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पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१३६
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>
(१२५)
गया है। यह १० करोड़ जनता का धर्मग्रंथ है और उनके द्वारा यह उतना ही भगवत्प्रेरित माना जाता है, अंगरेज पादरियों द्वारा जितनी भग-वत्प्रेरित
'बाइबिल' मानी जाती है। पंडित लोग वेद और उपनिषद की बातें कर सकते हैं, और कुछ उनका अध्ययन भी कर सकते हैं, कुछ कह सकते हैं कि
उनका विश्वास पुराणों के साथ संलग्न है; किंतु हिंदुस्तान की अधिकांश जनता के लिए चाहे वह विद्वान हो अथवा अविद्वान, चरित्र का एक मात्र प्रतिमान तुलसी-कृत रामायण है। हिंदुस्तान के लिए सचमुच यह परम सौभाग्य की बात है कि यह ऐसा है, क्योंकि इसने इस क्षेत्र को शैव धर्म की तांत्रिक अश्लीलताओं से बचा लिया है। रामानन्द उत्तरी भारत के प्रारम्भिक रक्षक हैं, जिन्होंने उस दुर्भाग्य से इसे बचाया जो कि बंगाल के ऊपर पड़ा। लेकिन तुलसीदास तो वह महान देवदूत हैं जो उनके सिद्धान्त को पूर्व और पश्चिम ले गए तथा उसे
स्थिर विश्वास में परिणत कर दिया ।
जिस धर्म का उपदेश उन्होंने किया,वह अत्यन्त सरल साथ ही विशिष्ट-राम नाम में पूर्ण विश्वास है। अनैतिकता के उस युग में जब हिन्दू समाज के बन्धन शिथिल हो रहे थे और मुगल साम्राज्य
संगठित हो रहा था, इस ग्रन्थ की सबसे विशिष्ट बात इसकी कठोर नैतिकता है, जो इस शब्द के किसी भी अर्थ में मानी जा सकती है । तुलसी प्रतिवासी के प्रति अपने कर्तव्य की शिक्षा देनेवाले महान उपदेशक थे। बाल्मीकि ने भरत को कर्तव्य-परायणता, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति और सीता के पतिव्रत की प्रशंसा की है, लेकिन तुलसी ने तो
आदर्श ही प्रस्तुत कर दिया है।
इसी प्रकार उस घोर विलासिता के युग में, रामायण से बढ़कर मर्यादापूर्ण और पवित्र कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है । वह स्वयं कहते हैं और ठीक कहते हैं :-
"अति खल जे विषयी बग कागा
एहि सर निकट न जाहिं अभागा
संबुक भेक सेवार समाना
इहाँ न विषय कथा रस नाना
तेहि कारन आवत हियँ हारे
कामी काक बलाक बिचारे"
१. मूल में इन चौपाइयों के स्थान पर इनका यह भावार्थ दिया हुआ है-अनु०
"Here are no. prurient seductive stories, like snail's, frogs
and scmm on the pure water of Ram's legend; and therefore the
lustful crow and the greedy cranes, if they do come, are
disappointed."<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{c|(१२५)}}</noinclude>गया है। यह १० करोड़ जनता का धर्मग्रंथ है और उनके द्वारा यह उतना ही भगवत्प्रेरित माना जाता है, अंगरेज पादरियों द्वारा जितनी भग-वत्प्रेरित
'बाइबिल' मानी जाती है। पंडित लोग वेद और उपनिषद की बातें कर सकते हैं, और कुछ उनका अध्ययन भी कर सकते हैं, कुछ कह सकते हैं कि
उनका विश्वास पुराणों के साथ संलग्न है; किंतु हिंदुस्तान की अधिकांश जनता के लिए चाहे वह विद्वान हो अथवा अविद्वान, चरित्र का एक मात्र प्रतिमान तुलसी-कृत रामायण है। हिंदुस्तान के लिए सचमुच यह परम सौभाग्य की बात है कि यह ऐसा है, क्योंकि इसने इस क्षेत्र को शैव धर्म की तांत्रिक अश्लीलताओं से बचा लिया है। रामानन्द उत्तरी भारत के प्रारम्भिक रक्षक हैं, जिन्होंने उस दुर्भाग्य से इसे बचाया जो कि बंगाल के ऊपर पड़ा। लेकिन तुलसीदास तो वह महान देवदूत हैं जो उनके सिद्धान्त को पूर्व और पश्चिम ले गए तथा उसे
स्थिर विश्वास में परिणत कर दिया।
जिस धर्म का उपदेश उन्होंने किया,वह अत्यन्त सरल साथ ही विशिष्ट-राम नाम में पूर्ण विश्वास है। अनैतिकता के उस युग में जब हिन्दू समाज के बन्धन शिथिल हो रहे थे और मुगल साम्राज्य
संगठित हो रहा था, इस ग्रन्थ की सबसे विशिष्ट बात इसकी कठोर नैतिकता है, जो इस शब्द के किसी भी अर्थ में मानी जा सकती है । तुलसी प्रतिवासी के प्रति अपने कर्तव्य की शिक्षा देनेवाले महान उपदेशक थे। बाल्मीकि ने भरत को कर्तव्य-परायणता, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति और सीता के पतिव्रत की प्रशंसा की है, लेकिन तुलसी ने तो
आदर्श ही प्रस्तुत कर दिया है।
इसी प्रकार उस घोर विलासिता के युग में, रामायण से बढ़कर मर्यादापूर्ण और पवित्र कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है। वह स्वयं कहते हैं और ठीक कहते हैं:—
{{blockcenter|<poem>"अति खल जे विषयी बग कागा
एहि सर निकट न जाहिं अभागा
संबुक भेक सेवार समाना
इहाँ न विषय कथा रस नाना
तेहि कारन आवत हियँ हारे
कामी काक बलाक बिचारे"</poem>}}
१. मूल में इन चौपाइयों के स्थान पर इनका यह भावार्थ दिया हुआ है-अनु०
"Here are no. prurient seductive stories, like snail's, frogs
and scmm on the pure water of Ram's legend; and therefore the
lustful crow and the greedy cranes, if they do come, are
disappointed."<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{c|(१२५)}}</noinclude>गया है। यह १० करोड़ जनता का धर्मग्रंथ है और उनके द्वारा यह उतना ही भगवत्प्रेरित माना जाता है, अंगरेज पादरियों द्वारा जितनी भग-वत्प्रेरित
'बाइबिल' मानी जाती है। पंडित लोग वेद और उपनिषद की बातें कर सकते हैं, और कुछ उनका अध्ययन भी कर सकते हैं, कुछ कह सकते हैं कि
उनका विश्वास पुराणों के साथ संलग्न है; किंतु हिंदुस्तान की अधिकांश जनता के लिए चाहे वह विद्वान हो अथवा अविद्वान, चरित्र का एक मात्र प्रतिमान तुलसी-कृत रामायण है। हिंदुस्तान के लिए सचमुच यह परम सौभाग्य की बात है कि यह ऐसा है, क्योंकि इसने इस क्षेत्र को शैव धर्म की तांत्रिक अश्लीलताओं से बचा लिया है। रामानन्द उत्तरी भारत के प्रारम्भिक रक्षक हैं, जिन्होंने उस दुर्भाग्य से इसे बचाया जो कि बंगाल के ऊपर पड़ा। लेकिन तुलसीदास तो वह महान देवदूत हैं जो उनके सिद्धान्त को पूर्व और पश्चिम ले गए तथा उसे
स्थिर विश्वास में परिणत कर दिया।
जिस धर्म का उपदेश उन्होंने किया,वह अत्यन्त सरल साथ ही विशिष्ट-राम नाम में पूर्ण विश्वास है। अनैतिकता के उस युग में जब हिन्दू समाज के बन्धन शिथिल हो रहे थे और मुगल साम्राज्य
संगठित हो रहा था, इस ग्रन्थ की सबसे विशिष्ट बात इसकी कठोर नैतिकता है, जो इस शब्द के किसी भी अर्थ में मानी जा सकती है । तुलसी प्रतिवासी के प्रति अपने कर्तव्य की शिक्षा देनेवाले महान उपदेशक थे। बाल्मीकि ने भरत को कर्तव्य-परायणता, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति और सीता के पतिव्रत की प्रशंसा की है, लेकिन तुलसी ने तो
आदर्श ही प्रस्तुत कर दिया है।
इसी प्रकार उस घोर विलासिता के युग में, रामायण से बढ़कर मर्यादापूर्ण और पवित्र कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है। वह स्वयं कहते हैं और ठीक कहते हैं:—
{{blockcenter|<poem>"अति खल जे विषयी बग कागा
एहि सर निकट न जाहिं अभागा
संबुक भेक सेवार समाना
इहाँ न विषय कथा रस नाना
तेहि कारन आवत हियँ हारे
कामी काक बलाक बिचारे<ref>मूल में इन चौपाइयों के स्थान पर इनका यह भावार्थ दिया हुआ है―अनु॰
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{c|(१२५)}}</noinclude>गया है। यह १० करोड़ जनता का धर्मग्रंथ है और उनके द्वारा यह उतना ही भगवत्प्रेरित माना जाता है, अंगरेज पादरियों द्वारा जितनी भग-वत्प्रेरित
'बाइबिल' मानी जाती है। पंडित लोग वेद और उपनिषद की बातें कर सकते हैं, और कुछ उनका अध्ययन भी कर सकते हैं, कुछ कह सकते हैं कि
उनका विश्वास पुराणों के साथ संलग्न है; किंतु हिंदुस्तान की अधिकांश जनता के लिए चाहे वह विद्वान हो अथवा अविद्वान, चरित्र का एक मात्र प्रतिमान तुलसी-कृत रामायण है। हिंदुस्तान के लिए सचमुच यह परम सौभाग्य की बात है कि यह ऐसा है, क्योंकि इसने इस क्षेत्र को शैव धर्म की तांत्रिक अश्लीलताओं से बचा लिया है। रामानन्द उत्तरी भारत के प्रारम्भिक रक्षक हैं, जिन्होंने उस दुर्भाग्य से इसे बचाया जो कि बंगाल के ऊपर पड़ा। लेकिन तुलसीदास तो वह महान देवदूत हैं जो उनके सिद्धान्त को पूर्व और पश्चिम ले गए तथा उसे
स्थिर विश्वास में परिणत कर दिया।
जिस धर्म का उपदेश उन्होंने किया,वह अत्यन्त सरल साथ ही विशिष्ट-राम नाम में पूर्ण विश्वास है। अनैतिकता के उस युग में जब हिन्दू समाज के बन्धन शिथिल हो रहे थे और मुगल साम्राज्य
संगठित हो रहा था, इस ग्रन्थ की सबसे विशिष्ट बात इसकी कठोर नैतिकता है, जो इस शब्द के किसी भी अर्थ में मानी जा सकती है । तुलसी प्रतिवासी के प्रति अपने कर्तव्य की शिक्षा देनेवाले महान उपदेशक थे। बाल्मीकि ने भरत को कर्तव्य-परायणता, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति और सीता के पतिव्रत की प्रशंसा की है, लेकिन तुलसी ने तो
आदर्श ही प्रस्तुत कर दिया है।
इसी प्रकार उस घोर विलासिता के युग में, रामायण से बढ़कर मर्यादापूर्ण और पवित्र कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है। वह स्वयं कहते हैं और ठीक कहते हैं:—
{{blockcenter|<poem>"अति खल जे विषयी बग कागा
एहि सर निकट न जाहिं अभागा
संबुक भेक सेवार समाना
इहाँ न विषय कथा रस नाना
तेहि कारन आवत हियँ हारे
कामी काक बलाक बिचारे<ref>मूल में इन चौपाइयों के स्थान पर इनका यह भावार्थ दिया हुआ है―अनु॰
"Here are no prurient seductive stories, like snail's, frogs
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>१० {{c|(१४५)}}
(१) एक रामायण चितामणि त्रिपाठी(१४३) द्वारा लिखी गई थी।
(२) मानदास (१७२) ने राम चरित्र लिखा जो बाल्मीकि रामायण और
हनुमान नाटक पर आधृत है।
(३) भगवंतराय खींची (३३३) ने एक रामायण लिखी।
(४) शंभुनाथ (३५७) ने ‘राम विलास' नामक एक रामायण लिखी।।
(५) गुलाब सिंह (४८६) ने एक वेदांतिक रामायण लिखी (इसका जो
अर्थ हो)।
(६) गजराज उपाध्या (५८५) ने एक रामायण लिखी।
(७) सहज राम (५९२) ने रघुवंश और हनुमान नाटक के अधार पर
एक रामायण लिखी।
(८) शंकर त्रिपाठी (६१३) ने कवित्त छंदों में एक रामायण लिखी।
(९) ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी (७१२) ने बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया।
(१०) चंद्र झा (७०२) ने एक रामायण लिखी।
(११) जानकी प्रसाद (६९५) ने ‘राम निवास रामायण' लिखी।
(१२) समर सिंह (७२५) ने एक रामायण लिखी।
(१३) पूरन चंद जूथ (८५८) ने राम रहस्य रामायण लिखी।
इस सूची में वे ग्रंथ नहीं आए हैं, जिनमें राम कथा का कोई विशेष अंग
ही वर्णित हुआ है, और न तो इसमें वे ही ग्रंथ हैं, जो इधर पिछले वर्षों में
गद्य और पद्य में लिखे गए हैं। इनमें भाषा और शैली की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ
पंडित छोटूराम तिवारी (सं० ७०५) लिखित (१४) रामकथा हैं।
{{c| ३. पंचायतनामा}}
[पंचायतनामे का प्रत्यक्षरीकरण और उसका अंग्रेजी अनुवाद मूल ग्रंथ
के प्रारंभ में ही भूमिका के अनंतर 'शुद्धिपत्र और परिशिष्ट' के मध्य में दिया गया है। इसे अ-स्थान समझकर अनुवाद में छठें अध्याय के तृतीय परिशिष्ट के रूप में दिया जा रहा है । पंचायतनामा का अंग्रेजी प्रत्यक्षरीकरण न देकर उसे देवनागरी लिपि में दिया जा रहा है और इसका जो अंग्रेजी अनुवाद
मूल ग्रंथ में है, उसे यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है, उसका हिंदी अनुवाद
नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है।
पंचायतनामें की केवल प्रथम छह पंक्तियाँ देवनागरी लिपि में हैं। यही
तुलसीदास की लिखी मानी जाती हैं। शेष अंश फारसी लिपि में है और तुलसीकृत नहीं माना जाता। पंचायतनामे की प्रतिच्छवि डा० माताप्रसाद गुप्त के ग्रंथ 'तुलसीदास' में देखी जा सकती है।
—अनुवादक]<noinclude></noinclude>
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(१) एक रामायण चितामणि त्रिपाठी(१४३) द्वारा लिखी गई थी।
(२) मानदास (१७२) ने राम चरित्र लिखा जो बाल्मीकि रामायण और
हनुमान नाटक पर आधृत है।
(३) भगवंतराय खींची (३३३) ने एक रामायण लिखी।
(४) शंभुनाथ (३५७) ने ‘राम विलास' नामक एक रामायण लिखी।।
(५) गुलाब सिंह (४८६) ने एक वेदांतिक रामायण लिखी (इसका जो
अर्थ हो)।
(६) गजराज उपाध्या (५८५) ने एक रामायण लिखी।
(७) सहज राम (५९२) ने रघुवंश और हनुमान नाटक के अधार पर
एक रामायण लिखी।
(८) शंकर त्रिपाठी (६१३) ने कवित्त छंदों में एक रामायण लिखी।
(९) ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी (७१२) ने बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया।
(१०) चंद्र झा (७०२) ने एक रामायण लिखी।
(११) जानकी प्रसाद (६९५) ने ‘राम निवास रामायण' लिखी।
(१२) समर सिंह (७२५) ने एक रामायण लिखी।
(१३) पूरन चंद जूथ (८५८) ने राम रहस्य रामायण लिखी।
इस सूची में वे ग्रंथ नहीं आए हैं, जिनमें राम कथा का कोई विशेष अंग
ही वर्णित हुआ है, और न तो इसमें वे ही ग्रंथ हैं, जो इधर पिछले वर्षों में
गद्य और पद्य में लिखे गए हैं। इनमें भाषा और शैली की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ
पंडित छोटूराम तिवारी (सं॰ ७०५) लिखित (१४) रामकथा हैं।
{{c| ३. पंचायतनामा}}
[पंचायतनामे का प्रत्यक्षरीकरण और उसका अंग्रेजी अनुवाद मूल ग्रंथ
के प्रारंभ में ही भूमिका के अनंतर 'शुद्धिपत्र और परिशिष्ट' के मध्य में दिया गया है। इसे अ-स्थान समझकर अनुवाद में छठें अध्याय के तृतीय परिशिष्ट के रूप में दिया जा रहा है । पंचायतनामा का अंग्रेजी प्रत्यक्षरीकरण न देकर उसे देवनागरी लिपि में दिया जा रहा है और इसका जो अंग्रेजी अनुवाद
मूल ग्रंथ में है, उसे यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है, उसका हिंदी अनुवाद
नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है।
पंचायतनामें की केवल प्रथम छह पंक्तियाँ देवनागरी लिपि में हैं। यही
तुलसीदास की लिखी मानी जाती हैं। शेष अंश फारसी लिपि में है और तुलसीकृत नहीं माना जाता। पंचायतनामे की प्रतिच्छवि डा० माताप्रसाद गुप्त के ग्रंथ 'तुलसीदास' में देखी जा सकती है।
—अनुवादक]<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{Rh|१०|(१४५)|}}</noinclude>
(१) एक रामायण चितामणि त्रिपाठी(१४३) द्वारा लिखी गई थी।
(२) मानदास (१७२) ने राम चरित्र लिखा जो बाल्मीकि रामायण और
हनुमान नाटक पर आधृत है।
(३) भगवंतराय खींची (३३३) ने एक रामायण लिखी।
(४) शंभुनाथ (३५७) ने ‘राम विलास' नामक एक रामायण लिखी।।
(५) गुलाब सिंह (४८६) ने एक वेदांतिक रामायण लिखी (इसका जो
अर्थ हो)।
(६) गजराज उपाध्या (५८५) ने एक रामायण लिखी।
(७) सहज राम (५९२) ने रघुवंश और हनुमान नाटक के अधार पर
एक रामायण लिखी।
(८) शंकर त्रिपाठी (६१३) ने कवित्त छंदों में एक रामायण लिखी।
(९) ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी (७१२) ने बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया।
(१०) चंद्र झा (७०२) ने एक रामायण लिखी।
(११) जानकी प्रसाद (६९५) ने ‘राम निवास रामायण' लिखी।
(१२) समर सिंह (७२५) ने एक रामायण लिखी।
(१३) पूरन चंद जूथ (८५८) ने राम रहस्य रामायण लिखी।
इस सूची में वे ग्रंथ नहीं आए हैं, जिनमें राम कथा का कोई विशेष अंग
ही वर्णित हुआ है, और न तो इसमें वे ही ग्रंथ हैं, जो इधर पिछले वर्षों में
गद्य और पद्य में लिखे गए हैं। इनमें भाषा और शैली की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ
पंडित छोटूराम तिवारी (सं॰ ७०५) लिखित (१४) रामकथा हैं।
{{c| ३. पंचायतनामा}}
[पंचायतनामे का प्रत्यक्षरीकरण और उसका अंग्रेजी अनुवाद मूल ग्रंथ
के प्रारंभ में ही भूमिका के अनंतर 'शुद्धिपत्र और परिशिष्ट' के मध्य में दिया गया है। इसे अ-स्थान समझकर अनुवाद में छठें अध्याय के तृतीय परिशिष्ट के रूप में दिया जा रहा है । पंचायतनामा का अंग्रेजी प्रत्यक्षरीकरण न देकर उसे देवनागरी लिपि में दिया जा रहा है और इसका जो अंग्रेजी अनुवाद
मूल ग्रंथ में है, उसे यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है, उसका हिंदी अनुवाद
नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है।
पंचायतनामें की केवल प्रथम छह पंक्तियाँ देवनागरी लिपि में हैं। यही
तुलसीदास की लिखी मानी जाती हैं। शेष अंश फारसी लिपि में है और तुलसीकृत नहीं माना जाता। पंचायतनामे की प्रतिच्छवि डा० माताप्रसाद गुप्त के ग्रंथ 'तुलसीदास' में देखी जा सकती है।—अनुवादक]<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{Rh|१०|(१४५)|}}</noinclude>
(१) एक रामायण चितामणि त्रिपाठी(१४३) द्वारा लिखी गई थी।
(२) मानदास (१७२) ने राम चरित्र लिखा जो बाल्मीकि रामायण और
हनुमान नाटक पर आधृत है।
(३) भगवंतराय खींची (३३३) ने एक रामायण लिखी।
(४) शंभुनाथ (३५७) ने ‘राम विलास' नामक एक रामायण लिखी।।
(५) गुलाब सिंह (४८६) ने एक वेदांतिक रामायण लिखी (इसका जो
अर्थ हो)।
(६) गजराज उपाध्या (५८५) ने एक रामायण लिखी।
(७) सहज राम (५९२) ने रघुवंश और हनुमान नाटक के अधार पर
एक रामायण लिखी।
(८) शंकर त्रिपाठी (६१३) ने कवित्त छंदों में एक रामायण लिखी।
(९) ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी (७१२) ने बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया।
(१०) चंद्र झा (७०२) ने एक रामायण लिखी।
(११) जानकी प्रसाद (६९५) ने ‘राम निवास रामायण' लिखी।
(१२) समर सिंह (७२५) ने एक रामायण लिखी।
(१३) पूरन चंद जूथ (८५८) ने राम रहस्य रामायण लिखी।
इस सूची में वे ग्रंथ नहीं आए हैं, जिनमें राम कथा का कोई विशेष अंग
ही वर्णित हुआ है, और न तो इसमें वे ही ग्रंथ हैं, जो इधर पिछले वर्षों में
गद्य और पद्य में लिखे गए हैं। इनमें भाषा और शैली की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ
पंडित छोटूराम तिवारी (सं॰ ७०५) लिखित (१४) रामकथा हैं।
{{c|३. पंचायतनामा}}
[पंचायतनामे का प्रत्यक्षरीकरण और उसका अंग्रेजी अनुवाद मूल ग्रंथ
के प्रारंभ में ही भूमिका के अनंतर 'शुद्धिपत्र और परिशिष्ट' के मध्य में दिया गया है। इसे अ-स्थान समझकर अनुवाद में छठें अध्याय के तृतीय परिशिष्ट के रूप में दिया जा रहा है । पंचायतनामा का अंग्रेजी प्रत्यक्षरीकरण न देकर उसे देवनागरी लिपि में दिया जा रहा है और इसका जो अंग्रेजी अनुवाद
मूल ग्रंथ में है, उसे यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है, उसका हिंदी अनुवाद
नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है।
पंचायतनामें की केवल प्रथम छह पंक्तियाँ देवनागरी लिपि में हैं। यही
तुलसीदास की लिखी मानी जाती हैं। शेष अंश फारसी लिपि में है और तुलसीकृत नहीं माना जाता। पंचायतनामे की प्रतिच्छवि डा० माताप्रसाद गुप्त के ग्रंथ 'तुलसीदास' में देखी जा सकती है।—अनुवादक]<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदुई साहित्य का इतिहास.pdf/११२
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{Rh||भूमिका|[८५}}</noinclude>हैं, और उनकी भाषा अत्यन्त कृत्रिम होती है। इस विशेष गाने के आविष्कारक जौनपुर के सुल्तान हुसेन शर्की बताए जाते हैं।<ref>विलर्ड ( Willard ), 'म्यूज़िक ऑव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान का संगत), १०८</ref>
'गज़ल' एक प्रकार की गीति कविता (ode) है जो रूप में क़सीदा के समान है, केवल अंतर है तो यही कि यह बहुत छोटी होती है, बारह पंक्तियों से अधिक नहीं होनी चाहिए। पिछली (पंक्ति) जिसे 'शाह बैत', या शाही पद्य, कहते हैं, में, क़सीदा की भाँति, लिखने वाले का तख़ल्लुस आना चाहिए।
कभी-कभी गज़ल में विशेष श्लेष शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार पहले पद्य के दो मिसरों का और आगे आने वाले पद्यों के अंतिम का समान रूप से या समान शब्दों से प्रारंभ और अंत हो सकता है; यह चीज़ वही है जिसे 'बाज़गश्त' कहते हैं।<ref>वली की ग़ज़ल जो 'दिल-रूबा' शब्दों से प्रारंभ होती है, और जो मेरे संस्करण के पृ॰ २३ पर है, उसका एक उदाहरण प्रस्तुत करती है, साथ ही वह जो 'सब चमन' शब्दों से प्रारंभ होती है, और जो २९ पर पढ़ी जा सकती है।</ref>
'चीस्तान', पद्य और गद्य में पहेली।
'ज़तलियत'। मीर जाफ़र ज़तली, जिन्होंने इन्हें अपना नाम दिया, की कविताओं की तरह रची गई कविताओं को इस प्रकार कहा जाता है, अर्थात् आधी फ़ारसी और आधी हिन्दुस्तानी।
'ज़िक्री'—'बयान', गाना जिसका विषय गंभीर और नैतिक रहता है। गुजरात में इसका जन्म हुआ, और काज़ी महमूद द्वारा हिन्दुस्तान में प्रचलित हुआ।<ref>विलर्ड (Willard), 'म्यूज़िक ऑव हिन्दुस्तान', पृ॰ ९३</ref>
'तकरीत' (Tacrỉt), अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा से भरी कविता को दिया गया नाम।<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/४२८
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<noinclude><pagequality level="1" user="प्रथम 07" /></noinclude>________________
( १९० )
( प्रथा ), २१२-१४, २२३ पृथ्वीभट १९८ पृथ्वीराजचरित्र १६२ पृथ्वीराज चौहान तृतीय) २-७,
१०-२०, २४-२५, २७, २६- ३२, ३६-३७, ४२.४२, ४५- ५३, ५७-६५, ६८-६६,७४- ८२,८७,६०,६३,६६-६८, २००, १०२-१०८, ११०० २३, १२६, १२०, १४३. ५०, १५२-५४, १५६-५६, १६१, १६३-६४, १६६-७२, १७४-७५, १७७, १८२, १८४, १६०-६२, १६५-६६, ११८, २००, २०६-२०८, २१०-२३, २२५ पृथ्वीराजप्रबंध ७, २४, १२६ पृथ्वीराज रहस्य की नवीनता ११२ पृथ्वीराज राठौर १६, १८८६
१२, १५२, १५६, १६२ पृथ्वीराजरासो (ग्रंथ) १.८, ११-१२, १८-२०, २२, २४- २५, २७-२६, २४-२५, २८. ४२, ४५, ४७-४८, ५१-५२ ५७, ५६, ६५, ७१-७२, ७४, १०, १५, १७, ६६-१००, १०२-१०५, १०८-११०, १२०-२१, १२३-२५, १२७- ३१, १३४-३५, १२८, १४२- ४२, १४५-४६, १५१.५२, १६० १६१, १६८ २७४-७६, १८०८११५-१६१, १६६-
६७, २०४, २०६, २१४,
२२०-२४
पृथ्वीराजरासो (लेख) १९२,
૨૯૬-૨
पृथ्वीराजरासों की एक प्राचीन प्रति और उसकी प्रमाणिकता १६५, २०१, २२० पृथ्वीराजरासो की ऐतिहासिकता पर प्रो० महमूद खाँ शीरानी के आक्षेप १६५
पृथ्वीराजरासो और उसकी हस्त- लिखित प्रतियाँ १६६
पृथ्वीराजरासो की कथाओं का ऐतिहासिक आधार १६५ पृथ्वीराजरासो और चंद बरदाई १६४, २०८ पृथ्वीराजरासो का निर्माण काल
१२१, १६४, २०२, २०७, २१३, २१८, २२० पृथ्वीराजरासो के संबंध की नवीन चर्चा १६४२०२ पृथ्वीराजरासो की प्रमाशिकता
१६४
पृथ्वीराजरासो की प्रथम संरक्षा
१६२
पृथ्वीराजरासो की प्रमाणिकता पर पुनर्विचार १६६ २१० पृथ्वीराजरासो की भाषा १९५-
૬
पृथ्वीराज रासो की विविधि
याचनायें १६७ पृथ्वीराज की सभा में जैनाचायों के शास्त्रार्थ १६२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|३५३८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{gap}}वस्तुतः असहयोगी भारत-भरमें नगरपालिकाओंमें प्रवेश कर रहे हैं, और जहाँ उनके बहुमतकी सम्भावना है वहाँ तो वे विशेष रूपसे ऐसा कर रहे हैं।
:{{gap}}'''३. क्या आप समझते हैं कि दक्षिण भारत अपने यहाँ फैली हुई अस्पृश्य- ताको देखते सविनय अवज्ञाके किसी भी रूपको अपनानेका अधिकारी है ? (आन्ध्र इसमें शामिल नहीं है, केवल तमिलसे ही अभिप्राय है ।)
यदि तमिल-भारतका कोई भी भाग अस्पृश्यताके पापको नहीं छोड़ता, तो वह सविनय अवज्ञा करनेके उपयुक्त नहीं माना जा सकता ।
'''एक पारसी:''' चेचकके टीकेको
बहुत ही नापसन्द करते हुए भी, मुझे 'यंग इंडिया' के स्तम्भों में उन बातोंके प्रचारके लोभको रोकना पड़ता है जिन्हें मेरे मित्र मेरी सनक कहते हैं। लेकिन टीका और इसी तरहकी दूसरी बुराइयोंका समाधान स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके बाद ही निकाला जा सकेगा ।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-१२-१९२१}}
{{C|{{larger|'''२१७. मानवताके नामपर'''}}}}
उदारदलीय लोगोंके नाम अपने पत्र में<ref>१. देखिए "उदार दलवालोंके नाम ", २७-११-१९२१ ।</ref> मैंने अपनी पूरी बात कह दी है, उसकी व्याख्याकी आवश्यकता नहीं। उसमें मैंने मलाबारकी घटनाओंके अप्रमाणित या एक- तरफा विवरणोंके बारेमें कुछ नहीं कहा है । परन्तु मेरे सामने ऐसे पत्र हैं जिनमें ऐसी- ऐसी अमानुषिकताओं का उल्लेख किया गया है जिनके आगे पंजाबके अत्याचार भी फीके पड़ जाते हैं। मलाबारमें प्रवेश निषिद्ध है । वहाँ जिस तरहकी नृशंसता हो रही बताई जाती है उसमें कैदियोंको दम घोटकर मारनेकी खबर सबसे अधिक चौंकानेवाली चीज है, यद्यपि यही सबसे क्रूर अत्याचार नहीं है । स्वार्थपूर्ण विवरणोंके कारण हिन्दुओंकी दृष्टि पूर्वग्रहोंसे अंधी हो गई है। मैं इस बातसे इनकार नहीं करता कि मोपलाओंने जबर्दस्ती धर्मपरिवर्तन व अन्य अत्याचार किये हैं । परन्तु मेरी आत्मा यह स्वीकार नहीं करती कि उसका बदला निर्दोष मोपलाओंसे या अपराधियोंके बीवी-बच्चोंसे लिया जाये; न ही अन्यायी लोगोंको यन्त्रणा देनेसे मुझे कोई खुशी हासिल होगी । इस प्रकारके प्रतिशोध मानवीय नहीं हैं ।
मुझे तथ्यों या आरोपोंकी और अधिक चर्चा नहीं करनी है। मैं तो केवल शान्ति- की अपील करता हूँ । सरकार क्या कर रही है ? वह सुरक्षा प्रदान करनेमें इतनी असमर्थ क्यों सिद्ध हुई है ? या उसका कर्त्तव्य केवल प्रतिशोध लेनेतक और मोपलाओं तथा उनके शिकार हिन्दुओंको अलग कर देनेतक ही सीमित है ?
यदि यह मान भी लिया जाये कि असहयोगियोंने मोपलाओंको सरकारके विरुद्ध भड़का कर यह उपद्रव शुरू किया था, तो क्या इस समय भी असहयोगी लोग मोपलाओं-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७१
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<noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{rh||मानवता के नामपर|
५३९}}</noinclude>
के रोषकी ज्वाला भड़का रहे हैं ? क्या विद्रोहको कुचलनेसे वे सरकारको रोक रहे हैं ?
सरकार असहयोगियोंको वहाँ जाने और मोपलाओंको समझाने के लिए अनुमति पत्र क्यों
नहीं देती ? यदि वे अपने दिये गये वचनके विपरीत कुछ करें तो बेशक उन्हें गोलीसे
उड़ा दिया जाये । सरकार नेकचलनी के लिए कुछ व्यक्तियोंको जमानतके तौरपर अपनी
हिरासत में रख ले। जब एक सम्भव उपाय सामने है और जब असहयोगी, कुछ शर्तोंके
अधीन, वहाँ जाने और शान्तिके लिए प्रयत्न करनेका प्रस्ताव रख रहे हैं, उस समय
सरकारके लिए मनमाने ढंगसे विध्वंस और विनाशपर ही तुले रहना बिलकुल अमा-
नुषिकता है।
यद्यपि शान्ति और मेलजोल स्थापित करनेका काम निश्चित रूपसे बहुत ही
कठिन बना दिया गया है, फिर भी यदि असहयोगियोंको उपद्रव क्षेत्रमें जाने और
मोपलाओंको समझाने-बुझाने की पूरी सुविधाएँ दी जायें, तो मैं अब भी उसकी सफलता के
बारेमें आशावान हूँ । मोपलाओंने अपनी वीरताका चाहे कितना ही गलत प्रयोग किया
हो, पर उनके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए।
मैं मद्रास प्रेसीडेंसीके हिन्दुओंसे प्रार्थना करता हूँ कि वे शान्त रहें और पथभ्रष्ट
मोपलाओं को अपने हृदयमें स्थान दें । उनका धर्म उन्हें यह नहीं सिखाता कि कुछ
व्यक्तियोंकी गलतियोंके लिए पूरी जातिको ही लांछित किया जाये । उन्हें अपनी गलती
भी स्वीकार करनी चाहिए। वे मोपलाओंको जानते थे फिर भी उन्होंने मोपलाओंको
और अच्छा पड़ोसी बनानेकी कोशिश नहीं की । हम अपनी पिछली लापरवाहीका फल
भोग रहे हैं । अब बिना कोई फर्क किये सभी मोपलाओंको राक्षस बताना और कहना
कि वे मानवीय सहानुभूतिके पात्र नहीं हैं, हमारे लिए उचित नहीं है। मोपलाओंकी
पाशविकतासे इस्लामको निःसन्देह क्षति पहुँची है । परन्तु, मोपलाओंके खूनका प्यासा
होनेसे, हिन्दूधर्मको भी इस्लामकी ही तरह क्षति पहुँच रही है। बलात्कार या हत्या करना
काफी बुरी बात है, परन्तु बलात्कारी या हत्यारेकी खाल उधेड़ना, उसके घरकी औरतों-
के साथ बलात्कार करना या उसके परिवार के बाकी लोगोंकी हत्या करना भी यदि
अधिक नहीं तो उतनी ही बुरी बात जरूर है। मैं नहीं जानता कि दुराचारी या हत्यारा
आकस्मिक आवेशमें अपराध कर बैठनेकी दलील नहीं दे सकता । परन्तु मनमाने ढंगसे
प्रतिशोध लेनेवाला भी क्या अपनी सफाईमें कोई दलील दे सकता है ? हिन्दुओंको मोप-
लाओंके खूनका प्यासा बनकर डायर और ओ डायरके कारनामोंका औचित्य सिद्ध नहीं
करना चाहिए । यदि हम मोपलाओंके सम्बन्धमें वीभत्सता और मान-मर्दनकी नीति
अपना सकते हैं, तो क्या वैसा करके हम सर माइकेल ओ'डायर और जनरल डायरके
कारनामोंको उचित नहीं ठहराते जिन्होंने कल्पित अन्याय और भयके कारण पंजाबमें
आतंक फैला दिया था ? मुझे भय है कि सरकार मलाबारके उपद्रवोंको जारी रखने के
लिए हिन्दुओंके रोषको भड़काकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही है । मलाबार और
मद्रास के हिन्दुओंको सावधान हो जाना चाहिए।
:[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-१२-१९२१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७२
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<noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१८. स्वयंसेवक- दलपर कुठार'''}}}}
बम्बईने प्रान्तीय सरकारोंको यह मौका दे दिया है कि वे व्यवस्थित ढंगसे दमन-
चक्र चलायें और असहयोग आन्दोलनको बिलकुल समाप्त कर देनेकी कोशिश करें ।
बंगाल, संयुक्त प्रान्त, पंजाब और दिल्लीकी सरकारोंने स्वयंसेवक-संगठनोंको छिन्न-भिन्न
कर देनेकी जो अधिसूचनाएँ जारी की हैं वे बम्बईकी सरकारके जवाबमें ही हैं। मैं
अपनी तरफसे तो इन अधिसूचनाओंका स्वागत ही करता हूँ । इन अधिसूचनाओंके
रूपमें हमें एक ऐसा कारण मिल गया जिससे हम अब सहज ही सविनय अवज्ञा कर
सकते हैं । यदि हम सरकारकी इस चुनौतीको स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, तो
हम तत्काल अपनी ताकत आजमा सकते हैं । सत्याग्रही अपना संघर्ष शुरू करनेका
अवसर स्वयं आप ही निश्चित करता है । यह सविनय अवज्ञाकी एक अपनी खूबी है ।
वह तबतक अवज्ञा करना उचित नहीं समझता, जबतक उसे ऐसा करना आवश्यक न
लगे । सरकार अपनी तरफसे उसे कितना ही उत्तेजित क्यों न करे, वह उससे सविनय
अवज्ञा शुरू नहीं करा सकती ।
ऐसी अवस्थामें यदि वे प्रान्त जहाँ ये अधिसूचनाएँ जारी हुई हैं तैयार हों तो
उनके लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि वे अपने स्वयंसेवक संगठनोंको भंग करनेसे
इनकार कर दें, और हर स्वयंसेवक अपनेको जेल पहुँचा सकता है। लेकिन हमें पहले
अपनी बुनियाद अच्छी तरह देख लेनी चाहिए। इन संगठनोंपर जो आरोप लगाया
गया है वह यह है कि वे ऐसी संस्थाएँ हैं जो बल-प्रयोगका साधन बनती हैं, शान्ति-
रक्षाका नहीं । अतएव हमारा पहला फर्ज यह है कि हम इस आरोपकी जाँच करें
और अगर वह किसी भी अंशमें हमपर घटता हो तो अपने उस दोषको बिलकुल
निर्मूल कर डालें। जिन-जिन स्वयंसेवकोंने बल-प्रयोग किया हो या अपने वचनों और
कार्योंके द्वारा बल-प्रयोगकी धमकी भी दी हो, उनको अवश्य उनके कामसे हटा
देना चाहिए।
संयोगसे कार्यसमितिने भी इसी मौकेपर स्वयंसेवक दलोंका संगठन करनेका प्रस्ताव<ref>१. बम्बई में २३-११-१९२१ को स्वीकृत प्रस्ताव ।</ref>
स्वीकृत किया है। मुझे आशा है कि प्रत्येक प्रान्तकी कांग्रेस कमेटी और खिलाफत-
समितियाँ इस कामको तुरन्त उठा लेंगी और तमाम स्वयंसेवक दल एक ही संगठनमें
शामिल हो जायेंगे तथा जो भी स्वयंसेवक अहिंसाके सिद्धान्तका कायल न हो वह
उसमें न रहने पायेगा । तब यदि इन संस्थाओंके काममें किसी तरहका हस्तक्षेप किया गया
तो हम संघर्ष छेड़ सकते हैं। पर इस संघर्षकी शर्त यह है कि जब स्वयंसेवकोंको जेल
भेजा जाये तब शेष सभी लोग खामोश रहें और शान्ति बनाये रखें। बिना शोरगुलके,
बिना भीड़-भाड़के जेलोंको भर देनेका यही सबसे उचित अवसर होगा । यदि हम
चुपचाप कष्ट सहन करनेके महत्वके कायल हों, तो हमें सरकारके लिए अपनी गिर-
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१८. स्वयंसेवक- दलपर कुठार'''}}}}
बम्बईने प्रान्तीय सरकारोंको यह मौका दे दिया है कि वे व्यवस्थित ढंगसे दमन-
चक्र चलायें और असहयोग आन्दोलनको बिलकुल समाप्त कर देनेकी कोशिश करें ।
बंगाल, संयुक्त प्रान्त, पंजाब और दिल्लीकी सरकारोंने स्वयंसेवक-संगठनोंको छिन्न-भिन्न
कर देनेकी जो अधिसूचनाएँ जारी की हैं वे बम्बईकी सरकारके जवाबमें ही हैं। मैं
अपनी तरफसे तो इन अधिसूचनाओंका स्वागत ही करता हूँ । इन अधिसूचनाओंके
रूपमें हमें एक ऐसा कारण मिल गया जिससे हम अब सहज ही सविनय अवज्ञा कर
सकते हैं । यदि हम सरकारकी इस चुनौतीको स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, तो
हम तत्काल अपनी ताकत आजमा सकते हैं । सत्याग्रही अपना संघर्ष शुरू करनेका
अवसर स्वयं आप ही निश्चित करता है । यह सविनय अवज्ञाकी एक अपनी खूबी है ।
वह तबतक अवज्ञा करना उचित नहीं समझता, जबतक उसे ऐसा करना आवश्यक न
लगे । सरकार अपनी तरफसे उसे कितना ही उत्तेजित क्यों न करे, वह उससे सविनय
अवज्ञा शुरू नहीं करा सकती ।
ऐसी अवस्थामें यदि वे प्रान्त जहाँ ये अधिसूचनाएँ जारी हुई हैं तैयार हों तो
उनके लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि वे अपने स्वयंसेवक संगठनोंको भंग करनेसे
इनकार कर दें, और हर स्वयंसेवक अपनेको जेल पहुँचा सकता है। लेकिन हमें पहले
अपनी बुनियाद अच्छी तरह देख लेनी चाहिए। इन संगठनोंपर जो आरोप लगाया
गया है वह यह है कि वे ऐसी संस्थाएँ हैं जो बल-प्रयोगका साधन बनती हैं, शान्ति-
रक्षाका नहीं । अतएव हमारा पहला फर्ज यह है कि हम इस आरोपकी जाँच करें
और अगर वह किसी भी अंशमें हमपर घटता हो तो अपने उस दोषको बिलकुल
निर्मूल कर डालें। जिन-जिन स्वयंसेवकोंने बल-प्रयोग किया हो या अपने वचनों और
कार्योंके द्वारा बल-प्रयोगकी धमकी भी दी हो, उनको अवश्य उनके कामसे हटा
देना चाहिए।
संयोगसे कार्यसमितिने भी इसी मौकेपर स्वयंसेवक दलोंका संगठन करनेका प्रस्ताव<ref>१. बम्बई में २३-११-१९२१ को स्वीकृत प्रस्ताव ।</ref>
स्वीकृत किया है। मुझे आशा है कि प्रत्येक प्रान्तकी कांग्रेस कमेटी और खिलाफत-
समितियाँ इस कामको तुरन्त उठा लेंगी और तमाम स्वयंसेवक दल एक ही संगठनमें
शामिल हो जायेंगे तथा जो भी स्वयंसेवक अहिंसाके सिद्धान्तका कायल न हो वह
उसमें न रहने पायेगा । तब यदि इन संस्थाओंके काममें किसी तरहका हस्तक्षेप किया गया
तो हम संघर्ष छेड़ सकते हैं। पर इस संघर्षकी शर्त यह है कि जब स्वयंसेवकोंको जेल
भेजा जाये तब शेष सभी लोग खामोश रहें और शान्ति बनाये रखें। बिना शोरगुलके,
बिना भीड़-भाड़के जेलोंको भर देनेका यही सबसे उचित अवसर होगा । यदि हम
चुपचाप कष्ट सहन करनेके महत्वके कायल हों, तो हमें सरकारके लिए अपनी गिर-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४७९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४१८. पत्र : मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{Right|१९ मई, १९३०}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
ईश्वर तेरी रक्षा करेगा। मैं रोज तुझे याद करता हूँ। आशा है अब तू उदास नहीं रहती होगी।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|चि॰ मणिबहन पटेल<br>नडियाद}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो–४ : मणिबहेन पटेलने'''|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''४१९. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}}
{{Right|२० मई, १९३०}}
{{Left|चि॰ नरहरि,}}
तुम्हारी जीभ नाचती है या नहीं, सो मैं नहीं जानता, लेकिन देखता हूँ तुम्हारी लेखनी नर्तन कर रही है। मेरे जेल-महलमें रहनेके कितने लाभ हैं?
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९०५३) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{C|{{larger|'''४२०. पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको'''}}}}
{{Right|यरवडा जेल<br>२० मई, १९३०}}
{{Left|प्रिय बहन,}}
मुझे सिलाईकी मशीनपर थोड़ा-बहुत सीना तो आता है। लेकिन चूँकि मुझे यहाँ काफी फुरसत है, इसलिए मैं इसे अच्छी तरहसे सीख लेना चाहता हूँ। जेल-अधिकारियोंने मुझे मशीन प्राप्त करनेकी अनुमति दे दी है। आप अनेक बहनोंका पालन-पोषण करती हैं, इसलिए आपके पास सिलाईकी मशीनें तो अवश्य होंगी, यह सोचकर मैं आपको यह तकलीफ दे रहा हूँ कि यदि आपके पास मशीनें हों और<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|४३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>आप उनमें से एक मुझे भेज सकती हों तो भेज दें। न हो तो मुझे उत्तर दें। आपका पत्र मुझे मिल जायेगा।
{{Right|'''मोहनदास के वन्देमातरम्'''}}
{{Left|लेडी प्रेमलीला विट्ठलदास ठाकरसी<br>पूना}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४८१३) की फोटो नकलसे; सौजन्य : प्रेमलीला ठाकरसी; जी० एन० ७१ से भी।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''४२१. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|२० मई, १९३०}}
{{Left|चि॰ प्रभावती,}}
तुझे किस तरह सान्त्वना दूँ? भगवान् तेरी रक्षा अवश्य करेगा। मुझे पत्र
लिखा जा सकता है, लिखना। कमलाबहनसे<ref>जवाहरलाल नेहरूकी पत्नी।</ref> कहना, अपनी तबीयतका ध्यान रखे। स्वरूपरानीको<ref>मोतीलाल नेहरू की पानी।</ref> मेरा प्रणाम। सरूप<ref>विजयलक्ष्मी पण्डित।</ref>, कृष्णाको<ref>कृष्णा हठीसिंह।</ref> आशीर्वाद। जयप्रकाशको आशीर्वाद, यदि वह [जेलसे] बाहर हो तो। अपना पत्र आश्रमके पते पर भेजना। मैं आनन्दमें हूँ। जो खुराक [जेलसे] बाहर थी वही खुराक यहाँ भी लेता हूँ।
मेरी चिन्ता न करना।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३३८८ ) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr|10em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४२२. भेंट : 'डेली हॅरॉल्ड' के प्रतिनिधिको'''<ref>भेंटकर्ता जॉर्ज स्लोकॉम्ब थे।</ref>}}}}
{{Right|२० मई, १९३०}}
'''हमारी बातचीत ब्रिटिश और भारतीय राजनीतिके सम्बन्ध में विचारोंके आदान-प्रदानसे शुरू हुई। इसके बाद मैंने उनसे साफ-साफ यह बतानको कहा कि स्वतन्त्रतासे उनका क्या मतलब है। मैंने पूछा कि क्या आप वैसी ही स्वतन्त्रता चाहते हैं जैसी स्वतन्त्रता अन्ततः औपनिवेशिक स्वराज्यसे प्राप्त होगी? या ब्रिटिश राष्ट्र-मण्डलसे अलग होने का आपका आग्रह है?'''
मैंने बराबर यही सुना है कि इंग्लैंडमें औपनिवेशिक स्वराज्यका मतलब स्वतन्त्रता माना जाता है, लेकिन भारतीय अधिकारीगण वैसा नहीं समझते। इसलिए जब वे औपनिवेशिक स्वराज्यसे एक उलटी चीजके रूपमें स्वतन्त्रताका विरोध करते हैं तो स्वभावतः हम स्वतन्त्रताकी ही माँग करते हैं।
'''जब मैंने उनसे यह पूछा कि क्या कनाडा और दक्षिण आफ्रिका सभी तात्त्विक विषयोंकी दृष्टिसे स्वतन्त्र नहीं हैं तो उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे स्वतन्त्र हैं। साथ ही उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण वाक्य भी कहा :'''
लेकिन हमें तो उनके समान दर्जा देनेके लिए अंग्रेजी हुकूमत तैयार नहीं है।
'''इसके बाद मैंने यह पूछा कि क्या आपने सविनय अवज्ञा आन्दोलनमें निहित तमाम खतरोंपर विचार कर लिया है? उन्होंने कहा कि हाँ, कर लिया है और फिर आगे बताया :'''
मैंने वह कदम उठाया है, जिसे पागलपन-भरा कदम कहा गया है। लेकिन यह खतरा ऐसा है, जिसे उठानेका औचित्य सिद्ध किया जा सकता है। खतरा उठाये बिना कोई महान् लक्ष्य कभी सिद्ध नहीं हुआ है।
'''फिर भी उन्होंने कहा कि शोलापुरमें जो हिंसा होनेकी खबर है, उससे मुझे बहुत चिन्ता हो रही है। वहाँ जो दो पुलिसवाले मारे गये हैं, उसका मुझे बड़ा दुःख है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि हिंसा सत्याग्रहियोंने नहीं की है। उन्हें तो सब-कुछ, यहाँतक कि मार-पीट और हिंसाको भी, बिना कोई प्रतिरोध किये सहनेका आदेश दिया गया है।
'''जब मैंने पूछा कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि कानून तोड़नेवालों और अधिकारियोंके बीच हो रहे इस संघर्ष में सरकार हार मान लेगी, तो गांधीजी मुस्करा उठे और उन्होंने कहा :'''<noinclude>{{Dhr}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५१०
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Vineet Kumar Tiwari 29
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{{c|{{larger|'''४६२. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|२७ जून, १९३०}}
{{Left|चि॰ प्रभावती,}}
अब तो तुझे मेरे पत्र नियमपूर्वक मिलते ही होंगे। यह बात तुझे समझ लेनी चाहिए कि मैं जबतक यहाँसे पत्र लिख सकता हूँ तबतक तो लिखता ही रहूँगा। मेरा वजन अच्छा है, १०३ पौंडसे तनिक ऊपर; इसलिए चिन्ता करनेका कोई कारण नहीं। पिताजी की तबीयत सुधरती जाती है यह बात तो मनको प्रसन्नता देनेवाली है। तेरा वजन कम हो गया है। यह कैसे?
प्रयत्न करके तबीयतको सुधार लेना। तुझे दूध अथवा दही तथा फल लेने चाहिए और व्यायाम करना चाहिए। जयप्रकाशके लिए एक पत्र इसके साथ है।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३३६०) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|'''४६३. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>२९ जून, १९३०}}
{{Left|चि॰ प्रभावती,}}
तेरा पत्र मिला। मेरा पत्र लिखना ही बन्द हो गया था, इसलिए तुझे मेरा पत्र कहाँसे मिल सकता था? कदाचित् अब नियमपूर्वक लिख सकूँगा। मेरा शरीर ठीक रहता है। खाने में दूध अथवा दही और मुनक्का अथवा खजूर, खट्टा नींबू, बस यही सब लेता हूँ। दूध भी अभीतक कच्चा ही पीता हूँ। इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है। उन लोगोंने एक सप्ताहसे काका साहबको मेरे साथ रखा है।
तुम दोनों के खाने-पीने का क्या प्रबन्ध है? नौकर रखा है अथवा खुद ही खाना पकाती है? कुछ पढ़ती भी है या नहीं? 'अनासक्तियोग'<ref>गांधीजी कृत '''भगवद्गीता'''का गुजराती अनुवाद; देखिए खण्ड ४१।</ref> पुस्तक तुझे भेजी थी वह मिली या नहीं। उसे पढ़ा? कुछ समझी?
पिताजी को लिखना कि मैं उन सबको बहुत याद करता हूँ।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३३९२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr}}
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