विकिपीडिया magwiki https://mag.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE MediaWiki 1.47.0-wmf.21 first-letter मीडिया विशेष वार्ता प्रयोगकर्ता प्रयोगकर्ता वार्ता विकिपीडिया विकिपीडिया वार्ता सञ्चिका सञ्चिका वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहयोग सहयोग वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk घटक घटक वार्ता Event Event talk योग 0 18327 80503 80502 2026-09-27T04:55:43Z Pataliputra01 5 80503 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] l354lad1fnz4vpdcgqcq0ydw4csvmjl 80504 80503 2026-09-27T05:04:44Z Pataliputra01 5 80504 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} [[वेद|वैदिक]] [[संहिता]]के अन्तर्गत तपस्वी ''तपस (संस्कृत)'' के बारेमे ([[ब्राह्मण|(कल ब्राह्मण)]]) प्राचीन कालसे वेदमे (१९०० से १५०० ईपू) उल्लेख भेट है जखनिकि तापसिक साधनाके समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणीमे प्राप्त है ।<ref name="Flood, p. 94">[21] ^फ्लड, पी. 94.</ref> ढेर मूर्ती जे सामान्य योग या [[समाधि]] मुद्राके प्रदर्शित कर है [[सिन्धुघाटी सभ्यता]] (३३००-१७०० ईपू) के स्थान पर प्राप्त होलै हे । पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्लके अनुसार "ई सब मूर्ति योगके धार्मिक संस्कार" के योगसे सम्बन्धके सङ्केत कर है ।<ref>[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145</ref> यद्यपि ई बातके निर्णयात्मक सबूत न है तैयो अनेक पण्डितके रायमे सिन्धुघाटी सभ्यता आउ योग-[[ध्यान]]मे सम्बन्ध है ।<ref>देखथिन: * [[योनातान मार्क केनोयेर|जोनाथन मार्क केनोयेरएक]] मूर्तीके "योग मुद्रामे बैठल" ऐसन वर्णन कर है । [http://www.harappa.com/indus/33.html जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखब, "अरौण्ड द इण्डस इन ९० स्लाइड्स". ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html|date=23 मार्च 2009}} * केरल वेर्नर लिख है " पुरातात्विक खोज हमनीके अनुमान करेके समर्थन कर है कि आर्य [[भारत]]के पूर्वके लोग योगशास्त्रके क्रियासे परिचित हलन". {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103|title=Yoga and Indian Philosophy|last=Werner|first=Karel|date=1998|publisher=Motilal Banarsidass Publ.|isbn=9788120816091|page=103}}[23] * [[हेन्रीच जिम्मर]] एक मुद्रामे "योगमुद्रा" के वर्णन कर है । {{cite book|url=https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm|title=Myths and Symbols in Indian Art and Civilization|last=Zimmer|first=Heinrich|publisher=Princeton University Press, New Ed edition|year=1972|ISBN=978-0691017785|page=[https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm/page/n182 168]}} * [[थोमस म्क्विल्ले]] लिख हथिन कि "ई छौ रहस्यमय सिन्धुघाटी मुद्राके छविमे जे उत्कीर्ण मूर्ति है ओकरामे हठयोगके ''मूलबन्धासन '' नामके आसन या ओकरासे मिलित जुलित ''उत्कटासन '' या ''बद्धा कोनासना '' प्रदर्शित है । {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219|title=The shape of ancient thought|last=McEvilley|first=Thomas|date=2002|publisher=Allworth Communications|isbn=9781581152036|pages=219-220}} * डॉ॰ फरजन्द मसीह, पञ्जाब विश्वविद्यालयके पुरातत्व विभागके अध्यक्ष हालेमे प्राप्त एगो मुद्राके वर्णन एक योगीके रूपके कह हथिन । [http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm अपूर्व वस्तुके खोज खण्डहरमे निहित खजाना दने सङ्केत कर है । ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm|date=15 फरवरी 2010}} * गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जेकि अन्य सीलमे से एक है, के बारेमे विवाद करित लिख है कि ई रूप एक योग मुद्रामे बैठल व्यक्तिके स्पष्ट न लगै या ई एगो मानव आकृतिके प्रतिनिधित्व करित लग है । फ्लड, पीपी. 28-29 . * पशुपति सीलके बारेमे जियोफ्रे सामुएलके मानल है कि "वास्तवमे हमनीके ई स्पष्ट न है कि ई मूर्ति कोनो नारी या पुरुष केकर व्याख्या कर है".{{cite book|url=http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4|title=The Origins of Yoga and Tantra|last=Samuel|first=Geoffrey|date=2008|publisher=Cambridge University Press|isbn=9780521695343|page=4}}[26]</ref> [[ध्यान]]मे उच्च चैतन्यके प्राप्त करेके रीतिके विकास श्रमानिक परम्परा द्वारा एवं उपनिषद् के परम्परा द्वारा विकसित होलै हल ।<ref>[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.</ref> ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] 9gmnag3vrjphr573bmk8yabmj8fwvk4 80505 80504 2026-09-27T05:06:55Z Pataliputra01 5 80505 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} [[वेद|वैदिक]] [[संहिता]]के अन्तर्गत तपस्वी ''तपस (संस्कृत)'' के बारेमे ([[ब्राह्मण|(कल ब्राह्मण)]]) प्राचीन कालसे वेदमे (१९०० से १५०० ईपू) उल्लेख भेट है जखनिकि तापसिक साधनाके समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणीमे प्राप्त है ।<ref name="Flood, p. 94">[21] ^फ्लड, पी. 94.</ref> ढेर मूर्ती जे सामान्य योग या [[समाधि]] मुद्राके प्रदर्शित कर है [[सिन्धुघाटी सभ्यता]] (३३००-१७०० ईपू) के स्थान पर प्राप्त होलै हे । पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्लके अनुसार "ई सब मूर्ति योगके धार्मिक संस्कार" के योगसे सम्बन्धके सङ्केत कर है ।<ref>[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145</ref> यद्यपि ई बातके निर्णयात्मक सबूत न है तैयो अनेक पण्डितके रायमे सिन्धुघाटी सभ्यता आउ योग-[[ध्यान]]मे सम्बन्ध है ।<ref>देखथिन: * [[योनातान मार्क केनोयेर|जोनाथन मार्क केनोयेरएक]] मूर्तीके "योग मुद्रामे बैठल" ऐसन वर्णन कर है । [http://www.harappa.com/indus/33.html जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखब, "अरौण्ड द इण्डस इन ९० स्लाइड्स". ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html|date=23 मार्च 2009}} * केरल वेर्नर लिख है " पुरातात्विक खोज हमनीके अनुमान करेके समर्थन कर है कि आर्य [[भारत]]के पूर्वके लोग योगशास्त्रके क्रियासे परिचित हलन". {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103|title=Yoga and Indian Philosophy|last=Werner|first=Karel|date=1998|publisher=Motilal Banarsidass Publ.|isbn=9788120816091|page=103}}[23] * [[हेन्रीच जिम्मर]] एक मुद्रामे "योगमुद्रा" के वर्णन कर है । {{cite book|url=https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm|title=Myths and Symbols in Indian Art and Civilization|last=Zimmer|first=Heinrich|publisher=Princeton University Press, New Ed edition|year=1972|ISBN=978-0691017785|page=[https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm/page/n182 168]}} * [[थोमस म्क्विल्ले]] लिख हथिन कि "ई छौ रहस्यमय सिन्धुघाटी मुद्राके छविमे जे उत्कीर्ण मूर्ति है ओकरामे हठयोगके ''मूलबन्धासन '' नामके आसन या ओकरासे मिलित जुलित ''उत्कटासन '' या ''बद्धा कोनासना '' प्रदर्शित है । {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219|title=The shape of ancient thought|last=McEvilley|first=Thomas|date=2002|publisher=Allworth Communications|isbn=9781581152036|pages=219-220}} * डॉ॰ फरजन्द मसीह, पञ्जाब विश्वविद्यालयके पुरातत्व विभागके अध्यक्ष हालेमे प्राप्त एगो मुद्राके वर्णन एक योगीके रूपके कह हथिन । [http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm अपूर्व वस्तुके खोज खण्डहरमे निहित खजाना दने सङ्केत कर है । ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm|date=15 फरवरी 2010}} * गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जेकि अन्य सीलमे से एक है, के बारेमे विवाद करित लिख है कि ई रूप एक योग मुद्रामे बैठल व्यक्तिके स्पष्ट न लगै या ई एगो मानव आकृतिके प्रतिनिधित्व करित लग है । फ्लड, पीपी. 28-29 . * पशुपति सीलके बारेमे जियोफ्रे सामुएलके मानल है कि "वास्तवमे हमनीके ई स्पष्ट न है कि ई मूर्ति कोनो नारी या पुरुष केकर व्याख्या कर है".{{cite book|url=http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4|title=The Origins of Yoga and Tantra|last=Samuel|first=Geoffrey|date=2008|publisher=Cambridge University Press|isbn=9780521695343|page=4}}[26]</ref> [[ध्यान]]मे उच्च चैतन्यके प्राप्त करेके रीतिके विकास श्रमानिक परम्परा द्वारा एवं उपनिषद् के परम्परा द्वारा विकसित होलै हल ।<ref>[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.</ref> बुद्धके पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रन्थमे [[ध्यान]]के बारेमे कोनो ठोस सबूत न भेट है । बुद्धके दु शिक्षकके ध्यानके लक्ष्यके प्रति कहल वाक्यके आधार पर वय्न्न ई तर्क कर है कि निर्गुण ध्यानके पद्धति ब्रह्मिन परम्परासे निकललै एहीसे उपनिषद् के [[सृष्टि]]के प्रति कहल कथनमे एवं ध्यानके लक्ष्यला कहल कथनमे समानता है ।<ref>[28] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.</ref> ई सम्भावित होहु सक है, नहियो.<ref>[29] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56.</ref> ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] sg02a9x0l73khhkoxutnh0a895j5z6u 80506 80505 2026-09-27T05:08:11Z Pataliputra01 5 80506 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} [[वेद|वैदिक]] [[संहिता]]के अन्तर्गत तपस्वी ''तपस (संस्कृत)'' के बारेमे ([[ब्राह्मण|(कल ब्राह्मण)]]) प्राचीन कालसे वेदमे (१९०० से १५०० ईपू) उल्लेख भेट है जखनिकि तापसिक साधनाके समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणीमे प्राप्त है ।<ref name="Flood, p. 94">[21] ^फ्लड, पी. 94.</ref> ढेर मूर्ती जे सामान्य योग या [[समाधि]] मुद्राके प्रदर्शित कर है [[सिन्धुघाटी सभ्यता]] (३३००-१७०० ईपू) के स्थान पर प्राप्त होलै हे । पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्लके अनुसार "ई सब मूर्ति योगके धार्मिक संस्कार" के योगसे सम्बन्धके सङ्केत कर है ।<ref>[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145</ref> यद्यपि ई बातके निर्णयात्मक सबूत न है तैयो अनेक पण्डितके रायमे सिन्धुघाटी सभ्यता आउ योग-[[ध्यान]]मे सम्बन्ध है ।<ref>देखथिन: * [[योनातान मार्क केनोयेर|जोनाथन मार्क केनोयेरएक]] मूर्तीके "योग मुद्रामे बैठल" ऐसन वर्णन कर है । [http://www.harappa.com/indus/33.html जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखब, "अरौण्ड द इण्डस इन ९० स्लाइड्स". ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html|date=23 मार्च 2009}} * केरल वेर्नर लिख है " पुरातात्विक खोज हमनीके अनुमान करेके समर्थन कर है कि आर्य [[भारत]]के पूर्वके लोग योगशास्त्रके क्रियासे परिचित हलन". {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103|title=Yoga and Indian Philosophy|last=Werner|first=Karel|date=1998|publisher=Motilal Banarsidass Publ.|isbn=9788120816091|page=103}}[23] * [[हेन्रीच जिम्मर]] एक मुद्रामे "योगमुद्रा" के वर्णन कर है । {{cite book|url=https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm|title=Myths and Symbols in Indian Art and Civilization|last=Zimmer|first=Heinrich|publisher=Princeton University Press, New Ed edition|year=1972|ISBN=978-0691017785|page=[https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm/page/n182 168]}} * [[थोमस म्क्विल्ले]] लिख हथिन कि "ई छौ रहस्यमय सिन्धुघाटी मुद्राके छविमे जे उत्कीर्ण मूर्ति है ओकरामे हठयोगके ''मूलबन्धासन '' नामके आसन या ओकरासे मिलित जुलित ''उत्कटासन '' या ''बद्धा कोनासना '' प्रदर्शित है । {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219|title=The shape of ancient thought|last=McEvilley|first=Thomas|date=2002|publisher=Allworth Communications|isbn=9781581152036|pages=219-220}} * डॉ॰ फरजन्द मसीह, पञ्जाब विश्वविद्यालयके पुरातत्व विभागके अध्यक्ष हालेमे प्राप्त एगो मुद्राके वर्णन एक योगीके रूपके कह हथिन । [http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm अपूर्व वस्तुके खोज खण्डहरमे निहित खजाना दने सङ्केत कर है । ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm|date=15 फरवरी 2010}} * गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जेकि अन्य सीलमे से एक है, के बारेमे विवाद करित लिख है कि ई रूप एक योग मुद्रामे बैठल व्यक्तिके स्पष्ट न लगै या ई एगो मानव आकृतिके प्रतिनिधित्व करित लग है । फ्लड, पीपी. 28-29 . * पशुपति सीलके बारेमे जियोफ्रे सामुएलके मानल है कि "वास्तवमे हमनीके ई स्पष्ट न है कि ई मूर्ति कोनो नारी या पुरुष केकर व्याख्या कर है".{{cite book|url=http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4|title=The Origins of Yoga and Tantra|last=Samuel|first=Geoffrey|date=2008|publisher=Cambridge University Press|isbn=9780521695343|page=4}}[26]</ref> [[ध्यान]]मे उच्च चैतन्यके प्राप्त करेके रीतिके विकास श्रमानिक परम्परा द्वारा एवं उपनिषद् के परम्परा द्वारा विकसित होलै हल ।<ref>[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.</ref> बुद्धके पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रन्थमे [[ध्यान]]के बारेमे कोनो ठोस सबूत न भेट है । बुद्धके दु शिक्षकके ध्यानके लक्ष्यके प्रति कहल वाक्यके आधार पर वय्न्न ई तर्क कर है कि निर्गुण ध्यानके पद्धति ब्रह्मिन परम्परासे निकललै एहीसे उपनिषद् के [[सृष्टि]]के प्रति कहल कथनमे एवं ध्यानके लक्ष्यला कहल कथनमे समानता है ।<ref>[28] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.</ref> ई सम्भावित होहु सक है, नहियो.<ref>[29] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56.</ref> उपनिषदमे [[ब्रह्माण्ड]] सम्बन्धी बयानके वैश्विक कथनमे कोनो [[ध्यान]]के रीतिके सम्भावनाके प्रति तर्क देइत कहल जा है कि [[नासदीय सूक्त]] कोनो [[ध्यान]]के पद्धति दने [[ऋग्वेद]]से पूर्वो इशारा कर है ।<ref>[30] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51 ।</ref> ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] 27teknxybqijxse5coesld5ya8qzayo 80507 80506 2026-09-27T05:15:00Z Pataliputra01 5 80507 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} [[वेद|वैदिक]] [[संहिता]]के अन्तर्गत तपस्वी ''तपस (संस्कृत)'' के बारेमे ([[ब्राह्मण|(कल ब्राह्मण)]]) प्राचीन कालसे वेदमे (१९०० से १५०० ईपू) उल्लेख भेट है जखनिकि तापसिक साधनाके समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणीमे प्राप्त है ।<ref name="Flood, p. 94">[21] ^फ्लड, पी. 94.</ref> ढेर मूर्ती जे सामान्य योग या [[समाधि]] मुद्राके प्रदर्शित कर है [[सिन्धुघाटी सभ्यता]] (३३००-१७०० ईपू) के स्थान पर प्राप्त होलै हे । पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्लके अनुसार "ई सब मूर्ति योगके धार्मिक संस्कार" के योगसे सम्बन्धके सङ्केत कर है ।<ref>[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145</ref> यद्यपि ई बातके निर्णयात्मक सबूत न है तैयो अनेक पण्डितके रायमे सिन्धुघाटी सभ्यता आउ योग-[[ध्यान]]मे सम्बन्ध है ।<ref>देखथिन: * [[योनातान मार्क केनोयेर|जोनाथन मार्क केनोयेरएक]] मूर्तीके "योग मुद्रामे बैठल" ऐसन वर्णन कर है । [http://www.harappa.com/indus/33.html जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखब, "अरौण्ड द इण्डस इन ९० स्लाइड्स". ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html|date=23 मार्च 2009}} * केरल वेर्नर लिख है " पुरातात्विक खोज हमनीके अनुमान करेके समर्थन कर है कि आर्य [[भारत]]के पूर्वके लोग योगशास्त्रके क्रियासे परिचित हलन". {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103|title=Yoga and Indian Philosophy|last=Werner|first=Karel|date=1998|publisher=Motilal Banarsidass Publ.|isbn=9788120816091|page=103}}[23] * [[हेन्रीच जिम्मर]] एक मुद्रामे "योगमुद्रा" के वर्णन कर है । {{cite book|url=https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm|title=Myths and Symbols in Indian Art and Civilization|last=Zimmer|first=Heinrich|publisher=Princeton University Press, New Ed edition|year=1972|ISBN=978-0691017785|page=[https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm/page/n182 168]}} * [[थोमस म्क्विल्ले]] लिख हथिन कि "ई छौ रहस्यमय सिन्धुघाटी मुद्राके छविमे जे उत्कीर्ण मूर्ति है ओकरामे हठयोगके ''मूलबन्धासन '' नामके आसन या ओकरासे मिलित जुलित ''उत्कटासन '' या ''बद्धा कोनासना '' प्रदर्शित है । {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219|title=The shape of ancient thought|last=McEvilley|first=Thomas|date=2002|publisher=Allworth Communications|isbn=9781581152036|pages=219-220}} * डॉ॰ फरजन्द मसीह, पञ्जाब विश्वविद्यालयके पुरातत्व विभागके अध्यक्ष हालेमे प्राप्त एगो मुद्राके वर्णन एक योगीके रूपके कह हथिन । [http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm अपूर्व वस्तुके खोज खण्डहरमे निहित खजाना दने सङ्केत कर है । ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm|date=15 फरवरी 2010}} * गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जेकि अन्य सीलमे से एक है, के बारेमे विवाद करित लिख है कि ई रूप एक योग मुद्रामे बैठल व्यक्तिके स्पष्ट न लगै या ई एगो मानव आकृतिके प्रतिनिधित्व करित लग है । फ्लड, पीपी. 28-29 . * पशुपति सीलके बारेमे जियोफ्रे सामुएलके मानल है कि "वास्तवमे हमनीके ई स्पष्ट न है कि ई मूर्ति कोनो नारी या पुरुष केकर व्याख्या कर है".{{cite book|url=http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4|title=The Origins of Yoga and Tantra|last=Samuel|first=Geoffrey|date=2008|publisher=Cambridge University Press|isbn=9780521695343|page=4}}[26]</ref> [[ध्यान]]मे उच्च चैतन्यके प्राप्त करेके रीतिके विकास श्रमानिक परम्परा द्वारा एवं उपनिषद् के परम्परा द्वारा विकसित होलै हल ।<ref>[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.</ref> बुद्धके पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रन्थमे [[ध्यान]]के बारेमे कोनो ठोस सबूत न भेट है । बुद्धके दु शिक्षकके ध्यानके लक्ष्यके प्रति कहल वाक्यके आधार पर वय्न्न ई तर्क कर है कि निर्गुण ध्यानके पद्धति ब्रह्मिन परम्परासे निकललै एहीसे उपनिषद् के [[सृष्टि]]के प्रति कहल कथनमे एवं ध्यानके लक्ष्यला कहल कथनमे समानता है ।<ref>[28] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.</ref> ई सम्भावित होहु सक है, नहियो.<ref>[29] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56.</ref> उपनिषदमे [[ब्रह्माण्ड]] सम्बन्धी बयानके वैश्विक कथनमे कोनो [[ध्यान]]के रीतिके सम्भावनाके प्रति तर्क देइत कहल जा है कि [[नासदीय सूक्त]] कोनो [[ध्यान]]के पद्धति दने [[ऋग्वेद]]से पूर्वो इशारा कर है ।<ref>[30] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51 ।</ref> [[हिन्दु]] ग्रन्थ आउ [[बौद्ध]] ग्रन्थ प्राचीन ग्रन्थमे से एक है जेकरामे ध्यान तकनीकके वर्णन प्राप्त होव है ।<ref>[31] ^ [[रिचर्ड गोम्ब्रिच]], ''थेरवाद बौद्ध धर्म: ए सोशल हिस्ट्री फ्रॉम एन्सिएण्ट बनारस टू माडर्न कोलम्बो ।'' रौतलेड्ग आउ केगन पॉल, 1988, पृष्ठ 44 ।</ref> ओखनी ध्यानके प्रथा आउ अवस्थाके वर्णन कर है जे बुद्धसे पहिले अस्तित्वमे हलै आउ साथे ऊ सब प्रथाके वर्णन कर है जे पहिले बौद्धधर्मके भीतरे विकसित होलै ।<ref>[32] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौटलेड्ज 2007, पृष्ट 50 ।</ref> हिन्दु वाङ्मयमे "योग" शब्द पहिले कथा उपनिषदमे प्रस्तुत होलै जने ज्ञानेन्द्रियके नियन्त्रण आउ मानसिक गतिविधिके निवारणके अर्थमे प्रयुक्त होलै हे जे उच्चतम स्थिति प्रदान करेवाला मानल गेलै हे ।<ref>[33] ^ फ्लड, पी. 95 । विद्वान कथा उपनिषदके पूर्व बौद्धत्वके साथे सूचीबद्ध न करथिन । उदाहरणला हेल्मथ वान ग्लासेनप्प देख सक हथिन, 1950 कार्यवाहीके "अकादेमी देर विस्सेन्स्चाफ्तेँ," लितेरातुर अण्ड से [http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html http://www.accesstoinsight.org/ lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20130204142029/http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html |date=4 फरवरी 2013 }} कुछ लोग कह हथिन कि ई पद बौद्ध है, उदाहरण हाजिम नाकामुरा के ए हिस्ट्री ऑफ एअर्ली वेदान्त फिलोसोफी, फिलोसोफी ईस्ट अण्ड वेस्ट, वोल. 37, अङ्क. 3 (जुलाई 1987) जेकरा अरविन्द शर्मा समीक्षा करलथिन हे, पीपी 325-331 । पाली शब्द "योग" के प्रयोग करेके एक व्यापक जाँचला पूर्व बौद्ध ग्रन्थमे देखथिन, थोमस विलियम र्ह्य्स डेविड, विलियम स्टेड, ''पाली-इङ्ग्लिश शब्दकोष'' मोतीलाल बनारसीदास पुब्ल द्वारा डालथिन, 1993, पृष्ठ 558: [http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&amp;pg=RA1-PA558&amp;dq=yoga+pali+term&amp;lr=#PRA1-PA558,M1 http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&amp;pg=RA1-PA558&amp;dq=yoga+pali+ term&amp;ir = # PRA1 lr-PA558, M1.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150322083352/http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&pg=RA1-PA558&dq=yoga+pali+term&lr=#PRA1-PA558,M1 |date=22 मार्च 2015 }} धम्मपदामे "आध्यात्मिक अभ्यास" के अर्थमे ई शब्दके प्रयोगला देखथिन गिल फ्रोन्स्दल, दी धम्मपदा, शम्भाला, 2005, पृष्ठ 56, 130 देखथिन ।</ref> महत्वपूर्ण ग्रन्थ जे योगके अवधारणासे सम्बन्धित है ऊ मध्यकालीन [[उपनिषद्]], [[महाभारत]], [[भगवद्गीता]] (२०० ईपू) एवं [[पतञ्जलि योगसूत्र]] (४०० ईपू) है । ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] 3na119abs4vlnc4c0ch8hz6deycpc31 80508 80507 2026-09-27T05:15:53Z Pataliputra01 5 80508 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} [[वेद|वैदिक]] [[संहिता]]के अन्तर्गत तपस्वी ''तपस (संस्कृत)'' के बारेमे ([[ब्राह्मण|(कल ब्राह्मण)]]) प्राचीन कालसे वेदमे (१९०० से १५०० ईपू) उल्लेख भेट है जखनिकि तापसिक साधनाके समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणीमे प्राप्त है ।<ref name="Flood, p. 94">[21] ^फ्लड, पी. 94.</ref> ढेर मूर्ती जे सामान्य योग या [[समाधि]] मुद्राके प्रदर्शित कर है [[सिन्धुघाटी सभ्यता]] (३३००-१७०० ईपू) के स्थान पर प्राप्त होलै हे । पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्लके अनुसार "ई सब मूर्ति योगके धार्मिक संस्कार" के योगसे सम्बन्धके सङ्केत कर है ।<ref>[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145</ref> यद्यपि ई बातके निर्णयात्मक सबूत न है तैयो अनेक पण्डितके रायमे सिन्धुघाटी सभ्यता आउ योग-[[ध्यान]]मे सम्बन्ध है ।<ref>देखथिन: * [[योनातान मार्क केनोयेर|जोनाथन मार्क केनोयेरएक]] मूर्तीके "योग मुद्रामे बैठल" ऐसन वर्णन कर है । [http://www.harappa.com/indus/33.html जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखब, "अरौण्ड द इण्डस इन ९० स्लाइड्स". ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html|date=23 मार्च 2009}} * केरल वेर्नर लिख है " पुरातात्विक खोज हमनीके अनुमान करेके समर्थन कर है कि आर्य [[भारत]]के पूर्वके लोग योगशास्त्रके क्रियासे परिचित हलन". {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103|title=Yoga and Indian Philosophy|last=Werner|first=Karel|date=1998|publisher=Motilal Banarsidass Publ.|isbn=9788120816091|page=103}}[23] * [[हेन्रीच जिम्मर]] एक मुद्रामे "योगमुद्रा" के वर्णन कर है । {{cite book|url=https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm|title=Myths and Symbols in Indian Art and Civilization|last=Zimmer|first=Heinrich|publisher=Princeton University Press, New Ed edition|year=1972|ISBN=978-0691017785|page=[https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm/page/n182 168]}} * [[थोमस म्क्विल्ले]] लिख हथिन कि "ई छौ रहस्यमय सिन्धुघाटी मुद्राके छविमे जे उत्कीर्ण मूर्ति है ओकरामे हठयोगके ''मूलबन्धासन '' नामके आसन या ओकरासे मिलित जुलित ''उत्कटासन '' या ''बद्धा कोनासना '' प्रदर्शित है । {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219|title=The shape of ancient thought|last=McEvilley|first=Thomas|date=2002|publisher=Allworth Communications|isbn=9781581152036|pages=219-220}} * डॉ॰ फरजन्द मसीह, पञ्जाब विश्वविद्यालयके पुरातत्व विभागके अध्यक्ष हालेमे प्राप्त एगो मुद्राके वर्णन एक योगीके रूपके कह हथिन । [http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm अपूर्व वस्तुके खोज खण्डहरमे निहित खजाना दने सङ्केत कर है । ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm|date=15 फरवरी 2010}} * गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जेकि अन्य सीलमे से एक है, के बारेमे विवाद करित लिख है कि ई रूप एक योग मुद्रामे बैठल व्यक्तिके स्पष्ट न लगै या ई एगो मानव आकृतिके प्रतिनिधित्व करित लग है । फ्लड, पीपी. 28-29 . * पशुपति सीलके बारेमे जियोफ्रे सामुएलके मानल है कि "वास्तवमे हमनीके ई स्पष्ट न है कि ई मूर्ति कोनो नारी या पुरुष केकर व्याख्या कर है".{{cite book|url=http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4|title=The Origins of Yoga and Tantra|last=Samuel|first=Geoffrey|date=2008|publisher=Cambridge University Press|isbn=9780521695343|page=4}}[26]</ref> [[ध्यान]]मे उच्च चैतन्यके प्राप्त करेके रीतिके विकास श्रमानिक परम्परा द्वारा एवं उपनिषद् के परम्परा द्वारा विकसित होलै हल ।<ref>[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.</ref> बुद्धके पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रन्थमे [[ध्यान]]के बारेमे कोनो ठोस सबूत न भेट है । बुद्धके दु शिक्षकके ध्यानके लक्ष्यके प्रति कहल वाक्यके आधार पर वय्न्न ई तर्क कर है कि निर्गुण ध्यानके पद्धति ब्रह्मिन परम्परासे निकललै एहीसे उपनिषद् के [[सृष्टि]]के प्रति कहल कथनमे एवं ध्यानके लक्ष्यला कहल कथनमे समानता है ।<ref>[28] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.</ref> ई सम्भावित होहु सक है, नहियो.<ref>[29] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56.</ref> उपनिषदमे [[ब्रह्माण्ड]] सम्बन्धी बयानके वैश्विक कथनमे कोनो [[ध्यान]]के रीतिके सम्भावनाके प्रति तर्क देइत कहल जा है कि [[नासदीय सूक्त]] कोनो [[ध्यान]]के पद्धति दने [[ऋग्वेद]]से पूर्वो इशारा कर है ।<ref>[30] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51 ।</ref> [[हिन्दु]] ग्रन्थ आउ [[बौद्ध]] ग्रन्थ प्राचीन ग्रन्थमे से एक है जेकरामे ध्यान तकनीकके वर्णन प्राप्त होव है ।<ref>[31] ^ [[रिचर्ड गोम्ब्रिच]], ''थेरवाद बौद्ध धर्म: ए सोशल हिस्ट्री फ्रॉम एन्सिएण्ट बनारस टू माडर्न कोलम्बो ।'' रौतलेड्ग आउ केगन पॉल, 1988, पृष्ठ 44 ।</ref> ओखनी ध्यानके प्रथा आउ अवस्थाके वर्णन कर है जे बुद्धसे पहिले अस्तित्वमे हलै आउ साथे ऊ सब प्रथाके वर्णन कर है जे पहिले बौद्धधर्मके भीतरे विकसित होलै ।<ref>[32] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौटलेड्ज 2007, पृष्ट 50 ।</ref> हिन्दु वाङ्मयमे "योग" शब्द पहिले कथा उपनिषदमे प्रस्तुत होलै जने ज्ञानेन्द्रियके नियन्त्रण आउ मानसिक गतिविधिके निवारणके अर्थमे प्रयुक्त होलै हे जे उच्चतम स्थिति प्रदान करेवाला मानल गेलै हे ।<ref>[33] ^ फ्लड, पी. 95 । विद्वान कथा उपनिषदके पूर्व बौद्धत्वके साथे सूचीबद्ध न करथिन । उदाहरणला हेल्मथ वान ग्लासेनप्प देख सक हथिन, 1950 कार्यवाहीके "अकादेमी देर विस्सेन्स्चाफ्तेँ," लितेरातुर अण्ड से [http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html http://www.accesstoinsight.org/ lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20130204142029/http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html |date=4 फरवरी 2013 }} कुछ लोग कह हथिन कि ई पद बौद्ध है, उदाहरण हाजिम नाकामुरा के ए हिस्ट्री ऑफ एअर्ली वेदान्त फिलोसोफी, फिलोसोफी ईस्ट अण्ड वेस्ट, वोल. 37, अङ्क. 3 (जुलाई 1987) जेकरा अरविन्द शर्मा समीक्षा करलथिन हे, पीपी 325-331 । पाली शब्द "योग" के प्रयोग करेके एक व्यापक जाँचला पूर्व बौद्ध ग्रन्थमे देखथिन, थोमस विलियम र्ह्य्स डेविड, विलियम स्टेड, ''पाली-इङ्ग्लिश शब्दकोष'' मोतीलाल बनारसीदास पुब्ल द्वारा डालथिन, 1993, पृष्ठ 558: [http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&amp;pg=RA1-PA558&amp;dq=yoga+pali+term&amp;lr=#PRA1-PA558,M1 http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&amp;pg=RA1-PA558&amp;dq=yoga+pali+ term&amp;ir = # PRA1 lr-PA558, M1.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150322083352/http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&pg=RA1-PA558&dq=yoga+pali+term&lr=#PRA1-PA558,M1 |date=22 मार्च 2015 }} धम्मपदामे "आध्यात्मिक अभ्यास" के अर्थमे ई शब्दके प्रयोगला देखथिन गिल फ्रोन्स्दल, दी धम्मपदा, शम्भाला, 2005, पृष्ठ 56, 130 देखथिन ।</ref> महत्वपूर्ण ग्रन्थ जे योगके अवधारणासे सम्बन्धित है ऊ मध्यकालीन [[उपनिषद्]], [[महाभारत]], [[भगवद्गीता]] (२०० ईपू) एवं [[पतञ्जलि योगसूत्र]] (४०० ईपू) है । ==योगके प्रसिद्ध ग्रन्थ== ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] 4wvld7qb2o2jc4jso2w7n3d01jd2k4o 80509 80508 2026-09-27T05:18:57Z Pataliputra01 5 /* योगके प्रसिद्ध ग्रन्थ */ 80509 wikitext text/x-wiki {{multiple image | footer = १२मा-१३मा शताब्दीके एगो भारतीय चित्रमे [[योगी]] तथा [[योगिनी]] | image1 = A yogi seated in a garden.jpg | width1 = 140 | alt1 = एगो पुरुष योगी | image2 = Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg | width2=160 | alt2 = दुगो महिला योगिनी }} [[सञ्चिका:Sivakempfort.jpg|thumb|right|200px|[[पद्मासन]] मुद्रामे यौगिक ध्यानस्थ [[शिव]]-मूर्ति]] '''योग''' प्राचीन भारतीय ऋषिमुनि आउ तत्त्ववेत्ता द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है । [[पतञ्जलि]] 'चित्तके वृत्तिके निरोध' के योग कहलथिन हे आउ एकर आठ अङ्ग (अष्टाङ्ग) बतैलथिन हे - [[यम]], [[नियम]], [[आसन]], [[प्राणायाम]], [[प्रत्याहार]], [[धारणा]], [[ध्यान]] आउ [[समाधि]] । [[वेद व्यास|व्यास]] [[समाधि|समाधिए]]के योग मान हथिन । [[योगवासिष्ठ]]के अनुसार योग ऊ युक्ति है जेकरा द्वारा संसार सागरसे पार जाएल जा सक है । योगके ढेर मनी अङ्ग आउ प्रकार होव है जेकरा द्वारा हमनीके [[ध्यान]], [[समाधि]] आउ [[मोक्ष]] तक पहुँचेला होव हैै । 'योग' शब्द आउ एकर प्रक्रिया एवं धारणा [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे [[ध्यान]] प्रक्रियासे सम्बन्धित है । योग शब्द भारतसे बौद्ध पन्थके साथे [[चीन]], [[जापान]], [[तिब्बत]], [[दक्षिणपूर्व एशिया]] आउ [[श्रीलङ्का|श्रीलङ्को]]मे फैल गेलै हे आउ ई समय सब सभ्य जगत्‌ मे लोग एकरासे परिचित हथिन । सिद्धिके बाद पहिला बेर [[११ दिसम्बर]] [[२०१४]] के [[संयुक्त राष्ट्रसंघ|संयुक्त राष्ट्र महासभा]] प्रत्येक वर्ष [[२१ जून]]के [[विश्व योग दिवस]]के रूपमे मान्यता देलकै हे । [[हिन्दुधर्म]], [[जैनधर्म]] आउ [[बौद्धधर्म]]मे योगके अनेक सम्प्रदाय है । योगके विभिन्न लक्ष्य है आउ योगके अलगे-अलगे व्यवहार है ।<ref>Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68.</ref><ref> Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2.</ref><ref> तत्त्वार्थसूत्र [६.१], देखथिन मनु दोषी (२००७) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102</ref> परम्परागत योग आउ एकर आधुनिक रूप विश्वभरमे प्रसिद्ध है । सबसे पहिले 'योग' शब्दके उल्लेख [[ऋग्वेद]]मे भेट है । एकर बाद अनेक [[उपनिषद]]मे एकर उल्लेख ऐलै हे । [[कठोपनिषद]]मे सबसे पहिले योग शब्द ओही अर्थमे प्रयुक्त होव है जे अर्थमे एकरा आधुनिक समयमे समझल जा है । मानल जा है कि कठोपनिषदके रचना ईसापूर्व पच्चीसमा आउ तीसरा शताब्दी ईसापूर्वके बीचके कालखण्डमे होइलै हल । [[पतञ्जलि]]के [[योगसूत्र]] योगके सबसे पूर्ण ग्रन्थ है । एकर रचनाकाल ईसाके प्रथम शताब्दी या ओकर आसपास मानल जा है । [[हठ योग]]के ग्रन्थ ९मा से लेके ११मा शताब्दीमे रचल जानल लगलै हल । एकर विकास [[तन्त्र]]से होलै । [[पश्चिमी जगत]]मे "योग" के हठयोगके आधुनिक रूपमे लेल जा है जेकरामे शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य आउ विश्रान्तिके तकनीकके प्रधानता है । ई सब तकनीक मुख्यतः [[आसन]] पर आधारित है जखनिकि परम्परागत योगके केन्द्र बिन्दु [[ध्यान]] है आउ ऊ सांसारिक लगावसे छुटकारा दियावेके प्रयास कर है । पश्चिमी जगतमे आधुनिक योगके प्रचार-प्रसार भारतसे ऊ सब देशमे गेल गुरु कैलथिन जे प्रायः [[स्वामी विवेकानन्द]]के पश्चिमी जगतमे प्रसिद्धिके बाद ओहाँ गेलथिन हल । == व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार == '''योग''' शब्द युज् [[धातु (संस्कृतके क्रिया शब्द)|धातु]]मे ‘घञ्’ [[प्रत्यय]] लगावेसे निष्पन्न होव है । [[धातुपाठ]]मे युज्‌ शब्दके तीन अर्थ उपलब्ध होव है - समाधि, संयोग, संयमन । किन्तु योगशात्रके प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातुसे बनल है जेकर व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । [[व्यास]]जी स्पष्ट शब्दमे कहलथिन हे - "योगः समाधिः" । ओइसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ एवं ‘युज संयमने’ धातुओसे निष्पन्न होव है किन्तु तखनि ई स्थितिमे योग शब्दके अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ एवं नियमन होतै । आगे योगमे हमनी देखबै कि आत्मा आउ परमात्माके विषयोमे योग कहल गेलै हे । पाणिनीय [[गणपाठ]]मे तीन 'युज्' धातुके पाठ भेट है - :१) युज् समाधौ – दिवादिगणीय :२) युजिर् योगे – रुधादिगणीय :३) युज् संयमने - चुरादिगणीय '''युज् समाधौ''' – दिवादिगणीय युज् धातुके अर्थ है समाधि । समाधिके प्रकृति प्रत्यय अर्थ है सम्यक् स्थापन । दुसर अर्थमे समाधिके सिद्धिला जुड़ल । '''युजिर् योगे''' – रुधादिगणीय युज् धातुके अर्थ है जुड़ल, जोड़ल, मेल कैल, संयोग कैल अर्थात् ई दुःख रूपी संसारसे वियोग आउ ईश्वरसे संयोगके नाम योग है । भगवद्गीतोमे वर्णन भेट है - ''तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् ।'' (६/२३) ''' युज् संयमने''' – चुरादिगणीय युज् धातुके अर्थ है संयमन अर्थात् मनके संयम अथवा मनके नियमन । मनके संयमित कैले योग है । ई प्रकार योगके अर्थ होलै - "योग साधनाके अपनावित मनके नियन्त्रित करके, संयमित करके, आत्माके परमात्मासे मिलन" । [[परिभाषा]] ऐसन होवेके चाही जे अव्याप्ति आउ अतिव्याप्ति दोषसे मुक्त होवे, योग शब्दके वाच्यार्थके ऐसन लक्षण बता सके जे प्रत्येक प्रसङ्गला उपयुक्त होवे आउ योगके इलावा कोनो अन्य वस्तुला उपयुक्त न होवे । [[भगवद्गीता]] प्रतिष्ठित ग्रन्थ मानल जा है । ओकरामे योग शब्दके ढेर बार प्रयोग होलै हे । कखनियो अकेले आउ कखनियो सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग । वेदोत्तर कालमे [[भक्तियोग]] आउ [[हठयोग]] नामो प्रचलित हो गेलै हे । [[पतञ्जलि]] [[योगदर्शन]]मे 'क्रियायोग' शब्द देखेमे आव है । [[पाशुपत योग]] आउ माहेश्वर योग नियन शब्दोके प्रसङ्ग भेट है । ई सब स्थलमे योग शब्दके जे अर्थ है ऊ एक दोसरसे भिन्न है । [[गीता]]मे [[श्रीकृष्ण]] एक स्थल पर कहलथिन हे ''''योगः कर्मसु कौशलम्'''‌' (कर्ममे कुशलते योग है) । ई वाक्य योगके परिभाषा न है । कुछ विद्वानके ई मत है कि जीवात्मा आउ परमात्माके मिल जाएके योग कहल जा है । ई बातके स्वीकार करेमे ई बड़ आपत्ति खड़ा होव है कि [[बौद्धधर्म|बौद्धमतावलम्बियो]] जे परमात्माके सत्ताके स्वीकार न करथिन, योग शब्दके व्यवहार कर आउ योगके समर्थन कर हथिन । एही बात [[साङ्ख्य|साङ्ख्यवादियो]]ला कहल जा सक है जे ईश्वरके सत्ताके असिद्ध मान हथिन । [[पतञ्जलि]] [[योगसूत्र]]मे जे परिभाषा देलथिन हे 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्तके वृत्तिके निरोधके नाम योग है । ई वाक्यके दु अर्थ हो सक है - चित्तवृत्तिके निरोधके अवस्थाके नाम योग है या ई अवस्थाके लावेके उपायके योग कहल जा है । किन्तु ई परिभाषा पर ढेर विद्वानके आपत्ति है । उनकर कहलाम है जे चित्तवृत्तिके प्रवाहेके नाम चित्त है । पूर्ण निरोधके अर्थ होतै चित्तके अस्तित्वके पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृति आउ संस्कारके निःशेष हो जाएल । यदि ऐसन हो जाए त फिर समाधिसे उठल सम्भव न होतै । काहेकि ऊ अवस्थाके सहाराला कोनो संस्कार बचल न होतै, प्रारब्ध दग्ध हो गेल होतै । निरोध यदि सम्भव होवै त [[श्रीकृष्ण]]के ई वाक्यके का अर्थ होतै ? ''योगस्थः कुरु कर्माणि'', योगमे स्थित होके कर्म करथिन । विरुद्धावस्थामे कर्म हो न सकै आउ ऊ अवस्थामे कोनो संस्कार न पड़ सकै, स्मृति न बन सकै, जे समाधिसे उठेके बाद कर्म करेमे सहायक होवे । संक्षेपमे आशय ई है कि योगके शास्त्रीय स्वरूप, ओकर दार्शनिक आधार, के सम्यक्‌ रूपसे बुझल बड़ी सरल न है । संसारके मिथ्या मानेवाला [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवादियो]] निदिध्याह्नके नामसे ओकर समर्थन कर है । अनीश्वरवादी साङ्ख्य विद्वानो ओकर अनुमोदन कर हथिन । [[बौद्धधर्म|बौद्धे]] न, [[इस्लाम|मुसलमान]] [[सूफी]] आउ [[ईसाई]] मिस्टिको कोनो न कोनो प्रकार अपन सम्प्रदायके मान्यता आउ दार्शनिक सिद्धान्तके साथे ओकर सामञ्जस्य स्थापित कर ले हथिन । ई सब विभिन्न दार्शनिक विचारधारामे कौन प्रकार ऐसन समन्वय हो सक है कि ऐसन धरातल मिल सके जेकरा पर योगके भित्ति खड़ा कैल जा सके, ई बड़ रोचक प्रश्न है किन्तु एकर विवेचनला बड़ी समय चाही । एहाँ ऊ प्रक्रिया पर तनीसुन विचार कर लेल आवश्यक है जेकर रूपरेखा हमनीके [[पतञ्जलि]]के सूत्रमे भेट है । तनीमनी शब्दभेदसे ई प्रक्रिया ऊ सब समुदायके मान्य है जे योगके अभ्यासके समर्थन कर हथिन । ===परिभाषा=== *(१) [[योगसूत्र|पातञ्जल योग दर्शन]]के अनुसार - '''योगश्चित्तवृतिनिरोधः''' (१/२) अर्थात् चित्तके वृत्तिके निरोधे योग है । *(२) [[साङ्ख्य दर्शन]]के अनुसार - '''पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते ।''' अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिके पार्थक्यके स्थापित करके पुरुषके स्वरूपमे अवस्थित होइले योग है । *(३) [[विष्णुपुराण]]के अनुसार - '''योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने''' अर्थात् जीवात्मा एवं परमात्माके पूर्णतया मिलने योग है । *(४) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते''' (२/४८) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत आउ उष्ण आदि द्वन्दमे सर्वत्र समभाव रखल योग है । *(५) [[भगवद्गीता]]के अनुसार - '''तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्''' अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न होवे एहीसे निष्काम भावनासे अनुप्रेरित होके कर्त्तव्य करेके कौशल योग है । *(६) [[आचार्य हरिभद्र]]के अनुसार - '''मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो''' अर्थात् [[मोक्ष]]से जोड़ेवाला सब व्यवहार योग है । *(७) [[बौद्धधर्म]]के अनुसार - '''कुशल चितैकग्गता योगः''' अर्थात् कुशल चित्तके एकाग्रता योग है । भारतीय दार्शनिक आउ धार्मिक परम्परामे "योग" शब्दके अलगे-अलगे विधिसे परिभाषित कैल गेलै हे । {| class="wikitable" |- ! मूल ग्रन्थ !! अनुमानित रचना-काल !! योगके परिभाषा |- |''[[मैत्रायणी उपनिषद]]'' | लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व | ''कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च ।'' <br>''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 <br>अर्थात् प्राण, मन एवं इन्द्रियके एक हो जाएल, एकाग्रावस्थाके प्राप्त कर लेल, बाह्म विषयसे विमुख होके इन्द्रियके मनमे आउ मन आत्मामे लग जाएल, प्राणके निष्चल हो जाएल योग है । |- | [[वैशेषिक सूत्र]] | लगभग चौथा शताब्दी ईसा पूर्व | ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः ।'' -- वैशेषिक सूत्र ६/२/१६<br> अर्थात् मन आत्मामे स्थिर होवे पर ओकर (मनके) कार्यके अनारम्भ है, ऊ योग है । |- | ''[[कठोपनिषद]]'' | ईसा पूर्वके अन्तिम शताब्दी | ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।''<br>''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥''<br>''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ ।''<br>''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद ६ / १०-११, नचिकेता आउ यमके बीच संवाद<br>जखनि मनके साथे समस्त ज्ञानेन्द्रिय भलीभाँति स्थिर हो जा है आउ बुद्धियोके कोनो चेष्टा न रहै तखनि ई अवस्थाके परमागति कहल जा है । ओही स्थिर इन्द्रिय-धारणाके योग कहल जा है । ऊ अवस्थामे साधक प्रमाद रहित होव है । काहेकि 'योग' एही पदार्थके उद्भव एवं लय (प्रभवाव्ययौ) दुनहीँ है । |- | ''[[भगवद्गीता]]'' | लगभग दोसर शताब्दी ईसा पूर्व | "सफलता आउ असफलता दुनोमे समभाव (एक समान) रहल । ऐसन समते योग कहला है ।" (२.४८) "कर्ममे कुशलते योग है ।" (२.५०) "ई जानथिन कि जेकरा योग कहल जा है, ऊ दुःखके संयोगसे वियोग (दुःखसे मुक्ति) है ।" (६.२३) |- | ''[[पतञ्जलि योगसूत्र]]'' | लगभग प्रारम्भिक शताब्दी ईस्वी | १.२. ''योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'' – "चित्तके वृत्तिके रुक जाएले योग है ।" १.३. तखनि [[पुरुष (साङ्ख्य)|पुरुष]] |- | ''योगभाष्य'' | योगसूत्रके समाने | ''योगः समाधिः'' - "समाधिए योग है," जे [[एकाग्रता]] आउ ''निरुद्ध'' मने विषय-रहित [[समाधि]] (''असम्प्रज्ञात समाधि'') के सन्दर्भित कर है । |- | ''[[योगाचारभूमि-शास्त्र]] (श्रावकभूमि)'', एक [[महायान]] बौद्ध [[योगाचार]] ग्रन्थ | चौथा शताब्दी ईस्वी | | "योग चार प्रकारके है - श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता आउ उपाय ।" (२.१५२) |- | [[पाशुपत सूत्र]] पर कौण्डिन्यके ''पञ्चार्थभाष्य'' | चौथा शताब्दी ईस्वी | "ई प्रणालीमे जीवात्मा आउ ईश्वर (प्रभु) के मिलने योग है ।" (१.१.४३) |- | [[हरिभद्र सूरी]] द्वारा रचित एक [[जैन ग्रन्थ]] | छठा शताब्दी ईस्वी | "दृढ़ विश्वासके साथे योगीके स्वामि हमनीके सिद्धान्तमे योगके सम्यक् ज्ञानसे शुरू होवेवाला तीनो [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन आउ सम्यक् चारित्र] के संयोग (''सम्बन्धः'') के रूपमे परिभाषित कैलन हे काहेकि [एकरासे] [[मोक्ष]]के साथे जुड़ाव होव है.... सामान्य बोलचालमे ई [योग] शब्द एकर कारणके साथे [आत्माके] सम्पर्कोके दर्शाव है काहेकि कार्यला कारणके उपयोग सामान्य है ।" (२, ४) |- | ''[[लिङ्ग पुराण]]'' | ७मा–१०मा शताब्दी ईस्वी | " 'योग' शब्दसे तात्पर्य [[निर्वाण]]से है जे [[शिव]]के स्थिति है ।" (१.८.५ए) |- | [[आदि शङ्कराचार्य]]के ''[[ब्रह्मसूत्र]]-भाष्य'' | लगभग ८मा शताब्दी ईस्वी | "योगके ग्रन्थमे कहल गेलै है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) के जानेके साधन है' (''अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः'')" (२.१.३) |- | ''मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'', अद्वैत [[कश्मीर शैव दर्शन]]के प्राथमिक ग्रन्थमे से एक | ६ठा–१०मष शताब्दी ईस्वी | "एक सत्ताके दोसर सत्ताके साथ एक हो जाएल योग कहल जा है ।" (४.४-८) |- | [[शैव सिद्धान्त]]के विद्वान नारायणकण्ठके ''मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति'' | ६ठा–१०मा शताब्दी ईस्वी | "आत्म-नियन्त्रण (स्वामित्व) प्राप्त कैले योगी होएल है । योगी शब्दके अर्थ है 'ऊ जे अनिवार्य रूपसे अपन स्वरूपके अभिव्यक्ति... शिव-त्व (''शिवत्वम्'') से संयुक्त' होवे ।" |- | लक्ष्मणदेशिकेन्द्रके ''शारदातिलक'', एक [[शाक्त धर्म]] | ११मा शताब्दी ईस्वी | "योगके विशेषज्ञ कह हथ जीवात्माके [[आत्मा]] |- | ''[[योगबीज]]'', एक [[हठयोग]] ग्रन्थ | १४मा शताब्दी ईस्वी | "[[अपान]] आउ प्राण, अपन स्वयं के [[रज]] आउ वीर्य, सूर्य आउ चन्द्रमा, जीवात्मा आउ परमात्माके मिलन आउ एही प्रकार सब द्वन्द्वके मिलन योग कहला है ।" (८९) |} == योगके इतिहास == [[सञ्चिका:Shiva Pashupati.jpg|300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पासे प्राप्त मोहरमे योगमुद्रा]] {{मुख्य|योगके इतिहास}} [[वेद|वैदिक]] [[संहिता]]के अन्तर्गत तपस्वी ''तपस (संस्कृत)'' के बारेमे ([[ब्राह्मण|(कल ब्राह्मण)]]) प्राचीन कालसे वेदमे (१९०० से १५०० ईपू) उल्लेख भेट है जखनिकि तापसिक साधनाके समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणीमे प्राप्त है ।<ref name="Flood, p. 94">[21] ^फ्लड, पी. 94.</ref> ढेर मूर्ती जे सामान्य योग या [[समाधि]] मुद्राके प्रदर्शित कर है [[सिन्धुघाटी सभ्यता]] (३३००-१७०० ईपू) के स्थान पर प्राप्त होलै हे । पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्लके अनुसार "ई सब मूर्ति योगके धार्मिक संस्कार" के योगसे सम्बन्धके सङ्केत कर है ।<ref>[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145</ref> यद्यपि ई बातके निर्णयात्मक सबूत न है तैयो अनेक पण्डितके रायमे सिन्धुघाटी सभ्यता आउ योग-[[ध्यान]]मे सम्बन्ध है ।<ref>देखथिन: * [[योनातान मार्क केनोयेर|जोनाथन मार्क केनोयेरएक]] मूर्तीके "योग मुद्रामे बैठल" ऐसन वर्णन कर है । [http://www.harappa.com/indus/33.html जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखब, "अरौण्ड द इण्डस इन ९० स्लाइड्स". ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html|date=23 मार्च 2009}} * केरल वेर्नर लिख है " पुरातात्विक खोज हमनीके अनुमान करेके समर्थन कर है कि आर्य [[भारत]]के पूर्वके लोग योगशास्त्रके क्रियासे परिचित हलन". {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103|title=Yoga and Indian Philosophy|last=Werner|first=Karel|date=1998|publisher=Motilal Banarsidass Publ.|isbn=9788120816091|page=103}}[23] * [[हेन्रीच जिम्मर]] एक मुद्रामे "योगमुद्रा" के वर्णन कर है । {{cite book|url=https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm|title=Myths and Symbols in Indian Art and Civilization|last=Zimmer|first=Heinrich|publisher=Princeton University Press, New Ed edition|year=1972|ISBN=978-0691017785|page=[https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm/page/n182 168]}} * [[थोमस म्क्विल्ले]] लिख हथिन कि "ई छौ रहस्यमय सिन्धुघाटी मुद्राके छविमे जे उत्कीर्ण मूर्ति है ओकरामे हठयोगके ''मूलबन्धासन '' नामके आसन या ओकरासे मिलित जुलित ''उत्कटासन '' या ''बद्धा कोनासना '' प्रदर्शित है । {{cite book|url=http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219|title=The shape of ancient thought|last=McEvilley|first=Thomas|date=2002|publisher=Allworth Communications|isbn=9781581152036|pages=219-220}} * डॉ॰ फरजन्द मसीह, पञ्जाब विश्वविद्यालयके पुरातत्व विभागके अध्यक्ष हालेमे प्राप्त एगो मुद्राके वर्णन एक योगीके रूपके कह हथिन । [http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm अपूर्व वस्तुके खोज खण्डहरमे निहित खजाना दने सङ्केत कर है । ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm|date=15 फरवरी 2010}} * गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जेकि अन्य सीलमे से एक है, के बारेमे विवाद करित लिख है कि ई रूप एक योग मुद्रामे बैठल व्यक्तिके स्पष्ट न लगै या ई एगो मानव आकृतिके प्रतिनिधित्व करित लग है । फ्लड, पीपी. 28-29 . * पशुपति सीलके बारेमे जियोफ्रे सामुएलके मानल है कि "वास्तवमे हमनीके ई स्पष्ट न है कि ई मूर्ति कोनो नारी या पुरुष केकर व्याख्या कर है".{{cite book|url=http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4|title=The Origins of Yoga and Tantra|last=Samuel|first=Geoffrey|date=2008|publisher=Cambridge University Press|isbn=9780521695343|page=4}}[26]</ref> [[ध्यान]]मे उच्च चैतन्यके प्राप्त करेके रीतिके विकास श्रमानिक परम्परा द्वारा एवं उपनिषद् के परम्परा द्वारा विकसित होलै हल ।<ref>[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.</ref> बुद्धके पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रन्थमे [[ध्यान]]के बारेमे कोनो ठोस सबूत न भेट है । बुद्धके दु शिक्षकके ध्यानके लक्ष्यके प्रति कहल वाक्यके आधार पर वय्न्न ई तर्क कर है कि निर्गुण ध्यानके पद्धति ब्रह्मिन परम्परासे निकललै एहीसे उपनिषद् के [[सृष्टि]]के प्रति कहल कथनमे एवं ध्यानके लक्ष्यला कहल कथनमे समानता है ।<ref>[28] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.</ref> ई सम्भावित होहु सक है, नहियो.<ref>[29] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56.</ref> उपनिषदमे [[ब्रह्माण्ड]] सम्बन्धी बयानके वैश्विक कथनमे कोनो [[ध्यान]]के रीतिके सम्भावनाके प्रति तर्क देइत कहल जा है कि [[नासदीय सूक्त]] कोनो [[ध्यान]]के पद्धति दने [[ऋग्वेद]]से पूर्वो इशारा कर है ।<ref>[30] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51 ।</ref> [[हिन्दु]] ग्रन्थ आउ [[बौद्ध]] ग्रन्थ प्राचीन ग्रन्थमे से एक है जेकरामे ध्यान तकनीकके वर्णन प्राप्त होव है ।<ref>[31] ^ [[रिचर्ड गोम्ब्रिच]], ''थेरवाद बौद्ध धर्म: ए सोशल हिस्ट्री फ्रॉम एन्सिएण्ट बनारस टू माडर्न कोलम्बो ।'' रौतलेड्ग आउ केगन पॉल, 1988, पृष्ठ 44 ।</ref> ओखनी ध्यानके प्रथा आउ अवस्थाके वर्णन कर है जे बुद्धसे पहिले अस्तित्वमे हलै आउ साथे ऊ सब प्रथाके वर्णन कर है जे पहिले बौद्धधर्मके भीतरे विकसित होलै ।<ref>[32] ^ अलेक्जेण्डर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ बुद्धिस्ट मेडिटेशन । रौटलेड्ज 2007, पृष्ट 50 ।</ref> हिन्दु वाङ्मयमे "योग" शब्द पहिले कथा उपनिषदमे प्रस्तुत होलै जने ज्ञानेन्द्रियके नियन्त्रण आउ मानसिक गतिविधिके निवारणके अर्थमे प्रयुक्त होलै हे जे उच्चतम स्थिति प्रदान करेवाला मानल गेलै हे ।<ref>[33] ^ फ्लड, पी. 95 । विद्वान कथा उपनिषदके पूर्व बौद्धत्वके साथे सूचीबद्ध न करथिन । उदाहरणला हेल्मथ वान ग्लासेनप्प देख सक हथिन, 1950 कार्यवाहीके "अकादेमी देर विस्सेन्स्चाफ्तेँ," लितेरातुर अण्ड से [http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html http://www.accesstoinsight.org/ lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20130204142029/http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html |date=4 फरवरी 2013 }} कुछ लोग कह हथिन कि ई पद बौद्ध है, उदाहरण हाजिम नाकामुरा के ए हिस्ट्री ऑफ एअर्ली वेदान्त फिलोसोफी, फिलोसोफी ईस्ट अण्ड वेस्ट, वोल. 37, अङ्क. 3 (जुलाई 1987) जेकरा अरविन्द शर्मा समीक्षा करलथिन हे, पीपी 325-331 । पाली शब्द "योग" के प्रयोग करेके एक व्यापक जाँचला पूर्व बौद्ध ग्रन्थमे देखथिन, थोमस विलियम र्ह्य्स डेविड, विलियम स्टेड, ''पाली-इङ्ग्लिश शब्दकोष'' मोतीलाल बनारसीदास पुब्ल द्वारा डालथिन, 1993, पृष्ठ 558: [http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&amp;pg=RA1-PA558&amp;dq=yoga+pali+term&amp;lr=#PRA1-PA558,M1 http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&amp;pg=RA1-PA558&amp;dq=yoga+pali+ term&amp;ir = # PRA1 lr-PA558, M1.] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150322083352/http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&pg=RA1-PA558&dq=yoga+pali+term&lr=#PRA1-PA558,M1 |date=22 मार्च 2015 }} धम्मपदामे "आध्यात्मिक अभ्यास" के अर्थमे ई शब्दके प्रयोगला देखथिन गिल फ्रोन्स्दल, दी धम्मपदा, शम्भाला, 2005, पृष्ठ 56, 130 देखथिन ।</ref> महत्वपूर्ण ग्रन्थ जे योगके अवधारणासे सम्बन्धित है ऊ मध्यकालीन [[उपनिषद्]], [[महाभारत]], [[भगवद्गीता]] (२०० ईपू) एवं [[पतञ्जलि योगसूत्र]] (४०० ईपू) है । ==योगके प्रसिद्ध ग्रन्थ== {| class="wikitable" |- ! ग्रन्थ !! रचयिता !! रचनाकाल/टिप्पणी |- | '''[[पतञ्जलि योगसूत्र|योगसूत्र]]''' || [[पतञ्जलि]] || ४०० ई पूर्व |- | '''[[योगभाष्य]]''' || [[वेदव्यास]] || द्वितीय शताब्दी |- | '''[[तत्त्ववैशारदी]]''' || [[वाचस्पति मिश्र]] || ८४१ ई |- |'''[[योगयाज्ञवल्क्य]]''' || [[याज्ञवल्क्य]] || सबसे पुरान संस्कृत पाण्डुलिपि ९मा-१०मष शताब्दीके है । |- | '''[[भोजवृत्ति]]''' || [[राजा भोज]] || ११मा शताब्दी |- | '''[[गोरक्षशतक]]''' || [[गुरु गोरख नाथ]] || ११मा-१२मा शताब्दी |- | '''[[योगचूडामण्युपनिषद]]''' || - || १४मा-१५मा शताब्दी (रिचर्ड रोसेन के अनुसार) |- | '''[[योगवार्तिक]]''' || [[विज्ञानभिक्षु]] || १६मा शताब्दी |- | '''[[योगसारसङ्ग्रह]]''' || विज्ञानभिक्षु || १६मा शताब्दी |- | '''[[हठयोगप्रदीपिका]]''' || [[स्वात्माराम|स्वामी स्वात्माराम]] || १५मा-१६मा शताब्दी |- | '''[[सूत्रवृत्ति]]''' || गणेशभावा || १७मा शताब्दी |- | '''[[योगसूत्रवृत्ति]]''' || [[नागेश भट्ट]]<ref>[https://kymyogavaisharadi.org/display/bhashya/vritti/devanagari नागोजीभट्ट कृत वृत्ति]</ref> || १७मा शताब्दी |- | '''[[शिवसंहिता]]''' || ऋषी आर्यवीर रुद्र || २५०० ई पूर्व |- | '''[[घेरण्डसंहिता]]''' || [[घेरण्ड मुनि]]|| १५०० ई पूर्व |- | '''[[हठरत्नावली]] || श्रीनिवास भट्ट || १७मा शताब्दी |- | '''[[मणिप्रभा]]''' || रामानन्द यति|| १८मा शताब्दी |- | '''[[सूत्रार्थप्रबोधिनी]]''' || नारायण तीर्थ || १८मा शताब्दी |- | '''[[जोगप्रदीपिका]]''' || जयतराम || १७३७ ई <br> ई हिन्दी, ब्रजभाषा, खड़ीबोलीके मिललजुलल भाषामे रचित है<br> आउ शब्दावली संस्कृतके अत्यन्त निकट है । |- | '''सचित्र योगसाधन''' || शिवमुनि || २०मा शताब्दी ; हिन्दीमे लिखित<ref>{{Cite web |url=https://www.shivmunisamaj.com/list-of-books-by-shivmuni |title=शिवमुनि महाराज का अमर साहित्य |access-date=31 दिसम्बर 2022 |archive-date=31 दिसम्बर 2022 |archive-url=https://web.archive.org/web/20221231051935/https://www.shivmunisamaj.com/list-of-books-by-shivmuni |url-status=dead }}</ref> |- | '''[[योगदर्शनम्]]''' || [[स्वामी सत्यपति परिव्राजक]] || २१मा शताब्दी |} ==एकरो देखथिन== * [[योगके इतिहास]] * [[योग दर्शन]] * [[अष्टाङ्ग योग]] * [[योगसूत्र]] * [[हठयोग]] * [[जैनधर्ममे योग]] * [[अन्तर्राष्ट्रिय योग दिवस]] * [[भारतीय मनोविज्ञान]] - कुछ लोग मान हथिन कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञानके दोसरा नाम है । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची|2}} == बाहरी कड़ी == {{विकिसूक्ति|योग}} * [[wikt:योग_शब्दावली|योग-शब्दावली]] * [https://indianculture2025k.blogspot.com/2020/06/disease-prevention-by-yoga.html योग द्वारा रोग निवारण] * [https://kymyogavaisharadi.org/ योगवैशारदी] (कृणमचार्य योग मन्दिरम् के ई जालस्थल पर योगके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है) *[https://sanskrit.nic.in/syllabus/Prak_Shastri/PS_1_Sem_Yoga.pdf योग सैद्धान्तिक] (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध लागि) *[https://sanskritdocuments.org/sanskrit/yoga/ योग सम्बन्धित ग्रन्थ] (देवनागरीमे) {{योग}} {{भारतीय दर्शन}} [[श्रेणी:हिन्दु दार्शनिक अवधारणा]] [[श्रेणी:योग]] [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:संस्कृत शब्द]] [[श्रेणी:ध्यान]] [[श्रेणी:व्यायाम]] [[श्रेणी:भारतीय खोज]] mator1zx4u5b3hrk0ijcvl528lcnx3d