विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.22 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विषयसूची:गो-दान.djvu 252 602 675933 618838 2026-09-30T08:35:22Z AMAN KUMAR 6475 कड़ी और श्रेणी जोड़ी 675933 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=गो-दान |Language=hi |Volume= |Author=[[लेखक:प्रेमचंद]] |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=सरस्वती प्रेस |Address=बनारस |Year=1936 |Key= |ISBN= |Source=djvu |Image=5 |Progress=श |Pages=<pagelist 1to4=- 5=आमुख 6=लेखक-परिचय 7=आवरण-पृष्ठ 8=प्रकाशक 9=मुखपृष्ठ 10=- 11=आरंभ 12=10 109=108 364to369=-/> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:अपरापूर्ण अनुक्रम]] [[श्रेणी:प्रेमचंद]] 8n9ogafsxtlgdmj1qyjih7qu6pqn5r1 पृष्ठ:गो-दान.djvu/११ 250 614 675931 579704 2026-09-30T08:20:28Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{C||'''१'''}}</noinclude>होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा—गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूूँ। जरा मेरी लाठी दे दे। धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली—अरे, कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है। होरी ने अपने झुरर्यों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा—तुझे रस-पानी की पड़ी है, मुझे यह चिन्ता है कि अबेर हो गयी तो मालिक से भेट न होगी। असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायगा। 'इसी से तो कहती हूँ, कुछ जलपान कर लो। और आज न जानोगे तो कौन हरज होगा। अभी तो परसों गये थे।' 'तू जो बात नहीं समझती,उसमें टाँग क्यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है। नहीं कहीं पता न लगता कि किधर गये। गाँव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं पायी। जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है,तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।' धनिया इतनी व्यवहार-कुगल न थी। उसका विचार था कि हमने ज़मींदार के खेत जोते हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी खुशामद क्यों करें, उसके तलवे क्यो सहलाये। यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस बरसों में उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो,चाहे एक-एक कौड़ी को दाँत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक़ होना मुश्किल है। फिर भी वह हार न मानती थी, और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आये दिन संग्राम छिड़ा रहता था। उसकी छ: सन्तानों में अब केवल तीन जिन्दा है, एक लड़का गोबर कोई सोलह साल का, और दो लड़कियाँ सोना और रूपा, बारह और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ही में मर गये। उसका मन आज भी कहता था, अगर उनकी दवादारू होती तो वे बच जाते; पर वह एक धेले की दवा भी न मँगवा सकी थी। उसकी ही उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाँ ही साल तो था; पर सारे बाल पक गये थे, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। सारी देह ढल गयी थी, वह सुन्दर गेहुआँ रंग साँवला गया था और आँखों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिन्ता ही के कारण तो। कभी तो जीवन का सुख न मिला। इस चिरस्थायी जीर्णावस्था ने उसके आत्म-सम्मान को उदासीनता का रूप दे दिया था। जिस गृहस्थी मे पेट की रोटियाँ भी न मिलें, उसके लिए इतनी खुशामद क्यों? इस परिस्थिति से उसका मन बराबर विद्रोह किया करता था। और दो चार धुड़कियाँ खा लेने पर ही उसे यथार्थ का ज्ञान होता था।<noinclude></noinclude> nfslbyo5yhyf2obu8atc9l6gjkqo5kd पृष्ठ:गो-दान.djvu/१२ 250 615 675932 579715 2026-09-30T08:33:28Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" />{{rh|१०|||गो-दान}}</noinclude>उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ लाकर सामने पटक दिये। होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा—क्या ससुराल जाना है जो पाँचों पोसाक लायी है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जाकर दिखाऊँ। होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा—ऐसे ही तो बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जायेंगी! होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा—तो क्या तू समझती है, मै बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते है। 'जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे! तुम्हारी दशा देख-देखकर तो मैं और भी भूखी जाती हूँ कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?' होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में जैसे झुलस गयी। लकड़ी सँभालता हुआ बोला—साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पायगी धनिया! इसके पहले ही चल देंगे। धनिया ने तिरस्कार किया—अच्छा रहने दो, मत असुभ मुंह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने। होरी लाठी कन्धे पर रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाये हुए हृदय में आतंकमय कम्पन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के सम्पूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अन्तःकरण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अन्दर छिपाये लेता था। विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी मानो झटका देकर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गयी यी। काना कहने से काने को जो दुःख होता है, वह क्या दो आँखोंवाले आदमी को हो सकता है? होरी कदम बढ़ाये चला जाता था। पगडण्डी के दोनों ओर ऊख के पौधों की लहराती हुई हरियाली देख कर उसने मन में कहा—भगवान कहीं गौं से बरखा कर दें और डाँड़ी भी सुभीते से रहे, तो एक गाय जरूर लेगा। देशी गायें तो न दूध दें न उनके बछवे ही किसी काम के हों। बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले। नहीं, वह पछाई गाय लेगा। उसकी खूब सेवा करेगा। कुछ नहीं तो चार-पाँच सेर दूध होगा। गोबर दूध के लिए तरस-तरस कर रह जाता है। इस उमिर में न खाया-पिया, तो फिर कब खायेगा। साल-भर भी दूध पी ले, तो देखने लायक हो जाय। बछवे भी अच्छे बैल निकलेंगे। दो सौ से कम की<noinclude></noinclude> nrwdp9hjkn9x2v0ca7yqoadmtzci1ob विकिस्रोत वार्ता:मुखपृष्ठ 5 36509 675935 503561 2026-09-30T10:13:36Z ~2026-52674-03 6933 /* Hindi */ नया अनुभाग 675935 wikitext text/x-wiki == Undo deletion of Shrimad Bhagavad Gita with Hindi translation == Hi All,<br /> When we try to visit [[श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दीभाषाऽऽनुवादसहिता]] page, wikisource says that user VIGNERON has deleted this page and all its related sub-pages. Can someone with proper credentials please restore (undelete) them? Following is the message that we get: <br /><br /> ::12:00, 19 November 2011 VIGNERON (Talk | contribs) deleted page श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दीभाषाऽऽनुवादसहिता (Moved to the own language subdomain: content was: "श्रीमद् भगवद्गीता (Srimad Bhagawad Gita - With Hindi Translation)</br> सरल हिन्दी अनुवाद - पँकज चन्द गुप्ता क) <br /> The original link to [[श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दीभाषाऽऽनुवादसहिता]] page was available on [[श्रीमद्_भगवद्गीता_हिन्ही_मे_आसान_भाषा_में_आनुवाद]] page. Please undelete these important pages as they had a very concise and useful translation of Gita in Hindi. Thanks. <br /><br /> Regards,<br /> Ashok == Ramcharitmanas == The Ramcharitmanas was not written in Hindi but in Sanskrit. So it should not be included here. However, there is a traslation of the content in hindi written by someone else.[[User:59.94.181.128|59.94.181.128]] 09:51, 18 December 2006 (UTC) :I don't think so, see [[w:Ramcharitmanas]]. It is certainly different than modern Hindi, but it is not Sanskrit. Regards, : Shri Ram Charitmas was written in Avadhi by Goswami Tulasidas. Hindi (khadi boli) as we know it now, did not exist at that time. Awadhi can be treated as a dialect of Hindi, if you so like, similar to Brij Bhasha, in which Surdas wrote, or marvadi, in which MeeraBai wrote. Ram charit manas has a few shlokas at beginning of each chapter in sanskrit, but the main language was the languages of the masses at that time. So, it is quite OK to have it under hindi. ~~ == Hindi subdomain == Hello, It seems that there are now regular Hindi contributors here. What do you think about creating a Hindi subdomain? Regards, [[User:Yann|Yann]] 08:42, 5 April 2007 (UTC) :Hello Yann, :I agree with you that it is time to create a Hindi subdomain. Creating a Hindi subdomain may even speed-up the Hindi Wikisource project. This is nice to know. I think I have enough time to devote here. Regards --[[User:Rachana dayal|Rachana dayal]] 11:38, 29 April 2008 (UTC) Hi, If you are willing to have a separate Hindi Wikisource subdomain, see [[m:Requests for new languages]]. I will help and support it. Regards, [[User:Yann|Yann]] 17:20, 1 May 2008 (UTC) ===देवनागरी फोनेटिक टूल=== हिन्दी विकिपेडिया पर हिन्दी लिखने के लिये जिस देवनागरी फोनेटिक टूल की व्यवस्था की गयी है, उसे हिन्दी-विकिसोर्स, हिन्दी-विकिकोट आदि पर भी उपलब्ध कराया जाय। यह बहुत ही उपयोगी टूल है। इसके उपल्ब्ध होने से हिन्दी में कन्टेन्ट-सृजन को बढ़ावा मिलेगा। हिन्दी के अलावा मराठी, नेपाली, संस्कृत, काश्मीरी, नेपाल भाषा और भोजपुरी आदि के विकिपेडिया और विकिपेडिया के बन्धु प्रकल्पों पर भी इस टूल को उपलब्ध कराया जाय। == Chrestomathie hindi == Hello, I found a scan of Hindi texts, which can be used for proofreading. See [[:File:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu]]. [[User:Yann|Yann]] 09:04, 27 March 2011 (UTC) == Heritage GLAM == Apologies for posting in English. Recently, collaborations were done with 6 government GLAM institutes in Punjab, including 3 museums, 2 libraries and 1 archive, partnership that was managed with numerous meetings and communications with officials that went around for nearly a year. We hope to do capacity development and document Heritage via our project Wiki Loves Heritage - focused on rare documents, archive and books that have clear historical and cultural importance but have no online presence. Here is the link to the grant: https://meta.wikimedia.org/wiki/Grants:Project/Wikilover90/Heritage_GLAM The archive, museum and library have an important source of content with great historical importance available exclusively in only that institute. And documenting and digitizing them would open a great resource to general public and researchers at large who otherwise invest a lot of money to have restricted and very costly access to that source. The project is one of the first to be proposed on such a level and such partnership has never been implemented in North India before. This project would be a pioneer in the future collaborations in Punjab and national level. The infrastructure and resources required to make this project successful can be possible with the success of the grant. That being said, a small part of this project is related to Punjabi Wikisource and the digitization and proofreading would involve multiple languages. One of the other parts include creation of Articles on the museum/archive art and artists. The pilot for this project is Municipal Library project that is ongoing and will continue till January 20. The learnings shared during the pilot project would be completed by that time. The progress of the project can be seen at its Meta Page. The project would officially get started after March and the Wikisource part and Wikipedia part would be done later in the year, which would leave enough time to implement the learnings in the project. Suggestions for improvements in project is welcome. If you would like to sign up for volunteering for the project, please use the section below. Thank you! A part of project apart from digitization and partnerships is outreach, so the outcome would measure in different terms, including content upload. It also addresses artists of North India in Wikiverse Commons Conference. Apart from that, there is a small part of proofreading on Hindi Wikisource. Please sign up for active volunteers for the project team from Hindi Wikisource and help us improve the stats along with any other scope of improvement in the program design.[[User:Wikilover90|Wikilover90]] ([[User talk:Wikilover90|talk]]) 20:22, 10 December 2018 (UTC) ===Suggestions=== ===Sign up=== {{ping|Wikilover90}} thank you for your this proposal It is a useful project for Glam and indic wiki communities I am joining this project as an Advisor -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:2px;">J. Ansari</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:2px;">Talk</span>]]''' 15:40, 25 December 2018 (UTC) : Thank You{{ping|J ansari}}! I am excited and I hope, we can progress in advancing Hindi Wikisource and digitisation of precious Hindi literature.[[User:Wikilover90|Wikilover90]] ([[User talk:Wikilover90|talk]]) 15:58, 25 December 2018 (UTC) == Approvable == {{ping|Pmsarangi|Abhinav619|Hrishikes}} and anyone else interested: LangCom has voted to approve the Hindi Wikisource. Before I pull the trigger, though, I need someone to go to [[:m:Requests for new languages/Wikisource Hindi]] and fill out the table, including: ;Required * Project name (<code>|project_native=</code>) * Project namespace (<code>|ns_project=</code>) (often the same) * Project talk namespace (<code>|ns_project_talk=</code>) ;Optional * Any additional namespaces and/or settings (<code>|add_namespaces</code> and <code>|add_settings</code>) * Add a logo if you have created one Finally, please affirm whether you wish to use '''Asia/New Delhi''' or UTC as the local time zone there. (Hindi Wikipedia, Wiktionary and Wikibooks use UTC. Hindi Wikiquote, Wikiversity and Wikivoyage use IST.) I will watch the page there and will pull the trigger when this is done. Congratulations! [[User:StevenJ81|StevenJ81]] ([[User talk:StevenJ81|talk]]) 15:18, 12 March 2019 (UTC) :[[User:StevenJ81|StevenJ81]], I have added logo and additional namespaces. Please proceed. Thanks. [[User:SM7|SM7]] ([[User talk:SM7|talk]]) 08:52, 13 March 2019 (UTC) ::{{ping|SM7}} All added to the phabricator. Do be patient; they're having problems creating wikis right now. [[User:StevenJ81|StevenJ81]] ([[User talk:StevenJ81|talk]]) 13:55, 13 March 2019 (UTC) == विकिमीडिया आंदोलन रणनीति 2018-20 == प्रिय सदस्यों, मेरा नाम रूपिका शर्मा है और मैं विकिमीडिआ फाउंडेशन द्वारा नियुक्त हिंदी भाषा की रणनीति समन्वयक हूँ। अगले कुछ महीने मैं हिंदी भाषा समुदाय के साथ रणनीति प्रक्रिया के बारे में चर्चाएँ करुँगी जो 2030 तक विकिमीडिया परियोजनाओं में होने वाले बदलाव को परिभाषित करेंगी। 2017 में आंदोलन रणनीति प्रक्रिया का पहला चक्र शुरू हुआ था जिसमे हिंदी समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया था जिससे हम रणनीतिक दिशा की ओर बढ़ सके और अभी 2018 से 2020 तक दूसरा चक्र चल रहा है। इसमें हम विकिमीडिया की भविष्य की भूमिका को ध्यान में रखते हुए और अपनी संरचनाओं को अद्यतन करने के लिए एक सहयोगी रणनीति विकसित करने के लिए एक व्यापक चर्चा शुरू करेंगे जिससे हम 2030 तक अपनी रणनीतिक दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकें। विकिमीडिया परियोजनाएं अपने उपयोगकर्ताओं की जरूरतों को बेहतर ढंग से कैसे पूरा करें? हिंदी समुदाय के सदस्यों को विचार-विमर्श में भाग लेकर इस रणनीतिक दिशा को प्रभावित करने का न्योता दिया जा रहा है। इन चर्चाओं से प्रतिक्रिया संरचनात्मक परिवर्तनों के लिए संस्तुति का आधार बनेगी जिसके साथ हम अपने रणनीतिक दिशा में सफलतापूर्वक और दृढ़ता से आगे बढ़ सकेंगे। वे कौन सी बातें हैं जिनकी समुदाय को सबसे ज्यादा महत्वता है? हम आपके लिए आंदोलन की रणनीति प्रक्रिया को समझना कैसे आसान बना सकते हैं? भाषा और तकनीकी प्रवीणता बाधाओं को ध्यान में रखते हुए। आप इन चर्चाओं के लिए किन प्लेटफार्मों और मध्यस्थों को पसंद करेंगे? नौ कार्यवाहक समूहों - भूमिकाएं और ज़िम्मेदारियां, आय के स्रोत, संसाधन आबंटन, विविधता, सहभागिताएं, क्षमता निर्माण, सामुदायिक स्वास्थ्य, उत्पाद व प्रौद्योगिकी और वकालत ने दस्तावेज तैयार किए हैं जिनमें हमारे आंदोलन की संरचनाओं से संबंधित विषयों पर मुख्य प्रश्न हैं। मई के अंत तक, हिंदी समुदाय के प्रत्येक सदस्य के पास इन सवालों के जवाब देने और स्कोपिंग दस्तावेजों पर अपनी राय साझा करने का मौका है। आपके जवाब मुद्दों, चुनौतियों और अवसरों की रूपरेखा तैयार करेंगे जिसे कार्यदल आगे बढ़ाएगा। वे हमारे आंदोलन की गहरी समझ हासिल करने, रोमांचक संभावनाओं की पहचान करने और बदलाव के लिए संस्तुति विकसित करने में मदद करेंगे। इन पहलुओं को विकिमेनिया 2019 में वितरित किया जाएगा। सभी हिंदी भाषा उपयोगकर्ताओं से अनुरोध किया जाता है: * आंदोलन के बारे में मुख्य पृष्ठ पढ़ना शुरू करें। * पहचानें कि आप किस विषय (स्कोपिंग दस्तावेज़) में सबसे अधिक रुचि रखते हैं। * प्रत्येक विषय (या सबसे बड़ी रुचि के विषय) के मुद्दों को पढ़ें और उन पर प्रतिबिंबित करें। उदाहरण के लिए, ये "[[metawiki:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/2019 Community Conversations/Capacity Building/hi|क्षमता निर्माण]]" विषय में मुद्दे हैं। * रणनीति प्रक्रिया की परिचर्चा के लिए ऑन-विकी, सोशल मीडिया और ऑफ़लाइन वार्तालापों में मित्रवत स्थान नीति का पालन करना याद रखें। ध्यान केंद्रित चर्चाओं के लिए एक सुखद वातावरण सुनिश्चित करने के लिए इन अपेक्षाओं की आवश्यकता होती है जहां योगदानकर्ता सम्मानपूर्वक संलग्न होते हैं। आपसे अनुरोध है कि आंदोलन रणनीति के पृष्ठों और स्कोपिंग दस्तावेजों को देखें; इनका अनुवाद पेशेवर अनुवादकों द्वारा किया गया है और यदि किसी तरह के बदलाव की आवश्यकता हो तो आप उसके मुताबिक बदलाव कर सकते हैं। इसके इलावा आंदोलन रणनीति से संबंधित कोई भी प्रश्न या संदेह हो, तो अवश्य पूछें। हम कैसे अधिक न्यायसंगत और सांस्कृतिक रूप से विविध बनेंगे? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, हम अपनी चर्चाओं को निर्देशित करेंगे। स्कोपिंग दस्तावेज़ों बारे में आपकी क्या प्रतिपुष्टि है? क्या आपको रणनीति प्रक्रिया के बारे में कोई संदेह हैं? आप मेरे वार्ता पृष्ठ या ईमेल पर किसी भी प्रश्न या संदेह के साथ मेरे पास पहुंच सकते हैं। मैं आप सभी को एक अच्छी चर्चा की कामना करती हूँ और आपके ध्यान के लिए अग्रिम धन्यवाद देती हूँ। आंदोलन की रणनीति प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया [[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/hi|यहाँ]] जाएँ। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 09:42, 4 April 2019 (UTC) :{{Ping|RSharma (WMF)}} जी नमस्कार। जल्द ही इस विषय पर बिंदुवार चर्चा आरंभ की जाएगी। समुदाय को समस्त प्रक्रियाओं से अवगत कराते रहें। धन्यवाद। --[[User:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[User talk:अजीत कुमार तिवारी|talk]]) 11:12, 4 April 2019 (UTC) ==ध्यान दें :विकिमीडिया फाउंडेशन ब्रांड चर्चा== विकिमीडिया फाउंडेशन ब्रांड पर चर्चा कर रहा है और हिंदी समुदाय के विचार सुनना चाहता है | कृपया [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Hindi_Wikimedians_User_Group#%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%8F_%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A1_%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%BE यहाँ] चर्चा में हिस्सा ले|--[[User:Abhinav619|Abhinav619]] ([[User talk:Abhinav619|talk]]) 08:25, 17 April 2019 (UTC) ==आंदोलन रणनीति 2030 चर्चा सारांश मार्च - अप्रैल== अप्रैल 2019 तक की सामुदायिक चर्चा प्रकाशित हो चुकी है। इसे [[:m:आंदोलन रणनीति 2030: हिंदी सामुदायिक रिपोर्ट अप्रैल 2019|आंदोलन रणनीति 2030: हिंदी सामुदायिक रिपोर्ट अप्रैल 2019]] पर पढ़ा जा सकता है। धन्यवाद। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 14:15, 14 May 2019 (UTC) ==Wikisource Advance Training 2019 host for Bid & Application open== ''Call for bids to host Wikisource Advance Training 2019 & participation of the program.'' ''Apologies for writing in English, please consider translating the message.'' ''Hello everyone,'' It gives us great pleasure to inform that the Wikisource Advance Training 2019 programme organised by CIS-A2K is going to be held from 11 October & 13 October 2019.This year CIS-A2K is seeking expressions of interest from interested communities in India for hosting the Wikisource Advance Training 2019.Wikisource Advance Training is a 3 (three) days residential training program for which attempts to aims to groom experienced Wiki-librarians for Indic language Wikisource to proofread even better quality content on Wikisource. <big>'''If you're interested in hosting the program, Following are the per-requests to propose a bid:'''</big> *Active local community which is willing to support conducting the event. *At least 4 active Wikimedian ( not specific for Wikisource contributor) community members should come together and propose the city. They should reside in the city/nearby or states. *Women Wiki-librarian in organizing team is highly recommended. *City should have at least a national airport. *Venue and accommodations should be available for the event dates. *Participants size of Wikisource Advance Training generally will be around 22. *Needed a venue which will have good internet connectivity and conference space for the above mentioned size of participants. *Discussions/announcement with the local community by mailing list/village pump. <big>'''For participation in this program, you should apply here:'''</big> *The selection will be done by each Indic Wikisource community. *We may select maximum 2 (two) Wiki-librarian from each language community. *'''Eligibility criteria for supporting a candidate for a participation:''' He/she should have a minimum 50 proofread in their languages Wikisource before 15th August 2019. *The applicant for participation in this program should have a minimum 500 proofread in their languages Wikisource before 15th August 2019. *Self nomination can be done at with a new section. *We encourage for female participants. Please learn more about the Wikisource Advance Training program please visit [[:meta:CIS-A2K/Events/Wiki Advanced Training/2019|this page]] and to submit your bid please visit [[:meta:CIS-A2K/Events/Wikisource Advance Training/Bids|this page]]. Feel free to reach to me for more information or email jayanta@cis-india.org. Best![[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]] ([[User talk:Jayanta (CIS-A2K)|talk]]) 18:35, 14 August 2019 (UTC) ==विकिमीडिया आंदोलन रणनीति 2018-20/अनुशंसाएँ== नमस्कार! विकिमीडिया आंदोलन रणनीति 2018-20 के लिए [[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/Recommendations/hi|मसौदा सिफ़ारिशें]] (draft recommendations) प्रकाशित हो चुकीं हैं। सिफ़ारिशों को नौ विकिमीडिया कार्यकारी समूहों द्वारा विकसित किया गया है और हमारे आंदोलन के भविष्य के निर्माण में मदद करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं। यह उन तरीकों पर पहली नज़र डालते हैं, जिनसे हम अपने आंदोलन की संरचनाओं को अपनी सामरिक दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं। <br> * सिफ़ारिशें प्रारंभिक चरण ड्राफ्ट हैं, और इसको ध्यान में रखते हुए हम हर प्रकार की प्रतिक्रिया का स्वागत कर हैं।<br> सिफ़ारिशें अनुसंधानमूलक हैं और अभी विकास के विभिन्न चरणों में हैं तथा अलग-अलग मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हमारे आंदोलन का हिस्सा हैं।<br> चर्चा और पारदर्शिता के उद्देश्य से सिफ़ारिशों का दस्तावेज़ सामुदायिक इनपुट के लिए खुला है, लेकिन इसे अंतिम दस्तावेज़ के बजाय प्रक्रिया के तहत अपूर्ण समझा जाना चाहिए।<br> सभी सिफ़ारिशें महत्वपूर्ण हैं, और यह कार्य समूहों द्वारा कई महीनों की कड़ी मेहनत का दर्शाती हैं। विकिमीडिया के विषयगत क्षेत्रों की विविधता की पूरी तस्वीर प्राप्त करने के लिए नौ विषयों की समीक्षा और विचार के लिए हम समुदाय को न्यौता देते हैं।<br> समय के साथ सिफ़ारिशें में काफी बदलाव होने की संभावना है। इन्हें समृद्ध करने के लिए आगे के शोध, चर्चा और सामुदायिक इनपुट की आवश्यकता है। <br> * इस चरण के लिए हम 15 सितंबर तक इस चरण के लिए इनपुट मांग रहे हैं।<br> अप्रैल 2019 से समुदाय की बातचीत विभिन्न बिंदुओं के साथ एक सतत और खुली सामुदायिक प्रक्रिया में रही है। हमारा वर्तमान चरण सितंबर के अंत में ट्यूनिस में हो रही हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट (harmonization sprint) में कार्यकारी समूह के सदस्यों के मिलने से पहले मसौदा सिफ़ारिशों पर वर्तमान प्रतिक्रिया को सुलझाने पर केंद्रित है।<br> ड्राफ्ट सिफ़ारिशें पर सामुदायिक प्रतिक्रिया के लिए विकिमेनिया एक बड़ा अवसर था। प्रत्येक विषयगत क्षेत्र में न्यूनतम 25 से 80 तक लोग ने कार्यकारी समूह के सदस्यों के साथ बैठकर रणनीति बैठक (strategy space) में साथ मिलकर चर्चा की। कार्यकारी समूह के सदस्य अब उन विचारों और सिफ़ारिशें को शामिल करने के लिए काम कर रहे हैं जो उनके साथ साझा किए गए थे।<br> हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट के बाद, कार्यकारी समूह अपने विचारों को एक साथ परिष्कृत करना जारी रखेंगे।<br> * अभी हम सिफ़ारिशें के विकास के "इनपुट" चरण में हैं। सिफ़ारिशें जो नवंबर 2019 तक तैयार और पूरी तरह से विकसित हो जाएंगी, उन्हें उनकी समीक्षा, प्रतिक्रिया और समर्थन के लिए ट्रस्ट के बोर्ड को भेज दिया जाएगा।<br> ट्रस्टी बोर्ड की ओर से उनकी भूमिका पर अच्छी तरह से वाक़िफ़ होने के लिए कृपया [[:m:Wikimedia Foundation Board noticeboard/July 2018 - Board of Trustees participation in the Movement Strategy Process|पूरा विवरण]] पढ़ें और समीक्षा करें।<br> बोर्ड सिफ़ारिशें की समीक्षा और समर्थन वहाँ करेगा जहाँ उचित होगा, उदाहरण के लिए, जहाँ कहीं विकिमीडिया फ़ाउंडेशन से मजबूत भूमिका और वित्तपोषण की आवश्यकता हो सकती है।<br> अन्य सिफ़ारिशें के समर्थन के लिए अलग-अलग समूहों की आवश्यकता होगी जिससे वे संबंधित हैं।<br> सभी सिफ़ारिशें नवंबर तक अंतिम रूप देने, प्रकाशित करने और साझा करने के लिए तैयार नहीं होंगी। कुछ मामलों में, आगे के शोध, चर्चा और सामुदायिक इनपुट की दुबारा और आवश्यकता होगी। अन्य मामलों में, कुछ सिफ़ारिशें का परित्याग किया जाएगा और बाकियों को बढ़ावा दिया जाएगा। <br> सिफ़ारिशें विकसित करने के क्रम में एकत्रित किए गए डाटा, प्रतिक्रिया और जानकारी का उपयोग कार्यान्वयन प्रक्रिया को सूचित करने के लिए किया जाएगा।<br> * विकिमनिया में विषयगत क्षेत्रों और कार्यकारी समूहों के बीच हुई चर्चा से यह स्पष्ट था कि यह सिफ़ारिशें ज्यादातर समर्थित सिद्धांतों के एक समूह, कार्यों या नियमों के एक से अधिक विशिष्ट समुच्चय का प्रतिनिधित्व करने की संभावना रखती हैं।<br> इनमें से अधिकांश को हमने पहले चरण में "क्यूँ" को प्राथमिकता दी: मुक्त ज्ञान आंदोलन के लिए समर्थन प्रणाली बनने लिए हमने ज्ञान इक्विटी और सेवा के रूप में ज्ञान की चर्चा की थी। हमारा वर्तमान चरण "क्या" का जवाब दे रहा है। "कैसे", "कब", और "कौन" के प्रश्न हमारे अगले चरण के लिए हैं, इसका कार्यान्वयन, जो 2020 में शुरू होगा - इसके सार्वजनिक परामर्श और संवाद का अपना अलग संस्करण होगा।<br> * सामुदायिक इनपुट कार्यकारी समूहों द्वारा सार्थक विचार प्राप्त कर रहा है।<br> सभी जानकारी जो मेटाविकि, विकिमीडिया-1 मेलिंग लिस्ट पर साझा की जा रही है और समुदायक रणनीति समन्वयक टीम को भेजी जाती है, जिन्हें सारांश रिपोर्ट में मेटा पर दस्तावेज बना कर प्रकाशित किया गया और मासिक समीक्षा के लिए कार्यकारी समूहों को भेजा गया।<br> इस प्रतिक्रिया का यह दौर समाप्त हो रहा है और कोर टीम सभी सामग्रियों को दो समूहों में विभाजित कर रही है- संरचनात्मक प्रतिक्रिया और प्रोग्रामेटिक प्रतिक्रिया।<br> हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट से पहले संरचनात्मक प्रतिक्रिया को सामूहिक रूप से संक्षेपित किया जा रहा है और एक सामुदायिक वार्तालाप संकलन रिपोर्ट में भेजा जा रहा है। इसे मेटा पर सार्वजनिक किया जाएगा।<br> प्रोग्रामेटिक फीडबैक को विषय के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा। और एक अलग रिपोर्ट में फिर से उठाया जाएगा और अगले साल कार्यान्वयन चरण में उपयोग किया जाएगा। मेटा पर भी इसे सार्वजनिक किया जाएगा।<br> मसौदा सिफ़ारिशें (draft recommendations) को पढ़ने के लिए [[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/Recommendations/hi|इस लिंक]] जाएँ। आप अपनी प्रतिक्रिया यहाँ, मेटा विकी में वार्ता पृष्ठ या फिर ईमेल (rsharma@wikimedia.org) पर कर सकते हैं। धन्यवाद। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 10:56, 2 September 2019 (UTC) ==आंदोलन रणनीति 2030 मसौदा अनुशंसाएँ चर्चा सारांश == मसौदा अनुशंसाओं का चर्चा सारांश प्रकाशित है। इसे [[:m:आंदोलन रणनीति 2030: मसौदा अनुशंसाएँ चर्चा सारांश|आंदोलन रणनीति 2030: मसौदा अनुशंसाएँ चर्चा सारांश]] पर पढ़ा जा सकता है। जल्द ही ट्यूनिस में हुए हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट में कार्य समूहों द्वारा बनाए दुसरे संस्करण को साझा किया जाएगा। धन्यवाद। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 18:18, 23 September 2019 (UTC) == Hindi == 1 [[विशेष:योगदान/~2026-52674-03|~2026-52674-03]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-52674-03|वार्ता]]) १०:१३, ३० सितम्बर २०२६ (UTC) mr8x8udc50thm61z6tmp44a06lbld56 675936 675935 2026-09-30T10:13:46Z Pristome 6737 Undid edits by [[Special:Contribs/~2026-52674-03|~2026-52674-03]] ([[User talk:~2026-52674-03|talk]]) to last version by अजीत कुमार तिवारी 675936 wikitext text/x-wiki == Undo deletion of Shrimad Bhagavad Gita with Hindi translation == Hi All,<br /> When we try to visit [[श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दीभाषाऽऽनुवादसहिता]] page, wikisource says that user VIGNERON has deleted this page and all its related sub-pages. Can someone with proper credentials please restore (undelete) them? Following is the message that we get: <br /><br /> ::12:00, 19 November 2011 VIGNERON (Talk | contribs) deleted page श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दीभाषाऽऽनुवादसहिता (Moved to the own language subdomain: content was: "श्रीमद् भगवद्गीता (Srimad Bhagawad Gita - With Hindi Translation)</br> सरल हिन्दी अनुवाद - पँकज चन्द गुप्ता क) <br /> The original link to [[श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दीभाषाऽऽनुवादसहिता]] page was available on [[श्रीमद्_भगवद्गीता_हिन्ही_मे_आसान_भाषा_में_आनुवाद]] page. Please undelete these important pages as they had a very concise and useful translation of Gita in Hindi. Thanks. <br /><br /> Regards,<br /> Ashok == Ramcharitmanas == The Ramcharitmanas was not written in Hindi but in Sanskrit. So it should not be included here. However, there is a traslation of the content in hindi written by someone else.[[User:59.94.181.128|59.94.181.128]] 09:51, 18 December 2006 (UTC) :I don't think so, see [[w:Ramcharitmanas]]. It is certainly different than modern Hindi, but it is not Sanskrit. Regards, : Shri Ram Charitmas was written in Avadhi by Goswami Tulasidas. Hindi (khadi boli) as we know it now, did not exist at that time. Awadhi can be treated as a dialect of Hindi, if you so like, similar to Brij Bhasha, in which Surdas wrote, or marvadi, in which MeeraBai wrote. Ram charit manas has a few shlokas at beginning of each chapter in sanskrit, but the main language was the languages of the masses at that time. So, it is quite OK to have it under hindi. ~~ == Hindi subdomain == Hello, It seems that there are now regular Hindi contributors here. What do you think about creating a Hindi subdomain? Regards, [[User:Yann|Yann]] 08:42, 5 April 2007 (UTC) :Hello Yann, :I agree with you that it is time to create a Hindi subdomain. Creating a Hindi subdomain may even speed-up the Hindi Wikisource project. This is nice to know. I think I have enough time to devote here. Regards --[[User:Rachana dayal|Rachana dayal]] 11:38, 29 April 2008 (UTC) Hi, If you are willing to have a separate Hindi Wikisource subdomain, see [[m:Requests for new languages]]. I will help and support it. Regards, [[User:Yann|Yann]] 17:20, 1 May 2008 (UTC) ===देवनागरी फोनेटिक टूल=== हिन्दी विकिपेडिया पर हिन्दी लिखने के लिये जिस देवनागरी फोनेटिक टूल की व्यवस्था की गयी है, उसे हिन्दी-विकिसोर्स, हिन्दी-विकिकोट आदि पर भी उपलब्ध कराया जाय। यह बहुत ही उपयोगी टूल है। इसके उपल्ब्ध होने से हिन्दी में कन्टेन्ट-सृजन को बढ़ावा मिलेगा। हिन्दी के अलावा मराठी, नेपाली, संस्कृत, काश्मीरी, नेपाल भाषा और भोजपुरी आदि के विकिपेडिया और विकिपेडिया के बन्धु प्रकल्पों पर भी इस टूल को उपलब्ध कराया जाय। == Chrestomathie hindi == Hello, I found a scan of Hindi texts, which can be used for proofreading. See [[:File:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu]]. [[User:Yann|Yann]] 09:04, 27 March 2011 (UTC) == Heritage GLAM == Apologies for posting in English. Recently, collaborations were done with 6 government GLAM institutes in Punjab, including 3 museums, 2 libraries and 1 archive, partnership that was managed with numerous meetings and communications with officials that went around for nearly a year. We hope to do capacity development and document Heritage via our project Wiki Loves Heritage - focused on rare documents, archive and books that have clear historical and cultural importance but have no online presence. Here is the link to the grant: https://meta.wikimedia.org/wiki/Grants:Project/Wikilover90/Heritage_GLAM The archive, museum and library have an important source of content with great historical importance available exclusively in only that institute. And documenting and digitizing them would open a great resource to general public and researchers at large who otherwise invest a lot of money to have restricted and very costly access to that source. The project is one of the first to be proposed on such a level and such partnership has never been implemented in North India before. This project would be a pioneer in the future collaborations in Punjab and national level. The infrastructure and resources required to make this project successful can be possible with the success of the grant. That being said, a small part of this project is related to Punjabi Wikisource and the digitization and proofreading would involve multiple languages. One of the other parts include creation of Articles on the museum/archive art and artists. The pilot for this project is Municipal Library project that is ongoing and will continue till January 20. The learnings shared during the pilot project would be completed by that time. The progress of the project can be seen at its Meta Page. The project would officially get started after March and the Wikisource part and Wikipedia part would be done later in the year, which would leave enough time to implement the learnings in the project. Suggestions for improvements in project is welcome. If you would like to sign up for volunteering for the project, please use the section below. Thank you! A part of project apart from digitization and partnerships is outreach, so the outcome would measure in different terms, including content upload. It also addresses artists of North India in Wikiverse Commons Conference. Apart from that, there is a small part of proofreading on Hindi Wikisource. Please sign up for active volunteers for the project team from Hindi Wikisource and help us improve the stats along with any other scope of improvement in the program design.[[User:Wikilover90|Wikilover90]] ([[User talk:Wikilover90|talk]]) 20:22, 10 December 2018 (UTC) ===Suggestions=== ===Sign up=== {{ping|Wikilover90}} thank you for your this proposal It is a useful project for Glam and indic wiki communities I am joining this project as an Advisor -'''[[User:J ansari|<span style="background:#5d9731; color:white;padding:2px;">J. Ansari</span>]] [[User talk:J ansari|<span style="background:#1049AB; color:white; padding:2px;">Talk</span>]]''' 15:40, 25 December 2018 (UTC) : Thank You{{ping|J ansari}}! I am excited and I hope, we can progress in advancing Hindi Wikisource and digitisation of precious Hindi literature.[[User:Wikilover90|Wikilover90]] ([[User talk:Wikilover90|talk]]) 15:58, 25 December 2018 (UTC) == Approvable == {{ping|Pmsarangi|Abhinav619|Hrishikes}} and anyone else interested: LangCom has voted to approve the Hindi Wikisource. Before I pull the trigger, though, I need someone to go to [[:m:Requests for new languages/Wikisource Hindi]] and fill out the table, including: ;Required * Project name (<code>|project_native=</code>) * Project namespace (<code>|ns_project=</code>) (often the same) * Project talk namespace (<code>|ns_project_talk=</code>) ;Optional * Any additional namespaces and/or settings (<code>|add_namespaces</code> and <code>|add_settings</code>) * Add a logo if you have created one Finally, please affirm whether you wish to use '''Asia/New Delhi''' or UTC as the local time zone there. (Hindi Wikipedia, Wiktionary and Wikibooks use UTC. Hindi Wikiquote, Wikiversity and Wikivoyage use IST.) I will watch the page there and will pull the trigger when this is done. Congratulations! [[User:StevenJ81|StevenJ81]] ([[User talk:StevenJ81|talk]]) 15:18, 12 March 2019 (UTC) :[[User:StevenJ81|StevenJ81]], I have added logo and additional namespaces. Please proceed. Thanks. [[User:SM7|SM7]] ([[User talk:SM7|talk]]) 08:52, 13 March 2019 (UTC) ::{{ping|SM7}} All added to the phabricator. Do be patient; they're having problems creating wikis right now. [[User:StevenJ81|StevenJ81]] ([[User talk:StevenJ81|talk]]) 13:55, 13 March 2019 (UTC) == विकिमीडिया आंदोलन रणनीति 2018-20 == प्रिय सदस्यों, मेरा नाम रूपिका शर्मा है और मैं विकिमीडिआ फाउंडेशन द्वारा नियुक्त हिंदी भाषा की रणनीति समन्वयक हूँ। अगले कुछ महीने मैं हिंदी भाषा समुदाय के साथ रणनीति प्रक्रिया के बारे में चर्चाएँ करुँगी जो 2030 तक विकिमीडिया परियोजनाओं में होने वाले बदलाव को परिभाषित करेंगी। 2017 में आंदोलन रणनीति प्रक्रिया का पहला चक्र शुरू हुआ था जिसमे हिंदी समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया था जिससे हम रणनीतिक दिशा की ओर बढ़ सके और अभी 2018 से 2020 तक दूसरा चक्र चल रहा है। इसमें हम विकिमीडिया की भविष्य की भूमिका को ध्यान में रखते हुए और अपनी संरचनाओं को अद्यतन करने के लिए एक सहयोगी रणनीति विकसित करने के लिए एक व्यापक चर्चा शुरू करेंगे जिससे हम 2030 तक अपनी रणनीतिक दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकें। विकिमीडिया परियोजनाएं अपने उपयोगकर्ताओं की जरूरतों को बेहतर ढंग से कैसे पूरा करें? हिंदी समुदाय के सदस्यों को विचार-विमर्श में भाग लेकर इस रणनीतिक दिशा को प्रभावित करने का न्योता दिया जा रहा है। इन चर्चाओं से प्रतिक्रिया संरचनात्मक परिवर्तनों के लिए संस्तुति का आधार बनेगी जिसके साथ हम अपने रणनीतिक दिशा में सफलतापूर्वक और दृढ़ता से आगे बढ़ सकेंगे। वे कौन सी बातें हैं जिनकी समुदाय को सबसे ज्यादा महत्वता है? हम आपके लिए आंदोलन की रणनीति प्रक्रिया को समझना कैसे आसान बना सकते हैं? भाषा और तकनीकी प्रवीणता बाधाओं को ध्यान में रखते हुए। आप इन चर्चाओं के लिए किन प्लेटफार्मों और मध्यस्थों को पसंद करेंगे? नौ कार्यवाहक समूहों - भूमिकाएं और ज़िम्मेदारियां, आय के स्रोत, संसाधन आबंटन, विविधता, सहभागिताएं, क्षमता निर्माण, सामुदायिक स्वास्थ्य, उत्पाद व प्रौद्योगिकी और वकालत ने दस्तावेज तैयार किए हैं जिनमें हमारे आंदोलन की संरचनाओं से संबंधित विषयों पर मुख्य प्रश्न हैं। मई के अंत तक, हिंदी समुदाय के प्रत्येक सदस्य के पास इन सवालों के जवाब देने और स्कोपिंग दस्तावेजों पर अपनी राय साझा करने का मौका है। आपके जवाब मुद्दों, चुनौतियों और अवसरों की रूपरेखा तैयार करेंगे जिसे कार्यदल आगे बढ़ाएगा। वे हमारे आंदोलन की गहरी समझ हासिल करने, रोमांचक संभावनाओं की पहचान करने और बदलाव के लिए संस्तुति विकसित करने में मदद करेंगे। इन पहलुओं को विकिमेनिया 2019 में वितरित किया जाएगा। सभी हिंदी भाषा उपयोगकर्ताओं से अनुरोध किया जाता है: * आंदोलन के बारे में मुख्य पृष्ठ पढ़ना शुरू करें। * पहचानें कि आप किस विषय (स्कोपिंग दस्तावेज़) में सबसे अधिक रुचि रखते हैं। * प्रत्येक विषय (या सबसे बड़ी रुचि के विषय) के मुद्दों को पढ़ें और उन पर प्रतिबिंबित करें। उदाहरण के लिए, ये "[[metawiki:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/2019 Community Conversations/Capacity Building/hi|क्षमता निर्माण]]" विषय में मुद्दे हैं। * रणनीति प्रक्रिया की परिचर्चा के लिए ऑन-विकी, सोशल मीडिया और ऑफ़लाइन वार्तालापों में मित्रवत स्थान नीति का पालन करना याद रखें। ध्यान केंद्रित चर्चाओं के लिए एक सुखद वातावरण सुनिश्चित करने के लिए इन अपेक्षाओं की आवश्यकता होती है जहां योगदानकर्ता सम्मानपूर्वक संलग्न होते हैं। आपसे अनुरोध है कि आंदोलन रणनीति के पृष्ठों और स्कोपिंग दस्तावेजों को देखें; इनका अनुवाद पेशेवर अनुवादकों द्वारा किया गया है और यदि किसी तरह के बदलाव की आवश्यकता हो तो आप उसके मुताबिक बदलाव कर सकते हैं। इसके इलावा आंदोलन रणनीति से संबंधित कोई भी प्रश्न या संदेह हो, तो अवश्य पूछें। हम कैसे अधिक न्यायसंगत और सांस्कृतिक रूप से विविध बनेंगे? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, हम अपनी चर्चाओं को निर्देशित करेंगे। स्कोपिंग दस्तावेज़ों बारे में आपकी क्या प्रतिपुष्टि है? क्या आपको रणनीति प्रक्रिया के बारे में कोई संदेह हैं? आप मेरे वार्ता पृष्ठ या ईमेल पर किसी भी प्रश्न या संदेह के साथ मेरे पास पहुंच सकते हैं। मैं आप सभी को एक अच्छी चर्चा की कामना करती हूँ और आपके ध्यान के लिए अग्रिम धन्यवाद देती हूँ। आंदोलन की रणनीति प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया [[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/hi|यहाँ]] जाएँ। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 09:42, 4 April 2019 (UTC) :{{Ping|RSharma (WMF)}} जी नमस्कार। जल्द ही इस विषय पर बिंदुवार चर्चा आरंभ की जाएगी। समुदाय को समस्त प्रक्रियाओं से अवगत कराते रहें। धन्यवाद। --[[User:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[User talk:अजीत कुमार तिवारी|talk]]) 11:12, 4 April 2019 (UTC) ==ध्यान दें :विकिमीडिया फाउंडेशन ब्रांड चर्चा== विकिमीडिया फाउंडेशन ब्रांड पर चर्चा कर रहा है और हिंदी समुदाय के विचार सुनना चाहता है | कृपया [https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Hindi_Wikimedians_User_Group#%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%8F_%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A1_%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%BE यहाँ] चर्चा में हिस्सा ले|--[[User:Abhinav619|Abhinav619]] ([[User talk:Abhinav619|talk]]) 08:25, 17 April 2019 (UTC) ==आंदोलन रणनीति 2030 चर्चा सारांश मार्च - अप्रैल== अप्रैल 2019 तक की सामुदायिक चर्चा प्रकाशित हो चुकी है। इसे [[:m:आंदोलन रणनीति 2030: हिंदी सामुदायिक रिपोर्ट अप्रैल 2019|आंदोलन रणनीति 2030: हिंदी सामुदायिक रिपोर्ट अप्रैल 2019]] पर पढ़ा जा सकता है। धन्यवाद। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 14:15, 14 May 2019 (UTC) ==Wikisource Advance Training 2019 host for Bid & Application open== ''Call for bids to host Wikisource Advance Training 2019 & participation of the program.'' ''Apologies for writing in English, please consider translating the message.'' ''Hello everyone,'' It gives us great pleasure to inform that the Wikisource Advance Training 2019 programme organised by CIS-A2K is going to be held from 11 October & 13 October 2019.This year CIS-A2K is seeking expressions of interest from interested communities in India for hosting the Wikisource Advance Training 2019.Wikisource Advance Training is a 3 (three) days residential training program for which attempts to aims to groom experienced Wiki-librarians for Indic language Wikisource to proofread even better quality content on Wikisource. <big>'''If you're interested in hosting the program, Following are the per-requests to propose a bid:'''</big> *Active local community which is willing to support conducting the event. *At least 4 active Wikimedian ( not specific for Wikisource contributor) community members should come together and propose the city. They should reside in the city/nearby or states. *Women Wiki-librarian in organizing team is highly recommended. *City should have at least a national airport. *Venue and accommodations should be available for the event dates. *Participants size of Wikisource Advance Training generally will be around 22. *Needed a venue which will have good internet connectivity and conference space for the above mentioned size of participants. *Discussions/announcement with the local community by mailing list/village pump. <big>'''For participation in this program, you should apply here:'''</big> *The selection will be done by each Indic Wikisource community. *We may select maximum 2 (two) Wiki-librarian from each language community. *'''Eligibility criteria for supporting a candidate for a participation:''' He/she should have a minimum 50 proofread in their languages Wikisource before 15th August 2019. *The applicant for participation in this program should have a minimum 500 proofread in their languages Wikisource before 15th August 2019. *Self nomination can be done at with a new section. *We encourage for female participants. Please learn more about the Wikisource Advance Training program please visit [[:meta:CIS-A2K/Events/Wiki Advanced Training/2019|this page]] and to submit your bid please visit [[:meta:CIS-A2K/Events/Wikisource Advance Training/Bids|this page]]. Feel free to reach to me for more information or email jayanta@cis-india.org. Best![[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]] ([[User talk:Jayanta (CIS-A2K)|talk]]) 18:35, 14 August 2019 (UTC) ==विकिमीडिया आंदोलन रणनीति 2018-20/अनुशंसाएँ== नमस्कार! विकिमीडिया आंदोलन रणनीति 2018-20 के लिए [[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/Recommendations/hi|मसौदा सिफ़ारिशें]] (draft recommendations) प्रकाशित हो चुकीं हैं। सिफ़ारिशों को नौ विकिमीडिया कार्यकारी समूहों द्वारा विकसित किया गया है और हमारे आंदोलन के भविष्य के निर्माण में मदद करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं। यह उन तरीकों पर पहली नज़र डालते हैं, जिनसे हम अपने आंदोलन की संरचनाओं को अपनी सामरिक दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं। <br> * सिफ़ारिशें प्रारंभिक चरण ड्राफ्ट हैं, और इसको ध्यान में रखते हुए हम हर प्रकार की प्रतिक्रिया का स्वागत कर हैं।<br> सिफ़ारिशें अनुसंधानमूलक हैं और अभी विकास के विभिन्न चरणों में हैं तथा अलग-अलग मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हमारे आंदोलन का हिस्सा हैं।<br> चर्चा और पारदर्शिता के उद्देश्य से सिफ़ारिशों का दस्तावेज़ सामुदायिक इनपुट के लिए खुला है, लेकिन इसे अंतिम दस्तावेज़ के बजाय प्रक्रिया के तहत अपूर्ण समझा जाना चाहिए।<br> सभी सिफ़ारिशें महत्वपूर्ण हैं, और यह कार्य समूहों द्वारा कई महीनों की कड़ी मेहनत का दर्शाती हैं। विकिमीडिया के विषयगत क्षेत्रों की विविधता की पूरी तस्वीर प्राप्त करने के लिए नौ विषयों की समीक्षा और विचार के लिए हम समुदाय को न्यौता देते हैं।<br> समय के साथ सिफ़ारिशें में काफी बदलाव होने की संभावना है। इन्हें समृद्ध करने के लिए आगे के शोध, चर्चा और सामुदायिक इनपुट की आवश्यकता है। <br> * इस चरण के लिए हम 15 सितंबर तक इस चरण के लिए इनपुट मांग रहे हैं।<br> अप्रैल 2019 से समुदाय की बातचीत विभिन्न बिंदुओं के साथ एक सतत और खुली सामुदायिक प्रक्रिया में रही है। हमारा वर्तमान चरण सितंबर के अंत में ट्यूनिस में हो रही हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट (harmonization sprint) में कार्यकारी समूह के सदस्यों के मिलने से पहले मसौदा सिफ़ारिशों पर वर्तमान प्रतिक्रिया को सुलझाने पर केंद्रित है।<br> ड्राफ्ट सिफ़ारिशें पर सामुदायिक प्रतिक्रिया के लिए विकिमेनिया एक बड़ा अवसर था। प्रत्येक विषयगत क्षेत्र में न्यूनतम 25 से 80 तक लोग ने कार्यकारी समूह के सदस्यों के साथ बैठकर रणनीति बैठक (strategy space) में साथ मिलकर चर्चा की। कार्यकारी समूह के सदस्य अब उन विचारों और सिफ़ारिशें को शामिल करने के लिए काम कर रहे हैं जो उनके साथ साझा किए गए थे।<br> हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट के बाद, कार्यकारी समूह अपने विचारों को एक साथ परिष्कृत करना जारी रखेंगे।<br> * अभी हम सिफ़ारिशें के विकास के "इनपुट" चरण में हैं। सिफ़ारिशें जो नवंबर 2019 तक तैयार और पूरी तरह से विकसित हो जाएंगी, उन्हें उनकी समीक्षा, प्रतिक्रिया और समर्थन के लिए ट्रस्ट के बोर्ड को भेज दिया जाएगा।<br> ट्रस्टी बोर्ड की ओर से उनकी भूमिका पर अच्छी तरह से वाक़िफ़ होने के लिए कृपया [[:m:Wikimedia Foundation Board noticeboard/July 2018 - Board of Trustees participation in the Movement Strategy Process|पूरा विवरण]] पढ़ें और समीक्षा करें।<br> बोर्ड सिफ़ारिशें की समीक्षा और समर्थन वहाँ करेगा जहाँ उचित होगा, उदाहरण के लिए, जहाँ कहीं विकिमीडिया फ़ाउंडेशन से मजबूत भूमिका और वित्तपोषण की आवश्यकता हो सकती है।<br> अन्य सिफ़ारिशें के समर्थन के लिए अलग-अलग समूहों की आवश्यकता होगी जिससे वे संबंधित हैं।<br> सभी सिफ़ारिशें नवंबर तक अंतिम रूप देने, प्रकाशित करने और साझा करने के लिए तैयार नहीं होंगी। कुछ मामलों में, आगे के शोध, चर्चा और सामुदायिक इनपुट की दुबारा और आवश्यकता होगी। अन्य मामलों में, कुछ सिफ़ारिशें का परित्याग किया जाएगा और बाकियों को बढ़ावा दिया जाएगा। <br> सिफ़ारिशें विकसित करने के क्रम में एकत्रित किए गए डाटा, प्रतिक्रिया और जानकारी का उपयोग कार्यान्वयन प्रक्रिया को सूचित करने के लिए किया जाएगा।<br> * विकिमनिया में विषयगत क्षेत्रों और कार्यकारी समूहों के बीच हुई चर्चा से यह स्पष्ट था कि यह सिफ़ारिशें ज्यादातर समर्थित सिद्धांतों के एक समूह, कार्यों या नियमों के एक से अधिक विशिष्ट समुच्चय का प्रतिनिधित्व करने की संभावना रखती हैं।<br> इनमें से अधिकांश को हमने पहले चरण में "क्यूँ" को प्राथमिकता दी: मुक्त ज्ञान आंदोलन के लिए समर्थन प्रणाली बनने लिए हमने ज्ञान इक्विटी और सेवा के रूप में ज्ञान की चर्चा की थी। हमारा वर्तमान चरण "क्या" का जवाब दे रहा है। "कैसे", "कब", और "कौन" के प्रश्न हमारे अगले चरण के लिए हैं, इसका कार्यान्वयन, जो 2020 में शुरू होगा - इसके सार्वजनिक परामर्श और संवाद का अपना अलग संस्करण होगा।<br> * सामुदायिक इनपुट कार्यकारी समूहों द्वारा सार्थक विचार प्राप्त कर रहा है।<br> सभी जानकारी जो मेटाविकि, विकिमीडिया-1 मेलिंग लिस्ट पर साझा की जा रही है और समुदायक रणनीति समन्वयक टीम को भेजी जाती है, जिन्हें सारांश रिपोर्ट में मेटा पर दस्तावेज बना कर प्रकाशित किया गया और मासिक समीक्षा के लिए कार्यकारी समूहों को भेजा गया।<br> इस प्रतिक्रिया का यह दौर समाप्त हो रहा है और कोर टीम सभी सामग्रियों को दो समूहों में विभाजित कर रही है- संरचनात्मक प्रतिक्रिया और प्रोग्रामेटिक प्रतिक्रिया।<br> हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट से पहले संरचनात्मक प्रतिक्रिया को सामूहिक रूप से संक्षेपित किया जा रहा है और एक सामुदायिक वार्तालाप संकलन रिपोर्ट में भेजा जा रहा है। इसे मेटा पर सार्वजनिक किया जाएगा।<br> प्रोग्रामेटिक फीडबैक को विषय के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा। और एक अलग रिपोर्ट में फिर से उठाया जाएगा और अगले साल कार्यान्वयन चरण में उपयोग किया जाएगा। मेटा पर भी इसे सार्वजनिक किया जाएगा।<br> मसौदा सिफ़ारिशें (draft recommendations) को पढ़ने के लिए [[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/Recommendations/hi|इस लिंक]] जाएँ। आप अपनी प्रतिक्रिया यहाँ, मेटा विकी में वार्ता पृष्ठ या फिर ईमेल (rsharma@wikimedia.org) पर कर सकते हैं। धन्यवाद। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 10:56, 2 September 2019 (UTC) ==आंदोलन रणनीति 2030 मसौदा अनुशंसाएँ चर्चा सारांश == मसौदा अनुशंसाओं का चर्चा सारांश प्रकाशित है। इसे [[:m:आंदोलन रणनीति 2030: मसौदा अनुशंसाएँ चर्चा सारांश|आंदोलन रणनीति 2030: मसौदा अनुशंसाएँ चर्चा सारांश]] पर पढ़ा जा सकता है। जल्द ही ट्यूनिस में हुए हार्मोनाइजेशन स्प्रिंट में कार्य समूहों द्वारा बनाए दुसरे संस्करण को साझा किया जाएगा। धन्यवाद। [[User:RSharma (WMF)|RSharma (WMF)]] ([[User talk:RSharma (WMF)|talk]]) 18:18, 23 September 2019 (UTC) rzii1urw9nig10mz4d99evqb93dih0p पृष्ठ:हड़ताल.djvu/१७८ 250 108838 675934 437341 2026-09-30T08:40:05Z AMAN KUMAR 6475 - के स्थान पर — रखा 675934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="अनिरुद्ध कुमार" />{{Rh|अङ्क २]|हड़ताल|[दृश्य २}}</noinclude> का झगड़ा मिटा दो! तब तुम्हारा शत्रु एक टुकड़ा तुम्हारे सामने फेंक देगा।" {{c|{{larger|'''जागो'''}}}} कभी नहीं। {{c|{{larger|'''टॉमस'''}}}} मैं ने यह नहीं कहा। {{c|{{larger|'''रॉबर्ट'''}}}} <small>{{c|[चुभती हुई आवाज़ में]}}</small> मित्रवर, तुम ने चाहे यह न कहा हो पर तुम्हारा मतलब यही था। और धर्म के विषय में तुम ने क्या कहा? तुम ने कहा—"धर्म इसे मना करता है"। "प्रकृति भी इसे मना करती है"। अगर धर्म और प्रकृति में इतनी एकता है तो मुझे यह बात आज ही मालूम हुई है। उस युवक ने— <small>{{c|[राउस की ओर इशारा कर के]}}</small> कहा है कि मेरी बाणी में नरक की आग भरी हुई है। अगर ऐसा होता तो मैं उस सारी आग को इस घुटना टेकने वाले प्रस्ताव को जलाने और झुलसने में लगा देता। घुटना टेकना कायरों और नमक हरामों का है।<noinclude>{{rh||१६९}}</noinclude> e7yfqx3w5svy46kh2zo8gw9n1ipwuvt पृष्ठ:कामना.djvu/१४३ 250 113944 675909 442142 2026-09-29T23:15:00Z AMAN KUMAR 6475 {{gap}} जोड़ा और उपरी पाठ को बोल्ड किया 675909 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="नीलम" />{{c|<u>'''सुबोध काव्य-माला'''</u>}}</noinclude>{{center|{{x-larger|'''१-विद्यापति की पदावली'''}}}} {{larger|{{center|अखिल-भारतवर्षीय हिन्दी-साहित्य सम्मेलन की उत्तमा-परीक्षा में स्वीकृत पाठ्यग्रंथ}}}} {{center|<small>सम्पादक-श्रीरामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी, 'बालक'-सम्पादक</small>}} {{gap}}{{larger|मासिकपत्रों की महारानी 'माधुरी' लिखती है}}-इस पुस्तक में मैथिल-कोकिल विद्यापति के २६५ पद्यों का संग्रह है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शृंगारी कवियों मे उनका उच्च स्थान है। तीन-तीन प्रान्तों में उनकी कविता का आदर है। उनकी भाषा में जो माधुर्य है, वह अलंकृत-काल के अनेक कवियों में, अस्वाभाविक रूप से प्रयत्न करने पर भी, नहीं आया। उनकी कविता में स्वाभाविकता का सर्वत्र प्रमाण मिलता है। हिन्दी शृंगारी कवियों में 'हृदय-हीनता' का जो दोषारोपण किया जाता है, उससे वह सर्वथा विमुक्त हैं। प्रस्तुत पुस्तक में, आरम्भ के ५० पृष्ठों में, विद्यापति का परिचय दिया गया है। उनके सम्बन्ध में जितनी जानने योग्य बातें हैं, उन सबका बहुत अच्छी तरह विवेचन किया गया है। भारतीय कला के सुप्रसिद्ध चित्रकार धुरंधर महाशय के ९ चित्रों ने इस पुस्तक की शोभा को कई गुना बढ़ाकर काव्य और चित्रकला का परस्पर गहन सम्बन्ध पूर्ण रीति से प्रगट कर दिया है। यह संस्करण बहुत ही अच्छा निकला। पाद-टिप्पणियाँ बहुत ही उपयोगी हैं। इस संस्करण की उपयोगिता के विषय<noinclude></noinclude> gekwdf5cyty69656toj0220solkhs41 675910 675909 2026-09-29T23:17:39Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="नीलम" />{{c|<u>{{larger|सुबोध काव्य-माला}}</u>}}</noinclude>{{center|{{x-larger|'''१-विद्यापति की पदावली'''}}}} {{larger|{{center|अखिल-भारतवर्षीय हिन्दी-साहित्य सम्मेलन की उत्तमा-परीक्षा में स्वीकृत पाठ्यग्रंथ}}}} {{center|<small>सम्पादक-श्रीरामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी, 'बालक'-सम्पादक</small>}} {{gap}}{{larger|मासिकपत्रों की महारानी 'माधुरी' लिखती है—}} इस पुस्तक में मैथिल-कोकिल विद्यापति के २६५ पद्यों का संग्रह है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शृंगारी कवियों मे उनका उच्च स्थान है। तीन-तीन प्रान्तों में उनकी कविता का आदर है। उनकी भाषा में जो माधुर्य है, वह अलंकृत-काल के अनेक कवियों में, अस्वाभाविक रूप से प्रयत्न करने पर 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|Volume=२ |Author=संघ लोक सेवा आयोग |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=संघ लोक सेवा आयोग |Address=नई दिल्ली |Year=2022 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=अ |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:संघ लोक सेवा आयोग प्रश्न पत्र]] [[श्रेणी:परापूर्ण अनुक्रम]] 9bq5zp66p2mgxhxxuly554t6z1omn64 पृष्ठ:QPCSM22 HINDI Literature-II.pdf/१ 250 175426 675846 541466 2026-09-29T14:33:24Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित */ 675846 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>&nbsp; {{border|maxwidth=7em|color=black|position=right|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}} {{c|{{x-larger|'''हिन्दी/HINDI'''}}<br>{{larger|'''प्रश्‍न-पत्र II/Paper II'''<br>'''(साहित्य)/(LITERATURE)'''}}}} {{overfloat left|depth=0em|{{border|maxwidth=12em|color=black|position=left|padding=1px|<small>''निर्धारित समय : '''तीन''' घण्टे''</small><br><small>''Time Allowed : '''Three''' 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मान्यता दी जाएगी यदि उसे काटा न गया हो। प्रश्‍न-सह-उत्तर (क्यू.सी.ए.) पुस्तिका में खाली छोड़े गए कोई पृष्ठ अथवा पृष्ठ के भाग को पूर्णतः काट दीजिए।'' {{dhr}} {{c|'''Question Paper Specific Instructions'''}} :'''Please read each of the following instructions carefully before attempting questions :''' :There are '''EIGHT''' questions divided in '''TWO SECTIONS''' and printed in '''HINDI'''.'' :''Candidate has to attempt '''FIVE''' questions in all.'' :''Questions No. '''1''' and '''5''' are compulsory and out of the remaining, '''THREE''' are to be attempted choosing at least '''ONE''' question from each Section.'' :''The number of marks carried by a question/part is indicated against it.'' :''Answers must be written in '''HINDI''' (Devanagari Script).'' :''Word limit in questions, wherever specified, should be adhered to.'' :''Attempts of questions shall be counted in sequential order. Unless struck off, attempt of a question shall be counted even if attempted partly. Any page or portion of the page left blank in the Question-cum-Answer (QCA) Booklet must be clearly struck off.''<noinclude>{{rule}} {{rh|{{border|maxwidth=7em|color=black|position=left|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}}|1|}}</noinclude> 4r8qhh95qg7e1r6z3hby1heakeruxyy 675847 675846 2026-09-29T15:11:18Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रमाणित */ 675847 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; {{border|maxwidth=7em|color=black|position=right|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}} {{c|{{x-larger|'''हिन्दी/HINDI'''}}<br>{{larger|'''प्रश्‍न-पत्र II/Paper II'''<br>'''(साहित्य)/(LITERATURE)'''}}}} {{overfloat left|depth=0em|{{border|maxwidth=12em|color=black|position=left|padding=1px|<small>''निर्धारित समय : '''तीन''' घण्टे''</small><br><small>''Time Allowed : '''Three''' Hours''</small>}}}}{{border|maxwidth=10em|color=black|position=right|padding=1px|align=right|<small>''अधिकतम अंक : '''250'''''</small><br><small>''Maximum Marks : '''250'''''</small>}} {{dhr}} {{rule}} {{dhr}} {{c|'''प्रश्‍न-पत्र सम्बन्धी विशेष अनुदेश'''}} :'''''कृपया प्रश्‍नों के उत्तर देने से पूर्व निम्‍नलिखित प्रत्येक अनुदेश को ध्यानपूर्वक पढ़ें :''''' :''इसमें '''आठ''' प्रश्‍न हैं, जो '''दो खण्डों''' में विभाजित हैं तथा '''हिन्दी''' में छपे हैं।'' :''उम्मीदवार को कुल '''पाँच''' प्रश्‍नों के उत्तर देने हैं।'' :''प्रश्‍न संख्या '''1''' और '''5''' अनिवार्य हैं तथा बाकी प्रश्‍नों में से प्रत्येक खण्ड से कम-से-कम '''एक''' प्रश्न चुनकर '''तीन''' प्रश्‍नों के उत्तर दीजिए।'' :''प्रत्येक प्रश्‍न/भाग के लिए नियत अंक उसके सामने दिए गए हैं।'' :''प्रश्‍नों के उत्तर '''हिन्दी''' (देवनागरी लिपि) में ही लिखे जाएँगे।'' :''प्रश्‍नों में शब्द-सीमा, जहाँ विनिर्दिष्ट है, का अनुसरण किया जाना चाहिए।'' :''प्रश्‍नों के प्रयासों की गणना क्रमानुसार की जाएगी। आंशिक रूप से दिए गए प्रश्‍नों के उत्तर को भी मान्यता दी जाएगी यदि उसे काटा न गया हो। प्रश्‍न-सह-उत्तर (क्यू.सी.ए.) पुस्तिका में खाली छोड़े गए कोई पृष्ठ अथवा पृष्ठ के भाग को पूर्णतः काट दीजिए।'' {{dhr}} {{c|'''Question Paper Specific Instructions'''}} :'''Please read each of the following instructions carefully before attempting questions :''' :There are '''EIGHT''' questions divided in '''TWO SECTIONS''' and printed in '''HINDI'''.'' :''Candidate has to attempt '''FIVE''' questions in all.'' :''Questions No. '''1''' and '''5''' are compulsory and out of the remaining, '''THREE''' are to be attempted choosing at least '''ONE''' question from each Section.'' :''The number of marks carried by a question/part is indicated against it.'' :''Answers must be written in '''HINDI''' (Devanagari Script).'' :''Word limit in questions, wherever specified, should be adhered to.'' :''Attempts of questions shall be counted in sequential order. 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(a) (b) (c) CRNA-S-HND भाव, भाषा एवं विचार की दृष्टि से निराला की 'कुकुरमुत्ता' कविता का मूल्यांकन कीजिए । 20 “गुप्त जी ने 'भारत-भारती' में अतीत का गौरव गान, वर्तमान को रचनात्मक ऊर्जा एवं जागरण का संदेश देने हेतु किया है ।” स्पष्ट कीजिए । 10 15 15<noinclude></noinclude> c9kibbuahoce09edctroqh41hcpb3i9 675849 675848 2026-09-29T15:34:33Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित */ 675849 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>&nbsp; {{c|'''SECTION A'''}} {|width=100% | '''Q1.'''<br>{{gap}} || '''निम्‍नलिखित काव्यांशों की लगभग 150 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए :''' || '''10x5=50'''<br>{{gap}} |} {|width=100% | {{gap}} || (a)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि ॥ दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहुणां, बहुरि न आँवौं हट्ट ॥</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>बेद पुरान बिहाइ सुपंथ कुमारग कोटि कुचाल चली है। काल कराल, नृपाल कृपालन राज समाज बड़ोई छली है ॥ बर्न-बिभाग न आस्रम धर्म, दुनी दुख-दोष-दरिद्र दली है। स्वारथ को परमारथ को कलि राम को नाम प्रताप बली है ॥</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>रससिंगार-मंजनु किए, कंजनु भंजनु दैन। अंजनु रंजनु हूँ बिना खंजनु गंजनु नैन ॥ तो पर वारौं उरबसी, सुनि, राधिके सुजान। तू मोहन कै उर बसी ह्‍वै उरबसी-समान ॥</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (d)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>कौन हो तुम वसंत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन-तिमिर में चपला की रेख, तपन में शीतल मंद बयार। नखत की आशा-किरण समान, हृदय के कोमल कवि की कांत– कल्पना की लघु लहरी दिव्य, कह रही मानस-हलचल शांत।</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (e)<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>धिक‍् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक‍् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका।</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |} {|width=100% | '''Q2.'''<br>{{gap}} || (a)<br>{{gap}} || भाव, भाषा एवं विचार की दृष्टि से निराला की 'कुकुरमुत्ता' कविता का मूल्यांकन कीजिए। || 20<br>{{gap}} |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}} || "गुप्त जी ने 'भारत-भारती' में अतीत का गौरव गान, वर्तमान को रचनात्मक ऊर्जा एवं जागरण का संदेश देने हेतु किया है।" स्पष्ट कीजिए। || 15<br>{{gap}} |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}} || 'असाध्य वीणा' कविता का मूल स्रोत क्या है? कवि ने कविता-सृजन की प्रक्रिया को किन स्तरों पर प्रस्तुत किया है? || 15<br>{{gap}} |}<noinclude>{{dhr}} {{rh|{{border|maxwidth=7em|color=black|position=left|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}}|2|}}</noinclude> cyti6sivwwm1bkjvgm2eqfc5qhpctc0 675853 675849 2026-09-29T16:53:23Z सौरभ तिवारी 05 49 675853 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>&nbsp; {{c|'''SECTION A'''}} {|width=100% | '''Q1.'''<br>{{gap}} || '''निम्‍नलिखित काव्यांशों की लगभग 150 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए :''' || '''10x5=50'''<br>{{gap}} |} {|width=100% | {{gap}} || (a)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि ॥ दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहुणां, बहुरि न आँवौं हट्ट ॥</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>बेद पुरान बिहाइ सुपंथ कुमारग कोटि कुचाल चली है। काल कराल, नृपाल कृपालन राज समाज बड़ोई छली है ॥ बर्न-बिभाग न आस्रम धर्म, दुनी दुख-दोष-दरिद्र दली है। स्वारथ को परमारथ को कलि राम को नाम प्रताप बली है ॥</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>रससिंगार-मंजनु किए, कंजनु भंजनु दैन। अंजनु रंजनु हूँ बिना खंजनु गंजनु नैन ॥ तो पर वारौं उरबसी, सुनि, राधिके सुजान। तू मोहन कै उर बसी ह्‍वै उरबसी-समान ॥</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (d)<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>कौन हो तुम वसंत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन-तिमिर में चपला की रेख, तपन में शीतल मंद बयार। नखत की आशा-किरण समान, हृदय के कोमल कवि की कांत– कल्पना की लघु लहरी दिव्य, कह रही मानस-हलचल शांत।</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |- | &nbsp; || (e)<br>{{gap}}<br>{{gap}} || <poem>धिक‍् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक‍् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका।</poem> || {{gap}}<br>{{gap}}<br>10 |} {|width=100% | '''Q2.'''<br>{{gap}} || (a)<br>{{gap}} || भाव, भाषा एवं विचार की दृष्टि से निराला की 'कुकुरमुत्ता' कविता का मूल्यांकन कीजिए। || {{gap}}<br>20 |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}} || "गुप्त जी ने 'भारत-भारती' में अतीत का गौरव गान, वर्तमान को रचनात्मक ऊर्जा एवं जागरण का संदेश देने हेतु किया है।" स्पष्ट कीजिए। || {{gap}}<br>15 |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}} || 'असाध्य वीणा' कविता का मूल स्रोत क्या है? कवि ने कविता-सृजन की प्रक्रिया को किन स्तरों पर प्रस्तुत किया है? || {{gap}}<br>15 |}<noinclude>{{dhr}} {{rh|{{border|maxwidth=7em|color=black|position=left|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}}|2|}}</noinclude> qqdn07craliyyc7f6w8ijkqc9uciq1t पृष्ठ:QPCSM22 HINDI Literature-II.pdf/३ 250 175556 675850 555733 2026-09-29T15:50:45Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित */ 675850 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{|width=100% | '''Q3.'''<br>{{gap}} || (a)<br>{{gap}} || "सूरदास द्वारा भ्रमरगीत प्रसंग की योजना का मुख्य उद्देश्य निर्गुण पर सगुण की विजय दिखाना है।" इस कथन की युक्तिसंगत समीक्षा कीजिए। || 20<br>{{gap}} |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}} || "जायसी ने नागमती के वियोग-वर्णन द्वारा नारी की व्यथा-कथा को प्रस्तुत किया है।" इस कथन से आप कितने सहमत हैं, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। || 15<br>{{gap}} |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}} || "दिनकर ने 'कुरुक्षेत्र' में युधिष्ठिर और भीष्म के माध्यम से अपने ही मानसिक अंतर्द्वंद्वों को अभिव्यक्त किया है।" कथन का तर्कपूर्ण विवेचन कीजिए। || 15<br>{{gap}} |} {|width=100% | '''Q4.'''<br>{{gap}} || (a)<br>{{gap}} || कबीर-वाणी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कितनी प्रासंगिक है? उदाहरण सहित लिखिए। || 20<br>{{gap}} |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}} || 'ब्रह्मराक्षस' अस्तित्ववादी मान्यताओं और खंडित व्यक्तित्व का प्रतीक है। इस कथन के आलोक में 'ब्रह्मराक्षस' कविता की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए। || 15<br>{{gap}} |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}} || 'हरिजन गाथा' कविता के आधार पर नागार्जुन की जनवादी दृष्टि की मीमांसा कीजिए। || 15<br>{{gap}} |}<noinclude>{{dhr|12em}} {{rh|{{border|maxwidth=7em|color=black|position=left|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}}|3|}}</noinclude> 9twkjuebt43lkps5jm1tvxhwdemwhvn 675854 675850 2026-09-29T16:55:36Z सौरभ तिवारी 05 49 675854 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{|width=100% | '''Q3.'''<br>{{gap}} || (a)<br>{{gap}} || "सूरदास द्वारा भ्रमरगीत प्रसंग की योजना का मुख्य उद्देश्य निर्गुण पर सगुण की विजय दिखाना है।" इस कथन की युक्तिसंगत समीक्षा कीजिए। || {{gap}}<br>20 |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}} || "जायसी ने नागमती के वियोग-वर्णन द्वारा नारी की व्यथा-कथा को प्रस्तुत किया है।" इस कथन से आप कितने सहमत हैं, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। || {{gap}}<br>15 |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}} || "दिनकर ने 'कुरुक्षेत्र' में युधिष्ठिर और भीष्म के माध्यम से अपने ही मानसिक अंतर्द्वंद्वों को अभिव्यक्त किया है।" कथन का तर्कपूर्ण विवेचन कीजिए। || {{gap}}<br>15 |} {|width=100% | '''Q4.'''<br>{{gap}} || (a)<br>{{gap}} || कबीर-वाणी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कितनी प्रासंगिक है? उदाहरण सहित लिखिए। || {{gap}}<br>20 |- | &nbsp; || (b)<br>{{gap}} || 'ब्रह्मराक्षस' अस्तित्ववादी मान्यताओं और खंडित व्यक्तित्व का प्रतीक है। इस कथन के आलोक में 'ब्रह्मराक्षस' कविता की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए। || {{gap}}<br>15 |- | &nbsp; || (c)<br>{{gap}} || 'हरिजन गाथा' कविता के आधार पर नागार्जुन की जनवादी दृष्टि की मीमांसा कीजिए। || {{gap}}<br>15 |}<noinclude>{{dhr|12em}} {{rh|{{border|maxwidth=7em|color=black|position=left|padding=0.2px|'''CRNA-S-HND'''}}|3|}}</noinclude> 1uxx2s1azwsz6uhfuldvhb7gzkws9ix पृष्ठ:QPCSM22 HINDI Literature-II.pdf/६ 250 175559 675865 555736 2026-09-29T22:22:52Z AMAN KUMAR 6475 साँचा हटाया खाली पृष्ठ से 675865 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude><noinclude></noinclude> ogpxtilu3s7iwa9xvcxytyrl8uco8mg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१६९ 250 176843 675860 619793 2026-09-29T22:13:11Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean 675860 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>________________ प्रिय श्री पॉल, ११३. पत्र : एच० एल० पॉलको अगस्त ७, १९११ मैं आपकी संस्थाकी प्रगतिकी ओर उत्सुकता व दिलचस्पीसे देखता रहूँगा । कृपया ऐंजीको मेरी तरफ से बधाई दे दीजिए। आशा है, आप सब सानन्द होंगे । हृदयसे आपका, मो० क० गांधी गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (सी० डब्ल्यू० ४९०१ ) की फोटो- नकलसे । सौजन्य : डॉक्टर कुप्पन । ११४. पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको पू० भाई प्राणजीवन, श्रावण सुदी १३ [ अगस्त ७, १९११] आपका पत्र मिला है। आपने सोराबजीके विषयमें जो लिखा है, उससे मैंने ऐसी कोई धारणा नहीं बनाई कि आपकी राय उनके विलायत भेजे जानेके विरुद्ध है । हरिलालसे रंगून रहनेका आग्रह न कीजिएगा । उसे स्वतन्त्रतापूर्वक रहने देने में ही उसका भला है। वह हारकर स्वयं रंगून जाये अथवा यहाँ चला जाये, तो बात दूसरी है। इसके सिवा रंगून में उसकी गुजराती सुधरनेकी सम्भावना मुझे कम मालूम होती है । यदि वह अहमदाबादमें अकेला रह सके और परिश्रमपूर्वक अभ्यास करे, तो उसकी १. डर्बनकी मजिस्टेट अदालतमें भारतीय दुभाषिया और वकं । २. भारतीय शिक्षण संस्था, डर्बन । ३. श्री पॉलको पुत्रो; गांधीजीको इन्होंने अपना धर्म-पिता बना लिया था और फीनिक्स आश्रम में शिक्षा लेकर भारतीय समाजकी सेवा करनेका निश्चय किया था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २७७ और ३२० | ४. पत्रमें भारतीय तिथि तो दी गई है, लेकिन संवत् नहीं। फिर भी दो बातोंके उल्लेखसे ईसवी- सन्का पता चल जाता है। छठे अनुच्छेद में इंडियन नेशनल बिल्डसँके गुजराती अनुवादकी चर्चा है । यह अनुवाद इंडियन ओपिनियनके १९११ के अंकोंमें क्रमिक रूपसे प्रकाशित हुआ था । और फिर इन्हीं दिनोंकी बात है कि गांधीजी महाभारतमें वर्णित माया सरोवरके आख्यान (जिसे आर्नोल्डने अपनी पुस्तक इंडियन आइडिल्लमें 'द एनचेंटेड लेक' शीर्षकसे प्रस्तुत किया है ) से बहुत अभिभूत हो उठे थे; देखिए " पत्र: छगनलाल गांधीको ", पृष्ठ १२७-२८ । इससे ज्ञात होता है कि यह पत्र सन् १९११ में ही लिखा गया था । उस वर्षे श्रावण सुदी १३ को अगस्तकी ७ तारीख पड़ी थी। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> f508imz0que1xpl2pgifznq0kkbbcqw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१३४ 250 184081 675858 639946 2026-09-29T22:09:25Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean check 675858 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ १०० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय परिणाम सूचित किया है, वह सर्वोपरि है । ईश्वरपर भरोसा रखे बिना इतना महान संघर्ष लड़ सकना कदापि सम्भव नहीं था । हमारा सच्चा आधार तो केवल वही था । यदि हमने इस संघर्ष के द्वारा उसीपर अधिक निर्भर रहना सीख लिया हो, तो इतना काफी है, क्योंकि और सब बातें तो इसके पीछे-पीछे चली आयेंगी । [ गुजरातीसे ] इंडियन ओपिनियन, ३-६-१९११ ८३. संक्षिप्त रूप ' [ जून ६, १९११के बाद ] एन० एन० नॉट नोटेड (नोट नहीं किया) एन० नोटेड (नोट किया) आर० रिजेक्टेड (नामंजूर) पी० पेंडिंग (मुल्तवी) गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५२६ 'क') से । चि० मगनलाल, ८४. पत्र : मगनलाल गांधीको [ जून ९, १९११के पूर्व इसके साथ आनन्दलालका पत्र है; उसे देखना । पुरुषोत्तमदासको भी पढ़ाना । आनन्दलालको भाड़ेका पैसा देनेके सम्बन्धमें मैंने रेवाशंकरभाईको लिखा है। मैं तारीख ९ जून तक तो नहीं आ सकता । उस दिन श्री हॉस्केनकी समितिको भोज दिया जाना है। तारीख १० को निकलूं तो निकलूं। साथका पत्र' नायकको भेज देना । मुझे उसका पता मालूम नहीं है । मोहनदासके आशीर्वाद गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ५०८९) से । सौजन्य : राधाबेन चौधरी १. सरकार के साथ समझौता हो जानेके बाद ट्रान्सवाल तथा संवके अन्य प्रान्तोंमें प्रवेश चाहनेवाले लोगों के प्रार्थनापत्र आने शुरू हो गये। गांधीजीने अंग्रेजीके उपर्युक्त संक्षिप्त रूप इन्हीं प्रार्थनापत्रों के वर्गीकरण के लिए तैयार किये थे । २. पहला प्रार्थनापत्र डर्बनके श्री भगू भीखाके यहाँसे आया था, जिसपर जून, ५, १९११ की तारीख थी । ३. तिथिका अनुमान पत्रके दूसरे अनुच्छेदकी प्रथम पंक्ति से स्पष्ट है । ४. रेवाशंकर जगजीवन झवेरी; डॉ० प्राणजीवन मेहता के भाई । ५. यह उपलब्ध नहीं है । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 3ktqor4hrktmabxsvzv248vziy6lvai पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१७४ 250 184083 675861 639948 2026-09-29T22:14:43Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean 675861 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ १३८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय किये हैं उनके सम्बन्धमें तथा जो जायदादें सरकारी कागजोंमें उनके नामपर दर्ज हैं, परन्तु वास्तवमें जिन्हें वे इस समाजके सदस्योंके लिए धरोहरके रूपमें रखे हुए हैं, उनके सम्बन्धमें अगर जरूरत हुई तो कारावास भोगनेपर भी समाजकी सहायता करनेका जो उदारतापूर्ण वचन दिया है उसके लिए आभार प्रकट करती है। प्रस्तावक - श्री दादू (क्रूगर्सडॉर्प) ; समर्थक - • अहमद खाँ (रूडीपूर्ट) । 66 'स्वर्ण- कानून और सन् १९०८ कस्बा - कानून संशोधन अधिनियम (टाउनशिप्स अमेंडमेंट ऐक्ट) को लेकर भारतीय व्यापारियोंको उनकी जायदादों और कारोबारसे वंचित करनेका जो यत्न किया जा रहा है यह सभा अपनी पूरी शक्तिके साथ उसका प्रतिकार करने और आनेवाली मुहिममें कारावास तथा अन्य संकटोंको झेलने और उन्हें सहनेका निश्चय करती है । " प्रस्तावक -- - श्री इस्माइल आमद मुल्ला; समर्थक – श्री आमद मूसाजी; और अनुमोदक- श्री इ० एस० कुवाडिया । " यह सभा अध्यक्षको अधिकार देती है कि वे इन प्रस्तावोंकी नकलें भेजते हुए एक विनम्र आवेदनपत्र द्वारा सरकारसे अनुरोध करें कि वह इन उपर्युक्त कानूनों में इस तरह के परिवर्तन कर दे, जिससे भारतीय समाज अपने आपको आश्वस्त अनुभव कर सके और यह कि वह उनके वैध व्यवसायोंकी रक्षा करे । प्रस्तावक -- - श्री ए० एम० वाजा; समर्थक -- श्री ए० ए० करोडिया; और अनुमोदक - - श्री एच० माल तथा श्री एम० एस० नाना । गया। -- इस लड़ाईके लिए चन्दा एकत्र करनेका काम शुरू करनेका भी निश्चय किया [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, १९-८-१९११ १. इब्राहीम सालेजी कुवाडिया; जोहानिसबर्गके प्रसिद्ध व्यापारी और किसी समय हमीदिया इस्लामिया अंजुमनके कोषाध्यक्ष; सन् १९०९ और १९१०में ब्रिटिश भारतीय संघके कार्यवाहक अध्यक्ष ( खण्ड ९, पृष्ठ २५२ पा० टि० १; खण्ड १०, पृष्ठ २८६ पा० टि० २ ); सन् १९०८ और १९०९ में सत्याग्रहीके रूपमें कई बार जेल गये; जून १९०९ में भारतको जानेवाले प्रस्तावित भारतीय शिष्टमण्डलके सदस्य चुने गये; लेकिन बादमें शीघ्र ही गिरफ्तार कर लिये गये; देखिए खण्ड ९, पृष्ठ २५३ और २८८ तथा खण्ड ६ और ८ भी । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> bvjum0ila5jmdw5gvq8np137krd1yo0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१५४ 250 184084 675856 639949 2026-09-29T21:57:47Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean check 675856 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ ११८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय एक से अधिक पत्नियाँ हों तो प्रवेशाधिकार केवल एकको ही - पहली पत्नीको दिया जायेगा। शेष स्त्रियाँ वैध रूपसे पत्नियाँ नहीं मानी जा सकतीं। यदि न्यायाधीश- का यह निर्णय कायम रहता है और यदि प्रवासी अधिकारी उसपर अमल करने लगता है तो मुसलमान भाइयोंको बहुत असुविधाका सामना करना होगा। अभीतक तो जितनी भी पत्नियाँ हों उन सबके प्रवेशके सम्बन्धमें बाधा उपस्थित नहीं हुई, परन्तु अब बाधा उपस्थित होना सम्भव है । इस सम्बन्ध में हमीदिया इस्लामिया अंजुमन तथा ब्रिटिश भारतीय संघ शीघ्र ही आन्दोलन छेड़नेवाला है । हमें आशा है कि श्री आदमजीके सलाहकार अब बाई रसूलको डर्बन ले आकर मामलेमें पूरी सावधानीसे काम लेंगे । निकाह और तलाकके सम्बन्ध में प्रतिष्ठित मौल- वियों तथा दूसरे लोगोंके हलफनामे दाखिल करानेकी जरूरत है। और उसके साथ बाई रसूलका हलफनामा भी दाखिल करना होगा। यदि ऐसा किया गया तो मेरा विश्वास है कि न्यायालयको [ बाई रसूलके पक्षमें ] अपना निर्णय देना ही पड़ेगा । डर्बनके मामलेमें एक बार हुक्म हासिल हो जाये तो स्पष्ट है कि फिर इस महिलाके ट्रान्सवालमें प्रविष्ट होनेमें अड़चन पैदा हो ही नहीं सकती । [ गुजरातीसे ] इंडियन ओपिनियन, ८-७-१९११ १०२. पत्र : मगनलाल गांधीको चि० मगनलाल, आषाढ़ बदी १ [ जुलाई १२, १९११ ] चि० छगनलालका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ । जान पड़ता है कि उसे खूब पश्चात्ताप हुआ है । कभी-कभी थोरोका कोई वाक्य 'इंडियन ओपिनियन' में प्रकाशित करनेके लिए श्री वेस्टको उतार कर दे दिया करो। अब हमें छगनलालके तारका इन्तजार करना है। अभीतक उसका तार नहीं मिला; इससे मालूम होता है कि उसकी रवानगी के बारेमें फिर कोई खलल पैदा हो गया है। तुमने फीनिक्समें टॉल्स्टॉय- के बारेमें स्वप्न देखा था, उसके बारेमें लिखा गया तुम्हारा पत्र आज हाथ पड़ा । ऐसा लगता है कि उत्तरमें कुछ तुम्हें लिख भेजने के इरादेसे मैंने उसे उठा रखा होगा । स्वप्नोंको कोई भी महत्व नहीं देना चाहिए। स्वप्न हमारे मनकी तरंगोंकी प्रतिक्रिया भी हुआ करते हैं । इतना काफी है कि हम साधुताका ध्यान निरन्तर बनाये रखें। बापूके आशीर्वाद गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ५६३६) से। सौजन्य : राधाबेन चौधरी १. इस पत्र में श्री छगनलालके दक्षिण आफ्रिका आनेका उल्लेख है । वे वहाँ जुलाई २०, १९११ को पहुँचे थे । सन् १९११ में आषाढ़ बदी १, जुलाईकी १२ तारीखको पड़ी थी। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> dzjqkul990s90p2u8g8qi3nd20dgp5h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१६३ 250 184087 675859 639952 2026-09-29T22:12:00Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean check 675859 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ पत्र: छगनलाल गांधीको १२७ प्रवासी और पंजीयन कानूनोंके कारण हमपर थोपे गये दीर्घकालीन संघर्षके दौरान आपने हमारी जो सहायता की, वह स्वयंस्फूर्त थी, इसलिए उसका मूल्य और बढ़ गया है। आपने ऐन मौकेपर सत्याग्रहियोंको इस्तेमाल के लिए टॉल्स्टॉय फार्म देनेकी जो उदारता दिखाई थी, वह हमारे लिए अनमोल सहायता सिद्ध हुई। और हमारे गाढ़े समय में आपने व्यक्तिगत रूपसे हमारी जो मदद की है, उसका मूल्य तो चुकाया ही नहीं जा सकता । आपने ट्रान्सवाल यूरोपीय समिति के अवैतनिक मन्त्रीकी हैसियतसे जो कार्य किया है, उसके लिए भी हम आपके आभारी हैं । आपने इन और ऐसी ही अन्य कई कृपाओंसे भारतीय समाजको सदाके लिए अपना ऋणी बना लिया है । हम दुआ करते हैं कि इस सबके लिए भगवान् आपपर अनुकम्पा करें। अ० मु० काछलिया, अध्यक्ष मो० क० गांधी अवैतनिक मन्त्री ब्रिटिश भारतीय संघ [ अंग्रेजी से ] इंडियन ओपिनियन, ५-८-१९११ चि० छगनलाल, १०९. पत्र : छगनलाल गांधीको जोहानिसबर्ग श्रावण सुदी ७ [ अगस्त १, १९११ ] तुम्हारे पत्र से लगता है कि तुम फिर घबड़ाये हुए हो। इसका कोई कारण मैं नहीं देखता । चि० जमनादासको केप अथवा लन्दनकी मैट्रिककी परीक्षा देनी हो, तो दे सकता है। लेकिन परीक्षा देकर क्या करेगा, यह मेरी समझ में नहीं आता । परीक्षाकी तैयारी करते हुए उसके लिए जो कुछ पढ़ना पड़ेगा, उसमें समय लगाना व्यर्थ होगा; क्योंकि उसे तो बादमें भूलना ही है । इस बातका विचार करना चाहिए कि जमनादासको १. छगनलाल गांधी जुलाई महीने में अपने साथ जमनादासको दक्षिण आफ्रिका लाये थे; देखिए " पत्र : मगनलाल गांधीको", पृष्ठ १२३ । इससे प्रकट होता है कि यह पत्र सन् १९११ में लिखा गया। उस वर्षे श्रावण सुदी ७ को अगस्तकी पहली तारीख पड़ती थी। श्री छगनलाल गांधी भी - जिनके सौजन्यसे यह पत्र प्राप्त हुआ है - इस तारीख की पुष्टि करते हैं । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> gai3kbqdpa90946qlxkwh09exdjcah8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२११ 250 184088 675862 639953 2026-09-29T22:15:58Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean 675862 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ तीन पौंडी कर १६५ खो दी थी, उसे वह अब फिरसे प्राप्त कर सकता था । इस विधेयकको द्वितीय वाचनके लिए पेश करते हुए नेटालके प्रधानमन्त्रीने कहा था : यह विधेयक इसलिए लाया गया है कि जो भारतीय गिरमिटसे स्वतन्त्र होनेके बाद तीन पौंडी कर दे सकनेकी स्थितिमें न हो, वह दुबारा गिरमिटिया हो सके। ऐसे अवसर आ सकते हैं जब कोई भूतपूर्व गिरमिटिया भारतीय तीन पौंडी कर न चुका सके, और यह उचित ही होगा कि उसे दोबारा गिरमिटिया बननेकी छूट दी जाये । न केवल उसे दोबारा गिरमिटिया बननेका अधिकार दिया जा रहा है, बल्कि उसे वापस भारत जानेकी सुविधा भी प्राप्त हो जायेगी जिसे वह अपना पहला करार समाप्त होनेपर इस्तेमाल न करनेके कारण खो चुका था। अतः यहाँ यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि कानूनका मंशा यह था कि जो भारतीय दोबारा गिरमिटिया करार करे उसे कर नहीं देना पड़ेगा । किन्तु यह प्रलोभन पर्याप्त नहीं था। १९०९ के अन्तमें वागानोंके मालिक और ज्यादा भारतीय मजदूरोंकी माँग कर रहे थे, और भारत सरकारने गिरमिटियोंको नेटाल भेजना बन्द करनेकी धमकी दी थी। ऐसी हालत में क्या किया जाये ? विधान परिषद् में माननीय श्री बेन्सने कहा कि : तीन पौंडका अधिवास-शुल्क और साथ ही व्यक्ति कर भारतीयोंके लिए बहुत कड़ी शर्त है। यह सत्य है कि उपनिवेश छोड़कर जानेवाले भारतीयोंकी संख्या बाहरसे आनेवाले भारतीयोंकी अपेक्षा अधिक है। मेरी रायमें हमें श्रमिकोंका यह निष्क्रमण रोकना चाहिए। उपनिवेश सचिवने संशोधन विधेयक (अमेंडमेंट बिल) को द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत करते हुए कहा कि : स्वयं भारतीयोंकी ओरसे और मजिस्ट्रेटोंकी तरफसे भी, इस आशयके प्रार्थनापत्र प्राप्त हुए हैं कि ३ पौंडके परवानेका भुगतान कर सकना सम्भव नहीं है। सरकार अनुभव करती है कि यदि भारतीय स्त्रियाँ इस परवानेसे मुक्त कर दी जायें तो करका भुगतान सम्भव हो जायेगा, और इस कानूनका लक्ष्य वही करना है । भारतीय प्रवासी आयोग (इंडियन इमिग्रेशन कमीशन) ने मामलेकी जाँच की थी, और जो प्रस्ताव अब विचाराधीन है उसकी सिफारिश की थी। सर लिएझ हूलेटने विधेयकका समर्थन किया और कहा कि यह मंशा कभी नहीं था कि तीन पौंडी कर स्त्रियों और लड़कियोंपर लागू हो। लेकिन श्री कर्कमानके प्रस्तावपर एक संशोधन पास हो गया जिसके जरिए मजिस्ट्रेटोंको अपनी विवेक-बुद्धिसे निर्णय करके किसी भारतीय स्त्रीको परवाना-शुल्कसे छूट दे सकनेका अधिकार दे दिया गया। उसी विधेयकमें श्री क्लेटनने बकाया रकमके भुगतानसे सम्बन्धित एक और धारा जोड़नेका प्रस्ताव किया जिसे इस लेखके आरम्भमें उद्धृत किया गया है, और वह कानून के रूप में पास कर दिया गया । यह कानून जनवरी १९१० में पास हुआ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> ss742nkjmavah930o3swdo6nimf9wwk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२२३ 250 184089 675863 639954 2026-09-29T22:17:48Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean 675863 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ पत्र : रावजीभाई पटेलको १८७ आनन्दलाल अधिकसे-अधिक शनिवारको यहाँसे चल देंगे। वे एच० वर्ग और स्टैंडर्टन होते हुए जायेंगे। मैंने उन्हें सलाह दी है कि उनको अधिकसे अधिक पहली जनवरी तक वहाँ पहुँच ही जाना चाहिए। लगता है कि यहाँ उन्होंने अच्छा काम किया है। फार्म में वे एक दिनसे ज्यादा नहीं रुके । चन्दा जमा करनेका काम उनको निःसन्देह पसन्द है । आपका हृदयसे मो० क० गांधी तुमने साक्ष्यका बहुत ही सुन्दर विश्लेषण किया है । तुम्हारा उदाहरण मुझे हमेशा सुझाता रहता है कि सच्ची परख किताबी ज्ञानसे नहीं, बल्कि स्वाभाविक सूझबूझ और सामान्य सज्जनतासे आती है । कृपया ठक्कर से कहना कि मैं गुजराती खण्डके लिए दो छोटे-छोटे अग्रलेख या इसी तरहकी कुछ चीज भेजना चाहता हूँ और बुधवारको डाकसे रवाना करने की आशा रखता हूँ । गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (सी० डब्ल्यू ० ४४१५ ) की फोटो- नकलसे । सौजन्य : ए० एच० वेस्ट । १५८. पत्र : रावजीभाई पटेलको भाई श्री ५ रावजीभाई, मार्गशीर्ष सुदी ८ (नवम्बर २९, १९११) आपका पत्र मिला । उससे मैं यह समझा हूँ कि आप फीनिक्समें काम करना चाहते हैं । यह विचार अच्छा है। मैं आपको प्रोत्साहित करता रहूँगा । परन्तु आप निभा सकेंगे, इस सम्बन्ध में मुझे शक है । वहाँ रहकर : १. ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा । २. सूक्ष्म सत्यका पालन करना होगा । ३. ४. काम मुख्यतः शारीरिक अर्थात् कुदाली और फावड़ेका समझें । यदि अक्षर ज्ञान में वृद्धि करना हेतु हो तो उसे भूल जायें; उसमें अनायास या आवश्यकतावश वृद्धि हो, तो भले हो । ५. अक्षर ज्ञान बढ़ानेकी अपेक्षा चरित्र गठन करना हमारा कर्तव्य है यह बात मन में पक्के तौरपर जमा लेनी होगी । ६. ७. जाति-बिरादरी और कुटुम्ब परिवारके अन्यायका विरोध निर्भय होकर करते रहनेका निश्चय कर लेना होगा । गरीबी सच्चे अर्थ में अपनानी होगी । १. गांधीजीनी साधनाके लेखक रावजीभाई पटेलके अनुसार गांधीजीने यह पत्र १९११में लिखा था। इसकी ठीक तारीख स्वयं पत्रसे मालूम न हो सकी । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> daia7wj0mn8kyh42k0avu4ydpot1vzr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२२४ 250 184090 675864 639955 2026-09-29T22:18:42Z AMAN KUMAR 6475 Ocr clean 675864 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>________________ १८८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय यदि यह सब आपसे हो सके या ऐसा करनेकी आपकी इच्छा हो, तभी फीनिक्स आनेका विचार करें। यह समझ रखना चाहिए कि वहाँ जीवन दिन-प्रति-दिन कठिन होता जायेगा। यह धारणा बनानी चाहिए कि ऐसा होना सुखका विषय है । यदि आपका इरादा मार्च महीने में आ जानेका हो तो उक्त बातोंपर मनन करें । पत्र लिखते रहें । मोहनदासका यथायोग्य नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, से १९३९ में प्रकाशित गुजराती पुस्तक 'गांधीजीनी साधना' से । १५९. एशियाई आचार-विचारपर हमला पिछले सप्ताह हमने 'ट्रान्सवाल लीडर' में प्रकाशित एक अग्रलेखका पूरा पाठ उद्धृत किया था । इस लेखमें श्री भायात द्वारा बॉक्सबर्ग में एक दूकान खोली जानेकी घटनाको उस नगरपर किया गया एशियाई हमला बताया गया था । आजका 'लीडर' श्री कार्टराइटके जमानेका 'लीडर' नहीं है। जिस लेखका हम जिक्र कर रहे हैं, एशियाइयोंके प्रति उसके जैसी कटुतापूर्ण और अपमानकारी चीज मिलना मुश्किल है । इसके लेखककी रायमें- एशियाई व्यापारी अपनी मनहूस छाया डाल रहा है, और अपने रहन-सहनके आदिम तरीकों, जीवनकी साधारणतम सुविधाओंके प्रति पूर्ण उदासीनता, पूर्वदेशीय काइयाँपन और अपनी निम्न कोटिकी सभ्यताके कारण यूरोपीय दुकानदारोंका भविष्य खतरेमें डाल रहा है । एक दूसरी जगह लेखक प्राच्य सभ्यताको " बहुत ही निम्न स्तरकी " सभ्यता बताता है। आगे चलकर वह कहता है, जिनकी किसी बात का कोई ठिकाना ही नहीं ऐसे इन कुलियोंकी व्यापारी धूर्तता और सामाजिक अन्यायोंके खिलाफ यूरोपीय व्यापारी अपनी लड़ाई लम्बे अर्से तक जारी नहीं रख सकता । उक्त लेखकके अन्तिम शब्द ये हैं : हम चाहते है कि इन कुलियोंकी, जिन्होंने दक्षिण आफ्रिकी संघके कितने ही नगरोंमें सड़कोंके हर नुक्कड़पर अपना कारोबार जमा रखा है और जो अपने साथ ही एशिया के अजीब किस्म के रीति-रिवाज और वेश-भूषा ले आये हैं, अन्यायपूर्ण प्रतियोगितासे यूरोपीयोंकी रक्षा की जाये । लेखके जो उद्धरण हमने यहाँ दिये हैं उनसे पाठक यह जरूर समझ जायेंगे कि एशियाई आचार-विचारपर किस प्रकार आक्रमण किया गया है, किस प्रकार उनकी आदतों और रहन-सहनके तरीकोंकी निन्दा की गई है, और किस प्रकार यूरोपीय सभ्यताकी तुलना में एशियाई सभ्यताको निकृष्ट बताया गया है। नादान Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 1gnjv1wc7d8xp4ft5ijd8elcvszrf3m विषयसूची:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf 252 193567 675866 663760 2026-09-29T22:50:33Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675866 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=आँसू |Language=hi |Volume= |Author=[[लेखक:जयशंकर प्रसाद]] |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=राजीव प्रकाशक |Address=आजमगढ़ |Year=1925 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist 1to2="मुखपृष्ठ" 3to4="प्रकाशक" 5to33="भूमिका" 41="8" 34="1" /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:कविता]] [[श्रेणी:जयशंकर प्रसाद]] 53uxvauly8j51oohkl63klszfcscxu0 675867 675866 2026-09-29T22:52:04Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675867 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=आँसू |Language=hi |Volume= |Author=[[लेखक:जयशंकर प्रसाद]] 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675914 675911 2026-09-30T05:40:30Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675914 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=आँसू |Language=hi |Volume= |Author=विश्वनाथ लाल 'शैदा' |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=राजीव प्रकाशक |Address=आजमगढ़ |Year=1925 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=अ |Pages=<pagelist 1="मुखपृष्ठ" 2to4="प्रकाशक" 5to33="भूमिका" 41="8" 34="1" /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:कविता]] [[श्रेणी:विश्वनाथ लाल 'शैदा']] 9b1pcloivlwfi1sw8a95hrt2ig5357l पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/१२ 250 193586 675921 663697 2026-09-30T07:13:44Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{dhr|6}}</noinclude>{{c|{{x-larger|'''हिंदी नाटकों के उद्भव के पूर्व'''}}}} {{larger|संस्कृत-नाटकों की परंपरा}} हिंदी के उपन्यास, कहानी तथा निबंध संस्कृत-साहित्य की क्रमागत परपरा से बहुत कम प्राप्त कर सके हैं। किंतु काव्य और नाटक सीधे उसके विकास क्रम में पड़ते हैं । भारतेन्दु तथा उनका महल संस्कृत की नाट्य प्रणाली से बहुत कुछ प्रभावित रहा; संस्कृत नाटकों के काव्यात्मक वातावरण, रूमानियत तथा टेकनीक की छाप प्रसाद के नाटकों पर स्पष्ट देखी जा सकती है। प्रसाद के परवर्ती नाटककारो की कृतियों भी किन्हीं ग्रंथों में संस्कृत-नाटकों से अनुप्राणित हैं । ऐसी स्थिति में संस्कृत-नाटकों का संक्षिप्त विश्लेषण केवल श्रृंखला की कड़ियाँ मिलाने का औपचारिक कार्य नहीं माना जा सकता बल्कि समग्र नाट्य साहित्य के नैरन्तर्य तथा नवीन परिवर्तनों को समझने-समझाने में विशेष उपयोगी सिद्ध हो सकता है । संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनुमान और कल्पना के आधार पर ही कुछ कहा जा सकता है । नाट्यशास्त्र में उल्लिखित दैवी उत्पत्ति तर्क से पुष्ट न होने के कारण मान्य नहीं हो सकती । लेकिन 'न वेद व्यवहारोंयं संश्राव्यः शूद्रजातिषु । तस्थात्सृजापर वेदं पश्चमं सार्ववणिकम्' से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि नाटक अत्यन्त लोक-प्रिय साहित्य था। सभी वर्णों के स्त्री-पुरुष समान रूप से इसका रसास्वादन कर सकते थे। ऋग्वे‌‌द में पाए जाने वाले सूक्तों (जो संख्या में लगभग पंद्रह है) के संवाद-तत्व से नाटक की उत्पत्ति का सम्बन्ध मोड़ लेना कम भ्रमपूर्ण नहीं है। मैक्समूलर और<noinclude></noinclude> l6elxlivvz2unya3tx1eptoon4jih7l सदस्य:AMAN KUMAR/common.js 2 198150 675855 674743 2026-09-29T21:52:54Z AMAN KUMAR 6475 + 675855 javascript text/javascript mw.loader.load('//meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Indic-TechCom/Script/OCR4VE.js&action=raw&ctype=text/javascript'); mw.loader.load('//en.wikisource.org/w/index.php?title=User:Samwilson/PageCleanUp.js&action=raw&ctype=text/javascript'); l5zhw3p0mmz4fxu1jf45st61ltrffzn 675857 675855 2026-09-29T21:59:40Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675857 javascript text/javascript mw.loader.load('//en.wikisource.org/w/index.php?title=User:Samwilson/PageCleanUp.js&action=raw&ctype=text/javascript'); 688h3oz8kgki1e1y6iloiov0kxpu6co हिंदी साहित्य भाग २ प्रश्नपत्र संघ लोक सेवा आयोग २०२२ 0 198161 675851 2026-09-29T16:49:05Z सौरभ तिवारी 05 49 "{{header | title = हिंदी साहित्य भाग २ प्रश्नपत्र 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n190s1zbbvk8d8274kig8w6ej4wnryh पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२ 250 198163 675869 2026-09-29T22:56:50Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675869 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ प्रकाशक- . कृष्ण मोहन लाल अस्थाना 'राजी' अनन्तपूरा, आजमगढ़। मुद्र प्रभात ज<noinclude></noinclude> 4v21mhp9q82z784cb847rs29bawsnjn 675915 675869 2026-09-30T05:51:45Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; <poem>{{c|प्रकाशक— {{larger|'''कृष्ण मोहन लाल अस्थाना'''}} अनन्तपूरा, आजमगढ़।}} {{dhr|18em}} {{right|मुद्रक: – प्रभात प्रिंटिंग क आजमगढ़}} </poem><noinclude></noinclude> t80i8pu6vowhbua9yg80305tn84acy2 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३ 250 198164 675870 2026-09-29T22:57:16Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675870 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ आँसू ( व्याख्यात्मक आलोचना ) स्वर्गीय बाबू जयशंकरप्रसाद की सिद्ध रचना १" की समीक्षा स्कू" ननि धुर्य, "सु" लेखक:- विश्वनाथ लाल "शैदा" आजमगढ़<noinclude></noinclude> 55n5flrr1ajr6ubglnzwyhclykdgi8w पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/४ 250 198165 675871 2026-09-29T22:57:43Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675871 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ प्रकाशकः- कृष्ण मोहन लाल अष्ठाना "राजीव" अनन्तपूरा, आजमगढ़ प्रथमवार १००० नववर्ष प्रतिपदा सम्बत् २०११ मूल्य २शा) मुद्रका -- प्रभात प्रिंटिंग क आजमगढ़<noinclude></noinclude> b7itp2regg3i07lh3hhnx6av7nzd35v 675916 675871 2026-09-30T06:05:01Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>&nbsp; <poem>{{c|प्रकाशकः— कृष्ण मोहन लाल अष्ठाना "राजीव" '''अनन्तपूरा, आजमगढ़''' {{dhr|6em}} {{gap|12em}}'''प्रथमवार १०००''' {{gap|12em}}'''नववर्ष प्रतिपदा सम्बत् २०११''' {{gap|12em}}'''मूल्य २॥''')}} {{dhr|6em}} {{right|'''मुद्रक:–'''{{gap}} '''प्रभात प्रिंटिंग क'''{{gap}} '''आजमगढ़'''{{gap}}}} </poem><noinclude></noinclude> 28vbej27rrbw7o6tvixiu76iae3f29i पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/५ 250 198166 675872 2026-09-29T22:58:07Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675872 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ भूमिका ear बाबू जय शंकर प्रसाद "छायावाद युग्" के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनका प्रवन्ध-काव्य "कामायनी" सर्व- सम्मति से युग काव्य घोषित हो चुका है। "कामायनी" के प्रकाशन के दस वर्ष पूर्व "आंसू" का प्रथम संस्करण साहित्य सदन, चिरगांव, झांसी से प्रकाशित हुआ था किन्तु "आंसू” का द्वितीय संशोधित, परिवर्द्धित एवं नृनन-कम-बद्ध संस्करण "कामायनी" के दो वर्ष पूर्व १९३३ में छपा । सन् १९३३ में ही उनकी काव्य-पुस्तिका "जहर" भी प्रकाशित हुई। श्री किशोरी जाल गुप्त ने अपनी पुस्तक "प्रसाद का विकासात्मक अध्ययन" "" के पूर्वार्द्ध को "भावना युग" तथा उत्तरार्द्ध की वन युग" की उपज माना है। इसी “चिन्तन युग" में यनी" भी लिखी गई । यदि यह सत्य है कि कविता का किर्ष केवल वस्तु-जगत की परम्परा-जन्य-मान्यताओं एक कल्पित स्वर्ग की सृष्टि ही करना नहीं है वरन् वस्तु जगत की गोद में उस कल्पित स्वर्ग को जा बिठाना है, तो यह मानना अनिवार्य होगा कि कविता के लिए यथार्थ और आदर्श का मेल अनिवार्य है । "भावना और चिन" के मेल से ही कवि सत्य के अनुशीलन में समर्थ होता है और art सामने एक ऐसा जग उपस्थित कर देता है जहां पुरुष प्रकृति, प्रेम, सुन्दरता, जीवन, मृत्यु आदि का अनुगुण्य दर्शन हो जाता है । इस दृष्टि से "प्रसू" प्रसाद की श्रेष्ठतम रचना है। कामायनी में चितन की अधिकता है, उसमें हृदय पक्ष निर्बल है। कामायनी की भाषा में भी वह प्रवाह, वह धुर्य, वह प्रसाद नहीं, जो "धांसू" में। सच तो यों हैं कि सु" प्रसाद की सिद्ध रचना है। उसके वरण वरण चरण में उनके प्राण बसते हैं। उसके छंदों में उनकी श्रात्मा<noinclude></noinclude> hm6n1j1i5kb1f0rsjqf6tciz7s708bz पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/६ 250 198167 675873 2026-09-29T22:58:27Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675873 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( ख ) की कार है। उसकी वाक्सरण में उनके मनोभावों क प्रवाह है, तो उसकी छंद - विच्छित्ति में उनकी का विराम | संपूर्ण काव्य के पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे उसमें उनकी मनोव्यथा अंकित है । इस मनोव्यथा की छाप उनकी सभी कृतियों पर हैं किंतु वह इतनी सजग और कहीं नहीं जितनी 'आँसू' में । इस मनोव्यथा का कुछ रहस्य प्रसाद के कहानी- संग्रह 'छाया' से खुलता है। उसके समर्पण में है, जिसकी छाया मानस में उदय रहती है उसी की पवित्र स्मृति मैं कित" । छाया १६१२ की कृति है । उस समय प्रसाद की अवस्था २३ वर्ष को थी । धांसू की पतियों पर विहंगम दृष्टि डालने से स्पष्ट हो जाता है कि यह छाया "स्थूल' की थी। "" की प्राण प्रतिष्ठा एक दुर्बल मानव के "मोह" से होती है। 2 वह एक अस्थि चर्म युक्त रूपमाधुरी से संबन्ध रहता | आनन्द विभोर हो उसे अपनी भावना का भगवान बनाता है। मिथ्या जग में उसे सत्यं शिवं सुन्दरम की प्रतिमूर्ति मान बैठता है। कुछ कारण [a sent a रूप-माधुरी से विछोह होता है और वह वियोग वेदना से पीड़ित होकर क्रन्दन करने लगता है उस मधुपायी की भांति जिसका नशा टूट गया हो। रूप का मोह सब मोहों से प्रबल होता है बासनाओं की सृष्टि का रहस्य समझने वाले जानते हैं कि रूप का मोह प्रायः संभोग से प्रशामित नहीं होता है। वरन वियोग में वह याद की कसक बनकर अस्थायी को स्थायित्व प्रदान करने के पावन कृत्य में लगता है। धीरे धीरे मोह में परिवर्तित होता है। प्रेम की साधना "विवश परावृत में "वृत्ति" अगाती है। साधना स्वयं साम्य बनती 發<noinclude></noinclude> qj65fg99tmb1oiycbbad084h9ryi5g3 675917 675873 2026-09-30T06:32:10Z AMAN KUMAR 6475 नीचे की दो पंक्तियों के कारण शोधित घोषित नहीं कर रहा 675917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" />{{c|( ख )}}</noinclude>की भांकर है। उसकी वाक्‌सरणि में उनके मनोभावों का प्रवाह है, तो उसकी छंद - विच्छित्ति में उनकी वांछाओं का विराम | संपूर्ण काव्य के पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे उसमें उनकी मनोब्यथा अंकित है । इस मनोब्यथा की छाप उनकी सभी कृतियों पर हैं किंतु वह इतनी सजग और कहीं नहीं जितनी 'आँसू' में । इस मनोब्यथा का कुछ रहस्य प्रसाद के कहानी- संग्रह 'छाया' से खुलता है। उसके समर्पण में अकङि्त है, "जिसकी छाया मानस में उदय रहती है उसी की पवित्र स्मृति में अंकित"। छाया १६१२ की कृति है । उस समय प्रसाद की अवस्था २३ वर्ष को थी । आंसू की पंक्तियों पर विहंगम दृष्टि डालने से स्पष्ट हो जाता है कि यह छाया "स्थूल' की थी। "आंसू" की प्राण प्रतिष्ठा एक दुर्बल मानव के "मोह" से होती है। वह एक अस्थि चर्म युक्त रूपमाधुरी से संबन्ध दृढ़ता है। आनन्द विभोर हो उसे अपनी भावना का भगवान बनाता है। मिथ्या जग में उसे सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की प्रतिमूर्ति मान बैठता है। कुछ कारण बस उसका उस रूप-माधुरी से विछोह होता है और वह वियोग-वेदना से पीड़ित होकर क्रन्दन करने लगता है उस मधुपायी की भांति जिसका नशा टूट गया हो। रूप का मोह सब मोहों से प्रबल होता है बासनाओं की सृष्टि का रहस्य समझने वाले जानते हैं कि रूप का मोह प्रायः संभोग से प्रशामित नहीं होता है। वरन वियोग में वह याद की कसक बनकर अस्थायी को स्थायित्व प्रदान करने के पावन कृत्य में लगता है। धीरे धीरे मोह में परिवर्तित होता है। प्रेम की साधना "विवश अपरा में बुद्धि में "सद्‌वृत्ति" जगती है। साधना स्वयं साम्य बनती है<noinclude></noinclude> 18xhr12e5tyrfl0qz2aiysbn5sf3t11 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/७ 250 198168 675874 2026-09-29T22:58:43Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675874 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ यथा ( ग ) अपने उन आनन्द कणों को जिन्हें उसने अपनी प्रेयसि में द्रत किया था, प्रकृति के कण कण में बिखरा देखता हैं । प्रेम का निस्सीम रूप देख वह आनन्द मग्न हो जाता है । ★ के नव जाग्रत मनोभाव प्रेम, वेदना, और जीवन का समन्वय कीते हैं और उसे व्यक्तित्व की सार्थकता परमार्थ चिन्तन में दखाई पड़ती है। उसका अल्प भूमा की परिधि छूता है और स्व. भोगोura front विश्व प्रेमी आस्थाओं द्वारा कल्पना के सहारे उन तथ्यों से आंख मिचीनी करता है जो शरीरी को अशरीरी बनाकर प्रियता अप्रियता की परिधि से बाहर खींच लाते हैं। "सू" काव्य प्रेम की प्रक्रिया से पूर्ण रूपेण सजा हुआ है । तमजनित मोह किस प्रकार उत्सर्ग शोला सात्विकी प्रवृति के हाथों प्रेम में परिणत होता है उसकी संभृत काव्य मय झांकी आंसू में मिलती है। मानव रुचिकर से प्रीति करता है रुचि - कर से दूर भागता है। किन्तु जब उसे बोध हो जाता है कि प्रिय अप्रिय का द्वंद एक ही वस्तु के दो चित्र हैं तब वह प्रत्येक वस्तु में अपनी सौन्दर्य-बुद्धि स्थिर करता है । इस भांति उसे जगत की प्रत्येक वस्तु में चिर-सुन्दर की छाया दिखायी पड़ती है। विश्व वैचित्र्य का संपूर्ण रूप उसके प्रेम का विषय बनता हैं। इस प्रकार उसकी ऋषि चेतना अनुभव करती है कि संसार की सभी वस्तुयें एक आनन्द ही की विवर्त हैं। “आंसू ' काव्य इसी भूति का प्राकाम्य चित्रण हैं। इसी से वह '' छंद में लिखा भी गया है। प्रसाद के "श्रानन्दभाव" को समने के लिये कामायनी का निम्नांकित छंद सहायक होगा: - "चिति का स्वरूप यह नित्य जगत बत रूप बदलता है शत शत<noinclude></noinclude> 2tuht0yrpviabyf9ksx0kbihnlkeejq पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/८ 250 198169 675875 2026-09-29T22:59:25Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675875 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (घ) का विरह मिलन भय नित्य विश्व उल्लास पूर्ण आनन्द सतत प्रसाद के आनन्दवाद के करण आंसू की प्रत्येका हैं । "रसो वैस:" की पूत अनुभूतियों ने "सु" को सर्व बना दिया है। साहित्यिक रचना केवल वैयक्तिक लोन जान श्रथवा मनोरम आवों का ही चित्रण नहीं होतीं वरन वेम "साघारणी करण" के जौहर बसते हैं जिनके सहारे पाठक तथा श्रोता कवि के व्यक्ति से अपने मानव का तदात्म्य स्थापित करता है। भाव, विभाव अनुभाव तथा संचारी भाव की काव्यमय अभिव्यक्ति की सभा अपना व्यक्तित्व तभी स्थापित कर पाती है जब वह वासनायुक्त सभ्यों को रसास्वाद करा सके । "आसु" इस दृष्टि से भी एक सफल साहित्यिक रचना है। "" के "भाव पक्ष" पर मनन करने में उपर्युक्त सभी बातें सहायक होंगी । जैसा ऊपर लिखा गया है "आंसू विरह-काव्य है। स का धागा उस प्राण की कसक से बंधा है जिस प्राश के लिए "मानस का सब रस पीकर, लुढ़का दी तुमने प्याली" एक प्रदे जिंका है। प्रश्न समाधान तक पहुंचता है। संभोग-प्रशमित-मोह . तथा चिर जाग्रत चिर अतृप्त प्रेम का अन्तर आप ही प पर उतरता है। यह क्यों और कैसे होता है इसपर अनु व्याख्या करते समय प्रकाश डाला गया है। आज के युग में प्रसाद की कृतियों का बड़ा सम्मान दे विश्वविद्यालयों, कालेजों तथा स्कूलों में उनके साहित्य का प पाठन होता है जिसके कारण आज प्रसाद के काव्य पर प्र mater साहित्य प्राप्य है। ये आलोचनायें उनके समस्त काव्यों पर सामूहिक रूप से हुई हैं। केवल 'कामायनी'<noinclude></noinclude> lnyohy1z51u8tfxl3j4b4qkdstd2dtt पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/९ 250 198170 675876 2026-09-29T22:59:47Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675876 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ र (ङ) तन्त्र रूप से भी अनेक आलोचना पुस्तकें लिखी जा चुकी किन्तु धांसू पर अलग से कोई भी आलोचना ग्रन्थ अभी नहीं लिखा गया। प्रसाद के काव्य पर जो आलोचन हुई सीमै पर भी विचार विवेचन हुआ है। आंसू पर जो बोचना सामग्री अभी तक आई है उसमें निम्नांकित पांच का है:-- वर १-- शुक्ल जी ने अपने इतिहास में प्रसाद काव्य पर विचार करते हुये आंसू पर भी विचार किया है। शुक्ल जी ने जो कुछ भी इस सम्बन्ध में कहा है वह नितान्त भ्रामक है कारण कि उनके सारे निष्कर्ष आंसू के प्रथम संस्करण पर निकले हुए प्रतीत होते हैं। सत्य होते हुए भी अब उनकी संगति आंसू के वर्तमान संस्करणों से नहीं बैठती । शुक्ल जी का एक अभिमत यह है कि, "वेदना की कोई एक निर्दिष्ट भूमि न होने से सभी पुस्तक का कोई एक समन्वित प्रभाव नहीं निष्पन्न होता पर अलग अलग लेने पर उक्तियों के भीतर बड़ी ही रंजन कारिणी कल्पना, व्यञ्जक चित्रों का बड़ा अनूठा विन्यास, भावनाओं की अत्यन्त सुकुमार योजना मिलती है" । कहना न होगा कि वर्तमान संस्करण में निर्दिष्ट भूमि तथा समन्वित प्रभाव दोनों ही विद्यमान हैं। ३ २- नन्ददुलारे वाजपेयी ने "जयशंकर प्रसाद" नामक ग्रंथ के, "प्रारम्भिक काव्य विकास" शीर्षक अध्याय में परम सहा- नुभूति पूर्वक विचार किया है और कहा है कि आंसु मानवीय है, इसे कवि का आत्मस्वीकार भी कहा जा सकता है। इसका काव्य वैभेव स्वयं इतना उच्च हैं कि इसे रहस्यवाद के आवरण की आवश्यकता नहीं है । विजय शंकर मल्ल ने अपने एक free में इस मत का और भी तर्क पूर्ण प्रतिपादन किया है।<noinclude></noinclude> n184yl1x7cpb0geipx8nvv3xjj4o08i पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१० 250 198171 675877 2026-09-29T23:00:04Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675877 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( च ) ३--- रामरतन भटनागर का "afa प्रसाद, एक आंसू की दृष्टि से इस लिए महत्वपूर्ण है कि इसमें छन्दों की (प्रथम संस्करण के छंदानुक्रम से) एक व्याख्या की गई है, यद्यपि यह अत्यन्त संक्षिप्त है। का स एक भी , श्री - ४ --- विनय मोहन शर्मा का, "कवि प्रसाद, आंसू और "कृतियां भी आंसू की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इस ग्रंथ में आलोचक "सू" को पुस्तक के नामकरण में ही - महत्व देता प्रतीत होता है । शर्मा जी ने "प्रो" के अन्दों की व्याख्या संशोधित एवं परिवद्धित संस्करण के बन्दानुक्रम से कर दी है। यह आंसू को समझने का दूसरा प्रयास है। यह व्याख्या भटनागर जी की व्याख्या की अपेक्षा विस्तृत एवं पूर्ण है फिर भी दोनों ही ग्रन्थों में किसी नवीन afष्टिकोण की स्थापना नहीं हुई है और afe भावों को यथोचित समझते समाने का पूर्ण प्रयास भी नहीं किया गया है । ५- किशोरी लाल गुप्त का "प्रसाद का विकासात्मक अध्ययन", आंसू के आलोचनात्मक अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। शुक्ल जी ने आंसू के सम्बन्ध में जो कुछ कहा है, उसका तर्कपूर्ण उत्तर इस प्रथमें दिया गया है। लेखक ने पूर्व पर्व पश्चात पाठों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुये संशाधनों तथा छन्दमों के नवीन न्यास की विशेषताओं का उल्लेख भी • किया है और यह भी सिद्ध किया हैं कि स में एक निर्दिष्ट भाव भूमि है और उसका समन्वित प्रभाव पड़ता है। सभी बन्द मुक्त होते हुये भी अनुस्यूत हैं। लेखक ने आंसू को पूर्ण रूपे मानवीय एवं लौकिक माना है और यह भी लिखा है कि भां हृदय की प्यास का एक लबालब प्यासा है। उनके अनुसा<noinclude></noinclude> 4501lodsagjjm4u1omykqg4uapi0qdp पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/११ 250 198172 675878 2026-09-29T23:00:21Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675878 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (छ) "आंसू " में मानव की व्यक्तिगत वेदना तथा जगत वेदना ही वर्तमान है और उसमें अध्यात्मिक वेदना ढूढ़ने का हठ करना यथार्थ नहीं । इतना होते हुए भी ऐसे महत्व पूर्ण काव्य ग्रन्थ पर स्वतंत्र रूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक न थी । इस अभाव की पूर्ति के लिए प्रस्तुत पुस्तक लिखी गई । कारण विशेष से नेत्रों से जलपात होने का नाम अश्रु है । विषाद के आंसू, अमर्ष के आंसू, मान के श्रांस, इठ के धांसू आदि जिस प्रकार के भी आंसू हों, उनको सृष्टि साकी है। कारण कि इन सबके पीछे प्रेम को हो लीला है। ["अरी वीर वर्जत कहा रुदन करन दे मोहिं । सजल नयन बल ही सकल हिय दुख इरुये होंहि" "शेये हम यास में उस रंग का रोना कैसा । पानी हो हो के वहा खूने तमन्ना कैसा"] | आंसू की प्रकृति में प्रेम का उन्माद होने से ही 'करुण' को रस मानने पर आचार्य लोग विवश हुये । [ "क्या जख्मे मुहब्बत है कि राहत नहीं जाती श्रांखें तो हैं नम दिल की मुमत नहीं जातो" ] द्वन्दात्मक संसार में परस्पर विरोधी शक्तियों में अनुकूलता के औहर जगाने का श्रेय प्रेम को है । वही ममता की हानि उठाकर सुख दुख में मेल कराने में समर्थ होता है । अश्रु इसी प्रेम का विवर्त है। उसमें इस इन्द्र को ढक कर ऐक्य स्थापित करने की शक्ति है, तभी तो आंसू वर्षा से सिंच कर दोनों ही कूल हरा हो कि कल्पना सार्थक बनती है । इस दृष्टि से आंसू का बड़ा महत्व है | यदि द्वन्द्वात्मक विश्व में व्यवस्थापित स्वर, ताल मय ऐक्य की सृष्टि एक रहस्य है तो आंसू की सृष्टि भी कुछ कम रहस्यमय नहीं है। मिलन वियोग के द्वितप्रय भाव की प्रत्येक अवस्थिति पर अश्रु केवल श्रानन्द की ही सृष्टि करता है। वियोग सचमुच वियोग नहीं बल्कि उसका प्रतिभास<noinclude></noinclude> rcey2sm7nijkpxbeyxw5sh6lbepdzox 675918 675878 2026-09-30T06:47:18Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(छ)}}</noinclude>"आंसू " में मानव की ब्यक्तिगत वेदना तथा जगत वेदना ही वर्तमान है और उसमें अध्यात्मिक वेदना ढूंढ़ने का हठ करना यथार्थ नहीं। इतना होते हुए भी आंसू ऐसे महत्व पूर्ण काव्य ग्रन्थ पर स्वतंत्र रूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक न थी। इस अभाव की पूर्ति के लिए प्रस्तुत पुस्तक लिखी गई। कारण विशेष से नेत्रों से जलपात होने का नाम अश्रु है। विषाद के आंसू, अमर्ष के आंसू, मान के श्रांस, इठ के धांसू आदि जिस प्रकार के भी आंसू हों, उसको सृष्टि सात्वको है। कारण कि इन सबके पीछे प्रेम को हो लीला है। ["अरी वीर वर्जत कहा रुदन करन दे मोहिं। सजल नयन बल ही सकल हिय दुख हरुये होंहि" "रोये हम यास में उस रंग का रोना कैसा। पानी हो हो के बहा खूने तमन्ना कैसा"] | आंसू की प्रकृति में प्रेम का उन्माद होने से ही 'करुण' को रस मानने पर आचार्य लोग विवश हुये। [ "क्या जख्मे मुहब्बत है कि राहत नहीं जाती आंखे तो हैं नम दिल की मुमर्रत नहीं जातो" ] द्वन्दात्मक संसार में परस्पर विरोधी शक्तियों में अनुकूलता के जौहर जगाने का श्रेय प्रेम को है। वही ममता की हानि उठाकर सुख दुख में मेल कराने में समर्थ होता है। अश्रु इसी प्रेम का विवर्त है। उसमें इस द्वन्द को ढक कर ऐक्य स्थापित करने की शक्ति है, तभी तो आंसू वर्षा से सिंच कर दोनों ही कूल हरा हो कि कल्पना सार्थक बनती है। इस दृष्टि से आंसू का बड़ा महत्व है | यदि द्वन्द्वात्मक विश्व में व्यवस्थापित स्वर, ताल मय ऐक्य की सृष्टि एक रहस्य है तो आंसू की सृष्टि भी कुछ कम रहस्यमय नहीं है। मिलन वियोग के द्वितप्रय भाव की प्रत्येक अवस्थिति पर अश्रु केवल श्रानन्द की ही सृष्टि करता है। वियोग सचमुच वियोग नहीं वल्कि उसका प्रतिभास<noinclude></noinclude> 1ptl7y8xxw5z5wx3oka8vvkab6istkc 675919 675918 2026-09-30T06:47:50Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 675919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|(छ)}}</noinclude>'आंसू" में मानव की ब्यक्तिगत वेदना तथा जगत वेदना ही वर्तमान है और उसमें अध्यात्मिक वेदना ढूंढ़ने का हठ करना यथार्थ नहीं। इतना होते हुए भी आंसू ऐसे महत्व पूर्ण काव्य ग्रन्थ पर स्वतंत्र रूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक न थी। इस अभाव की पूर्ति के लिए प्रस्तुत पुस्तक लिखी गई। कारण विशेष से नेत्रों से जलपात होने का नाम अश्रु है। विषाद के आंसू, अमर्ष के आंसू, मान के श्रांस, इठ के धांसू आदि जिस प्रकार के भी आंसू हों, उसको सृष्टि सात्वको है। कारण कि इन सबके पीछे प्रेम को हो लीला है। ["अरी वीर वर्जत कहा रुदन करन दे मोहिं। सजल नयन बल ही सकल हिय दुख हरुये होंहि" "रोये हम यास में उस रंग का रोना कैसा। पानी हो हो के बहा खूने तमन्ना कैसा"] | आंसू की प्रकृति में प्रेम का उन्माद होने से ही 'करुण' को रस मानने पर आचार्य लोग विवश हुये। [ "क्या जख्मे मुहब्बत है कि राहत नहीं जाती आंखे तो हैं नम दिल की मुमर्रत नहीं जातो" ] द्वन्दात्मक संसार में परस्पर विरोधी शक्तियों में अनुकूलता के जौहर जगाने का श्रेय प्रेम को है। वही ममता की हानि उठाकर सुख दुख में मेल कराने में समर्थ होता है। अश्रु इसी प्रेम का विवर्त है। उसमें इस द्वन्द को ढक कर ऐक्य स्थापित करने की शक्ति है, तभी तो आंसू वर्षा से सिंच कर दोनों ही कूल हरा हो कि कल्पना सार्थक बनती है। इस दृष्टि से आंसू का बड़ा महत्व है | यदि द्वन्द्वात्मक विश्व में व्यवस्थापित स्वर, ताल मय ऐक्य की सृष्टि एक रहस्य है तो आंसू की सृष्टि भी कुछ कम रहस्यमय नहीं है। मिलन वियोग के द्वितप्रय भाव की प्रत्येक अवस्थिति पर अश्रु केवल श्रानन्द की ही सृष्टि करता है। वियोग सचमुच वियोग नहीं वल्कि उसका प्रतिभास<noinclude></noinclude> nevqqex4pzkt232696701mshay5zj23 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१२ 250 198173 675879 2026-09-29T23:00:37Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675879 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( अ ) है। वियोग केवल कौतुक कार के विजन इच्छा की सृष्टि है। "earer में दम भरता हूँ तेरी घाशनाई का निहायत गम है इस कतरे को दरिया की जुदाई का पर मनन करने वाले जानते हैं कि बुलबुला समुद्र की गोद में है फिर वह दरिया से वियुक्त कैसे हुआ। प्रेमी प्रेमिका का इन्द्र भी इसी कौतुक की छाया है। रवीन्द्र बाबू के शब्दों में प्रेमी स्वयं प्रेमिका की छाया है। "रम्याणि वीक्ष्य" की व्याख्या आगे की गई है और वहीं यह बताया गया है कि अभावात्मक दुख में भावात्मक सुख किस प्रकार विराजमान रहता है । इस दृष्टि- कोण से यह ध्रुव है कि अश्रु के पीछे आनन्द भाव ही कौतुक करता है। का प्रेमियों की दुनियां में एक विशेष स्थान सर्वदा से रहा है । काल के किसी अवस्थान पर विश्व साहित्य आंसू की विभूतियों से रिक्त नहीं। सामान्यतः वियोग के वर्णनों में सात्विक अनुभाव के रूप में महण किया गया है किन्तु सुपर स्वतन्त्र रूप से कोई पुस्तक कहीं लिखी गई है इसका पता ज्ञात साहित्य के इतिहास में नहीं है। प्रसाद का आंसू काव्य अपने ढंग का अनूठा ग्रन्थ है । मर्मज्ञों का कहना है कि लक्षित कलाओं में काव्य कता श्रेष्ठ है और काव्य कला में नाट्य कला | प्रसाद एक सफल नाटककार थे, यह ऊपर लिखा चुका है। यदि आप ांसू काव्य को सावधानी से पढ़ेंगे तो आपको अनुभव होगा कि आंसू काव्य में "नाटकान्तम कवि- त्वम्" की छाप है । गीति और प्रबन्ध के सरस मेल ने उसे विश्व का अनुपम काव्य बना दिया है। स्मृति के स्फुरण के साथ किस प्रकार कवि अतीत के दर्शन करता कराता है और साथ ही किस प्रकार उज्वल भविष्य की कल्पना करता इसका अनुभव पाठक को कवि के साथ साधारणीकरण करने<noinclude></noinclude> 024dgxx6stie6ng2uhdyx7ubq6tzevu पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१३ 250 198174 675880 2026-09-29T23:00:59Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675880 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ { #6. ) की शक्ति देता है। "स" काव्य नाट्य काव्य की मान्यताओं 'earn कथन है। वीन्द्रनाथ ठाकुर ने कचदेवयानी शीर्षक कविता में जिस कक्षा का प्रयोग कथोपकथन से किया है वहीं कला यांस काव्य के वन में सफलता से प्रयुक्त हुई है। आंसू की पंक्तियों पर विचार करते हुये आगे इस ओर संकेत किया गया है। आंसू उस युग का प्रतिनिधि काव्य है जिसे हम दहते हैं। यदि यह कहा जाय कि आंसू से ही छायावाद का प्रादुर्भाव हुआ तो अयथार्थं न होगा । इलाचन्द जोशी ने तो मुक्त करठ से घोषित किया कि आंसू की पक्तियों ने हिन्दी जगत को सर्व प्रथम उस वेदना बाद की मादकता से विभोर किया जिससे बाद का सारा छायावादी युग मतवाला हो उठा। आलोचकों का मत है कि धांसू के प्रकाशन ने छायावादी विचार धारा को स्थायित्व तथा मान्यता प्रदान कराया। मैं इस दृष्टिकोण से सहमत हूँ । स्वयं पंत ने 'प्रसाद को ही छायावाद का जनक माना है । इस सम्बन्ध में छायावाद के नाम करण पर विचार करने का मोह मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। छायावाद की मीमांसा करने वालों का कहना है कि छायावादी विचार धारा हिन्दी साहित्य में प्रसाद के अवतरण के कुछ पहले ही से आ गई थी। मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं। छायावाद का साहित्य मेरी थांखों के सामने पनपा और मुरकाया । पल्लव तथा 'आस' के प्रकाशन के पूर्व हिन्दी साहित्य में छायावाद जैसी कोई वस्तु नहीं थी । यदि उसके तत्व कहीं विद्यमान भी थे तो उनका नाम करण नहीं हुआ था। मुझे भली भांति याद है कि सन २० और २५ के बीच कुछ कवि हिन्दी साहित्य में ऐसे आये जिनको समय के लब प्रतिष्ठ कवियों तथा साहित्य<noinclude></noinclude> ruf2luolvr5z72x22zpj8gonlr2ko4w पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१४ 250 198175 675881 2026-09-29T23:01:13Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675881 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( त्र ) सेवियों ने शंका को दृष्टि से देखना प्रारम्भ किया। राम नरेश त्रिपाठी ने हिन्दी कविता कौमुदो द्वितीय भाग को भूमिका में इस दृष्णि कोण को स्पष्ट प्रकट किया और जिया, " तीसरी श्रेणी के कवि हिन्दी साहित्य में ऐसे आ रहे हैं जैसे वैष्णवों की बस्ती में कोई मंत्र आकर बस जाय । यद्यपि dema की दृष्टि में as पर उन्द्र और विवार दोन प्रतीत होगा पर वास्तव में वह वैसा नहीं होता। उसके भी आचार विचार नियम बद्ध होते हैं-इम इन नवागन्तुक कवियों का स्वागत करते हैं। इसमें से निराला और पन्त को कवितायें कविता कौमुदी में दी गई हैं। यद्यपि इस प्रकार को कवितायें हिन्दी में पहले पहल बाबू जयशंकर प्रसाद ने प्रारम्भ की थी। पर वे केवल मार्गदर्शक बने रहे। आशा है हिन्दी कविता कानन में यह विदेशी फूलों से सजी क्यारी भी अपनी शोभा बढ़ावेगी ।" उस युग के सरस्वती के पन्ने साक्षी हैं कि उस समय के साहित्य सेवियों ने हमारे इन नवागन्तुक कवियों का समादर नहीं किया। उन्हें इन नये कवियों की कविता में अस्पष्ट भात्र व्यञ्जना, छायाकलुषित भाषा तथा दायापरि विचार धारा मिली। उन्हें ऐसा लगा जैसे ये नये कवि अपनी प्रेरणा विदेशी साहित्य से ग्रहण कर रहे हो। इसी लिए उन्होंने वक्रोक्ति में इस नवीन काव्यधारा को छायावादी काव्यधारा का नाम दिया। किन्तु नवीनता को तो पुरातन के व्यंग सा अनुप्राणित करते आये हैं, हमारे नये कवियों ने अपने पूर्वजों के इस व्यंग को बरदान रूप में शिरोधार्य किया और छायावाद को एक नया अर्थ दे दिया। जिन लोगों को डा० सत्यप्रकाश के प्रतिविम्ब नामक ग्रन्थ के पहने का अवसर मिला होगा वे समझ सकते हैं कि हमारे कवियों ने छायावाद की निवृत्त में क्या क्या जौहर जगाये और बाद के अन्तर्गत विम्या<noinclude></noinclude> pom5wvzlpx9dojfk66y8y3v73tnhbaq पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१५ 250 198176 675882 2026-09-29T23:01:48Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675882 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (ट) ant fear नये वाद का परिचय दिया । पन्त की वीणा की वह भूमिका जो छपने पर भी जनता के सामने न आ सकी, यदि आज प्राप्य होती तो उपर्युक्त सभी बातों पर प्रकाश पड़ता । यह एक स्वतन्त्र इतिहास है जिस पर पर्दा पड़ चुका है और किन्चित अब साहित्य जगत को उसका स्मरण भी नहीं है। छायावाद की पहली विजय तब हुई जब महादेवी वर्मा के नीहार की भूमिका हरिऔध ने लिखी । जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है प्रेमिका स्वयं प्रेमी की छाया है. इस औपनिषधिक सत्य को सर्व प्रथम साहित्य क्षेत्र में रबि बाबू ने अपनी पुस्तक 'साधना' में स्थान दिया। हमारे नये कवियों ने इसी दृष्टिकोण को अपनाकर 'छायावादी" साहित्य की सर्जना की। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारे नये कवियों ने सौन्दर्य तथा प्रेम के कलगान की प्रेरणा बंगला साहित्य से ग्रहण की। यह भी सत्य है कि कुछ के मनन के पीछे अंग्रेजी फारसी उर्दू साहित्य की छाया भी है, किन्तु यह कहना कि छायावादी साहित्य केवल विदेशी अनुकरण है, भ्रमपूर्ण हैं। सूर तुलसी कवीर के बाद हिन्दी साहित्य में कुछ भी ऐसा नहीं जिसे हम विश्व साहित्य की निधि बता सकें । प्रियप्रवास तथा साकेत में भी वह क्षमता नहीं । किन्तु छाया- वादी युग के निराला, पन्त, महादेवी की कविता विश्व साहित्य में अपना स्थान रखती है ऐसा कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं । प्रसाद के आंसू और "कामायनी" तो विश्व साहित्य की मूल्य निधि हैं और हम केवल इन दो ग्रंथों को लेकर विश्व की किसी अन्य भाषा के काव्य साहित्य से टक्कर ले सकते हैं। मनन करने वालों से छिपा नहीं कि छायावादी साहित्य की अन्तिम परिणति औपनिषधिक विचार धारा से जा मिली। कहना न होगा कि आज तक औपनिपचिक विचार धारा की गहराई विश्व में और कहीं नहीं मिलती ।<noinclude></noinclude> i1zb5gkv8jy6t9xs0o959zbfj4yu3cp पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१६ 250 198177 675883 2026-09-29T23:02:09Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( उ ).. प्रसाद का नन्द बाद, निराला का अस बाद, पंत की आत्मरति तथा महादेवी का सर्वात्मवाद, त्यावादी साहित्य को स्थायित्व तथा अमरत्व देने में समर्थ हैं ऐसा मेरा विश्वास. छायावाद दर्शन की दुनियां में एक विशेष स्थान रखता है। छाया का दूसरा नाम माया है तभी तो कवीर ने गाया छाया माया एक सम विरला जाने कोय । गता के पीछे फिरे, ठाड़े सम्मुख हो । छन्दोग्योपनिषद में इंद्रविरोचन और प्रजापति की आख्यायिका का प्रारम्भ जिस प्रश्न से होता है वह यों है:-- 'भगवन जो जल में सब ओर प्रतीत होता है और जो वर्पण में दिखाई देता है उनमें आत्मा कौन है ।" यही प्रश्न डा० सत्य प्रकाश के 'प्रतिविम्ब' में मुखर हो उठा है "कर में एक सुकर लेकर के, करलो अपना ही दर्शन । चानन के प्रतिनियों में तुम छिप जाओ हे चंचल मन" । प्रश्न का समाधान उसी आख्यायिका में यों हुआ है-इन्द्र यह शरीर मरणशील दी है. यह मृत्यु से है, यह इस अमृत अशरीरी आत्मा का अधिष्ठान है। सारीर आत्मा विश्चय ही प्रिय प्रिय से मस्त है। सशरीर रहते हुए इसके प्रिय अप्रिय का नाश नहीं होता, अशरीरी होने पर इसे प्रिय अप्रिय स्पर्श नहीं करते । योगिक क्रियाओं द्वारा मानव किस प्रकार इंद्रियातीत होता है। इसका दिदर्शन पातञ्जल योग दर्शन में करें। पूरी व्याख्या इस प्रसंग में सम्भव नहीं, आंसू की व्याख्या करते समय योग दर्शन के मोटे मोटे सिद्धांतों की ओर संकेत किया गया है । माया. प्रतिविम्ब ईश्वर, 'छायेव यस्य भुवनानि दुर्गा' पर मनन करने बाले जानते हैं कि माया भगवान के साथ छाया के समान रहती हुई सृष्टि स्थिति और संहार करती रहती है। उपनिषदों में बताया गया है कि सब पदार्थों को बीज रूप प्राण ही उत्पन्न<noinclude></noinclude> mqebbcbc0gk4gshap3qzjulak1hl7in पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१७ 250 198178 675884 2026-09-29T23:02:25Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (ढ) दृष्टि में ब्रह्म का प्रतिभास विश्व है। वह सममल है लीलामय भगवान अपनी गुणमयी माया द्वारा अपने को छिपाये हुए है। अतएव वह माया को आवरण मानता है। मायाविनी माया सृष्टि की अनन्त श्रृंखला का विस्तार करती हुई ब्रह्मज्योति को इस प्रकार आच्छादित करती है कि सृष्टि में तिरोहित हो जाता है। किन्तु छायावादी विश्वकब्धि के साथ उसकी भित्ति में ब्रह्मोपलब्धि पाता है और इसप्रकार जगन्माया परमसत्ता की छाया मूर्ति बनी उसी की धनन्त छटा से उद्भासित होकर उसी में निरंतर तिरोहित होती दिखाई पड़ती है। अतएव उसकी दृष्टि में जगन्माया गुणमयीमाया का स्वरूप सत्य प्रतीत होता है और उसी के आधार पर चलकर अथवा उसी को सद कुछ समझ कर अपनी साधना चलाता है और अपनी साधना से गुणमयी माया में मोहमयी माया, योगमाया, की आस्था जगाकर भक्ति साधना जगाता है। व्याख्या करते समय आगे इस प्रकरण पर पुनः प्रकाश डाका जावेगा । मेरी धारणा है कि "छायावादी युग" की कवितायें विशेषतः उपयुक्त विचार धारा से प्रभावित हैं। "श्रांसू" काव्य तो उपर्युक्त विचार धारा से पूर्णतः श्रीप्रीत है । मेरे कुछ मित्र कहा करते हैं कि काव्य को दर्शन से क्या करना ? मैं उनसे केवल यही कहता हूं कि आप यदि दर्शन और फिलासफी में भेr नहीं समझते तो थाप का सोचना यथार्थ है । किन्तु पाश्चात्य 'फिलासफी' शब्द सत्य की खोज ज्ञान का प्रेम मात्र व्यञ्जित करता है। उसमें विद्या बुद्धि का विलास तर्क वितर्क की लीला है। किन्तु दर्शन तो "इन्द्रिया तीय अतिमानसिक उपaब्धि" है। दर्शन उन तथ्यों क<noinclude></noinclude> 7rvp1z3dn4qozhk2o6otu1k17kfd7d3 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१८ 250 198179 675885 2026-09-29T23:02:39Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( प ) समाहार करता है जिनका शाश्वत प्रबुद्ध ऋऋषिचेतन ने साक्षात्कार किया। किशोरी लाल जी ने अपनी पुस्तक "प्रसाद का विकासात्मक अध्ययन" में लिखा है "प्रसाद जी भारतीय साहित्य को भारतीय दर्शन से अनुमति मानते थे । दर्शन के रस को साहित्य के रस का समानान्तर मानते थे ।" मेरा भी दृष्टिकोण यही है । मेरा निश्चय अटल है कि प्रत्येक देश के साहित्य पर उस देश को संस्कृति, सभ्यता, दर्शन यादि की छाप होती है और होनी चाहिये । जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है "छायावादी साहित्य" का नाम करण वक्रोक्ति में किया गया किन्तु नये साहित्य के प्रवर्तकों ने इस नव उपाधि को नम्रता पूर्वक अपनाया। प्रसाद जी ने स्वयं छायावाद को समझाते हुये बताया कि कविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश विदेश की किसी सुन्दरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूति से नयी अभिव्यक्ति होने लगी तब हिन्दी मैं उसे छायावाद कहने लगे। वाह्य उपाधि से हटकर अन्तर हेतु की ओर कविकर्म प्रेरित हुआ। अभिव्यक्ति का यह निराला ढंग अपना स्वतंत्र लावण्य रखता है। इस लावण्य को संस्कृत मैं "छाया" और "चिछिन्ति” के द्वारा कुछ लोगों ने विरूपित किया है । कवि की वाणी में यह प्रतीयमान छाया युवती की लज्जा ! भूपा की तरह होती है। यह यौवन के भीतर रमणी सुलभ श्री की बहन ही है ।... वाह्य की प्रवृति आंतर की ओर चल पड़ी” प्रसाद की इस व्याख्या से पता चलता है। कि छायावादी साहित्य की आधार शिला "वेदना" है जिसपर afa अंतर में प्रतिबिम्बित भागोन्द्वास की इमारत खड़ी करता है। 'छाया' का एक अर्थ सुन्दरता भी है। PHO<noinclude></noinclude> gb3bzl6gmvy2uotf1o2sab9s3059rxr पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/१९ 250 198180 675886 2026-09-29T23:02:53Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675886 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (a) रम्याणिवक्ष्य" में कविगुरु कालिदास ने बताया है कि यह जननान्तर से चला आया स्थिर मात्र है जी सुन्दर वस्तुओ की उपस्थिति से चेतना में सजा होकर चिर-सुन्दर की प्राप्ति से होने वाली अानन्दानुभूति के लिये भों का विकल कर देव है । वस्तु को उपस्थिति बेतना में जिस स्मृति की कारित करती है वह आनन्द स्मृति होने से तो सुखद हैं किन्तु अब उसका सम्बन्ध आउन्द की आधार वस्तु से होता है तो उस में दुःख की छाया भी आ जाती है ।" दुःख की यह "छाया वेदना है। इसी से मैं कहा करता हूँ कि सौन्दर्य के माध्यम से विर-सौन्दर्य की प्राप्ति की साधना हो छायावादी कविता का प्राण है। कला के माध्यम से भाव की सिद्धि को भी मैं छायावाद का मानता हूँ | के प्रभाव जिसे "होम सिक्लेस, कहते हैं वही छायावादी कविता की वेदना है। वेदना की टीस, अभाव का अनुभव ही छायावादी काव्यधारा को उसके पूर्णवर्ती काव्य से विज़न करता है । छायावादी कवि के कवि कीट्स की भांति "Ever let the fancy roam for pleasure is never at home" कहता, हुआ इस संसार से परे एक ऐसा संवार बताना चाहता है 'जहां के हंसते विहंग लजाम, मृत्युद्धाया का सुन के नाम " किन्तु उनके पूर्णत्व की खोज कल्पना के विलास तक ही सीमित रहती है। यहां भी वह 'छाया' ही छू पाना है। सत्य उस से कल्पना में आंख मिचौनी होती है। किन्तु सत्य उसकी अनुभूति में सजग होकर उसमें कवि चेतना नहीं जगा पाता अपूर्णत्व तथा अभाव का यह अनुभव किसी विपय तक सीमि नहीं होता, कभी वह विर सुन्दर की खोज करता है तो कभ अमरत्व का पीछा करता है। कभी अतीत के पुनर्दर्श करना चाहता है तो कभी कल्पित उज्ज्वल अविष्य के fa<noinclude></noinclude> dxcacubpfdmvpkqq6v3g1ezmgol3ykb पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२० 250 198181 675887 2026-09-29T23:03:06Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( अ ) होता है। उसमें प्रत्येक दशा में एक चिकलता होती है एक उद्विग्नता होती है जिसमें उसकी आत्मा की अतृप्ति उपरंजित होती है। छायावाद की प्रारंभिक अवस्थाओं में कुछ लेखकों ने भ्रमवश छायावाद और रहस्यवाद में विभिन्नता स्थापित न कर पाने के नाते छायावाद और रहस्यवाद को एक मान लिया। इस भ्रम का कारण भी स्वयं छायावाद के प्रवर्तकों के कथन प्राकथनं ही थे। स्वयं डाक्टर रामकुमार वर्मा जो मेरे सहपाठी हैं इस भूल में पड़ गये। 'साहित्य समालोचना' के पृष्ठ १२ ( पर आप लिखते हैं "सब से पहले हम छायावाद या रहस्यवाद "को लेते हैं। उन्हीं के ( पृष्ठ १३ पर अङ्कित ) शब्दों में जब कवि स्वयं नहीं समझता कि "छायावाद" क्या है तो पाठकों से उसके समझने की क्या आशा की जा सकती है ! डाक्टर नागेन्द्र ने अपनी year "विचार और अनुभूति" के पृष्ठ 5 पर छाया के विषय में तीन भ्रान्तियों का उल्लेख किया है। मैं उन्हें यहां दुहराना नहीं चाहता मेरा भी विश्वास है कि (१) araare और रहस्यवाद में अन्तर है (२) छायावाद केवल विशिष्ट शैली नहीं वरन स्वतंत्र विचारधारा है (३) छायावाद पाश्चात्य की रोमानी कविता से भिन्न है । इसी सम्बन्ध में मैं "रहस्यवादी" काव्य धारा के बारेमें भी अपने विचार प्रकट करना चाहता हूँ । छान्दोग्योपनिषध ८-१-१ में आया है "अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरंद grati वेश्म दहरोडस्मिन्नन्तरा का शस्तस्मिन् यदन्तस्त दन्वेष्टव्यं सद्भाव विजिज्ञासित व्यमिति । (यह मानव शरीर म पुर है। इसके भीतर एक कमल कुसुमाकर गृह है। उसके<noinclude></noinclude> cozbfc1ygdb58e0jcdirxitadefwwye पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२१ 250 198182 675888 2026-09-29T23:03:24Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (*) भीतर एक छोटा सा आकाश है। उसके अन्दर एक निगून रहस्य है । उसको जानना होगा। उसका अन्वेषण करना होगा" खत्यानुसन्धान ब्रह्मानुसंधान या आत्मानुसंधान की प्रवृि रहस्यवाद का प्राण है । रहस्यवादी की दृष्टि उपरागों पर नही are उसके कारणभूत छायावान पर होती है । उसकी म शैली का आधार विचार की अनुलोम गति, तर्क की आगमन शैली, होती है। उसकी सम्यक प्रयुद्ध ऋषि चेतना में अतिभार चरम सत्य अनुसन्धान की प्रथम अवस्थाओं से ही विद्यमान रहता है। कृषि चेतना की जागर्ति साधन से होती है जब तक बुद्धि 'ऋतम्भर तंत्र प्रज्ञा" की अवस्था प्राप्त नहीं करती तब तक वह 'रहस्य' का उद्घाटन करने में समर्थ नहीं होती । छाया- वाद और रहस्यवाद की प्रवृत्तियों में विशिष्ट अन्तर यही है कि छायावाद कल्पना के आधार पर अनुसन्धान करता है और रहस्यवादी साधना के बल पर जब साधक सत्य के अनुशीलन में ऊपर उठकर सत्य में डोखता दिखाई पड़ता है तब वह रहस्यवादी हो जाता है। रहस्यवादी में ऋषि चेतना जग जाती है और वह छायावादियों की भांति अपनी ज्ञानध ससमता सादित्य, तथा सान्तत्व में केवल समित्व, अना दिव और अनन्तत्व की कल्पना ही नही करता वरन उसकी "ऋषि चेतना में देश कालातीत असीम अनादि अनन्त प अद्वितीय अपरिमाण तत्व समुज्जवल रूप से प्रकट रहता है। अभाव रूप में नहीं, भाव रूप में भारतीय दृष्टिकोण से रहस्यवादी धारा तथा छायावादी धारा से जो विभेद ऊपर उपलक्षित किया गया है किश्चित et face अग्रेजी के "मिस्टीसिज्म" और "रोमेन्टीसिज्म मैन हो । किन्तु भारतीय रहस्यवाद की आधार शिक्षायें न<noinclude></noinclude> kh7sueq6xmzbd5pvcbt5dn3jbp4mqwn पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२२ 250 198183 675889 2026-09-29T23:03:39Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675889 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( * ) केवल अंग्रेजी “मिस्टीसिज्म" में ही वर्तमान हैं, वरन फारसी के "तसबुक" में भी । यों तो सूफी साहित्य में दो विचार धाराएं सुस्पष्ट हैं किन्तु उनमें विभेद करने का प्रयत्न नहीं किया गया हैं। वरेड रसेल ने अपने निबंध "मिस्टीसिज्म और जाजिक" में लिखा है कि “मिस्टी कल फिलासफी" सब काल में संसार के सभी भागों में कुछ मान्यताओं से उपलक्षित रही है। उनमें पहली मान्यता यह है कि वह दिव्यदृष्टि में विश्वास करती है। इसी दिव्यष्टि से संबद्ध यह कल्पना भी है कि प्रतिभात असत् प्रत्यक्ष जगत के पीछे एक सत अन्तरजगत है और इस अन्तरजगत के प्रति केवल मानव की विस्मय भागना ही नहीं होती वरन् कभी कभी यह भावना उपासना तथा पूजा बन जाती है। दूसरी मान्यता एकात्मता की है जिसमें किसी प्रकार का विभाजन नहीं। तीसरी मान्यता “काल-तत्व" के अस्तित्व का निषेध है। और चौथी मान्यता यह है कि विकार असत् है"। मैं इस निकर्ष से सहमत हूं। यदि आप आंसू के उत्तरा पर मनन करेंगे तो थाप 'रहस्यवादी" धारा के मूलतत्व को समझने में समर्थ होंगे। कालातीत काल, सर्वात्मवाद, ऋतम्भरा, तथा पाप की निस्सारता चारों ही उत्तरार्ध में वर्तमान है। सूफी-साहित्य-कारों की मनन शैली वैदिक परंपराओं से भ नहीं है। "सर्वविदं ब्रह्म" तथा "एकोसत् विबहुधा वदन्ति" की छाप का एक उदाहरण देखिये:-- "देहर जुज़ जलवये यकताइये माशूक नहीं हम कहाँ होते अगर हुस्न न खुदबी होता " + फारसी के शायर नजीरी ने लिखा:--- "अक्स शख्ते फिताद दर भटकन वजुस्तम कसे न बूद प्रजा"<noinclude></noinclude> cw9bpbt4l7ace6uw2yv03lz4mein87h पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२३ 250 198184 675890 2026-09-29T23:03:53Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675890 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( न ) (किसी की मेरे द्वार पर छाया दिखाई दी। ढूंढ़ा तो वहाँ कोई न था ) क्या रहस्यवाद की चरमसीमा ये भाव नहीं छू रहे हैं। केनोपनिषद् में "यक्ष" की आख्यायिका में भी क्या यही भाव विद्यमान नहीं । सुफी लोगों ने यौगिक क्रियाओं को भी अपनाया है । यह एक Fans faषय है जिसका विवरण यहां सम्भव नहीं। इस सम्बन्ध में केवल इतना ही लिखना पर्याप्त होगा कि "वेदना" सूफियों का 'गम' महक से रान शिनाकसे कि रामन शिनासद इस्त वेगाना भरा आंकि अलमन शिनासद। (जो वेदना से परिचित नहीं, वह मुझसे भी परिचित नहीं । वेदना से अपरिचित वह मुझसे अपरिचित है } सर्वदा दिल के दाग हरे रखना चाहता है:- " दामे दिल दर इश्क अफसुर्दन नमीदानद कि चोत लालये ई बाग़ पञ मुदन नमीदानद कि चीत" (दिका दाग प्रेम में अच्छा होना नहीं जानता। इस बाग का जाना मुरझाना नहीं जानता ) मर्माहत होना ही उसे धमरत्व है:- जसमे पैकानम व आवे जिन्दगी शोयद दहन हर कि तीरे ऊ खुरद मुरदन नमी दानद कि नीत (मेरा वीर का जख्म जीवन के पानी से मुह बोता है। जो उसका तीर खाता है वह मरना नहीं जानता ) दर्दे दिल को वह दर्द की दुवा मानता है --- "नजीरी जिन्दगी दर दर्दे दिल जू कि दर्द तो मसीहाये तो वाशद" (नजी जिन्दगी दिल के दर्द में ढूढ़ों । कारण कि तुम्हारा दर्द ही तुम्हारा मसीहा है। उसकी मान्यता के अनुसार 'प्रेम' ही सृष्टि का कारण है।<noinclude></noinclude> 68kz2di2pnrddppdd1blixkhrxuvl14 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२४ 250 198185 675891 2026-09-29T23:04:09Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675891 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( प ) "श्रालम श्रज इश्क दर वजूद आमद इश्क मेमारे हस्तो बूद आमद हरवे अहलीयते नमूदन दरव हमा अज इश्क दर नमूद श्रानद” नेस्त जुज इश्क वो आशिको माशूक हरचे दर मजहरे शहूद ग्रामद" उसकी दृष्टि में प्रेम अनादि है:-- "इश्के मा वाकयए नेस्त की पायां गरदद हरचे आगाज नदारद गमे पायानश नेस्त और वह समझता है कि प्रेम ही उसकी सारी कठिनाइयों को सरल कर सकता है:- अफाक अल्लह at trs ऋजू हस्ती वर आद वयक मुश्किल नमूदी सहल हजारां मुश्किले मारा और प्रेम ही उसे अमरत्व देता है:- इश्कम नवी दे जिन्दगिये जाविदां दिइद चश्मये कि गुमशदा दर वादिये मनस्त उनकी दृष्टि में प्रेम और सौन्दर्य एक ही तत्व के पहल हैं। इस्ने मा कर्द जलवये वरमा इश्के मा दिल जमा रख़ूद हैं जा अशी व हुस्ना दर पर्दा तवां दाशतन शोला गम्माजी कुनद नाचार हरजा श्रातिशस्त भक्ति रहस्य का आवरण ही उसका पर्दा है:- इम शन खुश श्राशनास्त वख्यश निगाहे मा गोया हिजाब सोख्ता श्रज वर्क आहे मा उसके प्रेम में बुद्धि को स्थान नहीं:- .<noinclude></noinclude> djmu6taro05cr6hfeetf4wx1k55gq32 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२५ 250 198186 675892 2026-09-29T23:04:26Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675892 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (फ) " पदे अक्ल तोबा कदम अजु इश्क खता करदम पशीभानम कुजा है " वह कण कण में एक ही सत्ता का प्रतिभास पाता है:- “दरी मैदाने पुर नैरंग हेरानन्त दानाई । कि यक हगांमा आारायस्त व सद कि श्वर तमाशा" लौकिक से परे वह एक अलौकिक का दर्शन करता है: नजर गरदद हिगाव श्रजा कि मन दीदार मी वी नम Th fai अ चश्मे जाहिर की तमाशाये दिगर दारम् ॥ वह आत्मा को कतरा तथा परमात्मा को सांगर जानता है:- "वजहमत इतिमाल उर्फ तदचु पैवेन्दे दुरीद श्रज हम ब फुरसत कुतरां दरिया मी शब्द् बूँ कतरा शुद दरिया" बस्त को ही वह जीवन की सिद्धि मानता है:- मन तू शुदम तूमन झुदी मन तन शुदम चूँ जो सुदी ता कस न गोयद याद अभी मन दीगरम तू दीयरी" इस प्रकार आप देखेंगे कि सूफी-साहित्य पर भक्ति-रहस्य तथा वेदांत दर्शन दोनों की छाप है। प्रसाद ने जब इन बातों को "आँसू में दुहराया तो लोग उसे "उर्दू-फारसी की छाया समझने लगे । उपसंहार के पहिले यह भी बिना 'आवश्यक है कि छायावाद और रहस्यवाद की मनन शैली से संवद्ध "तत्वमसि' और 'मोहम्' आदि की व्याख्या भी है। छान्दोग्योपनिषद में "तत् सत्यं स श्रात्मा तत्त्वमसि" की बात आई है वह सत्य है, वही भात्मा है, वही तू हैं ) तथा वहीं "सवं खल्विदं ब्रह्म "तत्त्वमसि " की बात भी आई है। समा - नाधिकरण मात्र, विशेष्य विशेषण भाव और तक्ष्य लक्षण भाव से यह तीन प्रकार का संबंध माना जाता है। पहले संबंध से तत् अप्रत्यक्ष चैतन्य का बोधक है और त्वम् प्रत्यक्ष<noinclude></noinclude> 69cx344jcjdbx793j4dlprkj40m98k1 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२६ 250 198187 675893 2026-09-29T23:04:43Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675893 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( ब ) चेतन का, और दोनों का एक चैतन्य मयन्त्रा से तात्पर्य है यही समाधिकरण संबंव है। "जैसे वह देवदत्त है में पहले देखे हुए देवदत्त तथा प्रत्यक्ष देवदत्त में तादात्म्य हो जाता है । विशेषणविशेष्य संबंध में भी दोनों पदों का तात्पर्य एक वस्तु से अभिन्न रूप से हो जाता है । नक्ष्य-लक्षण में दोनों परस्पर विरोधी अर्थो को छोड़ कर श्रविरुद्ध चैतन्य लक्ष्य हो जाता है । अध्यारोप और अपवाद न्याय द्वारा तत् श्रर 1. त्वम् दोनों अर्थो का शोधन करके जिस समय "तत्वमासी" द्वारा अखण्ड चैतन्य का बोध हो जाता है उस समय मैं ब्रह्म हूं इसी प्रकार की अखण्ड अन्तः करण वृत्ति चैतन्य प्रतित होती है तब वह चित्त वृत्ति द्वारा चैतन्य द्वारा प्रकाशित होकर प्रत्यागात्मा ( जीव ब्रह्म का अभेदज्ञान ) अभिन्न पर ब्रह्म विषयक ज्ञान देती है। जैसे दीपक की प्रम सूर्य की प्रभा के प्रकाश होने पर अपने निष्प्रभ हो जाती है उसी प्रकार अन्तःकरण वृत्ति में प्रतिविवित चैतन्य स्वप्रकाश ब्रह्म चैतन्य के प्रकाश करने से स्वयं अभिभूत हो जाता है और जैसे दर्पण के न रहने पर मुख प्रतिविष मुख ही रहता है वैसे ही उपाधिभूत अन्तःकरण के न होने पर स्वप्रकाश पर ब्रह्ममात्र ही होता है। इस प्रकार ज्ञानियों को 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है। मन करके धारण किया जाता है ब्रह्म मन से वारण नहीं किया जाता ।" ऊपर जो कुछ लिखा गया है वह सब ब्रह्म सम्बंधी विविध दृष्टि को उपस्थित करता है। इन्हीं विभिन्न दृष्टिकोणों से सम्बद्ध भोग्य बसुन्धरा संबंधी आस्थायें हैं तथा व्यष्टि- समष्टि संबंधी विचार है। मानव मन की अतृप्ति सभी दशा में तृप्ति चाहती है। इस तृप्ति की खोज में वह कभी परिस्थितियों<noinclude></noinclude> bdy3gihbmpyx7hzgcwpf9aig3vbz2e7 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२७ 250 198188 675894 2026-09-29T23:04:56Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( ग ) से Baar है कभी उससे भगता है। प्रवृत्ति-निवृत्ति का यही अपनी अलौकिक थास्थायें खोकर कभी द्वन्दात्मक भौतिक are को ओर भी झुकता है । आप को अनुभव होगा कि मानव-मन विश्लेषण-संश्लेषण दोनों करता रहता है। शरीर को भव सागर की बी/चयों में छोड़ उनका मन भव-सागर में किल्लोल करता है । भाव की एकदेशयिता का नाम ही विचार धारा है। यहीं विचार धारा "वाद" शब्द से प्रतिष्ठित होती है जैसा कि मैं ने ऊपर कहा है मैं सुकवि की दृष्टि को सार्वभौमिक मानता हूँ और जिस कवि में एकदेशीयता होती है उसे यथार्थतः महाकवियों की श्रेणी में बिठाना ठीक नहीं समझता । मेरे विचार में राजनीति तथा समाज की गुत्थियों में उनकी कविता निष्प्राण होती है जो चारा भी नहीं बनाती वरन ऊर्मि सरीखी क्षणिक अस्तित्व के पश्चात् स्वतः विलीन हो जाती है। प्रगतिवादी साहित्य इसी दोष से पीड़ित है ! प्रयोगवादी साहित्य तो ऊर्मि का आकार भी ग्रहण करने में समर्थ रहेगा। "छायावादी" काव्य धारा की ओर पुनः लौटने के पूर्व मैं antar wear हूँ कि काव्य जिसमें सार्वभौमिकता के प्राण नहीं बसते वस्तुतः क्षणिक होते हैं। सार्वभौमिक काव्यधारा देश काल की एक देशीयता संभाले शाश्वत सत्य की गोद में पलती है और यहीं उसे अमरत्व का वरदान देती है । सर्वा पूर्ण साहित्य वही है जो सार्वभौमिक तथा स्थायी हो । साहित्य को सार्वभौमिक बनाने के लिए देश धर्म समाज आदि के उन भाव-भावनाओं आस्थाओं तथा विचारों को अपनाना होगा जो संसार के प्रत्येक भाग में सामान्यतः वर्तमान हों। कौन इन्कार कर सकता है कि प्रेम और सौन्दर्य के अन्योन्याश्रित संबंध से उत्पन्न यौन-भावनायें आनन्द- क्षिप्सायें काल के किसी<noinclude></noinclude> f6tj774gr2v4qfrndppdw5xvstj7oxf पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२८ 250 198189 675895 2026-09-29T23:05:14Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675895 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (म ) अवस्थान पर समाप्त नहीं होने की । "हम क्या, जगत क्या. वेश्व- वैचित्र्य का उद्गम क्या, जगत में इतना दुखः क्यों, मृत्यु के क्या ?' आदि अनेक विचार परक समस्यायें ऐसी हैं जो अपनी शाश्वत गति से संसार के उद्गम से चली आ रही हैं और उसके पराभव तक चलती जायेंगी। जिस साहित्य में इस प्रकार के मनन-चिंतन - कल्पना अनुभूति के अङ्कुर होंगे वह साहित्य काल के किसी अवस्थान पर नहीं मरता, उसे अमरत्व मिलता है । साहित्य जिसमें मानव को मानव बनाने की सामग्री नहीं, जिसमें जीवन दायिनी प्रसूतियों का उद्गम नहीं वस्तुतः साहित्य नहीं है। जहां तक साहित्य की शैली का संबंध है उस विषय में भी इतना कहना पर्याप्त होगा कि कलात्मक विश्लेषण मधु-शब्द-विन्यास, संहृत, अभिव्यंजना, लाक्षणिकता, मानवीय भावनाओं का रंगीन चित्रण तथा उर्ध्वमुखी कल्पना ही साहित्यकार के साहित्य में चार चांद लगाते हैं । किचित यह तो निर्विवाद है कि उत्तम कविता समष्टि की भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होती वरन् व्यष्टि की उत्तम काव्य प्राण का प्राण के प्रति अथवा महा प्राण के प्रति श्रात्म निवेदन है। इस दृष्टि से आत्माभिव्यक्ति, काममय अंतरंग प्रेरणा, आत्मरति भावात्मकता काव्य के प्राण हैं। प्रकृति हमारे आनन्दानुभाव में कितनी सहायक होती है यह किसी से छिपा नहीं । यदि वर्डस्वर्थ ने लिखा Every flower that blooms can give thoughts too deep for tears, the earth, every common sight To me did seen apparelled in celetial light." And the Alps where snows are spread High between the clouds and the sun<noinclude></noinclude> dn3734dbguetoaq4eoqy73yj3rkin1j पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/२९ 250 198190 675896 2026-09-29T23:05:41Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( य ) And of living things each one And my spirit which so long Darkened this swift stream of song Intepenetrated lie By the glory of the sky." सादी ने बिखा:- वेहज रूये जेवास्त आवाजे खुश कि ई हज्जे नफस वीं कूते क ( सुन्दर मुख से मधुर ध्वनि श्रच्छी है कारण कि उससे जीव start मिलता है और इससे आत्मा की पुष्टि होती है ) । पक्षियों का कल-कूजन, फूलों की मनोहारी मधुकारिता, पुर्णेन्दु की लहरती हुई छटा किसे आत्म विभोर नहीं करते। मानव अपने भाव का प्रतिबिम्ब प्रकृति में देखने पर विवश है। प्रकृति का मानवीकरण इसी भाव की व्यापकता का फल है। "जता बिलोकि नवहिं तरु शाखा” की बात तो गोस्वामी तुलसी दास भी कह गये हैं। काव्य प्रायः दो प्रकार के होते हैं, आदर्शवादी और यथार्थ बादी। आदर्शवादी आदर्श का यथार्थ अनुभव चाहता है तो यथार्थं नादी यथार्थ को आदर्श भूत बनाता है। दोनों साधनों में केवल शैली का अन्तर है। दोनों साधनाओं का परिणाम नस का परिपाक ही है। "छायावादी साहित्य के दृष्टि कोण को समझने के लिए उपर्युक्त सभी बातों से अवगत होना आवश्यक है। इसमें सन्देह नहीं कि छायावादी साहित्य का प्रारम्भ कायावृत्तियों के प्रच्छन पोषण से हुआ। जैसा कि आचार्य शुक्र का मत है।<noinclude></noinclude> psve320vqki8abvg16b0z95mzc4gan1 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३० 250 198191 675897 2026-09-29T23:05:56Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (र) किन्तु भाव की सृष्टि का इतिहास भी तो यही है। "सवास- नाना सभ्यानां रसस्यास्वादनं भवेत” में तो आचार्यों ने ही घोषित किया कि "वासना युक्त सभ्यों को ही रसास्वाद होता "ये वासनायें नित्य तथा संस्कार जन्य होती हैं। श्रतएव "कायावृत्तियों के पोषण" से साहित्य का उद्गम होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, यह तो स्वाभाविक है। कायावृत्तियों का "न" पोषण ही साहित्य में वांछनीय है। उसका नग्न चित्र सभ्यों की मर्यादा के विमुख है । छायावादी कविता का उद्गम जैसे भी हुआ हो, हमें यह देखना है कि उसका व्यवसान कहां हुआ । “अगाज को कौन पूछता है, अंजाम अच्छा हो आदमी का" । वासनाओं ( अथवा पाश्चात्य प्रतीक में मानसिक कुंठाओं) से उद्भूत साहित्य क्या घूम फिर कर उन्हीं वासनाओं में सीमित रह गया या वह द्रष्टा और दृश्य के रंग में इस प्रकार रंगा कि अन्त में वह "ततः केश कर्म निवृत्तिः" की सीमा भी छू श्राया । इसका उत्तर आप को पन्त, निराला, महादेवी, प्रसाद की परिपक्क कवितायें देंगी। यदि संपूर्ण छायावादी साहित्य का अध्ययन किया जावे तो स्थिर होगा कि छायावाद में निम्नांकित तत्व विद्यमान हैं:- १- छाया कलुषित भाषा तथा भाव (प्रारम्भिक अवस्थाओं में ) २- शृंगारिक वर्णनों में प्राचीन का नवीन कल्पनाओं में समावेश ३- प्रकृति की ओर विशेष झुकाव तथा उसका मानवीय करण ४ -- बेदनावाद (विरहियों की प्रेमसाधना का आधुनिक रूप ) (करुणरस का परिपाक ) ५ -- सौन्दर्य, प्रेम आदि के वर्णनों पर आध्यात्मिकता का श्रावरण<noinclude></noinclude> 2x2aopsrrwyomjolsvy41hken1zwwv7 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३१ 250 198192 675898 2026-09-29T23:06:16Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675898 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (ख) ६- कल्पना का विलास ७ - लाक्षणिकता, ध्वन्यात्मकता तथा प्रतीक विधान -अद्वैतवाद, रहस्यवाद आदि दर्शनों की छाया E-- अपरोक्ष अनुभूति की ओर झुकी अन्तः प्रेरणा १० - आत्माभिव्यक्ति, आत्मगत भाव व्यञ्जना ११- लौकिक को अलौकिक बनाने का प्रयास १२- विश्व - वेदना १३ अस्पष्ट भाव व्यञ्जना १४- कठिन शब्दावली इस पृष्टि भूमि में प्रतिष्ठित प्रसाद का " काव्य" ऐति- हासिक दृष्टि से एक महत्व रखता है। प्रसाद का धांसू स्मृति- काव्य है । इसमें मिलन के पश्चात प्रेमविरह की कहानी है। सारा काव्य नाटकीय ढंग से उपस्थित किया गया है। पाठक को इसमें दृश्य तथा श्रव्य दोनों का आनन्द मिलता है । दुःख पूर्ण वर्तमान स्थिति के प्रारम्भिक वर्णन में "अब" अतीत को सजग करता है वर्तमान स्थिति के विश्लेषण के पश्चात कवि भाव दोल में बैठा अतीत और वर्तमान के किनारे छूता है, मिलन की स्मृति का चित्रण लाक्षणिक प्रयोगों से स्पष्ट करता हुआ, वह वियोग की यातनाओं और उपालंभ की जो झांकी प्रस्तुत करता है वह भूतपूर्व है। आंसू के गारिक वर्णन में प्राचीन तथा नवीन शैली का मेल बड़ा ही मुग्धकर है। आंसु का उत्तरार्ध रहस्यवादी धारा रंगा है। "मैं सभय निरधार यह जग काँचो कांच सों, - एकै रूप अपार प्रतिविम्बित लखियत जहां" की तरल भावनाओं में डूबा, किस भांति aौकिक में अलौकिक की सिद्धि प्राप्त<noinclude></noinclude> bd9c650st0p6g4kan8mc96j9665hxnu पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३२ 250 198193 675899 2026-09-29T23:06:30Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( ब ) करता है इसे कुछ वे ही समझ सकते हैं जिन्हों ने अनुभव किया हो कि 'मोहन मूरत श्याम की अति अद्भुत गति जोय, वसतु सुचित अन्तर तक प्रतिविम्बित जग होय " "मेरी मानस पूजा का पावनप्रतीक अविचल हो" आदि की व्याख्या करते हुये इस पर विचार किया गया है। सर्वे भवन्तु सुखिना', वसुधैव कुटुम्बकं आदि की भावना का उद्गम रहस्यवादी धारा ही है । इसमें सन्देह नहीं कि प्रसाद के पूर्व लौकिक द्वारा अली- किक की सिद्धि का इतना सुस्पष्ट संदेश हिन्दी साहित्य को कभी नहीं मिला था और इस दृष्टि से भी आंसू का एक विशिष्ट स्थान है । किन्तु आंसू का संदेश कुछ और ही है । "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते" की भाव धारा से विलग हो कर सती सीता सावित्री का गुण गान करते हुए भी, हिन्दी का कवि समुदाय नारी की महत्ता भूल गया। संत कवियों ने तो लिखा ही कि "नारी की मांई परे अन्धा होत सुजंग, कविरा उनकी कौन गति जो नित नारी संग" । रीतकालीन विहारी भी चुप न रह सके और बोल उठे या भव पारावार है उलंधि पार को जाय, ति छवि छायाग्राहिनी यसै बीच ही आय | द्विवेदी युग में ही नारी को पुनः उसका वेद-विहित मूल्य देने का प्रयास प्रारंभ हो गया था किन्तु प्रसाद का कार्य इस दिशा में स्तुत्य है । "नारी तू केवल श्रद्धा है" की कल्पना में रत प्रसाद ने नारी को बड़ा महत्व दिया, नहीं नहीं नारी के महत्व के प्रति सामाजिक चेत- नाओं को जागरुक किया। उन्होंने अपने नाटकों में नारी को प्रकृति स्वरूपा माना है। उन्हीं के शब्दों में "वह करुणा की मूर्ति है। दया, क्षमा, त्याग, तितिक्षा, एवं सेवा भावना की वह साक्षात प्रतिमा है । असत् को सत् में, अधमता को उदात्तता में, राक्षसत्व को देवख में वर्वरता को सभ्यता में एवं पाप को<noinclude></noinclude> fp1v7rwgk874o3booq7is8jxyg9tirc पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३३ 250 198194 675900 2026-09-29T23:06:48Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675900 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( श ) एच में परिवर्तित करने का भार उसी पर है"। आंसू की पंक्तियों में नारी असि का इसी दृष्टि कोण से वर्णन किया गया | मानव कुत्ता के प्रति भी प्रेम की आस्थायें जगा कर प्रेम साधना में सफल हो सकता है यह आंसू का महानतम संदेश है। यदि आप परकीया राधा की मीमांसा से परिचित होंगे तो आप को इस संदेश के सनातनत्व में भी सन्देह न होगा । आजमगढ़ २१ मार्च५४ "शैदा"<noinclude></noinclude> pov2h4wfbo4akvxs37wss273u1ss4ws 675920 675900 2026-09-30T06:55:36Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{c|( श )}}</noinclude>पुण्य में परिवर्तित करने का भार उसी पर है"। आंसू की पंक्तियों में नारी-असि का इसी दृष्टि कोण से वर्णन किया गया है| मानव कुलटा के प्रति भी प्रेम की आस्थायें जगा कर प्रेम साधना में सफल हो सकता है यह आंसू का महानतम संदेश है। यदि आप परकीया राधा की मीमांसा से परिचित होंगे तो आप को इस संदेश के सनातनत्व में भी सन्देह न होगा । {{gap|7em}}आजमगढ़ {{gap|7em}}२१ मार्च ५४{{gap|14em}}"शैदा"<noinclude>{{dhr|12em}}</noinclude> b2b1bufrjg5hkos8l8nmaf1vpu8uune पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३४ 250 198195 675901 2026-09-29T23:07:12Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675901 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ उ आँसू व्याख्यात्मक आलोचना " को घनीभूत पीड़ा श्री मस्तक में स्मृति सी छाई दुर्दिन में न कर वह आज बरसने आई" पर्युक्त पंक्तियां "" के प्रथम पृष्ट पर प्रति हैं जैसे ये आंसू मुक्ता-माल की सुमेर हो । ज्ञान- चेतना के गर्मज्ञों से छिपा नहीं कि मानव मन के एक कोने में छोटी से छोटी अनुभूति का सूक्ष्माति- सूक्ष्म आभास अति रहता है। इसी को हम "संस्कार" का नाम देते हैं। अशाल-चेतना में केवल वर्तमान जीवन के ही संस्कार<noinclude></noinclude> 7xcakab965ku8m9oto6wagl0lx2v3s4 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३५ 250 198196 675902 2026-09-29T23:07:28Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (व्याख्यात्मक आलोचना ) नहीं होते वरन पूर्व जन्म के भी चेतना के लिए कोई भी बात 'विगत' अथवा 'भूत' नहीं होती। उसका नि होता है | ये प्रत्येक अनुभूतिवना के लिए शाश्वत वर्तमान है जिसमें जाति, देश और काम का कोई या नहीं। यौगिक क्रियाओं से ज्ञान में विराजमान छोटी से छोटी अनुभूति को स्मृति जगाई जा सकती है। ज्ञान चेतना में विद्यमान कोई भी बात किसी विशेष घटना से हमारी area aar में आ बैठती है, इसी को हम स्मृति कहते हैं। पातञ्जल योग दर्शन के अनुसार किष्ट और कष्ट भेदवाली वृत्तियां पांच प्रकार की होती हैं (१) प्रमा (२) fara (३) विकल्प (४) निद्रा (५) स्मृति "अनुभूत पिया मोः स्मृतिः अर्थात अनुभव किये हुये विषय का न छिपना (प्रकट हो जाना ) 'स्मृति' है । "जाति देश काल व्यव हितानामप्यनन्तर्य स्मृति संस्कारयोरेकरूपत्वात्" के अनुसार जाति, देश, काल का व्यवधान रहने पर भी कर्म के संस्कारों में व्यान नहीं होता क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों एक रूप होते हैं | मानव के शुक्ल, कृष्ण तथा शुक्लकृष्ण कर्मों से उनके फल भोगानुकूल वासनाओं की अभिव्यक्ति होती है। ये वासनायें अनादि हैं। क्योंकि प्राणी में अपने बने रहने की इनिव्य रहती है। वासनाओं का फल पुनर्जन्म, श्रीयु और भोग है। आय चित्त है और शब्दादि विषयन्यलम्बन है । वासनायें इसके सम्बन्ध से संग्रहित होती हैं। अज्ञान-चेतना की रहस्यमयी गुत्थियों में हुये विद्वान फ्रायड तथा युग जिसे “रिप्रेशन" (दमन-क्रिया) का नाम देते हैं वही वासनाओं की सृष्टि की क्रिया है। जब योग साधनों से इन (वासनाओं का अभाव हो जाता है तब कर्मों में फल देने की सामर्थ्य नहीं रह जाती, चित्त अपने कारण में विलीन हो जाता है। इस प्रकार हेतु फ<noinclude></noinclude> tt37np8k4dl5vghy6v4acy1d7gbqfgz पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३६ 250 198197 675903 2026-09-29T23:07:42Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ "अ" व्याख्यात्मक आलोचना ] आश्रय और आलम्बन इन चारों का अभाव होने से वासनाओं का प्रभाव हो जाता है। यही तो है ननोमंथियों का रेचन । ""काव्य को समझने के लिए उपयुक्त विचारधारा से परिचित होना परमावश्यक है। यह तो नहीं कि मैं "सू" काव्य मैं किसी 'आध्यात्मिकता' का आरोप चाहता हूँ अथवा मैं उसे "उपमिति कथा" मानता हूँ किन्तु मेरे विचार से "आँसू" के कवि के मनन के पीछे एक ऐसी मनोवैज्ञानिक तथा यौगिक विचारधारा है जिसे भुला कर हम "आँसू" के किसी भी स्थल का नहीं प्राप्त कर सकते । श्री किशोरी लाल गुप्त ने "प्रसाद का विकासात्मक अध्ययन" में लिखा है:- " का द्वितीय संस्करण अतीत की स्मृति का काव्य है" किन्तु उन्होंने यह भी लिखा है कि परिवर्तित अंश के अध्ययन से तीन बातें स्पष्ट होती हैं (१) इनमें कहीं रहस्यवाद की झलक नहीं है (२) बाद की सभी पंक्तियों का मूल मन्त्र है--विश्वकल्याण (३) इनमें वोच्वास की कमी है, चिन्तन की अधिकता है ।" प्रत्येक व्यक्ति जो यौगिक विचारधारा तथा रहस्यवाद की मासाओं से परिचित है गुप्त जी के इस निष्कर्ष का प्रतिवाद करेगा । मैं "लू" को विरहियों की प्रेम-साधना का ही आधुनिक रूप मानता हूं ! आँसू का प्रथम छन्द है:- "स करुणा कलित हृदय में श्रम विकल रागिनी बजती क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना गरजती " असीम "" की इन प्रथम पक्तियों में पुस्तक के विषय की पू व्यञ्जना निहित है। पुस्तक 'नगरा' से प्रारम्भ होती है जिसका<noinclude></noinclude> j8iyqmpqcqh2w69pw48fxds4hirjc3d पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३७ 250 198198 675904 2026-09-29T23:07:57Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675904 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ { " व्यायाचना ) देवता"स्वर्ग" तथा फल "सुख" है । २४, १४ के विराम पर मात्रा के छंद का प्रयोग किया गया है। इस बंद का न नाम "न" है यपि "दीन पिंगल के रचयिता श्री श्रव उपाध्याय ने इसे "कांस बंद" का नाम दिया है। करुणा-कलित हृदय' का टुकड़ा बताता है कि काव्य का स्थायी भाव करुणा है अतएव उसमें रस मिलेगा। करुण रस को कवि भवभूति नेवारस माना है। उनका कहना है-की- रसः करुण एव विवर्त भेदात्' अर्थात अन्यरसका केही रूप विपर्यय हैं। करुण रस करुणा-विप्रलंभ का प्राया है। प्रेम में वियोग की अनुभूतियों का नाम करुण-विप्रलंभ है। 'विकल' शब्द में 'वि' उपसर्ग वियोग का है।"कार" शब्द है कि दुख दर्द से बेचैन होकर अधीर हो उठा है। "कलित" और विकल शव्द बताते हैं कि पहले पूर्णत्र था अब उसमें न्यूनता आ गई है । कवि की पूर्वस्थिति का परिचय 'करुणा फलित हृदय' देता है ! प्रेम के पश्चात वियोगावस्था की मनस्थितिकान कवि ने आगे चलकर (रोनी करुणा कोने में किया है। इस प्रकार का तारतम्य "आंसू" में पूर्ण व्यापकता से वर्तमान है "आंसू" एक सुन्दर प्रवन्ध ator' है और जब तक पूरे काव्य में एक सूत्रबद्ध भाव-कथा का दर्शन करने में पाठक समर्थ नहीं होता तब तक उसका 'आंसू ' का अध्ययन अधूरा ही रहेगा। 'करुणा-कलित-हृदय में एक यह भी व्यञ्जना निहित है कि प्रेम करने के पूर्व कवि के मन की वृत्ति 'सात्विकी' थी। माया त्रिगुमयी है । "रजस क्रिया शक्ति, तमस् स्थिति तथा निरोध शक्ति है और सत्व प्रकाश शक्ति तथा साम्य सुषमा शान्ति शक्ति है । रजस से - चेष्टा उत्पन्न होती हैं, उद्यम उद्योग होता है, काम क्रोधादि होते हैं। तमस से जाड्य, आलस्य, निद्रा, भूल, भ्रान्ति, मोह तथा<noinclude></noinclude> lojgjb8nncar38pa3e3d4iwngz6k9er पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३८ 250 198199 675905 2026-09-29T23:08:14Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ( " व्याख्यात्मक चना ) अशान्ति कात है। ल से ज्ञान, विज्ञान, विद्या, प्रेम, मैत्री, करा हैं" की पूर्वाधा (य) सम्व प्रधान थी, और वर्तमान व्यवस्था (अ) प्रधान है कारण कि उसने "माया की छाया में विश्वास बढ़ाया। उसकी साधना पुनः सात्विकी मनोवृति जगायेची वेदना पूर्ण हृदय को संवेदनशील बनाकर | "आंसू" के परिवर्तित में इसी aftant मनोवृत्ति के जगाने की क्रिया का वर्णन है। रहस्यवाद की अन्तिम परियाति इसी उत्सर्गशीला सात्विकी मनोवृति को जगाना है। "काव्य" नाटकीय ढंग से प्रारंभ होता है। "क्यों" शब्द ने पूरी व्यञ्जना को रहस्यात्मक रूप दे दिया है जैसे कवि अपनी मनःस्थिति को स्वयं न समझ रहा हो। कथी- पकथन या स्वगत् कथन को क्यों का प्रयोग कितना रस बीफिल कर देता है. इसे कुछ कविवर गुरुम सिंह ही जानते हैं तभी तो उन्होंने "नूरजहां" का प्रारंभ इसी 'क्यों" से किया यो सुरगाई हुई कैसे हुआ है दिल] | क्यों प्रश्नात्मक भी है, विस्मयसूचक भी। पाठक को इस क्यों" का उत्तर आगे मिलेगा, इससे उसकी उत्सुकता जग जाती हैं। और वह समाधान कहने के लिए बिल हो उठता है । [ प्रिय प्रवास के चतुर्थ सर्ग में इस "क्यों" के सुन्दर प्रयोगों को कभी अवश्य देखें] | फारसी के एक कवि ने लिखा--- सत्यवादिता, न्याय निष्ठा, सारे सहा "भी गिरिमिरिया तिपले खवरे नेस्त दलित नाम कि कुदाम हस्त" [मैं रोता हूँ और अपने रोने का कारण उसी भांति नहीं 'जानना जैसे छोटा बच्चा | मेरे मन में कोई अभिलाषा है किन्तु नही जानता कि वह कौन सी अभिलाषा है ] ।<noinclude></noinclude> 6ahrjpjaaen28r1flkduwr2mqbeasb2 पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/३९ 250 198200 675906 2026-09-29T23:08:28Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675906 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ('श्री व्याख्यात्मक आलोचना ) इसी भांति afe अपनी वर्तमान "विकता" को नहीं समझ पा रहा है। उसे कोई कमी खटक रही है, किसी मा का अनुभव हो रहा है। अभाव की यही कसक वेदना वाद की श्राधार शिला छायावाद का मूल मंत्र है । स्वरों में हाहाकार विकलता का क्या कवि में afa कहता है मेरा भोगसागर रूपी हृदय करुणा से भरा हुआ अपनी प्राकृत अवस्था में कलकल निनादी गति से बह रहा था। किन्तु न जाने क्यों उसका वह स्वच्छ वाता संगीत सम्बाधित हो गया है, उसकी कड़ियां टूटी हुई हैं, जैसे उसमें कोई दोष आगया हो, कोई कमी हो गई हो । जैसे ना से संक्षुध होने पर समुद्र का संगीत गरज में परिवर्तित हो जान है उसी भांति वेदना से दुभित होकर मेरे भर गया है। मेरे करुणाई हृदय की इस कारण है, वह पूछता है अपने मन से अपनी वर्तमान दशा की चेतना जगती है तो वह अपनी दशा पर स्वयं चकित होता है। वह समझ नहीं पा रहा है कि ऐसा क्यों हुआ १ जिसने कल तक मग में पलक पांवड़े बिछाये थे उसने सहसा क्यों आखें फेर लीं ? मनोभाव की करवट में टीस चुभन का डोलना था कि मन अशांत हो गया। संगीत का अवरोह 'नीम' की अपेक्षा करता है। प्रेम भी तो जीवन का संगीत है फिर दुखे मन के स्वरों में हाहाकार का उद्देजन भर जाना स्वाभाविक है। अनुभव से आये हुए विषयों के जो संस्कार चित्त में पड़े हैं उनका किसी निमित्त को पाकर स्फुरित हो जाना ही 'स्मृति' है । यह वृत्ति भी अन्य वृत्तियों की भांति दो प्रकार की होती है (१) "क्लिष्ट जिससे भोगों में राग-द्वेष उत्पन्न होता है। (२) अष्टि जिससे भोगों में विराग उत्पन्न होता है। वर्तमान दुःखद अवस्था में बीती मुख पूर्ण घड़ियां याद आ ही जाती हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों में:---<noinclude></noinclude> 5fem1e4jjfll59veqr5gy0idq8uii8g पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/४० 250 198201 675907 2026-09-29T23:08:42Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ (यो मायात्यक आलोचना ) 'सुख को मधुर बनाने दाते दुख में गूज नहीं सकते दुम में उनकी प्रव मृत नहीं सकते " विजय शेती हमें सता बहु पीड़ायें होती स्मृति का चित्र विदित पतियों में देखिए--- 'सूती मेरे गंधा जाता भर जाती सुख की देवी टनिक में लोते की याद दिलाती जब अतीत का तिरोभाव हो जाता है तब स्मृति द्वारा ही मन अतीत के दर्शन करता है । अंग्रेजी के विख्यात कवि "शेली" ने निखाः-- मरज मोरी एण्ड राइट इटस् ग्रेज --- दाई मोन्टेड व १ कम, ट्रेस द इट आफ जोरी फ्लेड फारनाऊ दिव फाइनान दिवस बाऊ तथा टी० गूर० ने भी लिखा:-- चन्द मेमोरी त्रिगस् दि लाइट ग्राफ प्रदर जयउड मी फेस पर संस्कार की मीमांसा करते हुए बताया गया है कि प्राणी जो कुछ कर्म करता है एवं अपनी इन्द्रियों तथा मन बुद्धि द्वारा जो कुल अनुभव करता है वह सब का सब उसके अन्तःकरण ने संस्कार रूप में संचित रहता है। उक्त संस्कार दो प्रकार के होते हैं। एक वासना रूप जो स्मृति के हेतु हैं दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि पुनर्जन्म आयु और भोग के हेतु हैं ।<noinclude></noinclude> hbx736d9mltw8cdcq55ox3yexp4s84y पृष्ठ:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf/४१ 250 198202 675908 2026-09-29T23:08:59Z AMAN KUMAR 6475 Ocr 675908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>________________ ६ ('आँ' व्याग्यात्मक आलोचना ) 'आस' को उपर्युक्त प्रथम चार पतियों में फ़्यू" का उल्लेख है। 'हृदय' एक शारीरिक अवयन है। यही 'य' गर्ल के आकार वाला कमल है जा चिन का स्थान है। जगत में जो 'ह्रदय है नही भार जगत भ "मानस" है ल जिस समय हृदय सागर में वेना को कम से एक कोलाहल मचा हुआ है उसी समय 'मानस सागर' से भी एक प्रतिक्रिया हो रही है। स्मृति के स्फुरण का चित्र करि आगे वाली पत्तियों में यो करता है ' मानस सागर के क्यो लोल लहर की ग पर कच कल अनि मे है कहती कुछ विस्तृत बीती बातें' स्मृति के स्फुरण का इतना सजीव वर्णन किश्चित ही आर कहीं उपलब्ध हो | "कहती" श के प्रयोग ने एक रूप या कर दिया है जैसे कोई कानो मे कुछ अनक रहा हा । 'लोल लहर" तथा 'कज-कल ध्वनि' की 'वन्यात्मकता कितनी मनोहारिणी है। छायावा की व्याख्या करते हुये स्वय प्रसाद ने बताया है कि stars set की विशेषतायें हैं ""वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा उपचार वक्ता के साथ रानुभूति की विवृत्त " | विचार की दृष्टि डालने पर उपर्युक्त पक्तियों में ये सभी गुण मिलेंगे। वियोग के दुस की तीव्रता के साथ स्मृति के सुम की कोमलता का अनुभव ही ' वेदना" की साधना का प्रारण ₹ 1 कवि कुल गुरु कालिदास का निम्नानि श्लोक इस सम्बन्ध म विचारणीय है.-<noinclude></noinclude> g6zhcxq6yz99yvx4l8ag7nvx83tmmqx लेखक:विश्वनाथ लाल 'शैदा' 100 198203 675912 2026-09-30T05:34:25Z AMAN KUMAR 6475 नए लेखक को जोड़ा 675912 wikitext text/x-wiki {{author | firstname = विश्वनाथ | lastname = लाल 'शैदा' | first_initial = व | description = }} == रचनाएं == * [[विषयसूची:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf|आँसू]] * [[हिन्दी साहित्य : पिछला दशक]] * [[जलते प्र‌श्न]] [[श्रेणी:आलोचक]] [[श्रेणी:1903 में जन्म]] 8qjlu0ux7g065vfo5ghqtd8qs9srq3d श्रेणी:1903 में जन्म 14 198204 675913 2026-09-30T05:37:32Z AMAN KUMAR 6475 नई श्रेणी जोड़ी 675913 wikitext text/x-wiki {{births by year |century = 19 |decade = 0 |year = 3 }} gilg2ay0h2odjc9nurmi1c47smgpolg पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/१ 250 198205 675922 2026-09-30T07:14:20Z AMAN KUMAR 6475 /* आवश्यक नहीं */ 675922 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="AMAN KUMAR" /></noinclude><noinclude></noinclude> 8gmk29zusg0s0v08qaxifkprtq5lnve पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/२ 250 198206 675923 2026-09-30T07:18:16Z AMAN KUMAR 6475 /* अशोधित */ "&nbsp; <poem>{{c|{{xxx-larger|'''हिन्दी नाटक'''}} {{dhr|9em}} {{larger|'''डॉ० बच्चन सिंह'''}} {{dhr|9em}} साहित्य भवन (प्राइवेट लिमिटेड, 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2026-09-30T07:27:46Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 675928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" />{{dhr|12em}}</noinclude><poem> {{c|श्रद्धेय आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी को साग्रह और सादर}} </poem><noinclude>{{dhr|12em}}</noinclude> ssmh88ifr6i9a0xm9zpe7ocj8931vzw पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/७ 250 198211 675929 2026-09-30T07:28:01Z AMAN KUMAR 6475 /* आवश्यक नहीं */ 675929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="AMAN KUMAR" /></noinclude><noinclude></noinclude> 8gmk29zusg0s0v08qaxifkprtq5lnve पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/९ 250 198212 675930 2026-09-30T07:30:22Z AMAN KUMAR 6475 /* अशोधित */ "वे सूत्रधार कहे जा सकते हैं, यद्यपि आज के नाटकों में अधार नहीं होते। ऐसे व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता न शापित करना अन्याय है । किन्तु अपने निकटवर्ती बंधु के प्रति उसे प्..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 675930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AMAN KUMAR" />&nbsp; {{c|६}}</noinclude>वे सूत्रधार कहे जा सकते हैं, यद्यपि आज के नाटकों में अधार नहीं होते। ऐसे व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता न शापित करना अन्याय है । किन्तु अपने निकटवर्ती बंधु के प्रति उसे प्रकाशित करना भी कहाँ का न्याय है ! हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी --लेखक<noinclude></noinclude> ev4ltuuluynvzzdlksz8hdvsylvo020