विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.19 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१३७ 250 34630 675739 578971 2026-09-14T06:55:38Z Puja shaw 6887 675739 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>दूसरे वैष्णव कवि जो कृष्ण भक्ति का उपदेश करते थे, अपने श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए अपनी भारत को प्रायः बार विलासिनी बना देते थे; लेकिन तुलसीदास ने अपने देशवासियों में उदार विश्वास किया और उनका विश्वास पूर्णरूपेण प्रतिफलित और पुरस्कृत भी हुआ है। {{c|तुलसीदास सरवरिया ब्राह्मण थे । यह सोलहवीं शती के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए थे और १६२४ ई० में पर्याप्त दीर्घायु होकर दिवंगत हुए, जैसा कि पुरानी कविता है :-}} संवत सोलह सै असी, असी गंग के तीर सावन सुकला सप्तमी, तुलसी तजेउ शरीर सावन सुदी ७, संवत् १६८० को, तुलसी ने गंगा के किनारे असी घाट . पर शरीर त्याग किया ।। | भक्तसिन्धु और वृहद् रामायण माहात्म्य के अनुसार इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का हुलसी था तथा वे हस्तिनापुर में पैदा हुए थे। लेकिन दूसरे प्रमाणों के अनुसार वे चित्रकूट के निकट हाजीपुर में उत्पन्न हुए थे | जो हो, सामान्य परम्परा तो यह है कि जमुना तट स्थित, बाँदा जिले के । राजापुर को उनकी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। लड़कपन में यह सूकरखेत ( सोरों ) में रहे, जहाँ पहली बार रामभक्ति का उदय इनमें हुआ । प्रियादास ( संख्या ५१ और ३१९ ) के अनुसार इनकी पत्नी ने पहले पार्थिव प्रेम को दिव्य प्रेम में परिणत करने के लिए प्रोत्साहित किया और उसकी प्रबोध-वाणी से उत्तेजित होकर इन्होंने उसका परित्याग कर दिया और बनारस चले गए, जहाँ इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश, अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, प्रयाग ( इलाहाबाद ), पुरुषोत्तमपुरी और अन्य तीर्थ स्थानों में यदा-कदो जाते हुए, बिताया । ( कुछ ग्रंथों की तिथियों को छोड़ ) उनके जीवन का एक मात्र तथ्य, जिसके सम्बन्ध में यथार्थ असंशय है, यह है कि ये आनन्द राय और कन्हई के बीच जमीन के एक झगड़े के सम्बन्ध में पञ्च । बनाए गए थे। इनके हाथ का लिखा हुआ पञ्चायतनामा अब भी उपलब्ध है, इसकी तिथि उनकी मृत्यु से ११ वर्ष पहले की, संवत् १६६९ है । इसका एक फोटो, प्रत्यक्षरीकरण और अनुवाद इस ग्रंथ में जोड़ दिए गए हैं । प्रियादास द्वारा वर्णित और श्री ग्राउस द्वारा रामायण के अपने अनुवाद की भूमिका में सन्निहित, कुछ दन्त-कथाएँ संक्षेप में यहाँ दी जा रही हैं। एक कृतज्ञ भूत, १. इस उद्धरण के पश्चात् दोहे का अंग्रेजी अनुवाद भी दिया हुआ है।--अनुवादक. . . २. रामायण बालकांड दोहा ८७.<noinclude></noinclude> k3urwokbjjdwyc2nprnxqllfug2tlrm 675740 675739 2026-09-14T10:35:51Z ~2026-49680-28 6888 675740 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|दूसरे वैष्णव कवि जो कृष्ण भक्ति का उपदेश करते थे, अपने श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए अपनी भारत को प्रायः बार विलासिनी बना देते थे; लेकिन तुलसीदास ने अपने देशवासियों में उदार विश्वास किया और उनका विश्वास पूर्णरूपेण प्रतिफलित और पुरस्कृत भी हुआ है।}} {{c|तुलसीदास सरवरिया ब्राह्मण थे । यह सोलहवीं शती के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए थे और १६२४ ई० में पर्याप्त दीर्घायु होकर दिवंगत हुए, जैसा कि पुरानी कविता है :-}} {{c|संवत सोलह सै असी, असी गंग के तीर सावन सुकला सप्तमी, तुलसी तजेउ शरीर'}} {{c|सावन सुदी ७, संवत् १६८० को, तुलसी ने गंगा के किनारे असी घाट . पर शरीर त्याग किया ।}} {{c|भक्तसिन्धु और वृहद् रामायण माहात्म्य के अनुसार इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का हुलसी था तथा वे हस्तिनापुर में पैदा हुए थे। लेकिन दूसरे प्रमाणों के अनुसार वे चित्रकूट के निकट हाजीपुर में उत्पन्न हुए थे | जो हो, सामान्य परम्परा तो यह है कि जमुना तट स्थित, बाँदा जिले के । राजापुर को उनकी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। लड़कपन में यह सूकरखेत ( सोरों ) में रहे, जहाँ पहली बार रामभक्ति का उदय इनमें हुआ । प्रियादास ( संख्या ५१ और ३१९ ) के अनुसार इनकी पत्नी ने पहले पार्थिव प्रेम को दिव्य प्रेम में परिणत करने के लिए प्रोत्साहित किया और उसकी प्रबोध-वाणी से उत्तेजित होकर इन्होंने उसका परित्याग कर दिया और बनारस चले गए, जहाँ इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश, अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, प्रयाग ( इलाहाबाद ), पुरुषोत्तमपुरी और अन्य तीर्थ स्थानों में यदा-कदो जाते हुए, बिताया । ( कुछ ग्रंथों की तिथियों को छोड़ ) उनके जीवन का एक मात्र तथ्य, जिसके सम्बन्ध में यथार्थ असंशय है, यह है कि ये आनन्द राय और कन्हई के बीच जमीन के एक झगड़े के सम्बन्ध में पञ्च । बनाए गए थे। इनके हाथ का लिखा हुआ पञ्चायतनामा अब भी उपलब्ध है, इसकी तिथि उनकी मृत्यु से ११ वर्ष पहले की, संवत् १६६९ है । इसका एक फोटो, प्रत्यक्षरीकरण और अनुवाद इस ग्रंथ में जोड़ दिए गए हैं । प्रियादास द्वारा वर्णित और श्री ग्राउस द्वारा रामायण के अपने अनुवाद की भूमिका में सन्निहित, कुछ दन्त-कथाएँ संक्षेप में यहाँ दी जा रही हैं। एक कृतज्ञ भूत}} १. इस उद्धरण के पश्चात् दोहे का अंग्रेजी अनुवाद भी दिया हुआ है।--अनुवादक २. रामायण बालकांड दोहा ८७.<noinclude></noinclude> 8z10sralugynpsguope64n052l298ar पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/२३५ 250 34739 675738 675735 2026-09-13T16:21:21Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित */ 675738 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{c|(२१६)}}</noinclude>&nbsp; टि॰—महाकवि कालिदास त्रिपाठी का उपनाम है। {{right|-सर्वेक्षण ६८८, ७३}} <br>{{larger|४०४. रसराज कवि—}}जन्म १७२३ ई॰। एक अच्छे नखशिख के रचयिता। <br>{{larger|४०५. रसिक बिहारी—}}जन्म १७२३ ई॰। राग कल्पद्रुम। टि॰—महाराज नागरीदास की उपपत्नी बनीठनी जी रसिक विहारी नाम से लिखती थीं। १७२३ ई॰ इनका उपस्थिति काल है। इनका देहावसान सं॰ १८२२ में आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ। {{right|—सर्वेक्षण ७९५}} <br>{{larger|४०६. रुद्रमणि—}}चौहान, जन्म १७२३ ई॰। <br>{{larger|४०७. दल सिङ्घ—}}राजा, बुंदेलखंडी। जन्म १७२४ ई॰। राधाकृष्ण की लीला से संबंध रखनेवाले 'प्रेम पयोनिधि' नामक ग्रंथ के रचयिता। <br>{{larger|४०८. प्राननाथ—}}कोटा के। जन्म १७२४ ई॰। यह कोटा दरबार में थे। टि॰—१७२४ ई॰ (सं॰ १७८१) उपस्थिति काल है। {{right|—सर्वेक्षण ४५८}} <br>{{larger|४०९. जुलफेकार कवि—}}जन्म १७२५ ई॰। इन्होंने बिहारी (सं॰ १९६) की सतसई पर एक अच्छा तिलक रचा। टि॰—समय एकदम गलत है। प्रसंग-प्राप्त ग्रन्थ की रचना सं॰ १९०३ में हुई थी। {{right|—सर्वेक्षण ३०५}} <br>{{larger|४१०, कमल नयन कवि—}}बुंदेलखंडी। जन्म १७२७ ई॰। शृंगार रस पर इन्होंने बहुत लिखा है, पर इनका कोई पूर्ण ग्रंथ नहीं ज्ञात है। इनकी कविता सरस कही जाती है। टि॰—१७२७ ई॰ (सं॰ १७८४) उपस्थिति काल है, जन्म काल नहीं। {{right|—सर्वेक्षण ८९}} <br>{{larger|४११. बिस्वनाथ अताई—}}बुंदेलखंडी; जन्म १७२७ ई॰। सत्कविगिराविलास। टि॰—१७२७ ई॰ (सं॰ १७८४) इनका जन्मकाल न होकर उपस्थिति काल है, क्योंकि इसके १९ ही वर्ष बाद संकलित सत्कविगिराविलास में इनकी रचना है।<noinclude></noinclude> kc14lh11nwj8r50t7p8jtceif50hzn0