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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८१
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||संयुक्त प्रान्तका दौरा—६|४३}}</noinclude>उसी डिब्बे में जगह मिल सकी जिसकी खिड़कीपर एक कार्ड लगा था : "यूरोपीयों और आंग्ल-भारतीयोंके लिए"। उन्होंने डिब्बेमें कुछ यूरोपीय और आंग्ल-भारतीय तथा कुछ भारतीयोंको भी देखा। बाराबंकीमें उन [के बैठने] पर कोई आपत्ति नहीं की गई। लेकिन लखनऊमें दो यूरोपीय महिलाओंने इस कारणसे उनपर आपत्ति की कि वे ठीक पोशाक नहीं पहने थे। वे पूरी खादीकी धोती [कुरता], गंजी और टोपी पहने थे। उन्होंने देवदास से डिब्बेसे बाहर चले जानेको कहा और जैसा कि वे बताते हैं, अपशब्दों का भी प्रयोग किया। युवा गांधी उनकी बात नहीं मान रहे थे। उन भद्र महिलाओंने अपनी मददके लिए गार्डको बुला लिया, पर देवदास टससे मस न हुए। उसके बाद जैसा कि होता है, वही हुआ। गार्ड स्टेशन मास्टरको बुला लाया। फिर पुलिस आ गई। स्वाभाविक तौर पर भीड़ तो होनी ही थी, हो गई। गांधीजीको जो-कुछ हो रहा था, बताया गया। उन्होंने यही तय किया कि देवदासको जैसा भी वह ठीक समझे करने दिया जाये और खुद तटस्थ रहा जाये। जबकि बहस-मुबाहिसा हो ही रहा था, प्रोफेसर कृपलानी और अन्य लोग इस रिजर्व डिब्बेके पास गये। डिब्बेमें एक मिशनरी था। उससे उनकी काफी गर्मागरम बहस हो गई, क्योंकि प्रोफेसरको मिशनरीकी यह दलील ठीक नहीं लग पा रही थी कि देवदासको बात इसलिए मान लेनी चाहिए कि भद्र महिलाओंको उनकी पोशाकपर आपत्ति है। इस सबके अन्तमें यह हुआ कि पुलिस इस तरह की पोशाक पहननेवाले व्यक्तिको गिरफ्तार कर नहीं पाई थी, कारण चाहे अनिच्छा रहा हो चाहे साहसका अभाव, कि गाड़ी स्टेशनसे चल पड़ी और देवदास बताते हैं कि बादमें वह मिशनरी और वे महिलाएँ भी उनके मित्र बन गये। यह घटना दुःखद है और इससे जाहिर होता है कि पूर्वग्रह कितनी मुश्किलसे दूर हो पाते हैं। यूरोपीयों और आंग्ल-भारतीयोंकी अभीतक यह नहीं समझमें आया है कि भारतकी अधिकांश जन-संख्याकी राष्ट्रीय पोशाक धोती है। जबतक यूरोपीयों और आंग्ल-भारतीयोंके लिए डिब्बे रिजर्व होंगे तबतक यह जाति और रंग-भेद भी बना रहेगा, जिससे कभी-कभी ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ भी होंगी, क्योंकि डिब्बे रिजर्व करनेसे रंग-भेदके उद्धत पूर्वग्रहको बल मिलता है और वह समाप्त नहीं होता। देवदास गांधी के मामलेमें शायद रिजर्वकी जो चिप्पी भी लगी थी, वह नियम विरुद्ध ढंगसे लगी थी। डिब्बे पर आम तरीकेसे जैसे ठप्पा लगाया जाता है, वहाँ वैसा नहीं लगा था। डिब्बे रिजर्व रखनेकी यह अपमानजनक पद्धति तभीतक जारी रखी जा सकती है जबतक यात्रियोंका एक बहुत बड़ा भाग दबकर चुपचाप ऐसे अपमान सहता रहेगा। जिसको जनताका समर्थन प्राप्त नहीं है, ऐसे किसी भी नियमकी जनता द्वारा आदर सहित पालन होनेकी कोई सम्भावना नहीं है। हमें आशा करनी चाहिए कि युवा गांधीने शिष्टतासे जो सफल विरोध किया, उससे रेलवे अधिकारियोंको डिब्बे रिजर्व करनेकी यह अपमानजनक प्रथा समाप्त करनेकी प्रेरणा मिलेगी।
{{c|'''एक सच्चा श्राद्ध'''}}
हरदोईकी यात्रा कईएक घटनाओंके कारण दिलचस्प थी। एक निःस्वार्थ स्त्रीके कार्योंने सारे वातावरणका स्वरूप ही बदल दिया था। एक छोटे-से जमींदार, बरुआके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८२
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>राजा जंगबहादुर सिंहकी पत्नी श्रीमती विद्यादेवीने अपने पति और अन्य सम्बन्धियोंमें सेवाको भावना भर दी है। उन्होंने स्वयं पर्दा त्याग दिया है और अपने प्रभावमें आनेवाली बहनोंसे भी पर्देका त्याग करवा दिया है। वे नियमित रूपसे सूत कातती हैं और उनकी देवरानी श्रीमती लक्ष्मी देवी तो बेहद महीन सूत कातती हैं। उनके काते सूतसे बरुआमें ही बुना गया एक खादीका टुकड़ा गांधीजीको भेंट किया गया था, जिसे उन्होंने हरदोईकी सार्वजनिक सभामें १०५ रु॰ में नीलाम कर दिया। स्त्रियों की सभामें रानी विद्यादेवीने कुछ कीमती जेवर दे दिये। स्त्रियोंकी सभामें लगभग १,७०० रु॰ की भेंट मिली जिसमें ७०० रु॰ नकद और करीब १,००० रु॰ के गहने थे। इसमें से अधिक भाग इसी परिवारसे मिला था। सम्भवतः उन्हींके शान्त प्रभावसे प्रेरित होकर कुँवर महेश्वरसिंहने अपनी पत्नी—जिनका देहान्त पिछली जनवरी में हुआ था—की स्मृति में गांधीजीसे एक खादी भण्डार खुलवाया। इस अवसरपर गांधीजीको दिये गये अभिनन्दनपत्रमें कहा गया था कि स्वर्गीया श्रीमती सरस्वती देवी विदुषी महिला थीं, उन्होंने पर्दा त्याग दिया था, नियमित रूपसे सूत कातती थीं और भगवानकी पूजा करती थीं। जरूरतमंद स्त्रियों और बच्चोंको वे स्वयं मुफ्त दवा बाँटती थीं और बच्चोंके लिए वस्त्र सीने में अत्यधिक प्रसन्नताका अनुभव करती थीं। उन जैसी पवित्र और गरीबोंकी सेविका स्त्रीके लिए, खादी-भण्डारसे अच्छा श्राद्ध अथवा स्मारक और कुछ नहीं हो सकता था। स्त्रियोंकी सभा में गांधीजीने उनके ही जीवन-चरित्रको यदि भाषणका आधार बनाया तो यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है।
{{c|'''अन्य बातें'''}}
इन टिप्पणियोंको लिखते समय बहुत-सी दिलचस्प घटनाएँ याद आ रही हैं जिनमें से केवल कुछको ही लिखकर मुझे सन्तोष करना पड़ेगा और कई दिलचस्प घटनाओंका जिक्र छोड़ ही देना पड़ेगा। मुरादाबादकी यात्रा इसलिए उल्लेखनीय थी कि गांधीजी एक पुराने मुसलमान दोस्त मौलवी अब्दुस्समद साहबके यहाँ ठहरे थे। आजकल यह एक असाधारण बात हो गई है। उन्होंने एक पुराने पुस्तकालयके लिए एक नये भवनका उद्घाटन किया, जिसे वहाँके एक नागरिक लाला ब्रजलालने दानमें दिया था। धामपुरमें हमने खादीका काम पूरे जोर-शोर से चलते देखा। स्वागतमें जो सुव्यवस्था थी उसकी गांधीजीने बड़ी प्रशंसा की। वे भीड़के शोर-शराबे आदिसे थक चुके थे। इसलिए जब वे प्लेटफार्मपर उतरे और उन शान्त स्त्री-पुरुषोंकी कतारोंके बीचसे गुजरे जो स्टेशनपर जमा हुए थे तो उन्होंने बड़ी ताजगी महसूस की। आर्य प्रतिनिधि सेवा समितिके कार्यसे भी गांधीजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। हरिद्वार में तथाकथित सनातनी ब्राह्मणोंने गांधीजीका बहिष्कार करनेका प्रयत्न किया था, लेकिन वह बिलकुल विफल हो गया। यहाँकी थैलीके ज्यादासे-ज्यादा ५०० रु॰ होनेकी आशा थी, यह पूरी २,५०० रु॰ की हुई। इसका श्रेय गुरुकुल कांगड़ीके उप-प्रधानाचार्य पण्डित देवशर्मा अभय और उनके साथियोंके एक दलके प्रयत्नोंको है। उनके ही प्रयत्नसे हरिद्वार में एक खादी-भण्डार भी खुला है, और लगभग स्वावलम्बी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८३
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||स्वयंसेवक या सरदार?|४५}}</noinclude>होकर ही चल रहा है। इस महान प्राचीन तीर्थस्थानकी नैतिक और भौतिक गन्दगीके बारेमें अभी मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है, क्योंकि गांधीजी इसपर खुद अगले सप्ताह लिखनेकी सोच रहे हैं।<ref>देखिए "भौतिक और नैतिक गन्दगी", ३१-१०-१९२९।</ref> इस सप्ताह मैं देहरादून और मसूरीकी भी चर्चा नहीं करूँगा।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया,''' २४-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''५४. स्वयंसेवक या सरकार?'''}}}}
स्वयंसेवकके बारेमें गतांकमें जो कुछ लिखा है<ref>देखिए "स्वयंसेवकों का कर्तव्य", १७-१०-१९२९।</ref>, उसे थोड़ा और दोहरानेकी आवश्यकता है। अपने हर जगह के भ्रमणमें मैंने देखा है कि बहुतेरे स्वयंसेवकोंको इस बातका खयाल नहीं रहता कि आया वे स्वयंसेवक हैं या सरदार। उदाहरणार्थ, अगर जलसों में किसीसे कुछ कहना है, तो हुक्मके तौर पर कहते हैं, प्रार्थना नहीं करते। जब मुझे मंचतक ले जाते हैं, तो रास्ते में खड़े हुए देहातियोंसे विनयपूर्वक और धीरेसे अलग हटने को न कहकर उलटे उन्हें धकेलते या कठोर भाषा अथवा स्वरमें उन्हें हट जानेका हुक्म देते हैं। स्टेशनपर जहाँ-जहाँ मैं उतरता हूँ भीड़ तो होती ही है। स्वयंसेवक विनयपूर्वक मार्ग करवानेके बदले जोरोंसे चीखते हैं, इससे लोग न तो समझते हैं, न सुनते हैं, उलटे कोलाहल बढ़नेसे कुप्रबन्ध बढ़ता है। मेरे कष्टका तो कहना ही क्या है? यद्यपि इन तमाम हुक्मोंका मंशा तो मुझे कष्टसे बचाना ही है। जब सारा जुलूस प्लेटफार्मसे बाहर निकलता है, तब मुसाफिरोंका खयालतक नहीं रखा जाता; लोग उनके असबाबको कुचलते हुए चलते हैं, उसे पैरोंसे ठेलते जाते हैं, अगर कोई मुसाफिर रास्ते में बैठा हो तो उसका भी विचार नहीं करते। मान लीजिए कि हम आम सड़कसे होकर कहीं जा रहे हैं, और कोई देहाती बीचमें चल रहा है। स्वयंसेवक उसे दुत्कार कर हटा देना ही अपना कर्त्तव्य समझते हैं। ऐसे और भी अनेक दृष्टान्त मैं दे सकता हूँ। मुझे विश्वास है कि यह सब अविनय जानबूझ कर नहीं किया जाता होगा; बल्कि विवेक और तालीमके अभाव के कारण ही यह सब होता होगा। हमारे वायुमण्डलमें ऊँच-नीचके भाव भरे पड़े हैं। शहरी लोग देहातियों को हलका मानते हैं। जब राजाओंकी सवारी निकलती हैं, तब उनके नौकर-चाकर वगैरा शान-शौकत से चलते हैं; लोगोंको मनमानी गालियाँ तक दे देते हैं। गोरे साहबोंने इसीका अनुकरण किया है। ऐसी नकलबाजीके फनमें साहब बहादुर बड़े होशियार रहते हैं। इस वायुमण्डलका प्रभाव हमपर इच्छा न रहते हुए भी पड़ा है। लेकिन इस लोक-जागृतिके कालमें स्वयंसेवकोंको सच्चे सेवक बनना होगा। उनकी सच्ची सेवा मूकसेवा होनी चाहिए; गरीबोंकी और असहायोंकी सेवा होनी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८४
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चाहिए। प्रतिष्ठित नेताओंकी सेवाके लिए तो सैकड़ों तैयार हो जाते हैं और उन्हें अधिक तथा अनावश्यक सेवा द्वारा नाहक परेशान करते हैं, लेकिन गरीबोंकी सेवाके लिए बहुत थोड़े मिलते हैं; और जो मिलते हैं, उनमें भी बहुतेरे तो यह मानते हैं कि गरीबोंकी सेवा करके वे उनपर बड़ा उपकार कर रहे हैं। सच तो यह है कि जो गरीबोंकी सेवा करता है, वह अपने ऋणका कुछ हिस्सा अदा करता है। भारतवर्षके गरीब भूखों मरते हैं, लाचार बन गये हैं, इस सबका कारण हम मध्यमवर्गके लोग हैं। स्वयंसेवक भी इसी वर्गके होते हैं। हमींने उन गरीबोंके कन्धोंपर बैठकर अबतक अपना निर्वाह किया है और आज भी कर रहे हैं। जब गरीब वर्गको अपने अधिकारका और अपने बलका ज्ञान होगा, तब वे हमारे सरदार बन जायेंगे और हम लाचारीसे, मजबूरन उनके सेवक बनेंगे। उस हालत में हमें कोई स्वयंसेवक नहीं कहेगा, अवश्य ही हम उनके गुलाम या नौकर कहलायेंगे।
इसलिए किसी भी स्वयंसेवकको स्वप्न तकमें यह खयाल नहीं आना चाहिए कि अगर वह नम्रतासे, आदरपूर्वक या जी-जानसे देहातियोंकी सेवा करता है, तो किसीपर कोई उपकार करता है। ऐसी ही सेवामें उसका और सारे भारतवर्षका भला ह । :'''हिन्दी नवजीवन,''' २४-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''५५. पत्र : हेमन्त के॰ चटर्जीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
२४ अक्टूबर, १९२९}}<br>प्रिय मित्र,
आपके २४ सितम्बरके पत्र<ref>पत्र लेखकने जन-स्वास्थ्य समिति द्वारा प्रस्तावित दुग्ध वितरण योजनाके बारेमें गांधीजीकी राय माँगी थी।</ref> और सहपत्रके लिए धन्यवाद। उन्हें पढ़नेका वक्त मुझे अब मिल सका है। मुझे यह साफ कहना ही होगा कि मुझे दुग्ध-वितरण व्यवस्थाको सुनिश्चित रूपसे बेहतर बनानेकी आपकी योजना पसन्द नहीं आई, हालांकि विभिन्न समितियोंके निष्कर्ष इससे उल्टे हैं। मेरा यह मत है कि अगर हम दूधको कानपुरके गरीब से गरीब नागरिकको सुलभ और एक जैसा सस्ता बनाना चाहते हैं, तो दुग्ध-वितरणको नगरपालिकाके अधिकारमें लाने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। अगर यह सच है कि नगरपालिका ऐसा उद्योग इसलिए हाथमें नहीं ले सकती कि भ्रष्टाचारकी सम्भावना है, तो मैं समझता हूँ कि दूसरी कोई भी—निजी या सरकारी—संस्था इसे हाथमें नहीं ले सकती। स्थानीय स्वायत्त शासनका मर्म प्रामाणिक उद्यम विकसित करनेमें निहित है और इस चीजको लिए नगरपालिकाएँ स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करके सम्भव बना सकती हैं। यदि नगरपालिकाएँ बड़े उद्योगोंको सफलतापूर्वक<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चाहिए। प्रतिष्ठित नेताओंकी सेवाके लिए तो सैकड़ों तैयार हो जाते हैं और उन्हें अधिक तथा अनावश्यक सेवा द्वारा नाहक परेशान करते हैं, लेकिन गरीबोंकी सेवाके लिए बहुत थोड़े मिलते हैं; और जो मिलते हैं, उनमें भी बहुतेरे तो यह मानते हैं कि गरीबोंकी सेवा करके वे उनपर बड़ा उपकार कर रहे हैं। सच तो यह है कि जो गरीबोंकी सेवा करता है, वह अपने ऋणका कुछ हिस्सा अदा करता है। भारतवर्षके गरीब भूखों मरते हैं, लाचार बन गये हैं, इस सबका कारण हम मध्यमवर्गके लोग हैं। स्वयंसेवक भी इसी वर्गके होते हैं। हमींने उन गरीबोंके कन्धोंपर बैठकर अबतक अपना निर्वाह किया है और आज भी कर रहे हैं। जब गरीब वर्गको अपने अधिकारका और अपने बलका ज्ञान होगा, तब वे हमारे सरदार बन जायेंगे और हम लाचारीसे, मजबूरन उनके सेवक बनेंगे। उस हालत में हमें कोई स्वयंसेवक नहीं कहेगा, अवश्य ही हम उनके गुलाम या नौकर कहलायेंगे।
इसलिए किसी भी स्वयंसेवकको स्वप्न तकमें यह खयाल नहीं आना चाहिए कि अगर वह नम्रतासे, आदरपूर्वक या जी-जानसे देहातियोंकी सेवा करता है, तो किसीपर कोई उपकार करता है। ऐसी ही सेवामें उसका और सारे भारतवर्षका भला है।
:'''हिन्दी नवजीवन,''' २४-१०-१९२९
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{{right|मुकाम मसूरी<br>
२४ अक्टूबर, १९२९}}<br>प्रिय मित्र,
आपके २४ सितम्बरके पत्र<ref>पत्र लेखकने जन-स्वास्थ्य समिति द्वारा प्रस्तावित दुग्ध वितरण योजनाके बारेमें गांधीजीकी राय माँगी थी।</ref> और सहपत्रके लिए धन्यवाद। उन्हें पढ़नेका वक्त मुझे अब मिल सका है। मुझे यह साफ कहना ही होगा कि मुझे दुग्ध-वितरण व्यवस्थाको सुनिश्चित रूपसे बेहतर बनानेकी आपकी योजना पसन्द नहीं आई, हालांकि विभिन्न समितियोंके निष्कर्ष इससे उल्टे हैं। मेरा यह मत है कि अगर हम दूधको कानपुरके गरीब से गरीब नागरिकको सुलभ और एक जैसा सस्ता बनाना चाहते हैं, तो दुग्ध-वितरणको नगरपालिकाके अधिकारमें लाने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। अगर यह सच है कि नगरपालिका ऐसा उद्योग इसलिए हाथमें नहीं ले सकती कि भ्रष्टाचारकी सम्भावना है, तो मैं समझता हूँ कि दूसरी कोई भी—निजी या सरकारी—संस्था इसे हाथमें नहीं ले सकती। स्थानीय स्वायत्त शासनका मर्म प्रामाणिक उद्यम विकसित करनेमें निहित है और इस चीजको लिए नगरपालिकाएँ स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करके सम्भव बना सकती हैं। यदि नगरपालिकाएँ बड़े उद्योगोंको सफलतापूर्वक<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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विकिस्रोत:हिंदी विकि क्षमता निर्माण कार्यशाला सितंबर २०२६
4
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2026-09-25T14:07:47Z
AMAN KUMAR
6475
हस्ताक्षर को उचित स्थान पर जोड़ा
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wikitext
text/x-wiki
{| class="wikitable"
| कार्यक्रम || हिंदी विकि क्षमता निर्माण कार्यशाला
|-
| स्थान || पी॰जी॰डी॰ए॰वी॰ कॉलेज (सांध्य), नई दिल्ली
|-
| आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप
|-
| तिथि || २५ सितंबर, २०२६ (अपराह्न ४:०० से अपराह्न ५:०० तक)
|-
| प्रतिभागी संख्या || ३५
|-
| समन्वयक || [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]]
|-
| स्रोतविद एवं प्रशिक्षक || [[सदस्य:नीलम|नीलम]]
|-
|}
'''[[m:Hindi Wikimedians User Group|हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप]]''' के सौजन्य से २५ सितंबर, २०२६ को '''हिंदी विकि क्षमता निर्माण कार्यशाला''' का आयोजन किया जा रहा है। इस स्थानीय स्तर की एक दिवसीय कार्यशाला में ३५ सदस्यों के शामिल होने की संभावना है।
== कार्यक्रम रूपरेखा ==
यह कार्यशाला २ घंटे की होगी। कार्यक्रम विवरण निम्नवत है —
* ३:०० — विकिस्रोत खाता निर्माण, कार्यशाला प्रतिभागिता
* ४:०० — प्रतिभागियों के साथ संपादन एवं समस्या समाधान।
* ५:०० — अल्पाहार
== प्रतिभागी ==
:प्रतिभागी इस अनुभाग में हस्ताक्षर करें—
# --[[सदस्य:Dhrubb|Dhrubb]] ([[सदस्य वार्ता:Dhrubb|वार्ता]]) ११:२२, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:377 deepu|377 deepu]] ([[सदस्य वार्ता:377 deepu|वार्ता]]) ११:२४, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:369aut|369aut]] ([[सदस्य वार्ता:369aut|वार्ता]]) ११:२६, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:PGDAV|PGDAV]] ([[सदस्य वार्ता:PGDAV|वार्ता]]) ११:२६, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:Divasudha|Divasudha]] ([[सदस्य वार्ता:Divasudha|वार्ता]]) ११:२८, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:Kaprajapati21|Kaprajapati21]] ([[सदस्य वार्ता:Kaprajapati21|वार्ता]]) ११:२८, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:Kuchupuchu0|Kuchupuchu0]] ([[सदस्य वार्ता:Kuchupuchu0|वार्ता]]) ११:३०, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
# --[[सदस्य:Shailender133|Shailender133]] ([[सदस्य वार्ता:Shailender133|वार्ता]]) ११:२८, २५ सितम्बर २०२६ (UTC)
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