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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 1.pdf/६३
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<noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh||भारतीय अन्नाहारी-२|२१}}</noinclude>सकता है कि उन्हें कलेवाकी जरूरत पड़ती होगी। परन्तु, जैसा कि ऊपरके विवरण-से स्पष्ट हो गया होगा, वे कलेवा नहीं करते और न दुपहरका साधारण भोजन ही करते हैं। पर निस्सन्देह कुछ पाठकोंको आश्चर्य होगा कि वे अपने पहले भोजन के बाद नौ घंटोंतक कुछ भी खाये बिना कैसे रहते हैं। इसके दो उत्तर हो सकते हैं — पहला तो यह कि आदत, दूसरा निसर्ग है। कुछ लोगोंका धर्म यह आदेश देता है और कुछ लोगों के धंधे तथा रीति-रिवाज उन्हें इसपर बाध्य करते है कि वे दिन में दो बारसे ज्यादा भोजन न करें। दूसरे, कुछ स्थानोंको छोड़कर सारे भारतकी आबहवा बहुत गर्म है। यह उपर्युक्त आदत का कारण हो सकता है; क्योंकि इंग्लैंड में भी देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में भोजनकी जितनी मात्रा आवश्यक होती है उतनी ही गर्मीके मौसममें आवश्यक नहीं होती। इंग्लैंड में जिस तरह भोजनका प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग ग्रहण किया जाता है, वैसा भारतीय नहीं करते। वे अनेक पदार्थों को एक-साथ मिला देते हैं। कुछ हिन्दुओंमें तो सब पदार्थों को एक-साथ मिला लेना धर्म है। इसके अतिरिक्त, भोजनका प्रत्येक व्यंजन बड़े विस्तारपूर्वक बनाया जाता है। सच तो यह है कि भारतीय सादी उबली हुई शाक-सब्जियाँ खाने में विश्वास नहीं करते। वे उनमें अच्छी खासी मात्रा में नमक, मिर्च, हल्दी, राई, लौंग और तरह-तरहके दूसरे मसाले डालकर उन्हें स्वादिष्ट बना लेते हैं। अंग्रेजी में उन सारे मसालों के नाम दवाइयों के नामोंमें ही मिल सकते हैं; उनके बाहर पाना कठिन है।
:पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं।
:दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु
उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक
मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका
निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके
और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है।
:रसोईके कामोंमें मक्खन या यों कहिए कि घीका जितना उपयोग इंग्लैंड या
सम्भवतः सारे यूरोपमें किया जाता है उससे भारतमें कहीं अधिक होता है। और<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh||भारतीय अन्नाहारी-२|२१}}</noinclude>सकता है कि उन्हें कलेवाकी जरूरत पड़ती होगी। परन्तु, जैसा कि ऊपरके विवरण-से स्पष्ट हो गया होगा, वे कलेवा नहीं करते और न दुपहरका साधारण भोजन ही करते हैं। पर निस्सन्देह कुछ पाठकोंको आश्चर्य होगा कि वे अपने पहले भोजन के बाद नौ घंटोंतक कुछ भी खाये बिना कैसे रहते हैं। इसके दो उत्तर हो सकते हैं — पहला तो यह कि आदत, दूसरा निसर्ग है। कुछ लोगोंका धर्म यह आदेश देता है और कुछ लोगों के धंधे तथा रीति-रिवाज उन्हें इसपर बाध्य करते है कि वे दिन में दो बारसे ज्यादा भोजन न करें। दूसरे, कुछ स्थानोंको छोड़कर सारे भारतकी आबहवा बहुत गर्म है। यह उपर्युक्त आदत का कारण हो सकता है; क्योंकि इंग्लैंड में भी देखा जाता है कि सर्दी के मौसम में भोजनकी जितनी मात्रा आवश्यक होती है उतनी ही गर्मीके मौसममें आवश्यक नहीं होती। इंग्लैंड में जिस तरह भोजनका प्रत्येक पदार्थ अलग-अलग ग्रहण किया जाता है, वैसा भारतीय नहीं करते। वे अनेक पदार्थों को एक-साथ मिला देते हैं। कुछ हिन्दुओंमें तो सब पदार्थों को एक-साथ मिला लेना धर्म है। इसके अतिरिक्त, भोजनका प्रत्येक व्यंजन बड़े विस्तारपूर्वक बनाया जाता है। सच तो यह है कि भारतीय सादी उबली हुई शाक-सब्जियाँ खाने में विश्वास नहीं करते। वे उनमें अच्छी खासी मात्रा में नमक, मिर्च, हल्दी, राई, लौंग और तरह-तरहके दूसरे मसाले डालकर उन्हें स्वादिष्ट बना लेते हैं। अंग्रेजी में उन सारे मसालों के नाम दवाइयों के नामोंमें ही मिल सकते हैं; उनके बाहर पाना कठिन है।
{{gap}}पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं।
{{gap}}दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है।
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<br>{{gap}}पहले भोजन में साधारणतः रोटियाँ या चपातियाँ, जिनके बारेमें बादमें अधिक लिखा जायेगा, थोड़ी-सी दाल, जैसे अरहर या सेम आदिकी, और अलग-अलग या एक-साथ पकी हुई दो या तीन हरी सब्जियाँ होती है। इसके बाद पानीमें पकी हुई और मसालोंसे स्वादिष्ट बनी दाल और चावल मिलाकर खाते हैं। अन्तमें कुछ लोग दूध या चावल या केवल दूध या दही या, विशेषतः गर्मीके दिनोंमें, छाँछ भी लेते हैं।
<br>{{gap}}दूसरे भोजन या ब्यालूमें अधिकतर पहले भोजनके ही पदार्थ होते हैं। परन्तु उनकी मात्रा और शाक-सब्जियोंकी संख्या कम होती है। दूधका उपयोग अधिक मात्रामें किया जाता है। यहाँ पाठकों को याद दिला दूँ कि यही भारतवासियोंका निश्चित भोजन नहीं है। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यही पदार्थ सारे भारतके और सब वर्गोंके आहारको सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, इन आहारों में मिठाई नहीं गिनाई गई, जब कि सम्पन्न वर्गोंमें हफ्तेमें एक बार तो मिठाई जरूर ही खाई जाती है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, बम्बई प्रदेशमें चावलसे गेहूँ अधिक खाया जाता है, बंगालमें गेहूँसे अधिक उपयोग चावलका होता है। यही बात तीसरे अपवादके बारेमें भी है, जिससे यह नियम सिद्ध हो जाता है कि मजदूर-वर्गका आहार उपर्युक्त आहारसे भिन्न है। यदि सब प्रकारके आहारोंकी चर्चा की जाये तो बहुत विस्तार हो जायेगा और वैसा करनेसे, लेखकी सारी रोचकता समाप्त हो जानेकी आशंका है।
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खण्ड चार
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{{c|{{larger|'''भूमिका'''}}}}
इस खण्ड का सम्बन्ध गांधीजी के जीवनकी एक महत्त्वपूर्ण मंजिलसे है। उनके और दक्षिण आफ्रिकी सरकारके बीच भावी संघर्षके चिह्न १८९६ में ही प्रकट हो चुके थे; और इस खण्डमें जो कागज-पत्र पाठकोंके सामने रखे जा रहे हैं, उनमें उन चिह्नोंकी झलक मिलेगी। गांधीजी ने जब पहली बार लोकहितके लिए अपने प्राणोंको जोखिममें डाला था, उस प्रसंगकी परिस्थितियोंका लेखा भी इस खण्डमें उपलब्ध है।
गांधीजी १८९६ में स्वदेश लौटे थे। उस समय वे २६ वर्षके थे। दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ जो व्यवहार किया जा रहा था उसका परिचय भारतकी जनता और अधिकारियोंको देनेकी जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। उन्होंने भारतमें राजनीतिक जीवनके मुख्य-मुख्य केन्द्रोंका दौरा किया, लोकनेताओंसे मुलाकातें कीं और बड़ी-बड़ी सार्वजनिक सभाओंमें भाषण दिये। उक्त विषयपर उन्होंने कुछ पुस्तिकाएँ भी प्रकाशित की।
इनमें से एक पुस्तिका आम तौरपर 'ग्रीन पैम्फलेट' ('हरी पुस्तिका', पृ॰ २–३८), के नामसे प्रसिद्ध हुई थी। उसकी विषय-वस्तुके बारे में एक गलत समाचार दक्षिण आफ्रिकी पत्रोंमें प्रकाशित हुआ। भारत-स्थित एक पत्र-प्रतिनिधिने पुस्तिकाका और उसपर 'पायनियर' तथा 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' द्वारा की गई टिप्पणियोंका संक्षिप्त विवरण तार द्वारा लन्दन भेज दिया था। रायटरके लंदन-कार्यालयसे उस सारांशका भी सारांश, एक तीन पंक्तियोंका तार, दक्षिण आफ्रिका पहुँचा और उसने बड़ी-बड़ी घटनाओंका सूत्रपात कर दिया। गांधीजी ने भारतमें जो-कुछ कहा था उसके भ्रामक समाचारसे डर्बनके गोरे नागरिक क्रुद्ध हो उठे। वर्षका अन्त होते-होते, और जबकि गांधीजी को दक्षिण आफ्रिका वापस लानेवाला जहाज सवारियाँ उतारने के लिए इजाजतकी प्रतीक्षा कर रहा था, उनके विरुद्ध छिड़ा हुआ तीव्र आन्दोलन अपनी चरम सीमापर पहुंच गया। १३ जनवरी, १८९७ की शामको जब वे डर्बनमें उतरे, भीड़के एक हिस्सेने उनपर घातक आक्रमण किया और उनकी हत्या ही कर डाली होती परवे बच गये। यह उसी भीड़का हिस्सा था जो पहले डर्बनके जहाज-घाटपर एकत्र हुई थी। यदि पुलिस सुपरिटेंडेंट और उनकी पत्नीने चतुराईसे काम न लिया होता तो गांधीजी के प्राणोंकी रक्षा न हो पाती।
इस खण्डका आरम्भ एक छोटे-से किन्तु ऐतिहासिक महत्त्वके दस्तावेज, 'प्रमाणपत्र' से होता है जिसके द्वारा दक्षिण आफ्रिकावासी भारतीयोंने गांधीजी को अपनी ओरसे बोलने का अधिकार दिया था। गांधीजी ने इसे 'हरी पुस्तिका' के अन्तमें जोड़ दिया था। इस पुस्तिकामें दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले व्यवहारका बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया था, जहाँ "द्वेष-भावना कानूनके रूपमें<noinclude>{{c|पाँच}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''आभार'''}}}}
इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम निम्नलिखित संस्थाओं, व्यक्तियों तथा पत्रपत्रिकाओंके आभारी है:<br>
{{gap}}'''संस्थाएँ :''' साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास और संग्रहालय, नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली; ब्रिटिश म्यूज़ियम पुस्तकालय, कलोनियल ऑफिस पुस्तकालय तथा इंडिया ऑफिस पुस्तकालय, लन्दन; प्रिटोरिया तथा पीटरमैरित्सबर्ग आर्काइठज़, दक्षिण आफ्रिका; एशियाटिक पुस्तकालय, बम्बई; राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता; अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, राष्ट्रीय अभिलेखागार एवं नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय, नई दिल्ली और भारत सेवक समाज, पूना।<br>
{{gap}}'''व्यक्ति :''' श्री रुस्तमजी फर्दुनजी सोराबजी तलेयारखाँ, बम्बई।<br>
{{gap}}'''पत्र-पत्रिकाएँ :''' 'अमृतबाजार पत्रिका', 'इंग्लिशमैन', 'इंडिया', 'गुजरात समाचार', 'टाइम्स ऑफ इंडिया', 'नेटाल एडवर्टाइज़र', 'नेटाल मर्क्युरी', 'बंगाली', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'बॉम्बे गजट', 'मुम्बई समाचार', 'स्टेट्समैन' तथा 'हिन्दू'।<noinclude>{{dhr|12em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/१
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/५
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सूचना और प्रसारण मन्त्रालय<br>
भारत सरकार<br>
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कापीराइट
नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनुमतिसे
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निदेशक, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली—१ द्वारा प्रकाशित
और शान्तिलाल हरजीवन शाह, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद—१४ द्वारा मुद्रित</poem>}}<noinclude></noinclude>
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आगामी १७ नवम्बरको लालाजीकी पुण्यतिथि है। उस दिन हरएक देशभक्त—स्त्री या पुरुष—स्वभावतः अपने-आपसे सवाल करेगा : 'साल-भरमें मैंने लालाजीकी मृत्युका प्रतिकार करनेके लिए क्या किया है? जिस स्वराज्यके लिए लालाजी जिये और मरे उसे निर्दिष्ट ध्येय तक पहुँचानेके लिए मैंने क्या किया है? जिन तथाकथित अछूतोंके हितको उन्होंने अपना हित बना लिया था, उन अछूतोंके लिए मैंने क्या किया है? पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजीने जो अपील की थी उसके लिए मैंने क्या किया है?' लालाजीकी अनेक-विध जीवन-प्रवृत्तियोंमें से किसी एक पर अधिक महत्त्व देकर राष्ट्रभक्त इसी तरहके और भी कई प्रश्न अपनेसे पूछ सकते हैं। लेकिन मेरा उद्देश्य तो तमाम कांग्रेस कमेटियोंको यह सलाह देना है कि वे पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजी द्वारा निकाली गई पाँच लाखकी अपीलवाली<ref>जिसका मसौदा गांधीजीने तैयार किया था; देखिए खण्ड ३८ पृ॰ ९९-१०१।</ref> रकम पूरी करें और उस रूपमें लालाजीकी पुण्यतिथि मनायें। यह बड़ी शर्मकी बात है कि अबतक पाँच लाखमें से सिर्फ दो लाखके करीब रुपये ही इकट्ठे हो सके हैं। अगर पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाये तो रकमका बाकी अंश १७ नवम्बरतक या उससे पहले इकट्ठा कर लेना कोई मुश्किल नहीं है। अगर उन्हें यह काम करना हो तो आज ही से पूरी-पूरी लगनके साथ काम शुरू कर देना चाहिए।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया,''' २४-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''५३. संयुक्त प्रान्तका दौरा–६<ref>यह तथा इसी शीर्षकसे लिखे गये आगेके अन्य लेख जो 'ए' द्वारा हस्ताक्षरित हैं, गांधीजीने ही लिखे थे। देखिए "पत्र : महादेव देसाईको", १८-११-१९२९। यद्यपि वहाँ गांधीजी कहते हैं कि उन्होंने तीन पत्र लिखे हैं, वास्तवमें उन पत्रों में से छः 'ए' हस्ताक्षरसे प्रकाशित हुए और ये पत्र इस खण्डमें उद्धृत हैं।</ref>'''}}}}
{{gap}}इस महीने १८ तारीखको समाप्त होनेवाले सप्ताह के दौरेका कार्यक्रम<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> इस प्रकार है :
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{{gap}}बाराबंकीसे हमें हरदोईके लिए डाकगाड़ी पकड़नी थी। गाड़ीमें बहुत भीड़ थी। अब फिर पहलेकी तरह ही गांधीजी तीसरे दर्जेमें सफरका आग्रह दृढ़तासे करने लगे हैं। हमारे दलको जगह मिलनेमें कुछ कठिनाई हुई, जिसे रेलवे अधिकारियोंने दूर किया। देवदास गांधी जब भी दलमें होते हैं, अपने लिए आम यात्रियोंके बीच जगह बना लेते हैं, ताकि हमारे दलमें एक आदमी कम हो जाये। बाराबंकीमें उन्हें केवल<noinclude>{{gap}}{{smallrefs}}</noinclude>
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आगामी १७ नवम्बरको लालाजीकी पुण्यतिथि है। उस दिन हरएक देशभक्त—स्त्री या पुरुष—स्वभावतः अपने-आपसे सवाल करेगा : 'साल-भरमें मैंने लालाजीकी मृत्युका प्रतिकार करनेके लिए क्या किया है? जिस स्वराज्यके लिए लालाजी जिये और मरे उसे निर्दिष्ट ध्येय तक पहुँचानेके लिए मैंने क्या किया है? जिन तथाकथित अछूतोंके हितको उन्होंने अपना हित बना लिया था, उन अछूतोंके लिए मैंने क्या किया है? पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजीने जो अपील की थी उसके लिए मैंने क्या किया है?' लालाजीकी अनेक-विध जीवन-प्रवृत्तियोंमें से किसी एक पर अधिक महत्त्व देकर राष्ट्रभक्त इसी तरहके और भी कई प्रश्न अपनेसे पूछ सकते हैं। लेकिन मेरा उद्देश्य तो तमाम कांग्रेस कमेटियोंको यह सलाह देना है कि वे पण्डित मालवीयजी और मोतीलालजी द्वारा निकाली गई पाँच लाखकी अपीलवाली<ref>जिसका मसौदा गांधीजीने तैयार किया था; देखिए खण्ड ३८ पृ॰ ९९-१०१।</ref> रकम पूरी करें और उस रूपमें लालाजीकी पुण्यतिथि मनायें। यह बड़ी शर्मकी बात है कि अबतक पाँच लाखमें से सिर्फ दो लाखके करीब रुपये ही इकट्ठे हो सके हैं। अगर पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाये तो रकमका बाकी अंश १७ नवम्बरतक या उससे पहले इकट्ठा कर लेना कोई मुश्किल नहीं है। अगर उन्हें यह काम करना हो तो आज ही से पूरी-पूरी लगनके साथ काम शुरू कर देना चाहिए।
:[अंग्रेजीसे]
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{{gap}}इस महीने १८ तारीखको समाप्त होनेवाले सप्ताह के दौरेका कार्यक्रम<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> इस प्रकार है :
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:'''यंग इंडिया,''' २४-१०-१९२९
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{{gap}}बाराबंकीसे हमें हरदोईके लिए डाकगाड़ी पकड़नी थी। गाड़ीमें बहुत भीड़ थी। अब फिर पहलेकी तरह ही गांधीजी तीसरे दर्जेमें सफरका आग्रह दृढ़तासे करने लगे हैं। हमारे दलको जगह मिलनेमें कुछ कठिनाई हुई, जिसे रेलवे अधिकारियोंने दूर किया। देवदास गांधी जब भी दलमें होते हैं, अपने लिए आम यात्रियोंके बीच जगह बना लेते हैं, ताकि हमारे दलमें एक आदमी कम हो जाये। बाराबंकीमें उन्हें केवल<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:Veer Vinod Vol II (Shyamaldas, 1886).djvu/१५१
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/* अशोधित */ "“महाराणा उदयसिंद. ] वीरगिनोद, [ सदीमशाह सर-१३८ 'पूर्णमछ को वालबद्चों समेत अश्लका भरोसा देकर थोड़ी दूर किलेसे बाहर निकलने दिया, लेकिन पीछेसे फोज भेजकर घेरलिया और राजा..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="2401:4900:1F3F:53CF:C931:E5D1:C9EF:66F3" /></noinclude>“महाराणा उदयसिंद. ] वीरगिनोद, [ सदीमशाह सर-१३८
'पूर्णमछ को वालबद्चों समेत अश्लका भरोसा देकर थोड़ी दूर किलेसे बाहर निकलने
दिया, लेकिन पीछेसे फोज भेजकर घेरलिया और राजा ओरेतों समेत बहादुरीसे
लड्कर मारागया. ह
शेरशाह आगरे में आया और वहांसे उसने बढही फौजके साथ मारवाडके
राव मालदेव पर चढ़ाई की. का
हिजरी ९५० ता० १० शब्वाल [ वि० १६०० पोप शुरू ११ ८ ई० १५४३
ता० ७ डिसेम्बर | को मुकाबिले की नोबत पहुंची अजमेरके पास दोनों फौजें एक
महीने तक मुकाबिल पडी रहीं, आखिरकार ऊपर लिखे हुए दिनको शेरशाहने फ्रेबके
साथ फृतह पाई, जिसका पूरा जिक्र मारवाड की तवारीख में लिखाजायगा.
इस लड़ाईके पीछे चित्तोड़वालोंसे सुहह करता हुआ वापस रणथम्भोर आया,
ओर बहांसे कालिनजर पहुंचकर किलेका घेरा डाला. वहांके राजाने मुकाबिला
किया, शेरशाह् एक दिन वारूदके खजाने ( मेगजीन ) के पास खड़ा था कि उसमें
आग लगजानेसे वह मए अपने उस्ताद वगेरहके जलूगया. हिजरी ९६० ता० १२
रवीटल्ञ्रव्वल [ वि० १६०२ ज्ये"ठ शुकू १३ 5 ई० १५४५ ता० २४ मई ] को
इस तक्लीफूमें फूतहकी खबर सुनकर मरगया.
यह वादशाह आमतौर पर इन्साफु पसन््द्र ओर मुल्कगीरीमें दगावाज था,
अपनी रअय्यतको दिलसे आराम देना चाहता था. इसने सड़कें तय्यार करवाकर
दोतरफा सायादार पेड़ रूगवाये थे ओर मोके २ प्र कुए और सराएं बनवाई थीं. जब
वह अपनी डाढ़ीको सिफेद देखता तो अफ्सोसके साथ कहता कि मुभको शामके वक्त
बादशाहत मिली. |
जलालखां इस्लामरवां, सलीमशाह सूर,
शेरशाहके पीछे दो बेटे आदिलखां ओर जलालखां रहे, उनमेंसे आदिलखां तो
अपने बापके मरनेके वक्त रणथम्भोरमें था ओर जलालखां छोटा पास होनेके सबब
सर्दारोंकी मद॒दसे कालिन्जरके पास तख्त पर बैठा. इसने अपने बड़े भाई
' आदिलखांके नाम एक अर्जी लिख भेजी, कि आप दूर फासले पर थे जिससे में
पास होनेके कारण तख्त पर बैठगया ताकि सल्तनतमें किसी प्रकार खुलल न आवे,
बरना में तो आपका तबिदांर ही हूं.
इस तरह सक्रीमशाह हिजरी ९६२ ता० १५ रबीउल्ञ्र्वल [ बि० १६०२
आपाढद़ कृष्ण १ ८ ई० १५४५ ता० २६ मई ] को तख्तपर बेठकर सीकरी में<noinclude></noinclude>
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