विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.20 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk मीडियाविकि:Gadgets-definition 8 37252 675797 638803 2026-09-20T09:58:21Z NguoiDungKhongDinhDanh 3967 Remove deprecated option. See [[:phab:T298199|T298199]] for more information. ([[:m:GS|global sysop]] action) 675797 wikitext text/x-wiki == editing-tools == * charinsert[peers=charinsert-styles]|charinsert.js * charinsert-core[hidden|dependencies=jquery.textSelection,user,mediawiki.storage]|charinsert-core.js * charinsert-styles[hidden|type=styles]|charinsert-styles.css * edittop[dependencies=mediawiki.util]|edittop.js * HotCat[rights=edit]|HotCat.js * popups[type=general]|popups.js|navpop.css * RegexMenuFramework[dependencies=mediawiki.util]|RegexMenuFramework.js * refToolbar[dependencies=user.options]|refToolbar.js * specialchars|specialchars.js * TemplatePreloader|TemplatePreloader.js * DefaultSummaries|DefaultSummaries.js * ContrastReducer|ContrastReducer.js * robot|robot.js * cropimage|cropimage.js == display-tools == * Prosesize[default|dependencies=mediawiki.api,mediawiki.util|rights=edit,purge]|Prosesize.js|Prosesize.css == editing-tools-for-Page-namespace == <!-- * ocr|ocr.js -- Historical/Generic OCR Tool --> * GoogleOCR|GoogleOCR.js * IndicOCR|IndicOCR.js * HindiOCR|HindiOCR.js * Easy_LST[default]|Easy_LST.js * NopInserter[dependencies=mediawiki.util]|NopInserter.js * pilcrowMarkers|pilcrowMarkers.css * mark-proofread[dependencies=mediawiki.util]|mark-proofread.js|mark-proofread.css == editing-tools-for-Index-namespace == * Fill_Index|Fill_Index.js == interface == * Site[default|dependencies=mediawiki.util|peers=Site-styles]|SiteMessages.js|DisplayFooter.js|ToolbarFixes.js * Site-styles[hidden|type=styles]|Site.css|DisplayFooter.css * prefill-template-preview[hidden|default|actions=edit|namespaces=10,828]|prefill-template-preview.js * PageNumbers[default]|PageNumbers.js * PageNumbers-core[hidden|dependencies=mediawiki.util,user,mediawiki.cookie]|PageNumbers-core.js|PageNumbers-core.css * Visibility[dependencies=mediawiki.cookie]|Visibility.js == compatibility == * Font-Awesome[top]|Font-Awesome.css == development == * ResultListSort|ResultListSort.js * WE-framework WS|WE-framework WS.js<!-- * mediawiki.toolbar [dependencies=jquery.textSelection] | mediawiki.toolbar.js * Legacy-2006toolbar [dependencies=ext.gadget.mediawiki.toolbar] | Legacy-2006toolbar.js --> == maintenance-tools== * markblocked|markblocked.js == admin-tools == * CleanDeleteReasons[rights=delete]|CleanDeleteReasons.js * massdelete[rights=delete]|massdelete.js == hidden == == hidden == * utils-difference[hidden]|utils-difference.js * a11y-page-status[hidden|default|namespaces=104|actions=edit]|a11y-page-status.js ==Gadget-TranscludedIn== * TranscludedIn[type=general|default]|TranscludedIn.js 9l9apd42hacvlphdmeqdneic96u64mi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 1.pdf/६३ 250 158728 675784 510287 2026-09-19T18:49:18Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675784 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh||भारतीय अन्नाहारी-२|२१}}</noinclude>सकता है कि उन्हें कलेवाकी जरूरत पड़ती होगी। परन्तु, जैसा कि ऊपरके विवरण-से स्पष्ट हो गया होगा, वे कलेवा नहीं करते और न दुपहरका साधारण भोजन ही करते हैं। पर निस्सन्देह कुछ पाठकोंको आश्चर्य होगा कि वे अपने पहले भोजन के बाद नौ घंटोंतक कुछ भी खाये बिना कैसे रहते हैं। इसके दो उत्तर हो सकते हैं — पहला तो यह कि आदत, दूसरा निसर्ग है। कुछ लोगोंका धर्म यह आदेश देता है और कुछ लोगों के धंधे तथा रीति-रिवाज उन्हें इसपर बाध्य करते है कि वे दिन में दो बारसे ज्यादा भोजन न करें। दूसरे, कुछ स्थानोंको छोड़कर सारे भारतकी आबहवा बहुत गर्म है। यह उपर्युक्त आदत का कारण हो सकता है; क्योंकि इंग्लैंड में भी देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में भोजनकी जितनी मात्रा आवश्यक होती है उतनी ही गर्मीके मौसममें आवश्यक नहीं होती। इंग्लैंड में जिस तरह भोजनका प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग ग्रहण किया जाता है, वैसा भारतीय नहीं करते। वे अनेक पदार्थों को एक-साथ मिला देते हैं। कुछ हिन्दुओंमें तो सब पदार्थों को एक-साथ मिला लेना धर्म है। इसके अतिरिक्त, भोजनका प्रत्येक व्यंजन बड़े विस्तारपूर्वक बनाया जाता है। सच तो यह है कि भारतीय सादी उबली हुई शाक-सब्जियाँ खाने में विश्वास नहीं करते। वे उनमें अच्छी खासी मात्रा में नमक, मिर्च, हल्दी, राई, लौंग और तरह-तरहके दूसरे मसाले डालकर उन्हें स्वादिष्ट बना लेते हैं। अंग्रेजी में उन सारे मसालों के नाम दवाइयों के नामोंमें ही मिल सकते हैं; उनके बाहर पाना कठिन है। :पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं। :दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है। :रसोईके कामोंमें मक्खन या यों कहिए कि घीका जितना उपयोग इंग्लैंड या सम्भवतः सारे यूरोपमें किया जाता है उससे भारतमें कहीं अधिक होता है। और<noinclude></noinclude> 0b0cycymvzdsbkaijo1bc6lmnkyip19 675785 675784 2026-09-19T18:51:46Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675785 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh||भारतीय अन्नाहारी-२|२१}}</noinclude>सकता है कि उन्हें कलेवाकी जरूरत पड़ती होगी। परन्तु, जैसा कि ऊपरके विवरण-से स्पष्ट हो गया होगा, वे कलेवा नहीं करते और न दुपहरका साधारण भोजन ही करते हैं। पर निस्सन्देह कुछ पाठकोंको आश्चर्य होगा कि वे अपने पहले भोजन के बाद नौ घंटोंतक कुछ भी खाये बिना कैसे रहते हैं। इसके दो उत्तर हो सकते हैं — पहला तो यह कि आदत, दूसरा निसर्ग है। कुछ लोगोंका धर्म यह आदेश देता है और कुछ लोगों के धंधे तथा रीति-रिवाज उन्हें इसपर बाध्य करते है कि वे दिन में दो बारसे ज्यादा भोजन न करें। दूसरे, कुछ स्थानोंको छोड़कर सारे भारतकी आबहवा बहुत गर्म है। यह उपर्युक्त आदत का कारण हो सकता है; क्योंकि इंग्लैंड में भी देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में भोजनकी जितनी मात्रा आवश्यक होती है उतनी ही गर्मीके मौसममें आवश्यक नहीं होती। इंग्लैंड में जिस तरह भोजनका प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग ग्रहण किया जाता है, वैसा भारतीय नहीं करते। वे अनेक पदार्थों को एक-साथ मिला देते हैं। कुछ हिन्दुओंमें तो सब पदार्थों को एक-साथ मिला लेना धर्म है। इसके अतिरिक्त, भोजनका प्रत्येक व्यंजन बड़े विस्तारपूर्वक बनाया जाता है। सच तो यह है कि भारतीय सादी उबली हुई शाक-सब्जियाँ खाने में विश्वास नहीं करते। वे उनमें अच्छी खासी मात्रा में नमक, मिर्च, हल्दी, राई, लौंग और तरह-तरहके दूसरे मसाले डालकर उन्हें स्वादिष्ट बना लेते हैं। अंग्रेजी में उन सारे मसालों के नाम दवाइयों के नामोंमें ही मिल सकते हैं; उनके बाहर पाना कठिन है। {{gap}}पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं। {{gap}}दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है। {{gap}}रसोईके कामोंमें मक्खन या यों कहिए कि घीका जितना उपयोग इंग्लैंड या सम्भवतः सारे यूरोपमें किया जाता है उससे भारतमें कहीं अधिक होता है। और<noinclude></noinclude> sny77552902sdqqov3lh378c9v9nbk0 675786 675785 2026-09-19T18:52:36Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675786 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh||भारतीय अन्नाहारी-२|२१}}</noinclude>सकता है कि उन्हें कलेवाकी जरूरत पड़ती होगी। परन्तु, जैसा कि ऊपरके विवरण-से स्पष्ट हो गया होगा, वे कलेवा नहीं करते और न दुपहरका साधारण भोजन ही करते हैं। पर निस्सन्देह कुछ पाठकोंको आश्चर्य होगा कि वे अपने पहले भोजन के बाद नौ घंटोंतक कुछ भी खाये बिना कैसे रहते हैं। इसके दो उत्तर हो सकते हैं — पहला तो यह कि आदत, दूसरा निसर्ग है। कुछ लोगोंका धर्म यह आदेश देता है और कुछ लोगों के धंधे तथा रीति-रिवाज उन्हें इसपर बाध्य करते है कि वे दिन में दो बारसे ज्यादा भोजन न करें। दूसरे, कुछ स्थानोंको छोड़कर सारे भारतकी आबहवा बहुत गर्म है। यह उपर्युक्त आदत का कारण हो सकता है; क्योंकि इंग्लैंड में भी देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में भोजनकी जितनी मात्रा आवश्यक होती है उतनी ही गर्मीके मौसममें आवश्यक नहीं होती। इंग्लैंड में जिस तरह भोजनका प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग ग्रहण किया जाता है, वैसा भारतीय नहीं करते। वे अनेक पदार्थों को एक-साथ मिला देते हैं। कुछ हिन्दुओंमें तो सब पदार्थों को एक-साथ मिला लेना धर्म है। इसके अतिरिक्त, भोजनका प्रत्येक व्यंजन बड़े विस्तारपूर्वक बनाया जाता है। सच तो यह है कि भारतीय सादी उबली हुई शाक-सब्जियाँ खाने में विश्वास नहीं करते। वे उनमें अच्छी खासी मात्रा में नमक, मिर्च, हल्दी, राई, लौंग और तरह-तरहके दूसरे मसाले डालकर उन्हें स्वादिष्ट बना लेते हैं। अंग्रेजी में उन सारे मसालों के नाम दवाइयों के नामोंमें ही मिल सकते हैं; उनके बाहर पाना कठिन है। <br>{{gap}}पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं। <br>{{gap}}दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है। <br>{{gap}}रसोईके कामोंमें मक्खन या यों कहिए कि घीका जितना उपयोग इंग्लैंड या सम्भवतः सारे यूरोपमें किया जाता है उससे भारतमें कहीं अधिक होता है। और<noinclude></noinclude> iahzuaftakvrr04n96xx4wrtgeanjyk 675787 675786 2026-09-19T18:53:10Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675787 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh||भारतीय अन्नाहारी-२|२१}}</noinclude>सकता है कि उन्हें कलेवाकी जरूरत पड़ती होगी। परन्तु, जैसा कि ऊपरके विवरण-से स्पष्ट हो गया होगा, वे कलेवा नहीं करते और न दुपहरका साधारण भोजन ही करते हैं। पर निस्सन्देह कुछ पाठकोंको आश्चर्य होगा कि वे अपने पहले भोजन के बाद नौ घंटोंतक कुछ भी खाये बिना कैसे रहते हैं। इसके दो उत्तर हो सकते हैं — पहला तो यह कि आदत, दूसरा निसर्ग है। कुछ लोगोंका धर्म यह आदेश देता है और कुछ लोगों के धंधे तथा रीति-रिवाज उन्हें इसपर बाध्य करते है कि वे दिन में दो बारसे ज्यादा भोजन न करें। दूसरे, कुछ स्थानोंको छोड़कर सारे भारतकी आबहवा बहुत गर्म है। यह उपर्युक्त आदत का कारण हो सकता है; क्योंकि इंग्लैंड में भी देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में भोजनकी जितनी मात्रा आवश्यक होती है उतनी ही गर्मीके मौसममें आवश्यक नहीं होती। इंग्लैंड में जिस तरह भोजनका प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग ग्रहण किया जाता है, वैसा भारतीय नहीं करते। वे अनेक पदार्थों को एक-साथ मिला देते हैं। कुछ हिन्दुओंमें तो सब पदार्थों को एक-साथ मिला लेना धर्म है। इसके अतिरिक्त, भोजनका प्रत्येक व्यंजन बड़े विस्तारपूर्वक बनाया जाता है। सच तो यह है कि भारतीय सादी उबली हुई शाक-सब्जियाँ खाने में विश्वास नहीं करते। वे उनमें अच्छी खासी मात्रा में नमक, मिर्च, हल्दी, राई, लौंग और तरह-तरहके दूसरे मसाले डालकर उन्हें स्वादिष्ट बना लेते हैं। अंग्रेजी में उन सारे मसालों के नाम दवाइयोंके नामोंमें ही मिल सकते हैं; उनके बाहर पाना कठिन है। <br>{{gap}}पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं। <br>{{gap}}दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है। <br>{{gap}}रसोईके कामोंमें मक्खन या यों कहिए कि घीका जितना उपयोग इंग्लैंड या सम्भवतः सारे यूरोपमें किया जाता है उससे भारतमें कहीं अधिक होता है। और<noinclude></noinclude> gik28vdduw4fz96ul3a5h5rj57sg3fc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 4.pdf/१ 250 159570 675796 651933 2026-09-19T20:32:58Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675796 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{c|{{x-larger|{{xxxx-larger|'''सम्पूर्ण'''}}<br> {{x-larger|{{xxxx-larger|'''गांधी'''}}}}<br> {{x-larger|{{xxxx-larger|'''वाङ्‌मय'''}}}}}}<br> खण्ड चार {{dhr|3em}} [[File:Drawing of Mahatma Gandhi.svg|center|100px]] प्र का श न{{gap}}वि भा ग}}<noinclude></noinclude> muoo2xkq8k858suc1io4mlpq6agyttn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 2.pdf/९ 250 159891 675788 509271 2026-09-19T20:00:42Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675788 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''भूमिका'''}}}} इस खण्ड का सम्बन्ध गांधीजी के जीवनकी एक महत्त्वपूर्ण मंजिलसे है। उनके और दक्षिण आफ्रिकी सरकारके बीच भावी संघर्षके चिह्न १८९६ में ही प्रकट हो चुके थे; और इस खण्डमें जो कागज-पत्र पाठकोंके सामने रखे जा रहे हैं, उनमें उन चिह्नोंकी झलक मिलेगी। गांधीजी ने जब पहली बार लोकहितके लिए अपने प्राणोंको जोखिममें डाला था, उस प्रसंगकी परिस्थितियोंका लेखा भी इस खण्डमें उपलब्ध है। गांधीजी १८९६ में स्वदेश लौटे थे। उस समय वे २६ वर्षके थे। दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ जो व्यवहार किया जा रहा था उसका परिचय भारतकी जनता और अधिकारियोंको देनेकी जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। उन्होंने भारतमें राजनीतिक जीवनके मुख्य-मुख्य केन्द्रोंका दौरा किया, लोकनेताओंसे मुलाकातें कीं और बड़ी-बड़ी सार्वजनिक सभाओंमें भाषण दिये। उक्त विषयपर उन्होंने कुछ पुस्तिकाएँ भी प्रकाशित की। इनमें से एक पुस्तिका आम तौरपर 'ग्रीन पैम्फलेट' ('हरी पुस्तिका', पृ॰ २–३८), के नामसे प्रसिद्ध हुई थी। उसकी विषय-वस्तुके बारे में एक गलत समाचार दक्षिण आफ्रिकी पत्रोंमें प्रकाशित हुआ। भारत-स्थित एक पत्र-प्रतिनिधिने पुस्तिकाका और उसपर 'पायनियर' तथा 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' द्वारा की गई टिप्पणियोंका संक्षिप्त विवरण तार द्वारा लन्दन भेज दिया था। रायटरके लंदन-कार्यालयसे उस सारांशका भी सारांश, एक तीन पंक्तियोंका तार, दक्षिण आफ्रिका पहुँचा और उसने बड़ी-बड़ी घटनाओंका सूत्रपात कर दिया। गांधीजी ने भारतमें जो-कुछ कहा था उसके भ्रामक समाचारसे डर्बनके गोरे नागरिक क्रुद्ध हो उठे। वर्षका अन्त होते-होते, और जबकि गांधीजी को दक्षिण आफ्रिका वापस लानेवाला जहाज सवारियाँ उतारने के लिए इजाजतकी प्रतीक्षा कर रहा था, उनके विरुद्ध छिड़ा हुआ तीव्र आन्दोलन अपनी चरम सीमापर पहुंच गया। १३ जनवरी, १८९७ की शामको जब वे डर्बनमें उतरे, भीड़के एक हिस्सेने उनपर घातक आक्रमण किया और उनकी हत्या ही कर डाली होती परवे बच गये। यह उसी भीड़का हिस्सा था जो पहले डर्बनके जहाज-घाटपर एकत्र हुई थी। यदि पुलिस सुपरिटेंडेंट और उनकी पत्नीने चतुराईसे काम न लिया होता तो गांधीजी के प्राणोंकी रक्षा न हो पाती। इस खण्डका आरम्भ एक छोटे-से किन्तु ऐतिहासिक महत्त्वके दस्तावेज, 'प्रमाणपत्र' से होता है जिसके द्वारा दक्षिण आफ्रिकावासी भारतीयोंने गांधीजी को अपनी ओरसे बोलने का अधिकार दिया था। गांधीजी ने इसे 'हरी पुस्तिका' के अन्तमें जोड़ दिया था। इस पुस्तिकामें दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले व्यवहारका बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया था, जहाँ "द्वेष-भावना कानूनके रूपमें<noinclude>{{c|पाँच}}</noinclude> pt6hdl2ko1oh9xtrqrapvgihu1s7j86 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 2.pdf/१३ 250 159895 675789 509282 2026-09-19T20:09:37Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675789 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''आभार'''}}}} इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम निम्नलिखित संस्थाओं, व्यक्तियों तथा पत्रपत्रिकाओंके आभारी है:<br> {{gap}}'''संस्थाएँ :''' साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास और संग्रहालय, नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली; ब्रिटिश म्यूज़ियम पुस्तकालय, कलोनियल ऑफिस पुस्तकालय तथा इंडिया ऑफिस पुस्तकालय, लन्दन; प्रिटोरिया तथा पीटरमैरित्सबर्ग आर्काइठज़, दक्षिण आफ्रिका; एशियाटिक पुस्तकालय, बम्बई; राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता; अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, राष्ट्रीय अभिलेखागार एवं नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय, नई दिल्ली और भारत सेवक समाज, पूना।<br> {{gap}}'''व्यक्ति :''' श्री रुस्तमजी फर्दुनजी सोराबजी तलेयारखाँ, बम्बई।<br> {{gap}}'''पत्र-पत्रिकाएँ :''' 'अमृतबाजार पत्रिका', 'इंग्लिशमैन', 'इंडिया', 'गुजरात समाचार', 'टाइम्स ऑफ इंडिया', 'नेटाल एडवर्टाइज़र', 'नेटाल मर्क्युरी', 'बंगाली', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'बॉम्बे गजट', 'मुम्बई समाचार', 'स्टेट्समैन' तथा 'हिन्दू'।<noinclude>{{dhr|12em}}</noinclude> 36evx7kdcni159c176m4fscpyzyblid पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/१ 250 160014 675790 651934 2026-09-19T20:14:41Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675790 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{c|{{x-larger|{{xxxx-larger|'''सम्पूर्ण'''}}}}<br> {{x-larger|{{xxxx-larger|'''गांधी'''}}}}<br> {{x-larger|{{xxxx-larger|'''वाङ्‌मय'''}}}}}} {{dhr|3em}} [[File:Drawing of Mahatma Gandhi.svg|center|100px]] {{c|प्र का श न{{gap}}वि भा ग}}<noinclude></noinclude> h4mp4w9miykp4lmy3bekeaty8lzv68e पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/५ 250 160018 675791 614962 2026-09-19T20:18:35Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675791 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{dhr}} ३ {{dhr}} '''(१८९८-१९०३)'''}}<noinclude>{{dhr|18em}}</noinclude> 572ybalmbcaj6x8c5kvthn6cj7qpk5r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/९ 250 160021 675794 651936 2026-09-19T20:25:56Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675794 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{xxx-larger|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्‌मय'''}}<br> {{dhr}} ३<br> (१८९८–१९०३) {{dhr|15em}} [[चित्र:Emblem of India.svg|50px|फ़्रेमहीन|केंद्र]] '''प्रकाशन विभाग'''<br>सूचना और प्रसारण मन्त्रालय<br>भारत सरकार}}<noinclude></noinclude> dudrd16moxjhprjigfz2mixy78yfgjc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/८ 250 162202 675792 516004 2026-09-19T20:21:05Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675792 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>[[चित्र:Gandhi Johannesburg 1900.jpg|फ़्रेमहीन|center|350px]] {{c|गांधीजी, १९००—जोहानिसबर्गमें}}<noinclude></noinclude> ij726dqzu223bu0udk6pqfanuw05esb 675793 675792 2026-09-19T20:21:56Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675793 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{dhr}}</noinclude>[[चित्र:Gandhi Johannesburg 1900.jpg|फ़्रेमहीन|center|350px]] {{c|गांधीजी, १९००—जोहानिसबर्गमें}}<noinclude></noinclude> d9gfh11sjg2meub8mcpnc6kwlnuuedf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/१० 250 162203 675795 651938 2026-09-19T20:29:33Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; {{c|अप्रैल १९६० (वैशाख १८८२ शक) {{dhr|3em}} © नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, १९५९ {{dhr|3em}} '''साढ़े सात रुपये''' {{dhr|3em}} कापीराइट<br>नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनुमतिसे {{dhr|9em}} निदेशक, प्रकाशन विभाग, दिल्ली–८ द्वारा प्रकाशित<br>और जीवणजी डाह्याभाई देसाई, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद–१४ द्वारा मुद्रित}}<noinclude></noinclude> iev6xehxzpwv5p1gutivqqo0mb2bdjh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१ 250 196420 675777 668805 2026-09-19T17:58:38Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675777 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>[[File:चित्र सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय vol. 42 (१).jpg|350px]]<noinclude></noinclude> ajb9l090zg08kprcpkgmp3owj4vhhp0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/७ 250 196426 675778 668811 2026-09-19T18:09:51Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675778 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{dhr|2em}}</noinclude>{{c|{{larger|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्‌मय'''}} {{dhr|2em}} {{larger|४२}} {{dhr|2em}} (अक्टूबर १९२९-फरवरी १९३०) }} {{dhr|18em}}<noinclude>{{dhr|18em}}</noinclude> hfwv8486l28561i3jf6f8b5pk86bt92 675779 675778 2026-09-19T18:10:18Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675779 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{dhr|2em}}</noinclude>{{c|{{larger|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्‌मय'''}} {{dhr|2em}} {{larger|४२}} {{dhr|2em}} (अक्टूबर १९२९-फरवरी १९३०) }}<noinclude>{{dhr|18em}}</noinclude> d6p96rqt7stn8w79kuw7wl8caf5vggq 675780 675779 2026-09-19T18:10:46Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675780 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{dhr|2em}}</noinclude>{{c|{{larger|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्‌मय'''}} {{dhr|1em}} {{larger|४२}} {{dhr|1em}} (अक्टूबर १९२९-फरवरी १९३०) }}<noinclude>{{dhr|18em}}</noinclude> pj0smvdpi7zshtu9ezczts2hrtuab01 675782 675780 2026-09-19T18:22:26Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675782 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; 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{{c|{{x-larger|'''५२. लालाजीकी पुण्यतिथि'''}}}} आगामी १७ नवम्बरको लालाजीकी पुण्यतिथि है। उस दिन हरएक देशभक्त—स्त्री या पुरुष—स्वभावतः अपने-आपसे सवाल करेगा : 'साल-भरमें मैंने लालाजीकी मृत्युका प्रतिकार करनेके लिए क्या किया है? जिस स्वराज्यके लिए लालाजी जिये और मरे उसे निर्दिष्ट ध्येय तक पहुँचानेके लिए मैंने क्या किया है? जिन तथाकथित अछूतोंके हितको उन्होंने अपना हित बना लिया था, उन अछूतोंके लिए मैंने क्या किया है? पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजीने जो अपील की थी उसके लिए मैंने क्या किया है?' लालाजीकी अनेक-विध जीवन-प्रवृत्तियोंमें से किसी एक पर अधिक महत्त्व देकर राष्ट्रभक्त इसी तरहके और भी कई प्रश्‍न अपनेसे पूछ सकते हैं। लेकिन मेरा उद्देश्य तो तमाम कांग्रेस कमेटियोंको यह सलाह देना है कि वे पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजी द्वारा निकाली गई पाँच लाखकी अपीलवाली<ref>जिसका मसौदा गांधीजीने तैयार किया था; देखिए खण्ड ३८ पृ॰ ९९-१०१।</ref> रकम पूरी करें और उस रूपमें लालाजीकी पुण्यतिथि मनायें। यह बड़ी शर्मकी बात है कि अबतक पाँच लाखमें से सिर्फ दो लाखके करीब रुपये ही इकट्‌ठे हो सके हैं। अगर पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाये तो रकमका बाकी अंश १७ नवम्बरतक या उससे पहले इकट्ठा कर लेना कोई मुश्किल नहीं है। अगर उन्हें यह काम करना हो तो आज ही से पूरी-पूरी लगनके साथ काम शुरू कर देना चाहिए। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया,''' २४-१०-१९२९ {{c|{{x-larger|'''५३. संयुक्त प्रान्तका दौरा–६<ref>यह तथा इसी शीर्षकसे लिखे गये आगेके अन्य लेख जो 'ए' द्वारा हस्ताक्षरित हैं, गांधीजीने ही लिखे थे। देखिए "पत्र : महादेव देसाईको", १८-११-१९२९। यद्यपि वहाँ गांधीजी कहते हैं कि उन्होंने तीन पत्र लिखे हैं, वास्तवमें उन पत्रों में से छः 'ए' हस्ताक्षरसे प्रकाशित हुए और ये पत्र इस खण्डमें उद्धृत हैं।</ref>'''}}}} {{gap}}इस महीने १८ तारीखको समाप्त होनेवाले सप्ताह के दौरेका कार्यक्रम<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> इस प्रकार है : {{c|'''पूर्वग्रह कठिनाईसे दूर होते हैं'''}} {{gap}}बाराबंकीसे हमें हरदोईके लिए डाकगाड़ी पकड़नी थी। गाड़ीमें बहुत भीड़ थी। अब फिर पहलेकी तरह ही गांधीजी तीसरे दर्जेमें सफरका आग्रह दृढ़तासे करने लगे हैं। हमारे दलको जगह मिलनेमें कुछ कठिनाई हुई, जिसे रेलवे अधिकारियोंने दूर किया। देवदास गांधी जब भी दलमें होते हैं, अपने लिए आम यात्रियोंके बीच जगह बना लेते हैं, ताकि हमारे दलमें एक आदमी कम हो जाये। बाराबंकीमें उन्हें केवल<noinclude>{{gap}}{{smallrefs}}</noinclude> ov9gcc8t2g0izud7wmu9om1py1q52ir 675775 675774 2026-09-19T17:39:11Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675775 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; 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