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पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१३७
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{c|(१२६)}}</noinclude>
दूसरे वैष्णव कवि जो कृष्ण भक्ति का उपदेश करते थे, अपने श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए अपनी भारती को प्रायः बार विलासिनी बना देते थे; लेकिन तुलसीदास ने अपने देशवासियों में उदार विश्वास किया और उनका विश्वास पूर्णरूपेण प्रतिफलित और पुरस्कृत भी हुआ।
तुलसीदास सरवरिया ब्राह्मण थे। यह सोलहवीं शती के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए थे और १६२४ ई॰ में पर्याप्त दीर्घायु होकर दिवंगत हुए, जैसा कि पुरानी कविता है :—
{{blockcenter|<poem>संवत सोलह से असी, असी गंग के तीर
सावन सुकला सत्तमी, तुलसी तजेउ शरीर<ref>इस उद्धरण के पश्चात् दोहे का अंगरेज़ी अनुवाद भी दिया हुआ है। —अनुवादक.</ref></poem>}}
सावन सुदी ७, संवत् १६८० को, तुलसी ने गंगा के किनारे असी घाट पर शरीर त्याग किया।
भक्तसिन्धु और वृहद् रामायण माहात्म्य के अनुसार इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का हुलसी था तथा वे हस्तिनापुर में पैदा हुए थे। लेकिन दूसरे प्रमाणों के अनुसार वे चित्रकूट के निकट हाजीपुर में उत्पन्न हुए थे। जो हो, सामान्य परम्परा तो यह है कि जमुना तट स्थित, बाँदा जिले के राजापुर को उनकी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। लड़कपन में यह सूकरखेत (सोरों)<ref>रामायण बालकांड दोहा ८७.</ref> में रहे, जहाँ पहली बार रामभक्ति का उदय इनमें हुआ। प्रियादास (संख्या ५१ और ३१९) के अनुसार इनकी पत्नी ने पहले पार्थिव प्रेम को दिव्य प्रेम में परिणत करने के लिए प्रोत्साहित किया और उसकी प्रबोध-वाणी से उत्तेजित होकर इन्होंने उसका परित्याग कर दिया और बनारस चले गए, जहाँ इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश, अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, प्रयाग (इलाहाबाद), पुरुषोत्तमपुरी और अन्य तीर्थ स्थानों में यदा-कदा जाते हुए, बिताया। (कुछ ग्रंथों की तिथियों को छोड़) उनके जीवन का एक मात्र तथ्य, जिसके सम्बन्ध में यथार्थ असंशय है, यह है कि ये आनन्द राय और कन्हई के बीच जमीन के एक झगड़े के सम्बन्ध में पञ्च बनाए गए थे। इनके हाथ का लिखा हुआ पञ्चायतनामा अब भी उपलब्ध है, इसकी तिथि उनकी मृत्यु से ११ वर्ष पहले की, संवत् १६६९ है। इसका एक फोटो, प्रत्यक्षरीकरण और अनुवाद इस ग्रंथ में जोड़ दिए गए हैं। प्रियादास द्वारा वर्णित और श्री ग्राउस द्वारा रामायण के अपने अनुवाद की भूमिका में सन्निहित, कुछ दन्त-कथाएँ संक्षेप में यहाँ दी जा रही हैं। एक कृतज्ञ भूत<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{c|(१२६)}}</noinclude>
दूसरे वैष्णव कवि जो कृष्ण भक्ति का उपदेश करते थे, अपने श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए अपनी भारती को प्रायः बार विलासिनी बना देते थे; लेकिन तुलसीदास ने अपने देशवासियों में उदार विश्वास किया और उनका विश्वास पूर्णरूपेण प्रतिफलित और पुरस्कृत भी हुआ।
तुलसीदास सरवरिया ब्राह्मण थे। यह सोलहवीं शती के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए थे और १६२४ ई॰ में पर्याप्त दीर्घायु होकर दिवंगत हुए, जैसा कि पुरानी कविता है :—
{{blockcenter|<poem>संवत सोलह से असी, असी गंग के तीर
सावन सुकला सत्तमी, तुलसी तजेउ शरीर<ref>इस उद्धरण के पश्चात् दोहे का अंगरेज़ी अनुवाद भी दिया हुआ है। —अनुवादक.</ref></poem>}}
सावन सुदी ७, संवत् १६८० को, तुलसी ने गंगा के किनारे असी घाट पर शरीर त्याग किया।
भक्तसिन्धु और वृहद् रामायण माहात्म्य के अनुसार इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का हुलसी था तथा वे हस्तिनापुर में पैदा हुए थे। लेकिन दूसरे प्रमाणों के अनुसार वे चित्रकूट के निकट हाजीपुर में उत्पन्न हुए थे। जो हो, सामान्य परम्परा तो यह है कि जमुना तट स्थित, बाँदा जिले के राजापुर को उनकी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। लड़कपन में यह सूकरखेत (सोरों)<ref>रामायण बालकांड दोहा ८७.</ref> में रहे, जहाँ पहली बार रामभक्ति का उदय इनमें हुआ। प्रियादास (संख्या ५१ और ३१९) के अनुसार इनकी पत्नी ने पहले पार्थिव प्रेम को दिव्य प्रेम में परिणत करने के लिए प्रोत्साहित किया और उसकी प्रबोध-वाणी से उत्तेजित होकर इन्होंने उसका परित्याग कर दिया और बनारस चले गए, जहाँ इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश, अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, प्रयाग (इलाहाबाद), पुरुषोत्तमपुरी और अन्य तीर्थ स्थानों में यदा-कदा जाते हुए, बिताया। (कुछ ग्रंथों की तिथियों को छोड़) उनके जीवन का एक मात्र तथ्य, जिसके सम्बन्ध में यथार्थ असंशय है, यह है कि ये आनन्द राय और कन्हई के बीच जमीन के एक झगड़े के सम्बन्ध में पञ्च बनाए गए थे। इनके हाथ का लिखा हुआ पञ्चायतनामा अब भी उपलब्ध है, इसकी तिथि उनकी मृत्यु से ११ वर्ष पहले की, संवत् १६६९ है। इसका एक फोटो, प्रत्यक्षरीकरण और अनुवाद इस ग्रंथ में जोड़ दिए गए हैं। प्रियादास द्वारा वर्णित और श्री ग्राउस द्वारा रामायण के अपने अनुवाद की भूमिका में सन्निहित, कुछ दन्त-कथाएँ संक्षेप में यहाँ दी जा रही हैं। एक कृतज्ञ भूत<noinclude>{{rule}}
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पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१९३
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>( {{c|१८०}} )
२०८.गोपाल कवि—प्राचीन, जन्म १६५८ ई०।
मित्रजीत सिंह के दरबार में थे।
टी०——गोपाल प्राचीन मित्रजीत सिंह के पुत्र कल्याण सिंह' के यहाँ थे ।
सरोज में इन्हें 'सं० १७१ मैं उ०' कहा गया है ।
-{{right|सर्वेक्षण १६४}}
२०९.हरिवंश सिसर—बिलग्राम, जिला हरदोई के । १६६२३ ई० में उपस्थित।
इनके हाथ की लिखी पद्मावत की एक पोथीं के अनुसार यह अमेठी
के राजा हनुमंत सिह के दरबार में थे । यह सुप्रसिद्ध कवि हैं और अब्दुल
जलील बिलग्रामी ( स० १७९ ) के भाषा शिक्षक थे ।
टि०——सरोज के अनुसार इनकी लिखी पद्मावत की पोथी से इनका अब्दुल
जलील का भाषा काव्य शिक्षक होना सिद्ध होता है, न कि इनका अमेठी नरेश
हनुमंत सिंह को दरबारी चि होना । सरोज में इन्हें सं० १७२९ में इ०
कहा गया है ।
{{right|——सर्वेक्षण ९६९}}
२१०. सबल सिङ्ग चौहान—जन्म १६७० ई०
महाभारत के २४,००० श्लोकों का पद्यन्नद्ध अनुवाद बहुत संक्षेप में किया
है । यह कौन थे, इस सम्बन्ध में अनेक कथन हैं। कुछ कहते हैं कि यह
चन्दागढ़ के राजा थे, दूसरे कहते हैं कि सबलगढ़ के । शिव सिंह का ख्याल
है कि यह इटावा जिले में किसी गाँव के जमींदार थे । शिव सिंह द्वारा उल्लि- .
खित भाषा साहित्य के दो ग्रंथों घटऋतु और भाषा ऋतुसंहार के रचयिता.
सबलसिंह कवि भी संभवतः यही हैं ।
टि०——सवलसिंह की रचनाकाल सं० १७१२ से १७८१ तक है । अतः
१६७० ई० ( सं १७२७ वि० ) इनका जमकल कदापि नहीं हो सकता।
यह इनका उपस्थितिकाल हैं । घटऋतु और भापात्रतुसंहार दोनों एक ही ग्रन्थ
हैं। ग्रियर्सन को दोनों सवक सिंहों के अभिन्न होने का अनुमान ठीक है ।।
{{right|—सर्वेक्षण ९१३, ९१३}}
२११.स्त्री गोविन्द कवि—जन्म (१ उपस्थिति, देखिए;सं० १४५) १६७३ई०
यह सतारा के शिवराज सुलंकी के दरबार में थे।
टी०——१६७३ ई० उपस्थिति काल है, जन्मकाल नहीं।
{{right|—सर्वेक्षण ८६३}}
२१२.देवीदाल कवि-बुन्देलखण्डी । १६८५ ई० में उपस्थित ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" /></noinclude> {{c| ( १८०) }}
२०८.गोपाल कवि—प्राचीन, जन्म १६५८ ई०।
{{gap}}मित्रजीत सिंह के दरबार में थे।
{{gap}}टी०——गोपाल प्राचीन मित्रजीत सिंह के पुत्र कल्याण सिंह' के यहाँ थे ।
सरोज में इन्हें 'सं० १७१ मैं उ०' कहा गया है ।
-{{right|सर्वेक्षण १६४}}
२०९.हरिवंश सिसर—बिलग्राम, जिला हरदोई के । १६६२३ ई० में उपस्थित।
इनके हाथ की लिखी पद्मावत की एक पोथीं के अनुसार यह अमेठी
के राजा हनुमंत सिह के दरबार में थे । यह सुप्रसिद्ध कवि हैं और अब्दुल
जलील बिलग्रामी ( स० १७९ ) के भाषा शिक्षक थे ।
{{gap}}टि०—सरोज के अनुसार इनकी लिखी पद्मावत की पोथी से इनका अब्दुल
जलील का भाषा काव्य शिक्षक होना सिद्ध होता है, न कि इनका अमेठी नरेश
हनुमंत सिंह को दरबारी चि होना । सरोज में इन्हें सं० १७२९ में इ०
कहा गया है ।
{{right|—सर्वेक्षण ९६९}}
२१०. सबल सिङ्ग चौहान—जन्म १६७० ई०
{{gap}}महाभारत के २४,००० श्लोकों का पद्यन्नद्ध अनुवाद बहुत संक्षेप में किया
है । यह कौन थे, इस सम्बन्ध में अनेक कथन हैं। कुछ कहते हैं कि यह
चन्दागढ़ के राजा थे, दूसरे कहते हैं कि सबलगढ़ के । शिव सिंह का ख्याल
है कि यह इटावा जिले में किसी गाँव के जमींदार थे । शिव सिंह द्वारा उल्लि- .
खित भाषा साहित्य के दो ग्रंथों घटऋतु और भाषा ऋतुसंहार के रचयिता.
सबलसिंह कवि भी संभवतः यही हैं ।
{{gap}}टि०—सवलसिंह की रचनाकाल सं० १७१२ से १७८१ तक है । अतः
१६७० ई० ( सं १७२७ वि० ) इनका जमकल कदापि नहीं हो सकता।
यह इनका उपस्थितिकाल हैं । घटऋतु और भापात्रतुसंहार दोनों एक ही ग्रन्थ
हैं। ग्रियर्सन को दोनों सवक सिंहों के अभिन्न होने का अनुमान ठीक है ।।
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२११.स्त्री गोविन्द कवि—जन्म (१ उपस्थिति, देखिए;सं० १४५) १६७३ई०
यह सतारा के शिवराज सुलंकी के दरबार में थे।
{{gap}}टी०—१६७३ ई० उपस्थिति काल है, जन्मकाल नहीं।
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२१२.देवीदाल कवि-बुन्देलखण्डी । १६८५ ई० में उपस्थित ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/८३
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh||( ७४)|}}</noinclude> तिथि के पहले शिवसिंह को समर्पित संभी गीत लिखे १४४६, ई०
भागवत पुराण की प्रतिलिपि की ।{{right|१४५६ ई०}}
दुर्गाभक्ति तरंगिणी लिखी{{right|१४७० ई०}}
यदि इन तिथियों को ठीक माना जाय तो इन्होंने अपना ग्रंथ कम-से-कम
९० वर्ष की वय में पूर्ण किया होगा। विद्यापति के महान् आश्रयदाता राजा
शिवसिंह रूपनारायण भी कहे जाते थे, जो उस वंश के अनेक लोगों की
सामान्य उपाधि प्रतीत होती है। इनकी कई पक्षियाँ थीं, जिनमें से कवि ने
लखिमा ठकुराइन, प्राणवती और मोदवती को अमर कर दिया है। एक जनश्रुति
है कि बादशाह अकबर ने शिवसिंह को किसी अपराध पर दिल्ली बुलाया
और विद्यापति ने अपनी दैवी-शक्ति को प्रदर्शन कर अपने आश्रयदाता, को
बंधन मुक्त कराया। बादशाह ने विद्यापति को एक काष्ठ-मंजूषा में बन्द
कर दिया और नगर की कुछ मंगला मुखियों को सरिता स्नान के लिए भेज
दिया। जब सब समाप्त हो गया, बादशाह ने विद्यापति को मंजूषा से सुंक्त किया
और जो कुछ हुआ था उसका वर्णन करने के लिए कहा। तब विद्यापति ने
तत्काल एक गीत बनाकर सुनाया, जो उनके सर्वाधिक मनोहर गीतों में से एक है। यह परंपरा से हम तक पहुँचा है और इसमें एक स्नान-रता सुंदरी
का वर्णन है। इनकी प्रतिभा से चमत्कृत होकर बादशाह ने उनकी प्रार्थना
स्वीकार कर शिवसिंह को मुक्त कर दिया। दूसरी जनश्रुति यह है कि कवि ने
अपना अंत निकट आया जानकर पवित्र गंगा के तट पर मरना निश्चित किया।
मार्ग में उन्होंने सोचा कि धारा तो भक्तों की बेटी है; और उन्होंने उसे अपने
पास बुलाया। आज्ञाकारिणी बाढ़ तीन धाराओं में विभक्त हो गई और जहाँ
विद्यापति बैठे थे, वहाँ तरंगायित होने लगी। प्रसन्नतापूर्वक इसके पवित्र जल
पर दृष्टि-निक्षेप करते हुए, विद्यापति ने अपना शरीर गिरा दिया और दिवंगत
हो गए। जहाँ वे मरे, वहाँ एक शिवलिंग निकल' अयिा। यह शिवलिंग और
सरिता के चिह्न अभी तक वहाँ दिखाए जाते हैं। यह स्थान दरभंगा जिले में :
बाजितपुर कस्बे के निकट है। उस महान वृद्ध गीताचार्य के उपयुक्त ही उसकी
यह मृत्यु-गाथा है। :: : : :: : : .
पूर्वी हिंदुस्तान के साहित्य के इतिहास पर विद्यापति को प्रभाव अत्यधिक
। यह उन धार्मिक प्रेम गीतों की रचना की कला में पूर्ण प्रवीण थे, जो
{{smallrefs}}
१. यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि ( यदि इस कंथा पर विश्वास किया जाय तो ) :
• अकबर इस कथा की वास्तविक नायक कदापि नहीं हो सकता क्योंकि वह सोलहवीं शती
के उत्तरार्ध में हुआ है।
|<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदुई साहित्य का इतिहास.pdf/११२
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{Rh||भूमिका|[८५}}</noinclude>हैं, और उनकी भाषा अत्यन्त कृत्रिम होती है। इस विशेष गाने के आविष्कारक जौनपुर के सुल्तान हुसेन शर्की बताए जाते हैं।<ref>विलर्ड ( Willard ), 'म्यूज़िक ऑव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान का संगत), १०८</ref>
'गज़ल' एक प्रकार की गीति कविता (ode) है जो रूप में क़सीदा के समान है, केवल अंतर है तो यही कि यह बहुत छोटी होती है, बारह पंक्तियों से अधिक नहीं होनी चाहिए। पिछली (पंक्ति) जिसे 'शाह बैत', या शाही पद्य, कहते हैं, में, क़सीदा की भाँति, लिखने वाले का तख़ल्लुस आना चाहिए।
कभी-कभी गज़ल में विशेष श्लेष शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार पहले पद्य के दो मिसरों का और आगे आने वाले पद्यों के अंतिम का समान रूप से या समान शब्दों से प्रारंभ और अंत हो सकता है; यह चीज़ वही है जिसे 'बाज़गश्त' कहते हैं।<ref>वली की ग़ज़ल जो 'दिल-रूबा' शब्दों से प्रारंभ होती है, और जो मेरे संस्करण के पृ॰ २३ पर है, उसका एक उदाहरण प्रस्तुत करती है, साथ ही वह जो 'सब चमन' शब्दों से प्रारंभ होती है, और जो २९ पर पढ़ी जा सकती है।</ref>
'चीस्तान', पद्य और गद्य में पहेली।
'ज़तलियत'। मीर जाफ़र ज़तली, जिन्होंने इन्हें अपना नाम दिया, की कविताओं की तरह रची गई कविताओं को इस प्रकार कहा जाता है, अर्थात् आधी फ़ारसी और आधी हिन्दुस्तानी।
'ज़िक्री'—'बयान', गाना जिसका विषय गंभीर और नैतिक रहता है। गुजरात में इसका जन्म हुआ, और काज़ी महमूद द्वारा हिन्दुस्तान में प्रचलित हुआ।<ref>विलर्ड (Willard), 'म्यूज़िक ऑव हिन्दुस्तान', पृ॰ ९३</ref>
'तकरीत' (Tacrỉt), अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा से भरी कविता को दिया गया नाम।<noinclude>{{rule|10em|align=left}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:M.A. Hindi Syllabus Mizoram University.pdf/७
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 19. || महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 20. || मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य - रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 21. || शताब्दी की कविता - नंदकिशोर नवल, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 22. || समकालीन काव्य यात्रा - नन्दकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 23. || आधुनिक हिन्दी कविता (भाग -1 और 2) - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 24. || समकालीन हिन्दी कविता - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
|}
'''मूल्यांकन पद्धतिः'''
{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 है, जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा की अवधि 3 घंटे निर्धारित है।
|-
| style="vertical-align:top;" | 4. || सत्रांत परीक्षा में प्रत्येक इकाई से दो-दो आलोचनात्मक प्रश्न पूछे जाएँगे, जिनमें से एक-एक का उत्तर लिखना होगा। (3x15=45 अंक)
|-
| style="vertical-align:top;" | 5. || प्रत्येक इकाई से कम-से-कम एक - एक और कुल चार टिप्पणियाँ पूछी जाएँगी, जिनमें से दो का उत्तर लिखना होगा। (2x71⁄2=15 अंक)
|}<noinclude>{{right|{{smaller|Page 7 of 36}}}}</noinclude>
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| style="vertical-align:top; width:30px;" | 19. || महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 20. || मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य - रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 21. || शताब्दी की कविता - नंदकिशोर नवल, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 22. || समकालीन काव्य यात्रा - नन्दकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
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| style="vertical-align:top;" | 23. || आधुनिक हिन्दी कविता (भाग -1 और 2) - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
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| style="vertical-align:top;" | 24. || समकालीन हिन्दी कविता - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
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| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 है, जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
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| style="vertical-align:top; width:30px;" | 19. || महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 20. || मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य - रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 21. || शताब्दी की कविता - नंदकिशोर नवल, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 22. || समकालीन काव्य यात्रा - नन्दकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 23. || आधुनिक हिन्दी कविता (भाग -1 और 2) - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली
|-
| style="vertical-align:top;" | 24. || समकालीन हिन्दी कविता - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
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{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 है, जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा की अवधि 3 घंटे निर्धारित है।
|-
| style="vertical-align:top;" | 4. || सत्रांत परीक्षा में प्रत्येक इकाई से दो-दो आलोचनात्मक प्रश्न पूछे जाएँगे, जिनमें से एक-एक का उत्तर लिखना होगा। (3x15=45 अंक)
|-
| style="vertical-align:top;" | 5. || प्रत्येक इकाई से कम-से-कम एक - एक और कुल चार टिप्पणियाँ पूछी जाएँगी, जिनमें से दो का उत्तर लिखना होगा। (2x71⁄2=15 अंक)
|}<noinclude>{{right|{{smaller|Page 7 of 36}}}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="प्रथम 07" />{| style="width:100%; border:none; background:transparent; font-weight:bold;"
|-
| style="text-align:left;" | HIN/Mj/501 || style="text-align:center;" | आरंभिक हिंदी कविता || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 3
|}</noinclude>'''इस पत्र के अध्ययन के उपरांत विद्यार्थी :'''
{| style="width:100%; border:none; background:transparent;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | i. ||आरंभिक हिंदी कविता (आदिकालीन, भक्तिकालीन और रीतिकालीन) के परिदृश्य और उसकी प्रवृत्तियों से परिचित हो सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | ii. ||आरंभिक हिंदी कविता (आदिकालीन, भक्तिकालीन और रीतिकालीन) और कवियों के अध्ययन विश्लेषण की तकनीक सीख सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | iii. ||सरहपा के काव्य के माध्यम से सिद्ध- साहित्य के काव्यगत वैशिष्ट्य से अवगत 'सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | iv. ||चंदबरदायी की रचना 'पृथ्वीराज रासो' के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक सरोकारों को समझ सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | v. ||विद्यापति के काव्य- सौन्दर्य से परिचित हो सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | vi. ||कबीर एवं जायसी की काव्यगत विशिष्टताओं से अवगत हो सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | vii. ||सूरदास एवं मीराँबाई की काव्य- संवेदना से परिचित हो सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | viii. ||तुलसीदास के काव्य के माध्यम से उनके सामाजिक और साहित्यिक सरोकारों को समझ सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | ix. ||केशवदास की काव्य-संवेदना से परिचित हो सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | x. ||बिहारी के काव्य के माध्यम से रीतिसिद्ध साहित्य की काव्य- संवेदना से परिचित हो सकेंगे।
|-
| style="vertical-align:top;" | xi. ||घनानन्द के काव्य के माध्यम से रीतिमुक्त साहित्य की काव्य- संवेदना से परिचित हो सकेंगे।
|}
'''इकाई 1.''' आदिकालीन हिंदी कविता<br>
(क) सरहपा
पाठ्य पुस्तक- आदिकालीन काव्य, सं. वासुदेव सिंह, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी पाठ्य अंश- दोहाकोश से दोहा संख्या- 1, 2, 5, 6, 7, 9, 11, 12, 13, 14 (कुल 10 दोहे)
(ख) चंदबरदायी
पाठ्य पुस्तक- पृथ्वीराजरासो, सं. माताप्रसाद गुप्त, साहित्य सदन, चिरगाँव, झाँसी
पाठ्य अंश- कयमास वध, प्रारंभिक 05 पद
(ग) विद्यापति
पाठ्य पुस्तक– विद्यापति पदावली, सं. रामवृक्ष बेनीपुरी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
पाठ्य पद संख्या-1, 3, 4, 175, 250 ( कुल 05 पद)}}
इकाई 2. भक्तिकालीन हिंदी कविता
(क) कबीर एवं जायसी
कबीर
पाठ्य पुस्तक - कबीर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
पाठ्य पद संख्या - 134, 160, 162, 163 (कुल 4 पद)
जायसी
पाठ्य पुस्तक - जायसी ग्रंथावली, सं. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी
पाठ्य अंश - नागमती वियोग खंड, कड़वक संख्या - 1, 4, 6, 9
(ख) सूरदास एवं मीराँबाई
सूरदास
पाठ्य पुस्तक - भ्रमरगीतसार, सं. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी
पाठ्य पद संख्या - 9, 23, 64, 85 (कुल 4 पद )
मीराँबाई
पाठ्य पुस्तक - मीराँबाई की पदावली - सं. परशुराम चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
पाठ्य पद संख्या-5, 18, 19, 70 (कुल 4 पद )
(ग) तुलसीदास
पाठ्य पुस्तक - रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर
पाठ्य अंश उत्तरकाण्ड, दोहा- चौपाई - 117 से 128 तक
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{| style="width:100%; border:none; background:transparent; font-weight:bold;"
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| style="text-align:left;" | HIN/FP/506 || style="text-align:center;" | परियोजना कार्य - I || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 4
|}</noinclude>{{dhr|4em}}
परियोजना कार्य हेतु सेमेस्टर के प्रारम्भ में ही किसी एक विषय / संस्था का चयन विद्यार्थी को करना होगा, जिस पर उसे 10 से 20 पृष्ठ का लिखित प्रतिवेदन विभाग में जमा करना होगा।
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'''मूल्यांकन पद्धति:'''
{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 . जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा लिखित प्रतिवेदन 35 अंक और उसकी प्रस्तुति एवं मौखिकी का मूल्यांकन 25 अंक के आधार पर किया जाएगा।
|}
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text/x-wiki
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| style="text-align:left;" | HIN/FP/506 || style="text-align:center;" | परियोजना कार्य - I || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 4
|}</noinclude>{{dhr|3em}}
परियोजना कार्य हेतु सेमेस्टर के प्रारम्भ में ही किसी एक विषय / संस्था का चयन विद्यार्थी को करना होगा, जिस पर उसे 10 से 20 पृष्ठ का लिखित प्रतिवेदन विभाग में जमा करना होगा।
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{{Outdent|'''मूल्यांकन पद्धति:'''}}
{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 . जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा लिखित प्रतिवेदन 35 अंक और उसकी प्रस्तुति एवं मौखिकी का मूल्यांकन 25 अंक के आधार पर किया जाएगा।
|}
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| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 . जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा लिखित प्रतिवेदन 35 अंक और उसकी प्रस्तुति एवं मौखिकी का मूल्यांकन 25 अंक के आधार पर किया जाएगा।
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परियोजना कार्य हेतु सेमेस्टर के प्रारम्भ में ही किसी एक विषय / संस्था का चयन विद्यार्थी को करना होगा जिस पर उसे 10 से 20 पृष्ठ का लिखित प्रतिवेदन विभाग में जमा करना होगा।
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{{Outdent|'''मूल्यांकन पद्धति :'''}}
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|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 है, जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
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{{dhr|3em}}</noinclude>परियोजना कार्य हेतु सेमेस्टर के प्रारम्भ में ही किसी एक विषय/ संस्था का चयन विद्यार्थी को करना होगा, जिस पर उसे 10 से 20 पृष्ठ का लिखित प्रतिवेदन विभाग में जमा करना होगा।
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|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 है, जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
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| style="text-align:left;" | HIN/FP/604 || style="text-align:center;" | परियोजना कार्य - III || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 4
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| style="text-align:left;" | HIN/FP/604 || style="text-align:center;" | परियोजना कार्य - III || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 4
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{{dhr|3em}}</noinclude>परियोजना कार्य हेतु सेमेस्टर के प्रारम्भ में ही किसी एक विषय/ संस्था का चयन विद्यार्थी को करना होगा, जिस पर उसे 10 से 20 पृष्ठ का लिखित प्रतिवेदन विभाग में जमा करना होगा।
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{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 है, जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
|-
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| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा लिखित प्रतिवेदन 35 अंक और उसकी प्रस्तुति एवं मौखिकी का मूल्यांकन 25 अंक के आधार पर किया जाएगा।
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{{right|{{smaller|Page 30 of 36}}}}</noinclude>
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text/x-wiki
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| style="text-align:left;" | HIN/FP/651 || style="text-align:center;" | परियोजना कार्य - IV || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 4
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{{dhr|3em}}</noinclude>परियोजना कार्य हेतु सेमेस्टर के प्रारम्भ में ही किसी एक विषय / संस्था का चयन विद्यार्थी को करना होगा, जिस पर उसे 10 से 20 पृष्ठ का लिखित प्रतिवेदन विभाग में जमा करना होगा।
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{{Outdent|'''मूल्यांकन पद्धति:'''}}
{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 . जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा लिखित प्रतिवेदन 35 अंक और उसकी प्रस्तुति एवं मौखिकी का मूल्यांकन 25 अंक के आधार पर किया जाएगा।
|}<noinclude>{{dhr|3em}}
{{right|{{smaller|Page 35 of 36}}}}</noinclude>
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AMAN KUMAR
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{| style="width:100%; border:none; background:transparent; font-weight:bold;"
|-
| style="text-align:left;" | HIN/Mj/652 || style="text-align:center;" | लघु शोध प्रबंध - ॥ || style="text-align:right;" | क्रेडिट- 12
|}
{{dhr|3em}}</noinclude>विद्यार्थी को अपने निर्धारित शोध विषय पर 40 से 50 पृष्ठ का लघु शोध प्रबंध लिखकर विभाग में जमा करना होगा।
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{{Outdent|'''मूल्यांकन पद्धति:'''}}
{| style="width:100%; border:none; background:transparent; margin-left:2em;"
|-
| style="vertical-align:top; width:30px;" | 1. || इस पत्र का पूर्णांक 100 . जिसमें सतत मूल्यांकन हेतु 40 अंक और सत्रांत परीक्षा हेतु 60 अंक निर्धारित हैं।
|-
| style="vertical-align:top;" | 2. || सतत मूल्यांकन दो चरणों में C1 एवं C2 के आधार पर किया जाएगा।
|-
| style="vertical-align:top;" | 3. || इस पत्र की सत्रांत परीक्षा लिखित प्रतिवेदन 35 अंक और उसकी प्रस्तुति एवं मौखिकी का मूल्यांकन 25 अंक के आधार पर किया जाएगा।
|}<noinclude>{{dhr|3em}}
{{right|{{smaller|Page 36 of 36}}}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५७३
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||पत्र-लेखकोंसे|
५४१}}</noinclude>फ्तारी आसान कर देनी चाहिए। जब हर दफा हम उसका प्रदर्शन करने लगते हैं और
जुलूस निकालते हैं तब सरकारके लिए गिरफ्तारी करना कठिन हो जाता है। जेलकी
सजाएँ तो हमारे सामान्य दैनिक व्यवहारकी बात हो जानी चाहिए। जब हम हवाखोरीके
लिए या पिकनिक आदिपर जाते हैं तब इतना सारा प्रदर्शन तो नहीं होता । मैं
कहता हूँ कि ऐसी ही उदासीनता जेल जानेके विषयमें भी हमारे मनमें आ जानी
चाहिए। मैं अदालत में बयान देनेके सम्बन्धमें श्री जयकरके इस नुस्खेको बहुत अच्छा
समझता हूँ कि एक मसविदा बना लें और सब लोग वैसा ही बयान दें । अगर बयान
देने या न देनेमें से किसी एकको चुनना हो तो मैं न देनेके पक्षमें अपना मत बिना
हिचकिचाहटके दे दूंगा । जेल जानेसे किसी तरहकी सनसनी नहीं फैलनी चाहिए;
क्योंकि सनसनीसे उत्तेजना बढ़ती है और उत्तेजनासे दंगे-फसादकी नौबत आ सकती
है और दंगे-फसाद शुरू हो जानेसे निरपराध लोगोंके लगातार जेल जाने के क्रममें
गड़बड़ी पैदा होती है ।
जेल जानेसे भी ज्यादा महत्वकी बात है शान्तिपूर्ण वातावरण बनाये रखना ।
अतएव संगठन-भंग करनेकी सरकारी आज्ञाओंका उल्लंघन करके हिंसाको बढ़ावा मिलने-
की जोखिम उठाना और जेल जानेकी जल्दी मचाना किसी भी प्रान्तके लिए ठीक
न होगा । अहिंसाको स्थायी रूप देनेमें यदि हमें देर भी लगे तो उससे अन्तमें हमारी
कुछ भी हानि नहीं होगी । हमारी स्वराज्यकी क्षमता इसी बातमें है कि हम उन
हरएक तजवीजों और बन्दिशोंको जो हमसे हिंसा-काण्ड मचवानेके लिए की जा रही हों,
पहले ही से समझ लें और उनकी दाल न गलने दें; फिर वे चाहे खुफिया पुलिसके
द्वारा कराई गई हों, अथवा अन्य किसी तरीकेसे ।
:[ अंग्रेजीसे ]<br>
:'''यंग इंडिया,''' १-१२-१९२१
{{C|{{larger|'''२१९. पत्र लेखकोंसे'''}}}}
{{Left|डी० वी० राव पूछते हैं :}}
:'''१.क्या आपका यह विश्वास है कि श्रीकृष्णने अर्जुनको अहिंसा केसिद्धान्त का उपदेश न दे कर गलती की थी? या उन्होंने युद्ध और हिंसाका प्रतिपादन करके ठीक किया था ?'''
मेरे विचारमें 'भगवद्गीता' एक विशुद्ध धार्मिक ग्रंथ है, ऐतिहासिक नहीं । एक
ऐतिहासिक और लौकिक घटनाको लेकर इसमें एक महान धार्मिक सिद्धान्तकी स्थापना
की गई है। इसमें मानव-मनमें नित्य चल रही बुराई और भलाईकी शक्तियोंके बीच,
अहुरमज्द और अहरमनके बीच, हाइड और जेकिल के बीच चलनेवाले संघर्षपर प्रकाश
डाला गया है । मन रूपी इस लघु कुरुक्षेत्रमें उभरनेवाले सभी दुष्ट मनोवेगोंपर हम
जितनी भी हिंसा करें थोड़ी है । ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर 'भगवद्गीता' यह<noinclude></noinclude>
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