैं विद्यार्थियोंके पास चला गया। वे इसकी राह ही देख रहे थे और उन्होंने मेरे हाथसे उस 'हरी पुस्तिका'<ref>देखिए खण्ड २, पृष्ठ १०१-३३।</ref> की सभी प्रतियाँ ले लीं जो मैं उन दिनों भारत-भरमें बाँट रहा था। मैंने उन विद्यार्थियोंकी खातिर ही स्वर्गीय श्री जी० परमेश्वरन् पिल्लईसे अनुरोध किया कि उस पुस्तिकाकी और अधिक प्रतियाँ छपवाकर विद्यार्थियोंमें बाँट दें। श्री पिल्लईने उस समय सबसे आगे बढ़कर मेरे और मेरे ध्येयके प्रति अपार उत्साह दिखाया और बड़ी प्रसन्नताके साथ पुस्तिकाकी दस हजार प्रतियाँ छपवा दीं।<ref>देखिए खण्ड २, पृष्ठ १७६।</ref> विद्यार्थी लोग उन दिनों दक्षिण आफ्रिकाकी परिस्थिति समझनेके लिए इतने व्यग्र थे! उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मैंने अपने-आपसे कहा था : “हाँ, भारत माता अपनी सन्तानपर गर्व कर सकती है और उनसे अपनी सभी आशाएँ पूरी होनेकी आशा सँजो सकती है।” तबसे विद्यार्थियोंके साथ मेरा परिचय बराबर अधिकाधिक प्रगाढ़ और अधिकाधिक व्यापक होता गया है। मैंने बंगलोरमें कहा था<ref>देखिए "भाषण: बंगलोरके नागरिकोंकी सभामें", २८-८-१९२७।</ref> कि जो ज्यादा देते हैं उनसे और ज्यादा देनेकी अपेक्षा की जाती है और आपने मुझे इतना अधिक देकर यह अधिकार भी दे दिया है कि मैं आपसे और अधिककी अपेक्षा रखूँ। आप मुझे कितना भी दें, मैं कभी सन्तुष्ट होनेवाला नहीं हूँ। मुझे जितना कुछ भी करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है, आपने उसमें से कुछका समर्थन किया है। आपने अपने मानपत्रमें दरिद्रनारायणका नाम बड़े आदर और स्नेहके साथ लिया है; और (प्रधानाचार्य) महोदय,<noinclude></noinclude> ieqexncca23td1wy01v8dun50c8b5u2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५७ 250 187509 675394 645941 2026-08-30T17:50:09Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675394 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : पचैयप्पा कॉलेज, मद्रासमें|५१९}} आपने निस्सन्देह बिलकुल सच्ची भावनासे चरखेके बारेमें किये गये मेरे दावेका समर्थन किया है। मैं जानता हूँ कि मेरे अनेक प्रतिष्ठित और विद्वान् देशभाइयोंने मेरे दावेको यह कहते हुए ठुकरा दिया है कि मामूली-से चरखेसे, जिसे हमारी बहनों और माताओंने प्रसन्नतापूर्वक त्याग दिया था, कभी स्वराज्य हासिल नहीं किया जा सकता। इतनेपर भी आपने मेरे दावेका समर्थन किया है और इसकी मुझे बड़ी प्रसन्नता है। आप विद्यार्थियोंने हालांकि अपने मानपत्रमें साफ-साफ यह नहीं कहा है कि आपके हृदयमें चरखेके लिए स्थान है, फिर भी आपने इतना तो कह ही दिया है जिसके आधारपर विश्वास किया जा सकता है कि आपके हृदयमें चरखेके लिए सचमुच स्थान है। इसलिए आप यह थैली भेंट करके ही चरखेके प्रति अपने प्रेमकी इतिश्री न मानें। यदि आप इसीमें इसकी इतिश्री मानें तो यह थैली मेरे लिए परेशानीका कारण बन जायेगी; क्योंकि तब इस रकमका मेरे लिए कोई उपयोग ही नहीं रह जायेगा। इस धनको भुखमरीसे पीड़ित करोड़ों लोगोंमें बाँटनेपर वे जो खादी तैयार करेंगे, यदि आप उसे इस्तेमाल नहीं करेंगे तो इस धनका कोई उपयोग नहीं। चरखेके प्रति मौखिक रूपसे आस्था प्रकट कर देने और मेरी झोलीमें कृपाके तौरपर चाँदीके चन्द टुकड़े डाल देनेसे तो स्वराज्य नहीं मिल जायेगा और न करोड़ों मेहनतकशों और भूखे-नंगे लोगोंकी दिन-दिन बढ़ती गरीबीकी समस्या ही हल हो जायेगी। मैं अपनी भूल सुधार दूँ। मैंने कहा है, करोड़ों मेहनतकश लोग। काश कि उनका यह विशेषण सार्थक होता! दुर्भाग्यकी बात है कि हमने वस्त्रोंके बारेमें अपनी रुचि नहीं बदली है और इस तरह इन करोड़ों भूखे-नंगे इन्सानोंके लिए यह नामुमकिन बना दिया है कि वे साल-भर मेहनतकश बने रह सकें। हमने उन्हें जबरदस्ती छुट्टी दे रखी है — वर्षमें कम-से-कम चार माहकी ऐसी छुट्टी जिसकी उन्हें जरूरत नहीं है। यह मेरी कल्पनाकी बहक नहीं, बल्कि एक हकीकत है। उन लोगोंके बीच जाकर स्थितिको देखनेवाले हमारे अनेक देशभाइयोंने इसकी साक्षी दी है। और आपको अगर उनके साक्ष्यपर भरोसा न हो तो मैं आपको बतलाता हूँ कि अनेक अंग्रेज प्रशासकोंने भी इस सत्यको दुहराया है। इसलिए इस थैलीको आपसे लेकर इसकी रकम क्षुधार्त्त बहनोंमें बाँट देनेसे समस्या हल नहीं हो जायेगी। इससे तो उलटे उन बहनोंका आत्मिक बल कमजोर पड़ जायेगा। उनको दूसरोंसे दान लेनेकी आदत पड़ जायेगी और वे दूसरोंके आगे हाथ पसारने लगेंगी। और जो भी स्त्री-पुरुष या राष्ट्र दूसरोंके आगे हाथ पसारनेका आदी हो जाता है, उसकी रक्षा तो भगवान् ही कर सकता है। मैं और आप यही चाहते हैं कि इन बहनोंके लिए ऐसी जीविका जुटा दी जाये जिसे वे घर बैठे कर सकें और ऐसी जीविका जुटानेका एकमात्र साधन चरखा ही है। यह एक इज्जत और ईमानदारीका काम है और काफी भला भी है। आपके लिए एक आनेका भले ही कोई मतलब न हो। आप २, ३, ४ या ५ मील पैदल चलकर शरीरको थोड़ा व्यायाम देनेकी बजाय, ट्राममें बैठकर उस एक आनेको गँवा सकते हैं और फालतू बातोंमें समय खो सकते हैं। लेकिन यही एक आना जब किसी गरीब बहनकी जेबमें जाता है तो वह बड़ा उपयोगी बन जाता है। वह उस एक<noinclude></noinclude> b42bd7i4lu5nx1sjw9zbbga08lol7qm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५८ 250 187510 675405 645942 2026-08-30T17:59:50Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675405 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} आनेके लिए मेहनत करती है और अपने पवित्र हाथोंसे कातकर मुझे सुन्दर सूत देती है। उस सूतका अपना एक इतिहास होता है। वह सूत इस योग्य होता है कि राजकुमारों और राजाओंके लिए वस्त्र बुने जा सकते हैं। मिलसे निकलनेवाले कपड़ेका ऐसा कोई इतिहास नहीं होता। मेरे लिए तो यह विषय अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है और मैं अपना लगभग सारा समय इसीके चिन्तनमें लगाता हूँ, पर मुझे इसके लिए आपका और अधिक समय नहीं लेना चाहिए। यदि यह थैली आपके इस संकल्पका प्रतीक नहीं है कि आप अगर अभी खादी नहीं पहनते तो आगेसे निश्चय ही खादीके अतिरिक्त कोई वस्त्र धारण नहीं करेंगे, तो आपकी यह थैली मेरी सहायता करना तो दूर, मेरे मार्गमें बाधक बन जायेगी। आपके थैली भेंट करने और तालियाँ बजानेसे ही मैं इस भ्रममें पड़नेवाला नहीं हूँ कि आप खादीके सिद्धान्तमें पूरी तरह विश्वास करते हैं। मैं चाहता हूँ कि आपकी करनी आपकी कथनीके अनुरूप हो। आप भारतकी शोभा हैं। मैं नहीं चाहता कि आपके बारेमें कोई कह सके कि आपने यह रकम मुझे झाँसा देनेके लिए दी थी, कि आप खादी नहीं पहनना चाहते और खादीपर आपका कोई विश्वास नहीं। तमिलनाडके एक प्रख्यात सपूत और मेरे मित्र द्वारा की गई भविष्यवाणीको सही मत होने दीजिए। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि मेरे मरनेपर मेरे दाह-संस्कारके लिए और लकड़ियाँ जमा करनेकी जरूरत नहीं पड़ेगी, उसका काम तो उन चरखोंकी लकड़ियोंसे ही चल जायेगा जिनको मैं आज लोगोंमें बाँट रहा हूँ। उनको चरखेपर कोई आस्था नहीं और उनका खयाल है कि जो भी चरखेकी बड़ाई करता है वह महज मेरी इज्जतके खयालसे करता है। उनकी यह हार्दिक राय है। यदि खादी आन्दोलन इतना ही निकम्मा निकला तो यह समूचे राष्ट्रके लिए एक भारी दुःखद घटना होगी और उस दुःखद घटनाको लानेमें सीधे-सीधे आपका हाथ होगा और आप उस अपराधके सहभागी होंगे। वैसा करना समूचे राष्ट्र द्वारा आत्महत्या करना होगा। यदि चरखेपर आपकी जीवन्त आस्था नहीं तो उसे ठुकरा दीजिए। वह आपके प्रेमका कहीं सच्चा प्रदर्शन होगा। वैसा करके आप मेरी आँखें खोल देंगे और तब मैं भग्न स्वरमें दुनियाके इस नक्कारखानेमें यह चीखता हुआ अपनी राह चला जाऊँगा कि “आपने चरखेको ठुकराकर दरिद्रनारायणको ठुकरा दिया।” यदि मैं भ्रममें होऊँ, यदि आप ढोंग कर रहे हों तो इसका परिणाम मेरे और आपके लिए भी बहुत दुःखद, पतनकारी और अपमानजनक होगा। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप साफ-साफ सच बात कहकर उस सबसे मुझे और अपनेको भी बचाइए। यह तो हुई एक बात। लेकिन, आपने अपने मानपत्रमें और भी कई बातें कही हैं। आपने उसमें बाल-विवाह और बाल-विधवाओंका उल्लेख किया है। एक तमिल विद्वान्ने मुझे लिखा है कि मैं विद्यार्थियोंको बाल-विधवाओंकी समस्याके बारेमें बतलाऊँ। उनका कहना है कि देशके अन्य भागोंकी अपेक्षा इस प्रान्तमें बाल-विधवाओंकी हालत कहीं बदतर है। मैं उनके इस कथनकी सचाईको कसौटी नहीं कर पाया हूँ।<noinclude></noinclude> dm9mez6frquannnnu2dwnfaz13zusj3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५५९ 250 187511 675410 645943 2026-08-30T18:03:24Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675410 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : पचैयप्पा कॉलेज, मद्रासमें|५२३}} आप इसके बारेमें मुझसे ज्यादा जानते होंगे। लेकिन मैं यही चाहता हूँ कि आप नवयुवक लोग कमजोरका पक्ष ग्रहण करनेकी वीर भावना अपनेमें रखें। यदि आपके अन्दर ऐसी भावना मौजूद हो तो मैं आपके सामने बहुत बड़ा सुझाव रखता हूँ। मैं समझता हूँ कि आपमें से अधिकांश लोग अविवाहित हैं और आपमें से काफी लोग ब्रह्मचारी भी हैं। 'काफी लोग' मैंने इसलिए कहा है कि मैं विद्यार्थियोंको जानता-समझता हूँ। अपनी बहनको कामुक दृष्टिसे देखनेवाला विद्यार्थी ब्रह्मचारी नहीं होता। मैं चाहता हूँ कि आप एक पवित्र संकल्प कर लें — यह कि आप किसी विधवा बालिकासे ही शादी करेंगे, अन्यथा अविवाहित रहेंगे। आप अपने लिए किसी विधवा बालिकाकी तलाश करें और अगर वह आपको न मिल सके तो आप विवाह ही न करें। आप ऐसा संकल्प करके, संसारके सामने उक्त घोषणा कर दें, अगर आपके माता-पिता हैं तो उनको या अपनी बहनोंको अपना निश्चय बतला दें। मैं उनको “बाल-विधवा” न कहकर “विधवा बालिकाएँ” इसलिए कह रहा हूँ कि उन बालिकाओंकी स्थितिका वर्णन ठीक-ठीक इन्हीं शब्दोंमें होता है। कारण, मेरा विश्वास यह है कि कोई दस-पन्द्रह वर्षकी बालिका, जिसने न अपने विवाहमें कोई सहमति दी और न विवाह हो जानेके बाद अपने तथाकथित पतिके साथ रही और फिर भी जिसे एक दिन एकाएक विधवा घोषित कर दिया गया, वास्तवमें विधवा नहीं है। यह तो विधवा शब्दका दुरुपयोग है, भाषाका दुरुपयोग और उसके साथ अनाचार करना है। हिन्दू धर्ममें विधवा शब्दके साथ पवित्रताका एक भाव जुड़ा हुआ है। स्वर्गीया श्रीमती रमाबाई रानडे-जैसी सच्ची विधवा नारीकी मैं पूजा करता हूँ। वे जानती थीं कि विधवा होना क्या होता है। परन्तु एक नौ वर्षीया बालिका तो कुछ जानती ही नहीं कि पति कैसा होना चाहिए। हाँ, अगर इस प्रान्तमें ऐसी विधवा बालिकाएँ न हों तो मेरी ये सभी दलीलें बेमतलब हैं। परन्तु यदि आपके यहाँ ऐसी विधवा बालिकाएँ मौजूद हैं तो फिर इस अभिशापसे छुटकारा पानेके लिए आपका यह पुनीत कर्त्तव्य हो जाता है कि आप किसी विधवा बालिकासे ही विवाह करनेका संकल्प कर लें। मेरे मनमें इतना अन्धविश्वास तो है ही कि मैं मानता हूँ कि राष्ट्र ऐसे जितने भी पाप करता है उनका स्पष्ट परिणाम उसे भुगतना ही पड़ता है। मेरा विश्वास है कि हमारे ये सारे पाप ही हैं, जिन्होंने हमको गुलामीकी इस अवस्थातक पहुँचा दिया है। हो सकता है कि इंग्लैंडकी कॉमन्स सभासे किसी दिन आपको संसारका अच्छे-से-अच्छा संविधान प्राप्त हो जाये। लेकिन यदि उस संविधानको कार्यरूपमें परिणत करनेवाले योग्य और उपयुक्त ढंगके स्त्री-पुरुष आपके यहाँ नहीं होंगे तो वह संविधान निरर्थक सिद्ध होगा। क्या आप समझते हैं कि जबतक हमारे देशमें एक भी ऐसी विधवा रहेगी, जो अपनी बुनियादी आवश्यकताओंकी पूर्तिकी इच्छुक होते हुए भी उनसे बलात् वंचित रखी जाती है, तबतक हम अपनेको अपना शासन आप चलाने अथवा दूसरोंपर शासन करने या तीस करोड़ आबादीवाले इस राष्ट्रका भाग्य-निर्माण करने योग्य कह सकते हैं? यह धर्म नहीं, अधर्म है। मेरी आत्मा हिन्दू धर्मकी भावनासे पूरी तरह सराबोर है, इसलिए मैं ऐसी बात कह सकता हूँ। यह मत समझिए कि ये<noinclude></noinclude> tfxqlev00icx54ht2eeq81jbhq31kof पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६० 250 187512 675415 645944 2026-08-30T18:07:00Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675415 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} मेरे पाश्चात्य संस्कार बोल रहे हैं। मेरा दावा है कि विशुद्ध भारतीयताकी भावना मेरी रग-रगमें बसी हुई है। मैंने पश्चिमकी अन्य कई विशेषताओंको आत्मसात् किया है, इसे नहीं। हिन्दू धर्ममें इस प्रकारके वैधव्यके लिए कहीं कोई आधार नहीं है। बाल-विधवाओंके बारेमें मैंने जितना कुछ कहा है, वह सब बाल-वधुओंपर भी लागू होता है। निश्चय ही, आपको अपनी वासनापर इस सीमातक तो अंकुश रख ही सकना चाहिए कि आप सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी बालिकाके साथ विवाह न करें। यदि मेरी चले तो मैं लड़कियोंके लिए विवाहकी न्यूनतम आयु बीस वर्ष निश्चित कर दूँ। वैसे भारतमें भी बीस वर्षकी अवस्था काफी कम है। भारतमें बालिकाओंकी अकाल-प्रौढ़ता, पूर्ण परिपक्वताके पहले ही प्रौढ़ता, लानेके लिए भारतकी जलवायु भी नहीं, बल्कि हम स्वयं जिम्मेदार हैं, क्योंकि मैं ऐसी बीस वर्षीया बालिकाओंको भी जानता हूँ जो बिलकुल शुद्ध और पवित्र हैं, जिनका कौमार्य अक्षुण्ण है और जो किसी भी तूफानका सामना करनेमें समर्थ हैं। वैसी अकाल-प्रौढ़ताको हमें गलेसे नहीं लगाये रहना चाहिए। कुछ ब्राह्मण विद्यार्थी मुझसे कहते हैं कि वे इस सिद्धान्तका अनुसरण नहीं कर सकते। उनको सोलह वर्षीया बालिकाएँ नहीं मिल सकतीं, क्योंकि इने-गिने ब्राह्मण ही इस अवस्थातक अपनी लड़कियोंको अविवाहित रहने देते हैं, ब्राह्मण कुमारियोंका विवाह अधिकतर १०, १२ या १३ वर्षकी अवस्थातक ही कर दिया जाता है। तब मैं ब्राह्मण युवकोंसे कहता हूँ : “आप अगर अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रख सकते तो अपनेको ब्राह्मण मानना छोड़ दीजिए।” आप विवाहके लिए किसी ऐसी सोलह वर्षीया बालिकाको चुनिए जो बालपनमें ही विधवा हो गई हो। यदि आपको इस अवस्थाकी कोई विधवा ब्राह्मणी नहीं मिलती तो जिस जातिमें भी ऐसी लड़की मिले, आप उसीसे शादी कर लीजिए। और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हिन्दुओंका भगवान् उस युवकको क्षमा कर देगा, जिसने किसी बारह-वर्षीया कुमारीके साथ बलात्कार करनेकी अपेक्षा अपनी जातिसे बाहरकी लड़कीके साथ शादी करना अधिक पसन्द किया। यदि आपका हृदय पवित्र नहीं है और आप अपने मनोविकारोंको काबूमें नहीं रख सकते तो आप शिक्षा-सम्पन्न व्यक्ति नहीं रह जाते। आपने अपनी संस्थाको एक श्रेष्ठ संस्था कहा है। मैं चाहता हूँ कि आप इस श्रेष्ठ संस्थाका नाम सार्थक करें, अपने-आपको उसके योग्य सिद्ध करें। श्रेष्ठ संस्थाको ऐसे युवक तैयार करने चाहिए जो चरित्रमें सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हों और चरित्रके बिना शिक्षा व्यर्थ है तथा बुनियादी व्यक्तिगत पवित्रताके बिना चरित्रका कोई मतलब नहीं रह जाता। मैं ब्राह्मणवादकी पूजा करता हूँ। मैंने वर्णाश्रम धर्मको उचित ठहराया है। पर जो ब्राह्मणवाद अस्पृश्यता, बाल-वैधव्य और कुमारियोंके शील-भंगको बरदाश्त करता है, वह मुझे दुर्गंधयुक्त लगता है। ऐसा ब्राह्मणवाद तो ब्राह्मणत्वका मखौल है। ऐसा ब्राह्मणवाद ब्रह्मके ज्ञानसे रहित है; वह तो धर्मग्रन्थोंकी सच्ची व्याख्यासे कोसों दूर, निरा पशुवाद है। ब्राह्मणवाद इससे कहीं अधिक श्रेष्ठ तत्त्वोंसे बना हुआ है। मैं चाहता हूँ कि मेरी ये कुछ बातें आपके हृदयकी गहराईमें पैठ जायें। मैं अपने ये हार्दिक उद्गार व्यक्त करते हुए, आप सबपर नजर जमाये हुए हूँ। मैं आपकी बुद्धिको नहीं,<noinclude></noinclude> 9da8270qjwu0ahkxd9xtz7gg23kzm8r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६१ 250 187513 675418 645945 2026-08-30T18:10:42Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675418 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : पचैयप्पा कॉलेज, मद्रासमें५२५}} आपके हृदयोंको प्रभावित करना चाहता हूँ। देश आपकी ओर आशासे देख रहा है; और मैंने जो बातें कही हैं वे आपके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। कालीकटके एक प्रोफेसर साहबने मुझसे अनुरोध किया है कि मैं सिगरेट, चाय और काफीके बारेमें भी कुछ कहूँ। इसलिए मैं अब इनको लेता हूँ। ये चीजें जीवनके लिए आवश्यक नहीं हैं। कुछ लोग दिनमें काफीके दस-दस प्याले भी पी लेते हैं। क्या यह उनको स्वस्थ और जाग्रत रखने तथा अपने कर्त्तव्योंके पालनके लिए आवश्यक है? यदि वे इसके बिना जाग्रत नहीं रह सकते तो अच्छा यही है कि सो जायें, लेकिन काफी या चाय न पियें। हमें इन चीजोंका गुलाम नहीं बनना चाहिए। लेकिन काफी और चाय पीनेवाले अधिकांश लोग इनके आदी बन जाते हैं। सिगार और सिगरेटें देशी हों या विदेशी, उनसे बचना ही चाहिए। सिगरेटका पीना तन्द्राकारी होता है और आप जो सिगार पीते हैं, उनमें तो अफीमका पुट भी रहता ही है। ये आपके शरीरके तंतुओंपर हावी हो जाते हैं, और फिर आप इनको छोड़ नहीं पाते। समझमें नहीं आता कि कोई भी विद्यार्थी अपने मुँहको एक चिमनी बना देना कैसे पसन्द कर सकता है। यदि आप चाय, काफी, सिगरेट और सिगार पीना छोड़ दें, तो खुद देखेंगे कि खर्चमें कितनी बचत होती है। टॉल्स्टॉयकी एक कहानी है, जिसमें एक शराबी किसीकी हत्या करने जाता है, पर उसके मनमें हिचकिचाहट होती है। लेकिन जैसे ही वह सिगार पीता है, उसका धुआँ छोड़नेके साथ ही मुस्कराते हुए उठ खड़ा होता है और कहता है : “मैं भी कैसा बुजदिल हूँ।” वह कटार निकालकर हत्या कर देता है। टॉल्स्टॉयने अपने अनुभवके आधारपर ही लिखा है। उनको जिस चीजका आत्मानुभव था, उसीको उन्होंने लिखा है। और वे सिगरेटों और सिगारोंके तो शराबसे भी ज्यादा खिलाफ हैं। पर आप यह मत मान बैठिए कि शराब और तम्बाकूमें शराब कम नुकसानदेह है। बिलकुल नहीं। सिगरेट अगर इब्लीस है तो शराब शैतान है। यहाँ एक हिन्दी प्रचार कार्यालय है, जिसका खर्च उत्तर भारतके लोग उठाते हैं। संस्थाने लगभग एक लाख रुपये खर्च किये हैं और हिन्दी शिक्षकगण अपना काम नियमित रूपसे करते रहे हैं। कुछ प्रगति हुई है, लेकिन हम अभीतक कोई ठोस काम नहीं कर पाये हैं। यदि आप रोजाना एक घंटा दें तो साल-भरमें हिन्दी सीख सकते हैं। आप छः महीनेमें सरल हिन्दी समझने लायक बन सकते हैं। आपमें से अधिकांश हिन्दी नहीं जानते, इसलिए मैं आपके सामने हिन्दीमें नहीं बोल सकता। भारतमें हिन्दीको सर्वव्यापक भाषा बनाना चाहिए। आपको संस्कृत भी जाननी चाहिए, जिससे आप 'भगवद्गीता' पढ़ सकें। एक श्रेष्ठ हिन्दू संस्थाके विद्यार्थी होनेके नाते आपको 'भगवद्गीता' पढ़ाई जानी चाहिए। मैं चाहूँगा कि यहाँ मुसलमान विद्यार्थी भी पढ़ने आ सकें। (एक आवाज आई — “पंचमोंको इसमें दाखिला नहीं दिया जाता।”) यह तो मुझे एक नई बातका पता लगा। पंचमों और मुसलमानों, दोनोंके लिए इस संस्थाके द्वार खोल देने चाहिए। यदि यहाँ पंचमोंको दाखिला नहीं दिया जायेगा तो मैं इसे हिन्दू संस्था माननेसे इनकार करता हूँ। (सुन्दर! खूब!) हिन्दू संस्था होनेका मतलब यह तो नहीं होता कि कोई पंचम या मुसलमान यहाँ<noinclude></noinclude> j25rcmprn90d1gbivla03abo8cw87zt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६२ 250 187514 675421 645946 2026-08-30T18:13:07Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675421 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} पढ़ न सके। मैं समझता हूँ कि अब समय आ गया है कि ट्रस्टी लोग इसकी नियमावलीमें रद्दोबदल करें। इसे मेरी ओरसे प्रस्तुत एक याचिका समझिए। याद रखिए कि यह याचिका व्यर्थकी उखाड़-पछाड़ करनेवाले किसी तथाकथित सुधारक द्वारा नहीं प्रस्तुत की जा रही है। इसे प्रस्तुत करनेवाला एक सच्चा हिन्दू है, जो ईश्वरसे भय खानेवाला है, जिसकी नस-नसमें हिन्दुत्व हिलोरें ले रहा है और जो हिन्दू धर्मके सर्वश्रेष्ठ आदर्शोंपर चलनेका प्रयास कर रहा है। प्रधानाचार्य महोदय, कृपया आप मेरी इस याचिकाको सम्बन्धित लोगोंके पास पहुँचा दें। यदि इस प्रान्तका दौरा करते हुए मुझे यह सुननेको मिले कि मेरी याचिकापर कार्रवाई हो गई है तो यह मेरे लिए बड़े हर्षका विषय होगा। मेरा यह सन्देश सुननेके लिए आपको धन्यवाद।<ref>प्रधानाचार्यने अपने धन्यवाद-ज्ञापन भाषणके दौरान कहा कि कॉलेजके द्वार सभी वर्गोंके लिए खोलनेके प्रयत्न चल रहे हैं।</ref> :[अंग्रेजीसे] यंग इंडिया, १५-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४२०. भाषण : रायपुरम्, मद्रासमें'''<ref>कालमण्डपम् मैदानमें।</ref>}}}} {{right|७ सितम्बर, १९२७}} {{left|मित्रो,}} खादीके निमित्त दी गई आपकी थैली और आपके मानपत्रके लिए धन्यवाद। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि आप कांग्रेसके सभी कामोंमें दिलचस्पी ले रहे हैं। और आपका यह आश्वासन पाकर मुझे बहुत ही खुशी हुई कि आप आगामी कांग्रेस अधिवेशनको पूरे तौरपर सफल बनानेमें अपना योगदान देनेका संकल्प कर चुके हैं। यहाँकी स्वागत-समितिने इस अधिवेशनकी अध्यक्षता करनेके लिए भारतके एक तपे-तपाये सेवकको सर्वसम्मतिसे चुना है। वे एक बहुत बड़े उद्देश्यको लेकर चल रहे हैं और उसी उद्देश्यको पूरा करनेके लिए वे अध्यक्ष-पदका भार अपने सिर ले रहे हैं। डॉ० अन्सारी भारतके गिने-चुने शल्य-चिकित्सकोंमें से हैं, और ऐसे शल्य-चिकित्सककी हैसियतसे वे हिन्दुओं और मुसलमानोंके बीचकी खाईको पाटनेके लिए कृतसंकल्प हैं। मैं जानता हूँ कि अनेक प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियोंने डॉ० अन्सारीके पक्षमें अपना मत इसीलिए दिया है कि उनको बहुत आशाएँ हैं कि उनके कांग्रेस अध्यक्ष बननेसे देशके ये गहरे घाव ठीक हो सकेंगे। लेकिन हमें यह सोचनेकी गलती नहीं करनी चाहिए कि उनको चुन लेनेके बाद फिर हमारा कोई काम ही नहीं रह जाता। मरीजका काम इतनेसे ही पूरा नहीं हो जाता कि वह सबसे समझदार और होशियार शल्य-चिकित्सकको<noinclude></noinclude> id66773ck46q22ulld6r7fw3gfj92er पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६३ 250 187515 675424 645947 2026-08-30T18:15:15Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675424 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण : रायपुरम्, मद्रासमें५२७}} बुला ले। मरीजसे अपने चिकित्सकके साथ तन-मनसे सहयोग करनेकी अपेक्षा रखी जाती है। उसे चिकित्सककी हिदायतोंपर पूरी ईमानदारीके साथ चलना पड़ता है। हम मरीज हैं। हमने अपनी चिकित्साके लिए डॉ० अन्सारीको बुलाया है। उन्होंने जिस कामका बीड़ा उठाया है, यदि हम उसमें उनके साथ सहयोग न करें, तो दोष उनका नहीं, हमारा ही होगा। और चूंकि सबसे अधिक भार मद्रासके कांग्रेसजनों और दक्षिण भारतसे ही सबसे अधिक संख्यामें आनेवाले प्रतिनिधियोंके कंधोंपर पड़ेगा, इसलिए मुझे यह जानकर और भी खुशी हुई कि आप इस कांग्रेस अधिवेशनको सफल बनानेको कटिबद्ध हैं। आपने अपने कंधोंपर बहुत बड़ा और गम्भीर दायित्व ले लिया है। मुझे बतलाया गया है कि श्रीयुत एस० श्रीनिवास अय्यंगार यहाँके कांग्रेस-मन्त्रीके साथ रोज ही टेलीफोन द्वारा संपर्क बनाये रखते हैं। इससे पता चलता है कि उनको कांग्रेसके आगामी अधिवेशनकी कितनी चिन्ता है। अब यह मद्रासके लोगोंका ही काम है कि वे उनके श्रमका भार हलका करें और उनका काम आसान बनायें। हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि नेतागण ही हमारा सारा काम कर देंगे। अक्सर हमारे खिलाफ यह आरोप लगाया जाता है कि साधारण लोग अपनी पूरी शक्ति नहीं लगाते। मैं चाहता हूँ, मद्रास इस आरोपको गलत साबित कर दिखाये। आपने खादी और चरखेमें अपनी आस्था प्रकट की है। आपने अपने मानपत्रमें कहा है कि यदि आपको कपास भेजने और आपके काते हुए सूतको खरीदनेका प्रबन्ध कर दिया जाये तो आप खादीकी कताई-बुनाईका प्रबन्ध कर सकते हैं। आप यदि इस मामलेमें गम्भीर हैं तो आपको एक कदम और आगे जाना होगा। आपको अपनी एक समिति बनाकर अपने लिए कपासका खुद प्रबन्ध करना पड़ेगा। हर कतैयेको कताईमें सिद्धहस्त बननेके लिए धुनना और अपनी पूनियाँ आप बनाना भी सीखना चाहिए। आपका लक्ष्य यही रहना चाहिए कि जितना सूत तैयार हो, उस सबको यहीं बुन लिया जाये। खादी तैयार करनेका यही सबसे अच्छा और सस्ता तरीका है। अगर आप खुद बुनाई नहीं कर सकते तो अखिल भारतीय चरखा संघको दे सकते हैं। उसको यदि बढ़िया किस्मका, मजबूत, इकसार बुना जाने लायक सूत मिले तो वह आपका सारा का सारा सूत खरीद सकता है। मुझे मालूम है कि यह एक मजदूर-केन्द्र है। मैं अपने साथी मजदूरोंसे बस एक ही बात कहूँगा। जैसे भी हो, आपको शराबखोरी छोड़ देनी चाहिए और जुए तथा अन्य बुराइयोंसे भी हर तरह दूर रहना चाहिए। शराबखोरीका यह अभिशाप मजदूरोंके नैतिक और शारीरिक शक्तिको नष्ट कर रहा है। मजदूर भाई अगर कमर कस लें तो इस अभिशापसे छुटकारा पाना उनके लिए बहुत कठिन नहीं है। भारतीय मजदूर यदि अपनी सहायता आप करनेको तत्पर हो जायें तो उनका भविष्य सचमुच उज्ज्वल है। अपनी सहायता आप करनेका सबसे अच्छा तरीका है आत्मशुद्धि। मजदूरोंको यह भी याद रखना चाहिए कि आर्थिक दृष्टिसे हमारे देशके करोड़ों व्यक्ति उनसे भी बुरी स्थितिमें हैं। यदि मजदूर लोग अपनेसे कहीं अधिक गरीबीमें रहनेवाले उन भाई-बहनोंका कुछ खयाल करें तो वे कम-से-कम खादीको तो अपना ही लेंगे। मैं जानता हूँ कि यहाँ उपस्थित सभी भाई-बहनोंने इस थैलीके लिए<noinclude></noinclude> f3iuqpiwxq0gqjt6umg7u32ekufhw9v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६४ 250 187516 675429 645948 2026-08-30T18:17:09Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675429 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} चन्दा नहीं दिया है। स्वयंसेवक लोग अभी आपके पास जायेंगे और आपकी इच्छा हो तो कुछ-न-कुछ चन्दा देनेकी कृपा कीजिए। लेकिन जिसे खादीमें विश्वास न हो, उसे एक पाई भी देनेकी जरूरत नहीं। गरीबकी एक पाई भी उतनी ही कीमत रखती है, जितनी कि अमीरोंके दिये हुए रुपये, बशर्ते कि दोनों ही सच्चे मनसे स्वेच्छापूर्वक दिये जायें। अभी-अभी मुझसे यह अनुरोध किया गया है कि मैं नीलकी मूर्तिके सिलसिलेमें चल रहे सत्याग्रहके बारेमें भी कुछ कहूँ। मेरे मनमें जो भी था, मैं समुद्र-तटकी सभामें कह चुका हूँ।<ref>देखिए "भाषण : मद्रासकी सार्वजनिक सभामें", ४-९-१९२७।</ref> इस मामलेपर मुझसे बातचीत करनेके लिए आनेवाले स्वयंसेवकोंको मैंने कल एक घंटेसे अधिक और आज भी एक घंटेसे कुछ ज्यादा ही समय दिया। आप एक-दो दिनोंमें इस बातचीतका सार समाचारपत्रोंमें देखेंगे और इसकी जो टीपें ली गई हैं, वे जैसे ही मुझे मिलेंगी, उन्हें देख सुधारकर मैं प्रकाशनार्थ दे दूँगा और तब आपको इस बातचीतका प्रामाणिक विवरण भी देखनेको मिल जायेगा।<ref>देखिए "बातचीत : नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे", ६ और ७-९-१९२७।</ref> पर यहाँ मैं इतना जरूर कह देना चाहता हूँ कि इसका ध्येय मुझे बहुत ही ठीक लगता है। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उस स्थानसे वह मूर्ति हटा दी जानी चाहिए। मैंने उसपर अंकित वाक्य देखे हैं। उनमें इतिहासको गलत ढंगसे पेश किया गया है।<ref>देखिए खण्ड ३५।</ref> वहाँ वह मूर्ति खड़ी राष्ट्रका निरन्तर अपमान करती रहती है और स्वयंसेवक हमारी बधाईके पात्र हैं कि उन्होंने इस प्रकार स्वयं कष्ट सहन करके उस मूर्ति की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। परन्तु इस संसारमें हर अच्छा उद्देश्य या बहुत-से अच्छे उद्देश्य कुप्रबन्ध और उनको पूरा करनेके लिए समझदारीसे काम न करनेके कारण विफल होते देखे गये हैं। इसलिए यदि स्वयंसेवक अपना संघर्ष जारी रखनेका फैसला करते हैं तो उनको इतनी सावधानी रखनी चाहिए कि आन्दोलनमें गन्दगी न आने पाये। सत्याग्रह बड़ा सुन्दर अस्त्र तो है, पर वह बड़ा खतरनाक भी है। यदि इसमें गन्दगीका थोड़ा-सा भी पुट आ जाये तो यह एक बड़ा खतरनाक अस्त्र बन जाता है। जिस प्रकार पौष्टिक-से-पौष्टिक दूधको जहरकी छोटी-सी बूँद ही पीने लायक नहीं रहने देती, उसी प्रकार किंचित् अशुद्धता ही सत्याग्रह-संघर्षको आन्दोलनके मूल उद्देश्य और आन्दोलनकर्त्ताओंके लिए खतरनाक अस्त्र बना देती है। यदि सत्याग्रही थोड़ी भी हिंसा कर बैठें या सत्यके पथसे किंचित् भी भटक जायें, तो उनको और उनके ध्येयको बड़ी हानि पहुँचेगी। सत्याग्रहमें गोपनीयताके लिए कहीं कोई स्थान नहीं। संसारमें युद्धके जितने भी तरीके हैं, मैं तो उनमें सबसे अधिक अगोपन सत्याग्रहको ही मानता हूँ। इसी प्रकार सत्याग्रहमें कायरताके लिए कोई स्थान नहीं। यदि कोई व्यक्ति अपने किसी स्वार्थसे प्रेरित होकर सत्याग्रहका प्रचार करेगा तो स्वयं हानि उठायेगा। सत्याग्रह कष्ट-सहनका सार है, इसलिए इस अस्त्रका इस्ते-<noinclude></noinclude> gmatvnns0drp31j0hijlmi3pbmqsglk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६५ 250 187517 675433 645949 2026-08-30T18:18:57Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675433 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh||पूर्ण मद्य-निषेध|५२९}} माल करनेके लिए नाममात्रका आर्थिक सहारा भी दरकार नहीं। स्वेच्छासे जितना अधिक कष्ट सहन किया जायेगा, उतनी ही शीघ्रतासे और उतनी ही अधिक शुद्ध किस्मकी सफलता मिलेगी। इसलिए यदि सत्याग्रही लोग इन शर्तों और अपनी मर्यादाको भलीभाँति समझकर अपना काम ठीकसे करेंगे, और ये सभी शर्तें पूरी करते चलेंगे तो उन्हें विश्वास रखना चाहिए कि उनकी सफलता निश्चित है। यदि उनमें ऐसी योग्यताएँ न हों और यदि इन शर्तोंपर उनको विश्वास न हो तो उनको सत्याग्रहका मार्ग त्याग देना चाहिए। इन शर्तोंको पूरा करनेकी सामर्थ्य न होनेके कारण यदि वे सत्याग्रहका खयाल छोड़ दें, तो उनके इस कार्यको मैं साहसपूर्ण मानूँगा। अपनी भूलें स्वीकार करने और अपनी सीमाएँ समझकर कदम पीछे हटा लेनेके लिए भी थोड़े साहसकी जरूरत पड़ती है। परन्तु यदि सत्याग्रही लोग मेरी बतलाई हुई इन शर्तोंको पूरा कर सकते हैं तो मैं उनको आशीर्वाद देता हूँ और प्रत्येक देशभक्तको उनको प्रोत्साहन और आशीर्वाद देना चाहिए। :[अंग्रेजीसे] हिन्दू, ८-९-१९२७ {{c|{{larger|'''४२१. पूर्ण मद्य-निषेध'''}}}} आप यह बात समझ लीजिए कि शराब बनाने, तैयार करने और उसे अपने पास रखने आदिके बारेमें मौजूदा आबकारी अधिनियममें किये जानेवाले परिवर्तनोंका, काफी बड़ी हदतक, अनिवार्य परिणाम यह होगा कि लोगोंको परेशान होना पड़ेगा। आपको ऐसी परेशानीके लिए तैयार रहना चाहिए। मद्य-निषेधका यह एक अनिवार्य पहलू है। इसलिए मुझे यह भरोसा करके ही चलना है कि आप लोग इस काममें सहायता देनेमें किसी तरहकी कोताही नहीं करेंगे। दुकानोंपर धरना देने, लोगोंको शराबकी बुराइयाँ समझाने और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिए मैं आपकी सहायता नहीं लेना चाहता। जिस उद्देश्यके लिए मैं आपकी सहायता चाहता हूँ वह यह है कि अवैध शराब और उससे सम्बन्धित दूसरे अपराध बन्द हो सकें। यह उद्धरण मद्रासके लोक स्वास्थ्य एवं आबकारी मन्त्रीके भाषणके 'हिन्दू' द्वारा प्रकाशित विवरणसे लिया गया है। मन्त्री महोदयने एक और बातमें भी जनतासे सहायता माँगी है; यह कि वे कर-वृद्धिको खुशी-खुशी स्वीकार कर लें। इसके बारेमें मैं इस समय इससे अधिक कुछ नहीं कहूँगा कि जनता जहाँ भी इस योग्य हो, उसे आवश्यकताका प्रमाण मिल जानेपर कर-वृद्धिको स्वीकार कर लेना चाहिए। पूर्ण मद्य-निषेधका उद्देश्य पूरा करनेके लिए रुपये-पैसेके रूपमें जो भी कीमत चुकानी पड़े, थोड़ी ही होगी। लेकिन अभी तो मैं इस उद्धरणकी ही बात करूँगा। मुझे तो लगता है कि मन्त्री महोदयने मद्य-निषेधको गलत ढंगसे देखा है। मेरी रायमें इस कामको आंशिक<noinclude></noinclude> 9lcx6zcpuf7dmy8lczlxy0b45b4szbh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/५६६ 250 187518 675436 645950 2026-08-30T18:20:50Z Somya Shaw 6839 /* शोधित */ 675436 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Somya Shaw" /></noinclude>{{rh|५३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} तौरपर शुरू किया ही नहीं जाना चाहिए। यह तभी सफल होगा जब इसे पूरे तौरपर, सारे देशमें लागू किया जाये। यह एक-दो जिलोंकी नहीं, अखिल भारतीय समस्या है। मैंने अपनी राय बिना किसी हिचकिचाहटके प्रकट कर दी है। मेरी राय यह है कि साम्राज्य सरकारने आमदनीका यह सबसे अनैतिकतापूर्ण स्रोत प्रान्तोंको सौंपकर और इस प्रकार भारतीय युवकोंकी शिक्षाका खर्च पूरा करनेके लिए इस कलंकपूर्ण आयको ही एकमात्र साधन बनाकर बहुत दुष्टतापूर्ण काम किया है। लेकिन, मन्त्री महोदयके भाषणकी जिस बातसे मेरे मनको सबसे अधिक पीड़ा पहुँची है वह यह है कि जनसाधारणके कल्याणसे सम्बन्धित इस प्रश्नको भी वे बहुत सतही और सरसरी तौरपर निबटानेका प्रयत्न कर रहे हैं। यदि वे जनतासे यह अपेक्षा करते हैं कि वह उनकी इस योजनाको कार्यान्वित करनेके लिए पुलिसका काम करे तो स्पष्ट है कि वे खुद ही अपनी योजनाको गम्भीरतासे नहीं देख रहे हैं। और फिर वे यह कहकर जनताको डराते क्यों हैं कि मद्य-निषेधका प्रयोग करनेपर उन्हें 'परेशान होना पड़ेगा'? क्या चोरी या बन्दूककी बारूद बनानेको अपराध घोषित कर देनेसे जनताको परेशान होना पड़ता है? क्या लाइसेंस लिये बिना शराब खींचना आज भी एक अपराध नहीं माना जाता? इसलिए मन्त्री महोदयका आशय यह है कि आज जिन लोगोंके पास शराब खींचने या बेचनेके लाइसेंस हैं, मद्य-निषेध लागू होनेके बाद वे चोरीसे शराब खींचने लगेंगे और इसलिए उनको परेशान होना पड़ेगा। उस स्थितिमें जनताको परेशान होनेकी कोई बात ही नहीं उठती। अगर मन्त्री महोदय यह समझते हों कि मद्य-निषेध करनेके लिए उनको मद्य-निषेधकी घोषणा कर देने और फिर उनके द्वारा बनाये कानूनोंको भंग करनेवालोंके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनेसे आगे उन्हें कुछ नहीं करना है तो इससे यही प्रकट होता है कि उनमें सूझ-बूझकी कमी है और उनको जनतासे वास्तवमें कोई सहानुभूति नहीं है। मैं उनको यह बतलानेकी धृष्टता करता हूँ कि कानूनी कार्रवाई करना तो मद्य-निषेधके कार्यक्रमका एक सबसे छोटा और ध्वंसात्मक अंश ही है। मद्य-निषेध कार्यक्रमका एक अधिक बड़ा और रचनात्मक पहलू भी है। लोग अपनी वर्तमान असहाय अवस्थाके कारण शराब पीते हैं। कारखानोंके मजदूर और ऐसे ही अन्य लोग शराबखोरी करते हैं। वे अपने-आपको समाजमें अकेला और उपेक्षित महसूस करते हैं और तब वे शराबकी ओर झुकते हैं। जिस प्रकार शराबसे दूर रहनेवाले लोगोंके लिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वे स्वभावसे ही सन्त हैं, उसी प्रकार शराब पीनेवालोंके बारेमें भी यह कहना ठीक नहीं होगा कि वे स्वभावसे ही बुरे हैं। अधिकांश लोग अपने सामाजिक वातावरणसे नियन्त्रित होते हैं। जो भी मन्त्री मद्य-निषेधको सफल बनानेके लिए सचमुच उत्सुक होगा, वह अपने अन्दर सुधारकों-जैसे गुण और उत्साह पैदा करेगा। तब उसे जनतासे ठीक वही सहायता दरकार होगी, जिसे मद्रासके इन मन्त्री महोदयने बिलकुल ही व्यर्थ समझा है। मेरी विनम्र रायमें तो उनको सचमुच धरना देनेवालों और “लोगोंको शराबकी बुराइयाँ समझाने” और “ऐसे ही अन्य कार्य करनेवाले” स्त्री-पुरुषोंकी ही जरूरत है। ठीक इसी प्रकारके कार्योंके<noinclude></noinclude> deteztu06u23tgtek0gm5o02e2h0fpn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६४४ 250 187596 675215 675211 2026-08-30T12:00:55Z सीमा1 430 675215 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|अपील : तमिलनाडसे, ४००-१; एक अपील, ३३०-३१}} {{outdent|टिप्पणी, ८६-८८; -बेलूर मन्दिरकी दर्शक-पुस्तिकामें, ४०९ - [णियां ], ५-७,५३-५५, १२८-३०, २२७-२९, ३५०-५४, ४२९-३१;}} {{outdent|तार : अब्राह्मणोंकी परिषद्को, ४५५; -जमना- लाल बजाजको, ३१७; - मीराबहनको,३११, ४७९, ४९७, ५४८; -मोतीलाल नेहरूको, ४२५ - रामेश्वरदास पोद्दारको, ५५; - वल्लभभाई पटेलको,३१८; - सरोजिनी नायडूको, ३१८}} {{outdent|(एक) पत्र, ३६-३७, ६९, १२७-२८, १५२- ५३, १७३, २४५, २५७, ४०५-६}} {{outdent|पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको, २९-३०; - अब्बास तैयबजी को, ३७-३८; - अलवीको, ७८-७९ ; -आनन्दीबाईको, ४१७; -आर० बी० ग्रेगको १५-१६, २९७; - आश्रमकी बहनोंको, ४२, ६८-६९, ११४, १६३-६४, २१४-१५, २५२, २९२-९३, ३२५, ३८४, ४१४, ४५६-५७, ४९९-५००, ५६८-६९; - ई० एस० पटवर्धनको, ३२७; - उत्तम भिक्खुको, १९७; -ए० आई० काजीको १९५, ३७५; - ए० ए० पॉलको, १३, ३७९; - ए० फेनर ब्रॉकवेको, १२०-२१; - ए० बकीको, ३५६-५७; - ए० रंगस्वामी 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टी० आदिनारायण चेट्टियारको, ८९-९० टी० आर० कृष्णस्वामी अय्यरको, ४२० टी० आर० महादेव अय्यरको, २७४-७५, ३३४- ३५, ४२२, ४६१; टी० टी० शर्मनको, २७५; -टी० डब्ल्यू० कलानीको,४०३; - टी० परमशिव अय्यरको, २७२-७३, ३५८; - डब्ल्यू० बी० स्टोवरको,१०-११; - डब्ल्यू ० ल्यूतॉस्तॉवस्कीको, ३१६-१७; - डी० सी० बोसको, १७०- {{multicol-break}} ७१; -तारा मोदीको, ७०; -तारिणी-प्रसाद सिन्हाको २६६; -द० बा० कालेलकरको, ७३-७४; - देवचन्द पारेखको, ३८०-८१; -देवी वेस्टको, ४५-४६ ; - देवेन्द्रनाथ मित्रको, ३८-३९; {{Multicol-end}} शीर्षक सांकेतिका ३४-३९ ६०९ - देवेश्वर सिद्धान्तालंकारको, ३९०- ९१; -नरगिस कैप्टेनको, १९८, २६९- ७०; - नाजुकलाल नन्दलाल चोकसीको, ७५, १६०, २३८; ना० मो० खरेको, ५७८-७९; -पी० आर० सुब्रह्मण्य शास्त्रीको, ८९; -पी० के० चार्लुको, ६०; - पी० राजगोपाल अय्यरको, ६१; - प्रभावतीको, २७२; -प्रभा- शंकर पट्टणीको, ५६८; फीरोजा पी० एस० तलयारखांको, २३-२४; फूलचन्द शाहको ८०; - फैन्सिस्का स्टैंडेनेथको, २६५-६६ ; -बनारसीदास चतुर्वेदीको, ७६; - बलवन्तराय मेहता- को, ४७७-७८; -बाल कालेलकरको, ३६४-६६, ४७४-७५; - बालकृष्णको, ३८८-८९ ; - ( डॉ०) बा० शि० मुंजे- को, १७, २८५; -बी० एफ० भरूचा- को, ९२-९३, १४०-४३; बी० गोपालाचारको, ४०७-८; - (श्रीमती) ब्लेयरको, ७२; - मणिबहन पटेलको, ३८५, ३८५-८६, ४२३-२४; -मणि-· लाल और सुशीला गांधीको, ३४-३५, ११८-१९, ३८१-८२, ४४३; -मथुरा- दासको, ३३-३४; - मनोरमादेवीको, २३; - (श्रीमती) माणिकबाई बहा- दुरजीको १३-१४ - मिर्जा एम० इस्माइलको, १६; ११२-१३, ११३, - मीराबहनको, १२०, १४४, १४७-४८, १५६-५७, १६९, १९४- ९५, २०३, २१७-१८, २३३, २५१- ५२, २६४, २८९, ३१०-११, ३२०,<noinclude></noinclude> t8z0cybxmzs7ylviigc6y8jun1upqiw 675319 675309 2026-08-30T16:27:14Z सीमा1 430 675319 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{Multicol}} {{outdent|-गंगाबहन वैद्यको, ५६७;-गंगूको, १;}} {{outdent|-गिरिराज किशोरको, १२१-२२;}} {{outdent|-(डॉ०) गुरुदास रायको २९४-९५;}} {{outdent|-गुलजार मुहम्मद अकील 'को, ३२१- २२, ४७२; -गो० कृ० देवधरको,४८-४९; -गोपालरावको, १५७-५९;}} {{outdent|-घनश्यामदास बिड़लाको, ४९-५०,२२२; -चेंगिया चेट्टीको,२५४-५५;}} {{outdent|-छगनलाल जोशीको, ३३७, ३८६-८७,४१४-१५, ४१५-१६; -जगमोहन 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{{Multicol-end}} {{outdent|-- देवेश्वर सिद्धान्तालंकारको, ३९०-९१; -नरगिस कैप्टेनको, १९८, २६९- ७०; - नाजुकलाल नन्दलाल चोकसीको,७५, १६०, २३८; ना० मो० खरेको, ५७८-७९; -पी० आर० सुब्रह्मण्य शास्त्रीको, ८९; -पी० के० चार्लुको,६०; - पी० राजगोपाल अय्यरको, ६१; - प्रभावतीको, २७२; -प्रभाशंकर पट्टणीको, ५६८; फीरोजा पी० एस० तलयारखांको, २३-२४;फूलचन्द शाहको ८०; - फैन्सिस्का स्टैंडेनेथको, २६५-६६ ; -बनारसीदास चतुर्वेदीको, ७६; - बलवन्तराय मेहताको, ४७७-७८; -बाल कालेलकरको, ३६४-६६, ४७४-७५; -बालकृष्णको, ३८८-८९ ; -(डॉ०) बा० शि० मुंजेको, १७, २८५; -बी० एफ० भरूचाको, ९२-९३, १४०-४३; बी० गोपालाचारको, ४०७-८; - (श्रीमती) ब्लेयरको, ७२; - मणिबहन पटेलको, ३८५, ३८५-८६, ४२३-२४; -मणिलाल और सुशीला गांधीको, ३४-३५, ११८-१९, ३८१-८२, ४४३; -मथुरादासको, ३३-३४; - मनोरमादेवीको, २३; -(श्रीमती) माणिकबाई बहादुरजीको १३-१४ -मिर्जा एम० इस्माइलको, १६; ११२-१३, ११३, - मीराबहनको, १२०, १४४, १४७-४८, १५६-५७, १६९, १९४-९५, २०३, २१७-१८, २३३,२५१-५२, २६४, २८९, ३१०-११, ३२०,}}<noinclude>३४-३९</noinclude> fo88gw3vdoh9gqixqha3hzc5egl2nva 675327 675319 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-शंकर- को, २९८; - शान्तिकुमार मोरारजीको, ५००; -शापुरजी सकलातवालाको, १७०, २६७; -शारदाको, ४१८ ; -शाह चमनलाल डुंगाजीको, - सतीशचन्द्र दासगुप्तको, २२, ११७- १८, २१३-१४, ३२३-२४, ४७० ; - (डॉ० ) सत्यपालको, ४२३; - सन्तोजी महाराजको, ९५-१००; -सरोजिनी नायडूको, ६२, ९०; -सांगली इंडस्ट्रि- ६३; यल एंड एग्रिकल्चरल स्कूलके प्रिंसिपल- को, २४; - सातवलेकरको, ४५; -सी० एफ० एन्ड्रयूजको, ३१, ३७४- ७५; - सी० वी० वैद्यको, २६८, २९४; - सुन्दरलाल माथुरको, २४७; -सुरेन्द्र- को, ७४-७५; -सूरजप्रसाद माथुरको, २१०-११; -सोंजा श्लेसिनको, ९, ३७६-७७; - स्वामीको ३०७-१०, ३२९-३०; - हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय- को, ३२, ५९, ९१; - हिन्दी साहित्य सम्मेलनके मन्त्रीको, १२६, २९१; -हेलेन हॉसडिंगको, ५६, २१९-२०, ३५७ बातचीत : कुम्भकोणम् में पण्डितोंके साथ, ५८३-८४; -नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे, ५०७-१९; - मिशनरियोंके साथ, २८०-८३ भाषण : अखिल कर्नाटक हिन्दी सम्मेलन, बंगलोर में, १५५-५६; -अर्काटमें, ४७६-७७; -आदि कर्नाटक विद्या- थियोंके समक्ष, १४३-४४, २३६-३७, ४४८; - आरनीमें, ४७६; -आरसी- केरेकी सार्वजनिक सभामें, ४१०-११ ; -आरसीकेरे जंकशनपर लम्बानियोंके समक्ष, २९३; - इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइन्समें, १६६-६८; - एमेच्योर ड्रमैटिक एसोसिएशन, मैसूरमें, १४९; -कडलूरकी सार्वजनिक सभामें, ५५२- ५७; - कांजीवरम् में, ५३३-३६; - कुम्भ- कोणम्में, ५७९-८३; -कृष्णगिरिमें, ४२५-२७; -'गीता' पर, मद्रासमें, ४९५-९७; -गुजरातियों और मार- वाड़ियोंके समक्ष, मद्रासमें, ५३७-३८; - चामराजेन्द्र संस्कृत पाठशालामें, २८७-८८; - चि० रं० दासके बारेमें,<noinclude></noinclude> 3tmdem72qppl8qy15gf69tnafoa9ien 675368 675334 2026-08-30T17:38:28Z सीमा1 430 /* शोधित */ 675368 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|६१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय }}</noinclude>{{Outdent|३७२-७४, ३८३-८४, ४११-१२,४३४-३६, ४५५-५६, ४९७-९८,५०६, ५६५-६६, ५७०, ५७७;}} {{Outdent|-(डॉ०) मु० अ० अन्सारीको, ३३१-३४, ४३७-३८;–मूलचन्द अग्रवालको,३१५, ; - मैसूरके महाराजाको, ३१२;}} {{Outdent|-मोतीलाल नेहरूको, ३२-३३, ९४-९५, १७२, ४३८-३९; -य० पारनेरकरको, २३५, ३२३; -राजकिशोरी मेहरोत्राको, ७६, २५६;}} {{Outdent|- राधासुन्दर दासको, २७६; -रामदास गांधीको,२९१-९२, 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-बंगलोर में व्यायामशालाके उद्घाटन के अवसरपर, ४४६-४७ ;-बंगलोर में स्वयंसेवकोंके समक्ष, ४४४-४५; - भद्रावती में, ३९९; -मद्दागिरिमें, १९९१-९२; -मद्य-निषेधके बारेमें, मद्रास में, ५०१-५; -मद्रासको सार्वजनिक सभामें, ४९३-९५; -मद्रास में विद्यार्थियोंके समक्ष, ४८१-८४; -मन्नार-}} {{multicol-break}} {{outdent|{{gap}}गुडिकी सार्वजनिक सभामें, ५९८-६००; -मन्नारगुडिके नेशनल हाईस्कूलमें, ५९५-९६; -महिला समाज, बंगलोर में,१७३; -महिलाओंके समक्ष, मद्रासमें, ५३८-४० ; -मायावरम् में, ५७१-७६;-मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में,१६४-६६; -मैसूरके हिन्दी भाषा सेवा-समाजमें, २२३-२४; -मैसूरमें भेंट किये गये मानपत्रोंके उत्तरमें, २२५-२७ -मैसूरमें विदाई समारोहके २३९-४१; -मैसूरमें विद्यार्थियोंके समक्ष, २१५-१७; -रायपुरम्, मद्रासमें, ५२६-२९; -वलंगँमानमें ५९४-९५ -वाई० एम० सी० ए०, कडलूरमें, ५४८-५१; -वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें, ४८७-९३; -वेलूर मन्दिरमें, ४१०; -वेल्लूरकी सार्वजनिक सभामें, ४६२-६४; -वेल्लूरके वूरीज कॉलेज में, ४५७-६१; -शिमोगा में, ३८३; -सेंट टॉमस माउंट, मद्रासमें,५४५-४६; - हरिहरमें, ३७०; -हासन- के टाउन 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-मायावरम् में, ५७१-७६;-मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में,१६४-६६; -मैसूरके हिन्दी भाषा सेवा-समाजमें, २२३-२४; -मैसूरमें भेंट किये गये मानपत्रोंके उत्तरमें, २२५-२७ -मैसूरमें विदाई समारोहके २३९-४१; -मैसूरमें विद्यार्थियोंके समक्ष, २१५-१७; -रायपुरम्, मद्रासमें, ५२६-२९; -वलंगँमानमें ५९४-९५ -वाई० एम० सी० ए०, कडलूरमें, ५४८-५१; -वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें, ४८७-९३; -वेलूर मन्दिरमें, ४१०; -वेल्लूरकी सार्वजनिक सभामें, ४६२-६४; -वेल्लूरके वूरीज कॉलेज में, ४५७-६१; -शिमोगा में, ३८३; -सेंट टॉमस माउंट, मद्रासमें,५४५-४६; - हरिहरमें, ३७०; -हासन-के टाउन हॉलमें, २९९-३००; -हिन्दी प्रचार कार्यालय में ५०५-६; देखिए विदाई भाषण भी}} {{outdent|भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको, ४५७; -श्री और श्रीमती बियरमको, १७४-७५; 'हिन्दू' के प्रतिनिधिसे, ५४६-४७ }} {{outdent|विदाई भाषण : बंगलोरकी प्रार्थना सभामें,४५४-५५}}{{outdent|विदाई सन्देश : विद्यार्थियोंको, ४१९}} {{outdent|सन्देश : दक्षिण भारतके लोगोंको, ९३;-' फॉरवर्ड' को, ८८-८९ : -रजत जयन्ती के लिए, ३१३ –सर्चलाइटको,भी १६८; देखिए विदाई-सन्देश भी}} 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-बंगलोरके यूनाइटेड थियोलॉजिकल कॉलेजमें, २५८-६०;- बंगलोर खादी-प्रदर्शनी के समापनके अवसरपर १४५-४७ -बंगलोर नगरपालिका मानपत्रके उत्तरमें, १९९-२००; -बंगलोर में व्यायामशालाके उद्घाटन के अवसरपर, ४४६-४७ ;-बंगलोर में स्वयंसेवकोंके समक्ष, ४४४-४५; - भद्रावती में, ३९९; -मद्दागिरिमें, १९९१-९२; -मद्य-निषेधके बारेमें, मद्रास में, ५०१-५; -मद्रासको सार्वजनिक सभामें, ४९३-९५; -मद्रास में विद्यार्थियोंके समक्ष, ४८१-८४; -मन्नार- {{multicol-break}} गुडिकी सार्वजनिक सभामें, ५९८-६००; -मन्नारगुडिके नेशनल हाईस्कूलमें, ५९५-९६; -महिला समाज, बंगलोर में,१७३; -महिलाओंके समक्ष, मद्रासमें, ५३८-४० ; -मायावरम् में, ५७१-७६;-मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में,१६४-६६; -मैसूरके हिन्दी भाषा सेवा-समाजमें, २२३-२४; -मैसूरमें भेंट किये गये मानपत्रोंके उत्तरमें, २२५-२७ -मैसूरमें विदाई समारोहके २३९-४१; -मैसूरमें विद्यार्थियोंके समक्ष, २१५-१७; -रायपुरम्, मद्रासमें, ५२६-२९; -वलंगँमानमें ५९४-९५ -वाई० एम० सी० ए०, कडलूरमें, ५४८-५१; -वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें, ४८७-९३; -वेलूर मन्दिरमें, ४१०; -वेल्लूरकी सार्वजनिक सभामें, ४६२-६४; 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गुडिकी सार्वजनिक सभामें, ५९८-६००; -मन्नारगुडिके नेशनल हाईस्कूलमें, ५९५-९६; -महिला समाज, बंगलोर में,१७३; -महिलाओंके समक्ष, मद्रासमें, ५३८-४० ; -मायावरम् में, ५७१-७६;-मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में,१६४-६६; -मैसूरके हिन्दी भाषा सेवा-समाजमें, २२३-२४; -मैसूरमें भेंट किये गये मानपत्रोंके उत्तरमें, २२५-२७ -मैसूरमें विदाई समारोहके २३९-४१; -मैसूरमें विद्यार्थियोंके समक्ष, २१५-१७; -रायपुरम्, मद्रासमें, ५२६-२९; -वलंगँमानमें ५९४-९५ -वाई० एम० सी० ए०, कडलूरमें, ५४८-५१; -वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें, ४८७-९३; -वेलूर मन्दिरमें, ४१०; -वेल्लूरकी सार्वजनिक सभामें, ४६२-६४; -वेल्लूरके वूरीज कॉलेज में, ४५७-६१; -शिमोगा में, ३८३; -सेंट टॉमस माउंट, मद्रासमें,५४५-४६; - हरिहरमें, ३७०; -हासन-के टाउन हॉलमें, २९९-३००; -हिन्दी प्रचार कार्यालय में ५०५-६; देखिए विदाई भाषण भी {{outdent|भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको, ४५७; -श्री और श्रीमती बियरमको, १७४-७५; 'हिन्दू' के प्रतिनिधिसे, ५४६-४७}} {{outdent|विदाई भाषण : बंगलोरकी प्रार्थना सभामें,४५४-५५}}{{outdent|विदाई सन्देश : विद्यार्थियोंको, ४१९}} 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", ५५८-५९; काशी विद्यापीठ, ८८; गाँवोंमें मवेशियोंकी दशाका सुधार, ३०३-४; गुजरातकी तबाही, ३४०; गुजरातकी सहायता करें, ३०४-५, चित्तरंजन सेवा सदन, ८३; 'जी' वार्ड जिला कांग्रेस कमेटी खादी भण्डार, २३३; दक्षिण आफ्रिकावासी भारतीय, ३३८-३९; दीक्षा कौन ले ?, ४४२-४३; दृढ़ताकी कसौटी, ३४९-५०; दो तुलाएँ, १५०-५१; धर्मके नामपर झगड़ा, २५-२६; 'नवजीवन' देवनागरी में, ६६-६७; नाली-निरीक्षककी रिपोर्ट, ५८४-९४; निष्कलंक मजदूरी, १००-१; परोपकारी डाक्टर, ६७-६८; पिंजरापोलोंका {{multicol-break}} {{outdent|सुधार, १७५-७८; पिंजरापोलोंके समक्ष उपस्थित काम, १३५-३७; पिछड़े वर्ग, ३९७-९८; पूर्ण मद्य-निषेध, ५२९-३१; प्रकृतिका 'कोप', २८८-८९; प्रदर्शनीमें बिक्री, ३००; बंगलोर खादी-प्रदर्शनी, ८४-८६ ; बाढ़ के बाद, ४८४-८७; बाढ़से शिक्षा, ३९१-९६; भारतीय जहाजरानी,३०१-२; मानवोचित गुणोंका विकास करनेवाला युद्ध, ३४५-४७; मूलचन्द अग्रवालके प्रश्नोंके उत्तर, ३१३-१५; मैसूरमें गो-रक्षा,१३०-३२; युगों पुरानी समस्या, १३७-४०; राजनीतिक संगठन क्या है ?, १३३-३५; रानीपरज जाँच समिति, ७-८; लंकाशायर गुट, ५०-५२; वर्णसंकर सन्तानकी समस्या, ४४०-४२; विद्यार्थी और 'गीता',४२७-२९; विद्यार्थियोंकी कसौटी, ५५७; संयमका नियम, ४३२; सच्चा विज्ञान और सच्ची कला, ३४७-४९; सच्चा श्राद्ध, ४६७; सत्याग्रहकी सीमाएँ, १७१-८५; समान तुलावर, १८५-८७ सांस्कृतिक कताई, ३०२; स्वदेशी बनाम विदेशी, २७-२८; स्वयंसेवकोंसे, ३७०-७२; स्वास्थ्य-रक्षा कैसे करें, ४६८-६९; हमारा कलंक, ८०-८२;हमारी सभ्यता, ५३१-३२; हिन्दू-मुस्लिम एकता, २-५ {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> i5jmz1skgtjtvg243vzwde6ev8p5aoi 675422 675420 2026-08-30T18:13:27Z सीमा1 430 675422 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|६१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{c|'''विविध'''}} {{gap}}अखिल भारतीय लिपि, १७९-८१ ; अनुकरणीय, ३५५; अनेकतामें एकता,३४२-४५; अन्धे कतैये, ४३३-३४; अभावग्रस्त नगरपालिकाएँ, २३०-३२; इस परमार्थ-साधकका स्वागत करें, ३४१;इसे भी विवाह कहेंगे ?, ४६५-६६; एक और खादी-मण्डार, ३३८; एक विद्यार्थीकी परेशानी, १०१-५; एक विद्यार्थीके प्रश्नोंके उत्तर, ५५९-६०; एक सत्याग्रहीका देहान्त, ३१९; कहीं हम भूल न जायें, ४६६; क्या किया जाये ? 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उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। 'यंग इंडिया'में जो-कुछ जाता है, उस सभीको मैं ध्यानसे देखता हूँ। इसी तरह लगभग जो गुजराती 'नवजीवन'में छपता है उस सबको भी मैं ध्यानसे देखता हूँ। एक विश्वासपात्र साथी गुजराती 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया' की सहायतासे 'हिन्दी नवजीवन' तैयार करते हैं। इसलिए हो सकता है कि 'हिन्दी नवजीवन' में किन्हीं मामलोंका काफी ब्योरेवार उल्लेख हो और किन्हीं दूसरे मामलोंमें उक्त दोनों पत्रोंमें प्रकाशित विवरणका वहाँ केवल सारांश ही दिया जाये। प्रेसमें जानेसे पहले अंग्रेजी मैंने देखी थी। हिन्दी मैंने अब आपका पत्र मिलनेके बाद पढ़ी है। मेरी समझमें दोनोंमें कोई विरोध नहीं है। क्या आप अंग्रेजी और हिन्दी पाठमें कोई विरोध पाते हैं और क्या Gandhi Heritage Portal<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> o3sfhoz90d5uetvpox0mu1b20amrhb3 675226 675225 2026-08-30T12:22:48Z ऋतु मिश्रा 6631 सुधार 675226 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''४३. पत्र : कन्नूमलको'''}}}} {{right|मुकाम मसूरी<br> २३ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय मित्र, आपका पत्र कुछ समय हुए मिला था। जब मैं आश्रम वापस लौटूँगा तो देखूँगा कि आपकी पुस्तकोंकी कितनी प्रतियोंकी मुझे जरूरत है; और अगर जरूरी लगा तो आपकी किसी अन्य पुस्तककी कुछ और प्रतियाँ भी डाक द्वारा भेजनके लिए आपको कष्ट दूँगा। अगर मुझे वक्त मिला तो मैं निश्चय ही आपकी अन्य पुस्तकों में से भी कुछएक पुस्तकें पढ़नेकी काशिश करूँगा और आपको बताने लायक कुछ हुआ तो आपको पत्र लिखूँगा। {{right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} <br>श्रीयुत कन्नूमल <br>धोलपुर अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५१९९) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|'''४४. पत्र : हरचरणलाल वर्मनको'''}}}} {{right|मुकाम मसूरी<br> २३ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय मित्र, आपका पत्र<ref>इस पत्र में '''हिन्दी नवजीवन और यंग इंडिया'''में गांधीजीकी दयाल बागकी यात्राका अलग-अलग ब्योरा प्रकाशित होनेपर आश्चर्य प्रकट किया गया था।</ref> मिला; उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। 'यंग इंडिया'में जो-कुछ जाता है, उस सभीको मैं ध्यानसे देखता हूँ। इसी तरह लगभग जो गुजराती 'नवजीवन'में छपता है उस सबको भी मैं ध्यानसे देखता हूँ। एक विश्वासपात्र साथी गुजराती 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया' की सहायतासे 'हिन्दी नवजीवन' तैयार करते हैं। इसलिए हो सकता है कि 'हिन्दी नवजीवन' में किन्हीं मामलोंका काफी ब्योरेवार उल्लेख हो और किन्हीं दूसरे मामलोंमें उक्त दोनों पत्रोंमें प्रकाशित विवरणका वहाँ केवल सारांश ही दिया जाये। प्रेसमें जानेसे पहले अंग्रेजी मैंने देखी थी। हिन्दी मैंने अब आपका पत्र मिलनेके बाद पढ़ी है। मेरी समझमें दोनोंमें कोई विरोध नहीं है। क्या आप अंग्रेजी और हिन्दी पाठमें कोई विरोध पाते हैं और क्या<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 2j210qy31togl3krzi4fx9og5zm7oot पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/७४ 250 196493 675235 668878 2026-08-30T12:43:28Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 675235 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपको उनमें से किसीपर कोई आपत्ति है? अगर कहीं थोड़ा-सा भी अन्याय हुआ हो तो मैं उसे ठीक करनेकी कोशिश करूँगा। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६४९) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|'''४५. पत्र : कोण्डा वेंकटप्पैयाको'''}}}} {{right|मुकाम मसूरी<br> २३ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय वेंकटप्पैया, आपके पत्र मिले। आपने पल्लेपाडु आश्रम [वेल्लूरके निकट] के लिए जो व्यवस्था की है, उसका मैं अनुमोदन करता हूँ। मैं ऐसी व्यवस्था करूँगा कि आपको किसी-न-किसी तरह १००० रु० मिल जायें। निस्सन्देह आपको यह पूरा हक है कि आप किसीको भी हटा दें और दूसरे किसी भी आदमीको कामपर लगा लें। आपका या सीताराम शास्त्रीका कभी-कभी आश्रममें रहना मैं बहुत पसन्द करूँगा। इससे जिन युवकोंको आपने काम सौंप रखा है, उनका हौसला बढ़ेगा और स्थानीय लोगोंकी सहानुभूति प्राप्त होगी। शायद आप आश्रमके नजदीकके ग्रामीण लोगोंपर भी असर डाल सकेंगे। मैं चाहूँगा कि यह आश्रम क्रिया-कलापोंका जीवन्त केन्द्र बने। जहाँतक तेनाली [जिला गुंटूरमें] का सम्बन्ध है, कृपया मुझे बताइयेगा कि तेनाली संस्थाको वास्तव में कितना अनुदान चाहिए और इस रकमके किस तरह खर्च होनेकी सम्भावना है। इसका भी लगभग सही अन्दाज बताइयेगा कि तकनीकी शिक्षककी योग्यताएँ क्या होनी चाहिए। क्या उसका तेलगु या अंग्रेजी जानना जरूरी है? यह एक ऐसी माँग है, जिसे पूरी कर सकना कठिन होगा। पुन्नैया आजकल कहाँ काम कर रहे हैं? क्या अपेक्षित प्रशिक्षणको पूरा करनेके लिए पुन्नैया या किसी और व्यक्तिको आश्रम में नहीं भेजा जा सकता? वैसे तो ज्यादातर शिक्षक काममें लगे हुए हैं परन्तु यदि सम्भव हो सके तो मैं आपकी इच्छा पूर्ण करना चाहता हूँ। आपने अपनी पत्नी और पुत्रीके स्वास्थ्यके सम्बन्धमें कुछ नहीं लिखा है। वे दोनों कैसी हैं? दिसम्बर में वर्धामें होनेवाली अ॰ भा॰ च॰ संघकी परिषदको बैठकमें शामिल होनेके लिए आप अवश्य तैयार रहें। {{right|हृदयसे आपका,}} <br>श्रीयुत कोण्डा वेंकटप्पैया <br>गुंटूर (मद्रास अहाता ) अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६९९) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> 9d0w17fk5lywzs9ysjj6vlnkpy3ljx4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७६ 250 197137 675339 671589 2026-08-30T17:17:28Z Kumari Arpana Sinha 2191 675339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है। मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं। [ गुजरातीसे ] '''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}} चि० मीरा, रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है। तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं। तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना । मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी । <small>१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।</small><noinclude></noinclude> hyvxg66uiirfwxzacxfwe3a19jap2ds पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८६ 250 197228 675340 671968 2026-08-30T17:19:32Z Kumari Arpana Sinha 2191 675340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गांधी है। पुरुष मेरे साथ कूचमें शामिल हो सकें, इसलिए जिस प्रकार बहुत-सी स्त्रियोंने आश्रमके विभिन्न विभागोंका काम अपने-अपने हाथोंमें ले लिया उसी तरह मीराबाई भी सफाई विभागकी प्रधान बन गई है। साथ ही वे शिशु कक्षाओंको पढ़ाने में भी हाथ बँटा रही हैं और दूसरी जो सेवाएँ उनसे हो सकती हैं, कर रही हैं। अन्तमें वे क्या बनेंगी, यह तो कोई नहीं कह सकता और वे खुद तो कह ही नहीं सकती। पाठकोंके लिए इतनी ही जानकारी पर्याप्त होनी चाहिए कि उन्होंने अपना भाग्य आश्रमके और मेरे साथ सदाके लिए जोड़ लिया है। उन्हें भारतकी सेवाकी प्रबल लगन है। आश्रमको वे प्राप्त हो सकीं, यह हमारा सौभाग्य था। मैं उनसे तभी से स्नेह करता रहा हूँ जब मैं उनके कुल-गोत्रके बारेमें भी कुछ नहीं जानता था और उनके बारेमें जो कुछ जानता था वह सिर्फ दो संक्षिप्त पत्रोंसे ही जानता था, जो उन्होंने आश्रम में दाखिले के लिए मुझे पहले-पहल लिखे थे। तबसे आज चार वर्षोंसे भी अधिक समय से उनसे मेरा निकटतम सम्पर्क रहा है, किन्तु मेरे उस स्नेहमें कोई कमी नहीं आई है। आश्रमके नियमोंका पालन करने और उसके आदर्शोंको चरितार्थं करनेके लिए आश्रमके किसी भी सदस्यने उनसे अधिक लगनसे काम नहीं किया है। लेकिन वे आश्रमकी प्रधान नहीं हैं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३५. तलवारका न्याय'''}}}} एक अध्यापक महोदय लिखते हैं: इस लेखको पढ़कर मुझे मेमने और भेड़ियेके किस्सा स्मरण हो आया। भेड़िया किसी न-किसी तरह मेमनेको खा जाना चाहता था, परन्तु किसी न्याय्य बहानेकी खोजमें था। जब कोई ठीक-सा बहाना न मिला तब मेमनेके बाप-दादोंका दोष बताकर उसने उसे मार खाया। लोगोंके पास जमीन है, परन्तु न्यायतः उसका मालिक कौन है, इस सवालकी छानबीनसे सल्तनतको क्या वास्ता? सल्तनत तो रुपयोंकी भूखी है और तलवारके बलसे रुपये वसूल करती है। धारासभामें नौकरशाही लम्बी-चौड़ी बहस होने देती है, पर उस बहसके पीछे विश्वास तो यह रहा है कि आखिर सरकारकी मालगुजारीमें कुछ कमी नहीं होगी-फिर भले ही जमीन किसीकी क्यों न मानी जाये। इसलिए हमारे सामने सच्चा सवाल तो यह है कि हम इस तलवार बलका मुकाबला कैसे करें? क्या तलवारसे करेंगे? यदि तलवार बलका मुकाबला तलवार से ही करना है तो अभी हमें वर्षों तक गुलामीमें रहना पड़ेगा, क्योंकि कैसा भी शासन <small>१. पत्र यहाँ उस नहीं किया जा रहा है। पत्र-लेखकने अंग्रेजों द्वारा भारतमें लागू मालगुजारी की आलोचना की थी।</small><noinclude></noinclude> bzjv3ceri4kdjsgp4ahekuvx9b0sya6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८७ 250 197229 675341 671971 2026-08-30T17:21:05Z Kumari Arpana Sinha 2191 675341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी। '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} {{Right|सजोद}} २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू,''' २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम-चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी <small>१. " धर्म यात्रा" से उद्धृत।</small> <small>२. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था।</small> ४३-१०<noinclude></noinclude> ltaliihx35outpklzyul4cp90n9ud5u पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८९ 250 197231 675342 671949 2026-08-30T17:22:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 675342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण मांगरोलमें|१४७}}</noinclude>कर --- इसके लिए हम चाहे जितने भी विशेषणोंका प्रयोग करें वे कम ही है--का नाश अवश्य होगा। यदि आप ऐसा वातावरण तैयार करें और उसे फैलायें तो इसके बाद विदेशी कपड़ोंका त्याग करके दूसरा किला भी जीता जा सकता है। इसका मतलब है साठ करोड़ रुपये हस्तगत कर लेना। हम महज होश खो देनेके कारण २५ करोड़ रुपये शराव और अफीम में दे डालते हैं। हमें यह दूसरा किला अवश्य जीतना है। यदि आप मद्यपान छोड़ दें तभी ऐसा होना सम्भव है। ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़ेके, २५ करोड़ रुपये शराबके और ६ करोड़ रुपये नमक-कर के। यदि हम यह पूरी रकम बचा सकें तो हमारे चेहरे चमकने लगेंगे और इस प्रकार स्वराज्य भी मिला ही समझें। नमक-कर तो अब उठ ही गया समझें, इसलिए आप लोगों में से जो इस लड़ाई में भाग न ले रहे हों वे इन दो कामोंको पूरा करनेमें मदद दें। विदेशी कपड़ा छोड़कर आप सब भाई-बहन खादी पहनें और जो सच्चा धर्म है उसे पहचानें। [ गुजराती से ] '''प्रजाबन्धु''' ३०-२-१९३० {{C|{{Larger|'''१३९. भाषण : मॉंगरोलमें'''}}}} {{Right|२७ मार्च, १९३०}} हम किसी प्रकारके भ्रममें न रहें। यदि हम यह मानते हैं कि सभी चीजोंके पीछे भगवान् का हाथ होता है तो हमें हिम्मत और आत्मविश्वासपूर्वक यह मानकर चलना चाहिए कि नमक-कर उठ गया । अबतक तो हम लोग नमकहराम थे और अब हमें नमकहलाल बनना है। नमक-कानून तोड़नेकी बात तो हमने १२ तारीखसे कहनी शुरू की है किन्तु अन्य दो-तीन बातें तो हम १९२० से ही कहते आ रहे हैं। यदि आपको याद हो तो बेजवाड़ा कांग्रेस के कार्यक्रमके अनुसार २० लाख चरखे चलवाने थे। विदेशी कपड़ेका त्याग करना था । किन्तु आज हम इसमें से कितना कर पाये हैं? यह तो हमारे लिए दुःख और लज्जाकी बात है। यही बात शराब के बारेमें है इसका भी खुलकर उपयोग हो रहा है। इन दोनों चीजोंके बारेमें हम यह मान बैठे थे कि जब हमारे हाथमें शक्ति आ जायेगी तभी हम इन्हें दूर कर पायेंगे। किन्तु मेरा यह कहना है कि यदि हम इन चीजोंको हटा सकें तो इसका मतलब होगा कि हमने सरकारको हटा दिया। यदि हम काम करना चाहें तो इस गाँव में जितने लोग नमक खाते हैं उन्हें चाहिए कि वे स्वयं अपने हाथका बना नमक उपयोग में लायें। सभी बालकोंको खुलेआम नमककी 'चोरी' करनी चाहिए और विदेशी कपड़ों-को जलाकर खादी खरीद लेनी चाहिए या तैयार कर लेनी चाहिए। दूसरी तरफ यदि हम मालिकोंसे मिलकर शराबके ठेकोंको बन्द करा सकें तो आनन्द ही आ जाये और स्वराज्यकी लड़ाई में भी रस आने लगे। जब हम ये सारे काम कर पायेंगे तभी<noinclude></noinclude> 15kozq9ljxym2etvpoy46vvh8sm6gvs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९१ 250 197233 675343 671952 2026-08-30T17:23:23Z Kumari Arpana Sinha 2191 675343 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४१. भाषण : रायमामें ''''}}}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} जिस जिलेमें नमक बनानेका स्थान न हो मैं वहां नहीं रुक सकता। अत: आप सबके प्रेमको ध्यान में रखते हुए भी फिलहाल मैं दांडी जा रहा हूँ। हालांकि इस जिलेको छोड़ते हुए मुझे बुरा लग रहा है; किन्तु मुझे तो दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ना ही है। यदि १२ तारीखको हिन्दु मुसलमान, ईसाई, पारसी सभीके आशीर्वादसे हम इस कर का विरोध कर सके तो आप यह मान लें कि उक्त कर हट ही गया। ६ तारीखको आप सब हिन्दू-मुसलमान मिलकर नमक बनाने में जुट जायें। यदि सरकार जमीनकी खुदी हुई मिट्टीपर कर लेनेका निर्णय करे तो ले सकती है, वैसे ही आज वह नमक पर कर लेती है। किन्तु हम यह कर क्यों दें? जिस तरह गरीब स्त्रियाँ बबूलकी दातुनें बेचने निकलती हैं, उसी प्रकार हम सब भी नमक लेकर बेचने निकल पड़ें। क्या हम करोड़ों गरीबोंकी खातिर इतना भी नहीं करेंगे? संसारके पूरे इतिहासमें नमक-कर-जैसे अन्यायपूर्ण कर का मुझे कहीं उल्लेख नहीं मिला। किन्तु नमक-कर उठ जानेसे ही हमें स्वराज्य नहीं मिल जायेगा। हमें सजगतापूर्वक अन्य कार्य भी करने हैं। हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना है। पंजाबकी खादी पहनने से हमारा काम नहीं चलेगा। हरएकको स्वयं ही कातना और उससे अपना कपड़ा बुनवा लेना होगा। यह हमारी मूढ़ता ही है कि हम बच्चोंसे लेकर बूढ़ों तक यह सहज और सुन्दर काम नहीं करते। इससे हिन्दुस्तानके प्रति हमारी बेबफाई ही जाहिर होती है। विदेशी वस्त्रों और शराबका बहिष्कार करके हम तुरन्त ही स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दुस्तानको स्वतन्त्र कर लेनेके बाद हम अपना सारा काम गद्दीपर बैठकर करेंगे। इसलिए आप इस नमक सत्याग्रहमें भाग लेकर अन्य दो कामोंको पूरा कर दिखायें तथा जो इस लड़ाई में भाग नहीं ले रहे हैं वे आपके साथ मिलकर यह सिद्ध कर दिखायें कि भड़ौच जिला तो पूरी तरहसे हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रताकी लड़ाई में ही जुटा हुआ है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु,''' ३०-३-१९३० <small>१. पद भाषण अपराह्न में ३ बजे दिया गया था।</small><noinclude></noinclude> fsgc0zsuce6mampgzf817zs2zvk1ago 675345 675343 2026-08-30T17:23:54Z Kumari Arpana Sinha 2191 675345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४१. भाषण : रायमामें १'''}}}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} जिस जिलेमें नमक बनानेका स्थान न हो मैं वहां नहीं रुक सकता। अत: आप सबके प्रेमको ध्यान में रखते हुए भी फिलहाल मैं दांडी जा रहा हूँ। हालांकि इस जिलेको छोड़ते हुए मुझे बुरा लग रहा है; किन्तु मुझे तो दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ना ही है। यदि १२ तारीखको हिन्दु मुसलमान, ईसाई, पारसी सभीके आशीर्वादसे हम इस कर का विरोध कर सके तो आप यह मान लें कि उक्त कर हट ही गया। ६ तारीखको आप सब हिन्दू-मुसलमान मिलकर नमक बनाने में जुट जायें। यदि सरकार जमीनकी खुदी हुई मिट्टीपर कर लेनेका निर्णय करे तो ले सकती है, वैसे ही आज वह नमक पर कर लेती है। किन्तु हम यह कर क्यों दें? जिस तरह गरीब स्त्रियाँ बबूलकी दातुनें बेचने निकलती हैं, उसी प्रकार हम सब भी नमक लेकर बेचने निकल पड़ें। क्या हम करोड़ों गरीबोंकी खातिर इतना भी नहीं करेंगे? संसारके पूरे इतिहासमें नमक-कर-जैसे अन्यायपूर्ण कर का मुझे कहीं उल्लेख नहीं मिला। किन्तु नमक-कर उठ जानेसे ही हमें स्वराज्य नहीं मिल जायेगा। हमें सजगतापूर्वक अन्य कार्य भी करने हैं। हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना है। पंजाबकी खादी पहनने से हमारा काम नहीं चलेगा। हरएकको स्वयं ही कातना और उससे अपना कपड़ा बुनवा लेना होगा। यह हमारी मूढ़ता ही है कि हम बच्चोंसे लेकर बूढ़ों तक यह सहज और सुन्दर काम नहीं करते। इससे हिन्दुस्तानके प्रति हमारी बेबफाई ही जाहिर होती है। विदेशी वस्त्रों और शराबका बहिष्कार करके हम तुरन्त ही स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दुस्तानको स्वतन्त्र कर लेनेके बाद हम अपना सारा काम गद्दीपर बैठकर करेंगे। इसलिए आप इस नमक सत्याग्रहमें भाग लेकर अन्य दो कामोंको पूरा कर दिखायें तथा जो इस लड़ाई में भाग नहीं ले रहे हैं वे आपके साथ मिलकर यह सिद्ध कर दिखायें कि भड़ौच जिला तो पूरी तरहसे हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रताकी लड़ाई में ही जुटा हुआ है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु,''' ३०-३-१९३० <small>१. पद भाषण अपराह्न में ३ बजे दिया गया था।</small><noinclude></noinclude> h8g69088kgu2c0sjujdky9ffonxq3f7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९२ 250 197234 675350 671953 2026-08-30T17:26:46Z Kumari Arpana Sinha 2191 675350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४२. भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष१ '''}}}} {{Right|[ २८ मार्च १९३०]²}} हमारी यात्राका यह अन्तिम सप्ताह है। इसके आरम्भ में ही हमें सारी मलिनता दूर कर देनी होगी। प्रत्येक जिलेकी सीमा पार करते समय हमें नदी मिली है। नदीको हम पवित्र मानते हैं। नदी आदि तो शुद्धिके बाह्य चिह्न हैं। इसकी मददसे हम शुद्ध बनें, नम्र बनें। दांडीको हमने हरिद्वार माना है तो हरिद्वार-जैसे पवित्र धाममें जानेकी योग्यता हममें आनी चाहिए। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन,''' १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४३. भाषण: उमराछीमें३'''}}}} {{Right|२८ मार्च १९३०}} यदि कोई व्यक्ति ६१ वर्षकी आयुमें कूच शुरू करना चाहता है तो उसे हिमालयकी यात्रा पर जाना चाहिए ताकि उसे मोक्षका लाभ तो मिले, परमेश्वरके दर्शन तो हों? लेकिन मैंने तो उलटा धर्म सीखा है। मुझे तो ईश्वरके दर्शन इसी तरह कूच करते हुए प्राप्त करने हैं। आप लोगोंके भी दर्शन करके मैं आपसे उसमें भाग लेनेकी याचना करता हूँ। क्योंकि जबतक देशमें जो राक्षसी राज्य है उसमें उथल-पुथल नहीं होती तबतक हम सब उसके भागीदार है। ऐसा भागीदार यदि धवलगिरि तक भी जाये तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। परमेश्वरके दर्शन तो दुष्कर है। वह तो ३० कोटि मनुष्योंके हृदयमें वास करता है। वहाँ जाना हो तो व्यक्तिको इन हृदयोंसे तादात्म्य स्थापित करना चाहिए। इन तीस कोटिमें उत्कलके हड्डियोंके पंजर, हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा सिख, पुरुष और स्त्रियां, ये सब आ जाते हैं। जबतक हम इसके प्रत्येक अंगके साथ एक नहीं हो जाते, उसमें लीन नहीं हो जाते तबतक हम आस्तिक नहीं, नास्तिक हैं। इसीसे मैंने मनमें विचार किया कि ६१ वर्षकी उम्र में भी तुझे शान्तिसे नहीं बैठना है। जबतक इस साम्राज्यका नाश नहीं हो जाता तबतक तेरे लिए कैसा आराम? आजतक मैं मौन था। मित्रोंके कटाक्षोंको सुनता था और सहता था। मुझे भय था कि लोग शायद गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे? मैं कहूँ और लोग न करें तो क्या होगा? लेकिन मुझे लगा कि <small>१. "धर्म-पात्रा" से उद्धृत।</small> <small>२. गांधीजी ने ये शब्द उस समय कहे जबकि वे और उनकी पार्टी सूरत जिलेमें कीम नदी पार कर रही थी, उस दिन २८ मार्च थी।</small> <small>३. "खराज गीता" से उद्धृत।<small><noinclude></noinclude> maeomd5lucs2m5ogo7wa4yg1omwiw2j पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९४ 250 197236 675353 671955 2026-08-30T17:28:36Z Kumari Arpana Sinha 2191 675353 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५२| सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>दोष दिखाई दिये। इसके लिए मुझे अपने साथियोंसे कहना पड़ा। मैंने जो दोष बताये वे केवल उतने ही नहीं रहे हैं अपितु दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। मेरे साथके जत्थेके लोगोंके दोष मुझे खटकते रहते हैं। बाइसरायको पत्र लिखनेवाला मैं कौन होता हूँ? वाइसराय हिन्दुस्तानके प्रति व्यक्तिकी आयसे पांच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, इसके लिए मैंने उनकी कटु आलोचना की थी। यह वेतन उनको कैसे पच सकता है? और हम उसे कैसे पचने दें? इसमें उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं है। ईश्वरने उनको पैसा दिया है, उन्हें वेतनकी कोई जरूरत नहीं है। पत्रमें मैंने लिखा कि आप सारा पैसा परोपकारमें लगा देते होंगे; और बादमें मैंने ऐसा सुना भी; बहुत सम्भव है, ऐसा ही होता हो। वे, यह पैसा परोपकारमें लगाते हों तो भी मुझे तो उन्हें इतना ज्यादा पैसा देना खलेगा। मैं तो २१,००० रुपये उन्हें कदापि न दूं, शायद २,१०० रुपये भी न दूं। लेकिन ऐसा कब किया जा सकता है? मैं स्वयं गरीबोंकी तरह रहता होऊँ तभी न? हम अपनेको गरीब कहकर घरोंसे निकले, किन्तु यदि जत्थेके प्रत्येक व्यक्तिपर गरीबोंकी कमाईसे पचास गुना ज्यादा खर्च होता हो, तो ऐसा कहनेका मुझे क्या अधिकार है? अपने पर होनेवाले खर्चका हिसाब मैंने अपने साथियोंसे मांगा है और मैं उसे लेनेवाला हूँ। हिन्दुस्तानकी दैनिक आय ७ पैसे है असम्भव नहीं कि हम उससे पचास गुना ज्यादा खाते हों। देशमें जहाँसे भी मिले वहाँसे आप अंगूर मँगवाते हैं, नारंगी लाते हैं, जहाँ बारह चाहिए वहाँ १२० इकट्ठा करते हैं। जहाँ १ सेर दूधकी जरूरत होती है वहाँ आप ३ सेर ले आते हैं। आप दूध-घी हमें देते हैं और हम यह सोचकर उसे ग्रहण कर लेते हैं कि मना करनेपर आपकी भावनाको ठेस पहुंचेगी। आप अमरूद आदि भेंट करते हैं, उन्हें कैसे अस्वीकार किया जा सकता है, ऐसा सोचकर हम खा लेते हैं और बादमें हलके मनसे विलायती कलमसे वाइसरायको लिखते हैं कि आप पाँच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, तो यह बात कैसे शोभा दे सकती है? अखा भगतने गाया है, "काचो पारो खावो अन्न, तेनुं छे चोरीनुं धन"१ अपनी गरीबीको जो शोभा दे, उतना खर्च न करके अधिक पैसे खर्च करना चोरी ही है। और चोरी करके इस युद्धमें विजय प्राप्त नहीं की जा सकती, इस तरह विजय प्राप्त करनेके लिए मैं निकला भी नहीं हूँ। अभी तो झुण्डके-झुण्ड स्वयंसेवक आयेंगे। उन सवपर व्यर्थका खर्च करेंगे तो कैसे निर्वाह होगा! मेरी तो ऐसी दीन दशा है कि मैं अपने साथके इन अस्सी व्यक्तियोंको भी नहीं पहचान पाता। ऐसी स्थिति में मुझे सार्वजनिक रूपसे मैलको धोकर सन्तोष मानना होगा। यदि आप इसे जल्दी ही नहीं समझेंगे तो स्वराज्य प्राप्त करनेकी आशा न रखें। मैंने यह बताया कि हम अस्सी लोग कितने दुर्बल हैं और हमने वाइसरायको जो पत्र लिखा है वैसा पत्र लिखकर हमने उचित नहीं किया। हालांकि मैंने पूरा ब्योरा आपके सामने नहीं रखा फिर भी वैसा करना मुझ जैसे स्पष्टवक्ताके लिए भी मुश्किल है। <small>१. तात्पर्य यह कि चोरीका धन ऐसा ही है जैसे कच्चा पारा खाना</small><noinclude></noinclude> 711era0v4x9g8a6o587rsj2jnn3muj5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०१ 250 197243 675484 672192 2026-08-30T20:27:59Z Kumari Arpana Sinha 2191 675484 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : ओलपाड ताल्लुके में|१५९}}</noinclude>बननेका धन्धा करनेका नाम ही मुखियागिरी है। मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है कि सभी मुखिया ऐसे ही होंगे, लेकिन बहुत-से मुखियोंसे मेरी जो बातचीत हुई है, यह उसका निचोड़ है। न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़ देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो! [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''' २०३-१९३० {{C|{{larger|'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें१'''}}}} {{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]२}} मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-दान अधिक होगा। आज भी चरखा संघमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है । पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे कहता हूँ कि 'सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप चरखेका स्पर्श न करें। मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीठूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें तो आप इस ओलपाडको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं, शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा; <small>१. "स्वराज-गीता" से उद्धृत।<small> <small>२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये थे। पर ३१ तारीखको उनका मौनवार था।<small><noinclude></noinclude> qrbpxv2uv6f75gq3ohd9ei2cbtk73z4 675485 675484 2026-08-30T20:28:41Z Kumari Arpana Sinha 2191 675485 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : ओलपाड ताल्लुके में|१५९}}</noinclude>बननेका धन्धा करनेका नाम ही मुखियागिरी है। मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है कि सभी मुखिया ऐसे ही होंगे, लेकिन बहुत-से मुखियोंसे मेरी जो बातचीत हुई है, यह उसका निचोड़ है। न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़ देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो! [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''' २०३-१९३० {{C|{{larger|'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें१'''}}}} {{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]२}} मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-दान अधिक होगा। आज भी चरखा संघमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है । पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे कहता हूँ कि 'सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप चरखेका स्पर्श न करें। मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीठूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें तो आप इस ओलपाडको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं, शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा; <small>१. "स्वराज-गीता" से उद्धृत।</small> <small>२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये थे। पर ३१ तारीखको उनका मौनवार था।</small><noinclude></noinclude> n0s66lggv1uarxui2cvc3u037kosv7z पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०२ 250 197244 675486 672188 2026-08-30T20:29:37Z Kumari Arpana Sinha 2191 675486 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो ऐसे प्रेम-पगे शब्द सुनते ही वह चाहे जितना बड़ा शराबी हो, उसका सिर झुक जायेगा और अगर वह भला आदमी होगा तो शायद से भी पड़ेगा और रामका नाम लेकर शराब छोड़नेकी प्रतिज्ञा करेगा। किन्तु हिन्दुस्तानकी स्त्रियों में ऐसा जोश, हिम्मत और परोपकार-वृत्ति कहाँ है? लेकिन यह हिम्मत में दे सकता हूँ। आप ईश्वरका नाम लेकर सीधे चली चलें तो आपको कुदृष्टिसे देखनेवाला कौन है? मनमें ऐसा विश्वास रखें कि पवित्रता ही आपकी ढाल है। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४८. भाषण: साँधियेरमें'''}}}} {{Right|३० मार्च, १९३०}} एक और तलाटी भाईने इस्तीफा दे दिया, इसके लिए उन्हें मेरा धन्यवाद! आज आपका विशेष कर्तव्य यह है कि आप सरकारी नौकरियोंको कूड़ा-कर्कट या जूठन समझकर फेंक दें। आपको चाहे कैद हो, चाहे फाँसीपर लटकाया जाये या भूखों मरना पड़े, फिर भी आप अपने विशेष कर्तव्यका पालन करें। यहाँ के पटेल बफादारी में सबसे दो कदम आगे हैं, वे दूसरोंको भी इस्तीफ देनेसे मना करते है। मैं तो उनसे भी इस्तीफा देनेकी नम्रतापूर्वक विनती करनेवाला हूँ। अतः इस सम्बन्धमें 'नवजीवन' में प्रकाशित 'बहिष्कारको मर्यादा' शीर्षक लेख सावधानीसे पढ़कर और भली-भाँति समझकर तदनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए। हम सरकार से असहयोग कर रहे हैं; अतः हमें उस हदतक सरकारका बहिष्कार करना चाहिए। नमक के सम्बन्धमें मैं फिलहाल कुछ नहीं कहना चाहता। यह कर अन्यायपूर्ण और बुरा है, तथा इसके पीछे एक लम्बा इतिहास है। यह कर लगाना नीतिपूर्ण है या अनीतिपूर्ण, सरकार यह नहीं कह सकती। किन्तु आप नमक-करको खत्म हुआ ही समझें। मैं यह बात जूझनेकी आपकी शक्तिके आधारपर कह रहा हूँ। उक्तकर उठ जानेका यह अर्थ नहीं कि हमें स्वराज्य मिल जायेगा। इसके बाद हमें औरभी काम करने हैं। आज यहाँ बम्बईके कपड़ा व्यापारी आये हुए हैं। १९२१ में विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका वे जितना महत्व समझते थे, आज उसकी अपेक्षा कहीं अधिक समझने लगे हैं। मैं तो हिन्दुस्तानके व्यापारियों और ग्रामोंके विकासकी दृष्टिसे ही सोचता हूँ । अब ये सब लोग इस बात को समझने लगे हैं कि जिस प्रकार यह लड़ाई दरिद्रनारायणके लिए है उसी प्रकार व्यापारियोंके लिए भी है। स्वतन्त्र भारतमें तो यही लोग कपड़े व्यापारी होंगे। आज जो आसुरी धन्धा है, स्वराज्य मिल जानेपर <small>१. देखिए पृ४ १५५-७<small><noinclude></noinclude> pnd8jgfdhniinxxl2hxagwfdm78woev पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०४ 250 197246 675358 672376 2026-08-30T17:30:59Z Kumari Arpana Sinha 2191 675358 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक अनुकरणीय उदाहरण है। आज तो गांवोंकी सफाई बहुत ही जरूरी है। इसलिए हम गन्दे गाँवोंको साफ करने जा रहे हैं। इस पाठसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि वे स्वराज्यको निकट ले आई हैं। मैं तो बहनोंको भी बलिदान कर देना चाहता हूँ। मैं आपको इस बातकी याद दिला देना चाहता हूँ कि हमें आत्मशुद्धि करनी है। एक ओर हम सविनय अवज्ञा करते रहेंगे तो दूसरी ओर हम शुद्ध होते जायेंगे। आपको भगवान् इन सब बातोंको समझने की सामर्थ्य दे। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४९. भाषण : देलाडमें१'''}}}} {{Right|३० मार्च, १९३०}} जैसा कि 'गीता' में कहा गया है, जो वस्तु आरम्भमें कड़वी लगती हो किन्तु जिसका परिणाम मधुर हो वह सात्त्विक है। इसलिए हालांकि कल मेरा चित्त व्याकुल हो उठा था और वह व्याकुलता अभीतक मिटी नहीं है, किन्तु मैने अपनी शान्ति गँवाई नहीं है; मित्रों, साथियों और सभाके सामने मैंने जो प्रेमके अंगारे उगले थे उन्होंने मेरे शब्दोंको उस रूपमें नहीं लिया। कलकी उस चौंधिया देनेवाली रोशनी के बदले में आज दीपकका मन्द मन्द टिमटिमाता हुआ प्रकाश देख पा रहा हूँ। आजकी सभा में मुझे जो आन्तरिक और बाह्य शान्ति दिखाई पड़ रही है वह कल दिखाई नहीं देती थी। कलकी उन वत्तियोंमें मुझे कृत्रिमता नजर आती थी। आपके ग्राम्य जीवन और उन बत्तियोंमें मुझे कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ा। शहरोंके सम्पर्क में आने से ऐसी बत्तियाँ जल सकती है किन्तु असंख्य गाँव, शहरों और रेलकी पटरीसे सैकड़ों मील दूर पड़े हैं। हमारा विचार ऐसे गांवोंकी सेवा करनेका है किन्तु ऐसे गांवोंको तो आप जानते भी नहीं हैं। शायद ऐसे गाँव गुजरातमें तो होंगे नहीं, किन्तु गुजरात ही क्या हिन्दुस्तान है? वह तो हिन्दुस्तानका एक अंश मात्र है। बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रान्तकी तुलनामें गुजरात है क्या? संयुक्त प्रान्तकी यात्राके दौरान मैं ऐसे गांवोंसे गुजरा हूँ जहाँ रातको एक दीपक तक नजर नहीं आया, सिर्फ कुत्तोंका भौंकना ही सुनाई पड़ता था। गुजरातके घरोंकी तुलना में ये घर खण्डहर-जैसे लगते हैं और उन्हें देखकर रोना आता है, तथा मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं: "हे राम! हिन्दुस्तान में ऐसे घर!" यहाँके लोग कंकालोंकी तरह हैं। कड़कड़ाती सरदीमें उन्हें गुदड़ी तक नसीब नहीं होती। दरवाजा बन्द कर चिथड़े लपेटे जैसे-तैसे पड़े रहते हैं। उन गांवोंकी मुझे याद आती है। क्या ऐसे गाँवोंमें वे बत्तियां हमें शोभा देंगी? इन गाँवोंके लिए कोई सेठ मुझे पाँच बत्तियां दे और मैं उन बत्तियोको लेकर वहाँ जाऊँ तो मैं पाप करूंगा और उस हद तक पापका भागी बनूंगा। जहाँ घर घूरोंके <small>१. “धर्म-पात्रा" से उद्धृत</small><noinclude></noinclude> spglgl41l4hc6w8nd9fq00e6xzvhql9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०६ 250 197248 675361 672510 2026-08-30T17:32:48Z Kumari Arpana Sinha 2191 675361 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५०. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|३१ मार्च, १९३०}} {{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}} प्रिय रेनॉल्ड्स, मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सुबहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ। 'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख१ मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है। 'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था। अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दोंका प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो:"यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया। मैं ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था। अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति <small>१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर' उसका उत्तर लिखा था।</small><noinclude></noinclude> fk9jiga85keo3epfjflytebm7jt59v3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०७ 250 197249 675363 672528 2026-08-30T17:34:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 675363 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ कुछ हलका हो जायेगा।"१ तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि पहुँचाओ। 'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें२ कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी। अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं। कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न? यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या? सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}} {{Right|देलाड}} {{Right|३१ मार्च, १९३०}} प्रिय जवाहरलाल, तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल मैं सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है। मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम <small>१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।</small> <small>२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।</small><noinclude></noinclude> 47fbm7lour2ol7sasnretyfy23mlyzl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१३ 250 197256 675435 672550 2026-08-30T18:20:13Z Manikantkmr 5554 675435 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१}} चि० गंगाबहन, तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं। मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती। तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए। मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}} {{Right|२ अप्रैल, १९३०}} चि० प्रेमा, तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन मैं मान लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है। मुझे पेंजीका फूल२ मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें देना तो कृत्रिमता है। <small>'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन मंगलवार था।</small> <small>२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।</small><noinclude></noinclude> e5qwxdo7wcwx0bjhhblhanz0pd8c7ge पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१४ 250 197257 675487 672612 2026-08-30T20:32:59Z Kumari Arpana Sinha 2191 675487 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>क्या तू बच्चोंको पीटती है? मीराबहनका मीठा उलाहना है। आशा है तू अपनी तबीयतका ध्यान रखती होगी। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६६७) की फोटो नकलसे। सौजन्य : प्रेमावहन कंटक {{C|{{larger|'''१५६. भाषण : डिंडोलीमें'''}}}} {{Right|२ अप्रैल, १९३०}} खबर मिली थी कि कांग्रेसके कार्यकर्त्ताओंको यहां ठहरने भी देंगे या नहीं, इसमें सन्देह है। किन्तु मैं बताना चाहता हूँ कि अब तक सभी स्थानों पर हमारा उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया है। इस गाँवके दोनों दलोंने मिलकर हमारी बहुत अच्छी व्यवस्था की और वैसा ही भावभीना स्वागत भी किया। इस लड़ाईके पीछे तो ईश्वरका हाथ है। अतः ऐसा दिखाई देता है कि आपसी दुश्मनी खत्म हो गई है और सभी आपस में मित्र बन गये हैं। यह ईश्वर या खुदाकी मेहरबानी है। प्रिवी काउंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) में तो पुश्तों तक झगड़ोंका फैसला नहीं हो पाता। आप इस फन्देसे निकल आयें। हम यह लड़ाई उन लोगोंके विरुद्ध लड़ रहे हैं जो दूसरोंके कन्थोंपर सवार हैं। गोरे लोगोंने हमारे करोड़ों कन्धोंपर बोझ लाद रखा है; हमें उससे मुक्त होना है। किन्तु उससे भी पहले हमें गरीबोंके कन्धों परसे उतर जाना है। यदि कोई यह कहे कि नमक कर उठ जानेपर सरकार नहीं चलेगी तो उन लोगोंसे मैं कहूंगा कि वे नमकहराम हैं। कर घट जानेपर नमककी खपत बढ़ जायेगी। इस बातको ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि इस कर के कारण गरीबोंपर अधिकतम भार पड़ता है। पुराने जमाने में तो गरीबोंको कपड़ा भी मिला करता था। और असलमें गाँवके मजदूरोंको मजदूरीके बदलेमें सब कुछ मिलता था। फिर भी सरकार चाहे जितनी कोशिश करे लेकिन क्या वह सचमुच खादीकी अपेक्षा विदेशी गायोंको' सस्ता बना सकती? मुझे जो दूसरी खबर मिली है, उसके लिए मैं यहाँके पटेलको धन्यवाद देता हूँ। और उस गाँवको भी धन्यवाद देता हूँ जिस गाँवमें ऐसे बहादुर पटेल हैं। अबतक जिन लोगोंने इस्तीफे नहीं दिये हैं, उन्हें भी दे देने चाहिए और अपने मनसे सरकारका भय निकाल देना चाहिए। मुझे तो इस बातका आश्चर्य है कि मुझ जैसा व्यक्ति जो एक छोटी-सी लाठी भी नहीं तान सकता, इतने बड़े साम्राज्यको कैसे हिला पायेगा। किन्तु यदि आपके हृदयमें राम बसता हो तो इस एक साम्राज्यकी तो बात ही क्या इससे भी बड़े बीस साम्राज्योंको हिला देना <small>१. पींजी हुई रुई भरकर या उसको जमाकर बनाये गये रजाई,गद्दे, नमदे-जैसे वस्त्र।<small><noinclude></noinclude> 686snh4ka7hvik7x541j5q2quhlcs9j पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१८ 250 197261 675488 672694 2026-08-30T20:34:29Z Kumari Arpana Sinha 2191 675488 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५८. ६ अप्रैलको याद रखें'''}}}} गुरुवार, ३ तारीखको यह लेख पाठकोंके सामने होगा। यदि ६ अप्रैल से पहले कार्यक्रमको स्थगित करनेके सम्बन्धमें कोई सूचना नहीं जारी की जाती तो पाठक समझ लें कि मैंने सभीको ६ अप्रैल से नमक- कानूनोंके खिलाफ सामूहिक सविनय अवज्ञा करनेकी छूट दे दी है और जो लोग उसके लिए तैयार हैं उनसे मैं उस दिन अवज्ञा प्रारम्भ कर देनेकी अपेक्षा रखता हूँ। इस विषय में इन पृष्ठों में समय-समयपर मैंने जो कुछ कहा है, उसे संक्षेपमें एक बार दोहरा जाता हूँ। सविनय अवज्ञाके लिए केवल एक ही शर्त है।--अर्थात् सच्चे अर्थों में अहिंसाका पूर्ण पालन। सामुदायिक सविनय अवज्ञाका मतलब है बिना किसीकी प्रेरणाके सहज रीतिसे स्वयं क्रियाशील हो जाना। कार्यकर्त्ता केवल प्रारम्भिक अवस्थाओं में जनताका मार्ग- दर्शन करेंगे। आगे चलकर जनता इस आन्दोलनका नियमन खुद करेगी। कांग्रेसके स्वयंसेवक घटनाक्रम पर नजर रखेंगे और जहां कहीं जरूरत होगी, यहाँ मदद करेंगे। उनसे सबसे आगे रहनेकी अपेक्षा की जायेगी। स्वयंसेवकोंको किसी भी साम्प्रदायिक झगडेमें किसीका पक्ष नहीं लेना चाहिए। जहाँ कहीं हिंसाका विस्फोट हो, स्वयंसेवकोंसे उसे शान्त करनेके लिए प्राण तक दे देनेकी अपेक्षा की जाती है। पूर्ण अनुशासन और विभिन्न एकांशोंके बीच पूरा सहयोग सफलताकी अनिवार्य शर्त है। यदि सच्ची जन-जागृति हो तो जो लोग सविनय अवज्ञा न कर रहे हों उनसे यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे किसी-न-किसी राष्ट्रीय कार्यमें लग जायेंगे और दूसरोंको भी उसमें प्रवृत्त करेंगे। इन राष्ट्रीय कार्यों में खादी कार्य, शराब तथा अफीमकी दुकानोंपर धरना देना, विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना, गाँवोंकी सफाई करना, सविनय प्रतिरोधी कैदियोंके परिवारोंकी हर तरहसे सहायता करना आदि शामिल हैं। वास्तवमें नमक कर के सम्बन्धमें किये जानेवाले सविनय प्रतिरोधके प्रति यदि लोग सच्चा उत्साह दिखायें तो हमें खादीके बलपर ठीक ढंगके संगठनके द्वारा विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार सम्पन्न करा सकना चाहिए और पूर्ण मद्यनिषेध भी करवा सकना चाहिए। यदि ऐसा हो जाये तो उससे प्रतिवर्ष ९१ करोड़ रुपयेकी बचत होगी और करोड़ों बेकार लोगोंको सहायक धन्धा मिलेगा। और यदि हम यह सब कर दिखायें तो स्वराज्य मिलने में भी देर नहीं लगेगी। इनमें से एक भी काम हमारी शक्तिसे बाहर नहीं है। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इन्डिया,''' ३-४-१९३०<noinclude></noinclude> mc7zc8tqlz936ebk5p16x33kow4cjjx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२० 250 197263 675489 672696 2026-08-30T20:37:05Z Kumari Arpana Sinha 2191 675489 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१६०. पत्र : कपिलराय मेहताको'''}}}} {{Right|मध्य रात्रि [३ अप्रैल, १९३०]१}} चि० कपिलराय, तुम्हारे बारेमें मुझे खबर मिली है। उतावली न करना। शनिवारको यदि बुखार न हो तो आना। नवसारीसे वे तुम्हें भेज देंगे। अब पूरे शरीरकी गीली पट्टी न लेना दूध अवश्य लेना गरम पानीसे स्नान करनेमें कोई दिक्कत नहीं है। खाँसीके लिए डाक्टरको बताना। डाक्टर तो दस दिन तक सुरतमें ही रहनेके लिए कहते हैं। मैं भी यदि बुखार न हो तो शनिवारको आने में कोई हर्ज नहीं समझता। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च:] यह पत्र डाक्टर साहबको दिखलाना। चि० कपिलशय सैनिक अनाविल आश्रम, सूरत गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५९४ ) से: सौजन्य: कपिलराय मेहता; जी० एन० ३९७२ से भी {{C|{{larger|'''१६१. भाषण: वाँकी प्रार्थना सभामें२'''}}}} {{Right|३ अप्रैल, १९३०}} अब तो हमारा दो दिनका ही रास्ता बाकी रह गया है। उसके बाद हम काममें जुट जायेंगे। उस समय लोग भी बहुत अधिक होंगे। दांडीमें पानीकी कमीके बारेमें तो मैं आपको सूचना दे ही चुका हूँ। हमें तो जंगलमें रहनेवाले जैन साधुकी तरह पानीको दूध मानकर व्यवहारमें लाना होगा। अब मैं एक दूसरी बात और कह दूं कि वहाँके लोगोंको हमारे भोजनकी व्यवस्था करनेमें बहुत मुश्किलका सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वहाँ पहुँचनेके बाद दिनमें तीन बार आधा सेर चने, आधा सेर३, मुरमुरे और एक तोला घी तथा गुड़का गरम पानी, इतना ही आपको मिलेगा। अब तो हमें अपने जीवनको और कठोर बनाना है, अतः सब लोग इसके अभ्यस्त हो जायें। <small>१. डाककी मुहरसे।</small> <small>२. प्रार्थना सभा प्रातः चार बजे हुई थी।</small> <small>३. भाषा सेरसे तात्पर्य को बाधा सेर अर्थात् एक पावसे है।</small><noinclude></noinclude> tusocgjerw44ghpzjiqe5rk4qf18ejz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२५ 250 197268 675490 672751 2026-08-30T20:40:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 675490 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude> {{C|{{larger|'''१६४. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|वेजलपुर}} {{Right|४ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेजिनाल्ड, तुम्हारा पत्र पाकर बड़ी खुशी हुई। पुनः विश्वास प्राप्त करनेकी तो कोई बात ही नहीं है, क्योंकि तुमने कभी मेरा विश्वास खोया ही नहीं सच्ची अहिंसाको आत्मसात् करनेकी प्रक्रिया बहुत धीमी चलती हैं और कभी-कभी वह कष्टकर भी होती है और बहुत कम लोग इस चीजको समझते हैं कि मानसिक हिंसा जैसी भी कोई वस्तु है और उसे मनसे निकालने की जरूरत होती है। तुम बात तो तुरन्त समझ गये, यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नताका विषय है। तुम्हारे लिखे अन्य पत्रोंकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर तुम अपने मनमें एक और भी निश्चय कर लो तो मुझे बड़ी खुशी होगी। मेरा मतलब इस निश्चयसे है कि फिलहाल तुम अखवारोंको कोई पत्र नहीं लिखोगे। अभी तुम 'यंग इंडिया' को ही अपना एकमात्र विचारोद्वाहक होने दो। 'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद पंक्तियाँ लिखनेके बारेमें तुम्हारा क्या खयाल है?१ अपनी सगाईके विषयमें तुमने जो कुछ कहा है, उसे मैं समझता हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३३) की फोटो नकलसे। सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''१६५. भाषण : वेजलपुरमें'''}}}} {{Right|४ अप्रैल, १९३०}} इस सभा के बाद अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँचने के पहले मुझे दो भाषण और देने हैं। दांडीमें यदि भाषण देने जैसी स्थिति हुई तो मैं भाषण दूंगा। ४१ पटेलोने इस्तीफे दिये हैं और ताल्लुका कमेटीके प्रधानने उनका अभिनन्दन किया है। इन ४१ इस्तीफों के अतिरिक्त मुझे आज सात इस्तीफे और दिये जानेकी खबर मिली है। भारत-भूषण पण्डित मदनमोहन मालवीय और उनके बाद अन्य छः व्यक्तियोंने विधान सभासे इस्तीफा दे दिया है। ये छ: भी जाने-माने व्यक्ति हैं। एक तरफ <small>१. यंग इंडिया में ऐसी कोई टिप्पणी प्रकाशित नहीं हुई।</small><noinclude></noinclude> pcb0jwe5fgez2qvidcwvhnp3g9ph4ow पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२८ 250 197271 675491 672602 2026-08-30T20:42:00Z Kumari Arpana Sinha 2191 675491 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करेंगे। मुझे उम्मीद है कि सारा देश कल राष्ट्रीय सप्ताहको उसी भावनासे मनायेगा जिस भावनासे इसकी कल्पना की गई थी। मेरा निश्चत मत है कि देश कार्यके लिए हममें जितना ज्यादा उत्सर्गका भाव होगा और हमारी आत्मशुद्धि जितनी अधिक हुई होगी, हम अपने उस शानदार लक्ष्यको उतनी ही जल्दी प्राप्त करेंगे जिसके लिए भारतके करोड़ों लोग जाने-अनजाने प्रयत्नशील हैं। [अंग्रेजीसे] '''स्पीवेज एंड राइटिंग्ज ऑफ महात्मा गांधी''' {{C|{{larger|'''१६७. एक सन्देश'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|५ अप्रैल, १९३०}} शक्तिके विरुद्ध न्यायकी इस लड़ाई में सारी दुनियाकी सहानुभूति चाहता हूं। {{Right|मो० क० गांधी}} '''महात्मा गांधी''' (अलबम) में उपलब्ध अंग्रेजीकी फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''१६८. सन्देश : अमेरिकाको१'''}}}} {{Right|दांडी,}} {{Right|५ अप्रैल, १९३०}} मैं जानता हूं कि अमेरिकामें मेरे असंख्य मित्र हैं, जिनकी इस संघर्षमें गहरी सहानुभूति है, लेकिन मात्र सहानुभूति मेरे किसी कामकी न होगी। जरूरत इस बातकी है कि भारत के स्वतन्त्रताके सहज अधिकारके पक्ष में जनमतकी ठोस अभिव्यक्ति हो और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाये गये पूर्ण अहिंसात्मक उपायसे पूरी सहमति व्यक्तकी जाये। मैं पूरी नम्रताके साथ किन्तु साथ ही पूरी सचाईसे दावा करता हूँ कि यदि हम अहिंसात्मक तरीकेसे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो यह भारत द्वारा विश्वको दिया गया एक सन्देश होगा। [ अंग्रेजीसे ] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ७-४-१९३० <small>१. यह सन्देश न्यूयार्ककी ईस्टर्न न्यूज एंड प्रेस एजेंसीके संवाददाता एस० ए० को दिया गया था।<small><noinclude></noinclude> 57inbqpp7ds0ttitgmpsy8useg26cft पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३३ 250 197276 675492 672926 2026-08-30T20:45:16Z Kumari Arpana Sinha 2191 675492 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|१९२}}</noinclude>रोहतकमें लाला श्यामलाल नामक एक नम्र, बहादुर और त्यागी सेवक हैं। उन्होंने १९२१ के असहयोग आन्दोलनके समय अपनी वकालत छोड़ दी थी। आन्दोलनमें निःस्व हो जाने पर उन्होंने फिर वकालत शुरू की और हजारों रुपये कमाये। किन्तु लाहौरकी कांग्रेसके बाद उनका हृदय फिर पिघला और उन्होंने आश्रम में आनेके लिए अनुरोध किया। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी इस दाँडी-यात्रामें शामिल होनेकी भी इच्छा प्रगट की थी। किन्तु यह तो सोनेकी मुद्रासे पैसेके बराबर काम लेना होता। इसलिए मैंने उन्हें फिर वापस रोहतक भेज दिया। और जैसा कि उन्होंने लिखा है, उन्होंन अहिंसाका अमृत पीकर, सत्य और अहिंसाकी कीमत पहलेसे ज्यादा समझनेके बाद विदा ली और यह प्रतिज्ञा ली कि अब वे अहिंसाको कभी नहीं छोड़ेंगे। ये लाला श्यामलाल अराजभक्तिके अपराध में गिरफ्तार कर लिये गये हैं। उन्होंने 'यंग इंडिया' में लिखे उस लेखके-जैसा, जिसमें अराजभक्तिको धर्म बताया गया है, कोई भाषण किया होगा। पहली बात तो यह है कि सरकारको धारा १२४ (अ) उस मनुष्यके खिलाफ लागू करनी चाहिए जो प्रतिक्षण इस राज्यके नाशकी प्रार्थना कर रहा है और उसके लिए प्रयत्न भी कर रहा है। मतलब यह कि उन्हें इस धाराको मेरे खिलाफ लागू करना चाहिए। किन्तु सच तो यह है कि इस धाराका प्रयोग उसीके खिलाफ किया जाना चाहिए जो विद्रोह करके और शस्त्रास्त्र के द्वारा राज्यका नाश करनेकी कोशिश करे। जो व्यक्ति सत्य और अहिंसाके मार्ग पर चलकर स्वयं कष्ट सहन करके राज्यका नाश करना चाहता हो उसके खिलाफ इसका प्रयोग नहीं हो सकता। लेकिन मैं तो कोई न्यायाधीश नहीं हूँ। मेरी तो बैरिस्टरी भी छीन ली गयी है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|दांडी कूचके दौरान}} {{Right|[६ अप्रैल, १९३०के पूर्व]१}} चि० नारणदास, रेजिनाल्डने अगर नाम माँगा हो और तुमने उसे 'अंगद ' २ नाम दिया तो यह उचित ही है। कृष्णदास जैसे-जैसे पैसा मँगाये वैसे-वैसे उसे पैसा देते जाना। जबतक वह एक बारमें एक सौ रुपयेसे एक हजार रुपये तककी रकम माँगता है तबतक मुझसे <small>१. विषय-वस्तुसे लगता है कि यह ६ अप्रैल, १९३० को नारणदास गांधीको लिखे पत्रके पहले लिखा गया होगा।</small> <small>२. दौत्य करनेके कारण।</small><noinclude></noinclude> 7maymumoms8wr6uf9j2y5ckhur1ytp9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३७ 250 197280 675493 673194 2026-08-30T20:47:04Z Kumari Arpana Sinha 2191 675493 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७१. सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश१'''}}}} {{Right|[६ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}} आप सरदारको तीन महीने और तीन सप्ताह के पहले छुड़ाना चाहते हों तो शान्तिका-अहिंसाका पालन करके आप उन्हें छुड़ा सकते हैं। आपसे मैं पचास प्रतिशत नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत मुखियों द्वारा त्यागपत्र दिये जाने की मांग करता हूँ। तलाटी भी इसमें शामिल हैं ही। मुखिया और तलाटी सरकारके दो स्तम्भ हैं। इन्हीं पर भारतका राजनीतिक शरीर आधारित है। यदि ये टूट जायें तो सारा ढाँचा ही चरमराकर टूट जायेगा और धूलमें मिल जायेगा। X X X सावधान, झूठे त्यागपत्रोंको जला डालिए। उनके बिना भी हमारा काम चल सकता है। अगर कोई यह समझता हो कि गांधी तो महात्मा है, उसने तपश्चर्या की है, सरदार उसका सहकारी है, इसलिए दो महीने में हम सब फिर अपनी-अपनी जगह बहाल हो ही जायेंगे तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। स्वराज्य एक-दो महीने में भी मिल सकता है और उसमें पूरा जीवन भी लग सकता है। सरदारकी और मेरी हड्डियाँ राखमें मिल जायें, हो सकता है, तब भी स्वराज्य न मिले। लेकिन अब तो हम बागी हो गये हैं। और हमारी यह बगावत कोई ऐसी-वैसी नहीं है। जिस साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता, हम उसके खिलाफ बगावत कर रहे हैं। यह साम्राज्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, असत्यका पुंज है। सत्यकी फूंक मात्र से वह बात-की-बातमें उड़ जायेगा। लेकिन ऐसा सत्य हममें प्रकट हो तब न? इसलिए आज आरम्भ में ही आप सबको पुकारकर मैं हिसाब कर लेना चाहता हूँ, आपको सचेत करता हूँ कि हमें दगा न दीजिएगा। मुझे दगा देनेका मतलब सरदारको दगा देना है, भारत माताको दगा देना है, खुद अपनेको दगा देना है। किसीको आपके त्यागपत्रकी भूख नहीं है। आनन-फानन में कार्य सिद्ध हो जायेगा, ऐसा मानकर त्यागपत्र न दें। आप ऐसा समझकर ही त्यागपत्र दें कि अब आपको मुखियागिरी या तलाटीगिरी कभी मिलनेकी नही। X X X बहनोंने गाया है कि 'स्वराज्य लेना सरल है'; है तो, लेकिन तभी जब वे करके दिखायें। नमकके बारेमें इतना कहकर अब मैं एक-दो वाक्योंमें चरखेकी बात समझा रहा हूँ। आप ऐसा न समझें कि स्वराज्य नमकके पहाड़में तो है, लेकिन सूतके तारमें नहीं है। स्वराज्य तो सूतके तारमें ही है। करोड़ों लोगोंको सुखी बनाने <small>१. "स्वराज्य गीता" से उद्धृत साधन-सूत्र में यह नहीं बताया गया है कि ये भाषण सूरत जिले के किन स्थानों में और किन तारीखोंको दिये गये थे। <small> ४३-१३<noinclude></noinclude> qb5tmvurg9249iw6uws03dhm1m5y2tu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३८ 250 197281 675494 673195 2026-08-30T20:48:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 675494 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और शान्त रखनेवाला दूसरा कोई भी साधन नहीं है। आप सब नमककी खातिर आगे आयें या न आयें, खादीका मन्त्र तो जपते ही रहें। और शराब? इस बुराईको दूर करनेके लिए तो मीठ्बहन पागल बनी ही हुई हैं। इसकी खातिर एक पारसिन घर छोड़ दे और तब भी हम इस लतको न छोड़ें, यह शर्म की बात है। X X X स्वराज्यकी ये शर्तें रोज-रोज सुनाकर मैं तो थक गया। अब इसके बाद एक धर्म रह जाता है, जिसका पालन मैं कर लूँ। मेरा काम तो आपको अपना धर्म बताना था। मैंने तो यह निश्चय कर लिया है कि हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, लेकिन मुझे सविनय अवज्ञा करके या तो अपना बलिदान कर देना है या स्वराज्य प्राप्त करना है। इसीलिए मैंने लोगोंको आमन्त्रित किया और खुद निकल पड़ा। कल जिन्दा रहा तो आपके आशीर्वाद लेकर यहांसे भी चल पड़ूगा। जो तैयार हैं उन्हें मैं अपने साथ चलनेको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग न आयें वे खादी पहनें और बनायें। खादीकी कमी पड़ गई है। इसको बनानेवाला मैं तो चला। मैं बैठा होऊ तब तो चाहे जहाँसे खादी लाकर सबकी मांग पूरी कर दूँ। खादी बनानेवाला मैं तो दूसरे खादी बनानेवालोंको भी लेकर चला और जो बनानेवाले रह गये हैं उनमें यह मांग पूरी करनेकी शक्ति नहीं है। इसलिए खादी पहनना और बनाना आपका धर्म है। x x x मैं तो अंग्रेज, पारसी या मुसलमान किसीका सपने में भी बुरा नहीं चाहता। मैं तो सबका भला ही चाहनेवाला हूँ। इसलिए वह हमारा क्या कर सकती है? कुछ करनेकी उसकी हिम्मत ही नहीं होती। हिम्मत होगी तो पकड़ेगी और मुझे पकड़ ले तो भी जेल में पड़ा पड़ा मैं यही प्रार्थना करूँगा कि हे ईश्वर, इस सरकारका तू हृदय परिवर्तन कर और इसके हृदयमें मनुष्यको, इन्सानको शोभा न देनेवाली जो भावना पैदा हुई है उसे तू दूर कर अर्थात् जेलमें भी मैं तो इसके भलेकी ही कामना करूँगा मैं नहीं चाहता कि राजा या उसके अधिकारी मार डाले जायें। इसलिए मुझ जैसे व्यक्तिको पकड़ना या जेलमें डालना जरा भारी पड़ता है। राज्याधिकारी चाहें तो मुझे पकड़ सकते हैं, लेकिन मुझे पकड़ने में उन्हें शर्म आती है और इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। लेकिन हमेशा ऐसा ही चलनेवाला नहीं है। एक न एक दिन उसको मुझे पकड़ना ही है। और अगर मुझे नहीं पकड़ते तो कुछ ही दिनोंमें सारा हिन्दुस्तान धधक उठेगा। मैं जानता हूँ कि आप सब भाई-बहन अभी जेल जानेके लिए नहीं आये है। मेरे लिए तो पकड़े जाना या यहीं बैठे रहना, दोनों समान हैं। एक न एक दिन आप सबकी भी यही स्थिति होनेवाली है। सरकारकी गति तो सांप-छछुन्दरकी-सी हो गई है। मुझे बाहर रहने देना या जेल में डालना, ये दोनों बातें उसके लिए मुश्किल हैं। आपको मैं यह सामान्य धर्म <small>१. तात्पर्य अंग्रेज सरकार से है।</small><noinclude></noinclude> leil3wz0i46ujk80t22trth2to4ns2b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३९ 250 197282 675495 673205 2026-08-30T20:49:38Z Kumari Arpana Sinha 2191 675495 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंके प्रति|१९५}}</noinclude>बताता हूँ। हिन्दू, मुसलमान, पारसी तथा अन्य सब भी इस धर्मका पालन करें। हम सब ऐसा करें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सत्ता की शक्तिके बाहरकी बात होगी। [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१७२. बहनोंके प्रति१'''}}}} मैं इस तथ्य से भली-भांति अवगत हूं कि हिन्दुस्तानकी असंख्य स्त्रियाँ अनपढ़ हैं। लेकिन शिक्षाके अभाव के बावजूद वे समाजमें अपना स्थान किस तरहसे प्राप्त कर सकती है, इस बातको ध्यान में रखकर ही मैंने अपने शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्तोंकी रचना की है और इन्हीं सिद्धान्तोंमें से स्वराज्य प्राप्त करनेके साधनोंकी संयोजना हुई है। अब तो मैं दावेके साथ यह कह सकता हूँ कि यह लड़ाई कुछ ऐसे ढंगकी है कि यदि बहनें चाहें तो इसमें वे पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक योगदान दे सकती हैं। खादीका समस्त कार्य बहनोंके अधीन है। यदि वे अपना सहयोग न दें तो यह कार्य आज ही ठप हो जाये। आज जितने पुरुष खादी कार्यको प्रोत्साहन दे रहे हैं उनकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या कमसे कम पांच गुनी ज्यादा है। वस्तुतः इसे दस गुनी माननी चाहिए, क्योंकि लगातार आठ घंटे चलनेवाले एक करघे के लिए दस बहनोंको काम करना होता है। यह बात तो सभी जानते हैं कि करघोके लिए सूत प्रदान करनेमें पुरुषोंका हिस्सा बहुत कम है; परन्तु खादी आन्दोलनके अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों ठीक संख्या में अपना योगदान दे रही हैं। करघा तो अनेक स्त्रियाँ चलाती ही हैं। इसलिए खादीके विषय में तो यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह कार्य केवल बहनोंके ही अधीन है और इस कार्यको लेकर ही बहनोंने ऐसी प्रगति की है जैसी हिन्दुस्तानके इतिहासमें पहले कभी नहीं हुई थी और न कभी किसीने इसकी कल्पना ही की थी। समस्त हिन्दुस्तानकी अपनी तीन बारकी यात्राके दौरान मैंने यही देखा है और आज गुजरातमें कूचके दौरान भी मैं यही देख रहा हूं और सो भी इस सीमा तक कि हम त्रैराशिक तक लगा सकते हैं, अर्थात् कह सकते हैं कि आज जिस स्थान पर जितने अंश तक चरखेका चलन है उतने अंशतः स्त्रियोंमें जागृति आई है। इस तरह विचार करते हुए और बहनोंकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेकी अधीरताको देखते हुए मुझे तो ऐसा लगा है कि यदि बहनें सचमुच जोखिम उठाना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानके ही नहीं, संसारके इतिहास पर अपनी छाप छोड़ना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानकी सभ्यताका पुनरुद्धार करना चाहती हों तो उन्हें <small>१. इस शीर्षकके प्रथम तीन अनुच्छेदोंका अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। ये अनुच्छेद "भारतकी महिलाओं " के प्रारम्भिक तीन अनुच्छेदोंमें आ जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२६</small><noinclude></noinclude> 1m052es6f6vofy22751pj0k4373dfid 675496 675495 2026-08-30T20:50:56Z Kumari Arpana Sinha 2191 675496 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंके प्रति|१९५}}</noinclude>बताता हूँ। हिन्दू, मुसलमान, पारसी तथा अन्य सब भी इस धर्मका पालन करें। हम सब ऐसा करें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सत्ता की शक्तिके बाहरकी बात होगी। [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१७२. बहनोंके प्रति१'''}}}} मैं इस तथ्य से भली-भांति अवगत हूं कि हिन्दुस्तानकी असंख्य स्त्रियाँ अनपढ़ हैं। लेकिन शिक्षाके अभाव के बावजूद वे समाजमें अपना स्थान किस तरहसे प्राप्त कर सकती है, इस बातको ध्यान में रखकर ही मैंने अपने शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्तोंकी रचना की है और इन्हीं सिद्धान्तोंमें से स्वराज्य प्राप्त करनेके साधनोंकी संयोजना हुई है। अब तो मैं दावेके साथ यह कह सकता हूँ कि यह लड़ाई कुछ ऐसे ढंगकी है कि यदि बहनें चाहें तो इसमें वे पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक योगदान दे सकती हैं। खादीका समस्त कार्य बहनोंके अधीन है। यदि वे अपना सहयोग न दें तो यह कार्य आज ही ठप हो जाये। आज जितने पुरुष खादी कार्यको प्रोत्साहन दे रहे हैं उनकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या कमसे कम पांच गुनी ज्यादा है। वस्तुतः इसे दस गुनी माननी चाहिए, क्योंकि लगातार आठ घंटे चलनेवाले एक करघे के लिए दस बहनोंको काम करना होता है। यह बात तो सभी जानते हैं कि करघोके लिए सूत प्रदान करनेमें पुरुषोंका हिस्सा बहुत कम है; परन्तु खादी आन्दोलनके अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों ठीक संख्या में अपना योगदान दे रही हैं। करघा तो अनेक स्त्रियाँ चलाती ही हैं। इसलिए खादीके विषय में तो यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह कार्य केवल बहनोंके ही अधीन है और इस कार्यको लेकर ही बहनोंने ऐसी प्रगति की है जैसी हिन्दुस्तानके इतिहासमें पहले कभी नहीं हुई थी और न कभी किसीने इसकी कल्पना ही की थी। समस्त हिन्दुस्तानकी अपनी तीन बारकी यात्राके दौरान मैंने यही देखा है और आज गुजरातमें कूचके दौरान भी मैं यही देख रहा हूं और सो भी इस सीमा तक कि हम त्रैराशिक तक लगा सकते हैं, अर्थात् कह सकते हैं कि आज जिस स्थान पर जितने अंश तक चरखेका चलन है उतने अंशतः स्त्रियोंमें जागृति आई है। इस तरह विचार करते हुए और बहनोंकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेकी अधीरताको देखते हुए मुझे तो ऐसा लगा है कि यदि बहनें सचमुच जोखिम उठाना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानके ही नहीं, संसारके इतिहास पर अपनी छाप छोड़ना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानकी सभ्यताका पुनरुद्धार करना चाहती हों तो उन्हें <small>१. इस शीर्षकके प्रथम तीन अनुच्छेदोंका अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। ये अनुच्छेद "भारतकी महिलाओंसे " के प्रारम्भिक तीन अनुच्छेदोंमें आ जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२६</small><noinclude></noinclude> d3mvcfhkbms4ao39nw5gpl7elnmge2i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४० 250 197283 675497 673208 2026-08-30T20:53:05Z Kumari Arpana Sinha 2191 675497 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>अपने लिए कोई विशेष क्षेत्र चुन लेना चाहिए। तो अब इस दृष्टिसे विचार करें। यदि बहनें सविनय अवज्ञामें भाग लेना चाहती है तो वे निकट भविष्यमें ही ऐसा कर सकेंगी। परन्तु उनके लिए नवीन क्षेत्रकी खोज करनेके बाद अब उन्हें नमककानूनकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेके लिए आमन्त्रित करनेका मेरा तनिक भी मन नहीं होता। बहनें यदि उसमें शामिल हुईं भी तो वे पुरुषोंके हजुममें खो जायेंगी,क्योंकि मुझे उम्मीद है कि इसमें जगह-जगह से पुरुषोंके दल-के-दल उमड़ पड़ेंगे। इतनी बड़ी संख्या में बहनें भी निकल पड़ेंगी, ऐसा मैं नहीं मानता और यदि निकल भी पड़े तो बहनों अथवा भाइयोंके लिए करनेको कुछ नहीं रह जायेगा और नमक-कर भी हट जायेगा। मैं जैसे-जैसे विचार करता हूँ वैसे-वैसे मुझे यह एहसास होता है कि नमक कर दूर करवाने में हमें विशेष कष्ट नहीं उठाना होगा।१ मुझे लगता है कि इन लोगोंका हृदय परिवर्तन करना स्त्रियोंका खास क्षेत्र है अथवा वे उसे अपना खास क्षेत्र बना सकती हैं। इतिहास साक्षी है, हृदयके साम्राज्यको स्त्री जितनी जल्दी जीत सकती है उतनी जल्दी पुरुष नहीं जीत सकता। यदि स्त्रियां चाहें तो मद्य निषेधके इस कार्यको वे आज ही अपने हाथमें ले सकती है। इसके बारेमें मेरा विचार यह है : १. अच्छी अर्थात् सधी हुई स्त्रियां स्थान-स्थानपर सत्याग्रह-दल बनायें और वे अकेली ही मद्य विक्रेताओंके पास जायें और उनसे इस धन्धेको छोड़ देनेका अनुरोध करें। २. शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और शराबकी दुकानोंपर भी खड़ी रहें, भजन कीर्तन करें तथा शराबकी दुकानपर जानेवालोंको जाल में फँसने से रोकें।२ यदि शराबकी दुकानें बन्द हो जायें, अफीमकी दुकानें बन्द हो जायें तो उसका मतलब यह होगा कि जनताके २५ करोड़ रुपयोंकी बचत हो गई। २५ करोड़ रुपयेका राजस्व हिन्दुस्तानमें अन्य तरीकेसे निकल सकता है। इसका केवल एक ही परिणाम होगा, वह यह कि सेना और प्रशासनके खर्च में भी बहुत कमी हो जायेगी और यह कमी इस हदतक होगी कि उससे देशकी राजनीतिका रूप ही बदल जायेगा। आजकी नीति जनताके अविश्वासपर आधारित है। कलकी नीतिकी रचना जनताके विश्वासपर होगी। जनताके विश्वासपर आधारित राजनीति में न तो बड़े पुलिस विभागकी आवश्यकता होती है और न बहुत बड़ी सेना रखनेकी जरूरत होती है। लेकिन मैं बहनोंको इस झंझटमें डालू ही क्यों? अभी तो किसी अन्य क्षेत्रकी चर्चा किये बिना मैं यह्नोंके समक्ष मद्यपान निषेधके क्षेत्रको प्रस्तुत करता हूँ। मैं मानता हूँ कि इस कार्यको करनेके लिए गुजरात सबसे अधिक उपयुक्त क्षेत्र है। इस क्षेत्रको तैयार करनेवाली कोमलकाय पारसी महिला मीठूबहन पेटिट है और इस <small>१. इसके बाद अनुच्छेदका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद "भारतकी महिला-अओसे" के चौबे भनुच्छेदमें आ जाता है; देखिए पृष्ठ २२६ ।</small> <small>२. इसके बादका एक अनुच्छेद यह नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओंसे " के पाँचवें अनुच्छेद में आ जाता है; देखिए पृष्ठ २२६ । </small><noinclude></noinclude> 78ej3ig1sgbf3rcjbivikf8ii9d54qd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४१ 250 197284 675498 673230 2026-08-30T20:54:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 675498 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अन्त्यजोंके लिए कुएँ|१९७}}</noinclude>क्षेत्रका विचार भी मेरे मनमें उनके अलौकिक कार्यको देखकर ही आया है। इसलिए करनेको केवल इतना ही रह जाता है कि हम मीठूबहनके कार्यको सौ गुना बढ़ायें। इसका मतलब यह नहीं कि केवल सौ बहनें ही इस कार्यके लिए तैयार हों अपितु यह कि असंख्य बहनें तैयार हों जिससे यह कार्य सौ गुना ज्यादा अर्थात् असंख्य गुना ज्यादा बढ़ जाये। अभी जिस ढंगसे काम हो रहा है उसमें थोड़ा परिवर्तन करना होगा। पुरुष मात्र उस कार्यमें से निकल आयेंगे। बहनों द्वारा बताया हुआ काम ही वे लोग करेंगे। लेकिन मुख्य काम-जैसे धरना देना, लोगोंसे विनती करना, आरजू-मिन्नत करना, मद्य विक्रेताओंके पास दल लेकर विनय करनेके लिए जाना तो बहनोंका ही है१। मैंने इस योजनाकी केवल रूपरेखा-भर ही बताई है, इसमें व्योराको जोड़ा जा सकता है। मेरी इच्छा है, बहनें इस कार्य में पहल करें और चालू प्रवृत्तिको इतनी गति प्रदान करें जिससे जनता और सरकार दोनों ही हिल उठें। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''' ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१७३. अन्त्यजोंके लिए कुएँ'''}}}} ठक्कर बापाकी अन्त्यज भाइयोंके लिए कुएँ बनवाने सम्बन्धी अपील कुछ सप्ताह पूर्व 'नवजीवन' में प्रकाशित हुई थी। बम्बईसे कुछ एक भाई सांधियेरमें मुझसे मिलने आये थे। उन लोगोंसे मैने कहा था कि ठक्कर बापाकी झोली उन्हें ही भर देनी चाहिए। ४०,००० रुपयेकी रकम उनके लिए कोई बड़ी रकम न थी और इन [अन्त्यज] भाइयोंको इतने ही रुपयोंकी जरूरत है। उनमें से एक भाईने तुरन्त ही एक कुऍके लिए पैसे दे दिये। श्री नारणदासने सबके साथ सलाह-मशविरा कर तुरन्त ४०,००० रुपये इकट्ठा कर देनेकी बात कही। इससे मुझे बहुत हर्ष हुआ और मैंने आये हुए भाइयोंको बधाई दी। अब मेरी सलाह है कि यह पैसा तुरन्त इकट्ठा करके ठक्कर बापाके पास पहुँचा दिया जाये। आगामी तीन महीनोंमें ही कुओंकी खुदाई हो सकती है। चौमासा शुरू होनेपर कुऍकी खुदाईका काम नहीं हो सकता। [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', ६-४-१९३० <small>१. इसके बादके दो अनुच्छेदों का अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओं" के अन्तिम दो अनुच्छेदों में आ जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२८।<small><noinclude></noinclude> gzge1wc49dddih81k5wbv208bvno2ve पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४४ 250 197287 675469 673278 2026-08-30T19:46:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 675469 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>बहिष्कारके निम्न रूप हैं : (अ) विदेशी वस्त्र-मात्रका बहिष्कार। (ब) सिर्फ ब्रिटिश कपड़ेका बहिष्कार। (क) तमाम ब्रिटिश चीजोंका बहिष्कार। (ग) तमाम विदेशी चीजोंका बहिष्कार। मेरे खयालमें (१) अर्थात् शुद्ध खादी ही सच्ची स्वदेशी है और सच्चा बहिष्कार (अ) अर्थात् विदेशी वस्त्र मात्रका बहिष्कार है। यदि स्वदेशीका उपर्युक्त पहला प्रकार अर्थात् शुद्ध सादीका उत्पादन सध जाये तो उसके आधारपर अन्य आवश्यक स्वदेशी वस्तुओंको भी स्वतः प्रोत्साहन मिल जायेगा। यदि हम एकसाथ सभी आवश्यक वस्तुओंके पीछे पड़े रहे तो एक भी आवश्यक स्वदेशी वस्तुको अपनाने के अपने लक्ष्यतक भी नहीं पहुँच सकेंगे। बहिष्कारकी दृष्टिसे सिर्फ (अ) अर्थात् हर तरहके विदेशी वस्त्रका बहिष्कार आवश्यक है और यह खादी द्वारा ही हो सकता है। पाठक यह याद रखें कि दूसरी तरहकी स्वदेशीकी चर्चा कांग्रेसके जन्मकालसे अर्थात् ४५ वर्षसे चलती आई है, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली है। शुद्ध स्वदेशी अर्थात् खादीकी बातको अभी सिर्फ नौ साल ही हुए हैं; और तब भी उसमें अच्छी कामयाबी हासिल हुई है। उसके प्रसारके लिए एक ऐसी राष्ट्रीय संस्थाका जन्म हुआ है, जिसके मुकाबलेकी दूसरी कोई संस्था मुझे सारी दुनियामें नहीं दिखाई पड़ती। और इस खादीके कार्यके कारण ही तो आज व्यापक सविनय अवज्ञाका प्रयोग सम्भव हो सका है। पाठक यह भी याद रखें कि ४५ वर्षोंसे विदेशी चीजों और अंग्रेजी मालके बहिष्कारकी बातें होती आई हैं। लेकिन अबतक इसमें किसी तरहकी सफलता नहीं मिली है, जबकि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ है कि आज उसकी शक्यताके बारेमें लोगों में विश्वास पैदा हो गया है। मेरी राय में व्यावहारिक दृष्टिसे भी विदेशी वस्त्रके बहिष्कारको छोड़कर दूसरी ओर लोगोंका ध्यान खींचनेमें नुकसान है, और खादीको छोड़कर विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारको सफल बनानेका विचार करना दूरंदेशीकी निशानी नहीं है। अगर देशी मिलोंके द्वारा ही बहिष्कार सफल हो पाता तो अबतक अर्थात् इन ५० वर्षो में मिलोंको उसमें कामयाबी मिल गई होती। हां, यह मैं मानता हूँ कि खादीका समर्थन करके मिलें बहिष्कार आन्दोलनकी खासी मदद कर सकती हैं। यह किस तरह हो सकता है, सो मैं बता चुका हूँ। हिन्दुस्तानकी मिलोंका बना स्वदेशी कपड़ा निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी है। क्योंकि उससे खादी और मिलके कपड़ेको बराबरीका स्थान मिल जाता है। यह तो किसी ऊँचे और बौने आदमीकी दोस्ती जैसी बात हुई। ऊँचेको बौनेकी बराबरीके हक देनेका मतलब बौनेको कुछ भी न देना है। यह तो साफ जाहिर है। कि बौना, ऊँचे आदमीकी पंक्ति में खड़ा ही नहीं रह सकता। अतएव अगर ऊँचा<noinclude></noinclude> 1c2tp7ork4dje22gmmyiavu7k723a5g पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४८ 250 197291 675470 673289 2026-08-30T20:00:36Z Kumari Arpana Sinha 2191 675470 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>८. मिलें खादीके नामपर मिलका कपड़ा कभी न बनायें, खादीकी छापका उपयोग न करें, चरखेकी तसवीर न चिपकायें; बल्कि इसके विपरीत आज जिन-जिन किस्मोंकी खादी तैयार नहीं हो सकती, उन्हीं किस्मोंका कपड़ा बनायें, अर्थात् चरखा- संघसे मिलकर कपड़ेकी किस्म मुकर्रर कर लें। ९. मिलें खादीका संग्रह करें, प्रचार करें और उसके उत्पादनमें अपनी बुद्धि और अपने अनुभवका उपयोग करें। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१७७. पत्र : रेजिनल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेजिनल्ड, आशा है तुम्हें मेरा पहला पत्र' मिल गया होगा। विल्सनका पत्र बहुत अच्छा है। भगवान् तुम्हें अकल्याणसे बचायेगा। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३४ ) से। सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''१७८. पत्र : लाला दुनीचन्दको'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} प्रिय लाला दुनीचन्द, रोहतक के लाला शामलालकी गिरफ्तारीकी खबर पाते ही लाला सूरजभानको तुरन्त पंजाब चले जानेकी जरूरत महसूस हुई है। मैंने इस सुझावका समर्थन किया है। कृपया इनसे जो काम लेना चाहें, लें। मैं आशा करता हूँ कि स्वतन्त्रताके इस अन्तिम संघर्ष में आप व आपकी धर्मपत्नी अपना सर्वस्व त्याग करनेसे पीछे नहीं हटेंगे। {{Right|आपका,}} {{Right|'''मो० क० गांधी'''}} अंग्रेजी (जी० एन० ५५८८ ) की फोटो नकलसे। <small>१. देखिए पत्र रेजिनस्ट रेनॉल्डसको, ४-४-१९३०।</small> <small>२. रेनॉल्ड्सने गांधीजी के अनुरोधपर क्रॉनिकलमें प्रकाशित अपने उत्तरकी सफाई देते हुए क्षमायाचनाका एक पत्र लिख दिया था। उस सकाईको पढ़नेके बाद विल्सनने बहुत मैत्रीपूर्ण उत्तर दिया था जो रेनॉल्ड्सने गांधीजी को भेज दिया था।</small><noinclude></noinclude> 8ik4b15jt8zeznom9cb7tds4xiri0mw 675471 675470 2026-08-30T20:01:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 675471 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>८. मिलें खादीके नामपर मिलका कपड़ा कभी न बनायें, खादीकी छापका उपयोग न करें, चरखेकी तसवीर न चिपकायें; बल्कि इसके विपरीत आज जिन-जिन किस्मोंकी खादी तैयार नहीं हो सकती, उन्हीं किस्मोंका कपड़ा बनायें, अर्थात् चरखा- संघसे मिलकर कपड़ेकी किस्म मुकर्रर कर लें। ९. मिलें खादीका संग्रह करें, प्रचार करें और उसके उत्पादनमें अपनी बुद्धि और अपने अनुभवका उपयोग करें। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१७७. पत्र : रेजिनल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेजिनल्ड, आशा है तुम्हें मेरा पहला पत्र' मिल गया होगा। विल्सनका पत्र बहुत अच्छा है। भगवान् तुम्हें अकल्याणसे बचायेगा। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३४ ) से। सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''१७८. पत्र : लाला दुनीचन्दको'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} प्रिय लाला दुनीचन्द, रोहतक के लाला शामलालकी गिरफ्तारीकी खबर पाते ही लाला सूरजभानको तुरन्त पंजाब चले जानेकी जरूरत महसूस हुई है। मैंने इस सुझावका समर्थन किया है। कृपया इनसे जो काम लेना चाहें, लें। मैं आशा करता हूँ कि स्वतन्त्रताके इस अन्तिम संघर्ष में आप व आपकी धर्मपत्नी अपना सर्वस्व त्याग करनेसे पीछे नहीं हटेंगे। {{Right|आपका,}} {{Right|'''मो० क० गांधी'''}} अंग्रेजी (जी० एन० ५५८८ ) की फोटो नकलसे। <small>१. देखिए "पत्र रेजिनस्ट रेनॉल्डसको," ४-४-१९३०।</small> <small>२. रेनॉल्ड्सने गांधीजी के अनुरोधपर क्रॉनिकलमें प्रकाशित अपने उत्तरकी सफाई देते हुए क्षमायाचनाका एक पत्र लिख दिया था। उस सकाईको पढ़नेके बाद विल्सनने बहुत मैत्रीपूर्ण उत्तर दिया था जो रेनॉल्ड्सने गांधीजी को भेज दिया था।</small><noinclude></noinclude> 05peav29h2wgetfrevd5dtat3to7evn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४९ 250 197292 675472 673292 2026-08-30T20:04:31Z Kumari Arpana Sinha 2191 675472 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७९. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको १'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} अब तो नमक-कानून तोड़नेकी रस्म अदा हो ही चुकी है, इसलिए जो कोई भी नमक-कानूनके अनुसार सरकार द्वारा की जानेवाली कार्रवाईको झेलनेको तैयार हो, वह जहाँ चाहे और जहाँ सुविधा हो वहाँ नमक बना सकता है। मेरी सलाह है कि कार्यकर्त्ताओंको सर्वत्र नमक तैयार करना चाहिए, और जहाँ कार्यकर्त्ता साफ नमक बनाना जानते हों वहाँ वे वैसा नमक बनायें और ग्रामवासियोंसे भी ऐसा ही करनेके लिए कहें। पर उनको यह भी बता दिया जाये कि ऐसा करनेसे सरकार उन पर मुकदमा चला सकती है। दूसरे शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि उन्हें यह बता दिया जाये कि सरकारने नमकपर जो कर लगा रखा है उसका किसपर कितना बोझ पड़ता है और नमक-कर को रद करानेके लिए उससे सम्बन्धित नियमों और उपनियमोंको किस प्रकार तोड़ना चाहिए। ग्रामवासियोंको यह बात भी बिलकुल साफ बता देनी चाहिए कि यह काम उन्हें खुले आम करना होगा, छिपाकर नहीं। यह शर्त मालूम हो जानेपर वे चाहें तो खुद नमक तैयार करें, चाहें समुद्र-तट पर दरारों और गढ़ोंमें जमा हुआ प्राकृतिक नमक उठा लायें और उसका उपयोग करें। अपने और अपने ढोरोंके लिए काममें लानेके अतिरिक्त यदि कोई चाहे तो उसके हाथ वे उसे बेच भी सकते हैं। पर यह बात जता दी जाये कि खरीदनेवाला भी नमक-कानून तोड़नेका अपराधी होगा और उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है या बिना मुकदमा चलाये भी नमक अधिकारी उसको हैरान कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान १३ अप्रैलतक नमक कर के खिलाफ लड़ाई जारी रखनी चाहिए। जो लोग इस धर्म-कार्यमें लगे हुए हैं, उन्हें विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और खद्दरके व्यवहारके लिए जोरोंसे आन्दोलन करना चाहिए। उन्हें अधिकसे अधिक खद्दर तैयार करनेका भी प्रयत्न करना चाहिए। इस कार्यके लिए तथा मद्य निषेधके विषयमें मैं भारतकी स्त्रियोंके लिए एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दिन-दिन अधिक दृढ़ होता जाता है कि स्वाधीनता प्राप्ति के लिए पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां अधिक कार्य कर सकती हैं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा वे अहिंसाका ज्यादा अच्छा उदाहरण पेश कर सकेंगी -इसलिए नहीं कि वे कमजोर हैं, जैसा कि पुरुष अपने घमण्डके कारण उनको समझा करते हैं; बल्कि इसलिए कि उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा सही किस्मका साहस अधिक है, और त्यागकी भावना तो कई गुना ज्यादा है। <small>१. इस भेंटवार्तासे पहले गांधीजी ने कीचड़ सने नमकका एक डेला उठाकर नमक कानून भंग किया था।<\small><noinclude></noinclude> bojm0lqdzu6o9pk93v3rup664kqmlya 675473 675472 2026-08-30T20:05:00Z Kumari Arpana Sinha 2191 675473 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७९. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको १'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} अब तो नमक-कानून तोड़नेकी रस्म अदा हो ही चुकी है, इसलिए जो कोई भी नमक-कानूनके अनुसार सरकार द्वारा की जानेवाली कार्रवाईको झेलनेको तैयार हो, वह जहाँ चाहे और जहाँ सुविधा हो वहाँ नमक बना सकता है। मेरी सलाह है कि कार्यकर्त्ताओंको सर्वत्र नमक तैयार करना चाहिए, और जहाँ कार्यकर्त्ता साफ नमक बनाना जानते हों वहाँ वे वैसा नमक बनायें और ग्रामवासियोंसे भी ऐसा ही करनेके लिए कहें। पर उनको यह भी बता दिया जाये कि ऐसा करनेसे सरकार उन पर मुकदमा चला सकती है। दूसरे शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि उन्हें यह बता दिया जाये कि सरकारने नमकपर जो कर लगा रखा है उसका किसपर कितना बोझ पड़ता है और नमक-कर को रद करानेके लिए उससे सम्बन्धित नियमों और उपनियमोंको किस प्रकार तोड़ना चाहिए। ग्रामवासियोंको यह बात भी बिलकुल साफ बता देनी चाहिए कि यह काम उन्हें खुले आम करना होगा, छिपाकर नहीं। यह शर्त मालूम हो जानेपर वे चाहें तो खुद नमक तैयार करें, चाहें समुद्र-तट पर दरारों और गढ़ोंमें जमा हुआ प्राकृतिक नमक उठा लायें और उसका उपयोग करें। अपने और अपने ढोरोंके लिए काममें लानेके अतिरिक्त यदि कोई चाहे तो उसके हाथ वे उसे बेच भी सकते हैं। पर यह बात जता दी जाये कि खरीदनेवाला भी नमक-कानून तोड़नेका अपराधी होगा और उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है या बिना मुकदमा चलाये भी नमक अधिकारी उसको हैरान कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान १३ अप्रैलतक नमक कर के खिलाफ लड़ाई जारी रखनी चाहिए। जो लोग इस धर्म-कार्यमें लगे हुए हैं, उन्हें विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और खद्दरके व्यवहारके लिए जोरोंसे आन्दोलन करना चाहिए। उन्हें अधिकसे अधिक खद्दर तैयार करनेका भी प्रयत्न करना चाहिए। इस कार्यके लिए तथा मद्य निषेधके विषयमें मैं भारतकी स्त्रियोंके लिए एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दिन-दिन अधिक दृढ़ होता जाता है कि स्वाधीनता प्राप्ति के लिए पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां अधिक कार्य कर सकती हैं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा वे अहिंसाका ज्यादा अच्छा उदाहरण पेश कर सकेंगी -इसलिए नहीं कि वे कमजोर हैं, जैसा कि पुरुष अपने घमण्डके कारण उनको समझा करते हैं; बल्कि इसलिए कि उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा सही किस्मका साहस अधिक है, और त्यागकी भावना तो कई गुना ज्यादा है। <small>१. इस भेंटवार्तासे पहले गांधीजी ने कीचड़ सने नमकका एक डेला उठाकर नमक कानून भंग किया था।</small><noinclude></noinclude> g4ve681c9xg52u8gjdes4pnb3jmpvj3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५१ 250 197294 675474 673320 2026-08-30T20:06:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 675474 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२०७}}</noinclude>फिर गांधीजी ने रोहतक के लाला शामलालकी धारा १२४ ए के अधीन हुई गिरफ्तारीका उल्लेख किया। उनकी शानदार राष्ट्रीय सेवाओंके लिए उन्होंने लाला शामलालकी बड़ी प्रशंसा की। '''सरकार अन्य कार्यकर्त्ताओंको गिरफ्तार कर रही है, लेकिन मुझको नहीं। उसकी यह नीति मेरी समझमें नहीं आ रही है। ऐसा नहीं कि मैं गिरफ्तार होनेके लिए बहुत उत्सुक हूँ, लेकिन जो कुछ हो रहा है वह न्यायसंगत नहीं है। गिरफ्तारीसे मुझे कोई बड़ा सम्मान मिल जायेगा, ऐसी बात भी नहीं है। मैं तो पहले से ही महात्मा कहा जाता हूँ, हालांकि मैं यह उपाधि नहीं चाहता।''' '''जेल जानेके लिए मैं बिलकुल उत्सुक नहीं हूँ। दांडीकी अच्छी आबो-हवाका में मजा ले रहा हूँ। लेकिन सरकारको चाहिए कि वह अन्य लोगों से पहले मुझे गिरफ्तार करे, क्योंकि सबसे बड़ा अपराधी तो मैं ही हूँ। रोहतकके हर व्यक्तिका यह कर्त्तव्य है कि वह उस धारा १२४ ए का उल्लंघन करे जिसके अधीन लाला शामलालको गिरफ्तार किया गया है। अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधीजी ने लोगों से अपील की कि जिस नमकपर सरकार कर लेती है, वह नमक वे न खायें।''' [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे फॉनिकल''', ८-४-१९३० {{C|{{larger|'''१८१. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|रविवार, रातको दस बजे के बाद}} {{Right|[६ अप्रैल, १९३०]१}} चि० महादेव, मणिलाल कोठारीके पकड़े जानेकी बात सुनी है। रामदास आदि तो गिरफ्तार किये ही जा चुके हैं। यह सब अच्छा हो रहा है। तुम्हें भी दिन अथवा घंटे गिनने चाहिए। मैं जेलसे बाहर रहूँ अथवा जेलमें, दोनों तरहसे ठीक है। 'यंग इंडिया' के लेख मैंने मोहनलालको सीधे भेजे हैं। [कौन जाने] तुम यहाँ हो अथवा नहीं। समय मिले तो महिलाओंको संगठित कर लेना। आश्रमकी बहनें यदि पहल करती हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं, कदाचित् यही जरूरी हो मैं यह बात शराब-बन्दीके विषय में कह रहा हूँ। <small>१. मणिलाल कोठारी, रामदास और अन्य लोगों के पकड़े जानेकी सूचना १३-४-१९३० के नवजीवन में दी गई थी। पत्र स्पष्टतः इससे पहले रविवार को लिखा गया होगा।<\small><noinclude></noinclude> hlimaf386gl967o60wk7f2728tsezaf 675475 675474 2026-08-30T20:07:40Z Kumari Arpana Sinha 2191 675475 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२०७}}</noinclude>फिर गांधीजी ने रोहतक के लाला शामलालकी धारा १२४ ए के अधीन हुई गिरफ्तारीका उल्लेख किया। उनकी शानदार राष्ट्रीय सेवाओंके लिए उन्होंने लाला शामलालकी बड़ी प्रशंसा की। '''सरकार अन्य कार्यकर्त्ताओंको गिरफ्तार कर रही है, लेकिन मुझको नहीं। उसकी यह नीति मेरी समझमें नहीं आ रही है। ऐसा नहीं कि मैं गिरफ्तार होनेके लिए बहुत उत्सुक हूँ, लेकिन जो कुछ हो रहा है वह न्यायसंगत नहीं है। गिरफ्तारीसे मुझे कोई बड़ा सम्मान मिल जायेगा, ऐसी बात भी नहीं है। मैं तो पहले से ही महात्मा कहा जाता हूँ, हालांकि मैं यह उपाधि नहीं चाहता।''' '''जेल जानेके लिए मैं बिलकुल उत्सुक नहीं हूँ। दांडीकी अच्छी आबो-हवाका में मजा ले रहा हूँ। लेकिन सरकारको चाहिए कि वह अन्य लोगों से पहले मुझे गिरफ्तार करे, क्योंकि सबसे बड़ा अपराधी तो मैं ही हूँ। रोहतकके हर व्यक्तिका यह कर्त्तव्य है कि वह उस धारा १२४ ए का उल्लंघन करे जिसके अधीन लाला शामलालको गिरफ्तार किया गया है। अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधीजी ने लोगों से अपील की कि जिस नमकपर सरकार कर लेती है, वह नमक वे न खायें।''' [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे फॉनिकल''', ८-४-१९३० {{C|{{larger|'''१८१. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|रविवार, रातको दस बजे के बाद}} {{Right|[६ अप्रैल, १९३०]१}} चि० महादेव, मणिलाल कोठारीके पकड़े जानेकी बात सुनी है। रामदास आदि तो गिरफ्तार किये ही जा चुके हैं। यह सब अच्छा हो रहा है। तुम्हें भी दिन अथवा घंटे गिनने चाहिए। मैं जेलसे बाहर रहूँ अथवा जेलमें, दोनों तरहसे ठीक है। 'यंग इंडिया' के लेख मैंने मोहनलालको सीधे भेजे हैं। [कौन जाने] तुम यहाँ हो अथवा नहीं। समय मिले तो महिलाओंको संगठित कर लेना। आश्रमकी बहनें यदि पहल करती हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं, कदाचित् यही जरूरी हो मैं यह बात शराब-बन्दीके विषय में कह रहा हूँ। <small>१. मणिलाल कोठारी, रामदास और अन्य लोगों के पकड़े जानेकी सूचना १३-४-१९३० के नवजीवन में दी गई थी। पत्र स्पष्टतः इससे पहले रविवार को लिखा गया होगा।</small><noinclude></noinclude> daymbc0ocuxl87yl5gj7lqmej3ptrk6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५२ 250 197295 675476 673325 2026-08-30T20:09:07Z Kumari Arpana Sinha 2191 675476 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>लाला शामलालके पकड़े जाने की बात सुनकर मेरी अनुमतिसे सूरजभान पंजाब जा रहे हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] यहाँपर तो अभी सरकारने किसीपर हाथ नहीं डाला है। सरोजिनीदेवी यहीं रह गई हैं और उन्होंने वृद्ध अब्बास साहबके पकड़े जानेपर उनका स्थान लेनेका निश्चय किया है। {{Right|बापू}} गुजराती (एस० एन० ११४७२ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''१८२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|सवा दस बजे रातको [६ अप्रैल,]१ १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारे सवाल का जवाब तो तुम्हें मिल गया होगा। पुरुषोत्तमका यहाँ आ जाना कदाचित् अच्छा रहेगा। यहाँकी हवा तो उत्तम है; यदि उसे पानी अनूकूल आ जाये तो बहुत अच्छा हो। मेरे पकड़े जानेके अभी कोई आसार नहीं दिखाई देते। कमलादेवी एक बहुत भली महिला है। वह पन्द्रह एक दिन रहेगी। उसके बच्चेको यदि यह जगह माफिक आ गई तो वह ज्यादा दिन भी रह सकती है। यदि वह रहना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करना और यह देखना कि वह अकेली न पड़ जाये। रतिलाल यदि काममें लगा रहे तब तो बहुत अच्छा है। सबसे कहना मुझे समय नहीं मिलता, इसीसे कुछ एक पत्र रह जाते हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [ पुनश्च : ] सूरजभान मेरी अनुमतिसे पंजाब जा रहा है। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९६) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. पत्र सूरजभानके पंजाब जानेकी चर्चा लगता है कि पिछला पत्र और यह एक ही दिन लिखे गये होंगे।</small><noinclude></noinclude> 3al72yl9udfwf1hndanzhj2ryxs517j 675477 675476 2026-08-30T20:09:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 675477 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>लाला शामलालके पकड़े जाने की बात सुनकर मेरी अनुमतिसे सूरजभान पंजाब जा रहे हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] यहाँपर तो अभी सरकारने किसीपर हाथ नहीं डाला है। सरोजिनीदेवी यहीं रह गई हैं और उन्होंने वृद्ध अब्बास साहबके पकड़े जानेपर उनका स्थान लेनेका निश्चय किया है। {{Right|बापू}} गुजराती (एस० एन० ११४७२ ) की फोटो-नकलसे। {{C|{{larger|'''१८२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|सवा दस बजे रातको [६ अप्रैल,]१ १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारे सवाल का जवाब तो तुम्हें मिल गया होगा। पुरुषोत्तमका यहाँ आ जाना कदाचित् अच्छा रहेगा। यहाँकी हवा तो उत्तम है; यदि उसे पानी अनूकूल आ जाये तो बहुत अच्छा हो। मेरे पकड़े जानेके अभी कोई आसार नहीं दिखाई देते। कमलादेवी एक बहुत भली महिला है। वह पन्द्रह एक दिन रहेगी। उसके बच्चेको यदि यह जगह माफिक आ गई तो वह ज्यादा दिन भी रह सकती है। यदि वह रहना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करना और यह देखना कि वह अकेली न पड़ जाये। रतिलाल यदि काममें लगा रहे तब तो बहुत अच्छा है। सबसे कहना मुझे समय नहीं मिलता, इसीसे कुछ एक पत्र रह जाते हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [ पुनश्च : ] सूरजभान मेरी अनुमतिसे पंजाब जा रहा है। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९६) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. पत्र सूरजभानके पंजाब जानेकी चर्चा लगता है कि पिछला पत्र और यह एक ही दिन लिखे गये होंगे।</small><noinclude></noinclude> 32gjfv5qaueckfr9qwfuq7ama8i87xu 675478 675477 2026-08-30T20:10:48Z Kumari Arpana Sinha 2191 675478 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>लाला शामलालके पकड़े जाने की बात सुनकर मेरी अनुमतिसे सूरजभान पंजाब जा रहे हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] यहाँपर तो अभी सरकारने किसीपर हाथ नहीं डाला है। सरोजिनीदेवी यहीं रह गई हैं और उन्होंने वृद्ध अब्बास साहबके पकड़े जानेपर उनका स्थान लेनेका निश्चय किया है। {{Right|बापू}} गुजराती (एस० एन० ११४७२ ) की फोटो-नकलसे। {{C|{{larger|'''१८२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|सवा दस बजे रातको [६ अप्रैल,]१ १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारे सवाल का जवाब तो तुम्हें मिल गया होगा। पुरुषोत्तमका यहाँ आ जाना कदाचित् अच्छा रहेगा। यहाँकी हवा तो उत्तम है; यदि उसे पानी अनूकूल आ जाये तो बहुत अच्छा हो। मेरे पकड़े जानेके अभी कोई आसार नहीं दिखाई देते। कमलादेवी एक बहुत भली महिला है। वह पन्द्रह एक दिन रहेगी। उसके बच्चेको यदि यह जगह माफिक आ गई तो वह ज्यादा दिन भी रह सकती है। यदि वह रहना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करना और यह देखना कि वह अकेली न पड़ जाये। रतिलाल यदि काममें लगा रहे तब तो बहुत अच्छा है। सबसे कहना मुझे समय नहीं मिलता, इसीसे कुछ एक पत्र रह जाते हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] सूरजभान मेरी अनुमतिसे पंजाब जा रहा है। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९६) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. पत्र सूरजभानके पंजाब जानेकी चर्चा लगता है कि पिछला पत्र और यह एक ही दिन लिखे गये होंगे।</small><noinclude></noinclude> 86egi0aytno1ppcf70mssn4bg8scado 675479 675478 2026-08-30T20:11:51Z Kumari Arpana Sinha 2191 675479 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>लाला शामलालके पकड़े जाने की बात सुनकर मेरी अनुमतिसे सूरजभान पंजाब जा रहे हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] यहाँपर तो अभी सरकारने किसीपर हाथ नहीं डाला है। सरोजिनीदेवी यहीं रह गई हैं और उन्होंने वृद्ध अब्बास साहबके पकड़े जानेपर उनका स्थान लेनेका निश्चय किया है। {{Right|बापू}} गुजराती (एस० एन० ११४७२ ) की फोटो-नकलसे। {{C|{{larger|'''१८२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|सवा दस बजे रातको [६ अप्रैल,]१ १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारे सवाल का जवाब तो तुम्हें मिल गया होगा। पुरुषोत्तमका यहाँ आ जाना कदाचित् अच्छा रहेगा। यहाँकी हवा तो उत्तम है; यदि उसे पानी अनूकूल आ जाये तो बहुत अच्छा हो। मेरे पकड़े जानेके अभी कोई आसार नहीं दिखाई देते। कमलादेवी एक बहुत भली महिला है। वह पन्द्रह एक दिन रहेगी। उसके बच्चेको यदि यह जगह माफिक आ गई तो वह ज्यादा दिन भी रह सकती है। यदि वह रहना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करना और यह देखना कि वह अकेली न पड़ जाये। रतिलाल यदि काममें लगा रहे तब तो बहुत अच्छा है। सबसे कहना मुझे समय नहीं मिलता, इसीसे कुछ एक पत्र रह जाते हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] सूरजभान मेरी अनुमतिसे पंजाब जा रहा है। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९६) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. पत्र सूरजभानके पंजाब जानेकी चर्चा लगता है कि पिछला पत्र और यह एक ही दिन लिखे गये होंगे।</small><noinclude></noinclude> i6th4sn2owvo0wopopplqqca9q99efd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५३ 250 197296 675480 673349 2026-08-30T20:13:47Z Kumari Arpana Sinha 2191 675480 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : मीराबहनको,'''}}}} {{Right|६ अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है? शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६२२ से भी। {{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}} चि० मीरा, अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं। तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च :] इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१८ से भी। <small>१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।</small> ४३-१४<noinclude></noinclude> hptolj9gudtvnshbefg4b7lsnfuncv6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५४ 250 197297 675481 673353 2026-08-30T20:15:20Z Kumari Arpana Sinha 2191 675481 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८५. बर्बरतापूर्ण'''}}}} {{Right|[७ अप्रैल, १९३०]}} सरकार जो धमकियाँ दे रही थी, वे अब रंग ला रही हैं। कमसे कम गुजरात में नमक-कर का विरोध करनेवाले सत्याग्रहियोंको सरकारने बड़ी तत्परता से गिरफ्तार करना शुरू कर दिया है। इसके लिए मैं उसे बधाई देता हूँ। श्री मणिलाल कोठारी और उनके तमाम साथी, श्री अमृतलाल सेठ और उनके तमाम साथी तथा भोंड़ौच- सेवाश्रम के डॉ० चन्द्रलाल देसाई और उनके सभी साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं। दरबार गोपालदास और श्रीयुत फूलचन्द तथा साथ ही खेड़ा जिलेके बहादुर किन्तु भोले राजपूतोंको अनेक बुराइयोंसे विमुख करनेवाले साहसी सुधारक श्रीयुत रविशंकर भी गिरफ्तार कर लिये गये है। सरकार ने रामदास गांधी, केशवभाई गणेशजी, चिमनलाल प्राणशंकर वगैराको भी गिरफ्तार कर लिया है। उसे यह सब करनेका अधिकार था। लेकिन दांडीसे चार मील दूर आट गाँवमें उसने आज जैसा व्यवहार किया, वैसा व्यवहार करनेका उसे कोई अधिकार न था। पुलिसने सत्याग्रहियों से जवरदस्ती नमक छीननेकी कोशिश की। अगर पुलिसवाले एक सभ्य सरकारके प्रतिनिधि थे तो मैं कहूँगा कि उन्हें इस तरह जबरदस्ती करने का कोई अधिकार न था । सत्याग्रहियोंकी ओरसे उत्तेजना फैलानेका कोई काम नहीं किया जा रहा था। सत्याग्रही भागे भी नहीं जा रहे थे। उनके नाम लिख लिये जा सकते थे। लेकिन पुलिसने इन वीरोंके पवित्र शरीरको बिना किसी वारंट अथवा उचित कारणके हाथ लगाकर इनका तो अपमान किया ही, साथ ही सारे राष्ट्रका भी अपमान किया है। बारडोलीके एक सत्याग्रही उकाभाई रामकी कलाईपर कुछ चोट भी पहुँची है। मैं यह कबूल करता हूँ कि पुलिस उस जगह बिना किसी हथियारके गई थी और शायद पुलिसवाले भी इसे स्वीकार करेंगे कि यहाँ हथियार लेकर जानेकी कोई जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि लोगोंका बरताव स्पष्ट ही सम्पूर्णतया शान्तिमय था। इसके बावजूद नमक छीनने के लिए लोगोंके शरीरको इस तरह हाथ लगाना नैतिक दृष्टिसे गुनाह था और मैं समझता हूँ इंग्लैंड परम्परागत कानूनकी रूसे भी यह गुनाह ही था। हाँ, मैं यह नहीं जानता कि उस कानूनके द्वारा सरकारी अमलोंको कौन-से अधिकार दिये गये है, जिसके अन्तर्गत कायरताको, जिसकी कोई व्याख्या नहीं की गई है, जुर्म करार दिया गया है। पहली बार घटित इस छोटी-सी खूनी घटनाके कारण गाँवके प्रायः सब स्त्री-पुरुष मौकेपर आ पहुँचे। स्त्रियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनमें अभी कोई भाग नहीं <small>१. सोमवार, ७ अप्रैल, १९३० को।</small><noinclude></noinclude> 3jbpd6fr00p0382lmkr2k4me33yej3q पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५६ 250 197299 675482 673364 2026-08-30T20:15:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 675482 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन नमक तो तभी जब्त किया जा सकता है जब वे दोषी ठहराये जा चुके, इससे पहले नहीं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' १०-४-१९३० {{C|{{larger|'''१८६. वक्तव्य : समाचार पत्रोंको'''}}}} {{Right|७ अप्रैल, १९३०}} अबतक मिली खबरोंसे ऐसा जान पड़ता है कि सामुदायिक सविनय अवज्ञाकी जो चमत्कारिक लहर गुजरातमें आई है उसका असर सरकारपर भी हुआ है। सरकार ने इस आन्दोलनके नेताओंको पकड़ने में तनिक भी समय नहीं गंवाया और मैं समझता हूँ कि सरकारने अन्य प्रान्तोंके कार्यकर्त्ताओंपर भी इतना ही ध्यान दिया होगा। यह तो स्वयंको ही बधाई देने जैसा समाचार है। आश्चर्य की बात तो तब होती जब कि सरकार सत्याग्रहियोंको उनकी इच्छानुसार काम करने देती। यदि सरकारने बाकायदा जांच-पड़ताल किये बिना सत्याग्रहियोंकी जान-मालपर हमला किया होता तो उसे बर्बरता माना जाता। पुरानी पद्धति के अनुसार बाकायदा मुकदमे चलाये जायें और सजा दी जाये तो इसमें किसीको आपत्ति नहीं हो सकती। कैद या ऐसी ही दूसरी सजाएँ तो सत्याग्रहियोंकी कसौटी हैं, जिनसे होकर उन्हें गुजरना है। जब सत्याग्रही डिगता नहीं, जिनके प्रतिनिधिके रूपमें वह काम कर रहा है उन्हें धोखा नहीं देता तथा नायकके पकड़े जानेपर घबराता नहीं तभी यह कहा जा सकता है कि वह अपने उद्देश्यमें सफल हुआ है। अब वह समय आ पहुंचा है जब प्रत्येकको स्वयं ही सैनिक और स्वयं ही नायक बनना होगा। जो विद्यार्थी सरकारी अथवा सरकार द्वारा नियन्त्रित स्कूलों और कालेजोंमें पढ़ते हैं, यदि वे इस पकड़-धकड़के बाद भी अपने स्कूल-कालेज नहीं छोड़ते तो इससे मुझे बहुत ही दुःख होगा। नमक बनाने में जो खतरा है, लोगोंको उसे समझकर ही नमक बनाना चाहिए या फिर समुद्र के किनारे दरारों और गड्डोंमें पड़े हुए कुदरती नमकको इकट्ठा करके अपने और अपने पशुओंके लिए उसका उपयोग करना चाहिए और जो लोग खरीदना चाहें। उनके हाथ यह नमक बेच देना चाहिए। नमक कानून भंग करते हुए इन लोगोंको यह समझ लेना चाहिए कि वे ऐसी जोखिम उठा रहे हैं जिसकी बिना पर कायदेके मुताबिक कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। या फिर यह भी सम्भव है कि नमक-विभागके तथाकथित अधिकारी किसी तरहकी कानूनी कार्रवाई किये बिना ही उन्हें परेशान करें। १३ अप्रैलको समाप्त होनेवाले पूरे राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान नमक-कानूनके विरुद्ध इस ढंग से यह लड़ाई चलती रहेगी। जो लोग इस पवित्र कार्यमें भाग नहीं लेते उन्हें विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी जबरदस्त लड़ाईमें स्वयंको झोंक देना चाहिए और खादीका व्यवहार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें यथासम्भव<noinclude></noinclude> aflknkt3wbu5gzlvb1t1pq7z5eim4wz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२७९ 250 197322 675439 673804 2026-08-30T18:37:18Z Manikantkmr 5554 675439 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२०७. कुछ शर्ते}}}} पूर्ण स्वराज्य पाना कठिन है और सहल भी कठिन है, यदि हम कुछ करना ही न चाहें। सहल है यदि सारी जनता अपने धर्मको समझ जाये। यही बात हम हर चीजके लिए नहीं कह सकते। उदाहरण के तौरपर वेदाभ्यास। यह काम सबके लिए सहल नहीं है। इसके लिए बरसोंका अभ्यास आवश्यक है। परन्तु स्वराज्यके लिए तो केवल हृदय परिवर्तन ही आवश्यक है। क्योंकि स्वराज्य हमारी जन्मसिद्ध सम्पत्ति है। तब प्रश्न यह उठता है कि स्वराज्यके लिए वह कौन-सी शर्त है जिसका पालन सब कोई कर सकते हैं? सुनिए : १. नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञा सब कोई कर सकते हैं। इसमें किसी प्रकारकी शिक्षाकी आवश्यकता नहीं है। आट गाँवके तमाम स्त्री-पुरुष तथा लड़के-लड़कियोंने मेरे देखते हुए इस कामको कर बताया। इन लोगोंने पहलेसे कोई तालीम नहीं पाई थी। २. सब कोई तकलीपर सूत कात सकते हैं। पर चरखा सबको नहीं मिल सकता, क्योंकि वह जरा खर्चीला है। तकली तो घर-घरमें बाँसकी भी बना ली जा सकती है। अथवा सर्वसाधारण उसे कुछ ही पैसोंमें खरीद सकते हैं। अगर करोड़ों लोग तकली चलाना तथा रुई धुनना सीख लें तो जितनी चाहिए उतनी खादी बन सकती है। इस काम के लिए भी किसी लम्बी-चौड़ी तालीमकी जरूरत नहीं पड़ती। सिवा इसके, तकली तो फुरसतके वक्त चलानेकी चीज है। अतएव यदि लोगोंके दिलमें यह बात बैठ जाये और उनका हृदय परिवर्तन हो जाये तो करोड़ों स्त्री-पुरुष, बालक-बूढ़े इस कामको आसानीसे कर सकते हैं और उनके इस कार्यसे देश के कमसे कम ६० करोड़ रुपये हर साल बच सकते हैं। हम सब विदेशी वस्त्रका त्याग करके सिर्फ खादी ही पहनें। क्योंकि यही हमारे पहनने की चीज है। अगर हमारे पास पैसे नहीं है तो हम थोड़े कपड़ोंसे अथवा सिर्फ एक लंगोटीसे भी अपना काम चला सकते हैं। चूँकि यह लड़ाई आत्मशुद्धिकी है, इसलिए यदि हम शराब, अफीम, तमाखू आदिके व्यसनी हैं तो हमें आज ही इन व्यसनोंको छोड़ देना चाहिए। ऐसे और भी कई काम हैं जिन्हें अगर चाहें तो हम सब कर सकते हैं। ऊपर मैंने इन कामोंके सिर्फ दो-एक उदाहरण ही दिये हैं। स्वराज्य प्राप्ति के लिए हिन्दू, मुसलमान और अन्य धर्मावलम्बियोंका एक-दूसरेको भाई-भाई मानना और एक समान समझना जरूरी है। अस्पृश्यताके पापको समझकर उसे दूर करना और दलित भाई-बहनोंसे प्रेम करना भी आवश्यक है। ये सब वस्तुतः स्वराज्यकी शर्तें नहीं हैं, पर तो भी स्वराज्यकी व्याख्याके अन्तर्गत अवश्य आती हैं। अब जब कि देश में अद्भुत जागृति आ रही है, इन पंक्तियोंके हरएक पाठकको चाहिए कि वह इस यज्ञमें यथाशक्ति बलिदान दे। '''हिन्दी नवजीवन,''' १०-४-१९३०<noinclude></noinclude> 8tezl19xv1mqo5xcoh0h5pe1f0v648z 675440 675439 2026-08-30T18:37:52Z Manikantkmr 5554 675440 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२०७. कुछ शर्ते'''}}}} पूर्ण स्वराज्य पाना कठिन है और सहल भी कठिन है, यदि हम कुछ करना ही न चाहें। सहल है यदि सारी जनता अपने धर्मको समझ जाये। यही बात हम हर चीजके लिए नहीं कह सकते। उदाहरण के तौरपर वेदाभ्यास। यह काम सबके लिए सहल नहीं है। इसके लिए बरसोंका अभ्यास आवश्यक है। परन्तु स्वराज्यके लिए तो केवल हृदय परिवर्तन ही आवश्यक है। क्योंकि स्वराज्य हमारी जन्मसिद्ध सम्पत्ति है। तब प्रश्न यह उठता है कि स्वराज्यके लिए वह कौन-सी शर्त है जिसका पालन सब कोई कर सकते हैं? सुनिए : १. नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञा सब कोई कर सकते हैं। इसमें किसी प्रकारकी शिक्षाकी आवश्यकता नहीं है। आट गाँवके तमाम स्त्री-पुरुष तथा लड़के-लड़कियोंने मेरे देखते हुए इस कामको कर बताया। इन लोगोंने पहलेसे कोई तालीम नहीं पाई थी। २. सब कोई तकलीपर सूत कात सकते हैं। पर चरखा सबको नहीं मिल सकता, क्योंकि वह जरा खर्चीला है। तकली तो घर-घरमें बाँसकी भी बना ली जा सकती है। अथवा सर्वसाधारण उसे कुछ ही पैसोंमें खरीद सकते हैं। अगर करोड़ों लोग तकली चलाना तथा रुई धुनना सीख लें तो जितनी चाहिए उतनी खादी बन सकती है। इस काम के लिए भी किसी लम्बी-चौड़ी तालीमकी जरूरत नहीं पड़ती। सिवा इसके, तकली तो फुरसतके वक्त चलानेकी चीज है। अतएव यदि लोगोंके दिलमें यह बात बैठ जाये और उनका हृदय परिवर्तन हो जाये तो करोड़ों स्त्री-पुरुष, बालक-बूढ़े इस कामको आसानीसे कर सकते हैं और उनके इस कार्यसे देश के कमसे कम ६० करोड़ रुपये हर साल बच सकते हैं। हम सब विदेशी वस्त्रका त्याग करके सिर्फ खादी ही पहनें। क्योंकि यही हमारे पहनने की चीज है। अगर हमारे पास पैसे नहीं है तो हम थोड़े कपड़ोंसे अथवा सिर्फ एक लंगोटीसे भी अपना काम चला सकते हैं। चूँकि यह लड़ाई आत्मशुद्धिकी है, इसलिए यदि हम शराब, अफीम, तमाखू आदिके व्यसनी हैं तो हमें आज ही इन व्यसनोंको छोड़ देना चाहिए। ऐसे और भी कई काम हैं जिन्हें अगर चाहें तो हम सब कर सकते हैं। ऊपर मैंने इन कामोंके सिर्फ दो-एक उदाहरण ही दिये हैं। स्वराज्य प्राप्ति के लिए हिन्दू, मुसलमान और अन्य धर्मावलम्बियोंका एक-दूसरेको भाई-भाई मानना और एक समान समझना जरूरी है। अस्पृश्यताके पापको समझकर उसे दूर करना और दलित भाई-बहनोंसे प्रेम करना भी आवश्यक है। ये सब वस्तुतः स्वराज्यकी शर्तें नहीं हैं, पर तो भी स्वराज्यकी व्याख्याके अन्तर्गत अवश्य आती हैं। अब जब कि देश में अद्भुत जागृति आ रही है, इन पंक्तियोंके हरएक पाठकको चाहिए कि वह इस यज्ञमें यथाशक्ति बलिदान दे। '''हिन्दी नवजीवन,''' १०-४-१९३०<noinclude></noinclude> 59iqwtejcxwpt7x75tl06uy15il0m83 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८१ 250 197324 675441 673862 2026-08-30T18:38:55Z Manikantkmr 5554 675441 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२१०. सन्देश : ब० प्र० का० कमेटीको'''}}}} {{Right|१० अप्रैल, १९३०}} आबिंदअली और मेहरअलीकी अभी हाल ही में हुई गिरफ्तारीपर मैं बम्बई कांग्रेस कमेटी और बम्बईकी जनताको बधाई देता हूँ । बम्बईके हर नागरिकका यह कर्तव्य है कि वे गिरफ्तार हुए व्यक्तियोंका स्थान ले लें। नेताओंकी गिरफ्तारीपर हमें घबराना नहीं चाहिए। राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान लोगोंमें जो उत्साह और जोश दिखाई दिया उससे पता चलता है कि नेताओंकी गिरफ्तारीसे समस्त भारतके लोगोंका उत्साह बढ़ गया है। मैं आशा करता हूँ कि बम्बई में हुई हालकी गिरफ्तारियोंसे बम्बईकी जनता में वही उत्साह दिखाई देगा। हमें नमक बनाना चाहिए और केवल उसी नमकका उपयोग करना चाहिए। हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करें और शराबकी बुराईको दूर करें। मैंने ये दोनों कार्य भारतकी स्त्रियोंको सौंप दिये हैं। यदि हम विदेशी कपड़ेके बहिष्कारमें सफल होना चाहते हैं और मिलोंपर, जो शुद्ध रूपसे देशी हैं, अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं तो इन कार्योंको केवल स्त्रियाँ ही कर सकती हैं। हमें खादीके प्रचार कार्य में लगे रहना चाहिए और यह तबतक सम्भव नहीं हो सकता जबतक हममें से हर कोई तकलीको न अपना ले। [गुजरातीसे] '''गुजराती''' १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''२११. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|१० अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, तुम्हारा पत्र मिला। यह जानकर खुशी हुई कि माताजी खतरेके बाहर हैं। यदि मद्यनिषेध अभियान कभी शुरू हुआ तो इसमें कुछ करना तुम्हारे लिए सम्भव हो सकता है। यदि हुआ तो यह स्वाभाविक रूपसे ही शुरू होगा। अधिक लिखने के लिए समय नहीं है। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९१) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२५ से भी।<noinclude></noinclude> nehu4ysmnr02r5zxrc2tnkv86m5nkxf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८९ 250 197332 675442 673968 2026-08-30T18:42:41Z Manikantkmr 5554 675442 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : अवरामाकी सार्वजनिक सभामें|२४५}}</noinclude>'''फिर मैंने पूछा कि तब फिर पुलिस अधिकारियोंको जो नमक छीननेका कर्तव्य सौंपा गया है, उसे वे कैसे पूरा करेंगे? इसपर गांधीजी ने कहा कि इसी तरहके कानूनके खिलाफ तो मेरी लड़ाई है।''' '''इसके बाद महात्माजी के इस कथनका प्रसंग छिड़ गया कि यदि पुलिस स्त्रियोंको हाथ लगायेगी तो सारे देशकी भावना भड़क उठेगी, बशर्ते कि जनता बिलकुल नपुंसक ही न हो। मैंने बताया कि इस कथनको स्त्रियोंके वैधानिक रीतिसे गिरफ्तार किये जाने के खिलाफ एक धमकी मानकर इसकी आलोचना की गई है। इसपर महात्माजी ने हँसते हुए कहा कि मैंने जान-बूझकर यह कहा था कि यदि वैसी कठिन परिस्थिति आ गई तो देशकी भावना भड़क उठेगी, लेकिन उसका परिणाम अनिवार्यतः हिंसात्मक कार्रवाई करना ही तो नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा :''' जब डॉ० एनी बेसेंट गिरफ्तार किये जानेपर श्री एस० सुब्रह्मण्य अय्यरने अपनी उपाधियोंका त्याग कर दिया था तब उनकी भावना ही तो भड़क उठी थी, लेकिन इसके कारण उन्होंने कोई हिंसा तो नहीं की। मेरा मतलब इसी अर्थ में भावनाके भड़कने से था। '''फिर एक समाचार एजेंसी द्वारा प्रचारित इस खबरका प्रसंग आ गया कि महात्माजी ने स्वयंसेवकोंके लिए जो आहार निर्धारित किया है, उसको लेकर वे उनके खिलाफ विद्रोह कर उठे हैं। उन्होंने इस बातपर हँसते हुए कहा :''' आहारमें क्या-क्या रखा जाये, यह तय करनेमें कुछ कठिनाई जरूर सामने आई थी, लेकिन जब एक बार मैने आहार तय कर दिया तो उसे सभीने चुपचाप स्वीकार कर लिया। [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू,''' ११-४-१९३० {{C|{{larger|'''२२४. भाषण : अबरामाकी सार्वजनिक सभामें १'''}}}} {{Right|१० अप्रैल, १९३०}} मुझे सूचना मिली थी कि कल रात मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा और इसीलिए मैंने रातको ११ बजेतक बैठकर कुछ चिट्टियाँ लिख डाली और लिखनेका कुछ और भी जरूरी काम पूरा कर लिया। रात बीत गई और वह सब नहीं हुआ जिसकी आशा की जा रही थी। मैंने समाचार-पत्रोंमें आज पढ़ा है कि नमककी कीमत लगभग आधी हो गई है। लेकिन मेरा कहना तो यह है कि नमक की कोई कीमत ही क्यों हो? <small>१. आभग ५,००० ग्रामीण लोगोंने इस सभा में भाग लिया था</small><noinclude></noinclude> l92hcisaku81y2ovvvv4ugge1lb0nfv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९६ 250 197339 675443 674004 2026-08-30T18:45:33Z Manikantkmr 5554 675443 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>स्टेशनसे १० मील दूर डांडी मुकाम है। मुझको पकड़ लें, और मैं यहांसे छावनी उठा लूं तो भी तुमको रहने में कोई मुसीबत नहीं होगी। {{Right|बापुके आशीर्वाद}} जी० एन० २३७९ की फोटो नकलसे। {{c|{{Right|'''२३४. पत्र : सीतलासहायको'''}}}} {{right|दांडी}} {{right|११ अप्रैल, १९३०}} भाई सीतलासहाय, तुम्हारे पत्रका उत्तर देरसे जा रहा है। कालाकांकरके भाईको नमक बनानेके लिए भेजे जायं भले वे जेल चले जायें। काम तो सब जगह बहुत अच्छा चल रहा है। अधिक लिखानेका समय नहीं है। {{Right|बापुके आशीर्वाद}} श्रीयुत सीतलासहाय द्वारा सत्याग्रह कमेटी रायबरेली (सं० प्रा०) जी० एन० ८६८४ की फोटो नकलसे। {{larger|{{c|२३५. वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके लिए}}}} {{right|जलालपुर}} {{right|११ अप्रैल, १९३०}} अखवारोंमें इस आशयका अनधिकृत समाचार छपा है कि मैं जहाँ चाहूँ, वहाँ जा सकूंगा। इस समाचारके आधारपर मुझे भारतके अनेक हिस्सोंसे कई निमन्त्रण मिले हैं, जिनसे मैं अटपटी स्थितिमें पड़ गया हूँ। मेरा कहीं भी जानेका इरादा नहीं है जहाँतक सम्भव है, मैं अपना पूरा ध्यान गुजरातपर ही केन्द्रित करना चाहता हूँ, और यदि मेरा स्वास्थ्य वैसा ठीक रहा तो अगले सप्ताह मैं गुजरातके उन हिस्सों में। जानेकी फुरसत निकाल लूंगा जहाँ जाना आवश्यक है। हो सकता है, मैं बम्बईतक जाऊँ, लेकिन उससे आगे नहीं जाऊँगा। [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू''', १२-४-१९१० <small>१. कालाकांकरके राजा साहबके भाई कुँवर सुरेशसिंहको जून १९३० में गिरफ्तार कर लिया गया था।<small><noinclude></noinclude> 0sianhs0h2tlsw6ms0xcly1xhsschbu 675444 675443 2026-08-30T18:46:07Z Manikantkmr 5554 675444 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>स्टेशनसे १० मील दूर डांडी मुकाम है। मुझको पकड़ लें, और मैं यहांसे छावनी उठा लूं तो भी तुमको रहने में कोई मुसीबत नहीं होगी। {{Right|बापुके आशीर्वाद}} जी० एन० २३७९ की फोटो नकलसे। {{c|{{Right|'''२३४. पत्र : सीतलासहायको'''}}}} {{right|दांडी}} {{right|११ अप्रैल, १९३०}} भाई सीतलासहाय, तुम्हारे पत्रका उत्तर देरसे जा रहा है। कालाकांकरके भाईको नमक बनानेके लिए भेजे जायं भले वे जेल चले जायें। काम तो सब जगह बहुत अच्छा चल रहा है। अधिक लिखानेका समय नहीं है। {{Right|बापुके आशीर्वाद}} श्रीयुत सीतलासहाय द्वारा सत्याग्रह कमेटी रायबरेली (सं० प्रा०) जी० एन० ८६८४ की फोटो नकलसे। {{larger|{{c|२३५. वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके लिए}}}} {{right|जलालपुर}} {{right|११ अप्रैल, १९३०}} अखवारोंमें इस आशयका अनधिकृत समाचार छपा है कि मैं जहाँ चाहूँ, वहाँ जा सकूंगा। इस समाचारके आधारपर मुझे भारतके अनेक हिस्सोंसे कई निमन्त्रण मिले हैं, जिनसे मैं अटपटी स्थितिमें पड़ गया हूँ। मेरा कहीं भी जानेका इरादा नहीं है जहाँतक सम्भव है, मैं अपना पूरा ध्यान गुजरातपर ही केन्द्रित करना चाहता हूँ, और यदि मेरा स्वास्थ्य वैसा ठीक रहा तो अगले सप्ताह मैं गुजरातके उन हिस्सों में। जानेकी फुरसत निकाल लूंगा जहाँ जाना आवश्यक है। हो सकता है, मैं बम्बईतक जाऊँ, लेकिन उससे आगे नहीं जाऊँगा। [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू''', १२-४-१९१० <small>१. कालाकांकरके राजा साहबके भाई कुँवर सुरेशसिंहको जून १९३० में गिरफ्तार कर लिया गया था।<small><noinclude></noinclude> cu26nkkro14zaktzuh0bx02o2cnh89a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०७ 250 197350 675501 674360 2026-08-31T01:50:50Z Kumari Arpana Sinha 2191 675501 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण:दांडीमें|२६३}}</noinclude>तरह काम लेते हैं, मानों उनका जन्म पुरुषोंकी सेवा करनेके लिए ही हुआ हो। जिस समय इस देशकी स्त्रियाँ समझ-बूझकर मद्यनिषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारका काम सफल कर दिखायेंगी उस समय दुनियाको अपने-आप यह बात साफ हो जायेगी कि कुमारी मेयोका उक्त कथन झूठ था। आजकल खादीकी कुछ कमी महसूस हो रही है। इसीलिए मैं लोगोसे यह कह रहा हूँ कि स्वयं कातो और खादी पहनो तकली पर सूत कातकर मैं तुम्हारे सामने रोज इस बातका उदाहरण भी पेश कर रहा हूँ। जिस तरह हम हरएक घरमें अपना अनाज स्वयं दलते हैं, पीसते हैं और गूंधते हैं उसी प्रकार हमें घर-घरमें अपनी कपासका जैसा बने वैसा कच्चा पक्का सूत कातना चाहिए और उसका कपड़ा बनाकर खादी पहननी चाहिए। जिस समय देशमें कताई सार्वत्रिक हो जायेगी उस समय यह निश्चित समझना कि विदेशी कपड़ोंका यह व्यापार बिलकुल बन्द हो जायेगा। हमारे देशको जितना कपड़ा चाहिए उतना कपड़ा मिलें कभी नहीं दे सकतीं। इसके सिवा भारतकी अधिकांश मिलें पूंजीकी दृष्टिसे पूरे या अधूरे तौर पर विदेशी ही हैं। इसलिए ऐसी बहुत ही थोड़ी मिलें हैं जिनका कपड़ा जरूरत पड़नेपर हम उपयोग में ला सकते हैं। इन रचनात्मक कार्योंको करनेके लिए अनेक प्रतिष्ठित परिवारोंकी स्त्रियाँ बाहर निकल पड़ी हैं। दीवान श्री मनुभाईकी पुत्री श्रीमती हंसा मेहता और अन्य बहनोंने मिलकर अभी कुछ दिन हुए बम्बई में मद्यनिषेधका काम चलाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है। यदि गुजरातकी स्त्रियाँ लगातार इस प्रकार काम करती रहीं और पुरुष इस कार्य में उनकी सहायता करते रहे तो यह कार्य सारे देशमें फैल जायेगा। ये तीनों चीजें बहुत आसान है। यदि हम इन्हें सफलतापूर्वक कर डालें तो हम देखेंगे कि हमने कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये बचा लिये हैं-- ६ करोड़ नमक-करसे, २५ करोड़ शराबसे और ६० करोड़ विदेशी कपड़ेके व्यापारसे ऐसा करके हम ज्यादा शुद्ध बनेंगे, हमारी शक्ति बढ़ेगी और तब स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमें तनिक भी देर नहीं लगेगी। अन्तमें यह याद रखना है कि इन सात दिनोंमें हमने जो कुछ कमाया है, उसे हम खो न दें। अभी-अभी खबर मिली है कि कलकत्ते में कुछ नवयुवक सभाओं में जब्त की गयी पुस्तकोंके अंश पढ़कर सुनाते थे पुलिसने उनकी सभाओंको भंग करके उन्हें बहाँसे पुलिसके इन अत्याचारोंको देखकर कलकत्तेके मेयर श्री सेनगुप्तने भी उन जब्त की हुई पुस्तकोंके अंश पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया गया। बिखर जानेको मजबूर किया है। अभयाश्रमकें अत्यन्त योग्य खादी कार्यकर्त्ता डा० सुरेशचन्द्र बनर्जीको, जो किसी समय सरकारसे छह सौ रुपया मासिक वेतन पाते थे, नमक-कानून तोड़नेके अपराध में ढाई वर्षके सपरिश्रम कारावासकी सजा दी गयी है। ऐसे अत्याचारोंके बावजूद जिस प्रकार हम गुजरातमें न तो डरे हैं और न झुके हैं उसी प्रकार वहाँ भी कोई नहीं डरा है। इतना ही नहीं, उलटे उनकी शक्ति<noinclude></noinclude> jzxe46r73p4fsuedz40enatld0ruuw4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०९ 250 197352 675502 674363 2026-08-31T01:52:07Z Kumari Arpana Sinha 2191 675502 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र:लक्ष्मीदास श्रीकान्तको|२६५}}</noinclude>घरमें बैठे रहेंगे तो काम चलेगा किन्तु यदि मैदान में उतर पड़े तो फिर आप सचाईका ही व्यवहार करें। [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', २० ४-१९३० {{C|{{larger|'''२४७. पत्र : गुलाम रसूल कुरैशीको'''}}}} {{Right|१३ अप्रैल, १९३०}} चि० कुरैशी, तुम्हारा पत्र मिला। जितनी हमसे बन सके उतनी मेहनत करना हमारा काम है। फल देना ईश्वर के हाथमें है। सारे नियमोंका पालन करना चाहिए। मुसलमान भाइयोंसे मिलना चाहिए। तकली रोज चलानी चाहिए और दूसरोंको तकली चलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। {{Right|बापूकी दुआ}} [पुनश्च :] आज स्त्रियोंकी जो सभा हुई वह अच्छी थी। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४२९५ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : हमीद कुरैशी; जी० एन० ६६५० से भी। {{C|{{larger|'''२४८. पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|१३ अप्रैल, १९३०}} भाईश्री लक्ष्मीदास, तुम्हारा पत्र आज ही मिला। मैं इसे अभी-अभी अर्थात् रविवारको रातके साढ़े नौ बजे ही पढ़ सका इसलिए सन्देश भेजनेका समय भी नहीं रहा। तुम्हारे कार्य में तुम्हारी सफलताकी कामना तो मैं सदैव ही करता हूँ। मुझे समाचार देते रहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ४२०४ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> lhatx3nsu54dwr6sk3i3twcs9fnxpsb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१२ 250 197355 675445 674375 2026-08-30T19:01:10Z Manikantkmr 5554 675445 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मिलनेवाले समाचार भी अत्यन्त उत्साहवर्द्धक है। 'यंग इंडिया' तो आप पढ़ते ही होंगे। आपका स्वास्थ्य कैसा है? {{Right|आपका,}} {{Right|मो० क० गांधी}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८५) से। सौजन्य : इलाहाबाद नगरपालिका संग्रहालय {{C|{{larger|'''२५३. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}} चि० महादेव, तुम्हारा पत्र मिला। मैंने बुधवारको वेजलपुरमें तुम सबसे मिलनेकी व्यवस्था की है। मैं जहाँ भी होऊँगा वहाँसे वेजलपुर आऊँगा। मैं वहां सवेरे ही पहुँचनेकी तजवीज करूँगा। हमारा सदर मुकाम अब बहुत करके कराडी रहेगा। यदि स्वामीका आग्रह बना रहा तो गुरुवारकी साँझको बम्बईके लिए रवाना हो जाऊँगा और रविवारको सवेरे वापस लौट आऊँगा। फिलहाल तो बम्बई जानेकी इच्छा नहीं होती। तुम्हारा अहमदाबादका वर्णन गुजराती (एस० एन० ११४८१ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''२५४. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}} {{Right|१४ अप्रैल, १९३०}} चि० कुसुम मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मैंने जो लिखा है उसमें क्या तुझे कोई विचार सूझ पड़ता है? तू उसमें प्रमुख भाग लेनेकी हिम्मत रखती है क्या? तेरे पत्र मिले हैं। <small> १. गांधीजी २६ अप्रैल, १९३० को वेजलपुर पहुंचे थे। इसके अलावा गांधीजीने पत्र मदादेव देसाईको १४-४-१९३० में उन्हें सवेरे एक पत्र लिखनेका उल्लेख किया है। सम्भवतः उनका इशारा इसी की ओर है।</small> <small>२. पत्रका शेष भाग उपलब्ध नहीं है।</small><noinclude></noinclude> 2u93aas3myryn1pboraurynplb0tkt2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१९ 250 197362 675503 674389 2026-08-31T01:55:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 675503 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अस्पृश्यता|२७५}}</noinclude>कथनपर निरर्थक ही आपत्ति करेंगे, लेकिन मैं उनसे यही कहूँगा कि मेरा यह कथन रात-दिनके अनुभवपर आधारित है। मैं यह नहीं कहता कि हर बार सरकार इरादतन् ऐसा पक्षपात किया करती है। परन्तु 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' और 'फूट डालो और राज्य करो', ये तो सरकारी हलकोंके लिए सामान्य बातें हो गई हैं। अपने इस निश्चित विश्वासके बावजूद यदि मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूँ और स्वराज्य-साधनाकी गतिको अटकाऊँ तो मैं अल्पसंख्यकों और अछूतोंके साथ अन्याय करूँगा। मैं मानता हूँ कि जिस क्षण हमें, हममें से हरएकके अन्दर जो शक्ति छिपी हुई है, उसका ज्ञान हो जायेगा उसी क्षण हम स्वतन्त्र हो जायेंगे और हम सच्ची एकताकी ज्योतिका अनुभव करेंगे और 'अछूत' भी अनुभव करेंगे कि उनमें एक नई शक्ति आ गई है। हम याद रखें कि सत्याग्रहियोंके जत्थोंमें मुसलमान भी हैं, दूसरे धर्मवाले भी हैं और अछूत भी हैं- - चाहे बहुत थोड़ी तादादमें ही क्यों न हों। हकीकत तो यह है कि आज उन्हीं लोगोंके हाथों स्वराज्य-मन्दिरकी नींव डाली जा रही है, जो कौमी एकता, अधिकार और अवसरकी समानता तथा अस्पृश्यता निवारणको अपने धर्मका अंग मानते हैं। अंग्रेजोंके आनेसे हिन्दुओंमें विचार जागृति हुई और अस्पृश्योंको अपने अधिकारोंका भान हुआ, इस मोहक विचारमें पड़कर अछूत भाई राष्ट्रीय लक्ष्यकी प्राप्तिकी ओरसे विमुख न हो जायें। इस बातमें जो तथ्य है वह है, लेकिन अंग्रेज लोग ऐसा परोपकारी वृत्तिसे प्रेरित होकर हिन्दुस्तानमें नहीं आये थे। उनकी सभ्यता, बल्कि कहिए तमाम पश्चिमी देशोंकी सभ्यता, उस प्रकारके किसी भेद-भावको मान्यता नहीं देती जिस प्रकारका भेद-भाव अवदशाको प्राप्त हिन्दू धर्ममें चल रहा है। यदि अंग्रेज हमें गुलाम न बनाते, तब भी हम इस अच्छाईसे लाभ उठा सकते थे। अंग्रेजोंकी यह आलोचना मैं उनके मनुष्य रूपकी नहीं बल्कि शासक जातिके रूपकी कर रहा हूँ। मनुष्यके नाते तो वे उतने ही अच्छे हैं जितने अच्छे हम हैं। कुछ बातोंमें वे हमसे अच्छे हैं, तो कुछमें बुरे भी हो सकते हैं। लेकिन शासकोंके नाते वे सर्वथा अवांछनीय हैं। शासकोंके रूपमें वे न हमारी कोई भलाई कर सकते हैं और न उन्होंने की ही है। उन्होंने हमारी बुराइयोंको उकसाया है, उन्हें और भी गम्भीर बनाया है और चूंकि हममें हीन भावना आ गई है, इसलिए उनके सम्पर्कसे हमारा नैतिक ह्रास होता है। मैंने देखा है कि हम उनके सामने कुछ और व्यवहार करते हैं और पीठ पीछे कुछ और। यह पुंसत्वहीनता है और मनुष्यको पुंसत्वहीन बनानेकी प्रक्रिया है। यह चीज सर्वथा अस्वाभाविक है। गोखलेने कहा था कि " हममें से बड़ेसे-बड़े को भी उनके सामने झुकना पड़ता है।" पर जब सचमुच अंग्रेजोंकी आंखें खुलेंगी तब उन्हें पता चलेगा कि उनका शासन जितना पतनकारी हमारे लिए साबित हुआ है, उससे कुछ कम पतनकारी उनके लिए भी सिद्ध नहीं हुआ है। अब दो शब्द 'अस्पृश्यों' से कहूंगा। मैंने उन्हें सलाह दी है और वही सलाह फिर दोहराता हूँ कि सत्याग्रही तरीकेसे भी सनातनी मन्दिरोंमें प्रवेश करनेका उनका प्रयत्न सर्वथा अनावश्यक है। 'अस्पृश्यों' के लिए मन्दिरोंके द्वार खुलवाना 'सवर्ण'<noinclude></noinclude> itthmdf9xrby02l6059pmbxmd7018go पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२५ 250 197368 675446 674532 2026-08-30T19:04:11Z Manikantkmr 5554 675446 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६६. अध्यक्षका सम्मान'''}}}} कांग्रेस अध्यक्षको बड़े सस्ते में जयमाला मिल गई। मुझे अभी-अभी पण्डित मोतीलालजी का तार मिला है कि पण्डित जवाहरलालको छः महीने की सादी कैद हुई है। लेकिन राष्ट्रके प्रथम सेवकको एक दिनके लिए भी कैद करना सारे राष्ट्रका अपमान करना है। अध्यक्षको कैद करके सरकारने हमें चुनौती दी है कि जो करना हो करो। हम जो कर सकते हैं वह यही कि आगे बढ़कर अपने सिर और अधिक कष्ट लें। इसका एकमात्र उपाय वर्तमान आन्दोलनको तीव्र और संगठित बनाना है। मैं जानता हूँ कि देशके नौजवान बहुत बड़ा काम कर रहे हैं; तो भी मुझे कबूल करना चाहिए कि इस युद्धके प्रति देशके विद्यार्थियोंने जितना उत्साह दिखाया है, उससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ है। उनमें अभी आत्म-विश्वास पैदा नहीं हुआ है। वे यह नहीं मानते कि स्वराज्य जल्दी ही आ रहा है। वे यह भी महसूस नहीं करते कि सरल श्रद्धा और तदनुसार आचरण द्वारा स्वराज्यके आगमन की घड़ीको जल्दी निकट खींच लाना उन्हींका काम है। लेकिन श्रद्धा देनेकी चीज उसका उद्गम स्थान भी हृदय ही है। देश बड़ी उत्सुकता के साथ देखेगा कि जो हजारों विद्यार्थी आज उपाधियों और प्रमाण-पत्रोंके पीछे पड़े हुए हैं, उनपर पण्डित जवाहरलालके इस कारावासका क्या प्रभाव पड़ता है? [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९१० नहीं। वह हृदयकी वस्तु है, और {{C|{{larger|'''२६७. स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र'''}}}} रविवार तारीख १३ अप्रैल के दिन दांडीमें स्त्रियोंकी एक परिषद् हुई थी और उसके बाद दूसरी परिषद् १६ अप्रैलको वेजलपुरमें हुई। पहली परिषद् में मैंने लगभग सौ बहनोंके आनेकी आशा की थी; लेकिन हजार आई; दूसरीमें सिर्फ अहमदाबाद और बम्बईसे आनेवाली कुछ बहनों ही से मिलना था लेकिन सूरत जिलेकी बहनोंको इस बात का पता था, इसलिए वेजलपुरमें बहनोंकी संख्या दांडीकी अपेक्षा भी अधिक रही। यों यह दूसरी परिषद् हुई। दांडीमें नीचे लिखे प्रस्ताव पास हुए: <small>१. १३ अप्रैल के दिन दांडीमें गांधीजी का भाषण सुननेके बाद गुजरातकी स्त्री-परिषद् यह प्रस्ताव पास करती है कि वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ शराब और ताड़ीकी दुकानोंपर धरना देंगी, अर्थात् दुकानदारोंसे अपने इस धन्धेको छोड़ देनेकी प्रार्थना करेंगी तथा शराब और ताड़ी पीनेवालों से भी इस राक्षसी व्यसनको छोड़नेकी प्रार्थना करेंगी तथा इसी तरह विदेशी कपड़ोंके दुकानदारोंसे विदेशी</small><noinclude></noinclude> qej4w641et6tsps2403gxz4i1i0y875 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२६ 250 197369 675447 674533 2026-08-30T19:05:24Z Manikantkmr 5554 675447 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वस्त्रका व्यापार बन्द करने और विदेशी कपड़ोंके खरीदारोंसे विदेशी कपड़ा न खरीदनेकी प्रार्थना करेंगी और इन कामोंके लिए दुकानोंपर धरना देंगी। २. इस परिषद्का विश्वास है कि विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार खादीके द्वारा ही किया जा सकता है; अतएव यहाँ उपस्थित स्त्रियां भविष्य में खादीका ही उपयोग करेंगी और यथासम्भव स्वयं प्रतिदिन सूत कातेंगी, रुई पीजेंगी और कताईकी सभी क्रियाएँ सीख लेंगी। और ये सब काम अपने हाथों ही करेंगी। साथ ही अपने पड़ोसी भाई-बहनोंमें सूत कताईकी तमाम क्रियाओंको सीख लेने तथा तदनुसार काम करनेका प्रचार भी करेंगी। ३. इस आन्दोलनके लिए यह परिषद् नीचे लिखी बहनोंकी एक कार्य-कारिणी समिति नियुक्त करती है; और उसे इस आन्दोलनसे सम्बन्धित नियम-उपनियम आदि बनाने तथा उनमें संशोधन परिवर्द्धन करनेका अधिकार प्रदान करती है। समितिको अपनी संख्या बढ़ानेका भी अधिकार होगा : १. श्रीमती तैयबजी (सभापति) २. श्रीमती मीठूबहन पेटिट (मन्त्री) सदस्याएँ ३. श्रीमती मणिवहन पटेल ४. श्रीमती रोहिणी देसाई ५. श्रीमती चन्द्रबहन परिषद् आशा करती है कि गुजरातकी बहनें इस आन्दोलनका स्वागत करेंगी और इसमें हाथ बँटायेंगी। परिषद् आशा करती है कि इस परिषद्के द्वारा जो आन्दोलन आरम्भ किया जा रहा है उसे सारे गुजरात और अन्य प्रान्तों की महिलायें आगे बढ़ायेंगी१। वेजलपुर में भी यही प्रस्ताव पास हुए; किन्तु वहाँ पहले प्रस्तावको दो भागों में बाँट दिया गया था। मद्यपान निषेध और खादी द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको दो जुदा काम माना गया जिससे यदि कोई बहन उनमें से एकको ही स्वीकार करती हो तो वह उसीके लिए अपना मत दे सके। समितिने दूसरी परिषद्को सदस्य संख्यामें तीन बहनोंके नाम और जोड़े : श्रीमती शारदावहन सुमन्त मेहता श्रीमती सविताबहन त्रिवेदी श्रीमती सूरजबहन मणिलाल यों मतदानको बहुत महत्त्व देना जरूरी नहीं है। उसका महत्त्व इतना ही है कि सभामें किसी भी प्रस्तावका विरोध नहीं हुआ। इससे सूचित होता है कि उपस्थित स्त्रियाँ इस प्रस्तावके अनुसार काम करने को तैयार भले न हों, तथापि उन्हें प्रस्तावकी <small>१.यह अनुच्छेद '''यंग इंडिया''' से लिया गया है।</small><noinclude></noinclude> ga1e80rmgitbk0osd3o7yuqwpvr8wxl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२७ 250 197370 675448 674641 2026-08-30T19:06:37Z Manikantkmr 5554 675448 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र|२८३}}</noinclude>मूल बात पसन्द थी। इन दोनों परिषदों में देहाती बहनोंकी संख्या ज्यादा थी। इस बारकी लड़ाई खासकर गांवोंकी ही है। गांवोंकी जागृति आश्चर्यजनक है और यह शुभ चिह्न है। नमक, विदेशी वस्त्र बहिष्कार और मद्यपान निषेध, ये तीनों चीजें गाँववालों के लिए विशेष रूपसे हितकर है, तिस पर स्त्रियोंका तो इनमें विशेष लाभ निहित है। इन प्रस्तावोंपर यदि थोड़ी-सी बहनें भी प्राण निछावर करनेको तैयार होंगी तो वे सामने आयेंगी। यदि ऐसा न हुआ तो परिषद्का काम अधूरा माना जायेगा। परिषद् में आई हुई बहनोंकी संख्या इस बातकी सूचक है कि कोई काम लेनेवाला हो तो वे काम करनेको तैयार हैं। प्रत्येक संस्थाका प्राण उसकी कार्यकारिणी समिति होती है। अतएव जिन बहनोंने समितिको अपने नाम दिये हैं, उनकी लगन, तपश्चर्या और कार्यकुशलतापर ही कार्यकी सफलता निर्भर है। मीठूबहन पेटिटने तो बड़ी तेजीसे अपना कार्य आरम्भ कर दिया है। उनके कथनानुसार शराब पीनेवाले उत्साहपूर्वक ताड़ीके मटके फोड़ डालते हैं। सूरतके हजारों शराबी अपनी-अपनी जाति में शराब न पीनेका प्रस्ताव पास करने लगे हैं। यदि स्त्रियोंमें आत्मविश्वास आ जाये, उनकी श्रद्धा दृढ़ हो जाये तो स्त्रियाँ खुद ही जान जायेंगी कि उनके मनमें जो भय था वैसा भय रखनेका कोई कारण ही नहीं है। मनुष्य मात्रमें राम और रावण रहते हैं। यदि स्त्रियां अपने हृदयमें निवास करनेवाले रामकी सहायतासे काम करें तो मनुष्यों में रहनेवाला रावण सिर नहीं उठा सकता। स्त्रियोंकी अपेक्षा पुरुषोंमें राम देरसे जागता है। जिसे राम राखे उसे कौन चाखे? और जिससे राम रूठे उसे कौन राखे? शराबखोरीको बन्द करने के काममें शुरुआत में जो डर लगता है, उसके मिट जानेपर वह आसान हो जाता है। क्योंकि इस काम में केवल धरना देना पड़ता है। पीनेवाले दुष्ट नहीं, भोले होते हैं। पीनेवाले इस बात को समझते ही कि मद्यपान उनके हितमें नहीं है, शराब छोड़ देंगे। इसमें शराबके ठेकेदारोंका स्वार्थ तो है, पर ये जानते हैं कि उनका व्यापार कोई अच्छा व्यापार नहीं है। स्वराज्य आन्दोलन में इस प्रवृत्तिके शामिल होनेको मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। इन पृष्ठोंमें इसके पक्ष में जो दलीलें दी गई हैं, मुझे उनको दोहराने की कोई जरूरत नहीं है। मीठूबहनने पहले ही काम शुरू कर दिया है। वे किसी कार्यको करने में तनिक-सा भी समय नष्ट करनेवाली महिला नहीं हैं। सवाल यह है कि बीस अथवा पच्चीस महिलाओंका एक जत्था शराबकी हर दुकानपर जाये और शराब तथा ताड़ी पीने के लिए आनेवाले हर व्यक्तिसे निजी सम्पर्क स्थापित करके उसकी आदत छुड़ानेका प्रयत्न करे। ये महिलाएँ दुकानदारोंसे भी इस अनैतिक व्यापारको छोड़ देने और बेहतर साधनों द्वारा आजीविका अर्जित करनेकी अपील करेंगी।१ प्रशिक्षित महिला स्वयंसेविकाओंकी पर्याप्त संख्या हो जानेपर विदेशी वस्त्रकी दुकानोंपर भी वैसा ही किया जायेगा जैसा शराबकी दुकानोंके साथ किया जानेवाला <small>१. पद और अगले दो अनुच्छेद १७-४-१९३० के यंग इंडियासे लिये गये है।</small><noinclude></noinclude> r5y2ivscda3yf92fi25e7vhn8zh5dak पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२८ 250 197371 675449 674643 2026-08-30T19:07:37Z Manikantkmr 5554 675449 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>है। हालांकि एक ही समिति दोनों तरहके बहिष्कारोंका संचालन करेगी लेकिन इसके लिए दो शाखाओंका होना जरूरी है। कोई भी महिला इन दोनों कार्यों में से एक कार्यमें शामिल होनेके लिए स्वतन्त्र है, और प्रत्येक कार्यकर्त्रीका कांग्रेसकी सदस्या होना भी जरूरी नहीं होगा। सिर्फ एक बात अच्छी तरहसे समझ ली जानी चाहिए कि यह कार्य कांग्रेस कार्यक्रमका एक हिस्सा है और बड़े-बड़े नैतिक और आर्थिक परिणामोंके साथ इसके भारी राजनीतिक परिणाम भी सामने आयेंगे। जो महिलाएँ विदेशी वस्त्र- बहिष्कार-सम्बन्धी शाखामें काम करेंगी, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि खादी कार्यक्रमके रचनात्मक कार्यक्रमके बिना केवल बहिष्कार तो शरारत भरा एक काम होकर रह जायेगा। खादीके उत्पादनके बिना बहिष्कार की सफलता स्वाधीनताके राष्ट्रीय आन्दोलनका नाश ही कर डालेगी। क्योंकि लाखों लोग सहज विश्वाससे प्रेरित होकर इसे अंगीकार करेंगे; लेकिन जब वे देखेंगे कि पहनने के लिए खादी नहीं मिलती अथवा जो खादी मिलती है वह बहुत महँगी है, तो वे खीझ उठेंगे। इसलिए व्यवस्था यह होनी चाहिए कि आप विदेशी कपड़ेका त्याग करके अपने हाथसे खादी बनायें और उसे पहनें। पहले ही खादीकी बहुत कमी है। विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार एक मुश्किल काम है। उसके दो पहलू हैं: एक बहिष्कार और दूसरा खादीका उत्पादन। बहिष्कारके काम में बहुत उद्यमकी आवश्यकता नहीं है। इसके लिए थोड़ी-सी सेविकाएँ काफी हो सकती हैं। किन्तु खादीके उत्पादनके लिए तो हजारों ही नहीं, लाखों लोगोंको नियमित रूपसे उद्यम करना होगा। इस तरह इस काम से संगठन, योजना आदिकी शक्ति पैदा हो सकती है। लेकिन यह काम धैर्यपूर्वक करनेका है। इसके लिए बुद्धि और श्रद्धा अर्थात् हृदयकी जरूरत है। इसके कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपसे हमें करोड़ों बहनोंके सम्पर्क में आना होगा। इस कार्यके लिए गाँवों और शहरोंके बीच शुद्ध समन्वय स्थापित करनेकी आवश्यकता है और इस साधनके द्वारा हिन्दुस्तान के लिए आवश्यक खादीका थोड़े ही समयमें उत्पादन हो सकता है। खादी उत्पादन के सब साधन हमारे पास मौजूद हैं। और इसके उत्पादनके लिए आवश्यक कला-कुशलता भी हममें है। सिर्फ कार्यकर्त्ता नहीं हैं। कार्यकर्ता तैयार करनेका काम बहनोंका है। यह तभी हो सकता है जब बहनें स्वयं ओटने, घुनने, कातने आदिको क्रियाओंको सीखकर स्त्री-पुरुषोंमें इन कलाओंका प्रचार करें। खादीका काम करनेवाले बहुतसे कार्यकर्त्ता नमक कानून आन्दोलन उनमें लगे हुए हैं। अतः अस्थायी रूपसे खादीका उत्पादन रुक गया है। हमारे देशके लोगों में यह गलत धारणा घर कर गई है कि तन ढकनेके लिए हमें बाहरसे कपड़ा मंगवाना ही पड़ेगा। जिस क्षण हम अपनी इस मिथ्या धारणासे छुटकारा पा लेंगे उसी क्षण हमारे यहाँ कपड़ेकी कोई कमी नहीं रह जायेगी। यह ठीक वैसी ही बात होगी जैसे किसी व्यक्तिका यह कहना कि मँचेस्टर अथवा दिल्लीके बने बिस्कुटोंके बिना हम भूखों मर जायेंगे। जैसे हम अपना भोजन खुद बनाते और खाते हैं वैसे ही यदि हम चाहें तो अपना कपड़ा खुद तैयार करके पहन सकते हैं। <small>१. अन्तिम दो वाक्य अगले दो अनुच्छेद १७-४-१९३० के '''यंग इंडिया'''से लिये गये हैं।</small><noinclude></noinclude> bofjr2w3mjkodsmn1u0aok9z3tcv7bs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३३ 250 197376 675504 674652 2026-08-31T02:01:46Z Kumari Arpana Sinha 2191 675504 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: वेजलपुरमें स्वयंसेवकोंके समक्ष|२८९}}</noinclude>विस्फोट हुआ, फिर भी आन्दोलनका अहिसात्मक रूप मुख्यतः कायम रहा। भारतके भाग्यका निर्णय नगरोंमें क्या होता है, उससे नहीं, बल्कि गाँवोंमें क्या होता है, उससे होगा। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-४-१९३० {{C|{{larger|'''२७२. भाषण : वेजलपुरमें स्वयंसेवकोंके समक्ष'''}}}} {{Right|१७ अप्रैल, १९३०}} '''गांधीजी ने अपना भाषण प्रारम्भ करते हुए कहा कि आज हम यहाँ अपना आगामी कार्यक्रम तय करनेके लिए इकट्ठे हुए हैं। मैं जो कुछ सोचता था सरकार तो उससे बिलकुल उल्टा कर रही है। उसने सत्याग्रहियोंकी आशाओंपर पानी फेर दिया है। मैं सोचता था कि मुझे गिरफ्तार किया जायेगा, लेकिन मैं अब भी आजाद। हूँ। मगर सरकारने स्थितिका अन्दाजा लगाने में भूल की है। सत्याग्रहीके शब्द-कोशम 'पराजय' शब्द कहीं है ही नहीं। जो मर-मिटने और जो कुछ आ पड़े उसे सहनेके लिए तैयार हैं, उनके लिए पराजय कहीं है ही नहीं। इस कष्ट-सहन से हममें एक प्रयल शक्ति उत्पन्न होगी और उसके बलपर हम सरकारके सारे कानून तोड़ सकेंगे।''' '''हमने नमक कानून तो सफलतापूर्वक भंग किया है। अब आगे हम क्या करें? कलकता और कराचीमें दंगे होने की खबर मिली है। मैंने अखबारोंमें जो कुछ देखा है, उससे लगता है कि जनता से कहीं कोई गलती हो रही है और यह बहुत दुःखकी बात है। यद्यपि मैं यह आशा करता हूँ कि लोग अहिंसापर आरुढ़ रहेंगे, लेकिन मैं यह मानकर नहीं चल रहा हूँ कि ऐसी घटनाएँ कभी घटेंगी ही नहीं।''' मैं इस लड़ाईको बन्द करके लोगोंको शान्ति और अहिंसाकी शिक्षा नहीं दे सकता। कोई एक आदमी करोड़ों लोगोंपर नियन्त्रण कैसे रख सकता है? हमें अपने कर्त्तव्यका पालन करना चाहिए। फिर लोग अपने-आप समझ जायेंगे। मुझे उम्मीद है कि गुजरातने अहिंसाका पाठ अच्छी तरह समझ लिया है। आज अहिंसा ही हमारा धर्म है। हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करने तक कष्ट सहन करते रहना है। '''गांधीजी ने आगे कहा कि मैं चाहता हूँ, जबतक स्वराज्य प्राप्त न हो जाये तबतक सभीको राष्ट्रीय स्वयंसेवकोंके रूपमें काम करनेके लिए तैयार रहना चाहिए। फिर उन्होंने सभीसे कहा कि जो लोग अपनी सेवाएँ देते रहना चाहते हैं, ये निर्भीक होकर हाथ उठायें। इसपर ४८ के अतिरिक्त सभी स्वयंसेवकोंने हाथ उठा दिये।''' '''गांधीजी ने हाथ न उठानेवाले ४८ स्वयंसेवकोंको उनके साहसके लिए बधाई देते हुए उन्हें भरोसा दिलाया कि उन सबको उनके गाँवोंमें ही योग्य कार्य दिये जायेंगे।''' ४३-१९<noinclude></noinclude> m747kdj1xmte23z6pa84fiqugi8tdju पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३६ 250 197379 675450 674684 2026-08-30T19:10:49Z Manikantkmr 5554 675450 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>की निर्णय बुद्धिमें मेरा विश्वास नहीं रह गया है। नेहरू रिपोर्टका बचाव तो मैं अब भी करूँगा। मगर यह स्वीकार करता हूँ कि अगर उससे मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यकोंको सन्तोष नहीं मिलता तो वह बेकार ही है। यही कारण है कि मैंने कलकत्ता मोतीलालजीकी अनुपस्थितिमें, किन्तु उनकी सहमति और स्वीकृतिसे, रिपोर्टको बचानेवाला वह प्रस्ताव पेश किया था। आपके लिए इतना काफी होना चाहिए कि नेहरू रिपोर्ट और उसके साथ ही उसकी साम्प्रदायिक योजना खत्म हो गयी है। स्वतन्त्र भारतमें उस योजनाका रूप क्या होगा, इसका निर्णय तो अवसर आनेपर मुसलमान, सिख, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय और हिन्दू लोग ही करेंगे। अगर नेहरू रिपोर्टको स्वीकार करके मैंने गलती की तो उस गलतीमें डॉ० अन्सारी भी शरीक थे। मेरे लिए इतना काफी था। आपका यह आरोप सही है कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेके लिए मैंने आपसे परामर्श नहीं किया। लेकिन यह जानते हुए कि हममें कोई विचार-साम्य नहीं है, मैं वैसा विचार कर भी कैसे सकता था? क्या आप यह नहीं देख सकते कि आपसे सलाह लिये बिना काम करते हुए भी मेरे लिए यह सम्भव है कि आपका साथ न छोड़ें? मेरा मन साफ है। मैंने न आपका साथ छोड़ा है, न मुसलमानोंका। नमक- अधिनियम तथा अन्य अन्यायोंके खिलाफ लड़ने और स्वतन्त्रताके लिए संघर्ष करने में साथ छोड़नेका सवाल कहाँ उठता है? और अन्तमें कहूँगा कि मेरा कोई आश्वासन जिसे सिद्ध नहीं कर सकता उसे समय सिद्ध कर दिखायेगा। आप चाहें तो हमारे बीच हुआ पूरा पत्र-व्यवहार खुशी-खुशी छाप सकते हैं। आशा करता हूँ, मुहम्मद अलीकी आँखोंके बारेमें आपकी आशंकाएँ निर्मूल साबित होंगी। उनकी आंखोंकी आवश्यकता है चाहे वह मुझसे लड़नेके लिए ही क्यों न हो। ईश्वर उनका और आपका कल्याण करे। {{Right|सदा आपका ही,}} अंग्रेजी (एस० एन० १६८१०) की फोटो नकलसे। <small>१. मोतीलाल नेहरूकी अध्यक्षता में एक समिति द्वारा तैयार किये गये भारतके संविधानका मसविदा देखिए खण्ड ३८ ।</small><noinclude></noinclude> cyvyfcqwrmqajhb1ywzzrl2z42qz324 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४१ 250 197384 675451 674705 2026-08-30T19:12:09Z Manikantkmr 5554 675451 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण पटेलोंकी सभा, वेजलपुरमें|२९७}}</noinclude>किन्तु आपका पूरा दिन तो इस काम में नहीं लगेगा। इसलिए आपका दूसरा काम है विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना। यदि आप सचमुच विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हों तो आपको अपने घरमें बैठकर तकली घुमानी चाहिए, जिसके बनाने में एक पाई भी खर्च नहीं होती। यदि आप जैसे पटेल यह काम करने लगे तो गाँव के सभी लोग आपका अनुकरण करने लगेंगे। कहावत है कि संख्यामें बल है। और गांवमें सभीको खादी पहनाकर आप गाँवसे बाहर खिंचे चले जा रहे पैसे बचा सकेंगे। इसके अतिरिक्त यदि आप सब मिलकर निश्चय कर लें तो गांवकी शराबकी दुकानोंको तुरन्त बन्द कर सकते हैं क्योंकि गांवमें रहनेवाले सभी लोगोंकी रग आप पहचानते हैं। इसके अलावा पंचका महत्त्वपूर्ण कार्य भी आपको ही करना चाहिए। आप ऐसे सभी काम-काज करनेके अभ्यस्त हैं। बहुत से लोगोंको तो इसका चस्का पड़ गया होगा। पटेलगिरी छोड़ देनेके बाद यदि वे बेकार रहेंगे तो दुःखी हो जायेंगे और शायद उन्हें पटेलगिरी छोड़ देनेका पछतावा भी हो। मैं खुद वकालत करता था किन्तु उसे छोड़ देनेके बाद मुझे कभी पछतावा नहीं हुआ। क्योंकि मैंने ऐसा धन्धा खोज लिया जो मुझे वकालतकी अपेक्षा कहीं अधिक व्यस्त बनाये रखता है। पटेल पटेलगिरी छोड़ सकते हैं किन्तु उनके घर दरवार तो भरना ही चाहिए। वे पंचायतों की स्थापना करें। उनका गांवके मामलोंसे परिचय होनेके कारण वे झगड़ोंका निबटारा बहुत ही सन्तोषजनक ढंगसे कर सकते हैं। ये सब काम आप संगठित रूपसे कर सकें इसके लिए मेरा सुझाव है कि आप एक 'भूतपूर्व पटेल मण्डल' की स्थापना करें। यदि ऐसा मण्डल होगा तो उसके कामकाजकी रिपोर्ट मुझे नियमित रूपसे मिलती रहेगी तथा आपकी सभी प्रवृत्तियोंकी मुझे जानकारी रहेगी। [गुजरातीसे] '''नववजीवन,'''२५-५-१९३०<noinclude></noinclude> 2e01ix1okw5jwxprxm987742r8udg8w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४३ 250 197386 675483 674708 2026-08-30T20:22:09Z Kumari Arpana Sinha 2191 675483 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावकी' प्रस्तावना|२९९}}</noinclude>अन्य इतनी तरहके धन्धे जुड़े हुए हैं कि हम उनका अनुमान भी नहीं लगा पाते। कराडीके लोगोंकी तरह विदेशी कपड़ोंको इकट्ठा करके जला तो देना ही चाहिए। बारडोली भाइयो और बहनो, आपके पास जितने भी विदेशी कपड़े हों उन्हें आप श्रद्धापूर्वक जला दें किन्तु साथ-साथ यह प्रतिज्ञा करें कि आप खादी ही पहनेंगे। यदि आप खादी पहनेंगे तो आपका कपड़ेपर होनेवाला बहुत-सा खर्च बच जायेगा । यदि आप बारीक विदेशी या मिलके बने कपड़े पहनेंगे तो आपको १०-२० कपड़ोंकी आवश्यकता होगी किन्तु खादीके एक कच्छे या एक साड़ीसे काम चल जायेगा। फिर खादीकी प्रतिज्ञा तो ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि मैं अपने ही कते सूतकी खादी बुनवाकर पहनूंगा। ऐसा करना कुछ कठिन नहीं है। बुनना तो आप तुरन्त नहीं सीख सकते किन्तु तकलीपर कातना तो मैं आपको तुरन्त सिखा सकता हूँ। आप सूत कातने लगें तो उसे बुन देना आश्रमोंका काम है। यहाँ जो आश्रम हैं वे सब खादीके कामके लिए ही हैं। यहाँ काम तो हुआ है; किन्तु जितना होना चाहिए, अबतक उससे बहुत कम हुआ है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २५-५-१९३० {{C|{{larger|'''२८४. 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी'की प्रस्तावना'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} यह पुस्तिकाकी दूसरी आवृत्ति है। इसमें संकलित लेखोंके लेखक हैं प्रोफेसर कुमारप्पा | ये लेख पहले-पहल 'यंग इंडिया में छपे थे। इस आवृत्तिमें जहाँ कहीं आवश्यक हुआ है, संशोधन परिवर्धन भी किया गया है। इन लेखोंमें अंग्रेज सरकारकी आर्थिक नीति तथा भारतके सर्वसाधारणपर उसके प्रभावपर विचार किया गया हैं। इसलिए ये लेख बहुत समयानुकूल हैं। इस आवृत्तिमें खुद लेखकने ही बहुत सावधानी से तैयार की गयी और काफी विस्तृत सांकेतिका भी जोड़ दी है। इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मैं भारतीयों तथा पाश्चात्य देशोंके लोगों से भी यह पुस्तिका पढ़नेका अनुरोध करता हूँ। {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''पब्लिक फिनांस एंड आवर पॉवर्टी''' से तथा जी० एन० १००८५ से भी।<noinclude></noinclude> 4zl4ikyzg4zs5buegj6kylf1ujo7zyy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४५ 250 197388 675452 674712 2026-08-30T19:13:51Z Manikantkmr 5554 675452 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२८६. सन्देश : धोलेरा और वीरमगाँवके लोगोंको'''}}}} धोलेरा और वीरमगाँवके आसपाससे जो खबरें आ रही हैं, उन्हें सुनते रहना असह्य ही गया है। बर्बरतापूर्ण अत्याचार किये जानेकी जो बातें कही जा रही हैं उन्हें मानते हुए रोमांच हो आता है। जिन्होंने विवरण भेजा है वे सावधान रहें और उसे सिद्ध करने को तैयार रहें। अमानुषिक अत्याचारका जो विवरण दिया गया है, उसके बारेमें कहा जाता है कि वह लुके-छिपे नहीं बल्कि खुले आम हुआ है। मुझे आशा है कि उक्त विवरण गलत होगा। किन्तु यदि यह सही हो तो सत्याग्रहके जो साधन आजतक प्रयोगमें आये हैं उनकी अपेक्षा कहीं उम्र साधन भी हैं जो काममें लाये जा सकते हैं। उनके द्वारा इन अमानुषिक कृत्योंको तो रोका ही जा सकता है। जिनपर अत्याचार हुआ है वे लोग घबरायें नहीं। मैं स्वयं उस ओर जानेको बेचैन हूँ। और यदि ये अत्याचार बन्द नहीं हुए, और ईश्वरकी कृपा होगी तो मैं वहाँ पहुँचकर उनके निवारणके उपाय सुझाऊँगा। वे लोग यह मान लें कि सूरत जिलेका काम करते हुए भी मेरा मन धोलेरा और वीरमगांवमें ही अटका रहेगा। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २० ४-१९३० {{C|{{larger|'''२८७. कलकत्ता और कराची'''}}}} कलकत्ता-कराचीसे मिली हुई खबरें चौंकानेवाली हैं। इनमें सचाई कितनी है, सो तो समय आनेपर पता चलेगा। अखबारोंमें इतनी झूठी बातें छपती हैं कि उनसे सत्यको जान लेना बहुत मुश्किल है। हिंसक शासनको हमेशा धूर्तताके सहारेकी आवश्यकता बनी ही रहती है। यह कौन नहीं जानता कि बारडोली सत्याग्रहके दिनों में सत्याग्रहियों के बारेमें बेसिर-पैरकी बातें फैलाई गई थी? मेरे सम्बन्धमें आये दिन जो झूठी खबरें फैलती रहती हैं, उनका क्या मुझे अनुभव नहीं है? इतना होते हुए भी हमारे विपक्षमें कुछ-न-कुछ सत्य तो है ही। यह सच है कि कुछ हिन्दुस्तानियोंने किसी-न-किसीकी जानमालको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाया है। इस तरह उन्होंने इस लड़ाईको नुकसान पहुँचाया है, और मेरी स्थितिको विषम बना दिया है। लोग मुझसे जिस सेवाकी आशा रखते हैं, ऐसी घटनाओंके कारण उसमें रुकावट पड़ती है। यह दुःखकी बात है। ऐसी घटनाएँ मुझे झकझोर देती हैं। यह मेरा स्वभाव है, उससे मैं कैसे बचूं? फिर भी मेरा रास्ता तो सीधा-सादा है। कुछ भी क्यों न हो, मैं इस लड़ाईको बन्द नहीं कर सकता। मेरे पास अपनी अहिंसाको मापनेका कोई पैमाना नहीं है। मैं श्रद्धापूर्वक काम कर रहा हूँ । यदि शुद्ध अहिंसा ही काम कर रही होगी तो सब कुछ<noinclude></noinclude> dtnavb48yynctuwlbwsi328ulw71jwk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४६ 250 197389 675453 674713 2026-08-30T19:14:40Z Manikantkmr 5554 675453 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठीक ही होगा। जो भी कदम उठाये जा रहे हैं, उनका आखिरी परिणाम अच्छा ही होगा। 'नवजीवन' के पाठकोंका एक ही मार्ग और कर्तव्य है। वे जहाँ जायें, शान्तिका ही प्रचार करें, किसीसे कोई कड़वी बात न कहें, अंग्रेजोंके प्रति तिरस्कारके भाव पैदा न करें और अपने ही देशके अफसरोंके प्रति भी किसीके दिलमें नफरत पैदा न करें। अत्याचारीसे भी प्रेम करना हमारा कर्तव्य है। हमें उसपर आंच तक नहीं आने देनी चाहिए। बढ़ते हुए अत्याचारका मुकाबला हमें अधिकाधिक दुःख सहकर करना है। कलकता-कराचीके समाचारोंमें एक सुखद समाचार भी है। जयरामदासकी जांघ में गोली लगी है। जयरामदाससे बढ़कर सहृदय और सरल व्यक्तिको मैं नहीं जानता। जैसी उनकी निर्मलता है, वैसी ही निर्मल बुद्धि है और वैसी ही उनकी प्रतिष्ठा है। जयरामदास कांग्रेसकी कार्यसमिति के सदस्य और विदेशी वस्त्र बहिष्कार समितिके मन्त्री हैं। वे पूर्णतः अहिंसावादी हैं। इस युद्धमें ऐसे ही पुरुषोंके बलिदानकी आवश्यकता है। अतएव जयरामदास को मैं सौभाग्यशाली समझता हूँ कि उनके हिस्से में यह पहली गोली आई। अगर वहाँ उपद्रव हो गया था तो जयरामदास उपद्रव कराने वहां नहीं गये थे बल्कि लोगोंको शान्त करने गये थे। उनका घायल होना अच्छा ही है। ऐसे ही भारतीयोंके रक्त से स्वराज्य-मन्दिर चुना जायेगा। यदि हम भी इस यज्ञमें अन्तिम वलिदान देना चाहते हों तो हमें जयरामदासके समान निर्मल, सरल और दृढ़ बनना होगा। [गुजरातीसे] नवजीवन, २० ४ १९३० {{C|{{larger|'''२८८. विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी'''}}}} अभी-अभी दिल्लीसे मुझे एक तार मिला है, जिसमें लिखा है : "चौबीसों घंटे धरनेके फलस्वरूप विदेशी कपड़ेके व्यापारी कुछ विशेष शर्तोंपर समझौता करना चाहते हैं। जिस आर्डरका माल नहीं आया है उसे रद करने और जो माल पड़ा है उसे निर्धारित अवधिके भीतर बेच देनेकी अनुमति चाहते हैं।" प्रश्न यह है कि क्या ऐसी शर्तें स्वीकार की जा सकती हैं। मैंने अपनी यह राय लिख भेजी है: "अवधि कदापि नहीं दी जा सकती। यदि व्यापारियोंमें श्रद्धा हो तो वे विश्वास रखें कि स्वराज्यमें ऐसे गरीब व्यापारियोंको, जिनका नुकसान होगा, समुचित मुआवजा मिलेगा। सुखी-सम्पन्न व्यापारियोंको मुआवजा नहीं मिलेगा। यदि जमा मालके कारण उन्हें हानि उठानी पड़े तो वे इसे अपने पिछले पापोंका यत्किचित् प्रायश्चित्त समझें।"<noinclude></noinclude> 9ksnjoy6ae8ogdptcxi9atqkw94rj85 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४७ 250 197390 675454 674714 2026-08-30T19:15:43Z Manikantkmr 5554 675454 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी|३०३}}</noinclude>मेरे विचारसे स्वराज्यके इच्छुकोंके लिए यह आवश्यक है कि वे इसे भली-भाँति स्पष्ट कर दें। जो दुःसाहसी लोग मैदान में उतरे हैं, वे जीतें या मरें, परन्तु मरते- मरते भी स्वयं बहुत सी बातोंको साफ कर ही जायेंगे। इस संसारमें ऐसी कोई लड़ाई नहीं हुई, जिसमें हजारों आदमियोंको नुकसान न उठाना पड़ा हो। परन्तु यह संग्राम यदि अन्तत शान्तिमय बना रहा तो फल अधिकसे-अधिक मिलेगा और नुकसान कमसे कम होगा। इस तरह नुकसानको कम करनेकी दृष्टिसे भी सत्याग्रहियों को दृढ़ बनना चाहिए। जिस बहिष्कारको हमें आज ही सफल बनाना है, उसके लिए अवधि कैसी? विदेशी कपड़ोंके सभी व्यापारी यदि अवधिको माँग करने लगें तो हम कहाँके रहेंगे? तब तो बहिष्कार आन्दोलनकी शक्ति व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगी और दगाबाजी के आगे-पीछे और अगल-बगलके दरवाजे खुल जायेंगे। कौन किस व्यापारपर निगाह रखेगा? हाँ, जिस व्यापारीको हमारी जीतका भरोसा नहीं है, परन्तु जो दगा भी नहीं देना चाहता, वह इतना कर सकता है कि फिलहाल अपने मालको सुरक्षित रख छोड़े। यदि जनता हार जाये और गुलामीका दूसरा पट्टा दे तो वे अपना माल सहजमें ही बेच सकेंगे। ऐसे व्यापारी जाने-पहचाने स्वयं-सेवकोंको अपने मालकी फेहरिस्त सौंप दें और उसपर कांग्रेसकी मुहर लगवा लें, जिससे उचित समयपर यदि उन्हें मुआवजा देना ठीक जान पड़े तो स्वराज्य सरकार मुआवजा दे सके। दूसरा रास्ता यह है कि ऐसे व्यापारी अपना माल वहाँ भेज दें, जहाँ विदेशी कपड़ा बिकता हो। जो कुछ करना ही चाहता है, उसे अनेक सीधे रास्ते मिल जाते हैं। अन्यथा, नाचना न जाननेवालेको आँगन टेढ़ा ही लगता है। परन्तु व्यापारीके दुःखका क्या रोना? पढ़े-लिखे वकीलोंके बारेमें क्या कहा जाये? जैसे-तैसे एक कन्हैयालाल मुंशीको अपना मार्ग स्पष्ट सूझ पड़ा और उन्होंने अपनी अच्छी चलती हुई वकालत तथा सरकारी समुदाय जिसे 'कैरियर' मानता है, उसका बलिदान कर दिया। दूसरे वकील सविनय अवज्ञा करते हुए डरते हैं। कहीं 'किताब' में से नाम कट जाये तो? ये भले भीरु वकील सोचें तो समझ सकते हैं कि यदि सब सविनय अवज्ञा करें तो किसीका नाम 'किताब' से न निकले। लेकिन यदि सब वैसा न करें तो? तो भी डर क्या है? त्यागी वकील यह विश्वास क्यों न रखे कि वह अपना भाग अदा करके स्वराज्यको अधिक निकट लायेगा। वह इस बातको क्यों न माने कि इस महायुद्धका अन्तिम परिणाम स्वराज्य ही होगा। उस समय 'किताब' से काटे गये नाम भी ससम्मान फिर लिखे जायेंगे। डाक्टर काउजे ट्रान्सवालके प्रसिद्ध वकील थे। वे फांसी पर लटकने से बचे थे। उनकी वकालत छीन ली गई थी। लेकिन उन्होंने पुनः प्रतिष्ठापूर्वक अपनी वकालत शुरू की और न सिर्फ खोया हुआ पाया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी। ऐसे बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं। इस लड़ाई में सबसे महंगी चीज विश्वास है। यदि हममें थोड़ा-सा भी आत्म-विश्वास आ जाये तो स्वराज्य हमारी मुट्ठी में है। अन्यथा भ्रमवश हम बगल में बैठे हुए बालकको सारे गाँवमें ढूंढते फिरेंगे।<noinclude></noinclude> 33khro7lswvegdmycao4yblxdp5ip3s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५२ 250 197395 675455 674720 2026-08-30T19:17:18Z Manikantkmr 5554 675455 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९४. विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह'''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} {{C|'''गांधीजी ने कहा कि मुझे लगता है, जहाँ कहीं विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संगठन सर्वथा अहिंसात्मक ढंगसे किया जा सकता है, वहाँ इसे यदि बन्द किया जा सकता है तो केवल यही वचन देनेपर कि हम विदेशी वस्त्र नहीं बेचेंगे।'''}} यह सौदेबाजीका समय नहीं है। जिनका इस आन्दोलन में विश्वास है और जो मानते हैं कि इसके परिणामस्वरूप स्वराज्य मिलना निश्चित है तथा जो यह मानते हैं कि विदेशी वस्त्र खरीदना बन्द कर देना अच्छा है, उन्हें कुछ समयके लिए नहीं, बल्कि सदाके लिए विदेशी वस्त्र खरीदना छोड़ देना चाहिए। लेकिन जिनका इसमें विश्वास तो नहीं है, लेकिन जनमतके बढ़ते हुए तकाजेका खयाल करके विदेशी वस्त्रोंकी बिक्री बन्द कर देना चाहते हैं, उन्हें मैं निम्नलिखित सलाह दूंगा। ऐसे लोग धरना देना बन्द करनेको कहनेके बजाय फिलहाल विदेशी वस्त्र बेचना छोड़ दें और अगर यह आन्दोलन विफल हो जाये तो भविष्यमें फिर बेचना शुरू कर दें। अगर आन्दोलन सफल हो जाता है तो उन्हें अपने मालके लिए अन्यत्र बाजार मिल जायेगा। यदि इससे उन्हें घाटा होता है और वे इतने गरीब हैं कि घाटा बरदाश्त नहीं कर सकते तो उनको भरोसा रखना चाहिए कि भावी राष्ट्रीय सरकार उन्हें वाजिब मुआवजा देगी। लेकिन धरना देनेवालों को मैं आगाह कर देना चाहता हूँ कि वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हर प्रकारकी हिंसा करनेसे बचें। जिन कारणोंसे मैंने यह योजना बनाई कि शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर सिर्फ स्त्रियाँ ही धरना दें उनमें एक यह भी था। लेकिन जहां स्त्रियां इसके लिए तैयार न हों और पुरुषों में पूरा आत्म-विश्वास हो कि वे धरना देनेका काम अहिंसात्मक ढंगसे सम्पन्न कर सकेंगे,वहाँ बखूबी उन्हें भी धरना देना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude> 1nsrwkai05t7xfwpd2kimy96yt3qeob 675456 675455 2026-08-30T19:18:06Z Manikantkmr 5554 675456 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९४. विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह'''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} '''गांधीजी ने कहा कि मुझे लगता है, जहाँ कहीं विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संगठन सर्वथा अहिंसात्मक ढंगसे किया जा सकता है, वहाँ इसे यदि बन्द किया जा सकता है तो केवल यही वचन देनेपर कि हम विदेशी वस्त्र नहीं बेचेंगे।''' यह सौदेबाजीका समय नहीं है। जिनका इस आन्दोलन में विश्वास है और जो मानते हैं कि इसके परिणामस्वरूप स्वराज्य मिलना निश्चित है तथा जो यह मानते हैं कि विदेशी वस्त्र खरीदना बन्द कर देना अच्छा है, उन्हें कुछ समयके लिए नहीं, बल्कि सदाके लिए विदेशी वस्त्र खरीदना छोड़ देना चाहिए। लेकिन जिनका इसमें विश्वास तो नहीं है, लेकिन जनमतके बढ़ते हुए तकाजेका खयाल करके विदेशी वस्त्रोंकी बिक्री बन्द कर देना चाहते हैं, उन्हें मैं निम्नलिखित सलाह दूंगा। ऐसे लोग धरना देना बन्द करनेको कहनेके बजाय फिलहाल विदेशी वस्त्र बेचना छोड़ दें और अगर यह आन्दोलन विफल हो जाये तो भविष्यमें फिर बेचना शुरू कर दें। अगर आन्दोलन सफल हो जाता है तो उन्हें अपने मालके लिए अन्यत्र बाजार मिल जायेगा। यदि इससे उन्हें घाटा होता है और वे इतने गरीब हैं कि घाटा बरदाश्त नहीं कर सकते तो उनको भरोसा रखना चाहिए कि भावी राष्ट्रीय सरकार उन्हें वाजिब मुआवजा देगी। लेकिन धरना देनेवालों को मैं आगाह कर देना चाहता हूँ कि वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हर प्रकारकी हिंसा करनेसे बचें। जिन कारणोंसे मैंने यह योजना बनाई कि शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर सिर्फ स्त्रियाँ ही धरना दें उनमें एक यह भी था। लेकिन जहां स्त्रियां इसके लिए तैयार न हों और पुरुषों में पूरा आत्म-विश्वास हो कि वे धरना देनेका काम अहिंसात्मक ढंगसे सम्पन्न कर सकेंगे,वहाँ बखूबी उन्हें भी धरना देना चाहिए। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude> 71nu926qqj99z4qh5atwiqfvmbyqvvq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५३ 250 197396 675457 674721 2026-08-30T19:18:53Z Manikantkmr 5554 675457 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९५. काला शासन'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} पिछला सप्ताह सिर्फ खुशीका ही सप्ताह नहीं था। उस सप्ताह कलकत्ता और कराचीमें उपद्रव हुए। और अब बटगांवसे दुःखद समाचार आया है। उससे प्रकट होता है कि देश भरमें अहिंसाको वृत्तिका जो जबरदस्त प्रदर्शन हुआ है, उसके बावजूद वातावरण में हिंसा है और उस वृत्तिके घर हैं देशके नगर कलकत्ता और कराचीकी घटनाओं और चटगाँवकी घटनाओं में भेद किया जा सकता है। उन दो नगरोंमें हुई घटनाएँ क्षणिक आवेशके कारण हुई प्रतीत होती है। चटगाँव में उनके पीछे पूर्व योजना प्रतीत होती है। वे जैसी भी रही हों, मगर है बहुत खेदजनक और उनसे आन्दोलनकी प्रगति में बाधा पड़ी है। वैसे यह आन्दोलन बहुत ठीक चल रहा है और दिन-दिन ज्यादा जोर पकड़ता जा रहा है। मैं तो हिंसा में विश्वास रखनेवालों से यही अनुरोध कर सकता हूँ कि वे अहिंसात्मक प्रदर्शनके सहज प्रवाहमें विघ्न न डालें। चाहे वे मेरी बात सुनें या न सुनें, यह आन्दोलन तो चलता ही रहेगा। यह बात निश्चित है कि हिंसासे स्वराज्यकी ओर हमारी प्रगति रुकेगी। मैं यह नहीं समझा सकता कि यह कैसे होगा। जो लोग इस संघर्षके बाद जीवित रहेंगे ये देखेंगे कि वह हमारी प्रगति के लिए किस प्रकार बाधक सिद्ध हुई। फिलहाल सत्याग्रही लोग तो दूनी शक्तिसे अपना काम जारी रखें। हमें अपने खिलाफ खड़ी दोतरफा हिंसाका मुकाबला करना है। मेरे लिए तो जनता द्वारा की गई हिंसा हमारे मार्गमें उतनी ही बड़ी बाधा है जितनी बड़ी बाधा सरकारकी हिंसा है। सच तो यह है कि मैं सरकारकी हिंसाका मुकाबला जनताकी हिंसाकी तुलना में अधिक सफलतापूर्वक कर सकता हूँ। एक बात तो यह है कि जनताकी हिंसाका मुकाबला करनेके लिए मुझे वह समर्थन नहीं मिलेगा जो सरकारकी हिंसाका मुकाबला करनेके लिए मिलेगा। फिर, चूंकि हिंसामें विश्वास रखनेवाली जनताका उद्देश्य भी उतना ही नेक है जितना कि सत्याग्रहियोंका, इसलिए उसकी हिंसाका मुकाबला करनेके लिए तरीके भी उससे भिन्न अपनाने होंगे जो हम सरकारकी हिंसाका मुकाबला करनेके लिए अपना सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि कराचीकी ही तरह कलकत्ता और चटगांवमें भी सत्याग्रही लोग हिंसात्मक कार्रवाईको रोकनेकी कोशिश कर रहे थे। बहादुर युवक दत्तात्रेय माने का सत्याग्रहसे कोई मतलब नहीं था। एक कसरती जवान होनेके कारण वह सिर्फ व्यवस्था बनाये रखने में मदद देनेकी गरजसे मौकेपर गया था। लेकिन उसे <small>१. जवाहरलाल नेहरू और जे० एम० सेनगुप्तकी गिरफ्तारीके विरोध में १९ अप्रैलको एकतामें दुई हड़तालके दौरान दंगा हो गया था।<small><noinclude></noinclude> 6ou05r96681i877ty90ojm8dnl9qvve पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५४ 250 197397 675458 674722 2026-08-30T19:19:53Z Manikantkmr 5554 675458 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गोली लग गई और वह चल बसा। इसी तरह १८ वर्षीय मेघराज रेवाचन्दको गोली लगी और यह भी चल बसा। इस प्रकार जयरामदास सहित सात व्यक्तियोंको गोलियां लगी। जयरामदासको गोली लगने की खबर सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई विशुद्ध प्रसन्नता। नेताओंको लगे घावोंसे ही इस अन्यायका निराकरण होगा। बलिदानका नियम संसारमें सर्वत्र एक-सा है। वह तभी होगा जब परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति बलिदान देंगे और जयरामदास ऐसे ही परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति हैं। इसलिए जब मुझे जयरामदासके जख्मी होनेका समाचार मिला तो मैं इस आशयका तार भेजे बिना नहीं रह सका कि जेलमें बन्द रहने से जांघ में गोली लगना बेहतर है और सीनेमें लगा घाव तो जांघ में लगे घावसे भी अच्छा होता है।"। अतएव यद्यपि मैं दोनों दिवंगत वीर युवकोंके माता-पिताओंके प्रति अपनी समवेदना प्रकट करता है, किन्तु मेरे अन्तरतममें यही इच्छा उठ रही है कि यदि वे स्वीकार करें तो मैं उनके सपूतोंके इस सुशोभन बलिदानके लिए उन्हें बधाई है योद्धाकी मृत्यु पर आँसू नहीं बहाये जाते और सत्याग्रही योद्धाकी मृत्युमें तो इसके लिए और भी कम अवकाश है। स्वतन्त्रताके लिए आकुल राष्ट्रको जो सबक सीखने पड़ते हैं उनमें से एक यह है कि भय मात्रका त्याग कर दिया जाये; उपाधियाँ सोनेका भय, धन-ऐश्वर्य छिननेका भय, कारावासका भय और शरीरको चोट आने तथा अन्ततः मृत्युका भय सबको त्याग देना है। भारत-भरसे मिली तमाम खबरोंसे मुझे यही जान पड़ता है कि लोग अधिकाधिक निर्भीक होते जा रहे हैं। हम अन्यत्र बिहारसे आया एक पत्र छाप रहे हैं। उसे पढ़कर आत्मा झंकृत हो उठती है। एक चीज ऐसी है, जिससे हमें जल्दी ही छुटकारा पा लेना चाहिए। अर्थात् शारीरिक शक्तिके मनमाने प्रयोगको जैसे भी हो, बन्द कराना है। चाहे उसके लिए हमें सरकारको अपनी संगीनों और बन्दूकोंका प्रयोग करनेके लिए ही बाध्य क्यों न करना पड़े। वीरमगाँव में पुलिसने कुत्सित तरीकेसे जो मारपीट की उसके अनेक उदाहरणों में से मैं यहाँ केवल एक नमूना दे रहा हूँ {{C|'''दक्षिणामूर्ति विद्यार्थी भवन के छात्र अनिरुद्ध, व्यास'''}} {{C|'''स्वयंसेवक सं० ३५ / ३ का बयान'''}} {{C|'''मैं अपने कई साथियोंके साथ ६-३० शामकी डाकगाड़ीसे नमककी बोरियों के साथ वीरमगाँव रेलवे स्टेशनपर उतरा। तभी पुलिसके ८-१० लोगोंने हमें घेर लिया। नमकको न छिनने देनेके खयालसे मैं बोरीके साथ जमीनपर बैठ गया और पूरी ताकत से बोरीसे चिपक गया'''।}} <small>१. देखिए "तार एन० आर० मलकानीको ", १८-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude> a2olml6piek0g1fxmo5ktwmeuyw8rmr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५७ 250 197400 675459 674725 2026-08-30T19:21:41Z Manikantkmr 5554 675459 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|सोमवार की रात्रि [२१ अप्रैल, १९३०]१}} चि० गंगाबहन, अब रातके सवा ग्यारह बजे है, इसलिए अधिक नहीं लिखूंगा। मुझे अब भी बहुत काम है। जो बहनें वहां रहती हैं वे भी लड़ाईके काममें ही लगी है। मैंने अनेक बार समझाया है, आश्रम और हमारी यह लड़ाई दो भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। जिन्होंने जेलका भय त्याग दिया है उनके लिए तो जेल और घर दोनों एक समान है। जहां सहज ही सेवा करनेका अवसर मिले वहां उसका लाभ उठाना चाहिए। यदि धरना देनेके लिए बहनोंकी जरूरत पड़ी तो उसके लिए सब बहनोंका निकल पड़ना ही ठीक है। जब कोई कार्यकर्ता न बच रहे और सब ओर भयका वातावरण हो तब तुम सब लोग आश्रमको खाली करके कार्य करने के लिए निकल पड़ना और संघर्ष करते हुए अपने प्राण उत्सर्ग कर देना। इस समय जब कि अनेक बहनें धरना देनेके कार्य में आगे आ रही हैं उस समय आश्रमकी बहनोंको जो कार्य मिले उन्हें वही करते रहना चाहिए। कुसुमसे मैने कहा है कि आश्रमके भाई-बहनोंके दो भाग कदापि नहीं हो सकते। यदि वह आश्रमकी ओरसे शामिल होती है तो उसे प्रतिज्ञापर हस्ताक्षर करने ही चाहिए। यदि यह प्रतिज्ञापर हस्ताक्षर नहीं करती और आश्रम में रहना-भर चाहती है तो वह आश्रमके अन्य नियमोंको मानते हुए भी वहाँ रह सकती है। यह सुनकर जिस दिन अन्य बहनें यहाँ आई उसी दिन वह अपनी माँ साथ सलाह-मशविरा करनेके लिए गई। बादमें क्या हुआ, सो मैं नहीं जानता। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८७४६ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य <small>१. तारीख '''बापुना पत्रो-६: गं० स्व० गंगाबहेनने''' से ली गई है।<small><noinclude></noinclude> n2n0efsrvvo17nqhdmpcr2vs9wl8bui पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५८ 250 197401 675499 674772 2026-08-30T20:56:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 675499 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|अर्धरात्रि, सोमवार, २१ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, प्यारेलाल पहुँच गया है। तुम्हारा वक्तव्य तो काममें नहीं आया। मेरा लेख जब तुम पढ़ोगे तब तुम्हें मालूम होगा। भड़ौचमें जो घटनाएँ हो रही हैं और बिहार में जो घटनाएँ हुई हैं उन्हें देखते हुए धोलेरा और वीरमगांवमें हुई घटनाएँ कुछ भी नहीं लगतीं। अब चूंकि वहाँका उपद्रव शान्त हो गया है इसलिए अब इसकी ज्यादा चर्चा करनेसे क्या लाभ? तुमने अपनी साप्ताहिक चिट्ठीमें जो थोड़ा-कुछ लिख दिया है उसमें कोई हर्ज नहीं तुम्हारे वक्तव्यका कुछ भाग तो निकाल देने लायक लगा। ऐसा मुझे क्यों लगा, यह समझा सकनेका फिलहाल मेरे पास समय नहीं है। मैं पूरे दिन लिखता रहा। बादमें में नवसारी अस्पतालमें भरती एक व्यक्तिको देखने गया; उसे खजूरका वृक्ष काटते समय बड़ी जबरदस्त चोट आई थी और अब वह अन्तिम सासें गिन रहा है। वहांसे वापस आनेपर में कताई-यज्ञको पूरा कर रहा हूँ और तुम्हें यह पत्र लिखवा रहा हूँ। प्यारेलालको भड़ौच भेज रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि तुम तो पहले ही किसीको भेज चुके हो और अधिक सावधानीके तौरपर मैं प्यारेलालको भेज रहा हूँ। कल छोटेलालको वहाँ [तुम्हारे पास] भेजा है। उसको भेजने का उद्देश्य तो खादी-प्रचार में उससे काम लेना है। काकाको मैंने समझा दिया है। यों छोटेलालको शतावधानी कहा जाता है। तात्पर्य यह कि उससे जो काम लेना हो, लेना। अन्तिम निर्देश देनेकी दिशामें में विचार कर रहा हूँ। कह नहीं सकता, लेकिन एक-दो दिनमें किसी निश्चयपर पहुँच जाऊँगा। कल दोपहरको सूरत पहुँचूँगा और शामतक वहीं रहूँगा। शामको वापस आऊँगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनञ्च:] सारे हलफ़नामे भेज रहा हूँ। 'यंग इंडिया' का पुलिन्दा सीधे भेजा गया है। एक हलफनामेका अनुवाद मेरे लेखमें लिया गया है। प्यारेलालका अनुवाद अधूरा और दोषपूर्ण है। मैंने प्यारेलालको [भड़ौच] भेजनेका विचार त्याग दिया है। गुजराती (एस० एन० १६८२४) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> acop830pz6cmihxpmqglivhudvqsx7s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५९ 250 197402 675460 674773 2026-08-30T19:23:21Z Manikantkmr 5554 675460 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९९. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|नवसारी}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चटगाँवका समाचार पढ़कर मन व्यथित हो जाता है। इससे प्रकट होता है कि बंगाल में कमोवेश तादादमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो अहिंसामें विश्वास नहीं रखते-- न तो सिद्धान्त और न नीतिके रूपमें। मुझे यह तो मालूम ही था कि ऐसे लोग सारे देशमें हैं, लेकिन मैंने आशा यह की थी कि वे अहिंसाको एक मौका देंगे। कलकत्ता और कराचीकी घटनाओंको तो मैं किसी हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण नहीं, बल्कि आकस्मिक घटनाएँ मानता हूँ। लेकिन चटगांवकी घटनाएँ शायद हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण हैं और यदि ऐसा है तो यह बात बहुत गम्भीर है। लेकिन परिस्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो जाये, अब संघर्षको स्थगित नहीं किया जा सकता। हम अपना कदम पीछे नहीं हटा सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे। [अंग्रेजीसे] ''बाम्बे क्रॉनिकल''', २२-४-१९३०<noinclude></noinclude> 8znewsf3dpopyopg1sihc2zs6rya7bl 675461 675460 2026-08-30T19:24:05Z Manikantkmr 5554 675461 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९९. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|नवसारी}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चटगाँवका समाचार पढ़कर मन व्यथित हो जाता है। इससे प्रकट होता है कि बंगाल में कमोवेश तादादमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो अहिंसामें विश्वास नहीं रखते-- न तो सिद्धान्त और न नीतिके रूपमें। मुझे यह तो मालूम ही था कि ऐसे लोग सारे देशमें हैं, लेकिन मैंने आशा यह की थी कि वे अहिंसाको एक मौका देंगे। कलकत्ता और कराचीकी घटनाओंको तो मैं किसी हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण नहीं, बल्कि आकस्मिक घटनाएँ मानता हूँ। लेकिन चटगांवकी घटनाएँ शायद हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण हैं और यदि ऐसा है तो यह बात बहुत गम्भीर है। लेकिन परिस्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो जाये, अब संघर्षको स्थगित नहीं किया जा सकता। हम अपना कदम पीछे नहीं हटा सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे। [अंग्रेजीसे] '''बाम्बे क्रॉनिकल,''' २२-४-१९३०<noinclude></noinclude> 9lv3prjzcr5cey4855dfsdnt6m6747m पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६० 250 197403 675462 674816 2026-08-30T19:26:25Z Manikantkmr 5554 675462 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३००. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} भाई सतीशबाबु, बंगालमें जो कुछ हो रहा है उसका सत्य वर्णन मुझे कहींसे मीलता नहिं है। तुमारे संघका क्या चलता है उसका भी पता नहीं है। किसीको कह दो कि मुझको सच्ची हकीकत भेजते रहे। शरीर प्रवृत्ति कैसी है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} [पुनश्च:] यह लिखनेके बाद उपवासका तार देखा। मैंने तार दिया है। उत्तरकी प्रतीक्षा कर रहा हू। जी० एन० १६१७ की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३०१. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} प्रिय भगिनी, तुमारा खत कई दिनोंसे नहि है मुझे पता नहीं है कहां तक मुझे जेल बहार रखेंगे। कैसे हि हो मुझको लिखते रहो। जब जेलमें चला जाऊं तब देखा जाय। तुमारा शरीर अब कैसे रहता है? {{Right| बापुके आशीर्वाद} जी० एन० १६६६ की फोटो नकलसे। <small>१. अनुमानतः सोदपुरका आश्रम।</small><noinclude></noinclude> oerggti21k6sc4bz34rrt1e6m2xhs2y 675463 675462 2026-08-30T19:27:19Z Manikantkmr 5554 675463 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३००. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} भाई सतीशबाबु, बंगालमें जो कुछ हो रहा है उसका सत्य वर्णन मुझे कहींसे मीलता नहिं है। तुमारे संघका क्या चलता है उसका भी पता नहीं है। किसीको कह दो कि मुझको सच्ची हकीकत भेजते रहे। शरीर प्रवृत्ति कैसी है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} [पुनश्च:] यह लिखनेके बाद उपवासका तार देखा। मैंने तार दिया है। उत्तरकी प्रतीक्षा कर रहा हूं। जी० एन० १६१७ की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३०१. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} प्रिय भगिनी, तुमारा खत कई दिनोंसे नहि है मुझे पता नहीं है कहां तक मुझे जेल बहार रखेंगे। कैसे हि हो मुझको लिखते रहो। जब जेलमें चला जाऊं तब देखा जाय। तुमारा शरीर अब कैसे रहता है? {{Right| बापुके आशीर्वाद} जी० एन० १६६६ की फोटो नकलसे। <small>१. अनुमानतः सोदपुरका आश्रम।</small><noinclude></noinclude> gscfpsj2eiaq4yobyrpf4v4v4xquvtk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६१ 250 197404 675464 674778 2026-08-30T19:28:41Z Manikantkmr 5554 675464 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।</small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।</small><noinclude></noinclude> hzaa0avlwrrfgib036kvocj7dae6vif 675465 675464 2026-08-30T19:29:50Z Manikantkmr 5554 675465 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।</small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि वह हवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।</small><noinclude></noinclude> bf6rus3sow5wbs6xvx2dpqti2p97qda पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६२ 250 197405 675466 674801 2026-08-30T19:30:39Z Manikantkmr 5554 675466 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०४. पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} भाई हरिभाऊ, आपका पत्र मिला। आप सबके पकड़े जानेपर यदि मैं मुक्त रहा तो 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' में लिखूंगा। 'नवजीवन' में तो आज ही लिखना है। इसलिए कुछ लिख डालूंगा। रामनारायणने वहाँ आने की मांग की है और मैंने अपनी सम्मति भी दे दी है। लड़ाई खूब रंग पकड़ रही है। यदि हमारी ताकत ऐसी ही बनी रही तो मेरा विश्वास है कि हम थोड़े ही समय में अपने उद्देश्यको प्राप्त कर लेंगे। कल इतना लिखनेके बाद मुझे बाहर जाना पड़ा। नवसारीमें आपका तार मिला। आपका पत्र भी मिला। इस पत्रका ही उपयोग करते हुए मैंने 'हिन्दी नवजीवन 'में'लिखा है। 'यंग इंडिया' के आगामी अंकके लिए यदि मैं कुछ लिख सका तो लिखूगा। अपने शरीरका ध्यान रखना। शायद अगले सप्ताह में गिरफ्तार कर लिया जाऊँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६०७२) से। सौजन्य : हरिभाऊ उपाध्याय {{C|{{larger|'''३०५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right||२३ अप्रैल, १९३०}} चि० व्रजकृष्ण, तुम्हारा खत मिला। यहां बुलाकर मैं क्या करूं। दिल्लीके हाल मैं अच्छी तरह जानता हूं। जितना हो सके उतना किया जाय। अगर दिल्हीमें या उसके इर्द-गिर्दमे खद्दर उत्पतिका ज्यादा काम हो सके तो करो। बांसकी तकली बनाओ दूसरोंको बनानेका सिखा दो और सूतका संगठन करो और नायरसे मिलकर जो कुछ भी हो सकता है वह किया जाय। आश्रम स्थायी रखनेमें में कोई हानि देखता नहि हुँ। लेकिन हमारी प्रतिज्ञामें विश्वास है तो जानो कि आश्रम वैसे ही स्थायी वन जाता है क्यूंकी यह लड़ाई आखरीका फैसला है इसलिये स्वराज्यकी स्थापना होने तक तो वो रहता ही है और स्वराज्य मिल जानेके बाद तो सब आश्रम वैसे ही स्थायी <small>१. देखिए "सलाम अथवा देत १ २४-४-१९३०।</small><noinclude></noinclude> 9q7xn99mlngag2ai8h2a8e0rrortszq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७१ 250 197414 675467 674940 2026-08-30T19:37:21Z Kumari Arpana Sinha 2191 675467 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||धरना कैसे दें|३२७}}</noinclude>संन्यासीके नामसे विख्यात धनजी शाह, जो अब नमक- कानूनके अधीन जेल चले गये हैं, जहाँ में यह लेख लिख रहा हूँ, उस गांवमें कई वर्षोंसे काम करते रहे हैं। मैंने जो दांडीसे कराडी आनेका निर्णय किया वह एक हद तक उन्हींका खयाल करके किया था। दूसरे पारसी सज्जन हैं बहराम मेहता, एक स्नातक असहयोगी वे लोगोंके सम्मान और स्नेहके पात्र थे, इसलिए पुलिसने उन्हें ओलपाडमें गिरफ्तार कर लिया। भारतके पितामह दादाभाई नौरोजीकी चार पौत्रियोंका उल्लेख करनेकी तो कोई जरूरत ही नहीं है। वे चारों बहनें बिना किसी दिखावेके देश-कार्यमें लगी हुई हैं। ये जिस एकान्त निष्ठासे काम कर रही हैं, वह उनके उदारमना पितामहके योग्य ही है। इस काम में निःस्वार्थ भावसे मदद देनेवाले और भी बहुत-से पारसी भाइयोंके नाम में गिना सकता हूँ। इसलिए मुझे पूरी आशा है कि पारसी शराब विक्रेता अपनी बहनोंके अनुरोधको ठुकरायेंगे नहीं। नमक करकी तरह ही शराबके व्यापारका भी अन्त निश्चित है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१२. धरना कैसे दें}}}} १. किसी भी शराब अथवा विदेशी कपड़े की दुकानपर धरना देनेके लिए कमसे कम दस स्त्रियोंका होना आवश्यक है। इन दसोंको अपने में से एकको नेता चुन लेना चाहिए। २. इनको सबसे पहले तो एक शिष्टमण्डलके रूपमें विक्रेतासे मिलकर उससे अपना व्यापार बन्द करनेका अनुरोध करना चाहिए और यदि वह शरावका व्यापारीहो तो शराब से सम्बन्धित और विदेशी कपड़ोंका व्यापारी हो तो विदेशी कपड़ोंसे सम्बन्धित तथ्यों तथा आंकड़ोंसे युक्त पर्चे देने चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि पर्चे ऐसी भाषामें होने चाहिए जिसे व्यापारी समझता हो। ३. यदि व्यापारी व्यापार बन्द करने को तैयार न हो तो स्वयंसेविकाओंको दुकानमें जानेके रास्तेको छोड़कर दुकानकी चौकसी करनी चाहिए और जो लोग यहाँ शराब अथवा विदेशी कपड़े खरीदने की इच्छासे आयें उनसे व्यक्तिगत रूपसे वैसा न करनेका अनुरोध करना चाहिए। ४. स्वयंसेविकाओंको अपने हाथोंमें ऐसी प्रचार पताकाएँ अथवा गत्ते आदिके हलके प्रचार-फलक रखने चाहिए जिनपर यदि वे शराबकी दुकानपर धरना दे रही हों तो शराबके खिलाफ और विदेशी कपड़ोंकी दुकानपर धरना दे रही हों तो विदेशी कपड़ोंके खिलाफ, बड़े-बड़े अक्षरोंमें चेतावनियाँ लिखी हों। ५. यथासम्भव स्वयंसेविकाओंको वर्दी पहने हुए होना चाहिए। ६. उन्हें बीच-बीचमें अपने विषयसे सम्बन्धित उपयुक्त भजन गाते रहना चाहिए। ७. यदि पुरुष उनकी ओरसे जोर-जबरदस्ती अथवा दस्तन्दाजी करें तो उन्हें उनको रोकना चाहिए।<noinclude></noinclude> 0tc3xw5uu2c7zu83cba5g5l2c44gba9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७२ 250 197415 675500 674978 2026-08-30T21:03:17Z Kumari Arpana Sinha 2191 675500 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>८. किसी भी हालत में अश्लील भाषा, गाली-गलौज, धमकियों अथवा अशोभन भाषाका प्रयोग नहीं करना चाहिए। ९. लोगोंको अपनी बात डरा-धमकाकर या जोर-जबरदस्ती नहीं, बल्कि अनुनय-विनय और तर्कके द्वारा समझानी चाहिए। १०. जहाँ धरना दिया जा रहा हो, वहाँ पुरुषोंको किसी भी कारणसे एकत्र न होना चाहिए और न आने-जानेका रास्ता ही रोकना चाहिए। इसके विपरीत उन्हें आम तौर पर आसपास के क्षेत्रोंमें विदेशी कपड़ों और शराबके खिलाफ प्रचार करना चाहिए। उन्हें स्त्रियोंके ऐसे जलूस निकालने चाहिए और इस तरहके जलूस निकालने में मदद करनी चाहिए जो आसपासके इलाकों में घूम-घूमकर मद्य निषेध और खादीका सन्देश पहुँचायें तथा लोगोंको शराब और विदेशी कपड़ोंके त्यागकी आवश्यकता समझायें। ११. इन धरना एकांशोंके पीछे ऐसे संगठनोंका एक पूरा जाल-सा बिछा होना चाहिए जो तकली और चरखेका सन्देश फैलायें और सोच-सोचकर नये-नये पर्चे और प्रचारके नये-नये तरीके निकालें। १२. सारी आमदनी और खर्चका बिलकुल ठीक-ठीक और व्यवस्थित हिसाव रखना चाहिए। इस हिसाबको समय-समयपर लेखा परीक्षकसे जँचवा लिया जाये। यह काम भी स्त्रियोंकी देख-रेख में पुरुष ही करें। इस सारी योजनाकी अवधारणा यह मानकर की गई है कि पुरुष स्त्रियोंके प्रति सच्चे आदर भावसे काम लेंगे और उनकी उन्नतिकी सच्ची भावनासे अनुप्राणित होंगे। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१३. हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार'''}}}} यदि हम अपना कर्त्तव्य पूरा करेंगे और विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके उद्देश्य और उसकी सफलताकी शर्तोंको समझनेकी कोशिश करेंगे तो यह बहिष्कार अब सम्पन्न होने ही वाला है। नीचे मैं अपनी जो मान्यताएँ प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, ये किन तर्कों पर आधारित है, इसका विचार मैं यहाँ नहीं करूँगा। वे तर्क तो इन स्तम्भों में कई बार पेश किये जा चुके हैं। छापनेके लिए आँकड़े मैं तो तैयार करवा रहा हूँ। लेकिन इस समय तो मैं जिन लोगोंकी मेरे निष्कर्षो में रुचि हो उनके लिए अपने निष्कर्ष ही दे रहा हूँ। पक्ष-विपक्ष के सभी कारणों और दलीलोंपर निष्पक्ष भावसे विचार करनेके बाद ही मैंने ये निष्कर्ष निकाले है: <small>१. हम सम्पूर्ण बहिष्कारके जितने समयमें सम्पन्न हो जानेकी आशा रखते हैं, उतने समय में देशी मिलें अपनी क्षमता इतनी बढ़ा लेंगी कि वे बहिष्कारके परिणाम-स्वरूप होनेवाली कपड़ेकी कमीको पूरा कर पायेंगी, यह सम्भव नहीं है। <small><noinclude></noinclude> je0jan3hutem1pepvch86p0m1wgdohg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७४ 250 197417 675323 675140 2026-08-30T16:39:08Z Kumari Arpana Sinha 2191 675323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यदि मिल मालिक चाहें तो जिन मिलोंका स्वामित्व, नियन्त्रण और प्रबन्ध भारतीयोंके हाथों में है, जो बुनाईके लिए विदेशी सूतका उपयोग बिलकुल नहीं करतीं,जो खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा तैयार नहीं करेंगी, अपने कपड़ोंके लिए खादी नामका इस्तेमाल न करेंगी और न अपने कपड़ोंपर चिपकाये जानेवाले लेवलोंपर चरखेकी तसवीर ही छापेंगी तथा जो मूल्योंमें भी वृद्धि नहीं करेंगी, ऐसी मिलोंकी सूची प्रकाशित करके खादीके बलपर बहिष्कारकी योजनाको सफल बनाने में सहायता दे सकते हैं। मेरा यह निश्चित मत है कि जो लोग बहिष्कार के लिए प्रचार तो करते हैं, लेकिन इस बातपर जोर नहीं देते कि बहिष्कार करनेवाले लोगोंको खुद सूत कात-कर अथवा अन्य लोगोंको कातनेके लिए राजी करके खादी उत्पादनमें सहायता देनी चाहिए और इस प्रकार जो लोग स्वदेशीके अर्थोको पूरी तरह समझे बिना उसकी बात करते रहते हैं, वे इस आन्दोलनको यदि वास्तवमें हानि नहीं पहुँचाते तो इसकी प्रगति के मार्ग में बाधक तो जरूर होते हैं। बहिष्कार करनेवालों को अपने निश्चित मार्गसे विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही फिलहाल वे खादीकी माँग पूरी करनेमें असमर्थ ही क्यों न हों। वे यह याद रखें कि यही क्षण खादीके उत्पादनके लिए सबसे उपयुक्त है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। आवश्यकता किसी नियमको नहीं जानती, क्योंकि वह तो नये नियमोंका आविष्कार करती है। यदि लोग कातनेको कहे जानेपर विदेशी कपड़ेको त्यागनेसे इनकार कर दें तो इसपर उन्हें चिन्ता नहीं होनी चाहिए। यह संयम बहिष्कार आन्दोलनको वास्तवमें गति देगा। यह कोई थोथा सिद्धान्त नहीं है। जिस प्रकार हम स्वराज्य अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि इसलिए चाहते हैं कि हम उसके बिना जी नहीं सकते, उसी प्रकार हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार भी अंग्रेजोंको सजा देनेके लिए नहीं, बल्कि करोड़ों क्षुधार्त्त लोगोंको चरखेके द्वारा काम और इस प्रकार भोजन देनेके लिए करना है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१४. तकलीके द्वारा बहिष्कार'''}}}} डॉ० पट्टाभि सीतारमैया वर्षोंसे सहकारी बैंकिंग में दिलचस्पी रखते आये हैं और इसके सिवा वे आन्ध्रमें खादीके विशेषज्ञ हैं; अतः यह माना जा सकता है कि उन्होंने जो आंकड़े दिये हैं वे सोच-समझकर दिये हैं। उन्होंने हिसाब लगाया है कि ५० लाख चरखोंपर प्रतिदिन पांच घंटेके हिसाब से इतना सूत काता जा सकता है जिससे उस सारे विदेशी वस्त्रकी कमी पूरी की जा सकती है जिसका हमें बहिष्कार करना है। उनका विचार है कि भारतके घरोंमें पहलेसे ही इतने चरखे विद्यमान हैं। लेकिन उन चरखोंको प्रकाशमें लाने और उनपर कताई शुरू करवाने में अभी हमें थोड़ा समय लगेगा। कताईके वातावरणसे उत्पन्न होनेवाली मांगको पूरा करनेके लिए हमें जितनी। जल्दी नये चरखे बना सकने चाहिए उतनी जल्दी हम नहीं बना सकते। और फिर<noinclude></noinclude> pmokv4vjcolrpkf3k1ejs60w022et36 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७५ 250 197418 675325 675141 2026-08-30T16:48:34Z Kumari Arpana Sinha 2191 675325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||तकलीके द्वारा बहिष्कार|३३१}}</noinclude>चरखोंपर हमें पूँजी भी लगानी पड़ेगी, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। जब हम करोड़ों लोगोंका विचार करते हैं तो एक रुपया प्रति व्यक्तिके हिसाब से भी यह पूँजी करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। और हम यथासम्भव कमसे कम पूँजीसे काम करना चाहते हैं। हम ज्यादासे ज्यादा लोगोंको कमसे कम समय में कातना सिखाना चाहते हैं। ऐसा केवल तकलीके द्वारा ही हो सकता है। यदि चरखेसे प्रति घंटा औसतन ३०० गज सूत काता जा सकता है तो तकलीसे १०० गज सूत काता जा सकेगा। अतएव पचास लाख चरखोंसे जितना सूत काता जा सकता है उतना सूत तैयार करनेके लिए हमें १ करोड ५० लाख तकलियोंकी जरूरत होगी। और यदि लोग ५ घंटे न कातकर केवल १ घंटा ही कातें तो हमें ७ करोड़ ५० लाख तकलियोंकी जरूरत पड़ेगी। यह संख्या भारतकी आबादीकी एक चौथाई है। लेकिन चूंकि हममें विश्वास नहीं है इसलिए यह सुनते ही हमारा सिर घूमने लगता है कि आठ करोड़ व्यक्ति राष्ट्रके लिए प्रतिदिन एक घंटा काम कर सकते हैं। लेकिन यदि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय चेतना हो तो इसमें कोई अनोखी बात न होगी कि भारतमें रहनेवाले हर चार व्यक्तियोंमें एक व्यक्ति गुलामी से मुक्तिकी कीमत के रूपमें प्रतिदिन एक घंटा चरसेको दे। जो भी हो, कार्यकर्त्ताओंको पूरे विश्वासके साथ तकलीको हाथमें लेना चाहिए। उन्हें लोहेकी तकलीकी बात नहीं सोचनी चाहिए, जो मगनलाल गांधीने नगरके लोगोंके लिए बनाई थी। यदि आठ करोड़ लोहेकी तकलियोंकी एकदम मांग हो तो उनपर एक अच्छी रकम खर्च होगी तथा उनके बनने में भी काफी समय लगेगा। इसलिए हमें अपने मनसे लोहेकी तकलीका विचार निकाल देना चाहिए। तकलियाँ चिरे हुए बांस तथा टूटी खपरिया अथवा अधन्नेके आकार और वजनके खोटे सिक्कोंसे बनाई जा सकती है। औजारके नामपर बस एक नुकीला और तेज चाकू चाहिए। नोककी जरूरत टिकुलीमें छेद करनेके लिए है। ये रहे निर्देश: {{C|{{larger|'''तकली कैसे बनायें'''}}}} १. मंगलौर खपरे अथवा स्लेट अथवा ऐसी ही किसी चीजका एक टुकड़ा लें और उसकी पैसेके आकारकी टिकुली बना लें। टुकड़के किनारोंको धीरेसे तोड़कर और उसे किसी खुरदरी चीजपर रगड़कर, गोल बनाकर ऐसा किया जा सकता है। २. टिकुलीके बीचों-बीच एक छेद बनायें, छेद एक तरफसे तनिक बड़ा हो। ३. सात इंच लम्बा एक अच्छा सूखा चिरा हुआ बांस लें। उसे चाकूसे छीलकर गोल करें, उसकी मोटाई अन्तमें पेंसिल जितनी रह जानी चाहिए। उसका एक छोर घिसकर बुननेकी सलाई-जितना नुकीला बना लें। नुकीले छोरसे आधा इंच नीचे एक खाँचा बनायें जिसमें धागा अटकाया जा सके। ४. अब इस बाँसकी छड़को टिकुलीमें डालो। छड़ उस ओरसे डाली जाये जिस ओरका छेद तनिक बड़ा है, जिससे कि छड़के मोटे छोरका आधा इंच लम्बा हिस्सा छेदके उस ओर रह जाये।<noinclude></noinclude> 85n44er1i82wynk9mezzjb0g4yct561 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७६ 250 197419 675328 675142 2026-08-30T16:54:39Z Kumari Arpana Sinha 2191 675328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३३२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>५. तकलीकी जांच करनेके लिए उसे समतल जगहपर घुमायें। अगर यह लट्टूके समान घूमती हो तब तो यह ठीक है। अगर नहीं घूमती तो समझ लें कि या तो छेद सीधा नहीं है अथवा टिकुलीके बीचों-बीच नहीं है अथवा बाँसकी छड़की नोक एक जैसी नहीं है। तकलीके दोषका पता लगाना और उसे ठीक करना बहुत आसान है। तकलीपर लगातार एक सप्ताह तक अभ्यास करनेके बाद जो सबसे ज्यादा सूत काता गया वह प्रति घंटा ११० गज था और तकली बनाने में केवल आधा घंटा लगता है। तकली बनाना समय-व्यापनका अच्छा साधन है और कातना एक रचनात्मक मनोरंजन। यह व्यथित हृदयको शान्ति प्रदान करता है और एक मूक साथी है। चरखा गुंजन करता है और इसलिए कह सकते हैं, वह आपका ध्यान बँटाता है। तकलीमें कोई आवाज नहीं होती, यह उसकी एक खूबी है और इस तरह यह शायद करोड़ों मूक प्राणियोंका सही प्रतिनिधित्व करती है। आप भी इसे चलायें और आप भी उसी प्रसन्नताका अनुभव करेंगे जिस प्रसन्नताका अनुभव हममें से कई लोग करते हैं। कुछ भी हो, जो भी स्त्री अथवा पुरुष चरखा चलाता है वह देशकी सम्पत्ति में वृद्धि करता है और बहिष्कार आन्दोलनको गति प्रदान करता है तथा इस तरह स्वराज्यको दिन-प्रति-दिन निकट लाता है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१५. विदेशी कपड़ोंके व्यापारी'''}}}} मैंने विदेशी वस्त्र-बहिष्कारके प्रश्नके सम्बन्धमें पत्र-प्रतिनिधियोंके सम्मुख अपने विचार रख दिये हैं। व्यापारियोंमें जो घबराहट पाई जाती है उससे देशके प्रति उनके विश्वासका अभाव सूचित होता है। यदि उन्हें इस बातका पूरा यकीन है कि निकट भविष्य में स्वराज्य आनेवाला है तो वे शर्तोकी और समय दिये जानेकी माँग क्यों करते है? वे बिना किसी शर्तके आगे क्यों नहीं आते और इसे ज्यादा निश्चित क्यों नहीं बना देते? अनिश्चयकी यह स्थिति स्वराज्य के वातावरणको बल प्रदान करनेके स्थानपर कमजोर बनाती है और लोगोंके हृदयोंमें सन्देह उत्पन्न करती है। यह आन्दोलन मुख्य रूपसे विश्वासपर आधारित है। हममें ऐसा कोई मूलभूत दोष नहीं है जिससे हम स्वराज्यके अनुपयुक्त ठहरते हों। यह तो हमारा भ्रम है, जो हमें, तीस करोड़की आबादीवाले इस राष्ट्रको असहाय और अपनी क्षमताके विषयमें शंकालु बनाता है। विदेशी कपड़े व्यापारी अपनी गोलमोल बातोंके द्वारा इस भ्रमको पुष्ट न करें। उन्हें अपने-आपको इससे मुक्त करना चाहिए तथा उसे दूर करनेमें औरोंकी भी सहायता करनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें<noinclude></noinclude> 0pk9s451qmfp00w73av1bvpy0f8yzlq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७७ 250 197420 675333 675143 2026-08-30T17:00:02Z Kumari Arpana Sinha 2191 675333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सलाम अथवा बेंत?|३३३}}</noinclude>कोई शर्तें नहीं रखनी चाहिए, अपितु साहसपूर्वक यह कह देना चाहिए कि वे विदेशी कपड़ोंका व्यापार बन्द नहीं करेंगे। जो लोग कमजोर हैं और जिन्हें स्वराज्यकी प्राप्ति के बारेमें सन्देह है उन्हें मैं एक ठोस सुझाव देता हूँ। अभी जो माल आया नहीं है उसे ये न मँगवायें। यदि स्वराज्य नहीं मिलेगा और यदि वे अपने पुराने धन्धेमें वापस जाना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा करनेसे दुनियाकी कोई ताकत नहीं रोक सकेगी। उनके पास इस समय जो विदेशी माल मौजूद है उसे तबतकके लिए सन्दुकमें बन्द करके रख देना चाहिए जबतक वे उसे बाहर विदेशोंमें बेचनेकी व्यवस्था नहीं कर लेते और जो व्यापारी अपेक्षाकृत गरीब हैं उन्हें स्वराज्य सरकार पर भरोसा रखना चाहिए कि वह उनकी जितनी आवश्यक समझेगी उतनी क्षतिपूर्ति कर देगी। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे अपने पास पड़े मालकी एक तालिका बना लें और उसे ऐसे स्वयंसेवकोंसे प्रमाणित करवा लें जिन्हें ऐसा करनेका अधिकार प्राप्त हो। धनाढ्य व्यापारियोंको किसी क्षतिपूर्तिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हें जो नुकसान होगा वह राष्ट्रके प्रति किये गये उनके पापका आंशिक प्रायश्चित होगा। और अन्तमें, हालांकि यह अन्तिम सुझाव एक बुरा सुझाव है, वे लोग अपना माल सुरक्षित रखें और जब विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका यह सार्वजनिक आन्दोलन पर्याप्त समर्थनके अभाव में खत्म हो जाये अथवा बलपूर्वक उसका दमन कर दिया जाये तब अपने मालको बाहर निकालकर बेचें। किन्तु भगवान् न करे कि वर्तमान उत्साह पानीका एक बुलबुला-मात्र ही सिद्ध हो अथवा उग्र दमनके द्वारा उसे दबाना संभव हो जाये! इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आन्दोलनका चाहे जो भी परिणाम क्यों न हो, विदेशी कपड़े व्यापारियोंको स्पष्ट रूपसे यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं ये हमारे उद्देश्यके लिए हानिकारक हैं और यह कि शर्तके बिना भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया है। उनमें देशभक्तिकी इतनी भावना तो होनी चाहिए कि वे कसौटीपर खरे उतरें; उन्हें अपनी ओरसे विदेशी कपड़ेकी बिक्री बन्द कर देनी चाहिए जिससे धरना देनेकी जरूरत ही न रह जाये। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''३१६. सलाम अथवा बेंत?'''}}}} अजमेरसे श्री हरिभाऊ उपाध्याय लिखते है:१ यदि हरिभाऊजी को मिली हुई सबर सच है तो जेलमें भी सत्याग्रह करनेका काफी सामान मौजूद है। आम तौर पर कैदीका जेलरको सलाम करना ही अच्छा है। परन्तु यदि कोई सत्याग्रही सलाम न करे तो उसके साथ जबरदस्ती कभी न की <small>१. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है पत्र लेखकका कहना था कि जेलके अधिकारियोंको 'सलाम' न करने के कारण सत्याग्रही बाबा नृसिंहदासको काल कोठारीमें डाल दिया गया है और शायद उन्हें बेंत भी लगाये जायें।<small><noinclude></noinclude> 7wct3risy1p527umu3830xa1l1fo6lz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३७९ 250 197422 675335 675149 2026-08-30T17:05:29Z Kumari Arpana Sinha 2191 675335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger| '''३१८. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|११ बजे रात, २४ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेनॉल्ड्स, सिर्फ एक पंक्ति। देखना है, महादेवकी अनुपस्थितिमें अब तुम 'यंग इंडिया का कार्य भार कैसे निभाते हो? उम्मीद है, तुम स्वस्थ एवं प्रसन्न होगे। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३५ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य : स्वार्थ मोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''३१९. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|[२४ अप्रैल, १९३० के बाद]१}} तुम्हारा पत्र अभी-अभी मिला, उसी डाकसे जिस डाकसे महादेवके बारेमें समाचार मिला है। हाँ, तुम छोटेलालके साथ खादी कार्यमें लगना चाहो तो लग जाओ। बालकोबासे मुझे पत्र लिखनेको कहना। उसे दूध और फल अवश्य लेने चाहिए। मैं अन्तिम उपायपर२ विचार कर रहा हूँ, जिससे कुछ निर्णयात्मक कार्यवाही अनिवार्य हो जाये। लेकिन सब कुछ भगवान् के हाथमें है। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८५) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ५३८५ से भी। <small>१. महादेवके बारेमें समाचार' से तात्पर्य सम्भवत: २४ अप्रैलको अहमदाबादमें उनकी गिरफ्तारीसे है।<small> <small>२.लगता है 'अन्तिम उपाय से तात्पर्य धरासणाके नमक डिपोपर प्रस्तावित धरनेसे है; देखिए "पत्र: बाइसरायको" ४-५-१९३०।<small><noinclude></noinclude> qnovx7h1g947cdxrilnuxqb0ofwod5p 675336 675335 2026-08-30T17:06:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 675336 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger| '''३१८. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{Right|११ बजे रात, २४ अप्रैल, १९३०}} प्रिय रेनॉल्ड्स, सिर्फ एक पंक्ति। देखना है, महादेवकी अनुपस्थितिमें अब तुम 'यंग इंडिया का कार्य भार कैसे निभाते हो? उम्मीद है, तुम स्वस्थ एवं प्रसन्न होगे। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३५ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य : स्वार्थ मोर कालेज, फिलाडेल्फिया {{C|{{larger|'''३१९. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|[२४ अप्रैल, १९३० के बाद]१}} तुम्हारा पत्र अभी-अभी मिला, उसी डाकसे जिस डाकसे महादेवके बारेमें समाचार मिला है। हाँ, तुम छोटेलालके साथ खादी कार्यमें लगना चाहो तो लग जाओ। बालकोबासे मुझे पत्र लिखनेको कहना। उसे दूध और फल अवश्य लेने चाहिए। मैं अन्तिम उपायपर२ विचार कर रहा हूँ, जिससे कुछ निर्णयात्मक कार्यवाही अनिवार्य हो जाये। लेकिन सब कुछ भगवान् के हाथमें है। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८५) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ५३८५ से भी। <small>१. महादेवके बारेमें समाचार' से तात्पर्य सम्भवत: २४ अप्रैलको अहमदाबादमें उनकी गिरफ्तारीसे है।</small> <small>२.लगता है 'अन्तिम उपाय से तात्पर्य धरासणाके नमक डिपोपर प्रस्तावित धरनेसे है; देखिए "पत्र: बाइसरायको" ४-५-१९३०।</small><noinclude></noinclude> n6m0q73ihgdpw45w9n3mfsv1ggdtk6g पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८० 250 197423 675337 675167 2026-08-30T17:09:03Z Kumari Arpana Sinha 2191 675337 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२०. पत्र : डोरोथी डि' सूवाको'''}}}} {{Right|मुकाम कराठी}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} प्यारी बच्ची, जलूसवालों के किसी भी कामसे तुम डरो मत। वे तुमको कोई भी नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते और यदि तुम ईश्वर पर भरोसा रखती हो तो फिर तुमको किसी भी चीज या आदमीसे डरनेकी कोई जरूरत ही नहीं। फिर भी मैं जरूरतके मुताबिक कार्रवाई करूँगा। {{Right|हृदयसे तुम्हारा,}} {{Right|मो० क० गांधी}} कुमारी डोरोथी दि सूवा नं० ४७, गॉफ रोड आगरा (सं० प्रा०) अंग्रेजी (जी० एन० १३६९ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३२१. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}} {{Right|२५ अप्रैल १९३०}} प्यारे सफेद दाढ़ीवाले, लो, अब मणिबहन भी आपके पास आ रही है। उम्मीद है, उसके आगमनसे आपको, रावजीभाईको तथा अन्य लोगोंको हार्दिक प्रसन्नता होगी। खेड़ाकी स्त्रियोंमें जागृति लानेके लिए उसकी सेवाओंका बेरहमीसे प्रयोग करना। हमीदा१ ओलपाडमें अद्भुत काम कर रही है। वह अपने पिताके समान ही होनहार है। भगवान् उसका भला करे। सस्नेह, {{Right|मो० क० गां०}} अंग्रेजी (एस० एन० ९५७१ ) की फोटो नकलसे। <small>१. अम्बास तैयबजीकी पुत्री।</small><noinclude></noinclude> qf50zkgsyf2cu3rbaxokaxoyvos6l46 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८१ 250 197424 675338 675153 2026-08-30T17:15:16Z Kumari Arpana Sinha 2191 675338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२२. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|२५ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, तुम्हें मेरा आशीर्वाद तो है ही तुम्हारा लारीसे यात्रा किये बिना काम नहीं चल सकता था; फिर भी मेरी दृष्टिसे दोष तो हुआ ही है। यह दोषदर्शन वस्तुतः अन्य लोगोंके हितके लिए है, लेकिन तुम्हारे लिए भी हो तो हर्ज नहीं। मोटर जब्त होना जरूरी नहीं था। मैंने तो सोचा था कि जैसे गंगाजल कांवरमें [पैदल] लाया जाता है, तुम नमक ले जानेकी वही पद्धति अपनाओगे और मुझे यह बात पसन्द भी बहुत आई थी। मान लो कि पांच-पांच मीलपर अथवा लगभग इतनी ही दूरीपर पड़ाव रखें और हर पड़ावमें २५ व्यक्ति हो। २५ लोगोंकी टुकड़ीमें हर व्यक्ति पांच-पांच सेर लेकर निकले तो उसका मतलब होगा तीन मन, पाँच सेर नमक। वह टुकड़ी दूसरे मुकामपर नमक पहुँचा दे और वहीं रहे। वहाँकी टुकड़ी तीसरे मुकामपर पहुँचाये। दूसरी टुकड़ी वापस आये और पहली टुकड़ी धोलेरा पहुँचे। इससे तो लोगोंको बहुत कुछ तालीम मिल जाती और नमक भी अच्छी तरह पहुँचता और किसी किस्मका नुकसान भी न होता। तुमने जो किया उसमें गाड़ी जब्त होने की आशंका तो थी ही; और [नमककी] बोरी तो जब्त होती ही। फिर इसमें कुछ छिपाकर रखनेकी बात भी थी; तुम्हारी विजय भी उसमें छिपानेकी कलापर अवलम्बित थी जब कि हमारे पास इस तरह छिपाने लायक तो कोई बात होनी ही नहीं चाहिए। इस तरह छिपा रखना सामान्य युद्धकी चतुराईके अन्तर्गत आता है। यह हमारे लिए वर्जित है। फिर, बोरीमें रखे हुए नमकको कब्जे में लेने के लिए पुलिसको काफी शक्ति लगानी पड़ेगी। ऐसा हमें अकारण ही नहीं करना चाहिए। फलत: तुम्हारी इस योजनामें बहादुरी तो खूब थी, चतुराई भी थी; लेकिन उसमें शुद्ध अहिंसाका अभाव था। किन्तु आजके वातावरणमें तुम्हें यह वस्तु सूझ नहीं सकती थी। सम्भव है, मैं स्वयं भी कहीं भूल कर जाता होऊँगा। अलबत्ता, मैं एक भी कदम बिना सोचे-विचारे नहीं उठाता और प्रत्येक नया कदम उठाने के समय मुझे सोचने-विचारनेका समय मिलता है। आजकल मैं जो विचार करता हूँ वह केवल प्रार्थना रूप है। इसमें मैं बुद्धिका प्रयोग नहीं करता। केवल अपने हृदयको टटोलकर देख लेता हूँ। स्वामीने भायन्दरसे नमक ले जानेकी बात सोची थी। उसमें भी यही दोष आ जाता। धारासणा मेरी नजर में है, लेकिन मैं किसीको उसके पास भी नहीं फटकने देता। अन्ततः यदि उसपर कब्जा करनेका निश्चय किया गया तो संघ प्रकट रूपसे नोटिस देकर निकलेगा। मैंने जो कुछ लिखा है उसे पढ़कर तनिक भी पश्चात्ताप न करना, दु:ख मत मानना। मैंने तो यह इसलिए लिखा है, जिससे तुम्हें जेलमें अहिंसाका सूक्ष्म <small>१. तीर्दथयात्रियों का दल।</small> ४३-२२<noinclude></noinclude> cbilx1tm94fdydz9ponct9z3su0osgf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७६ 250 197519 675221 670047 2026-08-30T12:11:54Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675221 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />४३२ सम्पूर्ण गांधी वाड्मय</noinclude>वक्तव्यपर<ref>१. १२ मईको वाइसरायने यह घोषणा करते हुए कि गोलमेज परिषद् बुलानेके लिए आवश्यक कदम उठाये जा रहे है, कहा था कि "जिस नीतिकी घोषणा करनेका सौभाग्य मुझे गत नवम्बर महीने में प्राप्त हुआ था, उस नीतिका पालन करनेके लिए मेरी और महामहिमकी सरकारें है और देशमें होने- वाली ये दुःखद घटनाएं हमें उस संकल्पसे डिगा नहीं सकतीं। "</ref> मैं अपनी राय नहीं जाहिर करता तो मैं समझता हूँ कि मैं अपने कर्तव्य- पालनमें चूक जाऊँगा । ऐसा जान पड़ता है कि आपने इस सीधे-सादे तथ्यको नजरअन्दाज कर दिया है कि जिस क्षण जनसाधारण बहुत बड़ी तादाद में अवज्ञाका सहारा लेना शुरू करता है उस क्षणसे वह अवज्ञा अवज्ञा नहीं रह जाती। क्या आप नहीं देख रहे हैं कि ऐसे सैकड़ों लोग जेलोंमें पड़े हुए हैं जिनके बारेमें सभी जानते हैं कि वे बड़े ही शान्त प्रकृतिके हैं, उन्होंने दीर्घ कालतक सुन्दर सेवा कार्य किया है<ref>२. यहाँ मसविदेमें कुछ शब्द नहीं है।</ref> और उनकी प्रामाणिकतामें किसी प्रकारके सन्देहकी गुंजाइश नहीं है? ये कानूनका उल्लंघन करनेवाले लोग नहीं है; अंग्रेजोंके प्रति उनके मनमें कोई द्वेष भी नहीं है। और हजारों भोले-भाले ग्रामीणोंने, जिनका स्वभाव सामान्यतः कानूनका पालन करनेका ही है, इस आन्दोलनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करनेके लिए जो कुछ किया है उसे आप क्या मानेंगे? मेरे विचारसे ऐसे पुरुषों और स्त्रियोंके आन्दोलनको अराजकता कहना भाषाके साथ अत्याचार करना है। यहाँ तो वह मन्तव्य ही देखनेको नहीं मिलता जो अपराधका सार होता है। उस<ref>३. मसविदे और इस अन्तिम रूपसे संशोधित प्रतिमें एक शाब्दिक अन्तर है।</ref> मन्तव्यको तो उदात्ततम मन्तव्य ही कहा जायेगा जिससे प्रेरित होकर अब्बास तैयबजी जैसा वयोवृद्ध व्यक्ति आराम और चैनकी जिन्दगी छोड़कर जेल जीवनको स्वीकार करे।<ref>४. अब्बासी १२ मईको गिरफ्तार हुए थे।</ref> आप भारत के प्रति अपना प्रेम जतलाते हैं। आप जो कुछ जतलाते हैं, उसमें मैं विश्वास करता हूँ। लेकिन भारतके रोगका आपने जो निदान किया है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ। जिन शिकायतोंकी ओर जनताका ध्यान केन्द्रित है, उन्हें जबतक तुरन्त दूर नहीं किया जाता तबतक अच्छेसे अच्छा संविधान भी देशको शान्ति और सन्तोष नहीं दे पायेगा। नमक कर नहीं चल सकता। शराबसे होनेवाली सरकारी आयको समाप्त होना ही है। विदेशी वस्त्रोंका आयात, जिसके कारण ग्राम्य जीवन पंगु हो गया है, बन्द होना ही चाहिए। इन विषयोंमें जनताकी भावना कितनी तीव्रbहै, इसकी ओर क्या आपने ध्यान नहीं दिया ? या कि आप ऐसा मानते हैं कि इस आन्दोलनमें जो लाखों स्त्री-पुरुष हिस्सा ले रहे हैं वे सब दुष्ट हैं, या गुमराह अथवा मूर्ख है और अंग्रेज अधिकारी हो इस बात के सबसे योग्य निर्णायक है कि भारतके लिए क्या अच्छा है ? अगर मेरा अन्दाजा गलत न हो तो चाहे जितना<ref>५. पढ़ा मसवि और अन्तिम रूपसे संशोधित प्रति किंचित् शाब्दिक अन्तर है।</ref> कठोर दमन किया जाये, आप देखेंगे कि जनतापर उसका कोई असर नहीं हो रहा है। आप करोड़ों लोगोंको Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> bcftl3q7qc9b7ccags8r0djwlv3fyr7 675222 675221 2026-08-30T12:12:49Z अंजली राजभर 4516 675222 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४३२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>वक्तव्यपर<ref>१. १२ मईको वाइसरायने यह घोषणा करते हुए कि गोलमेज परिषद् बुलानेके लिए आवश्यक कदम उठाये जा रहे है, कहा था कि "जिस नीतिकी घोषणा करनेका सौभाग्य मुझे गत नवम्बर महीने में प्राप्त हुआ था, उस नीतिका पालन करनेके लिए मेरी और महामहिमकी सरकारें है और देशमें होने- वाली ये दुःखद घटनाएं हमें उस संकल्पसे डिगा नहीं सकतीं। "</ref> मैं अपनी राय नहीं जाहिर करता तो मैं समझता हूँ कि मैं अपने कर्तव्य- पालनमें चूक जाऊँगा । ऐसा जान पड़ता है कि आपने इस सीधे-सादे तथ्यको नजरअन्दाज कर दिया है कि जिस क्षण जनसाधारण बहुत बड़ी तादाद में अवज्ञाका सहारा लेना शुरू करता है उस क्षणसे वह अवज्ञा अवज्ञा नहीं रह जाती। क्या आप नहीं देख रहे हैं कि ऐसे सैकड़ों लोग जेलोंमें पड़े हुए हैं जिनके बारेमें सभी जानते हैं कि वे बड़े ही शान्त प्रकृतिके हैं, उन्होंने दीर्घ कालतक सुन्दर सेवा कार्य किया है<ref>२. यहाँ मसविदेमें कुछ शब्द नहीं है।</ref> और उनकी प्रामाणिकतामें किसी प्रकारके सन्देहकी गुंजाइश नहीं है? ये कानूनका उल्लंघन करनेवाले लोग नहीं है; अंग्रेजोंके प्रति उनके मनमें कोई द्वेष भी नहीं है। और हजारों भोले-भाले ग्रामीणोंने, जिनका स्वभाव सामान्यतः कानूनका पालन करनेका ही है, इस आन्दोलनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करनेके लिए जो कुछ किया है उसे आप क्या मानेंगे? मेरे विचारसे ऐसे पुरुषों और स्त्रियोंके आन्दोलनको अराजकता कहना भाषाके साथ अत्याचार करना है। यहाँ तो वह मन्तव्य ही देखनेको नहीं मिलता जो अपराधका सार होता है। उस<ref>३. मसविदे और इस अन्तिम रूपसे संशोधित प्रतिमें एक शाब्दिक अन्तर है।</ref> मन्तव्यको तो उदात्ततम मन्तव्य ही कहा जायेगा जिससे प्रेरित होकर अब्बास तैयबजी जैसा वयोवृद्ध व्यक्ति आराम और चैनकी जिन्दगी छोड़कर जेल जीवनको स्वीकार करे।<ref>४. अब्बासी १२ मईको गिरफ्तार हुए थे।</ref> आप भारत के प्रति अपना प्रेम जतलाते हैं। आप जो कुछ जतलाते हैं, उसमें मैं विश्वास करता हूँ। लेकिन भारतके रोगका आपने जो निदान किया है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ। जिन शिकायतोंकी ओर जनताका ध्यान केन्द्रित है, उन्हें जबतक तुरन्त दूर नहीं किया जाता तबतक अच्छेसे अच्छा संविधान भी देशको शान्ति और सन्तोष नहीं दे पायेगा। नमक कर नहीं चल सकता। शराबसे होनेवाली सरकारी आयको समाप्त होना ही है। विदेशी वस्त्रोंका आयात, जिसके कारण ग्राम्य जीवन पंगु हो गया है, बन्द होना ही चाहिए। इन विषयोंमें जनताकी भावना कितनी तीव्रbहै, इसकी ओर क्या आपने ध्यान नहीं दिया ? या कि आप ऐसा मानते हैं कि इस आन्दोलनमें जो लाखों स्त्री-पुरुष हिस्सा ले रहे हैं वे सब दुष्ट हैं, या गुमराह अथवा मूर्ख है और अंग्रेज अधिकारी हो इस बात के सबसे योग्य निर्णायक है कि भारतके लिए क्या अच्छा है ? अगर मेरा अन्दाजा गलत न हो तो चाहे जितना<ref>५. पढ़ा मसवि और अन्तिम रूपसे संशोधित प्रति किंचित् शाब्दिक अन्तर है।</ref> कठोर दमन किया जाये, आप देखेंगे कि जनतापर उसका कोई असर नहीं हो रहा है। आप करोड़ों लोगोंको Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 5kb101c39t5vkw2edsej3orazyk9z17 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७७ 250 197520 675228 670048 2026-08-30T12:29:24Z अंजली राजभर 4516 /* अशोधित */ 675228 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र मीराबहनको|४३३}}</noinclude>जबरदस्ती गुलाम बनाकर नहीं रख पायेंगे। भारतको इंग्लैंडके हित साधनके लिए खपते नहीं रहना है। उसे खुद अपने लिए जीना चाहिए, ताकि वह संसारकी प्रगति- में अपना योगदान दे सके। एक गुलाम राष्ट्रके रूपमें वह दुनियापर बोझ बना हुआ है, क्योंकि वह जो जिन्दगी जी रहा है वह झूठी है। इसलिए जबतक आप स्थितिको हमारे दृष्टिकोणसे नहीं देखते और बलप्रयोगको छोड़कर केवल तर्कबुद्धि द्वारा कायल कराकर काम करवानेका तरीका नहीं अपनाते तबतक गोलमेज परिषद् कुछ बननेवाला नहीं है। और जहाँतक अन्तिम माँगोंके आग्रहका प्रश्न है उस सम्बन्ध में तो वे लोग भी कांग्रेसियोंके ही साथ हैं जिन्हें आप अपने साथ समझते हैं। {{Right|आपका सच्चा मित्र,<br> मो० क० गांधी}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]}} बॉम्बे सीक्रेट ऍन्स्ट्रैक्ट्स, ७५० (३४) तथा एस० एन० १९९७२ से भी । {{C|{{larger|'''४१६. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|१८ मई, १९३०}} {{Left'''बोबारा नहीं पढ़ा'''<br> चि० मीरा,}} मेरा पिछले मौनवारका पत्र<ref>१. देखिए "पत्र मीराबहनको १२-५-१९३० ।</ref> तो तुम्हें मिल ही गया होगा। लगता है, उसे शुक्रवारसे पहले डाकमें नहीं डाला जा सका। यह शायद जल्दी जायेगा। आज रवि-वार है और अभी रातके ८ बज चुके हैं। मैं आम तौरपर रविवारको ३ बजे दिनसे ही मौन धारण कर लेता हूँ । यहाँके मेरे जीवनके बारेमें तो तुम्हें आश्रमवासियोंके नाम लिखे सामान्य पत्रसे मालूम हो जायेगा। अब मैं दूनेसे भी ज्यादा सूत कातने लगा हूँ। ४०० तार चरखे पर कातता हूँ और ५५ से ६० तार तकलीपर सारे सूतको अच्छी तरह नम कर दिया जाता है और उसे ठीकसे बन्द करके रखा जाता है। चरखेके सूतके ७५-७५ तारोंकी ५ लच्छियाँ रोज तैयार करके रखी जाती हैं और तकलीपर कते लगभग १६० तारोंकी एक लच्छी प्रतिदिन रखी जाती है। यह जाननेकी उत्सुकता है कि यह सूत कितना मजबूत होता है। इस सारे कामपर प्रतिदिन ६ घंटे देने पड़ते हैं। मगर इतना समय देना भी मुझे खलता नहीं। मैं इस बार ज्यादा अध्ययन नहीं करता और न पिछली बार की तरह यहाँ बहुत सारी पुस्तकें ही इकट्ठी करना चाहता हूँ बने तो मैं कताईके काममें ही पूर्णता प्राप्त करना चाहूँगा। कुछ ही दिनोंमें मुझे धुनाई भी करनी पड़ेगी। अभी १० दिनोंके लायक पूनियाँ मेरे पास हैं। एन० को लिखे पत्र में ये सब बातें नहीं बताई है। ४३-२८ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> bboxwntju35pq1x4xou27040a0jroxx 675229 675228 2026-08-30T12:30:54Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 675229 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||पत्र मीराबहनको|४३३}}</noinclude>जबरदस्ती गुलाम बनाकर नहीं रख पायेंगे। भारतको इंग्लैंडके हित साधनके लिए खपते नहीं रहना है। उसे खुद अपने लिए जीना चाहिए, ताकि वह संसारकी प्रगति- में अपना योगदान दे सके। एक गुलाम राष्ट्रके रूपमें वह दुनियापर बोझ बना हुआ है, क्योंकि वह जो जिन्दगी जी रहा है वह झूठी है। इसलिए जबतक आप स्थितिको हमारे दृष्टिकोणसे नहीं देखते और बलप्रयोगको छोड़कर केवल तर्कबुद्धि द्वारा कायल कराकर काम करवानेका तरीका नहीं अपनाते तबतक गोलमेज परिषद् कुछ बननेवाला नहीं है। और जहाँतक अन्तिम माँगोंके आग्रहका प्रश्न है उस सम्बन्ध में तो वे लोग भी कांग्रेसियोंके ही साथ हैं जिन्हें आप अपने साथ समझते हैं। {{Right|आपका सच्चा मित्र,<br> मो० क० गांधी}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]}} बॉम्बे सीक्रेट ऍन्स्ट्रैक्ट्स, ७५० (३४) तथा एस० एन० १९९७२ से भी । {{C|{{larger|'''४१६. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|१८ मई, १९३०}} {{Left|'''बोबारा नहीं पढ़ा'''<br> चि० मीरा,}} मेरा पिछले मौनवारका पत्र<ref>१. देखिए "पत्र मीराबहनको १२-५-१९३० ।</ref> तो तुम्हें मिल ही गया होगा। लगता है, उसे शुक्रवारसे पहले डाकमें नहीं डाला जा सका। यह शायद जल्दी जायेगा। आज रवि-वार है और अभी रातके ८ बज चुके हैं। मैं आम तौरपर रविवारको ३ बजे दिनसे ही मौन धारण कर लेता हूँ । यहाँके मेरे जीवनके बारेमें तो तुम्हें आश्रमवासियोंके नाम लिखे सामान्य पत्रसे मालूम हो जायेगा। अब मैं दूनेसे भी ज्यादा सूत कातने लगा हूँ। ४०० तार चरखे पर कातता हूँ और ५५ से ६० तार तकलीपर सारे सूतको अच्छी तरह नम कर दिया जाता है और उसे ठीकसे बन्द करके रखा जाता है। चरखेके सूतके ७५-७५ तारोंकी ५ लच्छियाँ रोज तैयार करके रखी जाती हैं और तकलीपर कते लगभग १६० तारोंकी एक लच्छी प्रतिदिन रखी जाती है। यह जाननेकी उत्सुकता है कि यह सूत कितना मजबूत होता है। इस सारे कामपर प्रतिदिन ६ घंटे देने पड़ते हैं। मगर इतना समय देना भी मुझे खलता नहीं। मैं इस बार ज्यादा अध्ययन नहीं करता और न पिछली बार की तरह यहाँ बहुत सारी पुस्तकें ही इकट्ठी करना चाहता हूँ बने तो मैं कताईके काममें ही पूर्णता प्राप्त करना चाहूँगा। कुछ ही दिनोंमें मुझे धुनाई भी करनी पड़ेगी। अभी १० दिनोंके लायक पूनियाँ मेरे पास हैं। एन० को लिखे पत्र में ये सब बातें नहीं बताई है। ४३-२८ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> inb7vqi03hm69eaw7jduzzm4zzlwxs2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८७ 250 197530 675367 675081 2026-08-30T17:38:20Z Manikantkmr 5554 675367 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४२६. पत्र : सरलादेवीको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय बहन, आपके भेजे फल मुझे मिल गये। मुझसे कहा गया है कि मैं आपको लिख दूँ कि अब आगेसे आप फल न भेजें। मुझे जितने भी फलोंकी जरूरत होती है यहाँसे मिल जाते हैं। आम और संतरे जेलरको खानेके लिए दे दिये जाते हैं। जब चारों तरफ आग लगी हो तब मैं मजेमें आम कैसे खा सकता हूँ? दो या चार दिन मैंने संतरे लिये, फिर छोड़ दिया। मुझे उनकी जरूरत महसूस नहीं होती। जरूरत महसूस होनेपर निश्चय ही मैं लेने लगूंगा। फल भेजने के पीछे जो प्रेम-भाव है, उसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। आशा है सभी बच्चे भले-चंगे होंगे। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७४ । {{C|{{larger|'''४२७. पत्र : चन्द्रशंकर शुक्लको२'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२५ मई, १९३०}} प्रिय चन्द्रशंकर, जेल सुपरिटेंडेंटने तुम्हारा पत्र मुझे दिखा दिया है। फिलहाल मैं कोई भी पुस्तक नहीं मँगाऊँगा। यहाँ जो पुस्तकें मौजूद हैं, वे भी यों ही पड़ी हैं। अवकाश का सारा समय कताई और पिजाईमें खप जाता है। थोड़ा समय पढ़ने में लगाता हूँ। आशा है, तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक होगा। यदि न हो तो उसे सुधारो। [जुदाईकी] पीड़ा तो अब तुम भूल चुके होगे। काकासे मुलाकात होती होगी। कमलनयन कहाँ है? वहाँ हो तो पत्र लिखनेको कहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७३। <small>१ व २. ये अंग्रेज़ीमें अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> mox4ryqjwsi6m1g84tkh4lswkb917w2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८९ 250 197532 675370 675083 2026-08-30T17:39:05Z Manikantkmr 5554 675370 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र : जानकीदेवी बजाजको|४४५}}</noinclude>बाहरका विचार बहुत कम आता है। काममें विचारको अवकाश नहीं है। 'गीता' के मध्यविन्दु पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता हूँ। इससे शान्ति रहती है। नहीं तो समाचार-पत्रोंसे सब कुछ जाननेके बाद शान्ति बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। दोनों समय प्रार्थना और 'गीता' का पाठ मेरे लिए एक बहुत बड़ा आधार है। कृष्णन् नायर, सूरजभान और जयन्तीप्रकाशकी क्या कोई खबर है? सतीश बाबू कैसे हैं? तुम जिन-जिनको पत्र लिखो उन्हें लिख देना कि पत्र प्रकाशित नहीं किये जाने चाहिए। हाँ, मित्र मण्डलको अवश्य पढ़वा सकते हैं। जमनाकी तबीयत कैसी है? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४३०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय जानकीबहन, कैसी हो? आशा है, तुम्हारा साहस नहीं छूटा होगा। मदालसा कैसी है? कमलनयनके बारेमें चिन्ता मत करो। क्या विनोबाके गीता-प्रवचन सुनकर तुम इतना भी नहीं समझ पाई कि हमें किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७५ ॥ <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> mwmj3w4147zmqlexqr229g92zeyixky 675372 675370 2026-08-30T17:39:32Z Manikantkmr 5554 675372 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र : जानकीदेवी बजाजको|४४५}}</noinclude>बाहरका विचार बहुत कम आता है। काममें विचारको अवकाश नहीं है। 'गीता' के मध्यविन्दु पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता हूँ। इससे शान्ति रहती है। नहीं तो समाचार-पत्रोंसे सब कुछ जाननेके बाद शान्ति बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। दोनों समय प्रार्थना और 'गीता' का पाठ मेरे लिए एक बहुत बड़ा आधार है। कृष्णन् नायर, सूरजभान और जयन्तीप्रकाशकी क्या कोई खबर है? सतीश बाबू कैसे हैं? तुम जिन-जिनको पत्र लिखो उन्हें लिख देना कि पत्र प्रकाशित नहीं किये जाने चाहिए। हाँ, मित्र मण्डलको अवश्य पढ़वा सकते हैं। जमनाकी तबीयत कैसी है? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४३०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय जानकीबहन, कैसी हो? आशा है, तुम्हारा साहस नहीं छूटा होगा। मदालसा कैसी है? कमलनयनके बारेमें चिन्ता मत करो। क्या विनोबाके गीता-प्रवचन सुनकर तुम इतना भी नहीं समझ पाई कि हमें किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७५ ॥ <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> 2pz46ma26givjou09enafklyqzkuoj1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९० 250 197533 675374 675087 2026-08-30T17:40:28Z Manikantkmr 5554 675374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३१. पत्र : जमनाबहन गांधीको १'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय जमनाबहन, यह पत्र तुमसे यह कहनेके लिए लिख रहा हूँ कि मेरे बारेमें किसी भी बहनको चिन्तित नहीं होना चाहिए। मैं रोज ही तुम सबकी याद कर लेता हूँ। मेरे नाम एक पत्र लिखवाकर उसे आश्रमके जरिये भिजवा दो। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ {{C|{{larger|'''४३२. पत्र : निर्मला गांधीको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय निमु, बा ने बतलाया है कि तुम और तुम्हारी माताजी दोनों आश्रम में लौट आई है। यह अच्छा हुआ। लेकिन तुम्हारी कब्जकी शिकायत अब कैसी है? क्या तुम बहादुर नहीं? सावित्री५ कैसी है? उसे इसी नामसे बुलाते हैं या किसी दूसरे नामसे? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७६। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है, उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>४. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small> <small>५. निर्मला गांधीकी कन्या 'सुमित्रा के स्थानपर यह शायद भूलसे लिखा गया है।</small><noinclude></noinclude> 2y3cn8uv0tdvagyy1u6w2oyspc4jiep पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९१ 250 197534 675377 675088 2026-08-30T17:41:48Z Manikantkmr 5554 675377 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३३. पत्र : राधा गांधीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय राधा, तुम्हारा पत्र मुझे मिला नहीं यह डाकमें ही होगा। तुमने यदि मुझे अबतक कोई पत्र न लिखा हो, तो अब लिखना और सारे समाचार देना। रुखी कहाँ है? कैसी है? बड़ी जल्दी में हूँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७८। {{C|{{larger|'''४३४. पत्र : मंत्री गिरिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]४}} प्रिय मैत्री, कुछ समझदारी आई तुझमें? अपने पिताका नाम ऊँचा करो। कृष्णमैयादेवी कैसी है? मुझे पत्र लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधार पर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> 8n71qcltbkid8c1go175ri9ryf28wav पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९२ 250 197535 675379 675102 2026-08-30T17:42:50Z Manikantkmr 5554 675379 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३५. पत्र : गंगाबहन झवेरीको१'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय गंगाबहन झवेरी, तुम और नानीबहन सकुशल होगी। क्या अब तुम अकेली रह सकती हो? अँधेरा बढ़ चुका है, इसलिए मैं अधिक कुछ नहीं लिखूंगा {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ । {{C|{{larger|'''४३६. पत्र : गोमती मशरूवालाको२'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय गोमती, मैंने सुना है कि किशोरलालका स्वास्थ्य अच्छा है। विस्तारसे लिखो। तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? तारी कहाँ है? यहीं हो तो उससे मुझे पत्र लिखनेको कहना। नाथू कहाँ है? क्या वह आश्रम जाता है? वहां कौन-कौनसी बहनें हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ । <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. सामन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगायागया है।</small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> jhgm96pyu0el2e71izx9wagydzc3k8c 675382 675379 2026-08-30T17:43:28Z Manikantkmr 5554 675382 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३५. पत्र : गंगाबहन झवेरीको१'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]२}} प्रिय गंगाबहन झवेरी, तुम और नानीबहन सकुशल होगी। क्या अब तुम अकेली रह सकती हो? अँधेरा बढ़ चुका है, इसलिए मैं अधिक कुछ नहीं लिखूंगा {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ । {{C|{{larger|'''४३६. पत्र : गोमती मशरूवालाको२'''}}}} {{Right|परवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय गोमती, मैंने सुना है कि किशोरलालका स्वास्थ्य अच्छा है। विस्तारसे लिखो। तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? तारी कहाँ है? यहीं हो तो उससे मुझे पत्र लिखनेको कहना। नाथू कहाँ है? क्या वह आश्रम जाता है? वहां कौन-कौनसी बहनें हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ । <small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. सामन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगायागया है।</small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> r7ar2hffiplpor58pgo60a64oe8crfe पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९३ 250 197536 675385 675110 2026-08-30T17:44:44Z Manikantkmr 5554 675385 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३७. पत्र : मोतीबहनको १'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय मोतीबहन, ३ बा ने बतलाया कि तुम उदास रहती हो। ऐसा क्यों? 'गीता' का पाठ करनेवालेको उदासी घेर ही नहीं सकती। नित्य प्रति ईश्वरका ध्यान करने और उसे अपने हृदयमें प्रतिष्ठित माननेवाला कोई व्यक्ति उदास हो ही कैसे सकता है? उदासीको मार भगाओ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|'''४३८. पत्र : डा० प्राणजीवनदास मेहताको४'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय प्राणजीवन भाई, जेलमें अकसर आपकी याद आती रही है। आप भले-चंगे तो होंगे ही। मेरे बारेमें चिन्तित न हों। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ । <Small>१. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</Small> <Small>२. साधनसूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममे रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</Small> <Small>३. मथुरादास पुरुषोत्तमकी पत्नी।</Small> <Small>४. अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</Small> ४३-२९<noinclude></noinclude> jxn0t50y18w4rvaagxyymi2y283arlb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९४ 250 197537 675386 675118 2026-08-30T17:45:57Z Manikantkmr 5554 675386 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. पत्र : रतिलाल मेहताको१'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय रतिलाल, चम्पाके किरायेका तुमने क्या किया? तुम क्या काम करते हो? क्या तुम बापूको२ पत्र लिखते हो? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४०. पत्र: मणिबहन परीखको३'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मणिबहन, नरहरि आखिर जेल पहुँच ही गया। उसने मार भी खाई है। वह दूना भाग्यशाली निकला। क्या तुम पूर्णतः साहसी बनी हुई हो? अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७७ <small> १. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. रतिलालके पिता डा० प्राणजीवन मेहता।</small> <small>३. यह अंग्रेजीसे अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small><noinclude></noinclude> nlnsxkjnvhmi2jir4vdjdrljruvxsiu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९५ 250 197538 675388 675206 2026-08-30T17:46:58Z Manikantkmr 5554 675388 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४१. पत्र : मीठूबहन पेटिटको१'''}}}} {{Right|यरबडा मन्दिर}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मीठूबहन, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६। {{C|{{larger|'''४४२. पत्र : अमीना कुरैशीको२'''}}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय अमीना, इमाम साहब आखिर जेल-महलमें पहुँच ही गये। शायद कुरैशी भी [जेल] चला गया हो। क्या तुम्हारी सेहत ठीक है? जापेके लिए क्या इंतजाम किया गया है? बच्चे कैसे हैं? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७८। <small>१ व २. ये अंग्रेजी अनूदित पत्रके अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> gt6awkotgy1buzckpakgdzus9av4fns पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९६ 250 197539 675393 675214 2026-08-30T17:49:41Z Manikantkmr 5554 675393 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४३. पत्र : शान्ताको१'''}}}} {{Right|मौनवार[२६ मई, १९३०]२}} प्रिय शान्ता, कैसी हो, मन अब बिलकुल शान्त तो है न ? हो सकता है कि डाकमें तुम्हारा कोई पत्र हो, जो मुझे न मिल पाया हो। तुमने यदि कोई पत्र लिखा ही न हो तो अब लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४४. पत्र : सोनामणिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय सोनामणि, तुम दोनों बहनें कैसी हो? हिन्दी अच्छी तरह सीख ली है? सारे समाचार देना। [अंग्रेजी से] {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६ ॥ <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small> <small>३. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> ag4josdmj93jffef1fh1qf4q9eodm0x 675395 675393 2026-08-30T17:50:23Z Manikantkmr 5554 675395 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४३. पत्र : शान्ताको१'''}}}} {{Right|मौनवार[२६ मई, १९३०]२}} प्रिय शान्ता, कैसी हो, मन अब बिलकुल शान्त तो है न ? हो सकता है कि डाकमें तुम्हारा कोई पत्र हो, जो मुझे न मिल पाया हो। तुमने यदि कोई पत्र लिखा ही न हो तो अब लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग ३, पृष्ठ ५७८ । {{C|{{larger|'''४४४. पत्र : सोनामणिको३'''}}}} {{Right|मौनवार [२६ मई, १९३०]४}} प्रिय सोनामणि, तुम दोनों बहनें कैसी हो? हिन्दी अच्छी तरह सीख ली है? सारे समाचार देना। [अंग्रेजी से] {{Right|बापूके आशीर्वाद}} '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७६। <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small> <small>३. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>४. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> ko1cibitwh8943pmg35aqssyp1lttm0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९७ 250 197540 675397 675213 2026-08-30T17:52:22Z Manikantkmr 5554 675397 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude> {{C|{{larger|'''४४५. पत्र : कलावती त्रिवेदीको१'''}}}} {{Right|मौनवार [ २६ मई, १९३०]२}} प्रिय कलावती, तुम्हारे पत्रका इंतजार है। इन दिनों तुम्हारी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या कर रही हो? मुझे अपना सारा हाल लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५। {{C|{{larger|'''४४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ३'''}}}} {{Right|[२६ मई, १९३०] ४}} प्रिय गंगाबहन (बड़ी), बारहवाँ और तेरहवां अध्याय पढ़ते समय मुझे तुम्हारी याद आई। अपेक्षाकृत छोटे-से बारहवें अध्यायके अनुवादके शीर्ष पर मैंने लिख दिया है कि यह सब लोगों को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए यदि संस्कृतमें नहीं तो कमसे कम गुजरातीमें अवश्य कर लेना चाहिए। गुजरातीमें उसे समझना आसान है। उसमें बतलाये गये भक्ति मार्गको समझ लेनेके बाद जाननेके लिए कुछ रह ही नहीं जाता। निस्सन्देह तुमने पत्र लिखा होगा, लेकिन अबतक वह मेरे पास नहीं पहुँचा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ ५७५ <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small> <small>३. पद अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है।</small> <small>४. साधन-सूत्रमें इस शीर्षकको जिस क्रममें लगाया गया है।</small> <small>५. अनासक्तियोगके; देखिए खण्ड ४१ मूल पत्र उपलब्ध नहीं है। रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान</small><noinclude></noinclude> orh7usnwn9rg78k069lzhierfz63i0w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४९८ 250 197541 675219 670069 2026-08-30T12:08:55Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675219 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४७. पत्र : पी० जी० मैथ्यूको''' }}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मैथ्यू, तुम्हारा पत्र पाकर मुझे खुशी हुई। यदि तुममें धैर्य है तो भगवान् तुम्हें प्रकाश और शान्ति देगा। {{Right|बापू}} अंग्रेजी (जी० एन० १५५२ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''४४८. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२७ मई, १९३०}} प्रिय श्री क्विन,१ क्या आप दो पौंड दाख और एक पौंड किशमिशका आर्डर देने और लिखनेके लिए कुछ सादा कागज या साधारण पैड भेजने की कृपा करेंगे? {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग २, पृष्ठ २४० । <small>२. परवडा सदर जेके सुपरिंटेंडेंट।<small><noinclude></noinclude> hgkl30uppd8h2ijz9g0iku22n2wk22k 675220 675219 2026-08-30T12:09:36Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675220 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४७. पत्र : पी० जी० मैथ्यूको''' }}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मैथ्यू, तुम्हारा पत्र पाकर मुझे खुशी हुई। यदि तुममें धैर्य है तो भगवान् तुम्हें प्रकाश और शान्ति देगा। {{Right|बापू}} अंग्रेजी (जी० एन० १५५२ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''४४८. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२७ मई, १९३०}} प्रिय श्री क्विन,१ क्या आप दो पौंड दाख और एक पौंड किशमिशका आर्डर देने और लिखनेके लिए कुछ सादा कागज या साधारण पैड भेजने की कृपा करेंगे? {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग २, पृष्ठ २४० । <small>२. परवडा सदर जेके सुपरिंटेंडेंट।<small><noinclude></noinclude> mn9btuewgjdrs3ldxik1hk2ijdwkrhj 675399 675220 2026-08-30T17:53:16Z Manikantkmr 5554 675399 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४४७. पत्र : पी० जी० मैथ्यूको''' }}}} {{Right|२६ मई, १९३०}} प्रिय मैथ्यू, तुम्हारा पत्र पाकर मुझे खुशी हुई। यदि तुममें धैर्य है तो भगवान् तुम्हें प्रकाश और शान्ति देगा। {{Right|बापू}} अंग्रेजी (जी० एन० १५५२ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''४४८. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२७ मई, १९३०}} प्रिय श्री क्विन,१ क्या आप दो पौंड 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'''महात्मा गांधी: सोसं मंटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|४५०. पत्र : ई० ई० डायलको}}}} {{Right|यरवडा सदर जल}} {{Right|३० मई, १९३०}} प्रिय मेजर डायल, आज चार व्यक्ति मुझसे मिलने आये। इनमें एक तो थीं श्रीमती कैप्टेन और दूसरे श्री रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्स। शेष दो थे कुमारी स्लेड (मीराबाई) और श्री मथुरादास त्रिकमजी । इनमें से अन्तिम दो को मुझसे मिलनेकी इजाजत दी गई। लेकिन चूंकि पहले दो व्यक्तियोंको सुपरिटेंडेंट मिलनेकी अनुमति न दे पाये, इसलिए मैंने इन दोनोंसे भी मिलनेसे इनकार कर दिया। आपको याद होगा कि हम दोनोंके बीच हुई पहली ही बातचीत में मैंने आपसे साफ कह दिया था कि मैं अपने रक्त सम्बन्धियों और अन्य लोगों में कोई फर्क नहीं करता और यह कि अगर सरकार यह चाहती हैं कि मैं अपने रक्त सम्बन्धियोंसे मिलूं तो उसे मेरे दृष्टिकोणको स्वीकार करना चाहिए और मुझे अन्य लोगोंसे भी, जो श्रीमती कैप्टेन और श्री रेनॉल्ड्सकी तरह मेरे लिए रक्त-सम्बन्धियोंके ही समान हैं, मिलनेकी छूट देनी चाहिए। मैंने यह समझा था कि <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद 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एक तो थीं श्रीमती कैप्टेन और दूसरे श्री रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्स। शेष दो थे कुमारी स्लेड (मीराबाई) और श्री मथुरादास त्रिकमजी । इनमें से अन्तिम दो को मुझसे मिलनेकी इजाजत दी गई। लेकिन चूंकि पहले दो व्यक्तियोंको सुपरिटेंडेंट मिलनेकी अनुमति न दे पाये, इसलिए मैंने इन दोनोंसे भी मिलनेसे इनकार कर दिया। आपको याद होगा कि हम दोनोंके बीच हुई पहली ही बातचीत में मैंने आपसे साफ कह दिया था कि मैं अपने रक्त सम्बन्धियों और अन्य लोगों में कोई फर्क नहीं करता और यह कि अगर सरकार यह चाहती हैं कि मैं अपने रक्त सम्बन्धियोंसे मिलूं तो उसे मेरे दृष्टिकोणको स्वीकार करना चाहिए और मुझे अन्य लोगोंसे भी, जो श्रीमती कैप्टेन और श्री रेनॉल्ड्सकी तरह मेरे लिए रक्त-सम्बन्धियोंके ही समान हैं, मिलनेकी छूट देनी चाहिए। मैंने यह समझा था कि <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।<small> <small>२. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।<small><noinclude></noinclude> n8111l79u0rmmd8vkm0ez82w8tlgdwm 675409 675278 2026-08-30T18:03:17Z Manikantkmr 5554 675409 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{Larger|'''४४९. पत्र : मोहनलाल भट्टको१'''}}}} {{Right|मंगलवार [२७ मई, १९३०]२}} प्रिय भाई मोहनलाल, सचमुच तुम काफी अच्छा कर रहे हो। 'गीता' [के अनुवाद] में दो भूलें मिली हैं। मैं उनको फिरसे लिख लूँगा । 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर' और 'मॉडर्न रिव्यू' मुझे भेजो। दोनों हमारे पास आते थे। यदि न आये हों तो कृपया मैसर्स नटराजन् और रामानन्द बाबूको लिख दीजिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी: सोसं मंटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ ५७७। {{C|{{larger|४५०. पत्र : ई० ई० डायलको}}}} {{Right|यरवडा सदर जल}} {{Right|३० मई, १९३०}} प्रिय मेजर डायल, आज चार व्यक्ति मुझसे मिलने आये। इनमें एक तो थीं श्रीमती कैप्टेन और दूसरे श्री रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्स। शेष दो थे कुमारी स्लेड (मीराबाई) और श्री मथुरादास त्रिकमजी । इनमें से अन्तिम दो को मुझसे मिलनेकी इजाजत दी गई। लेकिन चूंकि पहले दो व्यक्तियोंको सुपरिटेंडेंट मिलनेकी अनुमति न दे पाये, इसलिए मैंने इन दोनोंसे भी मिलनेसे इनकार कर दिया। आपको याद होगा कि हम दोनोंके बीच हुई पहली ही बातचीत में मैंने आपसे साफ कह दिया था कि मैं अपने रक्त सम्बन्धियों और अन्य लोगों में कोई फर्क नहीं करता और यह कि अगर सरकार यह चाहती हैं कि मैं अपने रक्त सम्बन्धियोंसे मिलूं तो उसे मेरे दृष्टिकोणको स्वीकार करना चाहिए और मुझे अन्य लोगोंसे भी, जो श्रीमती कैप्टेन और श्री रेनॉल्ड्सकी तरह मेरे लिए रक्त-सम्बन्धियोंके ही समान हैं, मिलनेकी छूट देनी चाहिए। मैंने यह समझा था कि <small>१. यह अंग्रेजीमें अनूदित पत्रका अनुवाद है। मूल पत्र उपलब्ध नहीं है।</small> <small>२. साधन-सूत्र में इस शीर्षकको जिस क्रममें रखा गया है उसके आधारपर तिथिका अनुमान लगाया गया है।</small><noinclude></noinclude> jgj05y8p7m237aq8rarop19dnix015s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०० 250 197543 675234 670071 2026-08-30T12:40:28Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675234 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>आपने मेरी बात मान ली है। लेकिन हो सकता है, मैंने गलत समझा हो। मैं किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहता। मैं अपने लिए कोई विशेष सुविधा नहीं चाहता। मैं तो सिर्फ यही चाहता हूँ कि आप मेरी स्थितिको समझें और सरकारको मेरा दृष्टिकोण मालूम हो जाये, फिर वह उसे भले ही स्वीकार न करे। अगर मैं अन्य लोगों नहीं मिल सकता तो मुझे अपने रिश्तेदारोंसे भी नहीं मिलना चाहिए। मेरा यह दृष्टिकोण मेरे लिए कोई नया नहीं है। १९२२ में भी मैंने यही दृष्टिकोण अपनाया था। उस समय मुझे उन लोगोंसे मिलने में कोई कठिनाई नहीं हुई थी जो मेरे रिश्तेदार नहीं थे। यह कहनेकी तो जरूरत ही नहीं है कि यह बात मेरे ध्यानमें है कि मुझे मुलाकातियोंसे न तो कोई राजनीतिक सन्देश प्राप्त करना चाहिए और न उनके द्वारा भेजना चाहिए। मेरे साप्ताहिक पत्र भी अधरमें लटके हुए हैं। ये पत्र भी मैंने हमारे बीच हुए समझौते के मुताबिक ही लिखे और इस समझौतेको मैंने जिस रूपमें समझा वह यह था कि आश्रमवासी मित्रोंके नाम एक लिफाफेमें भेजे सभी गैर-राजनीतिक पत्रोंको१ एक ही पत्र माना जायेगा। यदि इन दोनों मामलों में आप स्थितिको स्पष्ट करते हुए जल्दी ही सूचना भेज दें तो कृपा होगी। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] बॉम्बे सीक्रेट ऐक्स्ट्रैक्ट्स, ७५० (५) ए, पृष्ठ ६५ तथा एस० एन० १९९७३ से भी । {{C|{{larger|'''४५१. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|४ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, अधिक से अधिक आधा घंटेके लिए ही सही, यदि आप किसी जेलर इन्स्पेक्टरको भेज दें तो कृपा होगी। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २४१ । <small>१. यहाँ बॉम्बे सीकेट एक्स्ट्रेक्ट समें 'अफेयर्स' (मामले) शब्द आया है, लेकिन एस० एन० १९९७३ में उपलब्ध मसविदेमें प्रयुक्त 'लेटर्स' शब्दके अनुसार अनुवाद किया गया है।<small><noinclude></noinclude> m8qx597zzmbe1ci2dly8pamr43dmctc 675281 675234 2026-08-30T14:54:26Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675281 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>आपने मेरी बात मान ली है। लेकिन हो सकता है, मैंने गलत समझा हो। मैं किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहता। मैं अपने 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सरकार सप्ताह में दो बार मेरे सात रमत-सम्बन्धियोंको मुझसे मिलने देगी और अन्य लोग सरकारकी विशेष अनुमति लेकर ही मुझसे मिल सकते हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि मेरी पत्नीको, जो मेरी रक्त सम्बन्धी नहीं है, और इसलिए उसके भाइयों तथा अन्य सम्बन्धियोंको मुझसे मिलनेके लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ेगी। मुझे विश्वास है कि यह एक शब्द-सम्बन्धी चूक-भर है। लेकिन स्पष्ट ही अधिकारियोंका मन्या यह है कि जिन लोगोंका मुझसे खूनका रिश्ता नहीं है अथवा जिनकी विवाहादिके सूत्रसे मुझसे कोई रिश्तेदारी नहीं है, वे मुझसे सरकारकी अनुमति लेकर ही मिल सकते हैं और इसका एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई स्लेड हैं। यदि इस निर्णयको बदला नहीं जाता तो मुझे लगता है कि मुझे अपने किसी भी रिश्तेदारसे न मिलना चाहिए। आश्रममें तथा आश्रमसे बाहर ऐसी अनेक विधवाएँ, लड़कियों, लड़के और आदमी हैं जो मेरे लिए शायद रिश्तेदारोंसे भी बढ़कर हैं। यदि ये लोग मुझसे उसी प्रकार नहीं मिल सकते जिस प्रकार मेरे रिश्तेदार मिल सकते हैं तो इनके साथ न्याय करनेके लिए मुझे अपने रिश्तेदारोंसे भी कतई नहीं मिलना चाहिए। यद्यपि अब एक पखवाड़ा बीत गया है, लेकिन मुझे इस सम्बन्धमें कोई जानकारी नहीं मिल पाई है कि आश्रमसे यहाँ जो पत्र आये और जो पत्र मैंने आश्रमको लिखे उनका क्या हुआ। आपने मुझे बताया था कि उन्हें ' आपने आई० जी० के पास भेज दिया है। एक बात और है। मुझे मालूम हुआ है कि यहाँ मेरा कोई साथी हो, इस लिए श्रीयुत कालेलकरको यहां लाया जा रहा है। वे मेरे एक सम्मानित सहकार्यकर्त्ता <small>१. पत्र जेल सुपरिटेंडेंट आर० वी० मार्टिनको १२ तारीखको मिला था।<small> <small>२. एस० एन० १९९७४ में इस पत्रका जो मसविदा उपलब्ध है उसमें "एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई ४" वे शब्द नहीं है।<small> <small>३. गांधीजी को दी जानेवाली सुविधाओं के सम्बन्धमें गृह सचिवने १७ जून को जेलोंके इंस्पेक्टर जनरलको लिखा कि...मुझसे ऐसा सूचित करने को कहा गया है कि 'रक्त सम्बन्धी' के स्थानपर 'सम्बन्धी' शब्द लिखा जाये स्पष्ट ही श्री गांधी की पत्नी या उनके साले और ऐसे ही अन्य लोगोंको इस सुविधासे वंचित रखनेका मंशा नहीं था। मुझे यह भी सूचित करनेका निर्देश दिया गया है कि अगर श्री गांधी अपने सम्बनियों से मिलने से इनकार करें तो एक ही रास्ता रह जाता है कि ऐसे सम्बन्धियोंको भी अजनवी मानकर मुलाकातोंका नियमन तदनुसार किया जाये।..."<small> <small>४. यहाँ मसवि 'ब' (दोनों) शब्द आया है।<small><noinclude></noinclude> p4wd9jennjmjifc1psqcdw162qcris1 675239 675237 2026-08-30T12:53:38Z Manikantkmr 5554 675239 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५२. पत्र : आर० वी० मार्टिनको'''}}}} {{Right|यरवडा सदर जेल}} {{Right|११ जून, १९३०१}} प्रिय मेजर मार्टिन, आपने मुझे बताया है कि सरकार सप्ताह में दो बार मेरे सात रमत-सम्बन्धियोंको मुझसे मिलने देगी और अन्य लोग सरकारकी विशेष अनुमति लेकर ही मुझसे मिल सकते हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि मेरी पत्नीको, जो मेरी रक्त सम्बन्धी नहीं है, और इसलिए उसके भाइयों तथा अन्य सम्बन्धियोंको मुझसे मिलनेके लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ेगी। मुझे विश्वास है कि यह एक शब्द-सम्बन्धी चूक-भर है। लेकिन स्पष्ट ही अधिकारियोंका मन्या यह है कि जिन लोगोंका मुझसे खूनका रिश्ता नहीं है अथवा जिनकी विवाहादिके सूत्रसे मुझसे कोई रिश्तेदारी नहीं है, वे मुझसे सरकारकी अनुमति लेकर ही मिल सकते हैं और इसका एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई स्लेड हैं। यदि इस निर्णयको बदला नहीं जाता तो मुझे लगता है कि मुझे अपने किसी भी रिश्तेदारसे न मिलना चाहिए। आश्रममें तथा आश्रमसे बाहर ऐसी अनेक विधवाएँ, लड़कियों, लड़के और आदमी हैं जो मेरे लिए शायद रिश्तेदारोंसे भी बढ़कर हैं। यदि ये लोग मुझसे उसी प्रकार नहीं मिल सकते जिस प्रकार मेरे रिश्तेदार मिल सकते हैं तो इनके साथ न्याय करनेके लिए मुझे अपने रिश्तेदारोंसे भी कतई नहीं मिलना चाहिए। यद्यपि अब एक पखवाड़ा बीत गया है, लेकिन मुझे इस सम्बन्धमें कोई जानकारी नहीं मिल पाई है कि आश्रमसे यहाँ जो पत्र आये और जो पत्र मैंने आश्रमको लिखे उनका क्या हुआ। आपने मुझे बताया था कि उन्हें ' आपने आई० जी० के पास भेज दिया है। एक बात और है। मुझे मालूम हुआ है कि यहाँ मेरा कोई साथी हो, इस लिए श्रीयुत कालेलकरको यहां लाया जा रहा है। वे मेरे एक सम्मानित सहकार्यकर्त्ता <small>१. पत्र जेल सुपरिटेंडेंट आर० वी० मार्टिनको १२ तारीखको मिला था।<small> <small>२. एस० एन० १९९७४ में इस पत्रका जो मसविदा उपलब्ध है उसमें "एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई ४" वे शब्द नहीं है।<small> <small>३. गांधीजी को दी जानेवाली सुविधाओं के सम्बन्धमें गृह सचिवने १७ जून को जेलोंके इंस्पेक्टर जनरलको लिखा कि...मुझसे ऐसा सूचित करने को कहा गया है कि 'रक्त सम्बन्धी' के स्थानपर 'सम्बन्धी' शब्द लिखा जाये स्पष्ट ही श्री गांधी की पत्नी या उनके साले और ऐसे ही अन्य लोगोंको इस सुविधासे वंचित रखनेका मंशा नहीं था। मुझे यह भी सूचित करनेका निर्देश दिया गया है कि अगर श्री गांधी अपने सम्बनियों से मिलने से इनकार करें तो एक ही रास्ता रह जाता है कि ऐसे सम्बन्धियोंको भी अजनवी मानकर मुलाकातोंका नियमन तदनुसार किया जाये।..."<small> <small>४. यहाँ मसविदे'बोय' (दोनों) शब्द आया है।<small><noinclude></noinclude> 94yk911ry4pho79qnfr2una0h3zjc2x 675285 675239 2026-08-30T14:58:49Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५२. पत्र : आर० वी० मार्टिनको'''}}}} {{Right|यरवडा सदर जेल}} {{Right|११ जून, १९३० १}} प्रिय मेजर मार्टिन, आपने मुझे बताया है कि सरकार सप्ताह में दो बार मेरे सात रक्त-सम्बन्धियोंको मुझसे मिलने देगी और अन्य लोग सरकारकी विशेष अनुमति लेकर ही मुझसे मिल सकते हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि मेरी पत्नीको, जो मेरी रक्त सम्बन्धी नहीं है, और इसलिए उसके भाइयों तथा अन्य सम्बन्धियोंको मुझसे मिलनेके लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ेगी। मुझे विश्वास है कि यह एक शब्द-सम्बन्धी चूक-भर है। लेकिन स्पष्ट ही अधिकारियोंका मन्शा यह है कि जिन लोगोंका मुझसे खूनका रिश्ता नहीं है अथवा जिनकी विवाहादिके सूत्रसे मुझसे कोई रिश्तेदारी नहीं है, वे मुझसे सरकारकी अनुमति लेकर ही मिल सकते हैं और इसका एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई स्लेड हैं।२ यदि इस निर्णयको बदला नहीं जाता तो मुझे लगता है कि मुझे अपने किसी भी रिश्तेदारसे न मिलना चाहिए। आश्रममें तथा आश्रमसे बाहर ऐसी अनेक विधवाएँ, लड़कियों, लड़के और आदमी हैं जो मेरे लिए शायद रिश्तेदारोंसे भी बढ़कर हैं। यदि ये लोग मुझसे उसी प्रकार नहीं मिल सकते जिस प्रकार मेरे रिश्तेदार मिल सकते हैं तो इनके साथ न्याय करनेके लिए मुझे अपने रिश्तेदारोंसे भी कतई नहीं मिलना चाहिए।३ यद्यपि अब एक पखवाड़ा बीत गया है, लेकिन मुझे इस सम्बन्धमें कोई जानकारी नहीं मिल पाई है कि आश्रमसे यहाँ जो पत्र आये और जो पत्र मैंने आश्रमको लिखे उनका क्या हुआ। आपने मुझे बताया था कि उन्हें४ आपने आई० जी० के पास भेज दिया है। एक बात और है। मुझे मालूम हुआ है कि यहाँ मेरा कोई साथी हो, इस लिए श्रीयुत कालेलकरको यहां लाया जा रहा है। वे मेरे एक सम्मानित सहकार्यकर्त्ता <small>१. पत्र जेल सुपरिटेंडेंट आर० वी० मार्टिनको १२ तारीखको मिला था।<small> <small>२. एस० एन० १९९७४ में इस पत्रका जो मसविदा उपलब्ध है उसमें "एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई ४" वे शब्द नहीं है।<small> <small>३. गांधीजी को दी जानेवाली सुविधाओं के सम्बन्धमें गृह सचिवने १७ जून को जेलोंके इंस्पेक्टर जनरलको लिखा कि...मुझसे ऐसा सूचित करने को कहा गया है कि 'रक्त सम्बन्धी' के स्थानपर 'सम्बन्धी' शब्द लिखा जाये स्पष्ट ही श्री गांधी की पत्नी या उनके साले और ऐसे ही अन्य लोगोंको इस सुविधासे वंचित रखनेका मंशा नहीं था। मुझे यह भी सूचित करनेका निर्देश दिया गया है कि अगर श्री गांधी अपने सम्बनियों से मिलने से इनकार करें तो एक ही रास्ता रह जाता है कि ऐसे सम्बन्धियोंको भी अजनवी मानकर मुलाकातोंका नियमन तदनुसार किया जाये।..."<small> <small>४. यहाँ मसविदे'बोय' (दोनों) शब्द आया है।<small><noinclude></noinclude> iyq0ngfs2myiq4qjtqkrokdahvxp468 675413 675285 2026-08-30T18:05:05Z Manikantkmr 5554 675413 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५२. पत्र : आर० वी० मार्टिनको'''}}}} {{Right|यरवडा सदर जेल}} {{Right|११ जून, १९३० १}} प्रिय मेजर मार्टिन, आपने मुझे बताया है कि सरकार सप्ताह में दो बार मेरे सात रक्त-सम्बन्धियोंको मुझसे मिलने देगी और अन्य लोग सरकारकी विशेष अनुमति लेकर ही मुझसे मिल सकते हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि मेरी पत्नीको, जो मेरी रक्त सम्बन्धी नहीं है, और इसलिए उसके भाइयों तथा अन्य सम्बन्धियोंको मुझसे मिलनेके लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ेगी। मुझे विश्वास है कि यह एक शब्द-सम्बन्धी चूक-भर है। लेकिन स्पष्ट ही अधिकारियोंका मन्शा यह है कि जिन लोगोंका मुझसे खूनका रिश्ता नहीं है अथवा जिनकी विवाहादिके सूत्रसे मुझसे कोई रिश्तेदारी नहीं है, वे मुझसे सरकारकी अनुमति लेकर ही मिल सकते हैं और इसका एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई स्लेड हैं।२ यदि इस निर्णयको बदला नहीं जाता तो मुझे लगता है कि मुझे अपने किसी भी रिश्तेदारसे न मिलना चाहिए। आश्रममें तथा आश्रमसे बाहर ऐसी अनेक विधवाएँ, लड़कियों, लड़के और आदमी हैं जो मेरे लिए शायद रिश्तेदारोंसे भी बढ़कर हैं। यदि ये लोग मुझसे उसी प्रकार नहीं मिल सकते जिस प्रकार मेरे रिश्तेदार मिल सकते हैं तो इनके साथ न्याय करनेके लिए मुझे अपने रिश्तेदारोंसे भी कतई नहीं मिलना चाहिए।३ यद्यपि अब एक पखवाड़ा बीत गया है, लेकिन मुझे इस सम्बन्धमें कोई जानकारी नहीं मिल पाई है कि आश्रमसे यहाँ जो पत्र आये और जो पत्र मैंने आश्रमको लिखे उनका क्या हुआ। आपने मुझे बताया था कि उन्हें४ आपने आई० जी० के पास भेज दिया है। एक बात और है। मुझे मालूम हुआ है कि यहाँ मेरा कोई साथी हो, इस लिए श्रीयुत कालेलकरको यहां लाया जा रहा है। वे मेरे एक सम्मानित सहकार्यकर्त्ता <small>१. पत्र जेल सुपरिटेंडेंट आर० वी० मार्टिनको १२ तारीखको मिला था।</small> <small>२. एस० एन० १९९७४ में इस पत्रका जो मसविदा उपलब्ध है उसमें "एकमात्र अपवाद श्रीमती मीराबाई ४" वे शब्द नहीं है।</small> <small>३. गांधीजी को दी जानेवाली सुविधाओं के सम्बन्धमें गृह सचिवने १७ जून को जेलोंके इंस्पेक्टर जनरलको लिखा कि...मुझसे ऐसा सूचित करने को कहा गया है कि 'रक्त सम्बन्धी' के स्थानपर 'सम्बन्धी' शब्द लिखा जाये स्पष्ट ही श्री गांधी की पत्नी या उनके साले और ऐसे ही अन्य लोगोंको इस सुविधासे वंचित रखनेका मंशा नहीं था। मुझे यह भी सूचित करनेका निर्देश दिया गया है कि अगर श्री गांधी अपने सम्बनियों से मिलने से इनकार करें तो एक ही रास्ता रह जाता है कि ऐसे सम्बन्धियोंको भी अजनवी मानकर मुलाकातोंका नियमन तदनुसार किया जाये।..."</small> <small>४. यहाँ मसविदे'बोय' (दोनों) शब्द आया है।</small><noinclude></noinclude> hd7ii74y9rxidqqhvy9hfynpxfxdmyq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०२ 250 197545 675240 670073 2026-08-30T13:00:53Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675240 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हैं, लेकिन अगर आप लोगोंको मेरी किसी बातसे ऐसा लगा हो कि मेरा साथ देनेके लिए उन्हें यहाँ लाया जाये तो मुझे इस बातका खेद है। मैं नहीं चाहूँगा कि वे साबरमती जेल में जिन अनेक साथियोंके साथ रखे गये हैं, उनसे अलग करके उन्हें यहाँ इसलिए लाया जाये कि वे मेरे इस एकाकीपनके सहभागी बनें। अगर उन्हें अन्य सत्याग्रही कैदियोंके साथ बेरोक-टोक मिलने-जुलने की सुविधा दी जाये तो मुझे उनका साहचर्य प्राप्त करके प्रसन्नता होगी, लेकिन उनको नुकसानमें रखकर उनके साहचर्यका सुख पानेकी मेरी कोई इच्छा नहीं है। स्वभावतः मैं जो चाहूँगा वह यही कि इस जेलके अपने सभी सत्याग्रही मित्रोंसे मिल-जुल सकूं। और मैंने अक्सर आपसे जो बात कही है, उसीको फिर दोहराता हूँ मैं अपने लिए कोई विशेष सुविधा नहीं चाहता। लेकिन, अगर किसी साधारण कैदीको संयोगसे उसके जो साथी उसी जेलमें हों जिसमें वह है, उनके साहचर्य की सुविधा दी जा सकती है तो मेरे लिए भी मनमें ऐसी इच्छा रखना शायद अनुचित न होगा। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९३१६) की फोटो नकलसे; तथा एस० एन० १९९७४ से भी {{C|{{larger|४५३. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [१६ जून, १९३० या उसके पूर्व ]१}} चि० प्रेमा, ऐसा लगता है, तुम्हारे पत्रको जेल अधिकारियोंने ही रोक लिया है। मुझे विश्वास है, उसमें ऐसा कुछ नहीं होगा जिसको लेकर आपत्ति की जा सके, लेकिन क्या किया जाये? यदि सारे पत्र मुझे मिल जायें तो जेलका कोई अर्थ ही न रहे। फिर लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७६) की फोटो नकलसे। सौजन्य : प्रेमावहन कंटक <small>२. बापुना पत्रो-५ः कु० प्रेमान कंटकने नामक पुस्तकमें ऐसा कहा गया है कि शायद पद पत्र १२ से लेकर २३ जूनके बीच किसी दिन लिखा गया होगा।<small><noinclude></noinclude> k9drsr5ns8y4aalcozs7i5srgagg0q9 675241 675240 2026-08-30T13:01:48Z Manikantkmr 5554 675241 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हैं, लेकिन अगर आप लोगोंको मेरी किसी बातसे ऐसा लगा हो कि मेरा साथ देनेके लिए उन्हें यहाँ लाया जाये तो मुझे इस बातका खेद है। मैं नहीं चाहूँगा कि वे साबरमती जेल में जिन अनेक साथियोंके साथ रखे गये हैं, उनसे अलग करके उन्हें यहाँ इसलिए लाया जाये कि वे मेरे इस एकाकीपनके सहभागी बनें। अगर उन्हें अन्य सत्याग्रही कैदियोंके साथ बेरोक-टोक मिलने-जुलने की सुविधा दी जाये तो मुझे उनका साहचर्य प्राप्त करके प्रसन्नता होगी, लेकिन उनको नुकसानमें रखकर उनके साहचर्यका सुख पानेकी मेरी कोई इच्छा नहीं है। स्वभावतः मैं जो चाहूँगा वह यही कि इस जेलके अपने सभी सत्याग्रही मित्रोंसे मिल-जुल सकूं। और मैंने अक्सर आपसे जो बात कही है, उसीको फिर दोहराता हूँ मैं अपने लिए कोई विशेष सुविधा नहीं चाहता। लेकिन, अगर किसी साधारण कैदीको संयोगसे उसके जो साथी उसी जेलमें हों जिसमें वह है, उनके साहचर्य की सुविधा दी जा सकती है तो मेरे लिए भी मनमें ऐसी इच्छा रखना शायद अनुचित न होगा। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९३१६) की फोटो नकलसे; तथा एस० एन० १९९७४ से भी {{C|{{larger|'''४५३. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|मौनवार [१६ जून, १९३० या उसके पूर्व ]१}} चि० प्रेमा, ऐसा लगता है, तुम्हारे पत्रको जेल अधिकारियोंने ही रोक लिया है। मुझे विश्वास है, उसमें ऐसा कुछ नहीं होगा जिसको लेकर आपत्ति की जा सके, लेकिन क्या किया जाये? यदि सारे पत्र मुझे मिल जायें तो जेलका कोई अर्थ ही न रहे। फिर लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७६) की फोटो नकलसे। सौजन्य : प्रेमावहन कंटक <small>१. बापुना पत्रो-५ः कु० प्रेमान कंटकने नामक पुस्तकमें 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43.pdf/५०३ 250 197546 675243 670074 2026-08-30T13:08:35Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675243 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५४. पत्र : रामानन्द चटर्जीको'''}}}} {{Right|यरवडा सदर जेल}} {{Right|१८ जून १९३०}} प्रिय रामानन्द बाबू, आपका २५ मईका पत्र मुझे अभी तीन दिन पहले दिया गया। इसमें आपने जो कुछ लिखा है, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कविवर राजचन्द्र पर लिखा मेरा छोटा-सा लेख आपके हाथोंमें सुरक्षित पहुँच गया। मैं चिन्तामें था कि पता नहीं, वह आपको मिला या नहीं। मुझे अन्य पत्रिकाओंके अलावा 'मॉडर्न रिव्यू' मँगानेकी भी छूट दी गई है। क्या आप मई अंकसे लेकर आगे तककी उसकी प्रतियाँ भेज सकेंगे? कुछ दिन पहले मैंने 'यंग इंडिया' कार्यालयसे यह पत्रिका भेजने को कहा था, लेकिन पता नहीं, मुझे अबतक प्रतियाँ क्यों नहीं मिल पाई है। मैंने खुद नहीं लिखा था। आशा है, जल्दी ही 'यंग इंडिया' में आपका कोई लेख देखनेको मिलेगा। पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदीसे मेरा नमस्कार कहें। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} श्रीयुत रामानन्द चटर्जी १२०-२, अपर सर्कुलर रोड कलकत्ता अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९३१४) से । सौजन्य : सीतादेवी <small>१. देखिए " महान् तवदर्शी, १८-३-१९३०।<small><noinclude></noinclude> b22v6hip0h9wingg8jls17q5pd2s1vj 675288 675243 2026-08-30T15:02:49Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675288 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५४. पत्र : रामानन्द चटर्जीको'''}}}} {{Right|यरवडा सदर जेल}} {{Right|१८ जून १९३०}} प्रिय रामानन्द बाबू, आपका २५ मईका पत्र मुझे अभी तीन दिन पहले दिया गया। इसमें आपने जो कुछ लिखा है, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कविवर राजचन्द्र पर लिखा मेरा छोटा-सा लेख आपके हाथोंमें सुरक्षित पहुँच गया। मैं चिन्तामें था कि पता नहीं, वह आपको मिला या नहीं। मुझे अन्य पत्रिकाओंके अलावा 'मॉडर्न रिव्यू' मँगानेकी भी छूट दी गई है। क्या आप मई अंकसे लेकर आगे तककी उसकी प्रतियाँ भेज सकेंगे? कुछ दिन पहले मैंने 'यंग इंडिया' कार्यालयसे यह पत्रिका भेजने को कहा था, लेकिन पता 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बाद फिर आश्रम के पत्र लिखनेको कलम उठा रहा हूँ। मुझे मालूम हो गया था कि जो पत्र मैंने तुम्हारे पास भेजे थे और इसी तरह जो पत्र आश्रमसे मेरे पास भेजे गये थे वे रोक लिये गये हैं। ऐसी सूरतमें मैं लिखना नहीं चाहता था। अब रास्ता काफी साफ हो गया दीखता है, यद्यपि मुझे सारे साप्ताहिक पत्र अभीतक नहीं मिले हैं और मुझे पता है कि कुछ रोक लिये गये हैं। वे बच्चोंके लिखे पत्र हैं। मैं उन्हें प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहा हूँ। कभी-कभी तो मुझे यह महसूस कराया ही जाना चाहिए कि यह जेल जीवन है। जबतक मौजूदा कठिनाई दूर नहीं हो जाती, तबतक मैं किसीसे मुलाकात करने- को तैयार नहीं हूँ। अगर सम्मानपूर्ण शर्तोंपर मुलाकातें नहीं हो सकतीं, तो हमें पत्र लिखकर ही सन्तोष कर लेना चाहिए, बशर्ते कि पत्र-व्यवहार भी इज्जतके साथ जारी रखा जा सके। इसलिए अगर तुम्हें मेरे पत्र नियमित रूपसे न मिलें, तो समझ लो कि में कैदी हूँ अगर मैं सचमुच बीमार हुआ तो दीवारें बोल उठेंगी। पिछली बारकी तरह खुद अधिकारी ही घोषणा कर देंगे; और जब कभी तुम्हें अफवाहें सुनाई दें, तुम उनसे हमेशा पूछताछ कर सकती हो और मुझे आशा है कि वे तुम्हें Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 93gl7pcovfu24holtau67m6wxxlrig3 675246 675244 2026-08-30T13:16:46Z Manikantkmr 5554 675246 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५५. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|१८ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, कृपया इन चीजोंके लिए आर्डर दे दीजिए: दास दो पौंड खजूर दो पौंड {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २६६ । {{C|{{larger|'''४५६. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|२२ जून, १९३०}} चि० मीरा, कई सप्ताह बाद फिर आश्रम के पत्र लिखनेको कलम उठा रहा हूँ। मुझे मालूम हो गया था कि जो पत्र मैंने तुम्हारे पास भेजे थे और इसी तरह जो पत्र आश्रमसे मेरे पास भेजे गये थे वे रोक लिये गये हैं। ऐसी सूरतमें मैं लिखना नहीं चाहता था। अब रास्ता काफी साफ हो गया दीखता है, यद्यपि मुझे सारे साप्ताहिक पत्र अभीतक नहीं मिले हैं और मुझे पता है कि कुछ रोक लिये गये हैं। वे बच्चोंके लिखे पत्र हैं। मैं उन्हें प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहा हूँ। कभी-कभी तो मुझे यह महसूस कराया ही जाना चाहिए कि यह जेल जीवन है। जबतक मौजूदा कठिनाई दूर नहीं हो जाती, तबतक मैं किसीसे मुलाकात करनेको तैयार नहीं हूँ। अगर सम्मानपूर्ण शर्तोंपर मुलाकातें नहीं हो सकतीं, तो हमें पत्र लिखकर ही सन्तोष कर लेना चाहिए, बशर्ते कि पत्र-व्यवहार भी इज्जतके साथ जारी रखा जा सके। इसलिए अगर तुम्हें मेरे पत्र नियमित रूपसे न मिलें, तो समझ लो कि में कैदी हूँ अगर मैं सचमुच बीमार हुआ तो दीवारें बोल उठेंगी। पिछली बारकी तरह खुद अधिकारी ही घोषणा कर देंगे; और जब कभी तुम्हें अफवाहें सुनाई दें, तुम उनसे हमेशा पूछताछ कर सकती हो और मुझे आशा है कि वे तुम्हें<noinclude></noinclude> 0mnai222y4z5qkterd7gsgqubjnrfjh 675290 675246 2026-08-30T15:06:06Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675290 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४५५. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|१८ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, कृपया इन चीजोंके लिए आर्डर दे दीजिए: दाख दो पौंड खजूर दो पौंड {{Right|हृदयसे आपका}} 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जितनी रुई थी, सब पींज ली है। अभीतक जरा भी खराब नहीं हुई है। मैंने नीमके पत्ते इस्तेमाल नहीं किये। उसके बदले इमली से मिलते-जुलते किसी और ही पेड़के पत्ते काममें लाता हूँ। वे ठीक काम दे रहे हैं। पूना आनेवाले किसी भी आदमीके हाथ तुम दो पौंड रुई भेज सकती हो। बहुत जल्दी नहीं है। मेरे पास कमसे कम १५ जुलाईतक चलने लायक पूनियाँ हैं। तबतक मुझे धुनकीको छूने की जरूरत नहीं है। जब मुझे जरूरत होगी तो तुम्हारे सुझावोंके अनुसार धुनकीको ठीकसे जमा लूंगा। तकुए पर गिर्रीको ठीक तरह लगाने के बारेमें भी मैं समझ गया हूँ। लेकिन यहाँ भी प्रकृतिने मुझपर कृपा की है। मैंने गिरींको अपने ही ढंगसे लगा लिया और वह बिलकुल स्थिर हो गई है। अगर गड़बड़ हुई तो तुम्हारा नुस्खा आजमाऊँगा। तुमने अपने कामके बारेमें जो कुछ लिखा है, वह सब मेरे ध्यानमें है। तुम्हें ईश्वर जैसा रास्ता बताये अपनी शक्तिके अनुसार वैसा ही करो। भगवान् तुम्हारा कल्याण करे और बातें सामान्य पत्रसे जान लेना। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९८) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३२ से भी। {{C|{{larger|'''४५७. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२२ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, (१) क्या आप दो पौंड खजूर के लिए आर्डर देनेकी कृपा करेंगे? (२) मेरे साथीको कल सब्जियाँ और नमक नहीं मिला। (३) उनको कमोड पॉट अभीतक नहीं दिया गया; ढाँचा उनके पास है। (४) उनके अपने वर्तन-भांडे, चार्ट इत्यादि अबतक उनको लौटाये नहीं गये हैं। मुझे उनके लिए इसलिए लिखना पड़ रहा है कि उनको मेरी खातिर ही यहाँ लाया गया है। इसलिए उनकी असुविधा मुझे अपनी ही असुविधा महसूस होती है। इस प्रकार मैं बिलकुल स्वार्थवश ही उनके बारेमें लिख रहा हूँ।<noinclude></noinclude> ixsrnjbacxei1tm97405ietxvy8zfko 675251 675250 2026-08-30T13:27:37Z Manikantkmr 5554 675251 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र:मीराबहनको|४६१}}</noinclude>फौरन जानकारी दे देंगे। लेकिन में उम्मीद रखता हूँ कि जहाँतक पत्र लिखनेका सम्बन्ध है, स्थिति ठीक ही रहेगी। अभी तो मामूली कब्जके सिवा मेरे स्वास्थ्य में कोई खराबी नहीं है। किसी भी तरह की चिन्ताका कोई कारण नहीं है। सबसे हाल में तुम्हारा ९ तारीखका पत्र मिला है। उसके बाद कोई पत्र नहीं मिला। धुनकीके बारेमें तुमने जो सुझाव दिये हैं, वे बहुत अच्छे और काफी हैं। फिर भी मैंने उसे उलटा लटका रखा है और वह भली-भांति काम कर रही है। खुद धुनकीको लेकर कोई कठिनाई नहीं हुई। मेरे पास जितनी रुई थी, सब पींज ली है। अभीतक जरा भी खराब नहीं हुई है। मैंने नीमके पत्ते इस्तेमाल नहीं किये। उसके बदले इमली से मिलते-जुलते किसी और ही पेड़के पत्ते काममें लाता हूँ। वे ठीक काम दे रहे हैं। पूना आनेवाले किसी भी आदमीके हाथ तुम दो पौंड रुई भेज सकती हो। बहुत जल्दी नहीं है। मेरे पास कमसे कम १५ जुलाईतक चलने लायक पूनियाँ हैं। तबतक मुझे धुनकीको छूने की जरूरत नहीं है। जब मुझे जरूरत होगी तो तुम्हारे सुझावोंके अनुसार धुनकीको ठीकसे जमा लूंगा। तकुए पर गिर्रीको ठीक तरह लगाने के बारेमें भी मैं समझ गया हूँ। लेकिन यहाँ भी प्रकृतिने मुझपर कृपा की है। मैंने गिरींको अपने ही ढंगसे लगा लिया और वह बिलकुल स्थिर हो गई है। अगर गड़बड़ हुई तो तुम्हारा नुस्खा आजमाऊँगा। तुमने अपने कामके बारेमें जो कुछ लिखा है, वह सब मेरे ध्यानमें है। तुम्हें ईश्वर जैसा रास्ता बताये अपनी शक्तिके अनुसार वैसा ही करो। भगवान् तुम्हारा कल्याण करे और बातें सामान्य पत्रसे जान लेना। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९८) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३२ से भी। {{C|{{larger|'''४५७. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२२ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, (१) क्या आप दो पौंड खजूर के लिए आर्डर देनेकी कृपा करेंगे? (२) मेरे साथीको कल सब्जियाँ और नमक नहीं मिला। (३) उनको कमोड पॉट अभीतक नहीं दिया गया; ढाँचा उनके पास है। (४) उनके अपने वर्तन-भांडे, चार्ट इत्यादि अबतक उनको लौटाये नहीं गये हैं। मुझे उनके लिए इसलिए लिखना पड़ रहा है कि उनको मेरी खातिर ही यहाँ लाया गया है। इसलिए उनकी असुविधा मुझे अपनी ही असुविधा महसूस होती है। इस प्रकार मैं बिलकुल स्वार्थवश ही उनके बारेमें लिख रहा हूँ।<noinclude></noinclude> mmf1u67z41sp2b03y7cd4fhb29jzdqq 675252 675251 2026-08-30T13:28:24Z Manikantkmr 5554 675252 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र:मीराबहनको|४६१}}</noinclude>फौरन जानकारी दे देंगे। लेकिन में उम्मीद रखता हूँ कि जहाँतक पत्र लिखनेका सम्बन्ध है, स्थिति ठीक ही रहेगी। अभी तो मामूली कब्जके सिवा मेरे स्वास्थ्य में कोई खराबी नहीं है। किसी भी तरह की चिन्ताका कोई कारण नहीं है। सबसे हाल में तुम्हारा ९ तारीखका पत्र मिला है। उसके बाद कोई पत्र नहीं मिला। धुनकीके बारेमें तुमने जो सुझाव दिये हैं, वे बहुत अच्छे और काफी हैं। फिर भी मैंने उसे उलटा लटका रखा है और वह भली-भांति काम कर रही है। खुद धुनकीको लेकर कोई कठिनाई नहीं हुई। मेरे पास जितनी रुई थी, सब पींज ली है। अभीतक जरा भी खराब नहीं हुई है। मैंने नीमके पत्ते इस्तेमाल नहीं किये। उसके बदले इमली से मिलते-जुलते किसी और ही पेड़के पत्ते काममें लाता हूँ। वे ठीक काम दे रहे हैं। पूना आनेवाले किसी भी आदमीके हाथ तुम दो पौंड रुई भेज सकती हो। बहुत जल्दी नहीं है। मेरे पास कमसे कम १५ जुलाईतक चलने लायक पूनियाँ हैं। तबतक मुझे धुनकीको छूने की जरूरत नहीं है। जब मुझे जरूरत होगी तो तुम्हारे सुझावोंके अनुसार धुनकीको ठीकसे जमा लूंगा। तकुए पर गिर्रीको ठीक तरह लगाने के बारेमें भी मैं समझ गया हूँ। लेकिन यहाँ भी प्रकृतिने मुझपर कृपा की है। मैंने गिरींको अपने ही ढंगसे लगा लिया और वह बिलकुल स्थिर हो गई है। अगर गड़बड़ हुई तो तुम्हारा नुस्खा आजमाऊँगा। तुमने अपने कामके बारेमें जो कुछ लिखा है, वह सब मेरे ध्यानमें है। तुम्हें ईश्वर जैसा रास्ता बताये अपनी शक्तिके अनुसार वैसा ही करो। भगवान् तुम्हारा कल्याण करे और बातें सामान्य पत्रसे जान लेना। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९८) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३२ से भी। {{C|{{larger|'''४५७. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२२ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, (१) क्या आप दो पौंड खजूर के लिए आर्डर देनेकी कृपा करेंगे? (२) मेरे साथीको कल सब्जियाँ और नमक नहीं मिला। (३) उनको कमोड पॉट अभीतक नहीं दिया गया; ढाँचा उनके पास है। (४) उनके अपने वर्तन-भांडे, चार्ट इत्यादि अबतक उनको लौटाये नहीं गये हैं। मुझे उनके लिए इसलिए लिखना पड़ रहा है कि उनको मेरी खातिर ही यहाँ लाया गया है। इसलिए उनकी असुविधा मुझे अपनी ही असुविधा महसूस होती है। इस प्रकार मैं बिलकुल स्वार्थवश ही उनके बारेमें लिख रहा हूँ।<noinclude></noinclude> 1a7txoazc4twc1bi0nlhqb2r2axbp0v 675293 675252 2026-08-30T15:10:52Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र:मीराबहनको|४६१}}</noinclude>फौरन जानकारी दे देंगे। लेकिन मैं उम्मीद रखता हूँ कि जहाँतक पत्र लिखनेका सम्बन्ध है, स्थिति ठीक ही रहेगी। अभी तो मामूली कब्जके सिवा मेरे स्वास्थ्य में कोई खराबी नहीं है। किसी भी तरह की चिन्ताका कोई कारण नहीं है। सबसे हाल में तुम्हारा ९ तारीखका पत्र मिला है। उसके बाद कोई पत्र नहीं मिला। धुनकीके बारेमें तुमने जो सुझाव दिये हैं, वे बहुत अच्छे और काफी हैं। फिर भी मैंने उसे उलटा लटका रखा है और वह भली-भांति काम कर रही है। खुद धुनकीको लेकर कोई कठिनाई नहीं हुई। मेरे पास जितनी रुई थी, सब पींज ली है। अभीतक जरा भी खराब नहीं हुई है। मैंने नीमके पत्ते इस्तेमाल नहीं किये। उसके बदले इमली से मिलते-जुलते किसी और ही पेड़के पत्ते काममें लाता हूँ। वे ठीक काम दे रहे हैं। पूना आनेवाले किसी भी आदमीके हाथ तुम दो पौंड रुई भेज सकती हो। बहुत जल्दी नहीं है। मेरे पास कमसे कम १५ जुलाईतक चलने लायक पूनियाँ हैं। तबतक मुझे धुनकीको छूने की जरूरत नहीं है। जब मुझे जरूरत होगी तो तुम्हारे सुझावोंके अनुसार धुनकीको ठीकसे जमा लूंगा। तकुए पर गिर्रीको ठीक तरह लगाने के बारेमें भी मैं समझ गया हूँ। लेकिन यहाँ भी प्रकृतिने मुझपर कृपा की है। मैंने गिरींको अपने ही ढंगसे लगा लिया और वह बिलकुल स्थिर हो गई है। अगर गड़बड़ हुई तो तुम्हारा नुस्खा आजमाऊँगा। तुमने अपने कामके बारेमें जो कुछ लिखा है, वह सब मेरे ध्यानमें है। तुम्हें ईश्वर जैसा रास्ता बताये अपनी शक्तिके अनुसार वैसा ही करो। भगवान् तुम्हारा कल्याण करे और बातें सामान्य पत्रसे जान लेना। सस्नेह, {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९८) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३२ से भी। {{C|{{larger|'''४५७. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२२ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, (१) क्या आप दो पौंड खजूर के लिए आर्डर देनेकी कृपा करेंगे? (२) मेरे साथीको कल सब्जियाँ और नमक नहीं मिला। (३) उनको कमोड पॉट अभीतक नहीं दिया गया; ढाँचा उनके पास है। (४) उनके अपने वर्तन-भांडे, चार्ट इत्यादि अबतक उनको लौटाये नहीं गये हैं। मुझे उनके लिए इसलिए लिखना पड़ रहा है कि उनको मेरी खातिर ही यहाँ लाया गया है। इसलिए उनकी असुविधा मुझे अपनी ही असुविधा महसूस होती है। इस प्रकार मैं बिलकुल स्वार्थवश ही उनके बारेमें लिख रहा हूँ।<noinclude></noinclude> ku13w9p0qlc04x7sikc6khw4pks3en3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०६ 250 197549 675255 670077 2026-08-30T13:44:01Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675255 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और फिर चिट्टियाँ न मिलनेकी बात तो है ही। {{Right|हृदयसे आपका,}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २६६ । {{C|{{larger|'''४५८. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२२/२३ जून, १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारी भेजी डाक मुझे धीरे-धीरे मिलती जा रही है। तुम देखोगे कि मैंने मीराबहनको जो पत्र लिखा है उसमें मैंने इसकी चर्चा की है। १९, २६ मई और १० जूनको लिखे तीनों पत्र इन पिछले छः दिनोंमें मुझे एक-एक करके मिले हैं। अन्य पत्र जो तुमने मुझे भेजे होंगे, अभी इधर-उधर भटक रहे होंगे। मेरे हिसाबसे मुझे अभी दो डाक और मिलनी चाहिए। अर्थात् २ या ३ जूनके तथा १६ जूनके पत्र अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें पत्रके साथ भेजे जानेवाले पत्रोंके लेखकोंके नाम भी लिखना। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ पत्र मुझे नहीं दिये गये हैं। रतिलालको जिस तरह सन्तुष्ट किया जा सकता हो, उस तरह सन्तुष्ट करना। मैं उसे पत्र लिख रहा हूँ। जापानके जो भाई 'सत्यके प्रयोग' का अनुवाद करना चाहते हैं उन्हें अनुमति दे देना। बंगाली बहनोंका पत्र इसके साथ है। रावजीभाई, शिवाभाई अब बिलकुल अच्छे हो गये होंगे। जगन्नाथ किस काममें लगे हुए हैं? कच्चे दूधसे दही जमानेका प्रयोग पूर्णतः सफल हुआ है। मैं ज्यादातर दूधके बदले दही लेता हूँ। इसलिए इस समय मेरी खुराक यह है, दही, खजूर अथवा मुनक्का और एक बार नीबूका रस। मैं अभी तो कोई गरम पेय नहीं लेता। एरंडीका तेल सिर्फ एक दिन पीना पड़ा था और उस दिन मैंने दो बार गरम पानी, नीबू और नमक लिया था। दूध भी पी लिया था; लेकिन कच्चा ही उसका कोई खराब असर देखनेमें नहीं आया। इसलिए देखता हूँ, अभी तो ऐसे ही काम चलेग। वजन जो था वही है। एकाध पौंड इधर-उधर हो जाता है। फिलहाल तो १०५ है । काकासाहब चार दिनसे आ गये हैं। आनन्द है। उनकी खुराक दूध रोटी और भी है तथा मेरे हिस्से के फलोंमें से कुछ ले लेते हैं। हरी सब्जियोंकी माँग की है, उम्मीद है उसे स्वीकार कर लिया जायेगा।<noinclude></noinclude> 2o4qvu41mzl7i7vrvk5kbu4mijfuo1v 675256 675255 2026-08-30T13:44:52Z Manikantkmr 5554 675256 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और फिर चिट्टियाँ न मिलनेकी बात तो है ही। {{Right|हृदयसे आपका,}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २६६ । {{C|{{larger|'''४५८. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२२/२३ जून, १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारी भेजी डाक मुझे धीरे-धीरे मिलती जा रही है। तुम देखोगे कि मैंने मीराबहनको जो पत्र लिखा है उसमें मैंने इसकी चर्चा की है। १९, २६ मई और १० जूनको लिखे तीनों पत्र इन पिछले छः दिनोंमें मुझे एक-एक करके मिले हैं। अन्य पत्र जो तुमने मुझे भेजे होंगे, अभी इधर-उधर भटक रहे होंगे। मेरे हिसाबसे मुझे अभी दो डाक और मिलनी चाहिए। अर्थात् २ या ३ जूनके तथा १६ जूनके पत्र अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें पत्रके साथ भेजे जानेवाले पत्रोंके लेखकोंके नाम भी लिखना। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ पत्र मुझे नहीं दिये गये हैं। रतिलालको जिस तरह सन्तुष्ट किया जा सकता हो, उस तरह सन्तुष्ट करना। मैं उसे पत्र लिख रहा हूँ। जापानके जो भाई 'सत्यके प्रयोग' का अनुवाद करना चाहते हैं उन्हें अनुमति दे देना। बंगाली बहनोंका पत्र इसके साथ है। रावजीभाई, शिवाभाई अब बिलकुल अच्छे हो गये होंगे। जगन्नाथ किस काममें लगे हुए हैं? कच्चे दूधसे दही जमानेका प्रयोग पूर्णतः सफल हुआ है। मैं ज्यादातर दूधके बदले दही लेता हूँ। इसलिए इस समय मेरी खुराक यह है, दही, खजूर अथवा मुनक्का और एक बार नीबूका रस। मैं अभी तो कोई गरम पेय नहीं लेता। एरंडीका तेल सिर्फ एक दिन पीना पड़ा था और उस दिन मैंने दो बार गरम पानी, नीबू और नमक लिया था। दूध भी पी लिया था; लेकिन कच्चा ही उसका कोई खराब असर देखनेमें नहीं आया। इसलिए देखता हूँ, अभी तो ऐसे ही काम चलेग। वजन जो था वही है। एकाध पौंड इधर-उधर हो जाता है। फिलहाल तो १०५ है । काकासाहब चार दिनसे आ गये हैं। आनन्द है। उनकी खुराक दूध रोटी और भी है तथा मेरे हिस्से के फलोंमें से कुछ ले लेते हैं। हरी सब्जियोंकी माँग की है, उम्मीद है उसे स्वीकार कर लिया जायेगा।<noinclude></noinclude> o1yqd56nrsddn16i4n6i8th77clqvtg 675257 675256 2026-08-30T13:46:24Z Manikantkmr 5554 675257 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और फिर चिट्टियाँ न मिलनेकी बात तो है ही। {{Right|हृदयसे आपका,}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २६६ । {{C|{{larger|'''४५८. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२२/२३ जून, १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारी भेजी डाक मुझे धीरे-धीरे मिलती जा रही है। तुम देखोगे कि मैंने मीराबहनको जो पत्र लिखा है उसमें मैंने इसकी चर्चा की है। १९, २६ मई और १० जूनको लिखे तीनों पत्र इन पिछले छः दिनोंमें मुझे एक-एक करके मिले हैं। अन्य पत्र जो तुमने मुझे भेजे होंगे, अभी इधर-उधर भटक रहे होंगे। मेरे हिसाबसे मुझे अभी दो डाक और मिलनी चाहिए। अर्थात् २ या ३ जूनके तथा १६ जूनके पत्र अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें पत्रके साथ भेजे जानेवाले पत्रोंके लेखकोंके नाम भी लिखना। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ पत्र मुझे नहीं दिये गये हैं। रतिलालको जिस तरह सन्तुष्ट किया जा सकता हो, उस तरह सन्तुष्ट करना। मैं उसे पत्र लिख रहा हूँ। जापानके जो भाई 'सत्यके प्रयोग' का अनुवाद करना चाहते हैं उन्हें अनुमति दे देना। बंगाली बहनोंका पत्र इसके साथ है। रावजीभाई, शिवाभाई अब बिलकुल अच्छे हो गये होंगे। जगन्नाथ किस काममें लगे हुए हैं? कच्चे दूधसे दही जमानेका प्रयोग पूर्णतः सफल हुआ है। मैं ज्यादातर दूधके बदले दही लेता हूँ। इसलिए इस समय मेरी खुराक यह है, दही, खजूर अथवा मुनक्का और एक बार नीबूका रस। मैं अभी तो कोई गरम पेय नहीं लेता। एरंडीका तेल सिर्फ एक दिन पीना पड़ा था और उस दिन मैंने दो बार गरम पानी, नीबू और नमक लिया था। दूध भी पी लिया था; लेकिन कच्चा ही उसका कोई खराब असर देखनेमें नहीं आया। इसलिए देखता हूँ, अभी तो ऐसे ही काम चलेग। वजन जो था वही है। एकाध पौंड इधर-उधर हो जाता है। फिलहाल तो १०५ है । काकासाहब चार दिनसे आ गये हैं। आनन्द है। उनकी खुराक दूध रोटी और भी है तथा मेरे हिस्से के फलोंमें से कुछ ले लेते हैं। हरी सब्जियोंकी माँग की है, उम्मीद है उसे स्वीकार कर लिया जायेगा।<noinclude></noinclude> nt1xdzkhmub7rfdqdx1jsppapxz6ptl 675295 675257 2026-08-30T15:14:36Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और फिर चिट्टियाँ न मिलनेकी बात तो है ही। {{Right|हृदयसे आपका,}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २६६ । {{C|{{larger|'''४५८. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२२/२३ जून, १९३०}} चि० नारणदास, तुम्हारी भेजी डाक मुझे धीरे-धीरे मिलती जा रही है। तुम देखोगे कि मैंने मीराबहनको जो पत्र लिखा है उसमें मैंने इसकी चर्चा की है। १९, २६ मई और १० जूनको लिखे तीनों पत्र इन पिछले छः दिनोंमें मुझे एक-एक करके मिले हैं। अन्य पत्र जो तुमने मुझे भेजे होंगे, अभी इधर-उधर भटक रहे होंगे। मेरे हिसाबसे मुझे अभी दो डाक और मिलनी चाहिए। अर्थात् २ या ३ जूनके तथा १६ जूनके पत्र अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें पत्रके साथ भेजे जानेवाले पत्रोंके लेखकोंके नाम भी लिखना। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ पत्र मुझे नहीं दिये गये हैं। रतिलालको जिस तरह सन्तुष्ट किया जा सकता हो, उस तरह सन्तुष्ट करना। मैं उसे पत्र लिख रहा हूँ। जापानके जो भाई 'सत्यके प्रयोग' का अनुवाद करना चाहते हैं उन्हें अनुमति दे देना। बंगाली बहनोंका पत्र इसके साथ है। रावजीभाई, शिवाभाई अब बिलकुल अच्छे हो गये होंगे। जगन्नाथ किस काममें लगे हुए हैं? कच्चे दूधसे दही जमानेका प्रयोग पूर्णतः सफल हुआ है। मैं ज्यादातर दूधके बदले दही लेता हूँ। इसलिए इस समय मेरी खुराक यह है, दही, खजूर अथवा मुनक्का और एक बार नीबूका रस। मैं अभी तो कोई गरम पेय नहीं लेता। एरंडीका तेल सिर्फ एक दिन पीना पड़ा था और उस दिन मैंने दो बार गरम पानी, नीबू और नमक लिया था। दूध भी पी लिया था; लेकिन कच्चा ही उसका कोई खराब असर देखनेमें नहीं आया। इसलिए देखता हूँ, अभी तो ऐसे ही काम चलेग। वजन जो था वही है। एकाध पौंड इधर-उधर हो जाता है। फिलहाल तो १०५ है । काकासाहब चार दिनसे आ गये हैं। आनन्द है। उनकी खुराक दूध रोटी और घी है तथा मेरे हिस्से के फलोंमें से कुछ ले लेते हैं। हरी सब्जियोंकी माँग की है, उम्मीद है उसे स्वीकार कर लिया जायेगा।<noinclude></noinclude> ropmmj1gqtawnubwseflrg3mixnsp2u पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०७ 250 197550 675259 670078 2026-08-30T13:53:13Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675259 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />पत्र नारणदास गांधीको ४६३</noinclude>काममें मैंने सिलाईके कामको और जोड़ दिया है। लेडी विट्ठलदाससे मशीनके लिए कहा था, सो आ गई है। उसपर फिलहाल में जेलकी टोपियाँ सीता हूँ। इस काम में ४५ मिनटसे एक घंटेका समय लगता है। कातनेकी रफ्तार तो कमसे कम ३७५ तार है। औसतन ४०० तार होते होंगे। तकली पर काम जारी है। तकली बनाने में भी पर्याप्त समय देता हूँ। आजकल महीन कताई पर जोर दे रहा हूँ। उसका अच्छा अभ्यास होता जा रहा है। तकलीके गुण मुझ पर दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक प्रकट होते जाते हैं। वह कदाचित् चरखेकी अपेक्षा दुखियोंका अधिक सहारा हो, हालांकि दोनों ही शान्ति प्रदान करते हैं। आज सिलाईकी मशीनके साथ तुलना करते हुए मुझे हाथके कामकी सात्विकता स्पष्ट दिखाई देती है। मैं सिलाईकी मशीनको अमूल्य वस्तु तो मानता हूँ, लेकिन वह शान्ति देनेवाली चीज नहीं है। उसको चलाते हुए गतिको उत्तरोत्तर तेज करनेकी इच्छा होती है और अन्ततः दिमाग थक जाता है। परन्तु तकली पर अधिकार प्राप्त करनेके बाद जिस तरह सुन्दर बैलगाड़ीको हांकनेवाला धीमे-धीमे और शान्तिपूर्वक अपनी मंजिल तय करता है, तकली कातनेवाला उसकी अपेक्षा अधिक शान्तिसे अपना कार्य सम्पन्न करता जाता है। मेरा अनुभव तो यही है; जबकि अभी में तकली चलाने में पारंगत नहीं हुआ हूँ। उस पर पूरा अधिकार प्राप्त करनेके बाद कैसा अनुभव होता है, यह देखना अभी बाकी है। काकासाहब भी तकली चला रहे हैं, लेकिन उसका रहस्य अभी उनके हाथ नहीं लगा है। उनके लिए ये वस्तुएँ कष्टसाध्य हैं। इनमें श्रेय है, यह बात तो वे जानते हैं। इसीसे उससे प्रेम करनेकी कोशिश में हैं। वे अभी चरखा नहीं चलाना चाहते; अभी तो ये तकलीकी साधनाको ही पूरा करना चाहते हैं। पढ़ाई तो मैं सूत्र यज्ञसे फुरसत मिलने पर ही कर पाता हूँ। सिलाईके कामको भी मैं सूत्र यज्ञका एक हिस्सा मानता हूँ। मथुरादासने मुझे जो सुझाव भेजा था उसका मैंने स्वागत किया। संयोग मिलने पर मैं उस पर अमल करता हूँ। काकाके आने पर लोभ हो आया। इससे मैंने कलसे मराठी शुरू की है। थोड़ी-सी भी आ जाये तो अच्छा होगा। 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बात सबसे कहता हूँ, तो स्वयं क्यों न करूँ ? लेकिन ऐसा करना तो पक्के घड़ेको साँचे में ढालने के समान है। लेकिन यदि इस दिशामें प्रयत्न करना सकारथ है तो यह यहीं हो सकता है, ऐसा सोचकर मैंने आठ दिन पहले 'गीता' कण्ठस्थ करना आरम्भ किया था। बारहवां अध्याय कण्ठस्थ कर लिया है। तेरहवां शुरू किया है। काकाके आनेपर स्वाभाविक रूपसे इस क्रम में तनिक व्यवधान पड़ गया है। सूत्र यज्ञके समय में से तो मैं इसके लिए समय चुरानेवाला नहीं हूँ; इसलिए 'चलते-फिरते पुस्तकालय " आदिमें यह काम करता हूँ। 'पुस्तकालय' में 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बातसे कोई न चौंके। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह बात हमने सीखी है। इसलिए वहां भगवान्‌का नाम लेते हुए अथवा उसका काम करते हुए किसीको क्षोभ न होना चाहिए। हां, इससे यह बात अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि हमारे 'पुस्तकालय' पुस्तक भण्डारके समान ही स्वच्छ और निर्मल होने चाहिए। १. गांधीजी शौचालय में किताबें रखते थे और उसे 'पुस्तकालय' कहते थे।<noinclude></noinclude> a8egwhr9pi8krxyvz4bu58uejqwf9ud 675260 675259 2026-08-30T13:54:54Z Manikantkmr 5554 675260 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र नारणदास गांधीको|४६३}}</noinclude>काममें मैंने सिलाईके कामको और जोड़ दिया है। लेडी विट्ठलदाससे मशीनके लिए कहा था, सो आ गई है। उसपर फिलहाल में जेलकी टोपियाँ सीता हूँ। इस काम में ४५ मिनटसे एक घंटेका समय लगता है। कातनेकी रफ्तार तो कमसे कम ३७५ तार है। औसतन ४०० तार होते होंगे। तकली पर काम जारी है। तकली बनाने में भी पर्याप्त समय देता हूँ। आजकल महीन कताई पर जोर दे रहा हूँ। उसका अच्छा अभ्यास होता जा रहा है। तकलीके गुण मुझ पर दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक प्रकट होते जाते हैं। वह कदाचित् चरखेकी अपेक्षा दुखियोंका अधिक सहारा हो, हालांकि दोनों ही शान्ति प्रदान करते हैं। आज सिलाईकी मशीनके साथ तुलना करते हुए मुझे हाथके कामकी सात्विकता स्पष्ट दिखाई देती है। मैं सिलाईकी मशीनको अमूल्य वस्तु तो मानता हूँ, लेकिन वह शान्ति देनेवाली चीज नहीं है। उसको चलाते हुए गतिको उत्तरोत्तर तेज करनेकी इच्छा होती है और अन्ततः दिमाग थक जाता है। परन्तु तकली पर अधिकार प्राप्त करनेके बाद जिस तरह सुन्दर बैलगाड़ीको हांकनेवाला धीमे-धीमे और शान्तिपूर्वक अपनी मंजिल तय करता है, तकली कातनेवाला उसकी अपेक्षा अधिक शान्तिसे अपना कार्य सम्पन्न करता जाता है। मेरा अनुभव तो यही है; जबकि अभी में तकली चलाने में पारंगत नहीं हुआ हूँ। उस पर पूरा अधिकार प्राप्त करनेके बाद कैसा अनुभव होता है, यह देखना अभी बाकी है। काकासाहब भी तकली चला रहे हैं, लेकिन उसका रहस्य अभी उनके हाथ नहीं लगा है। उनके लिए ये वस्तुएँ कष्टसाध्य हैं। इनमें श्रेय है, यह बात तो वे जानते हैं। इसीसे उससे प्रेम करनेकी कोशिश में हैं। वे अभी चरखा नहीं चलाना चाहते; अभी तो ये तकलीकी साधनाको ही पूरा करना चाहते हैं। पढ़ाई तो मैं सूत्र यज्ञसे फुरसत मिलने पर ही कर पाता हूँ। सिलाईके कामको भी मैं सूत्र यज्ञका एक हिस्सा मानता हूँ। मथुरादासने मुझे जो सुझाव भेजा था उसका मैंने स्वागत किया। संयोग मिलने पर मैं उस पर अमल करता हूँ। काकाके आने पर लोभ हो आया। इससे मैंने कलसे मराठी शुरू की है। थोड़ी-सी भी आ जाये तो अच्छा होगा। 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बात सबसे कहता हूँ, तो स्वयं क्यों न करूँ ? लेकिन ऐसा करना तो पक्के घड़ेको साँचे में ढालने के समान है। लेकिन यदि इस दिशामें प्रयत्न करना सकारथ है तो यह यहीं हो सकता है, ऐसा सोचकर मैंने आठ दिन पहले 'गीता' कण्ठस्थ करना आरम्भ किया था। बारहवां अध्याय कण्ठस्थ कर लिया है। तेरहवां शुरू किया है। काकाके आनेपर स्वाभाविक रूपसे इस क्रम में तनिक व्यवधान पड़ गया है। सूत्र यज्ञके समय में से तो मैं इसके लिए समय चुरानेवाला नहीं हूँ; इसलिए 'चलते-फिरते पुस्तकालय " आदिमें यह काम करता हूँ। 'पुस्तकालय' में 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बातसे कोई न चौंके। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह बात हमने सीखी है। इसलिए वहां भगवान्‌का नाम लेते हुए अथवा उसका काम करते हुए किसीको क्षोभ न होना चाहिए। हां, इससे यह बात अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि हमारे 'पुस्तकालय' पुस्तक भण्डारके समान ही स्वच्छ और निर्मल होने चाहिए। १. गांधीजी शौचालय में किताबें रखते थे और उसे 'पुस्तकालय' कहते थे।<noinclude></noinclude> sbi9441su0n7ryhw9amhceesj06ammg 675261 675260 2026-08-30T13:58:35Z Manikantkmr 5554 675261 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र नारणदास गांधीको|४६३}}</noinclude>काममें मैंने सिलाईके कामको और जोड़ दिया है। लेडी विट्ठलदाससे मशीनके लिए कहा था, सो आ गई है। उसपर फिलहाल में जेलकी टोपियाँ सीता हूँ। इस काम में ४५ मिनटसे एक घंटेका समय लगता है। कातनेकी रफ्तार तो कमसे कम ३७५ तार है। औसतन ४०० तार होते होंगे। तकली पर काम जारी है। तकली बनाने में भी पर्याप्त समय देता हूँ। आजकल महीन कताई पर जोर दे रहा हूँ। उसका अच्छा अभ्यास होता जा रहा है। तकलीके गुण मुझ पर दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक प्रकट होते जाते हैं। वह कदाचित् चरखेकी अपेक्षा दुखियोंका अधिक सहारा हो, हालांकि दोनों ही शान्ति प्रदान करते हैं। आज सिलाईकी मशीनके साथ तुलना करते हुए मुझे हाथके कामकी सात्विकता स्पष्ट दिखाई देती है। मैं सिलाईकी मशीनको अमूल्य वस्तु तो मानता हूँ, लेकिन वह शान्ति देनेवाली चीज नहीं है। उसको चलाते हुए गतिको उत्तरोत्तर तेज करनेकी इच्छा होती है और अन्ततः दिमाग थक जाता है। परन्तु तकली पर अधिकार प्राप्त करनेके बाद जिस तरह सुन्दर बैलगाड़ीको हांकनेवाला धीमे-धीमे और शान्तिपूर्वक अपनी मंजिल तय करता है, तकली कातनेवाला उसकी अपेक्षा अधिक शान्तिसे अपना कार्य सम्पन्न करता जाता है। मेरा अनुभव तो यही है; जबकि अभी में तकली चलाने में पारंगत नहीं हुआ हूँ। उस पर पूरा अधिकार प्राप्त करनेके बाद कैसा अनुभव होता है, यह देखना अभी बाकी है। काकासाहब भी तकली चला रहे हैं, लेकिन उसका रहस्य अभी उनके हाथ नहीं लगा है। उनके लिए ये वस्तुएँ कष्टसाध्य हैं। इनमें श्रेय है, यह बात तो वे जानते हैं। इसीसे उससे प्रेम करनेकी कोशिश में हैं। वे अभी चरखा नहीं चलाना चाहते; अभी तो ये तकलीकी साधनाको ही पूरा करना चाहते हैं। पढ़ाई तो मैं सूत्र यज्ञसे फुरसत मिलने पर ही कर पाता हूँ। सिलाईके कामको भी मैं सूत्र यज्ञका एक हिस्सा मानता हूँ। मथुरादासने मुझे जो सुझाव भेजा था उसका मैंने स्वागत किया। संयोग मिलने पर मैं उस पर अमल करता हूँ। काकाके आने पर लोभ हो आया। इससे मैंने कलसे मराठी शुरू की है। थोड़ी-सी भी आ जाये तो अच्छा होगा। 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बात सबसे कहता हूँ, तो स्वयं क्यों न करूँ ? 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लेकिन ऐसा करना तो पक्के घड़ेको साँचे में ढालने के समान है। लेकिन यदि इस दिशामें प्रयत्न करना सकारथ है तो यह यहीं हो सकता है, ऐसा सोचकर मैंने आठ दिन पहले 'गीता' कण्ठस्थ करना आरम्भ किया था। बारहवां अध्याय कण्ठस्थ कर लिया है। तेरहवां शुरू किया है। काकाके आनेपर स्वाभाविक रूपसे इस क्रम में तनिक व्यवधान पड़ गया है। सूत्र यज्ञके समय में से तो मैं इसके लिए समय चुरानेवाला नहीं हूँ; इसलिए 'चलते-फिरते पुस्तकालय " आदिमें यह काम करता हूँ। 'पुस्तकालय' में 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बातसे कोई न चौंके। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह बात हमने सीखी है। इसलिए वहां भगवान्‌का नाम लेते हुए अथवा उसका काम करते हुए किसीको क्षोभ न होना चाहिए। हां, इससे यह बात अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि हमारे 'पुस्तकालय' पुस्तक भण्डारके समान ही स्वच्छ और निर्मल होने चाहिए। <small>१. गांधीजी शौचालय में किताबें रखते थे और उसे 'पुस्तकालय' कहते थे।<small><noinclude></noinclude> tlo7b8a2so7czhaffnmzw4wzmmjd8qb 675298 675263 2026-08-30T15:22:03Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675298 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र:नारणदास गांधीको|४६३}}</noinclude>काममें मैंने सिलाईके कामको और जोड़ दिया है। लेडी विट्ठलदाससे मशीनके लिए कहा था, सो आ गई है। उसपर फिलहाल मैं जेलकी टोपियाँ सीता हूँ। इस काम में ४५ मिनटसे एक घंटेका समय लगता है। कातनेकी रफ्तार तो कमसे कम ३७५ तार है। औसतन ४०० तार होते होंगे। तकली पर काम जारी है। तकली बनाने में भी पर्याप्त समय देता हूँ। आजकल महीन कताई पर जोर दे रहा हूँ। उसका अच्छा अभ्यास होता जा रहा है। तकलीके गुण मुझ पर दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक प्रकट होते जाते हैं। वह कदाचित् चरखेकी अपेक्षा दुखियोंका अधिक सहारा हो, हालांकि दोनों ही शान्ति प्रदान करते हैं। आज सिलाईकी मशीनके साथ तुलना करते हुए मुझे हाथके कामकी सात्विकता स्पष्ट दिखाई देती है। मैं सिलाईकी मशीनको अमूल्य वस्तु तो मानता हूँ, लेकिन वह शान्ति देनेवाली चीज नहीं है। उसको चलाते हुए गतिको उत्तरोत्तर तेज करनेकी इच्छा होती है और अन्ततः दिमाग थक जाता है। परन्तु तकली पर अधिकार प्राप्त करनेके बाद जिस तरह सुन्दर बैलगाड़ीको हांकनेवाला धीमे-धीमे और शान्तिपूर्वक अपनी मंजिल तय करता है, तकली कातनेवाला उसकी अपेक्षा अधिक शान्तिसे अपना कार्य सम्पन्न करता जाता है। मेरा अनुभव तो यही है; जबकि अभी मैं तकली चलाने में पारंगत नहीं हुआ हूँ। उस पर पूरा अधिकार प्राप्त करनेके बाद कैसा अनुभव होता है, यह देखना अभी बाकी है। काकासाहब भी तकली चला रहे हैं, लेकिन उसका रहस्य अभी उनके हाथ नहीं लगा है। उनके लिए ये वस्तुएँ कष्टसाध्य हैं। इनमें श्रेय है, यह बात तो वे जानते हैं। इसीसे उससे प्रेम करनेकी कोशिश में हैं। वे अभी चरखा नहीं चलाना चाहते; अभी तो ये तकलीकी साधनाको ही पूरा करना चाहते हैं। पढ़ाई तो मैं सूत्र यज्ञसे फुरसत मिलने पर ही कर पाता हूँ। सिलाईके कामको भी मैं सूत्र यज्ञका एक हिस्सा मानता हूँ। मथुरादासने मुझे जो सुझाव भेजा था उसका मैंने स्वागत किया। संयोग मिलने पर मैं उस पर अमल करता हूँ। काकाके आने पर लोभ हो आया। इससे मैंने कलसे मराठी शुरू की है। थोड़ी-सी भी आ जाये तो अच्छा होगा। 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बात सबसे कहता हूँ, तो स्वयं क्यों न करूँ? लेकिन ऐसा करना तो पक्के घड़ेको साँचे में ढालने के समान है। लेकिन यदि इस दिशामें प्रयत्न करना सकारथ है तो यह यहीं हो सकता है, ऐसा सोचकर मैंने आठ दिन पहले 'गीता' कण्ठस्थ करना आरम्भ किया था। बारहवां अध्याय कण्ठस्थ कर लिया है। तेरहवां शुरू किया है। काकाके आनेपर स्वाभाविक रूपसे इस क्रम में तनिक व्यवधान पड़ गया है। सूत्र यज्ञके समयमें से तो मैं इसके लिए समय चुरानेवाला नहीं हूँ; इसलिए 'चलते-फिरते पुस्तकालय " आदिमें यह काम करता हूँ। 'पुस्तकालय' में 'गीता' कण्ठस्थ करनेकी बातसे कोई न चौंके। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह बात हमने सीखी है। इसलिए वहां भगवान्‌का नाम लेते हुए अथवा उसका काम करते हुए किसीको क्षोभ न होना चाहिए। हां, इससे यह बात अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि हमारे 'पुस्तकालय' पुस्तक भण्डारके समान ही स्वच्छ और निर्मल होने चाहिए। <small>१. गांधीजी शौचालय में किताबें रखते थे और उसे 'पुस्तकालय' कहते थे।<small><noinclude></noinclude> q1y4ujo1juf90ln96gzeirsl3gj4eyj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०८ 250 197551 675266 670079 2026-08-30T14:17:32Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरा तो ऐसा ही है, क्योंकि यहाँ तो रहनेके स्थानपर ही सबको सब क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। मुझे तीन कोठरियाँ दी गई हैं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने तो दक्षिण आफ्रिका और यहां भी जेलमें एक ही कोठरीमें सब क्रियाएं की हैं, करनी पड़ी हैं। तुम्हारा २६ मईका पत्र, हम दोनोंको, लम्बा होनेके बावजूद संक्षिप्त और पर्याप्त लगा है। उसमें एक शब्द भी फिजूल नहीं है। यदि कुछ रह गया हो तो पत्र उसी हद तक अपूर्ण है लेकिन उससे कुछ रह जानेका आभास नहीं होता। २६ मईका यह पत्र १० जूनके पत्रके बाद मिला। कल ही मिला है। अब और अधिक नहीं लिखूंगा। मेरा खयाल है मैंने तुम्हारे सब प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है। अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें जिन लोगोंके पत्र साथ हो उनके नाम अवश्य देना। यह पत्र दो हिस्सोंमें लिखा गया है। एक हिस्सा कल रात लिखा था। खुशालभाईकी सेवामें तो अभी पुरुषोत्तम ही है न? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] मीराबहन यदि वहां न हो अथवा अत्यन्त व्यस्त हो तो रुई भेजने की बातपर तुम फुरसतसे अमल करना। बालकृष्णका उत्तर अब फिर कभी। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११३) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४५९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२३ जून, १९३०}} चि० प्रेमा, मुझे तुम्हारा सुन्दर पत्र मिला। यदि मुझे सचमुच तुम्हारे पत्रकी जरूरत महसूस न हो तो केवल औपचारिकतावश में तुमसे उसकी मांग न करूँ। धुरन्धर और कमला मुझे बहुत अच्छे लगे। दूसरी बहनसे तो न जाने कब मिलना हो। तुम्हें कच्ची सब्जियों का उपयोग छोड़ना नहीं चाहिए। कच्चा करेला भी अवश्य खाया जा सकता है। मैंने तो खाया है। कुछ ताजे करेले लो, उनको पीस लो और उसमें नींबू निचोड़ दो; लेकिन किसी समय कोई सब्जी न मिले तो उसके बिना ही काम चलाना चाहिए। उसके बदले किशमिश लेनी चाहिए। सुधरे हुए स्वास्थ्यको<noinclude></noinclude> qvj8wsozvlk21mxg01ebbmvn9j4n8lm 675267 675266 2026-08-30T14:20:25Z Manikantkmr 5554 675267 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरा तो ऐसा ही है, क्योंकि यहाँ तो रहनेके स्थानपर ही सबको सब क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। मुझे तीन कोठरियाँ दी गई हैं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने तो दक्षिण आफ्रिका और यहां भी जेलमें एक ही कोठरीमें सब क्रियाएं की हैं, करनी पड़ी हैं। तुम्हारा २६ मईका पत्र, हम दोनोंको, लम्बा होनेके बावजूद संक्षिप्त और पर्याप्त लगा है। उसमें एक शब्द भी फिजूल नहीं है। यदि कुछ रह गया हो तो पत्र उसी हद तक अपूर्ण है लेकिन उससे कुछ रह जानेका आभास नहीं होता। २६ मईका यह पत्र १० जूनके पत्रके बाद मिला। कल ही मिला है। अब और अधिक नहीं लिखूंगा। मेरा खयाल है मैंने तुम्हारे सब प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है। अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें जिन लोगोंके पत्र साथ हो उनके नाम अवश्य देना। यह पत्र दो हिस्सोंमें लिखा गया है। एक हिस्सा कल रात लिखा था। खुशालभाईकी सेवामें तो अभी पुरुषोत्तम ही है न? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] मीराबहन यदि वहां न हो अथवा अत्यन्त व्यस्त हो तो रुई भेजने की बातपर तुम फुरसतसे अमल करना। बालकृष्णका उत्तर अब फिर कभी। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११३) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४५९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२३ जून, १९३०}} चि० प्रेमा, मुझे तुम्हारा सुन्दर पत्र मिला। यदि मुझे सचमुच तुम्हारे पत्रकी जरूरत महसूस न हो तो केवल औपचारिकतावश में तुमसे उसकी मांग न करूँ। धुरन्धर और कमला मुझे बहुत अच्छे लगे। दूसरी बहनसे तो न जाने कब मिलना हो। तुम्हें कच्ची सब्जियों का उपयोग छोड़ना नहीं चाहिए। कच्चा करेला भी अवश्य खाया जा सकता है। मैंने तो खाया है। कुछ ताजे करेले लो, उनको पीस लो और उसमें नींबू निचोड़ दो; लेकिन किसी समय कोई सब्जी न मिले तो उसके बिना ही काम चलाना चाहिए। उसके बदले किशमिश लेनी चाहिए। सुधरे हुए स्वास्थ्यको<noinclude></noinclude> oeuvpyp90ntced3i3uvrc9ylnaui7nq 675268 675267 2026-08-30T14:21:26Z Manikantkmr 5554 675268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|४६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरा तो ऐसा ही है, क्योंकि यहाँ तो रहनेके स्थानपर ही सबको सब क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। मुझे तीन कोठरियाँ दी गई हैं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने तो दक्षिण आफ्रिका और यहां भी जेलमें एक ही कोठरीमें सब क्रियाएं की हैं, करनी पड़ी हैं। तुम्हारा २६ मईका पत्र, हम दोनोंको, लम्बा होनेके बावजूद संक्षिप्त और पर्याप्त लगा है। उसमें एक शब्द भी फिजूल नहीं है। यदि कुछ रह गया हो तो पत्र उसी हद तक अपूर्ण है लेकिन उससे कुछ रह जानेका आभास नहीं होता। २६ मईका यह पत्र १० जूनके पत्रके बाद मिला। कल ही मिला है। अब और अधिक नहीं लिखूंगा। मेरा खयाल है मैंने तुम्हारे सब प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है। अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें जिन लोगोंके पत्र साथ हो उनके नाम अवश्य देना। यह पत्र दो हिस्सोंमें लिखा गया है। एक हिस्सा कल रात लिखा था। खुशालभाईकी सेवामें तो अभी पुरुषोत्तम ही है न? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] मीराबहन यदि वहां न हो अथवा अत्यन्त व्यस्त हो तो रुई भेजने की बातपर तुम फुरसतसे अमल करना। बालकृष्णका उत्तर अब फिर कभी। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११३) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४५९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२३ जून, १९३०}} चि० प्रेमा, मुझे तुम्हारा सुन्दर पत्र मिला। यदि मुझे सचमुच तुम्हारे पत्रकी जरूरत महसूस न हो तो केवल औपचारिकतावश में तुमसे उसकी मांग न करूँ। धुरन्धर और कमला मुझे बहुत अच्छे लगे। दूसरी बहनसे तो न जाने कब मिलना हो। तुम्हें कच्ची सब्जियों का उपयोग छोड़ना नहीं चाहिए। कच्चा करेला भी अवश्य खाया जा सकता है। मैंने तो खाया है। कुछ ताजे करेले लो, उनको पीस लो और उसमें नींबू निचोड़ दो; लेकिन किसी समय कोई सब्जी न मिले तो उसके बिना ही काम चलाना चाहिए। उसके बदले किशमिश लेनी चाहिए। सुधरे हुए स्वास्थ्यको<noinclude></noinclude> 277jrww84i4aouxuwff7ehtxkgs5awk 675300 675268 2026-08-30T15:26:09Z Manikantkmr 5554 /* शोधित */ 675300 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|४६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरा तो ऐसा ही है, क्योंकि यहाँ तो रहनेके स्थानपर ही सबको सब क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। मुझे तीन कोठरियाँ दी गई हैं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने तो दक्षिण आफ्रिका और यहां भी जेलमें एक ही कोठरीमें सब क्रियाएं की हैं, करनी पड़ी हैं। तुम्हारा २६ मईका पत्र, हम दोनोंको, लम्बा होनेके बावजूद संक्षिप्त और पर्याप्त लगा है। उसमें एक शब्द भी फिजूल नहीं है। यदि कुछ रह गया हो तो पत्र उसी हद तक अपूर्ण है लेकिन उससे कुछ रह जानेका आभास नहीं होता। २६ मईका यह पत्र १० जूनके पत्रके बाद मिला। कल ही मिला है। अब और अधिक नहीं लिखूंगा। मेरा खयाल है मैंने तुम्हारे सब प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है।अबसे तुम जो पत्र लिखो उसमें जिन लोगोंके पत्र साथ हो उनके नाम अवश्य देना। यह पत्र दो हिस्सोंमें लिखा गया है। एक हिस्सा कल रात लिखा था। खुशालभाईकी सेवामें तो अभी पुरुषोत्तम ही है न? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :] मीराबहन यदि वहां न हो अथवा अत्यन्त व्यस्त हो तो रुई भेजने की बातपर तुम फुरसतसे अमल करना। बालकृष्णका उत्तर अब फिर कभी। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८११३) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''४५९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२३ जून, १९३०}} चि० प्रेमा, मुझे तुम्हारा सुन्दर पत्र मिला। यदि मुझे सचमुच तुम्हारे पत्रकी जरूरत महसूस न हो तो केवल औपचारिकतावश मैं तुमसे उसकी मांग न करूँ। धुरन्धर और कमला मुझे बहुत अच्छे लगे। दूसरी बहनसे तो न जाने कब मिलना हो। तुम्हें कच्ची सब्जियों का उपयोग छोड़ना नहीं चाहिए। कच्चा करेला भी अवश्य खाया जा सकता है। मैंने तो खाया है। कुछ ताजे करेले लो, उनको पीस लो और उसमें नींबू निचोड़ दो; लेकिन किसी समय कोई सब्जी न मिले तो उसके बिना ही काम चलाना चाहिए। उसके बदले किशमिश लेनी चाहिए। सुधरे हुए स्वास्थ्यको<noinclude></noinclude> 902y6u9shvf2kguag2509dme7wo8tsi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०९ 250 197552 675272 670080 2026-08-30T14:41:36Z Manikantkmr 5554 /* अशोधित */ 675272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh|पत्र पैट्रिक क्विनको|४६५}}</noinclude>फिरसे बिगाड़ नहीं लेना भूख यदि ज्यादा लगती है तो दूध-दहीका प्रमाण बढ़ाया जा सकता है। खर्चका खयाल न करना। अपने अन्तिम निर्णयके बारेमें बताना। किसी बातका उत्तर रह गया हो, तो फिर पूछ लेना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७१) की फोटो नकलसे। सौजन्य : प्रेमावहन कंटक {{C|{{larger|'''४६०. पत्र : कलावती त्रिवेदी'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२४ जून, १९३०}} वि० कलावती, अब तो तुम गूजराती अच्छी तरह समजती होगी। मुझे पत्र लिखो और सब ख्यालात बता दो। अब चित्त स्थिर है? क्या काम करती है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} जी० एन० ५२४५ की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''४६१. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२६ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, आशा है आपने खजूरोंके लिए आर्डर भेज दिया होगा। कृपया नमक और कमोड पॉट भिजवा दीजिए। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग २, पृष्ठ २६९ । ४३-३०<noinclude></noinclude> iiyhs7tz7g5hthzmyhhnjnjpz5rdwl4 675274 675272 2026-08-30T14:43:50Z Manikantkmr 5554 675274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Manikantkmr" />{{rh||पत्र पैट्रिक क्विनको|४६५}}</noinclude>फिरसे बिगाड़ नहीं लेना भूख यदि ज्यादा लगती है तो दूध-दहीका प्रमाण बढ़ाया जा सकता है। खर्चका खयाल न करना। अपने अन्तिम निर्णयके बारेमें बताना। किसी बातका उत्तर रह गया हो, तो फिर पूछ लेना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७१) की फोटो नकलसे। सौजन्य : प्रेमावहन कंटक {{C|{{larger|'''४६०. पत्र : कलावती त्रिवेदी'''}}}} {{Right|यरवडा मन्दिर}} {{Right|२४ जून, १९३०}} वि० कलावती, अब तो तुम गूजराती अच्छी तरह समजती होगी। मुझे पत्र लिखो और सब ख्यालात बता दो। अब चित्त स्थिर है? 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क्या काम करती है? {{Right|बापुके आशीर्वाद}} जी० एन० ५२४५ की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''४६१. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}} {{Right|२६ जून, १९३०}} प्रिय श्री क्विन, आशा है आपने खजूरोंके लिए आर्डर भेज दिया होगा। कृपया नमक और कमोड पॉट भिजवा दीजिए। {{Right|हृदयसे आपका}} {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] '''महात्मा गांधी : सोर्स मैटिरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड २, भाग २, पृष्ठ २६९ । ४३-३०<noinclude></noinclude> 6dpuc8h2xqe28j5fjtyi7rj5rjwbwk8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२५ 250 197568 675320 675132 2026-08-30T16:30:10Z Kumari Arpana Sinha 2191 675320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude> {{C|{{larger|'''परिशिष्ट ४'''}}}} {{C|{{larger|''''डेली टेलीग्राफ' के विवरणसे उद्धरण१'''}}}} 'डेली टेलीग्राफ' के विशेष सम्वाददाता, श्री अश्मीड बार्टलेट उसके इसी महीनेकी ६ तारीखके अंकमें लिखते हैं: पैगम्बर अब आजाद नहीं रह गया, उसे बड़ी हिफाजतसे पूनाके पास 'प्रेसीडेंसी' की सबसे आरामदेह जेल, यरवडामें नजरबन्द किया जा चुका है। उनके अनुयायियोंपर स्पष्ट अभियोग लगाये गये हैं, लेकिन गांधीके साथ ऐसा नहीं किया जायेगा । उनको १८२७ के अध्यादेश २५ के तहत, बिना कोई मुकदमा चलाये, बम्बई में नजरबंद रखा जायेगा। इस अध्यादेशकी शब्दावली ऐसी सामान्य रखी गई है कि सरकार उसके बल पर जिस किसीको भी ऐसे किसी भी अभियोगमें नजरबन्द कर सकती है जिसका किसी तरह यह अर्थ लगाया जा सके कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग होनेका अंदेशा है, या वह आंतरिक उपद्रव रोकनेके लिए नजरबन्द कर सकती है। इस अध्यादेशका प्रयोग आखिरी बार १९०६ में ट्रान्सवाल- हत्याकांडके वाद नाटू भाइयोंको नजरबन्द करनेके लिए किया गया था। उनकी गिरफ्तारी भी रातके सन्नाटेमें बहुत ही गुपचुप ढंगसे की गई। महात्मा सूरतके पास कराडीमें अपने शिविरमें गहरी नींद सो रहे थे। रातमें करीब १ बजे जिला पुलिस सुपरिटेंडेंटने जिला मजिस्ट्रेट और पुलिसके बीस सशस्त्र सिपाहियोंके साथ उनके कमरेमें प्रवेश किया। उन्होंने उनपर टार्चकी रोशनी डाली। महात्मा तुरन्त जाग गये। गांधी इस सबपर बहुत ही शांत चित्त बने रहे। उन्होंने बस इतना कहा कि वारंट उनको पढ़कर सुना दिया जाये और उनको अपने दांत साफ करनेकी अनुमति दी जाये। हिन्दुओंमें सोकर उठनेपर यह एक अनिवार्य धार्मिक कर्म होता है। दोनों अनुरोध मान लिये गये। थोड़ी ही देर बाद उनको एक लारीमें बैठा दिया गया। लारी पुलिसवालोंके साथ रेलवे स्टेशनकी ओर चल दी। वहाँ वे अपने पहरेदारोंके साथ अहमदाबाद-बम्बई एक्सप्रेस में लगे विशेष डिब्बेमें बोरीवलीके लिए सवार हुए, जहाँसे उनको मोटर द्वारा यरवडा जेल पहुँचाया जाना था। जेल पहुँचनेपर, वे अत्यन्त ही स्वस्थ तथा प्रफुल्लित दिख रहे थे और उन्होंने अपनी यात्राके सुप्रबन्धके लिए कृतज्ञता प्रकट की। कल समूची बम्बई नगरीमें यह एक आम चर्चा थी कि गांधीजी बस गिरफ्तार होने ही वाले हैं; और दोपहर बाद सरकारने अपनी कार्रवाईकी योजनाका ब्योरा <small>१. देखिए पृष्ठ ४२१-२२।<small> ४३-३१<noinclude></noinclude> 5g3wxyyyxr4waqetxo9ruai2bvjdtwc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२६ 250 197569 675322 675135 2026-08-30T16:32:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 675322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{Right|४८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>विदेशी सम्वाददाताओंको बतला दिया था, लेकिन पिछले तीन दिनोंके सख्त सेंसरके कारण उसके बारेमें एक शब्द भी तार द्वारा देशसे बाहर नहीं भेजा जा सका था।... सरकारका मुख्य उद्देश्य यह था कि आम जनताको इसकी खबर लगनेसे पहले ही गांधीको जेलमें बन्द कर दिया जाये, जिससे कि पूना तक उनकी यात्राके दौरान प्रदर्शनोंके फलस्वरूप दंगों और रक्तपातसे बचा जा सके। तार कार्यालयसे विदेशी समाचार-पत्रोंको तार द्वारा यह खबर भेजे जानेसे ही बम्बई भरके लोगोंको सरकारी योजनाकी जानकारी हो जाती। गांधीकी गिरफ्तारीका निर्णय अन्तिम रूपसे कुछ ही दिन पहले शिमलामें राज्य परिषद् (काउन्सिल ऑफ स्टेट) की बैठकमें किया गया था और तब ४ मईको गिरफ्तार करनेकी योजना थी। लेकिन उस दिन रविवार पड़नेके कारण उसे बदलनेका निर्णय किया गया और इसलिए सोमवारको रातके एक बजे (भारतीय समय) अर्थात् रविवारकी रातके १२ बजेके बाद सोमवार शुरू होनेपर सूरतमें उनको गिरफ्तार करनेका निर्णय किया गया था। श्री हाट्सनने मुझे अपना कार्यक्रम सूचित करनेकी कृपा की। उसके अनुसार गांधीको बम्बई से १३ मीलकी दूरी पर बोरीवली नामक एक छोटे-से स्टेशनपर उतार- कर वहाँसे कार द्वारा उनको पूना भेजा जाना था।... [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू,''' २७-५-१९३०<noinclude></noinclude> ild8e8pb05mshabmqdfkgr6slv20vas पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३ 250 197622 675317 674417 2026-08-30T15:53:50Z Juhi1986 6803 675317 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ |- | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || पन्द्रह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || सोलह |- | १. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०) || १ |- | २. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०) || १ |- | ३. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ४. || पत्र : नानीबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ५. || पत्र : मनु गांधीको (३-७-१९३०) || ३ |- | ६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०) || ३ |- | ७. || पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (५-७-१९३०) || ४ |- | ८. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (५-७-१९३०) || ४ |- | ९. || पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३०) || ५ |- | १०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (६-७-१९३०) || ५ |- || ११. || पत्र : डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०) || ६ |- | १२. || पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०) || ६ |- | १३. || पत्र : मीराबहनको (७-७-१९३०) || ७ |- | १४. || पत्र : नारणदास गांधीको (७-७-१९३०) || ८ |- | १५. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (७-७-१९३०) || ९ |- | १६. || पत्र : आर॰ वी॰ मार्टिनको (८-७-१९३०) || १० |- | १७. || पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०) || १३ |- | १८. || पत्र : प्रभावतीको (८-७-१९३०) || १४ |- | १९. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०) || १४ |- | २०. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (८-७-१९३०) || १४ |- | २१. || पत्र : शारदा सी॰ शाहको (९-७-१९३०) || १५ |- | २२. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०) || १५ |- | २३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २५. || पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०) || १७ |- | २६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०) || १७ |- | २७. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१३-७-१९३०) || १८ |- | २८. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०) || १८ |}<noinclude></noinclude> pylfgid4jdbanke1hq0rz0zc9g1ndwx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४ 250 197623 675315 674418 2026-08-30T15:53:13Z Juhi1986 6803 675315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||अठारह|}}</noinclude>{|width=100% |- | २९. || पत्र : दुर्गा गिरिको (१३-७-१९३०) || १९ |- | ३०. || पत्र : मीराबहनको (१४-७-१९३०) || २० |- |३१. || पत्र : कुसुम देसाईको (१४-७-१९३०) || २१ |- | ३२. || पत्र : मणिबन पटेलको (१४-७-१९३०) || २२ |- | ३३. || पत्र : हरिप्रसादको (१४-७-१९३०) || २२ |- | ३४. || पत्र : नारणदास गांधीको (१३/१५-७-१९३०) || २३ |- | ३५. || पत्र प्रभावतीको (१५-७-१९३०) || २५ |- | ३६. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१५-७-१९३०) || २५ |- | ३७. || पत्र : एस॰ एस॰ एल॰ पोलकको (१६-७-१९३०) || २५ |- | ३८. || पत्र गोविन्द पटेलको (१७-७-१९३०) || २६ |- | ३९. || पत्र : मीराबहनको (१८-७-१९३०) || २७ |- | ४०. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (१८-७-१९३०) || २७ |- | ४१. || पत्र : नारणदास गांधीको (१८-७-१९३०) || २८ |- | ४२. || पत्र प्रभावतीको (१८-७-१९३०) || २८ |- | ४३. || पत्र : शिवाभाईको (१९-७-१९३०) || २९ |- | ४४. || पत्र : दूधीवन देसाईको (१९-७-१९३०) || २९ |- | ४५. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१९-७-१९३०) || ३० |- | ४६. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१९-७-१९३०) || ३० |- | ४७. || पत्र : प्रेमावहन कंटकको (१९-७-१९३०) || ३१ |- | ४८. || पत्र : लालजी परमारको (१९-७-१९३०) || ३१ |- | ४९. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१९-७-१९३०) || ३२ |- | ५०. || पत्र : रमाबहन जोशीको (१९-७-१९३०) || ३२ |- | ५१. || पत्र : मीराबहनको (२०-७-१९३०) || ३३ |- | ५२. || पत्र : पैट्रिक क्विनको (२०-७-१९३०) || ३४ |- | ५३. || पत्र : पैट्रिक विवनको (२०-७-१९३०) || ३५ |- | ५४. || पत्र : रतिलाल शाहको (२०-७-१९३०) || ३५ |- | ५५. || पत्र पुरुषोत्तम डी॰ सरैयाको (२०-७-१९३०) || ३६ |- | ५६. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२०-७-१९३०) || ३६ |- | ५७. || पत्र : जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (२१-७-१९३०) || ३७ |- | ५८. || पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२१-७-१९३०) || ३७ |- | ५९. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२१-७-१९३०) ||३८ |- | ६०. || तार वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२२-७-१९३०) || ३८ |- | ६१. || पत्र जी॰ ए॰ नटेसनको (२२-७-१९३०) || ३९ |- | ६२. || पत्र : नारणदास गांधीको (१८/२२-७-१९३०) || ३९ |- | ६३. || ज्ञापिका : मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको (२३-७-१९३०) || ४३ |- | ६४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२३-७-१९३०) || ४५ |}<noinclude></noinclude> k5xzjn3lebukp37y77zff9il3mtpw3j पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५ 250 197624 675270 670334 2026-08-30T14:36:54Z Juhi1986 6803 /* शोधित */ 675270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||उन्नीस|}}</noinclude>{|width=100% |- | ६५. || पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२६-७-१९३०) ||४६ |- | ६६. || पत्र बली और कुमीको (२६-७-१९३०) ||४६ |- | ६७. || पत्र : रामी गांधीको (२६-७-१९३०) ||४७ |- | ६८. || पत्र : मनु गांधीको (२६-७-१९३०) ||४७ |- | ६९. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (२६-७-१९३०) ||४८ |- | ७०. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (२७-७-१९३०) ||४८ |- | ७१. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२७-७-१९३०) ||४९ |- | ७२. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२७-७-१९३०) ||४९ |- | ७३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (२७-७-१९३०) || ५० |- | ७४. || पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२७-७-१९३०) ||५० |- | ७५. || मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (२७-७-१९३०) ||५१ |- | ७६. || पत्र : विठ्ठलदास जेराजाणीको (२७-७-१९३०) ||५१ |- | ७७. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२७-७-१९३०) ||५१ |- | ७८. || पत्र : मीराबहनको (२८-७-१९३०) ||५२ |- | ७९. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२८-७-१९३०) ||५३ |- | ८०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२८-७-१९३०) ||५३ |- | ८१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२८-७-१९३०) || ५४ |- | ८२. || पत्र : प्रभावतीको (२८-७-१९३०) ||५४ |- | ८३. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (२८-७-१९३०) ||५५ |- | ८४. || पत्र : मणिबहन पटेलको (२८-७-१९३०) ||५५ |- | ८५. || पत्र : शूरजी वल्लभदासको (२९-७-१९३०) ||५६ |- | ८६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२९-७-१९३०) ||५६ |- | ८७. || पत्र : नारणदास गांधीको (२८/३१-७-१९३०) ||५७ |- | ८८. || टिप्पणी: मु० रा० जयकरको (२-८-१९३०) ||६० |- | ८९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२-८-१९३०) ||६१ |- | ९०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२-८-१९३०) ||६१ |- | ९१. || पत्र : कमलनयन बजाजको (२-८-१९३०) ||६२ |- | ९२. || पत्र: शारदा सी० शाहको (३-८-१९३०) ||६३ |- | ९३. || पत्र : कुसुम देसाईको (३-८-१९३०) ||६३ |- | ९४. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (३-८-१९३०) ||६४ |- | ९५. || पत्र : मीराबहनको (४-८-१९३०) ||६४ |- | ९६. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (४-८-१९३०) ||६५ |- | ९७. || पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (४-८-१९३०) ||६५ |- | ९८. || पत्र : रुक्मिणी बजाजको (४-८-१९३०) ||६६ |- | ९९. || पत्र : व्रजकृष्ण चाँदीवालाको (४-८-१९३०) ||६६ |- | १००. || पत्र : एक आश्रमवासीको (५-८-१९३० से पूर्व) ||६७ |}<noinclude></noinclude> 28wx6dd7iy49ikt6o8348nxoewo3g59 675314 675270 2026-08-30T15:51:48Z Juhi1986 6803 675314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||उन्नीस|}}</noinclude>{|width=100% |- | ६५. || पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२६-७-१९३०) ||४६ |- | ६६. || पत्र बली और कुमीको (२६-७-१९३०) ||४६ |- | ६७. || पत्र : रामी गांधीको (२६-७-१९३०) ||४७ |- | ६८. || पत्र : मनु गांधीको (२६-७-१९३०) ||४७ |- | ६९. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (२६-७-१९३०) ||४८ |- | ७०. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (२७-७-१९३०) ||४८ |- | ७१. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२७-७-१९३०) ||४९ |- | ७२. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२७-७-१९३०) ||४९ |- | ७३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (२७-७-१९३०) || ५० |- | ७४. || पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२७-७-१९३०) ||५० |- | ७५. || मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (२७-७-१९३०) ||५१ |- | ७६. || पत्र : विठ्ठलदास जेराजाणीको (२७-७-१९३०) ||५१ |- | ७७. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२७-७-१९३०) ||५१ |- | ७८. || पत्र : मीराबहनको (२८-७-१९३०) ||५२ |- | ७९. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२८-७-१९३०) ||५३ |- | ८०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२८-७-१९३०) ||५३ |- | ८१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२८-७-१९३०) || ५४ |- | ८२. || पत्र : प्रभावतीको (२८-७-१९३०) ||५४ |- | ८३. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (२८-७-१९३०) ||५५ |- | ८४. || पत्र : मणिबहन पटेलको (२८-७-१९३०) ||५५ |- | ८५. || पत्र : शूरजी वल्लभदासको (२९-७-१९३०) ||५६ |- | ८६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२९-७-१९३०) ||५६ |- | ८७. || पत्र : नारणदास गांधीको (२८/३१-७-१९३०) ||५७ |- | ८८. || टिप्पणी: मु॰ रा॰ जयकरको (२-८-१९३०) ||६० |- | ८९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२-८-१९३०) ||६१ |- | ९०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२-८-१९३०) ||६१ |- | ९१. || पत्र : कमलनयन बजाजको (२-८-१९३०) ||६२ |- | ९२. || पत्र: शारदा सी॰ शाहको (३-८-१९३०) ||६३ |- | ९३. || पत्र : कुसुम देसाईको (३-८-१९३०) ||६३ |- | ९४. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (३-८-१९३०) ||६४ |- | ९५. || पत्र : मीराबहनको (४-८-१९३०) ||६४ |- | ९६. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (४-८-१९३०) ||६५ |- | ९७. || पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (४-८-१९३०) ||६५ |- | ९८. || पत्र : रुक्मिणी बजाजको (४-८-१९३०) ||६६ |- | ९९. || पत्र : व्रजकृष्ण चाँदीवालाको (४-८-१९३०) ||६६ |- | १००. || पत्र : एक आश्रमवासीको (५-८-१९३० से पूर्व) ||६७ |}<noinclude></noinclude> bqaao7lzi94jvsgw01nj0dvuah9z62w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६ 250 197625 675284 670335 2026-08-30T14:57:43Z Juhi1986 6803 /* अशोधित */ 675284 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Juhi1986" />{{rh||बीस|}}</noinclude>{|width=100% |- |१०१. ||पत्र नारणदास गांधीको (३/५-८-१९३०)||६७ |- |१०२. ||पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (५-८-१९३०)||७१ |- |१०३. ||पत्र : राधावन गांधीको (८-८-१९३०)||७२ |- | १०४. ||पत्र : बलीबहन वोराको (८-८-१९३०)||७२ |- |१०५. ||पत्र : मैत्री गिरिको (८-८-१९३०)||७३ |- |१०६. ||पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (८-८-१९३०)||७३ |- |१०७. ||पत्र : रुक्मिणी बजाजको (८-८-१९३०)||७४ |- |१०८. ||पत्र : शारदा सी० शाहको (९-८-१९३०)||७४ |- |१०९. ||पत्र : प्रभावतीको (९-८-१९३०)||७५ |- |११०. ||पत्र : सत्यादेवी गिरिको (९-८-१९३०)||७५ |- |१११. ||पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (९-८-१९३०)||७६ |- |११२. ||पत्र : मीराबहनको (१०-८-१९२०)||७६ |- |११३. ||पत्र : शिवाभाई पटेलको (१०-८-१९३०)||७७ |- |११४. ||पत्र : हरिच्छा देसाईको (१०-८-१९३०)||७८ |- |११५. ||पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (१०-८-१९३०)||७८ |- | ११६. ||पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (११-८-१९३०)||७९ |- |११७. ||पत्र : वा० गो० देसाईको (११-८-१९३०)||७९ |- |११८. ||पत्र : नारणदास गांधीको (१२-८-१९३०)||८० |- |११९. ||पत्र : सप्रू और जयकरको (१५-८-१९३०)||८२ |- |१२०. ||पत्र : राधाबहन गांधीको (१८-८-१९३०)||८५ |- |१२१. ||पत्र : प्रेमावहन कंटकको (१८-८-१९३०)||८५ |- |१२२. ||पत्र : वसुमती पण्डितको (१८-८-१९३०)||८६ |- |१२३. ||पत्र : रुक्मिणी बजाजको (१८-८-१९३०)||८६ |- |१२४. ||पत्र : कुँवरजी पारेखको (१८-८-१९३०)||८६ |- |१२५. ||पत्र : रेहाना तैयबजीको (१८-८-१९३०)||८७ |- |१२६. ||पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (१८-८-१९३०)||८७ |- | १२७. ||पत्र : मणिवहन पटेलको (१८-८-१९३०)||८८ |- |१२८. ||पत्र : प्रभावतीको (१८-८-१९३०)||८८ |- |१२९. ||पत्र : जयप्रकाश नारायणको (१८-८-१९३०)||८९ |- |१३०. ||पत्र : मीराबहनको (१८-८-१९३०)||८९ |- |१३१. ||पत्र नारणदास गांधीको (१९-८-१९३० ) ९० १३२. पत्र रमावहन जोशीको (२१-८-१९३०) ९३ १३३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२१-८-१९३०) ९३ १३४. पत्र : नारायण मोरेश्वर सरेको (२१-८-१९३०) १३५. पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-८-१९३०) ९४ ९४ १३६. पत्र मथुरादास पुरुषोत्तमको (२१-८-१९३०) ९५ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 1nislxx7vh292enkjsgc8wg3nnalmmw 675294 675284 2026-08-30T15:13:08Z Juhi1986 6803 /* शोधित */ 675294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||बीस|}}</noinclude>{|width=100% |- |१०१. ||पत्र नारणदास गांधीको (३/५-८-१९३०)||६७ |- |१०२. ||पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (५-८-१९३०)||७१ |- |१०३. ||पत्र : राधावन गांधीको 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: मोतीबहन चोकसीको (८-९-१९३०)||१३२ |- |१८८. ||पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-९-१९३०)||१३२ |- |१८९. ||पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (८-९-१९३०)||१३३ |- |१९०. ||पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (८-९-१९३०)||१३३ |- |१९१. ||पत्र : नारणदास गांधीको (५/९-९-१९३०)||१३४ |- |१९२. ||पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१०-९-१९३०)||१३६ |- |१९३. ||पत्र : मोतीबहन चोकसीको (१०-९-१९३० के लगभग)||१३७ |- |१९४. ||पत्र : रमाबहन जोशीको (११-९-१९३०)||१३७ |- |१९५. ||पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (११-९-१९३०)||१३८ |- |१९६. ||पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-९-१९३०)||१३८ |- |१९७ ||पत्र : निर्मला देसाईको (११-९-१९३०)||१३९ |- |१९८. ||पत्र : बलभद्रको (११-९-१९३०)||१३९ |- |१९९. ||पत्र : लीलावती आसरको (११-९-१९३०)||१४० |- |२००. ||पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (११-९-१९३०)||१४० |- |२०१. ||पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-९-१९३०)||१४१ |- |२०२. ||पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (११-९-१९३०)||१४१ |- |२०३. ||पत्र : बनारसीलाल बजाजको (११-९-१९३०)||१४२ |- |२०४. ||पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-९-१९३०)||१४२ |- |२०५. ||पत्र : रुक्मिणी बजाजको (१२-९-१९३०)||१४३ |- |२०६. ||पत्र : कुसुम देसाईको (१२-९-१९३०)||१४३ |- |२०७. ||पत्र : माधवदासको (१२-९-१९३०)||१४४ |- |२०८. ||पत्र : मणिबहन परीसको (१३-९-१९३०)||१४४ |}<noinclude></noinclude> 0k30cruyxvmsxe6anu15w75yrtb7nd4 675310 675307 2026-08-30T15:48:47Z Juhi1986 6803 675310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||बाईस|}}</noinclude>{|width=100% |- |१७३. ||पत्र: शारदा सी॰ शाहको (६-९-१९३०)||१२३ |- |१७४. ||पत्र: प्रेमावहन कंटकको (६-९-१९३०)||१२४ |- |१७५. ||पत्र : लीलावती आसरको (६-९-१९३०)||१२४ |- |१७६. ||पत्र : बेचरदास दोषीको (६-९-१९३०)||१२५ |- |१७७. ||पत्र : कमलनयन बजाजको (६-९-१९३०)||१२६ |- |१७८. ||पत्र : मीराबहनको (७-९-१९३०)||१२६ |- |१७९. ||पत्र : मणिबहन पटेलको (७-९-१९३०)||१२८ |- |१८०. ||पत्र : सुशीला गांधीको (७-९-१९३०)||१२८ |- |१८१. ||पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (७-९-१९३०)||१२९ |- |१८२. ||पत्र : रेहाना तैयबजीको (७-९-१९३०)||१२९ |- |१८३. ||पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको (७-९-१९३०)||१३० |- |१८४. ||पत्र कलावती त्रिवेदीको (७-९-१९३०)||१३० |- |१८५. ||पत्र जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (८-९-१९३०)||१३१ |- |१८६. ||पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको (८-९-१९३०)||१३१ |- |१८७. ||पत्र : मोतीबहन चोकसीको (८-९-१९३०)||१३२ |- |१८८. ||पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-९-१९३०)||१३२ |- |१८९. ||पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (८-९-१९३०)||१३३ |- |१९०. ||पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (८-९-१९३०)||१३३ |- |१९१. ||पत्र : नारणदास गांधीको (५/९-९-१९३०)||१३४ |- |१९२. ||पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१०-९-१९३०)||१३६ |- |१९३. ||पत्र : मोतीबहन चोकसीको (१०-९-१९३० के लगभग)||१३७ |- |१९४. ||पत्र : रमाबहन जोशीको (११-९-१९३०)||१३७ |- |१९५. ||पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (११-९-१९३०)||१३८ |- |१९६. ||पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-९-१९३०)||१३८ |- |१९७ ||पत्र : निर्मला देसाईको (११-९-१९३०)||१३९ |- |१९८. ||पत्र : बलभद्रको (११-९-१९३०)||१३९ |- |१९९. ||पत्र : लीलावती आसरको (११-९-१९३०)||१४० |- |२००. ||पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (११-९-१९३०)||१४० |- |२०१. ||पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-९-१९३०)||१४१ |- |२०२. ||पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (११-९-१९३०)||१४१ |- |२०३. ||पत्र : बनारसीलाल बजाजको (११-९-१९३०)||१४२ |- |२०४. ||पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-९-१९३०)||१४२ |- |२०५. ||पत्र : रुक्मिणी बजाजको (१२-९-१९३०)||१४३ |- |२०६. ||पत्र : कुसुम देसाईको (१२-९-१९३०)||१४३ |- |२०७. ||पत्र : माधवदासको (१२-९-१९३०)||१४४ |- |२०८. ||पत्र : मणिबहन परीसको (१३-९-१९३०)||१४४ |}<noinclude></noinclude> 64u1aprlucv4t4kdsb7eosm5nbkwdkh