विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.19 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२९३ 250 3161 675737 636348 2026-09-13T11:21:44Z ~2026-49779-52 6885 675737 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|६०८]||[कबीर}}</noinclude>(iii)छेकानुप्रास—गगन गाजै, चित चेतन। (v)पदमैत्री—खडू बिहडू, आऊ जाऊँ। '''विशेष'''—(i) प्रतीकों का प्रयोग है। (ii) कार्यायोग के साधनों से आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति तथा उन प्रतीकों के माध्यम से आध्यात्मिक साधना का वर्णन है। (iii) अनहद नाद—देखें टिप्पणी पद सख्या १५७। (iv) शून्य—देखें टिप्पणी पद संख्या १६४। (v) नाद बिंदु—देखे टिप्पणी पद सख्या १८। (vi) वाह्योपचारो का विरोध है। (vii) सालिगराम काटौं—कहता यह है कि कबीर शालिगराम की पूजा छोडने से कबीर का तात्पर्य यह है कि वह सीमित तत्त्व की औपचारिक उपासना का त्याग कर देंगे और व्रह्यादिक जो माया जनित देव हैं, उनका अस्तित्व ही मिटा देंगे। (viii) सायर फोडि पाटौ—मूलाधार चक्र के जल का शुन्य-शिखर के सरोवर-जल से सम्मिलन करूँगा अर्थात् विषयानंद को साधनाजन्य आनद एवं आध्यात्मिक आह्लाद में समाहित कर दूँगा। गगन कूप की बूँदो को टपक-टपक कर चण्डाग्नि में भस्म नहीं होने दूँगा अर्थात् उसकी शक्ति को विषय-वासनाओं में नष्ट नहीं होने दूँगा। उससे आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करता रहूँगा। (viii) बन वन डोलै। तुलना करें— {{Block center|{{larger|<poem> :'''कस्तुरी कुण्डल बसै मृग ढुँढै वन माहि।''' :'''ऐसे घट घट राम हैं दुनियाँ देखे नांहि।'''{{gap}}(कबीरदास)</poem>}}}} {{C|{{larger|'''(१९७)'''}}}} {{Block center|{{larger|<poem> :'''बाबा पेड़ छाडि सब डालीं लागे, मूंढे जंत्र अभागे।''' :'''सोइ सोइ सब रैणि बिहांणी, भोर भयौ तब जागे॥ टेक॥''' :'''देवलि जाऊ तौ देवी देखौं, तीरधि जांऊ त पाणीं।''' :'''ओछी बुधि अगोचर वांणीं, नहीं परम गति जांणी॥''' :'''साध पुकारै समझत नांहीं, आंन जन्म के सूते।''' :'''बांधै ज्यूँ अरहट की टीडरि, आवत जात बिगूते॥''' :'''गुर बिन इहि जग कौंन भरौसा, काकै सगि ह्वै रहिये।''' :'''गनिका कै धरि बेटा जाया, पिता नांव किस कहिये॥''' :'''कहै कबीर यह चित्र विरोध्या, बूझी अंमृत बांणी।''' :'''खोजत खोजत सतगुर पाया, रहि गई आंवण जांणीं॥'''</poem>}}}} '''शब्दार्थ'''-मूनं यन्। पन्मतत्त्व, ब्रहा। डाली=शाखाएँ=अन्य देवता व्यक्त ज्ञाप रुप। हृप्र-टामूर्ण।ऊंणरौटु दृश्यमान जगत।<noinclude></noinclude> 1oz0xrrzlkmsf8t8tlsum168oze6lrf पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१३६ 250 34629 675729 675721 2026-09-12T14:55:27Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित */ 675729 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{c|(१२५)}}</noinclude>गया है। यह १० करोड़ जनता का धर्मग्रंथ है और उनके द्वारा यह उतना ही भगवत्प्रेरित माना जाता है, अंगरेज पादरियों द्वारा जितनी भगवत्प्रेरित 'बाइबिल' मानी जाती है। पंडित लोग वेद और उपनिषद की बातें कर सकते हैं, और कुछ उनका अध्ययन भी कर सकते हैं, कुछ कह सकते हैं कि उनका विश्वास पुराणों के साथ संलग्न है; किंतु हिंदुस्तान की अधिकांश जनता के लिए चाहे वह विद्वान हो अथवा अविद्वान, चरित्रका एक मात्र प्रतिमान तुलसीकृत रामायण है। हिंदुस्तान के लिए सचमुच यह परम सौभाग्य की बात है कि यह ऐसा है, क्योंकि इसने इस क्षेत्र को शैव धर्म की तांत्रिक अश्लीलताओं से बचा लिया है। रामानन्द उत्तरी भारत के प्रारम्भिक रक्षक है, जिन्होंने उस दुर्भाग्य से इसे बचाया जो कि बंगाल के ऊपर पड़ा। लेकिन तुलसीदास तो वह महान देवदूत हैं जो उनके सिद्धान्त को पूर्व और पश्चिम ले गए तथा उसे स्थिर विश्वास में परिणत कर दिया। जिस धर्म का उपदेश उन्होंने किया, वह अत्यन्त सरल साथ ही विशिष्ट—राम नाम में पूर्ण विश्वास है। अनैतिकता के उस युग में जब हिन्दू समाज के बन्धन शिथिल हो रहे थे और मुगल साम्राज्य संगठित हो रहा था, इस ग्रन्थ की सबसे विशिष्ट बात इसकी कठोर नैतिकता है, जो इस शब्द के किसी भी अर्थ में मानी जा सकती है। तुलसी प्रतिवासी के प्रति अपने कर्तव्य की शिक्षा देनेवाले महान उपदेशक थे। बाल्मीकि ने भरत की कर्तव्य परायणता, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति और सीता के पतिव्रत की प्रशंसा की है, लेकिन तुलसी ने तो आदर्श ही प्रस्तुत कर दिया है। इसी प्रकार उस घोर विलासिता के युग में, रामायण से बढ़कर मर्यादापूर्ण और पवित्र कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है। वह स्वयं कहते हैं और ठीक कहते हैं :— {{blockcenter|<poem>"अति खल जे विषयी बग कागा एहि सर निकट न जाहिं अभागा संबुक भेक सेवार समाना इहाँ न विषय कथा रस नाना तेहि कारन आवत हियँ हारे कामी काक बलाक बिचारे<ref>मूल में इन चौपाइयों के स्थान पर इनका यह भावार्थ दिया हुआ है—अनु॰<br>"Here are no prurient seductive stories, like snail's, frogs and scum on the pure water of Ram's legend; and therefore the lustful crow and the greedy cranes, if they do come, are disappointed."</ref>"</poem>}}<noinclude>{{rule}} {{smallrefs}}</noinclude> 4jztuyh2jitich89tr0dlkgwmckxitw पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१५६ 250 34651 675730 675723 2026-09-12T15:52:48Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित */ 675730 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{Rh|१०|(१४५)|}}</noinclude>&nbsp; (१) एक रामायण चिंतामणि त्रिपाठी (१४३) द्वारा लिखी गई थी। (२) मानदास (१७२) ने राम चरित्र लिखा जो बाल्मीकि रामायण और हनुमान नाटक पर आधृत है। (३) भगवंतराय खीची (३३३) ने एक रामायण लिखी। (४) शंभुनाथ (३५७) ने ‘राम विलास' नामक एक रामायण लिखी।। (५) गुलाब सिंह (४८६) ने एक वेदांतिक रामायण लिखी (इसका जो अर्थ हो)। (६) गजराज उपाध्या (५८५) ने एक रामायण लिखी। (७) सहज राम (५९२) ने रघुवंश और हनुमान नाटक के अधार पर एक रामायण लिखी। (८) शंकर त्रिपाठी (६१३) ने कवित्त छंदों में एक रामायण लिखी। (९) ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी (७१२) ने बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया। (१०) चंद्र झा (७०२) ने एक रामायण लिखी। (११) जानकी प्रसाद (६९५) ने ‘राम निवास रामायण' लिखी। (१२) समर सिंह (७२५) ने एक रामायण लिखी। (१३) पूरन चंद जूथ (८५८) ने राम रहस्य रामायण लिखी। इस सूची में वे ग्रंथ नहीं आए हैं, जिनमें राम कथा का कोई विशेष अंग ही वर्णित हुआ है, और न तो इसमें वे ही ग्रंथ हैं, जो इधर पिछले वर्षों में गद्य और पद्य में लिखे गए हैं। इनमें भाषा और शैली की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ पंडित छोटूराम तिवारी (सं॰ ७०५) लिखित (१४) रामकथा हैं। {{c|{{larger|३. पंचायतनामा}}}} [पंचायतनामे का प्रत्यक्षरीकरण और उसका अँगरेजी अनुवाद मूल-ग्रंथ के प्रारंभ में ही भूमिका के अनंतर 'शुद्धिपत्र और परिशिष्ट' के मध्य में दिया गया है। इसे अ-स्थान समझकर अनुवाद में छठें अध्याय के तृतीय परिशिष्ट के रूप में दिया जा रहा है। पंचायतनामा का अंग्रेजी प्रत्यक्षरीकरण न देकर उसे देवनागरी लिपि में दिया जा रहा है और इसका जो अंग्रेजी अनुवाद मूल ग्रंथ में है, उसे यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है, उसका हिंदी अनुवाद नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है। पंचायतनामें की केवल प्रथम छह पंक्तियाँ देवनागरी लिपि में हैं। यही तुलसीदास की लिखी मानी जाती हैं। शेष अंश फारसी लिपि में है और तुलसीकृत नहीं माना जाता। पंचायतनामे की प्रतिच्छवि डा॰ माताप्रसाद गुप्त के ग्रंथ 'तुलसीदास' में देखी जा सकती है।{{gap|11em}}—अनुवादक]<noinclude></noinclude> n9wzzruu2d1n2l8if4pynu8x4c65o0x 675731 675730 2026-09-12T15:53:48Z अजीत कुमार तिवारी 12 675731 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{Rh|१०|(१४५)|}}</noinclude>&nbsp; (१) एक रामायण चिंतामणि त्रिपाठी (१४३) द्वारा लिखी गई थी। (२) मानदास (१७२) ने राम चरित्र लिखा जो बाल्मीकि रामायण और हनुमान नाटक पर आधृत है। (३) भगवंतराय खीची (३३३) ने एक रामायण लिखी। (४) शंभुनाथ (३५७) ने ‘राम विलास' नामक एक रामायण लिखी।। (५) गुलाब सिंह (४८६) ने एक वेदांतिक रामायण लिखी (इसका जो अर्थ हो)। (६) गजराज उपाध्या (५८५) ने एक रामायण लिखी। (७) सहज राम (५९२) ने रघुवंश और हनुमान नाटक के अधार पर एक रामायण लिखी। (८) शंकर त्रिपाठी (६१३) ने कवित्त छंदों में एक रामायण लिखी। (९) ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी (७१२) ने बाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया। (१०) चंद्र झा (७०२) ने एक रामायण लिखी। (११) जानकी प्रसाद (६९५) ने ‘राम निवास रामायण' लिखी। (१२) समर सिंह (७२५) ने एक रामायण लिखी। (१३) पूरन चंद जूथ (८५८) ने राम रहस्य रामायण लिखी। इस सूची में वे ग्रंथ नहीं आए हैं, जिनमें राम कथा का कोई विशेष अंग ही वर्णित हुआ है, और न तो इसमें वे ही ग्रंथ हैं, जो इधर पिछले वर्षों में गद्य और पद्य में लिखे गए हैं। इनमें भाषा और शैली की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ पंडित छोटूराम तिवारी (सं॰ ७०५) लिखित (१४) रामकथा हैं। {{c|{{larger|३. पंचायतनामा}}}} [पंचायतनामे का प्रत्यक्षरीकरण और उसका अँगरेजी अनुवाद मूल-ग्रंथ के प्रारंभ में ही भूमिका के अनंतर 'शुद्धिपत्र और परिशिष्ट' के मध्य में दिया गया है। इसे अ-स्थान समझकर अनुवाद में छठें अध्याय के तृतीय परिशिष्ट के रूप में दिया जा रहा है। पंचायतनामा का अंग्रेजी प्रत्यक्षरीकरण न देकर उसे देवनागरी लिपि में दिया जा रहा है और इसका जो अंग्रेजी अनुवाद मूल ग्रंथ में है, उसे यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है, उसका हिंदी अनुवाद नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है। पंचायतनामें की केवल प्रथम छह पंक्तियाँ देवनागरी लिपि में हैं। यही तुलसीदास की लिखी मानी जाती हैं। शेष अंश फारसी लिपि में है और तुलसीकृत नहीं माना जाता। पंचायतनामे की प्रतिच्छवि डा॰ माताप्रसाद गुप्त के ग्रंथ 'तुलसीदास' में देखी जा सकती है। —अनुवादक]<noinclude></noinclude> la2ahl1qy3tmzegd49a2nosh5kvd72o पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/२३५ 250 34739 675734 579076 2026-09-12T18:10:03Z Manish kumar sh 6881 675734 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( २१६ )}} टि०-महाकवि कालिदास त्रिपाठी का उपनाम है। -सर्वेक्षण ६८८, ७३ ४०४. रसराज कवि-जन्म १७२३ ई० । एक अच्छे नखशिख के रचयिता । ४०५. रसिक बिहारी-जन्म १७२३ ई० । . राग कल्पद्रुम। टिक-महाराज नागरीदास की उपपत्नी बनीठनी जी रसिक विहारी नाम: से लिखती थीं। १७२३ ई० इनका उपस्थिति काल है। इनका देहावसान सं० . १८२२ में आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ। -~सर्वेक्षण ७९५ ४०६. रुद्रमणि-चौहान, जन्म १७२३ ई० । ४०७. दल सिङ्घ--राजा, बुंदेलखंडी । जन्म १७२४ ई० । राधाकृष्ण की लीला से संबंध रखनेवाले 'प्रेम पयोनिधि' नामक ग्रंथ के रचयिता। ४०८. प्राननाथ-कोटा के । जन्म १७२४ ई० । यह कोटा दरबार में थे। टिक-१७२४ ई० (सं० १७८१ ) उपस्थिति काल है। -सर्वेक्षण ४५८ ४०९. जुलफेकार कवि-जन्म १७२५ ई० ।। इन्होंने बिहारी ( सं० १९६ ) की सतसई पर एक अच्छा तिलक रचा। टि०-समय एकदम गलत है। प्रसंग-प्राप्त ग्रन्थ की रचना सं० १९०३ में हुई थी। -सर्वेक्षण ३०५ ४१०, कमल नयन कवि-बुंदेलखंडी । जन्म १७२७ ई०। .. शृंगार रस पर इन्होंने बहुत लिखा है, पर इनका कोई पूर्ण ग्रंथ नहीं . ज्ञात है । इनकी कविता सरस कही जाती है। टि०-१७२७ ई० (सं० १७८४ ) उपस्थिति काल है, जन्म काल नहीं । -सर्वेक्षण ८९ ४११. बिस्वनाथ अताई-बुंदेलखंडी; जन्म १७२७ ई० । । . . सत्कविगिराविलास। टि०-१७२७ ई० (सं० १७८४) इनका जन्मकाल न होकर उपस्थिति काल है, क्योंकि इसके १९ ही वर्ष बाद संकलित सत्कविगिराविलास से इनकी रचना है।<noinclude></noinclude> ln01mu3al89vsw6tx5u4d81iedjolfm 675735 675734 2026-09-12T18:37:31Z Manish kumar sh 6881 675735 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( २१६ )}} {{c|टि०-महाकवि कालिदास त्रिपाठी का उपनाम है।}} {{right|-सर्वेक्षण ६८८, ७३}} ४०४. रसराज कवि-जन्म १७२३ ई०। एक अच्छे नखशिख के रचयिता। ४०५. रसिक बिहारी-जन्म १७२३ ई०। राग कल्पद्रुम। {{rh|टिक-महाराज नागरीदास की उपपत्नी बनीठनी जी रसिक विहारी नाम:}} से लिखती थीं। १७२३ ई० इनका उपस्थिति काल है। इनका देहावसान सं० . १८२२ में आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ। -~सर्वेक्षण ७९५ ४०६. रुद्रमणि-चौहान, जन्म १७२३ ई० । ४०७. दल सिङ्घ--राजा, बुंदेलखंडी । जन्म १७२४ ई० । राधाकृष्ण की लीला से संबंध रखनेवाले 'प्रेम पयोनिधि' नामक ग्रंथ के रचयिता। ४०८. प्राननाथ-कोटा के । जन्म १७२४ ई० । यह कोटा दरबार में थे। टिक-१७२४ ई० (सं० १७८१ ) उपस्थिति काल है। -सर्वेक्षण ४५८ ४०९. जुलफेकार कवि-जन्म १७२५ ई० ।। इन्होंने बिहारी ( सं० १९६ ) की सतसई पर एक अच्छा तिलक रचा। टि०-समय एकदम गलत है। प्रसंग-प्राप्त ग्रन्थ की रचना सं० १९०३ में हुई थी। -सर्वेक्षण ३०५ ४१०, कमल नयन कवि-बुंदेलखंडी । जन्म १७२७ ई०। .. शृंगार रस पर इन्होंने बहुत लिखा है, पर इनका कोई पूर्ण ग्रंथ नहीं . ज्ञात है । इनकी कविता सरस कही जाती है। टि०-१७२७ ई० (सं० १७८४ ) उपस्थिति काल है, जन्म काल नहीं । -सर्वेक्षण ८९ ४११. बिस्वनाथ अताई-बुंदेलखंडी; जन्म १७२७ ई० । । . . सत्कविगिराविलास। टि०-१७२७ ई० (सं० १७८४) इनका जन्मकाल न होकर उपस्थिति काल है, क्योंकि इसके १९ ही वर्ष बाद संकलित सत्कविगिराविलास से इनकी रचना है।<noinclude></noinclude> 22puseh83asuvqwja9ujwjc7996o04e पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/२८४ 250 34793 675728 579130 2026-09-12T12:34:16Z Manish kumar sh 6881 675728 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="नीलम" /></noinclude>_{{c|(२६५)}}___________ टिरामनाथ प्रधान वैश्य थे। इनका जन्म सं० १८५७ में हुआ था। अतः १८४५ ई० (सं० १९०२ ) इनका उपस्थिति काल है। इनकी मृत्यु सं० १९२५ में हुई। सर्वेक्षण ७२४ ६२५. गिरिधारी-ब्राहाण, सातनपुर के एक वैसवाड़ा | जन्म १८४७ ई० । शृंगार संग्रह । इनकी कविताएँ या तो कृष्ण लीला संबंधी है अथवा शांत रस की हैं। यह कोई बहुत पढ़े लिखे नहीं थे, पर अच्छा लिखते थे। • टि-यह बैसवाड़ा के अंतर्गत सातनपुरवा के रहनेवाले थे। १८४७ ई. (सं० १९०४) इनका उपस्थिति काल है । -सर्वेक्षण १५९ ६२६, हिमाचलराम कवि-भटौली जिला फैजाबाद के ब्राह्मण । जन्म १८४७ ई० सीधी सादी कविता है। टि.--१८४७ ई० (सं० १९०६) उपस्थिति काल है। इनकी मृत्यु सं० १९१५ में हुई। ---सर्वेक्षण ९९२ ६२७. चैन सिद्ध-उपनाम हरचरन, खत्री, लखनऊ के । जन्म १८५३ ई०। __ शृङ्गार संग्रह | इन्होंने भारत दीपिका' और 'शृङ्गार सारावली' लिखी हैं। यही संभवतः वह दूसरे चैन कवि भी हैं, जिनका उल्लेख शिव सिंह ने किया है। टि०-चैन सिंह चैन से भिन्न हैं। -~-सर्वेक्षण २३३, २३२ भाग ४, विविध ६२८. जैचन्द-जयपुर के । १८०६ ई० में उपस्थित ।। स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा नामक, जैन संप्रदाय के सिद्धान्तों का विवेचन करनेवाले, सं० १८६३ वि० ( १८०६ ई०) में विरचित, संस्कृत एवं भाषा ग्रन्थ के कर्ता। ६२९. लल्लू जो लाल---गुजराती, आगरावाले। १८०३ ई० में उपस्थित । निम्नलिखित ग्रन्थों के सुप्रसिद्ध रचयिता: (१) प्रेम सागर ( राग कल्पद्रुम) यह ऊपर वाले साल में मार किस आफ वेलेजली की सरकार की अधीनता और डाक्टर जान गिलक्रिष्ट के निर्देशन<noinclude></noinclude> d9qmspqfqxslzytwqu14fmlsjdif42n 675732 675728 2026-09-12T16:21:37Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित */ 675732 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{c|(२६५)}}</noinclude>&nbsp; टि॰—रामनाथ प्रधान वैश्य थे। इनका जन्म सं॰ १८५७ में हुआ था। अतः १८४५ ई॰ (सं॰ १९०२) इनका उपस्थिति काल है। इनकी मृत्यु सं॰ १९२५ में हुई। {{right|सर्वेक्षण ७२४}} <br>{{larger|६२५. गिरिधारी}}—ब्राहाण, सातनपुर के एक बैसवाड़ा| जन्म १८४७ ई॰। शृंगार संग्रह। इनकी कविताएँ या तो कृष्ण लीला संबंधी है अथवा शांत रस की हैं। यह कोई बहुत पढ़े लिखे नहीं थे, पर अच्छा लिखते थे। टि॰—यह बैसवाड़ा के अंतर्गत सातनपुरवा के रहनेवाले थे। १८४७ ई॰ (सं॰ १९०४) इनका उपस्थिति काल है। {{right|—सर्वेक्षण १५९}} <br>{{larger|६२६, हिमाचलराम कवि}}—भटौली जिला फैजाबाद के ब्राह्मण। जन्म १८४७ ई॰। सीधी सादी कविता है। टि॰—१८४७ ई॰ (सं॰ १९०४) उपस्थिति काल है। इनकी मृत्यु सं॰ १९१५ में हुई। {{right|—सर्वेक्षण ९९२}} <br>{{larger|६२७. चैन सिङ्घ}}—उपनाम हरचरन, खत्री, लखनऊ के। जन्म १८५३ ई॰। शृङ्गार संग्रह। इन्होंने 'भारत दीपिका' और 'शृङ्गार सारावली' लिखी हैं। यही संभवतः वह दूसरे चैन कवि भी हैं, जिनका उल्लेख शिव सिंह ने किया है। टि॰-चैन सिंह चैन से भिन्न हैं। {{right|—सर्वेक्षण २३३, २३२}} {{c|{{larger|भाग ४, विविध}}}} <br>{{larger|६२८. जैचन्द}}—जयपुर के। १८०६ ई॰ में उपस्थित। स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा नामक, जैन संप्रदाय के सिद्धान्तों का विवेचन करनेवाले, सं॰ १८६३ वि॰ (१८०६ ई॰) में विरचित, संस्कृत एवं भाषा ग्रन्थ के कर्ता। <br>{{larger|६२९. लल्लू जी लाल}}—गुजराती, आगरावाले। १८०३ ई॰ में उपस्थित। निम्नलिखित ग्रन्थों के सुप्रसिद्ध रचयिता:— (१) प्रेम सागर (राग कल्पद्रुम)—यह ऊपर वाले साल में मारक्विस आफ् वेलेजली की सरकार की अधीनता और डाक्टर जान गिलक्रिष्ट के निर्देशन<noinclude></noinclude> pvv0rw31vaj6z4l3ok0qvk6mv5rzqqj 675733 675732 2026-09-12T16:22:43Z अजीत कुमार तिवारी 12 675733 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{c|(२६५)}}</noinclude>&nbsp; टि॰—रामनाथ प्रधान वैश्य थे। इनका जन्म सं॰ १८५७ में हुआ था। अतः १८४५ ई॰ (सं॰ १९०२) इनका उपस्थिति काल है। इनकी मृत्यु सं॰ १९२५ में हुई। {{right|सर्वेक्षण ७२४}} <br>{{larger|६२५. गिरिधारी}}—ब्राहाण, सातनपुर के एक बैसवाड़ा| जन्म १८४७ ई॰। शृंगार संग्रह। इनकी कविताएँ या तो कृष्ण लीला संबंधी है अथवा शांत रस की हैं। यह कोई बहुत पढ़े लिखे नहीं थे, पर अच्छा लिखते थे। टि॰—यह बैसवाड़ा के अंतर्गत सातनपुरवा के रहनेवाले थे। १८४७ ई॰ (सं॰ १९०४) इनका उपस्थिति काल है। {{right|—सर्वेक्षण १५९}} <br>{{larger|६२६, हिमाचलराम कवि}}—भटौली जिला फैजाबाद के ब्राह्मण। जन्म १८४७ ई॰। सीधी सादी कविता है। टि॰—१८४७ ई॰ (सं॰ १९०४) उपस्थिति काल है। इनकी मृत्यु सं॰ १९१५ में हुई। {{right|—सर्वेक्षण ९९२}} <br>{{larger|६२७. चैन सिङ्घ}}—उपनाम हरचरन, खत्री, लखनऊ के। जन्म १८५३ ई॰। शृङ्गार संग्रह। इन्होंने 'भारत दीपिका' और 'शृङ्गार सारावली' लिखी हैं। यही संभवतः वह दूसरे चैन कवि भी हैं, जिनका उल्लेख शिव सिंह ने किया है। टि॰-चैन सिंह चैन से भिन्न हैं। {{right|—सर्वेक्षण २३३, २३२}} {{c|{{x-larger|भाग ४, विविध}}}} <br>{{larger|६२८. जैचन्द}}—जयपुर के। १८०६ ई॰ में उपस्थित। स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा नामक, जैन संप्रदाय के सिद्धान्तों का विवेचन करनेवाले, सं॰ १८६३ वि॰ (१८०६ ई॰) में विरचित, संस्कृत एवं भाषा ग्रन्थ के कर्ता। <br>{{larger|६२९. लल्लू जी लाल}}—गुजराती, आगरावाले। १८०३ ई॰ में उपस्थित। निम्नलिखित ग्रन्थों के सुप्रसिद्ध रचयिता:— (१) प्रेम सागर (राग कल्पद्रुम)—यह ऊपर वाले साल में मारक्विस आफ् वेलेजली की सरकार की अधीनता और डाक्टर जान गिलक्रिष्ट के निर्देशन<noinclude></noinclude> 020yvmnetcokilxl01khqjkd27hja8p पृष्ठ:M.A. Hindi Syllabus Mizoram University.pdf/६ 250 176560 675736 675702 2026-09-13T08:07:26Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675736 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{center|'''प्रथम सेमेस्टर'''}} {| style="width:100%; border:none; background:transparent; font-weight:bold;" |- | style="text-align:left;" | HIN/Mj/500 || style="text-align:center;" | हिंदी साहित्य का इतिहास (काव्य) || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 3 |}</noinclude>{{Outdent|'''इस पत्र के अध्ययन के उपरांत विद्यार्थी:'''}} {| style="width:100%; border:none; background:transparent;" |- | style="vertical-align:top; width:30px;" | i. || इतिहास-दर्शन और साहित्येतिहास की अवधारणा एवं उपयोगिता से परिचित हो सकेंगे। |- | style="vertical-align:top;" | ii. || हिंदी साहित्य के इतिहास की रूपरेखा, इतिहास लेखन की परंपरा, काल-विभाजन, सीमांकन एवं नामकरण आदि की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। |- | style="vertical-align:top;" | iii. || हिंदी साहित्य (काव्य) के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक के विभिन्न कालखंडों की पृष्ठभूमि, नामकरण, प्रवृत्तियों एवं विविध साहित्य रूपों से परिचित हो सकेंगे। |- | style="vertical-align:top;" | iv. || आधुनिकता की अवधारणा तथा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से परिचित हो सकेंगे। |- | style="vertical-align:top;" | v. || हिंदी साहित्य में आधुनिकता के आरंभ के संबंध में ज्ञान हासिल कर सकेंगे। |- | style="vertical-align:top;" | vi. || नवजागरण की अवधारणा एवं परिस्थितियों से परिचित हो सकेंगे। |- | style="vertical-align:top;" | vii. || आदिकाल से लेकर समकालीन हिंदी कविता की विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए अब तक की हिंदी कविता के बदलते स्वरूप की पहचान कर सकेंगे। |} :'''इकाई 1.''' इतिहास-दर्शन और साहित्येतिहास, हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की परंपरा, आदिकाल: पृष्ठभूमि, नामकरण, प्रवृत्तियाँ, साहित्य की विविध धाराएँ (सिद्ध, नाथ, जैन, रासो, लौकिक साहित्य) :'''इकाई 2.''' भक्ति आंदोलन, भक्ति काव्य की प्रवृत्तियाँ, भक्तिकालीन विभिन्न काव्य धाराएँ: निर्गुण काव्यधारा, सगुण काव्यधारा, रीतिकाल: पृष्ठभूमि, नामकरण, प्रवृत्तियाँ, विभिन्न काव्य धाराएँ (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त) :'''इकाई 3.''' आधुनिकता की अवधारणा, हिन्दी साहित्य में आधुनिकता का प्रारम्भ, हिन्दी नवजागरण, भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, समकालीन कविता {{gap}}'''सहायक ग्रंथ:''' {| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;" |- | style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इतिहास क्या है?- ई.एच.कार, मैकमिलन प्रकाशन, दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 2. || इतिहास के बारे में- लाल बहादुर वर्मा, इतिहास बोध प्रकाशन, इलाहाबाद |- | style="vertical-align:top;" | 3. || साहित्य का इतिहास दर्शन- नलिन विलोचन शर्मा, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना |- | style="vertical-align:top;" | 4. || साहित्य और इतिहास-दृष्टि- मैनेजर पांडेय, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 5. || इतिहास और आलोचना- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 6. || हिन्दी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |- | style="vertical-align:top;" | 7. || हिन्दी साहित्य का आदिकाल- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना |- | style="vertical-align:top;" | 8. || हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 9. || हिन्दी साहित्य की भूमिका- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 10. || हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद |- | style="vertical-align:top;" | 11. || हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास- बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 12. || हिन्दी साहित्य का अतीत- विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, वाणी प्रकाशन, दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 13. || परंपरा का मूल्यांकन- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 14. || हिन्दी साहित्य:बीसवीं शताब्दी- नंददुलारे वाजपेयी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद |- | style="vertical-align:top;" | 15. || आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ- नामवर सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद |- | style="vertical-align:top;" | 16. || छायावाद- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 17. || कविता के नये प्रतिमान- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |- | style="vertical-align:top;" | 18. || भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली |}<noinclude>{{right|{{smaller|Page 6 of 36}}}}</noinclude> 6fgvcsofenxb1w53rxckenmckn6ptks पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७२ 250 186339 675727 675726 2026-09-12T11:59:48Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 675727 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१८. स्वयंसेवक- दलपर कुठार'''}}}} बम्बईने प्रान्तीय सरकारोंको यह मौका दे दिया है कि वे व्यवस्थित ढंगसे दमन- चक्र चलायें और असहयोग आन्दोलनको बिलकुल समाप्त कर देनेकी कोशिश करें । बंगाल, संयुक्त प्रान्त, पंजाब और दिल्लीकी सरकारोंने स्वयंसेवक-संगठनोंको छिन्न-भिन्न कर देनेकी जो अधिसूचनाएँ जारी की हैं वे बम्बईकी सरकारके जवाबमें ही हैं। मैं अपनी तरफसे तो इन अधिसूचनाओंका स्वागत ही करता हूँ । इन अधिसूचनाओंके रूपमें हमें एक ऐसा कारण मिल गया जिससे हम अब सहज ही सविनय अवज्ञा कर सकते हैं । यदि हम सरकारकी इस चुनौतीको स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, तो हम तत्काल अपनी ताकत आजमा सकते हैं । सत्याग्रही अपना संघर्ष शुरू करनेका अवसर स्वयं आप ही निश्चित करता है । यह सविनय अवज्ञाकी एक अपनी खूबी है । वह तबतक अवज्ञा करना उचित नहीं समझता, जबतक उसे ऐसा करना आवश्यक न लगे । सरकार अपनी तरफसे उसे कितना ही उत्तेजित क्यों न करे, वह उससे सविनय अवज्ञा शुरू नहीं करा सकती । ऐसी अवस्थामें यदि वे प्रान्त जहाँ ये अधिसूचनाएँ जारी हुई हैं तैयार हों तो उनके लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि वे अपने स्वयंसेवक संगठनोंको भंग करनेसे इनकार कर दें, और हर स्वयंसेवक अपनेको जेल पहुँचा सकता है। लेकिन हमें पहले अपनी बुनियाद अच्छी तरह देख लेनी चाहिए। इन संगठनोंपर जो आरोप लगाया गया है वह यह है कि वे ऐसी संस्थाएँ हैं जो बल-प्रयोगका साधन बनती हैं, शान्ति- रक्षाका नहीं । अतएव हमारा पहला फर्ज यह है कि हम इस आरोपकी जाँच करें और अगर वह किसी भी अंशमें हमपर घटता हो तो अपने उस दोषको बिलकुल निर्मूल कर डालें। जिन-जिन स्वयंसेवकोंने बल-प्रयोग किया हो या अपने वचनों और कार्योंके द्वारा बल-प्रयोगकी धमकी भी दी हो, उनको अवश्य उनके कामसे हटा देना चाहिए। संयोगसे कार्यसमितिने भी इसी मौकेपर स्वयंसेवक दलोंका संगठन करनेका प्रस्ताव<ref>१. बम्बई में २३-११-१९२१ को स्वीकृत प्रस्ताव ।</ref> स्वीकृत किया है। मुझे आशा है कि प्रत्येक प्रान्तकी कांग्रेस कमेटी और खिलाफत- समितियाँ इस कामको तुरन्त उठा लेंगी और तमाम स्वयंसेवक दल एक ही संगठनमें शामिल हो जायेंगे तथा जो भी स्वयंसेवक अहिंसाके सिद्धान्तका कायल न हो वह उसमें न रहने पायेगा । तब यदि इन संस्थाओंके काममें किसी तरहका हस्तक्षेप किया गया तो हम संघर्ष छेड़ सकते हैं। पर इस संघर्षकी शर्त यह है कि जब स्वयंसेवकोंको जेल भेजा जाये तब शेष सभी लोग खामोश रहें और शान्ति बनाये रखें। बिना शोरगुलके, बिना भीड़-भाड़के जेलोंको भर देनेका यही सबसे उचित अवसर होगा । यदि हम चुपचाप कष्ट सहन करनेके महत्वके कायल हों, तो हमें सरकारके लिए अपनी गिर-<noinclude></noinclude> 4gbs5msg26gdhamy8323ylkhtzexdv2