विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.20 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१०० 250 34590 675761 578934 2026-09-16T05:39:23Z Prince2107 6874 675761 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{c|(८९)}}</noinclude>वंशजों की गद्दी कोटा में और यदुनाथ जी के वंशजों की गद्दी सूरत में चली। विट्ठलनाथ अपने पिता वल्लभाचार्य के ही समान ब्रजभाषा के कवि नहीं थे। इनकी रचनाएँ राग कल्पद्रुम में नहीं हैं। राग कल्पद्रुम में 'विट्ठल गिरिधरन' छापवाले कुछ पद हैं, जिन्हें सरोजकार ने इन विट्ठलनाथ की रचना समझ रखा है। इस छाप से विट्ठलनाथ की शिष्या गंगाबाई लिखा करती थीं। सरोज के "२५ विट्ठल कवि ३" (सर्वेक्षण ५२१) के ग्रियर्सन में इन विट्ठलनाथ से अभिन्न होने की सम्भावना की गई है, यह ठीक नहीं। —सर्वेक्षण ५१९ विट्ठलनाथ का जन्म सं॰ १५७२ पौष कृष्ण ९, शुक्रवार को काशी के निकट चरणाट में हुआ एवं मृत्यु फाल्गुन कृष्ण ७, संवत् १६४२ में हुई। कृष्णदास पय-अहारी, रामानन्द के शिष्य अनन्तानन्द के शिष्य थे और जयपुर के निकट गलता में रहते थे। इन्हीं पय-अहारी जी के शिष्य अग्रदास थे, जिनके शिष्य नाभादास हुए। यह सब रामावत संप्रदाय के हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य का नाम कृष्णदास अधिकारी था। ग्रियर्सन का यह भ्रम बहुत दिनों तक, आजतक, यत्र तत्र चलता आया है। अष्टछाप निश्चय ही आठ कवियों का समूह था, किसी ग्रंथ का नाम नहीं था। पर ये आठ कवि ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, इसका यह अभिप्राय कभी नहीं। अष्टछाप का अर्थ है उस समय तक के (सं॰ १६०७), जब कि अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ जी ने की, वल्लभ संप्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों का समुदाय। ये आठों वल्लभ सप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, न कि संपूर्ण ब्रजभाषा काव्य साहित्य के। जिस समय अष्टछाप की स्थापना हुई उस समय तक अष्टछाप में सम्मिलित सूर को छोड़कर अन्य सभी से श्रेष्ठ मीरा, हित हरिवंश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास जैसे उत्कृष्ट कवि हो चुके थे या थे। अष्टछापी कवियों में नंददास भी हैं, पर अष्टछाप की स्थापना के समय तक इन्होंने बहुत थोड़ी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं। सूरदास के अभीष्ट पद से तात्पर्य 'हठि गोसाईं करी मेरी आठ मध्ये छाप' से है। ३६. क्रिशनदास पय अहारी-व्रजांतर्गत गोकुलवासी। १५५० ई० में उपस्थित। राग कल्पद्रुम। यह वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।(देखिए संख्या ३५)। "इनकी कविता अत्यंत ललित और मधुर है।" "इनके बहुत पद राग सागरोद्भव में लिखे हैं।” एक जनश्रुति है कि कृष्ण के<noinclude></noinclude> 4kmzh7d5hixz2j16am46cmy4jkh5s0i