विकिस्रोत
hiwikisource
https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.20
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिस्रोत
विकिस्रोत वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
लेखक
लेखक वार्ता
अनुवाद
अनुवाद वार्ता
पृष्ठ
पृष्ठ वार्ता
विषयसूची
विषयसूची वार्ता
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
पृष्ठ:हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास.pdf/१००
250
34590
675764
675761
2026-09-17T00:59:09Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
675764
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(८९)}}</noinclude>वंशजों की गद्दी कोटा में और यदुनाथ जी के वंशजों की गद्दी सूरत में चली।विट्ठलनाथ अपने पिता वल्लभाचार्य के ही समान ब्रजभाषा के कवि नहीं थे। इनकी रचनाएँ राग कल्पद्रुम में नहीं हैं। राग कल्पद्रुम में 'विट्ठल गिरिधरन' छापवाले कुछ पद हैं, जिन्हें सरोजकार ने इन विट्ठलनाथ की रचना समझ रखा है। इस छाप से विट्ठलनाथ की शिष्या गंगाबाई लिखा करती थीं। सरोज के "२५ विट्ठल कवि ३" (सर्वेक्षण ५२१) के ग्रियर्सन में इन विट्ठलनाथ से अभिन्न होने की सम्भावना की गई है, यह ठीक नहीं।
{{right|—सर्वेक्षण ५१९}}
:विट्ठलनाथ का जन्म सं॰ १५७२ पौष कृष्ण ९, शुक्रवार को काशी के निकट चरणाट में हुआ एवं मृत्यु फाल्गुन कृष्ण ७, संवत् १६४२ में हुई।
:कृष्णदास पय-अहारी, रामानन्द के शिष्य अनन्तानन्द के शिष्य थे और जयपुर के निकट गलता में रहते थे। इन्हीं पय-अहारी जी के शिष्य अग्रदास थे, जिनके शिष्य नाभादास हुए। यह सब रामावत संप्रदाय के हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य का नाम कृष्णदास अधिकारी था। ग्रियर्सन का यह भ्रम बहुत दिनों तक, आजतक, यत्र तत्र चलता आया है।
:अष्टछाप निश्चय ही आठ कवियों का समूह था, किसी ग्रंथ का नाम नहीं था। पर ये आठ कवि ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, इसका यह अभिप्राय कभी नहीं।अष्टछाप का अर्थ है उस समय तक के (सं॰ १६०७), जब कि अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ जी ने की, वल्लभ संप्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों का समुदाय। ये आठों वल्लभ सप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, न कि संपूर्ण ब्रजभाषा काव्य साहित्य के। जिस समय अष्टछाप की स्थापना हुई उस समय तक अष्टछाप में सम्मिलित सूर को छोड़कर अन्य सभी से श्रेष्ठ मीरा, हित हरिवंश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास जैसे उत्कृष्ट कवि हो चुके थे या थे। अष्टछापी कवियों में नंददास भी हैं, पर अष्टछाप की स्थापना के समय तक इन्होंने बहुत थोड़ी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं।
:सूरदास के अभीष्ट पद से तात्पर्य 'हठि गोसाईं करी मेरी आठ मध्ये छाप' से है।
३६. क्रिशनदास पय अहारी-व्रजांतर्गत गोकुलवासी। १५५० ई० में उपस्थित।
:राग कल्पद्रुम। यह वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।(देखिए संख्या ३५)। "इनकी कविता अत्यंत ललित और मधुर है।" "इनके बहुत पद राग सागरोद्भव में लिखे हैं।” एक जनश्रुति है कि कृष्ण के<noinclude></noinclude>
k6tkvtuxl9b0riijbtsmxpb6276xf52
675765
675764
2026-09-17T01:05:23Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
675765
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(८९)}}</noinclude>वंशजों की गद्दी कोटा में और यदुनाथ जी के वंशजों की गद्दी सूरत में चली।विट्ठलनाथ अपने पिता वल्लभाचार्य के ही समान ब्रजभाषा के कवि नहीं थे। इनकी रचनाएँ राग कल्पद्रुम में नहीं हैं। राग कल्पद्रुम में 'विट्ठल गिरिधरन' छापवाले कुछ पद हैं, जिन्हें सरोजकार ने इन विट्ठलनाथ की रचना समझ रखा है। इस छाप से विट्ठलनाथ की शिष्या गंगाबाई लिखा करती थीं। सरोज के "२५ विट्ठल कवि ३" (सर्वेक्षण ५२१) के ग्रियर्सन में इन विट्ठलनाथ से अभिन्न होने की सम्भावना की गई है, यह ठीक नहीं।
{{right|—सर्वेक्षण ५१९}}
विट्ठलनाथ का जन्म सं॰ १५७२ पौष कृष्ण ९, शुक्रवार को काशी के निकट चरणाट में हुआ एवं मृत्यु फाल्गुन कृष्ण ७, संवत् १६४२ में हुई। <br>
{{gap|2em}}कृष्णदास पय-अहारी, रामानन्द के शिष्य अनन्तानन्द के शिष्य थे और जयपुर के निकट गलता में रहते थे। इन्हीं पय-अहारी जी के शिष्य अग्रदास थे, जिनके शिष्य नाभादास हुए। यह सब रामावत संप्रदाय के हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य का नाम कृष्णदास अधिकारी था। ग्रियर्सन का यह भ्रम बहुत दिनों तक, आजतक, यत्र तत्र चलता आया है। <br>
{{gap|2em}}अष्टछाप निश्चय ही आठ कवियों का समूह था, किसी ग्रंथ का नाम नहीं था। पर ये आठ कवि ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, इसका यह अभिप्राय कभी नहीं।अष्टछाप का अर्थ है उस समय तक के (सं॰ १६०७), जब कि अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ जी ने की, वल्लभ संप्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों का समुदाय। ये आठों वल्लभ सप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, न कि संपूर्ण ब्रजभाषा काव्य साहित्य के। जिस समय अष्टछाप की स्थापना हुई उस समय तक अष्टछाप में सम्मिलित सूर को छोड़कर अन्य सभी से श्रेष्ठ मीरा, हित हरिवंश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास जैसे उत्कृष्ट कवि हो चुके थे या थे। अष्टछापी कवियों में नंददास भी हैं, पर अष्टछाप की स्थापना के समय तक इन्होंने बहुत थोड़ी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं। <br>
{{gap|2em}}सूरदास के अभीष्ट पद से तात्पर्य 'हठि गोसाईं करी मेरी आठ मध्ये छाप' से है।
{{Outdent|३६. क्रिशनदास पय अहारी-व्रजांतर्गत गोकुलवासी। १५५० ई० में उपस्थित।}}
राग कल्पद्रुम। यह वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।(देखिए संख्या ३५)। "इनकी कविता अत्यंत ललित और मधुर है।" "इनके बहुत पद राग सागरोद्भव में लिखे हैं।” एक जनश्रुति है कि कृष्ण के<noinclude></noinclude>
hlecmabuhy51fq14c3adpm1oa3ie201
675766
675765
2026-09-17T01:07:15Z
AMAN KUMAR
6475
Larger
675766
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(८९)}}</noinclude>वंशजों की गद्दी कोटा में और यदुनाथ जी के वंशजों की गद्दी सूरत में चली।विट्ठलनाथ अपने पिता वल्लभाचार्य के ही समान ब्रजभाषा के कवि नहीं थे। इनकी रचनाएँ राग कल्पद्रुम में नहीं हैं। राग कल्पद्रुम में 'विट्ठल गिरिधरन' छापवाले कुछ पद हैं, जिन्हें सरोजकार ने इन विट्ठलनाथ की रचना समझ रखा है। इस छाप से विट्ठलनाथ की शिष्या गंगाबाई लिखा करती थीं। सरोज के "२५ विट्ठल कवि ३" (सर्वेक्षण ५२१) के ग्रियर्सन में इन विट्ठलनाथ से अभिन्न होने की सम्भावना की गई है, यह ठीक नहीं।
{{right|—सर्वेक्षण ५१९}}
विट्ठलनाथ का जन्म सं॰ १५७२ पौष कृष्ण ९, शुक्रवार को काशी के निकट चरणाट में हुआ एवं मृत्यु फाल्गुन कृष्ण ७, संवत् १६४२ में हुई। <br>
{{gap|2em}}कृष्णदास पय-अहारी, रामानन्द के शिष्य अनन्तानन्द के शिष्य थे और जयपुर के निकट गलता में रहते थे। इन्हीं पय-अहारी जी के शिष्य अग्रदास थे, जिनके शिष्य नाभादास हुए। यह सब रामावत संप्रदाय के हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य का नाम कृष्णदास अधिकारी था। ग्रियर्सन का यह भ्रम बहुत दिनों तक, आजतक, यत्र तत्र चलता आया है। <br>
{{gap|2em}}अष्टछाप निश्चय ही आठ कवियों का समूह था, किसी ग्रंथ का नाम नहीं था। पर ये आठ कवि ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, इसका यह अभिप्राय कभी नहीं।अष्टछाप का अर्थ है उस समय तक के (सं॰ १६०७), जब कि अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ जी ने की, वल्लभ संप्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों का समुदाय। ये आठों वल्लभ सप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, न कि संपूर्ण ब्रजभाषा काव्य साहित्य के। जिस समय अष्टछाप की स्थापना हुई उस समय तक अष्टछाप में सम्मिलित सूर को छोड़कर अन्य सभी से श्रेष्ठ मीरा, हित हरिवंश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास जैसे उत्कृष्ट कवि हो चुके थे या थे। अष्टछापी कवियों में नंददास भी हैं, पर अष्टछाप की स्थापना के समय तक इन्होंने बहुत थोड़ी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं। <br>
{{gap|2em}}सूरदास के अभीष्ट पद से तात्पर्य 'हठि गोसाईं करी मेरी आठ मध्ये छाप' से है।
{{Outdent|{{larger|३६.}} क्रिशनदास पय अहारी-व्रजांतर्गत गोकुलवासी। १५५० ई० में उपस्थित।}}
राग कल्पद्रुम। यह वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।(देखिए संख्या ३५)। "इनकी कविता अत्यंत ललित और मधुर है।" "इनके बहुत पद राग सागरोद्भव में लिखे हैं।” एक जनश्रुति है कि कृष्ण के<noinclude></noinclude>
o2jsr0iz5rkghhzemwdz9qdi03wmyll
675767
675766
2026-09-17T01:09:04Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
675767
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(८९)}}</noinclude>वंशजों की गद्दी कोटा में और यदुनाथ जी के वंशजों की गद्दी सूरत में चली।विट्ठलनाथ अपने पिता वल्लभाचार्य के ही समान ब्रजभाषा के कवि नहीं थे। इनकी रचनाएँ राग कल्पद्रुम में नहीं हैं। राग कल्पद्रुम में 'विट्ठल गिरिधरन' छापवाले कुछ पद हैं, जिन्हें सरोजकार ने इन विट्ठलनाथ की रचना समझ रखा है। इस छाप से विट्ठलनाथ की शिष्या गंगाबाई लिखा करती थीं। सरोज के "२५ विट्ठल कवि ३" (सर्वेक्षण ५२१) के ग्रियर्सन में इन विट्ठलनाथ से अभिन्न होने की सम्भावना की गई है, यह ठीक नहीं।
{{right|—सर्वेक्षण ५१९}}
विट्ठलनाथ का जन्म सं॰ १५७२ पौष कृष्ण ९, शुक्रवार को काशी के निकट चरणाट में हुआ एवं मृत्यु फाल्गुन कृष्ण ७, संवत् १६४२ में हुई। <br>
{{gap|2em}}कृष्णदास पय-अहारी, रामानन्द के शिष्य अनन्तानन्द के शिष्य थे और जयपुर के निकट गलता में रहते थे। इन्हीं पय-अहारी जी के शिष्य अग्रदास थे, जिनके शिष्य नाभादास हुए। यह सब रामावत संप्रदाय के हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य का नाम कृष्णदास अधिकारी था। ग्रियर्सन का यह भ्रम बहुत दिनों तक, आजतक, यत्र तत्र चलता आया है। <br>
{{gap|2em}}अष्टछाप निश्चय ही आठ कवियों का समूह था, किसी ग्रंथ का नाम नहीं था। पर ये आठ कवि ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, इसका यह अभिप्राय कभी नहीं।अष्टछाप का अर्थ है उस समय तक के (सं॰ १६०७), जब कि अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ जी ने की, वल्लभ संप्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों का समुदाय। ये आठों वल्लभ सप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, न कि संपूर्ण ब्रजभाषा काव्य साहित्य के। जिस समय अष्टछाप की स्थापना हुई उस समय तक अष्टछाप में सम्मिलित सूर को छोड़कर अन्य सभी से श्रेष्ठ मीरा, हित हरिवंश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास जैसे उत्कृष्ट कवि हो चुके थे या थे। अष्टछापी कवियों में नंददास भी हैं, पर अष्टछाप की स्थापना के समय तक इन्होंने बहुत थोड़ी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं। <br>
{{gap|2em}}सूरदास के अभीष्ट पद से तात्पर्य 'हठि गोसाईं करी मेरी आठ मध्ये छाप' से है।
{{Outdent|{{larger|३६. क्रिशनदास पय अहारी}}—व्रजांतर्गत गोकुलवासी। १५५० ई० में उपस्थित।}}
राग कल्पद्रुम। यह वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।(देखिए संख्या ३५)। "इनकी कविता अत्यंत ललित और मधुर है।" "इनके बहुत पद राग सागरोद्भव में लिखे हैं।” एक जनश्रुति है कि कृष्ण के<noinclude></noinclude>
cubtyi8xc0ejlwb1m7eddlkjmqmcnen
675768
675767
2026-09-17T09:29:31Z
अजीत कुमार तिवारी
12
-अनावश्यक प्रारूपण. +प्रतिलिपि संपादन.
675768
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(८९)}}</noinclude>वंशजों की गद्दी कोटा में और यदुनाथ जी के वंशजों की गद्दी सूरत में चली। विट्ठलनाथ अपने पिता वल्लभाचार्य के ही समान ब्रजभाषा के कवि नहीं थे। इनकी रचनाएँ राग कल्पद्रुम में नहीं हैं। राग कल्पद्रुम में 'विट्ठल गिरिधरन' छापवाले कुछ पद हैं, जिन्हें सरोजकार ने इन विट्ठलनाथ की रचना समझ रखा है। इस छाप से विट्ठलनाथ की शिष्या गंगाबाई लिखा करती थीं। सरोज के "२५ विट्ठल कवि ३" (सर्वेक्षण ५२१) के ग्रियर्सन में इन विट्ठलनाथ से अभिन्न होने की सम्भावना की गई है, यह ठीक नहीं।
{{right|—सर्वेक्षण ५१९}}
विट्ठलनाथ का जन्म सं॰ १५७२ पौष कृष्ण ९, शुक्रवार को काशी के निकट चरणाट में हुआ एवं मृत्यु फाल्गुन कृष्ण ७, संवत् १६४२ में हुई।
कृष्णदास पय-अहारी, रामानन्द के शिष्य अनन्तानन्द के शिष्य थे और जयपुर के निकट गलता में रहते थे। इन्हीं पय-अहारी जी के शिष्य अग्रदास थे, जिनके शिष्य नाभादास हुए। यह सब रामावत संप्रदाय के हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य का नाम कृष्णदास अधिकारी था। ग्रियर्सन का यह भ्रम बहुत दिनों तक, आजतक, यत्र तत्र चलता आया है।
अष्टछाप निश्चय ही आठ कवियों का समूह था, किसी ग्रंथ का नाम नहीं था। पर ये आठ कवि ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, इसका यह अभिप्राय कभी नहीं। अष्टछाप का अर्थ है उस समय तक के (सं॰ १६०७), जब कि अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ जी ने की, वल्लभ संप्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों का समुदाय। ये आठों वल्लभ सप्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे, न कि संपूर्ण ब्रजभाषा काव्य साहित्य के। जिस समय अष्टछाप की स्थापना हुई उस समय तक अष्टछाप में सम्मिलित सूर को छोड़कर अन्य सभी से श्रेष्ठ मीरा, हित हरिवंश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास जैसे उत्कृष्ट कवि हो चुके थे या थे। अष्टछापी कवियों में नंददास भी हैं, पर अष्टछाप की स्थापना के समय तक इन्होंने बहुत थोड़ी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं।
सूरदास के अभीष्ट पद से तात्पर्य 'हठि गोसाईं करी मेरी आठ मध्ये छाप' से है।
<br>{{larger|३६. क्रिशनदास पय अहारी}}—व्रजांतर्गत गोकुलवासी। १५५० ई॰ में उपस्थित।
राग कल्पद्रुम। यह वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे। (देखिए संख्या ३५)। "इनकी कविता अत्यंत ललित और मधुर है।" "इनके बहुत पद राग सागरोद्भव में लिखे हैं।" एक जनश्रुति है कि कृष्ण के<noinclude></noinclude>
4kcu6erb2nzt0df7tzood8j80i1ynw1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५९
250
186985
675763
671594
2026-09-16T15:59:05Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
675763
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|१५५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
यूनिट, २६० पा० पा०, २६४
यूरोप; की प्रस्तावित यात्रा, १२७,
१५९-६०, १७४-७५, १९०, २०३,
२०७, २१६, २१७, २२२, २३८,
२६२,
२४०, २४८, २५२-३, २५९,
२६५, २६७-६८, २८३-८५
रामचन्द्रन, जी० ५५, २१३, ४३७
रामदेव, ४३४
रामनन्दन, २६९
रामनाथ, ४८९
५२७
योगवाशिष्ठ, ९४
{{C|र}}
रचनात्मक कार्य, ४५, १८३
रटर, श्रीमती रचेल एम०, ४०१
रणछोड़लाल अमृतलाल, २६५
रति, १८९
रमजान, १७१
रमणभाई नीलकंठ, सर, की गुजरातके
प्रति सेवाएँ, ९६, १०७-८
रविशंकर, महाराज, ३०२, ३३४ रहमत,
४६१
राजकिशोरी, २६९, २७०
राजगोपालाचारी, च० ३३, ७५ पा० टि०,
८८, १२१, १२७, १५२ पा० टि०,
१५३, १६०, १६६, २२६, २७८,
३६७, ३७२, ४३६, ४५०, ४६९,
४७३
राजचन्द्र, देखिए मेहता, रायचन्द रावजीभाई
राजनीति, और समाजसेवा, १०७
राजेन्द्रप्रसाद, ९९, २४९, ४४६
राज्य, -द्वारा उद्योगकी व्यवस्था, १३९
राधाकृष्णन, एस०, २११
शरीर, ४८०
रामनाथन्, एस०, ८८, २४२, ३०३, ३०४
पा०, टि०, ३५५, ३५६, ४३६, ४५०
रामायण, ८१, १७६, ३०७, ३६४, ४८०
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
रामचन्द्रन्, १६१
रामेश्वरदास, १८
राय, डॉ०, ५४, ८०, १०१, ४१४
राय, डा० विधानचन्द्र, १०४, १३२, ३०५
राव, एन० राम, १५२
राव, टी० नागेश, २४०
राव, टी० वी० केशव, ३२८
राव, बी० शिवा, १९४
राव, सी० बालाजी, ४८, २३३, ३२२
राव, सी० रंगनाथ, ३६८
रावण, १७६, १८२, ४८०
राष्ट्रीय मुस्लिम विद्यालय, १३२
राष्ट्रीय शिक्षण मण्डल, ३७८
राष्ट्रीय शिक्षा; -सत्याग्रह आश्रममें, ४२४-
२५
राष्ट्रीय संस्थाएँ; -और ऐच्छिक अनुशासन,
३०९-१०
राष्ट्रीय सप्ताह, १८३, १८४ पा० टि० १९१,
२३९, २४७
रिच, एल० डब्ल्यू०, ६४, ६८
रिच, श्रीमती एल० डब्ल्यू०, ६४
रामनाम, ४१, ८१, ११२, २७१, ३१४;
-और दुखियोंकी सेवा, ३१५; -का
प्रभाव, १७६-७७
रामविनोद, ३५७
राम (भगवान), ११२, १७६, १७७१७८,
१९५, १९६, ३१४, ४०९ -ईश्वर
है, १७६-७८; का निवास स्थान<noinclude></noinclude>
k98zobkqdllutldkuje2cue21uoksom
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५६४
250
186990
675762
671101
2026-09-16T15:50:36Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
675762
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{rh|५३२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
अस्पृश्यता, ३१२; -और बारडोली
आन्दोलन, ३८; और हिन्दू-मुस्लिम
एकता, १५३; -का अर्थ, १३७;
-की ओर बढ़ने में सामाजिक बुराइयाँ
रुकावट, ४९३; के लिए मानसिक
क्रान्ति आवश्यक, ५०; और गुजरात
विद्यापीठ, ७
स्वराज्यवादी, ३७
स्वाधीनता, देखिए स्वराज्य
स्वावलम्बन पाठशाला, ३७८
स्वेच्छा स्वीकृत दारिद्र्य, का अर्थ, २९४-९६
नस्वेन्सका किरकान्स, ४००
{{C|ह}}
हंगमिंग, कु, १७-१८
हंटर, विलियम विल्सन, ४१७
हंटर कमेटी, १६३, १८२
हकीमजी, देखिए अजमल खाँ, हकीम
हनुमान की आराधना, १९५-९६
हबीबुल्ला, सर मुहम्मद, ६१, २८७, ३५४
हरचन्दराय विशनदास, ४७
हरिहर, ३८२
रेहन्द्रनाथ, राय, १८१
हाउस ऑफ कामन्स, ४५
हाथ कताई, और हाथ-बुनाई, १४ पाo
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
टि०; - देखिए कताई भी
हाथ करघा, और चरखा, ४८
हारकर, श्रीमती, २५
हारोलिकर, वी० बी०, ४७-४८
हॉवर्ड, जैन, १०९
हिंसा, कायरता से अच्छी है, ७७-७८
हिगिन बॉटम, श्रीमती सँम, २१७
हिगिनबॉटम, सैम, १६२
हिन्दी नवजीवन, ३१४
हिन्दी - हिन्दुस्तानी, की शिक्षा, गुजरात
विद्यापीठमें, ४२५
हिन्दू, ४४९
हिन्दू, ३७, ४५ पा० टि०, ४७, ५०,
१०९, १४३, १५३, १५६, १६४,
१६८, १८३, १९७, २४५, ३४०;
-और अलग-अलग निर्वाचक मण्डलों
पर कांग्रेस प्रस्ताव, ८२, -और
अस्पृश्य, ३२, २४६
हिन्दूधर्म, १०९, ४०९, ४२२, ४३९; -और
अवतार, १७६-७७; -और अस्पृश्यता,
७, ३२, २४६, २४७
हिन्दू महासभा, १९८
हिन्दू-मुस्लिम एकता, १९, ३७, ८२, २५२,
३६७, ४००; -और स्वराज्य, १५३,
३१२
हिन्दू-मुस्लिम मतभेद, ७८, ४१२
हिबर्ट, ३६२ पा० टि०
हुसैन, डॉ० जाकिर, ११३, १३२, ३४८
हेमिल्टन, सर डेनियल एम०, ९९, २५२,
४०१
हेरॉल्ड, ६४
हेस, रोलैंड, ९०
हैंड स्पिनिंग ऐसे, १४०
होज, रेव०, ९९
होम्स, जॉन हेन्स, १०५, २६०, २६४
होरेशियस, २७<noinclude></noinclude>
tsqito4mb7ke68ao1loaomvyekof2ao