विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.20 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८० 250 196499 675772 668884 2026-09-19T07:29:19Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 675772 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''५२. लालाजीकी पुण्यतिथि'''}}}} आगामी १७ नवम्बरको लालाजीकी पुण्यतिथि है। उस दिन हरएक देशभक्त—स्त्री या पुरुष—स्वभावतः अपने-आपसे सवाल करेगा : 'साल-भर में मैंने लालाजीकी मृत्युका प्रतिकार करनेके लिए क्या किया है? जिस स्वराज्यके लिए लालाजी जिये और मरे उसे निर्दिष्ट ध्येय तक पहुँचानेके लिए मैंने क्या किया है? जिन तथाकथित अछूतोंके हितको उन्होंने अपना हित बना लिया था, उन अछूतोंके लिए मैंने क्या किया है? पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजीने जो अपील की थी उसके लिए मैंने क्या किया है?' लालाजीकी अनेक-विध जीवन-प्रवृत्तियोंमें से किसी एक पर अधिक महत्त्व देकर राष्ट्रभक्त इसी तरहके और भी कई प्रश्न अपनेसे पूछ सकते हैं। लेकिन मेरा उद्देश्य तो तमाम कांग्रेस कमेटियोंको यह सलाह देना है कि वे पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजी द्वारा निकाली गई पाँच लाखकी अपीलवाली<ref>जिसका मसौदा गांधीजीने तैयार किया था; देखिए खण्ड ३८ पृ॰ ९९-१०१।</ref> रकम पूरी करें और उस रूपमें लालाजीकी पुण्यतिथि मनायें। यह बड़ी शर्मकी बात है कि अबतक पाँच लाखमें से सिर्फ दो लाखके करीब रुपये ही इकट्ठे हो सके हैं। अगर पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाये तो रकमका बाकी अंश १७ नवम्बरतक या उससे पहले इकट्ठा कर लेना कोई मुश्किल नहीं है। अगर उन्हें यह काम करना हो तो आज ही से पूरी-पूरी लगनके साथ काम शुरू कर देना चाहिए। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया,''' २४-१०-१९२९ {{c|{{x-larger|'''५३. संयुक्त प्रान्तका दौरा–६<ref>यह तथा इसी शीर्षकसे लिखे गये आगेके अन्य लेख जो 'ए' द्वारा हस्ताक्षरित हैं, गांधीजीने ही लिखे थे। देखिए "पत्र : महादेव देसाईको", १८-११-१९२९। यद्यपि वहाँ गांधीजी कहते हैं कि उन्होंने तीन पत्र लिखे हैं, वास्तवमें उन पत्रों में से छः 'ए' हस्ताक्षरसे प्रकाशित हुए और ये पत्र इस खण्डमें उद्धृत हैं।</ref>'''}}}} इस महीने १८ तारीखको समाप्त होनेवाले सप्ताह के दौरेका कार्यक्रम<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> इस प्रकार है : {{c|'''पूर्वग्रह कठिनाईसे दूर होते हैं'''}} बाराबंकी से हमें हरदोईके लिए डाकगाड़ी पकड़नी थी। गाड़ीमें बहुत भीड़ थी। अब फिर पहलेकी तरह ही गांधीजी तीसरे दर्जेमें सफरका आग्रह दृढ़तासे करने लगे हैं। हमारे दलको जगह मिलने में कुछ कठिनाई हुई, जिसे रेलवे अधिकारियोंने दूर किया। देवदास गांधी जब भी दलमें होते हैं, अपने लिए आम यात्रियोंके बीच जगह बना लेते हैं, ताकि हमारे दलमें एक आदमी कम हो जाये। बाराबंकीमें उन्हें केवल<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> mpva7u3ga69hc3znkn996e0vykums62