विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.23 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१० 250 176573 675999 619191 2026-10-12T08:15:13Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 675999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude> ( ७२ ) पुंडीर बीर मंजर भिरन, लरन तिरच्छो लगयो । नव बधू जेम संका सुबर, उद्दौ[?] जानि जिमि भगयो ॥ छं० ७२ ॥ रू० ६० । भावार्थ—रू० ५६—दृढ़ (=मुख्य) छत्र अपने सर पर धारण कर जैत सेनापति बना और उसने सेना को चन्द्रपुंडीर[?] खड़ा किया । सब राजे महाराजे एकत्रित हुए । एक सिरे पर हुसैन ख़ाँ था और दूसरे सिरे पर पुंडीर था और बीच में वीर योद्धा रघुवंशी राम था । सॉंवल का योद्धा और सारंग दे गौरी के संमुख पड़े (या गौरी के लानों[?] पर सामने से आक्रमण करने के लिये प्रस्तुत थे) । वे दोनों (चामंड और हुसैन ख़ाँ) दोनों सिरों पर बहुत सी छोटी और बड़ी तोपें लिये हुए क्रोधित खड़े थे । रू० ६०—छठी घड़ी आधी बीती थी कि मध्याह्न का सूर्य सर पर आ गया । शूरों[?] ने कायरों के कंधे सर से काट दिये जब वे हरिणों के समान उन के आगे पड़ भागे । पूरी आधी घड़ी तक तलवार से तलवार बजती रही । (शूरवीरों की) अभिलाषा थी कि सामने शत्रु मिले और उनका ध्यान तलवारों की मूठों पर था । युद्ध में शत्रु के दल का नाश करने वाले पुंडीर ने जब एक पक्ष से वार किया तो गौरी की सेना इस प्रकार भाग खड़ी हुई जिस प्रकार नव वधू स्वर्णोदय[?] देखकर अपने पति के पास से लज्जावश भाग जाती है । शब्दार्थ—रू० ५६—मुजफ़्क[?] (अ० [अरबी शब्द]= मुज़फ़्फ़र[?]) = दृढ़ ; यहाँ मुख्य से तात्पर्य है । होनेले ने (=अ० [अरबी शब्द]) से जो उत्पत्ति की है वह यहाँ ठीक नहीं है । मु—दृढ़ । अपेश=अपना ; अर्पित । छिति सिर छत्र=सिर पर छत्र लगाया अर्थात् सेनापति बना । अद्धरिर[?]=अद्धरित हुआ । राजू=राजा गया । इत्र तहाँ इकम=वहाँ एकत्रित हुए । एक अग्र=एक सिरे पर । बाम अग्र=दूसरे सिरे पर । पुंडीर=चंद पुंडीर । साभिमान्=उपभो (=उप्भो)=उपस्थित हो ; सॉंवल=सॉंवला योद्धा ; सॉंवली—राजपूतों की एक जाति भी कही जाती है जिसका ठीक पता नहीं चलता । टॉड ने (Rajasthan. Vol. I, p. 93) और उनके अनुसरण पर शेरिंग ने (Hindu Tribes and Castes. Vol. I, p. 148) में इन्हें प्रमार जाति की २५ शाखाओं में से एक तथा मारवाड़ निवासी और पूगल का अधिपति बताया है । दूसरी ओर (Asiatic Journal. Vol. XXV, pp. 106) में टॉड का कथन है कि सॉंवला, परिहार जाति की एक प्रशाखा है और शेरिंग ने (वहीं, पृ० १५१ में) झॉंसी ज़िले के परिहारों के पूर्वजों में एक 'सारंग दे' का नाम लिया है । सारंग दे=यह वीर Hindu Tribes and Castes. p. 151 और<noinclude></noinclude> 844132f0xr4wgnvovny1kt7z799b4ub पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३११ 250 176574 676000 619192 2026-10-12T08:18:42Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676000 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>( ७३ ) Asiatic Journal. Vol. XXV, p. 106 में वर्णित परिहार जाति का नहीं[?] वरन् कोई दूसरा वीर है जो सॉंवलों का चौहान वंश का था । उतरे[?]=भगदना[?] । दुहुँ बाँह=दोनों सिरों पर । उपमेति[?] रूप=क्रोधित उपस्थित थे । रू० ६०—छट्ठि=छठवीं । पटिय=घड़ी । कंच=कंधे । कड्ढि=काटा । कुरंग=हरिण । लोह सों लोह लुरक्के=लोहे से लोहा लड़कता रहा । कंक=तलवार की मूठ ; परक्के=लरकती थी । चिंत में कंक परक्के=चित्त में तलवार की मूठ लटकती थी ध्यान तलवार की मूठ पर था । भीर=दल के दल । मंजर=मंजन करने वाला । लरन तिरच्छो लगयो=अब उसने तिरछे पक्ष से लड़ना प्रारंभ किया अर्थात् जब उसने एक पक्ष से वार किया । जेम=जिस प्रकार । संका < सं० शंका (शंकित होकर या सङ्कोच होकर) । सुबर=स्वामी, पति । उदौ=उदय (सूर्योदय) । जानि=जानकर । जिमि=जैसे । भगयो=भाग जाती है । नोट—रू० ६०—की अंतिम दो पंक्तियों का अर्थ होनले महोदय ने इस प्रकार किया है— "Pundir seeing the slaying and fighting multitude, drew aside from fighting, just as a newly married woman, from shyness towards her husband, makes off on noticing the sun's rising." "चंद पुंडीर ने छक्क पाकर यवन सेना पर तिरछे ढंग से इस प्रकार बाचा किया कि उनके पैर उखड़ गये ।" रासो-सार, पृ० १०१ । छंद भुजंगी[?] मिले चाइ चहुआन सा चाँपि गौरी । स्वयं पंच कोरी निसानं बहोरी ॥ बजे आवधं संभरे काढ कोसं । तिनं नीसांन मिलि अद्धकोसं ॥ छं० ७३ ॥ बरं बंवरं चौर माहीति साई । हुले छत्र पीतं चले यार धाई ॥ छुले सूर हक्के हहक्के पचारं । घले बघ्य दोऊ बरं आ अपारं ॥ छं० ७४ ॥ __________ (१) ना०—घने (२) ना०—[?] (३) ए०—अपारं[?]<noinclude></noinclude> bgn3vjvlxscbetarickt103qto8wpqj 676001 676000 2026-10-12T08:20:39Z Manvikesarwani09 6620 676001 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align:center;">( ७३ )</div> &emsp;Asiatic Journal. Vol. XXV, p. 106 में वर्णित परिहार जाति का नहीं[?] वरन् कोई दूसरा वीर है जो सॉंवलों का चौहान वंश का था । उतरे[?]=भगदना[?] । दुहुँ बाँह=दोनों सिरों पर । उपमेति[?] रूप=क्रोधित उपस्थित थे । &emsp;रू० ६०—छट्ठि=छठवीं । पटिय=घड़ी । कंच=कंधे । कड्ढि=काटा । कुरंग=हरिण । लोह सों लोह लुरक्के=लोहे से लोहा लड़कता रहा । कंक=तलवार की मूठ ; परक्के=लरकती थी । चिंत में कंक परक्के=चित्त में तलवार की मूठ लटकती थी ध्यान तलवार की मूठ पर था । भीर=दल के दल । मंजर=मंजन करने वाला । लरन तिरच्छो लगयो=अब उसने तिरछे पक्ष से लड़ना प्रारंभ किया अर्थात् जब उसने एक पक्ष से वार किया । जेम=जिस प्रकार । संका < सं० शंका (शंकित होकर या सङ्कोच होकर) । सुबर=स्वामी, पति । उदौ=उदय (सूर्योदय) । जानि=जानकर । जिमि=जैसे । भगयो=भाग जाती है । &emsp;नोट—रू० ६०—की अंतिम दो पंक्तियों का अर्थ होनले महोदय ने इस प्रकार किया है— <div style="margin:0 2em;"> "Pundir seeing the slaying and fighting multitude, drew aside from fighting, just as a newly married woman, from shyness towards her husband, makes off on noticing the sun's rising." "चंद पुंडीर ने छक्क पाकर यवन सेना पर तिरछे ढंग से इस प्रकार बाचा किया कि उनके पैर उखड़ गये ।" रासो-सार, पृ० १०१ । </div> <div style="text-align:center;">छंद भुजंगी[?]</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> मिले चाइ चहुआन सा चाँपि गौरी । स्वयं पंच कोरी निसानं बहोरी ॥ बजे आवधं संभरे काढ कोसं । तिनं<ref>ना०—घने</ref> अग्र नीसांन मिलि अद्धकोसं ॥ छं० ७३ ॥ बरं बंवरं चौर माहीति साई । हुले छत्र पीतं चले यार धाई ॥ छुले सूर हक्के हहक्के<ref>ना०—दहके[?]</ref> पचारं । घले बघ्य दोऊ बरं आ अपारं<ref>ए०—अपारं[?]</ref> ॥ छं० ७४ ॥ </poem> </div> <references/><noinclude></noinclude> olbm7qtj7dkjleivuf5o11exii2tm1t पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१२ 250 176575 676002 619193 2026-10-12T08:22:44Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676002 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ७४ )</div></noinclude><div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> बतमंग[?] छुट्टे परे औन धारी । मनो दंड सुक्की बगी साइ बारी ॥ मनै कंग कंधं[?] बजे के सीस भारी । तहाँ जोगमाया जकी सौं[?] विचारी<ref>मो०—तुसंध षिच्चरी[?]</ref> ॥ छं० ७५ ॥ बही स्रांग बग्गी बही धार धारं । तहाँ सेन दूनूं करें मार मारं ॥ मनै रंग मैरू गहे ताल बीरं । सुरंग षच्चरी[?] बंधि नारद तीरं ॥ छं० ७६ ॥ इसी जुद्ध वद्ध उबद्धंड भानं । मिरे गोरियं सेन षरू चाहुआनं ॥ करै कुंडली हेम बग्गी प्रमानं । मनो मंडली रास सं कन्ह ठानं ॥ छं० ७७ ॥ कुटी आवधं माहि सामंत सूरं । बजे गोर जोरं मनो बज्र भूरं ॥ लगे धार धारं तिनै षग्ग छुट्टे । कुटे कुंभ भग्गी करंकं उछुट्टे ॥ छं० ७८ ॥ पुट्टी ग्रोम[?] मोम्भं[?] पर्यौ दिव राजं । मनो मेघ छुट्टे प्रझमी[?] समाजं ॥ पराक्रम राजं प्रयोधिपे[?] रुठ्ठौ । रन रू घि[?] गोरी समं जंग जुझ्झौ ॥ छं० ७९ ॥ रू० ६१ ॥ </poem> </div> <div style="text-align:center;">दूहा</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> तेज छुट्टि[?] गोरी सुबर, दिय षीरज तपार[?] । मो उपमै सुसान को, बीर परिद्द न वार ॥ छं० ८० ॥ रू० ६२ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६१— &emsp;गौरी चौहान के जितने की इच्छा से बड़ा[?] । उसके साथ पाँच कोसों[?] ... [स्कैन से टाइप करें] । (आधे कोस के आधे कोस और चारों ओर नगारे) बज रहे थे ॥ छं० ७३ ॥<noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> pc91045l1ej41q55gmdo9vhvau5d7zx पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१३ 250 176576 676003 619194 2026-10-12T08:23:56Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676003 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ७५ )</div></noinclude>&emsp;अनेकों हुरें[?] व चँवर सूर्य किरणों से उनकी छाया कर रहे थे । पीले छत्र हिल रहे थे । शूरवीर उत्साह से पुकार कर मारो मारो कहते थे । दोनों ओर की सेनायें युद्ध भूमि में उसी प्रकार दौड़ रहीं थीं मानों अखाड़े में उतर रहीं हों । वा—दोनों ओर के शूरवीर (परस्पर) चिल्लाकर झूलते और गरजते हुए ललकारते थे और (मल्लों सदृश) कमर में हाथ डाले (युद्ध भूमि रूपी) अखाड़े में जा धरते (=लड़ने लगते) थे । छं० ७४ । &emsp;सर कटते ही रक्त की धारा वह निकलती थी मानों आग की ज्वाला निकल रही हो । कबंध नाचते थे और कटे हुए सिर चिल्लाते थे । वहाँ योग माया (दुर्गा) भी (यह दृश्य देखकर) स्तंभित हो विचार में पड़ जाती थीं । छं० ७५ । &emsp;साँग बखकर[?] घुस जाती थी, तलवार से तलवार बज रही थी और दोनों सेनायें मारो मारो चिल्ला रहीं थीं । भैरव प्रसन्न होकर नाच रहे थे, गण ताल दे रहे थे और सुंदर अप्सरायें नारद के समीप खड़ी थीं । छं० ७६ । &emsp;इसी युद्ध काल में सूर्य अस्त हो रहे थे तथा गोरी और चौहान की सेनायें लड़ रहीं थीं । सैनिक तलवार को ऐसा कुंडलाकार घुमाते थे मानों कृष्ण ने रास-मंडल ठाना हो । छं० ७७ । &emsp;सामंतों और शूरों द्वारा फेंके आयुध गौरी की ओर जलते हुए वज्र के समान लगते थे । तलवारों से तलवारें बजकर धड़ कटते थे, दोनों कुंभ फूटते थे और खोपड़े टूटते थे । छं० ७८ । &emsp;पृथ्वी पर रक्त की बहती हुई धार ऐसी सुंदर मालूम होती थी मानों वर्षा काल में बीरबहूटियाँ इकट्ठी हो गई हों । पराक्रमी महाराज पृथ्वीराज युद्ध में गौरी से क्रोध पूर्वक भिड़े रहे । छं० ७९ । &emsp;रू० ६२—छं० ८०—सुभट गौरी का तेज (=साहस) छूट गया [तब] तातार [ मारूफ खाँ ] ने [ यह कहकर ] धैर्य दिया (=प्रबोधा) कि मेरे रहते सुलतान पर भीर पड़ी ही नहीं (या—मेरे रहते हुए सुलतान पर कष्ट नहीं पड़ सकता) । [ "जब तक मैं उपस्थित हूँ तब तक सुलतान के पास सेना है"—होनले ] । &emsp;शब्दार्थ—रू० ६१—मिले चाइ=मिलने के चाव से । चाँपि=दबाना, बढ़ना । पंच कोरी=पाँच कोड़ी=सौ । निसान अहोरी (निशान अहेरी)=अचूक निशाना मारने वाले अर्थात् धनुर्धर सैनिक । आवधं < आयुध=अस्त्र शस्त्र । नीसान < फा०[?]=नगाड़े । तिनं अग्र=उनके आगे । बंबरं=हुरें[?] । चौर=<noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> nz5wvvr5yjxihcbk82xu9k8t22lw441 पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१५ 250 176578 676004 619196 2026-10-12T08:26:38Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676004 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ७७ )</div></noinclude>ओर लगते हैं । बज्ज < वज्र । भूरं = सूखे (यहाँ 'जलते हुए' का संकेत है) । तिनं घरह तुट्ट = उनके धड़ टूटते हैं । दुहुँ = दोनों । कुम्भ = कनपटी । भगे < [सं०] भग्न । करक = हड्डी । (उ०—'लेकिनी करौ करक की जायसी') । छुट्ट[?] = फूटना । श्रोन < श्रोणित = रक्त । भोमं = पृथ्वी । अपो बिंब राज = ऐसी सुन्दरता हो जाती है । मेघ बुड्के[?] = मेघ की बूँदियाँ, बीर बहूटियाँ । पराक्रम राजं = पराक्रमी राजा । प्रथीपति < पृथ्वीपति = पृथ्वीराज । रूट्यौ = रूठना (यहाँ 'क्रोध पूर्वक' का संकेत है) । रुधि = रुँधकर । समं = साथ । जंग < फा० [फ़ारसी शब्द] = युद्ध । जंग जुट्यौ = युद्ध में भिड़ा रहा । रू० ६२—तेज छुट्टि = साहस भंग हो गया । सुबर < सुभट = श्रेष्ठ वीर । दिय धीरज = धैर्य दिया, प्रबोधा । ततार = तातार मारूफ खाँ । मो = मेरे । उपभै (उभै) = उपस्थित होते । भीर = कष्ट । परीइ न वार = इस बार पड़ी ही नहीं । <div style="text-align:center;">छंद मोतीदाम</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> रतिराज के जोवन राजत जोर । चंप्यौ ससिरं उर सैंसव कोर ॥ यन मधि मद्धि मधु धुनि होय<ref>ए० कृ० को०—कोह, कोय, होह; ना०—जोय</ref> । तिनं उपमा बरनी कबि कोय ॥ छं० ८१ ॥ सुनी बर आगम जुब्बन<ref>ए०—जुडन</ref> बैन । नच्चौं कहूँ न सु वदिम मैन ॥ कहूँ दुरि कनन पुच्छत<ref>मो० ए० को०—पुच्छन</ref> नैन । कहौं किन अब्ब दुरि दुरि बैन ॥ छं० ८२ ॥ सुनि रोरन सैसव दुंदुभि बजि । उभे रतिराज स जोवन<ref>सुजोवन, ए०—सजीवन</ref> सजि ॥ कही बर और सुरंगिय चपे[?] । नर<ref>ना०—रन, ए० कृ० को०—नर</ref> होइ बने[?] बन भज्जि ॥ छं० ८३ ॥ इयु मीन नलीन भये अति भय[?] । विश्रम भारु परीबहि[?] मुर ॥ मनुं मारुत फौज प्रथमं चल्लाइ । गति तजि सकुच्चि[?] कल्ले मिलि आइ ॥ छं० ८४ ॥ </poem> </div><noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> f85jywlgtwbgs6cr0yt08eyu7fo4ds9 पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१६ 250 176579 676005 619197 2026-10-12T08:27:53Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676005 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ७८ )</div></noinclude><div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> दहि सीतम धूप न कंदहि जीव । प्रगटै उर तुच्छ सोऊ उर भीव ॥ बिन पल्लव कोर<ref>ना०—कोरहि तारहि रंभ; ए०—कोरहि तारे संभ</ref> हिता रहि संभ । गहना बिन बाल बिराजत श्रंभ ॥ छं० ८५ ॥ कति कंठन कंठ सज्यौ अलि पंप । न उद्धिय भ्रंग नवेतिय श्रं ॥ सजी चतुरंग सज्यौ बजी[?] इन बनराइ । उप्पर सैसब जाइ ॥ छं० ८६ ॥ कवि मत्तिय जूह तिनं बहु चोर । नंतर[?] वैसंधय चंद्र कठोर<ref>ना०—वर्म तथ संघय चंद कठोर</ref> ॥ छं० ८७ ॥ रू० ६३ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६३— &emsp;जिस तरह ऋतुराज (वसंत) ने शिशिर को दबा लिया है उसी प्रकार यौवन ने शैशवावस्था को दबा दिया है और अब[?] ऋतुराज और यौवन का जोड़ा सुशोभित हो रहा है । उन (वसंत और यौवन) के बीच मधुर वार्तालाप होता है और उनकी कुछ उपमायें कवि वर्णन करता है । छं० ८१ । &emsp;यौवन का सुंदर आगमन जानकर क्या कामदेव उत्साहपूर्वक नहीं नाचने लगता ? कभी कान नेत्रों से जाकर पूछते हैं कि देखो दौड़ता हुआ कौन आ रहा है ? छं० ८२ । यह शिशिर का शब्द है या शैशव की दुंदुभी बज रही है ? या दोनों ऋतुराज और यौवन (युद्ध के लिये) सज रहे हैं ? (नेत्र कानों को उत्तर देते हैं कि) लाल रंग से अलंकृत होकर (या सुंदर वस्त्राभूषणों से सजकर) दोनों (मनुष्य) [ऋतुराज और यौवन] वन को भाग गये हैं । छं० ८३ । &emsp;नोट—"इय मीन नलीन भये अति रज्जि" इस पंक्ति से प्रस्तुत रूपक की अंतिम पंक्ति तक एक पंक्ति में यौवन और दूसरी में ऋतुराज व वसंत का क्रमशः वर्णन है । (वसंत ऋतु में) मछलियाँ (कमल के डंठलों के समीप) रहकर प्रसन्न होती हैं । (यौवन काल में) भय और विभ्रम (= संदेह) का भार लज्जा ढोती है । (वसंत में) अपनी बारी पर प्रथम मारुत देव अपनी (मृदुल वायु) चलाते हैं । (यौवन में) लज्जित चाल और संकोच इकडा हो जाते हैं ।<noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> 426mv5xupf1qz03awn2l7r3po0oaqzc पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१७ 250 176580 676006 619198 2026-10-12T08:29:28Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ७९ )</div></noinclude>(वसंत में) शीत से दग्ध प्राणियों को धूप से कष्ट नहीं होता है । (यौवन में) प्रेम का संचार मन में होता है और वही उर (हृदय) में भय का संचार करता है । (वसंत में) वृक्षों में पतझड़ हो जाता है परन्तु पत्तों के निकलने की फिर आशा रहती है । (यौवन में) भूषण विहीन होने पर भी बाला का मुँह सुंदर रहता है । (वसंत में) कोयलें अपना स्वर और भ्रमर अपने पंख सजाते हैं । (यौवन में) उड़ते हुए भौंरों के स्थान पर नवेलियों की काली आँखें दिखाई पड़ती हैं । अपने लिये चतुरंगिणी सेना सजाने के लिये (वसंत ने) वन के वृक्षों की पंक्तियाँ सजाई हैं और (यौवन पर) आक्रमण करने के लिये शैशव ने (दुंदुभी या ढोल) बजा दिया है । कवि की बुद्धि अनेक उपमाओं का कथन नहीं कर सकती । इन दो अवस्थाओं (शैशव और यौवन) के मिलन (वयःसंधि) का वर्णन चंद के लिये कठिन है । &emsp;शब्दार्थ—रू० ६३—रतिराज < ऋतुराज वसंत (कामदेव का साथी) । जोबन < यौवन । राजत=शोभित । जोर=जोड़ा । चंप्यौ=दाबकर, समाप्त करके । ससिरं=शिशिर ऋतु । उर शैशव कोर=शैशव के हृदय को छेदकर अर्थात् शैशव काल को दबाकर । उनी मधि मद्धि=उन (ऋतुराज और यौवन) के बीच में । मधु धुनि होय=मधुर वार्तालाप होता है । जुब्बन < यौवन । बैन < वचन=शब्द । उद्दिम < सं० उद्यम (उत् + यम + अल)=उत्साह पूर्वक । मैन < सं० मदन=कामदेव । दुरि=दौड़कर । क्रेनन < कर्ण=कान । दुरी दुरि[?]=१ हुआ ; दौड़ता हुआ । ससि रोरन=शिशिर का शब्द । उभे < उभय=दोनों । श्रोन < श्रवण=कान । सुरंगिय=सुरंग (लाल रंग जो होली के अवसर पर फेंका जाता है) । रज्जि=सजकर । नर दोउ=दोनों मनुष्य (ऋतुराज और यौवन) । चपे=दब गये (यहाँ छिप गये से तात्पर्य है) । मीन=मछलियाँ । नलीन < नलिन=कमल । अति रज्जि=अत्यंत (रंजित) प्रसन्न होकर । विभ्रम=संदेह । भारु=भार, बोझ । परीबहि < परिवाह=वहन करना, ढोना । भवभय[?] । तुच्छ—यह 'प्रेम' के लिये प्रयुक्त हुआ जान पड़ता है । नज्जि < सं० नज्जा[?]=शरमाना, लजाना ; तज्जा । मारुत=वायुदेव का नाम । मुर=मुड़ना ; अपनी बारी आने पर । फौज < अ०=सेना । सकुच्चि < संकोच । कछेकठे[?]=एक साथ इकट्ठे । दहि=जलाना । कंदहि=कष्ट पहुँचाना ; नाश करना । सोतम=शीत । अंष=आँखें । मत्तियमति=बुद्धि । जूह सं० यूथ > जूथ=समूह । अनंत[?]=वर्णन । वैसंधय < सं० वयःसंधि=दो अवस्थाओं—शैशव और यौवन का—मिलन । चंद कठोर=चंद कवि के लिये कठिन विषय है ।<noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> mygw58kq7d7grrwhj5ygdkpmqbw7nma पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१८ 250 176581 676007 619199 2026-10-12T08:31:30Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८० )</div></noinclude>&emsp;नोट—मोतीदाम छंद का लक्षण—यह वार्णिक छंद है । इसके प्रत्येक छंद में चार जगण होते हैं । (१) 'प्राकृत पैङ्गलम्' में मौक्तिकदाम [मोतिदान-मोतियदाम=मोतीदाम=मोतियों की माला] छंद वर्णवृत्त के अंतर्गत माना गया है और इसका लक्षण इस प्रकार कहा गया है— <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> पओहर चारि पसिद्धह ताम ति तेरह मत्तह मोतिय दाम । पुव्वहि हारउ दिज्जइ थंत[?] वि स[?] ल छप्पण मत्त ॥ II, १३३ ॥ </poem> </div> (अर्थात् चार पयोधर वाला, तेरह मात्राओं का मोतीदाम छंद होता है । प्रत्येक चरण के आदि अंत में लघु रहते हैं । १६ चरणों के इस छंद में कुल २५६ मात्रायें होती हैं ।) (२) रूप-दीप-पिंगल में इसका निम्न लक्षण दिया है— <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> कली मधि भ्यार जगन बनाय करो षि[?] मन्त से षोडश पाय । बतावत शेस सुनो शुभ नाम कहावत छंद सु मोतियदाम । </poem> </div> (३) 'भानु' जी ने अपने 'छंद: प्रभाकर' में इस छंद को चार जगण (।ऽ।) वाला मात्र कहकर समाप्त कर दिया है । <div style="text-align:center;">छंद रसावला</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> बोल पुच्छे धनं । स्वामि जपे मनं । रोस लग्गे तनं । सिंह मर्द<ref>ना०—मंद</ref> मनं ॥ छं० ८८ ॥ छोह मोहं षितं । दांन छुट्टे नं[?] । नाम राज धनं । प्रंन सातुक्कनं[?] ॥ छं० ८९ ॥ मेच्छ बाहं बिनं । रत कंध दल्ल जा हल्ल जा ढाहनं । जीव ता सा हनं ॥ छं० ९० ॥ बान जा संवनं । पंषि जा बंधनं । स्याम सेतं धनी । पीत रक्तं घनी ॥ छं० ९१ ॥ यह मच्ची[?] घरी । रोस दंती फिरी । फौज फट्टी पुनं । सूर उपभे<ref>ना०—उम्मे</ref> धनं ॥ छं० ९२ ॥ </poem> </div><noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> 0awmg0lm15v0sr7agbgi8aybumg8vq5 पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३१९ 250 176582 676008 619200 2026-10-12T08:32:34Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676008 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८१ )</div></noinclude><div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> लेहु लेहु करी । लोह काढे कन्ह जा संभरी । पाइ मंडे अरी । फिरी ॥ छं० ९३ ॥ बीर हक्क करी । नैन स्तं बरी । बीर बज्जे भार पंड जा षोलियं । बीर सा बोलियं ॥ छं० ९४ ॥ धुरं । दंति कट्टे कुरं । कोरियं । फौज विष्फोरियं ॥ छं० ९५ ॥ दंति रुद्दी परे । अग्ग फूलं झरे । पन्नारियं । जावकं ढारियं ॥ छं० ९६ ॥ आननं हंकयं । अंग जा संचयं । सत्त सामंतयं । बोन सा पथ्थयं ॥ छं० ९७ ॥ फौज दोऊ फटी । जांनि जूनी टटी ॥ छं० ९८ ॥ रू० ६४ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६४—खच्च खच्च का शब्द अत्यधिक बढ़ गया । स्वामी (पृथ्वीराज) अपने मन में प्रार्थना करने लगे । उनको क्रोधावेश हो आया और मन में सिंह का साहस भर गया तथा माया मोह क्षीण हो गये । खूब दान दिये गये । राजा की प्रशंसा होने लगी । योद्धाओं ने सात्विक धर्म का ध्यान रक्खा । म्लेच्छों के हाथ काट डाले गये और उनके कंधों से रक्त की धारा बहने लगी । जिसकी ढाल गिर पड़ी उसके प्राण चले गये । (धनुष में) प्रत्यंचा पर संधाने हुए बाण जाल में फँसे हुए पक्षियों सदृश लगते थे । काली और सफेद (श्वेत) सेनायें थीं तथा पीले व लाल रंग की भरमार थी । काली पोशाक यवनों की, सफेद क्षत्रियों की तथा लाल पीला रंग रक्त व मांस का जान पड़ता है । घोर कोलाहल मचने लगा, (गोरी के हाथी क्रोधित होकर इधर उधर दौड़ने लगे (जिसके कारण) फौजें फट गई और शूर वीर स्थान स्थान पर झुंडों में खड़े हो गये । पकड़ो पकड़ो की पुकार मन्च गई (और) तलवारें निकल आई । [ यह देखकर ] कन्ह (अपने धनुष क.) प्रत्यंचा सँभाल इधर उधर दौड़ने लगे । वीर गरजे और उनके नेत्र रक्त वर्ण हो गये । खाँडे निकल व्याये (और सैनिक (गण)[?]) वीरों के समान बोलने लगे तथा क्रूरता पूर्वक लड़ने लगे । तलवारों के इधर उधर बार पड़ने से हाथी घायल हो गये तथा फौज छितरा गई । (अंत में) हाथी अवरुद्ध हो गये (तब उनपर) आग के शोले फेंके गये । सोने की पारियों से गुलाल डाला गया । (कटे हुए) मुँह (सिर) चिल्लाने लगे और<ref>ए०—जामं वयं</ref> ।<noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> tuznrpzvuzs5p6qiu2a5mxmpprwahsn पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२१ 250 176584 676009 619202 2026-10-12T08:40:44Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676009 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८२ )</div></noinclude>&emsp;फूलं भरे=आगे आग के फूल या शोले झाड़े (डाले) गये । हेम=सोना । पन्नारियं=पन्नारियों से । जावकं ढारियं=आलता डाला गया । जावकं आ०, अप० जावय < सं० यावकालता, लाख का रंग । आननं हंकयं=मुख चिल्लाये । अंग=शरीर । अंग जा नंचयं=कबंध नाचने लगे । सत्त सामंतयं=सात सामंतों ने[?] [ शाह की प्रथम बाढ़ में इन्हीं सात सामंतों को वीर गति प्राप्त हुई थी ] । वन[?] जाल, चटाई । चांन[?] सा पथ्थयं=शाह के पथ को रोक सी बनकर रोका । सा=वह ; सदृश । पथ्थयं=पथ, मार्ग । फौज दोऊ फटी=दोनों फौजें अलग अलग हो गईं । जानि जूनी टटी=टट्टी[?] भी हुई जान कर[?] । &emsp;नोट—रसावला छंद का लक्षण—इस नाम के छंद का पता उपलब्ध छंद ग्रंथों में नहीं लगता परन्तु इसका लक्षण विमोहा छंद के सर्वथा अनुरूप है । 'विमोहा' के नाम जोहा, विजोहा, द्वियोधा और विजोदा भी मिलते हैं—छंद: प्रभाकर, भानु । 'विमोहा' वर्णवृत्त है । 'प्राकृत पैङ्गलम्' में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है— <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> अक्खरा जं छत्रा पाच पाचं ठिया । मत्त पंचा दुग्गा विरिण जोहा गरणा[?] ॥ II, ४५ ॥ </poem> </div> [ अर्थात्—जिसके प्रत्येक चरण में ६[?] अक्षर, दस मात्रायें और दो गण (ऽ।ऽ) हों ] । संभव है कि रासोकार के समय में यह विमोहा छंद 'रसावला' नाम से भी प्रख्यात रहा हो । <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> सोलंकी माधव नरिंद, [षांन]<ref>'षांन' पाठ अन्य प्रतियों में नहीं है परन्तु डा० होनले ने इसे दिया है ।</ref> चिलप्पौ मुष लग्गा । सुबर बीर रस बीर, बीर बीरा रस पग्गा ॥ दुहुन[?] जुद्ध[?] जुध तेग, दुहुँ हथन उपभारिय<ref>ना०—उभारिय</ref> । तेग तुट्टि चालुक, बथ्थ परि कढि कटारिय ॥ अग अग रुक्कि ठिल्ले बलन, अधम जुद्ध रागे लरन । सारंग बंध घन वा परि, गोरी बै दिन्नौ<ref>ए० कृ० को०—दीनो, ना०—दिन्नौ</ref> मरन ॥ छं० ९९ ॥ रू० ६५ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६५—सोलंकी माधव राय का खिलजी खाँ से मुकाबिला पड़ा । दोनों श्रेष्ठ वीर थे (अतः आमने सामने आते हो) वीर रस में पग<noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> fi6nmycvdj1bvxrp3djqsduha56rh5t पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२२ 250 176618 676010 619260 2026-10-12T08:44:54Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८३ )</div></noinclude>गये । युद्ध में प्रबल दोनों वीरों ने दोनों हाथों से तलवारें उठा लीं । (अंत में लड़ते लड़ते) चालुक्य की तलवार टूट गई और तब उसने कमर से कटार खींच ली । परन्तु बैरियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया और घम[?] युद्ध होने लगा । सारंग के बंधु के अनेक घाव लगे जिससे यह गिर पड़ा और गोरी ने उस पर मरने वाला घात[?] किया (अर्थात् गोरी ने उसे मार डाला) । &emsp;शब्दार्थ—रू० ६५—सोलंकी (या चालुक्य)—राजपूतों की जाति विशेष । अन्हिलवाड़ापत्तन गुजरात में राज्य करने वाले इसी राजपूत कुल के थे । भीमदेव द्वितीय उपनाम भोला जयचंद के बाद पृथ्वीराज का भयानक[?] प्रतिद्वंद्वी था । अपने पिता सोमेश्वर की हत्या का बदला लेने के लिये कवि का कथन है कि पृथ्वीराज ने भीमदेव को युद्ध में मार डाला (रासो—सय[?] ४४) । यह बात 'रासमाला' (Rasmala. Forbes Vol. 1, pp. 221-30) से भी प्रतिपादित होती है । साथ ही चंद ने सीमदेव[?] के पुत्र कचरा चालुकराव या कचराराय—चालुक पहु के विषय में लिखा है कि संयोगिता हरण[?] वाले युद्ध में वह पृथ्वीराज के साथ था और उसी युद्ध में गंगा में डूब गया [रासो सम्यो ६१ तथा Asiatic Journal, Tod, Vol. XXV, pp. 106, 282] । कुछ भी हो यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि सोलंकी वंश के अनेक राजकुमार पृथ्वीराज के सामंत थे । माधव सोलंकी भी इन्हीं में था और दूसरा सारंग था जिसका वर्णन अगले ६० ७० में आता है । सोलंकी या चालुक्य राजपूत वंश छत्तीस राजवरानों[?] में था तथा चार अग्नि कुलों में एक था । [सोलंकियों का वि० वि० देखिये—Rajasthan Tod. Vol. I, pp. 27, 100; Hindu Tribes and Castes. Sherring, Vol. I, pp. 156-58; Races of N. W. India, Elliot, Vol. I, p. 50] । बिलची=खिलजी खाँ । षुष लग्गा=सामने आया ; मुकाबिला हुआ । सुबर बीर रस बीर=सुभट वीररस में तो बीर थे ही । बीर बीरा रस परगा=वीर वीर रस में पग गये । दुहुन[?] जुद्ध जुध=युद्ध में दक्ष दोनों ने । उपभारिय=उभारी अर्थात् उठाई । तुट्टि=टूट गई । तेग=तलवार । चालुक्य=सोलंकी माधव राय के लिये आया है । बथ्थ < सं० वस्ति=कमर [ बथ्थ < बक्षस्थल=छाती ] । कढि=काढ़ना, कटार [ ] दे० Plate No. III । सारंग बंध=खींच लेना[?] । कटारिय=सारंग का संबंधी[?] ; सारंग (तलवार) + बंध (बाँधने वाला) ; सारंग (तलवार) + बंध (बार, धात्र) । दिन्नौ मरन=मरने वाला आघात किया ।<noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> 3suekr79vz7xchgxi3forrec5hq4wze पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२३ 250 176619 676011 619261 2026-10-12T08:46:33Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८४ )</div></noinclude><div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> टकि[?]<ref>ना०—षग्य, हा०—षग्य</ref> जुटिक, जमन सेन समुद्र<ref>ना०—समंद</ref> गजि । हयगय बर हिल्लोर, गरु गोइंद दिष्थि सजि ॥ अगम्म[?] ठेल अभंग<ref>ना०—अनम</ref>, नीर असि मीर समाहिय । अति दल बल हुट्टि, पच्छ लज्जी परवाहिय ॥ रज तज्ज रज्ज मुक्ति न रही, रज न लगी रज रज भयौ । उच्छुंग अच्छरसों लयौ, देव बिमानन चढ़ि गयौ ॥ छं० १०० ॥ रू० ६६ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६६—जब वह (खान गोरी या खिलजी) तलवार रोक कर खड़ा हुआ तो यवन सेना समुद्र की भाँति गरजने लगी । हाथी और घोड़ों को बड़ी लहर सदृश आते देख गरु गोइंद ने अपने को (आगे बढ़कर युद्ध करने के लिये) सजाया । अगम्य, ठेल, अभंग जल की धार सदृश मीर सामने आये [या—अगम्य अटेल अभंग जल की भाँति असमी मी गे बढ़े] और अत्यधिक दल बल से ग्राहुडि (गरु गोइंद)[?] को लज्जित कर प्रवाहित कर दिया [अर्थात् हुट्टि को मार डाला] । यद्यपि उसका (पृथ्वी का राज्य) चला गया परन्तु राजा होने से वह न रज सका । उसके धूल नहीं लगी (अर्थात् इस प्रकार के विषम युद्ध के वह भयभीत हो विमुख नहीं हुआ वरन् वीरता पूर्वक युद्ध करके वीर गति को प्राप्त हुआ ; वा—'रजन लग्ग' का अर्थ 'धूल में लगकर या गिरकर' भी लिया जा सकता है) या [—वैरी के बड़े दल बल को रोकने में समर्थ होकर उसने अपने पक्ष की लज्जा को धो दिया] । राज्य (वैभव) त्याग रूपी रज (< रज्जु = रस्सी) उसे रोक न सकी, वह रज रज (टुकड़े टुकड़े) हो गया परन्तु उसने अपने रज (धूल) न लगने दी ; (और) वह रज (= श्राकाश = स्वर्ग) में पुन: रज (= राजा या राज्यपद पर) हो गया । अप्सराओं ने उसे गोद में ले लिया और देवताओं के विमान पर चढ़कर वह (स्वर्ग लोक) चला गया । &emsp;नोट—यवन सेना के कई एक सिपाहियों ने मिलकर माधवराय को मार डाला । वह देखते ही गोइंद राव का भाई यवन दल रूपी समुद्र को दीर्घकाय मगर की भाँति मथता हुआ खिलजी खाँ के ऊपर टूट पड़ा परन्तु उसे भी कई एक मुसलमान सिपाहियों ने काट कर टूक टूक कर दिया।" रासो-सार, पृष्ठ १०२ । प्रस्तुत कवित्त में दीर्घकाय मगर या उसका पर्याय-वाची कोई शब्द नहीं है । रासो-सार लेखकों की 'मगर' की उपमा सचमुच[?]<noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> ib6j386blg8tt1m2hccoaofhq1m6kcb पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२४ 250 176620 676012 619262 2026-10-12T08:50:17Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८६ )</div></noinclude>अनूठी है । पानी की धार का वर्णन ता इस रूपक में है ही अब पानी में रहने वाला भी कोई होना चाहिये और वह 'दीर्घकाय मगर' से अच्छा और कौन कहा जा सकता था । &emsp;शब्दार्थ—रू० ६६—खग्य < सं० खड्ग = तलवार [ दे० Plate No. III ] । हटकि = रोकना । टिक = टिकना—(यहाँ स्थिर होकर खड़े होने से तात्पर्य है) । जमन < सं० यवन । समुद (: समंद) < समुद्र । गजि = गरजना । हय = घोड़े । गय < सं० गज = हाथी । वर हिल्लोर = श्रेष्ठ हिलोर अर्थात् बड़ी लहर । गरु गोइंद—यह पृथ्वीराज के प्रसिद्ध सामंतों में था । अन्य राजाओं के साथ भी[?] रायल समरसिंह को दहेज दिया था ["दियौ राव गोइंद = श्राहूह[?] राज । दिय तीस हथ्थी महा तेज सार्ज ।" सम्यौ २१, छं० १०८] । इसने दो बार गोरी को पकड़ा था ["गोद राव गहिलौत नेस । जिन दोव फेर गज्जन गहेस ॥" सम्यौ २१, छं० [?]] । साधारणतः इसके ये नाम मिलते हैं—गोविन्द राव, गोविंद राय, गोविन्द राज । यह गुहिलोत (गुहिल पुत्र) वंश का था अतएव गुहिलोत राजवंशी उपाधि 'आहुड' भी इसको मिली थी ("शोनंद[?] राजा हुड पति") । गरु गोइंद की मृत्यु इसी कवित्त में स्पष्ट वर्णित है इसलिये यह प्रसिद्ध गोविन्दराज गुहिलोत नहीं है वरन् उसका भाई या अन्य संबंधी है । प्रसिद्ध गोविन्दराज संयोगिता अपहरण के अवसर पर पृथ्वीराज के साथ था ["entre[?] गोद कहि । वर ढिल्ली सुर पान । हय्य वीर विरुभाइ चलि । वर लग्गै सुरतान ॥" सम्यौ ६१] । चंद बरदाई ने उसकी प्रशंसा इस प्रकार की है ["गुरू राव गोविंद चंदे सु इंद । सुतं-मंडलीकं सबै सेन चंद ॥" सम्यौ ६१, छं० १११] । अंत में इसी युद्ध में बड़ी वीरता से लड़कर वह पंचत्व को प्राप्त हुआ ["उठे हक्कि करि भारि कोपेज डालं । हये प्यार मीरं दुवाहंड ढालं ॥ उरं लग्ग जंबूर धारास बानं । पर्यौ राव गोवंद दिल्ली रुजानं ॥" सम्यौ ६१, छं० १४७२] । वह पृथ्वीराज के बहनोई समरसिंह गुहिलोत का निकट संबंधी रहा होगा । "उसने पृथ्वीराज की बहिन से विवाह किया", [ Races of N. W. Provinces of India, Elliot. Vol. I, p. 90 ] । इलियट महोदय ने समरसिंह गुहिलोत तथा गोविंद गुहिलोत नामों को समझने में भूल कर दी इसने भ्रमवश ऐसा लिख दिया है । अगले रू० ८४[?] में हत वीरों के साथ प्रस्तुत कवित्त में वर्णित गरु गोइंद, 'जैत गोर (गरुवा)' के नाम से धाता[?] है । दिवि सजिसजा हुआ दिखाई पड़ा । नीर = जल । सि = (१) धार (२) अस्ती (३) तलवार । समाहिय (< ० समाधित - : समाधिस्य) = इकट्ठे हुए, दौड़े, सामने आये । लज्जी = लज्जित कर दिया । परवाहिय:<noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> sirdl12h7jqc960v61um6g9ktm8z33y पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२५ 250 176621 676013 619263 2026-10-12T08:51:46Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८७ )</div></noinclude>प्रवाहित कर दिया, बहा दिया । रज्ज = पाँच 'रज' आये हैं जिनके अर्थ क्रमशः इस प्रकार किये गये हैं—(१) रज = राज्य, वैभव (२) रज्ज = राजपद, रस्सी (३) रज = धूलि, (४) रज = प्रकाश (स्वर्ग), धूलि कण (५) रज = राजा, धूलि कण । 'रज—रज' का 'टुकड़े टुकड़े' अर्थ भी किया गया है । उच्छंग < सं० उत्संग = गोद ; [कुछ विद्वान् उच्छंग का संबंध सं० उत्साह से भी अनुमान करते हैं] । अच्छर < अप्सरा । सों लयो = [होर्नले महोदय इसका 'सो लयम' पाठ करके 'सुला लिया' अर्थ करते हैं] । अच्छर उच्छुंगन सों लयो = अप्सराओं ने उसे गोद में ले लिया, अप्सराओं ने उसे बड़े उत्साह से उठा लिया । देव विमानन चढ़ि गयो = देव विमानों में चढ़ कर गया । <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> परि पतंग जै सिंघ, (पै) पतंग अपुन तन दज्झे । (इन) नव पतंग गति लोन, करे अरि रि<ref>ना०—[?]</ref> धज धज्झे ॥ (उह) तेल ठांम बाति, अनि एकल विरुज्झाइय । (इह) पंच पर अरि पंच, पंच अरि पंध<ref>ना०—पंच</ref> लगाइय ॥ रनि चारी<ref>'चारे चारे' के स्थान पर अन्य प्रतियों में केवल एक 'चारि' मिलता है ।</ref>, बर बरयौ, दइ दाहन दुज्जन दवन । जीव असुरे महि मंडल, ताहि पुज्झै कवन ॥ छं० १०१ ॥ रू० ६७ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६७—पतंग जयसिंह मारा गया । उसने अपना शरीर पतिंगे के समान (युद्ध रूपी दीपक की लौ पर कूद कर) जला दिया । शत्रुओं की धज्जी धज्जी उड़ाकर वह पतंग (सूर्य) की गति में लीन हो गया [अर्थात् सूर्य लोक को चला गया] । जिस प्रकार [जुगनू] अकेले ही दीपक बुझा देता है उसी प्रकार उसने भी [मरते मरते] अपने पाँच शत्रुओं के पंच (= पंच तत्वों से निर्मित शरीर) को पंच (पंच तत्वों) में मिला दिया, तथा दुर्जनों (= शत्रुओं) को दवन (अग्नि) का दाहन (= आहुति) देकर रण रूपी श्रेष्ठ कुमारी (कन्या) का वरण किया, महि मंडल के असुरों (यवनों) को उसने जीता (अर्थात् पराजित कर दिया), कौन उसकी बराबरी कर सकता है । &emsp;नोट—(पै), (इन), (उह) पाठ ना० प्र० स० की प्रतियों में नहीं है, डॉ० होर्नले ने इन्हें दिया है ।<noinclude> <references/></noinclude><noinclude></noinclude> ebldkg4j4khmjpxxtvy23y0qswyow3a 676014 676013 2026-10-12T08:53:43Z Manvikesarwani09 6620 676014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८७ )</div></noinclude>प्रवाहित कर दिया, बहा दिया । रज्ज = पाँच 'रज' आये हैं जिनके अर्थ क्रमशः इस प्रकार किये गये हैं—(१) रज = राज्य, वैभव (२) रज्ज = राजपद, रस्सी (३) रज = धूलि, (४) रज = प्रकाश (स्वर्ग), धूलि कण (५) रज = राजा, धूलि कण । 'रज—रज' का 'टुकड़े टुकड़े' अर्थ भी किया गया है । उच्छंग < सं० उत्संग = गोद ; [कुछ विद्वान् उच्छंग का संबंध सं० उत्साह से भी अनुमान करते हैं] । अच्छर < अप्सरा । सों लयो = [होर्नले महोदय इसका 'सो लयम' पाठ करके 'सुला लिया' अर्थ करते हैं] । अच्छर उच्छुंगन सों लयो = अप्सराओं ने उसे गोद में ले लिया, अप्सराओं ने उसे बड़े उत्साह से उठा लिया । देव विमानन चढ़ि गयो = देव विमानों में चढ़ कर गया । <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> परि पतंग जै सिंघ, (पै) पतंग अपुन<sup>(४)</sup> तन दज्झे । (इन) नव पतंग गति<sup>(३)</sup> लोन, करे अरि रि धज धज्झे ॥ (उह) तेल ठांम बाति<sup>(२)</sup>, अनि एकल विरुज्झाइय । (इह) पंच<sup>(५)</sup> पर अरि पंच, पंच अरि पंध<sup>(६)</sup> लगाइय ॥ रनि चारी<sup>(१)</sup>, बर बरयौ, दइ दाहन दुज्जन दवन । जीव असुरे महि मंडल, ताहि पुज्झै कवन ॥ छं० १०१ ॥ रू० ६७ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६७—पतंग जयसिंह मारा गया । उसने अपना शरीर पतिंगे के समान (युद्ध रूपी दीपक की लौ पर कूद कर) जला दिया । शत्रुओं की धज्जी धज्जी उड़ाकर वह पतंग (सूर्य) की गति में लीन हो गया [अर्थात् सूर्य लोक को चला गया] । जिस प्रकार [जुगनू] अकेले ही दीपक बुझा देता है उसी प्रकार उसने भी [मरते मरते] अपने पाँच शत्रुओं के पंच (= पंच तत्वों से निर्मित शरीर) को पंच (पंच तत्वों) में मिला दिया, तथा दुर्जनों (= शत्रुओं) को दवन (अग्नि) का दाहन (= आहुति) देकर रण रूपी श्रेष्ठ कुमारी (कन्या) का वरण किया, महि मंडल के असुरों (यवनों) को उसने जीता (अर्थात् पराजित कर दिया), कौन उसकी बराबरी कर सकता है । &emsp;नोट—(पै), (इन), (उह) पाठ ना० प्र० स० की प्रतियों में नहीं है, डॉ० होर्नले ने इन्हें दिया है ।<noinclude> (१) 'चारे चारे' के स्थान पर अन्य प्रतियों में केवल एक 'चारि' मिलता है ।<br> (२) ना०—बासीय (३) ना०—प्रगति (४) ना०—अप<br> (५) ना०—पंच (६) ना०—दै ।</noinclude><noinclude></noinclude> 9hqmzq5fhz99a0fxv9444a6h5vk52p6 पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२६ 250 176622 676015 619264 2026-10-12T08:54:56Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८८ )</div></noinclude>&emsp;शब्दार्थ—रू० ६७—परि गिर पड़ा अर्थात् मारा गया । पतंग जैसिंव = पतंग जयसिंह नामक पृथ्वीराज का वीर सामंत था । पतंग का एक अर्थ सूर्य भी होता है जिससे अनुमान होता है कि जयसिंह सूर्यवंशी राजपूत था । पतंग = पतिंगा । अपुन तन = अपना शरीर । दज्झे < दह्ू = जलाना । नव = नया । पतंग = सूर्य । गति लीन = गति में लीन होकर । (नोट—भारतीय शूरवीरों का यह विश्वास था कि वीर गति पाकर योद्धा सूर्य लोक जाते हैं और सूर्य लोक की प्राप्ति बड़े ही पुण्य व तपस्या द्वारा होती मानी गई है । "वेवे जात मंडल अखंड अरकन के ।" गंगा-गौरव, जगन्नाथदास रत्नाकर[?]) । ठाम < थान < स्थान । तेल ठांम = तेल का स्थान अर्थात् दीपक । वाति = बत्ती । श्रग्नि < सं० अग्नि ; ग्रगनि = जुगनू । 'तेल ठांम बाति ग्रगनि सकल विरुज्झाइय' = जुगनू जलता हुआ दीपक अकेले बुझा देता है । [नोट—जुगनू का दीपक बुझाना अशुभ सूचक माना गया है ।] एकल = केले[?] । अप्प < अप्प = अपना । विरुज्झाइय = बुझा देना । रनि रन । कूंचारी = कुमारी कन्या । 'पंच लगाइय' का 'पंध लगाइय' पाठ भी मिलता है, जिसका अर्थ मार्ग पर लगा दिया अर्थात् 'मार डाला' होगा । बर = श्रेष्ठ । बरौ = वरण किया । दैइ = देकर । दाहन = (संज्ञा) जलाने का (समिधा या आहुति से तात्पर्य है) । दुज्जन < दुर्जन शत्रु । दवन < दव = दावाग्नि । जीतेव = जीत लिया । ताहि = उसकी । पुज्जै = बराबरी । कवन = हिं० कौन < प्रा० कवन, कवण, कोउण < सं० क: पुनः । इस रू० का होर्नले महोदय द्वारा किया हुआ अर्थ जान लेना भी उचित होगा— <div style="margin:0 2em;"> "Patang Jaysingh fell; he burns his body like a moth (into a flame); a new existence he obtained in the sun having torn many enemies in shreds. (Just as that (moth) by itself puts out the flame of the wick of an oil lamp (by falling into it); so (he), while being killed himself, also killed the enemy, felling five of them to the ground. War he wedded as a virgin, scorning fate and destroying enemies, he defeated the demons on earth. Who else can equal that." pp. 42-43. </div> <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> रूपी बीर पुंडीर, फिरी पारस सुरतांनी<sup>(२)</sup> । सत्र<sup>(१)</sup> बीर चमकत, तेज आरुहि सिर ठांनी ॥ </poem> </div><noinclude> (१) ना०—शस्त्र (२) ए०—तानी ।</noinclude><noinclude></noinclude> hb6q5qm97lj7uqn7lcebmwz799oofdc पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२७ 250 176623 676016 619265 2026-10-12T08:56:34Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ८९ )</div></noinclude><div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> टोप ऑप तुटि किरच, सार सारह जार भारे । मिलि नच्छित्र रोहिनी, सीस ससि उडगन चारे ॥ उठि परत भिरत भंजत अरिन, जै जै जै सुरलोक हुन । कमंध<sup>(१)</sup> पल पंच पल, कौन साइ कंप्यौ<sup>(२)</sup> जु धुं ॥ छं० १०२ ॥ रू० ६८ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६८—जहाँ वीर [मान] पुंडीर डटा हुआ था वहाँ सुलतान की सेना ने उसे घेर लिया और अपने चमकते हुए तेज़ शस्त्रों से उसके सिर पर वार किया । उन्होंने अपने भालों से उसका चमकदार टोप टुकड़े टुकड़े कर दिया (उस समय ऐसी शोभा हुई मानों) रोहिणी नक्षत्र के योग से सर रूपी चंद्रमा के चारों ओर तारे घूम रहे हों । वह गिरता पड़ता और भिड़ता हुआ शत्रु का नाश कर रहा था, [यह दृश्य देखकर] सुरलोक में जय जय की ध्वनि हो उठी । (अंत में मारे जाने पर) उसका कबंध चार पाँच पल तक खड़ा रहा । हे भाई, ध्रुव को कौन टाल सकता है ? &emsp;शब्दार्थ—रू० ६८—रूप्यौ = रोपना, स्थापित करना (यहाँ 'डटे रहने' से तात्पर्य है) । वीर पुंडीर—यह न तो चंद पुंडीर है और न चामंडराय पुंडीर है वरन् पुंडीर वंशी कोई अन्य वीर है । जहाँ तक अनुमान है रू० ८४ में वर्णित यह भान पुंडीर है । फिरी = घूमी । पारस = चारों ओर ; (पारसी) ; [< प० पालास < प्रा० पल्लास < सं० पर्यास (परि + सं+भ्रमणा)[?] = घेरा, जिससे मंडल, चक्र की भाँति जथा या सेना अर्थ निकाले जा सकते हैं] [ < पार्श्व = निकट ] । [नोट—चंद ने 'पारस' शब्द का व्यवहार रासो के अनेक स्थलों पर किया है । उ०—सम्यौ ६१, छं० १६२२-१६२३—"इसी राति प्रकासी । सरं कुमुदिनी विकासी ॥ मंडली सामंत भासी । कविन कल्लोल लासी ॥ पारसं रज्जि चंदमं । तारसं तेज मंदमं ॥" (प्रभात की शोभा वर्णन)—अर्थात् इस प्रकार रात्रि प्रकाशित हुई, सरों में कुमुदिनी विकसित हुई, सामंतों की मंडली भासित हुई, कवियों ने अपनी कल्लोलें सुनाईं, चंद्रदेव का पारस (= घेरा) रुपहला हो गया, तारा-गणों का तेज मंद हो गया । सम्यौ ६१, छं० १६२६—"पारसयं पसरी रस सीर । जनक देव कि सेव पडलि ॥ हालि हलाल रही चव कोदिय । दीह भयौ निस की दिति मंदिय ॥" और सम्यौ ६१—"फिरि रक्यौ पृथिराज सबर पारस पहुषंगिय ।" 'पारस' का अर्थ 'पारसी' नहीं लिया जा सकता । सच बात तो यह है कि 'पारस' शब्द के व्यवहार में न होने के कारण उचित<noinclude> (१) ना०—कबंध (२) ना०—कोन भाइ कंप्यौ ।</noinclude><noinclude></noinclude> snbkiddfndcns2jikqzh8dgpsrfkjkd पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२८ 250 176624 676017 619266 2026-10-12T08:57:45Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ९० )</div></noinclude>अर्थ नहीं किये जा सके । 'फिरी पारस सुरतानी' का अर्थ 'सुलतान की सेना ने उसे घेर लिया' ही उपयुक्त होगा ।] तेज < फा० (तेज़) । आरहि < सं० आरोह = उठाना । औप < ओप = प्रकाश । सार सारह = टुकड़े टुकड़े । मिलि = मिलने पर । नच्छित्र रोहिनी = रोहिणी नक्षत्र । ससि < शशि = चंद्रमा । उडगन < उड्डुगण = तारे । [नोट—रोहिणी नक्षत्र तलवार है, पुंडीर का सर चंद्रमा है, टोप के टुकड़े तारे हैं] । कबंध = धड़ । पंच = पाँच । चव (चौ) = चार । पल पंच चव = चार पाँच पल तक । कौन = कौन । भाइ = भाई । कंप्यौ = हिलाना, कँपाना, डिगाना । धु ध्रुव । कौन भाइ कंप्यौ जु धु = हे भाई ध्रुव को कौन टाल सकता है । उठ्यौ = उठा रहा अर्थात् खड़ा रहा । जरि = जड़ना, मारना । भारे भाले = बरछे । जरि भारे-भाले जड़ कर या मार कर । तेज < सं० तेजस् = आभा, प्रकाश । <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> दुज्जन सल कूरंभ, बंध पल्हन हकारियं<sup>(१)</sup> । सम्हो षां खुरसान, तेग लंबी उपभारियं<sup>(२)</sup> ॥ टोप दुट्टि बर करिय, सीस पर तुट्टि कमंध । भार मार उच्चार, तार तं नंचि कमंध ॥ तहँ देषि रुद्र रुद्र हस्यो, हय हय<sup>(४)</sup> हय नंदी कहौ । कवि चंद सयल<sup>(५)</sup> पुत्री चकित, पिषि बीर भारथ नयौ<sup>(३)</sup> ॥ छं० १०३ ॥ रू० ६९ ॥ </poem> </div> <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> सोलंकी सारंग, धांन पित्तनी मुष लग्गा । वह पंगा नौ[?] ग्रत इतें चहुआन बिलग्गा ॥ है कंपन दिय पाय, कन्ह उत्तर बिय बाजिय । गज गुंजार हुँकार, धरा गिर कंदर गाजिय ॥ जय जय तै[?] देव जय जय करहि, पहुपंजलि पूजत रिनह । इक परयौ तेत सोधै सकल, इक रह्यौ बंधे घुनह ॥ छं० १०४ ॥ रू० ७० ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ६९—दुर्जनों को सालने वाले पल्हन के बंधु [= भाई या संबंधी] कूरंभ ने हाँक लगाई (या चुनौती दी) । खुरासान खाँ ने उसका सामना किया और (अपनी) लंबी तलवार ऊपर उठाई तथा (उस पर बार किया जिससे उसका) टोप [= शिरस्त्राण] टूट कर बिखर गया और कबंध से<noinclude> (१) ना०—सक्कारिय (२) ना०—उभ्भारिय (३) मो०—भयो, हा०—[?]<br> (४) मो०—हयं हयं (५) ना० शैल, ए०—सवल, क्र० को०—संयल ।</noinclude><noinclude></noinclude> 5q6rgyoq5bb238mgniptovf5b1iz1h6 पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३२९ 250 176625 676018 619267 2026-10-12T08:58:46Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ९१ )</div></noinclude>सर टूट गया [अर्थात् धड़ से सिर कट गया] । (फिर जब तक कटे हुए लुंठित सिर से) मारो ! मारो ! की ध्वनि उच्चारित होती रही (तब तक उसका) धड़ (इस आवाज़ की) ताल पर नाचता रहा । यह दृश्य देखकर रुद्र ने भयंकर अट्टहास किया—['वहाँ भयंकर रुद्र यह दृश्य देखकर दुख के आवेग में रो उठे'—होर्नले । नोट—'रुद्र का रोना' अर्थ समुचित नहीं है क्योंकि ऐसा वर्णन हमें पुराणों आदि में नहीं मिलता, शिव का अट्टहास ही प्रसिद्ध है ।] और नंदी हाय हाय करने लगा । चंद कवि कहते हैं कि शैल पुत्री (पार्वती जी) यह नया महाभारत देखकर चकित रह गईं । &emsp;रू० ७०—[अपने हत बंधु के शव को ढूँढ़ते हुए] सोलंकी सारंग (अचानक) खिलजी ख़ाँ के सामने आ गया । वह पहले पंगा (जयचंद) का भृत्य था परन्तु इस अवसर पर चौहान की ओर था । कन्ह (सारंग के प्राण संकट में देख) दो घोड़ों के कंधों (= पीठ) पर पैर रखकर खड़े हो गये और हाथी के समान चिग्घारने लगे जिससे पृथ्वी, पर्वत और कंदरायें गूँज उठीं । (शत्रु का ध्यान अवश्य ही बँट गया और सारंग बच गया । यह कौतुक देखकर) देवताओं ने जय जय का घोष किया और युद्ध की पूजा में (अर्थात् प्रशंसात्मक युद्ध के लिये) पुष्पांजलि दी । एक (सारंग) सारा खेत (= क्षेत्र, युद्ध क्षेत्र) ढूँढ़ता रहा और एक (कन्ह) चिल्लाने की धुन बाँधे रहा । &emsp;शब्दार्थ—रू० ६९—दुज्जन < दुर्जन । सल = सालना, कष्ट देना, छेद करना ; (सल < सं० शल्य = भाला) । कूरंभ—अगले रू० ८४ की २१वीं पंक्ति में हमें इसका दूसरा नाम मात्हन[?] मिलता है । कूरंभ, पल्हन का भाई या निकट संबंधी था । बंध < बंधु = भाई, संबंधी । पल्हन—पृथ्वीराज का वीर लड़ाकू सामंत था । और संयोगिता अपहरण वाले युद्ध में मारा गया था [रासो सम्यो ६१, छं० १४६०-६१ तथा— <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> परे मध्य विप्पहर । पल्हू पज्जून बंध बर । रज रज तन किय हटकि । कटक कमधज्ज कोटि भर ॥ ईस सीस संहूयौ । हथ्थ सों हथ्थ न मुक्क यौ सुख हो । वीर वीरा रस तक, मारत रिन कूरंभ कि । ते रवि मंडल मेद्रियें सूर 1 यौ[?] डोल्यो न रथ्थ संपल्यौ । किति कला न हे देपिये ॥ छं० १४६२ ॥ गंग डोलि ससि डोलि । डोलि ब्रांड सक्र डुल । अष्ट थान दिगपाल । चाल चंचाल विचल धल ॥ </poem> </div><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> e97si6k31kheu1h4fa9yd6nmpgt34nh पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३३० 250 176626 676019 619268 2026-10-12T08:59:52Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ९२ )</div></noinclude><div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> फिरि रक्यौ प्रथिराज । सबर पारस पहु पंगिय । च्यारि च्यारि तरवारि । बीर कूरंभहि सजिय ॥ यि[?] पहुप इक चंदने । एक किति जंपत बयन । हथ्थ दरिद्री द्रव्य ज्यौं । रहे सूर निरषत नयन ॥ छं० १४६३ ॥ सम्यौ ६१ ॥] </poem> </div> &emsp;सम्हो = सामने । उपभारिय = उभारी, उठाई । बर करिय = बरकना, बिखरना । दुहि = टूटना । तुट्टि = टूटना, कटना । सीस < सं० शीश = सर । टोप = शिरस्त्राण [दे० Plate No. I, राजपूत योद्धाओं के शिरस्त्राण लगे हैं] । कमध < कबंध = धड़ । तार < ताल । नंचि = नाचता रहा । रुद्र = एक प्रकार के गण ; शिव का एक नाम ; (वि० वि० प० में देखिये) । रुद्र हस्यो = भयानक रूप से हँसने लगे (अर्थात् भयंकर अट्टहास करने लगे) । नंदी—[< सं० नंदिन्]—(१) शिव के एक प्रकार के गण । ये तीन प्रकार के होते हैं—कनक-नंदी, गिरिनंदी और शिवनंदी । (२) यह शिव के द्वारपाल बैल का नाम भी है जिसे नंदिकेश्वर कहते हैं । प्रस्तुत कवित्त में शिव के गण से ही तात्पर्य समझ पड़ता है । सयल पुत्री < शैल पुत्री = पार्वती ; ये हिमालय की कन्या प्रसिद्ध हैं । पिष्षि < सं० प्रेक्ष = देखकर । वीर = बोरों का[?] । भारथ (अप०) [ < प्रा० भारह सं० भारत = युद्ध, संग्राम ] = महाभारत । (उ०—भारथ होय जूझ जो श्रधा । होहिं सहाय श्राय सब जोधा । जायसी) । नयो = नया । &emsp;रू० ७०—सोलंकी सारंग—इस वीर के विषय में कुछ विद्वानों का मत है कि यहीं मारा गया और वे प्रस्तुत कवित्त की अंतिम पंक्ति का अर्थ "एक सब के सामने खेत रहा और एक गरजने की धुन बाँधे रहा" करते हैं ; परन्तु इस वीर की मृत्यु यहाँ नहीं हुई है । अगले रासो-सम्यौ में हम पाते हैं । संयोगिता अपहरण वाले युद्ध में वह पृथ्वीराज की ओर से बड़ी वीरता पूर्वक लड़कर मारा गया था— <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> "ब्रह्म चालुक ब्रह्म चार । ब्रह्म विद्या अरि रच्चिय ॥ केस डाभ अरि करिय । रुधिर घन[?] पत्र विसिप्पिय[?] ॥ अगम गहिंग[?] अंजुलिय । नाग गहि नासिक तामें ॥ धन सिर फेरि र दुहुँ श्रवन । जाप जापं सुत्र राम ॥ सम्हों परयौ । दुअन तार मन उल्हसिया ॥ मी[?] जुद्धधमि । सुर पुर जा सारंग वसिय ॥" </poem> </div> छं० १५२४, सं० ६१ । &emsp;नौ भृत = नया भृत्य (नौकर) [नौकर से सामंत अथवा सैनिक का तात्पर्य है] । विलग्या[?] < हिं० विलग = पार्थक्य, अलग<noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> s56qxgw9r5pfhdj2hky31expwzd9r1n पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३३१ 250 176627 676020 619269 2026-10-12T09:01:07Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ९३ )</div></noinclude>उतरा । विय वाजिय = दो घोड़े । उत्तर विय बाजिय = दो घोड़ों पर चढ़ा । धरा = पृथ्वी । गिर < गिरि = पर्वत । कंदर = कंदरा, गुफा । गाजिय = गूँज उठीं । पशुपंजलि < पुष्पांजलि । पूजत = पूजा की, प्रशंसा की । रिनह < रण (की) = युद्ध (की) । एक < अप० इक < प्रा० एक, एग्गो, एओ < सं० एक = हिं० एक । परयौ सोधे सकल = सारा ढूँढ़ता पड़ा रहा । षेत-खेत < क्षेत्र । बंधे = धे । धुनह = धुन । &emsp;नोट रू० ७०—"इधर जब खिलजी खाँ के मुकाबले में दो तीन अच्छे अच्छे बीर काम आये तब सारंग देव ने उस पर आक्रमण किया, सारंगदेव ने अपने घोड़े को एड़ देकर खिलजी खाँ के हाथी के मस्तक पर जा टपकारा । इस अद्भुत कौशल से इधर तो हाथी चिंघार[?] उठा उधर सारंगदेव ने खिलजी खाँ को मार कर दो कर दिया ।" रासो-सार, पृष्ठ १०२ । रू० ६६ में जिस प्रकार दीर्घकाय मगर की कल्पना की गई है उसी ढंग की एक मौलिक उद्भावना यहाँ भी है । <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> करी मुष्प आहुड्ड, वीर गोइंद सु अष्प । कबिल पील जनु कन्ह, दंत दारन दहि<sup>(१)</sup> नब्बे ॥ सुंड दंड भयै पंड, पीलवानं गज मुक्यौ । गिद्ध<sup>(२)</sup> सिद्ध र वेताल, आइ अषिन पल स्क्यौ ॥ बर बीर परयो भारथ्थ बर, लोह लहरि<sup>(३)</sup> लग्गत<sup>(४)</sup> भुत्यौ । तत्तर पान संभ्भ सुत<sup>(५)</sup> सिंह हक्कि अंबर दुल्यौ ॥ छं० १०५ ॥ रू० ७१ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ७१—वीर गोइंद के संबंधी बहु ने एक हाथी की सूँड वैसे ही पकड़ कर खींची (या—अक्षय वीर गोइंद के संबंधी ने एक हाथी की सूँड वैसे ही आहुड (ऐंठ) दी) जैसे कृष्ण ने कुवलयापीड के भयानक दाँत तोड़े थे । सूँड के दाँत टूट जाने पर पीलवान ने उसे छोड़ दिया तथा गिद्धों, सिद्धों और वेतालों ने आकर उस पर दृष्टि जमाई (परन्तु) इस वीर युद्ध में श्रेष्ठ योद्धा (= कनक आहुड) गिर पड़ा, तलवारों के बारों से वह मरी[?] हो गया था, तातार खाँ के सामने उसने अपनी वीरता दिखाई थी (और) उसका सिंह सदृश गर्जन सुनकर आकाश भी काँप उठता था । &emsp;शब्दार्थ—रू० ७१—करी = हाथी । मुष्प = मुख, सूँड (यहाँ हाथी की सूँड से तात्पर्य है) । आहुड्ड—यह पृथ्वीराज का वीर सामंत था । अगले रू० ८४<noinclude> (१) ना०—नाहि (२) ना०—गिद्धि सिद्धि (३) ना०—लहरी (४) ना०—लगात<br> (५) ना०—सम्हो सुक्रत, मं०—सम्म सुकृत ।</noinclude><noinclude></noinclude> hz5xwu9m1ox2k2gqccyvpvym4legchl पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३३२ 250 176628 676021 619270 2026-10-12T09:02:09Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676021 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ९४ )</div></noinclude>में हम इसका नाम कनक आहुड्ड पढ़ते हैं । यह गुहिलोत वंश का था । 'आहुड्ड' गुहिलोत राजपूतों की एक पदवी थी जिसका प्रयोग समरसिंह और गरुआ[?] गोविंद के साथ अधिक मिलता है । रासो में आहुड्ड पति और बहु[?] नरेश नाम भी पाये जाते हैं । प्रस्तुत कवित्त में आया हुआ 'गोइंद' प्रसिद्ध गोविंद समझ पड़ता है और यदि यह सच है तो उसके दो संबंधी इस युद्ध में मारे गये । ['आहुड्ड' का अर्थ 'ऐंठना' संभव तो था परन्तु 'आहुड्ड' सामंत का पूरा विवरण मिल जाने से 'ऐंठना' अर्थ अच्छा नहीं है । 'आहू'[?] = ऐंठना—अर्थ करके भी अनुवाद में अर्थ लिख दिया गया है परन्तु उसका विशेष मूल्य नहीं है] । आ[?] (या अंचे) < सं० आ + कृष् = खींचना । [आ < संश्रय] । कविल पील = कुवलयापीड़—यह कंस का हाथी था जिसे कृष्ण ने दाँत तोड़कर मार डाला था । वास्तव में यह दैत्य था परन्तु शाप वश हाथी हो गया था [वि० वि०—महाभारत, भागवत दशम स्कंध] । दारुन दहि = दारुण कष्ट देकर । दंत = दाँत । नष्ट = नष्ट करना, तोड़ना । सुंड = हाथी । पंड = खंड, टूटना । मुक्यौ = छोड़ना । गिद्ध = पक्षी विशेष जो बड़ी दूर तक देख सकता है । मरे हुए पशु ही इसका आहार हैं । सिद्ध—जिसने योग या तप द्वारा अलौकिक लाभ या सिद्धि प्राप्त की हो । सिद्धों का निवास स्थान सुवर्लोक कहा गया है । 'वायु पुराण' के अनुसार इनकी संख्या अट्ठासी हज़ार है और ये सूर्य के उत्तर और सप्तर्षि के दक्षिण अंतरिक्ष में वास करते हैं । ये एक कल्प भर तक के लिये अमर कहे गये हैं । कहीं कहीं सिद्धों का निवास स्थान गंधर्व किन्नर आदि के समान हिमालय पर्वत भी कहा गया है । परन्तु प्रस्तुत कवित्त में वर्णित शव भक्षी सिद्ध, कापालिक या वीर पंथी[?] योगियों से तात्पर्य है । सिद्ध का अर्थ 'सिद्धि' भी हो सकता है । ये 'सिद्धि', खप्पर वाली योगिनियाँ हैं जो दुर्गा की परिचारिकायें कही जाती हैं तथा युद्ध भूमि में घूमने वाली मानी गई हैं । बेताल—< सं० बेताल—पुराणों के अनुसार भूतों की एक प्रकार की योनि । इस योनि के भूत साधारण भूतों के प्रधान माने जाते हैं और श्मशानों में रहते हैं । आइ अषिन पल रुक्यौ = आकर आँखों के पास रुक गये (या—आकर उसपर अपनी दृष्टि जमाई) कि कब यह मरे और खाने को मिले । लोह = तलवार । लहरि लहर, (यहाँ तलवारों के 'वार' से तात्पर्य है ।) लग्गत = लगने से । भुत्यौ = भूल गया था अर्थात् स्थान स्थान पर घाव लगने से भँझरी[?] हो गया था । संभी = सामने । सुकृत सुकृत = सुंदर (वीरोचित) कार्य । सिंह हक्कि = सिंह सदृश हुंकारा (या गरजा) । अंबर = आकाश । दुल्यौ = डोल गया, काँप उठा ।<noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> jkzaja5bk81f7mwxb50a89jfrxoodca पृष्ठ:रेवातट (पृथ्वीराज-रासो).pdf/३३३ 250 176629 676022 619271 2026-10-12T09:03:06Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 676022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="text-align:center;">( ९५ )</div></noinclude>&emsp;नोट—प्रस्तुत कवित्त की अंतिम दो पंक्तियों का अर्थ होनले महोदय ने इस प्रकार लिखा है— <div style="margin:0 2em;"> "The brave warrior fell in this brave fight, reeling under the repeated strokes of the sword (of his enemy). Tartar Khan in front of him roared like a lion over his success, (so loudly that) the heavens shook." p. 46. </div> <div style="text-align:center;">कवित्त</div> <div style="display:table; margin:0 auto;"> <poem> पोलि षभ्भ नरसिंघ, पिल्लि<sup>(१)</sup> षभ्भ सीसह भारि । तुटि भर धरनि परंत, परत संभरि कट्टारिय ॥ चरन अंत जरत, वीर कूरंभ करौ[?] । तेग थाइ<sup>(२)</sup> चुक्कत, करी भर लोह सँभारी ॥ चलि गयो न कमन<sup>(३)</sup>, क्रम्म न चले, दुल्यौ न, डुलत<sup>(४)</sup> । तिन परत वीर दाहर तनौ, चामंडा बज्जी लहर ॥ छं० १०६ ॥ रू० ७२ ॥ </poem> </div> &emsp;भावार्थ—रू० ७२—नरसिंह (के संबंधी) ने क्रोधावेश में तलवार खींच ली और खल (शत्रु) के सर पर वार किया जिससे उसका धड़ कटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा परन्तु गिरते गिरते उसने (नरसिंह के संबंधी के) कटार मार दी । (कटार लगने से इस वीर के) पैर विकट वीर कूरंभ की लोथ की अंतड़ियों से उलझ गये । उसने तलवार का सहारा लेना चाहा परन्तु चूक गया और (स्वयं अपनी तलवार से घायल जाने के कारण उसके) लोहू की धार झर झर करके वह चली [या—(झरी झर=) गिरते गिरते उसने तलवार से सहारा लेना चाहा परन्तु चूक गया और बुरी तरह घायल हो गया] । वह एक पग भी न चल सका, न वह हिला और न उसके श्रेष्ठ हाथ ही हिले । उसको गिरते देखकर दाहर का पराक्रमी पुत्र चामंड दुख से परिपूरित हो गया [या—उसके गिरने पर दाहर का वीर पुत्र चामंड युद्ध की लहर में उत्तेजित हो गया अर्थात् भयंकर युद्ध करने लगा] । &emsp;शब्दार्थ—रू० ७२—पति पर उलझ = तलवार निकालकर । नोट—प्रस्तुत रू० में जिस वीर की मृत्यु का वर्णन है वह अगले रू० ८४ के आधार पर नरसिंह का संबंधी और दाहिम जाति का राजपूत था । इस रू० में चामंड-राय-पुंडीर-दाहिम का नाम, चामंडा, आया है जिसका वर्णन पढ़कर अनुमान होता है कि वीरगति पाने वाला योद्धा अवश्य ही चामंडराय का संबंधी था ।<noinclude> (१) ना०—पिञ्चि पत्र (२) ना०—घाइ (३) मो०—न कमन कमनव ; ना०—क्रमन क्रम्मन<br> (४) ना०—नडुल, ए०—न डुलतन ।</noinclude><noinclude></noinclude> mgupbjkswepqg6yuk4k1abl55685g4h