विकिपीडिया magwiki https://mag.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE MediaWiki 1.47.0-wmf.14 first-letter मीडिया विशेष वार्ता प्रयोगकर्ता प्रयोगकर्ता वार्ता विकिपीडिया विकिपीडिया वार्ता सञ्चिका सञ्चिका वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहयोग सहयोग वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk Module Module talk Event Event talk जैनधर्मके इतिहास 0 16620 64395 64375 2026-08-08T07:07:11Z Pataliputra01 5 64395 wikitext text/x-wiki [[सञ्चिका:Udayagiri Caves - Rani Gumpha 01.jpg|thumb|300px|उदयगिरिके रानी गुम्फा (मूल जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय)]] [[जैनधर्म]] भारत श्रमण परम्परासे निकलल प्राचीन [[धर्म]] आउ [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] है । जैन अर्थात् कर्मके नाश करेवाला 'जिन भगवान्' के अनुयायी । [[सिन्धु घाटी सभ्यता|सिन्धु घाटी]]से भेटल जैन अवशेष जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्मके दर्जा दे है ।<ref name="जैन धर्म की प्राचीनता"> http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html  {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150704210130/http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html |date=4 जुलाई 2015 }}</ref> [[शिखरजी|सम्मेत्त शिखर]], [[राजगीर]], [[पावापुरी]], [[गिरनार]], [[शत्रुञ्जय]] [[पावागढ़]] आदि जैनके प्रसिद्ध [[तीर्थ]] है । [[पर्यूषण पर्व|पर्यूषण]] पर्व आउ महावीर स्वामी जन्म कल्याणक इनकर मुख्य त्यौहार है । [[अहमदाबाद]], [[महाराष्ट्र]], [[उत्तरप्रदेश]], [[बङ्गाल]], [[राजस्थान]] आदिके अनेक जैन आजकल भारतके अग्रगण्य उद्योगपति आउ व्यापारीमे गिनल जा हथिन । जैन ग्रन्थके अनुसार [[धर्म]] वस्तुके स्वाभाव समझाव है । एहीसे जहियासे [[सृष्टि]] है तहियासे धर्म है, आउ जहिया तक सृष्टि है तहिया तक धर्म रहतै, अर्थात् जैनधर्म सदासे अस्तित्वमे हलै आउ सदा रहतै ।<ref name="Glasenapp 1999. P.15">Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.15 "Jainas consider that religion is eternal and imperishable. It is without beginning and it will never cease to exist. The darkness of error enveloping the truth in certain, periodically occurring aeons clears up again and again so that the brightness of the Jaina-faith can sparkle again anew."</ref><ref name="Dundas, Paul 2002. P.12">Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.12 "Jainism is believed by its followers to be everlasting, without beginning or end..."</ref><ref>Varni, Jinendra; Ed. Prof. Sagarmal Jain, Translated Justice T.K. Tukol and Dr. Narendra Bhandari. ''{{IAST|Samaṇ Suttaṁ}}.'' New Delhi: Bhagwan Mahavir memorial Samiti. “The Historians have so far fully recognized the truth that Tirthankara Mahavira was not the founder of the religion. He was preceded by many tirthankaras. He merely reiterated and rejuvenated that religion. It is correct that history has not been able to trace the origin of the Jaina religion; but historical evidence now available and the result of dispassionate researches in literature have established that Jainism is undoubtedly an ancient religion.” Pp. xii&nbsp;– xiii of introduction by Justice T.K.Tutkol and Dr. K.K. Dixit.</ref><ref>Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.24. "Thus not only nothing, from the philosophical and the historical point of view, comes in the way of the supposition that Jainism was established by Parsva around 800 BC, but it is rather confirmed in everything that we know of the spiritual life of that period."</ref><ref>Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.17. "Jainism, then, was in origin merely one component of a north Indian ascetic culture that flourished in the Ganges basin from around the eighth or seventh centuries BC."</ref> इतिहासकार सब द्वारा जैनधर्मके मूलो [[सिन्धु घाटी सभ्यता]]से जोड़ल जा है जे [[हिन्द आर्य प्रवास]]से पूर्वके देशी आध्यात्मिकताके दर्शाव है । सिन्धु घाटीसे भेटल जैन शिलालेखो जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्म होवेके पुष्टि कर है । <ref>Larson, Gerald James (1995) ''India’s Agony over religion '' SUNY Press ISBN 0-7914-2412-X. “There is some evidence that Jain traditions may be even older than the Buddhist traditions, possibly going back to the time of the Indus valley civilization, and that Vardhamana rather than being a “founder” per se was, rather, simply a primary spokesman for much older tradition. Page 27”</ref><ref>Joel Diederik Beversluis (2000) In: ''Sourcebook of the World's Religions: An Interfaith Guide to Religion and Spirituality'', New World Library : Novato, CA ISBN 1-57731-121-3 Originating on the Indian sub-continent, Jainism is one of the oldest religion of its homeland and indeed the world, having pre-historic origins before 3000 BC and the propagation of Indo-Aryan culture.... p. 81</ref><ref>Jainism by Mrs. N.R. Guseva p.44</ref> अन्य शोधार्थीके अनुसार [[श्रमण परम्परा|श्रमण]] परम्परा [[वैदिक धर्म|ऐतिहासिक वैदिक धर्म]]के हिन्द-आर्य प्रथाके साथ समकालीन आउ पृथक होलै ।<ref>{{cite book | title=Jainism: An Introduction | publisher=I.B. Tauris | author=Long, Jeffrey D. | year=2009 | location=New York | pages=45–56 | isbn=978-1-84511-626-2}}</ref> जैन ग्रन्थ ([[आगम (जैन)|आगम]]) के अनुसार वर्तमानमे प्रचलित जैनधर्म [[ऋषभदेव|आदिनाथ]]के समयसे प्रचलनमे ऐलै । एहैँसे जे [[तीर्थङ्कर]] परम्परा प्रारम्भ होलै ऊ [[महावीर]] वा वर्धमान तक चलित रहलै जे ईसासे ५२७ वर्ष पूर्व [[निर्वाण]] प्राप्त कैलन हल । महावीरके समयसे पीछे कुछ लोग विशेषकरके यूरोपीय विद्वान् जैनधर्मके प्रचलित होएल मान हथिन । जैनधर्म [[बौद्धधर्म]]से पुराना है । एकर बौद्धधर्मसे कोनो नाता न है । ==ऐतिहासिक रूपरेखा== जैन मान्यताके अनुसार जैनधर्म अनादि कालसे चलल ऐलै हे आउ अनन्त काल तक चलित रहतै । ई धर्मके प्रचार करेला समय-समय पर अनेक तीर्थङ्करके आविर्भाव होवित रह है । जैनधर्मके २४ तीर्थङ्करमे [[ऋषभदेव|ऋषभ]] प्रथम आउ [[महावीर]] अन्तिम तीर्थङ्कर हथिन । महावीरके ११ [[गणधर]] (मुख्य शिष्य) हलथिन - [[इन्द्रभूति गौतम]], [[अग्निभूति गौतम]] ,[[वायुभूति गौतम]], [[व्यक्तस्वामी]], [[सुधर्मास्वामी]] , [[मण्डितपुत्र]], [[मौर्यपुत्र]], [[अकम्पित गौतम]], [[अचलभ्राता]], [[मेतार्यस्वामी]] आउ [[प्रभासस्वामी]] । महावीर स्वयं क्षत्रिय कुलमे उत्पन्न होइथिन किन्तु उनकफ सब गणधर [[ब्राह्मण]] हलथिन । एकरामे गौतम इन्द्रभूति आउ सुधर्माके छोड़के नौ गणधर महावीरके जीवनकालेमे देह त्याग कैलथिन । जौन रात्रिके महावीर [[निर्वाण]] पौलथिन ओही रात्रिके [[इन्द्रभूति गौतम|गौतम इन्द्रभूति]]के केवलज्ञानके प्राप्ति होलै । महावीर-निर्वाणके पश्चात् [[सुधर्मास्वामी|सुधर्मा]] २० वर्ष तक जैन सङ्घके अधिपति रहलथिन । बादमे सङ्घके भार जम्बूस्वामीके सुपुर्द कर देल गेलै आउ ई प्रकार जैन परम्परा आगे बढ़ित रहलै । जम्बूस्वामीके पश्चात् [[केवलज्ञान]] आउ निर्वाण-गमनके द्वार बन्द हो गेलै । [[पार्श्वनाथ]]के मान्यताके अनुसरण करके [[लिच्छवि]] कुलोत्पन्न महावीर चतुर्विध सङ्घके दृढ़ बनावेला गणतन्त्रवादी आदर्श पर सङ्घके नियमके सङ्घटित कैलथिन । निर्ग्रन्थ धर्मके प्रचार करेला ज्ञातपुत्र महावीर [[बिहार]]मे [[राजगृह]], चम्पा ([[भागलपुर]]), मछिया ([[मुङ्गेर]]), [[वैशाली]] (बसाढ़) आउ [[मिथिला]] (जनकपुर) आदि तथा [[उत्तरप्रदेश]]मे [[वाराणसी|बनारस]], [[कौशाम्बी जिला|कौशाम्बी]] (कोसम) [[अयोध्या]], [[श्रावस्ती]] (सहेट-महेट) आउ स्थूणा ([[स्थानेश्वर]]) आदि स्थानमे विहार कैलथिन । ऊ समय एही आर्य क्षेत्र कहला हलै, शेष क्षेत्र अनार्य हलै । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[बिम्बिसार]] (श्रेणिक) आउ [[अजातशत्रु]] (कूणिक) के जैनधर्मके अनुयायी कहल गेलै हे । राजसिंह श्रेणिक द्वारा महावीरसे प्रश्न पूछल जाएके उल्लेख जैन शास्त्रमे आव है । चम्पानगरीमे महावीरके समवसृत होवे पर अजातशत्रुके अपन दलबल सहित उनकर दर्शनार्थ गमन करेके वर्णन प्राचीन आगममे मिल है । [[नन्द वंश|नन्द राजा]] घड़ी [[भद्रबाहु]] आउ स्थूलभद्र बड़ प्रतिभाशाली जैन आचार्य होइथिन जे जैनधर्मके समुन्नत बनैलथिन । आचार्य महागिरि स्थूलभद्रके प्रधान शिष्यमे से हलथिन । [[पाटलिपुत्र]] नगरे जैन आगमके प्रथम वाचना होलै जे 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नामसे कहल जा है । [[चन्द्रगुप्त]]के बाद [[अशोक]] (२७२-२३२ ईपू) के पौत्र राजा सम्प्रति (२२०-२११ ईपू) के नाम जैन ग्रन्थमे बड़ी आदरसे लेल जा है । आचार्य महागिरिके शिष्य सुहस्ति सम्प्रतिके जैनधर्ममे दीक्षित कैलथिन । सम्प्रति [[महाराष्ट्र]], [[आन्ध्र]], [[द्रविड़]], [[कुर्ग]] आदि प्रदेशमे अपन सुभटके भेजके जैन श्रमणसङ्घके विशेष प्रभावना कैलथिन । [[कलिङ्ग]]के सम्राट [[खारवेल]] जैनधर्मके परम अनुयायी हलन । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[नन्द वंश|नन्द]], जे जिन-प्रतिमा उठाके ले गेलन हल, ओकरा ऊ वापिस लैलन । [[कटक]] भिरु [[उदयगिरि आउ खण्डगिरि|उदयगिरि]]से प्राप्त शिलालेखसे पता चल है कि [[खारवेल]] ऋषभके प्रतिमा निर्माण करवैलन आउ जैन साधुके रहेला गुफा खोदवैलन । तत्पश्चात् ईसवीके पूर्व प्रथम शताब्दीमे [[उज्जैन|उज्जैनी]]के राजा [[विक्रमादित्य]]के पिता गर्दभिल्लसे उत्तेजित कैल जाए पर कालकाचार्यके [[ईरान]] जाके [[शक]] राजाके हिन्दुस्तानमे लावेके उल्लेख जैन ग्रन्थमे मिल है । कालकाचार्यके प्रतिष्ठान ([[पैठन]], महाराष्ट्र) के राजा सातवाहनके समकालीन बतावल गेलै हे । फिर आचार्य पादलिप्त, वज्रस्वामी आउ आर्यरक्षित सङ्घके अधिपतित्व कैलन । ई प्रकार जैनधर्मके उन्नति होवित गेलै आउ अखनि ऊ दूर दूर तक फैल गेलै । [[Image:Kankali Tila (Samvat 95).jpg|right|thumb|300px|[[मथुरा]]के [[कङ्काली टीला]] नामक पुरातात्विक स्थल पर चार तीर्थङ्करके मूर्ति]] [[मथुरा]]मे ईसवीके आरम्भके जे शिलालेख उपलब्ध होलै हे, ओकरासे पता लग है कि कोनो समय मथुरा जैनधर्मके बड़ केन्द्र हलै आउ व्यापारी एवं निम्नवर्गके लोग ई धर्मके अनुयायी हलन । एहाँके शिलालेखमे जे जैन आचार्यके गण, कुल आउ शाखाके उल्लेख है ऊ भद्रबाहुके [[कल्पसूत्र (जैन)|कल्पसूत्र]]के स्थाविरावलिमे जैसेके तैसे मिल है । ईसवी ३६०-७३ के लगभग आर्य स्कन्दिलके अध्यक्षतामे मथुरामे जैन आगमके दोसर वाचना होलै । एकरोसे मथुराके महत्त्वके पता चल है । ई कालके प्रमुख जैन आचार्यमे उमास्वाति, [[सिद्धसेन]]के नाम विशेष उल्लेखनीय है जे अपन अलौकिक प्रतिभाके बलसे जैन साहित्यके पुष्पित आउ पल्लवित कैलन । जैनधर्मके कीर्ति पताका चारो दिशामे फैलल हलै । [[गुप्त राजवंश|गुप्त]] राजाके काल भारतवर्षके सुवर्णकाल कहल जा है । ई समय जैनधर्म उत्तरोत्तर उन्नत दशाके प्राप्त होवित गेलै । [[गुजरात]]मे [[गिरनार]] आउ [[पालीताना|शत्रुञ्जय]] जैनके परम तीर्थ मानल गेलै हे । ईसवीके ७मा शताब्दीमे देवर्धिगणि क्षमाश्रमणके अधिपतित्वमे वल्लभीमे जैन आगमके अन्तिम वाचना स्वीकार करके ओकरा लिपिबद्ध कर देल गेलै । आगे चलके [[चावडा राजवंश|चावड़ा]] वंशके राजा वनराज राजगद्दी पर आसीन होवेके पूर्व (७२०-७८०) जैन मुनि शीलगुणसूरिके उपदेशसे प्रभावित होके गुजरातके प्रसिद्ध अणहिल्लपुर पाटण नामके नगर बसौलन । आचार्य [[आचार्य हरिभद्र|हरिभद्र]] नियन प्रकाण्ड विद्वानके ई समय जनम होलै जे न्यायसिद्धान्त आदि विषय पर ग्रन्थ लिखके जैनधर्मके समुन्नत कैलन । फिर [[चालुक्य राजवंश|चालुक्य वंश]]के स्थापक राजा मूलराज (९६१-९९६) जैन मन्दिरके निर्माण करवौलन । अणहिल्लपुर पाटणके राजा सिद्धराज जयसिंह कलिकाल सर्वज्ञ [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] (जनम १०८८ ई) के समकालीन हलन । सिद्धराज जयसिंहके मृत्यु हो जाए पर उनकर भतीजा [[कुमारपाल]] गुजरातके गद्दी पर बैठलन । कुमारपाल हेमचन्दके राजगुरु नियन मान हलन । == एकरो देखथिन == * [[भारतमे जैनधर्म]] * [[जैनधर्म]] * [[गणधर]] * [[तीर्थङ्कर|जैनधर्मके तीर्थङ्कर]] * [[जैन त्योहार]] * [[विहरमान तीर्थङ्कर]] * [[शलाकापुरुष]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:जैनधर्मके इतिहास]] [[Category:जैनधर्म]] 8xcbn5iwj9klh748405w5c4d8b8aeh1 64396 64395 2026-08-08T07:09:13Z Pataliputra01 5 64396 wikitext text/x-wiki [[सञ्चिका:Udayagiri Caves - Rani Gumpha 01.jpg|thumb|300px|उदयगिरिके रानी गुम्फा (मूल जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय)]] [[जैनधर्म]] भारत श्रमण परम्परासे निकलल प्राचीन [[धर्म]] आउ [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] है । जैन अर्थात् कर्मके नाश करेवाला 'जिन भगवान्' के अनुयायी । [[सिन्धु घाटी सभ्यता|सिन्धु घाटी]]से भेटल जैन अवशेष जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्मके दर्जा दे है ।<ref name="जैन धर्म की प्राचीनता"> http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html  {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150704210130/http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html |date=4 जुलाई 2015 }}</ref> [[शिखरजी|सम्मेत्त शिखर]], [[राजगीर]], [[पावापुरी]], [[गिरनार]], [[शत्रुञ्जय]] [[पावागढ़]] आदि जैनके प्रसिद्ध [[तीर्थ]] है । [[पर्यूषण पर्व|पर्यूषण]] पर्व आउ महावीर स्वामी जन्म कल्याणक इनकर मुख्य त्यौहार है । [[अहमदाबाद]], [[महाराष्ट्र]], [[उत्तरप्रदेश]], [[बङ्गाल]], [[राजस्थान]] आदिके अनेक जैन आजकल भारतके अग्रगण्य उद्योगपति आउ व्यापारीमे गिनल जा हथिन । जैन ग्रन्थके अनुसार [[धर्म]] वस्तुके स्वाभाव समझाव है । एहीसे जहियासे [[सृष्टि]] है तहियासे धर्म है, आउ जहिया तक सृष्टि है तहिया तक धर्म रहतै, अर्थात् जैनधर्म सदासे अस्तित्वमे हलै 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P.15">Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.15 "Jainas consider that religion is eternal and imperishable. It is without beginning and it will never cease to exist. The darkness of error enveloping the truth in certain, periodically occurring aeons clears up again and again so that the brightness of the Jaina-faith can sparkle again anew."</ref><ref name="Dundas, Paul 2002. P.12">Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.12 "Jainism is believed by its followers to be everlasting, without beginning or end..."</ref><ref>Varni, Jinendra; Ed. Prof. Sagarmal Jain, Translated Justice T.K. Tukol and Dr. Narendra Bhandari. ''{{IAST|Samaṇ Suttaṁ}}.'' New Delhi: Bhagwan Mahavir memorial Samiti. “The Historians have so far fully recognized the truth that Tirthankara Mahavira was not the founder of the religion. He was preceded by many tirthankaras. He merely reiterated and rejuvenated that religion. It is correct that history has not been able to trace the origin of the Jaina religion; but historical evidence now available and the result of dispassionate researches in literature have established that Jainism is undoubtedly an ancient religion.” Pp. xii&nbsp;– xiii of introduction by Justice T.K.Tutkol and Dr. K.K. Dixit.</ref><ref>Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.24. "Thus not only nothing, from the philosophical and the historical point of view, comes in the way of the supposition that Jainism was established by Parsva around 800 BC, but it is rather confirmed in everything that we know of the spiritual life of that period."</ref><ref>Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.17. "Jainism, then, was in origin merely one component of a north Indian ascetic culture that flourished in the Ganges basin from around the eighth or seventh centuries BC."</ref> इतिहासकार सब द्वारा जैनधर्मके मूलो [[सिन्धु घाटी सभ्यता]]से जोड़ल जा है जे [[हिन्द आर्य प्रवास]]से पूर्वके देशी आध्यात्मिकताके दर्शाव है । सिन्धु घाटीसे भेटल जैन शिलालेखो जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्म होवेके पुष्टि कर है । <ref>Larson, Gerald James (1995) ''India’s Agony over religion '' SUNY Press ISBN 0-7914-2412-X. “There is some evidence that Jain traditions may be even older than the Buddhist traditions, possibly going back to the time of the Indus valley civilization, and that Vardhamana rather than being a “founder” per se was, rather, simply a primary spokesman for much older tradition. Page 27”</ref><ref>Joel Diederik Beversluis (2000) In: ''Sourcebook of the World's Religions: An Interfaith Guide to Religion and Spirituality'', New World Library : Novato, CA ISBN 1-57731-121-3 Originating on the Indian sub-continent, Jainism is one of the oldest religion of its homeland and indeed the world, having pre-historic origins before 3000 BC and the propagation of Indo-Aryan culture.... p. 81</ref><ref>Jainism by Mrs. N.R. Guseva p.44</ref> अन्य शोधार्थीके अनुसार [[श्रमण परम्परा|श्रमण]] परम्परा [[वैदिक धर्म|ऐतिहासिक वैदिक धर्म]]के हिन्द-आर्य प्रथाके साथ समकालीन आउ पृथक होलै ।<ref>{{cite book | title=Jainism: An Introduction | publisher=I.B. Tauris | author=Long, Jeffrey D. | year=2009 | location=New York | pages=45–56 | isbn=978-1-84511-626-2}}</ref> जैन ग्रन्थ ([[आगम (जैन)|आगम]]) के अनुसार वर्तमानमे प्रचलित जैनधर्म [[ऋषभदेव|आदिनाथ]]के समयसे प्रचलनमे ऐलै । एहैँसे जे [[तीर्थङ्कर]] परम्परा प्रारम्भ होलै ऊ [[महावीर]] वा वर्धमान तक चलित रहलै जे ईसासे ५२७ वर्ष पूर्व [[निर्वाण]] प्राप्त कैलन हल । महावीरके समयसे पीछे कुछ लोग विशेषकरके यूरोपीय विद्वान् जैनधर्मके प्रचलित होएल मान हथिन । जैनधर्म [[बौद्धधर्म]]से पुराना है । एकर बौद्धधर्मसे कोनो नाता न है । ==ऐतिहासिक रूपरेखा== जैन मान्यताके अनुसार जैनधर्म अनादि कालसे चलल ऐलै हे आउ अनन्त काल तक चलित रहतै । ई धर्मके प्रचार करेला समय-समय पर अनेक तीर्थङ्करके आविर्भाव होवित रह है । जैनधर्मके २४ तीर्थङ्करमे [[ऋषभदेव|ऋषभ]] प्रथम आउ [[महावीर]] अन्तिम तीर्थङ्कर हथिन । महावीरके ११ [[गणधर]] (मुख्य शिष्य) हलथिन - [[इन्द्रभूति गौतम]], [[अग्निभूति गौतम]] ,[[वायुभूति गौतम]], [[व्यक्तस्वामी]], [[सुधर्मास्वामी]] , [[मण्डितपुत्र]], [[मौर्यपुत्र]], [[अकम्पित गौतम]], [[अचलभ्राता]], [[मेतार्यस्वामी]] आउ [[प्रभासस्वामी]] । महावीर स्वयं क्षत्रिय कुलमे उत्पन्न होइथिन किन्तु उनकफ सब गणधर [[ब्राह्मण]] हलथिन । एकरामे गौतम इन्द्रभूति आउ सुधर्माके छोड़के नौ गणधर महावीरके जीवनकालेमे देह त्याग कैलथिन । जौन रात्रिके महावीर [[निर्वाण]] पौलथिन ओही रात्रिके [[इन्द्रभूति गौतम|गौतम इन्द्रभूति]]के केवलज्ञानके प्राप्ति होलै । महावीर-निर्वाणके पश्चात् [[सुधर्मास्वामी|सुधर्मा]] २० वर्ष तक जैन सङ्घके अधिपति रहलथिन । बादमे सङ्घके भार जम्बूस्वामीके सुपुर्द कर देल गेलै आउ ई प्रकार जैन परम्परा आगे बढ़ित रहलै । जम्बूस्वामीके पश्चात् [[केवलज्ञान]] आउ निर्वाण-गमनके द्वार बन्द हो गेलै । [[पार्श्वनाथ]]के मान्यताके अनुसरण करके [[लिच्छवि]] कुलोत्पन्न महावीर चतुर्विध सङ्घके दृढ़ बनावेला गणतन्त्रवादी आदर्श पर सङ्घके नियमके सङ्घटित कैलथिन । निर्ग्रन्थ धर्मके प्रचार करेला ज्ञातपुत्र महावीर [[बिहार]]मे [[राजगृह]], चम्पा ([[भागलपुर]]), मछिया ([[मुङ्गेर]]), [[वैशाली]] (बसाढ़) आउ [[मिथिला]] (जनकपुर) आदि तथा [[उत्तरप्रदेश]]मे [[वाराणसी|बनारस]], [[कौशाम्बी जिला|कौशाम्बी]] (कोसम) [[अयोध्या]], [[श्रावस्ती]] (सहेट-महेट) आउ स्थूणा ([[स्थानेश्वर]]) आदि स्थानमे विहार कैलथिन । ऊ समय एही आर्य क्षेत्र कहला हलै, शेष क्षेत्र अनार्य हलै । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[बिम्बिसार]] (श्रेणिक) आउ [[अजातशत्रु]] (कूणिक) के जैनधर्मके अनुयायी कहल गेलै हे । राजसिंह श्रेणिक द्वारा महावीरसे प्रश्न पूछल जाएके उल्लेख जैन शास्त्रमे आव है । चम्पानगरीमे महावीरके समवसृत होवे पर अजातशत्रुके अपन दलबल सहित उनकर दर्शनार्थ गमन करेके वर्णन प्राचीन आगममे मिल है । [[नन्द वंश|नन्द राजा]] घड़ी [[भद्रबाहु]] आउ स्थूलभद्र बड़ प्रतिभाशाली जैन आचार्य होइथिन जे जैनधर्मके समुन्नत बनैलथिन । आचार्य महागिरि स्थूलभद्रके प्रधान शिष्यमे से हलथिन । [[पाटलिपुत्र]] नगरे जैन आगमके प्रथम वाचना होलै जे 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नामसे कहल जा है । [[चन्द्रगुप्त]]के बाद [[अशोक]] (२७२-२३२ ईपू) के पौत्र राजा सम्प्रति (२२०-२११ ईपू) के नाम जैन ग्रन्थमे बड़ी आदरसे लेल जा है । आचार्य महागिरिके शिष्य सुहस्ति सम्प्रतिके जैनधर्ममे दीक्षित कैलथिन । सम्प्रति [[महाराष्ट्र]], [[आन्ध्र]], [[द्रविड़]], [[कुर्ग]] आदि प्रदेशमे अपन सुभटके भेजके जैन श्रमणसङ्घके विशेष प्रभावना कैलथिन । [[कलिङ्ग]]के सम्राट [[खारवेल]] जैनधर्मके परम अनुयायी हलन । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[नन्द वंश|नन्द]], जे जिन-प्रतिमा उठाके ले गेलन हल, ओकरा ऊ वापिस लैलन । [[कटक]] भिरु [[उदयगिरि आउ खण्डगिरि|उदयगिरि]]से प्राप्त शिलालेखसे पता चल है कि [[खारवेल]] ऋषभके प्रतिमा निर्माण करवैलन आउ जैन साधुके रहेला गुफा खोदवैलन । तत्पश्चात् ईसवीके पूर्व प्रथम शताब्दीमे [[उज्जैन|उज्जैनी]]के राजा [[विक्रमादित्य]]के पिता गर्दभिल्लसे उत्तेजित कैल जाए पर कालकाचार्यके [[ईरान]] जाके [[शक]] राजाके हिन्दुस्तानमे लावेके उल्लेख जैन ग्रन्थमे मिल है । कालकाचार्यके प्रतिष्ठान ([[पैठन]], महाराष्ट्र) के राजा सातवाहनके समकालीन बतावल गेलै हे । फिर आचार्य पादलिप्त, वज्रस्वामी आउ आर्यरक्षित सङ्घके अधिपतित्व कैलन । ई प्रकार जैनधर्मके उन्नति होवित गेलै आउ अखनि ऊ दूर दूर तक फैल गेलै । [[Image:Kankali Tila (Samvat 95).jpg|right|thumb|300px|[[मथुरा]]के [[कङ्काली टीला]] नामक पुरातात्विक स्थल पर चार तीर्थङ्करके मूर्ति]] [[मथुरा]]मे ईसवीके आरम्भके जे शिलालेख उपलब्ध होलै हे, ओकरासे पता लग है कि कोनो समय मथुरा जैनधर्मके बड़ केन्द्र हलै आउ व्यापारी एवं निम्नवर्गके लोग ई धर्मके अनुयायी हलन । एहाँके शिलालेखमे जे जैन आचार्यके गण, कुल आउ शाखाके उल्लेख है ऊ भद्रबाहुके [[कल्पसूत्र (जैन)|कल्पसूत्र]]के स्थाविरावलिमे जैसेके तैसे मिल है । ईसवी ३६०-७३ के लगभग आर्य स्कन्दिलके अध्यक्षतामे मथुरामे जैन आगमके दोसर वाचना होलै । एकरोसे मथुराके महत्त्वके पता चल है । ई कालके प्रमुख जैन आचार्यमे उमास्वाति, [[सिद्धसेन]]के नाम विशेष उल्लेखनीय है जे अपन अलौकिक प्रतिभाके बलसे जैन साहित्यके पुष्पित आउ पल्लवित कैलन । जैनधर्मके कीर्ति पताका चारो दिशामे फैलल हलै । [[गुप्त राजवंश|गुप्त]] राजाके काल भारतवर्षके सुवर्णकाल कहल जा है । ई समय जैनधर्म उत्तरोत्तर उन्नत दशाके प्राप्त होवित गेलै । [[गुजरात]]मे [[गिरनार]] आउ [[पालीताना|शत्रुञ्जय]] जैनके परम तीर्थ मानल गेलै हे । ईसवीके ७मा शताब्दीमे देवर्धिगणि क्षमाश्रमणके अधिपतित्वमे वल्लभीमे जैन आगमके अन्तिम वाचना स्वीकार करके ओकरा लिपिबद्ध कर देल गेलै । आगे चलके [[चावडा राजवंश|चावड़ा]] वंशके राजा वनराज राजगद्दी पर आसीन होवेके पूर्व (७२०-७८०) जैन मुनि शीलगुणसूरिके उपदेशसे प्रभावित होके गुजरातके प्रसिद्ध अणहिल्लपुर पाटण नामके नगर बसौलन । आचार्य [[आचार्य हरिभद्र|हरिभद्र]] नियन प्रकाण्ड विद्वानके ई समय जनम होलै जे न्यायसिद्धान्त आदि विषय पर ग्रन्थ लिखके जैनधर्मके समुन्नत कैलन । फिर [[चालुक्य राजवंश|चालुक्य वंश]]के स्थापक राजा मूलराज (९६१-९९६) जैन मन्दिरके निर्माण करवौलन । अणहिल्लपुर पाटणके राजा सिद्धराज जयसिंह कलिकाल सर्वज्ञ [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] (जनम १०८८ ई) के समकालीन हलन । सिद्धराज जयसिंहके मृत्यु हो जाए पर उनकर भतीजा [[कुमारपाल]] गुजरातके गद्दी पर बैठलन । कुमारपाल हेमचन्दके राजगुरु नियन मान हलन । ई समय आदर्श जैन राज्य स्थापित करेके प्रयत्न कैल गेलै जेकर फलस्वरूप अनेक सुन्दर जैन मन्दिरके निर्माण होलै । प्राणि हिंसा, शिकार, मांस-भक्षण आदिके रोकेके घोषणा कैल गेलै आउ यज्ञके अवसर पर पशुहिंसाके बदले ब्राह्मणके अनाज होम करेके आदेश देल गेलै । एही समय वस्तुपाल आउ तेजपाल मन्त्री [[गिरनार]], शत्रुञ्जय तथा [[माउण्ट आबू|आबू]] पर्वत पर कलापूर्ण भव्य मन्दिरके निर्माण कैलन । == एकरो देखथिन == * [[भारतमे जैनधर्म]] * [[जैनधर्म]] * [[गणधर]] * [[तीर्थङ्कर|जैनधर्मके तीर्थङ्कर]] * [[जैन त्योहार]] * [[विहरमान तीर्थङ्कर]] * [[शलाकापुरुष]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:जैनधर्मके इतिहास]] [[Category:जैनधर्म]] dd9hwsd14h0d2v5nq7wmjngixh3tqlh 64397 64396 2026-08-08T07:12:10Z Pataliputra01 5 64397 wikitext text/x-wiki [[सञ्चिका:Udayagiri Caves - Rani Gumpha 01.jpg|thumb|300px|उदयगिरिके रानी गुम्फा (मूल जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय)]] [[जैनधर्म]] भारत श्रमण परम्परासे निकलल प्राचीन [[धर्म]] आउ [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] है । जैन अर्थात् कर्मके नाश करेवाला 'जिन भगवान्' के अनुयायी । [[सिन्धु घाटी सभ्यता|सिन्धु घाटी]]से भेटल जैन अवशेष जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्मके दर्जा दे है ।<ref name="जैन धर्म की प्राचीनता"> http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html  {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150704210130/http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html |date=4 जुलाई 2015 }}</ref> [[शिखरजी|सम्मेत्त शिखर]], [[राजगीर]], [[पावापुरी]], [[गिरनार]], [[शत्रुञ्जय]] [[पावागढ़]] आदि जैनके प्रसिद्ध [[तीर्थ]] है । [[पर्यूषण पर्व|पर्यूषण]] पर्व आउ महावीर स्वामी जन्म कल्याणक इनकर मुख्य त्यौहार है । [[अहमदाबाद]], [[महाराष्ट्र]], [[उत्तरप्रदेश]], [[बङ्गाल]], [[राजस्थान]] आदिके अनेक जैन आजकल भारतके अग्रगण्य उद्योगपति आउ व्यापारीमे गिनल जा हथिन । जैन ग्रन्थके अनुसार [[धर्म]] वस्तुके स्वाभाव समझाव है । एहीसे जहियासे [[सृष्टि]] है तहियासे धर्म है, आउ जहिया तक सृष्टि है तहिया तक धर्म रहतै, अर्थात् जैनधर्म सदासे अस्तित्वमे हलै आउ सदा रहतै ।<ref name="Glasenapp 1999. P.15">Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.15 "Jainas consider that religion is eternal and imperishable. It is without beginning and it will never cease to exist. The darkness of error enveloping the truth in certain, periodically occurring aeons clears up again and again so that the brightness of the Jaina-faith can sparkle again anew."</ref><ref name="Dundas, Paul 2002. P.12">Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.12 "Jainism is believed by its followers to be everlasting, without beginning or end..."</ref><ref>Varni, Jinendra; Ed. Prof. Sagarmal Jain, Translated Justice T.K. Tukol and Dr. Narendra Bhandari. ''{{IAST|Samaṇ Suttaṁ}}.'' New Delhi: Bhagwan Mahavir memorial Samiti. “The Historians have so far fully recognized the truth that Tirthankara Mahavira was not the founder of the religion. He was preceded by many tirthankaras. He merely reiterated and rejuvenated that religion. It is correct that history has not been able to trace the origin of the Jaina religion; but historical evidence now available and the result of dispassionate researches in literature have established that Jainism is undoubtedly an ancient religion.” Pp. xii&nbsp;– xiii of introduction by Justice T.K.Tutkol and Dr. K.K. Dixit.</ref><ref>Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.24. "Thus not only nothing, from the philosophical and the historical point of view, comes in the way of the supposition that Jainism was established by Parsva around 800 BC, but it is rather confirmed in everything that we know of the spiritual life of that period."</ref><ref>Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.17. "Jainism, then, was in origin merely one component of a north Indian ascetic culture that flourished in the Ganges basin from around the eighth or seventh centuries BC."</ref> इतिहासकार सब द्वारा जैनधर्मके मूलो [[सिन्धु घाटी सभ्यता]]से जोड़ल जा है जे [[हिन्द आर्य प्रवास]]से पूर्वके देशी आध्यात्मिकताके दर्शाव है । सिन्धु घाटीसे भेटल जैन शिलालेखो जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्म होवेके पुष्टि कर है । <ref>Larson, Gerald James (1995) ''India’s Agony over religion '' SUNY Press ISBN 0-7914-2412-X. “There is some evidence that Jain traditions may be even older than the Buddhist traditions, possibly going back to the time of the Indus valley civilization, and that Vardhamana rather than being a “founder” per se was, rather, simply a primary spokesman for much older tradition. Page 27”</ref><ref>Joel Diederik Beversluis (2000) In: ''Sourcebook of the World's Religions: An Interfaith Guide to Religion and Spirituality'', New World Library : Novato, CA ISBN 1-57731-121-3 Originating on the Indian sub-continent, Jainism is one of the oldest religion of its homeland and indeed the world, having pre-historic origins before 3000 BC and the propagation of Indo-Aryan culture.... p. 81</ref><ref>Jainism by Mrs. N.R. Guseva p.44</ref> अन्य शोधार्थीके अनुसार [[श्रमण परम्परा|श्रमण]] परम्परा [[वैदिक धर्म|ऐतिहासिक वैदिक धर्म]]के हिन्द-आर्य प्रथाके साथ समकालीन आउ पृथक होलै ।<ref>{{cite book | title=Jainism: An Introduction | publisher=I.B. Tauris | author=Long, Jeffrey D. | year=2009 | location=New York | pages=45–56 | isbn=978-1-84511-626-2}}</ref> जैन ग्रन्थ ([[आगम (जैन)|आगम]]) के अनुसार वर्तमानमे प्रचलित जैनधर्म [[ऋषभदेव|आदिनाथ]]के समयसे प्रचलनमे ऐलै । एहैँसे जे [[तीर्थङ्कर]] परम्परा प्रारम्भ होलै ऊ [[महावीर]] वा वर्धमान तक चलित रहलै जे ईसासे ५२७ वर्ष पूर्व [[निर्वाण]] प्राप्त कैलन हल । महावीरके समयसे पीछे कुछ लोग विशेषकरके यूरोपीय विद्वान् जैनधर्मके प्रचलित होएल मान हथिन । जैनधर्म [[बौद्धधर्म]]से पुराना है । एकर बौद्धधर्मसे कोनो नाता न है । ==ऐतिहासिक रूपरेखा== जैन मान्यताके अनुसार जैनधर्म अनादि कालसे चलल ऐलै हे आउ अनन्त काल तक चलित रहतै । ई धर्मके प्रचार करेला समय-समय पर अनेक तीर्थङ्करके आविर्भाव होवित रह है । जैनधर्मके २४ तीर्थङ्करमे [[ऋषभदेव|ऋषभ]] प्रथम आउ [[महावीर]] अन्तिम तीर्थङ्कर हथिन । महावीरके ११ [[गणधर]] (मुख्य शिष्य) हलथिन - [[इन्द्रभूति गौतम]], [[अग्निभूति गौतम]] ,[[वायुभूति गौतम]], [[व्यक्तस्वामी]], [[सुधर्मास्वामी]] , [[मण्डितपुत्र]], [[मौर्यपुत्र]], [[अकम्पित गौतम]], [[अचलभ्राता]], [[मेतार्यस्वामी]] आउ [[प्रभासस्वामी]] । महावीर स्वयं क्षत्रिय कुलमे उत्पन्न होइथिन किन्तु उनकफ सब गणधर [[ब्राह्मण]] हलथिन । एकरामे गौतम इन्द्रभूति आउ सुधर्माके छोड़के नौ गणधर महावीरके जीवनकालेमे देह त्याग कैलथिन । जौन रात्रिके महावीर [[निर्वाण]] पौलथिन ओही रात्रिके [[इन्द्रभूति गौतम|गौतम इन्द्रभूति]]के केवलज्ञानके प्राप्ति होलै । महावीर-निर्वाणके पश्चात् [[सुधर्मास्वामी|सुधर्मा]] २० वर्ष तक जैन सङ्घके अधिपति रहलथिन । बादमे सङ्घके भार जम्बूस्वामीके सुपुर्द कर देल गेलै आउ ई प्रकार जैन परम्परा आगे बढ़ित रहलै । जम्बूस्वामीके पश्चात् [[केवलज्ञान]] आउ निर्वाण-गमनके द्वार बन्द हो गेलै । [[पार्श्वनाथ]]के मान्यताके अनुसरण करके [[लिच्छवि]] कुलोत्पन्न महावीर चतुर्विध सङ्घके दृढ़ बनावेला गणतन्त्रवादी आदर्श पर सङ्घके नियमके सङ्घटित कैलथिन । निर्ग्रन्थ धर्मके प्रचार करेला ज्ञातपुत्र महावीर [[बिहार]]मे [[राजगृह]], चम्पा ([[भागलपुर]]), मछिया ([[मुङ्गेर]]), [[वैशाली]] (बसाढ़) आउ [[मिथिला]] (जनकपुर) आदि तथा [[उत्तरप्रदेश]]मे [[वाराणसी|बनारस]], [[कौशाम्बी जिला|कौशाम्बी]] (कोसम) [[अयोध्या]], [[श्रावस्ती]] (सहेट-महेट) आउ स्थूणा ([[स्थानेश्वर]]) आदि स्थानमे विहार कैलथिन । ऊ समय एही आर्य क्षेत्र कहला हलै, शेष क्षेत्र अनार्य हलै । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[बिम्बिसार]] (श्रेणिक) आउ [[अजातशत्रु]] (कूणिक) के जैनधर्मके अनुयायी कहल गेलै हे । राजसिंह श्रेणिक द्वारा महावीरसे प्रश्न पूछल जाएके उल्लेख जैन शास्त्रमे आव है । चम्पानगरीमे महावीरके समवसृत होवे पर अजातशत्रुके अपन दलबल सहित उनकर दर्शनार्थ गमन करेके वर्णन प्राचीन आगममे मिल है । [[नन्द वंश|नन्द राजा]] घड़ी [[भद्रबाहु]] आउ स्थूलभद्र बड़ प्रतिभाशाली जैन आचार्य होइथिन जे जैनधर्मके समुन्नत बनैलथिन । आचार्य महागिरि स्थूलभद्रके प्रधान शिष्यमे से हलथिन । [[पाटलिपुत्र]] नगरे जैन आगमके प्रथम वाचना होलै जे 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नामसे कहल जा है । [[चन्द्रगुप्त]]के बाद [[अशोक]] (२७२-२३२ ईपू) के पौत्र राजा सम्प्रति (२२०-२११ ईपू) के नाम जैन ग्रन्थमे बड़ी आदरसे लेल जा है । आचार्य महागिरिके शिष्य सुहस्ति सम्प्रतिके जैनधर्ममे दीक्षित कैलथिन । सम्प्रति [[महाराष्ट्र]], [[आन्ध्र]], [[द्रविड़]], [[कुर्ग]] आदि प्रदेशमे अपन सुभटके भेजके जैन श्रमणसङ्घके विशेष प्रभावना कैलथिन । [[कलिङ्ग]]के सम्राट [[खारवेल]] जैनधर्मके परम अनुयायी हलन । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[नन्द वंश|नन्द]], जे जिन-प्रतिमा उठाके ले गेलन हल, ओकरा ऊ वापिस लैलन । [[कटक]] भिरु [[उदयगिरि आउ खण्डगिरि|उदयगिरि]]से प्राप्त शिलालेखसे पता चल है कि [[खारवेल]] ऋषभके प्रतिमा निर्माण करवैलन आउ जैन साधुके रहेला गुफा खोदवैलन । तत्पश्चात् ईसवीके पूर्व प्रथम शताब्दीमे [[उज्जैन|उज्जैनी]]के राजा [[विक्रमादित्य]]के पिता गर्दभिल्लसे उत्तेजित कैल जाए पर कालकाचार्यके [[ईरान]] जाके [[शक]] राजाके हिन्दुस्तानमे लावेके उल्लेख जैन ग्रन्थमे मिल है । कालकाचार्यके प्रतिष्ठान ([[पैठन]], महाराष्ट्र) के राजा सातवाहनके समकालीन बतावल गेलै हे । फिर आचार्य पादलिप्त, वज्रस्वामी आउ आर्यरक्षित सङ्घके अधिपतित्व कैलन । ई प्रकार जैनधर्मके उन्नति होवित गेलै आउ अखनि ऊ दूर दूर तक फैल गेलै । [[Image:Kankali Tila (Samvat 95).jpg|right|thumb|300px|[[मथुरा]]के [[कङ्काली टीला]] नामक पुरातात्विक स्थल पर चार तीर्थङ्करके मूर्ति]] [[मथुरा]]मे ईसवीके आरम्भके जे शिलालेख उपलब्ध होलै हे, ओकरासे पता लग है कि कोनो समय मथुरा जैनधर्मके बड़ केन्द्र हलै आउ व्यापारी एवं निम्नवर्गके लोग ई धर्मके अनुयायी हलन । एहाँके शिलालेखमे जे जैन आचार्यके गण, कुल आउ शाखाके उल्लेख है ऊ भद्रबाहुके [[कल्पसूत्र (जैन)|कल्पसूत्र]]के स्थाविरावलिमे जैसेके तैसे मिल है । ईसवी ३६०-७३ के लगभग आर्य स्कन्दिलके अध्यक्षतामे मथुरामे जैन आगमके दोसर वाचना होलै । एकरोसे मथुराके महत्त्वके पता चल है । ई कालके प्रमुख जैन आचार्यमे उमास्वाति, [[सिद्धसेन]]के नाम विशेष उल्लेखनीय है जे अपन अलौकिक प्रतिभाके बलसे जैन साहित्यके पुष्पित आउ पल्लवित कैलन । जैनधर्मके कीर्ति पताका चारो दिशामे फैलल हलै । [[गुप्त राजवंश|गुप्त]] राजाके काल भारतवर्षके सुवर्णकाल कहल जा है । ई समय जैनधर्म उत्तरोत्तर उन्नत दशाके प्राप्त होवित गेलै । [[गुजरात]]मे [[गिरनार]] आउ [[पालीताना|शत्रुञ्जय]] जैनके परम तीर्थ मानल गेलै हे । ईसवीके ७मा शताब्दीमे देवर्धिगणि क्षमाश्रमणके अधिपतित्वमे वल्लभीमे जैन आगमके अन्तिम वाचना स्वीकार करके ओकरा लिपिबद्ध कर देल गेलै । आगे चलके [[चावडा राजवंश|चावड़ा]] वंशके राजा वनराज राजगद्दी पर आसीन होवेके पूर्व (७२०-७८०) जैन मुनि शीलगुणसूरिके उपदेशसे प्रभावित होके गुजरातके प्रसिद्ध अणहिल्लपुर पाटण नामके नगर बसौलन । आचार्य [[आचार्य हरिभद्र|हरिभद्र]] नियन प्रकाण्ड विद्वानके ई समय जनम होलै जे न्यायसिद्धान्त आदि विषय पर ग्रन्थ लिखके जैनधर्मके समुन्नत कैलन । फिर [[चालुक्य राजवंश|चालुक्य वंश]]के स्थापक राजा मूलराज (९६१-९९६) जैन मन्दिरके निर्माण करवौलन । अणहिल्लपुर पाटणके राजा सिद्धराज जयसिंह कलिकाल सर्वज्ञ [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] (जनम १०८८ ई) के समकालीन हलन । सिद्धराज जयसिंहके मृत्यु हो जाए पर उनकर भतीजा [[कुमारपाल]] गुजरातके गद्दी पर बैठलन । कुमारपाल हेमचन्दके राजगुरु नियन मान हलन । ई समय आदर्श जैन राज्य स्थापित करेके प्रयत्न कैल गेलै जेकर फलस्वरूप अनेक सुन्दर जैन मन्दिरके निर्माण होलै । प्राणि हिंसा, शिकार, मांस-भक्षण आदिके रोकेके घोषणा कैल गेलै आउ यज्ञके अवसर पर पशुहिंसाके बदले ब्राह्मणके अनाज होम करेके आदेश देल गेलै । एही समय वस्तुपाल आउ तेजपाल मन्त्री [[गिरनार]], शत्रुञ्जय तथा [[माउण्ट आबू|आबू]] पर्वत पर कलापूर्ण भव्य मन्दिरके निर्माण कैलन । दक्षिणो भारतमे जैनधर्मके प्रसार होलै । विशेषकर श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैनके ओहाँ प्रवेश होलै । ईसा वर्षके प्रारम्भिक शताब्दिएसे [[तमिल् साहित्य]] पर जैनधर्मके प्रभाव दृष्टिगोचर होव है । [[चोल राजवंश|चोल]] आउ [[चेर]] ई धर्मके अनुयायी बनलन । [[महाराष्ट्र]], [[कर्नाटक]], [[मद्रास राज्य]]के उत्तरी भाग, [[कुर्ग]], [[आन्ध्र]] आउ [[मैसूर राज्य]]मे अनेक जैन धर्मानुयायी लोग बस हलथिन । ई सब पता ई सब स्थानके जीर्णशीर्ण देवालय आउ शिलालेखसे लग है । == एकरो देखथिन == * [[भारतमे जैनधर्म]] * [[जैनधर्म]] * [[गणधर]] * [[तीर्थङ्कर|जैनधर्मके तीर्थङ्कर]] * [[जैन त्योहार]] * [[विहरमान तीर्थङ्कर]] * [[शलाकापुरुष]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:जैनधर्मके इतिहास]] [[Category:जैनधर्म]] dfzcufpu1samyium733k51yu8ilhf0i 64398 64397 2026-08-08T07:14:03Z Pataliputra01 5 64398 wikitext text/x-wiki [[सञ्चिका:Udayagiri Caves - Rani Gumpha 01.jpg|thumb|300px|उदयगिरिके रानी गुम्फा (मूल जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय)]] [[जैनधर्म]] भारत श्रमण परम्परासे निकलल प्राचीन [[धर्म]] आउ [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] है । जैन अर्थात् कर्मके नाश करेवाला 'जिन भगवान्' के अनुयायी । [[सिन्धु घाटी सभ्यता|सिन्धु घाटी]]से भेटल जैन अवशेष जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्मके दर्जा दे है ।<ref name="जैन धर्म की प्राचीनता"> http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html  {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150704210130/http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html |date=4 जुलाई 2015 }}</ref> [[शिखरजी|सम्मेत्त शिखर]], [[राजगीर]], [[पावापुरी]], [[गिरनार]], [[शत्रुञ्जय]] [[पावागढ़]] आदि जैनके प्रसिद्ध [[तीर्थ]] है । [[पर्यूषण पर्व|पर्यूषण]] पर्व आउ महावीर स्वामी जन्म कल्याणक इनकर मुख्य त्यौहार है । [[अहमदाबाद]], [[महाराष्ट्र]], [[उत्तरप्रदेश]], [[बङ्गाल]], [[राजस्थान]] आदिके अनेक जैन आजकल भारतके अग्रगण्य उद्योगपति आउ व्यापारीमे गिनल जा हथिन । जैन ग्रन्थके अनुसार [[धर्म]] वस्तुके स्वाभाव समझाव है । एहीसे जहियासे [[सृष्टि]] है तहियासे धर्म है, आउ जहिया तक सृष्टि है तहिया तक धर्म रहतै, अर्थात् जैनधर्म सदासे अस्तित्वमे हलै आउ सदा रहतै ।<ref name="Glasenapp 1999. P.15">Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.15 "Jainas consider that religion is eternal and imperishable. It is without beginning and it will never cease to exist. The darkness of error enveloping the truth in certain, periodically occurring aeons clears up again and again so that the brightness of the Jaina-faith can sparkle again anew."</ref><ref name="Dundas, Paul 2002. P.12">Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.12 "Jainism is believed by its followers to be everlasting, without beginning or end..."</ref><ref>Varni, Jinendra; Ed. Prof. Sagarmal Jain, Translated Justice T.K. Tukol and Dr. Narendra Bhandari. ''{{IAST|Samaṇ Suttaṁ}}.'' New Delhi: Bhagwan Mahavir memorial Samiti. “The Historians have so far fully recognized the truth that Tirthankara Mahavira was not the founder of the religion. He was preceded by many tirthankaras. He merely reiterated and rejuvenated that religion. It is correct that history has not been able to trace the origin of the Jaina religion; but historical evidence now available and the result of dispassionate researches in literature have established that Jainism is undoubtedly an ancient religion.” Pp. xii&nbsp;– xiii of introduction by Justice T.K.Tutkol and Dr. K.K. Dixit.</ref><ref>Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.24. "Thus not only nothing, from the philosophical and the historical point of view, comes in the way of the supposition that Jainism was established by Parsva around 800 BC, but it is rather confirmed in everything that we know of the spiritual life of that period."</ref><ref>Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.17. "Jainism, then, was in origin merely one component of a north Indian ascetic culture that flourished in the Ganges basin from around the eighth or seventh centuries BC."</ref> इतिहासकार सब द्वारा जैनधर्मके मूलो [[सिन्धु घाटी सभ्यता]]से जोड़ल जा है जे [[हिन्द आर्य प्रवास]]से पूर्वके देशी आध्यात्मिकताके दर्शाव है । सिन्धु घाटीसे भेटल जैन शिलालेखो जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्म होवेके पुष्टि कर है । <ref>Larson, Gerald James (1995) ''India’s Agony over religion '' SUNY Press ISBN 0-7914-2412-X. “There is some evidence that Jain traditions may be even older than the Buddhist traditions, possibly going back to the time of the Indus valley civilization, and that Vardhamana rather than being a “founder” per se was, rather, simply a primary spokesman for much older tradition. Page 27”</ref><ref>Joel Diederik Beversluis (2000) In: ''Sourcebook of the World's Religions: An Interfaith Guide to Religion and Spirituality'', New World Library : Novato, CA ISBN 1-57731-121-3 Originating on the Indian sub-continent, Jainism is one of the oldest religion of its homeland and indeed the world, having pre-historic origins before 3000 BC and the propagation of Indo-Aryan culture.... p. 81</ref><ref>Jainism by Mrs. N.R. Guseva p.44</ref> अन्य शोधार्थीके अनुसार [[श्रमण परम्परा|श्रमण]] परम्परा [[वैदिक धर्म|ऐतिहासिक वैदिक धर्म]]के हिन्द-आर्य प्रथाके साथ समकालीन आउ पृथक होलै ।<ref>{{cite book | title=Jainism: An Introduction | publisher=I.B. Tauris | author=Long, Jeffrey D. | year=2009 | location=New York | pages=45–56 | isbn=978-1-84511-626-2}}</ref> जैन ग्रन्थ ([[आगम (जैन)|आगम]]) के अनुसार वर्तमानमे प्रचलित जैनधर्म [[ऋषभदेव|आदिनाथ]]के समयसे प्रचलनमे ऐलै । एहैँसे जे [[तीर्थङ्कर]] परम्परा प्रारम्भ होलै ऊ [[महावीर]] वा वर्धमान तक चलित रहलै जे ईसासे ५२७ वर्ष पूर्व [[निर्वाण]] प्राप्त कैलन हल । महावीरके समयसे पीछे कुछ लोग विशेषकरके यूरोपीय विद्वान् जैनधर्मके प्रचलित होएल मान हथिन । जैनधर्म [[बौद्धधर्म]]से पुराना है । एकर बौद्धधर्मसे कोनो नाता न है । ==ऐतिहासिक रूपरेखा== जैन मान्यताके अनुसार जैनधर्म अनादि कालसे चलल ऐलै हे आउ अनन्त काल तक चलित रहतै । ई धर्मके प्रचार करेला समय-समय पर अनेक तीर्थङ्करके आविर्भाव होवित रह है । जैनधर्मके २४ तीर्थङ्करमे [[ऋषभदेव|ऋषभ]] प्रथम आउ [[महावीर]] अन्तिम तीर्थङ्कर हथिन । महावीरके ११ [[गणधर]] (मुख्य शिष्य) हलथिन - [[इन्द्रभूति गौतम]], [[अग्निभूति गौतम]] ,[[वायुभूति गौतम]], [[व्यक्तस्वामी]], [[सुधर्मास्वामी]] , [[मण्डितपुत्र]], [[मौर्यपुत्र]], [[अकम्पित गौतम]], [[अचलभ्राता]], [[मेतार्यस्वामी]] आउ [[प्रभासस्वामी]] । महावीर स्वयं क्षत्रिय कुलमे उत्पन्न होइथिन किन्तु उनकफ सब गणधर [[ब्राह्मण]] हलथिन । एकरामे गौतम इन्द्रभूति आउ सुधर्माके छोड़के नौ गणधर महावीरके जीवनकालेमे देह त्याग कैलथिन । जौन रात्रिके महावीर [[निर्वाण]] पौलथिन ओही रात्रिके [[इन्द्रभूति गौतम|गौतम इन्द्रभूति]]के केवलज्ञानके प्राप्ति होलै । महावीर-निर्वाणके पश्चात् [[सुधर्मास्वामी|सुधर्मा]] २० वर्ष तक जैन सङ्घके अधिपति रहलथिन । बादमे सङ्घके भार जम्बूस्वामीके सुपुर्द कर देल गेलै आउ ई प्रकार जैन परम्परा आगे बढ़ित रहलै । जम्बूस्वामीके पश्चात् [[केवलज्ञान]] आउ निर्वाण-गमनके द्वार बन्द हो गेलै । [[पार्श्वनाथ]]के मान्यताके अनुसरण करके [[लिच्छवि]] कुलोत्पन्न महावीर चतुर्विध सङ्घके दृढ़ बनावेला गणतन्त्रवादी आदर्श पर सङ्घके नियमके सङ्घटित कैलथिन । निर्ग्रन्थ धर्मके प्रचार करेला ज्ञातपुत्र महावीर [[बिहार]]मे [[राजगृह]], चम्पा ([[भागलपुर]]), मछिया ([[मुङ्गेर]]), [[वैशाली]] (बसाढ़) आउ [[मिथिला]] (जनकपुर) आदि तथा [[उत्तरप्रदेश]]मे [[वाराणसी|बनारस]], [[कौशाम्बी जिला|कौशाम्बी]] (कोसम) [[अयोध्या]], [[श्रावस्ती]] (सहेट-महेट) आउ स्थूणा ([[स्थानेश्वर]]) आदि स्थानमे विहार कैलथिन । ऊ समय एही आर्य क्षेत्र कहला हलै, शेष क्षेत्र अनार्य हलै । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[बिम्बिसार]] (श्रेणिक) आउ [[अजातशत्रु]] (कूणिक) के जैनधर्मके अनुयायी कहल गेलै हे । राजसिंह श्रेणिक द्वारा महावीरसे प्रश्न पूछल जाएके उल्लेख जैन शास्त्रमे आव है । चम्पानगरीमे महावीरके समवसृत होवे पर अजातशत्रुके अपन दलबल सहित उनकर दर्शनार्थ गमन करेके वर्णन प्राचीन आगममे मिल है । [[नन्द वंश|नन्द राजा]] घड़ी [[भद्रबाहु]] आउ स्थूलभद्र बड़ प्रतिभाशाली जैन आचार्य होइथिन जे जैनधर्मके समुन्नत बनैलथिन । आचार्य महागिरि स्थूलभद्रके प्रधान शिष्यमे से हलथिन । [[पाटलिपुत्र]] नगरे जैन आगमके प्रथम वाचना होलै जे 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नामसे कहल जा है । [[चन्द्रगुप्त]]के बाद [[अशोक]] (२७२-२३२ ईपू) के पौत्र राजा सम्प्रति (२२०-२११ ईपू) के नाम जैन ग्रन्थमे बड़ी आदरसे लेल जा है । आचार्य महागिरिके शिष्य सुहस्ति सम्प्रतिके जैनधर्ममे दीक्षित कैलथिन । सम्प्रति [[महाराष्ट्र]], [[आन्ध्र]], [[द्रविड़]], [[कुर्ग]] आदि प्रदेशमे अपन सुभटके भेजके जैन श्रमणसङ्घके विशेष प्रभावना कैलथिन । [[कलिङ्ग]]के सम्राट [[खारवेल]] जैनधर्मके परम अनुयायी हलन । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[नन्द वंश|नन्द]], जे जिन-प्रतिमा उठाके ले गेलन हल, ओकरा ऊ वापिस लैलन । [[कटक]] भिरु [[उदयगिरि आउ खण्डगिरि|उदयगिरि]]से प्राप्त शिलालेखसे पता चल है कि [[खारवेल]] ऋषभके प्रतिमा निर्माण करवैलन आउ जैन साधुके रहेला गुफा खोदवैलन । तत्पश्चात् ईसवीके पूर्व प्रथम शताब्दीमे [[उज्जैन|उज्जैनी]]के राजा [[विक्रमादित्य]]के पिता गर्दभिल्लसे उत्तेजित कैल जाए पर कालकाचार्यके [[ईरान]] जाके [[शक]] राजाके हिन्दुस्तानमे लावेके उल्लेख जैन ग्रन्थमे मिल है । कालकाचार्यके प्रतिष्ठान ([[पैठन]], महाराष्ट्र) के राजा सातवाहनके समकालीन बतावल गेलै हे । फिर आचार्य पादलिप्त, वज्रस्वामी आउ आर्यरक्षित सङ्घके अधिपतित्व कैलन । ई प्रकार जैनधर्मके उन्नति होवित गेलै आउ अखनि ऊ दूर दूर तक फैल गेलै । [[Image:Kankali Tila (Samvat 95).jpg|right|thumb|300px|[[मथुरा]]के [[कङ्काली टीला]] नामक पुरातात्विक स्थल पर चार तीर्थङ्करके मूर्ति]] [[मथुरा]]मे ईसवीके आरम्भके जे शिलालेख उपलब्ध होलै हे, ओकरासे पता लग है कि कोनो समय मथुरा जैनधर्मके बड़ केन्द्र हलै आउ व्यापारी एवं निम्नवर्गके लोग ई धर्मके अनुयायी हलन । एहाँके शिलालेखमे जे जैन आचार्यके गण, कुल आउ शाखाके उल्लेख है ऊ भद्रबाहुके [[कल्पसूत्र (जैन)|कल्पसूत्र]]के स्थाविरावलिमे जैसेके तैसे मिल है । ईसवी ३६०-७३ के लगभग आर्य स्कन्दिलके अध्यक्षतामे मथुरामे जैन आगमके दोसर वाचना होलै । एकरोसे मथुराके महत्त्वके पता चल है । ई कालके प्रमुख जैन आचार्यमे उमास्वाति, [[सिद्धसेन]]के नाम विशेष उल्लेखनीय है जे अपन अलौकिक प्रतिभाके बलसे जैन साहित्यके पुष्पित आउ पल्लवित कैलन । जैनधर्मके कीर्ति पताका चारो दिशामे फैलल हलै । [[गुप्त राजवंश|गुप्त]] राजाके काल भारतवर्षके सुवर्णकाल कहल जा है । ई समय जैनधर्म उत्तरोत्तर उन्नत दशाके प्राप्त होवित गेलै । [[गुजरात]]मे [[गिरनार]] आउ [[पालीताना|शत्रुञ्जय]] जैनके परम तीर्थ मानल गेलै हे । ईसवीके ७मा शताब्दीमे देवर्धिगणि क्षमाश्रमणके अधिपतित्वमे वल्लभीमे जैन आगमके अन्तिम वाचना स्वीकार करके ओकरा लिपिबद्ध कर देल गेलै । आगे चलके [[चावडा राजवंश|चावड़ा]] वंशके राजा वनराज राजगद्दी पर आसीन होवेके पूर्व (७२०-७८०) जैन मुनि शीलगुणसूरिके उपदेशसे प्रभावित होके गुजरातके प्रसिद्ध अणहिल्लपुर पाटण नामके नगर बसौलन । आचार्य [[आचार्य हरिभद्र|हरिभद्र]] नियन प्रकाण्ड विद्वानके ई समय जनम होलै जे न्यायसिद्धान्त आदि विषय पर ग्रन्थ लिखके जैनधर्मके समुन्नत कैलन । फिर [[चालुक्य राजवंश|चालुक्य वंश]]के स्थापक राजा मूलराज (९६१-९९६) जैन मन्दिरके निर्माण करवौलन । अणहिल्लपुर पाटणके राजा सिद्धराज जयसिंह कलिकाल सर्वज्ञ [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] (जनम १०८८ ई) के समकालीन हलन । सिद्धराज जयसिंहके मृत्यु हो जाए पर उनकर भतीजा [[कुमारपाल]] गुजरातके गद्दी पर बैठलन । कुमारपाल हेमचन्दके राजगुरु नियन मान हलन । ई समय आदर्श जैन राज्य स्थापित करेके प्रयत्न कैल गेलै जेकर फलस्वरूप अनेक सुन्दर जैन मन्दिरके निर्माण होलै । प्राणि हिंसा, शिकार, मांस-भक्षण आदिके रोकेके घोषणा कैल गेलै आउ यज्ञके अवसर पर पशुहिंसाके बदले ब्राह्मणके अनाज होम करेके आदेश देल गेलै । एही समय वस्तुपाल आउ तेजपाल मन्त्री [[गिरनार]], शत्रुञ्जय तथा [[माउण्ट आबू|आबू]] पर्वत पर कलापूर्ण भव्य मन्दिरके निर्माण कैलन । दक्षिणो भारतमे जैनधर्मके प्रसार होलै । विशेषकर श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैनके ओहाँ प्रवेश होलै । ईसा वर्षके प्रारम्भिक शताब्दिएसे [[तमिल् साहित्य]] पर जैनधर्मके प्रभाव दृष्टिगोचर होव है । [[चोल राजवंश|चोल]] आउ [[चेर]] ई धर्मके अनुयायी बनलन । [[महाराष्ट्र]], [[कर्नाटक]], [[मद्रास राज्य]]के उत्तरी भाग, [[कुर्ग]], [[आन्ध्र]] आउ [[मैसूर राज्य]]मे अनेक जैन धर्मानुयायी लोग बस हलथिन । ई सब पता ई सब स्थानके जीर्णशीर्ण देवालय आउ शिलालेखसे लग है । कर्नाटक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक सम्प्रदायके मुख्य धाम हलै । [[गङ्ग वंश|गङ्ग]] आउ [[राष्ट्रकूट राजवंश]]के आश्रयसे जैनधर्म उन्नत होलै । राष्ट्रकूट वंशके राजामे [[अमोघवर्ष नृपतुङ्ग|अमोघवर्ष प्रथम]] (८१५-८७७ ई) जैन धर्मअनुयायी हलन । अमोघवर्ष जैनधर्मके प्रमुखतासे संरक्षण देलन । [[कदम्ब राजवंश|कदम्बवंशियो]] अधिकतर जैनेधर्मके अनुयायी रहलन । == एकरो देखथिन == * [[भारतमे जैनधर्म]] * [[जैनधर्म]] * [[गणधर]] * [[तीर्थङ्कर|जैनधर्मके तीर्थङ्कर]] * [[जैन त्योहार]] * [[विहरमान तीर्थङ्कर]] * [[शलाकापुरुष]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:जैनधर्मके इतिहास]] [[Category:जैनधर्म]] f21fom936gq7kzx8n49pi5e16738he2 64399 64398 2026-08-08T07:16:22Z Pataliputra01 5 64399 wikitext text/x-wiki [[सञ्चिका:Udayagiri Caves - Rani Gumpha 01.jpg|thumb|300px|उदयगिरिके रानी गुम्फा (मूल जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय)]] [[जैनधर्म]] भारत श्रमण परम्परासे निकलल प्राचीन [[धर्म]] आउ [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] है । जैन अर्थात् कर्मके नाश करेवाला 'जिन भगवान्' के अनुयायी । [[सिन्धु घाटी सभ्यता|सिन्धु घाटी]]से भेटल जैन अवशेष जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्मके दर्जा दे है ।<ref name="जैन धर्म की प्राचीनता"> http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html  {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150704210130/http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html |date=4 जुलाई 2015 }}</ref> [[शिखरजी|सम्मेत्त शिखर]], [[राजगीर]], [[पावापुरी]], [[गिरनार]], [[शत्रुञ्जय]] [[पावागढ़]] आदि जैनके प्रसिद्ध [[तीर्थ]] है । [[पर्यूषण पर्व|पर्यूषण]] पर्व आउ महावीर स्वामी जन्म कल्याणक इनकर मुख्य त्यौहार है । [[अहमदाबाद]], [[महाराष्ट्र]], [[उत्तरप्रदेश]], [[बङ्गाल]], [[राजस्थान]] आदिके अनेक जैन आजकल भारतके अग्रगण्य उद्योगपति आउ व्यापारीमे गिनल जा हथिन । जैन ग्रन्थके अनुसार [[धर्म]] वस्तुके स्वाभाव समझाव है । एहीसे जहियासे [[सृष्टि]] है तहियासे धर्म है, आउ जहिया तक सृष्टि है तहिया तक धर्म रहतै, अर्थात् जैनधर्म सदासे अस्तित्वमे हलै आउ सदा रहतै ।<ref name="Glasenapp 1999. P.15">Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.15 "Jainas consider that religion is eternal and imperishable. It is without beginning and it will never cease to exist. The darkness of error enveloping the truth in certain, periodically occurring aeons clears up again and again so that the brightness of the Jaina-faith can sparkle again anew."</ref><ref name="Dundas, Paul 2002. P.12">Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.12 "Jainism is believed by its followers to be everlasting, without beginning or end..."</ref><ref>Varni, Jinendra; Ed. Prof. Sagarmal Jain, Translated Justice T.K. Tukol and Dr. Narendra Bhandari. ''{{IAST|Samaṇ Suttaṁ}}.'' New Delhi: Bhagwan Mahavir memorial Samiti. “The Historians have so far fully recognized the truth that Tirthankara Mahavira was not the founder of the religion. He was preceded by many tirthankaras. He merely reiterated and rejuvenated that religion. It is correct that history has not been able to trace the origin of the Jaina religion; but historical evidence now available and the result of dispassionate researches in literature have established that Jainism is undoubtedly an ancient religion.” Pp. xii&nbsp;– xiii of introduction by Justice T.K.Tutkol and Dr. K.K. Dixit.</ref><ref>Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri. 1999. Jainism: an Indian religion of salvation. P.24. "Thus not only nothing, from the philosophical and the historical point of view, comes in the way of the supposition that Jainism was established by Parsva around 800 BC, but it is rather confirmed in everything that we know of the spiritual life of that period."</ref><ref>Dundas, Paul. 2002. The Jains. P.17. "Jainism, then, was in origin merely one component of a north Indian ascetic culture that flourished in the Ganges basin from around the eighth or seventh centuries BC."</ref> इतिहासकार सब द्वारा जैनधर्मके मूलो [[सिन्धु घाटी सभ्यता]]से जोड़ल जा है जे [[हिन्द आर्य प्रवास]]से पूर्वके देशी आध्यात्मिकताके दर्शाव है । सिन्धु घाटीसे भेटल जैन शिलालेखो जैनधर्मके सबसे प्राचीन धर्म होवेके पुष्टि कर है । <ref>Larson, Gerald James (1995) ''India’s Agony over religion '' SUNY Press ISBN 0-7914-2412-X. “There is some evidence that Jain traditions may be even older than the Buddhist traditions, possibly going back to the time of the Indus valley civilization, and that Vardhamana rather than being a “founder” per se was, rather, simply a primary spokesman for much older tradition. Page 27”</ref><ref>Joel Diederik Beversluis (2000) In: ''Sourcebook of the World's Religions: An Interfaith Guide to Religion and Spirituality'', New World Library : Novato, CA ISBN 1-57731-121-3 Originating on the Indian sub-continent, Jainism is one of the oldest religion of its homeland and indeed the world, having pre-historic origins before 3000 BC and the propagation of Indo-Aryan culture.... p. 81</ref><ref>Jainism by Mrs. N.R. Guseva p.44</ref> अन्य शोधार्थीके अनुसार [[श्रमण परम्परा|श्रमण]] परम्परा [[वैदिक धर्म|ऐतिहासिक वैदिक धर्म]]के हिन्द-आर्य प्रथाके साथ समकालीन आउ पृथक होलै ।<ref>{{cite book | title=Jainism: An Introduction | publisher=I.B. Tauris | author=Long, Jeffrey D. | year=2009 | location=New York | pages=45–56 | isbn=978-1-84511-626-2}}</ref> जैन ग्रन्थ ([[आगम (जैन)|आगम]]) के अनुसार वर्तमानमे प्रचलित जैनधर्म [[ऋषभदेव|आदिनाथ]]के समयसे प्रचलनमे ऐलै । एहैँसे जे [[तीर्थङ्कर]] परम्परा प्रारम्भ होलै ऊ [[महावीर]] वा वर्धमान तक चलित रहलै जे ईसासे ५२७ वर्ष पूर्व [[निर्वाण]] प्राप्त कैलन हल । महावीरके समयसे पीछे कुछ लोग विशेषकरके यूरोपीय विद्वान् जैनधर्मके प्रचलित होएल मान हथिन । जैनधर्म [[बौद्धधर्म]]से पुराना है । एकर बौद्धधर्मसे कोनो नाता न है । ==ऐतिहासिक रूपरेखा== जैन मान्यताके अनुसार जैनधर्म अनादि कालसे चलल ऐलै हे आउ अनन्त काल तक चलित रहतै । ई धर्मके प्रचार करेला समय-समय पर अनेक तीर्थङ्करके आविर्भाव होवित रह है । जैनधर्मके २४ तीर्थङ्करमे [[ऋषभदेव|ऋषभ]] प्रथम आउ [[महावीर]] अन्तिम तीर्थङ्कर हथिन । महावीरके ११ [[गणधर]] (मुख्य शिष्य) हलथिन - [[इन्द्रभूति गौतम]], [[अग्निभूति गौतम]] ,[[वायुभूति गौतम]], [[व्यक्तस्वामी]], [[सुधर्मास्वामी]] , [[मण्डितपुत्र]], [[मौर्यपुत्र]], [[अकम्पित गौतम]], [[अचलभ्राता]], [[मेतार्यस्वामी]] आउ [[प्रभासस्वामी]] । महावीर स्वयं क्षत्रिय कुलमे उत्पन्न होइथिन किन्तु उनकफ सब गणधर [[ब्राह्मण]] हलथिन । एकरामे गौतम इन्द्रभूति आउ सुधर्माके छोड़के नौ गणधर महावीरके जीवनकालेमे देह त्याग कैलथिन । जौन रात्रिके महावीर [[निर्वाण]] पौलथिन ओही रात्रिके [[इन्द्रभूति गौतम|गौतम इन्द्रभूति]]के केवलज्ञानके प्राप्ति होलै । महावीर-निर्वाणके पश्चात् [[सुधर्मास्वामी|सुधर्मा]] २० वर्ष तक जैन सङ्घके अधिपति रहलथिन । बादमे सङ्घके भार जम्बूस्वामीके सुपुर्द कर देल गेलै आउ ई प्रकार जैन परम्परा आगे बढ़ित रहलै । जम्बूस्वामीके पश्चात् [[केवलज्ञान]] आउ निर्वाण-गमनके द्वार बन्द हो गेलै । [[पार्श्वनाथ]]के मान्यताके अनुसरण करके [[लिच्छवि]] कुलोत्पन्न महावीर चतुर्विध सङ्घके दृढ़ बनावेला गणतन्त्रवादी आदर्श पर सङ्घके नियमके सङ्घटित कैलथिन । निर्ग्रन्थ धर्मके प्रचार करेला ज्ञातपुत्र महावीर [[बिहार]]मे [[राजगृह]], चम्पा ([[भागलपुर]]), मछिया ([[मुङ्गेर]]), [[वैशाली]] (बसाढ़) आउ [[मिथिला]] (जनकपुर) आदि तथा [[उत्तरप्रदेश]]मे [[वाराणसी|बनारस]], [[कौशाम्बी जिला|कौशाम्बी]] (कोसम) [[अयोध्या]], [[श्रावस्ती]] (सहेट-महेट) आउ स्थूणा ([[स्थानेश्वर]]) आदि स्थानमे विहार कैलथिन । ऊ समय एही आर्य क्षेत्र कहला हलै, शेष क्षेत्र अनार्य हलै । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[बिम्बिसार]] (श्रेणिक) आउ [[अजातशत्रु]] (कूणिक) के जैनधर्मके अनुयायी कहल गेलै हे । राजसिंह श्रेणिक द्वारा महावीरसे प्रश्न पूछल जाएके उल्लेख जैन शास्त्रमे आव है । चम्पानगरीमे महावीरके समवसृत होवे पर अजातशत्रुके अपन दलबल सहित उनकर दर्शनार्थ गमन करेके वर्णन प्राचीन आगममे मिल है । [[नन्द वंश|नन्द राजा]] घड़ी [[भद्रबाहु]] आउ स्थूलभद्र बड़ प्रतिभाशाली जैन आचार्य होइथिन जे जैनधर्मके समुन्नत बनैलथिन । आचार्य महागिरि स्थूलभद्रके प्रधान शिष्यमे से हलथिन । [[पाटलिपुत्र]] नगरे जैन आगमके प्रथम वाचना होलै जे 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नामसे कहल जा है । [[चन्द्रगुप्त]]के बाद [[अशोक]] (२७२-२३२ ईपू) के पौत्र राजा सम्प्रति (२२०-२११ ईपू) के नाम जैन ग्रन्थमे बड़ी आदरसे लेल जा है । आचार्य महागिरिके शिष्य सुहस्ति सम्प्रतिके जैनधर्ममे दीक्षित कैलथिन । सम्प्रति [[महाराष्ट्र]], [[आन्ध्र]], [[द्रविड़]], [[कुर्ग]] आदि प्रदेशमे अपन सुभटके भेजके जैन श्रमणसङ्घके विशेष प्रभावना कैलथिन । [[कलिङ्ग]]के सम्राट [[खारवेल]] जैनधर्मके परम अनुयायी हलन । [[मगध महाजनपद|मगध]]के राजा [[नन्द वंश|नन्द]], जे जिन-प्रतिमा उठाके ले गेलन हल, ओकरा ऊ वापिस लैलन । [[कटक]] भिरु [[उदयगिरि आउ खण्डगिरि|उदयगिरि]]से प्राप्त शिलालेखसे पता चल है कि [[खारवेल]] ऋषभके प्रतिमा निर्माण करवैलन आउ जैन साधुके रहेला गुफा खोदवैलन । तत्पश्चात् ईसवीके पूर्व प्रथम शताब्दीमे [[उज्जैन|उज्जैनी]]के राजा [[विक्रमादित्य]]के पिता गर्दभिल्लसे उत्तेजित कैल जाए पर कालकाचार्यके [[ईरान]] जाके [[शक]] राजाके हिन्दुस्तानमे लावेके उल्लेख जैन ग्रन्थमे मिल है । कालकाचार्यके प्रतिष्ठान ([[पैठन]], महाराष्ट्र) के राजा सातवाहनके समकालीन बतावल गेलै हे । फिर आचार्य पादलिप्त, वज्रस्वामी आउ आर्यरक्षित सङ्घके अधिपतित्व कैलन । ई प्रकार जैनधर्मके उन्नति होवित गेलै आउ अखनि ऊ दूर दूर तक फैल गेलै । [[Image:Kankali Tila (Samvat 95).jpg|right|thumb|300px|[[मथुरा]]के [[कङ्काली टीला]] नामक पुरातात्विक स्थल पर चार तीर्थङ्करके मूर्ति]] [[मथुरा]]मे ईसवीके आरम्भके जे शिलालेख उपलब्ध होलै हे, ओकरासे पता लग है कि कोनो समय मथुरा जैनधर्मके बड़ केन्द्र हलै आउ व्यापारी एवं निम्नवर्गके लोग ई धर्मके अनुयायी हलन । एहाँके शिलालेखमे जे जैन आचार्यके गण, कुल आउ शाखाके उल्लेख है ऊ भद्रबाहुके [[कल्पसूत्र (जैन)|कल्पसूत्र]]के स्थाविरावलिमे जैसेके तैसे मिल है । ईसवी ३६०-७३ के लगभग आर्य स्कन्दिलके अध्यक्षतामे मथुरामे जैन आगमके दोसर वाचना होलै । एकरोसे मथुराके महत्त्वके पता चल है । ई कालके प्रमुख जैन आचार्यमे उमास्वाति, [[सिद्धसेन]]के नाम विशेष उल्लेखनीय है जे अपन अलौकिक प्रतिभाके बलसे जैन साहित्यके पुष्पित आउ पल्लवित कैलन । जैनधर्मके कीर्ति पताका चारो दिशामे फैलल हलै । [[गुप्त राजवंश|गुप्त]] राजाके काल भारतवर्षके सुवर्णकाल कहल जा है । ई समय जैनधर्म उत्तरोत्तर उन्नत दशाके प्राप्त होवित गेलै । [[गुजरात]]मे [[गिरनार]] आउ [[पालीताना|शत्रुञ्जय]] जैनके परम तीर्थ मानल गेलै हे । ईसवीके ७मा शताब्दीमे देवर्धिगणि क्षमाश्रमणके अधिपतित्वमे वल्लभीमे जैन आगमके अन्तिम वाचना स्वीकार करके ओकरा लिपिबद्ध कर देल गेलै । आगे चलके [[चावडा राजवंश|चावड़ा]] वंशके राजा वनराज राजगद्दी पर आसीन होवेके पूर्व (७२०-७८०) जैन मुनि शीलगुणसूरिके उपदेशसे प्रभावित होके गुजरातके प्रसिद्ध अणहिल्लपुर पाटण नामके नगर बसौलन । आचार्य [[आचार्य हरिभद्र|हरिभद्र]] नियन प्रकाण्ड विद्वानके ई समय जनम होलै जे न्यायसिद्धान्त आदि विषय पर ग्रन्थ लिखके जैनधर्मके समुन्नत कैलन । फिर [[चालुक्य राजवंश|चालुक्य वंश]]के स्थापक राजा मूलराज (९६१-९९६) जैन मन्दिरके निर्माण करवौलन । अणहिल्लपुर पाटणके राजा सिद्धराज जयसिंह कलिकाल सर्वज्ञ [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] (जनम १०८८ ई) के समकालीन हलन । सिद्धराज जयसिंहके मृत्यु हो जाए पर उनकर भतीजा [[कुमारपाल]] गुजरातके गद्दी पर बैठलन । कुमारपाल हेमचन्दके राजगुरु नियन मान हलन । ई समय आदर्श जैन राज्य स्थापित करेके प्रयत्न कैल गेलै जेकर फलस्वरूप अनेक सुन्दर जैन मन्दिरके निर्माण होलै । प्राणि हिंसा, शिकार, मांस-भक्षण आदिके रोकेके घोषणा कैल गेलै आउ यज्ञके अवसर पर पशुहिंसाके बदले ब्राह्मणके अनाज होम करेके आदेश देल गेलै । एही समय वस्तुपाल आउ तेजपाल मन्त्री [[गिरनार]], शत्रुञ्जय तथा [[माउण्ट आबू|आबू]] पर्वत पर कलापूर्ण भव्य मन्दिरके निर्माण कैलन । दक्षिणो भारतमे जैनधर्मके प्रसार होलै । विशेषकर श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैनके ओहाँ प्रवेश होलै । ईसा वर्षके प्रारम्भिक शताब्दिएसे [[तमिल् साहित्य]] पर जैनधर्मके प्रभाव दृष्टिगोचर होव है । [[चोल राजवंश|चोल]] आउ [[चेर]] ई धर्मके अनुयायी बनलन । [[महाराष्ट्र]], [[कर्नाटक]], [[मद्रास राज्य]]के उत्तरी भाग, [[कुर्ग]], [[आन्ध्र]] आउ [[मैसूर राज्य]]मे अनेक जैन धर्मानुयायी लोग बस हलथिन । ई सब पता ई सब स्थानके जीर्णशीर्ण देवालय आउ शिलालेखसे लग है । कर्नाटक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक सम्प्रदायके मुख्य धाम हलै । [[गङ्ग वंश|गङ्ग]] आउ [[राष्ट्रकूट राजवंश]]के आश्रयसे जैनधर्म उन्नत होलै । राष्ट्रकूट वंशके राजामे [[अमोघवर्ष नृपतुङ्ग|अमोघवर्ष प्रथम]] (८१५-८७७ ई) जैन धर्मअनुयायी हलन । अमोघवर्ष जैनधर्मके प्रमुखतासे संरक्षण देलन । [[कदम्ब राजवंश|कदम्बवंशियो]] अधिकतर जैनेधर्मके अनुयायी रहलन । मुसलमानके राज्यमे अनेक बादशाह जैन मुनीके सम्मानित करके उच्च पद पर बैठौलन । सुलतान [[फिरोजशाह तुगलक]] (१३५१-१३८८) रत्नशेखरसूरि के, [[तुगलक राजवंश|तुगलक]] सुल्तान मुहम्मद शाह [[जिरप्रभसूरि]]के आउ सम्राट [[अकबर]] (१५५६-१९०५) [[हरिविजय|हरिविजयसूरि]]के सम्मानित कैलन । एही प्रकार [[औरङ्गजेब]] (१६५९-१७०७) अपन दरबारके जवेरी शान्तिदास जैनके शत्रुञ्जय पर्वत आउ ओकर दु लाखके आमदनी तथा [[अहमद शाह बहादुर]] (१७४८-१७४५) जगत्सेठ महताबरायके पारसनाथ पर्वत देके पुरस्कृत कैलन । == एकरो देखथिन == * [[भारतमे जैनधर्म]] * [[जैनधर्म]] * [[गणधर]] * [[तीर्थङ्कर|जैनधर्मके तीर्थङ्कर]] * [[जैन त्योहार]] * [[विहरमान तीर्थङ्कर]] * [[शलाकापुरुष]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:जैनधर्मके इतिहास]] [[Category:जैनधर्म]] csr4w9tzlxbo8pqeuiq39y4oe81w9ag