विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.21 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियां.djvu/१२३ 250 42928 675842 595438 2026-09-28T08:34:43Z अजीत कुमार तिवारी 12 675842 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="शिखर तिवारी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''सवा सेर गेहूँ'''}}}} किसी गाँव में शङ्कर नाम का एक कुरमी किसान रहता था। सीधासादा गरीब आदमी था, अपने काम-से काम, न किसी के लेने में, न देने में। छक्का पंजा न जानता था, छल-प्रपंच की उसे छूत भी न लगी थी, ठगे जाने की चिन्ता न थी, ठग-विद्या न जानता था। भोजन मिला खा लिया, न मिला चबेने पर काट दी, चबेना भी न मिला, तो पानी पी लिया और राम का नाम लेकर सो रहा। किन्तु जब कोई अतिथि द्वार पर आ जाता था, तो उसे इस निवृत्ति-मार्ग का त्याग करना पड़ता था। विशेषकर, जब साधु-महात्मा पदार्पण करते थे, तो उसे अनिवार्यतः सासारिकता की शरण लेनी पड़ती थी। खुद भूखा सो सकता था पर साधु को कैसे भूखा सुलाता, भगवान् के भक्त ठहरे। एक दिन सन्ध्या समय एक महात्मा ने आकर उसके द्वार पर डेरा जमाया। तेजस्वी मूर्ति थी, पीताम्बर गले में, जटा सिर पर, पीतल का कमंडल हाथ में, खड़ाऊँ पैर में, ऐनक आँखो पर, सम्पूर्ण वेष उन महात्माओं का-सा था, जो रईसों के प्रासादों में तपस्या, हवागाड़ियों पर देवस्थानों की परिक्रमा और योग-सिद्धि प्राप्त करने के लिए रुचिकर भोजन करते हैं। घर में जौ का आटा था, वह उन्हें कैसे खिलाता। प्राचीन काल में जौ का चाहे जो कुछ महत्व रहा हो, पर वर्तमान युग में जौ का भोजन सिद्ध पुरुषो के लिए टुष्पाच्य होता है। बड़ी चिन्ता हुई, महात्माजी को क्या खिलाऊँ। आखिर निश्चय किया कि कहीं से गेहूँ का आटा उधार लाऊँ, पर गांव-भर में गेहूँ का आटा न मिला। गाँव में सब मनुष्य-ही-मनुष्य थे, देवता एक भी न था, अतएव देवताओं का पदार्थ कैसे मिलता! सौभाग्य से गाँव के विप्र महाराज के यहाँ से थोड़े-से मिल‌<br><noinclude></noinclude> ivllry4tuec8y1mmo19ec85lww0dmjo पृष्ठ:मेघदूत का हिन्दी-गद्य में भावार्थ-बोधक अनुवाद.djvu/६२ 250 50694 675841 570700 2026-09-27T20:18:57Z Arshsultanpuri 6393 /* प्रमाणित */ 675841 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Arshsultanpuri" />{{rh|'''४८'''|'''मेघदूत ।'''}}</noinclude>कराते हुए कहा—हे छली! मैंने स्वप्न में तुझे किसी स्त्री का हाथ पकड़ते देखा था। 'यह रहस्य की बात है। इसे मेरे सिवा और कोई नहीं जानता! इसे मैं इसलिए कहता हूँ, जिससे तुझे विश्वास हो जाय कि मैं सकुशल हूँ और यह सन्देश मेरा ही भेजा हुआ है। तू पड़ोसियों और पुरवासियों की चर्चा पर ध्यान न देना। लोग यदि कहें कि जीता होता तो अवश्य आता अथवा चिट्टी ही भेजता तो उनकी बात पर विश्वास न करना! विद्वानों का कहना है कि वियोग में पारस्परिक प्रेम कुछ कम हो जाता है—अपना स्नेही पास न रहने पर स्नेह कुछ घट जाता है—परन्तु प्रेमपात्र के दर्शनों से वह पहले से भी अधिक बढ़ जाता है। वियोग के कारण मिलाप की उत्कण्ठा अधिक हो जाती है और प्रेमी अनेक प्रकार की कामनायें करता हुआ बड़े चाव से अपने प्रेमपात्र की प्रतीक्षा करता है।' बस यही मेरा सन्देश है! इसको मेरी प्रियतमा तक पहुँचा देना—मुझे अपना बन्धु समझकर मेरा यह काम कर देना। तूने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली या नहीं, यह मुझे अब तक ज्ञात ही न हुआ। क्योंकि तू कुछ बोला नहीं। परन्तु मेरी समझ में तेरी चुप का यह अर्थ नहीं कि तुझे इससे इनकार हैं। चातक तुझसे सदाही जलदान की याचना करते हैं। तू उनकी इच्छापूर्ति तो कर देता है, पर बोलता नहीं। बिना गरजे ही—बिना बोले ही—तू उनका काम करता है। सज्जनों की यही रीति है। वे उत्तर दिये बिना ही अपने प्रेमी—अपने भक्त-याचकों की प्रार्थना सफल कर देते हैं। अभीष्ट कार्य की पूर्ति को ही वे उत्तर समझते हैं<noinclude></noinclude> 3g2oiulvnw79kdlgyaziw6t23vqsxxu