विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.24 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८५ 250 196504 676024 668889 2026-10-17T06:38:55Z ऋतु मिश्रा 6631 /* अशोधित */ 676024 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है। श्रीयुत हेमन्त के० चटर्जी, बी० ए० एल०एल० बी० कानपुर अंग्रेजी (एस० एन० १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे । ५६. पत्र : छगनलाल जोशीको हृदयसे आपका, [२४ अक्टूबर, १९२९] चि० छगनलाल, मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच हो जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली । अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना । यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना । अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो । जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले । गुजराती (जी० एन० ५४८८) की फोटो नकलसे । बापूके आशीर्वाद १. देखिए “ पत्र : आनलाल जोशीको ", २३-१०-१९२९ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 73hzalj7jtqoynsl56vjtmn7od11cpg 676025 676024 2026-10-17T06:49:20Z ऋतु मिश्रा 6631 676025 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है। {{right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰ कानपुर अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|५६. पत्र : छगनलाल जोशीको}}}} {{right|[२४ अक्टूबर, १९२९]}} चि॰ छगनलाल, मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली। अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४८८) की फोटो नकलसे। १. देखिए "पत्र : आनलाल जोशीको", २३-१०-१९२९<noinclude></noinclude> hegs5smziyb4wud6rylt1d6qognvlac 676026 676025 2026-10-17T06:50:58Z ऋतु मिश्रा 6631 676026 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है। {{right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰ कानपुर अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|५६. पत्र : छगनलाल जोशीको}}}} {{right|[२४ अक्टूबर, १९२९]<ref>देखिए "पत्र : आनलाल जोशीको", २३-१०-१९२९</ref>}} चि॰ छगनलाल, मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली। अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४८८) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 823aznjqoc6ouxlmxb4vafivg4tl68i 676027 676026 2026-10-17T06:55:06Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 676027 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है। {{right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} <br>श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰<br> कानपुर अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|'''५६. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}} {{right|[२४ अक्टूबर, १९२९]<ref>देखिए "पत्र : आनलाल जोशीको", २३-१०-१९२९</ref>}} चि॰ छगनलाल, मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली। अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४८८) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> s1k5uaornvme1w7c146jwvelg01x2ng 676028 676027 2026-10-17T06:55:46Z ऋतु मिश्रा 6631 676028 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है। {{right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} <br>श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰<br> कानपुर अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|'''५६. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}} {{right|[२४ अक्टूबर, १९२९]<ref>देखिए "पत्र : आनलाल जोशीको", २३-१०-१९२९</ref>}} चि॰ छगनलाल, मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली। अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४८८) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> sxstza3xfj9x9z1c84nimktpp85ei16 676029 676028 2026-10-17T06:57:00Z ऋतु मिश्रा 6631 नाम सुधार 676029 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : छगनलाल जोशीको|४७}}</noinclude>कुशलतासे और अपेक्षाकृत कम खर्चपर नहीं चला सकतीं तो यह सामूहिक जीवनके भविष्य के लिए बुरा लक्षण होगा। नगरपालिकाको वे सुविधाएँ प्राप्त हैं जो किसी सुव्यवस्थित राज्य में किसी भी निजी संस्थानको कभी नहीं मिल सकतीं। कानपुर-जैसे व्यापारिक केन्द्रमें दूधका सस्ता और शुद्ध वितरण हो, इस बातका पक्का प्रबन्ध करनेके लिए दो या तीन बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिए। दूधको उत्पादन कानपुरसे काफी दूरीपर नगरपालिकाके अपने फार्ममें बड़े पैमानेपर होना चाहिए। दूसरी बात यह कि सस्ता यातायात उपलब्ध करानेका कोई साधन जरूर हो। तीसरी बात यह है कि दूधके विक्रयपर नगरपालिकाका उसी प्रकारसे एकाधिकार होना चाहिए, जैसे कि डाक टिकटोंके छापने और बेचनेका एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकारका है। {{right|{{larger|हृदयसे आपका,}}}} <br>श्रीयुत हेमन्त के॰ चटर्जी, बी॰ ए॰ एल॰एल॰ बी॰<br> कानपुर अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२५३ ) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{x-larger|'''५६. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}} {{right|[२४ अक्टूबर, १९२९]<ref>देखिए "पत्र : छगनलाल जोशीको", २३-१०-१९२९</ref>}} चि॰ छगनलाल, मैं अपने पहले पत्र में लाहोरके बारेमें लिख चुका हूँ। और यह सोचकर कि मेरा कलका लिखा पत्र तीसरे दिन तो पहुँच ही जायेगा मन तार देनेका विचार छोड़ दिया तथा इस प्रकार बारह आनेकी बचत कर ली। अमावाकी रानीकी ओरसे बाल-बेयरिंगवाले पेटी-चरखेकी माँग आयेगी। यदि तुमसे माँग की जाये और चरखा तैयार हो तो भिजवा देना। यदि तैयार न हो तो तैयार करवाकर भिजवा देना। अच्छा हो, यदि तुम एक-दो चरखे तैयार करवाकर रखे ही रहा करो। जसदनकी रानीका पत्र भी सम्भवतः तुम्हें मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ५४८८) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> rfybyqtn7q8h4d0daa9ym8dhadqdmze पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/८६ 250 196505 676030 668890 2026-10-17T07:21:21Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ 676030 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''५७. पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको'''}}}} {{right|मुकाम सहारनपुर<br> २५ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी, मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूंगा । उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है । पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा । मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूंकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूं कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूंगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूंकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> gluc4rm6j3gkl41w5y73lueixshio4n 676031 676030 2026-10-17T07:27:41Z ऋतु मिश्रा 6631 676031 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''५७. पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको'''}}}} {{right|मुकाम सहारनपुर<br> २५ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी, मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूंगा। उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है। पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा । मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूंकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूं कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूंगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूंकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> ok3ijb6l95ot1hlvsdlqi48xx5yak31 676032 676031 2026-10-17T07:29:44Z ऋतु मिश्रा 6631 676032 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''५७. पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको'''}}}} {{right|मुकाम सहारनपुर<br> २५ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी, मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूंगा। उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है। पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा। मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूंकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूं कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूंगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूंकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> dsmgrlldxadz33l9f4p0gtwezz1euw6 676033 676032 2026-10-17T07:43:36Z ऋतु मिश्रा 6631 सुधार 676033 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''५७. पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको'''}}}} {{right|मुकाम सहारनपुर<br> २५ अक्टूबर, १९२९}} <br>प्रिय डॉ॰ अन्सारी, मैंने समाचारपत्रोंमें देखा है कि आप और लाला शंकरलाल मेरे दिल्ली आनेपर मुझे थैली भेंट करनेके लिए लोगोंसे रकम जमा करनेकी अपील कर रहे हैं। यह थैली स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निर्धारित की गई है। इस किस्मकी थैलियाँ इकट्ठी करनेकी स्वीकृति कहीं भी नहीं दी गई है। प्रान्तीय सेवाके लिए निर्धारित थैलियाँ कईएक स्थानोंपर स्वीकार की गई हैं परन्तु मुख्य थैली सब जगह खादीके लिए ही रही है। यदि समाचारपत्रोंने आपके बारेमें सही रिपोर्ट दी है तो फिर यह थैली पूरी तरह स्थानीय कांग्रेसके कार्यके लिए निश्चित की गई है। यह किसी भी हालत में न किया जाये। अगर खादीकी चिन्ता किसीको भी नहीं है तो मैं समझता हूँ कि चन्दा ही नहीं किया जाना चाहिए। मैं यह भी कहूँगा कि लाला शंकरलाल मेरी दिल्ली-यात्राके बारेमें जो कुछ भी करेंगे उसे मैं अस्वीकार कर दूँगा। उनके बारेमें मेरे अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं। जहाँतक मुझे मालूम है, उन्होंने अब भी वह रकम वापस नहीं की है जो अखिल भारतीय चरखा संघको दी जानी चाहिए थी। उन्होंने बारडोली संघर्षके नामपर इकट्ठा की गई पूरी रकम अब भी बारडोली नहीं भेजी है। पैसेके लेन-देनके बारेमें उनके विषयमें और भी कई शिकायतें समय-समयपर मेरे पास आई हैं, परन्तु मैंने उनकी जाँच करना उपयोगी नहीं समझा। मुझे मालूम है कि जमनालालजी और कई अन्य लोगोंको भी उनके बारेमें ऐसे अनुभव हुए हैं। मुझे खेद है, परन्तु चूँकि मैंने उनका नाम आपके नामके साथ जुड़ा देखा, मैंने सोचा कि मैं आपको यह बता दूँ कि उनके बारेमें मेरे क्या विचार हैं। आप चाहें तो अवश्य यह पत्र उन्हें दिखा दें। यदि उनके प्रति कोई अन्याय किया गया है और यदि इसका मुझे विश्वास दिलाया जा सके तो मैं उनसे क्षमा माँग लूँगा। मैंने उन्हें अखिल भारतीय चरखा संघके पैसेके बारेमें एक या दो बार लिखा अवश्य था और फिर पूरी तरह निराश होकर उन्हें आगे कुछ भी लिखना बन्द कर दिया। अब भी मैं चुप रहना ही पसन्द करता। परन्तु यदि मैं लाला शंकरलालके बारेमें अपने विचार आपको न बताता तो मैं सत्य छिपानेका दोषी बनता। आशा है कि जबतक सचमुच ही जरूरी न हो, आप किसी सार्वजनिक सभाका भी आयोजन नहीं करेंगे। चूँकि घोषणा की जा चुकी है और मैंने कुछ लोगोंको मिलने आदिकी स्वीकृति भेज दी है, इसलिए अब मुझे दिल्ली तो आना ही होगा। मैं रघुवीरके<ref>रघुवीरसिंह, नई दिल्लीमें मॉडर्न स्कूलके संस्थापक।</ref> पास ठहरूँगा, क्योंकि जब मैं मसूरी में था उन्होंने मुझे पत्र लिखकर मेरे वायदेकी याद दिलाई।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 3aaft68f8pezx4vp08okmh2hwd50syx