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श्रेणी:पशुपालन
14
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
इ पशुपालन से संबंधित श्रेणी हइ।
[[बर्ग:धंधा]]
[[बर्ग:प्राणी विज्ञान]]
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श्रेणी:शब्दार्थ
14
6180
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19308
2026-09-11T17:15:19Z
अनिरुद्ध कुमार
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पन्ना खाली कैल गेलै
79603
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text/x-wiki
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काण्ड
0
8563
79604
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अनिरुद्ध कुमार
172
79604
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text/x-wiki
'''काण्ड''' प्रायः कौनो अनुचित या बुरा कृत्यके संज्ञाके काम करऽ है । कौनौ प्राकृतिक अप्रिय घटनाके काण्ड न कहल जा है । इ शब्द के उत्पत्ति पहिले के महाकाव्य के अध्याय ला प्रयुक्त शब्द काण्ड से होले हे। काण्ड में कोई महान कहानी के कोई महत्वपूर्ण घटना के वरणन रह हलै। काण्ड के अर्थ संकुचत हो गेलै। अब इ कोई बड़ी कहानी के घटना के बदले मगही क्षेत्र में कोई बड़ा लेकिन खराब काम के लिए प्रयुक्त होवे लगलै।
6njvym04ardortmegznhnfo4myedg5a
79605
79604
2026-09-11T17:21:08Z
अनिरुद्ध कुमार
172
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text/x-wiki
'''काण्ड''' प्रायः कौनो अनुचित या बुरा कृत्यके संज्ञाके काम करऽ है । कौनौ प्राकृतिक अप्रिय घटनाके काण्ड न कहल जा है । इ शब्द के उत्पत्ति पहिले के महाकाव्य के अध्याय ला प्रयुक्त शब्द काण्ड से होले हे। काण्ड में कोई महान कहानी के कोई महत्वपूर्ण घटना के वरणन रह हलै। काण्ड के अर्थ संकुचत हो गेलै। अब इ कोई बड़ी कहानी के घटना के बदले मगही क्षेत्र में कोई बड़ा लेकिन खराब काम के लिए प्रयुक्त होवे लगलै।
[[श्रेणी:शब्द]]
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चर
0
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79625
68112
2026-09-12T02:18:08Z
AMAN KUMAR
377
कड़ी+
79625
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text/x-wiki
बीजगणितके विशेषताके अनुसार [[बीजगणित]]<nowiki/>मे राशिके जगह [[चिह्न]] अथवा [[अच्छर]]<nowiki/>के प्रयोग कैल जाहे जिनखर मूल्य पृथक स्थान पर पृथक होवहे , उनखा 'चर' कहल जाहे ।
उदाहरण -
y + 5 = 36 मे y एक चर हे आउ हियाँ y के मूल्य 31 होत । पुष्टिला कि का सचमे y के मूल्य 31 हे, अपने 5 के पक्षान्तर कर ली । (36-5=31)
जैसे: <br />
y + 5 = 36 <br />
y = 36 - 5 <br />
= 31 <br />
[[बर्ग:चर (गणित)|*]]
[[बर्ग:बीजगणित]]
[[बर्ग:कलन]]
[[बर्ग:प्राथमिक गणित]]
[[बर्ग:वाक्यविन्यास (तर्क)]]
cu0pwqr6dtc180ojaffop3zl7oivdol
ज्ञान
0
9961
79626
68283
2026-09-12T02:25:21Z
AMAN KUMAR
377
कड़ी+
79626
wikitext
text/x-wiki
[[सञ्चिका:Classical Definition of Knowledge-hi.svg|thumb|ज्ञानके शास्त्रीय परिभाषा]]निरपेक्ष सत्यके स्वानुभूतिहे '''ज्ञान''' हे । ई प्रिय-अप्रिय, सुख-दु:ख इत्यादि भावसे निरपेक्ष होवहे । एकर [[विभाजन (गणित)|विभाजन]] विषयके आधार पर होवहे । विषय पाँच होवहे - रूप, [[रस (काव्यशास्त्र)|रस]], गन्ध, शब्द आउ स्पर्श ।
ज्ञान लोगके भौतिक आउ बौद्धिक सामाजिक क्रियाकलापके उपज, सङ्केतके रूपमे जगत् के वस्तुनिष्ठ गुण आउ सम्बन्ध, प्राकृतिक आउ मानवीय तत्त्वके बारेमे विचारके अभिव्यक्ति हे । ज्ञान दैनन्दिन तथा वैज्ञानिक हो सकहे । वैज्ञानिक ज्ञान आनुभविक आउ सैद्धान्तिक वर्गमे विभक्त होवहे । एकर अतिरिक्त समाजमे ज्ञानके मिथकीय, कलात्मक, धार्मिक आउ अन्य ढेर अनुभूति होवहे । सिद्धान्ततः सामाजिक-ऐतिहासिक अवस्था पर [[मानुस]]<nowiki/>के क्रियाकलापके निर्भरताके प्रकट कैल बिन ज्ञानके सारके न समझल जा सकहे । ज्ञानमे मानुसके सामाजिक शक्ति सञ्चित होवहे, निश्चित रूप धारण करहे तथा विषयीकृत होवहे । ई तथ्य मनुष्यके बौद्धिक कार्यकलापके प्रमुखता आउ आत्मनिर्भर स्वरूपके बारेमे आत्मगत-प्रत्ययवादी सिद्धान्तके आधार हे ।<ref>दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-२२६, ISBN ५-0१000९0७-२</ref> स्वाभाविक आउ सहज शब्दमे हमनी ज्ञानके ई प्रकार परिभाषित कर सकहियै
{{Quote|अनुभवके अनुभूतिये ज्ञान कहला हे ।}}
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[बर्ग:ज्ञानमीमांसा]]
[[बर्ग:दर्शन]]
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पगहा
0
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अनिरुद्ध कुमार
172
"''' पगहा ''' पालतु जानवर के बांध के रखे वाला एगो उपकरण है। इ रस्सी के या सिक्कड़ के बनावल जा है।" सङ्गे नया पन्ना बनावल गेलै
79598
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text/x-wiki
''' पगहा ''' पालतु जानवर के बांध के रखे वाला एगो उपकरण है। इ रस्सी के या सिक्कड़ के बनावल जा है।
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
''' पगहा ''' पालतु जानवर के बांध के रखे वाला एगो उपकरण हइ। इ रस्सी के या सिक्कड़ के बनावल जा हइ।
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अनिरुद्ध कुमार
172
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text/x-wiki
''' पगहा ''' पालतु जानवर के बांध के रखे वाला एगो उपकरण हइ। इ रस्सी के या सिक्कड़ के बनावल जा हइ। एकरा में रस्सी या सिक्कड़ के दोनों छोर पर फंदा बनावल रह है। एक फंदा जानवर के गले में पहिना देल जा है और दोसर सिरा के खूँटा में फँसा देवल जा है। जब जानवर के कहीं ले जाय के रह है तो इ पगहा के खूट्टा वाला सिरा के खु्टटा से निकाल देल जा है।
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
''' पगहा ''' पालतु [[जानवर]] के बांध के रखे वाला एगो उपकरण हइ। इ [[रस्सी]] के या [[सिक्कड़]] के बनावल जा हइ। एकरा में रस्सी या सिक्कड़ के दोनों छोर पर फंदा बनावल रह हइ। एक फंदा जानवर के गले में पहिना देल जा हइ और दोसर सिरा के खूँटा में फँसा देवल जा हइ। जब जानवर के कहीं ले जाय के रह हइ तो इ पगहा के खूट्टा वाला सिरा के खु्टटा से निकाल देल जा हइ।
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
''' पगहा ''' पालतु [[जानवर]] के बांध के रखे वाला एगो उपकरण हइ। इ [[रस्सी]] के या [[सिक्कड़]] के बनावल जा हइ। एकरा में रस्सी या सिक्कड़ के दोनों छोर पर फंदा बनावल रह हइ। एक फंदा जानवर के गले में पहिना देल जा हइ और दोसर सिरा के खूँटा में फँसा देवल जा हइ। जब जानवर के कहीं ले जाय के रह हइ तो इ पगहा के खूट्टा वाला सिरा के खु्टटा से निकाल देल जा हइ।
[[श्रेणी:पशुपालन]]
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जौरी
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अनिरुद्ध कुमार
172
"''' जौरी ''' बाँधे के उपकरण हइ जे रस्सी की तरह होव हैहइ। इ धान के पुआल से बुनल रस्सी हइ। एकरा से जानवर के या सामान के बाँधल जा हइ। किसान एकर मदद से आँटी के बाँध के बोझा बा..." सङ्गे नया पन्ना बनावल गेलै
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text/x-wiki
''' जौरी ''' बाँधे के उपकरण हइ जे रस्सी की तरह होव हैहइ। इ धान के पुआल से बुनल रस्सी हइ। एकरा से जानवर के या सामान के बाँधल जा हइ। किसान एकर मदद से आँटी के बाँध के बोझा बाब हथिन। एकरा छप्पर छावे में भी उपयोग कइल जा हइ।
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
''' जौरी ''' बाँधे के उपकरण हइ जे [[रस्सी]] की तरह होव हैहइ। इ [[धान]] के [[पुआल]] से बुनल रस्सी हइ। एकरा से [[जानवर]] के या सामान के बाँधल जा हइ। किसान एकर मदद से [[आँटी]] के बाँध के [[बोझा]] बनाब हथिन। एकरा [[छप्पर]] छावे में भी उपयोग कइल जा हइ।
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
''' जौरी ''' बाँधे के उपकरण हइ जे [[रस्सी]] की तरह होव हैहइ। इ [[धान]] के [[पुआल]] से बुनल रस्सी हइ। एकरा से [[जानवर]] के या सामान के बाँधल जा हइ। किसान एकर मदद से [[आँटी]] के बाँध के [[बोझा]] बनाब हथिन। एकरा [[छप्पर]] छावे में भी उपयोग कइल जा हइ।
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[[श्रेणी:पशुपालन]]
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अनिरुद्ध कुमार
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text/x-wiki
''' जौरी ''' बाँधे के सामान हइ जे [[रस्सी]] की तरह होव हैहइ। इ [[धान]] के [[पुआल]] से बुनल रस्सी हइ। एकरा से [[जानवर]] के या सामान के बाँधल जा हइ। किसान एकर मदद से [[आँटी]] के बाँध के [[बोझा]] बनाब हथिन। एकरा [[छप्पर]] छावे में भी उपयोग कइल जा हइ।
[[श्रेणी:खेती]]
[[श्रेणी:पशुपालन]]
[[श्रेणी:सामान]]
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अनिरुद्ध कुमार
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''' जौरी ''' बाँधे के सामान हइ जे [[रस्सी]] की तरह होव हैहइ। इ [[धान]] के [[पुआल]] से बुनल रस्सी हइ। एकरा से [[जानवर]] के या सामान के बाँधल जा हइ। किसान एकर मदद से [[आँटी]] के बाँध के [[बोझा]] बनाब हथिन। एकरा [[छप्पर]] छावे में भी उपयोग कइल जा हइ।
[[बर्ग:खेती]]
[[बर्ग:पशुपालन]]
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इ खेती से संबंधित श्रेणी हइ।
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इ धंधा से संबंधित श्रेणी हइ।
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अनिरुद्ध कुमार
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"''' धान ''' एगो अनाज हइ। इ दू तरह के होब हइ। गरमाधान गरमी में उगाबल जा हइ। बरसाती धान बरसात के मौसम में उगाबल जा हइ। इ मगही क्षेत्र के लोगन के मुख्य भोजन है। इ दक्षिण भार..." सङ्गे नया पन्ना बनावल गेलै
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text/x-wiki
''' धान ''' एगो अनाज हइ। इ दू तरह के होब हइ। गरमाधान गरमी में उगाबल जा हइ। बरसाती धान बरसात के मौसम में उगाबल जा हइ। इ मगही क्षेत्र के लोगन के मुख्य भोजन है। इ दक्षिण भारत, बंगाल, उड़िसा, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश आदि राज्यन के भी मुख्य खाना हइ।
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text/x-wiki
''' धान ''' एगो अनाज हइ। इ दू तरह के होब हइ। गरमाधान गरमी में उगाबल जा हइ। बरसाती धान बरसात के मौसम में उगाबल जा हइ। इ मगही क्षेत्र के लोगन के मुख्य भोजन है। इ दक्षिण भारत, बंगाल, उड़िसा, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश आदि राज्यन के भी मुख्य खाना हइ।
[[बर्ग:अनाज]]
[[बर्ग:खेती]]
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''' धान ''' एगो [[अनाज]] हइ। इ दू तरह के होब हइ। गरमाधान गरमी में उगाबल जा हइ। बरसाती धान बरसात के मौसम में उगाबल जा हइ। इ मगही क्षेत्र के लोगन के मुख्य भोजन हइ। इ दक्षिण भारत, [[बंगाल]], [[ओड़िसा]], [[बिहार]], [[झारखंड]], [[उत्तरप्रदेश]] आदि राज्यन के भी मुख्य खाना हइ।
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''' धान ''' एगो [[अनाज]] हइ। इ दू तरह के होब हइ। गरमाधान गरमी में उगाबल जा हइ। बरसाती धान बरसात के मौसम में उगाबल जा हइ। इ मगही क्षेत्र के लोगन के मुख्य भोजन हइ। इ दक्षिण भारत, [[बंगाल]], [[ओड़िसा]], [[बिहार]], [[झारखंड]], [[उत्तरप्रदेश]] आदि राज्यन के भी मुख्य खाना हइ। चीन औ भारत में एकर बहुत पैदावार होब हइ। छत्तीसगढ़ के धन के कटोरा कहल जा हइ।
[[बर्ग:अनाज]]
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''' धान ''' एगो [[अनाज]] हइ। इ दू तरह के होब हइ। गरमाधान गरमी में उगाबल जा हइ। बरसाती धान बरसात के मौसम में उगाबल जा हइ। इ मगही क्षेत्र के लोगन के मुख्य भोजन हइ। इ [[दक्षिणभारत]], [[बंगाल]], [[ओड़िसा]], [[बिहार]], [[झारखंड]], [[उत्तरप्रदेश]] आदि राज्यन के भी मुख्य खाना हइ। [[चीन]] औ [[भारत]] में एकर बहुत पैदावार होब हइ। [[छत्तीसगढ़]] के धन के कटोरा कहल जा हइ।
[[बर्ग:अनाज]]
[[बर्ग:खेती]]
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अनिरुद्ध कुमार
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"इ अनाज से संबंधित श्रेणी हइ।" सङ्गे नया पन्ना बनावल गेलै
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इ अनाज से संबंधित श्रेणी हइ।
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text/x-wiki
इ अनाज से संबंधित श्रेणी हइ।
[[बर्ग:खेती]]
[[बर्ग:वनस्पति विज्ञान]]
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प्रतापपुर (कन्नौज)
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AMAN KUMAR
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+
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text/x-wiki
[[सञ्चिका:प्रतापपुर कन्नौज.jpg|thumb|प्रतापपुरके एगो गाँओ]]
प्रतापपुर, भारतीय राज्य [[उत्तरप्रदेश]]<nowiki/>के [[कन्नौज]] जिलाके एगो [[गाँओ]] हइ । एखर पिनकोड २०९७३३ हइ ।<ref name="f184">{{cite web|title=Partappur Village Population|website=Census 2011 India|url=https://www.census2011.co.in/data/village/146962-partappur-uttar-pradesh.html|access-date=2026-09-12}}</ref>
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:कन्नौज]]
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79628
79627
2026-09-12T02:46:00Z
AMAN KUMAR
377
सुधार
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text/x-wiki
[[सञ्चिका:प्रतापपुर कन्नौज.jpg|thumb|प्रतापपुरके एगो चित्र ]]
प्रतापपुर, भारतीय राज्य [[उत्तरप्रदेश]]<nowiki/>के [[कन्नौज]] जिलाके एगो [[गाँओ]] हइ । एखर पिनकोड २०९७३३ हइ ।<ref name="f184">{{cite web|title=Partappur Village Population|website=Census 2011 India|url=https://www.census2011.co.in/data/village/146962-partappur-uttar-pradesh.html|access-date=2026-09-12}}</ref>
== सन्दर्भ ==
<references />
[[श्रेणी:कन्नौज]]
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जय जिनेन्द्र
0
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"{{जैनधर्म}}" सङ्गे नया पन्ना बनावल गेलै
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text/x-wiki
{{जैनधर्म}}
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text/x-wiki
{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
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text/x-wiki
{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
ई दु संस्कृत अक्षरके मेलसे बनल है - जय आउ जिनेन्द्र ।
: '''जय''' शब्द [[केवली|जिनेन्द्र भगवान्]] के गुणके प्रशंसाला प्रयोग कैल जा है ।
: '''जिनेन्द्र''' ऊ सब आत्माला प्रयोग कैल जा है जे अपन मन, वचन आउ कायाके जीत लेलथिन आउ [[केवलज्ञान]] प्राप्त कर लेलथिन हो ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 16}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 164}}
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{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
ई दु संस्कृत अक्षरके मेलसे बनल है - जय आउ जिनेन्द्र ।
: '''जय''' शब्द [[केवली|जिनेन्द्र भगवान्]] के गुणके प्रशंसाला प्रयोग कैल जा है ।
: '''जिनेन्द्र''' ऊ सब आत्माला प्रयोग कैल जा है जे अपन मन, वचन आउ कायाके जीत लेलथिन आउ [[केवलज्ञान]] प्राप्त कर लेलथिन हो ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 16}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 164}}
==एकरो देखथिन==
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* [[महावीर]]
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{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
ई दु संस्कृत अक्षरके मेलसे बनल है - जय आउ जिनेन्द्र ।
: '''जय''' शब्द [[केवली|जिनेन्द्र भगवान्]] के गुणके प्रशंसाला प्रयोग कैल जा है ।
: '''जिनेन्द्र''' ऊ सब आत्माला प्रयोग कैल जा है जे अपन मन, वचन आउ कायाके जीत लेलथिन आउ [[केवलज्ञान]] प्राप्त कर लेलथिन हो ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 16}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 164}}
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== सन्दर्भ ==
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{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
ई दु संस्कृत अक्षरके मेलसे बनल है - जय आउ जिनेन्द्र ।
: '''जय''' शब्द [[केवली|जिनेन्द्र भगवान्]] के गुणके प्रशंसाला प्रयोग कैल जा है ।
: '''जिनेन्द्र''' ऊ सब आत्माला प्रयोग कैल जा है जे अपन मन, वचन आउ कायाके जीत लेलथिन आउ [[केवलज्ञान]] प्राप्त कर लेलथिन हो ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 16}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 164}}
==एकरो देखथिन==
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* [[महावीर]]
== सन्दर्भ ==
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== स्रोत ग्रन्थ ==
* {{Citation|last = Rankin|first = Aidan|title = Living Jainism: An Ethical Science|url = https://books.google.co.in/books?id=bQxZAQAAQBAJ&dq=jai+jinendra&source=gbs_navlinks_s|year = 2013|publisher = John Hunt Publishing|isbn = 978-1780999111|chapter = Chapter 1. Jains Jainism and Jainness|access-date = 20 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160303235306/https://books.google.co.in/books?id=bQxZAQAAQBAJ&dq=jai+jinendra&source=gbs_navlinks_s|archive-date = 3 मार्च 2016|url-status = live}}
* {{Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2|access-date = 20 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|archive-date = 6 मई 2016|url-status = live}}
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{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
ई दु संस्कृत अक्षरके मेलसे बनल है - जय आउ जिनेन्द्र ।
: '''जय''' शब्द [[केवली|जिनेन्द्र भगवान्]] के गुणके प्रशंसाला प्रयोग कैल जा है ।
: '''जिनेन्द्र''' ऊ सब आत्माला प्रयोग कैल जा है जे अपन मन, वचन आउ कायाके जीत लेलथिन आउ [[केवलज्ञान]] प्राप्त कर लेलथिन हो ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 16}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 164}}
==एकरो देखथिन==
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* [[महावीर]]
== सन्दर्भ ==
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== स्रोत ग्रन्थ ==
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* {{Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2|access-date = 20 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|archive-date = 6 मई 2016|url-status = live}}
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{{जैनधर्म}}
'''जय जिनेन्द्र''' एक प्रख्यात अभिवादन है । ई मुख्य रूपसे [[जैनधर्म]]के अनुयायी द्वारा प्रयोग कैल जा है । एकर अर्थ होव है "जिनेन्द्र भगवान् ([[तीर्थङ्कर]]) के नमस्कार" ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}
ई दु संस्कृत अक्षरके मेलसे बनल है - जय आउ जिनेन्द्र ।
: '''जय''' शब्द [[केवली|जिनेन्द्र भगवान्]] के गुणके प्रशंसाला प्रयोग कैल जा है ।
: '''जिनेन्द्र''' ऊ सब आत्माला प्रयोग कैल जा है जे अपन मन, वचन आउ कायाके जीत लेलथिन आउ [[केवलज्ञान]] प्राप्त कर लेलथिन हो ।{{Sfn|Rankin|2013|p = 37}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 16}}{{Sfn|Sangave|2001|p = 164}}
==एकरो देखथिन==
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* [[महावीर]]
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
== स्रोत ग्रन्थ ==
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* {{Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2|access-date = 20 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|archive-date = 6 मई 2016|url-status = live}}
{{जैन विषय}}
[[श्रेणी:भारतके अभिवादन शब्द आउ वाक्यांश]]
[[श्रेणी:जैनधर्म]]
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जैनधर्ममे भगवान्
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{{जैनधर्म}}
'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन ।
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'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
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{{जैनधर्म}}
'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
[[जैन दर्शन]]के अनुसार कर्म प्रकृतिके मौलिक कण होव है । जे कर्मके हनन करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेलकै हे ओकरा [[अरिहन्त]] कहल जा है । तीर्थङ्कर विशेष अरिहन्त होव हथिन जे 'धर्म तीर्थ' के रचना कर हथिनम। मने कि जे अन्य जीवके मोक्ष-मार्ग देखाव है । जैनधर्म कोनो सर्वोच्च जीव पर निर्भरता न सिखावै । तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला रस्ता देखाव हथिन किन्तु ज्ञानला सङ्घर्ष अपने करे पड़ है ।
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'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
[[जैन दर्शन]]के अनुसार कर्म प्रकृतिके मौलिक कण होव है । जे कर्मके हनन करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेलकै हे ओकरा [[अरिहन्त]] कहल जा है । तीर्थङ्कर विशेष अरिहन्त होव हथिन जे 'धर्म तीर्थ' के रचना कर हथिनम। मने कि जे अन्य जीवके मोक्ष-मार्ग देखाव है । जैनधर्म कोनो सर्वोच्च जीव पर निर्भरता न सिखावै । तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला रस्ता देखाव हथिन किन्तु ज्ञानला सङ्घर्ष अपने करे पड़ है ।
==एकरो देखथिन==
* [[गुणस्थान]]
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{{जैनधर्म}}
'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
[[जैन दर्शन]]के अनुसार कर्म प्रकृतिके मौलिक कण होव है । जे कर्मके हनन करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेलकै हे ओकरा [[अरिहन्त]] कहल जा है । तीर्थङ्कर विशेष अरिहन्त होव हथिन जे 'धर्म तीर्थ' के रचना कर हथिनम। मने कि जे अन्य जीवके मोक्ष-मार्ग देखाव है । जैनधर्म कोनो सर्वोच्च जीव पर निर्भरता न सिखावै । तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला रस्ता देखाव हथिन किन्तु ज्ञानला सङ्घर्ष अपने करे पड़ है ।
==एकरो देखथिन==
* [[गुणस्थान]]
==सन्दर्भ==
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{{जैनधर्म}}
'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
[[जैन दर्शन]]के अनुसार कर्म प्रकृतिके मौलिक कण होव है । जे कर्मके हनन करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेलकै हे ओकरा [[अरिहन्त]] कहल जा है । तीर्थङ्कर विशेष अरिहन्त होव हथिन जे 'धर्म तीर्थ' के रचना कर हथिनम। मने कि जे अन्य जीवके मोक्ष-मार्ग देखाव है । जैनधर्म कोनो सर्वोच्च जीव पर निर्भरता न सिखावै । तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला रस्ता देखाव हथिन किन्तु ज्ञानला सङ्घर्ष अपने करे पड़ है ।
==एकरो देखथिन==
* [[गुणस्थान]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
== सन्दर्भ ग्रन्थ ==
* {{citation|last=प्रमाणसागर|first=मुनि|title=जैन तत्त्वविद्या|year=२००८|publisher=भारतीय ज्ञानपीठ|url=https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|isbn=978-81-263-1480-5|access-date=10 जनवरी 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20150925201536/https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|archive-date=25 सितम्बर 2015|url-status=live}}
* {{Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2|access-date = 28 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|archive-date = 6 मई 2016|url-status = live}}
* {{Citation|last = शास्त्री |first = प. कैलाशचन्द्र |title = जैन धर्म|year = २००७|publisher = आचार्य शन्तिसागर 'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला|isbn = 81-902683-8-4}}
* {{cite book|title= आचार्य समन्तभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार| last1= जलज| first1=जयकुमार|year=2006|isbn=81-88769-04-5}}
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{{जैनधर्म}}
'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
[[जैन दर्शन]]के अनुसार कर्म प्रकृतिके मौलिक कण होव है । जे कर्मके हनन करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेलकै हे ओकरा [[अरिहन्त]] कहल जा है । तीर्थङ्कर विशेष अरिहन्त होव हथिन जे 'धर्म तीर्थ' के रचना कर हथिनम। मने कि जे अन्य जीवके मोक्ष-मार्ग देखाव है । जैनधर्म कोनो सर्वोच्च जीव पर निर्भरता न सिखावै । तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला रस्ता देखाव हथिन किन्तु ज्ञानला सङ्घर्ष अपने करे पड़ है ।
==एकरो देखथिन==
* [[गुणस्थान]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
== सन्दर्भ ग्रन्थ ==
* {{citation|last=प्रमाणसागर|first=मुनि|title=जैन तत्त्वविद्या|year=२००८|publisher=भारतीय ज्ञानपीठ|url=https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|isbn=978-81-263-1480-5|access-date=10 जनवरी 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20150925201536/https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|archive-date=25 सितम्बर 2015|url-status=live}}
* {{Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2|access-date = 28 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|archive-date = 6 मई 2016|url-status = live}}
* {{Citation|last = शास्त्री |first = प. कैलाशचन्द्र |title = जैन धर्म|year = २००७|publisher = आचार्य शन्तिसागर 'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला|isbn = 81-902683-8-4}}
* {{cite book|title= आचार्य समन्तभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार| last1= जलज| first1=जयकुमार|year=2006|isbn=81-88769-04-5}}
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{{जैनधर्म}}
'''जैनधर्ममे भगवान्''' [[अरिहन्त]] ([[केवली]]) आउ [[सिद्ध (जैनधर्म)|सिद्ध]] (मुक्त आत्मा) के कहल जा है । [[जैनधर्म]] ई ब्रह्माण्डके अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखावला जिम्मेदार कौनो निर्माता ईश्वर या शक्तिके धारणाके खारिज कर है ।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]]के अनुसार ई लोक आउ एकर छौ [[द्रव्य (जैन दर्शन)|द्रव्य]] ([[जीव]], [[पुद्गल]], [[आकाश]], [[काल]], [[धर्म]] आउ [[अधर्म]]) हमेशासे है आउ एकर अस्तित्व हमेशा रहतै । ई ब्रह्माण्ड स्वयं सञ्चालित है आउ सार्वभौमिक प्राकृतिक विधि पर चल है । जैन दर्शनके अनुसार भगवान्, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) के निर्माण न कर सकै । [[जैन ग्रन्थ]]मे देव (स्वर्ग निवासी) के एक विस्तृत विवरण भेट है किन्तु ई सब प्राणीके रचनाकारके रूपमे न देखल जा है; ओखनियो दुखके अधीन हथिन आउ अन्य सब जीवित प्राणी नियन अपन आयु पूरा करके अन्तिममे मर जा हथिन । जैनधर्मके अनुसार ई सृष्टिके कोनो न बनैलकै । देवी, देवता जे स्वर्गमे हथिन ऊ अपन निमन कर्मके कारण ओहाँ हथिन आउ भगवान् न मानल जा सकथिन । ई देवी, देवता एक निश्चित समयला ओहाँ हथिन आउ एहु मरण उपरान्त मनुष्य बनके मोक्ष जा सक हथिन ।
जैनधर्मके अनुसार हर आत्माके असली स्वभाव भगवन्ता है आउ हर आत्मामे अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान आउ अनन्त सुख है । आत्मा आउ कर्म पुद्गलके बन्धनके कारण ई गुण प्रकट न हो पावै । सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्रके माध्यमसे आत्माके ई राज्यके प्राप्त कैल जा सक है । ई सब रतन्त्रयके धारकके भगवान् कहल जा है । एक भगवान्, ई प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जा है - दुखसे मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म आउ अन्तिममे शरीरोसे मुक्ति । एकरा निर्वाण या [[मोक्ष (जैनधर्म)|मोक्ष]] कहल जा है । ई प्रकार जैनधर्ममे अनन्त भगवान हथिन, सब बराबर, मुक्त आउ सब गुणके अभिव्यक्तिमे अनन्त हथिन ।
[[जैन दर्शन]]के अनुसार कर्म प्रकृतिके मौलिक कण होव है । जे कर्मके हनन करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेलकै हे ओकरा [[अरिहन्त]] कहल जा है । तीर्थङ्कर विशेष अरिहन्त होव हथिन जे 'धर्म तीर्थ' के रचना कर हथिनम। मने कि जे अन्य जीवके मोक्ष-मार्ग देखाव है । जैनधर्म कोनो सर्वोच्च जीव पर निर्भरता न सिखावै । तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला रस्ता देखाव हथिन किन्तु ज्ञानला सङ्घर्ष अपने करे पड़ है ।
==एकरो देखथिन==
* [[गुणस्थान]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
== सन्दर्भ ग्रन्थ ==
* {{citation|last=प्रमाणसागर|first=मुनि|title=जैन तत्त्वविद्या|year=२००८|publisher=भारतीय ज्ञानपीठ|url=https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|isbn=978-81-263-1480-5|access-date=10 जनवरी 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20150925201536/https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|archive-date=25 सितम्बर 2015|url-status=live}}
* {{Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2|access-date = 28 सितम्बर 2015|archive-url = https://web.archive.org/web/20160506083824/https://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|archive-date = 6 मई 2016|url-status = live}}
* {{Citation|last = शास्त्री |first = प. कैलाशचन्द्र |title = जैन धर्म|year = २००७|publisher = आचार्य शन्तिसागर 'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला|isbn = 81-902683-8-4}}
* {{cite book|title= आचार्य समन्तभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार| last1= जलज| first1=जयकुमार|year=2006|isbn=81-88769-04-5}}
{{जैन विषय}}
[[श्रेणी:जैनधर्म]]
[[श्रेणी:ईश्वर]]
[[श्रेणी:जैनधर्ममे भगवान्]]
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