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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh||(११६)|}}</noinclude>विशेषण संज्ञा की व्याप्ति मर्यादित करता है—इस उक्ति का अर्थ यह हैं। कि विशेषण रहित संज्ञा से जितनी वस्तुओं का बोध होता है उनकी संख्या विशेषण के योग से कम हो जाती है। "घोड़ा" शब्द से जितने प्राणियों का बोध होता है उतने प्राणियों का बोध "काला घोड़ा", शब्दों से नहीं होता। "घोड़ा।" शब्द जितना व्यापक है उतना "काला घोड़ा" शब्द नहीं है। "घोड़ा" शब्द की व्याप्ति (विस्तार) "काला" शब्द से मर्यादित (संकुचित) होती है; अर्थात् "घोड़ा" शब्द अधिक प्राणियों का बोधक है और "काला घोड़ा" शब्द उससे कम प्राणियों का बोधक है।
"हिंदी-बाल-बोध-व्याकरण" में विशेषण का यह लक्षण दिया हुआ है—"संज्ञावाचक शब्द के गुणों को जतानेवाले शब्द को गुणवाचक शब्द कहते है।" इस परिभाषा में अध्याप्ति दोष है; क्योंकि कोई कोई विशेषण केवल संख्या और कोई कोई केवल दशा प्रगट करते हैं। फिर "गुण" शब्द से इस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष भी आ सकता है; क्योंकि भाववाचक संज्ञा भी "गुण" जतानेवाली है। इसके सिवा इस लक्षण में "संज्ञा" के लिए व्यर्थ ही "संज्ञा-वाचक शब्द" और "विशेषण" वा "गुणवाचक" के लिए "गुणवाचकशब्द" लाया गया है।]
१४४-व्यक्तिवाचक संज्ञा के साथ जो विशेषण आता है वह उस संज्ञा की व्याप्ति मर्यादित नहीं करता, जैसे, पतिव्रता सीता, प्रतापी भोज, दयालु ईश्वर, इत्यादि। इन उदाहरणों में विशेषण संज्ञा के अर्थ को केवल स्पष्ट करते हैं। "पतिव्रता सीता" वही व्यक्ति है जो 'सीता' है। इसी प्रकार "भोज" और "प्रतापी भोज" एकही व्यक्ति के नाम हैं। किसी शब्द का अर्थ स्पष्ट करने के लिये जो शब्द आते हैं वे '''समानाधिकरण''' कहते हैं (अं॰-५६१)। ऊपर के वाक्यों में "पतिव्रता," "प्रतापी" और "दयालु" समानाधिकरण विशेषण हैं।
१४५—जातिवाचक संज्ञा के साथ उसका साधारण धर्म सुचित करनेवाला विशेषण समानाधिकरण होता है; जैसे, मूक पशु,
अवोध बच्चा, काला कौआ, ठंडी बर्फ, इत्यादि। इन उदाहरणो में विशेषणों के कारण संज्ञा की व्यापकता कम नहीं होती।<noinclude></noinclude>
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AMAN KUMAR
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"हिंदी-बाल-बोध-व्याकरण" में विशेषण का यह लक्षण दिया हुआ है—"संज्ञावाचक शब्द के गुणों को जतानेवाले शब्द को गुणवाचक शब्द कहते है।" इस परिभाषा में अध्याप्ति दोष है; क्योंकि कोई कोई विशेषण केवल संख्या और कोई कोई केवल दशा प्रगट करते हैं। फिर "गुण" शब्द से इस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष भी आ सकता है; क्योंकि भाववाचक संज्ञा भी "गुण" जतानेवाली है। इसके सिवा इस लक्षण में "संज्ञा" के लिए व्यर्थ ही "संज्ञा-वाचक शब्द" और "विशेषण" वा "गुणवाचक" के लिए "गुणवाचकशब्द" लाया गया है।]
१४४-व्यक्तिवाचक संज्ञा के साथ जो विशेषण आता है वह उस संज्ञा की व्याप्ति मर्यादित नहीं करता, जैसे, पतिव्रता सीता, प्रतापी भोज, दयालु ईश्वर, इत्यादि। इन उदाहरणों में विशेषण संज्ञा के अर्थ को केवल स्पष्ट करते हैं। "पतिव्रता सीता" वही व्यक्ति है जो 'सीता' है। इसी प्रकार "भोज" और "प्रतापी भोज" एकही व्यक्ति के नाम हैं। किसी शब्द का अर्थ स्पष्ट करने के लिये जो शब्द आते हैं वे '''समानाधिकरण''' कहते हैं (अं॰-५६१)। ऊपर के वाक्यों में "पतिव्रता," "प्रतापी" और "दयालु" समानाधिकरण विशेषण हैं।
१४५—जातिवाचक संज्ञा के साथ उसका साधारण धर्म सुचित करनेवाला विशेषण समानाधिकरण होता है; जैसे, मूक पशु,
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