विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.21 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:मेघदूत का हिन्दी-गद्य में भावार्थ-बोधक अनुवाद.djvu/५१ 250 50718 675839 662555 2026-09-26T16:41:33Z Arshsultanpuri 6393 /* प्रमाणित */ 675839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Arshsultanpuri" />{{rh||मेघदूत।|३७}}</noinclude>है; नाभि उसकी गहरी है; आँखें उसकी चकित हरिणी की आँखों के सदृश हैं; नितम्ब उसके बहुत भारी हैं, इससे वह चलने में अलसाती सी है; और पयोधर उसके गुरुवा-वर्ण हैं, इससे वह कुछ झुकी हुई सी है। उसके रूपवर्णन में और अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। इतना ही कहना बस होगा कि स्त्रियों को सृष्टि में ब्रह्मा ने उसी को सबसे अधिक सुन्दर बनाया है। अथवा ब्रह्मा की कारीगरी का सबसे बढ़िया नमूना वही है। उसी को तू मेरी प्राणेश्वरी समझना। वह मेरे दूसरे जीवन के समान है! मुझसे वियुक्त होने के कारण वह बहुत कम बोलती होगी। बोले क्या, बातचीत में उसका मनही न लगता होगा। उसकी दशा तो चकवे से बिछुड़ी हुई चकवी के सदृश होगी। वियोग के इन दिनों में उसकी उत्कण्ठा बहुत ही बढ़ गई होगी। शीत की मारी पद्मिनी के समान उसका रुप कुछ का कुछ होगया होगा। बेचारी अकेली न मालूम अपने दिन किस तरह काटती होगी। दिन-रात रोते रोते उसकी आखें सूज गई होंगी! गरम गरम उसासें लेते लेते, उसके ओठों का रङ्ग फीका पड़ गया होगा। खुली हुई अलकें उसके मुख पर लटक रही होंगी? उनसे वह कहीं कहीं छिप गया होगा। अतएव हाथ पर रक्खा हुआ, उसका वह मुख—तुझसे पीछा किये गये (घनों से घिरे हुए) चन्द्रमा के समान—मलिन और कान्तिहीन दिखाई देता होगा। चलायमान मेघों के कारण जो हाल चन्द्रमा का होता है—अर्थात कभी तो उसका कुछ अंश ढक जाता है, कभी खुल जाता है, कभी धुँधला दिखाई देता है—वही हाल लटकी हुई अलकों के कारण मेरी<noinclude></noinclude> 82dztz0d8beedgtbj58rcsx46k7eo3g 675840 675839 2026-09-27T10:46:55Z AMAN KUMAR 6475 पन्ने का उपरी भाग में सुधार 675840 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Arshsultanpuri" />{{rh||मेघदूत|३७}}</noinclude>है; नाभि उसकी गहरी है; आँखें उसकी चकित हरिणी की आँखों के सदृश हैं; नितम्ब उसके बहुत भारी हैं, इससे वह चलने में अलसाती सी है; और पयोधर उसके गुरुवा-वर्ण हैं, इससे वह कुछ झुकी हुई सी है। उसके रूपवर्णन में और अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। इतना ही कहना बस होगा कि स्त्रियों को सृष्टि में ब्रह्मा ने उसी को सबसे अधिक सुन्दर बनाया है। अथवा ब्रह्मा की कारीगरी का सबसे बढ़िया नमूना वही है। उसी को तू मेरी प्राणेश्वरी समझना। वह मेरे दूसरे जीवन के समान है! मुझसे वियुक्त होने के कारण वह बहुत कम बोलती होगी। बोले क्या, बातचीत में उसका मनही न लगता होगा। उसकी दशा तो चकवे से बिछुड़ी हुई चकवी के सदृश होगी। वियोग के इन दिनों में उसकी उत्कण्ठा बहुत ही बढ़ गई होगी। शीत की मारी पद्मिनी के समान उसका रुप कुछ का कुछ होगया होगा। बेचारी अकेली न मालूम अपने दिन किस तरह काटती होगी। दिन-रात रोते रोते उसकी आखें सूज गई होंगी! गरम गरम उसासें लेते लेते, उसके ओठों का रङ्ग फीका पड़ गया होगा। खुली हुई अलकें उसके मुख पर लटक रही होंगी? उनसे वह कहीं कहीं छिप गया होगा। अतएव हाथ पर रक्खा हुआ, उसका वह मुख—तुझसे पीछा किये गये (घनों से घिरे हुए) चन्द्रमा के समान—मलिन और कान्तिहीन दिखाई देता होगा। चलायमान मेघों के कारण जो हाल चन्द्रमा का होता है—अर्थात कभी तो उसका कुछ अंश ढक जाता है, कभी खुल जाता है, कभी धुँधला दिखाई देता है—वही हाल लटकी हुई अलकों के कारण मेरी<noinclude></noinclude> 04e3m7cxom1cehgq5xb11s0ox8cgou6