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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८५
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है।
श्रीयुत हेमन्त के० चटर्जी, बी० ए० एल०एल० बी० कानपुर
अंग्रेजी (एस० एन० १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
५६. पत्र : छगनलाल जोशीको
हृदयसे आपका,
[२४ अक्टूबर, १९२९]
चि० छगनलाल,
मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच हो जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली ।
अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना । यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना । अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो । जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले ।
गुजराती (जी० एन० ५४८८) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. देखिए “ पत्र : आनलाल जोशीको ", २३-१०-१९२९
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है।
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श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰ कानपुर
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे।
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चि॰ छगनलाल,
मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली।
अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले।
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गुजराती (जी॰ एन॰ ५४८८) की फोटो नकलसे।
१. देखिए "पत्र : आनलाल जोशीको", २३-१०-१९२९<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है।
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श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰ कानपुर
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे।
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चि॰ छगनलाल,
मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली।
अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले।
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ऋतु मिश्रा
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proofread-page
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<br>श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰<br>
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अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे।
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मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली।
अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले।
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ऋतु मिश्रा
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proofread-page
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<br>श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰<br>
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चि॰ छगनलाल,
मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली।
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ऋतु मिश्रा
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proofread-page
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<br>श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰<br>
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''५७. पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको'''}}}}
{{right|मुकाम सहारनपुर<br>
२५ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी,
मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूंगा । उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है । पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा । मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूंकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूं कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूंगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूंकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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{{right|मुकाम सहारनपुर<br>
२५ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी,
मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूंगा। उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है। पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा । मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूंकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूं कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूंगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूंकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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२५ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी,
मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूंगा। उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है। पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा। मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूंकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूं कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूंगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूंकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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२५ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी,
मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूँगा। उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है। पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा। मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूँकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूँ कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूँगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूँकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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