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हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)
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2026-07-25T03:23:54Z
अजीत कुमार तिवारी
1007
/* इकाई–I : हिंदी भाषा के विकास की पूर्वपीठिका */
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यह पाठ्यक्रम हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास को समझने के लिए तैयार किया गया है। इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न कक्षाओं के माध्यम से हम आदिकाल से रीतिकाल तक हिंदी भाषा और साहित्य के विकास की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे। इस प्रक्रिया में हम साहित्य के इतिहास दर्शन, साहित्येतिहास लेखन की परंपरा और उसकी आवश्यकता पर भी विचार करेंगे।
'''हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास (रीतिकाल)''' में आपका स्वागत है। यह स्नातक स्तर के प्रथम सेमेस्टर का पाठ्यक्रम है। इस कक्षा में सीखने वाले को हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास का परिचयात्मक ज्ञान आवश्यक है।
==इकाई–I : हिंदी भाषा के विकास की पूर्वपीठिका==
* [[/भारोपीय भाषा परिवार और आर्यभाषाएँ/|भारोपीय भाषा परिवार और आर्यभाषाएँ (संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि का सामान्य परिचय)]]
* [[/हिंदी का प्रारंभिक रूप/|हिंदी का प्रारंभिक रूप]]
* [[/हिंदी का विकास (आदिकाल, मध्यकाल, आधुनिककाल)/]]
* [[/हिंदी भाषा : क्षेत्र और बोलियाँ/|हिंदी भाषा : क्षेत्र और बोलियाँ]]
== इकाई–II : साहित्येतिहास दर्शन और आदिकाल ==
* [[/साहित्येतिहास एवं इतिहास दर्शन/|साहित्येतिहास एवं इतिहास दर्शन]]
* [[/हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा/|हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा]]
* हिंदी साहित्य : काल विभाजन और नामकरण
* आदिकाल की परिस्थितियाँ
* सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य का परिचय और महत्व
* अमीर खुसरो और विद्यापति का साहित्यिक महत्व
* रासो काव्य परंपरा
== इकाई–III : भक्तिकाल ==
* भक्ति का उदय, भक्ति आंदोलन और उसका अखिल भारतीय स्वरूप
* भक्तिकाल के विभिन्न संप्रदाय और उनके आचार्य
* भक्तिकाल की विविध धाराएँ और उसकी विशेषताएँ, भक्तिकालीन प्रमुख कवि और उनके काव्य
== इकाई–IV : रीतिकाल ==
* रीतिकाल की प्रमुख परिस्थितियाँ
* रीतिकालीन काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
* रीतिकालीन काव्य की विविध धाराओं—रीतिबद्ध, रीतिमुक्त एवं रीतिसिद्ध—के कवियों का परिचय
* रीत्येतर साहित्य : रीतिकालीन वीरकाव्य, भक्तिकाव्य, नीतिकाव्य
== सहायक सामग्री ==
* विकिपीडिया पर पढ़ें [[w:hi: हिन्दी|हिंदी]]
* विकिपीडिया पर पढ़ें [[w:hi: हिन्दी भाषा का इतिहास|हिंदी भाषा का इतिहास]]
* विकिस्रोत पर पढ़ें [[s:hi:हिंदी साहित्य का इतिहास|हिंदी साहित्य का इतिहास]]
* विकिपुस्तक पर पढ़ें [[b:hi: हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)|हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)]]
[[श्रेणी:साहित्य का इतिहास]]
[[श्रेणी:हिंदी साहित्य]]
[[श्रेणी:हिंदी भाषा]]
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हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/भारोपीय भाषा परिवार और आर्यभाषाएँ
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2026-07-25T07:30:43Z
ममता साव9
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/* भारतीय आर्यभाषाएँ */
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भाषाविद संसार की समस्त भाषाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए उन्हें कुलों, उपकुलों, शाखाओं, उपशाखाओं तथा समुदायों के अंतर्गत वर्गीकृत करते हैं। किसी भी भाषा का संसार में स्थान कहाँ है, इसे समझने के लिए उसके कुल-उपकुल का अध्ययन आवश्यक है। उन सभी भाषाओं की गणना एक कुल में की जाती है, जिनके बारे में यह सिद्ध हो चुका है कि वे सभी किसी एक मूल भाषा से ही उत्पन्न और विकसित हुई हैं।<ref>{{cite book |last1=वर्मा |first1=धीरेंद्र |title=हिंदी भाषा और लिपि |date=1933 |publisher=हिंदुस्तानी एकेडमी |location=इलाहाबाद |pages=10-13 |edition=1996}}</ref> अभी तक संसार के सभी भाषा-परिवारों का निश्चित अनुमान नहीं किया जा सका है। विभिन्न भाषाविदों द्वारा भिन्न-भिन्न भाषा-परिवारों का अनुमान किया गया है। '''रेई''' (Reiss) ने एक, '''पार्टिरिज''' ने दस, '''विल्हेल्म फॉन हम्बोल्ड्ट''' ने तेरह, '''ग्रे''' ने छब्बीस, '''फ्रेडरिक मूलर''' ने सौ से अधिक भाषा-परिवार माना है।{{sfn|सीताराम झा|2015|p=47}} शोध के द्वारा नए प्रमाण मिलने पर इन संख्याओं और वर्गीकरण में भी परिवर्तन संभव है। सामान्यतः संसार की भाषाएँ निम्नांकित मुख्य कुलों में विभक्त की गई हैं:
# भारत-यूरोपीय अथवा भारोपीय कुल
# सामी अथवा सेमेटिक कुल
# हामी अथवा हेमेटिक कुल
# तिब्बती-चीनी कुल
# यूराल-अलटाइक कुल
# द्रविड़ कुल
# मलय या मैले-पालोनेशियन कुल
# बंटू कुल
# मध्य-अफ्रीका कुल
# अमेरिकी कुल
# जापानी-कोरियाई कुल
# आस्ट्रिक कुल
* इनके अतिरिक्त कॉकेशियन, आस्ट्रेलियाई, पापुई, सुडानी, बुशमैन, बास्क तथा यूट्र्स्कन आदि भाषा-परिवारों का उल्लेख भी किया जाता है। इन भाषाओं का ठीक-ठीक वर्गीकरण अभी तक नहीं किया जा सका है इसीलिए कभी इनकी स्वतंत्र सत्ता मान ली जाती है तो कभी किसी अन्य भाषा-परिवार में इनका विलय कर दिया जाता है। चूँकि हिंदी का संबंध भारोपीय भाषा परिवार से है इसलिए उपर्युक्त भाषा-परिवारों में से केवल भारोपीय का ही विस्तृत उल्लेख यहाँ किया जाएगा।
== भारोपीय भाषा परिवार ==
भारोपीय (भारत+यूरोप) कुल की भाषाएँ नाम के अनुसार ही प्रायः संपूर्ण यूरोप, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तर-भारत में बोली जाती हैं। अस्कोली के कंठ्य ध्वनियों के विकास (परिवर्तन) के आधार पर इन भाषाओं को दो समूहों—''''शतम्'''' और ''''केंतुम्''''— में विभक्त किया जाता है। केंतुम् समूह में उन शाखाओं की भाषाएँ रखी गईं जिनकी कंठ्य ध्वनियाँ (क, ख आदि) अपने मूल रूप में विद्यमान रहीं। वहीं शतम् या सतम् समूह में उन शाखाओं की भाषाएँ रखी गईं जिनमें कंठ्य ध्वनियाँ (क, ख आदि) संघर्षी ध्वनियों (श, स आदि) में परिवर्तित हो गईं। इस वर्गीकरण को 'सौ' (hundred) के सजातीय अर्थ (cognate) से भली-भाँति समझा जा सकता है। जैसे— '''लैटिन''' में सौ को '''केंतुम''' (centum), '''वैदिक (संस्कृत)''' में ''''शतम्'''' और '''अवेस्ता (ईरानी)''' में ''''सतम्'''' कहते हैं। वस्तुतः अस्कोली ने अवेस्ता के 'सतम्' और लैटिन के 'केन्तुम्' को ही अपने सिद्धांत का आधार बनाया। हालांकि शतम् शब्द का प्रयोग वैदिक संस्कृत में किया गया है और ऐसा माना जाता है कि शतम् से सतम् का रूप विकसित हुआ होगा न कि सतम् से शतम् का। हालांकि एक उदाहरण के आधार पर भाषाओं के वर्गीकरण को भी कुछ भाषाविद अनुचित मानते हैं।{{sfn|सीताराम झा|2015|pp=57-58}}
=== शतम् समूह ===
;1. आर्य अथवा भारत-ईरानी:
इस उपकुल में तीन प्रमुख शाखाएँ हैं—भारतीय आर्यभाषाएँ, ईरानी और दरद या पैशाची।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;2. आरमेनियन:
आरमेनियन आर्य उपकुल के पश्चिम में पायी जाती है। इसमें ईरानी शब्दों की बहुलता है। यह यूरोप और एशिया की भाषाओं के मध्य में स्थित है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;3. बाल्टो-स्लाविक:
काले सागर के उत्तर में इस उपकुल का विस्तार माना जाता है। आर्य उपकुल की भाँति इसी भी विभिन्न शाखाएँ हैं। बाल्टिक शाखा में लिथुआनियन, लेटिश और प्राचीन प्रशियन बोलियाँ शामिल हैं। स्लाविक शाखा में बुलगेरिया की प्राचीन भाषा, रूस की भाषाएँ, सर्बियन, स्लावी, पोलिश, ज़ेक अथवा बोहेमियन आदि प्रमुख हैं।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;4. अलबेनियन:
'शतम समूह' का अंतिम उपकुल जिस पर आरमेनियन की भाँति ही निकटवर्ती भाषाओं का बहुत प्रभाव है। इस उपकुल में प्राचीन साहित्य का प्रायः अभाव है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
=== केंतुम समूह ===
;1. ग्रीक:
'केंतुम समूह' की भाषाओं में सबसे प्राचीन उपकुल। होमर ने 'इलियड' और 'ओडेसी' नामक महाकाव्य की रचना प्राचीन ग्रीक में ही की। सुकरात, प्लेटो व अरस्तू जैसे दार्शनिकों के मूलग्रंथ इसी भाषा में रचित हैं। यूनान में आज भी इसी प्राचीन भाषा की बोलियों में से ही एक नए रूप का व्यवहार किया जाता है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;2. इटैलिक:
इटैलियन, फ़्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली, रोमानियन आदि इटैलिक क्षेत्र की पाँचों भाषाओं का विकास लैटिन से हुआ।{{sfn|देवेन्द्रनाथ शर्मा|2004|p=16}} प्राचीन रोमन साम्राज्य की भाषा होने के कारण यह उपकुल विशेष आदरणीय हो गया। यूरोप की प्रायः सभी आधुनिक भाषाओं पर लैटिन और ग्रीक का प्रभाव माना जा सकता है। वैज्ञानिक और विभिन्न पारिभाषिक शब्दावलियों का निर्माण भी प्रायः इन्हीं प्राचीन भाषाओं के सहारे किया जाता है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|pp=7-8}}
;3. केल्टिक:
इस उपकुल की एक शाखा आयरलैंड में तथा दूसरी ग्रेट ब्रिटेन (स्कॉटलैंड, वेल्स तथा कार्नवाल) में पायी जाती है। इस उपकुल की एक प्राचीन भाषा गाल अब मृतप्राय है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=8}}
;4. जर्मनिक अथवा ट्यूटैनिक:
गाथिक और नार्स भाषाओं में इस उपकुल का प्राचीन रूप विद्यमान है। नार्स से स्वीडेन, डेनमार्क, आइसलैंड आदि की भाषाएँ विकसित हुई हैं। जर्मन, डच, फ़्लेमिश तथा अंग्रेज़ी आदि भाषाएँ भी इसी उपकुल की सदस्य हैं।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=8}}
==भारतीय आर्यभाषाएँ ==
काल की दृष्टि से भारतीय आर्यभाषाएँ तीन वर्गों में विभक्त की गई हैं{{sfn|देवेन्द्रनाथ शर्मा|2004|p=26}}:
# प्राचीन भारतीय आर्यभाषा—1500 ई॰ पू॰ से 500 ई॰ पू॰ तक।
# मध्य भारतीय आर्यभाषा—500 ई॰ पू॰ से 1000 ई॰ तक।
# आधुनिक भारतीय आर्यभाषा—1000 ई॰ से आज तक।
यह जानने के लिए कि आधुनिक आर्यभाषा के रूप में हिंदी अपनी पूर्ववर्ती भाषिक अवस्थाओं से कितनी प्रभावित हुई, इनका संक्षिप्त परिचय आवश्यक है।
=== प्राचीन भारतीय आर्यभाषा ===
'''संस्कृत''' इस काल की प्रमुख भाषा रही। इसमें भी दो अवस्थाएँ मानी जाती हैं —'''वैदिक संस्कृत''' और '''लौकिक संस्कृत'''। वैदिक संस्कृत का काल लगभग 1500 ई॰ पू॰ से 1000 ई॰ पू॰ तक है। वैदिक संस्कृत का रूप वैदिक संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद आदि ग्रंथों में मिलता है।{{sfn|भोलानाथ तिवारी|2017|p=13}} वैदिक संस्कृत में भाषा का रूप-वैविध्य लौकिक संस्कृत की तुलना में अधिक था। वैदिक भाषा श्लिष्ट योगात्मक थी। वैदिक संस्कृत की रूप रचना में विविधता है। जैसे–प्रथमा विभक्ति बहुवचन में देव शब्द के 'देवाः' और 'देवासः', तृतीय विभक्ति बहुवचन में 'देवैः' और 'देवेभिः' दोनों रूप होते हैं। लौकिक संस्कृत में आकर यह अधिक व्यवस्थित हो गया। अपवादों और भेदों की कमी हो गयी। उदाहरण के तौर पर पूर्वोक्त दोनों वैकल्पिक रूप छँट गये और एक-एक रूप (देवाः तथा दैवैः) को ही मान्यता मिली। वैदिक संस्कृत स्वर-प्रधान है जबकि लौकिक संस्कृत में बलाघात की प्रधानता हो गई। वैदिक संस्कृत में उपसर्ग का प्रयोग मूल शब्द से हटकर भी हो सकता है किंतु लौकिक संस्कृत में नहीं। जैसे—परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः। (ऋग्वेद, 1–4–3) इस मंत्र में 'परि' उपसर्ग 'यन्ति' (क्रिया) के साथ होना चाहिए था लेकिन वह इससे अलग प्रयुक्त हुआ। लौकिक संस्कृत में यह प्रवृत्ति दिखायी नहीं पड़ती।{{sfn|देवेंद्रनाथ शर्मा|2004|p=27}}
===मध्यकालीन आर्यभाषाएँ===
मध्यकालीन आर्यभाषाएँ, जिन्हें मध्य भारतीय आर्यभाषाएँ भी कहा जाता है, प्राचीन भारतीय आर्यभाषाओं (जैसे संस्कृत) और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं (जैसे हिंदी, बंगाली, मराठी आदि) के बीच की कड़ी हैं। ये भाषाएँ लगभग 500 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी तक भारत में प्रचलित थीं। कालक्रम की दृष्टि से पाली (500 ई॰पू॰–1 ई॰), प्राकृत (1 ई॰–500 ई॰) तथा अपभ्रंश (500 ई॰–1000 ई॰) के बाद आधुनिक आर्यभाषाओं का विकास हुआ। प्रमुख मध्यकालीन आर्यभाषाओं का संक्षिप्त परिचय निम्नवत है:—
====पाली====
यह बौद्ध धर्म की प्रमुख भाषा थी, जिसमें त्रिपिटक (बौद्ध ग्रंथ) लिखे गए। यह मध्यकालीन आर्यभाषाओं में सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से प्रचलित थी। पाली का विकास मगध क्षेत्र में हुआ और यह श्रीलंका, म्यांमार जैसे क्षेत्रों में फैली।
====प्राकृत====
प्राकृत शब्द का अर्थ है "प्राकृतिक" या "सामान्य जन की भाषा"। इसमें कई उप-भाषाएँ शामिल थीं, जैसे—'''महाराष्ट्री प्राकृत'''। इनका प्रयोग जैन ग्रंथों और काव्य में हुआ, जैसे—"पउमचरिय"।
'''शौरसेनी प्राकृत'''—इनका प्रयोग नाटकों में, विशेष रूप से कालिदास और भास के नाटकों में (सामान्य लोगों की भाषा के रूप में) हुआ। '''मागधी प्राकृत'''—पूर्वी भारत में प्रचलित।'''अर्धमागधी'''—जैन धर्म के ग्रंथों में उपयोग, जैसे—'आगम'। प्राकृत का प्रयोग साहित्य, धर्म, और सामान्य संवाद में होता था।
====अपभ्रंश====
यह मध्यकालीन आर्यभाषाओं का अंतिम चरण था (लगभग 6वीं से 13वीं शताब्दी)। अपभ्रंश का अर्थ है "विकृत" या "परिवर्तित" भाषा, जो प्राकृत से और सरल हुई। यह आधुनिक भारतीय भाषाओं (जैसे हिंदी, गुजराती, राजस्थानी) का आधार बनी। उदाहरण के लिए स्वयंभू और पुष्पदंत जैसे कवियों ने अपभ्रंश में रचनाएँ कीं।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== स्रोत ==
* {{cite book |last1=झा |first1=सीताराम |title=भाषा विज्ञान तथा हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण |publisher=बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी |location=पटना |isbn=978-93-83021-84-0 |page= |edition=2015}}
* {{cite book |last1=वर्मा |first1=धीरेंद्र |title=हिंदी भाषा का इतिहास |date=1933 |publisher=हिंदी एकेडमी |location=इलाहाबाद |isbn=978-93-85185-03-8 |edition=2016}}
* {{cite book |last1=शर्मा |first1=देवेन्द्रनाथ |title=हिन्दी भाषा और नागरी लिपि |date=2004 |publisher=हिन्दी साहित्य सम्मेलन |location=प्रयाग}}
* {{cite book |last1=तिवारी |first1=भोलानाथ |title=हिन्दी भाषा और नागरी लिपि |date=2017 |publisher=लोकभारती प्रकाशन |location=इलाहाबाद}}
== वीडियो व्याख्यान ==
* [https://www.youtube.com/watch?v=CsihYoqgU08 भारोपीय परिवार की भाषाएँ और उनका विकास]
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2026-07-25T07:32:58Z
ममता साव9
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/* मध्यकालीन आर्यभाषाएँ */
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text/x-wiki
भाषाविद संसार की समस्त भाषाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए उन्हें कुलों, उपकुलों, शाखाओं, उपशाखाओं तथा समुदायों के अंतर्गत वर्गीकृत करते हैं। किसी भी भाषा का संसार में स्थान कहाँ है, इसे समझने के लिए उसके कुल-उपकुल का अध्ययन आवश्यक है। उन सभी भाषाओं की गणना एक कुल में की जाती है, जिनके बारे में यह सिद्ध हो चुका है कि वे सभी किसी एक मूल भाषा से ही उत्पन्न और विकसित हुई हैं।<ref>{{cite book |last1=वर्मा |first1=धीरेंद्र |title=हिंदी भाषा और लिपि |date=1933 |publisher=हिंदुस्तानी एकेडमी |location=इलाहाबाद |pages=10-13 |edition=1996}}</ref> अभी तक संसार के सभी भाषा-परिवारों का निश्चित अनुमान नहीं किया जा सका है। विभिन्न भाषाविदों द्वारा भिन्न-भिन्न भाषा-परिवारों का अनुमान किया गया है। '''रेई''' (Reiss) ने एक, '''पार्टिरिज''' ने दस, '''विल्हेल्म फॉन हम्बोल्ड्ट''' ने तेरह, '''ग्रे''' ने छब्बीस, '''फ्रेडरिक मूलर''' ने सौ से अधिक भाषा-परिवार माना है।{{sfn|सीताराम झा|2015|p=47}} शोध के द्वारा नए प्रमाण मिलने पर इन संख्याओं और वर्गीकरण में भी परिवर्तन संभव है। सामान्यतः संसार की भाषाएँ निम्नांकित मुख्य कुलों में विभक्त की गई हैं:
# भारत-यूरोपीय अथवा भारोपीय कुल
# सामी अथवा सेमेटिक कुल
# हामी अथवा हेमेटिक कुल
# तिब्बती-चीनी कुल
# यूराल-अलटाइक कुल
# द्रविड़ कुल
# मलय या मैले-पालोनेशियन कुल
# बंटू कुल
# मध्य-अफ्रीका कुल
# अमेरिकी कुल
# जापानी-कोरियाई कुल
# आस्ट्रिक कुल
* इनके अतिरिक्त कॉकेशियन, आस्ट्रेलियाई, पापुई, सुडानी, बुशमैन, बास्क तथा यूट्र्स्कन आदि भाषा-परिवारों का उल्लेख भी किया जाता है। इन भाषाओं का ठीक-ठीक वर्गीकरण अभी तक नहीं किया जा सका है इसीलिए कभी इनकी स्वतंत्र सत्ता मान ली जाती है तो कभी किसी अन्य भाषा-परिवार में इनका विलय कर दिया जाता है। चूँकि हिंदी का संबंध भारोपीय भाषा परिवार से है इसलिए उपर्युक्त भाषा-परिवारों में से केवल भारोपीय का ही विस्तृत उल्लेख यहाँ किया जाएगा।
== भारोपीय भाषा परिवार ==
भारोपीय (भारत+यूरोप) कुल की भाषाएँ नाम के अनुसार ही प्रायः संपूर्ण यूरोप, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तर-भारत में बोली जाती हैं। अस्कोली के कंठ्य ध्वनियों के विकास (परिवर्तन) के आधार पर इन भाषाओं को दो समूहों—''''शतम्'''' और ''''केंतुम्''''— में विभक्त किया जाता है। केंतुम् समूह में उन शाखाओं की भाषाएँ रखी गईं जिनकी कंठ्य ध्वनियाँ (क, ख आदि) अपने मूल रूप में विद्यमान रहीं। वहीं शतम् या सतम् समूह में उन शाखाओं की भाषाएँ रखी गईं जिनमें कंठ्य ध्वनियाँ (क, ख आदि) संघर्षी ध्वनियों (श, स आदि) में परिवर्तित हो गईं। इस वर्गीकरण को 'सौ' (hundred) के सजातीय अर्थ (cognate) से भली-भाँति समझा जा सकता है। जैसे— '''लैटिन''' में सौ को '''केंतुम''' (centum), '''वैदिक (संस्कृत)''' में ''''शतम्'''' और '''अवेस्ता (ईरानी)''' में ''''सतम्'''' कहते हैं। वस्तुतः अस्कोली ने अवेस्ता के 'सतम्' और लैटिन के 'केन्तुम्' को ही अपने सिद्धांत का आधार बनाया। हालांकि शतम् शब्द का प्रयोग वैदिक संस्कृत में किया गया है और ऐसा माना जाता है कि शतम् से सतम् का रूप विकसित हुआ होगा न कि सतम् से शतम् का। हालांकि एक उदाहरण के आधार पर भाषाओं के वर्गीकरण को भी कुछ भाषाविद अनुचित मानते हैं।{{sfn|सीताराम झा|2015|pp=57-58}}
=== शतम् समूह ===
;1. आर्य अथवा भारत-ईरानी:
इस उपकुल में तीन प्रमुख शाखाएँ हैं—भारतीय आर्यभाषाएँ, ईरानी और दरद या पैशाची।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;2. आरमेनियन:
आरमेनियन आर्य उपकुल के पश्चिम में पायी जाती है। इसमें ईरानी शब्दों की बहुलता है। यह यूरोप और एशिया की भाषाओं के मध्य में स्थित है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;3. बाल्टो-स्लाविक:
काले सागर के उत्तर में इस उपकुल का विस्तार माना जाता है। आर्य उपकुल की भाँति इसी भी विभिन्न शाखाएँ हैं। बाल्टिक शाखा में लिथुआनियन, लेटिश और प्राचीन प्रशियन बोलियाँ शामिल हैं। स्लाविक शाखा में बुलगेरिया की प्राचीन भाषा, रूस की भाषाएँ, सर्बियन, स्लावी, पोलिश, ज़ेक अथवा बोहेमियन आदि प्रमुख हैं।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;4. अलबेनियन:
'शतम समूह' का अंतिम उपकुल जिस पर आरमेनियन की भाँति ही निकटवर्ती भाषाओं का बहुत प्रभाव है। इस उपकुल में प्राचीन साहित्य का प्रायः अभाव है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
=== केंतुम समूह ===
;1. ग्रीक:
'केंतुम समूह' की भाषाओं में सबसे प्राचीन उपकुल। होमर ने 'इलियड' और 'ओडेसी' नामक महाकाव्य की रचना प्राचीन ग्रीक में ही की। सुकरात, प्लेटो व अरस्तू जैसे दार्शनिकों के मूलग्रंथ इसी भाषा में रचित हैं। यूनान में आज भी इसी प्राचीन भाषा की बोलियों में से ही एक नए रूप का व्यवहार किया जाता है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=7}}
;2. इटैलिक:
इटैलियन, फ़्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली, रोमानियन आदि इटैलिक क्षेत्र की पाँचों भाषाओं का विकास लैटिन से हुआ।{{sfn|देवेन्द्रनाथ शर्मा|2004|p=16}} प्राचीन रोमन साम्राज्य की भाषा होने के कारण यह उपकुल विशेष आदरणीय हो गया। यूरोप की प्रायः सभी आधुनिक भाषाओं पर लैटिन और ग्रीक का प्रभाव माना जा सकता है। वैज्ञानिक और विभिन्न पारिभाषिक शब्दावलियों का निर्माण भी प्रायः इन्हीं प्राचीन भाषाओं के सहारे किया जाता है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|pp=7-8}}
;3. केल्टिक:
इस उपकुल की एक शाखा आयरलैंड में तथा दूसरी ग्रेट ब्रिटेन (स्कॉटलैंड, वेल्स तथा कार्नवाल) में पायी जाती है। इस उपकुल की एक प्राचीन भाषा गाल अब मृतप्राय है।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=8}}
;4. जर्मनिक अथवा ट्यूटैनिक:
गाथिक और नार्स भाषाओं में इस उपकुल का प्राचीन रूप विद्यमान है। नार्स से स्वीडेन, डेनमार्क, आइसलैंड आदि की भाषाएँ विकसित हुई हैं। जर्मन, डच, फ़्लेमिश तथा अंग्रेज़ी आदि भाषाएँ भी इसी उपकुल की सदस्य हैं।{{sfn|धीरेंद्र वर्मा|2016|p=8}}
==भारतीय आर्यभाषाएँ ==
काल की दृष्टि से भारतीय आर्यभाषाएँ तीन वर्गों में विभक्त की गई हैं{{sfn|देवेन्द्रनाथ शर्मा|2004|p=26}}:
# प्राचीन भारतीय आर्यभाषा—1500 ई॰ पू॰ से 500 ई॰ पू॰ तक।
# मध्य भारतीय आर्यभाषा—500 ई॰ पू॰ से 1000 ई॰ तक।
# आधुनिक भारतीय आर्यभाषा—1000 ई॰ से आज तक।
यह जानने के लिए कि आधुनिक आर्यभाषा के रूप में हिंदी अपनी पूर्ववर्ती भाषिक अवस्थाओं से कितनी प्रभावित हुई, इनका संक्षिप्त परिचय आवश्यक है।
=== प्राचीन भारतीय आर्यभाषा ===
'''संस्कृत''' इस काल की प्रमुख भाषा रही। इसमें भी दो अवस्थाएँ मानी जाती हैं —'''वैदिक संस्कृत''' और '''लौकिक संस्कृत'''। वैदिक संस्कृत का काल लगभग 1500 ई॰ पू॰ से 1000 ई॰ पू॰ तक है। वैदिक संस्कृत का रूप वैदिक संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद आदि ग्रंथों में मिलता है।{{sfn|भोलानाथ तिवारी|2017|p=13}} वैदिक संस्कृत में भाषा का रूप-वैविध्य लौकिक संस्कृत की तुलना में अधिक था। वैदिक भाषा श्लिष्ट योगात्मक थी। वैदिक संस्कृत की रूप रचना में विविधता है। जैसे–प्रथमा विभक्ति बहुवचन में देव शब्द के 'देवाः' और 'देवासः', तृतीय विभक्ति बहुवचन में 'देवैः' और 'देवेभिः' दोनों रूप होते हैं। लौकिक संस्कृत में आकर यह अधिक व्यवस्थित हो गया। अपवादों और भेदों की कमी हो गयी। उदाहरण के तौर पर पूर्वोक्त दोनों वैकल्पिक रूप छँट गये और एक-एक रूप (देवाः तथा दैवैः) को ही मान्यता मिली। वैदिक संस्कृत स्वर-प्रधान है जबकि लौकिक संस्कृत में बलाघात की प्रधानता हो गई। वैदिक संस्कृत में उपसर्ग का प्रयोग मूल शब्द से हटकर भी हो सकता है किंतु लौकिक संस्कृत में नहीं। जैसे—परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः। (ऋग्वेद, 1–4–3) इस मंत्र में 'परि' उपसर्ग 'यन्ति' (क्रिया) के साथ होना चाहिए था लेकिन वह इससे अलग प्रयुक्त हुआ। लौकिक संस्कृत में यह प्रवृत्ति दिखायी नहीं पड़ती।{{sfn|देवेंद्रनाथ शर्मा|2004|p=27}}
===मध्यकालीन आर्यभाषाएँ===
मध्यकालीन आर्यभाषाएँ, जिन्हें मध्य भारतीय आर्यभाषाएँ भी कहा जाता है, प्राचीन भारतीय आर्यभाषाओं (जैसे संस्कृत) और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं (जैसे हिंदी, बंगाली, मराठी आदि) के बीच की कड़ी हैं। ये भाषाएँ लगभग 500 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी तक भारत में प्रचलित थीं। कालक्रम की दृष्टि से पाली (500 ई॰ पू॰–1 ई॰), प्राकृत (1 ई॰–500 ई॰) तथा अपभ्रंश (500 ई॰–1000 ई॰) के बाद आधुनिक आर्यभाषाओं का विकास हुआ। प्रमुख मध्यकालीन आर्यभाषाओं का संक्षिप्त परिचय निम्नवत है:—
====पाली====
यह बौद्ध धर्म की प्रमुख भाषा थी, जिसमें त्रिपिटक (बौद्ध ग्रंथ) लिखे गए। यह मध्यकालीन आर्यभाषाओं में सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से प्रचलित थी। पाली का विकास मगध क्षेत्र में हुआ और यह श्रीलंका, म्यांमार जैसे क्षेत्रों में फैली।
====प्राकृत====
प्राकृत शब्द का अर्थ है "प्राकृतिक" या "सामान्य जन की भाषा"। इसमें कई उप-भाषाएँ शामिल थीं, जैसे—'''महाराष्ट्री प्राकृत'''। इनका प्रयोग जैन ग्रंथों और काव्य में हुआ, जैसे—"पउमचरिय"।
'''शौरसेनी प्राकृत'''—इनका प्रयोग नाटकों में, विशेष रूप से कालिदास और भास के नाटकों में (सामान्य लोगों की भाषा के रूप में) हुआ। '''मागधी प्राकृत'''—पूर्वी भारत में प्रचलित।'''अर्धमागधी'''—जैन धर्म के ग्रंथों में उपयोग, जैसे—'आगम'। प्राकृत का प्रयोग साहित्य, धर्म, और सामान्य संवाद में होता था।
====अपभ्रंश====
यह मध्यकालीन आर्यभाषाओं का अंतिम चरण था (लगभग 6वीं से 13वीं शताब्दी)। अपभ्रंश का अर्थ है "विकृत" या "परिवर्तित" भाषा, जो प्राकृत से और सरल हुई। यह आधुनिक भारतीय भाषाओं (जैसे हिंदी, गुजराती, राजस्थानी) का आधार बनी। उदाहरण के लिए स्वयंभू और पुष्पदंत जैसे कवियों ने अपभ्रंश में रचनाएँ कीं।
== संदर्भ ==
{{reflist}}
== स्रोत ==
* {{cite book |last1=झा |first1=सीताराम |title=भाषा विज्ञान तथा हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण |publisher=बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी |location=पटना |isbn=978-93-83021-84-0 |page= |edition=2015}}
* {{cite book |last1=वर्मा |first1=धीरेंद्र |title=हिंदी भाषा का इतिहास |date=1933 |publisher=हिंदी एकेडमी |location=इलाहाबाद |isbn=978-93-85185-03-8 |edition=2016}}
* {{cite book |last1=शर्मा |first1=देवेन्द्रनाथ |title=हिन्दी भाषा और नागरी लिपि |date=2004 |publisher=हिन्दी साहित्य सम्मेलन |location=प्रयाग}}
* {{cite book |last1=तिवारी |first1=भोलानाथ |title=हिन्दी भाषा और नागरी लिपि |date=2017 |publisher=लोकभारती प्रकाशन |location=इलाहाबाद}}
== वीडियो व्याख्यान ==
* [https://www.youtube.com/watch?v=CsihYoqgU08 भारोपीय परिवार की भाषाएँ और उनका विकास]
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