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कल्पनाशक्ती
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<noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}}
{{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''१८'''|}}
{|
|-</noinclude>{{nopt}}
|-
| श्री. कृ. कोल्हटकरकृत मूकनायक. || कोमू
|-
| प्रो. विष्णु भिकाजी कोलतेकृत लव्हाळी. || कोल
|-
| क्षेमेन्द्रकृत दशावतारचरित. || क्षेद
|-
| क्षेमेन्द्रकृत सुवृत्ततिलक. || क्षेसु
|-
| ना. धों. खाण्डेकरकृत कविताकलाप. || खाक
|-
| ना. धों. खाण्डेकरकृत प्राकृत कविता. || खाप्राक
|-
| माजूग पहा || ग
|-
| गङ्गादासप्रणीत छन्दोमञ्जरी. || गछ
|-
| बाबा गर्दे. || गबा
|-
| गाङ्गेय. || गा
|-
| गायकवाड प्राच्यग्रन्थमाला. || गाप्राग्रमा
|-
| गिरीशकृत अभागी कमल. || गिअक
|-
| गिरीशकृत आम्बराअी. || गिआ
|-
| गिरीशकृत काञ्चनगङ्गा. || गिका
|-
| गिरीशकृत फलभार. || गिफ
|-
| जयदेवविप्रणीत गीतगोविन्द. || गीगो
|-
| गोविन्दकवीची कविता. || गोक
|-
| गोदातटींचा गुञ्जारव. || गोगु
|-
| गोविन्दराव टेम्बे. || गोटे
|-
| गोपीनाथ तळवळकर. || गोत
|-
| गोखले दत्तात्रय लक्ष्मण. || गोदल
|-
| गोपीनाथ तळवळकरकृत दूर्वाङ्कर. || गोदू
|-
| गोरे पाण्डुरङ्ग श्रावण. || गोपाश्रा
|-
| पा. श्रा. गोरेकृत बोबडे बोल. || गोबो
|-
| विठ्ठलराव घाटे. || घा
|-
| त्र्यं. गं. घारपुरेकृत लीलेचा संसार. || घाली
|-
| राजकवि चन्द्रशेखरकृत चन्द्रिका. || च
|-
| चतुर्विजयकृत वर्धमानषट्त्रिंशिका. || चव
|-
| काचा पहा || चारा<noinclude>{{nopt}}
|}</noinclude>
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कल्पनाशक्ती
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}}
{{rh||'''१९'''|<u>'''सङ्क्षेप'''</u>}}
{|
|-</noinclude>{{nopt}}
|-
| कृष्णशास्त्री चिपळूणकरकृत पद्यरत्नावली. || चिप
|-
| जगन्नाथप्रसादकृत छन्दःप्रभाकर. || छ्प्र
|-
| जगद्धरकृत स्तुतिकुसुमाञ्जलि. || जस्तु
|-
| जोशी अनन्त हरि. || जोअह
|-
| गजानन गोपाळ जोशीकृत पद्यपुष्पहार. || जोप
|-
| सीताराम बाळकृष्ण जोशीकृत वनमाला. || जोव
|-
| जोगळेकर सदाशिव विष्णु. || जोसवि
|-
| जोशी सीताराम बाळकृष्ण. || जोसीबा
|-
| जोअिन्दुकृत योगसार. || जोयो
|-
| ज्योत्स्ना || ज्यो
|-
| नारायण वामन टिळक यांची कविता. || टिक
|-
| टिळक वि. सि. || टीविसी
|-
| आनन्दराव टेकाडे. || टे
|-
| टेकाडेकृत आनन्द गीत. || टेआ
|-
| गजानन लक्ष्मण ठोकळ. || ठो
|-
| डिम्भ (कृष्णमुनि) कृत रुक्मिणीस्वयंवर. || डिरूस्व
|-
| तडफ || त
|-
| तण्डालं रामचन्द्ररावकृत सुदामभाग्योदयचरित. || तरासु
|-
| भास्कर रामचन्द्र ताम्बे यांची समग्र कविता. || तासक
|-
| दत्तांची कविता. || दक
|-
| दशवैकालिक सूत्र. || दवै
|-
| दडकर सुमतिबाओ. || दसु
|-
| रघुनाथपण्डिताचें दमयन्तीस्वयंवर. || दस्व
|-
| दाते शङ्कर गणेश सम्पादित मणिमाळ. || दाम
|-
| दाते शङ्कर गणेश सम्पादित लोककथा. || दालो
|-
| सौ. अपर्णा देशपाण्डे. || देअ
|-
| देवनाथकृत कवितासङ्ग्रह. || देक
|-
| सौ. कुसुमावती देशपाण्डे. || देकु
|-
| देवलकृत झुञ्जारराव. || देझु<noinclude>{{nopt}}
|}</noinclude>
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कल्पनाशक्ती
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}}
{{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''२०'''|}}
{|
|-</noinclude>{{nopt}}
|-
| गुणवन्त हनमन्त देशपाण्डे. || देगुह
|-
| ना. घ. देशपाण्डे || देनाघ
|-
| देशपाण्डे यांची निर्माल्यमाला. || देनिमा
|-
| पुरुषोत्तम यशवन्त देशपाण्डे. || देपुय
|-
| देवलकृत मृच्छकटिक. || देमृ
|-
| वामन नारायण देशपाण्डे. || देवाना
|-
| देवलकृत विक्रमोर्वशीय. || देविक्र
|-
| सौ. विमलाबाअी देशपाण्डे. || देवि
|-
| देवलकृत शारदा. || देशा
|-
| देवलकृत शापसम्भ्रम. || देशाप
|-
| देवलकृत संशयकल्लोळ. || देस
|-
| द्रोणपर्व. || द्रोप
|-
| नरहरिकृत गङ्गारत्नमाला. || नग
|-
| नवजीवन मासिक. || नजीमा
|-
| कान पहा. || नदी
|-
| नयचन्द्रसूरिप्रणीत हम्मीरमहाकाव्य. || नह
|-
| नागवर्मकृत छन्दोम्बुधि || नाग
|-
| देनाघ पहा || नाघदे
|-
| के. नारखेडेकृत चन्द्रकला || नाच
|-
| के. नारखेडेकृत बालगीतमाला || नाबा
|-
| सौ. नावलेकरकृत भाव कुसुमाञ्जलि || नाभा
|-
| सौ. मनोरमाबाअी नावलेकर || नाम
|-
| नागेशकृत वन्यपुष्पें. || नाव
|-
| निरञ्जन माधवाची कविता. || निक
|-
| निरञ्जनमाधवकृत चिद्बोधरामायण || निचि
|-
| निशिगन्धकृत ज्योत्स्नागीत. || निज्यो
|-
| निशिगन्धकृत निशागीत. || निनि
|-
| निरञ्जनमाधवकृत सद्वृत्तमुक्तावली. || निस, निमास
|-
| श्री. पण्डितकृत चवथीचा चान्द || पचचा<noinclude>{{nopt}}
|}</noinclude>
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कल्पनाशक्ती
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}}
{{rh||'''२१'''|<u>'''सङ्क्षेप'''</u>}}
{|
|-</noinclude>{{nopt}}
|-
| पद्मदल. || पद
|-
| कु. पद्मा पटवर्धन. || पप
|-
| पदसङ्ग्रह ( निर्णयसागर ). || पस
|-
| भवानीशङ्कर पण्डितकृत पिचलेला पावा. || पपि
|-
| परमात्मप्रकाश जोअिन्दुकृत. || पप्र
|-
| श्रीधर सखाराम पण्डितकृत स्वैरालाप. || पस्वै
|-
| पार्थिव (हरि काशिनाथ कुळकर्णी). || पा
|-
| वा. भा. पाठककृत आशागीत. || पाआ
|-
| पाण्डुरङ्गकविकृत गयगन्धर्वाख्यान. || पाग
|-
| पाटणकर परशुराम नारायण. || पापना
|-
| पारिजात मासिक. || पामा
|-
| भा. दा. पाळदे यांची रत्नमाला. || पार
|-
| गणेश हरि पाटिलकृत रानजाअी || पारा
|-
| पारिजात || पारि
|-
| पालेकर सौ. शान्ताबाअी. || पाशा
|-
| पाण्डुरङ्ग कविकृत स्थालीपाककथा. || पास्था
|-
| पिङ्गलविरचित छन्दःशास्त्र. || पि
|-
| पिम्पळपान || पिपा
|-
| पुष्पदन्तविरचित णायकुमारचरिअु || पुणा
|-
| पूज्यपादकृत नन्दीश्वरभक्ति. || पून
|-
| पूज्यपादकृत योगिभक्ति. || पूयो
|-
| अुपो पहा. || पोप
|-
| शे. पोहनेरकरकृत बागशाही. || पोबा
|-
| प्रभाकर याची कविता. || प्रक
|-
| प्रफुलपद्माकर ( द. बा. पद्माकरकृत ) || प्रप
|-
| कुन्दकुन्दाचार्यकृत प्राकृत गुरुभक्ति. || प्रागुभ
|-
| प्राकृत पैङ्गलम्. || प्रापै
|-
| फटत्कार || फ
|-
| फर्ग्युसन कॉलेज त्रैमासिक. || फत्रै<noinclude>{{nopt}}
|}</noinclude>
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कल्पनाशक्ती
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}}
{{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''२२'''|}}
{|
|-</noinclude>{{nopt}}
|-
| फाटक गणेश कृष्ण. || फागकृ
|-
| बीकृत फुलांची ओञ्जळ. || फुओ
|-
| बल्लवकवि || बक
|-
| बालकवि (ठोम्बरे) यांची कविता. || बाक
|-
| बालबोधमेवा मासिक. || बाबोमा
|-
| बापट सारजाबाअी. || बासा
|-
| बृहत्स्तोत्ररत्नाकर || बृस्तो
|-
| बेडेकर श्रीराम गोविन्द. || बेश्रीगो
|-
| श्री. रा. बोबडे. || बो
|-
| बा. भ. बोरकरकृत प्रतिभा. || बोप्र
|-
| भरतप्रणीत नाट्यशास्त्र. || भ
|-
| भट्टिकाव्यम् || भका
|-
| भगवद्गीता || भगी
|-
| भवभूतिप्रणीत मालतीमाधव. || भमा
|-
| भक्तिमार्गप्रदिप || भमाप्र
|-
| भासकृत अभिषेक. || भाअ
|-
| भासकृत अविमारक. || भाअवि
|-
| भासकृत कर्णभार. || भाक
|-
| भागवतम् || भाग
|-
| भालचन्द्र दत्त. || भाद
|-
| भासकृत प्रतिभा. || भाप्र
|-
| भावलेखा || भाले
|-
| भासकृत स्वप्नावासवदत्ता. || भास्व
|-
| वि. वा. भिडेकृत अलङ्कारनिरूपण. || भिअनि
|-
| वि. वा. भिडे जीवजागृति. || भिजी
|-
| भिक्षुकविकृत द्रौपदीवस्त्रहरण. || भिद्रौ
|-
| वि. वा. भिडेकृत मन्दारमञ्जरी अि० || भिम
|-
| भिडेकृत राघवीय परीवाह ( राम ). || भिरा
|-
| मञ्जुबाळ || म<noinclude>{{nopt}}
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कल्पनाशक्ती
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{{center|{{xxxx-larger|'''लक्षदीप'''}}}}
{{center|{{x-larger|'''निवडक लक्ष्मीकांत देशमुख'''}}}}
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[[File:दिलीपराज प्रकाशन TM.jpg|borderless|center|दिलीपराज प्रकाशन TM]]
{{center|दिलीपराज प्रकाशनाची सर्व पुस्तके आता आपण Online खरेदी करू शकता.<br>आमच्या Website ला कृपया एकदा अवश्य भेट द्या. अथवा Email करा.<br>
www.diliprajprakashan.in<br>Email - diliprajprakashan@yahoo.in}}
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{{center|{{xxxx-larger|'''लक्षदीप'''}}}}
{{center|{{xx-larger|'''निवडक लक्ष्मीकांत देशमुख'''}}}}
<Br><Br><br><br><br>
{{x-larger|{{center|'''संपादक : डॉ. रणधीर शिंदे'''}}}}
<Br><Br><br><br><br>
[[File:दिलीपराज प्रकाशन TM.jpg|center|borderless|दिलीपराज प्रकाशन TM]]
{{center|{{x-larger|'''दिलीपराज प्रकाशन प्रा. लि.'''}}}}
{{center|'''२५१ क, शनिवार पेठ, पुणे -४११०३०'''}}{{nop}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>{{center|'''लक्षदीप / LAKSHADEEP'''<br>(निवडक लक्ष्मीकांत देशमुख)<br>संपादक : डॉ. रणधीर शिंदे}}{{rule}}
♦{{gap}}प्रकाशक<br>{{gap}} राजीव दत्तात्रय बर्वे,<br>{{gap}} मॅनेजिंग डायरेक्टर,<br>{{gap}} दिलीपराज प्रकाशन प्रा. लि.,<br>{{gap}} २५१ क, शनिवार पेठ, पुणे - ४११ ०३०.<br>{{gap}} दूरध्वनी क्रमांक (फॅक्ससहित)<br>{{gap}} २४४७१७२३ । २४४८३९९५ । २४४९५३१४<br>©{{gap}}'''लक्ष्मीकांत देशमुख'''<br>♦{{gap}}'''प्रथमावृत्ती - १४ फेब्रुवारी २०१५'''<br>♦{{gap}}'''प्रकाशन क्रमांक - २२०४'''<br>♦{{gap}}ISBN : 978 - 93 - 5117 - 042 - 6<br>♦{{gap}}'''मुद्रक'''<br>{{gap}} मधुराज प्रिंटर्स ॲण्ड पब्लिकेशन्स् प्रा. लि.<br>{{gap}} स. नं. २९/८-९, पारी कंपनीजवळ, धायरी, पुणे - ४११ ०४१<br>♦{{gap}}'''टाईपसेटिंग'''<br>{{gap}} का. वि. शिगवण,<br>{{gap}} अक्षरवेल<br>{{gap}} दत्तवाडी, पुणे ४११ ०३०<br>♦{{gap}}'''मुद्रित शोधन :''' एस. एम. जोशी<br>♦{{gap}}'''मुखपृष्ठ :''' सुहास चांडक<br>♦{{gap}}'''मूल्य -''' <s>र</s> पाचशे मात्र{{rule}}
या पुस्तकातील कोणताही मजकूर, कोणत्याही स्वरूपात वा माध्यमात पुनःप्रकाशित अथवा संग्रहित करण्यासाठी लेखक व प्रकाशकाची लेखी पूर्वपरवानगी घेणे बंधनकारक आहे.{{nop}}<noinclude></noinclude>
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कल्पनाशक्ती
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Komal Sambhudas" /></noinclude>सामाजिक नियमनात स्त्री अंतिमत: बळी पडते.तिच्या शारीर व मानसिक बळी पडण्याचे संवेदन या कादंबरीत आहे.अन्वर बरोबर अनिच्छेनेच सलोमीला लग्न करावे लागते.त्याच्याकडून तिचा छळ होतो आणि तिला तलाकही दिला जातो.पुढे ती काही स्त्रियांच्यासाठी जागृतीचे काम करते.परंतु पुढे तिचा अरब राष्ट्रातील एक वृद्धाशी निका लावला जातो.मुस्लीम कुटुंबातील स्त्रीच्या केविलवाण्या जगाची कैफियत या कादंबरीत आहे.समकालीन जीवनातील रझिया पटेल यांच्या सिनेमाबंदी चळवळीची पार्श्वभूमी या कादंबरीत आहे.सलोनीचे हे आत्मनिवेदन आहे.पत्रात्मक तंत्राचा वापर या कादंबरीत आहे.मुस्लीम जीवनाचा,संस्कृतीचा व भाषेचा चांगला वापर या कादंबरीत आहे.<br>
{{gap}}'दौलत' या कादंबरीत महाराष्ट्रातील दलित तरुण व मारिया या निग्रो तरुणीच्या प्रेमकहाणीचे चित्रण आहे.मात्र या प्रेमकहाणीस वर्णभेदाची व रंगभेदाची पार्श्वभूमी आहे.पत्रशैलीचा प्रभावे या कादंबरीवर आहे.माणूसपण नाकारणाच्या भारतातील जातवास्तवाची पार्श्वभूमी या चित्रणास आहे.मारिया ही समाजशास्त्राच्या संशोधनासाठी भारतात सहा महिन्यासाठी आलेली आहे.या काळात तिची दलित चळवळीतील अभ्यासू कार्यकर्ता दौलत कांबळेशी ओळख होते व ओळखीचे रूपांतर प्रेमात होते.दौलतच्या मनात अंतर्द्वद्व आहे.तिच्यासोबत जाण्याचा निर्णय काय घ्यावा याबद्दलचा.एका बाजूला वडिलांनी समाजासाठी काम करण्याचा दिलेला सल्ला,आपला अभावग्रस्त समाज आणि दुस-या बाजूला प्रेम याच्या काचात तो अडकलेला आहे.जातमुक्तसमाजाच्या तो प्रतिक्षेत आहे.पत्रसंवादात दोन देशातील सामाजिक विषमतेचे सूत्र ते ऐकमेकांना सांगतात.दौलत भारतातील गुंतागुंतीच्या तीव्र दुख-या जातवास्तवाची माहिती तिला देतो.मनातील या जाणिवेमुळे तो प्रेमाचा त्याग करतो आणि भारतातच बाबासाहेबांच्या तिस-या पिढीचा कार्यकर्ता म्हणून राहण्याचा तो निर्णय घेतो,‘छोड़ दे सारी दुनिया किसी की लिए। ये मुनासिब नही आदमी के लिए प्यार से भी जरुरी कई काम है। प्यार सबकुछ नही आदमी के लिए। हे गाणं तो ऐकतो आणि त्यांच्या मनातील द्वंद्वाला नवी दिशा मिळते. समाजबदलासाठी आणि जातमुक्तीसाठी तो इथेच राहण्याचा निर्णय घेतो.<br>
{{gap}}देशमुख यांना प्रेमापेक्षा देश व समाजकार्य महत्त्वाचे वाटते,या विचारसूत्राचा आविष्कार करणारी ही कादंबरी आहे.ती एकरेषीय स्वरूपाची आहे.दोन व्यक्तींच्या परस्परसंबंधातून ती उलगडते.जातीय वास्तवाचे तीव्र स्वरूपाचे ताण तीमध्ये नाहीत.पृष्ठस्तरावरच ते राहातात.वाचकाचे लक्ष दौलत आणि मारिया यांच्या प्रेमकथेकडेच वेधून राहातात.कादंबरीत पत्रतंत्राचा व हिंदी गाण्यांचा प्रभावी असा उपयोग केला आहे.<br>
{{gap}}‘हरवलेले दिवस' (२०१४) ही देशमुख यांची वेगळ्या विषयावरची कादंबरी.<noinclude>{{right|'''लक्षदीप । १३'''}}</noinclude>
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JayashreeVI
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>सामाजिक नियमनात स्त्री अंतिमत: बळी पडते.तिच्या शारीर व मानसिक बळी पडण्याचे संवेदन या कादंबरीत आहे. अन्वर बरोबर अनिच्छेनेच सलोमीला लग्न करावे लागते. त्याच्याकडून तिचा छळ होतो आणि तिला तलाकही दिला जातो. पुढे ती काही स्त्रियांच्यासाठी जागृतीचे काम करते. परंतु पुढे तिचा अरब राष्ट्रातील एक वृद्धाशी निका लावला जातो. मुस्लीम कुटुंबातील स्त्रीच्या केविलवाण्या जगाची कैफियत या कादंबरीत आहे. समकालीन जीवनातील रझिया पटेल यांच्या सिनेमाबंदी चळवळीची पार्श्वभूमी या कादंबरीत आहे. सलोनीचे हे आत्मनिवेदन आहे. पत्रात्मक तंत्राचा वापर या कादंबरीत आहे.मुस्लीम जीवनाचा,संस्कृतीचा व भाषेचा चांगला वापर या कादंबरीत आहे.<br>
{{gap}}'दौलत' या कादंबरीत महाराष्ट्रातील दलित तरुण व मारिया या निग्रो तरुणीच्या प्रेमकहाणीचे चित्रण आहे.मात्र या प्रेमकहाणीस वर्णभेदाची व रंगभेदाची पार्श्वभूमी आहे. पत्रशैलीचा प्रभाव या कादंबरीवर आहे. माणूसपण नाकारणा-या भारतातील जातवास्तवाची पार्श्वभूमी या चित्रणास आहे. मारिया ही समाजशास्त्राच्या संशोधनासाठी भारतात सहा महिन्यासाठी आलेली आहे. या काळात तिची दलित चळवळीतील अभ्यासू कार्यकर्ता दौलत कांबळेशी ओळख होते व ओळखीचे रूपांतर प्रेमात होते. दौलतच्या मनात अंतर्द्वंद्व आहे. तिच्यासोबत जाण्याचा निर्णय काय घ्यावा याबद्दलचा. एका बाजूला वडिलांनी समाजासाठी काम करण्याचा दिलेला सल्ला,आपला अभावग्रस्त समाज आणि दुस-या बाजूला प्रेम याच्या काचात तो अडकलेला आहे. जातमुक्तसमाजाच्या तो प्रतिक्षेत आहे. पत्रसंवादात दोन देशातील सामाजिक विषमतेचे सूत्र ते ऐकमेकांना सांगतात. दौलत भारतातील गुंतागुंतीच्या तीव्र दुख-या जातवास्तवाची माहिती तिला देतो. मनातील या जाणिवेमुळे तो प्रेमाचा त्याग करतो आणि भारतातच बाबासाहेबांच्या तिस-या पिढीचा कार्यकर्ता म्हणून राहण्याचा तो निर्णय घेतो. ‘छोड़ दे सारी दुनिया किसी की लिए। ये मुनासिब नही आदमी के लिए। प्यार से भी जरुरी कई काम है। प्यार सबकुछ नही आदमी के लिए। हे गाणं तो ऐकतो आणि त्यांच्या मनातील द्वंद्वाला नवी दिशा मिळते. समाजबदलासाठी आणि जातमुक्तीसाठी तो इथेच राहण्याचा निर्णय घेतो.<br>
{{gap}}देशमुख यांना प्रेमापेक्षा देश व समाजकार्य महत्त्वाचे वाटते,या विचारसूत्राचा आविष्कार करणारी ही कादंबरी आहे. ती एकरेषीय स्वरूपाची आहे. दोन व्यक्तींच्या परस्परसंबंधातून ती उलगडते. जातीय वास्तवाचे तीव्र स्वरूपाचे ताण तीमध्ये नाहीत. पृष्ठस्तरावरच ते राहातात.वाचकाचे लक्ष दौलत आणि मारिया यांच्या प्रेमकथेकडेच वेधून राहातात. कादंबरीत पत्रतंत्राचा व हिंदी गाण्यांचा प्रभावी असा उपयोग केला आहे.<br>
{{gap}}‘हरवलेले दिवस' (२०१४) ही देशमुख यांची वेगळ्या विषयावरची कादंबरी.<noinclude>{{right|'''लक्षदीप । १३'''}}</noinclude>
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JayashreeVI
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>कादंबरीलेखनात त्यांनी सतत नवेनवे विषय प्रवेशित केले आहेत.मराठी बालमजुरांच्या समस्याग्रस्त जीवनाचे चित्रण या कादंबरीत आहे.बालमजुरांच्या जगाची दाहकता किती तीव्र व भयकारक आहे यांची प्रचिती या कादंबरीत आहे.अरुण पालीमकर या मिशनरीवृत्तीच्या लाढाऊ कार्यकर्त्याच्या नजरेतून बालमजुरांचे विश्व न्याहाळले आहे.बालमजुरीच्या प्रश्नाला किती कंगोरे आहेत याचे समाजशास्त्रीय संवेदन या कादंबरीत आहे.साधारणतः चारेक वर्षाच्या कालावकाशाचे चित्रण या कादंबरीत आहे. स्वत: अरुण बालमजूर होता.कुटुंबातील टोकाच्या भांडणामुळे तो परागंदा होतो.तो शिवकाशीच्या एका फटाके फॅक्टरीत काम करतो.तिथूनही कसाबसा जीव वाचवून पुन्हा आपल्या शहरात येतो.तो ‘स्वप्नभूमी’ ही बालहक्कासाठी लढणारी संस्था स्थापन करतो.यासाठी शहरातील या प्रश्नासाठी व मुलांसाठी तो झटत राहतो.दुकाने,कारखाने,वीटभट्टी,हॉटेलमधून काम करणारी मुले व त्यांचे विश्व या कादंबरीत आहे.शारीरिक व मानसिक पातळीवर त्यांचे पराकोटीचे शोषण होते.समाजाच्या अत्याचाराचे ते बळी होतात.त्यांचे बालपण व जीवनातील आनंदमयता हरवून जाते.वेठबिगार म्हणून त्यांना वागविले जाते.राज्यकर्ते,प्रशासन व मुजोर मालकवर्ग यामध्ये सहभागी असतो.त्यांचे हितसंबंध असतात.अनेक अनाम मुलांचे मूक आक्रोश संवेदनहीन समाजाला ऐकू येत नाहीत.एक तर तो केवळ निळवलेला आहे.याप्रकारची व्यवस्था ही जणू काही मुलांची यातनागृहेच आहेत.या सा-या प्रश्नासाठी अरुण काही मित्रांना बरोबर घेऊन बालमजुरांच्या पुनर्वसनाचा कार्यक्रम घेतो.त्यात त्याला यशही येते.सतत आपल्यातला लढाऊपणा जिवंत ठेवतो.बालमजुरांच्या कळवळ्यापोटी सहानुभावाने तो हे करत राहातो. त्याची कहाणी ‘हरवलेले दिवस' मध्ये आहे.<br>
{{gap}}अरुण या मध्यवर्ती पात्राच्या चित्रणातून कादंबरीची संहिता घडते.विविध घटनाप्रसंगातून व त्यांच्यातील चर्चेतून कादंबरीचे कथन आकाराला आलेले आहे.बालमजूर,झोपडपट्टी,बूटपॉलिश करणारी मुले,कारखान्यात,हॉटेलात काम करणारी मुले यांचे बारकाईने चित्रण या कादंबरीत आले आहे. त्याचबरोबर प्रशासनव्यवस्थेचेही या जीवनाकडे पाहण्याचे सूक्ष्मत-हेचे चित्रण आहे.एका अलक्षित शोषित समुहाचे चित्रण या कादंबरीत आहे.भूत आणि वर्तमान यांच्या कालसंदर्भात ते केले आहे.बालहक्कासंदर्भात जे विविध कायदे झाले,त्यासंबंधी जाणीवजागृती झाली,त्या माहितीचा उपयोग कादंबरीत केला आहे.<br>
{{gap}}जिल्हा प्रशासन व न्यायपालिकेतील राजकारणाचे चित्रण व त्यांच्या कादंबरीवाङ्मयाचा महत्त्वाचा संदर्भबिंदू आहे.'ऑक्टोपस' ही महसूल विभागातील भ्रष्टाचाराचे चित्रण करणारी कादंबरी आहे.आनंद पाटील या प्रामाणिक काम करणाच्या जिल्हाधिका-याच्या नजरेतून किडलेल्या भ्रष्टाचारी जगाचे विश्व या कादंबरीतून मांडले आहे.आनंद पाटील व भगवान काकडे यांच्या समांतर कथेतून या कादंबरीचे<noinclude>{{left|'''१४ । लक्षदीप'''}}</noinclude>
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JayashreeVI
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<noinclude><pagequality level="1" user="JayashreeVI" /></noinclude>{{center|{{larger|{{larger|'''अनुक्रमणिका'''}}}}}}
{{center|{{larger|'''कथा'''}}}}
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.. ........ ३. अंतरीच्या गूढ गर्मी ... ४. बांधा... ५. भूकबळी. ६. उदक ७. फिरुनी नवी जन्मेन मी! ... ८. बंद लिफ्ट ९. रन बेबी रन. १०. 'लाईफ' ‘टाईम'चा ‘फॉर्म्युन' ............. ११. भव शून्य नादे. १२. स्वत:लाच रचित गेलो ... १३. सारांश . १४. माधुरी व मधुबाला ....... १५. लंगडा बाळकृष्ण ... १६. केस स्टडीज ...
.............
.........
...............
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नाटक
१. अखेरची रात्र ......<noinclude></noinclude>
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कल्पनाशक्ती
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सदस्य चर्चा:कांतीराम जनार्दन शेजूळ
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स्वागत आणि साहाय्य चमू
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नवीन सदस्याच्या चर्चापानावर [[Template:Welcome|स्वागत संदेश]] टाकला
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{{Template:Welcome|realName=|name=कांतीराम जनार्दन शेजूळ}}
-- [[सदस्य:स्वागत आणि साहाय्य चमू|स्वागत आणि साहाय्य चमू]] ([[सदस्य चर्चा:स्वागत आणि साहाय्य चमू|चर्चा]]) २१:०२, २२ सप्टेंबर २०२६ (IST)
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश. ( शरीररर्वंङ. ) हा ग्रंथ श्रीधर व्यंकटेश केतकर; एप्- ९’ षीएय् डॉ, यांनी षंइघांनीळ् फांफ साहाय्पर्फाच्फ्प् पक्कीर्ने तयार केंळा. विमागत्रक्कावळा जळपेंगुर..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश.
( शरीररर्वंङ. )
हा ग्रंथ
श्रीधर व्यंकटेश केतकर; एप्- ९’ षीएय् डॉ,
यांनी
षंइघांनीळ् फांफ साहाय्पर्फाच्फ्प् पक्कीर्ने तयार केंळा.
विमागत्रक्कावळा
जळपेंगुरो-तपून
_…-
ज्ञानं राष्टूघनं मद्द्त्तमामेद्' श्यायसंरक्षकम् ।
लोकें क्षत्रियबैरयकार्यंघटनासौकयैउंस्थाफ्कमू ।।
कर्तृत्वागमबोंघको ननु क्लि’नाथैयलोऽघुना ।
मात्रा नागषुरे सुपण्विक्जनैऱ्संघऱ्शुभो निर्मित: ॥
१९२५
मुद्र्ष्-र्दो. श्रीधर ष्र्यफटेण् केतकर यांत“! प्नानकौश ष्ठाफ्च्चाना ८४१ सदाशिव पेठ पुणे येथे ण्प्पला.
१फांप्तफऽ-महारप्ष्दूयि ज्ञानकळोशांग्डळ लिमिटेड नागपूर, तर्फे श्रीधर व्यंकटेश केतकर,
८8 १, सदाशिव पेठ, पुणे.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "संपादकमंडळ मुख्य संपादक डॅ’प्. श्रीधर व्’रॅफटेश केतकर, प्रभू. ए. षीएइं. डळी. संपादकीय कार्पव्यवस्थापफ रप्. रा. यशवंत रामकृष्ण दाते, की. ए. एलुएलु. माँ. उपसंपादक रा. रप्. सवेंप्त्तम वा..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>संपादकमंडळ
मुख्य संपादक
डॅ’प्. श्रीधर व्’रॅफटेश केतकर, प्रभू. ए. षीएइं. डळी.
संपादकीय कार्पव्यवस्थापफ
रप्. रा. यशवंत रामकृष्ण दाते, की. ए. एलुएलु. माँ.
उपसंपादक
रा. रप्. सवेंप्त्तम वासुदेव देशपांडे, बी. ए.
रा. रा, चिंतामण गणेश कर्वे, मी॰ ९
रा. रा. लक्ष्मण केशव पाने, बी. ए. एलूएलू. बी.
लैत्रवैत्ते वेद्राप्म्रसॅपन्न चिनामणमट्ट शंकर दरबार.
र्दो. भास्कर गोपाळ नेने, एकू- एमू- एमू०
मिसू. एच. कोंद्दन, बॉ. ए. ( र्लडन)
साखासेपाट्क
स, सा. विनायक इय'यफ यागाशे एल, सी… र…
रा, ष, गणेश फेशवट्वेंफेळफर
स्थापत्यशास्त्र
क्रुषिफमैं
प्रौ’ल्फिक्कांद्द्प्टेषीं.एसली.
पो. रघुनाथ विणु दामले षी. ए.
प्राणिशास्त्र
षनस्पत्तिशास्त्र
प्नळो. इपंक्क विष्णु मोने एम. ए.
गणितशास्र
प्री- दत्तात्रय लक्ष्मण सरक्कोटूणा- एजी’
वैद्यभृषण गगेशशाझी जोशी
कै. क्सियकशखो खानाप्रफर
रा. रा. दिवाकर यशवेत फाटक
भूल्लरेशल्ला
यायैवैद्यफ
मार्थंज्योतिषशास्त्र
येन्नशाम्र
या घिभागांतळीळ विशिष्ट लेख व लेखक:-ज्योतिऱ्शास्त्र प्रो’ वि, ', मारक
ह्या विषयावर धांखास'पाद्फ नादृळोत त्या विषयाची थ्ण्यापद्र्प्रीं सेपाद्कमंप्ळांपर आदि असें म्रमण्पिं:
……ऱ्धं‘ऽग्प्नप्:……<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "षंतरंग परिचय. याविभागांतज, झ,ञ, ठ,ठ,ढ, ढ, ण र्शीश्नक्षरॅपुरों आशिया. द्विठुल्थानेतर-प्रा दे[रा क. "माया, सूरा, झालो असून, त ’ची२ ॰पृष्टे झालो आहेत त्यांचे क्गां‘फरणऱ् ’- णपियाठोसील, ग..."
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परिचय.
याविभागांतज, झ,ञ, ठ,ठ,ढ, ढ, ण र्शीश्नक्षरॅपुरों
आशिया. द्विठुल्थानेतर-प्रा दे[रा क. "माया, सूरा,
झालो असून, त ’ची२ ॰पृष्टे झालो आहेत त्यांचे क्गां‘फरणऱ् ’-
णपियाठोसील, गैयाँल, गैरिको, गेरिळाझेम, गैक्का, गैरेष्ठा,
जळपैगुरौ-च्चाचालामुखी.
दिंटुस्धानढूतिद्दास्व-हुं दि क’पाबाल, ज्याँप्तेष्टीम. पौ रप्
गैन्हा गक्सिण्फर्म. याफिफा-ण्विकिया, गळोद्द्यनॅर्क्स.
णिफ-णळु’ष्ठांशांन, जाषप्ळंलेंभिनी मु पु ल गा नौ. …णला-
णर्जिटाऊन, र्णांर्षिग्या, जाती, ।णनौव्द्दा, यिनळोअप्, गगोस्का॰
ठुद्दिन मए'गद् क्ल्रषी, ज्ञळांछुद्दिन तयुति, ञपांनक्ख्नप् मिसौ
णसर्वतसिंग,
जहांगीर,
जर्दाद्रश्ळाद्दा,
णानणारप्
बेगम,
ज्ञहूंलण, जानीबेग मिंझी, पाफरखान, णावेरखान, वोघफ्ळाट्रॅ.
ष स वी.…ज्ञहाज्ञफिर'गां, गाघप घरप्णें, षाघक्रार्दे,णिऊ॰
पदाला, बिबापांईं, निक्कादादावक्षी, येथे. वोरयाजो केतकर,
जोशी. ट्टे प्र जो भ म वा नी.…बांभेकर, बात्नणीं द्दाद्प्जॉ,
हँणन्तीवाठे, जोग, जोशी. सामान्य.-जहागांरदारीं, जामद्प्र॰
अमेरिफां-माँर्किया, अँम्तटाउन यरोंप-प्ना दे शि फ. -॰
व्हिया पेना, गैए'ङव्ण्ड गोहाक्सार्ग; ऐतिहासिफ्रा-
जस्टीन, जस्टिनियन, र्योनट्युप्नसन, गॉक्सन माँ, गॉर्प रळागै,
णस्लेग्त्वाम्ह्र, मीन, णुपीटर, णुव्हेंनत, शून्नौ, बेकर, गैफसेंन,
बेतुंद्ट, बेहोव्प्, बोत आँफ ओंकैं
बाट्रांप-गै द्व॰-ज।तफ. ज न.…पैन संप्रदाय, भिक्प्नभ,
णिनलूरि० सं रकूत. चरित्रे,” जोनराग, गैम्या. या मी ळ.॰णीक्क
चितप्गगो; मरप् ठो॰~णाक्काफर, णींफ्नमुफ, र्पोगौफ्रमानद्.
खाना,णिर[इतखाना, जोशी जोहार. बा सी.…गाठ, वाद्य,
शार’त्रे …वेद्यक.…यलनस्तिष्फ, जलर्तेन्नास, णलोंद्र,
णांलारळीफ्रिनगर, गिप्तळोजुघोतिया, बेठ्याय, योगी, बोनगन,
णलौपचार, उपर; र सा थ न.…नरित्रै-छुप्; व्या क र ण
शा ल.…यैर्तेद्र् व्याकरण. व न स्प वि.…णा, गवत, णळाहैं,
ज्वांगपाड्रुश्रा.
प्नाकैशिफ ण्’तेद्दारन न ऱ्क्लि-शृंन है॰-णव्ष्य्र,
बांध, पांभूळ’ गायफळ, णांसर्वंद्. मासुंद्, थिरै, णीपनकामें-
बाद, र्णांबुघोदण्, णागखेंदृ, षाग्मनैर, गागरप्प, णालिआ,
विचार,जु॰ष्ट्,पेपाळ, गैष्ठमघ, ज्वारी. घा ठु.…गस्त॰ ण र्थं॰
शा ल.…चरिंत्र- बेथॉन्त; प्रा णि शा त्न॰-जळु. ज्योतिष.-
जावळी, जळगांव, निरळ फांप्ततोंळी, जीक्घन किल्ला, दुप्नागढ,
बुनप्फ्प्द्र, जुन्नर,जुवो, बुपखा, बेकर, वेबुरीं,गैतपु'र,वैयोंर,
जारक्त्रमें, जुगार. काय रम्'णस्टिग्नेयन, णांमोंनफॉं, पाररर्म,
क्सद्न, ज्ञळापूर ता., जाफळोपांबाद्, णांखाऊ, याति, बाफरप्-
ज्योंति, ज्योतिऱ्शास्ना स या या शा प्र.…पातफमै. पारिभिद्,
बेनर, गैसरळी, याँगेश्वरीं, वोठिगचा र्दोगर, जीस्मिप्. है हा…
क्प् द.…गालना,सॅ यु'फप्रां त.-गलाळीं, जतपुर, जसक्'तनगर,
बाळापूर, ज्ञानसथ, ज्ञप्फरण्षाद्, जण्लोंन, पेपर, जेष्ठर्णोनपृर,
तुषार. भूशां ह्या… ण्यालामुखो. औ यो गि रु.… णाळिप्रात,
जिलेटिन. कि बाशा ब.… ड्रुप्गुत्पु. प द्प्पें विष्ठा न शास्त्र.-
जोशी मठ. " ऱ्द्दाड ग ध्य प्रां त.-उळाळेव, णशफूर, जागगोंर.
झ…सोला.
दिंदुस्थान,प्तिद्द्यस…द् क्षि ण द्दि दु त्या न.…झाथी-
णांमळी, जामखेड,
जामगद,
पितर, ड्रुनाणाणी, पुण्नळोना,
नृन. म प्थ [है दु च्या न.…गस्वो,गस्त्रङ, वापरा, यिगणी,
बोस, गळोवत. मैं गण् ल.…जठेश्वर, क्यों, णद्दानानप्द्,
ज्ञग्लाफ्हाड, घियागंज्ञ, जेम्स मेरसिंडूस, षेठेझ्या, गेसोंर.
ल्ला कॅद्ळोल, पाढलौलाव्.
रोन. छु टु ल गा नी…मिंनरप् उन क्सिप् बेगम, शियाउद्दीन,
गरनों, झुब्ढ् तुन निन्ना बैगग, झुल्पिफण्रखग्न, झेप×उमू
निसप्-यैगम, झेनखान कोंग्ष्, तैनव्षांदौ महाल, द्वेवुल
आ या म.…जिंणींरान, तोंटेया, नौटेयापूर, जोक्है, जोच्चर.
णघिदांन.
मि हा र.…गागतारप्. षं वा न रा ज पु ता ना.…णांमपूर,
जालॅद्र, जालोर, जुनोफ्, गुगल, गैसलमीर, पेप्तळोल, बँतों
सौनक्र, ट्रेरमुरुत.
गोधपूरट्यु द्या स.…गयारिबोंगर, जिंजी, णो’रॅया. अफ गप्णि॰
स्का.न॰…ञलाळाबांद्. वि बो न.…नाफना. प्रा ’चौ न.…
ग हा या ष्ट्र, झालरपाटण, झॅग्डोंप्; फा ठे पा ह.…सांप्तमेर,
पेगाक्रूमुफि.
र ज पू त-मामप्तिग. या तो…मावैल, सारगर
प्रार्देम्पिफरतिद्दासक् भूगोल-मुंफ्हँर लावा…शामपाँदर, झढ्याब्, प्तिद्द्यद्मष्टां. म 'य प्रां ल.…प्तगरपूर,
। ज्ञारप्पाभा, छूग्रछ्ये यु क प्रां स.…झमानिया, र्शाशी, सुती,<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "यंत्तरंग्जस्लि झेद्पूर. न ग[ ल.…झेञ्चरपूर, झालकाटो, झेनिद्, येरिय्या. ट्रांद्चकें. सौ यो गि रु…टोफ्रया. ये न शा झ…ट्राव्यै. स…ठ. आ तां म.…झिरळी. [ये हा र ओ रि त[.×ज्ञलोद्[. पं या न., नज्नर,..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>यंत्तरंग्जस्लि
झेद्पूर. न ग[ ल.…झेञ्चरपूर, झालकाटो,
झेनिद्, येरिय्या.
ट्रांद्चकें.
सौ यो गि रु…टोफ्रया. ये न शा झ…ट्राव्यै.
स…ठ.
आ तां म.…झिरळी. [ये हा र ओ रि त[.×ज्ञलोद्[. पं या न.,
नज्नर, शांगशिग, झुंघुन, झेलम. का श्र्मां रक्षारगर. न ह्या
देंश.दूंन्-प्त न, क्षिगफा‘ठेग क्लिति, झिगन.
याशिया,दिं
शानेठ्या-ऐतिद्द्यसिष्-क्कां
पुप्ना, प्तमानशद्दा,
खालून. प्रा दे [ते पत्र. …प्तमीनद्द्मर,
रगबुकिरतांन, ज्ञाळनप्न, झिवारत, मांडून, 'क्षुगेरिया, मोन.
यररैफ्-ष्ठामोंरा, सार, सारा, क्षारनृन, ज्ञालैयूंकम्र,
प्तीर्यांमाँर, प्तक्लि, सांप्'प्ड, झुळिरन, झेंनागा, तैनाटा. झेनौविया, तैरैक्किन, त्नेरयरट. न्नैनोविटुन, झेस्नान. आफ्रिकाप्रांसींनप्र, सांवेसाँ, क्रुळुलैय्. अमेरिका-…म्राफप्टेफप्त.
वाङ्मय-पां र शी-झरधुहु, ईंग्द् अवैस्ताझी कन्र्साज्गॅ'
फानैन, प्रेनोंफॉंन; फ्रें च.-ज्ञ`[ल[.
शार्दोश्ना णि शां त्र…शुरळ्, इछा. वि मप् न.…झेंप्पे'
बिन. श्रक्षरबिफप्स-झ.
अशावेफांस-न
ठाकूरगांन. रुंयुफप्रांन.…ठाकॄरद्वा[र,.ठाणभष[न या तों.ठग, ठाकूर. न[ इन य. -व्[कॄरद्र्[र[गेन[. अक्षरयिच्चान…ठ
ढ…-
दिंदुस् यान. रातेद्द्प्ल-फ न., ’डुष्ठे. न न ठें.॰॰प्फठे,
टिगणकर,ड॰[याँइने.दृ॰प्रगीणमर[नो.,…उफरोन
दल-
हौसी. बाली. …दूग, डोंगरा, बाँयारो, गेम, बोमल, णां.
प्रादेश्मि इतिहास व मगळोल-पुं न हैं. …यैगल,
व्महैं, त्वग्कोंर, रांग,
गंगचीं,
बाहाणु, बीता,
डॉम’गांय.
मग्यप्रांत.…र्दोगरगद. बेंगाल-साड्या, टाझ्यासेपुं-
क प्रां त. …ढेरापूर, ढेह्ररप्ड्रुन मम्य दि दुरथा न .…णपाँ
मद्रास.-॰टाला
गुंग,
ञ.
ठ-ठार्णे
दिंदुरभृप्न.रठिहूंप्स-मुं " र, …ठ्ठठाट्युणि. पंड्रुगप्ळं. -
,र्पबाक्पराणपुताना'…
देरप्नाझीखान,
ड्रु[गरपूर. वायव्य
डेंरणोपांचूर, देंरागात,
दैरानानक,
नरष्र.-दैराररमाएलखान. मण्-
हें श. …यायमंच्च-
द…त्रैन
र्दिटुस्धाननूक्लिस-मु पु ल गा नळो॰-टिप्पूसृलतान.
ऐ प्र णी. …टागोंर देवेंद्र, टागॉर सौंरेंद्र् मोहन, टाटा जमगेदणीं, टाटा रतन, टिळक्र. गा तळी. …टिपरा, टोंनलष्गैम्धू.
प्रादेशिक प्तिएप्स व भूगोल…पुं ' हैं…टेफांरी
टाकळी, टाफळी बुद्रुक, टावी, टिपा, र्टेभुरणी. म व्य प्रां न.टाकळघाट, टिपगत्व, टिलोताखेरीं. म व्य हि दु त्या न.…
टिक्का, टोंरां फतेपूर. न ग[ ळ,…टिटागड, टिप्फैरप्.
षं या ।. …टाफौ, टॅफ, येंशाम. वा न व्यनर हूंट्. …टांक,
टोर्चांनदॉ. त्र ण दे श…ठझी, ग्रँगर्षेग, टॅळोगी, ठहैंगुथ, यैगू,
टोंग्य.
’ आशिया र्दिदुस्थामेतर-प्रा देगॅते क. "ठर्तेठ, टांगाकैंग,
आशिया. द्दिदुल् थानेतर-डुफळो, झालो, गेमौनिच्चा.
युरोप-प्रा दे[ज्ञे फ. …डॅडॉ, डेफर्फ, रँफांग, व्याटेन
डब्लिन, डरहँम, ङबॉ, दान, ढान्यून, बांट्रॅमांउथ, मॉनिल्स’
दूलवैन्यो, देडिंक्षागच, डेन्मार्क, डेलफाय, देव्हृनपोटॅ
डोंहूंगा, डोंव्इर, डट्टसेल्डार्फे, ड्रस्डेन, ड्रोघङळो, [हुन्रॅक’
ऐप्तहा[त क. …टिडीमी डेर्केपेंळिलम्न, प्ग्रूङरनेक, या ती. ॰॰
देंन. अमेरिका…ङळान, देन्नर, ढेलपैअर.
अप्फिफा-ब्होमे, टिंफ, द्वैभिएटा.
वाङ्मय…म र[ ठो.…र्दोग्ग्रे. प्रौ रु.…णयोगैनीस,
देमॉक्विप्त, देमॉरयेनीन.
इं ग्लि रा.…स्किन्स,
टिकेन्ती,
डॉफौ, ट्रायडन. ३ टा कि य न.…ढ'टि, र्फे च,…दिद्देरॉट,
देफार्टे, ड्रुषषांघिएरळी, डयूंमा. ज्ञ र्मं न. …डूग्यनन.
शास्त्र…फ् दा थेंविंष्ठान. …चरित्रै-र्डेनिनल, क्षाबॅळे,
ढायप्रे, टासँन, टिदळोर,टिष्ठांन, टिवेंरटी, टांप्रेंश्नां, टुछूझ, टूर्ने, .डार्विन, डाल्टन, डॉअलॅबर्टे. ननरफ्त्तिशांस्रानालटूवॉ, टेर्तांफॉंन,द्वैनश[न, टोंकिथॉट्राय, ट्रॅयिड्गंड; ट्रिनाष्द्प्द्, बाँन, डाळिन, ळिडकॅमाळी, डिंगरी, डुन्मरकंद्, डुळिरअन,
ऐ ति एप् सि क. …टॉकेमौ.भ्या’फ्रेफां…टांग[[मेफां,टान्ञळोर,
टिंयफ्टू, टिप्रांडिं, टेग्'युमीगलफ्व्,
ठयूंमिंक्षिया, ट्रान्सव्द्द्यळ, ट्रिपींळीं.
टेनळ्क्ग्र,
टोगौलेड,
श्रमेप्’रेय्’ष्प्-टेफ्तम्र, टेळिनस्ता, टेरत्तिलफ्ग्रूगो, टोंठेडों.
डोंरली
येन्नशास्ना-बॉफ; वैद्यफ.…र्डाम्यास्वोफला
प्ना णि. …ङप्न, डुक्कर. रसायन-चरित्रे. …दिवार, ढयुमास,
ड्लोंग, डेव्ही, डोंयरनेर.
सो द् का म …चरिटॅहें-णेंना'
टेलो, ङयूंरठ. औ यो गि फ…ङग्मर. अक्षरक्सिप्स-ड.
ढं‘ढंग्प्
…प्ना दे शि क. …ढनाबेनवैत्’स, ठहँट्वेंकूलसृट्युयनर,
टायगेरेयस, टायर, टारकित्री, टारर्केटो, दृप्रेंटम, टाके, टानप्,
टिरळोल, टिल्फिढ, टॉगाआ, टेगनसौ, र्टेफ्लबार, टेपेश्चार,
टारफैटों, टोंठेडों, ट्रांएस्टे, ट्रॅट, द्विक्तटँमसेंऎत्ति हा सि क. …
टॉळर्स्टप्य, टारेंन'रब्, टानमन, दोन.
इत. जा तो…ठांमर, दुंढयें, हेस, ठोर
भाषा. शास्त्र…प्रा णि शां घ …र्ढेकूणण.
अ में रिं क न. …ट्टेन. र्फे च. …टगों,
थन…टँसळोठस, टातो.
तेडों,
_ याङ्नय…हि दा…टेफचैर मुनशॉ.’ ६ ग्लिश …टेलर
ठव्हार्नयर. श्दा[ल॰
शाखँ-ना ण क शां झ,…ठक्कम् ख नि न …टरपेंल,
टांफणखार. प्रा णीं.…टिटषी, टोंळ. न न रप दि.…टक्काळ’
टाफळक्ष्यपिमोफा, टोंमाटोर्मंग् दा थे वि ज्ञा न‘टारींसैलळोद्रिडाल
टेट्रप्रो टो र्पो फौ.…टालबँ[ठ. ग णि ल.…टॉटप्’व्रटॉलैमी.
ग्यळो ति प.…टपिंजेंत्राद्दी.
र ति हा
न.…येंढ, टेन,
हिंदुस्थान. इतिहास या या न्य. …ढप्लगञ ढाला.
वाङमय-इस्रो
साद-
अक्षाविफास-ण.
त…तपून॰
दिंडुस्ट्टेगताप्रार्देशिफ इतिहास व क्योंळू-शृं ।[हँ
तंडों
अद्याप,
तेडों
अलाह्रयार,
तेदो
नप्गों,
तेडों महॅगद्खान. ग द्र्ळा न. -र्स्ट[ज्[[नर, ननुष्. न ग[ ल …
तेडागांव. ते यु फ प्रां ल.…तनकपूर. या य व्फ् प्रां न.…
तनाक्ल. आं सां ग,…र'गिळ.‘ न हा हे न. …तगौग,
लपून.
या ती. …नडपी. वाड्मय-मौ र[ णि फ…तंत्रषंग. ग्प् न
तपागच्छ्, तत्त्वज्ञान. शास्ने…न न रफ् ति. …तगर, तन्नफ.
ओ शो [‘गे क.…नफ्कॉंर अक्षरावैफास-न.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "ज्ञलवैगुरों महांराष्ट्रयिप्नानफॉंशट्रजछ्येक्ष्य बहुतेक सर्व भागांत मळीचीं जमीन आहे. वफ्ताच्या पश्वि० पेस सुमान्. अर्धा मैलावर त'प्व्याचीं खाण आहे. त्याचप्रमाणे शागसिंग न[न[..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>ज्ञलवैगुरों
महांराष्ट्रयिप्नानफॉंशट्रजछ्येक्ष्य
बहुतेक सर्व भागांत मळीचीं जमीन आहे. वफ्ताच्या पश्वि०
पेस सुमान्. अर्धा मैलावर त'प्व्याचीं खाण आहे. त्याचप्रमाणे
शागसिंग न[न[च्य[ चहाच्पप् तळ्याच्या उत्तरेत यार मेलां॰
नर तांब्याच्या खाणी आहेत.
तिरताच्या पश्चिमेकडील भागांत जंगल रग्र्मां आहे. ज्ञेनरळी,
शितवीं, आंबा, फणत, पिपळ, चिंच यांचळो झार्डे र्तापडतात.
तुपारळो व तावू'वॉ झार्डे पुष्क्रळ् डगवतात. द्रुआरन्या उत्तरेत
जेगल पुष्कळ असू,
व्यापेंकॉँ
बरान भाग
क्षुरा’क्षेत गाहे.
जंव्टॅपे
शेतकों:…गळीर्चां नमळोन फार मुपाँक असून भात, गळि-
ताचीं धान्ये, बटाटे, एरेडीं, घुपारळी वगैरे येथे [’पेंकँ होतात.
त्तिरताच्या पश्चिमेस ताग, गहूं, तांदुळ पिकतात. या प्रदे-
शार्चे मुख्य
पीक
तांदूळ हें आहे’
१८७४ मष्र्मे सुरू झाली.
इ.स.
लागवड
१९०३ म‘ऱ्ग्रे’ २०७ चहावै
मळे होते.
चद्द्प्ची
इ. त.
येथें
मळयासाठो
मड्रुर मिळविण्याकरितां कांहीं एक कायदा रुरापां लागलेला
नाहीं. कारण येथे मड्रुर पुव्’रुळ मिळतात. तहाच्या मळ्यांत
येथील उष्णमान फघीद्दि फार नततें. साधारणपणे उन्हाळ्फांत ( एप्रिलमथॉ) ९॰॰ अँशपिंर प[र[ असतो. पाऊस
नेपाळी मत्रूर पुष्कळ येत अलून ते
पुष्कळ पङतळो. नलयेगुरळो येथें १२२ इंच न वक्ता २०९ इंच
केलॉ आहेत. त[ग[च^[ लागवड देखील बरीच वाढत चाललेली
पयैत पडतो. इ. स. १९०२
मोठा पूर आला होता त्यावेळी र्बं’रच तुरतान झार्के.
आहे. गुरांचीं अक्लाद् खुबो व अशक्त आहे. त्यांत सुधारणा
करण्याचा प्रयत्न कोणी करीत नाहाँ. गुरचरण पुष्कळ आहे.
इतिहास,…प्राच्चीन काळी या भागांत प्नरिंज्यरेंतिप
अथवा कामरूप नांवाचें राज्य होंतें. कोणी ज्ञल्पै’र्वेर न॰[त्र।च्य[
मघ्यें जेगलापांदूळान झालेल' उत्पन्न
च्या तप्र्टेनर महिन्यांत येथें
राजाने ज्या ठिकाणी ऱ्-[ल्पें नर्केवार्चे देवालय आहे, तेथें पूर्वी
एफ देऊळ बांथर्ले हाँत’ न नल्पें [’लै‘ग् त्याच वेळी बामेनॉतुन
वर आल. भितारगड नांवाचा बूळाद्वा रप्गा पिरधु याची पूर्मं’व्वो
राजधानी या भागांत होता. ह्या
ठिकाणी
प्राचींनत्न दाख‘
छोटा नागपुरद्वैतील
मजुरठेंचौ जागा घेत आहेत. फांहृळोनळो आफ्ळीं घरे याच भागांत
बंगला…र्येयै संरक्षित जेगरँव् आहेत. ३. त. १९०३-०४
रुपये होते,
१ १८॰॰॰
येथे डुनखडळोचा दगड व तांर्वे तरॅपडतें,
क्फ्तापप्लून
तांव्याचां खाण
होते. बागराकोंठ
पूर्वी कांहीं
येथे दगडी
दोन मैलांवर अतळेंलळो
नेपाळी लोक चालत्रीत
कोळसा साँपडतों.
व्यापार व रस्ते नयेरे८०-येर्थे तरट तयार होते. तहाच्या
वि॰।[रे पुष्कळ अवशेष सांपडतात. पुढें बंगालमधील पाल
राज्ञ'ळानों हा भाग घेतला. पुढें येन ([त्तांच्गा ताव्गांत हा
व्यापारामुढें इतर व्यापांरद्दि फार काढला
भाग मेला.
भान चांगला येतळो. मृतानर्शी देखील थोडा फार व्यापार
नळोलघ्क्ज्ञ नद्देनप्च्या रँपन रप्नप्र्ने कुचविहार
तरथांगांत अतलैंळें कामातापूर क्तविंर्ले पुढें हा भाग विश्व-
चालतो.
सिगर्ते स्थापन केलेल्या कॉँच राज्याचा भाग झाला. या
राज्याचा नाश झाल्यावर पश्चिमेकडील प्रदेश मों’गल राज्यांत
तांदूळ,
येतात.
बाहेर जातात. या
तामॉल झाला, इ. स. १७६५ मध्ये हैंरट इंडियाकंपनपृफडें
या भागाचा दियाणळोचा कारभार आला. याच्या अंतमाँ
रेलवे जाते.
गांत व्यवस्था ठेंनर्णे छुक्सिलॉर्वे झाल्यामुळे फार चोऱ्या
वगैरे होऊं लागल्याऱ् परंतु इ स. १७८९ मध्ये तेथील कळे…
फ्टरनें त्याचा बंदोबस्त केला.
द्रुआर भाग भोत्तियांच्या हातांत पडला होता व ते
क्रुचबिहारच्या संस्थानात फार त्रास देत असत. या ठिकाणी
देऱ्ग्घोपे
नेहमी
होत असत.
१८६५ सालाँ
भुतान
युद्ध झाल्यानंतर हा भाग ब्रिटिश राज्यात तौडप्यांत आला.
लोकसंख्या( १९२१ ) ९३६२६९.
पश्चिम द्रुआर भाफ्'प्त
वस्ती झपाट्याने वाढत आहे.
येथील क्रिडा ७७ लोक वॅगालॉचीं पळोठभापप् र'गपुरंम्’
अथवा राजवंशी बोलतात. चद्दाच्या मळ्पपिंर बाहेरील लोक
फार येत असल्यामुळे द्दिदॉ. मॅक, खात, पुंडारळी, तताळी
वगैरे भाषाद्दि प्रचलित आहेत.
येद्वैम्,
कापड,
इतर
लोखंडी
भागांत
या
वगैरे
स्टेट
तेबाखु
चहा,
ताग,
भागांतन ईंरटनै बंगाल
चांगले
ररतेंद्दि
आहेत.
प्तिल्ह्यल्वे र्दान विभाग आहेत. ज्ञलयेगुरळी आणि
जिंल्ह्यांत फचेऱ्या वगैरे तवे साँयां आहेत.
या
अलव्पुर.
वि भा ग.…ज्ञलपँगुरळो जिरझ्याचा एक विभाग, उ. अ.
२६॰२७’ व पू. है. ८८॰ २०’ ते ८९॰”. क्षेत्रफळ १८६८
चौ. मैं. व लळो. ते. (१९११) ६९९९५९. यांत एक गांव व
२०३९ खेडॉ आहेत. हा भाग सपाट मैदान
असुन यांत
जंगल पुष्कळ आहे, भिंत्तरगड व ज्ञल्पें येथें पुष्फळ प्राचीन
अवशेष तफैपङतात. या विभागांत तलवैगुरी, टिटाळ्या’
न[डर[ आणि येनागुरी ही व्यप्पळारळी ठिकाणे आहेत.
गां द.…नलपैगुरळो विभागाचे मुख्य ठिकाण.
उ. अ.
२६"३३’व पु. रे॰८८॰४३, लॉकसंख्य[(१९११) १४६९०.
गांव ज्ञरळो लहानस्राच आहे तरी तों भरभराटीस येत आहे.
ईंह्टनै बंगाल स्टेट रेलवे येवून जाते. इ त. १८८५ मच्र्थे
येथे म्युप्मेसिंपांळिलटळोचीं स्थापन झाली. येथें तर्वे फचेऱ्या,
{. स. १८७२ पासुन मुड्रुलगानघेच्या वरतळोर्वे प्रमाण
कमी होत चालळें आहे. येथील द्दिदुमुहुलमान आपत’प्त
तुरुंग, द्वाखावै, शाळा वगैरे आहेत.
न भांडतां रहातात. एकाच घरांत हिंदु व मुठुलमान कुटुंबे
र[[हेरऱ्ऽर्ला र्यंर्थे दृष्टीस पडतात.
२६॰
२४
पत्रे
आहे. घाम्यात
जप्झ्पे-बेगाल इलाखा.
ज्ञलपैगुरळो जिल्हा. उ. अ.
३१’ व पू. `र`. ८८॰ ५२’. लळोफतख्या ( १९०१)
२॰ ८८. मुगारे' तांनसें वर्षापूर्वी बांधलेले एक शिक्प्र्चे देवालय<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मंद्द्यराट्रीयज्ञप्नकोश॰(ज)१८४ जॅल'बे र्थंथें आहे. येथील लिंग अनादि असून कागरप राज्याच्या मुलाच्या डोक्याचा वैर अर्थात याहून वराच कमी व्याज यावव्येत कोंठेंतरी महादेव ळिगङपघ..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मंद्द्यराट्रीयज्ञप्नकोश॰(ज)१८४
जॅल'बे
र्थंथें आहे. येथील लिंग अनादि असून कागरप राज्याच्या
मुलाच्या डोक्याचा वैर अर्थात याहून वराच कमी व्याज
यावव्येत कोंठेंतरी महादेव ळिगङपघि अवतरले असें
कालिका पुराणांत वर्णेन आहे. द्र महाशिवरप्त्रोत येथें जत्रा
भरत अततें, व्याबेंळो व्यापारद्दि येथें पुष्कळ चालतो.
जकंक्-वऱ्हाड, मघ्वप्रांत. वुलटा’व्द्वै जिल्हा, खामगांव
तालुका. हे खेडेगाव खामगांवच्या उत्तरेत ८ मैलावर अलून
गो. आव. पी
रॅल्वेवै
एक स्टेशन
आहे. येथूनच
१८ इंच असतो. एका तांन महिन्याच्या
ज्ञलप्तप्’हैतष्रन् रोग…मस्विष्क
वैर ३२ इंच भरला. असल? टोफॉं व्या मुळांत पेंलत
नाइ‘व्त; व म्हणून त”[ मुर्ले पडूनच असतात… मस्त‘
काचौ द्दार्डे विस्तरणशळील
सेचयाचा
खान-
केला अततठें
त्याच्या
प्रत्येक अर्थेभागामध्ये
वाव मेंदूवर
असल्यामुळे या वाढत्या जल‘
फारता सांपडत नाही.
पण
ज`[
थोडा पडतो त्याचा परिणाम मात्र वतन होतो. पाश्वेकोंप्न फुगून बाहेरळोल भागामर्धांल मेगा बुजल्यातम्रख्या
होतात. एखाद्या वेळी या जलत'चय गस्तकाच्या कवटोंत
प्रवेश करून र्मेढूत खाली दावतळो. गग मेंदूच्या कियेत
अडथळा होऊन मुलाच्या मानसिक स्थितोंत बिघाड होऊ
लागतो. कशांत लक्ष नाहीं, घिडखोर व अपेंवठ वेंडतर
बुद्धिहौन अर्धे तें होऊं…लागतें. दात जास्त पडत गेल्यावर
अथया मेढूचा छेद्
पप्श्वेकोश
नांयाची पोकळी अतते, त"[त अतिशय जलतचय’ होऊन
ज्याच्या डोक्याचा
वैर २९ इंच व दुसऱ्या एका हंग्लडांताल ब्ळुलाच्या डोंक्यप्चा
गांयात जाण्याकरिता रेल्वेचा फांटा आहे. लळो. सं. ( १९० १)
२३०८ होती.
ज्ञलर्यन्नशांस्त्र
हा
रॉग होतो. याचे दोन प्रकार आहेत; ( १ ) तळोत्र व ( २ )
दौ‘येकप्लीन. यांयेकऱ् तीन विकार क्षयअँतुज्ञन्व मस्निष्कावरण’
दृयूं’ष्ट जाते, ऎवूद्वै येद्वैनन्सि हॉतें.
याद न'ळावप्च्या रळोगांत अंतर्भूत होतो व त्यांत थोड्या ’अव’
र्थांत पुष्कळ जलत'चव होऊन र`[ग^[ द्गावण्याचाव तभव
अतलॉ मुले वहुघां फार
विक्वा’तें झाल्यामुळे अर्ते होते. अथवा ह्याच्या येष्टणात कांहीं
वर्षे वांवत चाहाँत. पण अतलाँ गाणर्ते म्द्दातारपणापर्येत
जगल्याचीं उदाहरणे नाहाँत असें मात्र नग्हे‘व्. यांताहे
सौम्य असे बरेच भेद् असतात व त्या तऱ्हेची मुल जरी
मोठ्या डव्वय'र्ता असल? व इतर लक्षणद्दि व्यानां असली
तरळो कालांतराने व"! कमी वमॉ होत जाऊन मुलाची प्रक्रुति
क्षुधारते व डोंक्यार्ची फुगलैलळो पातळ हाडे, लहान
र`[ग दोऊनद्दि श्नर्से होते. याचा केवल
होऊन तग्हों कालघेतरार्ने टणक न मजबूत होंतात.
जास्त अततौ. त्याचे नवीन सदर रोगात सांपर्डल. येथे फक्त
पाँर्थकालव्न रोगाचे वर्णेन दिल आहे. कारण तशी माणसे
मोंर्वेया-डळोनयाचीं वर’ऱन पहाण्यात येतात. जलतचग कोठें
होंतौ हे तर त'ळागिंतठेंन आहे. गर्मांच्चस्थेंत गर्भातव कांहीं
क्षुद्धदाहार्शी अगर
ड प चा र.…यावर पुष्कळ उपाय व आँपथें उपयोंजून
क्षपनंतुजन्यदाहाशॉ कांहाँएक त'ऱ्र्मं'घ नततळो. हा रोग उप…
जत झाला असल्यास प्रसूतितमर्यो वरळीव अडचण होते.
परतु त्याचा उद्धव बहुतकरून
मूल
उपजल्यानतर
णांहेर्ली आहेत
पण म्हणण्यातारखा
असाच अनुभव आला.
तह!
डॉकँ
उपयोंग
होत
नाहीं
फ्ट्टयार्ने आंवळून बांधणे,
महिन्यांच्या प्रांत होतो. यापेंक्षां अधिक वयाच्या मुलांमध्ये
जलतनव जिंकत ज[व[ म्हणून प[=याच“[ औंषथें व भस्में
फार मोठ्या याणतद्देमघ्ये'द्दि तों होतो पण हे अपवादात्मक
आहे.
ल क्ष व्प् ,…प्रथमतध् शरीर व येष्ट्ररा यांच्या आकारयानात
ट्रॅ ऊन पाटिलळो. फटींतून पोकळ सुईंसाररप्या ना’लेग्रैनें र्टप्चून
जलतनय मधुन मधून त्यामाग कगळी फरप्ऱ्न पाहिला पण
व्यर्थ.
पम्कळातल्या जलाचा तवव व [नकाल उद्रात व्हावा असा
हेंतूर्ते शस्त्रक्रिया केल्या, परंतु व्यर्थ. शैवटीं हाच उपाय उत्तम
एकत्र जुळून आलठे नततात व त्यांतळोल फटों मोंकळया
असतात. यामुळें डॉक वाटेल तितके मोटे होण्यात फांहाँन
प्नतिन'प नततळो. व अस्थीमर्थाल फदळो
मात्र
ठरला फॉं पौष्टिक व पचण्यम्त सुलभ असें अन्न,, दूध, वगैरे
पथ्वकारक पदार्थ व लळोह्र, फरेंर्फव्, कळोडां‘तैव्हृर तेल हाँ व
मोठमोठाल्या
इतर शक्ति व पुष्टिवर्धक औंपवें व उत्तम भाज्या आणि
विपुल हर्वंमघ्थें मुलात विहार पत देणें या स्वरुप व स्व[भ[॰
होतात. अशा विशिष्ट प्रकारच्या माणसाची मस्तकस्‘ट्वबेघळी
क्रुस्नपता विचित्रव दिसते; तो अशोम्…कप[ळ[व[ वरील
भाग क्रुगून शान
पुढें
थेंऊन
डळोळ्याच्या
[चेक उपप्यांनॉच वरांल तौव उणयापेंक्षां कम्येसिद्वी अधिक
रवळग्याताल
वरच्या पातळ अस्थी पुर्हे फुत्रूप्न तिरफत झालेल्या असतात.
त्यामुळे दृष्टी भुमौकडे वळललळी असते, व बुवुळाचो हालचाल
पाश्वेकळोष्टांतील जलस'चयाचा निकाल व तबँघ मस्ति-
ष्कावहूंणाच्या पोकळीशट्रॅट्युहावाळूआणि फमरे’तळील पुथ्व'शप्च्या
विशरेमित दिसेल इतका डरैनयाचीं कवटी हळुहळू मोठळो
दोऊ लागते. या वयामघ्थें मरनुकावै निरनिराळे अस्थी
होते.
,
जळयेत्रशास्त्र-पप्णीं व प्रताहळी फ्दाथें यांच्या गति-
कशोशळोच गरागरा डोळे फिरविल्याप्रयार्णे असते. ङळोकँ मोठें म् स्थिप्ते’विंषर्यो तत्त्र्वे प्रत्तिपांदणारँ हें शास्त्र आहे, या
आणि वैद्य वळारळोक यामुळे हे मूल एखाद्या आबोंचाप्रमाणें हें शप्स्राने जला’रथा’ते व जलगात्तेशास्त्र असे दोन भाग आहेत.
दिततें. ष्प्र्डे बारीक व अशफच असल्यामुळे शरळोर अगद्ळो स या णगांल्ळील वस्तू घन अथवा भरीव किंवा प्रताइखषी
किरकोळ अततें. डीकळोवर यारळोक व थॉर्दाशळो लव असते. ‘ असतात. लाकूड, दगड वट्वेंम्रे पदार्थ भरीव होत; व पाणी,
यांत नततातवझतलॅ तर"! चातक किडके अततात. डोक्याचा
हया वगैरे पदार्थ प्रवाद्दखपळो द्दळोत. प्रवाद्दस्द्द्पाँ पदार्योचे
वैर मोजला असतां तरातर‘हेंर्मे २२ इंच भरतो. नक्विया , जलस्द्पौ व वप्युखपळी असें दोन भाग अततात.
या द`म्दॉ॰<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ रिकामे पान बनविले
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/९
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दाराष्ट्र’प्य सष्नवऱ्प्श. ( ज्ञ) १८६ जलसंन्नप्स जलसंत्रास पक्षापाताप्रमार्णे दौवैल्प येऊन खालचा नवदा लोंवता व उवद्या रहातो व त्यास चारी पायांवर उभे रहाता येत लण्याचा अवका..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दाराष्ट्र’प्य सष्नवऱ्प्श. ( ज्ञ) १८६
जलसंन्नप्स
जलसंत्रास
पक्षापाताप्रमार्णे दौवैल्प येऊन खालचा नवदा लोंवता व
उवद्या रहातो व त्यास चारी पायांवर उभे रहाता येत
लण्याचा अवकाश किंवा पाणी अगर पाण्यार्चे भांडे नजरेस
नाही, अन्न मिळता येत न[›-.॰॰[ व ड्रुळात्ग्रू येतो.
म्हटले तरी हे श्रांचकॅ येतात.
रळोगाम'ये
पा’हेल्या वरील
येदरँत
नळी
मुतोन्याद
पडर्णे अथवा करेणी सैन्याला अमल पाणी प[ज[ असे नुसते
फांहो
कालानेतर एखादी
पितालल्याप्रगान्ळा
पाण्याची क्षुवूऱ्क अगर एकदम लख्रव प्रकाश नजरेस पडला
डन्यादावस्या असते
तो नसते; आणि सव्रँ॰[ग'[त
पक्षापातावस्था एकदम लवकर प्राप्त होऊन मृत्यूद्दि लवकर
येतो. या र`[ग[स ते माणसास होणाऱ्या लक्षणावलन नांव
असतां अथवा कानावर एकदम मोठा ष्टवा’न ऐकू; आला
असतां व अकासप्रख्या अन्य बाह्य कारणानौहे आंचके
पडते आहे ते लक्षण म्हणजे पाण्याची र्माति. हे लक्षण या
आवक येऊन अन्न अगर
दोन्ही भेदांमप्थें क्रुव्यात मुळीच नसते.
कारणें:…पिस[ल`लर्ले
क्रुत्रे
जितक्या
लछ्येनां चावतें
त्गांतव्ल सुमारे अर्णां लोकानांच या र`[ग[च”[ भावना पुढें
होते असा अदाज आहे. हात, पाय, तोड इत्यादि वस्त्रहोन
अगास दंश झाला असतां लक्षणे इटक्रून फॉंहो काळी उद्ध-
वतात; पण जर दशांच्या मागळामघ्य कपडा अडकला असल
तर त्याच्या योगाने विंपससगे होण्यास सर्व जरी नाहो तरी
काहो ररेग्यांत तरी प्रतिबेघ होतो. त्वचा किंचित खरचटलळो
अतलळो असतां तेथे अगर ’ठेध्यावरण त्वचेच्या ठिकाणी
ऱव्गरेंत्पात्ते
झालेल्या
क्रुत्र्याते
प्रेमाते
वाटते
तरी मघ्णतास विंपवाया होते. हें विष प्राप्’यात टोंचून घातळें
असतांना प्रभोयावसन अर्धे
सिद्ध होते की है
विष
शरीरात
अक्षुर्पिड,
स्तन
मुख्य
व
मक्कास्यार्ने
पँकिया
आणि
लालाग्लि,
पिंड यांच्या
रस[च्या
ठिकाणी पसरून हो इंद्रियें ढूपिंत करते. पयोगाऱ्प्‘ अते
सिद्ध केर्के आहे का हेविप दूरऱ्स्य मजात'बूच्या मांगे
शरीरांत पसरत ज[ऊन मध्यवर्ती मजास्थानांत प्रवेश करते.
हा रोग तर्थ वयाच्या माणसांस होणें सभवनकुय असते.
परंतु पुम्ऽपाये क्रुत्र्यार्शी सदेंनिघ्य विट्रॅऱष रळोतोर्ने घडत अस॰
येण्यास निमित्त पुरे होते. अवनळिलकच्या स्नायूमध्यै हे
पाणी त्या नळोवाटे खाली जात
नाही. शिवाय श्वसनक्रिया ज्या स्नायुच्या योगे होते त्या
स्गावृंनांद्दि आंचकै येतात
रोगी एकदम
टाकल्याप्रमाणें
त्याचे खाते
व ते आपल्या नजरेस पडतात.
हुंदका आल्याप्रयाणें
अगर उस[स[
एक दळोर्थ श्रात झटकन घेतो. त्यावेळी
उंच
होतात;
छातळी
विस्तृत होते
व
मानॅवे पोठाले स्नायूश्चास आंत घेण्यासाठी खूप ताठतात.
रॉग्यास वळेच पाणी पाजण्याचा यत्न केल्यास ते धुंकून
टाकण्याचळो ररँगी आपण होऊन पराकाष्टा करतो आणि त्या
पाणी पाजण्याते आपण अत्यंत येदस्वन गेला असे द्शैवितो.
यानतर हे आंच’है शरीरात सर्वेच
स्नायूंमच्ये मुल
होतात.
व ते घनुवनृनांतळील आचऱ्त्याप्नयार्णे सतत असल्यामुळे
सवकुंग ताठते. रौग्याचळो मिळण्याची शक्ति नष्ट झाला हे
अन्य तऱ्हेते लक्षात येते. ते असे कीं तोडांत स्वामतघेक नी
थोडी लाळ असते तिरैव या रोग्यात मधून घुटके मिळता
न आल्यामुळे
तो तोर्डात जमते व तिच्या र्फेताळ अशा
दाट बुळा तो चोहोंकर्डे कफ खाकखन बाहेर टाकल्या
सारख्या सदा टाफीत असतो.
यानंतर या अ[च॰
त्यामुळे [अर्थात हा रोग कमी प्रमाणात आढळतो.
लक्षणें:…देश[नें अगर ससगनि’ विपप्रबैप झरिं'यानंत्ल्
क्ग् चौ तळोत्रतप्न’हे उत्तगैतर वाढत जाते व त्यामुळे रोगी
अ. [क'व चिरडखोर होऊन वळोलत छुटतो अगर वात होऊन
वरलतों र्किवातेला होऊन जवळच्या माणतास ड्जप्कर-
रॉन बराच कालपर्थत गभीवरथेंत असतो. हा काल वहु’घां
प्याचळो प्रवृत्ति दाखवितो. कयाँ त्यास विलक्षण
मातेविंम्नम
रळोगाते
होऊन न±न[ तऱ्हेये व्यास मिथ्याभऱस होतात. ज्वर वाढतो,
रव्ग्मंस खाऊ घालण्याचे सर्वे मम वाया जातात, रोग्या-
चिन्हृ नजरेस येत नाही. लक्षांत येण्यासारखे पाहेलँ लक्षण
च्यार्ते फारच मनौनिप्रइ करून आंचकँ क्षणभर थांबवून घस्लॅ
म्हणते हे क”[ देश वरा होऊन येथे वण असतो तेथे काही
चमत्कारिक तऱ्हेचीं वेदना भावृं लागते. कघळो तर हा
तर एखादा ट्टयाचा घोट गेला तर नातोट्वेंअशळी काठेंण अवस्था
प्र’प्त होतेथोज्याच अवपॉत या निरशयाते शरीर भयंकर कुश
होते, व ग्लानिं येत जाते हे सांगण्यास नकोच. कधीं कधीं
होन ते नऊ आठवडे असतो. परंतु कित्येक मद्दियेपर्थतद्दि
कर्थी कपींलावतोवया
काळामध्ये
काझी एक
वेदना आहे तोच स्वरूपात असते व तो वर्णांहें किंचित
लालसर झालेला आढळतो; व त्यावर बोट लाविर्के असतो
तेथे द्रुरवते. पण इळोद्दि चिन्हे फांहो रॉग्यांनां मुळीच होत
चाहोत;
आणि
मग प्रथम पुढील
हात पाय गलाल्यातारखे
होऊन
लक्षणे
मनास
होऊ
लागतात.
व शरीरात चैन
पर्डेनाते होते. अंगाचीं उलयाल होव्ळा, झोप न लागणें, विद्वा-
खोरपणा, अत्रावर वयेंछा कमी कमी होणे व घशांतु गुद्मल्यासप्रखें होऊन
त्या ठिकाणी अस्वस्थता वाटप्ब्‘ळा,
यानंतर
’_हु'ऱ्हेंघ्त्‘ऱ् अवस्थेत अटक व आवक पुंस होतात व ते विशेष
प्रकारचे असत[त.र`[ग्यार्मे पाणी पिण्यासठीं
भांर्डे डच…
अगदळी शैवटळो तेवढी हेआंचक
थांबतात.
आणि मृत्यू
समळोप आला असतांवारोग्यात वरेचते अन्न जाते. पण
ते जाऊन काहीं मृत्यु टळत नाही. त्यानंतर पक्षयात होऊन
येदुंप्प्द्वे येते. क’हो रळोस्थांस त्यामुळे हात पाय हलविण्याचळो
शक्ति, अगर स्पर्श चाणल्ग्'ळा, गुद्गुल्या होव्ग्,ड`[ळे फु'कर
घातला असतां मिटणे' यासर्व क्रियानष्ठ होतात. इतकळो
सर्वे लक्षणें होऊन मरण येण्यास दळोनपाघून चार दिवस
वहुंपां लागतात. र`[ग फारच लावला तरळी दहा दिवस फार
तर रळोगळो जगतो; च फौणताठि रळोगळी वरा होत नाहीं, इंद्रियें<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महागट्रीयमानफॉंश, (ज) १८७ जलसंत्रास फारशी विघदृललाँ आढळून येत नाहाँत. मस्तिष्कपटॅरज्ड्रुज्ञल वरयेवर साच्या पाण्याते वुळां खुळतुळचून टाकव्त बाब्या. वद्दिगत आलल वहुघां आढळते म..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महागट्रीयमानफॉंश, (ज) १८७
जलसंत्रास
फारशी विघदृललाँ आढळून येत नाहाँत. मस्तिष्कपटॅरज्ड्रुज्ञल वरयेवर साच्या पाण्याते वुळां खुळतुळचून टाकव्त बाब्या.
वद्दिगत आलल वहुघां आढळते मस्तिष्कावा वाहेमाग नेतर देशाच्या ठिकाणी मेट्रिक आसिडार्ने अगर लरेखंड लाल
पप्नरज्मु
॰
व [वेशेगत येडाला भावलागटा या भाषा' होईंर्तो तापवून भ[ज[र्वे. अथवा शस्नानॅ जरवमैचा भाग
मध्ये पुढील ब्रूक्ष्म फरक फक्त सूक्ष्मवशक येमानॅच कापून काढून नतर र`[ग्यास पास्टहूंर सरथेमघ्ये ररेगप्रां’तेदिसणारे होतात ते असे:…रक्तयाऱ्हेन्वचिं विस्तरण व त्या चमक औषधोपचार करून घेण्यासाठी पाठवाव
मोंवत’व् पेंशळोवै समुदाय. इतर ठिकाणी अतेच पेशींचे समुपास्थ्पृरच्या प्रनिबै’वक उपायाते
त्रोटक वर्णन:पिसाळलल्या क्रुच्णर्वे विष अनेक तज्ञांच्या शरीरात टोंट्टन
दाय व रक्तवाद्दिन्यांत माँठलॅंते रक्तवाहिन्यावून झालेलै
व.[‘र`ष्स[रीक रक्तत्नाव, पांढऱ्या पेशळोवे समुदाय, लालापिउ याकॄन नंतर त्यात हवा लागेल अशी योजना करुन नेतर
व मूर्षापडाच्यप् ठिकाणी बरेच आढळतात.
शोधकानै
काही
विशिष्ठ
कण
नेग्नळो नांवाद्या
मजापेंणीत अर्वेतेल
सिद्ध
केले आहेत व ते जेतुकरेटर्पिफाँ असावेत किंवा काय या…
.‘येपमी नचक्रु युह्'च् आहे, कारण ते या रच्गांत याठिकाणी
सांपडतातच.
नि दा न.…जखम
पूर्वी
आळी
होता
व
क्रुत्रे
चावलैं होते हा पूर्वेत्तिहात माहोत असला म्द्दणते हा रोग
ओंळरवण्यळास अडचण
कांहोच
नसते. या र`[ग[त्त्[॰[ मधली
अवस्था वनुवळीताप्रमाणें भासण्याचा स'मव असतो; पण त्या
वातामध्थें येवढो मन[च^[ म्रमिंथ् व बेभान स्थिति झालेली
नसते. भौति'नन्य वातोन्मादाच्या सोयावै, विशोप्तभ् त्यास
अगोदर एखादा कुत्रा चालून हा रव्ग होण्याची धास्ती
त्यास पडली असेल तर या ररेगा‘र्शी पुष्कळ साम्य असते.
त्या रॉगांत असणाऱ्या उन्यादप्लॅंकद्रुकवातार्चे या र॰[`ग[त
असणाऱ्या गलतेकोंचन या लक्षणर्क्स वरे’च सादृश्य रा`ग्यास
भाढूनतो
विनाकारण ["भतो.
अश[ काल्पनिक
मीतौर्ने
काही काळपर्थत जलसत्रासम्नम अशा यकृताच्या माणसामच्थें
होऊ’ शकतो. यावे खाचच्नॅ निदान होण्याताठीं या रॉगाते
मृत झालेल्या प्राण्याचा येडाला आँवलागेटळा न[व[ऱ्वा मस्ति`
ष्कातोल मगचाचा दाट दव तयार करून तो एखाद्या सशाच्या
मा’स्तष्कावरणाखालॉ टोंवतात. आणि पण त्यात हा रळोग
झाला म्हणते रव्गप्च्या निदानात वळकटळी येते. देश करणाऱ्या कोंणत्याद्दि प्राण्यांमध्ये हा रोग आहे किंवा नाही
याची सत्यता य;‘ पद्वतच्ते नेहेमी सिद्ध का’रेत[ येते. दिंपो.
नयांपस मेजर न[व[चा एक भाग या मगज[त
असतो त्याचे
ते विष रत्ग्यास
डोक्याच्या
कवटव्स
र्टीचितात.
भोक पाडितात. आणि
तयार करुन या
मोंकाच्या मागें
काळ कमी कमी होत लाऊन
त्याचे क्केश कमी
झाल्यासारखे होतात.
येऊं नये यासाठी पुढील प्रतिबेघक
होय:~…दंश
झाल्यावरळोवर
'दश[ये
उपाय
पण हो स्थिति
करणें श्रेयस्कर
जरा वरील
भागावर
पण र[ग॰
या वेळात
अरेवरग्स तो तात दिवसयिर
येतो. या सशळाच्या पष्ठरज्जच्या सर्वे भागांत हेविष पसरलेल असते, परंतु तिचा एखादा तुकडा कापून तो
काररचा हेर्वेत ठेंविंला असतां त्यांताल विष इवाळिमा’श्रेत
झाल्यामुळे
उडून
कमी
हरैऊन
टांनवळीर्य
होते व
शेवटी त्या तुकडयार्वे आकारमान
आणि
इवेते उष्णमान
या दोहोच्या मानप्र्वे थोड्या अगर
फार
अवघीन'तर
तुकड्यांतून ते विष साफ
त्या
चाहोते होते. प्रतिवयक उपाय
करण्यासाठी तो दाट द्र्व तयार करतात त्यासठीं अते
पृष्टऱज्बूवे तुकडे कोरडी हेवा असलेल्या निरनिराळ्या च[ट॰
त्यातुन टेळिवतात व हे सणाच्या शरीरातून पेंतल्ड्रेल असतात.
कोणता तुकडा कोणत्या दिवर्शी त्या पातळीत ठेवला गेला
आहे त्याच? नोंद त्या चाटळीवर एक कागद डकवून त्यावर
करितात. अशा तऱ्द्दे'नं या वाटल्यातील पृ…घ्ररज्हूंचे तुकडे
कमी अगर अधिक दिवसांचे जुने असल्यामुळे त्यांताल
विषाच्या तौत्रतेर्तांहे कमीजास्तपणप् असतो. आता समजा
र्को एखादा
तुकडा पघरा
दिवस वाळलेल्या
फक्त मार्पिव्या हे भीपप मधून मयून ’:[चिल्याते
अगर क्कोरॉफामैं हुंगविल्यार्ने ररेगळो गुंगुन '[डतो व
मस्तिष्कावरणाखालीं
ररेणच्या गभौवस्येचा काळ म्हणतात. या पहिल्या सशाते
विंप दुसऱ्या सश[स व दुसऱ्या सणाचे तिसऱ्या सश[स
याप्नयार्णे टोंचींत गेल्या'न उत्तरळात्तर र`[ग[च्य[ गमौवस्थेंचा
यापीं माया त्यावर चालत
आहे.
पिताळलैल्या
टोंळिचतात; म्हृणवे मग तो ससप’हे पिसळितो.
चिन्हे न्देहूं लागण्यात पघरा दिवस लागतात.
त्याचा थोडासा भाग एखाद्या
अनुभव
सशांच्या
क्रुत्र्याच्या पुष्ठरज्गुंचा काही भाग घेऊन त्याचा दाट द्रव
पातळ पापुदरे कातग्द्मन हूंक्ष्मद्शैक येत्रांतून तपाशूमाहे प्रा
र`[ग्[[र्वे निदान ठरवितात.
उ प चा र.…रॉग दिबुं लागल्यावर कौणत्याद्दि उप[॰
नाही असा
यासाठी प्रथम
दिवस
निरोगी
ठेवलेला आहे आणि
क्रुत्र्याच्या शरीरात
त्वचेखालज् टोंट्टन घातला; व त्यानंतर वरीलप्रमणि चवदा
तुकड्यांना अश दुसऱ्या दिवशी, तिसऱ्या
दिवशॉ तेरा दिवस वाळतेला; चवथ्या [देवर्शी चारा दिवस
वाळतेला: अशा कमानें एकच दिवस फक्त तो तुकडा
पाळला आहे असा जलाल विष अस`लला तुकडा गेवटॉ
टोंचण्या'त येतो. नंतर असा चमत्कार अनुभवात येतो कळी,
अशा क्रुग्‘यास या
रोगाचा [वपवाया होत नाहो.
पिसाळ-
तावडतोव एका दळोरळोर्ने ( देश हातपायाद्दिकांस झाला अस॰
ल्यास ) घट्ट बांघावे; व नंतर ज्यामाणसाच्या अळोठाचीं त्वचा
ठेर्ले क्रुचँ चावलैल्या माणसास या प्रकारातेच कित्येक दिवस
टोंहूंन प्रतितेघक उपाय करतात. मात्र दश झाल्यानंतर व
शां’त्रूत अतेल त्याते तो जरवम चोखुन रक्त धुंकॄन टाकार्वे व
ररेगलक्षर्णे दितूं लागण्याच्या अगोदर जितक्या लवकर हा<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "क्यारपेव् जलालग्याद मद्दासट्रीय समाफॉंप्त. यूज» १८८ उपाय करता येणें तो उपाय करावा शक्य असेल तितक्या लवकर हें चांगते. म्हणजे मग या प्राणघातक येगप्पाक्वा रॉग्याचा वचप्व खात्रा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>क्यारपेव्
जलालग्याद
मद्दासट्रीय समाफॉंप्त. यूज» १८८
उपाय
करता
येणें
तो
उपाय
करावा
शक्य असेल तितक्या लवकर
हें
चांगते.
म्हणजे मग
या प्राणघातक येगप्पाक्वा रॉग्याचा वचप्व खात्रां’डूं होतो.
एक चांगला किल्ला आहे. एके काळी हें भोसते राज्यातव्ल
पश्विम सरहद्दळावर‘ण्ल ठग्ये होते. वर्धा नदळीतळोल एका खडकाळ
बेटावर हा किल्ला बांधलेला असून तव्न या'र्दूळानंळो रवउकावै
काहीं रौगळो जास्त तोवतेंच्या लक्षर्णांनॉ र्षांडित
हुळकै अहूंन ते नदंळोत आहेत. चवथ्‘या वाहून दरयाता
ळल्यास त्यांस टोंवण्यासाठो
असें आड…
वरल्लप्नयाणेंच
पर'तु' अधिक
तोवसक्तींवा घट्ट द्रवतयार करून टोंवतात व टोंवण्याव’ग्
क्रिया वरचेवर अधिक वेळ? करावी लागते.
बुडापेस्ट यैर्यांल एका डाव `.;नें या प्नातेंव'वक उपऱ्याचीं
वॅगळी तऱ्हग् शोधून काढली आहे तो अशी:…- प्रथम
ज्या सशांत हो रोग
कृत्रिम रींतानॅ उत्पन्न केला आहे
अशांसशावळोपृष्टरज्ड्रु
धेळ‘न तिचा…” या
प्नमऱ्णांत
असठेला असा पातळ द्र्वाग्र्हे तयार करावयाचा. नंतर त्यात
अधिकाधिक पाणी
घालून १३नृ०००० प्नमाणापर्मेत
निरनिराळ्या विपरेंळाकोवै द्र्वाकट्टे तयार कसन ठेवावयावै.
र`[गां आलप् म्हणजे त्यास प्रथम
द्र्वाकाँते टोंवण्यास आरंभ करुन
अत्‘रँत
दररोज
र्तींवतेवै प्रतिबंधक औंपव टोंचून शैवर्टी
द्र्यावईं टळोयावयावा.
रफैगलक्षव्ळा
सुरू
होनश्ळाक्तळोच्या
अघिकाळाघेक
अत्यंत ताव
झाल्यावर
तो
नरप् करण्याच्या लशो कित्येक शोथकान’र्दे तयार केल्या
आहेत पण त्या या विशिष्ट ळिवषावर अचुक गुण वारव’
वितातव अरेंने नाहॉ.
त्या सामान्य ज्ञ'तुविनरिंळाक
असल्यामुळे थोडासा
गुण
वाटतो
जो हळी' रूढ असतेलळो पद्धति
एवढंच.
शोधुन
पास्टयूंरर्मे
काढली आहे
अहूंन
त्यास
रवडर्फातच खोदलेल्या तागमोउळो
रस्त्यानॅ
जप्र्वे लागतेरुव त्याचे रक्षण करण्याकरिता दोन वुसन आहेत.
जळघ्ळप्याद’म्या गांवावग् अफगाणिस्तानांतळोल एक
प्रांत अवून त्याच न'ळायार्वे एक शहर आहे. हें शहर काबूल
नदीच्या दक्षिणेकडील मैंदानांत समुद्र्सपत्टळिपासून १९५०
फुट उंवळावर काछुलपाहूंन ९६ मेल अतरऱ्वर व पेशावरप[मून ७६ मैलांवर आहे. तेर्यांल लोकसंख्या सुमारे ४०००
आहे. पेशावर व या शहरामध्ये रँववरघाट आहे व काबूल
व जलालप्यादमघ्ये ज्ञगडालक, खुदेंकावूल वयेरे घाट आहेत.
हो गागा यावरर्ते पसत केली व त्यार्ते या ठिकाणी कांहीं
वर्गांचे लप्विंठे. परंतु हें शहर त्याचा नातू अकवरइप्तहा यार्ने
इ. स. १५६० मध्ये वसावेते. कावूलच्या धर्तीवर वांथलेहँ
है एक छोटँखानळो सदर आहे. येथे एक मुख्य बाजार आहे;
व येथील रत्`त साधारणत: फार अरुंद आहेत. या शहराच्या
हातैहोसासव'र्धी विरोप प्यानर्फेव ठेंवण्याज्ञळोगॉ गोष्ट म्हटली
म्हणने पहिल्या अफगाण लढाईच्या वेळीं स. १ ८ ४ १ नोव्हेंबर-
पाखून इ.स १८४२ एप्रिलपर्मेत सर रळावटे सैल याते याशहूं॰
रवाकेठेला प्नप्तिद्वववाव हो होय. हें शहृर इ.स.१८`ळं ऱमध्र्थे
तोडून दिल्यानंतर जनरल परैलक यार्ने या शहराची तटवंदळी
तिची तर या लशीनां मुळीच नाहाँ. फार तर ताबडतोब पाडून टाकळी. पण १८७८ मध्ये तो फिरून बांघण्पांत
पाह्टयुर सल्र्थेत एकदम जाणे शक्य नसल्यास मधल्या ’ आलो. आतां या शहराला मजबूत भितोचीं तटबंदी असत
मुदर्तींत त्याचा उपयोग करणें रास्त होईल.
तिला बुव्ज्ञ व झरळोकॅ आहेत. ज्ञलालावादचप् प्रांत वुमारें
एखाद्या वस्तोत पिसाळल्ड्रेर्ले कुर्धे असल म्हणजे ते मरें'
पर्यंत दुसऱ्या क्रुत्र्यांस व प्राण्यात दंश करकखन
मध्ये सप्तगें फैलळावण्यास कारण होते. यासाठी
दोन
रुंद असून
त्यामध्ये काबूल
नदीच्या उत्तरेकडील लाघनन जिल्हा व दक्षिणेकडील निंप्ना'
अते एक
हार जिल्हा याचा समावेश होतो. येथील हवा पेशावरसारखो आहे. व्यूइरवताशास्त्रदृष्टया ज्ञलालावाद हें अफगाणिस्तानढेंतोल एक अतिशय महत्वार्वे ठाणें आहे; कारण
येथून लप्घगन व कुतारखोऱ्याच्या प्नतेंशद्वळार'प्वर नजर
क्रुत्रे आढळल्याचररेंवर वरच्या सर्वे पाळीव क्रुत्र्यात,
लोकांस (हेस करतां येऊं नये अशा तज्ञविर्यांच्या ताहें’च्या
मुसवया यातल्याच पाहिजेत अशी सक्ति द्र्ग्लर्डात काय’
द्यार्ते करिसात. व अशी
पिसाळलँलाँ कुत्री
अगदी
आढळत नाहाँत असे झार्के म्हणजे हो सक्ति काढून टाका
फक्त विनपाळींव कुत्री कुचल्याच्या
तात. आपल्या देशांत
८० मेल लांब व ३५ मैल
बनते,
सत्याचे विष घालून ठार करणें एवडॉच रववर'दारळो घेतात.
ठेंळिवतां येते व येथून हैम्‘वरघाटप्च्या उत्तरेस ळिवत्रळ व द्दिदु‘
स्थान यांचे रस्ते, ततेच काबूल-पेशावर रस्ता यांच्यावर तावळा
ठेंवित'प् येतो.
येथील कोरळीव लेणीं गया येथील फाँरनृव लेण्यांसारखीहुवे'
सलिम जिल्हा, तिव्पहुर तालुका.
हुंव दिसतात की त्यामध्ये काहीं तरळो सबंध असला पाद्दिव्न
उ. ञ. १२"रै५,’॰ व पु. रें.७८’३४’ लॉर्ड्स, (१९० १) २०५, ,
ज्ञलारपेव्-‘मदास,
रेल्वे
असें विल्यम प्तिम्सनू साद्देवास वाटते. [ इंडियन अँळिटक्वरळी,
पुस्तक ८ पान २२९, आगष्ट, १८७९ ]
यास महत्व आलें आये.
जलालावाद्, स ह तो ल.…नंथुक्तप्रांतांतव्ल शहाज्ञद्दावपूर
हा गांव मद्रासपासून १३२ मैल व वगलोरहूंन “मेल आहे.
बिल्ह्यांवळी नैऋत्येकडील तइसाँळ अड्रुन तिर्वे क्षेत्रफळ ३२४
ज्ञाछालखड …मच्यप्नास, नागपूर जिल्हा, काटळोल तहसळोल. काटोंलच्या वायव्येस १४ मैल व नागपुसढून ५३
मैलांवर वर्धा नदातोंरॉ हें रँवडॅगांव आहे. लोकवस्ती
सुमारे दोन द्वार आहे, या ठिकाणी नरप्ग्यांनॉ र्षांघतेळा
चौरस मेल आहे. उ. अ. २७^३५’ ते २७`५३’वपू. रॅ.
७९॰२॰’ ते ७९५४’. लेप्क'सख्या (१९११) १७३ ७५५. या
मदास सदनै
मराठा
रेल्वे आप्’णे साऊथ
यावे हें जॅक्सन असल्यामुळे
इंडियन
तइप्तिलौत एक गांव व ३५६ रँवर्डी आहेतइ. स.१९॰३-४
मध्ये नमाँनमदचूल २१२००० रुपये होता.
तहृसिळीच्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१२
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दाट्रीयेक्काकॉँश (ज) १८९. अटीवर नैऋत्येस नंगा नदळी वहात असून तो रामग'या तहशिलौतूनच म[न[पम[न सहन कराव सत्सयागन मिळवून मानव गावांच्या वहप्त जाते. हू उपयोगी पडा. याचा मुलगा हुलतान..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दाट्रीयेक्काकॉँश (ज)
१८९.
अटीवर
नैऋत्येस नंगा नदळी वहात असून तो रामग'या तहशिलौतूनच म[न[पम[न सहन कराव सत्सयागन मिळवून मानव गावांच्या
वहप्त जाते.
हू उपयोगी पडा. याचा मुलगा हुलतान हा का‘वे होता.
ग॰[ च,…सयुक्तप्रांत शहाजहानपूर जिल्हा.
वग्ळोल तह… टुं
सळोलत्र्वे मुख्य ठिकाण. उ. अ. २७॰४३’ व पू. रें, ७९॰४०’॰
जलाल हा स. १२७३ व मेल[.[ इंडियन अळीटपवरीं, पु०४ ]
जला'ळूद्दीन सयुतों-हा हेंजिप्त देशचा रद्दिवासळी
लोकसख्या(१९१ १) ६२६ ० .ह[ गांव जलाळुहोन फिरड्रेझशहा अलून स. १५०५ व मरण पावला. यार्ने लहान मोठे हुमारॅ
यार्ने वसा’वला अते म्हणतात. या ग[व[जवळुन रँल्वै बात [ ४०० ग्रंथ लिहिले होते. त्यांत क्रुघ्व-उळु-ळुबांक् हा मेष
नसल्यामुर्के यावे महत्व कमी होत चाल’लै आहेनांवाजण्यासारखा आहे. यांत त्याच्या पूर्वी होऊन गेलेल्या
जत्मलायाद्-सेधुंक्तप्रति. धुंझ्ळाकरनगर जिल्हा हैराण अरवळो प्रेयकारांगां ज्या ज्या ल`[क[न॰[ आश्रय दिला होता,
तहस’व्ल. मुसफरनगरपऱमून २१
`मैलावर
हा गांव त्"[[व‘[
नॉर्वे व चरित्रे दिला
आहेत. त्यावेळी
आहे. उ. अ. २९॰३७’ व पू. रे, ७७‘२७’. लोकसंख्या अरवळी प्रेयकारावें स्वत:चे नांव कारते पुढें येत नये, तर
( १९११ ) ५१६६. अवरंगझेव’च्या कारकीर्दीत जलालखान त्याच्या आश्नयदात्यांचेंच नांव पुढें येई. याप्नमार्णे हे पुस्तक
नांवाच्या पठाणाते वसविर्हेऽ अते
म्हणतात.
जवळच एका
मैलावर नजळोवरवम्न रळोद्दिल्यानॅ बांधलेल्या योसगउ श्विक्कयावै
अवन्शप आहेत.
झाथितखायाच्या कारकीर्दीत हा
गांव
पुष्कळ वेळां मराठयांनीं ठुटला होता. अद्यापि एका मराठयश्स
तेथे थोदेते' इनाम आहे.
ज्ञलाळी-सेपुंक्तप्नति,
तहमळील.
अळिलगट्व जिल्हा,
आलेगङ
अलिगङच्या आमैंयांस ११ मैलांवर हे एक सप्त
आठ हयार लळोकवस्वळीवै गांव आहे. उ. अ. १. ७॰`२'॰[ आणि
पू. है. ७८ ॰१६’ यांमध्ये आहे. येयाल आवकारा मुमुलयान
( तेय्यद )
अधून
ते शिया पंथाचे आहेत.
म्हणजे एक प्रकारचा ग्रंथकार-कोश आहे. याशिवपिं
काशफुस-सलसल-उनू-वसफुज झलझल या नांवाचा एक
ग्रंथ त्यार्ने केला आहे. त्यांत इ. स. ७१३ पासन १५००
पर्मेत आलेल्या एकंदर भूकषांवीं माहिती दिरेष्लाआहे. याचे
(मुळच अरबी भापतील) इंप्रर्जी भांपप्तर डे’ण्. स्पिजर
यार्ने कैंल आहे. [ वॉल…ओरिं. यायों. डिवश. जनरैन
एशियाटिक सोसायटी, पु १७ या. २ ]
ज्ञळें’घर (जेल[तोर)-ब्॰[ग[ल, वलतोर जिल्हा. ड्रुवणेंरेंखा
नदळोवर उत्तर अक्षांश २१" ५९. ’ व पूर्वे रेखांश ८७" १३ ’
ते कोणा
यांवर हें खेंर्डे वसल्ट्रेल्डू आहे. कलकत्त्याच्या ररत्यावर हेंखेंर्टे
कयाळुहोयाचे नंशज असून त्यांनों सन १२९५ च्या सुमारास
असुन बंगाल नागपूर रॅलयेये हे स्टेशन आहे. पूर्वी मुसल-
येथे वसाहत केला अते म्हणतात.
य[न”[ पठाण जमीन-
म[न॰[च्या अमदानींत भिदनम्पूर _सुभ्'यावळो राजधानी होतो.
अठराव्या शतकात ईस्ट इंडिया क’पनोचीं एक फॅफ्टरा
येथें होती.
ज्ञठेसर, स ह तो ल.…सयु'कप्रांत, हटा जिल्हा. उत्तर
द्[र[न[ हांक्रून देऊन गांवचे सर्वे हक्क आपण वळकाळिवके. ते
अद्यापि त्यांच्याकडे चालत
आहेत,
येथे व्यापार फारसा
नाहो.
जलाळुर्दान मुहम्मद वल्रवी …हा
छुड्रुलयान अपन वल्सचा
रहिवासळो होता.
ज[स[चा क्रु[फक
अक्षांश २७‘ ०,८’ ते २७" ३५’ व पूवै रेखांश ७८० ११’ ते
हा १२०७ व
७८° ३१’.दैय्न्नफळ २२७चौरस मैंल. सन १९११ मग्यें लोंक०
सख्या १२४६७२. या सहसछ्लाँत १५७ खैडॉ व दोन गांर्वे
जन्मला. लहानपणी हा यापासह वलरव साडून जिद्यापुरास
आला. तेथून`त मक्का जससहैं‘ऽम करून तुर्कत्यानांस मेल.
आहेत. जमीन सपाट असून सुपीक आहे. बागाइतोकारेतां
कालव्यावै पाणी मिंळतें.
गां ज.…हॅ जतेसर सइशिलचिं मुख्य ठिकाण असून ईस्ट
त्यायेळीं`सलजुक घराण्यातील अछाउद्दान हा राजा होता.
तो
जलाळुर्दाताचा शिष्य
वनला.
जलालवा गुरु
शम्फुंपिं म्हणून
एक
आळिलया
होता. जलालवा
पट्टळिशप्य व लेखक
[हेसाम म्हणून होता.
जलालनॅ
गुरूच्या स्मरणार्थ [हङणप्ऱ् या दरवैशांचा एक
पथ
स्यापिला.
या र्पयाला यार्तेच नांव पडते. हा पथ
मैलांवर आहे. उ. अ. २७“ २८ ’ व पू. रे. ७८’ १९… ’
इंडिया
रॅलबौच्या
जळेसर रॉड नांक्प्च्या
र्स्टशनपांहू'ग् ८.3,
१९१ १ ततोकसरव्या १३२८३॰ यांयाचे दोन भाग आहेत; एक
[केला व दुसरा गांव. किल्ला पंधराव्या शतकात मेंवाढ’च्या
अद्याणीहे तुर्कस्तानांत आहे. [हेसाम हाच जलालच्या पुढें
राण्यामें बांधला अते म्न्ए॰णत[त हधों [केल्याच्या जागेवर सव
या पंथाच्या गादीवर वसला. जलाल हा कवि होता.
त्याच्या काव्यग्रंयार्चे न[व मस्नवळो. हा ग्रंथ सहा अघ्यायांचा
सरकारा कचेऱ्या आहेत. ग[व[र्त[ल रस्ते अतिशय अरुंद
आहेत. सन १८६६ मध्ये म्युप्मेसिपालटी मिळाली, येथें
क्रुर्णणांतग्ल वचनें वयेरेंचा सप्रह असून त्यात क्रुफौ तत्त्वज्ञान
ज्ञलौदऍ उदर ) …… शरीरातील कळीणत्याद्दि भागांत
रॉयापुळें प[र्ण[ सांचून सूज येते तेव्हो त्यास उदर किंवा
असुन त्यांत
निरनिराळे विषय, कथा, पौराणिक गोष्टी,
प्नमुस्वपर्णे सांगितलेले आहे.
यावा
(फांव्श्रग्रंथ)
हूंव्वूच्या वेळीं यार्वे
म्न्हूंणुवां आहे.
आता आपल्या शिष्यांनां केळी.
दुसरा ग्रंथ दिवाण
पुर्दाल
ईंश्वरावळो भीति बाळगा,
मितावरणी नसून ईंश्वराची प्रार्थना करा,
निरिच्छ
होऊन
व्यापार फारसा नाही. एक सोन्याचा कारखाना आहे.
जलौद्र झार्ले आहे अते म्हणतात. व या लेखांत जठोदर
(पळोटांतळील) व शरळीरावराल खून यांच वणन मुख्यत‘ येहळ
हे दोन्हा रहैंग बहुतकरून एकाच वेळीं आलते असतात. ज्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१३
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "ज्ञळींदर महोराट्रीय मानक’रेश (ज) १९० हातापायावर अगर वैहऱ्यावर सूज आललळी व`[ट[ते दावल असतां रवळगप् जलरै‘दर असते तेथे डळित्ह त[कन यातात. हात, प[य,[‘३[श्न व ट्टपणहेअवयवव्हे वेळात तो अ..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>ज्ञळींदर
महोराट्रीय मानक’रेश (ज) १९०
हातापायावर अगर वैहऱ्यावर सूज आललळी
व`[ट[ते दावल असतां रवळगप्
जलरै‘दर
असते तेथे डळित्ह त[कन यातात. हात, प[य,[‘३[श्न व ट्टपणहेअवयवव्हे
वेळात तो
अतियाड होऊन त्यांवराल लूज फुटून पाणी पाइय्रूं लागते.
पडतो व व:याच
आपोआप बुडून येऊन पुन्हा घूज दिसते. र|`ग्यास उताणा
हो लक्षर्णे नवान विकारात विंद्देप्प होतात
निजत्रून त्याच्या पाटावर आडवळो तोर्टे ठेवून तोटांनों ठोकून
ता‘हे जलळोदर होते. _ हे जलोंदर औषधोपचारानीं वरें
होण्याचा पुष्कळ सभव असतो. याशिवाय लहान मुलाच्या
पगहेर्ले
असतां
निरोगी
मनुष्याच्या
पोटाप्रपार्णे
नग[ऱ्यास[रखा अगर पोकळ आवाज न येतो, आंत पाणी
असल्यामुळे नद्द आवाज येतो व एखाद्या वेळी हे पाणी फारच
असून पोट कार मोंठें त[र्लठें असते. या रें[ग[त अन्नावरणावे
पडयांत पाणी त[वते. त्यास स्वतेत्र र`[ग पातळीत न[ह”[त; तर
हृदय, यकृत अथवा मूर्णांपड या र`[ग[र्चे पयैवसान या
मयेकर लक्षर्णांत होते. याचीं इतर कारर्णे वरॉव आहेत; पण ,
मुख्यत: तान प्रकारची वर सांगितलेला? आहेत त्यापासुन
बहुतकरून हा होतो.
यकूतविकारामुर्के होणारे
जलौदर:…यक्रुत[मघ्ये प`[टँ॰
लव्र्देन
न[व[व^[
माँठो
शोर, जप्ठर व भांतडॉ
यातोल रक्त यकूतांत पळोचा’वेणारळी असते. या श्विरेवर यकृ-
ताच्या नाना तऱ्हेच्या र`ऽयामुळें दाव पडतो. उदाहरणार्थ
अट्टल दाल्वाज ल`[क[त या यकृतार्वे सतोचन होते अथवा
ड्रुनाट
[हेवतापात
हो शीर व तिच्या
सर्व
शप्खा
दवल्या ज[त[तव'मर[मर जलौपर होऊं लागते. अगर
यवुग्'ताजवळील भागांत मो’थेराग न[व[व[ असाध्य राग
होऊन त्याचा दान या [शरेवर पडूगळिह हे जलोंदर
होत.
पोट यागरळीएवर्ढे होते. एखाद्या वेळीं कावाळाहे होते.
उलटया होतात, मल[वर`[व असतोच, प`[ट[वर निळसर शिरा
फुगल्ट्रेल्या दिसतात. पाणी कार वाढल्यावर आस येणें,
निजर्णे, वसर्णे, हलन्प्, हें सर्वे कष्टार्नेव होते. तेडोंसारखी
कडक दास अति पिण[र[न[ हा रोग ।‘बेंईंगष होतो. व तो
उपचार ककना’हे कष्टसाघ्य अगर शैवटळी असाध्यव
असतो.
रक्राशय विकूतीमुळें होणारें जलौदरऱ्-यामघ्ये पोटांत पाणी
पोट[त डवारोग होऊन,
व यातच पळोटां-
अथवा म्हाताऱ्या म[णस[त
ट्रेथि-
रव्गामुळें अगर षंडुररेंयामुळें रक्तनाश फारच होऊन अ’त्रावरणप्चा दौयेकालान दाह बुक होऊनळिह जठोदर होते.
पण हो कारव्प् कचितच पडतात व कारशॉ नजरेस येत
नाहोत. व बी येतात त"[ असाध्य असतात.
उ पा य:-ह[ स्वतंत्र ररैग नसल्यामुळे मुळ ज्या रॉगामुळें
ते झालेल्ब् असते तो र`[गच वरा करण्याचा प्रयत्न केला
पाहिजे. नुसते पळोटांतोल पाणी काढून टाकण्याते उपयोग
होत न[ह"[. कारण ते पुन्हां लवकरच भरते. वरव्ल सर्वं क[र॰
णांस एकच उपाय लागू पडणार नाहो हे उघड आहे
यासाठी अतुमविक माणसाकडून आप'व घ्याव. शरळीरांताल
विकृत पाणी बाहेर निघून मेल पाळिइज हे सव उपायात
मुख्य तत्त्व आहे.
यकृताच्या विकारात ते पाणी विशिष्ट
रॅवक औंपदृग् देऊन वरंठियाच्या म[ग॰[॰‘न पडून वाहैंलते कर‘
त[त. हृदयामुळ होणाऱ्या जल्प्रेदर'ळात मृत्रमागोंते पाण्याचा
निकाल व्हावा असा उद्देश असतो व भुत्रपिडाच्या व्याघी’
मुळे होणाऱ्या जलौदर'ळात विशिष्ट. रँचक, ओंपर्धे, घाम आणण[र”[ अळीपर्थे व सूत्र वाढार्वेणारॉ औंपर्थे देऊन या सर्वे
म[ग॰[न”[ म्हणजे कोठा, त्वचा, व मुत्रर्पिड यांच्या वार्टे स[व-
लैर्ले पाणी निघून जाते. कित्येक येळ[ मूळ रोगच इतका
तांव असतो कीं, त्यात राज्याचा अत झाल्यावाहूंन रहात
नाहीं.
अशा वेळीं जलोंदरार्ते
पाणी शस्त्र र्टीचून त्याच्या
नळळीच्या मार्गे बाहेर काढतात.
त्यामुळे रव्ग्यास फॉंहोसा
होण्याचे अगोदर पावलावर व पायांवर सूज येते. रच्ग्यास आराम वाटतो व श्चासास अडचण पडणें कमी होते. पण
खोकला, दम व छातो घडघडणें, हो लक्षणे अगड्रेद्रपासून पुढें अशक्तता येते व पुन्हां प`[ट पाण्यानै भरून जाते.
असतात. खोकल्यावरळोवर कचितू रक्त येते. रळोगळी व’व्पा ` अन्न व पाणी याच्या ऎवजी द्रुयावर राहिल्याने उदररोगांत
टाकतो. चांगली झोप येत न[ह‘[. स्वर्मे पडतात. रवळोकल्या- पुष्कळ फायदा होतो. सर्वं प्रकारच्या जलौद्रांत हे पथ्य
मुळे वरवैवर उठार्वे लागते. थारतळी वाटते. अव पचत चाहो.
पायाने घोटे व डळोळ्यांर्वी पळोर्टे यांवर सुजैचीं टापशळी
लागते.
वनंतर पळोयार्वे जलौदर
दितुं
झप्हेंच तर ते शवर्टी
चांगत्ऱ्ऽ’च आहे पण वियेपत: मृवपिंड विक्वातेजन्य अलौद्र[त या पथ्याचा [‘वद्देग्प गुण दिसतो. गळोमुत्रप्राशन,
वाकारा, व
जुलाब
हे उपाय देशी नैद्यफांत सांगितलेले
होते व ते ओपघोपचारानॅ परें होते.
सूवपिडाच्या०व्यायामुळें होणार बळावर; ……या रक्तगांत
र`गी सकाळी ज[ग[ झाल्यावर सूज प्रथम डोळ्यांच्या मोंवतळी
आहेत. गोंमू’व नुसते, अगर इतर औषध अगर काढे यांबरबिर देतात. घाम निघाल्यार्ने रवियास फार बरे वाटते.
व त[ड[वरव प्रथम [दसते. यापुढे वहुंघां सळो र`[ग्य[स
प्रथम न कळतां त्याच्या अ[प्त[सच प्रथम समजते. नंतर सर्वे
अति घाम कढत्यन्यि‘हे कथॉ कधीं शक्ति कमी होते. क`[रड[
जितका घाम नियेल तितके पाणी त्वचेच्या द्वारॅ निघून जाते.
व।फ[र[ घेऊन पाम काढण्याचा एक प्रकार आहे.
वाफारा
शरींरा’हे हळुहळुसट्वेंक्रु लागते. लववळो थोडी होऊ' लागन
तोंत रक्त व आलव्यूग्’मेन त[वाचा पदार्थं जाऊन शरीर
गरोदर स्मियांत्ग्, र्तेदूचें विकार असतांना, हृदय फार अशक्त
अशक्त होते. जुनाट राग असल्यास रप् जात नाही.
एखाद्या वेळीं पाफ्ण्या सुयेनॅ इतक्या ज[ड होतात कळी त्यांमुळें
ततेच रोगी अत्या‘स्प स्थितीत असल्यास
साठे
असल्यास
अगर
करणें तहकूव ठेंवावें.
जेवणीनंतर
लागलीच
देऊ
नये.
हा उपचार<noinclude></noinclude>
tqjj1u6zoypty2sgyl4odsxxnvj7ncf
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१४
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जलोंदर आ यु व दळी य [व व च न. -प`[ट[च्या कुणा मोठया होणें यास सामान् [तऱ् उदर म्हणतात. द`[प`[न[ शरारातोल खालचौ व वरवॉ जलयाहो स्रोतते नंद आलौआणि त्यामुळेच प्र[ण व अपान वायु आणि त्वचा कुंशळो..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जलोंदर
आ यु व दळी य [व व च न. -प`[ट[च्या
कुणा मोठया
होणें यास सामान् [तऱ् उदर म्हणतात. द`[प`[न[ शरारातोल
खालचौ व वरवॉ जलयाहो स्रोतते नंद आलौआणि त्यामुळेच
प्र[ण व अपान वायु आणि
त्वचा
कुंशळो
हा
कक्ष,
जलोंदर
मह्मराट्रीयक्कोरा. (ज) १९१
’ दुंखतें, क्तवरेच्या खर्थिचग् माग
[.
[
आ‘प्रे हे दुष्ट झाले म्हणजे दोष,
व मांस याच्या मध्यभागळो येते असतां पळोटप्च्या
मोठया होतात.
‘
र`[ग अतिशय उष्ग, खारट, क्षारयुफ, बिदाहो, अवट,
मलिन, अशा खाण्याते ततेच अळोकार्रार्ची व रॅचक
औंपर्थे घेतल्यानंतर योग्य पथ्य न फेल्याते, मलहूंत्रादिकावे वेग धारण केल्याने, पानथरळो, मूळव्याध, सप्र-
जडवाट्रॅतौ. मळांचा अक्मुघ‘
त्वचा, डोळे, नख, हात, पाय, हा काळसर अरक्त होतात.
पोट एकाएकळो वाढते व लहान होते, पाँटांत र्टीवण व फाट०
ल्यासारखळी वेदना होते. त[रॅप्क व काळ्या रंगाच्या
पोटावर दिसतात.
पोटावर ठिवकळो मारली असतां
केल्या पखालळोसारखा आवाज
व शब्द करीत प`[ट[त
निघतो.
आणि
शिरा
फुग०
वायु चूळाळ
वोहोकडे फिरतो.
पितोदर८०यात त[फ्, मूछा, दाह, तहान, तोंड [‘तेखट
हा", म्नम, बुलाव, त्वचा, डव्ळें, नटँव हो पिवळी होणें, पळोट
[हेरव्०या रयार्वे होत्ग,
पिवळ्या व त[चूस रंगाच्या शिरांनळी
हणळो, यांनों क्रुशता आल्यामें, र्पवकमाँचा अबुकम बुकल्याव्ऱ,
आंतर्डे फुटत्ऱ्ऽ किंवा फाटल्यार्ने, मलसचयाते गुदद्वारांतळोल
पोट आच्छादित होर्फे,प`[ट[स घाम येथे, ते कढत लागर्णे, त्यांत
वळडूत मळ अडकल्यार्ते व अज्ञीर्णांर्ने होतो, प्नायऱ् या र`[ग[स
लागणे, लफैकर पाणी होणें व दुखन्ळा हो लक्षन्ग असतात.
कफीदर:…कफौदर[त अस गळ[ल्य[स[ररते वाटते, स्परेंप्
समजत नाहो, खूज येते, अग जड वाटते, झळोप जास्त येते,
अप्तिमांद्म हेच कारण आहे.
हा रोग आठ प्रकारचा आहे.
( १ )व[-[[दर, ( २ )
[पेंतोदर,( (३ ) कफोदर, (४ ) सन्निपातोद्र, ( ५ )ष्ठांहो'
दर,( ६ )वद्व `[दर( ७ )क्षतोदर, व( ८ )ज्ञलोंदर असे
ते आठ प्रकार आहेत.
या तेगाते पाँडि`लला मनुष्य त[छु व ओठ सुफून गेलेला,
दाह होये,त्य`[तून घुर नियाल्यासाररँव व[टर्णे,प`[ट हातास मऊ
मळमळते, अल्चि, आस व खोकला असतो, त्वचा, डकृळें व
नरर्थे हो षांङरों होतात. हातास पोर. गुळगुळीत लागते,
[‘नेश्वल असते, पोटावर पांढऱ्या शिरा दिसतम्त,
ते मो”,
[हेडण्याफिरण्यास असम'ये
असुन
जण काय प्रेतच असा दिसतो उदर होण्याच्या पव[
खखी
होते, हातास कठिण लागते, सावकाश वाढते, ग[र लागते,
व जड वाटते, हो लक्षर्णे असतात.
सळा’वप[तोदर:॰…त्रिदळोप[व[ प्रकळोप करणाऱ्या कारणांनी,
व[यक[न“[ वश करण्याकरिता दिष्ललै रज. किंवा नाक, कान,
हात, पाय, न पोट सुजतेला, बारळीक, क्रुसो फुगलैला, आहार
वशक्ति कमळो शऱतेला,
लाकर '[चत नाहो.
इत्यादिकांतळील मळ र्पोटांत मेल्यार्ने, सपाँद्दिकचिं विष किंवा
दुपळो विप ( कृत्रिम विष ) षोटांत गेल्यार्ते, वात, पित्त, कफ,
पुष्कळ वेलार्ने पवते व ते पवतांता अगप्चळी व वयाची आग
होते. थ`[`ड`स जरळी ज[त्त अव खाते तरळो पळोट[ला तडस
व रक्त हे स'चित होऊन काटेघांत येतात; तेथें विकृत होऊन
सान्निपात्तिक (त्रिदळीपजन्य) उदर उत्पन्न करतातयांत तळीन्हो
लागते.
नाहो.
दोघांच्या उदरार्ची लक्षणें अहूंन शिवाय शोपक्षूछो व म्रमहे
तरा दम लागतो,
विकार उत्पन्न होतात. हे उदर भयंकर आहे. यांत पाणी
फार लवकर होते. येडळो पडला, ज`[राच[ वारा सुटला किंवा
आभाळ आते असतां फार त्रासदायक होऊन हें विंकळोपास
[लाद्देल्याप्रमप्ण पूवळिचन्हे
भुक लागत न[ह[.
होतात. -॰
(वाढेल अव
अन्न [जरते किंवा न ळिर्मंरर्ले
हें समजत
एकदम शक्ति कमी वाटते, योडे ते चालल
अंड म[ठ[ होतो, श[चाल[ होत नभ्हा,
थोडा
पायाला तूज
ये`त, हलर्फे व योर्डे अव खाते किंवा मुळीच अन्न व ख[त[[`ह
आटोंपळोटांत द्रुखते व ताण नसतो. प`[ट[वर शिरा दिवृं लाग॰
त[त. प`[ट[च्या वळ्या मोडतात.
उदरावळो लक्षर्णे;…डोंळप[वर झद्वेपड, अंग गळणें, मलाच!
जाते.
प्लळोहोदर:…फार येवून लगेच घळोड[,ग[ड’[, इत्यादि वाइन
किंवा अशाच दुसऱ्या व्यार्धांनॅ क्षीण झ[ल्य[ते,ड|व्या क्रुशच्त‘क्रुल
अवरळोव, अप्तिमांद्य, दाह, सूज, प`[ट फुगणें व इगतटळो पाणी , पाणथरळी आपल्या स्थानापावून सुटून वाढते. किंवा रसाळिद
होणें. उदरात पाणी होण्यापूर्वी प`[ट[च[ रंग अरुण असतो, ` धानृनीं वाढलेले र‘फ [तेला वाढवते. तो आरंभी अठळी’
त्यास तुज नसते, ते फार जड वाटत त[हो, शिरानॉ गुंडाळ सारखी कठिण अखून नंतर कासवाच्या पाठोसारखळो हळुहळु
केते दिसतेआणि त्यांत नेहेमों गुडगुड आवाज होत असतो.
कुशीत वाढून उदररळोग उत्पन्न करते.
तेवळो व आवडी यांस फुगत्रून त्यातून वायु घोराते फिरतो, व `
ताहोता होतो.
प्लळोहोदराचीं
लक्षणेंऱ्--दम[,
खोकला,
तहान,
तोड
त्याने हृदय, कवर, र्वेवी, गुदद्वार आडस'घी, _ वेचत्र होते, पोट फुंगल्ग्’ळा व द्रुखये,त[प, पांटुरकैपणष्अळोकारा,
वेगुद्वळो, वेदना, दाह वमोंह हे विकार उत्पन्न होत[त.प`[ट[च[
हो दृखनात. अपानवापृ सरतांना आवाज होता. शोचास
रंग
बदलतो, वहुतकल्ऱ्न पोट आरक्त होते. आणखी त्यावर
होत ताहो, लघ्वळोस योहै होत, अग्नि फारसा मेद नसतो,
’ निळ्या व पिवळ्या रेघा उठतात. ष्ठांहोदरात उहोवते, प`[ट॰
खाण्यावर फार असक्ति असते, व तोड येचव नसते.
वातोदरऱ्-वातोदरांत, हात,
पाय,
नृपण व कुंशो ऱ् शुळ व पोटफुगळी हो लक्षच्ग असतां वायु; मोह, तहान, दाह,
मुजतात. कुशी, वरगडया, प`[ट, कंवर, व पाठ, यांत मूळ [ व त[प हो असतो [पत व जडत्व, अव्वी व कठिणपणा
होतो. हाडांचें त[ये फुटतात. कोरडी त[स येते, अ'ग [ हो असल्यास कफ यांचे आघिक्य आहे असे समचार्वे.
२५<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१५
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जळींदर महारात्रूछ्प्य रानफॉंश यकूद्रुदर:-प[णथर^[प्रम[न्ळाच उजव्या कुस्रोती .श्र् यकृताद्दे आपल्या स्यानापाघून तुटून उदर उत्पन्न करतेत्याचीं लक्षणें वर लिहिलेल्या प्लळोहोदर..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जळींदर
महारात्रूछ्प्य रानफॉंश
यकूद्रुदर:-प[णथर^[प्रम[न्ळाच उजव्या कुस्रोती .श्र् यकृताद्दे
आपल्या स्यानापाघून तुटून उदर उत्पन्न करतेत्याचीं लक्षणें
वर
लिहिलेल्या प्लळोहोदराप्रयाणेंच आहेत.
बद्धगुदरेंद्र:…अन्न[वर`[वर केस प`[ट[त गेल्यार्ने,
व्याघीच्या मोडांनळी,
उदावतव्ते
मुळ-
किंग्स दुसऱ्या कळोणत्याप्हे
आंतडवास चिकटून रहाणाऱ्या पदायाँनों गुदद्वार बंद आते
असता क्रुपित झालेला अपानवायु, मळ, पित्त, कफ यांचा
अवरत्प ककन उदर ( बद्वीदर ) उत्पन्न करतो… यांत दाह,
तुषा, ताप, [”शका, खोकला, दमा, यांङया गळणें,ड[र्के,ह्रद्य,
र्वेबौ व गुद् यांत शुळ, मलावरळोव,
अल्चिं, व[त`[ व वायू
काडणें हो लक्षणे' होतात व पळोट ताठते.
प`[ट[वर
निळ्या
त[वूस शिरा उठतात किंवा मुळीच उठत नाहोत व र्नेवाच्या
जलोंद्र
( ज) १९२
उत्पन्न करतो. या योगाने पोट जड,
ताठ, वाटळोर्ढे व मऊ
होते. बोटळाते ठोकते असतां वाजत नाहो. त्याच्या वरच्या
शिरा वाहोशा होतात, र्वेबौवर दावल असतां सगळें प`[ट
एकदम हलल्यासारखें भासते. नंतर यांत पाणी होऊन पूर्वीपेक्षां पोट म`[ठें होते. शिरा दितेनाशण् होतात. व जलळो॰
दरावा सर्वे लक्षणें होतात.
वातोदर, पित्तोदर, कफाद्र, प्लळोहोदर, सान्निपातोद्र व
जलादर हो अनुकर्मे एकाहून एक अधिक कष्टसा'य आहेत.
बद्रोदर व छिद्रोदर हे खाते असता बहुतकरून षंघरा दिव`
स[नं'[ र[`ग^[ मरतो.
उदर आ'रभापासूनच कष्टसाघ्य असते.
बलवान असता पाणी ( अजतांवु )
त्यांतून
रोगी
न झातेर्ले उदर वर्षे
वर प`[ट गाईंच्या ड्रंष्पठासारखें होते.
असतो यत्नाते बरें होते. डव्ळयास खूज, शिस्त व[कर्डे, त्वबे"
छिद्रोदर:…हाड, काटा, खडा वगैरे शल्ये अन्नावरोवर
प`[ट[त येल्यार्ते किंवा फार खाण्याते' अ[त`ड फाटते किंवा ["पकते.
वर पांढरे पापुद्वे येऊन त्यांतून पाणी येच्ग, शक्ति, रक्त, प्रांत
त्यामुळे त्या आतड्यात भोके पडतात. त्या मोंका‘नून अपक
अन्नरस मलावरळोवर वाहेर येतो. तो बुलवुळळोत,
पिवळा व
व अग्नि याचा अतिशय
नाश, अन्नहँप, सुज्ञ, अत्तिसार हो
लक्षणें तौन्न असतां उदररोग बरा होत नाहो. रॅचक भोपघ[न॰[ हलकँ त[लठें
पोट
पुन:
सरल
तर तेद्दि असा'य
लाल असुन त्यास प्रेतासारखो धाण येते. त्यांतून थोडथोडा
रस गुदांतून वाहेर पडतो “व वाकाचा सर्वे पळोटांत भरून
जाणावें.
भयंकर उदर उत्पन्न करतोयांत बँर्वांच्या खार्ली पळोट वाढते.
दोष आतेशय वाढल्याते स्रोतांचौ तोर्दे नंद होऊन उदररोग
उत्पन्न होतो. म्हणुन यांत रोग्यास मेहेर्मां रॅवक त[र्वे.
व पाणी कार लवकर होते.
यांत क्रुपित
झालेल्या त[ना‘हे
दोषांचीं लक्षणें असतात. दमा, लहान व म्रम हे [वकार
होतात. यास छिद्रोदर व काही आचायै परिखावळो उदर अते
म्हणतात.
जलफुंद्रा-ल्वेहन व त्बेंदन वगैरे [कैया करळीत असता
मग्येच एकाएकळो थेंड पाणी प्याल्यार्ने किंवा अग्नि मेद अबून
शक्ति क्षीण असून अथवा शरीर अतिशय क्षीण अहूंन अति…
शय पाणी प्याल्याते त्या पाण्यात मिंसळळेले काम व वायू
जलवाहक सळोतते बंद करून प`[ट[त राहून ते त[चलल पाणी
उदकस्यानांवून म्हण`ज क्कळोयांतून वाटावेतात. त्यामुळे उदर
होते. यांत तहान, गुदखाव, गुददूप्ळ, खोकला, दया व
असावे हेविकार होत[त.पोट[बर न[न[र॰ग[च्य[ शिरा उठतात.
पोट पाण्याने भरलेल्या पखालॉप्नयाणें हातास लागते. टिचकी
मारला असतां तसाच आवाज होतो.
दावल्याते परवालळीप्रमप्णेंच आत पाणी भरल्यासारखँ दिसते व पखालळीसारखेंच
[वै [के त्सा-उदर हा रोग रेवक औंषघांनॉ बरा होतो.
एक किंवा दोन मद्दिनैपयेत गळोमुत्र किंवा ढूय घाछून
एरंडेल तेल प[ज[`व. अन्न व खात[ पाईंच्या किंवा उटिणीच्या ट्टधावर रहाते. दाह, पळोटक्वाग्ळी, अतिशय तहान न
सूछोहे [वकार असतील त्यार्ने
वागार्वे. ज्याच्या अगॉ
[वेंशिर्षेककन याप्रमाणे
ल्क्षता आहे,
वात
[हनग्घता आणुन
उदरावा
नाश
करतग्ल
अशा ट्टातांचळो
अ[ल[,वायु वसला आणि दोषाशय शिप्‘येल आला म्हणते
जुलाव आल्यावर
हळूहळू हलकेर्से
अस सुख करून
कमानें साळीचा भात बेंतानें खाऊ लागग्वें. उदररोंग्याते
शिलक राहिलेला दोष जिखालस काढून टाकण्याकरिता
पुढील अळीषये घ्यावळी. गोमुत्राच्या पुष्कळशा भावना दि`ललै
हाय.
खाऊन नुसत्या द्रुधावर रहोव. गुग्गुळ घ्यावा.
कोंणत्याद्दि उदराचीं हयगय केलळी असत[अ[पल्यास्ध[न[॰
पातूनतुटतेते व पवऱ् होऊन
स्रोतते नंद आल्यामुळे वायाचळो
किंवा
दोन
दूध प्यार्वे. वपँयान पिपळी तेवन
रेच होऊन प`[ट उतरर्ले व नरम
याप्रमप्र्णे खाऊन वर
करावळो.
झाले
शिलाणित
म्हणजे
त्यास
बाहेरची
साल्वणादि इळाक कसन कपङयाचा पट्टा… बांधावा. या योयाते
पुन्हा प`[ट[त वारा भरून ते फुगणार नाहीं.
वाह्य गति वंद् होऊन तों
चांगले जुलाब होऊनद्दि पुन्हां ज्यार्चे प`[ट फुगते त्यांस
पातळ झालेले वाताद्दि दोष
तेधो व स्रोतते यांच्या त[ड[साहे पातळ करतात.
पुन: प`[ट[त कुशीत स[चतो.
शक्ति
त्यास रेचर्के द्यार्वी.
हजार [हेरडे र`[ज एक
मोंवतांछून गरगरात वाटोळो होते. हें ज्ञलोंद्ऱ
वाढला
योजना करावा. घुत[न॰[ स्निग्ध आलेल्या र`[ग्यास
ते ड्रुचमळतें. प`[ट मोंठें, गुळगुळीत, ताठ असते व बेबी वर
येऊन
फार
आहे व दोषांचळी बुद्धि व्हावळी अशी इच्छा आहे त्यांच्यासाठी
अग`[दरव
प`[ट[त त[वतेल्या
पाण्यांव आणखी भर घालून त्याचीं पिच्छा (बुळवुळांस मळ)
बरेच स्निग्ध, आवड व खारट असें निरुहवरतळो यावे. बो
`रचन देण्यास योग्य नखैल अशा उदर रळाग्यास वल्तळो, दूध<noinclude></noinclude>
nl0lgd4195l5mgv5e3leas94uje9nux
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१६
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जबाँपर जळेत्पचप्र महारात्रूरेंय म्प्नफॉंश. ( ज ; १९३ व घुतें हें शप्मक उपाय करावे. वातोद्रात बिशपेंकरून वातघ्र औषधांचे वरती द्यावे. शक्ति येप्याकरिंतां' दूध यार्वे. पित्तोदर’प..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जबाँपर
जळेत्पचप्र
महारात्रूरेंय म्प्नफॉंश. ( ज ; १९३
व घुतें हें शप्मक उपाय
करावे. वातोद्रात
बिशपेंकरून
वातघ्र औषधांचे वरती द्यावे. शक्ति येप्याकरिंतां' दूध
यार्वे. पित्तोदर’प्त रोगळो सशक्त असल्यास रॅचर्के व क्सिघ्न
औषधांचे बरवी यावे. रोगी अशक्त असेल तर अनुवासन
बस्ती देऊन रॅच होण्याकरिता द्रुयावै वरतळो द्यावे. दुध,
बस्ती आणि रेचर्के वरचेवर घेऊन वेतानें वागर्ले म्हणते
पद्घोद्र व छिद्र्च्द्र या द्च्हृच्त रव्ग्यावै शरळोर स्निग्ध व
स्मिन्न करून र्वेवळोच्यारवखी डाव्या वात्रूत्स चार तोर्टे जागा
तोडून चारच बोंर्टे पोट फाडार्वे, त्या ठिद्गा'तळून अ'ग्सङळी बाहेर
काढून वद्धीद्रात त्यांस र्केस, मळ, काहाँ असेल ते च्चाढूहूं
टळाकप्र्वे. व ण्विच्द्रांत शल्य असेल ते काढून अ'ळातङघांत जप्
स्राव झाला असेल तो धुवून काढावा. नंतर त्या छिद्र्घेस
[पेंत्तोदर खात्रीनॅ वरें होते.
डॉगळें उसवावे. ते झाले ह्मणजें त्यांची डोंकॉं राखून. घर्दे
कफीद्र झालेल्या सशक्त रोग्यार्ते रॅचर्के घेऊन तिखट,
क्षारयुक्त व कफवाशक अशा अन्नाचा उपयोग करावा.
जप्गच्या जागॉ वसवार्वी. वाहेरवा
ओढून काढावा
आणि
अ'त्तड्यांस
मथ व
वण शिवून
तूप लावून तो
त्यावर बेष्ठ॰
लैंमिंत्य, अरुचि, मळ्गळ, अन्निमांट्ग् हे विकार असून
वयाचे च्चर्णे व काळी माती हो मिसळून त्यांचा लेप करून
कर्फान पोट घट्ट व स्थिर शांल्यास व रोगी मद्य पिणारा
असल्यास अरिष्टे व क्षार द्यावे. अशक्त मनुष्यार्ते कफौद्र
पट्टा वायावा. नंतर व्यास निवांत जग्'नंत लॅहार्ने भरलेल्या
अरिंष्ट, गौमुप्र, चून्प्, क्षारयुभ्फ तेल यांनों वरें करावे.
प्तिदोपात्मक उद्रावर रळोगी बरा होण्याची आशत्
सोडून चचनाग वगैरे त्यावर विष किंवा ज्याच्यावर रामा…
वठेल्या सपौऱ्त् घिप टळाकळें आहे असे फल खाण्याच्या
पषार्योवून यावे. ते विष तीव्र प्रयाथॉ ग्ऱ्हूंणबे शरौरठेंतत्ल
सर्वे घांतांत घुसून दोषांस
वलात्कारार्ने ओढून
काउणारॅ
असर'यामुर्के निश्चल व थात्वादिफांस चिकटून वसलेल्या
दोपसमूहास बाहेर काढल्या. दोष निघून गेल्यावर त्यास
येउ पाण्यानॅ रनान घाटूकॄन थंड दूध क्विंत् कण्द्वेरा पाजत्वळो.
पाळेभाज्या, अद्देवट,रवारट किंवा तेलतूपन
घालता अर्धवट
पिपांत बसवून नुत्त्या द्रुधावर ठेवावे.
जलोंशांत वातनध्शक
तेर्के चळोछुन ऊन
पाप्यार्ते पोट
शेंक्रून कारबैपर्मेत पोटास वस्त्र गुंङत्ळार्वे. नंतर वद्धळोवर व
छिद्रोद्र यांवर सघेगितलॅंल्या जग्गॉ एक छेद करावा
व त्या
छिद्र'ण्त नळी घाछुन पळोटरंतोल अर्धे पाणी काढून टाकावें.
नंतर नळी काढून त्या त्रणावर हैंपवमिं’थेत तेल
चोछून पट्टा वाढून पींटप्स वस्त्र गुंद्मकॉँव. पुढें तिसऱ्या
चवथ्या दिंवसप्पाखून सोळा
दिवसर्तेपपँत थांबून थांबून
शिल्लक राहिलेले अर्धे पाणी थोर्डे थोडे करून काडार्वे. आणि
जसजर्ते पळोट तेल होईल तसतते ते कपक्यामें घट्ट गुंडाळून
बांयार्वे. याप्रमाणे सत्रे पाणी निघून गेल्यावर रव्ग्यास उपास
शिजवून खाव्या. एक मद्दिवापर्मेत अन्न न खाता या
वाढून किचितूं तूप व रँन'घव घातलेली कण्र्हरळो पाजत्वी. पुंर्ढे
भाज्यांवरव रहावे. तहान लागल्यास याचाच
एक महिन्यानंतर उंटिणीरेंग्ळा दूध प्या`व`.
सहा महिने नुस्त्या द्रुघावर रहावे. यापुर्ढे द्रुथांत शिजरँठळी
कण्र्देरळो घ्यावी,: आणि शवटॉ जुने तांबे किवा दृरळीक यांचा
त्वरस घ्यावा
ष्ट्ग्रंहोद्संत दोषानुरूप स्नेइन, रवेंद्न करून
द्होभात
खाऊ वाचून डाव्या हाताची शीर तोडप्वो. रेंवर्के व रोहि’
थीङथोडा भात द्रुयावररैवर किंवा फळांचे आवट
घालून
के`लल्या मांसरसम्वरळोवर खावा. याप्रमाणे एक वपेभर पथ्य
कर्ले असता जलौद्र बरें होते. सर्वे प्रयोगाच्या मागून दूध
पाजप्र्वे. कारण तें रसगदे सर्वे यातुंस स्थिर करणारे शक्ति
तक मृत ( वा. चि. त्या. ) द्यावा. या उपायांनॉ वरॅ न
वाटल्यास व तोत पाणी झाल नसल्यास गुल्यावर सांगि'
तलैल्या पद्वतौर्ने डाग द्यावा.
देणांरे’ व शिल्लक दोपांस काढणारँ आहे. तसेच औंषपें घेऊन
यक्रुतावर पानथरीसत्रखाँव चिकित्सा करावी. मात्र शळोर
तोडणे झाल्यास उजव्या हाताची तोडावी.
घेऊन ज्यांर्वे शरीर कृश झालें आहे, अशा मनुष्यास ढूघ र्हेच
अमृताप्रम्राणें गुणकारी आहे. उद्रांत ताकादे प्रशरत आहे.
यद्रोद्र झालेल्या रॉग्यास पान काढून अनुवास व वस्ती
जङत्व, अव्प्’वे, पोटपुच्गौ, अश्रिमांद्य व अतिसप्र हे विकार
र्देऊन गळोमुत्र’ तांक्ष्ण अळीपपें तेल वरँर्नथव यांसह क्सिहृ " असतां तें द्यावे. अतिशय उष्ण, आंबट, खारट, जड, गुळ,
नरतो द्यावा. व पुन्हा अनुवासन वस्तो द्यावा. त्यास तारक
तेलाची फळोउणोदितैले पदार्थ,,पाणी पि`णे, श्रम, मागें चालणे,
अन्न व तीन रॅवक द्यार्वे ततेच उद्प्वते नप्शक असून
दिवसा
वातशप्नक असणारे सर्व उपाय करावे.
छिद्रोद्राचीं
कफौद्राप्रमार्णेव
चिकित्सा रबेंट् खेंरळोजकरून वाफॉं
करावी.
पाणा जमल
की
लगेच काढून
टांकार्वे. याप्रमाणे वरवैवर करून ते बरें करावें.
जत्श्रेट्संत प्रथम
जलळिया’श्रेत दोष
काढून
व याडॉवून किंवा
घोड्यावरून फिरणें या
जलयाथ्परँचफित्सत्फ्द्वा‘तेट्टेरहैंग-
चिग्‘कैत्खैच्या याप्रकारार्चे हें नांव
जनतेमच्यें परिचित व
रूढ असते तेरा ते नांव सदोष व मिथ्यायास उत्पन्न करणारे
टाकणारॉ
तांक्ष्ण औंषपें गोमुत्र व अनेक प्रकारचे क्षार घाबूऽन योजावळो
आणि रॉग्यास आयेद्र्ळोपक व कफवाशक आहार द्यावे.
बद्रोद्र, छिद्र्व्द्र व जलोंद्र हो वर“! न झाल्यास शस्त्र’
प्रयोग करावा.
निजणें
; गोष्ठी वज्’त् कराव्या.
ज्ञलौपचार-(शांतळोष्ण
सर्व
आहे.कारण या
घित्कैत्तेमघ्यें नुसते
थंड
पाणीच नव्हे.
तर येउ, कळिमट व फक्त पाणी ववाफळारायांचा उपयोग
जरूरळीप्रयाणें होत असल्यामुळे “ शळोतोष्ण जलवाष्प
विंकिंत्सप्पद्वा ” दे नांव अन्वर्थंक होहँल्र्फे हा कल्पना
अप्द्दिट्रयांसळोल एका त्रूवडेंगांच्चळो प्रांसत्नैत्झ नळावाच्या एका<noinclude></noinclude>
fiiy5m2comh70o7px3yprr24gwkh3i8
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय सप्नफोश. (ज ) १९४ ज्ञलौपचाग्: जळोपचार शतकऱ्यार्में स. १८२९ मध्ये काढली. वइळूइकू त्याजकडे कांहीं इरकत नाहीं कळो हो टर्कीश वाष्पत्नानपद्वातें, सकाळ“! येणाऱ्या रॉरयांची..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय सप्नफोश. (ज ) १९४
ज्ञलौपचाग्:
जळोपचार
शतकऱ्यार्में स. १८२९ मध्ये काढली. वइळूइकू त्याजकडे
कांहीं इरकत नाहीं कळो हो टर्कीश वाष्पत्नानपद्वातें, सकाळ“!
येणाऱ्या रॉरयांची सख्या वाढत चालली. याच्या अगेप्द्ऱ कमरेड्तफ्या येउ पाण्यात बसण्यावळो पद्धति, व जलपान
याच विषयावर दोघा
इंग्रज डावटरांनों (१६४९- ड् पद्धतशीर करण्याची पद्धति, यांमुळे आरेप्रय उत्तम राख-
१७३४ व १७५६-१८०५ ) ग्रंथ प्रसिद्ध
केले
व
त्यांचीं जर्मन
भाव्त्त भाषांतरे आलों होतो.
प्यास बहुमोल मदत झाली आहे. शरीरास शीत व उष्ण
उपचार करून रोग इरण करण्यासाठी पुंर्डाल सप्यननामुप्रांया
पाद्देल्या
मुख्यत: उपयोग केला नातोऱ्’र्न १) अति थंड अगर कढत
ग्रंथाच्या
थोडया
येळांत
६
आवृत्या
निपळाल्या होत्या. या तत्वाचापुरस्कार करणारा हान्इ हा ` पाण्यांत भिजवून ,अपळ मिळुन काढलैलॉ वखँ गुंडाळून
डे‘म्फ्टर आप्ह्ठुयांत प्रग्सैद्वव्स येऊन हे उपचार करणाऱ्या हें बांधणे. हे
सस्या वाढत चालल्या.
फार
प्रळीसनित्हृर
येऊन त्याचळीकव्र्ति
वाटते?.
या येणाऱ्या
तोकद्रेस
डॉक्टर लड्रेक’ळाचळो सख्या मोठी होती. यांपेंकळो क'ळाहो मौज
पाहण्यासाठी येत तर कांहीं खऱ्या ज्ञानलालसॅमुळें येत. पण
पुष्कळजण स्वतन्स असऱ्ऱ्ऱ्ल्यय् व स्वत:च्या उपायांनळी
वऱ्या
आशेने
होत
येत.
पुढें प्रसिद्ध
नसलेल्या
व्याधी
नव्या करून
वस्त्र शरोरामवृंवतो
गुंडाळून
त्यावरून
एक
दोन गरम मऊ र्घ’प्ग-डंघांनौ शरीर घट्ट आच्छाद्णें व जरुर
तर त्या सर्मोवरून येणकापङऱर्ते आच्छाढून हो सर्वं आवरण
सुमारे एक तासमर ठेवून नंतर सचैल स्नान राज्यास करा-
शेतकऱ्याकद्दे तर रेप्गी
वयार्वे असते. याचा उपयोग मस्तफांतोल दूषित रक्तस'चय
कमी होऊन मेर्दूत शांतता ये`ण, पर्मेरर्धे मोकळी होऊन
त्या मागें यानाच्या रूपाते शग्रव्रमलविसनंन होणे हा होय.
घेण्याच्या
चिप्केत्खेविपयों जेंथ् मत ` हो वब्रॅ बांधण्याच्या अनेक तऱ्हांपेंकॉ एक प्नफांक्रु हा की,
झग्हैंठ ते त्यांतोल अतिशयोफि वगळली
वद्य हुं'ग्ढ व एकच असून ते हैलच गुंडालर्णे. हेतु हा कळी ते
या सर्वीचे या
असतां देखील सबैयेव अनुकूल अतेच झालॅ. त्यानंतर
प्रेथ्ध्,’ लिहून
हुकाव व मग त पुन: अळोर्के करून बांयार्वे व हा कम वाटेल
तितका कालपट्टेत्त सुरू ठेंवर्णे. दोघेकाल टिंकणाऱ्या ज्वरामघ्र्ये
व सस्थ'ग्कदून या पद्वतळोचा उपक्रम व प्रसार ड्ग्ट्रेठर्डात केला.
याना फार उपयोग होतो. पोट, छातळो, मस्तक वगैरे ठिकाणी
हा प्रनार पुढें जर्मनी, फ्रान्स व अमेरिका देशांत झपाटयाव्ळा
लहान येताच्या आकाराऱ्र्वी ओत“! वहँत् गुंडाळून त्यांच्या
वाढला आहे व… हिंदुस्थानात
भागप्तळील रक्तसवय
र्योघाडाक्तरांनों १८४०-१८८४
विंद्यनानू अधून हळूहळू
दरम्यान
या फ्द्वतांचीं
करणें,
शमन
करणें,
उत्तेजन
जुने
आणणें हें हेतु सप्घत’त् येतात. (२) कडत हवेर्ने अगर वाफेनॅ
युक्तऱ्यन्नसप्मुत्रो व उपकरणांच्या सग्ह्यांन शकव्ळा. याचा
मुख्य प्रकार भ्दृणवे टर्किश वाष्पस्नान हा होय. यांमध्ये
त्यावाद्दि
असतात.
नवीन
पद्वतळोम
अनुकूल
यामुळे
कमी
डॉक्टर व हे नवीन पद्धतोवाठे यांमध्ये वैर उत्पन्न होऊन
शिव्यागत्ळी, दौयारँग्प, फियोद्ळी अयव्द्ळी यांचा क्षुकाळ् होऊन
शवटळो सरकारयार्फत चौकशळीसप्टव् का‘मेशन नेमण्यात येऊन
निकाल
वाढत आहेत.
चि’ळिकत्सप्लये
होऊन
उष्णता १२९“ ते २१२॰ पर्यत असलेल्या
तो
दोन कोंठढ्या
परंतु ररेगळिव’ळिकत्सेसत्ठो १५०॰ हें मान
ठोक
लोकप्रिय होत असल्यार्चे निदर्शनास आल.
ही पद्धति
नवान असल्यामुळे इतके दिवस अत्यावस्थ व अनि अशक्त
असते. या उष्णतेमघ्न्र रळोग्यास स`|तेंल अगर कार्ये वडवा”
वयाचे अतेल त्यायानानॅ अर्धा ते दोन तासपयेत वाफारा
रेप्ग्यांवर हा चिकित्सा करून पहाण्यास डे’त्वटर लोक
मौत असत. जुनाट व कटत्ळ्त्टेंले रोगी, जे कसतेद्दि कडक
देण्यात येऊन नंतर सत्वण व आग रगढव्ळा यासह अगर
याशिवाय सप्पें सयेल स्नान ररेंग्यास घालतात. हें स्नान
परम उत्तेजक, स्त्रैद्क, गुणकारळी,ट्टष्टरक्तसचयहारक व शरीरार्चां झीज वररैत्च करून नवजच्वन व नवान शरळीरपेंशळोहि
उत्त्पन्न करणारे प्’हेतावइ आहे. त्यायोगे खोल इंद्रियांत
पथ्य व निर्बंध पाळण्यास तयार असत…. त्यांजवर होळिवकिंत्सत्’
स्मेउकें नावाच्या इंग्रज कारखान’
दारानें स्वताच्या रेप्ग'ळात या पद्वतोना अनुभव उत्तम तऱ्हेनं
घेतल्यामुळे आपल्या कारखान्यांतोल कामवारमट्वळेंघ्त ते
सौम्य व भयंकर स्वरूपाचे राग येत तें वरे करण्यासठीं
एक स्वत:चे ळिचकित्सत्लय वांघलॅं. विषमज्वरामघ्यें व ज्वरा’
तिशयामघ्यें ज्वर निनयोकपर्णे
अतिशळातोपचार करणें हें प्रथम
_/
पद्धति अमलात आणीत.
सांरवछुन राहिलेझ्ऽ रक्त हुंरर’गूराच्या पुंष्ठभागों येऊन त्यांतोल
व्यग’पें मॉङते, घमोंत्सजनान रक्तग्रुद्धि करिते व एकदां अति
गरम व
नंतर अति थेट
अशप्
वद्ल`लल्या उष्णतामावार्ते
कमी
करण्यात्गटॉ पोटावर ’, रक्तवाहिन्या व मज्ञापेंशव्नां उत्तेज्ञक व शक्तिद्ग्यक किया
जर्मंन’म्‘त १८६०-१८७० › आहे. शरार’ळार्तांल ढूपित होत असळेंले रस व यातु, नवव्न
नाल”! व नंतर इंग्लडांत रूढ होऊन तो हृदृटेंळो पूण शास्त्रस'मत
इलाज मानप्यांत येतो. तापाच्या रोंग्यास थ'उ न्यिरगुटांत
गुंडाळणें हा उपाय फांकळोजर्मंन लढाईत अति उत्तमपणें
वाढणारे रॉग,सघिवात, पाट्रांगृष्टवात, रळोगसिकता प्रमेंक्ष्'रळोग
व’ग्ळोरे स्थितौत यापालून फार गुण वाटतो.
पूर्वी उष्णरऱ्ना॰
नामें गुण वाटतो एवढें ठाऊक होते पण र्हे टर्किश वाष्प॰
अनुमवळिसद्ध ठरला गेला. यानंतर स. १८०५ पासुन १८७७ 3 ह्वान व थेडवस्त्र गुंडाळणें या दोन्ही ड्लातांनीं त्या क्रुन्या
पर्मेत टर्किश पद्वतोर्ने उष्ण व वाष्पस्नान करण्याच्या र’जें उपायावोह्कालपट्टीच केली आहे. याचे लहानसहान व
सेढ्था इंग्ल’डांत प्रचारात येऊन फार उपयुक्त ठरल्या. पु दिव्याच्या योगनि द्दवाकढत करण्याचे व वाफ तयार
या सगळ्यांना निष्त्ग्पँ म्इणुन
असें व्णा'यास [ करण्याचे प्रकार निघाले आहेत; पण मुद्दाम बांनून तयार<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१८
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीम यानफॉंश- (ज) १९५ बर्वे १४॰॰॰ फूट जव’ उंचीच्या भागापर्यंत सदैपडते. केलेल्या टर्किश वाष्पस्नप्तगृहाप्रमप्णें त्यापासून उत्तम गुण वाटत नाहीं. (३) थंड अगर कढत पाण्याये..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीम यानफॉंश- (ज) १९५
बर्वे
१४॰॰॰
फूट
जव’
उंचीच्या
भागापर्यंत
सदैपडते.
केलेल्या टर्किश
वाष्पस्नप्तगृहाप्रमप्णें
त्यापासून
उत्तम गुण वाटत नाहीं. (३) थंड अगर कढत पाण्यायें
या झाडाच्या पुष्कळ
सवैल स्नानयाचेंद्दि भेद आहेतसुईंइतकौ वारळोक 'यार अगर
कौन या ज’तोचा लागवड
लू’ल्'न तुपार,उथल पाण्यांनळालहुंडळो मारण्याचा, वोटाएवढो थार
सोड्रुनल्लाटेप्रमऱणें पाणी अनावर थेंऊन,सकाळी आल्या वस्नाते
फार प्रार्चांन काळापाहुन हिंदुस्थानात जवाची लागवड
यांथांआँफेस्टस
अमोंद्र वणितेल्या प्रकारद्देपेंक“! बरेच गुणघभै आहेत.
नियमित शरव्रभागस्नान म्इणने फक्त कमर व टुगण
पत्टळीच्या
कण्यास
पाद्स्तान हे प्रकार थंड
अगर कढत
स्नान,
पाण्याते करावयाचे
असतात. व ते प्रत्येक अवयवास वेगळ्या घेळ’व्, अगर एकयेळां अगर एका इंद्रियस्नानानंतर दुसरे या कमार्वे उरक’
ण्यांत येतात. हुंगण, मस्तक व पाय हें भाग भांड्यांतोल
झाडावै
ते ठेंव॰
ण्वावळोयोजना असते. उन्हाचीं’ कूक लागन्प् व मस्किष्कत्वरणा
दाह हे ळिलटरच्यानळिलकांत वफौवै थंड पाणी घालून त्या
नळ्यांया
थंड टॉप
चित्र
आहे.
स्टोंन यानॅ
करडॉग
येथे
एकत्र केलेले नमुने हें द्दिद्रुस्यानांर्तांल जवावे अत्यंत प्नार्चांन
नमुने होत. इन्द्र’ला “ जवार्वे
पळीक फळास आणणारा
वरे होतात.
, ईश्वर ” असें म्हटले आहे, व ज्ञन्म, विवाप्ट्ट आणि ड्रुत्यु
असत्`वद्ल केल्याने दूपितरक्तव जडत्व घालविणारे व तुज
जुनाट द्राहूंयुक्त रेप्नावर हा इलाज
या सवंर्वीच्या धार्मिक यिपाँत जवाचा उपयोग दिंठुलाकघेत
मस्तक"! धारण
एकदम आते थंड व कढत
सवय व मज्ञादोयेल्य
आणि हाइशत्मक आहे.
फार उपयुक्त आहे.
कोरडया अगर ओल्या
याला जवाये वरेच प्रकार पाहात होते; व
तालळोमनच्या वेळीं (इ. स. १०१५) वन हे महृत्त्वाचें खाद्य
द्रव्य होते असे वायवलवरून दिसते. मिसर देशांतील
अत्यन्त प्रम्चळोन अशा थडग्यांत ‘ हेवझास्टीकळो’न ’ जप्तोवै
जव स’प्पडळे आहेत. त्यावप्रयार्णे प्’स्वत्शरलड व तेव्र्दोय
येथील
इमारतींच्या
अवशपांतादे
जव आढळतात. दक्षिण इटलॉतोल ख्रि. पू. ६ व्या शतकर्केतोल, मेटँळि
पाँर्टाज
शहराच्या
.‘प्रतिपांवर
या
जातीच्या
मस्तकस्नान,
पाप्यांत नुसते वुडनूत न ठेवता वहात्या पाण्यांत
करतात.
होत आहे हे सिद्ध होते. चिन“! बादशहा शन॰नग यार्ने
लावलेल्या पाव खाद्ययान्यांत
जय हे एक धान्य होते.
मॅत्वतो गुंडाळर्णे, एकदां थेंड व एकदां कढत पाण्यांत भिजवलेल्या वआते अग चळोळर्णे हे स्नानाते प्रक". असून त्यांत
बुडवून
सत्यान्र्मेकरून
इ ति हास.-क्र,ग्तेदादि ›त्'थांत जवाचा उल्लेख आहे. यावस्ज
अगर स्पंनाते अंग पुसण्याचऱ्, ;”वन पिललैत्ऱ्ऽथेङ वस्त्र अगळा‘
पाण्यांत
जप्तोंवें‘र्में द्दिदृस्यप्वति हेंफ्झारढी॰
करून
करतात यावरूवा‘हें त्यासर्वंयोच्या ज्ञानाचें प्नाचौनत्व
सिद्ध ईंग्तें, ‘ ऐहेंळं'ईं-अकर्क्सत ’ नव हैं अफगाणिस्तान व
काश्मीर येथळोल महृत्वाचें पळोक होय असे" म्हटले आहे.
ला न न उ.…जव हें रव्वा, पीक आहे.
घडवा, पट्टया, अगर वयते रेप्ग-
हैं आवटोवर
ग्रस्त भागास बांघणें. याचा पहिला प्रकार थंड पट्टयाचा
म्हृण`ज वाष्पाँमवन होऊन तो भाग येउ व्हावा अशप्सप्टळो
अथवा नोव्हेवर महिन्यांत पेंरतात वयाचे र्किवाएप्रिल
या महिन्यांत त्याची कापणळी करतात. ळिइडुरथानांतोल
आहे. दुसऱ्या प्रकारामघ्ये वाष्पामवन होऊ नये म्हणून
त्यावर जाड कापड बांधुन ठेंळिवतात. पळोटिर्ते, आल्या
नारळांचा कास, जवस।र्वे र्पोटिस बांधुन ठेवून ते सकाळत्'रथ्याकाळ वद्लन्ग हे या प्रकळार'ग्पँकाच होय. व यांतोल शक
टिकून रहार्तो हा एक जास्त कायदा ॰॰_आहे॰ येकणें, पोटिस
लावर्गे, मोहरी वाटून लावणें, टरपेणसप्रख्या उष्ण तेलात वस्त्र
वऱ्यावशळा मार्गात जव, गहूं, वाटणि अथवा ढरमरे यांच्या
पिंकात पेंरतात. हृलफ्या, वाछुकामय, व थीर्डे रवत दिलेल्या
जमिनीत जवाचें पऱ्'क चांगले येते. एकराला ८० ते १२०
परैडापर्मेंत बॉ लागते. या निकाल! पाणी देण्याची फारशी
गरज पडत
नाहो.
एक एकर पिंकाच्या लागवङळीस
काहींच्या मते १८ स. ८ आ., काहींच्या २० रु-१२ आ. व
भिजहूंन ते बांघणें, कढत वडंया ठेवणे, उष्ण तेलैं चोळून
गुज्ञरायेव ५१ स. ८ आ. खते येतो.
रेंप्गग्नस्न भागांत लाल’म् आणव्!,फोड आणव्ळा,बोंळर्णे, रगडणें, '
सयुक्तप्रऱन्त व बंगालमध्ये या पिकावी
सर्वे प्रांतापेंक्षां
दावणें,च॰पा करर्णे,रे[गप्रल्त भागास व्यायामव तालळोम करणें,
जप्रत
व त्यास निजर्चे उपचार करणेंहे असल उपचार या सद्रारवालळो
येतात. श्कर्डे अशप् येत्या सांताक्रुझ येथें एका पारशी डावठ'
राते व कल्याण येथें डाफ्टर येते या गृहृस्यार्नो काढल्या
षंबांव, वायव्य सरहद्द, अजमौर-येरवाडा, पुंवहैं, मघ्यप्रांत,
सिंघ आणि मद्रास वरेररॅचा नंतर लागतो. ब्रिटिश हिंदुरया'
आहेत. इतरन्ना’हे दिंट्टस्यानांत मधुन
एकर
द्दिदॉत सटुंळा, इत्यादि नांर्वे आहेत.
मृ ल स्था न॰-॰`हृ’ २ ते ३ फूट लां’गंर्वे वृंणघान्य पुथ्वळो.
वरील समशीतोष्ण भागांत
सपांटींच्या
प्रदेशांत
सट्टेपडते. द्दिदृस्यानर्तेत हें झाड
त्याचप्रमाणे
ममुद्र्सपाटींपांतून
करण्यांत
नांतळोल एकद्र जवार्वे पव्क
मधून आढळतात.
जव-या झाडास लाटिनमघ्ये होडिंअस व्हृलगप्रे,
इंप्रजळोत वालाँ, सस्क्रुतमघ्र्ये यव, सकृ, मराठींत जव, सब्हु
लागवड
,
येते.
यांच्या
खालोखाल
१९०५-६ सम्लॉ ७३२६७",॰’.
होते. त्याच वर्षी एतद्देशळोय सस्यानांत
हे क्षेत्र
४१८४६३ एकर होते. हे क्षेत्र मुख्यत: जयपूर, अलवार,
भरतपूर व ग्यालेर या सल्यानांतून विभागलॅं गेले होते.
बंयालऱ्-येथोल मध्य व उत्तर निल्ह्यांतच विद्देम्पत; या
पिकाचीं लागवड आहे. दक्षिण बिहारमध्ये जव हे अत्यंत
स्वस्त खाद्य होय. उत्तर बिहारमध्ये जवालप् तितके: महत्त्व
नाहो. खुद्द बंगाल व अळोरँप्तामघ्थॅ या पिकाचा बहुतेक<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१९
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "लव अभावच मवाराट्टीय खो, रज, १९६ जघस’ आहे. पाटणा, भागलपूर, व णेटा नागपूर हो गु ण ध में.…चनै यार्ने जवार्वे खालीलप्रमाणे पृथक्करण मुख्य वनक्षेत्रे होत. सयुक्तप्रांतऱ्-या पिकाच्या..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>लव
अभावच
मवाराट्टीय खो,
रज, १९६
जघस’
आहे. पाटणा, भागलपूर, व णेटा नागपूर हो
गु ण ध में.…चनै यार्ने जवार्वे खालीलप्रमाणे पृथक्करण
मुख्य वनक्षेत्रे होत.
सयुक्तप्रांतऱ्-या पिकाच्या बाबतीत या प्रांताचा नंतर
पा‘हेला लागतो. आया, अयोध्या, गोरखपूर,
वनारत,
दिलेले अ|हे.-~पाणी १२'५, औंजसद्र्व्र्थे ११‘५, पिष्टसत्व
७०'०, चरवा १'३, तन्तु २‘६, क्षाररक्षा २‘१. औषधांत
जवाचा फार उपयोग होतोते एक पिताचौ जळजळ(श।मक)
किंवा सूज कमळो करणारे औंषय आहे. रव्ग्यांनऎ ते मुद्दाम
पथ्य म्हृणून देतात.
लखनौ व अलाहावाए हो मुख्य यवक्षेचँहात… स’ १९०५""६
मध्ये येथळील एकद्र वनक्षेत्र ४१२७९३६
एकर होते.
मम्यप्रति व वऱ्हाड: …स. १९०५…६ मध्ये एकंदर क्षेत्र
१ १ ६ ० ८ एकर होते. जबलपूर, द्मळो, बिलासपूर, वाया हो मख्य
व्या पा र॰--व्यापारळी आकड्यांवरून जवाच्या निर्गत’ति
स.१९०१ पाहुन १९०४-५ पयेत घोरेघीरे वाढ होत होतो
अते दिसते. पण स. १९०५-६ मघ्यें हो निर्गत एकाएकळो
जवक्षत्रे होत.
खालावलळी. स. १९०४…५ मध्ये गुंवईंतून सवकुंत जास्त माल
राजपुतानन्:…अजमौर*मेंरवाड हे या पिंकाच्या दृष्टीने
मह्रत्वाचें ठिकाण होय. पाणी दिलेल्या
म्इणते २३१०३७
या’मेंनींत एकराला
८६०७॰ हे. व नंगत्लनॅ ५९३०७ दंट्रेडवेंट मालाचौ
सरासरनिं ७.३४ हेड्रेडवेट पाक येत अहूंन पाणीनदितैल्या
जकात-( तेस्कत-उमा, गुंजराथळो-आळशॉ, हिंदीअलशळो, कानडी-अगशळी, टॅटिंन-ळिनस उसिटण् निसिमय ).
र्पनाव व वायव्य सरहद्दप्रति:-…या_ठिंक[णी जवाचळी इतर
कोंणत्यात्’हे पिर्फात लागवड न करतां स्वतेन्न लागवड कर-
मध्ये एक'द्र
या पिंकाचळो लागवड दिंदृस्यावात फार प्राचीन काळापासून
सस्यक्षेत्र र्पजायांत
होत आहे. हिंदुस्थानात हे पाक फक्त
१२ ॰५६७८ एकर व वायव्यसरइद्दच्वराल प्रांतात ३१५२७२
येथील कित्येक उच्च
तिबेटी जव’ म्हणून
मे व गूज या महि~
सप्टॅ’नरमघ्ये तयार
निरनिराळ्या ठिकाणचे
‘ ती फ्त्तत कादूतात
वाखाकप्‘रेत'त्
व ह्या फुटू नयेत म्हृणन याचप् परा द्द्’र्दि
( एकरळी १०० पौ'डावर ) करावा
लागतो.
काद्यांचा
दोर
आखड निघतो. सर्वे।हंद्रुस्थानार द्रवपौ सरातरळूप्नॅ तास
मिश्र
लक्ष एकरवर क्षेत्र जवसळोखालळो असते. यापकळो वारा लक्षांवर दैत्य म'यप्रांतांत व क्ऱ्हाडात मिळुन असते. याच्या
खालोखाल नंगाल व ओरिसा प्रांताचा नंतर लागतो. सन
1
यावा
क्कव्थ अते म्हणतात.
आळी. तागप्करितां वाहूंळाला फांद्या न फुटणारी जात असते.
लागवड
लागवड करतात. पण साधारणत: ते स्वतवपणेव पेंरष्यात
येते.
मवासऱ्-या प्रांतात हे अत्यन्त कमळी महत्वाचे' पीक आहे.
१९०५-६ मध्ये एकद्र क्षेत्र ३२००० एकर काय ते होते.
म्हैंनृरमच्थें १९०५…६ मध्ये १३३८ एकरात जवाचीं लाग-
या कपडयाला लि`नन
झातेते नाहीत. बहार प्रांतात १९०७ साली मि. व्एयानडर करकळोव्हे नावाचा एक तप्तश् आणुन लागवड करप्यांत
होत नाहीं. १९०५॰ ६ मध्ये एकंदर क्षेत्र २३१० ०३ एकर
होते. अह्रमवावाद्, रेवडा, सातारा, सोलापूर व र्पवमहाल
हो मुख्य यवक्षेब्रॅ होत. गुंजराथेंत गड्रु' व जव
फारच मौल्यवान व टिकाऊ असतो.
बी आणुन त्याजवद्दल प्रयोग ईस्ट इंडिया‘कपनापावून हिंदु,
स्वप्नात ( नंगत्ल्यांत ) चालू आहेत. ते अद्यापि सफल
ट्तकँ पीक निघते.
प्रयाणांत जवाचळो
पिंक,
वियांकरिंतां क1’र`तात. याच्या वाखापालून कै`लला कपडा
होते. एका एकराला सरासरळोनॅ ८॥ मण ज्ञान व ४ मण ‘प्रिम'
पुंवर्हेऱ्-येये कार मोठया
नियांकळिरता
वितात. आयतेड, तेलनियम, रशिया व अमेरिका वगैरे
ठिकाणी हे पाक देठाप'खून निपणाऱ्या वाखाका‘रेता व
एकर होते. फिररेझपूर, द्दिसप्र, गुरगांव, पेशावर, इशारा,
व नत्रु हो मुख्य वनक्षेत्रे होत.
क।२मौर:-येये जव चांगल्या प्रतांचें होत नाहो; व लोक
काळजोपूवैक लागवर्दाहे करीत नाहोत.
प्रदेशाच्या ठिकाणी‘ ळिग्नम अथवा‘
तो एक प्रकार आहे वा होत असतो.
न्यांत`परणी होऊन पळोक आगस्ट व
निगेंत
केली.
णमिंनींत एकराला सरासरव्नं १‘४६ हं. पीक निघते.
तात. स. १९०५-६
हे. वाद्देरदेर्शी गेला. त्याचवर्षी सिघते
१९१४|१५ त जवसळीखाला
एकर
क्षेन्न
होते
मुंवहें श्लाख्थ् रॅत
व निझामच्या राज्यांत
एकर क्षेत्र जवसळीखालाँ होते. या पिकार्चे
वड केला होता.
वाढत अठून,
उ प यो ग.…जवाच्या भाकरी अथवा चपात्या व्।व्रून
व भाजून खातात. प्रथम जव कड्रिन पाखडतात व नंतर
१९१…७
११८3१०
२३.४,॰॰॰
क्षेत्र वर्षानुवर्षे
सखी ते ३५ लक्षांवर येते
आहे. मय्यप्रतिर्केत नागपूर व छत्तीसगड या भागांत हे पळोक
कार महृत्त्वाचें आहे. सन १९१५।१६ सप्लळो भंडारा ९८॰॰॰
मोंगरांते वडवतात. नंतर द्बूऽन त्याचे पळोव् करतात व त्या एकर, नागपूर ७८॰॰ ॰ एकर, व बांदा ६ ८०० ० एकर याप्रमाणे
पिठाच्या भाकरी करून खातात. पवविण्याला योर्डे कठोण
क्षत्र अतून वऱ्हाडांत॰यवतम'ळ २३ ० ॰ › व अकळोला १ १० ० ०
असल्यामुळे अशक्त मुलाना हे खाद्य देणे ठोक नाहो. एकर येत होते मुंबई ड्लाख्यात १९१६।१७ सखी एक'
दिंद्रुस्वनातोल पुघ्कळ् भागांत जवापातून दारू तयार दर १६ ० ,७२ ५ एकर क्षत्र होते त्यावैक‘व् विजापूर ७८२१४
करतात. त्याचप्रमाणे घोड्यांना व गुरागां पासद्त्णा म्हणत
एकर, नाशिक २२९९६ एकर, सळोलापूर १९५८७ एकर,
!
]
मन देतात.
|अइमद्नगर
११८५०
एकर
व धारवाड
१३६४७
एकर<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२०
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "॰…. महाराट्रीप झुप्नकॉंप्रा, ( ज) १९6 जवादिर्डीगर क्षेत्र जवतोखालाँ होते. जवस बहुतेक परदेश? रवाना होतो. सरकारळी परवाना घेऊन गांवार्चा लागवड करतां दरवर्षी ` कॉंफौ लावण्याच्या प्रय..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>॰….
महाराट्रीप झुप्नकॉंप्रा, ( ज) १९6
जवादिर्डीगर
क्षेत्र जवतोखालाँ होते. जवस बहुतेक परदेश? रवाना होतो.
सरकारळी परवाना घेऊन गांवार्चा लागवड करतां
दरवर्षी ` कॉंफौ लावण्याच्या प्रयत्न काहीं भागांत होत आहे.
मार्च १९१४ अखेर पांच वर्षांची सरासरी पहाता
सप्त कळोटॅप् अठ्याणव लक्ष नव्वद हजार रुपयांचा माल
परदेशी रवाना झाला. १९१५प्१६ त[लळी ७॰॰,॰॰॰
टन जवस किमत १०२६॰॰॰ रुपये याप्रमाणे माल वाद्देर
देशी गेला.
जा तो.…याच्या दोन जातां आहेत. नेइमौचीं
तांबूस असून तिला नळोळसर फुलें येतात.
रवया रंगप्चळो जात
काळसर
दुसरा एक पाइ-
आहे. तिचा परा मघ्यप्रांतांत फारच
त्याला काळी, खोल, ओल घरून ठेंवणारळी अशळी जमीन
लागते. हे पच्क गहूं, हरवरा व शप्ळू यांच्याशी आळो॰
पाळोते पेंप्रॅतात; व कित्येक तेळां या पिकातून जवसप्चें पब्टे
मघ्यप्रांतांत
जवस एकटाच
पेरितात.
तथापि
हे पाक गहूं, हृरवरा वगैरग्शीं भिसळूनद्दि पेंरितात या पिकाला
खत देण्याचा फारशी वहिवाट नाहो. जमळीन एक दोन
तेल नांगरून ववरच्यावर क्रुळबुन तयार झाल्यावर आवटोवर
महिन्यांत पाभरळीमें पेरणी कारेतात. होन अव्ळच्त अ'तर
सुमारे एक फूट असते. एकर! व? सुमारे दहा बारा पळी’ड
लागते. हे पाक पेंरल्यानंतर पुढें निदणी
टिपणीं कप्रेहो देत
नार्दात. फेबुवारळी महिन्यांत पाक तयार होते. ते तयार
झाल्यावर निळ्याते कापितात व त्याच्या लहान पेंढया
वाचून ढ’व्ग पाळून ठेंवितात. नंतर खळ्यांत नेऊन पसरून
ठेंवितात व वाळल्यानंतर मच्गऱ्यामें सोडून ते पाखडतात.
वादशहाचा
दर एकरा सरासरीं उत्पन्न ४०० । ६०० पौ’डपर्मेत
येते. बियाचे तेल क’ढितातसींटिस कळिरतात व चटणी करून
खातात. गुंरास जुलाब व्हावा म्हणून जवसत्र्चे तेल पानितात.
स्वयपाफांत फार
त्याचा र'गांत व व्हारनिसाँत
उपयोग
कार उपयोग
कारॅतात.
होतो व छाप-
ण्याचीं शप्ईं तयार करण्यांता‘हे त्याचा उपयोग होतो. पेंड
गुरास खावयास वाढतात. तो फार पौष्टिक असते.
का.…-
हा शहाअलम
वडील पुत्र. याचा जन्म स. १७४९ व झाला.
पानिपत
आल्यानंतर
अहृमदशहा
अवदप्ळोर्ने
मोगली साम्राज्याचे ( रग्जट ) राजप्रतितिणि नेमिर्डे होते.
त्यार्ने हा कारभार
आपला वाप पुन्हा
गत्र्दावर स्थाना-
पन्न होईंफ्र्मेत ( १७०१ ) चालविलायांऱ्त्
दुसरे
नाव
शहाजादप् जहोदरशहा अते होते. पुढें यार्चे व याच्या
वापाचें न पटल्यान हा दिन्नच्ढून पळून लखनोंस गैला
(१७८४) त्यावेळी तेथें वें’त्रन हेस्टिग्ज हा दिघांचा
पवार
असफडहाला
याच्यार्शी
कंपनीच्या पावतात
कांहो
करार वगैरे करण्याच्या कामासठीं आला होता. जवान’
बख्त हा हेस्टिग्जकर्डे गेला व त्याच्यावरेप्नर पुढें बना०
रसला कायमचा जाऊन राहिला. देंस्टिन्जते वसळोराकडून
खटपट करवून याला दरसप्ल पांच लाख रु. वा नेमणुक
करवून दिला. हा बनारस
येथेच, आपल्या वयाच्या ३९
वे वर्षी
ला(३_१ में १७८८ ) त्याची कनर तेथेंसृ
आहे. त्याच्या प्रेतास वादशप्हो मान देण्यात आला
होता. याला तोच मुते होतो. तो वइतर सत्रे क्रुटुंव
त्याते इंप्रबांच्या देखरेखीखार्ली ठेंविहेंऽ. त्याचा नंशआतां०
पर्मेत बनारस योपँ नांदत होता व त्याला इंप्नजसरकार
काहो रक्कम’ग्हे देत होते. या`न कैल`ला वयाश ड्नाय`त
मुर्दीदकादप् नावाचा एक
म्हणणे धान्य तयार होते.
वऱ्हार्डात या तेलाचा
व कांहीं शिलालेख येथे सर्वेपडतात.
जवानबस्व्त मिर्झा, यदि
याला
जुजबी आढळतो. जवसत्चें पाक रव्वळो हेगामातोल असून
घालतात.
द्दिदूदेवळांचें अवशेष
येते.
काही
(इंडियन
ग्रंथ
हाऊस )मच्र्ये आहे.
ब्रिटिश
यार्ने
म्युझिअम
लिहून
ठेवलेला
द्दकॉकत स्कॉंटते भाषांतर करून हेंस्टिग्जच्या तत्कालॉन
सरकारी रियोटच्त छापली आहे.
दु स रा .…हा दुसरा जवानवख्त सिर्सा, द्रिखीचा शैवटचा वादशहा
मुलगा होय.
वहादूरशहा याचा सवकुंत
धाकटा
याला आपल्या वापावरेण्वरच र'ग्रून
अककुंट
येथे राजकळोय कैदी स्इपूळान ठेवण्यात आले होते.
( १८५८ `. हा मरॅपर्मेत ( १८८४ ) तेथेच होता. याची
बिल्द्यांतळोल नैऋत्य दिरेग्कडे असलेले डोंगर. उत्तर अक्षांश
१२‘ १८’ ते १२° ५४’ व पूर्वे रेखांश ७८॰ ३५’ ते
बेगम दमानीं दिला इंप्रजसरकारते दरमहा २५० रु.
पोळित्’टॅकल पेन्शन दिले होते. [ वींल- औंळिर. बप्र्यो.
७९."
डिंवश ]
ज्ञवा’प्दे डोंगर-मद्रास
११’. पूर्वेकडील
डोंगर
यामघ्य पालार नावार्वे खोरे
इलाखा.
आणि
आहे,
उत्तर
जवात्दे डोंगर
मलयालळी
जवाप्सयप्’मध्या‘हँदुस्थान. माळवा एजन्स्रोतोल एक
नावाचौ होगर्रा जात रहात अहूंन यांची सख्या साधारण
ठाक्रुरात.
जठहार, ते त्या न.…भुबईं ष्ट्लाख्यांत, ठाणे णिल्ह्यांत
१०००० आहे. येर्थांल हेवा ताधारण
तापाचच्
यांत
वाहँट असम दिव-
सप्थ येथें नेहमी उद्धवते. बेंलळोरपासन
राच्या एका कैंलासगड
नावाच्या
याच डोंग-
हें लहान`स
संस्थान
उ. अ. १९॰४३’
ते २००५’ व पु. न्.
डागरावर उन्हाळया’ ळू ७२”५५’ ते ७३"२॰’ यांच्या दरम्यान अघून त्यार्चे क्षेत्रफळ
करिता पुष्कळ नंगते वाचले आहेत. या डागरात पूवा न् ५०० चौ.मे.ल`कस'ख्या (११२१ )४९६९३ व उत्पम
फार नंगल अते पर'तु हल’व्ते बहुतेक नाहोतेकेर्लेआहे.
३… लाख आहे. याच्या उत्तरेस डहाण, मळोखाते, पूर्वेस
येथें शिकार पुष्कळ सप्पडते. गया, सत्वर, चित्ते, ठिपम् माखार्डे, दक्षिणेस वार्डे व पाश्चमेस हाणू व माहोम`हे ठाणे
फ्यांचें क्षीण, वाव वगैरे व"यपशू सांपडतात. या ठिकाणी
बिल्ह्मातौल तालुके आहेत’
पूर्वी या प्रदेंशांसच कळोळबन<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२१
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "ञव्हार मदण्याट्रीप ष्ठानफॉंश. ( ज ) १९८ जव्ह्मश् म्हणत. तेरऱ्थानजा बहुतेक प्रदेश म्हणजे एक हजार फूट उंचीवरील सह्याद्र्ळीर्वे पठार अखून तो सर्वत्र टेकड्या व डोंगर प्रदेश डोंगर..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>ञव्हार
मदण्याट्रीप ष्ठानफॉंश. ( ज ) १९८
जव्ह्मश्
म्हणत.
तेरऱ्थानजा बहुतेक प्रदेश म्हणजे एक
हजार फूट
उंचीवरील सह्याद्र्ळीर्वे पठार अखून तो सर्वत्र टेकड्या व डोंगर
प्रदेश डोंगराळ व सङकप् कमी त्यापुढे व्यापार
फारसा
आहे. मुयै, पिवळी, नाव व देहर्बी या नद्या मुख्य आहेत.
नाहीं. डहाणू रॅल्व्रँह्टॅशनमसुन जव्हार येथे जाण्यास मात्र
एक सरकारळी सउक चांगलळी बांधलेली आहे. याशिवाय चिंच,
उतार, गव्डॅ, याँउमरिं, शौर, तळांसल्प्, कासतवट्वडळी व र्डेग
सत्थानांत मलमाड
या घाटठेंतून नारळीकसारळीक गाउळीरत्ते आहेत.
आणि बार’प्कसारळीक नाहे
व नद्या यांनी व अरण्याते व्याप्त
( १५० चौ. ते. ) , कर्यात हेतेलळी
( ३६॰ चौ. ते. ) व गंजाउ( ३० चौ. ते. ) या नांचाये
तत्व महाल आहेत. खुद्द जव्हार येथे पाण्याचा तुटवडा पडे,
वरळोल जकातळीऱ्ब् वरेंचते
त्यामुळे माजी रप्जार्ने ड्रुर्मंनद्व्च्या
रक्कम होय.
इतिहास,-…घुमुलयानी अमल
पूर्वी उत्तरकॉंकणचय् बराचसा भाग
शहरास केला आहे.
पाण्याचा
पुरवठा
तेत्थानचा हवा म`लव्`रयाचळी व ताप-
सराईंचौ आहे. येथे साळिना १२० इंचांपर्येत पाऊस पडतो.
पवॅतप्च्यप्
पायथ्याशी उन्हाळा जास्त कडक
असतो.
उत्पन्न
निट्रग्त माला-
तेत्थानला मिळते;
तें व
जगलखात्यार्वे उत्पन्न ।‘मळुनच वहुघां सस्थानचळो जमावद्ळोचीं
( द्क्षिणेंत ) होण्याकोळी व वारली जहा-
गिरदारांच्या ताब्यात होता. जव्हार' येथे पूर्वी नारळी राजा
बांधकामास लागणारा दगड (वपुल आढळतो. साग, शिशू, होता. वळोळी लोक पुढील दंतकथा सांगतात. पक्ष्पेंरा अथवा
पळस, त्तिवस वयेरॅ झार्डे फार आहेत. सानाचा व्यापार ' नववा नावाचा एक करेंळळो थनघाटप्जवळ मुकर्णे या गांमाँ
फार असून तो नोव्हेंबर ते जुनपग्रँत चालू असतो. झाड एक गढोबेद् जमीनदार होता. या घराण्याला तेव्हापासून
तोङण्यापूर्बी इळाकडा २५ टक्के ( र्किमतोंच्या ) रक्कम सरका-
मुंकथे हे आडनाव भिळालँर्ढे आहे.
रांत भरावळी लागते, ग्ऱ्ह्रण`ज तोड करण्यास परवाना मिळतो.
तोडोंवो तपासणी महालकरळो कारेतो व मग लाकूड बाहेर
जाऊं देतात. द्रेंक गाडॉमग्न्प् ३८८ ते 3८१२ पर्मेत द्ल्तुरंप्
देवींच्या द्रेंग्नास गेला असतां तेथील पांच कोळी लावून“!
त्याला राजा होण्यावद्दल अशंट्ववट्वेंद् दिला. त्यावर जयावर्ने
घेतात.
काठेंवाडांत घुड्रुन तो तिकडे सात वर्षे राहिला. नतर परत
सस्थानाला सर्वांत जास्त उत्पन्न याच ( ज'गल )
खात्याचे आहे.
कोळी लोक जमवून पँउ,
तो एकदां पिंप्री येथे
घरमपूर हाँ गांर्वे काबीज कख्न
एकंदर उत्पन्नर्पिकॉ हे उत्पन्न जवळ जवळ " येऊन जव्हार येथे गेला व तेथील वारलळो रग्जासत्याते येलांच्या
८१ ते ८२ इजार'ळाते आहे.
ज'गलांत वाघ, न्वित्ते, अत्वळें,
कातड्यामें व्यापला
जाट्टेल इतका जमीन मागितली;
तळी
तरस, खळोकर्डे, सांवरें व कळोळसु'दें वयेरें जनावरे आढळतात.
लोकसंख्येपैकळो तेकउय् ८४’६३ वन्यजातव्चें लोक ( चारलळी,
तांतळो काढून त्यांच्या मोंजर्णीत
ठाकूर, काथोढो) असून वाकच्वे कोळी
कुणबी व इतर
लोक -
( नहुथां जयवाते वारल्यापाहूंनें धूतेतेते
आहेत.
गरोव असून
घेतो
असावा असा या गोष्टीचा तेदभै निघतो ) व त्याला जव्हार॰
वारलळी, ठाकूर वयेरें लोक
व मजुरळी यावर त्यांना त्तिवळीइ होतो.
हे लोक दास वाचून ६ कोंसठेंवरळोल गंभोरगउ
फार [येतात. करँळ्वांत चार पोटजाती आहेत
( राज’
कोळी, महादेव, मल्हार व ढोर ). सत्थानिक हा महादेव
करैळीं जातळोचा असल्यार्में महादेव हेच आपल्यास राजकीळीं
म्द्णार्वेतात.
जनावरे
खावयास
कातकऱ्यांर्शी तौयरिकॉ केल्यानें ढोर
निर्माण झालो.
राजाते कबूल केल्यावर त्यार्ने
लागल्यार्ते
कोळी
व
हो पोटजात
ठाकूर कोळी हे रम्जकाळ्यांच्या दर्जाचे
कप्त’ढ्याच्या अगदी थारळीक
राजाचें सारे राज्य घेतलें
प्रदेश छुनाडला
व त्याच्या
थोडासा प्रदेश जहाम्गेंरव्द्गाखल दिला.
मोंवतालचा
जयबाला दोन मुर्ले तेमशहा व होळकरराव या नावाची
होतां. पैकळी तेमशहा हा जयवाच्या मागें राजा झाला.
दिळांच्या मुक्षुलमान पप्तशहास या डोंगराळ प्रदेशांत स्वारी
करून तो हस्तगत
करता येट्टेना म्हृणुन त्यांनी या नेम"
शहास ५डूप्न स.१ ३४३रॅऱजा शहा हा किताब देऊन त्याच्या
आहेत.
ताब्यातील २२ ।"कहैंळू असलेला व ९ लाख उत्पन्नाचा मुलूख
पहिले लोक वळोलत'प्ना नेहेमी म हे अक्षर व दुसरे लोक
त्यास स्वतंत्र तोडून दिला. तेव्हां नेमशहाते या दिवसा…
ळुपप्लून आपला एक त्वतेन्न शक
बुक केला व तो
` आजरठुडां तेत्थान’ळात सरकारी कागद्द्पन्नळी वापरळीत अस-
असून त्यांचे मठाक्रूर व कठाफूर
असे
दोन
भेद
क हैं अक्षर ( काग्रँकारण नसताना ) उपयोगांत आणितात.
ततेच
मठाकूर
तर कठाकूर
खातात
_आपलो लप्रे लानप्यास
आर्णांत नाहीत.
ब्राह्मण आणतात
कातकरो
गळोपांस लोक
अते म्हणतात.
पूर्वी या सत्थानांत ( व्गभिचारळी ) जारज प्रतेस गुलामा`
प्रमाणें रावघिण्याचळी शिक्षा देत व त्यांचा भरणा
जव्हारच्या
राजाच्या पद्र'म् दास व वासळो या जागांवर करळीत.
च गजाड थागांशिवाव इतरत्र जमीन
नाषीक आहे.
मलवाउ
मुख्य
पीक भात, नाचणळो व साग असून सरकार आपल्या डुकमतळो
तात.
गुजराथच्या नयावांच्या ताब्यात येऊल नागोंठाण्यापयेतचा प्रदेश आला असतांद्दि त्यांनों जव्द्द्यट्.
करर्तेस मुळीच उपसर्ग दिला नाहीं. सतराव्या शतकाच्या
मध्यात फिर'गळो लनृफांनों मात्र यांच्या प्रदेंशप्स बराच त्रास
देऊन, अद्देप्रळो किल्ला व कांहीं महत्त्नावीं ठाणी कार्वाज `कलळो
होतां. मात्र त्यांना जव्हारकरांवरळोवर सतत भांडार्वे
खालॉ तेवाखुचा पेंरा करविंतें, व पुढें ठराविक भावानें तेवाड्रुर
लागते व नेहमी चकमकी कराव्या लागल्या
त्यांत “ हे
कोळी लोक आमर्वे नुकसान करून सरामर या आलावव्न
विकत घेते.
त्या झाडावर वानरासाररत्रै अते चटकन पसार होत ” अशी<noinclude></noinclude>
0kb78udkx697lvw065tgus9ni7rq0gi
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२२
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्द्यराष्ट्रळीघ आनकॉँश. ( ज ) १९०, जच्हार माप्हेवळी प्तिर’म्यानॉ दिली आहे ). होते. कै. मेडलीग व कै. वापुंम'हेव आठाप्यै यांच“! प्तष्टाग् या बैळीं ज्ञठइप्रकरऱ्कडे म’हुलळी ( दिक्क’ त्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्द्यराष्ट्रळीघ आनकॉँश. ( ज ) १९०,
जच्हार
माप्हेवळी प्तिर’म्यानॉ दिली आहे ).
होते. कै. मेडलीग व कै. वापुंम'हेव आठाप्यै यांच“! प्तष्टाग्
या बैळीं ज्ञठइप्रकरऱ्कडे
म’हुलळी ( दिक्क’ त्यांच्यात तब्व्पाँत होता )
ममलत हेनेद्दर्मी घेत असत. हे विद्वानॉवे चहावै होते.
पडून भिंवर्डग्’
पर्मेतचा प्रण्त होता. त्याशिवाय तवर ( दमण जवळील ),
वझे ( व’यिद ) व दरिर्के ( उवरगांग्मव र्चांल ) हाँ तीन
शइरॅ त्यांच्या हाती
हँप्गेळो. फि'रग्याच्या
उतरत्या
ज्यांपूग्ऱ्
गगंव प्रवैप्त धान्यावो
वगैरे
लोकोपयोगी
मदत
कामे
यांनळो रणी हो नाशिक
काळांत
करणें, रस्ते,
त्यात?
विहिरी र्षांघर्णे
शॉन
केळी,
जिंल्ष्ठांत’ण्ल‘ कळु'हँन
गांवच्यां
कन्कयान’व् आमची सत्ता पुन्हा वघ्उविंर्लप् (१६५० ). औंरग०
कोळी पब्टलाबौ मलगळी होय. हे पक्षघानार्ने सन १९०५ मध्ये
ड्रवाऱ्र जष्इऱ्रकरास भास दिला नाही.
मरात्र्य,‘ घ्या कारऽ दोन प्रथम मं रळोपन र्पिगटे यानों
जत्र्हा’च्या राज्-ऱ्गक्र त्रॅग्रळी केला होती. तेन्ष्ट्र'प्( १६७ऱ्)
विकमशहा हा पळून मोंगलहेंत गेला. पुढेंद्दि मराटग्रांन’व्
जव्दृप्रवर र्मान चार वैळां स्वाऱ्या केल्या. जव्इ'रकरातेंद्दि
।"क'रग्यांवर रवारळी करून त्यांना प्रदेश ळुऱला (१६९० ). `
वारले. त्प'प्च्यामाहें.’ त्यांचे वडील पुत्र धी. रप्गे कष्गणहा
अठराग्या
शतकाच्या
ऊ’है वाळ’माद्देच हे गादळीवर नसते. हेच द्दळीं सैस्थान'फ्रि
पनि आहेत. यांचा जन्म सन १८७९ च्या मगारास साला.
यांऱ्र इंप्नच्ची शिक्षण मवट्रेस एय्रँऱ्फस्ऱ्टन द्दप्यत्कुर्लात द्द्`प्ऊन
वडिलांच्या
हाताखात्’ऱ्'ऱ त्यर्ली राज्यकारभाराचें
बिक्षण
घेतले. यऱनां एक बंधु. एक वद्दळीण अश्या दोन मुर्ले आहेत.
प्रप्र'म‘ळो फतच् समुर्दाकनाऱ्याळिशवाय हें सॅत्थानला न्श्रायममहूव्यावै, दिवाण“! व फ्रीच्द'ग्’प् सर्व हक्क
अ’हेंव. गादीवर वसन’ण्ना फक्त इंप्रनसरकाराम वनराणा
बाक’ग्र्वे सर्वे उत्तरकोंकण ( वल्ट्टे ते दमण व भि'वडीपर्थेत )
नव्हारस्था हात? होते व त्यांत
१०
।"कते अधून
त्याना
द्यावा लागतो. न्यारवर’प्न खंडणी द्यावी लागत नाहीं. दत्तक
वनूल ३।। ल'खाया होता. पुढे" जव्इ'रकर हा मराठ्यांचा
माउहैर्मंक्क वमला व त्याच्या हातीं थोडासाव प्र‘ळात उरला.
घेण्ग्स इंयज्ञर्केचीं परवानगी लागते. ऍण्नजम’प्न ही सपँ
सरन्य्ण्नची मऽळकळीवी गणिळी जाते. पूर्वी ज्ञमळोनमोंज्ञणी
पेशव्गां'भ्ळी त्याच्यावर सरर्देशपुरथी व यातली हे कर वना’वलै. नागरप्ग्र होत अते. येलाचळो एक जोडी (जत्फाँ अमीन
एकदां नर कौन्व्’वि बँड त्याला मोंट्वतां येहैंना म्हृणु’ग् हें न'ळागर’,ल तितकी एक नांळंर जमीन होय. एका नाक्यावर
त्याला दरसाल १ हजारांचा नजग्प्णा पें'शांत्र्यास धाव, लागें.
". ते ८ व्. पयेत सरकारवारा अते. शिक्षणावर ३ ते ३“
बिकमशहास १०४२ त वम्रल्यावर त्याच्या वर्डाल राणींते हजार रु. खग्व होतो.
घेतलेला दत्तक थाकटया रार्णांनॅ ठार मारविंल’. तेव्हा
गां व:“-हों तेत्यानची राजधानी असून येथे पांचशें
हैरऱ्थाननो सर्वे सत्ता पेशव्यांना आपल्या हान? घेतला. या ` घराची चत्’न्ळो आहे. गांग् प्तड्रुद’पार्टापाखून १ द्दग्रार कूट
ऱ्म्मार्णे'गॅ घु॰१७५८व१७६१
मधे त्तव्द्दार पेशव्यांच्या तम्व्पांन
’ डेनाच्या पठारावर असल्याने
ह्या
ण्'ग्डव
निरोगी
आहे.
होते. पु’हँ त्थांगॅ १८८२ व जव्ह्’रकरास १५ ते २०
इजाराचा मळुरव तोंडून दिला. पनैगशहा टु‘सराहास.१७९८
नवग्न व व्न्ग्वा’त्थतपन्प् घरें वाधण्यास ल'छूङ फुकट पुरळिवर्ले.
त नाप्ल्थावरत्यान,‘ मुलगा विकमऽम्हा तिसरा हा पेश`
ढगांच्या अनुज्ञेऱ्ग् गार्दावर आला व त्याबद्दल स्थाऱ् ३ घ्जार
रु. नजराणा पेशव्ग्रांना देऊन त्र्ऱ्ऱ्वकऱ्या मामलेट्रारम्च्या
प'टुक्गा स्थिळाग्’दूंत उभा आहे. तो
बांधला होता. तो इ. स. १८२२ व
ष्ल्ईं’च्यातेस्थानिकानीं गावची पुष्कळ सुधारणा केली. लोका’र्बा
द्दऱद्वीच्या
ऱऽज्ञवाद्यब्’ज्ञटेंळच पूर्धी’ग्प् राजवाडा व
नगारस्वप्ना
१७'९० त क्रुष्'गशहार्ने
जलाला. व या "बीन
साड्ग्ऱ्ऱ्र राज्यकारभार चालऽ’वण्यादु व बुल केन्द्र. पुढें स.१ ८ ०५
य्प्ऱ्वज्ञवळ प्रावोन ज्ञव्हार गांव होते. येथून ५ फॉंसट्ववर
त`रानगऱ्म्’कहें भिल्लावा दंगप् झाभाते पप्तव्यान‘व् राजाला
आपल्ग लष्क’ळो अघिरगऱ्गप्वे देखरेरवोखालों ठेवते. तिसरा
विंकमऱ्प्हा इ. स. १८२१ व वा’ल्ग्प्’त्रैनर योंठ्याव दिंवमांन
त्याला मुलगा ( पतेंगशहा ) झाला; परंतु गादज्वद्दल विकमच्या दोन भावात नेहा `लागला. तेव्हां इंप्रगांनों तिसऱ्या
एक भापटगट्व नावाचा पट्वशां [कला आह.
फ्लँमरेंप्इ'भच गग्टां’क्र वजा’ग्ळोर्के, हा स.
वारत्’याऱ्रतर त्याचा चुलत
१८६५ व तिपुं’न्नेरु
पुंत्ण्या नारायण
यास
दत्तक
घेऊन स्व:चे नाव चवथा विकमशहा ठेऊन त्याला
गादीवर वसप्’वेर्ले. तो एक महिन्यानॅच’रारला. तेंव्हा
कृष्णशद्दाच् ग शाखेतील मल्हारराव नावाच्या मुलास दत्तक
घेऊन त्फ्ण्र्ते नाव चवथा पनॅगशहा ठेत्रिल्दूं हे प" "शहा
त्याबेंळळो १० वपहेंवे होते. दत्तदप्वद्दल इंप्रन्सरकाग्ते २०
हजार ऽ. नगराध्म घेनॅला. हेरुज २८ गावे स. १८६७ त
गादग्वर व’रर'ठे. त्याना पूर्ण अखत्गार जानैव य्ळो स. १८७७ व
मिळाला याना पुणें हागल्क्रुल'प्त द्वैग्नजा घ्’शक्ष्ग्'ण मिंलाढेल
२६
मरजघऱणाना वशवल अप्त[:…-१ प'पेरा ऊर्फ अग्रवा२ तेमशहा पाइला ( घुळवाराव )…३ भोमशठा-उ’ महेमद’
शहा…‘ळे कुंष्णशहप् पहिला ( दत्तक )-॰’, ऱ्मशहा दुसरा७ मिकनशहा पहिला-८ पत्व्‘ब्शद्रप् पहिला-९ फूष्गश्'हा
दुफ्ग ( दत्तक
)…१०
घिकय्शहा दुसरा-११
तिसरा-१२ पर्तेगशह्र' दुसरा ( दत्तक )…१३
क्रुष्णझाहा
(, क ’इ’हा
तिसरा-१४ पमैग-महा तिसरा-१५
दिऋनशद्दा चवथा
(दत्तक )…१६ पर्वेगऽग्हा चवथा ( दत्तक )-१॰ श्री कृष्ण-
शहा चवट्टे (ळिग्द्यपऽन ). [तैव्नि र्कोकण; बॉम्बे गव्इटँमिंट
सिलक्यान्स, पु २६; पेशयानृ त्ऱ्टु दृप्याळोजु-एथर‘दृज
कृत;
मँ’व्ट्युझो ऽग्प्म्बूंनठुव्’ऋप् तु: व्ऱ्च्ग्’ ग्ऽझं’टेश्रर ]
अशपूर, ते त्या न.… र्दे सत्थान म्ग्य्यप्रांत’ग्त उ. अ.
२२' १७त २३’ १५’ आणि पृ. है. ८3‘ ३०’ ते ८४॰ २४’
यांत वप्तलैं अनून १९६३ चौरस मेल क्षेत्रफळाचे आहे.<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "__ मवाराधृरेय मानफॉंश ळू (ज) २०० असदन संस्थान ऱ्या रप्स्थामाँतोंल हवा एक'दरळीत वरळी आहे, उन्हाळा : नवी करून देप्यांत अन्ली. तिच्या अन्वये र'भ्स्थानना सर्वे "कडक नसुन हिवाळ्यात घाट..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>__
मवाराधृरेय मानफॉंश
ळू
(ज) २००
असदन संस्थान
ऱ्या रप्स्थामाँतोंल हवा एक'दरळीत वरळी आहे, उन्हाळा : नवी करून देप्यांत अन्ली. तिच्या अन्वये र'भ्स्थानना सर्वे
"कडक नसुन हिवाळ्यात घाटर्देवर मात्र फार थंड हवा असते. अधिकार सम्याण्मेकाकडे राहृन त्यास हूंप्नजाच्या सामंतप्पैकॉँ
’
पण सखल प्रदेशांत अप्रज्ग्यदायक व सुखावइ असते; मात्र एक समजण्यात आर्ले.
गां न.…जशपूर सस्यानचें राजधान’प्र्वे गांव. यास
पावसाळ्यात अतिशय सदें हवा असल्यामुळे ज'ग्ग्लीतापाचा ’
उद्धव करणार“! असते.
घाटांवर ६७ इंच
प'ऊस
जगदळोशपूर अतेहि म्हणतात.
पडतो.
पेण हेद्दि पदप्र्थं उत्पन्न होतात.
१९०१ साल“! १६५४
मोद्दळो चौहाँकडे असुन
सुळक्यावर
वां-ग्लर्के " खुरिया
एक! अवघड
राणा” वै देऊळ
होती.
येथे
तेस्थप्मिंकाचऱ
रँवडॉ आहेत. लो. नं. ( १९०१ ग्ग्भ्’ळुग्भ्’. उत्पन्न रु,
|
"
कायतें हु १२३० ” ०. ष्'ठेवाडांर्तील तिसऱ्या दनीवे' र्दे सैन्यात आहे.
(
आहे, उच्चप्रदेशाशांल वहेंप्रवालाक या रार्णांप्ट्रे र्वशज ‘ पूर्गेच्या क्षत्रिय राजापँकॉं स्वामी चष्टन याप’हूंन
आहेत अर्धे म्हणतात. हे देऊळ बौद्धघतां‘र्चे दिसत असुन हा 'अपग्रंश असावा. जुनागडच्या घोर’प्नॉ र्यथें’ एक
अद्वैतळोल मूर्तीळिइ वुद्घाचौच दिसते पण लोक तो देवगृच ` बांधला होतान् व त्यास यारागड असे य्द्दणत.
समहूंन तिची पुजा का’रतान. लळोकर्मख्या ‘ १९२ १ ) रँवडॉच्या खुमानांच्या हातांत गेला. त्यांच्यापासुप्न
१५४ १५६.
सेल्थानिफांनीं सस्थानांतळील पुष्कळशळो पडित . खाचर याने इ स. १६६५ च्या सुमारास जिंकून
जमीन क्द्दाण्यास मोकळी करून दिली व
उंस
वाडा,
शाळा, ङप्कवेगला व सवपळोल्ट अगफम आणि तुरुंग आहे.
जसदन संस्थान-मुंबई इलाखा, काठेंवाडांतव्ल एक
संस्थान. उ. अ. २१‘ ५६' ते २२' १७’ व पू. रें. ७१‘८’
ते ७१॰ ३५’॰ क्षेत्रफळ ५८३ चौ. ते. यांत एर्कवर १६
प्रत्येक बेद्यण्ज्ञवळ अ'ग्वराहें असतेच. रेल्वेपप्ड्रुन हैं संस्थान
ढूर असल्यामुळे वन्श्रपदज्याँचा चांगला व्यापार चालत
नाही. सेरयामिकास ज्ञ‘गलर्चे उत्पन्न वरँच आहे.
प्रग्चळीन वस्वृंपँर्को फक्त खुरळीय’ पठाराच्या
उ. अ. २२‘ ५३’ व पृ रे.
८४° ८’. रांचापप्नृन ९० मैल असून येपळोल लोकसैस्व्या
येथळील ज'नलांत साल,ट्टबुरण‘ग् हो मौल्यवान झाडांची
भाष्ये असुन लाख, टसर रेशीम, मधमाशांच्या पौळ्यार्वे
आणि
गहुं
जसदन
किया
पुढे हा
विका
घेतला.
पुद्वै चजघूर खाजर यान्या अमद’नोंत्त हा आवनगरकडे गेला,
नंतर नवानगरनै वळकावला. पुढें जामजसजौच्या लप्नप्रसगों
नवानगरच्या जामते वचनृर रवाचर याच्या ट्वनाळीं के’क
यांच्या लागवडळो सुरू झाल्यावङन बाहेरून फार लोक आले.
ओरअना, नौतेंया, कळोरवा, अहार किंवा गौळीष्टांप्गर्वंशो
विक, कोर वगैरे अनेक जाती व पोटजाती येथे रहात अहुन
वचतुंर खाचर यातें इ. स. १७०७-८
मध्ये क्लिशठेंशी
अलीकडे यांरँग्काँ पुष्कळ लळोक वऱ्टून ख्रिस्ती झाले आहेत.
स्नेह सपग‘त्न्ला. याच वेशाकदे, दृहॉ हे ह्स्थान चालत
यांतील निम्याच्यावर हिंदू ववाकत्चे ”खत्तळी व इतर आहेत. प् आहे. सस्थानान जसदन डे' मुख्य ठिकाण आहे.
सरथानचळी
सन्मान्य
भाषा
छा’त्तसगडोंसप्रखो
र्डिदोचाच
`
ते त्या न जा अ व}
ची व ला र
भा र. शिक्षणा-
पोटधाया आहे. ओरावन व कोरना यावी त्वनेन्न भाषा द्रु १९२३ सखी प्राथमिक शिक्षण मोफत देण्याची व्यवस्था
आहे. लोक फ’र रानटी स्थितीत आहेत. या सत्यानांताल
स्'ग्स्थानद्वेत करण्यात आला. जासपुम् येथे एक नवीन शाळा
खुरि या ( कोरला),
उघडण्यात आलळी. त्याचप्नमार्णे तेस्यानच्या राणीम'हैवार्वी
फर्तेत्रहार ( झोरा’ग्ळोउ ). वेदम्बुआस् कव’र ) आरा आणि
खेमींदह्र ( रळीप्’नया) यात खुन्रयारँवराज सर्व इलरववागंच्या
दृय्ग्म प्नर्तांच्ग्रा इंग्रजी शाळांतौल नादग्र चिच्च थ्र्योथे प्रमाण
मुख्य घराणी पांच इलाखदप्गंचळी आहेत
जमीनी सेत्थानांत ।वे’ळ विरळ
अशा
पसरतेल्या
एकाबां सर्वे अमीन एकाच भागांत न’हग्.
सत्रैसव्घप्रण मांदृकान्’ग्च मुख्य पाक
११५ जाती लळोष्ठांनां माहीत आहेत.
'इंप्’ग्ऱ्द्वा २६ प’ऱ्त वण्ढावेर्हे कष्ट"! जावळीच्या मृत्यंमुलऱ्नळी शप्टेत
आहेत. न् न'प्र्वे दाखल केला आहेत. प्रब्थमेक शिक्षण जरा मोफत
करण्यात ठगर्के आहे तरी ते अद्याप सकाथे केल गेल नाहीं.
भ्अड्रुन त्याच्या
चर’इ’र्चे दहेडर्मे
र्वेद्रगां’गंतून शव्या उघट्वण्यासप्र्दी म’टव'नां उत्तजन दिल
जाते.
सर्वे शब्ळ'तून !’वफार्योच्या आरऱ्ग्याचळीहि पराक्षा
उप्’फांआंहे. या तेत्थानांत्पळील व्यवहार तेशण्ते काँचनच
होतो. जो मप्ल घ्प’वयाना त्याच्वामावदल्ग्रांत तांदृळ, फार
पद्दऱ्प्याँत येते ( १९२३ ).
तर ’हापृन ’दप्ग्रांव येन्न्प्. दरनद्रळोन्या फाँट? थॉडग्घ्प्रमाणप्वर
तलाव असत, त्यांच्या योगाने अदमाते २२,७॰॰ एकर
ज ळीन लागवउळोखालों जात
असे.
१८९९-०१ ९००
प्तप्बाँ फ्डमेल्या दृष्र्मंठ्यात, शेतकऱ्यांना पप्णीं पुरवण्याग्रीतां
सळोने सहैंपडते. ते गाट्व लोक जमा वरून राजास देतात. व
श्नरन्न लाखट्वद्दि र्भापङटेंन्, ते फिरते व्यापव्रळो मीठ, कापड
द’मरेच्या मोवदल्याँन पग्प्नातळो बेतात
एग्टुद्र जमी’भ्ळीच दोन विभाग आहेत ( १ )“खालसण्”
व ( २ )
‘ इलाखदप्रळो ’.
सत्थानच!
वलूल हुमा'र‘
एक लाग्वाचा आहे. सर्वे साधारण राजकारभर सत्थानिक
दिवाणाच्या मदरौंळीते करत असतो सैस्थानिकास इंग्नज’कढून
१८९९ साल? मी सनद मिंलालो तोच १९०५ सालग् पुन्हां
ज्ञमौनळोचा लागच्चडऽ-ऱ्१९२३ साली
अलनुम’ग्भ्र ट्व’नलग्न वांधप्’यर्हेत आला
चार तलावरेप्’ग्कॉ सर्वांत मोठा
अ'हे.
तेस्थानप्त एकदर
८
असून तो वराल
यार्वे क्षेत्रफळ
२५
चौरस मैल अमूप्न या तलावाच्या पाण्याच्या योगानॅ अद-
मारॅग् ११॰॰॰ एकर जमौन’प्चीं लऽगवउ करतां यैहेंल फ्रेतु
पुढें आळीपाळोव्र !’वद्दिराहेंव गाणी व तलावाचें पम्र्णी, घेतो
र्फारन उपयोगात आणण्याचें ठरते; नव्या विहोरळो सोप…<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२४
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान ".जसपुर ण्याच्या कामास उत्तेजन यार्वे याजना करण्यात आली ळंऱ्ष्णन एखाद्या बहाल करण्यात येहें. पुंउळोल खुवीवार उद्योगौ शतकऱ्यास एक विहार आणि निन्या पाण्याच्या योगाने जमीन ही..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>.जसपुर
ण्याच्या कामास
उत्तेजन यार्वे
याजना करण्यात आली
ळंऱ्ष्णन
एखाद्या
बहाल करण्यात येहें.
पुंउळोल खुवीवार
उद्योगौ शतकऱ्यास एक
विहार आणि निन्या पाण्याच्या योगाने
जमीन
ही जमात
[’मजणारा १५ [वघे
[[कण्याचा अगर
म्यूवजार्ने देण्याचा त्यास पूर्ण अधिकार अते. मात्र तत्पूर्वी
त्यार्ते स्वत:च्या रवबाँते त्या गा‘मेन’व्त एक तरा विहीर खळोद॰
विली पाप्हेथे. या कल्पक योजनेनुळें जमीन निव्योगीव
अडाणी शेतकऱ्यांच्या त[व्'गंतून उद्योगळो व शोधक शतक
ऱ्प्रांच्या त[ब्पांत जात आहे व र्णिहेरळो पुष्कळ बांधल्या जात
आहेत.
१९०३
साली
सस्धानर्ताल
सख्या १५७९ होतळी. त्यापँकाँ १२८०
२९९ पवया
बिद्दळार’च्चळी
एकदर
विहिरी कच्च्या व
होत्या.
तेस्यानशौ झालेल्या
रेल्देऱ्-मारनगर
ए'ष्’ फांग्गन्क्र्थे ‘ग्
ञलद्न सेह्धानग्स, भात्रनगर स्टेट रॅल्र्वेध्ऱ्या तोलद-जनदन
शरेनवप् ८ अ’णांवा भाग ( `शअर ) विकत घेण्याचा हक्क
प्राप्त झाला आहे. धेघुघ् क्लिर्डेलाहैन पुणे झाल्यास (नये
व ग्,एक[ व’ड्रुफ् राण्र्कोट आणि दुसऱ्या वाजुस अहृमद्|॰
वाद या शद्रुरास जाडल जब्इल.
सामाजिकऽ-लहानसहान कज्त्रे कीटढ्च्या मदनीत्रत्ट्टन
मिंला‘ट्वेंण्याच्यमू, पद्वत‘प्स सस्थानातफॅ" उत्तेजन दिते जाव
प्रड्रुन याववरँप्त
तेस्थानाकडून होणरे प्रयत्न बऱ्याच
अंशार्ने यशत्या होत आहेत. या योजतेमुळे पुष्कळ गर’[॰
यांचा फॉंटलला लढण्यास लागणारा अनाठायॉ पेंना कांचन
आहे. मालमत्तेच्या मुरहेंक्षनतेकरतर्ते, इमारन‘व्च्पाऱथानां
वरळील मालकी हक्क न'प्वाऱ्[॰ करून देण्याची योजना जसदन
आणि
जसवंतसिइ महाराणा
महाराष्ट्रळीयत्वानफॉंश-(ज) २०२
विघ्यापाशून तो सर्वे खऱ्वापर्थेत
वाढा’वण्ग्रंत आली
असून लोकघेनॉ तो फार पस'त पङलळी.
१९२३ साली बेट
( सफार्वे काम ) आणि काहीं किरकोळ करवलूली रद्द कर‘
प्’यात आली.
सस्थान'ग्त
मद्यन्वकास
वदळो करण्यात
आली
आहे. १९२२ साली मच्चाविकावा परवाना क`[ण[स’[हे देण्यात
आला नव्इतप्. या नियमाक्सिद्व सेस्थण्नच्पां हद्दीत मद्य
अप्णणाऱ्याध्रु
सेहुधानतपेंहें
शिक्षप्
देण्पांत
येते.
या मद्य.
विकीच्या बंदौमुळें सस्थऽनाच्या उपजात प्रण्तेवर्पो अदमाते
१३०० रुफ्याचळो बूट येत आहे.
तथापि मद्यळिवकास बंदी
केल्याबद्दल कोणळोद्दि ओंरङ
नाहीं.
केली
१९२३ सालन्द्दि
सस्यानाच्या हद्दीत मद्यविफॉंथे एकहि नर्वे लायतेन्स दिल
गेंठें नब्द्दऱ्. दरवार र्धा आला खावर यानीं सस्थानष्टेत सम.
रहेंमाण्सगॉ वान: व अफू यांचा उपयोग करण्याची वदळी कल?
आहे( १९२५ मार्च ).
जसपुप्-सैवुक्तप्रांत. तेनव्ताल त्रिल्ह्यांच्या काशोपृर
हातमागावर कापड काढतात. त्याचप्रमार्णे साखर आणि
द्द्मारत’ लाकूड यांवग‘हे व्यापार येथें चालतो.
ज'र-र त्रैतनगर…सैयुत्ताप्रांत- इटावा जिल्हा व तट्वसकुंणं
तोल एक गाव असून, ईंस्टहूंडिंयन रेत्वेंर्वे एक स्टेशन
आहे. उत्तर अक्षांश २६ ° ५३’ व पूबँ रेखांश ७८ '
५३’. इ. स. १९११ मघ्पें 3४८० लरेकसख्या होता. मम्पि…
पु’हूंन कळोणळो जसवतराय नावाचा कायस्थ इ. स. १७१५
मध्ये येथें येऊन राहिला त्‘[[च्या नावावरून गांवास हें नांव
मिलार्के आहे. इ. स. १८५ ’ च्या वर्डात बैङवत्म्यद्वेचीं एक
लष्करळी घोद्देस्व'गंयळी तुकडळो येथील एका लहानशा देंवळांत
उतरली होता. येथें व्यापार वराच आहे. नक्षीदार [’पतळेर्ची
भाडॉ येथ तयार होतात.
ज'तत्रंतऱ्रँनहृ, महाराणा (इ स. १६३८॰१६७८)_
हा आपला वाप गजऱ्ऱ्भ्ग याच्या हुग्-‘यूवेलऱ जौघपूट्च्या
गाद्ळीनर आला ( १६३८ ). तेव्श्चंपासन सन १६५८ पयैत
ग्ऱ्हृणवे वऱ्स वर्षे, तो अ[र'गझेव[व॰`[वर मुख्य त्ड्रेव्कख्न दक्षिणतच कामा’ण्ळोर’वर होना. तेथे
तो पुंव्कळ प्रसिद्धीस आला.
सन १६ ३८ मध्ये शहाजहान दुखणेकरळी पडला तेव्हां
त्याचा बहाल पत्र द… हा सन राज्यकारभार पाहूं लागला
त्मते याला ( याऱ्भ् दाराचा पक्ष
घेतल्यामुल ) पाळण्याचा
क्षुमद; र तेळिमप्व्. पृर्ढे अप्र'मझेव दारावर चाक्रून आला असता
त्याचा
पराभव
करण्याक रतप्
दारात
त्याच्यावर पठावेते. ’जसयतसिहाचा
जसवेतग्सहास
पराभव
झाला, तो
त्याच्या मेरमुत्सद्दीपणाघुर्ढे. द्रुग्रन्द क्षांहे सैन्य घेऊन इकडॅच
येत आहे अते समजल्यावस्वन उभयतां व'धूंस एकदमच
जिक्रु' अते ठरवून औंर'गझेवार्शी युद्ध न करता तसाच स्वस्थ
वसला. इतक्या अवकाशात औरं‘ग्झेवाऱ्ग् त्याच्या सैन्यातील
मुसलमासाँस फितूर तेल व थरमपूर येथे त्याचा पराभव झाला.
तरापण शैवथ्ळो औंरंगझेंवाचळी फळळो फोडून तो जळोघपुर'स
निघून गेला ( १६ ५८ ). या पर'मवामुर्वेय् त्याच्या राणीने
व्यानळो निभत्सना क.लो.व स्वत. सतळो जाण्यास विमल" तेव्हा
त्याते आरंगझेयावीं खाङ मांडण्याये
वचन
तिला
[द्'ळ क्
त्याप्रमाणे तो औंर'गझेवाच्या नेदृमॉ [”वस्द्ध वारेप्. अळीर'ग्म्झॅवामें
गार्दावर बसल्यावर जययिद’कडून र्भाउ घऱ्छुन जसवर्तांसहास
आपल्या वाडूत्रस वळवून येतते. प'रतु त्याचा असल्या हेतु
औब्लूगझेवाचा सड उगा‘ट्वेंण्य'चा होता. पुढें उभयता बेधृच्या
सैन्याची अलाहावद व इटावा याच्या वप्म्प [न खचवा येथें
लढाईत
त[उ
लब्गण्यप्च्या
ज्ञसवेतप्रँर्मेंहांनॅ आपल्या
ड्रुमाराव
गांव्
पडली.
फीबेंनिर्शी अकस्मात ओंरंगझेषात्रट्
उलटून र्हेन्यक्वियाण्‘पछ’र्डावर इला कला व त्याचा गळोट छुटला.
फ्रॅतु खुला वेळेवर येऊन न [’मळ'रग्यापृळें युद्ध टाळून च्यार्वे
शो लूट मिला‘ट्वेंळी होता. त‘[ सर्व घेऊन आग्ण्याचो वाट र्धारलळो.
दांह्रर्तांलोंच्’च्ल एक गांव. उत्तर अक्षांश २२. ° °. ” व पुरे
रेखांश ७८ ० ५०.’ इ. स .१ ९११ मघ्र्ये ६६१० लोकसख्या
पुङ क्षुजाना फ्रप्मव झाला. इकउ जसवतळिल्इ
होती. गांव अगदॉ अलीकडील असून येथें मुमुलमान कोटी
द्यावयाचा असा त्याचा [’नश्वय होता.
आप्रथाज्ञक्ळ
हारा याचा वाट पाहात वसला. कारण या रब्स गादळी [’मववन
परंतु द[र[स सवड,<noinclude></noinclude>
8ow4vakqg64kgajkvt5b6xngzxjcxbc
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२५
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "होईना. जसषंतमिट्व’र्मे पुष्कळ वाट पाहिली, आणि ड्रेत्वटळो तो जनृघपुरास गेला. तेथे आपली रग्[र’[ तेफ्त्ति ठेवून मेडल येथें जाऊन तो दप्राला भेटला. पण्‘नु आत'प् उपयोग नव्द्दतप् पूर्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>होईना. जसषंतमिट्व’र्मे पुष्कळ वाट पाहिली,
आणि
ड्रेत्वटळो
तो जनृघपुरास गेला. तेथे आपली रग्[र’[ तेफ्त्ति ठेवून मेडल
येथें जाऊन तो दप्राला भेटला. पण्‘नु आत'प् उपयोग नव्द्दतप्
पूर्वीची तेघी द[र.न्.या अ’ळसम्ते फुकट गेली.
तुनाचा फ्रामरँ फव्न
’
महाराष्ट्रर्मेय ष्ठानलोश ( ज ) २०२
ज्ञसवसॉसैद महाराणा
र्माठयेंप् र्योरल्या
अँप्मेगझेव
सैन्यासह ›ग्रांन्यावर
वळून आला. पण आपण जय मिन्बूंच असा व्ग्ऱ्लऱ म'रवला
वब्टॅना. तेव्हां जसवत्‘सिहास निरोप पटपिंला वऱ्'[ तुझा
पूर्वीचा कोंणगा’ह अपराध मनात ठेवळोत मप्घ्न्ण्, व जरलुं
आमच्या ह्या मऱ्हेंवरँण् तेटय'तून आग काढून वजूस स्त्रस्थ
ज्ञरिंय्न
कांन्'प् जऱ्तघेच त्याची र्कवर खवलळो त्याच सुमारास त्याचे
दृन’र्गे दोघे पुत्र ज्ञब्तहुंर्मंऱ्हूं व द्लथथक् हें फ्म्वूलच्या
थेइ’ऱ्व् येते; तेव्हा व्म्ष्च्“ दृन्खाचा परमावग्रळो
त्या शौफामुर्के
यामँय्नर तेथुन
कडक
होऊन तो
१० डिसेंबर त्ऱ्न १६७८ र`[न"[ यारला.
त्याचा व्त्बिंला व नाकरेंचीं मुलैं ह‘व् परत
निघाली. त्यानं अं’र'ड्रेनयान’ जवरंऱ्’ळंग् दिळांस नेऊन मुसलमान
करण्याचा प्रय्त्र करा. पण राग्'क्रुटुंवाच्या अंगरक्षक रज्ञपुत
मन्दामंमाँ मोंढ्या शरेंयोर्ते सदृ’र'गझेवाच्या [वय्द्व लाऊन
रानऱ्र्दुऱ्ठु'वास जळोघपुरास पळोहोवविर्ले. औंर'गझवार्मे पाउल…
राद्दशोल तर तुला पुन्हां गुतराथवीं सुमेद'रो सांगर्तोट्यु सात
हृजारळी मनसव धृतो. जय’रेतरिंग्द्द त्या गाष्टांस ववृल आला,
कैला’. त्यांत पुष्कळ रजपूत येते; पण रळाजक्रुटुंव हाती कागल
आणि शद्वाजादामरेअझ्प्तम शिराजळो महाराजांवर स्वारा कर,
ण्य’क्रारेय्प् [प्याला होता. त्याच्या हाताखाली रहाण्याचें वबूल
पप्लॅंपँत महृ रन्णो चैद्गावप्त‘प् व राजकुमार अबितसिइ अँर'ग’
तेलाच्या हातों लागते नाह्रव्त. औंरगझेव अगर त्याचे भाऊ
फव्न [तक'उ ।‘रै मून गेला.
यावा पक्ष जसबेंतसिंइ हा घटकँत धरा व तोडी यार्चे क रण
' जसत्रेतर्सिहाच्या मनांत
श्रते मृळळोच
आक्ष्'गझेव शी ड्मानार्ने वायावें
नव्ट्वते. दक्षिणेत
जाऊन पडूहाँचनाच
त्या’ऱ्
नाही. याच प्रसगळो दुगहेंदप्स राठोद प्रसिद्वळोस आला. ३[वट॰
याच! विश्वासघात कराराअते ननृन आपल्यास मुक्षुलमानांस
शिवार्तावरव्वर पत्रव्यवहार मुखे करून शप्इस्वरवायाचौ फा’जवीं
हांकॄन देण्यानें स'मथ्यै नाष्ट’व् तर त्याच्यांराभेद उत्पन्न
कलन त्यांना ळिनर्जीव कराऱ्हेंधळो‘ण होय व याच हेनूते त्याने
करण्याचे आणि मरे'अह्मामलम् व’दशहा वनळिभ्ण्यार्चे कारब्‘यान
शिवाज्'ळोर्शी श’ग्टपर्वेत [येवत्वाते नाते ठेंप्‘वेल होते. याते
शिजार्वेर्ले ( १६६3 ). हे औअँगइंनवास कळस [[वर त्यार्मे
जसवनप्तिहाला दख्खगमधन काढून नयपृरचग् रब्जा जयसिंह
यावळी त्याच्या जागॉ तेमपुळाक केल? ( तरळो ड्रुबां [’शवाजप्चा
न जसवनाचा शिलशिला अंतस्मरात‘ग्र्ते चालून होता ).
त्या ट्रेहेंय्पामन उभयताच्या मनांत एकमेक्रांप्‘वपयां अविश्राप्त उत्ग्त्र झाला. तरा पण थी’रगझंव’में जसवतशिद्वाला
पुन्हां दक्षिणदेंर्शी पाठार्वेव्ऱ्ऽ ( १६६८ ), तेव्ऱ'ळा त्यात तिकडे
जाऊन मांकझ्झवास फिन्ग्वून, पूबँवतृ काग्स्यान हुंव् केल.
यामुळें' थैन्रंगझंवाला भय पडून त्य‘र्ने असवतभिंयाला गुज॰
राथच्या क्षुभ्'यावर तेमिलॅं. त्याप्रमाणे तिकडे जात असता
अहमरावादेंस त्याला समजल की, आपल्याला अम्पिकारावलन
दुर करण्याकरितां व’दजा'हानॅ हें कपट फेल‘ आहे. त्यानरळो
तर तो परम’रे’ जोधपुरास निघून गेला. याचवेळी शिवाबी'म
याच्या
होता.
झेवाला
म्हणून
उत्पन्न
सहाय्णते औंढेंगझेवाणी तात्पुरता तह करून घेतला
ज्ञसटँम्त’सेंदृ याप्रमाणे घरळी जाऊन बसला; वरळी थ्म्प्रेझ्
त्य’च्या सैन्याची व कारस्ध’नाची भोळित वाढत होता.
त्याला दू‘देश’! पाठवाबें असे ठरवून त्याने काबुलात बंड
झात्ऱ्त्र् होते ते मौङण्याकरेतां जसवतसिंहास कानृलच्यऱ्
युमेद’रांग्प्र नेमिर्ले. त्याप्रमाणे
जसवतमिंहाते
आपला पुत्र
पुंथ्वऱ्सिंह्र यास राज्य ष्ठांभाच्ण्’मस स गुन तो तिकडे निघून गेला.
जतवतप्तिइ कग्वूलास गेल्यावरँवर मागें त्याच्’नू कुलाबा
॰ ,द्वघ्ईंस कट्ण्याना कपथ्पढू औंरगझेवानें विचार करून
पुथ्ग्ळा सिहास आपल्या दरवारळो बोल वून
तेलँ व याह्यात्क्रारा
त्याजचर फार प्र॰’[`त दऱखत्रून, आपल्या क्रुन्चिं चिन्ह
व्यास पोशाख
दिला.
परं'दु
फ्ष्टपांख अँगांत
घातल्यावर
थोड्याच वेळांत पुणांसिंहानॅ तङफडुन प्राण तोडला:
पट्रेपप्खाला [’वप लादित्ठें होते.
हेंवतेमान
म्हणुन
कारण
अग्ऱ्यास य्मुनकार्दी एक
र्दुदर महाल
तो
अद्यापि (
पडफ्या अवरथेत
[ मढुन्री-स्य्'व्’रभो ड
मोंगोंर;
म्याहँ’टुसन- (द्दस्र्दुच्प्‘रेकल स्कैन
बांधला
)
होता.
तेथें दिसतो.
नुतेळिन’ळोराल‘निन;
ऑफ घि हैव्टव्ह स्टेट्स
ऑफ इंद्देया; टॉड…र[जर:थान, पु. २; मुहुलमानो [’रयासत;
गोडबोले- एतद्देशीय सेस्थाते'. ]
जप्तीळ-
जोधपुर
राजपुंताना. हे
सस्थानटॅतांल
मलर्मप् त्रिल्ह्यांच्या जर्तेल जहागिर’प्र्चे मुख्या ठिकाण उठून
जोधपूर… [’वकातेर रेल्वेच्या वाळोन्ना स्टॅशनपास्ळूरन २ मेल
अहे. इ. स. १९०१ मणं २५४३ लोक सख्या होतोजसळोल
क्षहागिरळोत एकंदर ७२ रेवडों अड्रुन तेथील ठाकूर
ज्ञळोधपृर स्ऱ्स्यानास २ १०० रुपये रवङणीं देतो. येथे
माचळोन राठोड लोकांचे वंशज
आहेत.
जहैटन-र्नप रामन इतिहासकार ढे‘रन्टोंनऱ्इन्सच्थां
काळांत इ`ऊन मेला असावा. त्याचा स्वनम्चा इतिहास
मुळीच उपलब्ध नप्दृ'ळो. हिस्ट'प्प्रॅथेंळंम फिऱ‘ल’ग्रॅप फॅरम व्लाब्रे
न'ळावार्वे त्या'हें एक पुस्तक आहे.
हें पुस्तक म्हणते पॉर्थ्यश्विसते अदूंगस्टसच्या क’ळी क्तिहेकेल्या पुहृतकांतौल महत्वाचा व
मनोटँज्ञफ’
असे त्ग्प्मैंच आपल्या प्रस्तावहैंत ›ऱ्द्दटर्ले आहे.
टेखस्नेप्नद्द होय
पर्तेम्पळोअसचें
पुस्तक आज उपलब्ध नाहीं. ज‘स्टन यामैं आपल्या पुंस्त॰
कांत मुळ प्रेथार्वे सत्र [”दत्ऱ्ञ् नहून, [’नवङक उतारे दिले
आहेत. या पुस्तकांत पुष्कळ महत्वाची माहिती मिळते.
ह्या .ळो भच्चा जरळो पूणत्वप्स पौहोंचलेल्ळो नसली तरी सफाहेंदार व सहन समजणारळी आहे.
वसवढंसिंह्यच्या | काया न्कलाना वराव झाला
मध्ययुगांत याच्या
होता.
पुस्त-<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२६
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दाराद्धीप त[नकळोरा (ज) जस्टिप्’नेयन जस्विऽत्तेपन ( ५६५ )॰हा सुप्रसिद्ध व भोर…“ दी ग्रेट ’…रेळामन व द्ऽळाल्प् ड्नौरिंकम प्रांनकुत ट`["रा‘शयम्ग् येथे माहिती नाहीं, जास्टन यप्र..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दाराद्धीप त[नकळोरा (ज)
जस्टिप्’नेयन
जस्विऽत्तेपन ( ५६५ )॰हा सुप्रसिद्ध व भोर…“ दी
ग्रेट ’…रेळामन व द्ऽळाल्प् ड्नौरिंकम
प्रांनकुत ट`["रा‘शयम्ग् येथे
माहिती नाहीं,
जास्टन यप्र्ने
ज्ञडूत
मँप्नाफिमाहँट पक्ष व नाल्व्नडळोमिंयन । पुराणमतवादळी ) पक्ष
असे पक्ष मांडत होते. जुते( च ल्सडोंनच्या क्’प्न’न्सळर्वे )मत
व’लपणत्न्वपर्थंळो
अते की, खाट्टेस्ट या [‘वभृतप्मन्’र्थे मानवळो व अविमानतो
त्यावा त्रुलना `रापचण् ब’द्गद्द' पाद्देला
( [’उ’ऱ्द्द’हेंन ) दृ’डू दोन्हँप् स्वरूप आहेत. उलटपक्षी मँप्नांफिसाईट म्हणत कौ रत्र’इन्ट फक्त एकाच स्वरूपात अवतरला
अहे. या दोन पक्षाचे एकीकरण करण्याचा जस्टिनियननॅ
त्याच्या आ`६व[प॰’['वपय॰[ किंवा
जन्मला
२०३
ञहिटरुंनॅय‘च्
घेतल्‘गमुळें
दत्तक
त्याला
म॰[2“या ग्रॅ'य्ग्वैम लढून चुकता ५१ ७ मध्ये मरण पावल्यापूट्वेंवयान क'न्स्प्रॉर्टेनॉपल येथें
नत” वदगहाद्दि झाला,
सहन त्याने उत्तम शिक्षण संपादन केले होते. त् पडू! स॰५२३
मर्णे मृप्रप्तिद्व थे’गेंईंण्राव-[व’ लग्न झळि होते,
राणी या
अनेक वऱ् प्रदत्न केला
व स्वत:च्या अधिकारात पुष्कळ
अ’झग्पचँ ( एळिडक्टुस ) काढली. पण कळोणताद्दि पक्ष खुप
झाला नाहीं व दळोघाचळो एफीळिह्र झाली नाहीं व रिघ्नस्तळोतर
नात्याथे तो सवै राजकारण'ग्त भाग घेत अस॰ता’स्टानेयनच्या
चरिंग्रांतोंल गं ष्ट‘न्वीं चार मृस्व्प सदरे पडतात तों…(` १ )
फांफ्ऐपुध्ग्प्रणा, ( २ ) सप्म्राज्पसरकार, ( ३ ) धार्मिक
समाजासद्दि त्याते कडक कायदे करून द्रुखत्रिर्ले पूर्वां’ऱ्या वाद्-
धोरण न ( ४ ) युद्धे व फ्रर’ट्रॅय धोरण.
एकाच प्रांतात ७० ०॰॰ लोंर्सानां सक्तळीते वा^प्तस्मा
( १ ) अचूमिंक
क-र म्मृ’पूप्’ग् पागंचन
जगाला जऽ’स्टनियन हा मोठा कायदे,
आहे.
काय-
त्याच्या वेळीं रोमन
शह‘र्ली घऱ्र्सिक बऱ्वत‘ळोता’हे भरते लक्ष घातर्ढे नव्द्ते.
पण
जऱ्स्टमिंयनच्या सक्तप्‘च्या कायद्याध्रुर्के अगज्ञेयामायनर
या
आला.
अथेन्स येथे जुन्या हूंतिपूजक
देशांत
धर्पच्या अनुयायी
विद्वानांन‘व् वभ्’नूच विद्यालये चाला’वली इ`त‘॰[.
तन्डिं नद्दिटा’ने.
कायद्याचे जुये व नये असे
द्यांत तप गोंधळ झाला होता.
दोन भेद पडून जुन्या कायधांन रामन लन्कसत्त’क राज्याच्या
यष्नै य्ळोद् प[डव्’."[ द्दा’जप्त व सीरिया देंशगेंतळोल लरेकडि जस्टि-
ग्रंथ वयेरँचा,
होते व त्यामुळेच पुढें मुसुलमानाना हे प्रांत जिंकणे सव्पँ
गेल.
( ४ ) जम्’हैट'ऱ्दूयनते तळोन मोठालळो युद्धे केली. त्यापेंकळो
एक ड्राणवरोर्मंर झाल, त्याचा महत्वाचा परिणाम काहोंच
झ'ला नाही. मात्र त्ममुट्टेव् जस्टिभियन सापत्तिक अडचणीत
बॅळवै कायदे
व कायदेर्णदृतर्ली ळिला’दृलेलॅ
आणि नव्या कायद्यात गैमत
बादशद्दर्दे’ग्ळी तेर्लत्ठें छुड्रुम न
कायदे यांचा समावेश होत असे जुन्या व नव्या
कायद्यात
पत्स्ग्र पिरळोघी गळोष्टरै’ पुव्कळ द्दळोत् [[. त्यामुळे सर्वे कायद्यांवळी
फॅरतप्`[स'॰।^[ करून व निरुपयळोगळो माग गब्छून बहर
ते सर्वे
कायदे एकत्र करण्याकरिगां स ५२८ मध्ये एक व नंतर५ ३०
मष्टळो दुसरे कमिशन नैमटॅरँऽ व ‘ कोडेक्स काक्सिटटढूशनमु ’
व ‘ डायजैल्ट ’ असे दोन मोठे कायटॅग्रंथ तयार केले. पण
द्देप्रेधद्दि फार मव्टों आल्यामुळे सवेतायान्य उपर्योयावा
असा ‘ हा’न्त्टटहूंट्‘प् अहेंफ जन्स्श्न‘तेयन ’ नावाचा
तिसरा
लहान ग्रंथ तयार करणांत आला व हाच ग्रंथ ह्रल्लळो विद्या’
र्णोनर्ते अम्यासळावा लागतो.
(‘ २ ’, सात्रहेंज्याच्या ज्ञमारवर्बो कारभारात तो फार अपहारप्रवण व उ‘यळ्या होता. स्वत:चे नाव व वडेजाव वाटावा
म्हणुन अनेक राजवाडे, ख्रिस्तालये ( चर्वे ) व’गरे बांधली
व पुष्कळ खर्वानळो सप्नेंजमिंक कामें केली. या कामांना आणि
बुवांना व सरदृद्दळोनरळील रानया टच्ळ्याचा त्रास वुर्मच्ण्राकरितां लाव देऱ्' [[ला ह्याला बो येता लागला तो त्याते
लळेफां ‘र कर व ’वून गौला कला. त्यामुळे राज्यात
अनेक
बँनू’ झाली त्यापँ धीं ५३२ मध्ये झाहेंथ्ल्’रा एका मोठया वेडॉत
तास इजार लळोत्. मेल. शिवाय असल्या मनतोक्त गाप्टळा करण्याकरिंतां जहिट’न्‘यनर्ते राज्यकारभाराचें प्र[[^त^[॰ग्धिक स्वरूप
क्द्कॄग् ञक्-ग्र्तो त्याला अनियाँत्रत स्वरूप [’दर्केअपव्ळा अवियंऱवत रज्यकरिंमार यशस्वी करण्याकारेतालायक व इयानळो
अते [देरण
य्ट्टेर्मंर
नेमले. [ट्टेवकुनॅयन्ना
जान ऑफ कपब्ड्या’सया
त्य `च कतेव‘गर मंत्री त्ळोते.
( ३ ) धार्मिक वव ’!तप्’ड जदे', [ळूनयनन्दू
वाली केल्या…
पुष्कळ
उल॰॰
त्यावॅढनूख्रिस्तळो घमैंमतांत दुफळा मानून
प्’तयत्तच्या धार्मिक वाव राताल सक्तव्मुळें फार अस'नुष्ट झाले
अधिकच सापडला. दुसरं
व तिसरे युद्वा अनुक्रमे व्टॅडाल व
गॉथ लोफांवरॉवर झ’र्हे-ल्य’ युद्धामुळे उत्तर आष्टम्’सकैना कांहीं
भाग दक्षिण स्पेन व
इटालळो हे देश
रामन
साम्राज्याला
मिळाले. या तळीन युबांशिवाय डॅन्यूयनद्‘द्दकडॉल स्लाव्ह व
हूण या रानटॅ[ टोळ्यावरावर जऱ’स्टा’नयनच्या तेन्याला वरचेवर सामने द्यावे लागत असत.
याप्रमाणे जस्टिमिंयनया सर्वे कार'ष्ठीर्ट्’ अनेक प्रकारच्या
कऽर्योत गेली. तो स्वत: टुपार, [’वद्वा‘न` व [वद्देग्चा पुरस्कातों
होता व निरलस क’येकतळी होता. तथापि ‘ ढळी ग्रेट ’ या
पद्वॅप्ला लागणारा उद्ण्म्पणा,
दृग्दृ’ष्टे व`गरे उच्च गुण
त्याच्या अत्रि नव्नें, इ‘ऱ्कें’व नव्हे तर थेयाडॉग राणीच्या
व दुसऱ्या काहो निकटवत’व् इसमाच्या सलयाप्रमाणे त`[
वागत अते. त्याला औंरस सतळित नसल्यामुळे त्याचे राज्य
त्याच्या पुतण्यास मिळाले.
:;भ्स्त-भ् परमाणु भारद्देक ६५ ३७ ) हँ
मृलद्वव्ग् आहे.
त्याचा रंग निळसर पिवळा
क्राप’ऱ्‘ला तुकडा चकच्फांत असता.
वित्ळते व १०४०`ते. उष्णमन
जस्त
एक
धाहुंखुफ्
अमूल
नवीन
४१५" ते.
ला
झाल्यावर उवकुं लागते.
शुद्ध जस्ताचळो ओढून त[र काटलाँ येते. त[जारळो जस्तर्पिर
वणावे घाव घातले असतां त्याचे तुकडे होतात; परतु १ ॰॰°
किंवा १५॰॰ ते. पर्मेत त[पऱ्वल्या’हेंतर त्याने पातळ
पत्रे
तयार करना
पत्रे
येतात;
सहज वायू शकतात.
आणि
थंड
झाल्यावर
ते
२० ०‘ ते. उष्णमान असता हो थाढु<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२७
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दळागट्रीय त्वानफॉंश (ज) २०४ जल्त इतकी ठिंनृच् होते कीं, खलवत्त्गांनॅ करॅ‘नृप् येते. ज्ञस्ताक् पमेंन अनंत. घाछुन [त्रर्शिष्टगुव्'क् ६.९१५ याया ळग्प्रसांरगुणऋ इर्तेन ज्ञस्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दळागट्रीय त्वानफॉंश (ज) २०४
जल्त
इतकी ठिंनृच्
होते कीं, खलवत्त्गांनॅ
करॅ‘नृप् येते.
ज्ञस्ताक्
पमेंन अनंत.
घाछुन
[त्रर्शिष्टगुव्'क्
६.९१५
याया ळग्प्रसांरगुणऋ
इर्तेन ज्ञस्नप्वर मेन चढत नाही.
लिया
पुष्टी
तें ०,१९१
०.००२९ध्५ आहे,
ते उरदूंऽ
^
प्नाप्णदावप् रंग
ज्ञत्त्सो
पिवळा अप्तनर्ते
इळोनों. व तें कोंवाल्य्
थंड झाल्यावर रंग पांढरा
न।त्रत[च्या
पुन्हां त[पळा’क्ल्यास
थंड
द्रापणार्ने
अँर्केकख्न
झाल्यानंतर
त्याचा
रंग
लागेंफ्र्थेत ` हिरवा होतो.
त[पक्सि [[त पेंय् पऊर ज्ञदू'व् ल’गर्ते. व त्यार्वे प्र’णिद :तयार
गंज च'ढू नये
पत्र्यानां
उ प यो ग.…लॉरवडॉ
होळी. अगद्“ घुद्व जव्ताची कांडळी पातळ गंथकाम्ठांत ग् म्हणून ते पत्र ज्ञत्ताच्या रसांग बुडवून
फाप्’ढनात पितळ,
ठेंत्रग्ठळो असतां त्तिनवर फारच थोडा पारँण’म होवो. परँगु
पिचवेंक्त्र त[व[ऱ्[ रत्रोर्टे सोने, टोंबँक्त्र् वगैरे मिध्रधानृ करण्या.
त्याच्या ज्ञवब्व्प्ल’टिनमु त[बॅं किंवा दृसरळी एखादी जास्त
करकां ज्ञत्ताचा उपयोग होतो. र`ज्ञच्या व्यवद्दारांतळोल पत्रे.
घन न्नेद्रुग्पिंक यातु याणल् [[सहेंताबडतोब द्र्वत व उड्या ॰ नळ, पिपें व मांर्ड'ग्’इ ज्ञत्नप्वॉ तयार करितात. नकाशे,
वायु निघून तानळो. सामान्य अगुद्वा भानु तवडनौत्र द्रवरे
चित्रे व’गरेंवै ब्लॉक ज्ञत्ताचे करण्याचा प्रघात आहे.
थेङ व पातळ तत्र य्ष्ठांताऱ्ट्टे ज्ञत्त द्र्ग्र्ते आणि नत्रस
निघुन जातो.
असल्यास
प्रप्णिद्
उघ्णयान जास्त असल्यास [ठेका अम्ल त[त्र
नत्रप्राणिद् तयार होते.
स॰[ प डण्या ॰च ठिं का ण …!”नस‘न्’त
ज्ञस्त हें त्व'नत्र
रीतीऱ्ग् आढळत नऱ्इळो. परहुं सेप्रोग्रीहिथनॅळीत पुंष्’रुळ् ठिकाणी
सापटँन. ज्ञक्कावो मुख्या अत्रे घिन घऽनु म्हणते त्यार्वे ग्'ळाघ.
औंप'भंळीघिज्ञप्न व भेपन प्रकरणऱ्फ्ज्ञस्तार्वे द्दग्लि फार
दण्इ क आहे, र्हे वांप पोटग्त
आपप देफ्रा
गेहँ
प्रो": र्गाकळें
असल्यास
केल्यावर
वांतिकारक
र्कोवडप्च्या
आंतौल
बलक्त्र [करा दृनर! एखादा डिकास्रारखा बिकटपदऱ्र्थं खान,
यास द्यावा. ज्ञरतार्चे गंथकित,
प्नाणिद्, कर्दित,
ओ‘लैएट
वरळो होण्यास
किद् होय. कलरव‘परळो हा रननिंन पदार्थ ज्ञह्नावा एक हु आणि रिरऱ्फत या लवणांच्या योग्रार्ने जखम
प् मदत होते.
अशाथित थातु आहे. ज्ञत्न चिरैप्पत: ज्ञर्मं’गें, आ’डंटुयाहैंन्प्ररै चजं’
(’ प, सयुफम्ग्रथार्ते व इंग्टँ’ऽद्वा या देशांत गंघां’कद्- ` जस्सो. सं ह्या न.…म’प्र्यांहैंदृत्थानळा’ळंळील एक
ख्यात अ’द्वाब्दर्ते. .ज्ञत्'ळार्वे क’र्वेनृ स्पेन, तायळेशिंया व
सेपुंक्त'पत्यातें' ह्यांत सांपङतें’. द्दिद्स्यळाबांत मदृरऱ, पंजाब व
वछुब्'वैह्ग्नन या ठिकाणी ज्ञह्ताचे दगड सइंपडतात.
क्द्ग्स.…१८३३
जर्मंनोंतून
हाँन
असे.
पपँत
ज्ञरताया
त्यानंतर
सर्व
पुरवठा
रशिया,.
बेनञम,
; सनर्दा सरथ‘न.
पुत्रै रॅखाश
उत्तर अक्षांञ २४" २०’
८८" २८’
तें
मैल, उत्तरेस, पूर्वेस आणि दक्षिणेस नागळोड सेह्थ’न; फ्श्विर्मेंमु
अज्ञयगङ सत्यान.
इ. स. १९११ त[लों
सख्या होती. ज्ञहागिरद्दार हा
मरण पावत्’याक्र नको
या तु वि द्या.…~॰अश्[`[घित घग्नूपा’मून ज्ञत्न तयार कर
ण्यावं'प् गीते र्थाङवयांत' थेव्प्प्रमाण्ळो' देता येहैल. ( १
पाहे",
ल्यातें अछ्येयेत धातूचे प्नामिद् चनप्’क्‘गें; ( २ [ नेतर प्र[[ण॰
द्’वरळोवर कर्वे मिसळून त्या मिंश्नणार्वे ञ्'ल्वेपानन करणें
ज्ञत्नप्र्वे प्रऱ्णिद् कोंळशावररैवर ( कबँनावरप्वर ) तापा‘बेंलैं
असतां इतर जड धातूंच्या प्नाणिइ'प्रयाणें यार्चेद्दि सेत्करण
३४’ व
क्षेत्रफळ ७२ चौरस
८०॰`८॰गुं
पुंदैल
८०८६
रजपूत
आणि
याधोरा
या
त्याना चौया पुत्र भारतंळाचेद् यास मिंळ त्या.
लोक…
असून
ज्ञस्ताचो ` सत्यानया सरयापवत्र छत्रसाल याचा बँसज्ञ आहे.
इंग्ऱ्ङक्सवुक्तसत्थ’र्ते या रँत्शांतद्दि फपाक्रमानॅ
पैयास ह्रळोऊ' लागलो.
लद्दानर्ते
तें २४‘
पन्ना
छत्रसाल
जहागिरी
तो त्यावेळी
न्नैतपुरया सेस्थनिक ज्ञगतरष्टज्ञ ( भप्रनें’ग्'चँद्चां भाऊ ) याचा
मांडलिक होता. भदृरतंप्चैदानॅ वांघोरा न्नहागॉर आपला वडील
मुलग् [ द्रुनेनसिम यासव ज्ञत्तों ज्ञह्मगंऱर आपला दुसरा मुलगा
हा’रसिग यास दिली. दुन्नैनर्सिगानंतर त्याचा पुत्र मेदिनॅग्लिग
हा गाद्ळोवर वसला. परंतु मेदिनळोसिग निपुत्रिक
वारल्याधुंर्के
होऊन बहुत मिंळ्र्ते. तख्त हें निर्कल'रेक्षांप्द्दे जास्त घन बैद्यु.
व'ळाभ्गेंस ज्ञइऱगिर ज्ञरसों ज्ञद्दागांर’त समाविष्ट झालो. एको
तिरु असल्यामु’ठें द्वैद्रुग्ट्टेनफ र’प्तकु’नें त्यार्चे पृपक्करण कम्ण्या.
[‘णेक्षांव्या शतकाच्या प्नार'र्भा ही ज्ञद्दश्या’र
पूर्वी अशौघित यानूर असणाऱ्या इऱर सर्व ज्ञट्व धातू प्रथम
निरऱळ्म क’णें जरूर असतेच त्यामु’दें या रत्तऱ्नॅ शुद्ध धावू,
वहदु’ग’रें’ वत्र्यक्राऊन ज्ञत्सत्नप् सत्फ्रामेक्र चेतमिग याच्या
तयार करण्यार्वे काप वरँव वर्टाण आहे. ज्ञस्ताने रासायनिक
ग्व्ञ्पाळभिंगार्ने वेतसिंगाचा अज्ञ'न पुत्र मूग्र्तो’प्तग यावा पक्ष
सेयुक्तपइव्र्थ वरेंच होंनातऱ्नस् ग्नच्या सपुंक्तपद्न्र्थांपेंकॉं प्र’प्’णद
घेऊन त्यांस [पद [क्र वऱ्’म्वहँ. [’प्रांठ्या असल सुरू झाल्या॰
वर ज्ञह्नो हें अत्तयगडार्ते माङलिवदृ आहे असें समजत असत,
अप्ला’ज्ञ [, इक्रुरद्, गंयाऱ्रुद्, गं‘पकित, व फॉंबँत हां मुख्य
अश्विन.
पृ भ्म् कू ऱ ण॰॰.॰ञस्गच्ग्रा लनर्णाच्या गि'यैरु द्रावणांनृन
गॅधफौकूम् उचशयच्फ्प्
योगग्र्में
तें
गेधकिद्प्च्या
खाला पदृतेंगुं गेघा’त्तक्षांच्या माझ्याया रंग पाट्या
स्वळिनत श्रम्त्र्'ळात द्र्वर्वे. परंतु प्तिरक्राम्लांत द्र्नन
रूपा’वृं
अमूग्न तें
न’ ह”,
एका गोंपांळभिंग गांरॅग्च्या
बांपाच्या अळी-
येडस्रोर नोंकरप्स दिली.
फ्रँतु
फ्र’त ज्ञत्स्रो र्हे स्वतंत्र आहे असा निघाला पुढें त[गलण्ब् य
मूरतासग'स इ स. १८ ६मघ्ट्टम् त्याप्रमाणे सनद [’सळाळीं.
ञगतराज्ञसिग इ,‘ इ. स. "‘८८८
मध्ये गाद्प्वर वसला. पकैंतु
..स १ ८२ २ साला त्यार्ने रऱज्यश्चारभ रांनून आफ्र्ले अंग ष्'ढून
दृ’श्’घेतल्यामुळे.
त्याना अज्ञान पुत्र [नरवप्रासग याच्या त[वप्र्ने
सल्ला त[पावला असतां त्यार्वे प्रप्तणद् वनतें, त[पलॅंऱ असतां कारभार घालत आहे या संस्थागांत एकंदर ६८ खेडा असून<noinclude></noinclude>
fw1wyh9f71alcsfsl3v5ajrjuy7ns57
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२८
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "ज्ञहृरँप्मेरप्याद् महाराटँप्य ज्ञानकोश, ( ज ) २०”. जहांगीर बादशहा २९ चौरस वेल नमोन लागवऔंखाला आ . ए’रॅघ्द्र उत्उन्न [ ज्तेंता ) च्या भंगांन अकबराच्या सठुणांयाळेंशांद्वै नव्हता, ॥..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>ज्ञहृरँप्मेरप्याद्
महाराटँप्य ज्ञानकोश, ( ज ) २०”.
जहांगीर बादशहा
२९ चौरस वेल नमोन लागवऔंखाला आ . ए’रॅघ्द्र उत्उन्न [ ज्तेंता ) च्या भंगांन अकबराच्या सठुणांयाळेंशांद्वै नव्हता,
॥
५
२३००० व्ग्यै आहे.
गां क्.…उ॰ अ. २४" ३० व पूर्वे `र`. ८०” ३०`
जधेश्वरग्नपर यावा अपत्रंप्त ज्ञद्तौ आहे अऱ्र म्हणतात.
ततेंच पुर्वी यास मेद्देन्द्र्ळो नगर, अवर‘ड्रुरळो, इरद्ळी’नगर
त[र्वे हातीं.
ह’व्
एफ [वेचित्र बिग, सतौर्वे द्गद्द गम्वप्त ळिरॅस,
तप्त. जेन आणि द्दिदूमैंर प्रावळोय् अपहँग्प येथें पुष्घ्ळ आहेत
असे क्रर्निगहंप म्र्तृणतों ( अर्किं. सग्र्हे रिंर्प’टॅ, पुं २ १ ).
जहांगिरायाद्~दें
शहर
सयुक्तप्रांतांत
त्रुहेंय्द्
तो विपयासक्त, [नट्ग्रु स्ग्च्छेद्ळी. त्वग्थेस धृ व व’ळिप्त होना,
अवव [च्या `ग्`व्’च्या अनुमदिष् कामद्ग्र'प्स मात्र त्याने
कायम ठेंळिवद्द्व् होनॅ. ज्ञठा‘न्च्ळोच्या नियमांत उपयुक्त फेरफार
पस्वर सर्वे ळंग्ज्’ग्ऱ्रिळाचभ् दाद लागावळो म्टुणूर साठ सोन्याच्या
घेथ्प् जिला अट्वफाबेंलल्या होंत्ग अशी
एक
सांरन’ठो राब-
व[ड्याच्या बाहेर मोदृढी होती. खुस. पग्’ळोझ, खुन्मृ ( शहा
ज्ञइ’न ) त्र शद्दर्योर असे ज्ञद्धहेगांरला चार
मुलगे
होने, हें
सर्वे मा’श्र्त्र भाऊ होळी. वडील पुत्र खुवृ याचे व ज्ञहांगाग्चें
माणमानॅर्दु क्र-ऱ्’द्दि पटल्द्वै ताहों प’बॅंझ हा केवळ मद्यर्पो असुन दृर्दुद्ध
,. ~
०
’
. ^
.
हें इप्हृर म् व गार्मंघ्र हात! खु‘मु या मून, म्ग्हृत्त्पाक्ष्प्क्षा, फावयात व
मद्दरग्र त^त्र बुद्रोवप् ईंत’, तळोव पुढें शद्दानइप्न या नळाबार्मे प्रसिद्ध
जिल्ह्य’त आहे’-हें शहा अटुपपय नावाच्या
बांधले व त्याला ज्ञद्द्'प्गंग्र वइंझ् हूं में नांव दिल.
स’वल खोलगट न्नागौ असव्भ्फ्म्युऱ्यूऽ पूर्वे रौगप्’र्वे
होंर्ते पण दृक्कीह्या शद्दरचै अऱ्रग्ग् तुंथाग्ळें अहे… ह्या झाला. त्राहृ "[रव' नाव वि…गळोप महत्वाचे न इन्. कारक्रीर्दाच्या
शइरची लोंक्तत्'भ्ग्ह्पाज्ञवळ सबळ त[डेअक्ररा हृतण्र प्रादे- हुअजूत्ररळीस झलब्पा उलाढालळोतत्यावें [’वशेप अंग होन्ऱ.
ह्यप् ष्ठाह्द्ळी धान्यानाव्न्प्'प्पर "`[रटुं’त चालतो. ह्या ठिकाणी हु ज्ञइ'प्गों‘वो पळिभ्न्लळी बायको जोपपुग्च्या रान्नाग्ळी मुलगी
बिहू छापण्याया कारखाना असून त्तिफावै पडदे व कापड जॉ‘वबाहै हिचे लप्न स. १५८०त ढीऊन तिला पुंरहुक्रु व एक
मुलगी झलौ द्रुनरळी बायको [वऋ[वैरच्श्न[
राममिंग
तयार होंऱ्ग्-॰
ज्ञद्दागौर, न्-ग्हागौग्दार-र्गीहार्गिर्राऱ्र दोन प्रकार रब्ज्ञाच’प् मुलगी विसरळी गया मऱ्लदेवाचग् मुलगा उद्यसिग
असत,
पहिल्या
प्रकारांत
ज्ञेतज्ञमोंन्प्
तोंडून देत अथवा यू याच’ळा; [द्दव'च मुलगा शहाज्ञद्दान. इळो स. ३६१२. त भैलळी.
सरकारसाऱ्यापेंकाँ रोख कांहीं रक्कम वसूल नेमून देत, फौज ' चौया पां‘वझचळो आट्टे: ही १५९८ त मेलळो. पाचवी केशवपदरी बाळगून सरक्रारयाफरळी करण्’भ्,[कारेबां एक देव व ` दास राठोडचीं मुलगी. सद्दाव‘! ज्ञहांद्रच्ची व सातर्षां शह…
दुसरी ह्या च्या व्यूक्तींस'ठो अथवा कुटुंबासप्ठो देत. पऱद्दे’
ल्यास सर'घाम, इ [म अथवा हैनातऱ्दृतासव दुसऱ्यास
बासइनप्प म्हणत. या हृयाम अगर्दी मोफत असे. त्यावर
सरक रदंर्णे फप्द्दळोव नसे. सर'ज्ञमज्ञइऱगिरळोस
सरकारद्देट्रेट्टे
म्हणने कांहीं तरळी सरकारवाक्ररळी (फ्रीज्ञ घेऊन वगैरे )
करणें. हें द्यावें लागे.
द्दिग्णेंत्र( मदृप्मष्ट्रटें’त ) इंप्रज्ञर्फपर्नऱ्र्ते आपके
वचैढ्त्र
यहेंरबोआईं. आठवी र[ज्ञ[ अतिरण्यचळो मुलगी. नवर्वी
रानामप्नमिंयानळो नानद्इप्वो नूरत्तहान'. हिला मूल
क्षार्के नऽहॉ. यशिंयाप व्ठो’फपनर्ते अब्’णीवग्' दहा
काया ( त्यात २ रज्ञपूत्र ) त[र्वे दिली आहेत.
ज्ञद्द'प्गौर गादीवर
बसल्यावर लवकरच
त्यावा
वाय…
`
वडील
पुत्र खुघू यार्तेत्मच्य’घिव्द्व
"द्वाबेंल. रत्तपून लोकांनी
त्याना
यास
पक्ष घेऊन
सहांगळीर
पदच्युत
करण्याचं,
रथ’र्पिठे त्या वेळीं मद्दश्यमुष्टाप्तऱ्‘ल ज्ञहागिरदारांचौ पुढील ` खटपट चालविलळी. पमँतु ज्ञद्यांर्गारऱ्श्व’ त्याला पकडून कैदेत
प्रयाण वमेंवग्रळी व्पवरथा लाचप्यांत आला पहिल्या प्रस‘ब्च्या ` ठेविल';व त्याच्या सब्थीदारांस क्रूर शिक्षा दिल्या हूंऱसरदारांत ( फस्टेक्कास ), शिवग्जौरँग्’ रदृज्य त्यापण्यमूर्वीटें ज्ञद्दळान ( मिंहव्न्निस’खानमु ) व तिचा भाऊ आसफखान
ने ज्ञहामिरदार हातें त्याची गणन! केल"; हें म्हृणडंत्त फल.
यांच्या मनांतून ज्ञद्दढेंगव्रच्या पश्रातू खुन्मु यास बाद…
टणवे र्निबाळव र, ज्ञतवै ङफ्ठे, मुथीढचे घोरपडे इ. होत. शाद्दळीतरह्न मिळावे असें असव्यामु’र्डे, खुड्रेल’ ज्ञगांशून
दुसऱ्या प्रतळोच्या सरदारांत शिभबांनॅ व छत्रपत‘दुनॉ निर्माण त[हृर्सि वरथाचीं त्यानीं रवथ्ग्ग्रू चाठांक्लँध्पग्तुत्गांत
कँलेस्यै आ‘थे-सारळी ( व त्ग्न्वै वशन ) येतात; उदा० प्रधान,
त्फांस यश
सचींव, प्रतिनिधी, श्र्क्कलक्ळोट घ्र वगैरे.
सरदार म्हणजे पेशव्गांन‘ळा [’नर्मांण वॅ`लळे,
त[हाँ.
अम्सफरयाताचौ
मुलगी
मुम्ता-
प्रगंच
ज्ञप्नइल इळीद्रुवऱ्’मु यास
हें होत
[ एळू-
न्ना’गननामक सरदारांच्या त[तव्र्शी द्रुसरॅ ल्-प लप्प्’वत्यामुळे वूरज्ञद्दार्मेंचीं खुवेंमुवर इतरम्ज्ञळो झाली. आपली
फिक्त्रून-ढिस्पँवेम; ग्रँटडपब्. पु. ३ ]
जर्दामीर-या नांवाचँ मेट षंमप्लमाथें भागत्य्पू’
[’ज्ञेल्यान आहे. या [’ठ.,[णी एव. .”लग. देऊळ च दगडावर
कोंरलेल’व् र्क्सव चित्रे आहेत. [ इंपें. ग्य'झे ].
ज्ञहांपळोर यऱ्दशह्मां’भ्ड् "‘-१ ६२७)… अकबर मरण
पावल्यावर त्याचा वर्डाल पुत्र सळीम
आले
तिसऱ्या
हा नुव्द्दीन
महंमद
नट्रांगौर पानशद्दा माझी हें नांव धारण
करून तख्तावर
वसला ( तर. २४ आवटळोबर स. १६०५ ). ज्ञर्दार्मार ( जग,
दिलॉ द्दळोतों ग्ड्रुर्हेमून खान-
(पहिल्या नवऱ्यापाशून झातैली) मुलगी
त्याच्याशी
सख्य
पुंग्स्त्रस देऊन
करावे असात्तिनॅ विचार
खुड्रामें द्दळो ग'ग्ष्ट कबूल
केळी नाहीं,
केला;
य’मुर्के
परंतु
त्यग्चें
[तच्याश’ऱ्ग् वांकर्डे आट्टेठें. पुढें आपली
मृढ्याळी छाहृर्योऱ
यास देण्याचें ठरवून त्यास रब्ज्प मिळवून देण्यावो खद०
पट नूरज्ञदृप्न कसं लागल्ळो.
असतां त्याने खघू यास
दक्षिणेत
गेला
आपल्याबरोबर नेर्ले.
त्या,
खुम्श्यू<noinclude></noinclude>
jgzv42opqn6nao8er7rwmthtr35c450
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/२९
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महृप्राष्ट्रयि ज्ञानकोश. ( ज ) २०६ त्र्ऱ्हांमाँर बादशहा जहांर्मांर बादशहा ळोकांनळी केले र’ज्पकत्र्योस लागणारे वहुनैक गुण लिप्या नव्गों होंते, खुढूप्चा खूम कला हेंवतेंप्नान ज..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महृप्राष्ट्रयि ज्ञानकोश. ( ज ) २०६
त्र्ऱ्हांमाँर बादशहा
जहांर्मांर बादशहा
ळोकांनळी
केले र’ज्पकत्र्योस लागणारे वहुनैक गुण लिप्या नव्गों होंते,
खुढूप्चा खूम कला हेंवतेंप्नान जहांगीर यास कळ’मं'व,
खुञया मुलगा बुल’हीं याग्न आपल्या पश्चातूं पायावर
त’र'पि ळि’च्या मइत्त्क्यकांक्षेनर्ढे (ज्ञवेंर्णांरच्या पप्ईंग्माट्रग्
तख्तावर कोणास वसव’र्वे याबद्दल [तये अनेक यानगङळो व
वतार्वे असे त्याने ठर्मंवलैं.
टिफार्णो खुहेंमच्या अनुमनळीर्ने
ग्यानखायातच्या
जयपूर व यारव[ङ
येर्थाल
उल ढालळो उप ढ्'वत घेल्यामुळें ) सवत्र बंडाळी उत्पन्न झाली.
राजांचे ब्'हांगळीरर्शी
सख्य होर्हे; उर्देपम्च्या राबार्शी
मात्र
व्य’ला
लापर्के.
मं[ग॰
दक्षिणच्या सुम्यावर खाव्खानान
यावी मेमपूळाच् झाली
द्द[त’[ परँतु त्याच्या द्द'नृभ्ग् दप्’क्षणना वेदांवत्न नळीट झाला
टूकरघ्र्वे
उदे
ळांऱ्ग् स्था’मत्व वब्रूल केर्ले नव्
(हें
ळू
ग्श्
हर्णे:
[घमण्ळीप्ट्ट
ध्यानट्वकॅगांरद् क्षापलळो
त[हाँ. मल्फिरॅवर यार्ते खानखानप्नचा
पराभव करून अइ'
'पत्रलैं तेव्द्द'प्स. १६ ९६ व बाद्शह्रप्ऱ् खु’ऱ्म
यास रज्ञपुं’ हें यास तिकडे प’टविर्ले. त्यानें मॉल'वरचा प‘प्भव वरून
वरून त्यांस अदृमक्ष्नगर कायाव कैडूव्. या कार्भागर’ख्द्दल ज्ञइर्क्सरनॅ
पड्रेज उदेटुग्ग्वर पाठर्वेलल्टि पर'तृ रजपुनांनों तिचा अनै-
मव'प्नळार परत
कदां पराभव केला पुढे जद्द्हैंग'रर्वे खु’रप
तांवर पाट'ळीर्ले; त्यार्मे रजपुताचांपरऱ्भव
तह क‘ण्यास लच्चिर्के. उदेपरना राजपुत्र कण्ड्रे वादन… प् खुर्रम यास ठ्ळाहाज्ञद्दान असे नाव [दल,
ह्यास शरण गेला;
( १६०८-१४
अशा प्रफारँ
या युद्धाचा
इ. स. १६०८ व वॅहेंप्ब्न होंक्रुकन्स नांवाव! एक इंग्रज
र्दुग्भ्ध्डच्या रळाज्ञग्’ट्व पत्र घेऊर जट्रांमाँरच्या भेटीस आला
शैवट झाला. .
).
होना. जद्दर्देगळोरट्रेदें त्याला क्षुग्हेंस वखार घालण्याबीं पर॰
दुलतानाया पनीर होता,
इराणचा "न्ग्र्दैप्टुं व’नगंऱ दिली पुढे इंग्रजांच्या व्यापारप्चळी वृद्धि करण्यासार्टी
तव्मात्प याऱ्र्ते त्यास
वज्द
प्रांताचा
कारभार यू हँग्ळिकन्स'न र्क्सव स्व‘ऱ्पथ्’ बेला. परतुं [’व,’ट`[फ व्ऱ्म्कांनीं
त्रू/ज्ञद्दानया आबा, ह्याला
मद्देपरें शरळीफ
हा खुग्[॰
भ्
सातच्या
[’देला. त्याचा मुलगा घ्यासयेग यास
कष्टद्शा
प्राप्त झाल्या- ` इंप्रतायिस्द्व
मुळें तो इर[ण[तून पळून गेला. ह्यांची मुलगी हूंरजद्दान
स. १५७६ व कदाहार येथे ज्ञन्पलळोनंतरघ्यासवेग आपल्या
फुंदुंबासइ [‘र्हेद्रुरयानांत येऊन अकवरांप्त भेटला. अकवरप्र्ने
ओंरङ
केल्यामुळे
वब्द्द्शदृर्ते त्यांस व्यापार
करण्याची वद्” केलीभ् व [फळे होंल्फिन्स निराश होऊन परत
गेला ( १६ ११ ). मँऱ्गल बादशहाच्या बैभवाविंपयों होकि’
न्सर्ते .‘पेंत्येक गोष्टां विलायलॅस कर्टावल्यावर तेर्धाल लोक
झाले. जहृ र्मारच्या राज्याचा वसूल
थक्क
उग्गशें
गांरवे मन वसलॅ; परंतु अकवरद्दस हो गोष्ट न धात्नडुत ल्यऱर्में . ".० कोटी रुपये द्दरै’ता. त्थाट्रेळी इंग्लंड व त्बाँप्टल्हैंङवा ट्ड्रुल
फ्प्च् एक कोटी इळोता. पुढें व.[द्द्’[ दिवसांनी सर टँ’म्सस रो
द्देप्र अफगाणखानतामक पठाणाशॉ नूरज्ञद्दळानवें लग्न करून
नावाचा एक टेंदृर‘प इंग्लंडचा वफील म्हणुन जहांगोरकडे
त्याला बेयालप्रांर्ती पाठविलॅं प‘रतु जहांगीर तख्तनर्शान
झाल्यावर त्यामैं शे‘खानाया ग्प्त्रव करून नृरजहांनला ` आला. दोघांर्चे व्यापारऱ्वद्दल बोलणें झाल व जमिनीवर इंग्रज
आग्ऱ्यास अप्णळिवर्ले. परँतुं लप्नप्वळी गोष्ट तिला पसत पडलो रु व्यापप्ऱ्यापायूंळान जकात घे'ऊ नये अमें जटांमळीरनॅ फमर्हेप्’वॅर्ले.
नाझी. सुमारे चार वर्षे [तग्न मोठ्या हालात दिवस क्राढिर्के. `: र॰[ऱ्[ जहांगांरळाप कायमच्या त्द्दप्वद्दळ विनंनिं केळी; फ्त्व’तु
तिच्या खाण्र्णांपण्या ऱ्’द्दि नोंद व्ग्रव्ल्या नव्द्र्तळी कपट्रे’ ) तह घहूं द्यावयावा नप्ह्रग् असा द्रवप्रच्या मंव्लाचा निश्चल्र
त्यास आपल्या
वरवळाग्ळी नोकरी
दि‘वून व फांऱ्ळाया कण्ढूव
निऱ्’प्
क्द्ऽग्द्दार्वे
दिली. नृरजहानवर चहा.
त’[ आपला [नवव्द्द करो अखेर’प्स
म्इणणें
ववूल
वल.
तेव्हां जद्द'ग्ग’ऱ्[रमें
होतां इंप्रमाँस वाटेल तंथें यापार करण्याचळो मोकळीक देंण्या'
विषय [”हे रात हैगनणें स्रा’वलॅं; पर'तु खुरँमु व अप्त्फ्स्त्रप्न
[तच्याष्ठा लग्न करून तिला आपली पट्टरळाणळो ट्रेलॉ (१५१०).
यारा! हरकत कळी; यामुळे त्यार्वे ( तह करण्याचें ) व…
बिया याप घ्प'सबेय्ळा यास मुग्व्य वज‘रार्वे काम मिंळ’र्ले. सिद्वीस गेले नाही. दृव्ड्रुद्दळू र`[ लोकांस उ…प्रिय होऊं
घ्याश्र्’व-ग् उदार, धार्मिक व राज्पव्पवद्द’गंत कुशल होता. ॰ लागला. यापुढे त्यऽच्या द्दप्तून सप्त्त्याचें फॉंह’व् एक काम
त्याचा पुत्र आसफरवप्न ( पहा) पृर्ढे फ'र प्रसिद्ध झाला. आंष्ऱ्फ’
न झाल्यामुळे त्याचा क्सिणथ द्योऊन स. १६ १८स [’वलायतेंस
निघून मला ज्ञट्रांगारचें शवटचे दिवस फारच वष्टप्रद् गेल.
खानावळो मुलगी मृमताज्ञमहाळ द्दळी शद्दातद्दानचीं बायको.
यूश्र् पृब्खानप्न, मुलगा शाएत्न्भ्खान हा और'म्ऽद्देग्बाच्या क[र॰ याद्शदृ [ये चार मुलगे व नूम्जद्दप्न याना र'ज्यध्ग् वरथेब्द्दल
किढन्त प्रसिद्धीस आया. नृरजइ’नवर ञद्दद्देगऱ्द्वं, फांक्रु मत्त‘ऱ्
फ र उलाढाला फ्ल्या [ [वाय मदृग्वत्स्व[न,खानरवन[न,3-[सफ
होती. तो प्रत्येक ववग्ज्त तिच्या तैत्रानॅ वागुं लगला,
खान व’गरँ बलाढ्य सरदारट्वहें आपआपल्या मज’ऱ्प्रमणे व[ग….=[
[’ते"[ आपल्या त[तलगांस मोठमोठो फामें [’द्लाँ. राज्याचा
असत. शदृप्जहान घास बादशाह“! मिळावी कमी आरंभी
सऱ्व कारभार नूम्जहृप्न पांहूं लागलो. वादकव्प्'वृ ळितवो‘इं नृरन्नद्दान्चळी इऱ्छा होता. पमँतु तो आपल्या तंत्राने वप्गणार
नांव त[ण्यांवर खोदांवलँ. नूरजद्दळानतें अनेक अ’ [थ मुल"…चा नहीं असे प'हूंन घिव्ग् येरढानापातुंन झालेली आपली
सांभाळ केला. जहाँग’रत्त्या लहरां व जुलमी वतैन’वर [तेंर्ते मुलगी शद्दयर्गेर य्प्स देंऊन्. त्यास रप्व्य्पव देण्याची खटपढं
चांगला याच ठेवून उत्तम बंदोबस्त केला. [‘ततै सर्वे राज्यास
एक विझुफ् प्न’ग्प्रचीं
शिद्त
लाप्‘द्वैल्यामृळें र.ज्याच^[ भरभ-
रल्य् झाली. स्रोवगोचौ [’रपति सुधारण्याचे [’तन' अनेक प्रयत्न
केली व इतर तिन्ही शद्दप्जफ्रांया नाश करण्याचा ।‘त्प्र्ते घाट
घातला. आमफ्खागने’ ज्ञाष्ठाजहाताया पक्ष टनाऱ्य्ला. अशा
प्रवरिं वम्’इणभप्यार्चे दिहुंष्ट पङठे.
खानखफ्राना’ष् शइजहा-<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराबू’प्थ ष्टांसफॉंश. ( ज्ञ ', २०७ जहांगीर'याक्सहा त[स मिळाला. मात्र मह्मवतखानार्मेंजहांगारा-वप् पक्ष त[डिला त[हँ सहोजहोन’प् सरकारा खाँतैरा आपल्या घेण्याचा प्रवत्न चालविला...."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराबू’प्थ ष्टांसफॉंश. ( ज्ञ ', २०७
जहांगीर'याक्सहा
त[स मिळाला. मात्र मह्मवतखानार्मेंजहांगारा-वप् पक्ष त[डिला
त[हँ
सहोजहोन’प्
सरकारा
खाँतैरा
आपल्या
घेण्याचा प्रवत्न चालविला. परंतु तो उवडकळोस
ताब्यात
आल्यामुळे
जहाज्ञपुर
कापड धान्य व लाणळो या सहा पदापक्रूव? त्याची तुला
होई जहृदुपारला तुका माया चांगला येत होती. मुसलमान
लाक नळाण्फांवर हूंहां कर्धां प्न[तम[ कढावयाच नाहीत मद्य
तर त्यान्या वयात वन्ट्र-ग् आहे, अस असत जहांगोंरँर्ने
त्यार्ते जहोर्यांराचळी माफी मागितली. तथापि पुनभ् लवकरच
त्यार्ने ब्रॅड केर्लेब् तेव्हां महोवतखान व पर्षीस यांनळो त्याचा
परानव केल्यामुळे तळो दक्षिणेत गेला. इ. स. १६२६ त
स. १६२१ त ना मोंहोर प[डिली,["तच्या एका बाचूप्स अळोठा [
पव’क्रुस मद्यात्तिरेकागें मरण पावला. पुढें लवकरच ञहांगांरप्द्दे
याड्रुस हूंये काढिलेला आद्दे.
आबारळो पडला
तयाखूचा प्रसार झाला अर्ते म्ह्रणतात.
महंमद हाद्ळो याने जहाँमिंराच्या कारकॉदॉचा एक इति-
व ता,
२८
अळोवय्ळोत्रर रोबों
ट्म्याच्या
विकारार्में मरण पावला. जहांगांरच्या मृत्यूने जिकडे तिकडे
गडबड चालू झाली. नूरजहानचळो सर्वे सत्ता नष्ट झाला व तिचे
र्वेताद्दे ढासलळे. आसफ्खातार्ने वूते बुलकौस तग्ऱ्ऱ्तावर
बसवून
वशांचा
शइयोंर यास कैद केले; व एक
मनुष्य्ळा द्क्षिन्ग्त राइट्वजहांताकहै पाठवून
भरत्यास
द्दासचा प्याला
लाविलैल्या स्वत:च चित्र असुन
हास लिहिला आहे.
दुसऱ्या
याच्या वेळींच दिंदुत्यानांत
तसेच कामगार
हुसैनळी यार्ते नसिर
ड्-तद्दानूगिंरो हो बखर लिहिला असून तळोत
जन्मापावून रप्ज्यारळोइणापयैतचीं हकीकत आहे.
त्याच्या
[ इति…
हास'सप्रहूं-ऐत्ति. गोष्ठी, या. १; स्मिथ-ऑब्त्सफॉंर्डे द्दिल्टरळी;
त[वडतळोवनिं आग्ऱ्यास वोलाविऱ्च्. ता. २४ जानेवारी १६ २.८
इलियट,
ररैजॉ शहाजद्दान आरऱ्यास येऊन र्पोचला; बहुतेक सर्वे सरयार त्यास मिळाले. शहाजहोन याऱ्‘र पुंरड्रुवे मुलगे बुलकळी
रोन एम्वसळी; टॉ-ड-राजल्यान; पिटरक्रुर्डा-ट्र_त्ठहृल्स: मुहुल-
दावरवक्ष व गसळोत्प; दानियालवै मुलगे तहूंमुरास व हो'शग;
जहाज फिरंगी-हा युरँमपयन मप्णस असत याच
रवरँ न[व ज्ञान यामस अतें होते. मराठे लळोक त्याला जहाज
व शहृवळीर या सर्मंचा खून कर’ळिवला.
ता. ५ फेबुचारळी
स. १६२ ८ रच्र्णी त्याचारद्द्ज् यारकुहृणविंथि होऊन त्याच्या नांवाने
खु'त्वा वाचण्यात आला.
अकवराबों
रऱ्ज्पव्पवरया जहांगांरनें कायम ठेंविल्यामुर्के
त्याची कारकादे
सुखावहृ
झाला.
त्याच्या
अंगी कांहीं
सद्रु‘ण होने. सिकारळीत व युद्वकलैंत तो प्रविण होता.
त्याचे
वजन १६२ पर्हेड होते. त्याला खुशामत व डामडळील प्रिय
होता. आर'मॉ त्याचा स्वभाव क्रूर होतरापरतु पुढें तळो वराब
सफैम्प वनला. त`[ मद्मपळो असून अफूर्ने सेवन करळी. तथापि
इतर लनृकळानों मद्यपान करूं नये अस! त्यार्ने नियम केला होता.
तो नियम मोंडयारास कडक शिक्षा देद्दे. त्याने सर्वे प्रक[॰
रच् या विद्येस उत्तेजन दिले, त्यार्ने केलेल्या राज्याकारभाराच्या
पु.
६; ग्लाडविन-रॅन ऑफ जहांगीर;
फाँत्ठर-
मानी रिंयासत. ]
[फरगों प्ष्ट्रणत. हा द्दिदृत्यागांत झाला त्यावेळी खलाथी
म्हणत एका गलवतावर होता. किनाऱ्यावर उतरल्यानतर
तो पता सळोडून यान मद्दाद्गा शिंदे याच्या पद्रळोसप्नकाचीं
नोकरा पत्कारला { १७८२ ). पुढे [सद्याचळो नळीकरा सोडून
तारघाना ( श्रो'वन ) येथील बेगम क्षुमसच्या पद्रळो तो
राहिला. थोडया दिवसां’गें पवरॉ बरेचसे लळोक बाळगून त्यार्ने
सुमसला सोडून ळुटाळूत्रु करून काहीं प्रांत (हा‘रेंयण भागांत)
वळ्काविंला. त्यार्ने आपले मुख्य ठार्णे ट्रॅसळी येथे करुन तेथें
एक [कला बांधिला. रॉइठकच्या दक्षिणेस १० कोतांवर
दुसरा एक जळो’नेगड त[वाचा किल्ला बांधिला. त्यास तत्रस्थ
तारथे यांचा त्याला आवड होता. याद्ळोवर येण्यापूवप् त्यात
टोंक जइब्जगड म्हणतात. पुढें मरप्ठवांनळी त्याच्याया जहाज०
गङऱ्'स वेढा घातला. त्यांत त्याचा सैनापति हॉपकिन्स हा
ठार होऊन त्याचा पुरा परमव झाला व तो एकटाच पळून
अनेक क्रूर कृत्ये केला होता. कूर स्वभावामुळे
( ३० कोंसांत्ररळील ) हैसोस गेला. मराठे त्याच्या मागे लागळें,’
निपर्मागां द्ह्दुरूल अंमल म्इणवात.
शिल्पकला व हुंन[ष्ट॰
कित्येकवळां
क्षुल्लक अपरायासठीं त्यार्ने कडक शिक्षा दिल्या होत्या. त्याचे भ् तेव्हां तो पळून अनुपरेंळाइरळो असलॅंल्या एका इंग्नज वुवभ्डळोच्या
आत्मचरित्र अगदी साध्या भाषेत ळिला‘द्देळेळें असून त्यांत
त्यार्ते आपले दुगुण व व्ग्रंर्गे त्पष्टपणं कबूल केली आहेत.
या चारेंत्रांत १२ वयाचा हृकाकत आहे; ऱ्त्यापुढाल हकीकत
भुतामद्खावानें[लद्दिलाँ अड्रंन त्या प्रेथार्वे नांव इकबलनामा
आश्रयास गेला. तेथून पुढे तों यूंरॉपांत (इंग्रजांच्या सोबर्तांनॅ ) जाण्यास निघाला असतां, गंगेच्या र्फाठो मरण पावला.
असे आहे.
बाँल-अळोळिर. वायों डिक्शनरी, ]
जहाज-पुर…उदेपुर सस्थानांत ह्याच नांवच्या गिल्ह्मावै
हें मुख्य ठिकाण आहे. येथील लोंकत्'सटुया त[न हजारांवर
आहे ह्या शद्दराज्ञवळ् एका ओसाड ड[गर[वर एक मोठा
किल्ला आहे. हें शहर पूरा उदेंपूरच्या प्रत[प[सह्र सणाच्या
ज्ञदांगिराच्या
आत्मचरित्रात
तुझुकहै जहां-
गिरळीइ गांव आहे. तो वेफिकार होता. लहृर लागेंलत्याप्नमणि
क्ष’गांत हिंदु, क्षणात पारशी, क्षणांत मुसलमान तर क्षणात
ख्रिस्ती अशी त्याची घरसोंड चाले. फलज्पेंस्तिषावर त्यावा
विश्वास होता अकवरार्ने चालू केलेले [देद्रु आचारविचार
त्यानौहें पुढें चालविले; तथापि अनेक प्रसगॉ देवळे व मुर्ती
फोडण इत्यादि कृत्ये केळी, त्याचा वाढदिवस मोंव्या समारं’
भार्ने साजरा करण्यात येहै.
२७
सळोनें,
चांदी, मौतों, रँशमौ
याचे एक चरित्र फ्रँकलिन त[वप्च्या एका हंप्रचार्में स्मि‘हेंर्टेल
आहे. [ कान-फौल ऑफ [’घे मोगल एम्पायर, या. ३;
त्नाव्य'ल्ला होते तें १५६७
त[लाँ
अकबराने
थेतरऱ्ऽ व
फिवुऱ झालेल्या ( प्रतापसिद्दाचा भाऊ , जगमल यास चहा,
गिऱ ऱ्हृपूळान [” ले
१८०६ ताल] कोंटयाचा दिवाण<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३१
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "फे… मक्षराट्रीय प्प्नफॉंश, (ज) २०८ झक्तिंसग याने तें शहर आपल्या ताब्यात पेंतर्ले, पण दंत्रज सरकारच्या मघ्वत्र्तांनॅ पुन: त्यार्ने उदेपुरच्या राण्याला परत दिंकैं. ह्या ज्ञद्दाज..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>फे…
मक्षराट्रीय प्प्नफॉंश, (ज) २०८
झक्तिंसग याने तें शहर आपल्या ताब्यात पेंतर्ले, पण
दंत्रज सरकारच्या मघ्वत्र्तांनॅ पुन: त्यार्ने उदेपुरच्या राण्याला
परत दिंकैं. ह्या ज्ञद्दाजपूर जिल्द्यांत हें शहर व इतर
खैडॉ आहेत.
३०६
जहांद्खांहा-ग्रावै मुरप्मद् मुद्देझ्क्षुद्दन्न हें मुख्य नांव
असून हा बहाद्रुरशहोचा वडील मुलगा व अवरंगझेवाचा नातु
होय. याचा जन्म द्ख्खनमघ्में ८ एप्रिल स. १६६३ व झाला
बहाठुरशहो स. १७१२. व व[रल्यान्’[तर त्याच्या मुलांमध्ये
गादोवद्दल बेटा लागला.
अझळोमउचूग्शांन व जह[नशह[
आणि रफिउशशान यांर्चां परस्पर भांडणे
होऊन ते मारले
गेल्यानंतर, जहोद्र ह[ लाहोर येथें १ ० एप्रिल उठुन-१७१२ त
गादीवर बसला. हा द्रुबँल, अतिशय क्रूर, येनळो, उद्वव् व
रत्म्यकारभारांत अनभिज्ञ होता.
त्यार्ने भावाच्या व चुल-
त्यांच्या सर्वे मुलांना ठार केले. त्यामें एकदां तर एका लाल
कुंवर नावाच्या कचर्न[( नतेफॉं )ला आपले ता`र’ळं’ राज्य
अर्पण केलें होते. यार्ने सारे नऊ मळिहवै राज्य केले. याला
याचा पुतण्या (’ अझीमउशृंशानचा मुलगा) फव्खसियर
यामें
आग्नयाजवळ् लढाईत कैंद् ष्ङन स. १७१३ च्या जानेवारीत
त्याचा खून केला. द्यावे प्रेत लोंर्फानां पाहण्यासाटॉ उघड्यावर ठेंवून नंतर दित्क्री येथील हुयाग्रूनच्या कवरंळोच्या आवारात
पुरर्के. दिलळो येथील ज्या राजपुत्रांचा खुन होर्हे त्यांबाँ प्रेते
याच अ[व[र[त नेहमी पुरण्यावळी चाल होता [ बळोल-अळोरिं.
वार्योप्ना. डिवश; मुड्रु. रियासत. ]
जहप्नआरर बेगम-”हो मुम्तानमह
झालेली शह[जह[न
चावशहाचो
मुलगी.
बेंगमेच्या पळोटॉ
हिचा जन्म २३
माचँ स. १६ १४ रोजळी झाला. हो विनोदी, उद्[र,विद्वा[न व
पुंद्र होती.
एके
दिवशी
तिच्या
अळोडर्णांच्या मद्रास
आकस्मिक आग लागून तिचे अंग पुष्कळ ठिकाणी ताजलै.
बरेच दिवस तिच्या जगण्याचळी अ[श[ नव्हती.
सुरत येर्थाल
ग्यान्निएल वाऊटन नावाच्या एका इंप्रज डोंवठराऱ्क्त शह[ज॰ `
जळगरँव
फाँह‘टॅद्दि आच्छादन न उभारण्यावद्दल सांगून तिर्ते रवतन्स
फकळीर म्हणळिबाँल आहे. जहनूआरा म्हणते जगाला सुपविंणारळी. शह[जह[न तिला नेहमी वक्षिर्ते देत असें.
तो
पातशद्दा असतांना द्रयारांतळोल प्रत्येक उलाढालव्‘त तों तिचे
मत घेत असे. तिच्यावर त्यावळी बहाल मज’व् होती. त्याचे
भोजन तिच्या दे^क्ष्द्र`रखळोखालळी तयार होई. शहोजहानचळी या
मुलळीवर वाईट दृष्टी होतळो अताद्दि बोंताटा त्यावेळी झाला
होता ( पुहु. रिया. पु. ६३९-४० ). दरबारात तिचे वजन
पुष्कळ होते. तिचळी नेमणुक फार मोठी अढून गरयारांकढून
वारंवार नजर [मेलाल्यार्में तिजयाशीं अपार सपत्ति त[व्लॉ
होती. याराचळो तारळो भित्त त्या सेपत्तीवर होतां व तिवैद्दि
त्यास पाठबळ होतें. तळो शैवथ्पर्मेत अतिवाछितच राहिली.
मुम्ताजमहाल येल्यानतर ३०-३५ वर्षे सर्वे जनानखान्यावर
तिचाच त[वा होता
औंरगझेव तिचा द्वेष्टा होता तरी
त्यार्ते तिचा इतताम (शहाजानच्या म[रे॰[[^ह)क[य्[म ठेंविला.
[जदुताथ सरकार…द्दित्टरळी ऑफ औं'रगझेव; बौल-अळोरि.
यायॉप्रप्. डिक्शनरी; मुमुलमानौ रितायत]
जहानाबाद, पळो ट वि भा ग.…हो बंगाल प्र[त[त गयप्
जिल्ह्यांतौल पळोउविताग आहे. येर्थाल लोकसंख्या हुमप्रें' चार
लाख आहे. ह्या भागांतळोल जमीन मोंठो सुपाँक असून येथे
पुष्कळ नद्या असल्यामुळे येतो उत्तम पिकतें त्या विभागांत
जहानाबाद शहर मुख्य असून १०७८ गांव आहेत.
पुराण.
वत्तुसशोघनास उपयोगी अशा पुष्कळ वस्तू येथें सापडतात.
गां व…हें शहर मॉरहर नर्दाच्या फांठळी अतून येथील वो.
स. तात
हजारांवर
आहे.
अठराव्या
शतकांत हें शहर
फापडावद्दल प्रख्यात होते. त्यावेळी ७०० कॉंष्टयस्पाँ घरे व
हजारॅप् माग असत. पुढें येवेत्ट्ररच्या स्वत्त मालापुदें
विमान न लागून हो घेता वसला. सध्या ह,’ पेदा किंचित
जाव घरून आह.
ज्ञढ्हु-साँमर्वशो एक राजर्षि. गगळीरथाच्या रथामागून
हानच्महुक्रुतानॅ तिला वरें केरॅल. त्याबद्दल त्यास वरॉच बक्षिस “ येणाऱ्या गंगेच्या अळोघामुर्के याचायज्ञसुमौ बुडून गलळो, म्हणून
देऊन त्यावरळोवरच ( चाऊप्य्नच्या विंनेतळोवसव ) फ्[तशह[नॅ
ईंग्नज व्यापान्गांना आपल्या राज्यांत आयातजकात माफ
केला; त्यानें तिच्या ट्टरवप्’यांत रक्तप्द्दि फार मेहनत घेतली
होती. [हेर्ते स.१६४८ मध्ये आग्ऱ्यास एक लाल (दगडांचीं)
मशव्द् वांथिलळो, तळी आग्ऱ्याच्या किलयात्ळोजारॉ आहे. तिला
". लाख स. सर्व आला. जहोनआरा हळो थीरगझेवम्च्या
कारकीर्दीत (सप्टेंबर १६८ ') मेला. तिची ववर निजामुद्देप्न
अवळिया याच्या द्ग्र्योत( दिल्लळो येथे) आहे. ह’[ दारप्च्या
नादूग्चीं होतो, त्यामुळे औं‘रगझेव तिचा द्वेष करी. शहाजहोन
त्यानें गेगानदोचें प्राशन केल. पुढें आपल्या कानातून त्यार्ने
ग्'गिला मुक्त केल. म्हणूनच र'गिला जन्हवी-जन्ढूचीं कन्या
असें त[व पडर्ले. [या. रा. १. ४३; वा. पु. ९१]
जट्लण-देवगिरळोच्या सम्राट कृष्णदेव यादव याचा
जहूंलण हा मुख्य येत्रळी होता. हा विद्वान व हुशार असून,
त्याने लिळिहलला छूक्तिमुक्तप्वलाँनामक. घुभाषित प्रेथ हर्ली
उपलब्ध आहे. जहूंलणचा काल इ. स.
आहे.
जळगांव-…वऱ्होड. ह[ तालुका
१२५०-१२६॰ चा
बुलाताणें [जल्द्यांत
कैदेत असतांना ळिहर्ते आपल तारॅ आयुष्य त्याच्या लेंवैत
उत्तरअक्ष'र्शि २९" ३’ आणि पूर्वंरँखांश ७६” ३५’ च्या वर-
घालविर्के. द्दिच्यामुळेंच भौरॅगझेंयाच्या अनन्वित छलापालून
म्यान आहे. त[ळुवयार्चे मुख्य ठिकाण याच त[वार्चे असून
शहप्नद्दान पुष्कळदां वचावला.
तें नांढूरा त्टॅशनपाखून १६ मैलांवर आहे. उत्तरेस ८ येलां’
चापावरळोवर आपण होऊन
तिचे कैद्खाना पत्करला. तिच्या थङरयावर एक लेख
कोंरलैला असून त्यांत आपल्या थङग्यावर वेर्लाप्तिपांप
वर सातपुडा डोंगर लागतो.
खानदेशांतादे एक
जळगांव
आहे. त्याताठळो यास जळगांव-जामोंइ असें म्हणतात. ऍन-<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३२
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2026-09-23T07:02:43Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जळगांव जळापुर तालुका महप्राट्रीव मप्चफळोश. ( ज ) २०९ गांपाचा नरनाळाच्या सरकारातोल ' वसला आहे. गांवावप्हेर ४००० रुपये खईंन अठरत्म्यळा हैं-अकवरळीमघ्यै त्या ( जित्’ह्यांतोंल ) `_,_प’ग..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जळगांव
जळापुर तालुका
महप्राट्रीव मप्चफळोश. ( ज ) २०९
गांपाचा नरनाळाच्या सरकारातोल ' वसला आहे. गांवावप्हेर ४००० रुपये खईंन अठरत्म्यळा
हैं-अकवरळीमघ्यै त्या
( जित्’ह्यांतोंल ) `_,_प’ग्.'गप्ग्य्[[त्त्=[[॰ग[व म्हणून उक्केख केंला आहे. शतकांत एक इमप्मयाडा बांधला आहे. येथें तिणकापाचा
येर्यांल लो. स.॰,द॰`ह[ हजारांफ्र्मेत आहे.
येता चालतो. तथापि येर्थाल मुसुलयान फोष्टी, पुंवहै, कलहें कापसर्डियां व्यापाराचें .र्मुग्हुब्ऱ्ळाहूठिंफांणेंद्रुहेंअचून येथें कत्ता, कानपूर वगैरे ठिकाणी गिरण्यांत काम करण्याकरिता
जातात.
सरकी काद्यांयांवै व कापूस दावण्याचे कारखाने आहेत.
येथें…काफ्साच्ची उतारपेठे आहे. ‘विढ्यक्विया पानांचगुंव्यापार‘
( २ )…पजाव, गुजराथ जिल्हा व गुजराथ तहशळील.
येर्थेवराच चाहॅतों. गांचाच्या वायव्येस राजा ठुमेट्रॅहर्रावें गुजराथच्या ईशान्येस ८ मैलावर हा गांव आहे.त[कत्तेझ्या
देऊळ अठून त्याप्रव्त्यये नागपंचमळोस जत्राळूमरते. दुंयेथें एक (११११) ११६१५. सियाळ्कोंव्, झेलम, जम्मू आणि
हींनशळो मशीद अहूंन तोवर एक फारलाँ शिलालेख; आहे. गुजराथ यांचे रस्ते या ठिकाणी मिळत असल्याने येर्थाल
क्ऱ्ऱ्हॅप्र्डातन्ल सर्दीत लहान :… तालुका हा (जळगांर )
असून यांत ८ इनाम गांर्वे व २१७ खालसा गांर्वे आदूंतुं.
वळाजारास बरा महत्त्व आल आहे. येथें” शालळो तयार होतात.
या तालुक्यातील जमात सपाँक असते कापताकारतां प्रां'भ्न्’
लरैफांनॉ वसाहत केळी; तेच लव्क
आहे. र्वे[गव[ग[इत[’हे
वरळीच आहे; त्यामुळे या त[ळुवय,’
पाश्वेम वऱ्होडचा बाग अस म्हणतात. या तालुक्याच्या सम[॰
वार पूण॰^[नद[ आहे. [वुलडांणें ग्याझे. ]
रॅलवेंर्ते एक स्टँशन असून येथील ल`[.स. षंचवोस हे‘जंसिंपर्थेत
आहे.या जिल्ह्यांत व पायाच्या आसपास कापुस फार पिकतळो.
म्हणत हा गांव कापसाच्या व्यापारा’चौ. एक मळोठळीग्र्डेतैरिं पेठ
ठरवून यास व्यापारा महत्व फार आल आहे. १८६२॰ ६५
साला ज्यावेळी अमप्रकॅत लढाई चौकू होतो त्यावेळी सर्वे
व[न[र…_येथं._,मरत
होता.
या
जिल्द्यांतळीलद्रुसुंग्ट्टेयेळूमींकँ, कापूसध्रुळूज्वरिंप्ळूछुहैंमूग, त[ळ हां
आहेत.
येथील
म्युक्तींसिपाळिलटों
१८६४ तालाँ
अस्ति॰
त्यांत आला.
र्यंर्थे जिल्ह्यांच्या कचेंऱ्या, दचाखाने, शाळा, होवस्कल
वगरे आहेत. मुळन्रीयेठा व मगारथ या नावाच्या दोन
कापड तयार करणाऱ् या गिरण्या असून इतर १५ [१७ कार.
खा`न
येथें एक
( कापूस द[वण्याचें व सरफॉं
हायस्कूल
आहे.
काढण्याचे ) आहेत.
पेंशवाईंअरँवर हा
गांव
त[न कळोसावराल नशिरावाद गांवाच्या परगण्या आला
होता. येथून त[पांव्द्दालळो रॅलवेंचा फांटा फुनला आहे. वऱ्ह[॰
ड‘प्त एक जळगांव असल्यार्ते याला जळगांव मेहख्ण अरुऱ्-द्वै
म्हणतात. मेहखण हें रेंष्ग्र्डे जत्रळ दॉड कॉँसावर असून तेथे
एक मोठा तलाव असन त्यानेच पाणी जळगांवला
सालच्या
द्रुष्काळानतर
र्थंपॅ फांहो काश्मिरी
शालळो विंर्णांत
असतात.
इ. स. १८६७ मध्ये म्यु[मेतिपाळिटी रथापिलाँ गेलो; तिचें
उत्पन्न नऊ हजारापयेत आहे. गांशंत इंग्नज्ञी व्हन्यांवबुलर
` शाळा व वयाखावै आहेत.
जळगांव-हे पुंवहैं इलगटुयांर्तील पूर्वे खानदेश बिल्ह्मार्चे
व जळगांव त[लवयार्वे मुहृये_[ठेंक[ण._ _जळो॰._…अ[व. पाँ.
खानदेर्शातौल ,कापसाचा
१८३२
नेण्यात
आल आहे. त[छुक्ष्यप्चें क्षत्रफळ् ३२० चौरस मल असनत्यांत
णु॰ गांर्वे आहेत; पुव्फ्त पाऊण लाखावर आहे. उतरकडाल
चयान क[ळ[ व पुंपॉक अड्रुन हनापाणा उत्तम [’नेरागा आहे.
[ इं. ग्याट्वेंर; खानदेश ग्याझे. ]
(३ )॰…पज[व॰ झेलम. तहशोल पिंड-दादनखानमघ्यैद्दे
गांव उ.
अ.
३२"
३९.’ व पू. रॅ. ७३‘ २८’
याच्या दरम्यान
आहे. हे र’रेर्डे झेलम नद्ळोच्या दक्षिण तांरावर वसलेले असून
लॉ. स. ( सन १९०१ )३१६१
आहे.
हे स्वेंर्डे बुर्केफाला
त[वाये प्राचीन गांव असावे असे कनिंगह्याम यावे म्हणव्ळा
आहे.हे बुकेफाल अलेक्सांडर दळो ग्रेट याने आपल्या पाँड्याच्या
रमम्रकप्प्रांत्वयै वसविंर्के. परंतु हेच
याविपयाँ वराच सराव आहे. या
राजाच्या वेळचीं नाणी त[पडतात.
गांव हलच्च्या च’रैपर्टार्ने मोंठा होता.
वसाहत झाल्यामुळे व नदीचा ओघ
तें खेंडें‘ असार्वे का नाही
भागांत प्रॉकों-बँपिंटूयन
अकबराच्या वेळीं हा
परंतु पिंडदादनखान येथे
दोन मेल पूर्वेकडे गेल्या०
मुळे हक्क] गांव मोडकळीस येत चालला आहे.
पु॰ १४ ]
ज्ञळापुर
तालुका-मुंबई
[ इंपे. गेंझे.
इलात्टुयांतळोल
सुरत
जिल्ह्यांतळोल उ अ. २०°४५’ ते २१०० ’वपू. रे ७२‘ ४७’
तें ७३॰ ८’
या दरम्यान हातालका
असत
यावे
क्षेत्र…
फळ १८८ चा. ये. वला स. समारँ पाऊण लाख आहे.
या त[लव्त्यात एकंदर ९१ खेंडॉ अतुंन जमोंनमहतूल व
इतर कर मिळून ३.६ लाखावर उत्पन्न होते ( १९०४ ).
जमीन सुपळोक व मळीचीं अतूग त॰[ समुद्राकडे उतरली आहे.
किनाऱ्यावर मधून मधून लहान लहान वाळूच्या टेकड्या
दिसतात. किनाऱ्यावरळील रव[र^[ जमीन सोडला तर इतर
जमीन हुपाँक आहे. रँवडळो मोठी अदूळान लोक मुखवस्तु
आहेत. पूर्णा आणि ॰अंघिरॅ›॰[ या
नयांच्या
किनाऱ्यावर
तिल्ह्मा'
देखील खारी जमीन आहे. या जमिनळोपँकॉँ फांहळो ज्ञमळी॰
न“[त भात पिकवै. ज्वारळो, बाजरी आणि यात हो मुख्य
येफॉं अकवरपूर तहत्तिलींत उ. अ. २६“ १९’व पू. रे.
पिक अलून डांळीवॉ धान्ये, हरगरा, गळिताबों यान्ग्रँ, ऊंस,
८२° ४५’ या दरम्यान ह[ गांव असुन याची तो. ते. साडे-
केळी वयेरें दुय्यम पिक होतात. हवा निरोगी आहे. [ इंपें.
ग्याट्वेंर पु’ १४]
ज्ञळत्यूर-…( १ )सयुक्त प्र[त[त’[ल फैजाचाद
सात हजारांपर्येत आहे. तात्या नदव्च्या त[रावर हो गांव<noinclude></noinclude>
717axmsnytatr3dwqk4r7kyjn1zwfev
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३३
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जेळू महाराट्रीय ज्ञानकोश (अ) २१० जाउ श्रसतें; पणतें अनेक वलयें एकमेकांस जोडून झाठेलैं असते. लरेंकसरब्या पाडता आहेहुव सन १९११ मध्यें ता ०८४५४० होता. या त[छुफ्याचें उत्पन्न १९० ०३..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जेळू
महाराट्रीय ज्ञानकोश (अ)
२१०
जाउ
श्रसतें; पणतें अनेक वलयें एकमेकांस जोडून झाठेलैं असते.
लरेंकसरब्या पाडता आहेहुव सन १९११ मध्यें ता ०८४५४०
होता. या त[छुफ्याचें उत्पन्न १९० ०३-४ साला 3. ५ लाख
रुपये होते. या ताछुवयाला वेनारो कालवा व डेंअर्टे कालवा
या प्राण्यात गांडूळ व जळू अशा दोन जातो आहेत.
या दोन कालव्यांर्वे पाणी मिळते.
जळू…हे
वलयाण्वित
राहणार असतात.
प्राणी ज्ञप्‘मेना‘व्या अ[श्नयार्ते
यावे शरांर जेर्तांसाररवे
जळू हा प्राणी उष्ण
प्रदेशांतौल
व डवफ्यास आढळतो.
द्लद्दलळोच्या
जा’मेबाँत
याची रचना ३३ वलयांनळो झालेली
असून त्यावर पातळ त्वचा असते.
असें दोन आकडे असतात.
तोंड हळोव.
लांबट, ताटंहूळ
या प्राण्यात मागें पुढें
पुढचा आकडा
हेच त्यार्चे
त्यास करवतळोसाररत्रे तळोन त[त असून त्यायोगे
हा प्राणी एखाद्या प्राण्यात देश
करून
रक्त शोपून
घेतो.
आपल्या शम्’रॅराचा आकार तिप्पट होईल इतके रक्त वळू
श ह र.…जाकानाबम्द् त[छुव्त्यार्वे हे मुख्या ठिकाण
आहे.या ठिकाणी जाण्यास नॉथे वेरुथ्नै रेल्वेच्यासिघ-पिळिशन
शाखेने त[वै लागत. या शहरग्वळो लो. स. सन १९११ मध्ये
११३६८ होती. हे शहर जनरल जॉन
बेकन या’न वसविल
आहे. ते दोन मैल लांव व एक मैल रुंद आहे. या टिकार्णो
देशळीघव्डेंत्नारांचळी एक मोठी तुकडॉआहेळिशनाय दिवप्णी व
फौज्ञदाम्ळी कचेऱ्या, दवाखाना,
तुरुंग, व्हिक्टोरिया क्कॉक
शोधून घेते व ते तिला पुढें कित्येक आठवडेपर्थेत पुरते असें
टावर व व्यापारी काफिल्याकरिंतां सोया आहेत. येथून
म्हणतात.
धान्य, तूप व कातडी यांचा मोठा
णदूंऽच्या घशांतळोल पिडाच्या रसामळें हे रक्त
व्यापार
रँल्वेंमागचिं
पातळ रहात व गोंठून तात नाहा. त[ड[कउ [ल ५ वलयांवर
चालतो. सन १९०३…४ साली या शहराचे उत्पन्न ळु०८जार
डोळ्यांच्या ५ जोड्या असतात.
शर्रासंताल अशुद्ध रक्त
बाहेर काढून टाकण्यासाठी कांहीं लोक वळता याळगतात.
व रवचँ ७६ हजार होता. येथील उष्णयान सर्वे हिंदुस्थानात
रक्त पिऊन फुगल्यावर वळता पिळून ते रक्त काढता येते.
जाखाऊ-कच्छ[तील ( मुंबई इलाखा )हे एक बंदर
[[ळर्वे, मूळव्याध
वगैरे
चांगला उपयोग होतो.
अधिक असत.
त्वप्रौगांवर ज्ञळया लावण्यापासून
असून हूंज्ञच्या नैऋत्येस ६० मैलावर आहेउ. अ.२३॰ १४’
ञकूच्या क[ह”[ जाती आहेत त्या
व पू. रें. ६८' ४५'.लोंकसख्या(१९०१)५॰".९.ग्[[व क्रिना’
पिण्याच्या पाण्यावरळोवर घश[त जाऊन उपद्रव
म्हणुन पिण्याचें’ पाणी [[[बूऱ्न घेण्याची काळजी
कारॅतात.
घेणे इष्ट
असत.
॰
जाद्दे-या झाडास लॉटिंन
प्रदेशांत पिके चांगली येतात. ज्या ठिकाणी जहाजे लागतात
ती जागा समुद्रापासून प[च मेल आत आहे. तिला गोंदिया
भाषेत तास्मिनम, इंप्रज्प्’ग्त
यास्मिन, सत्क्रुतमघ्दृळा जातिपुष्प, मर'ठोत जाईं,
ऱ्यापासून तान चार मेल आतवसलेला असून सभोवतालच्या
गुवरम्थोत
खाडळो असे नाव असून भरताच्या वेळीं ८ ते १२ फुंदांपयैत
पाणी खाडॉत
असर्ते.२॰ ते २५ टन
वज्ञतावॉ सहावे येथे
वमेली इत्यादि त[र्वे आहेत. या वेलान् या सयार १५ ॰ज्[[त[
येऊं शकतात. पुंवईंशळो या वद्राचा व्यापार पुष्कळ चालतो.
आहेत. त्वपिकॉ ४० पेक्षा जास्त जाता इंग्लंडमघऱ्ल नग्[[॰
च्पांत लागवड केलेल्या आहेत. या वेलॉर्वे मूलत्यान आफ्री’
याख'डांतोंल उष्ण देशव आहे. फुलांच्या रंगावरून जाद्वैवै
जांस्वन-ळंभुवहँ. काठेंवप्ड. भळोद्र्का ठाण्गांतळील एक
स्वतंत्र खंडणी देणारे लद्दानर्हे सत्यान. त[ळुकतार झाला
दोन प्रकार हळीतळील.
एक पांढरी व डुसरळी
पुष्पांच्या सुमंघामुळें हे झाडं फार प्राचीन
पिवळी.
या
काळापासून अरव
असून ळिमङळीवै भायाद् आहेत.
वांजर्गांर-मध्यप्रांत. बिलासपूर जिल्ह्यांतोंल पूबँकहाँल
तहसळोल. उत्तर अक्षांश २१' ३७’ ते २२॰५०’ वपूवैरेखांश
लोकांना व आये लळोफांनां माहांत हळोतें अर्ते ळिद्सर्ते. आपल्या
८२' १९’ ते ८३॰ ४०’. यांत खालसा व जमिंनदोरळो
सरबृग्‘तवाड्मयांताल
दोन भाग आहेत.
नाटकँ,
पुसणें,
चेपू
आद्दिप्रेथांतून
जातिपुणांचीं वर्णन आला आहेत. ‘ षुणाणां प्नक्रऱ: स्मितेंन
रचितळो नळो कुंद्तात्यादिश्चि: ’
असलॉ कित्येक
रुथळें या
खालसा
असे
तहसिलव्चें क्षेत्रफळ १३०३
चौ. मै. असून तो. ते. ( १९११) 3७६८२९ आहे. यात
७४१
शैवर्डी आहेत.
जमीनदारळी
तहसिलोंत ६१३ खेडी
फुलाच्या व'गैनास'बंर्धी दाखविता येतील. ताईंचा वेल मोठा
होतो. कित्येंक ठिकाणी मॉठमोंठथा वुक्षांवर चढलेतै जाट्रॅवै
असून तो. ते. १५४८९५ होतो. याचे क्षेत्रफळ खालसपिक्षां
जुताठ वेल फार उंच वाढत गेल्ड्रेळे दृष्टीस पडतातजाईंर्चां फुल
तहण्’सलळीचै उत्पन्न १.४२ लाख रुपये हळोत.
पांडरॉ
असून सुक्रुमार, पाहुन; व सुवासिक अशी असतात.
जाईंच्यापानाचा रस वणशळोथक आहे अस आयेळेवट्ळाकावे मत
आहे. ऊघ्वेपातनक्रियेनै ज्ञाईंच्या फुलांचे अत्तर निघते. जाई
किंवा चमेलींचीं सुयास्निक तेल तयार करतात.
त्मांचीं क्रुति
‘ `अतं’र ’ या लेखात सापडेल.
जाफौबाबाद्
ता छु का.…[संघप्रांतांत
नात्त ( १७५२ चौ मैं. )आहे.
इ. स. १९०२-३ मध्ये
कानपूर
जप्जमाउ-सयुक्तप्रांतातांल
कानपूर तहसिलव्वै पूर्वीचे नांव.
जाय्ळं-यावळो मुख्य वस्ती पंजाबमध्ये
हे शतळोचा घेता करतात.
हा तालुका
आहे. एकंदर
तेथे
घेद्याऱ्‘ञ
यांची
सख्या
जाट
आहे. याचे क्षेत्रफळ ४६ ० चौरस मेल आहे. या ताछुवगांत
आहे. जाट हे [’हेंट्ट, मसलसान
मुख्य शहर जाकींबावाद् हे असून ९८ खेडॉ आहेत.
आहेत.
येथील
असून
द्क्षिणेंर्तांल क्रुणब्यांच्या
व याच्याध्'ग्यावै साम्य आहे. मघ्यप्रांतात
१०००॰
जिल्ह्मापवळी
ताटांच्या उत्पत्तांवद्दल
लोकांची सख्यया४९५६५३६
व शीख या [तन्हळो 'वम त
बराच वाव आहे.
का‘नेंहेंहुंम<noinclude></noinclude>
gutarmfqxwi0j958hpog8ip2sneoeid
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३४
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महप्रा'ट्रोय मानफॉंश. (ज ) २११ जर्दि पूत्र्श्र् ल[व[च्या सागनाताच्या लाकडाचा एक खास ज्ञमिन’ऽवर ठेऊन त्याची दुयार्ने पूजा करतात. त्याच्या वरच्या टोकास ग[ड[वै चाक बांधून मग तो जमीनी..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महप्रा'ट्रोय मानफॉंश. (ज ) २११
जर्दि
पूत्र्श्र् ल[व[च्या सागनाताच्या लाकडाचा एक खास ज्ञमिन’ऽवर
ठेऊन त्याची दुयार्ने पूजा करतात. त्याच्या वरच्या टोकास
ग[ड[वै चाक बांधून मग तो जमीनीवर उभा करितात;
व टॉड यांस [हेदृ‘[शक ( इंडळो सिथियन) म्हणतात. कनिग,
ट्रॅम म्हृणता का'हू ’आवसर नदोव'सन पंज्ञ[व[त आल. महा…
भारतात
याहाँक
लाकचि
वणन आहे; ते
जप्ट'
ताटांवैव वणन
असावे असा विल्स नचा तर्क आहे. ततें असल्यास वाढ लोक
आणि
पतार्वांत ख्रि. पू. २० ॰ ते इ स. च्याहूं५ व्या शतकापर्मेन
मर्तिक झाले असल्यास गाईंवळो वासरळो व गोंऱ्द्दा यांचे लम
लावतात व त्यांच्या अगास तेलइळद् लावून त्याच्याकडूक्
आलल असावेत. क[ह”[ लोक म्हणतात
कळी महाभारतातोल
जऱठ द्देच्प्' वाढ होत. रिंरुतेच्या मते चाट शब्द ज्ञथ ( तमा
करणें) यापासून
निघाला
आहे.
दिवस
मेज्ञयानळी व
गणिवतावणें
करतात.
या खायास ७ प्रदक्षिणा घालनितात.
हे लोक लमें करण्यास ब्राह्मण उपाघ्यास बोंलावितात व
याह्मर्णाचा मत्रोपदेशप्हे घेतात. मव्यप्रांतातठे जाट पक्षी
निरनिराळ्या लडणप्ऱ्या
लोकांच्या समूहाला जाट अह्ळा म्हणत
यावक नसून वगेंनायक शब्द असाना
त[न
असावेत; तो जातिअसेहि तों म्हणतो.
खात न[ह“[त व मांससुद्व'ळा खाण्यावै असल्यास घराच्या बाहेर
इवैटसनन् या
मत
वाढ
व
रजपूत
याच्या
रक्त[चा फांरव निकट सवय
आहे.
त्यांचा श[र’[॰
रिक बांधा, वैहऱ्याच्ची ठेवण रज्ञपुतासारखाव आहे.
खातात. हे दाढी व कस कापीत नाहाँत.
हे काळ्या
याईंर्वे
दृय पळोत न[ह"[त. बायका नाक टोचींत नाहळीत, व काचेच्या
बांगडया सालात नाहीत. हें आपल्या घरांत वुळशव्र्वे
बाहेर
जाऊन
झाड
ताठ लोंकींनॉ पुढें शख्रि मनाचा अवल'व- करून रज्ञपुतांशॉ
चढाओढ करून श’ग्ख राज्यांत ववैत्व मिळविले. पण निघना’
लावीत नाहीत. तुळशदेंचीं पुजा
करतात.
असल्यामुळे त्याचा दर्जा रवपुताच्या खाली लागला. कोणी
जात आहे. पताबांत हे लोक शतळी करितात व र्फाहळोज्ञण
सैन्यात तोकरळी करितात. काश्मीरस'त्यानात यांची सख्या
१४१४१९ पयेत असून, तेथें ते मुसलमान, हिंदु व शीख
मध्यप्रांतातोल सागर निल्द्यांत याचा यदा गवङघांचा आहे.
विवाह वयेरें गोष्टींमुळे गनिया व रवत्रो ळीफांच्याद्दि खालो आमेय पताबांत शिवगळोत्रो व कासवगोंत्रो असे दोन वय्’ग्
त्यांची गणना होऊं लागलो. हव’टुसनड्रुआणंखा म्हणतो क”[ अळिहत. यात लप्रव्यवहार होतात, या ज्ञ[ठ[न[ स्वतंत्र धर्मं
आथें व शक लोक हिंदुस्थानात वसाहत करण्यात आले , नाही. मघ्यपनाबांत ते शोरव आहेत, पश्विम भागांत बहुतेक
त्पाच्यावरोवरच हे जाट अ[ले.पण त्याचे है।नानायक रजपूत मुसलमान आहेत. र्पतावळी ताटांत अरवळी त[वप्वळी एक पोट.
तार्टाचीं उत्पत्ति याह्मणांपसून झाल्याचे यानितात. ताटांत[ल
स[स॰[
पळोटतात
स[सळी
या
गुन्हेगार
तार्तांप्रयार्णे
दिसते. याव पोटतातरिंग्‘ महाराजा रणजितसियासारखे
पराकमॉ पुरुष निघाले. इतिहासात चाटांचा उक्केख प्रथम इ.
या तिन्ही तातचिं आहेत. मीरपूर निल्ह्यांत
तर
कळोफ्याद्दि
मुसुलमान येतकऱ्याला ताठ असे नांव देतात. आसामांत हे
स. ९१२ पूर्वी ड्व्नड्रुदाद्देवमघ्र्ये आढळतो. किरयान आणि
लोक फारच थोडे” ( १३५ ) आहेत. म्हेलूरकडें [‘हेदु ताठ
मनसुरा यांमघील प्रदेशावर हे" आठ ’ देखरँरव करीत प् कोलारच्या खाणीत काम करतात तर मुसुलमान ताठ सैन्यात
असत अस खुर्दादृव म्हणतो. अरव लोक [’हेबूंनां ताठ
तोकरळो करितात. र्पताबांत हे प्रथम आल्यावर एक त[गों
म्हणत अस मुनमिल उत्त्यू-तनाररैखम'च्र्ये ब्लिहेलैं आहे.
न रहाता सवैत्र लवकर पसरले. मोठमोठ्या घराण्गांनां पुष्कळ
तार्टाताल लयावधावरद्न ते शुद्ध वाचावे नसावत असें येन
वेळां ग[व[व”[ नॉर्वे दितेलळी आढळतात. अकवसर्ने एका जाट
म्हणतो ( ए. रि. ए. मधील ‘ ताठ ’ ठेरव पह[ ).
मुलळीशव् लप्न केल होते व त्यावेळी ज्ञालद्र व पारीद्रुआर्वातळील ३५ जाट व ३५ रजपूत ग[व[न[ पाचारण केल हळोते
यांच्या चालोरविळो गुजर व अहळोर लोकाप्रमणिच आहेत.
ताठ लोक त्वतब्वळो उत्पत्ति दक्षयज्ञाचा विध्वंस .करण्याअतें म्हृणतात. फेरॉज्ञपूर व ळुळिघयाताकडळोल जेगलळी जाट हे
करिता महादेवनि ज्ञदे'सून ते दोन व[र निर्माण
गरळोव आहेत, रणजितसिंग त्यांना शिपायाचीं नौकरी सहसा
केले
देत नते. पूर्वी या लोकात नालहृत्त्येंवळी चाल असावळी.
त्यान्यापासून आला अस सांगतात.
यांच्यात [ववाह शनितारॉ करतात. प्रथम वरास विववे-
इ. स. १०५९ व जाउ लोफांनों जाकंद्रद्रुआव जिंकला.
त्यार्वेळळो प्रतेशळो त्यांची वर्तणूक मगखुरळोचौ असे. त्यावेळी
सरोवर लग्न करावयाचे असल तर त्याला प्रयम पिपळ्ऱ.
भोवती
आपल्या
नवरा
उलत्रु
सात प्रदक्षिणा यालाव्या लागतात निघवेंला
षंबाक्सघ्र्वे पुढील म्हणी प्रचलित हळोत्या. ( १ ) जाटाला
दिर’वरळोवर लग्न करता येत न[ह[॰
प् उलट ज्ञबाव देऊ नका, नाहीतर ते तुमचे डोके फौडतोंल.
मल्यास त्याचा यायता नवऱ् यान् या प्रेतामोंवसळो ( २ ) जाटांन्याकडे करवसुलार्वे काम जाणे म्हणजे ईश्वरी
दिशन
सात
प्रदक्षिणा
पाळून
लोपव हळोय. ( ३ ) जाट ह[ आपल्या घमगुसशाद्दि भांडक[ह[
यांगउया फोडून टाकत, व १२ व्या
फाडून बुलळोत टाकते.
दिवशी
सव
बांगडया
ण्यास कम[ कर[त न[ह[
बोलत
नाहीं;
व
वोलतांनप्तहे क्विगप्ळप्त‘रेप्वग्य
वगैरे. [ इंडियन अँटिववरळी, पु. १४;
पँद त[नाचा उत्सव हे लोक फार याटानॅ करतात. घरां- भ् तेन्सस ऑफ इंडिया,, स॰ १९११, पु. १४, २०, २१;
ताल कता पुरुप [कपा त्याची बायका मेला अथया मुलछ्चँ [, र`|`ज्ञ~ग्लॅं[सर^[, पु. २3 क्रुक’ट्राईंव्न अँड कात्ट्स, पु. ३ ;.
[
[
लग्न व्हपिंयाचें असल तर हा उत्सव करतात. त्यातेंला
४०
हुशंनाचाद् तेठलमेंट दि.; इवटसन-षंजाव एप्रॉप्राफां; कूक. ]<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जाटपु महप्रप्ष्ट्रप्य शांनकव्श. क्या… “ डागराळ् भागांत रर्योड ( ज्ञ ) २१२ बालक भाषा [ तर ञग’ या विभागांत ["तपिटकाच ["ववैवन आणि मैद्दागांत तेलगु भापा बोलणाऱ्या सुधारलल्या खाड [ दिल..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जाटपु
महप्रप्ष्ट्रप्य शांनकव्श.
क्या… “ डागराळ्
भागांत
रर्योड
( ज्ञ ) २१२
बालक
भाषा [ तर ञग’ या विभागांत
["तपिटकाच ["ववैवन
आणि मैद्दागांत तेलगु भापा बोलणाऱ्या सुधारलल्या खाड [ दिल आहे.
लोकांचा ह[ एक पण
मतासच्या तेत्सस
आहे”
अशी
१९० १
सालच्या
रिंपोर्टीत चाठपूर्चां म[["हत्[”[ मिळते-
स.१९११ च्या खावैसुमारंळोत यांची सख्या ९३२७३ भरला.
पँकॉ ९२५२० मद्रास इलाप्ठुयांत हळोते. स[प[र्वे यांस आणि
गोंगांस भक्षिणाऱ्या सोंड लोकपिक्षां, ताउपु हे आपणांस
श्रेष्ठ समवतात. ‘कॉँड ज[टपु_र्ड[रळु’( सोंड जेंतिळोवे थनळी )
या नावाचे ताटप हे सक्षिप्तरह्नंप आहे असे मानण्यात येते.
यांच्यांत [नरनिरप्ळ्या
पडल्या आहेत.
प्राण्यांन्या दैवकांवन्कैंऱ्न
उदोथोरिंक
पोटजाती
[कव[ यामिक; काद्रिक; मान…
देगळो इ.
आपल्या
`
घमँवत्त्वांचा उपदेश सामान्य
ळव[ण[ होऊं
सव उपदेश
करताना
ज्ञनसमूहप्ला रुक्ष व कटा
नये म्हृणन मधूनमचून गोष्टी त[गणं किंवा
मोंष्टाच्या व्पार्में करणें. हळो सव थमप्रचार-
. फांचीं युळिक्त आहे. [हद्रुथम’खील सर्वे‘ पुराण ताड्मयाचा
’ हाच उद्देश आहे, ख्रिस्ती थर्मोपदेशकद्दि आपल्या ‘ समैन’
हु मध्ये (प्रवचगांत )‘ उदाहरणांचा ’ म्हणने सत्पुव्षांच्या
. चरित्रांतोल गोष्टींचा अन्तभोव करतात. वुद्धार्नेळिह त्वथ`
र्मोपदेंशांत
हा प्रकार
सुरव केला. बुद्धाचे अनेक पूवॅवन्म
झाले होते; त्यांत र[न[, व्यापारी, सरदार, अस्पृश्य किंवा
हत्ती,
["कना
असलाच
कळोणळो
मानव
पाण्याचे जन्म वुलार्ते घेतलें होते.
किया
मानवेतर
पूबैकालळोन फौणतळोद्दि
आतेच्या मुलीशळो लग्न करण्याचा प्रत्येकाचा
हक्क असतो. रँवडवळ् अथवघ् ख[लच्या द्र्माच्या तेलगु ळू एखादी गोष्ट घेऊन त्यांताल कथाविपयक एखादी त्पृहणींय
लोकांच्या विनाहपद्वर्तांप्रमार्णेच हे लोक निवाहसमा'रम ड्रु व्यक्ति म्हणजेच बुद्ध होय, अते त[गर्णे सळोपें होते. या…
साजरा करतात. निथताविपाद्दास पूण्ळी मोंकळीक आहे.विथवव्
` प्रमार्णे चातक
कथांवो
उत्पात्ते
आळी. ‘ घातक ’ न्हपृदृन
आपल्या थाकटचा दिरप्शगिंहेहु. लप्र करते. घथ्रफॉंटासाहे , ज्या कथा पुढें बनविण्यात आल्या, त्या कथा सुत्तांमघ्ये
प्रांतेहेंक्थ नसून, काडी मोडून दिठेल्या ["त्त्रयांनत्रैड्रुद्यां पुन्हां आहेतच; पण त्यांत वोळिथसत्त्नाचा [’नेर्देश त[ह[. ["शवा'य
लप्र करता येते. भुतान’ळा वहुंयां पुरतात. तथापि सपेंट्रेशानें हुत्तामच्ये‘ चातक कथाळिह काहांआहत. उदो. क्रूव्देत्प्घुत्त,
मेलेल्यामनुष्यास द्हन करय्ळेव अते शास्त्र सांगते.
ताकरा देवता ही चाठपुंर्चां ' यूक्रुलर्देवता
होय.
धान्याच्या मळणळीच्या वेळी या देवतेस प्रथम पव्काचा भाग
अपेंण
करण्याचा प्रघात आहे.
याच्या चातांच्या
मुख्यास
‘नायडु’ किंवा‘ सामोंथ’ अशी सह्या आहे. [ थर्स्टन; ते. [र.]
जाय्परेल-दैद्सपाद् सत्थान. महबूबनगर निल्ह्यांच्या
दक्षिणेस
असलॅंल एक
सह्थान.
यांत एक’द्र
७९.
खेडी असून क्षेत्रफळ ३५६ चरैरस येलार्चे'ळू,’ आहे. इ. स.
रुपये असून ["ननामसरकक्रु'रास ७३५३७ढ्फ्यै
र्दुवडर्णांतावत दिला जाते.
[गेलालखावसन अतें
ग्रँट नायऱ्" यार्ने
दिसते कळी, इ स,
[
अंगांपेंकॉं एक ध्येय आहे. चातकप्रथ ह[ ग[थ[च[ समुदाय
असून त्याने २२
निपात आहेत.
पण क[ह"[ ठिकाणी
गद्यमय
ह[ ग्रंथ बहुतेक पद्यसय
आहे. गद्य वरँच दुर्बोध आहे.
शिवाय या मूळ कथांवर टीका ळिलाहेतेलों असून हध्र्ग
उपलब्ध आहे तों मुळ
गाथा ’म्इपूळान तो ग्रंथ
` ‘ आवक
कथाव
त्यावरळोल ठोका
मिळून
बनलेला
आहे. त्याला
होती. एकदर उत्पन्न ॰ " जातकठ्ठवण्णना ’ अर्ते पाळी नाव आहे.
१९११ मध्ये ३८३१० लोकसस्व्या
१.९ लाख
महासुद्द्त्सनसुत्त, महाद्वक्षुत्त. ‘ चातक ’हा बाँद्धांच्या
यामिक प्रेथांपँक’व् आहे. कारण तो पनिन्न ग्रंथाच्या नऊ
१२४३
स्टेट वळाकावन प[गल
व
मध्र्में
डस`
वळीद्वावप्द्द्'मयनि चातक
` आहे. यांतळोल वऱ्याचशप्
हा प्रेथ फार जुना व महत्वाचा
कथा पंचतंत्र, कथासरिंव्सप्गर व
इतर गोष्टींची सरकत पुस्तके यांत सापडतात. काही कयांर्वे
रामायण. व
चू ….
महाभारत
..
यातौल कथांशी
. …
साम्य आहे, व
रेंदृतहुं ` क[ह[च जेननाडु-मयाताल कथ[श[ आहे. य[त[ल कथांर्ते
["कतपत साम्य आहे ते आर. गाबेंनॅ
(कॉंट्रांव्ग्रुशन्स आँफ वुद्धिझम टु ख्रिश्चानिटॉ )व एमू.
राव निपुत्रिक नारला व त्यार्ने पाखालच्या राव वशांतोल
अन्न ”
६
इ इ
५
साँत्र
आणखी फिहैंटें सर केले. याच्या; ऱ्वशबांनळोक्र `ग् ["रवत्ती कथांशो
राज्य वेऱ्ल. अठराव्या शतकाच्या अखेंरांस र[…ग्[[ नगचाथ-
लछमारप्व ह[ दत्तक घेतला. इ. स. १८३१
र[व यास ताटपव्ल ह[ परगणा
निबामाकड्रुन
७०००० रुपये खेडणळो द्यावळो असें ठत्ळें.
जाटपेंत्ल हे मुख्य ठिकाण होते.
जाचक-‘वखिंताइमयांतळोल
मध्ये
एक
ळछ्मा.
मिळाला व
८०
प्रफारन् या
वर्षांपूर्वी
ग्रंथाला
हे नाव आहे त्यांत तोघिसत्याच्या म्हणजे बुद्धाच्या पूव[न्या
अनेक जन्म[च[ कथ[_॰स[गिततेला, आहे.‘ जातक’ म्हणजे
विंठरनिझॅन( [हेरट्री
आहे. विंटरनिझचँ
विभागांत ( पृ. २२०
‘ चरिया पिटक ‘
ऑफ इंडियन ["लउरॅचर ) दाखा`वर्ले
म्हृणणें आम्हळो ज्ञानकोशाच्या ४ थ्या
पासून पुढें )मांडलै आहे.
हे ["तत्पठकातौल खुद्दक निकायमघील
शवटचे पुस्तक आहे. त्याचा उद्देश बोधिसत्व पूर्वीच्या
कळोणकव्णत्या ज्ञन्मांत द्ह[ ‘ पारमिता ’ ( गुयार्चा पूर्णेता )
मिळवू शकला होता ते सांगण्याचा आहे.
‘ निदानकथा ’हळो चातक टीकाग्रंयाला
प्रस्तावना
पूर्ववन्म. तिपिटक ग्रंथाचा चातक ह[ एक पाँटभाग आहे. [. म्हणून बोंडलो आहे. ‘ तातक कथण् ’ हा सर्वे ग्रेथच गौतमतातक कथांच्ची रचना व ड्त्तिद्दास व त्यांर्चे रवख्प ‘ बुद्धी- बुद्वाच्पा आत्मचरित्रपर असून ‘ नितानकथा ’ ही खुद्द<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मइप्राट्रॅरेय सप्नकळोश. ( ज ) २१३ जातफमैं जातिभेद गौतमवुद्वाबँच चरित्र आहे. षालींनाछूमयांतलैं बुद्धाचे हेच [ प्रमाण पङतें. नमिर्मावर क्षार असल्यामुळे पुष्कळ जमीन पाहेळें चरित्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मइप्राट्रॅरेय सप्नकळोश. ( ज ) २१३
जातफमैं
जातिभेद
गौतमवुद्वाबँच चरित्र आहे. षालींनाछूमयांतलैं बुद्धाचे हेच [ प्रमाण पङतें. नमिर्मावर क्षार असल्यामुळे पुष्कळ जमीन
पाहेळें चरित्र होय.
[ ओसाड पडली आहे म्हणुन लोकवस्ती कमी
‘अनहान ’ न[व[चा दसरा एक
कथांचाच ग्रंथ आद्देफाँ इ.स. १९०३…४
मध्ये एक लाख
रुपये
आहे.
उत्पन्न
होते.
सिंधु
मात,
त्यांत स[घु पुरुषांच्या गोष्टी असम “ चांगल्या कुत्यांर्वे फळ [ नद्व्च्या फालव्यांवै पाणी या तालुक्यात ।मेळतें.
चांगल मिळते व चाइटायें वाईट [मळर्ते ” हा उपदेश यानरळो, बालाँ, तळोळ आणि गळिताचीं थान्में हाँ मुख्य पिर्के
होत.
ठस[वण्याचा मुख्य उद्देश आहे ( अवदान पहा ).‘ नातक’
व ‘ अवद्गान ‘ या दोन ग्रंयांत मुख्य फरक असा आहे
जातिभेद-… “ जाति या शठदाचामुळ अथे ज्ञन्म.
कॉँ, चातर्फात बोंघिसत्त्नापद्दलच्या म्हृणने बुद्धाच्या नूत्रै- ऱ् कथीं कर्बी हा शब्द “ जन्मसिद्ध स्वरूप ” दाखविजन्मावद्दच्या सर्व कथा आहेत; आणि… ‘ अवदान ’ ग्रंथांत ण्यासठीं सस्कृत ग्रंथांत योजला आहे. आणि त्यावरून
इतर अनेक सत्पुरूषांच्या कथा आहेत, व क[हूं”[ बोंघि- ` घोडा, सिहृ वगैरे प्राण्यांच्या वर्गांसहि जाति हा शब्द लाव-
सत्त्यावद्दलद्दि आहेत.
‘बोंयिसत्त्यावदानमाल;
ऊफै
गातकमाला ’हा
सरकत गद्यपद्यमव
ग्रंथ आयेबूनांर नामाच्या कवळोचा
आहे. " त[तकमाला ’ न[व[वै द्रुसरँळाहे अनेक ग्रंथ आहेत,
पण आर्यंशुराचा ग्रंथव सर्वांत उत्तम आहे. हा ग्रं‘यांहे
वींथिसत्त्वप्च्या गुणवणेंनपर आहे.
`
नातकग्रंयांतळोल कथा मनोरंजक आहेत. या कयांचळो व
)
त[तवग्ग्रंथाचौ अधिक माहितळो ज्ञानकोशाच्या चवथ्या भागांत
दिला आहे ( वुदोतर जग प्र. ११ पान २२० ).
[ व्ही. फौसवळोलर्ते सटीक चातक ७ भागांत प्रसिद्ध केलॅं
आहे. ऱ्इळोस डेव्हिहूंसने
चातक कथांचें भाषांतर केलें आहे.
ण्यांत येत आहे व ज्याअयों जाति म्हणजे नननर्वो‘रळोष्टय
मूलक त[दृश्य किया समुच्चव ही कल्पना प्रचलित आलों
त्याअर्थी
आणि
हा
शब्द
स[दृद्याथा"नॅ[’हे
लावण्यात
यरैऊ' लागला. प्रस्तुत प्रसगळो “ बाति ” हे नांव ज्या प्रक[॰
रच्या मनुव्वससूहृल्ला लावण्यात येते तेच
विंनेचनाचा विषय आहे.
समुइ
फक्त
जातींचे शखोव विवेचन करावयावै म्हृठले म्हणने त्या
घिवैचनावे त[न भाग करता येतळोल. एक भाग म्हटला
म्हृणने अस्तित्वांत असळेल्या जातींची वाद आणि वपौन.
ही याद् नरळी पद्धतशीर व
नळीट
आली
नाहीं
तरळो
तशळी
यारॅवरळीज्ञ विंश्र्रळिनञ्च, ओंल्डनवगें, शर्पिटियर यांच्या ग्रेथातुन तयार करण्याचे प्रयत्न अनेक प्रांतांत बरेच झाले आहेत.
व प्रत्येक प्रांताने आपरँठें एथ्नोंयाफिकल खाते ठेवले आहे,
ज्ञ[तक।[वेपयां माहिती आढळेल. ]
जप्तफर्मं-‘हिंदु लौफांतांल एक सस्फार. बालक . त्या खात्यांतून हे काम होत आहे. त[तिव्रदाच्या अन्याजन्मास येताच पित्याने त्याने मुखावलळोकन करणें व गभौ- . सचिं द्रुसरॅ अंग म्हटले म्हणजे या अनेक जातो मिळुन
शयामघ्यै व[लक[स ने गर्मोबुपान घडटॅ असेल त्म द्ळोमाचै जळो पद्धति होंतें तिचे वण्ळीन, म्हृणजे तदंतगॅत अन्योन्याश्र’
निरसन करणें हा जातकमळीचा उद्देश आहे. कुमार जन्मास याचँ सोंयानरचनेवै कोप, दॉइ, हेंर्षा अदूळाया इत्यादि भावआल्याचे नृत्त कळर्तांच पित्त्याने स्नान करावें आणि ( त्या नांचे वर्णेन. तिसरा भाग म्हटला म्हणने जाति हा एक प्रकप्-
वालक|स दुसऱ्या कोणी स्पर्श करावयाच्या पूर्वी व त्यार्ने
नालछेद्न होण्यापूर्वी ) मध आणि तूप यामघ्यें सुवर्ण उग[॰
र -,[ हेच या दृष्टांनॅ विचार करून त्या तयाची अतघेटना, व
` स्वयेशांसन वइतर
सघांशॉ
व
एकद्र
समाजाशॉ
सर्वच
प्र[शन[॰"[ गर्मोवु…
या दृष्टीने अभ्यास. या अम्यासऱ्मश्यै जाति, वग्रं, राष्ट्रजाति
प्रयोगकारानॉ याचा उक्केख केला नाही. यांतळील
लागतो. हा सर्वे घठनप्शखीय अभ्यास झाला. हिंदु समाजाचा एकंदर इतिहास या अम्यासार्चे है उपांग आहे. हिंदु०
छून तें व[लक[कडून प्रप्शन करनाव्प्. या
इत्यादि गोष्टीची तुलना थेट्टेल. या समुच्चयांच्या अम्यातार्वे
पानाचा दीप नाहाँता होतो अस कांहेळोऱ्व मत आहे.
`
ऐतिहाखिंक
अभ्यास हेमद्दत्त्चार्चे अग आहेच. त्यामध्ये
या सस्फारम्च्या अगभुत अस[ ( मालकाच्या बुद्धीची वाढ
जातोंची घटनाळिवघटना इत्यादि गोष्टींचा :विचार कराव!
होण्यास) ‘ मेधाननन ’ नामक सरकार कांहीं डूत्रकारानीं
[देंला आहे.
विघि म्हृणतै यालकाच्या कानावर सोने ठेवून मेथा ट्टाद्रेगत `
करणाऱ्या ‘ मेप[ तें ’ इत्यादि मेत्रांचा जप करावयाचा
असतो. [मनु-याज्ञवल्क्य स्मृति; आश्वलायनखूत्र; निप्ब्प्य.
सिंधु; घमैंस्तिघु; वगैरे ]
जाति-पुंवईं,
सिमप्रांत.
कराची
णिल्ह्याचा
एकड्
तालुका. उ. अ. २३॰ऱ्.५’ तें २४॰३८’व पू. रे. ६८° १’ ते
६८॰४८’ क्षेत्रफळ २१८५ चौरस मैल. एक’द्र खेहाँ १२४;
समाज्ञघटनॅचा इतिहास द्यावयाचा म्हटला म्हणने एक अघि`
कच व्यापक विवेचन करार्वे लागणार. यासठीं येथें
अत्यंत
स्थूल गोष्टींचाच उत्द्वैरव करून मळिकळें झक्तिं पाहिजे.
अनेक
त[तोंचीं वणेंने ज्ञानकळिशांत त्या त्या जावळीच्या नावाखाली
आलीच आहेत. आतां अनेक जाती मिळुन जो पद्धति होते
त्या पद्वतांकडे लक्ष देऊ.
यांत गांव एकहि नाही. लोकसंख्या १९११ स[ल"[ ३५८…
अनेक निरनिराळ्या राब्रूनप्तो म्हणजे फिरता राहू हृळो
या ळिनत्ह्यांतोंल सव तालुके घेतले तर या तालुक्यांत फार एकत्र आलों म्हणजे त्यांचा एकमेकांशी स'बंथ मनुष्मस्वभा'
[वेरळ वस्तळो आहे… दर चौरस ’मलात फक्त १५ माणसँ हँ ` याच्या नियमानुसार उत्पन्न झालेल्या कांहीं नियमांनों<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३७
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जातिभेद मक्ष्प्रांबूघ्‘प्य ष्टांनकरैरा ( ज्ञ) ११४ जप्तिट्रेवट् वर्गांत आपण इतरांपेंक्षां निराळे आहोत किरा उच्च आहोत सघटित होती. त्या नियमांचा शोध करणें म्हणजे पद्धतीचे स्वर..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जातिभेद
मक्ष्प्रांबूघ्‘प्य ष्टांनकरैरा ( ज्ञ) ११४
जप्तिट्रेवट्
वर्गांत आपण इतरांपेंक्षां निराळे आहोत किरा उच्च आहोत
सघटित होती. त्या नियमांचा शोध करणें म्हणजे पद्धतीचे
स्वरूप वर्णन करणे होय.
अशी भावना उ पत्र झाली म्हणजे स्वत: स उच्च समजणारा
जातिभेद हा शब्द ट्टेप्रजी राज्यांत रूढ झाला आहे. तो [ समाज इतर['1[सन
आपल पृथपत्व स्थाधूं पहाता. ज्या
अनेक वन्य व रवडवळनातातव्ल काही लोंक नगरव[स[
मूलक भिन्नता [कैयाद्वात या अथार्ने वापरला जातो आप- होतात व आचारविचार यामघ्यें सुथार`ल जातात तेव्हा
ल्याकडे जातिभेद आणि चातुनैण्यै या गोष्टी एकच अशी त्यांच्यामघ्में
भ्
ड्तणंपाढून नियुक्त हळो’याचळी
प्रवृत्ति
समाजाचे जातिमूलक भेद किंवा माणसामाणसांतील
जाति
दिंहूं लागते. एवच अंतर्विवप्इ व उच्चतीच भाव यांचा
अन्योन्याश्रय आहे. उच्चनोंच भाव असला म्हृणजें कोण"
समजत होऊन जातिभेतास यामिक पाठिंबा आहे अशा
तऱ्हेचीं समलूत झालळी. जाठुवण्यै आणि जातिमय समाज
या गोष्ठी एक आहेत असेच लाफांस वाटत होते व त्यास
फांहळो अशी कारण असे होते कीं जातळो एक'द्र कितळो आहेत,
त्या कितळी भिन्न स्वरूपांच्या आहेत इत्यादि गोष्टींविषयाँ
त्यातरळी तत्वावर त्याचे समथेंन व्हावें लागलें. यासाठी
सामाजिक पद्वळी, र[जक[य महत्व किया अम्न्नारातांल उच्च-
नळोचता या गोष्टींवर दोन समाजातील
कल्पना अशी होंत्‘ळी कीं तात्विक चार वण्ळी ते जातळोच आहेत
त्यांच्यात पोटजाती पडल्या
असतील आणि
पृथवत्व रक्षिलैं जाते.
अ ” समाज “ व ” समाजाहून उच्च क[ इं तर ‘अ’ हा
अधिकारी समान आहे म्हणून, किंवा जमीनदार
समाज
काही जातळी
सकरार्ते उत्पन्न झाल्या असतील व काहीं कमँलळोपान किंवा आहे म्हुंगन किंवा तो राजवशांतळोल आहे म्हणन, किंवा तो
दुसऱ्या क[हृ“[ कारणांनळो तुकडे पडत जाऊन नाहृल्या अस॰ ’ रहाणाद्वै’र श्रेष्ठ आहे म्हृणन. या तऱ्हेच्या विचारांना [मन्न
तोल. जातिमय समाजाची स्थिति सरफारर्वे मानसशास्त्र- समाजामध्ये उच्चनाचता स्थापन करणाऱ्या कल्पना च[ह[
खावै व प्तिरळोगणतळी खाते गांन'व् पद्धतशीर पहाणळो केल्या कडे प्रचालत आहेत. म[रत[य[स [कवहुना एशियाटिक
पूव’[ जातिभेदार्वे खरे स्वरूप लोकांस अवगतच नव्हते असे
लोकांस
म्हणता येईल; व याच खात्यांनळी जातींच्या पद्धतशीर अम्या
कल्पनाबुतार प्राप्त झाला आहे. हिंदुस्यानामघ्ये
तास प्र[॰रम केला आहे; व खासगी पंडितांनी फार तर
त्यांच्या स[[‘हेत्यावरून निराळे [`नरँगय काढणे, किया ऎति’
हासिक अम्यासति भर घालणे या गोष्टी केल्या आहेत.
जाति हा एक सदृश मनुष्यांचा समुचय होय. या समु-
राजकीय व आनुवंशिक पदवी या कारणांवै महत्त्व अप्द्देच;
च्चयामघ्ये आपल्या
म्हणने पावित्र्यापाब्‘वेव्यविचार हळोय. अमुक जात उच्च क[
तर ती अधिक पवित्र आहे म्हणून; आणि अमुक जात
कनिष्ठ क[ तर ता कमळो पवित्र किंवा अफ्विंत्र आहे म्हणून.
भावना असते,
एकत्नाचीं
व यामुळे
व इतरांपप्लून
जातांचें
[हेताद्वित
पण
लोकांस
करण्यात
भिन्नत्वप्चळी
हेव्यक्तळीस
त्या
जात व पोटजात हे शब्द
व[र॰व[र
आर्ले
अगदॉ
आहे.
प्राधान्य
ळिमव्याब्ठेर्के
विराळ्या कारणाने
आणि
तें
कारण
आर्थिक,
न [हींस्पष्टीकरण
म्हृटलै
त्यांच्यावर उच्चनळोचता ठरनेच; पण तो प्रत्यक्ष न करता
त्यांच्यावर प[[वत्र्याप[[’बेंव्य करून नंतर ठरते. या प[।’व=न्याप[[’बैत्र्याच्या तत्त्नास [हृद्रुस्थानांत प्राधान्य [’मेक्रार्ले॰ त्याचे
चरण त्रळाह्यणजातळोवै प्रथमरथान होय. या प्र[च’[न काळी
द्क्षिणेनर अवल'त्रून असणाऱ्या जातांचें प्रथमरथान कोणत्याप्’हे दुसऱ्या तत्वावर सिद्ध करता आर्ले नसर्लेशितय ब्राह्मण
सया-
वापरले जातात
व हे परस्परापेंक्ष आहेत. उदाहरणार्थ फाँकणस्थ
हृळो महाराटँप्य ब्राम्हणाचीं पोटजात होईल. पण
ष्ट्रव्य ब्राम्हण हळी र्पचद्राविंड ब्राम्हणांचीं पींठजात
पंचद्राविड ब्राह्मण ही ब्राह्मजातळीचळी पोट जात
कारणांस
व अमैप्’रॅवर्दुत फ्’त्तिष्टता याच
याचा अयै अता नव्हे कळी त[पघ्’त्तेक स्थिति किंवा शिक्षण
यांवर जातींची उच्चनळोचता हिंदुस्थानात ठरत नाही.
नाहेर लग्न करता येत नाही त्या समास जाति म्हणावे अस[
आहे
त्या
आस्तिक,
उच्चनळीचतर्चे
आपर्के [हेताद्दित अर्ते काहीं अशग्र्ते व[ठतें.जात^[चळो व्याख्या
करण्याचे प्रयत्न अनेक झाले आहेत. त्यांमघ्र्मे सर्वांस लागू
पडणारे असें स्थूल लक्षण म्हटले म्हणने " जम्मना जायते
सघे प्रयेशो नान्यत: कदा । सघमर्यांदिंते क्षेत्र वियाहे
जाप्तेव्च्यतें ।।” असें देता येट्रेल. याचा अर्थ:-ज्या विशिष्ट
संघामध्ये प्रपेंश जन्मानेंच होतो आणि दुसऱ्या कव्णत्यप्त‘हे
कारणाने होत नाहीं व ज्या सघांतांल
दक्षिण
हा ईंश्वराशळो विशिष्ट स'वंघ सांगणारा वगे’ असल्यामुळें त्याचे
ब्राम्हण
मह[र[॰
होईल.
हव्ईंल.
प्राधान्य लोकांस मान्य असणें व त्याचे पावित्र्य अधिक नाठर्णे
या गोष्टी स्वाभाविकच होत्या. ब्राह्मणी घमैशप्स्राच्या
ड्तिहासति कमाकमाने
आचारघर्मोस देखील प्राधान्य
मिळार्ले. ते ब्राढाणजातौच्या उच्चत्व्चें व दृश्य आचरणावर
स[मा=यत; ब्राह्मण,. महाराट्रीय ब्राह्मण व कद्वैकणस्थ ब्राह्मण
या सर्वांस जात असें म्हृणतात. जेंव्हा अता‘व‘नाह म्हणजे
सघासल्या सघांतच विवाह हा देशांत रूढ असतोम्हणजै
व्यक्तींची उच्चता असावी या तत्त्वळावै समटॅद्भन करण्यामाठळो
मिळाळेंजर क्षक्रुत्रयवर्गामें आपल प्राधान्य देशावर स्थापित
र्देशामध्ये अनेक अतविनाहळी समाज असतात तेंव्हात्यारॅ केलें असतें तर त्यानरानर आचारघमौब्या’तेळिरक्त पण उच्च,
निरनिराळ्या सेवांमध्ये उच्चनळीचतैचा भावना असते. कर्थी` नळीचतातिर्णांयक तिराळें तत्व समाजात सुरू करावें लागलें
कथी अंतर्विवाह हा
उच्चनीचतेंर्चे कारण
असतो व कथॉ
कधीं परिणामा’हे असतो. म्ष्णजें एखाद्या जाता’मघ्यें क[ह^[
[
असतें3आणि त्यामुळे थेंथ’प्ल जातिभेद इतर देशांतील जाति-
भेहासारखाच
[ट्रॅतूं लागला असता. आणि तो माडर्णे किंवा<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/३८
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जातिभेद महारामूच्य ज्ञानकोश, ( ज ) २१५ जातिभेद कमळोकरर्णे या किया करण्यास राजसतासमथे आलों असतो. [ एकीकरण न झाल्यामुळे हा चार हजार जार्तीचा समान पण राजाचें सामाजिक महत्व वऱ्याच अं..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जातिभेद
महारामूच्य ज्ञानकोश, ( ज ) २१५
जातिभेद
कमळोकरर्णे या किया करण्यास राजसतासमथे आलों असतो. [ एकीकरण न झाल्यामुळे हा चार हजार जार्तीचा समान
पण राजाचें सामाजिक महत्व वऱ्याच अंशां त्याच्या क्षत्रिय' तयार झाला आहे. तथापि माँठया समाजाने तुकडे पडत
त्वावर आणि त्याने क्षळिवयत्व त्याच्या सस्कारावर व त्याचळो जाण्याची किय्ण्ऱ’हे झालेला आहेन्नऱ्ह्यणम्हणविणाऱ्याजार्तींवळो
सस्काराहँता ब्राह्मणांच्या इच्छेनर अशळो परिस्थिति उत्पन्न सख्या सुमारे ८॰॰ आहे. यातील बहुतेक जावी अप्यत्रप्ह्मण‘
झाल्यामुळे देशांतील क्षळित्रयवगें फेरफार करण्यास पूपौपणें वण॰[`च तुकदे पडत पडत झाल्या… आहेत यांत सशय
ड्रुबैल ठरल[.प[तित्र्याप[वित्र्यावर सामाजिक महत्त्व रचले गेले त[हळी.
जातळोइंय् वग‘["करण करण्याच प्रयत्न अनेक झाले आहेत.
असल्याकारणाने आणि प[[’वेत्र्य[प[[’वेंच्यतिण[यक आचारघमैं
उत्पन्न आल्यामुळे जगांतळोल एकंदर वरतूंर्चे, व [’रॅवाजार्चे पावि- जाताच कर्मे याहून क्षन्नियत्रैरेंयादि वण॰[त घव्लणें हा वर्षीत्र्याच्या तत्वावर वगॉकरण करणें भाग पडले आणि
एकंदर
सामाजिक विचारात नग[प[डुन निराळे अर्ते काहीं वळण
मिळाले.
अनेक जातचिं अस्तित्व, त्यांत त्रह्मणजातळोवै प्राधान्य
व जातींची उच्ननावता व तिचे स्पष्टीकरण करणारा पावि-
करणाचळो जुनी पद्धत झाली. जातव्चें, आज त्यांचा आयुष्यकम पाहून प्रगत, मध्यम व मब्गासलेले असॅग्हे वर्गीकरण
राजकारणात करण्यात येते जातव्र्वे वर्गीकरण त्यांच्या उत्पब्‘ते‘
बैणिष्टयावरून किंवा स्वरूपनेणिष्टयावरून करण्यात आले
आहे. या तत्याप्रमाणें
नेन्ससवाल्यानों जातळोवै
स[त
वगें
घटक म्हणून धरण्यात हरकत नाही. त्रह्मणजात’ग्च्या उच्च-
पाडले आहेत ते येव्ळाप्रम[व्[:-॰( १ )राष्ट्रजात्तिस्वरूपां जाति,
(न्. )कमैनिणित जाति, ( ३ ) त[पदोयमृलक जाति,
तेचा एक लांबलचक इतिहास आहे (ब्राह्मण पहा). पत’बैत्र्या‘
पाविंत्र्याच्या कल्पना वेद्कावायारहुन पराशररमृतळोपर्येत एक॰
( ४ ) सकरमूलक जाति, ( ५ ) राष्ट्रस्वरूपळो जाति, ( ६ )
स्थानांतरमूलक जाति, व ( ७ ) भिन्नाचारमूलक जाति.
सारख्या वाढत कशा नेल्या याचे स्पष्टीकरण अन्यत्र केलेच
आहे ("’याविंन्'य” पहा). उच्चनळीचतेच्या कल्पनांना चातुर्वे-
यांमध्ये र’ष्ट्रजातिस्वरूपळो जाति व राष्ट्रस्वरूपळी जाति याने
त्र्यापम्वित्र्यतेचळो कल्पना या
गोष्टी
जातिमॅद्राच्या मुख्य
ण्र्यांच्या कल्पनेमुळे' थॉडाबहुत प[।’ठेंव[ मिळाला. परंतु समा’
जाच्या एक’द्र्र इतिहातांत
तहेंच
[वेजय मिंळाबेर्णे
एका
वसलेल्या
एका
प्रदेशांत
निराळी
जात
केले आहे
व
तें त्या समुच्चयाच्या
राहणे
कपाँच वनलळो नव्हती. उलटपक्षी मराठा आणि
जातळीने दुसऱ्या
आणि त्या प्रदेशांत
आकारावर
`ने.वळ
उच्चनीचतातिणीयक दुसऱ्या
अनेक गोष्टीं होऊन गेल्या आहेत.
जार्तांवर
वर्गीकरण
प्रयोजनावरळिह आहे. उदाहरणार्थ बैजाऱ्यांचळो जात घ्या. हळो
जात अनेक निरनिराळ्या जातोंतळील माणर्ते एकत्रित होऊन
तयार झाला व हा जात मव्कळी असल्यामुळे [’हेला थोडेसे
राजकीय पृ'यवऱ्त्वार्वे स्वरूयाहे आले हळोतेंपण तो जात राष्ट्र
नेवप्र
या
वस्तळोसर्टी मागाहून की व ननागताचें आवारावेचार स्थानि-
जार्तोना राष्ट्रस्वरूप’! जाता म्हटले“ आहे. क[ की, यांर्वे राज,
फांहूंन मित्र असणें यामुळे नवागतांचळी उच्वता किंवा त[चता
काम स्वरूप अधिक स्पष्ट होते.
वहुंतेक जातळोप्तध्यें जातळोर्ते नेमलेला एक सभा असते.
वरिष्ठ जातळीमऱ्ये केव्हा केव्हा अशा प्रकारचळो सभा आढळून
निणित
झाला
आहे.
नेते स्थातिफांढून
श्रेष्ठ हळोणार व
केवळ वस्तळोसठीं आलेले स्थाळिनफांहूंन हलके ठरणार असा
नियम दिसतो. जातोंवे फांहाँ लोक परक्या प्रदेशांत जाऊन
आचारभिन्नत्व पावले म्हणजे ते दोन वर्ग पुन: संबंध आला
असतां एकमेकांस हलके समजणार.
पुष्कळ प्रसगों एका
विशिष्ट वगळीचा ज्या जात’प्शां संपर्क येतो त्या जात’ष्च्या
उच्चनळोचतेवर त्याशी स'बंथ ठेव णाऱ्या वर्गांची उच्चनळोचता ठरते
आणि प्रसगों अशा कारणाने एखाद्या जातळीवै तुकडो’हे पडतात. एव'च अनेक कारणांचा उच्चनळोवता ठरविण्यात परिं॰
णाम आला आहे. ह”[ कारणें प्रत्येक प्रसगों कोंणफौणता
होतां हे विशिष्ट जातच्र्चे इतिहास त्वि’हेतांनाच पहार्वे लागेल.
सप्मात्यत: जगांत विशिष्ट वर्गांचा, राट्रांचीं किंवा
उच्चनळीचता ठरण्यात ज्या गोष्ठी कारण झाल्या
त्याच हिंदुस्थानात कारण झाल्या आहेत. आतां
अनेकत्वाचा किंबहुना असंख्यत्वक्का विचार करू.
तुकडे पडत जाऊन जातिभेद वाढत गेला अशी
श्याहूंव्म्’
अदि’
पण ज्या मोठया
जावळी पडतील इतका मोठा
नव्हता.
समाजाच्या आज४०० ०
समाज पूर्वी कर्यांच अस्तित्बांत
अनेक समाज एकत्रित केले गॅले पण
२८
जातोंचीं
आहेत
जार्तांच्या
समाजाने
लोकांचळो
त्यांर्चे पूण
येत नाहळो. वस्थि जातति किरकाळ् वावतळोत,
जातांना त्या
जातोंतौल व्यक्तींवर फारसा अ'मल नसतो, पण महत्वाच्या
वावत’व्त मात्र खालच्या जातळोप्रमाणेंच कडक अंमल
असतो.
जातांर्ने निवडुन दिलेल्या पांच ल`[क[च^[ मिळून जात…
पंचायत बनते व त्या षंचायतांकहे जातव्मघळोल त्’टिवखेडे
तोंडण्याचें काम असते. क[ह”[ जातो या पंचायतळीवर एक
सरप'च निवडतात. जातांमघांल उपजातांमध्येद्दि स्वतंत्र षंचा'
यतळी असस[त.एखाद्य[ प्रआस‘वयाँ ज्यावॅळी वाद् उत्पन्न होतो
तेवढ्यायेकेपुरतेच हे पत्र एकत्र जमून आपला निर्णय देतात.
एका नावांच्या अगर उपजातळोच्या निरनिराळ्या पंचायतळीप्‘हे
असलेल्या आढळतात.
… ज्या गुन्हेगप्राला एखाद्या प्रश्नाचा निकाल लावून ध्यान…
याचा असेल तो या पच[न[ समक्ष भेटून अगर पत्रद्र्ळारँ' एक
ठिकाण“! नमवितळो. पेच जमल्यानतर ज्याने तळी सभा बळोला॰
वलळो असते तो आपले ग[ऱ्ह[णें पुढें माडतळो. ग[ऱ्ह[ण्`[ मांड‘
ण्यापूनीं त्याने आपला गुन्हा कबूल केला तर षंच त्याला जळी<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जातिभेद महारार्ट्प्य सप्नकौश ( ज… ) २१६ जातिभेद शिक्षा द्यावयाचा तळी देतात. पण गुन्हा कबूल नेला“ नाह घेदे करणें; ( ८ ) जातिनिबँ’घ न पाळणे; ( ९ ) पुनर्विवाह तर त्याच्या विरुद्ध वाड्रु..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जातिभेद
महारार्ट्प्य सप्नकौश ( ज… ) २१६
जातिभेद
शिक्षा द्यावयाचा तळी देतात. पण गुन्हा कबूल नेला“ नाह
घेदे करणें; ( ८ ) जातिनिबँ’घ न पाळणे; ( ९ ) पुनर्विवाह
तर त्याच्या विरुद्ध वाड्रुच्या त[क्षीवाराच्या जवान्या होतात.
व नंतर त्याच्या वाबूऱच्या स्राक्षांवाराच्या जव.न्या होतात.
त्यानंतर वादविवाद होऊन मग पंच निर्णय देतात. नर्मं॰
करणें वगैरे.
एतद्देशांय अंमलाखाली जातिनिषयक
देच्या क[ठच्या प्रदेशांत एखादा माणूस अपराघी अगर
लावण्याच्या
प्रश्नांचा निकाल
कामी राजा हा सव॰[॰त श्रेष्ठ गणला जात असे.
निरपराघळो ठरविण्याच्या वावतोंत ‘ रामरामायणकळी निठो’
चा उपाय अंमलात आणला जातो. तो प्रकार अमाम्’एका
राजाच्या हातांत एखाद्या जाताला श्रेष्ठ ठरविण्याचळी अगर
कनिष्ठ ठरविण्याचीं मुभा असे. वॅमालचा राजा वलाळसेन
याने काहीं जातांना मान्यता दिला होता व कांहीं जात”[न[
निठ्ठच्वर राम व दुसऱ्या निट्टव्वर रावण अशॉ अक्षरे लिहून
कनिष्ठ ठरविले होते. मुठुलमानळी अमलाखाली
त्या चिठ्या देवाच्या मूता‘वर ठेवतात व गुन्हेमाराला
नर्मानवार यांच्या हातांत वरील प्रकारचा सता र्केत्द्रोहूंत
आला होता. हक्की देखील एतद्देशीय सस्थानिक व
जमोंनवार यांच्या हातांत जातिविपयक प्रश्नांचा निर्णय
करण्याचा सत्ता थोव्याकार अशाने आहे. याचे उत्तम
चिक्रुरै
उचलण्यात सांगतात. गुन्हेगारानॅ उचलेलळी ळिचठ्ठळी रामाचळी
असली तर तो निर्दोपळी ठरला जाता व रावणाचा असेल तर
तर त्याला शिक्षा सांगण्यात येते.
क[ह“[ काह‘प् खालच्या
जातात एखाद्या वाईंवर व्यभिंचाराचा आरोप आला असल्यास तिचा हात उकळत असलेल्या तेलात घालण्यात येतो.
हात भाजत्यास तळोअपराघळी व नभाजल्यास तिलानिरपराघळो
ठरविण्यात येते. याशिवाय अनेक प्रकारच्या शिक्षा गुन्हेगाराला देण्यात येतात. काहीं टिंकार्णी गुन्हेगाराकडून, दंड
अगर
मिंशळो
शिक्षा
त्याला
सस्थानिक
उदाहरण नेपाळमध्ये दिसून येते. नेपाळमध्ये एखाद्या मनु०
'यामें काहीं जातिविषयक गुन्हा केला तर सस्थर्नावव्द्ध
तोंगुन्हासमजण्यांत येऊन सस्थानच्या न्यायकोंटदूंकडून
त्या गुन्ह्मावळो चौकशी रैकलळो जाते.र।जपुतान्य[त’[ल मारवाड,
खुशालगड अग’णें बुंदी या सस्थानांमघ्र्वे द्रवारकडून प्रत्येक
ज्ञातिमॉजन घेण्यात येते तर कांहीं करॅहळो ठिकाणी एक
जातींच्या पचायतांचा अध्यक्ष नेमला जा [[. मणिपूर सत्याकाढणे, वाय'ष्ठांच्या वानतांत र्केस माट्रणें इत्यादि नांत जातिफैवषयक प्रश्नांचा निर्णय देण्याच्या वावत‘ति राजा
देण्यात येतात. हा शिक्षा गुन्हेयाराने न पाळल्यास , सर्वीत येन समनला जातो. वा‘क्षेण मलवारमर्थाल नेबुद्रळी
ज्ञातांतून वाहेर हाकलण्यांत येते.
ब्राह्मणांमघ्में जातिविषयक तट[ तळोडण्यावै काम कळोचच्नच्या
पूर्वी जातषंचायताचा जातळोवराल ताया अबाधित स्वरू‘
पाचा असे. पण हाहॉ तो तिला होत चालला आहे. ब्रिटिश
अमवान’ति रेल्वे, मोंटारळो इत्यादि माघनाचळी सोय झाल्याने
एखाद्याला जातांनॅ वाळांत टाकले तर तो चटकन दुसरव्वडे
जाऊन रहातो. तो आपल्या जातांचळी पवक्रुच करळोत नाहीं.
व्यक्तिस्वातंव्याचें नसते स्तोंम मानल्याचा हा परिणाम होय.
पण अशा रळोतांने जातपंचायतच्ना तावा णिप्‘थेंल झाला असला
वरळी या जातपचायतीच्या जागी जातसभा अस्तित्वात येऊं
लागल्या आहेत. या जातसमांचा उद्देश आपल्या जातीचा
उन्नति करणें हा असून जातळोनिमप्य ठरविण्याच्या वावतळोत
या सभा पुष्कळ ठराव करतात, न न ठराव पाळण्यार्चे सभासदांकढून वचन घेण्यात येत असते. उदाहरणार्थ, वहारमध्ये
गळोलाल जाताच्या सभेने नऱ्लविवाहनिषेथाचा ठराव पास
केला आहे व वायक[न“[ दूध अगर भागी न विकण्याचा
ठराव पस[र केला आहे. दोसढ जातळोमयाल चारा करणाऱ्या
इसमाला जातळोवाहेर टाकण्याचा ठराव पवार आलेला आहे.
जातपचायतोंना मुख्यत: खालील स्वरूपाच्या प्रश्नांवर निर्णय
द्यावा लागतो;-
( १ )खालच्या जाताच्या माणसप्वसॅनर भोजन
थुम्रपान करणें; ( २ ) माय, वार
इत्यादि
अगर
राजाकडे देण्यात आले आहे. ओरिसा
मघ्येदि अशाच प्रकारची
पद्धत
प्रांतातील सस्यानां’
अमलात असल्याने आढ-
ड्रुड्रुन येत.
एकेका जात्तिसव’थाचळी ही व्यवस्था वर्णन केला. पण
पूर्वी अनेक जातळोसपाचळो एक पा’रॅषद् असे व तिच्याकडे
निरनिराळ्या जात’प्मपोल बेटे सोडण्यार्वे काम असे असे
प्रप्र्वान इतिहामावरून दिसून येते. बुद्वघमळीच्या अमवानति
अश[ प्रकारच्या घमँसभा असल्याचें आटळर्ते. अद्यापि गुञ‘
राथमघ्ये' व्यापारळो जार्तोयेफौ काही क[द्द॰[ जातोंमघ्ये अशां
प्रकारच्या सभा आढळतात. मनुत्सूतळोत अशा प्रकारच्या
परिषदेचें वर्णन आलेले आहे. ज्या प्रश्नावर घमैंशास्नाचा
रपष्टपणें निर्णय आलेला नसतो असे प्रश्न या परिषदेने
सळोडवावयाचे असतात अर्ते मनूर्चे मत दिसते.
पदेमघ्पें तळोनपासून
द्हाप’येत लोक
त्यात
चारा वर्णाच्या माणसांचा समावेश होत असे असे मनूर्ते
दिलेल्या वर्णनावरूव दिसवें.
तें क[ह’[[हे असो
ठिंकाणें सोडून [हेदुस्थानात जातपचायतसस्थण्
हक्कां काह‘प्
नामशेष
॰ आली आहे असें म्हणण्यात हरकत नाहळी.
द्ख्रवनमघ्ये
मुपुलमानी व मराठींमामाज्यांत जाति॰
विषयक ते`टभांडणें तळोडण्यार्चे काम त्या जातोंच्या जातगंने-
पवित्र वस्तूंची [( जातिसस्पा )कडे असे. ही जातीचा
हिंसा;( ३ ) स्वजनवथ अगर [’हेस[3( ४ ) एखाद्याचा कान
पंचायत आपल्या
हु, जातींच्या नियमांर्वे उढंघन करणारास जातिवहिबृत्र्ति अथवा
अगर नाक कापणें; (५ ) खालच्या जातळोकड्रन जाला खाणें; [ देहदंडन किंवा नुसता पैशाचा दंड वगैरे शिक्षा
( ६ )नडॉल माणसांना णिवामाळी
या परिं०
असतात व
देणें; ( ७)
देत असे.
निविद्ध [ निरनिराळ्या दोन जातचिं भांडण असल्यास पैठण किंवा<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४०
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जादू महाराट्रांय शांनकळोश. (ज) २१७ जातिभेद क्तऱ्शड अशातारख्या एखाद्या असलेल्या धर्मेमहासभेकडे प्रसिद्ध क्ष'याच्या ठिकाणी ] गावयाना आहे. त्यामध्ये अत्पेत महेत्त्वम्वॉ राट्र..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जादू
महाराट्रांय शांनकळोश. (ज) २१७
जातिभेद
क्तऱ्शड अशातारख्या
एखाद्या
असलेल्या धर्मेमहासभेकडे
प्रसिद्ध क्ष'याच्या ठिकाणी ] गावयाना
आहे.
त्यामध्ये अत्पेत महेत्त्वम्वॉ राट्रॅ म्हटला
तें सळोपनिण्यांत येद्दे या असे… म्हृयष्गं रनद्रुन व मराठें हा होत. सेप्नदायार्ते या बाबतीत
मह्रससेत वहुंथां वेद्श स्त्रपारंगत व श्रुतिल्तृत्तिज्ञ असे ब्राह्मण
पंडॉतच मुख्यत्वेकरुन असत व ते याज्ञवत्वयाप्दे तृग्तों
यमेंसिघु, मयुख वगैरे ग्रँथांधारै व पूवळोपण्र चालत
काय फारसे यशत्वा झाल नाहीं.
तथापि न्नेव्हा संप्रदायात
रानकच्य र-रस्वप येऊं लागवें तेव्हा ते कार्य बोंरार्ने होऊं
आलेल्या वद्दिवाटीप्रमाणें त्या तठषांया निकाल लावव्त
असत
आणि
मग
त्या निकालावरन्3कुंम
अमल
वनावणीं सरकारळी अधिकाऱ्यांच्या देखरेखीखाली होई.
णातोंवा दुसऱ्या जातांर्शी विवाह'संवघ असतो असे णरळो म्
विधान करण्यात आसे आहे. तरळो ज्या राष्ट्रनानित्वख्-री
बात? आद्देत त्य'ऱनर्केतें लक्षण लागु पडत नाहीं व त्या
तातोंमघ्पें वण्हेरच्यांना प्रवेंशळिइ होतो हे कैकाडॉ, मिल,
लागतें असगहें नियम, नर शण्खास रानकाय यामुख्य काढू"!
दिवस ज्ञात्त मिळते तर घालतां आला असता.
सध्याची
जो रप्ष्ट्रळोय भावना सव द्शमर जागृत झाला आहे तिर्वे
पर्णवतान एक मोठळो जात निमोण करण्याकडे होईल किंवा
नाहा. हा प्रश्न मनित’ऱ्याच्या अँघऱ्कारांत लपला आहे.
जाद्म-तमैंदेच्या
क्षप्त्रेयावो हा एक जात
पेंक"! सर्वीचा नाश
वनारौ इत्यादि अनेक नातीसे'वपाँन अवलोकन करून सर’
कारो मानवशप्घ्रवेत्त्यानीं म्द्दठलै आहे. तोच गोष्ट इतर
व तिवाच
खोऱ्यात
राहणाऱ्या यदु'वर्शाय
बनली आहे.
".६ कोट
यादवां-
झाल्यानंतर एकच वाहँ [क्लिक राहिली
मुलगा पुढें मधुरेना राजा झाला असे म्हणतात.
जातांसेव'थानॅप्हे थोडफ्या अ'शनि खरा आहे असे
येईल. व यावी अनेक उदाहेरणें पहिल्या विभागांत
क'गंतरावै नियम आणि हिंदु समप्नार्वे भवितव्य या
रणात दिलॉ आहेत आणि त्याच प्रकरणामघ्ये जुन्या
॰ याद्व'ण्चोमुथ्ळुय परार्णां क’रलळी सत्यान व जैसलमळीरसेस्थानचीं
म्ष्ट्णतां
रावघराणो होत. यांच्यात कछोटिया व अपोदिया असे दोन
समानवर्ण आहेत. छ्येग्निया हें स्वैर र्सबंघाची सतति आहेत; अघोप्रकदिया हें त्यांच्याशॉ लयव्यवहार करळीत नाहोंत. यांचीं
जातो
मळोउल्या नाऊर
बनतात
नरळीन
यासेवयार्ने तरॅर्वेद्दि दिलळो
नवीन
जातो
आहेत
कशण्
क्रुलनविं बहुतेक र’यानिक आहेत. पण ‘सेमरिया’ न'ग्वप्र्वे कुल
शिवरांच्या
( पुष्ट ३४५ पहा).
भिम
फार
मान
देंसे.
रवनातळोयावरळोवर
व्या’मेयार करून एखादा क्रुयारळी गभेवतौ झाली
जातिग्रुक सम’नांत दिसून येणारा उच्चनीवभाव व त्यार्वे
समर्थन करणारी परंपरा हा याग“ वत्‘णलाँव आहेत. जातिमत्सर, जात चोरणें म्हणते आपण
झाडास
जान’ण्वे आहात
विवाह
त्याच माणतावरॅऱवर
व'त्रूळान
वरान् या
हातात
‘ गुड
अ`गठी
घालून
तर
तिचा
’ निर्थार्ने करतात.
त्याच्या
गळ्यात
माळ यातला का लप्र लागत हे विथनानिवाहास क्रुकरगांना’
असे म्हणतात. काडी मोंडण्यान्री पद्वतांद्दि या लोकात नारार्ने
असे तांगणें यांसारख्या किया अनेक भिन्न मनुष्यसमुच्चय
असलेल्या प्रत्येक देशांत आढळून येतात. त्यात भारतीय
चाछू आहे. ज्गरार्ने नारिणळोच्या नवऱ्यास लयाचा रववै
नाबिंन्य असे काहीं नाही. उदाहरणार्थ चिनळी व गोऱ्याअशम् .
मात्र भरून द्यावा लागतो. फांहाँ काही बायकानळी दहा
भिव रत्तांवळो प्रना आपणास अमेरिकेत मेविंप्सकन म्हृणदहा वारावारा नवरे केल्याची देखील उदाहरणे आहेत.
वून घेत. पुष्कळ ठिकाणी यहुदा लोक आपण यहुदी आहो
ऍ लपर्जू पहातात. तर तसल्या किया भिन्न देशांत होण्यास
यांच्या बायका ‘ सवग ’ नावाचा पळोयाक करतात. त्या एक
लहान परकर नेसतात व एक लाव उत्तरच्य कमरेवरून
बी च्चारणें असतात तच्व कारणें हिंदुस्थानात नात लपनिण्यास
गुंडाछुन खांद्यावर घेतात.
लोकात प्रट्टत करतात.
लावतात.
द्दिठुसभानाच्या इतिहातामघ्ये ज्या मोठ्या परिणामकारळो
गोष्ठी झाल्या आणि ज्या ज्गत'प्च्या इनिहातांतद्दि महत्वाच्या
आहेत अशा गोष्टी म्हेठल्या म्हणने ब्राह्मणनातोंचो स्थापना,
व कपाळावर फार मोठी टिकली
या बायर्फाना यांच्या सयाणनि वरळीव मोकळीक
दिली आहे. जाद्म लरैक भालगुनार, काल्तकार, `शतांत
काम करणें वगैरे धंदे करतातवआपल्या येद्यात चांगले प्रवीण
असतात.
रानडुकर व मासे खाण्यास यास प्रतिवघ नाहीं.
तिन विभाग होणें, तिन इतर सर्वे सयानास सेस्कप्रपद्व करण्यावर प्रयत्न करणें आणि सर्वे आतडूचीं उत्पत्ति देण्याचा
प्रयत्न करणें व या तऱ्हेंच्या रवठपटोंनॉ सर्वं राष्ट्र'प्त एकर्वश’
हें जिंझोरँठया व सनाढ्या ब्राह्मणांच्या हातचीं ‘ कच्ची ’
रस्रोद्दे खावत्त. ब्राह्मण लोक यांच्या हातर्वे पाणी यातुपप्त्रां’
स'मवत्वाचौ कल्ग्ना उत्पन्न करणें या हेळोत. ब्राह्मणनातौऱ्बं
महेत्व कमी करण्याचे ते प्रयत्न झाल तेद्दि सप्यानिक ड्ति॰
कळी हें पूर्वी फार तूंप्र शिपाट्टे असत पण यांच्या मिं`वपणा-
टूळान पितात;
ड्रुत्तिका पांत्रांतून पळीत नाहीत. 'ह्ठर म्हणतो
रवठका नाद्म सउफा ’ अश’प् म्हृण पडला
हातांत निवाराहै होत. यांमध्ये नरेद्व, लेन, र्किगग्द्देत, ; बद्दल ‘ पत्ता
आहे. [रसेल व हिरालाल-कारट्त अँड ट्राइव्स इन सळो. पाँ.]
महानुभाव इत्यादि सेप्रदायांवी गणना करण्यात येईल.
जादू; या रता नि क.…णम्ड्रु या शब्दाची व्पुंत्या’हूंळो
या सप्रदायास याह्मणनातोंवै महत्त्व मोडण्याच्या रवठपटॉत ’
अपयश कर्वे काय आरें‘ञ् हें त्या त्या सप्रदायाच्या निघेवनांत
स्पष्ट कैसे; भाहे. अनेक गाता एकत्र करणारा राहू र्जी
ममूनमघुन जन्मास अग्लळो त्यांया इतिहास अचून शळोवला
'
यातु या शब्दापासून लावतात. झाराआस्ऱ्तरव अनुयाया ञ
मग त्याच्यापासून मँजिंक हा जाद्रुवावक इंग्नज्ञळो शब्द निघाला
आहे. ३. या. टॅलर हा नादूनिपयॉ असे लिहितो का, जादूला<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४१
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जादू महाराट्रीय ष्ठानकोंश ( ज) २९८ जाद्रु अतत्वियशास्त्र (आँकल्व् सायन्स) अगर ळिमथ्य[श[अ (खूडोंलायन्स ) असे नाव देतात. रानटी लळोकावळो चिन्हात्मक । यो यार्ने रोग सरे करणें हे सहान..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जादू
महाराट्रीय ष्ठानकोंश ( ज) २९८
जाद्रु
अतत्वियशास्त्र (आँकल्व् सायन्स) अगर ळिमथ्य[श[अ (खूडोंलायन्स ) असे नाव देतात.
रानटी
लळोकावळो
चिन्हात्मक
।
यो यार्ने रोग सरे करणें हे सहानुनृतिक ळिळाकत्सेवै तत्व
होते.
[’ आयीनार`[ग आणिमाहात जाद्रुविद्या
याच्याशी सबंध
असळेळे देव वरुण
षादू व नर्वीन युपांतोंल ञह्मग्म्द् या दोघांत्रो उत्पत्ति मिथ्या…
ज्ञानात असून, त्यांचा परिणाम अंघश्रद्वैप्रमणि अपायकप्रक | व रुद्र हे आहेत. त’[[पि त[नान्येकस्वन राक्षसांचा व पिशप्’
होतो. कांहीं पेळिडत म्हणतात कौ जादू व घमैं एकव.ज[दूवे ’[ च्बांचा त्या गोष्टींशी सेव'य आहे असे मानितात. अप्ति हा
सर्वे पिशावांचा नाशकनूळी आहे अशी समज आहे. म्हणून
सत्कार जरळोथर्मसल्कारासऽररये नसले तरळी त्ग्रंवळी सगति
एकसारखळीच असते. सर्वे र'नृह्करांच्या मार्गे एकच पौराणिक ' अप्रोला आहुति अपेंण करणें, सुगंघी वस्तू जाळणें व त्यांना
धूर येणें या गोष्ठी पिशप्चे व त्यांर्नो उत्पन्न केलेले र`[ग
कल्पना आहे आणि तळी कल्रना आत्म्यावळो होय. आत्म्या’
यातून कमश: ज्या पद्वतळी निघाल्या त्या देवपूवा, न[ढू, ‘ न[हृव्से करण्यास समथे आहेत असा प्राचीन ल`[क[च[ समज
होता. राक्षसपिशप्च्यांरेवरळीज्ञ अप्सरा व गंघवें मत्थेयाण्यांतां
निबाँववत्तुपूचा आणि देंवकनूजा या होत.
[
प्राथमिक पूना म्हृणबेंव जादू; त[ढूचळो कल्पना यम हें भुलवून व कशी पाडून त्यांना नाश करितात. सुगंधी वन…
अस्तित्वरॅत येण्याच्या पूर्वीचव् आहे. कायेकारणभाव‘वर रपतनूच्या त[हाण्यार्ने ह्या अप्सरांना व गधकाँना पळवून
जाड्रुडेंत् अस्तित्व बरेच
अवलंबुन
आहे.
ख्रित्नीं देशांतून
प्राथनाभाद्रात पाळावयाच सत्कार ज्या विशिष्ट देवून“!
उत्त्पन्न झाले तसल्याच
हेतुंनळो
मघ्यआँरट्रॅळियातळील
देवळे
निर्माण झ[ल”[॰क`[णळी देंवळांच्या कल्पनेस प्राथमिक यम
प्इणतात, तर कोणी या द्देवळांना ज्ञळादूंत ढकलताव.
‘ ठरलेल्या कारणांचा नेहेमी ठरलेला परिंणामच घडेल ’
असे शास्त्रज्ञ जाढूनारदेखील गृहीत घरळीत नाहीं. न[ढूनार
वहुंयाप् एखाद्या विशिष्ट शक्तळोचीं मदत घेऊन, आपला क[ये॰
भाग उरवग्त्तो. यालाच टेलरनें गूढशरिव म्हूंटत्ऱ्ऽ आहे.
लावितां येसे.
ज्याअर्थी [पेशाचे’ मनुष्यनातां'बें नैसर्गिक शत्रु आहेत
त्याअर्यो लहान भूल किंवा गमै याना त्याच्याकडून दुखापत
होण्याची फार भोति असते. म्हृणून
भाता व बालक
यांचे
दुष्ट पिश[च्च[प[ब्रून रक्षण करणारे पुष्कळ मम व विधी
×
५
.५
५,
॰
२.
आढळतात. चाक व उवरठा इ भुताच आवडत स्थान हाय.
` क्षुवर्णांचा जन्म अप्रोपऱड्रुन झालेला आहे, ह्या समनामुर्के
छुवणीलादेखाल मगलक’रक थमँ प्र८प्त झाले आहेत.
न[न समजल्याशिवाय मुतांना काहॉद्दि अपकार करितां
येत नाझीह्या हिंदु लळोफांच्या समनामुळें पहिल्यामुलार्वे न[व
[ या विपयाऱ्व तात्विक विवेचन बऱ्याच प्रेथद्वारँ करितां हें
गुप्त ठेवण्याची चाल आहे. शत्नांनों देंखव्ल पिश[च्च[न[
येहैंलमैंफॉं पुडोंल ग्रंथ प्रमुख होंतम्॰टॅलर॰रिंसर्वेस ड्बु टु दि
हात्रूम्न लावितां येते. ट्ट[ग[रिंक प्रेमप्क्सिय’व् मन आणि निधी
असे द्दित्ठरो ऑफ गनूकाट्टे’डट्वद्देव्हेंन्स-ड्न्टूरैडफ्शन टु दि
हु ज्यात आहेत असा स्त्रळोवशळोकरणाचा भाग भारतांयाच्या
द्दिद्टरळी मॉफ रिलिजन; लैग-मेविफ अँड रिलिजन, ]
न[द्गुविंयेत आढबूव्न येतो.
[हे दृल्था न[तळी ल चा दु [व द्या. …प्रळाव’ग्न हिंदृत्थानांतांढ
दुसऱ्या मनुष्याला ताब्यात आणण्याकारॅतां मेष व
पवित्र यामिक विपाँमघ्पें नाट्टवियेवा वराचता अंश आढळून
निघळोतांगितले आहेत. त्याचप्रमा'र्गे शत्रूत्व उन्मलन कर,
ण्याकळिरतां रानात वरावयावै [वघळो देखील आढळून येतात
आहे व धर्मांच्या हलक्या प्रतीच्या भ् सेणाच्या आकॄतावर काढू कलन त्या मदुष्याला ड्वा करतां
यैनळो निन्ठरणिझच्या मते न[द्रुविंद्या मूल यामिक [”वचाराच्या
अनेक स्वपांप्ट्टेकॉ एक
स्वप[प[स॰न तळी भिन्न नाहीं.
’ येते. त्याप्रमणि एखाद्या
सत्रे प्रकारचे मानसिक व शारीरिक राग [पतान् यांच्या
क्रुत्यांन’व् उत्पन्न होतात असा इतर देशांत ल्याप्रयागें हिंदु.
त्यानाता’हे स्थान आहे. म्द्रुणून र`[ग वरे कट्ण्याक्ररिवा
मेत्रांचा व मारलेल्या
वस्तूंवा उपयोग
करण्यात
येतो.
मनुष्याचंळो
नसे,
र्केस, अथवा
पायाखालचळी मानळो यावर वैटुक कलन त्या मनुष्याला
त्याये दुष्परिणाम भोगावयाला लानितां येतात अशांहिं
समबूत दृष्टीस पडते.
ज्यांना यळोगळो अशी सेज्ञा आहे. तो वर्ग घेदेवाईंक जाट्ट’
मत्राप्’गेवायावनल्पती व इरतत्पश ह्यांचाद्दि ररेगांपाशून गब्र`[व[ म्हृणतां येद्देल. आपणाला किमया अवगत आहे
मुक्त होण्याकरिता उपयोग केला जातो. हिंदुस्थानातील `असप् वहाणा करून हे भोळ्यालरेकापांढून बरान येता
मंत्रांचा सवात प्रावळोन सेप्रइ अयवेत्रद्ळात आदृळ्व येतो हें उपठतात. तसेच मांन्निकलरेकहेळोत.
(वेद्विद्या-अयवयेद् प्रकरण पहा ) ह्या मत्रांपरोवर बे विभो
विवाह, गभौरपण, बाळंतपण या कार्लो चाढूसरिखे विथळो
करावयाचे असतात ते द्खाल काहीं प्र चान ग्रंथांत आड,
काहीं बातऱ्तून करण्यात येतात. दुष्काळांत वाश्रर्फानों न[ग॰
ळून येतात. र`[`ग[न[ सजीव प्र[णा समहूंन त्याच व त्याच्या व्याव्ऱ जमीन न[गरलळो असतां चांगल पळोक येर्ते अशी जी
चिन्हाच केललैं वर्णन सुश्रुत वगैरे वद्यकग्रंथ'ळात आढक्रुन येत.
वनत्पतों व सन्रीव प्र'ण् यामध्ये राग उतरवून त`[ वर, करणें व
षाग्याच्या प्रवाह [वरावर ता काढून
टाकणें हा पद्वतांप्हे
`[[प्[[ढ‘<'ग्:त्`ग्[॰ सम्रानघर्मी वल्तेचा रोगांवर व्यापार घडवून त्या
कोठें कोठें समडूप्त असते तिचाच अव`शष
त्या’गंताल वळिजा, पक्की, कन्या वगैरे
प्रसंमाँ दृष्टीस पडतो.
आपल्यातील
चालळी न[ट्टा‘ऱ्देग्च्या
सदरात
दक्षिण हिदु’
नातोंतळोल
बऱ्याचशा
पडण्यातारख्या
निवाइ’
धार्मिक
आहेत.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४२
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जादू महाराष्ट्रप्य मानफॉंश, (ज) २१९ उदाहेरणार्थ, लप्रांताल प[ण[ भरण्याचा विधि, पुंसवनविथि, व[स्तुशां[ते,इत्या[दे. गळ्पऱ्रत त[ईंत, हातांत गद्रे, रुद्राक्ष नगरे जप्’दू न[दृविपयक वावि..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जादू
महाराष्ट्रप्य मानफॉंश, (ज) २१९
उदाहेरणार्थ, लप्रांताल प[ण[ भरण्याचा विधि, पुंसवनविथि,
व[स्तुशां[ते,इत्या[दे. गळ्पऱ्रत त[ईंत, हातांत गद्रे, रुद्राक्ष नगरे
जप्’दू
न[दृविपयक वाविलानळी प्रथांतून सांगितलेले संस्कार
प्र[थ्॰[नतन वर्णन क`लल्या विषयांशी सेलम असतात काही
घालण्याबाँ कारणें उघड आहेत. या वस्तू जाढूते मारलेल्या
प्रथांतन जादूची ट्टाति व प[ठ सांगितले आहेत.
असल्याने' वापरणाऱ्यालानायाहोत
न[दूच्या कियेताठो केव्हा केव्ऱ्[प्रवियांचा उपयोग
नाही
अशी
समनृत
असते. कांहीं काढून? गणिता कळोडॉ असतात; त्यांताल
उमी, आडवा, तिरपी तेराज कांहीं ठराविक असते. हा कोंडॉ
गुणकारक असतात असे मानण्यात येते. कांहीं स्तळोत्रांतद्दि
विरोप शक्ति असते अशी समबूत आहे. लहाहैंच्या वेळीं
शिवकवच, इनमानकवच इत्यादि लहान स्तोत्रे कागदावर
[लढून ते कागद त[ईंतांत घ'लन देहांत बांधण्याचा वहिवाट
पेंशवाईंताहृ असल्यार्वे आढळते. सर्प वयेरेवराल मन्न, हूंठ
जाढूगप्र
करीत.
या प्रतिमा आवूव्न रँ[गनाश होतो अशी भावना असते.
त[ढूच्या प्रसथी वापरल्या जाणाऱ्या वस्तू पुष्कळ असत.
काही प्र'सगळो न[दुयार पाण्यार्ने मरलेर्के मडर्फे वापरात असत.
तसेच क[इ"[ प्रसगॉ मातांवळी प्रतिमा पछाडं`लल्या माणसाच्या
शरळीरावर निटकबून नंतर तो काढून घ्यावयार्वां असे. म्हणजे
राज्याचा राग प्रत्यक्ष वस्तच्या कपानें बाहेर काढला
जातो असा त्यांचा समजूत झालला असे. वानिलाना न[ढूवै
मारणें इत्यादि प्रकार बे आज आपणांस एऱ्क्रू येतात ते अवसेष फारसे उरलेले [’देसत नाहीत. [ थेंठिंपसन-सेप्सन[ढूवैच अवशेष आहेत. सर्वांची पूजा, देंवक वसविणें, ` [टेक में’जिंक: किंग…बाविलळोनियन मणिक अँड से’खिंरळो;
माट्टाकापूना, चौसप्ट योगीनळो अथवा वावनवळीर यांची पूना हे माठ्यासेरा-अरेयाइक द्द्र्ट्सन्टेशन टेवस्ठ फॉन निप्पुर]
हैं।चि“।प्श न व चा दू. ……बेव्हा निबाँव वस्त अवज्ञा
सर्वे पिशाच्वपूजेंवै अथवा न[दृब्रॅच अवतेप आन आपणांत
करतात,
आणि
सज्ञीव प्र[णा विनतांचा अनादर
उरले आहेत. ज्याच्या अस॰! हें मत्रतामथ्‘पँ आहे त्यास
करतात अशा
फार कडक निर्मेंघ पाळावे लागतात अशी समलूत आहे.
प्रसेगीं ड्नियिशयन लाक आपले हेतू
उदाहेरणार्थं, सपाँचा मंत्र जाणणाराते पडवळींचळो भाजळो साध्य कलन घेण्याताठळो नाढूवै प्रयोग करीत. यासच ते
खातां कामा नये; रजस्वला स्त्रळीचा शब्द विद्देळापत: `जवतांना- हाक म्ग्णत. घम म्हृणन फांहा [नराळो भावना हँष्णिग्लियनांत
ऐकू नये;दू.लहान मुलाच्या अगर वाळेतपणात मृदूझालेझ्या ` नसुन जें क[हे’॰[ आहे ते हाक आहे अशी त्यांबी कल्पना असे.
हुठ]: देव आणि मृत पितर उप्र स्वसपाचे असतात अशळो
स्त्रनृच्याकवटोच्या ठिकाणी अड्रुत स[मथ्य असत अशा
तऱ्हेच्याअतेंक म्रामक समजुती आज आपणांत
[’द्देसतात. न[ढूचा मेन्न वहुयां प्रइर्णात पाठ
प्रचलित
करतात.
ज्ञ दूवा प्रयोग करण्यात कखीखा रान्न, विसेपत: अमावास्या
फार योग्य समजतात.
जादूना प्रयोग मतरहैग्रँले पप्णळो
किंवा उडदाताररर्वेभान्य फेकून, किंवा मतरलेला विहा
अगर एखाद्ळो वस्तु खावयास देऊन,
किंवा
कांहीं विशिष्ट
आकृति ओलांडल्यापुळें लऽगु होतो अशी समत्रूरत आहे.
कानफाटे, अघोरी व इतर यैरागळो ततेव न[झ अथवा
मुले
व ज्ञगणाऱ्या बिया वेटुक करता‘र अशी तातेत्रिक समजुन
दिसते. [ वेद्ग्रंय; ज्ञानकोश विभाग २ ; द्दिकेहांठ-रित्रुअल
लिय्रँचर;
मेंयडॅतिल्ड-बेंदिक
मायथोलौच्ची;
ए. [रे, ए
मणी…रु मेंरऱ्".क वरचा लेख, थस्टँन-कास्टुस अड ट्राईंव्स
आफ सदन इंडिया; सेयेच्ड बुकक्स ऑफ
[दे ईस्ट, पु. ४२:
इं. अ., पु. २८; एट्रॅगंयाफिकल सव्हें आफ
रियोटँ’ळु]
यावे; सेन्सस
अ छु रळो-वा वि लो नळी ज[ दू.-…ज[दूवरळील वाविलोनळो
ग्रंथांचा मुख्य उद्देश म्हृढला म्हणते घमौघिकाऱ्यांकाँ
भुवा दैवतांवर त[वा र[’[`खत[ यावा व त्यांच्या दुष्ट
शक्तींस बळी पडलेल्या प्र[ण्याल[ त[चाबेतां यावे. ज्या
आनन्याला सुतानॅ पछाडऱ्य् असेल त्या मुतावा न[मनिदेंश
करावा लागतो. असल्या प्रसगळो ज[दुग[र पुष्कळ भुतांचौ
राक्षसांचीं न[ते घेऊन त्यांना आव्हान करतो. अशर प्रसगो
त्यांवळो समजूत असे.
तेव्हा त्यांच्याशी करावयावै व्यवहार
थोड्याफार प्रमाणात हेफिच्या स्वरूपाचे असत.
ईंबिन्सियन लॉफांवळी हृळीकचळो कल्पना र्दाव मुख्य कसळोढळी
मानून चालल्यास धर्मविषयक कल्पवैला जागाच उरत नाही,
कारण ते काहीं घमेंविपयक म्हणून मानावयाचें त्यांचा अस॰
भीव वहुतेक द्द’ळार्केतव होतो.
ईंजिंप्तळी जादूचे कार्णक्षेन्न माणसांच्या
मळोठें होते व ज्या इच्छा सहृचासहृज्ञळो
इच्छाक्षेन्नाड्तर्के
ताघ्य
करून
घेतां
येत न[इव्त, त्या ज्[[दृच्या ताहाय्यार्में हेस्तगत करतां येतात,
अशी द्द्निळिप्शयन ल`[क[चीं समड्रुव्त असे. सेरक्षक, रोगक्विप्रक, इन्छापूरक नगरे प्रकार या ज[॰ढूस असत.
ईंनि’प्रैशयन लोकात बांगला न[ढू व दुष्ट जादू असले
येद्र् आढळत नाहीत; तरी पण न[ढूचा दुष्ट उपयोग कर-
णाऱ्यास कायद्याच्या कात्रीत पकडले जाई. यार्वे पुन्हा दोन
प्रकार आहेत. प्रत्यक्ष अ[[ण अप्रत्यक्ष प्रत्यक्ष जाढू|कये`
स[ठ“[ उपयागांत अ[[णल्य[ जाणाऱ्या वस्लुंत सेप, दगड, धातू
र'ग इत्यादि येतात; तसेच मेण,
निकणयाता यांनाद्दि उप-
योग कला ज्ञात असे. अप्रत्यक्ष जादू म्दृणसे जादृयाराला
काहीं विशिष्ट नियप्रांच वमन पाळाव लागे; पुष्कळ जादूचे
मन्न फार उपयुक्त वप्ठल्यान हैंजि’ळिप्शयन लोकांना या णट्रेदृ
मंत्रांचा तेद्मकाकडें उपयोग करण्याचा परिप’ठ पाडला.
थोथ हा ईंजिप्तमर्धाल फार
प्रसिद्ध
जादूगार
मानला
आव्हान करावयाच्या वाविलानळो भुनारेवतांचळो यादॉ उप- गेला आहे. थें‘ग्थच्या जाढूयार’व्तळोल कसवावरळोवरच चित्रलव्य झालेली आहे.
` तिपिंशांस्त्र, खगॉलशाअ व गणितशात्नांवा शौघक असे ,<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४३
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जावू महाराट्रीय न[नकळोश (ज ), २२० जप्ढ’ळू त्यासे वर्णन आढळत. हासस हा प्रसिद्ध जादृगव्रोण अस॰ जाढूवर जास्त पडली. त्याचा उल्लेख आहे तसेच होरस हा इसिसचा मुलगा व एक त्रूरा‘मे जादू व ज..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जावू
महाराट्रीय न[नकळोश (ज ), २२०
जप्ढ’ळू
त्यासे वर्णन आढळत. हासस हा प्रसिद्ध जादृगव्रोण अस॰
जाढूवर जास्त पडली.
त्याचा उल्लेख आहे तसेच होरस हा इसिसचा मुलगा व एक
त्रूरा‘मे जादू व जाढूगार या सेबेघी फार प्रसिद्ध होती.
प्रसिद्र् ड्क्सिव्शयन
ह ठ[ [ले य न जा द्रु.…-र`[ममघ’[ल ‘ टेल्व्हे टेवत्’स’चा
कायदा हाच जाढूच्या अस्तित्वाचा मुख्य पुरावा समजला
जातो. या कायद्याने एखाद्याच्या सेतांतील पळीक जाढूर्ते
"
^
"
जादूगार
मानला आहे. [ वन…
ईंर्णिप्’शयन मेंळिनक‘, ताईंस-दि [रलिजन्स आफ एल्शठ ईंनिप्त
अँड चाविलळोनिया. ]
प्रांक व रोमन जाढू.-प्रीस व’ रोममध्ये इतर ठिकाणां'
प्रमाणें, जादूवर सामान्य माणसण्चा देखील विश्वास असे,
जादूच्या सिद्धांतास आणि [’केयऱळिवषयक वाङ्मयात प्र[र॰म
होमरच्या वेठेयातून झाला.
अरिंस्टोंफेनौस काळांत थेसलळीचळी
आपल्या सेतांत नेण्याची बंदी केला आहे.
त्या काळांत
अशी समडूळात होतो कळी बेठफिर्णीचा एक सेन सेतांतील सर्वे
प^[क काढून आकाशयानात भलन ‘ मगळोविया ’ म्हेपूवुन नाव
ठरले अस॰
असलेल्या प्रदेशांत येत असे. असल्या कुंत्यास बंदी करणें
कायद्याते भाग पाडले.
ल्यार्ते तो धर्म व जे प[ख[डॉ देवतापूनन तो जादू असा
ज्याप्रमार्ण प्रांत देश जाढूच्या वावर्तीत थेसलौवर अव-
निर्णय [देला जात असे. म्हणले प्रळीफो-रॉमन घमाँव्यतिरिंक्त
लबून होता, त्याचप्रमाणें इठलोते श्ट्रारियाकडे आपले गुल्त्व
त्रीस व रॉममघील देवतानूनन शिष्टसमत
धर्म जाढूच्या स्वस्वयावे ठरतात.
सत्रे कालात जादूला
सम[ज[त ते वाद्देठ स्थान प्राप्त झालेत्यार्वे कारण वर केलेली
प्र[क॰रे[मन कसळोटींच कारण झाली.
जावू ब्ळोरकायदेशळीर
अविश्वतनळीय व अनीतिमान ठरलळो जात असे. जेंव्हा ख्रिस्गळो
घमौवा प्रसार प्रांत व रोममध्ये आला, तेव्हा तर हे स्पष्टच
ठरले फी ख्रिस्त"! घमें तेवढा शिष्टतमत व इतर 'वमँ याखडळी
म्इणतै जादूच्या स्वकपव्व.
त.ढूच्या उत्पत्तन्विषयळी ष्ठांनळोसे
असे मत आहे की येट्ग्काच्या कालप्नतेवरच जाढूस सुरुवात
आली, व जाढूच्या न[ढळोच कारण [तशी झालेले घमै
व ज्योतिष यांचे मिश्रण होय. अद्याच तऱ्हेनै [कमयाशाअ
व भनिध्यकथन याच्या निश्रणानॅ जाढूवीं प्रगा’ते आलों.
प्रळोक देतकथेंतौल जादृगार'प्त, तेलनिनळोस, र्दावतलळी,
कुरटेस आणि कव्स्वितेस प्रमुख गणले
आहेत.
पहिले
तळीन जादूगार प्रीसचें रा’हेवाशी अलून त्यांचे अस्तित्व हेलेनिक
फालापूवळि'व
असल्याचा दाखला आहे.
हे जादूगार देवांचे
सेवक मानले जात, ड्तकँच नव्हे तर
त्यांवळो पूना देखील
केली जाट्टे.
ड्तर्के अलून देखील त्यांना जादूगार ठरविले
आहे. ग्रीक पुराणातील प्रसिद्ध जादूगार प्रोमेळिथ्'यअस,
अगणिद्स, येळांपस, अळोतोते, पँसिफौ, सरस[,अ[णि मळोडिआ
होत.
या सर्वीत सरता आणि मळोडिआ या प्रमुख मानल्या
आहेत.
प्रळीक जाढूच्या पद्धतळीचा वैद्यकाशी फार निकट संबंध
आहे.
रामचळो जाढू वराच कहेंलपर्येत विदेशी घर्मोनो
भीक जादू, अगर नुसताच रोमन जादू आपणास आढळत
नसून प्रळीकळो~रकुंमनसेवपळो उदृडूखच अणिक आढळतात. हूंठ-
लींत जादृवराल ग्रंथांचा वाढ,, विईंळि’पकसन तत्ववैत्त्यफिडून
झाला.
आगस्ठसच्या काळांत रोम शहृरीं यारा निरनिराळ्या
मतांच्या जाढूयारांनों वस्तो केला होतो,: त्यांत आ‘ते हान
द्जरँच्या तागापाछून उच्च द्जळीवै खाल्डिंअन जादूगार असत.
आगस्टसच्या काळापूर्वी त[न शतकायानृप्न यामिक चळवळीची
लाठ तारखी चढतच होती.
याच काळांत ड्टलात व सत्रे
यूरोपमर जाढूचळो फार अपाठयानॅ वाढ आलो.
यूरळोपमध्यें मध्यबुगांत जादू व वैटकावरळोल विश्वास वराच
वाढलेला दिसतो. एखाद्या रँवड्यांत नळी सर्वांत बुद्ध स्त्रळी
असेल तो वैढकळो अतावयार्चाच अशी समत्रूरत असे. मनु…वरळील यातले, लढाया वगैरे वैठफौ खियाच उत्त्पन्न करतात
अशहु समडूऱत असे व त्यामुळे अशा सार्वजनिक आपत्तीच्या
प्रसथी वृद्ध स्नियावै जीवित
विद्देळाप धोक्यात असे; कारण
त्यांस वेउकों समजुन ताबडतोब जींवत जाळण्यांत येत असे.
जाढूचळो
जान ऑफ अ[क॰ या क्रूर बांला इंप्रगांनॉ नेटकी य्हाटूळान
जाळल्यार्चे उदाइरण इतिहासप्रसिद्वच आहे. [एन्स[यक्क॰`[.
ए. रिं. ए. मधील किर्वी क्केळीवर स्मिथचा ‘मॅजिक’ ( प्रळोक अड
रामन ) हा लेख विस्ट्टात असुन त्यांत या विभागावराल
सद्मैप्रेथ आढळताल. ]
न्नणविरळोपणऱ्
३ रा णळो जा ढू.-…यठ’र व जादू" यांच्या मिंध्रणाये प्रमाण
सरस’नि आपले नळी मनुष्यरूप करण्याताठळो लेपांचा
उपयोग केला होता. फांहेळो विशिष्ट पेय देण्याचग’हे प्रयात
दिसतो. पेय याहून प्रेम उत्पन्न करणें हा पद्धत फार
प्र[च[न कालापासून माहीत असल्यार्वे दिसते.
क[ड^[ हे एक प्रसिद्ध सळाघन सर्वेश्रुत आहेच.
दिले होते
विचलित आला खरा, पण तो स्थिति दुसऱ्या घ्यूंनिक युद्वनि
निवळलळो. पण रोमच्या जादूचे मुख्य पुरस्कर्ते कवी होते,
व हे कवळो विरोंपेंकरून प्रळोक देतक'यांचा अनुवाद करीत;
याचा परिणाम असा झाला कीं केटोच्या काळानंतर नुसतळो
कला हे एक जादूचे अग समजले जाते. मृतांनां तोलाविणें,
वशळोकरण मन्न, इत्यादि मोष्टळी जाढूच्या पद्वतव्त त[मौल
करतां येतील.
प्रांत व रॉन यांत’प्ल जाढूवर करेलचिंस, ईंजिप्त, येसलळो
आणि आयतुंलड या देशांतळोल जावुविटोंचा परिणाम
झाल्यार्वे दिसते. या सव'न्त येसळीचळो (छाया प्रांकळो’रामेन
मझ्दाच्या
थर्मोत विद्देप्प
दृष्टळोत्पत्तोस येते. भाषांतून
फक्त आहुरमझ्दालाच ईश्वर भानि’ल आहे; आणि
तत्कालान अस्तित्वात असलेली हान द्र्जाच? धार्मिक मते,
व जादृवै सस्कार यांच्यार्णो स्पष्ट विरोप दाखविला आहे.
गाथानैतरच्या
अवेस्तांतांल
घमैंय'यांठून
चठळिकणीं य[न[ जरळी काम दिले असले तरी,
जादूगार
व
झोरोआस्ठरते<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४४
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रयि यानफॉंश ( ज ) २२१ जादू जादूगार व चेंटफिर्णांसर्वपाँ बे सत्कार उक्केरिवले जांदू होते. ’ लैलेयूरोंपव अमेरिका यांत देखील वैटाकैणळो जाळण्याचो त्यांचा समावेश वराल प्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रयि यानफॉंश ( ज ) २२१
जादू
जादूगार व चेंटफिर्णांसर्वपाँ बे सत्कार उक्केरिवले
जांदू
होते. ’ लैलेयूरोंपव अमेरिका यांत देखील वैटाकैणळो जाळण्याचो
त्यांचा समावेश वराल प्रेथांठून केलेला आढळतो. या बुं साथ असल्यार्वे द्र्प्‘तेहासांत नमूद आहे. [ ग्रॅट-रिळिणिअस
[मेळाफाचप् परिणाम म्हणजेच झोररैआस्टरटेंया धर्मातील ‘ स्मिईंटेम ऑफ चायना; लेमों-त्रायनॉन क्कासिफ्प्त; डेंन्नऱसद्वैतवाद् होय.
फौकलोंअर ऑफ चायना. ]
सद्रुण विरुद्ध द्रुर्गुण यांच्या लढाईत ज्या किया घडत, रॅ का या नळो जा दू.…नप।नी लव्क'प्र्ताल जादूचे शास्त्र व
त्या किया आणि जादू यांच्यातील फरक लक्षांत घेतां असे हु त्यावरळोल वाङ्मय द्तकँ विस्तृत आहे की, त्यासबैयार्ने
प्’देछून येईल कळी जादृच्या योगाने प्रप्प्त होंणारॉ ऐहिक ढं त्रिस्तुतपर्णे विचार करणें देखील अशक्य आहे. या शास्नावै
सुखें बैद् पडावयार्ची; कारण
मझ्द्प्वॉ
बहुतेक
यामिक
भाग आणि विभाग पाडून याला
इतका
त्ळूक्ष्'मता आणली
कृत्ये उच्च व पवित्र स्वसपप्र्ची असल्याने त्यापासून निष्पन्न ` आहे कळी, त्यासबंयानें नुसती चू।‘वें देण्यास एक लहानसा
हांणाराप्रप्प्ति जास्त शाश्वत असे… सकल आणि ट्टर्दुप्णाचीं प्रेथ लिहावा लागेल.
कळे अशुद्ध असणार आणि त्यांचा न[ऱ्त व्होवयाचाब.
एंजिशिकळो पुस्तकांत जो जाढूवप् पहिला विधि दिलाआहे
`
"
अशा तऱ्द्देवै या सप्रदायावै मत आहे.
वि नळी जा ढू.-चिनळो वाङ्मयात जादूवळो मीमांसा व
विधि यावे वण्ळीन विस्तरार्ने आढळते. कन्फ्युशिंयतच्या
त्यार्चे नांव
“ तळोशी नळोहो नो पुल्सरळी” असें आहे;
या
विधींत जादूमय देवतद्वेजा उक्केख आला आहे. हा विधि
पेरणींच्या सुमारास करतात. त्यायोगानें चांगले पांक येते
काळापूर्वी जादूगाराया द्नळो समानांत मोठा होता. रानद्र~ ऱ् असा समन आहे.
यारात त्यांकडे काहाँ धार्मिक कृत्ये करण्यावे अधिकार दिले
या बियाँत अर्पण करण्याच्या वस्दूंप्’त ग्रुप्र अश्व. श्वेत वराह
अधुन
आणि पांढरा कोंबडा हो आहेत. आणखी एका विंपांचँ गांव
जाढूच्या कल्पना पुढें ताओं सप्रद्प्याच्या लोकांनी आप’
आहे, व त्याचा अर्थ:-…“ श्डक्षुमो देशांतील प्रमुखास उत्तम
देव ( नशीब ) प्रम्प्त होण्यावै शब्द ’ ( मंत्र ,) असा आहे.
या सर्वे विर्धांनां एकेकाळी कांहो अर्थ असल. परंतु हे
होते आणि
सार्वजनिक
उत्सवप्रतंगॉ
गुमकथन
व
निवप्रण्यावें काम सळोपावेलैं होते.
“ ड्ङक्षुमळो नो कुनळो नळो मियाफी नळो काढू योपोटा ”
ल्यास सामळील कलन घेतल्या. चीन देशांत
स्वतंत्र नृत्तांवै
जाढूगारा‘हे पुष्कळ आहेत. ह्या स्वतंत्र वर्गात चिनी समानांत
कळोठेंव स्यान नव्हते व त्यांचा
धंदा तर बिनहृरकत चाले,
म्हणुन जाढूविस्द्व कडक कायदे अस्तित्वांत आ`ल असावेत.
प्राचीन काळीं अनपेणाच्या काळांत एक क्रुरूप मनुष्य
व एक सेटकाण
जिवंत जाळण्याचो पद्धत होती. या कत्यार्ते
स्वर्गीय देवतांनां साहृजिंक दु:ख होणारच. व ह्या देवता त्या
अर्ले
विघळी सहोटुर्दुग्ळितकपद्वत्ति अथवा समळिर्वाकत्सा या .नृत्नग्पासून उत्पन्न झाल अतेंब अनुमान काढर्णे माग पडते ( व
टॅब तत्त्व अगदॉ
पुराण
स्थितीतील
मनुष्यांनीं
अमलात
आणले होते ). यावरून असें दिसून येते की, प्राचीन शिंतो
घमब्रूज्ञपप्नो मर्मो)त जादूवा बराच अंश होता व असें
दुदेंवळी प्राण्यांवर द्या द्ळाखविंणार म्हणजेच वषीव करून अनुमान काढण्यास जुन्या ग्रंथांचा उत्तम आधार आहे.
त्या दुभोगळो प्राण्यांच्या दु:ख[र्वे परिमार्जान करणार; तीन `
या घर्मोतांल विंर्धाचें मूलस्वखप जाढूमय आहे,
फलदायी परिणाम वैटळिकणीच्या नळीव'त जाळण्यार्ते अगर
ज्या देवतांस
उद्देद्रुळान हे विंथॉ आवरिले जात असत,
उन्हांत उघर्डे बसाबेपयानॅ होणार अर्ने मानण्यात येहै.
त्या देवता नदूच्या आहेत व त्या विर्थाचे सस्कषंत जादूचे
चींनमथळील सावश्रिक उत्सवप्वे हेतु [’नऱ्सशय जादूच्या पुरळोदिंत आहेत. जपानच्या राष्ट्रळोय मर्मंत्म्यण् सस्कृतच्च्या
स्वरुपाचे आङप्ठतळोल. म्हृणबे उत्सव करण्यानें अवपँण, मुळाशी जादू आहे. वमौया ॰तुलन।त्मक दृष्टांर्ने अम्यास
रोगराहै आणि दुदेव यांवै निराकरण, उत्तम पळोकपप्ण्याचैप् करणारास वराल तत्त्व त्या वमात प्नाथत झालल दिसेल.
सळोय आणि सुदेवप्राप्ति लामणार हो कल्पना होती. चिंनळो
॰ आ र यळो व मु पु ल मा जा.…क्रुराणांत जादूसबेघी पुष्कळ
क्रुटुंबांतील रळोनच्या आचरणात देखील जादूच्या वल्ग्नप् माहिती आलों आहे. ‘.म्सेहूंर’ ( जादू ) प्रथमत: हालत ब
वावरत असल्यार्चे द्दिमून येदेल. दारावर विवक्षित दिवशां माखत या दोन देवढूतांन’ळा कळले, ब त्यांनों तें मानवी
विवक्षित र`|पें लटकविंलैलाँ आदृळतील; लहान मुलाच्या
प्रप्ण्यांनां शिकविंल. प्तिहूंरचा परिणाम अंतबाँत्य होत असाक्त्
थैड्यांतून लाल दोरा बांधलेला दिसेल; या माँष्टांर्ये मूल जादृ॰ असें कुराणांत स्पष्ट नमूद् वेर्लिंल दिसत नाही. तरी दोन्ही
विषयक कल्पनांत आहे.
तऱ्हेवै परिणाम होत असावेत असा टोकाफांरांवा समज
चीन देशांतील जाढूगारांर्वे गिऱ्हाट्रेक गरळोब ननता नबून
थोर लोक असत. यावरुन पाइत'प् जन्ढूवरळोल श्रद्धा निव्वळ
, आहे.
मुड्रुलमान’ण्च्यादेतकयांयाजोसेप्रइ
कैरो
येथे
केला
गरीब लव्र्फातव होती अस॰ दिसत जाहाँ. दुष्ट जाढूस‘व'थॉ , आहे त्यावरून नो पुरावप् निघतो, तळो असाऱ्-मुटुलमानांनळो
मांत्रु रावांनी केलेले कडक कायदे सवश्रुत आहेत, तथापि दृष्टळोवर, सप‘प्च्या वियावर आणि सामान्यरॅप्गावर मन
ग्निनठेंतील जाढूविषयक कडक कायद्याखालाँ एकळिइ जादू' अथव! जादूवा इलाज कबूल कला आहे. कुराणातील असल्या
गार जिवंत मारला गेला न[हो. सतराव्या शतकातील सुधार-
मत्राचा प्रयळोग करणारा
रेंप्स्थांकडून द्रव्य घेतो व त्या<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जांदूचा कर्नाल मद्द्ग्राट्रीय मप्नफौरा. ( ज ) १२२ द्र्व्याचा कांहीं अंश घसेसैस्यापकाला द्यावा लागतो. रुपया हेंतें मन्न होत. [ कुराण; अरोबेपन नप्ईंढूस; लेन…मँनसे टँग्ड कस्ढम्स ऑफ..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जांदूचा कर्नाल
मद्द्ग्राट्रीय मप्नफौरा. ( ज ) १२२
द्र्व्याचा कांहीं अंश घसेसैस्यापकाला द्यावा लागतो. रुपया
हेंतें मन्न होत. [ कुराण; अरोबेपन नप्ईंढूस; लेन…मँनसे
टँग्ड कस्ढम्स ऑफ दि माँडनॅ ईंजिंळिप्शयन्स ].
ज्ञादूचा कंदौल' (में ळिजक लेन्हुंऽनेशू-र्दुईं येन्न इ.सयूभ् ६. ४६
च्या सुमारास कबर नासाच्या जम'नप्न शग्घून काडल असा
तज्ज्ञाचा समज आहे. या पूबाँ’प्’हैं काहीं काळ लोकांना हे
यत्र अत्'यत
याया’मेक
अवस्थेत
असा अंदाज आहे. जुन्या काळी
असलेले
माहीत
असावे
जादूगार लळोक पिशांचें
दाखविण्यात या कादेलाचा पुष्कळ्दां उपयोग करीत. अला'
कडे या कादेलात पुष्कळ सुधारणा झाल्या आहेत. वस्तूंचे
फोटो घेऊन त्यापासुन काया ( स्लाइड्रस ) तयार करण्यात
येऊं लागल्या आहेत. यामुळे होतानें रंगयून काचा (स्लाइ॰
डूंस) तयार करण्याचे श्रम कांबळे आहेत व फौटोंच्या योगार्ते
कामद्दि सुबक होतेखूक्ष्मद्ईंमक यत्रांहूंन दिसणारे देखावे फोटो
जप्घष
टुसऱ्या एका र्भिगांतून (लेन्समघुन) जाऊन पडद्यावर पडती.
यायोन्ळा पडद्यावर चित्रे दितूं लागतात. याद्रुसऱ्या भिगाच्या
( लेन्सच्या) योगार्ने चित्र मोठें होऊन पडद्यावर पडते.
जाधव, मा ळे या व क र.…र्हे घरानृप् घनागी
याच्या एका मुलापाहूंन निचार्के. घनाजळीला दोन
जाव'
चायका
होत्या. एकाचा मुलगा सताजी व द्रुसरनृचे चेद्र्सेन व तेमुसिग. मनाजळीनेतर चेद्र्सेंनास श’ढूर्ने सेनप्पा’ते करून तेमुसिंगास त्याबळी मुतालकळी दिला. पुढे वद्वासेन उघडपणें
शत्रुस मिळाल्यावखन फांहो दिवस
शत्रूकडें होती. परंतु या
शेभुळिइ त्याच्या बरोबरच
दोघांत वितुष्ट येऊन
शप्हूंछन्नपतांकडे आला. त्याने त्याचा
मान
शभु द!
करून त्यास
सभाबांवरळील एका स्वर्गात प्रतिनिर्यांबररेंवर पाठविले. तेथे
त्यान’ उत्तम कामगिरळी केला
जजिऱ्यावरळील
एका स्वप्रळोत
प्रतिनिघोबरकुबर शनृस पाठविले होते. नंतर शप्हूंर्ने त्याला
प्राफॉंन्ळा घेऊन पडद्यावर दाखवितां येतात. बुक्ष्मदशक यैत्रां’
मालेगावहँड्नाम
वून एकाच नळी फार थोड्या लोकांस जी गोष्ट पहाता येते
तीच गोष्ट पडद्यावर दाखवून एकाच वेळा मोठया जनतमूहोस
हो गांव या घराण्याकडे चालत आहे. कनोटकच्या १७३९
समजाऊन
त्याचा मुलगा अमरसिंग यातें माळेंगाचास राहून दोलतांचा
सांगतां येते.
या रँद्धर्तानें पदोर्थेविज्ञानशांस्त्र,
रसायनशास्त्र, प्राणिशाल, वनस्पव्सेशग्ख,भुस्तरश।ख, जनु’
शास्त्र इ. इ. अनेक शम्त्नांतील मद्द-टुंत्त्नावै प्रयोग र्किया सूड-
प्रमेये उघड कलन सांगती येतात. चलचिर्धे ( सिनेमा ) दो
जाढूच्या कंद्दिलार्चाच एक मुयारलेलळो आनृत्ति आहे.
क दि ला चळो ज्यो स.…या का‘देलात तीच प्रकाश उत्पन्न
करावा लागतो. त्याकरितां राट्टेध्ल्द्रतल किंवा वनस्पति जन्म
तेल पूर्वी फार करून वापरात असत.
परंतु यावा
उबेंड वेताचा असतो.
राकेलच्या शैजारळी शेजारळो येतील
अशी दोन तीन ज्योती असल्या-स त्याचा बराच उजेड
पडतळो. आक्सिहाट्रोजनच्या ज्यातील खडूचा तुकडा ठेविल्यास खडू अति तप्त होऊन त्या योगानॅ देदीप्यमान प्रकाश
कलन
दिले
(स. १७३२ ). अद्यापि
तील स्वप्रव्ती’हे हा इतर होता. हा स. १७६० व
कारभार केला. याते कवि मोरोपंत परप्डकरास
बरोबर काशीयान्नैस नेले होते. हा १८१७ व मरण
त्याचा मुलगा रत्नसिइ हा १८७६ त मेल्यावर
ट्टेप्रजळीत २॰ हजारावे उत्पन्न होते ) त्याचा पुत्र
हो जहागिरळोवर आला. तो १८७८ त चारला.
त्याने दत्तक चिरंजीव शभुसिइ देद्दलळो विद्यमान
नेल्यासृट्
आपल्या
पावला.
( याला
अमरसिंह
त्यानंतर
जहागिर॰
दोर आहेत. [ द्ळवळो-मराठो कैफियती; चाड-कैफियती ].
चा घो लो क र.…हें घराणें पिलाजी जाघवग्च्या बशबांर्चे
होय. पिंलाजच्स थोरल्या शण्छूनॅ पुणे प्रांती मौजें दिवे व
नांदेड या गांवीं जहागीर इनाम दिले; पुढें कन्नड, फुलयारळी
बट्टेरि अवर'गाचाद् प्रांतांताहे जहागीर मिळाली द्माजॉ थोरा‘
पडती. याला इंप्रनॉत “ लाड्मलाइठ ” अशी सजा आहे.
लाड्मलाहृव्चा पुष्कळ दिव्यात उपयोग केलेला आढळतो.
साच्या हातून चाळाजळी त्रिश्वनायास याने' सोडवून आणिहेंऽ. हो
ईंथरचा
उपयोग करीत न[होत. प'रतु नस्टॅ याच्या विद्रुग्द्दळोपाचा उप-
नेंद्दि याला गळोहैंठगांब, मरकळ वगैरे गांव ड्नाम दिले. छन्न॰
सालच्या वॅळ’प् नाजळीरानाबरो’बर याते मदत केल्यामुळे याला
सागरप्रठेंती पाव गांव इनाम मिळाले. वसहैंवै मोहिमेत काम गिरी
योग का‘र`तात. कावैनच्या दोन _;द्दप्ळा'लाकँतून जड्रेरदार विद्युत्प्रवप्इ पाठविंल्यास अत्यंत तेजस्वी प्रकाश पडतो. या प्रका‘
बजावत्’यामें तेथी’हैं याला फांहो इनाम मिळाले. नानासाट्रेक्
पॅशबें याला काका म्हृणत. पेशव्यांचा व या घराण्याचा
श|स दंप्रर्जीत “ आवहुंलाईंढ ” अशी सद्या आहे. या आई
लाइट्रचाच बहुतेक ठिकाणी ( शक्य असल्यास ) उपयोग
घरोबप् विद्देप्प होता. फौज व जातसर’जाम, स. १७१८ च्या
सुमारास चाघरेंली वगैरे गावांचा दौड लक्षाचा प्रथम मिळाला.
मुद्दे उपयोग का’र'तात.
विजेच्या दिव्याफैक“!
काबँन किंवा ष्ठाटिनमवे तेतू असलेल्या
दिव्याचा
बहुधा
पेशव्यांच्या बरोबर पुष्कळ मोंप्द्देगांत इतर
असे.
निजामा-
करितात. या का‘देलातील भिंगाचळो ( लेन्सवीं ) रचना सोंईं-
यास उत्तरा‘हँदुस्थानांतील मद्दालठेंचें उत्पन्न लाखाचँ होते. एकुण
प्रमाण निरनिराळ्या तऱ्हेचीं असते; एक मोंठें भिम (लेन्स)
फी`जस व जातीस अडळोच लक्षांचा सरंजाम होता. पिलागीस
ज्योतीपालून काहीं अतरावर ठेंनितैले असते. ह्मार्वे “ र्केन्द्रां-
सउनाजळो म्हणून पुत्र होता. त्याला सुमानजी व जळोत्याजळी
या नावाचे दोन पुत्र होते. जरेंत्यप्जींचा वेश चाडोंस
हेयात आहे. युभानजळोचा वेश वप्घोलळोस नठेंद्तौ.
त्याला समाती व मळोजी असे दोन पुत्र होते. समाजाचा
तर” अल्प अखून त्यांच्याबरोबर र्केद्रांत ज्योत येहैल इतक्या
बेंतानॅ ते मिंग ( लन्स )बसा‘वेंलेर्के असते. या योगानॅ प्रका०
शप्वै किरण समान्तर होतात. ही समान्तर प्रकाशळिकरर्णाचीं
शलाका काचेच्या (स्लाइडच्या) मध्स्त जाते; नंतर हा प्रकाश
पुत्र प्’पॅलानळी व मळळोच्चीचा पुन्न लक्ष्मणराव हे स. १८३२ त<noinclude></noinclude>
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महृग्राट्रोय शांनफळोश. (ज) द्ळंइ र्जाघंय ’जा’घ’व हयात होते. या दोघांत मिळून या साल अखेरव्त कन्नड इतर सरदारांच्या मदतीने अज्ञान निजामशहास समावूऽन परगण्यातून तेरा गांव‘प्वै साड..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महृग्राट्रोय शांनफळोश. (ज) द्ळंइ
र्जाघंय
’जा’घ’व
हयात होते. या दोघांत मिळून या साल अखेरव्त कन्नड इतर सरदारांच्या मदतीने अज्ञान निजामशहास समावूऽन
परगण्यातून तेरा गांव‘प्वै साडेचौप्ळीस हजार व वप्घळोळी निजामशाही काही दिवस यांवनिलळी. यावैळव् ती दसहजारों
परगण्’याच्या मॉकाइयातन एक हजार तीनशे रुपये इतकी मनतबदप्र होता यावईंळीं मालाजा मौसभ्ल ठुखर्णांच्या
रक्कम मिळत असे [ वम्ड-कैंफियती न्
` पदरॉरा’हेला( १५७’) पुढेंनिदरेबड यय प्रसिद्ध रग॰
व! ती क र.-पिलाजा जाघवप्न् या वशजार्वे हे एक ड्रु पवमीचीं गोष्ट घडलळो. ळिशद्खडण्त अद्यापि या घराण्याच्या
घराण आहे. चावोलॉकर घराण्यात य'चा थोडी माहिती : मोठमोठ्या इमारती, महाल, समाया, होन वगैरे पडक्या
आलो आहे. पिलाजींचा पुत्र सठचाती, त्याचा
धाकटा पुत्र ,हूं स्थितीत आहेत. त्यांप्ट्रे’फाँ एका महालात र'गपचमीचा महाल
बोत्याजा, त्याचा पुत्र लाडोजळी; हा स. १८३२ मध्ये हयात टुं म्हणतात. या प्रसगॉ शहाजी पाच वर्षांचा व निनानाद्दे तीन
होता. रावबप्च्चीर्ते याच्या सर्व जहाप्‘गेरळोर्वा जप्ती स. १८१५ '… वर्षांची होती. दोघे एकमेकांवर गुलाल फे‘कॄ लागल्याने ळुखच्या सुमारास केलळो होती; त्यामुळे १८३२
च्या सुमारास ` जोर्वे विनरेदाते हा "घोडा ठोक शोमतो अते म्हटले तेच खरॅ
जात अगर फौज्ञतर'जाम लाडळोजॉस र्फाहो शिल्लक राहिला
घखुन मालळोजळोम्र्दु निजाचाद्देर्ची मागणी केला. परंतु छुखजेंहॅन
नाहो; खग्सगत इनाम मात्र राळिहर्ले. पुढें हंप्नजळो झाल्यावर
आपल] बायको ल्हाळ्साचाईं हिच्या
आप्नहामुर्के मागणळोस
कपनीनि क'ळाहो गावे तोडून जहागिरादाखल दिला. लाडों- स्कार दिला नाहो. तेव्हा मालळोजार्ते द्रव्य व लोंळिकक मिंळ‘
र्माचा वेश द्दलळी नाती, ताछुकॅ पुरंदर, नि. पुणे येथे नांदत . दिला. निजामशहनि त्याला पेचहनारळी राज्ळो करून शिबसेरळो
ग् वगैरे किल्ले व पुणें वगैरे प्रांत जहागीर दिला; आणि छुख॰
आहे. [ वप्ड-कैव्कयतप् ]
श्चि द रेव ड क र.…माँगलाईंतील हे ळि‘शदखैडर्वे घराणें हु बोस आग्रह करून जिजाबाई हो शहाजळोत देबविली. हे
आपणांत दोलताचादच्या यादवघराण्यापेकळो म्हणाबेते. फे लम ड्रुत्द्द निजामशहाच्या देखरेखीखाल’व् झाल ( १६०४ ),
याच्या कांहीं शाखा देऊडगांव, औरंगाबाद या भागांत मालळोजळो चिवत असेपर्मेत जप्घव-र्मोतल्यांत भांडण नव्इतें॰
आहेत. बहामनी राज्यात गोंविद्जळो व ठाकूरती, जाघव'ग्बळो भ् पुढें मुनिजा निजामशहा हा गाद्व्वर आला, तेव्हां तों अज्ञान
नर्वि येतात. विठळोजळी जाधव हा ताळिकळोठच्या लढप्गुंईंत मुबु- यू असल्यानॅ त्याची आट्रे कारभार पाहो3व ती शहाजौच्या तत्रानॅ
पाही; त्पामुळें त्पार्ये वजन चाडले ते छुखर्गास खपलैं नाहीं.लमानांतपेंड्रे लढत होती. ळुखतीस पैठण परगण्यातील लात॰
नेर गांव इनाम होते. श्चिद्रेवड हें दोलताचादेजवळ असून ऱ् याच सुमारास शहाजहानर्ने त्याला आपल्या पक्षात मिळवून
पूर्वी मेहकर सरकारांत मोडत असे. ळुखजळोमें श्विदरेवडच्या बे घेण्याचा खठपठ चाला‘वैलळी व त्याप्रमाणे ठुखजा हा त्याला
मूळच्या होणें देशमुखास ठार मारून तेथांल देशमुखी मिळ- . जाऊन मिळाला (१६२१). शहाजाच्चातहि न मिळणारा मान,
विला. ळुखजॉत भुतागी म्हणुन एक भाऊ होता. ळुखज्ञी ॰ म्हृणज्ळो चौग्ळोसहजारळो ( २४ हगार स्वप्र व १५ हजार
हा पड्रेप्जबद सरदार होती. त्यार्ते निजामशहावळो चाकरी ; पायदळ ) मनसब शहाजहानर्ने त्याला दिला. नंतर र्मोगल,
केळी. निजामशहार्ने त्याला लिंदखड, पडतुर, खेंरर्डे वगैरे टु`ं ळुखजळीच्या साहाय्यार्ते दोलताचादेबर चालूच आहे. तेव्हां
प्रांत खाजगत खर्चात ब फौजेच्या सरजामास, त्याला पंच… [ मूर्दिजा व त्याचीं आई यास शहाजच्में तेथुन काढून कल्याणळं
हजारी सरदार कलन, वैजापुर, गांडम्पुर, फुलेवर, कन्नड, `; जवळील माहु‘तीच्या किक्कयात नेऊन ठेंवि'ल आणि
आपण
प्:रेठण, मेहकर वगैरे महाल लावून दिले. त्याचा व निजाम- '… मळिकअबरासह र्मोगलांशी लहूं लागला. या वेळच्या मात‘
शहाचा फार घरच्या होता. त्याच्या चायकोंर्ते एकदां . वर्दाच्या लढाईत (सन १६२४) मालेर्कबरामें मोंगल’प्चां
(ळुखर्णांचाप्’हैं) पराभव केला; ठुखजीं पळून गेल्यामुळे
शहाला भाऊवींजेचीं ओंबप्लणीं केली; तेव्हां त्यातें दोलताबम्द
सरकारची देशमुखी इग्'प्म दिलळो. ळुखजळोकडें २७ महाल ` यातला. पुढें छुखतीर्ने माहुंलोत वेंढप् दिला व मूर्तिजाचीं
व ५२ चावङयाचप् अधिकार होता. लखजळोत चार पुत्र होते. आई आपण होऊन त्याला मिळाला. तेव्र्दा शद्दागीर्वे
त्यानं] चार ठिकाणी शाखा स्थापिल्या. द्त्ताजोते अडगांव, तेढून निघून दुसरीकडे धुमाकूळ घातला. याचब्ळि‘प्
अबलोजळोर्ने मेहुव्ळा, बहादुरजॉर्ने किनगांव व रत्थीर्बनि शिंदे… * तळी दोडत असतां जिजाबाई छुखर्णांच्या हाती लागला. तिला
खेड येथे आपले ठम्णें दिले. शिदरँवड‘तीब शाखा पुढें त्यार्ने शिवनॅरळीत पोहोचवून दिले. निजामशाही अजिबात
देऊळ्गांचास आला, या गावच्या पाटिलफ्या व देशमुखी ` न बुडत'ऱ मूर्तिजाचा मुलगा हुसेन हा गादोबर आला. त्यामै
यांच्याकडे आहेत.
लखर्गाते
मलिकबरात वऱ्हाडचा
माग [ छुखजात राजकारणाच्या मिपार्ते दोलतीचादच्या
किलर्यात
मोंगल[(दिक्कीवप्ले)कबून परत मिळावेण्यांत बरीच मदत ' बोलावून आणरें’, व त्याचा खून केला ( १६३॰ ), ळुखर्बीनॅ
केली होती. प'रतु पुढें त्यार्ते व अबरार्चे बांकर्डे घेऊन तो । निजामशहात त्याचा वजीर फरेंवखान याच्या त्रास'ण्तून सोडमोंगलास मिळाला. त्यामुळे दक्षिण वऱ्हाडप्वर मोंगलावी हें विर्के होते. ळुखती आपल्याबरोबर आपला भाऊ जगदेब
पकड बसलळो. ठुखजनिं मूळ गांव लक्ष्यणर्सिह. चांदबिबोनें ` यास घेऊन सेम्यासह दोलतीचादेस आला. ठरलेल्या दिवशी
नगर लडविह्ऽ त्यावेळी ळुखनीर्ते लोंये गाबविर्के होते. तिचा आपले पुत्र, नातु, आप्त यांच्यासह ती किंलयांत गेला. तेदृळा
खून आल्यावर व नगर मोगलांच्या हाती पडल्यावर लसर्गनि त्याला आथॉ निध्शम्न करुन मग निजामशहाच्या भेटीस
२९<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महार'प्ष्ट्रळीय 'वप्नफॉंश. (जे) २२१3” जा‘घ्रच जाधव नेले. दरबार झाल्यावर निजामशहा उठून गेला व एकदम ) होता. आंदण म्हणून राजारामार्ने^[शदखेड, निरषुर, मेहकर बरचखे यारेकरळी छुखजा व त्या..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महार'प्ष्ट्रळीय 'वप्नफॉंश. (जे) २२१3”
जा‘घ्रच
जाधव
नेले. दरबार झाल्यावर निजामशहा उठून गेला व
एकदम ) होता. आंदण म्हणून राजारामार्ने^[शदखेड, निरषुर, मेहकर
बरचखे यारेकरळी छुखजा व त्याच्या मङळीवर तुटून पडले, ब् वगरे गावचे सरदशमुखप् हक जावयास दिल. साखरखेर्डे`यथें
या मङळीजवळ फक्त कठ्याराच होत्या. शवठपर्मेत ळुखजा निजाम व [देहांचा सरदार मुबारम्ज्ञ यांच्यात जी लढप्ट्रे
वत्याचळोमेडळीयाती लढून शवर्दी प्रप्ण दि`ल. यावेळी झालो तीत राघोजी हा मुबारळोजच्या बानृये’ लढत असती मेला
छुरवनांनॉ मुले अचलरैजी व राघोजी आणि नातु यशवतराव
( १७२४ ). पुढें निजामाने त्तिदखेंड व देऊळगांव येथें
हेमेलै. हो बातमी समजतांच जगदेव व त्याचा मुलगा
वहम्ट्टर आणि गिरिजा उर्फ म्हाळसा हो मडळी शिदखेष्
ड[स परत गेले,. याच्या पूर्वीच (स, १६२३) खंडागळ्याच्या
राघोजीच्या कुटुंबात पकडण्याचा
हत्तीच्या प्रकर्णावत्तन शहाजा व ठुखजी यांच्यामध्ये जी
कठकठ (भांडण) झाला तीत छुखजीचा पुत्र दत्ताजी
मारला गेला. यानतरच छुखजी मोंगलात जाऊन मिळाला
व भातबडळीची लढाई झाली. छुखजऱर्वेच दौलताबादचा किल्ला
माठ्या युर्कार्ने निजामशहाकारतां काबाज केला होत[.ळुलखजी
मला तेव्हा त्याचे वय ८० होते. पुढें मेतोंजी उक जगदेव
यात र्मोगलाते पवहजारळी
मनसव
दिलळी. त्याचा मुलगा
बहादूर व नातु मानसिंग हेळिह मोगल! मनसवदण्र होते. स.
१६३३ च्या लढाईत ज्ञगदे बार्ने र्मोगलातर्फे निजामशहाळिवरद्वा
पराकम गाजविंला होता. त्यामुळे ळुखजीचळी देशमुखळीसनद
व जहागीर
जगदेबाला
मिळाली
व शिवाय स्स्तुमगव हा
क्रितर्षि मिळाला. जगदेवाच्या वेळी जिजाबाई बालशिबाजी-
सह एकदा माद्देरळो आलो होती. ळुखजीचा मुलगा बहादूर
यात ज्ञगदेवार्ने दत्तक घेतले होते. त्याचे
राजा येथे न[दत
आहे. मानमिग
घराणें किनगांव’
झस्तुमराबाबों मुलगी
थोरल्या शाटूत( अवर'गझेबाच्या कैदेत असतां )दिलीं होती.
तिचे न[व अंनिकाव'ट्रॅ (माहेरचें
थॉडयाच दिवसांत
मेलळी.
राजसबाहैं)
माननिग
होते.
हो
मोंगलाकडॅच राहिला.
छुखजीचा पुत्र अचलेप्जी दोलताबादच्य.‘ देग्यात मेला.
त्याचा पुत्र सताजी (सुजनसिह)
व अचलौजीचळो
बायको
यासह म्हाळसाबाईं शिवाजीकडे मेला. सताजी हा सभाजो
( शिवाजीचा वडील भाऊ ) बरोबर कनकनिरळीच्या लढाईत
ठार झाला. त्याचा मुलगा सेभाजो तो शिवाजीच्या कार्योत
हातभार लावफैत असे.
छुरबजव्चा वडळील पुत्र दत्ताजी, याचळी शाखा अडगांव
येथें आहे. [तचीं [’वद्देप्ष प्रनिद्धि
धाकटा पुत्र राघोजी हा देऊळगांव
वैकॉँ दत्ताजी हा मॉगलाकडेच होता.
कनौटकात हा स. १६६४ त मेला.
प्रयत्न केला
असती,
त्याची आहे दुर्गा, बायको अंबिका व पुत्र मानसिग हे तेथून
निसदून साताऱ्यास शाडूच्या आश्रयास गेले. काहो दिवस[न॰[ शादूर्ने निजामाचीं समनृत कखन मानसिंगाचींहुं जहा-
गीर ( निजामानॅ जप्त केली होती ती ) तळोडविंलळो. शाढूच्या
पश्चात माननिग हा ताराबाईंच्या पक्षात मिळाला व रामराजाच्या विरुद्ध कारस्थान कडे लागलापुढें (१७५१) त[रा॰
बाईंचा व पेशव्यांचा तह झाल्यावर हा देऊळगांवकडे निघून
गेला. या शाखेतील अखेरचा प्रसिद्ध पुरुष बाजीराव होय.
त्याच्या हाताखाली अरब [शव'दो होती. एकदां त्याची व
इंप्रनांच्या तैनाती फॉंजेंचौ लढाहै होऊन फांहो इंग्रज अधिकारळी मारले गेले. या मांडर्णात
आपला काहीं सबंध नसून
अरबांचा पगार थकल्यामुळें ते हंप्रजावर उलठले अते
बाजीराव म्हणे ( अशी उदाहरर्णे पगार थकल्यामुमें तेन्यानै
दंगल माजविंल्याचीं त्याकाळी पुष्कळ घडत असत ). परंतु
त्यार्चे म्हणर्णे न ऎकतां त्याचँ सर्वे वतन खालसा करुन
(स. १८५१ ) त्याला मरेपर्मेत दोलताबादच्या [केलवांत
कैदेत ठेंनिले ( १८५९ ). त्याचा ओंरस मुलगा माननिग व
लेकवळा रासळोजी होता. या रासळोजीर्ने बाजीरावाची निजामा-
कडॉल जहागीर खठपठ करुन तळोडाबेलोत्यार्वे वजन सहन न
होऊन मानसिगाचळो आद्दे आदेंल्याबाईं व तिचे कारभारी
यान‘व् त्याला बिषप्रयोग केला अते म्हणतात ( स. १८६९ ).
एवटॅच नव्हे तर फारमाऱ्यांनॉ मानसिंगासाहेथॉढ्यग्
दिव-
स[न“[ विपप्रयोग केला ( स.१८७८ ). मानप्तिगाचा मुलगा
बाजीराव हा त्रैण व व्यसती होता, ती ( १९०६ ) औंर'गाबादेस एकाएकळो बारला.
हळीं दताजीराव
( बाबांराबाचा
पुतण्या) व बाजीरावाचा पुत्र आनदराव हे हयात आहेत. या
जाधव घराण्यातील इमारती वमेरेच्या खुणा शिद्रेवड, देऊळ॰
न[हो. छुखर्ताचासर्वीत
येथें असे. या शारवै- ,' गांवराब’, जानेफळ, फिनग[वर[जा,अडग[वराजा व मेटुण येथे
आढळतातजगदेवार्नेक्ष्यद्दिल्या)[ऱ्शदखेढास एक तलाव, वाडा
त्याच्यातपेंर्दे लढत[न[
व
गांबास काळाकोंट बांधला. देऊळगांबास जगदेबाच्या(तुळ॰
त्याचा मुलगा जगदेंघ;
यानेंच देऊळगांब येथें बालाजीचे देवस्थान स्थापिले. देऊळ,
गावांत यानें गती, वाडे, पेठा वगैरे वसावेल्या. यात मोंगलाकडून छत्री-चब‘राचा मान होता. हा '1 ६९९ त मेला. हा
गिरव्च्या बाळाजीचा भक्त होता. त्यार्ने ब्लिदरेवडास बालातीचळो
स्थापना केला. देऊळगांवचीं माते अगुष्टप्रमाण पचघचूची
आहे. संस्थान हल्ला [ चाच्या ताब्यात असन, त्याचें उत्पन्ना’हे
बरेच आहे जगदेवाला राघोजी म्हणून मुलगा होता त्यास
सातारकर राजाराम छत्रपति याचळो कन्या आवकाबाहै दिली
जाऊ) बायकळोचीं मरेतीसमाघ न[बाचीं सुंदर इमारत
आहे.
जामेफळांत जाघयाचळो एक गढो, त[खररर्वेढ्यास माननिहार्मे
बांधलेला बेस व र्शिदखेजास ळुखजीचळो समाधि आहे.
[सदर्भप्रेथ-फॉंरस्ता; जाघब घराण्याची केफियत; मारतवर्षे~ळिशवाजीचीं बखर; नव्वद कलमी बखर; अहमदनगर
गें’झेंटिंयर; खरे…मालौजी ब शहाजी; तेजावरचा शिलालेख;
बुसातिनै सलातीन; पातशहानामा; डफ; चिठणिशी बखर;
राजवाडे ख. ६; काळे…- वऱ्हाडचा इतिहास. ]<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/४८
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जाघचराईं महारप्याँय शांनकळो’श- ( ज ) २२५ जॅप्न जाघक्राईं ……तळोलापूर ळिजल्ह्यांतील करमाळें तालुक्यांत हू संपादन केलाहोती. पळोप झाल्यावर त्यार्ने पनृपवें वसवले… असलेल्या निबगा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जाघचराईं
महारप्याँय शांनकळो’श- ( ज ) २२५
जॅप्न
जाघक्राईं ……तळोलापूर ळिजल्ह्यांतील करमाळें तालुक्यांत हू संपादन केलाहोती. पळोप झाल्यावर त्यार्ने पनृपवें वसवले…
असलेल्या निबगांव येथेह जहाग्गेंरदार घराणें आहे.हे मुळचे [‘बेत्व शक्य तितके कमी करण्याचा प्रयत्न केला. त्यात कर
धनागीचा
बसवून लोकांकडून पुष्कळ पैसा जमविला पण स्वतऱ्कडे फार
मुलगा चद्सेन याच्या पदरी सदाशिवराव म्हणुन कारमारा
होता; पुढें त्यास दोनशे स्बाराची मनसब मिळाला. तो
जाघवराबाबररेबर असतां एका लढाइ'ते मेला. त्याचा पुत्र
थोडा खते केला. त्याचे शैवठपर्मेत बव्हेरिंयाच्या छुहँबररेवर
मावबर[व,यार्ने निजामाकडे बराच
कामगिरी केल्याने त्याला
स. १७६८ त तीन गांव मिळून
पाच हजारांची जहागीर
नसून पळोपला विरोधळो प`[प ( अँटि-पोप ) अस॰” उत्पन्न झाला
होता; त्यार्ने लाचछुबपत वगैरे अनेक गैरमाग्’ळागृ‘नीं पोप’
पद मिळविले. पुढें ७४ आरोप ठ`वून त्याची चौकशी झालो,
भालची विठगुप्यावे
होते.
हे ब्राप्हण आहेत.
मिळाली. निजामाकढून प्[शब्दांच्या दरबारॉ हा वकळोल होता.
पुढे याने पेशव्याची नौकरी पत्करिळीं. त्यावर याला
अकाँठच्या नबाबा( मदेमदअक्की )कडून थकलेलळो खंडणी
भांडण चालू होते.
२3. वा जें’ग्न पोप (१४१०-१४१५)ऱ्--हा
त्यांत क्रुछूम, अचीत्ति वगैरे आरोप शार्बोत होऊन तो
पदम्रष्ट झाला.
आणण्याच्या कामावर (मोंहळीम करून )पेंशव्यांन? पाठविले.
वेळीच
त्याने जाऊन ख'डणी वखूल कैलळो ( सन १७७१ ). याच्या
मार्फेत मद्र्ग्तकर इ'प्रज, तंजावर, गढवाल व मुरापुर या
तस्यागांची वोलल[च[लणीं( पेंशद्यांशी )होत असत. याला
फौजसर'जाम काहो नव्हता. मात्र वकिलौच्या कामासाठळी
हत्त’ण्, हलकारे व जालूदजोड्या वगैरे सरजाम याच्या पदरळी
श[हा:…ह्य[
असे. त्याची नरव्त नेमणुक सरकारी असे.
यास स. १ ७६९ न पेक्षा
हजारांची
निजामाकडू'न
जातसर'जाम जहागीर
पूवैरोमन
साम्राज्याचे
जेंळोन
बाद-
न[वावै सप्त राबे ९२५ ते १४४८ च्या द्ऱ.[
स्वत:च ळिलहून ठेवला आहे. साम्राज्याचा खरा वारस
पें[ल॰
अळोलौगास
करून
याच्याबराबर
ता बादशहा
तुकाच्या
मदतीर्ने युद्ध
झाला. पण कराच्या आल्यामुळे प्रजा न[खुप
झाली आणि पुन्हा झालेल्या लढा’ईंत( १३५४ ) खरा वारस
विजया
बरळोचशीजहागीर जप्त केळी. माधवराव
सन १७८६
न[वाचा
सुमारास ब[रला.त्याचा पुत्र गणपतराव
हा
१८५२ मध्ये
राजे,
य्यग्रुन झाले. त्यात विद्देप्ष महत्वाचा ६ वा जीन ,वादशह
(११९२… १३८३)होय यार्ने १३२०… १३५६पर्येतचा इतिहास
[’मेळालो. पेशवे सरकार द्रसाल तेनातीचें पाच हजार देत
असत. निचगांव, टाकळी, वडगांव,व[घ`[ल’[ वगैरे मिळुन
हो पधरा हजारांची जहागीर होती. रावबाजीऱ्नै' यापैकाँ
च्या
खरा पळोप
झाला. तेव्हा नॉनर्ने उरलेले आयुष्य लेखनव्यव`
त[यांत चालविले.
इंग्लडचा
एकच
जान
राजा
(
१ १६७…१२१६
राजा ट्टेग्लडांत झाला.
ती
);…या
आ‘न्ळोयो’त्रैत
राज्यकारभार करणारा खुवळी व मुलगी निघाला. अत्यंत वाहैंठ
हयात होती. मुळचे चइसेन जाधपाच्यापदरवे म्हणुन यागां
राजा म्हणून गणला गैल्यानेंच पुढे हे नांव ट्टेग्लडांत कोंणाद्दि
जाधवराब हा किबाव अद्यापपयेत चाछु आहे. [वाड-केफियती]
राजास दिले नसावेसे वाटते. त्याचे राजकीय चरित्र ‘इंग्'लड’
या लेखांत पहा. सामाजिकडष्टया याच्या चरित्रांतील महत्वाच्या गोष्ठी म्हणजे त्याचा ५ व्या वर्षीच एक वाडठूविश्चय
जॅप्न-हे' न[व [’खस्ती असून या न'ळावाचें अनेक देशांतढे राजे व ररेम-वे प`[प होऊन गेले आहेत.
बॉ न पळो प.…जान न[वावै एकंदर २३ पळोप इसवी सन
५२३ ते १४१५ या काळाच्या दरम्यान
झाले.
यापेंफॉं
पुष्कळसे राजकारणांत पडणारे होते. पाद्देल्या पींपला रोमन
बादशहा जस्टिन याच्या दरबारा धमँमतस्बातंत्र्य (येंलरेशन ) एरियन लरेर्फाक'रेतां मिळ्वितां आले न[हो
म्हणुन येअळोडोंरिंकते तु'रुगांत टाकले होते व तेथेच तो मरण
झाला होता. पुढें त्यानें विशष कारण नततीद्दि पाहेलळी बायको
टाकून दुसरे लग्न केले होते. त्याच्या या दुसऱ्या बायकोर्ते
जान बारल्यावर पाच मुले अततांप्’द्दे पुनर्विवाह लावला,
जानला अळीरस सेततीरवैरोज दोन मुलगे व एक मुलगी अशी
अतेप्रस सततीद्दि होती.
फ्रान्सचे जान राजेंब्-फान्तमघ्ये जान नांवाने दोन
पुढें
राजे १३१६त` १३६४ च्या दरम्यान झाले. वैफॉं पहिला
८ वा र्जेन( ८७२-८८२ ) याते राजकारर्णात उलाढाल
जान हा १० व्या ळुईंचा मुलगा बापाच् या मृत्युनतर जन्मास
यऊन फक्त सात दिवत[ निवत होता, व त[पुढें चुलत्याकडून
पावला. त्यानेतर`च ५ [ ६ जीन प`[प महत्वाचे नव्हते.
फार केला. युरोपीय र[ज[मघ्में पळोपकडून बादशाहळो मुकुट
स्वतऱ्स [मेळावा म्हणुन त्या काळांत विद्देळाष स्पपाँ असे, मारला गेला असे म्हणतात.
`र’
॰
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,
'१
५“
या स्पधत सळापडल्यामुळ या जानला ८७८ मध्य कालामन
दुसरा जीन ( १३१९-१३६४ हु) हा लहान वयातच
राजाकडुन कैद भौगावळो लागलो. आणि
धरसौडच्च्या राज्यावर आला. त्याचे मंत्रिमंडळ चांगले नव्हते, त्यानीं
धोंत्णामुळें कळोणाळिह राजाची मदत पोपला मिळाला न[हो. ‘ राजाचा पैसा खाऊन प्र`जबर जुछुम केला. यावेळी हंग्लड'
अखेर ती स्वत: च्या अ[[’श्रेत इसमांकदून मारला गेला. पुढाल
९ ते २ १०व्या पापपयेत क`[ण[[‘हे पोप महत्त्वाचें नव्हते.
बरोबर चाछू असलेल्या मुहांतील र्पोड्ठक्रुयसे येथे लढाद्दे
हेप्ऊन त[त ट्टेग्ल्‘ट्रडच्या ल्बॅक प्रिन्स'वै बाँनचा पराभव कलन
२२ वा र्वोन पाप (१३१६…१३ ३४):--य[नें कायद्याचाव त्याला केट. करून इंग्कंर्डात नेले. पुढें ३० लक्ष क:ऊन किंमत
वैद्यकाचा अभ्यास करून शिवाय इतर अनेकष्णि विद्रुत्ता हं देण्यार्वे ठरवून जेंळीन'नॅ सुटका करून घेतला. पण ती रक्कम<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जॉनसन अँड्रु. मद्द्यरा‘टू’प्प णनकरेश. ( ज ) २२६ जानरनथ ) केडतां न आल्यामुळे तो स. १३६४ मघ्ये पुन्हा इंग्लेडमघ्'य [ बाय `[र्वेनकुल व शि’तप दोन्हळो जानस वच्यपिक्षां अधिक … केदळो म्हणु..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जॉनसन अँड्रु.
मद्द्यरा‘टू’प्प णनकरेश. ( ज ) २२६
जानरनथ
)
केडतां न आल्यामुळे तो स. १३६४ मघ्ये पुन्हा इंग्लेडमघ्'य [ बाय `[र्वेनकुल व शि’तप दोन्हळो जानस वच्यपिक्षां अधिक
…
केदळो म्हणुन स्वत; होऊन गेला व तेथेच मरण पावला.
हु दबा [ची [असल्पापुले तिनॅच त्याला शाळतील निरनिराळ्या
पोट्रॅगालघे बोंब राजे: …था
न[वाघे सहा राजे वैवयात्र"[शतण [दल, या वेळी या या धदा [शप्यावाच होता.
१३५७ ते १८२६ च्या दरम्यान झाले. यात्रेकॉ पप्'हेला तो राहत असलेल्या टेसेतीप्र’फ्रांत पुष्कळ शैतकरळो राहात
जान विद्देप्ष प्रसिद्ध झाला. तो त्याचा भाऊ पाहेला फडिंनड
असून त्या गरळोब व दुबळ्या तेतकरळी लोकांची दैन्यावस्था
मरण पावल्यावर राज्यावर आला. त्याला कॅसलचा ( स्पेन )
माहेला जान हा प्रतिस्पर्धी होता. पण लढाईत जान विजया
सुयारण्याकडॅ त्यावै लक्ष गेले. त्यांचा पुढारो म्हणून ती
झाला. त्यार्ने सुर लळोकावर‘ळिह विजय मिळविले. हा दि प्रेठ ’
मेयर होऊन पुढें प्रत्तिनिथिंसमेचा व
१८४१ त सेसे'ठसमेचा
सभासद
त्याते
व ‘ फादर ओफ ळिहज केट्रो ’ या
न[वानॅ
प्रसिद्ध आहे.
यानंतरचे (दुसरा ते पाचवा जान हे) राबे फारसे महत्त्वळावै
न[हो‘त. पुतील सहावा जान ( १७६९…१८२६ ) याच्या
कारकीर्दीत महत्वाची गोष्ट म्हणते स.१८२० मध्ये अनत्या॰
चारा राज्यर्फाति होऊन जबाबदार रर्पियपद्वत्ति स्थापना
झाला व ती मान्य करण्याची जेंनिते शपथ घेतली. या सत्रे
जान राजाची एक विद्देळाष गीष्ट म्हणसे त्या प्रत्येंकनि ५०1६॰ ०
वर्षे राज्य केले.
पवन राजकारणांत ळिशरला; लवकरच ती प्रीवा‘ठेंहल येधळोल
झाला.
दोन्हळीदि
सर्भात
‘ जनऱ्ळो ’च्या
कायद्याच्या गोष्टीचा पुरस्कार केला. तेथे तो दहा वर्षे सभा.
तद होता. नंतर गव्हनैरच्या जागी त`[ दोनदा निवडून
आला. त्यावेळी त्याची लायकळीव [नऱ् पक्षपातापणा पगॅ
[दतन आला तो साबन्निक"[शक्षणाचा पुरस्कता असन क[म॰
करोवगावद्दल क[प्रेतमध्ये`नहपीं झगडत असे; प'रतु त`[
गुलामपभ्न्ताच्या तर्फेचा होता. दक्षिरैगकडाल सस्थानठेंसंबँयावे प्रे.ळिलकनवें वतेन फार अन्यायाचें आहे, तरी पण
हे`गरळो,
युनियन मा`डू'र द्दिय्णळो सेस्यानांनळी स्वते‘ऱ्ळा होऊ नये असे
जेव्शलेम, पळोलेड, से‘वसनळो, वगैरे देशांत ह्या न[वावे क[ह’[
रागे होऊन गेले. त्यांपँकळो पळोलडचा तिसरा जीन हा मइ॰
त्यार्वे मत होते. यादची ढुख असतां केवउपर्मेत युनियन
सरकारशी त`[ राजनिप्र राहिला. स. १८६१` मध्ये टेतेंर्तां.
सेस्यानचा लष्करी गव्हनैर असतां त्यार्नेद्दि तेथें बराच
इतर
देश:…य[[शव[य
बें’परेगेंनि, बरेहेपिया,
त्वावा होती.
जानस्ग्थ. त ह शी ल.…सयुक्तप्रांत. मुझफरनगर
जिल्हयातील तहशांल. उ. अ. २९° १७’ ते २९" २६ ’व
अरेरावळी चालवून यूनियनसरकारची सत्ता प्रस्थापित केला.
स. १ ८ ६ ४मघ्ये डेमोक्रॅटिक पक्षाला व तरहद्दव्वरळोल सश्यानांनां
पृ. रे. ७७॰ ३६’ ते ७८॰ ६’ क्षेत्रफळ ४५० चारस मेल. : खुप करण्य[क‘।`रत॰[ त`[ उपाघ्पक्षाच्या जागेकरतां उमॅदवार
ल`[॰ ते. (इ.स. १९११ ) १९९८६४. हात चार गांर्वे व झाला. स १८६५ मध्ये प्रे. लिंकनवा रवून झाल्यावर याजकडें‘
मध्ये सत्याचे,
अघ्यक्षावै व मूनियनसरकाच्या पुनर्चठनॅर्वे अवघड काम
उत्पन्न ३.६ लाख व इतर करावें उत्पन्न ४७॰॰॰ रुपये
होतेद्दिच्यापूर्वेकडे गंगा नदो असून तिच्या तांरावरळोल प्रदेश
आले.,त्यावेंळी युघ्वमान पक्षाला कठळोरपणें न वागवितां त्यार्वे
लिंकनर्वेच स्रोम्यपणाये धोरण चालविले. त्यात चीग्नट्टेच्या
दलदलाचा आहे. यातून
हकांचा प्रश्नच मुख्य महत्वाचा ह`त[॰
२४९
खेडॉ
आहेत.
इ स.. १९॰३॰४
इ. स.
१९०३-१८
अपरगै`जस मेन कै’प्गॅल गेला आहे.
मध्ये एकंदर
3.॰७ चरेंरल सेल जमीन
लागवडळोखाती असून १ १५ चफैरस मैल कालव्याखालाँ होती.
ग[ व.॰-जानसथ
असून
मुझफरनगरहूंन
तहा’सेलळोवै
१४
हें
मुख्य
मैलावर
ठिकाण
आहे.
उ. अ. २९" १९’ व पू. रे. ७७“ ५१.’ इ. स. १९११
मघ्में येथें ५९३२ लोंकसेख्या होती. अठराव्या शतकाच्या
शांभां ज्या जानसथ सय्यदानीं मोंगल त[प्रम्ज्यांत आपल्या
हाती मुख्य सत्ता ठेंविला होती त्यावै हें राहण्याचे? ठिकाण
होते. इ. स. १७३७ मध्ये वझीर कमस्दॉनच्या हुकमानॅ
र`[[हेला सैन्यानें हा गांव ठुठला व पुष्कळ
सय्यदांत ठार
मारले व हद्दपार केले. तरा अद्याप त्यांचे कांहीं व्[शज हक्की
या गावात आहेत.
जानसन अँड्रु( १८०८… १८७५` …हा युनैटेड स्टेट्स
( अमेरिका )चा
सतरावा अध्यक्ष इ.स. १८०८ मध्ये
जन्मला. त्याचा बाप त्याच्या चवध्'या वर्षीच बारल्यामुले तो
लहानपगाब एका [शप्याकर्डे न[कर राहिला व फ’वल्या
तेंळात^[शक्षूणमिंळयूंलागला’ स, १८२६ मध्ये त्यामें लग्न केले.
सर्वे गुलामांनां एक.
दम राजकीय हक्क देण्याच्या ती विकत होता. दक्षिर्णां
तेस्थानांनळाद्दि नळोप्रॉगां राजर्फाय हक दिसे नव्हते; तेव्हां
कप्रिसऱ्त् दक्षिणी सस्थानांर्तांल प्रनिनिघळी घेण्याचें
नाकारले.
प्रे. बॅंऱ्नसनते कमितये ठराव व्ह`टोंच्या जोरावर रद्द केले. उलठ
काघेसर्ने एकतफॉंरिफडरेठसनां राजकळोय हकहोन ब नळोमँप्नां
इक देण्यार्वे घोरण स्वळीकारले. शिवाय कॉंग्रेसच्या संमती…
शिवाय कोंणाद्दि अधिकाऱ्याला 'अघ्पक्षाऱ्व् नोकरदेंवखन दूर
न करण्याबद्दलचा ठराव व लष्करो बाबतीतील अघ्यट्य्तेच्या
अघिकारावर फांप्रेसचा अधिकार प्रस्थापित करण्याचा
ठराव
पास
केला;
या कारणामुळे
अध्यक्षाचा
स्वतंत्र अधिकार लुप्तप्राय झाला. तेंव्हा आपल्या मंत्रिमडळांतील आपल्या बिंरइद्व असलेल्या सभासदोनां ह्यांची
मुदत भरण्यापूर्वीब काढून टाकण्याचा जेंळोनसनते प्रयत्न
केला. त्यावर नळोकरव्च्या मुदतीचा कायदा मोडल्याबहल
जानतनवर आरोप ठेवून त्याला अध्यक्षपदावसन दूर करण्याचा कांप्रेसते उपकम केला. पण आराप इतका क्षुल्लक
व पुरावा इतका लगदा ह`[त[ कळी, शाप्बतीकारेतां लागणारे<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महृप्राष्ट्रळीप त[नकळोश. ( ज्ञ ) २२७ जॉनसभ्. डॉ, साम्युएल लाँनसन. डॉ, खप्य्ग्रुएल दोनतुतीयांश मतीर्वे मतामिवय न झाल्यामुळे जाक्सन पण त्यात आश्रय मिळाला न[हळो. निदोषळी ठरला. यापुढे..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महृप्राष्ट्रळीप त[नकळोश. ( ज्ञ ) २२७
जॉनसभ्. डॉ, साम्युएल
लाँनसन. डॉ, खप्य्ग्रुएल
दोनतुतीयांश मतीर्वे मतामिवय न झाल्यामुळे जाक्सन
पण त्यात आश्रय मिळाला न[हळो.
निदोषळी ठरला. यापुढे त्याच्या कारकीर्दीत विद्देळाष महत्वाच्या गोष्टी क[ह॰[च झाल्या नाहीत, स. १८६९ मध्ये मुक्त
खलास होतीचतों स्वस्थ घर”[ बसलाचशवटों स. १८७५ जुले
जानसनचा एका व्यापाऱ्याच्या एलिझाबेथ
३१ रोर्जी त`[ मरण पावला.
जळोनसनते अँड्रु तेकतनला
आपला
बमिगहेम
येथे असतांना
पळोटॅर न[वप्च्या
विधघेशळो प्रेम जमून विवाह झाला, त्यावेळी त्या वाहैवै वय
ओनतवच्या वयाच्या दुप्पट म्हणने अट्टेचाळीत वर्षांचे होते.
लन्नतमर्यो बायकरेकडून आठशै परेड त्यास मिळाले, त्या पेंशा’
राजकीय गुरु केले
वर बॉनसनते एक स्वत:चे विद्यलय सुरू केले. त्यांत ड्ग्लडचा
ळोते. त्यार्तेशिक्षये व्यवस्थित व उच्च दजळोपयेत झालेले नस‘
त्यामुळे त्याला ढूरदृष्टि नव्हती; त्यामुळे राजकारणांत त`[
सुप्रसिद्ध नट गॅरिक हा एक विद्यार्थी होता, ती पुढें या
मागातलेलाच राहिला.
नच्या अगी शिक्षकाला लागणारे गुण नसल्यामुळे त्याचे
विद्यालय लवकरच मोडले आणि या उयोगांत जानसनला
बायकव्कडू'न मिळालेला सर्वे `एवजहि सेपला.
पु॰ढ॰ स.१ ७३७ मध्ये नॅ।नसन,लेखण^[वर चरिताये चालवि-
[लेकनचा रळूवन झाल्यामुळे अध्य-
क्ष॰ची जागा त्याच्या गळ्यात आकाहैमक पडली
आणि
त्या
जवाबदारळीढून मुठती घुटती त्याच्या न[काँ नव आले.
तो
मला होता तरळो त्याची भाषणे सामान्य प्रतीची होत. त्याला
दारूर्वे व्यसन फार होते. कमिसमधळील एखाद्या पक्षाचा
पुढारळी होण्याचीद्दि पात्रता त्यांच्या अंगी नव्हती;
मात्र
त्याचा प्रामाणिकपणा व येथे हे दोन गुण त्याच्या शहूंगीळिह
मान्य केले आहेत. [ एनसाक्को. विटा. पु. १५ ]
जैप्नखन. टँप्- साम्पुएल ( १ ७०९-१७८४
)…
हा मुप्रस्कि. प्रेथकार व शव्दकळोशकार इंग्लडहेंतील स्टाकर्डेशापरमघ्ये’ ळिचफळोल्ड ग[व"[ गरळोब पण त[लत व सेमाणित
घराण्यात जन्मला. जानसनचा बापपुस्तले विकणारा दुकानशर होता. र्वोनसनला लहानपणी ‘ स्काफ्युला ’ न[वाचा
रोग झाला होता. तो अनेक अळीपघांती किंवा तत्कालान ॰
समबुतीप्रमार्णे,
ट्टेग्लडची
राज्यकत्री
अन
राणी हिच्या
जळो‘नसनजाडप्यान् या मर्जेदार नकला
करात
असे.
जॅ’प्नस-
ण्यावें ठरवून गें‘रिकसह लेडनलाआला. येयेत्यार्ने फ्रेंच, इटा॰
लियत, लॅटिन वगैरे प्रेथांची भाषांतरे, नव्या ग्रंथांवर ठोका,
प्रसिद्ध पुरुषांची चरिबें, निरनिराळ्या विषयावर [मेबंघ व
कवित[,न[ठकार॰मौच्या सामाजिक विज्ञापनप्ग्रेथापँणपफ्रँपुस्त-
कालयांतील ,प्रयाची विषयवार याद, याप्रमार्णे जो जो उद्योग
सापडेल तो ती त्यार्ने कला.
तथ[[प
लेडनमघोल
त्[चा
पहिली र्पचवळोस वर्षे विपतीतच गेला. पोटाचा चिंता कर्बी
मुटला न[हळो,कध"[कध’[ तर त्याला दोनदोन दिवस अन्नावात्रूवन
काढावे लागले. कजनृमुले दोनदा न[झरच्या शिपायनि पकडले असती त्याला त्याचा मित्र प्रख्यात कादबरोकार रिचर्ड-
सन याते उसने पैसे देऊन सरेडळा’वॅले.
अशा विपत्र स्थितीत
इस्तस्पशनिंद्दि बरा झाला न[हो. जें’प्नसनचा आरंभी
[वैद्य म्यात निचफील्ड यांची झ[ल[.त्याची बुद्धि आते चलाख
व स्मरणशक्ति विलक्षण असल्यामुळे ते एकदां वाचले किवा
ऐकिले ते त्याच्या कायम लक्षांत राहात असे. तथापि तो
शरळोरार्में मला भक्कम व धष्टपुष्ट असल्यामुळे उनाड प`[र[च्या
ददिगाईंव त्याचा पहिला नंबर असे. त्यामुळे शाळेत मास्त'
र[च[ मार त्याला बा‘रवार रवाना लागें. या तत्कालळान शिक्षा-
त्याला ऐन उमॅदळीघे व मर त[स्ण्याच्ळो दिवस काढावे लागले.
तरी पण त्याची नळोति व सदाचरण हो हुटलॉ न[हव्त. जीन-
पद्र्वळोबद्दल जानतन तेवटपर्मेत म्हव्ळा क॰[, पतौजीते जर
कोंश’ तयार करण्यात सांगुन १५७५ [गती देण्याच
मला
मरेमरेतों
ग्त्रूप मारले नसते तर माझ्या हातून फांहा
[शकण झाले नसते.
त्याची प्रमिद्धि बरळोव झाला. नंतर १७४७ स[ल'[ जव्नसनला
लडनमघळोल कित्ग्रॅक पुस्तकवाल्यानीं मिळून‘ इंग्रजी भाषेचा
या कळोशाला पूवसकल्पित
कबूल
दोनतीन वर्ष न पुरती "।८
पुढें
वर्षे लागलो पण माठ्या चिकाटांन व परिश्नमपूवक जानसनते
हा तीसचाळीस हजार शब्दाचा कोश तडीस नेला. या
झेपल्यामुले डिग्री घेण्यापूर्वीच तो घर”[
करेश'ळात काहो शब्दाचे फार चमत्कारिक अये दिले आहेत.
असळो. पुढें १९ व्या वषा ती अ[वस॰
फान्हुं‘ युनिव्हासटाच्या पेंबोंक करिं’व्`नांत राहिला. पण
तीन वर्षांनी खर्व न
सनर्ने लडनमघ्ये आल्यावर ‘ लेडन " व ‘ मानवळी आरोवै
ब्रेकल्य ’ ह’[ दोन काव्थें, ‘ `ए’[`रन ’ न[वार्वे न[टक, तेव्हेज
नामक मित्राने” चरित्र वगैरे ग्रंथरचना केला व तेवढ्यार्ने
बापाच्या दुकानां-
जाक्सन ‘ ट`[र`[ ’ पक्षाचा असल्यामुळे ‘ टोंरो’ म्हणजे परे-
तले ग्रंथ वाचण्याचा न[द लागल्यामुले जानसनला लॅटिन,
ग्रीक, इटालियन या भाषांये सुडां इतके ज्ञान झाले होते
कळी, त्याच्या कॉलेजातील प्रोफेसरद्दि अचवा करळीत असत.
याच सुमारास त्याचा बाप बारला. पुस्तकविकळोवै
परागत धमौला व राज्यव्यवस्थेंला पाठिंबा देणारा, ‘ठिंहग’
कँहणबॅ धमळीची व राज्याची उलथापालथ करणारा, ‘ नरेशम्हणजे सत्रे प्रकारच्या लबाडवालाचाङचा
दुकान चांगले, चालत नसल्यामुळे नॅप्नतनते चारैतार्थाकरिती
मेलेल्या पाहून पाजी लोक ज्या शवठच्या लबार्डाचा उपयोग
परत आला.
तथापि लहानपणापासून
कार ’ म्हणजे.
एक प्रकारचा निरुपद्र्वळी हमाल, ‘देशभक्ति’
करून त्या फुकट
एका शाळेत नोकरी धरला; पण तेथे न जमल्यामुले त्यार्ने
करतात
बमिंगहँम येथे जाऊन
इंग्रजी भाषेचा पाहे लाच क`[श असल्यामळें येथपातून
‘आ’बेनिनिया
देशाची
सफर ’ या
न[वाच्यार्फेब प्रेयाऱ्व भाषांतर करून पाच परेडमिळविले. पुढें
एका लेटिन कवावै यम छापण्याविपयॉ जाहिरात त्यानें [देती
ती लबाडी, वगैरे अथे दिले आहेत
तथापि हा
त्याची
सपत्ति व कपात ’” वाढत जाऊन त्यार्वे पुन्ळील आयुष्य बरेच
सुखळार्ने व स्वस्थतेत गेलें.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५१
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीव न[नलोंश जॅ‘ळानरनन, डॉ. खाग्न्युए'ल कोशांच्या कामगिरोच्या काळातच जत्नसनर्ने ‘ रँबलर ) (ज) २२८ जानीवैग हुखँन मिर्झा आले आणि त्याचा पुतळा सेट पॉल चचैमघ्र्ये अप्रभागौ व..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीव न[नलोंश
जॅ‘ळानरनन, डॉ. खाग्न्युए'ल
कोशांच्या कामगिरोच्या काळातच जत्नसनर्ने ‘ रँबलर
)
(ज) २२८
जानीवैग हुखँन मिर्झा
आले आणि त्याचा पुतळा सेट पॉल चचैमघ्र्ये अप्रभागौ
व ‘ ऎडलर ’ हे दोन निबेषसप्नह लिहिले. कळोशग्र्नतरचा प्रेथ
स्थापिला आहे. बाँनतनच्या मागें त्याची एक सावत्र मुलगी
प्रसिद्ध कादंबरी ‘रातेलस’ हा होय. [’हे’वै सरै’देघानक अगदी होती. त्यासे‘ आपली सर्वे निदगी व मुमारे पधरा हजारांची
लहान व असे असले तरी भाषेचा भारद्स्तपणा व होल, श् ऐवज आपल्या कार वर्षे जवळ असलेल्या शिद्दळो चाकरास
वगैनाचा मोहक केला व आयुष्यातील स्थित्यतरार्वे यथाथे म् दिला. बाँनतनर्वे शरीर दाडर्गे ह`[ते,पण उतार वयात तर ते
व नित्तवेधक विवेचन या गुणांमुळें' हो कादंबरी इतका लळोक-
अवजड,
चेहरा शस्नाकेयेमुळें विद्रुप आणि
त्याची दृष्टि
प्रिय झाला का लवकरच तिर्चे’ भाषांतर हूंरोपतिल्या साऱ्या [ अमू बनलळी होती. शिवाय त्याला एक मेंढूचा रोग जडला
भाषांतून झाले. कॄष्णशखी चिपळूणकरानॉ यार्चे उत्क्रुष्टऱ् होता त्यामुळे त्याचा स्वभाव त्रामिक व क[ह"[स[ म्रमिष्टा'
सारखा बनला होता. तो शूळपाहूंनच त[पठ, सत्या‘प्रेय,
मराठी भाषांतर केले आहे. १ ’६० सालापासून जव्नसनची
त[पात्तेक स्थिति चांगली मुघारन गैलळो. तिसऱ्या जॉज राजाते , निस्पुह व मानळो होता. त्याची कल्पवाशक्ति फारशी सूक्ष्म
मोन्नैम'डळाच्या सलयावरून बॉनसनच्या ग्रेथकद्रुरेंत्वाबद्दल : व चलाख न’हुन बोजड व अवजड अशा त=`हची होती पण
त्याला त[लळोवा तीनते रोड वषोसन सुरू केलेयेथपातून बें‘[न० म् तक उर्फ विघेचनशक्ति मात्र विकेष प्रखर बनली होतीसन तत्कालळीन पडितमडळांत अग्रगण्य ठरूळंग् मोठमळोठें विद्वान व हुं त्यामुळेच
काव्यकादेबरीनाटक
यापेंक्षां ट[क[त्मक
प्रथा…
ग्रंथकार त्याच्याशी शिष्याप्रमाणें वायूंळा लामलेलाँनसनला वाद ; बद्दल व वादविवादपटुत्वाबद्दल त्याची कव्र्ति फ[र
निवादाची वि`शष होत असल्यामुळे याच मुमारास त्याते एक आहे. नांनसन हा ड्'यजसमाजाचा प्रतिनिणिमृत इसम
क्कव काढला, तो ‘जें‘प्नसन्स क्कब“ म्हणून ५०-६० वर्षे चालू; गणला जातो. म्हणजे बॉनसनच्य’ अगवै गुण व त्याचप्रमाणे दोष `ह` सवैसामारणत; एकदर इंप्रज समाजाच्या
होता. या क्कबांत जरैनसनचा समकालीन प्रसिद्ध राजकारणी
पुरुष बकँ, इतिहासकार गिबन, नटवयै गेंरिक, का'दबरळीकार अ'गों दिलून येतात.
गोल्डस्मिथ, चित्रकार रेनोंल्डतुं, प्रख्यात वचन फॉंवन्त,
[बोंस्घेलर्ते स. १७९१ त प्रसिद्ध केलेले जळो‘नसनर्वे चरित्र;
भाषाभिड्ळा सर विल्यम जोन्स वगैरे मेडळळी अखून ती दर मिसेत मि ओंझी, रेनौल्डसु वगैरेच्या आठवणी; मेकालेच
आठवड्यास एकदा एकत्र जमत व तेथे जेवण व सभाषण हो
दोन्हो कामे बरोबर चालत. तेभाषण बहुघां जुन्या व नव्या
र्बोनसनवराल [नबध व त्याचाच
ग्रँथकारांबद्दल चाले. बाँनतनडेंळा चरित्र लिहिणारा वुप्नासेद्व : होत ]
वें’प्ससेल हा या क्कबचा अनेक वर्षे सभासद होता व त्यार्मे
जावसाग्:
वावर…हें
बाँनसनच्या व त्याच्या मित्रमंडळीच्या भाषणरत्नांचा सप्नह हुं ण्याते न[व अत्रूस्न देहरादून
‘बॉनसनवै चरित्र ’ या प्रेयांत मोठ्या चातुयोसे करून थासे व्यामिला आहे.
ठेवला आहे,
त[पात्तेक
स्थिति मुयारतांच
र्वोनसनचा पळोष्यवम्’म्द्दि
वाढला. त्याचा बायकळो स. १७५२ मध्येच वारलळो होती पण
बाँनसन'नं आपल्या घरी कित्येक पग् , निराश्रित खाँपुरुषांनां
आश्रय दिला होता. तो स्वत: मात्र मेल न[वाच्या ’ [मत
द्र्तमाच्या घरळो राहत असे. कारण मिस्टर व मिसेत घेल
यांची त्यास मक्तिर्भूवक ठेवून घेतले होते.
विष्णुशाखाँ चिपळूणकर
याची निबेधमालेत केलेला अनुवाद, इत्यादि
सेपुक्तप्रांतातील
सेदर्भप्रथ
एका परग-
जिल्ह्यांतील जकात
तहशांल
जोन, रँवग्ठऱ्-हे डॅनिश वेस्ट इंडळीजमथील देठ सेट
थॅमसच्या पूर्वेस ४ मैलावर आहे.` हेंफे१ ० मैल लांब व ४।। मैल
रुंद अढून याचे क्षेत्रफळ २१ चा. मल आहे. हैं बेट डोंगराळ पण चांगले सुपीक असून यात पाण्याचा पुरवठा
चांगला आहे. येथे व्यापार फारच थोडा चालतो. लोकसंख्या
सुमारे एक हजार आहे.
र्वोतबेलवरोवर ळिहवैडीज
जानीवैग तुस्वैन मिंज्ञी--हा ठदुग्चा नवाब होय. हा
बेग्रंची सफर केला व तिचे वर्णेन प्रसिद्ध केले. नंतर त्यार्ते
घेतला. त्यात से’व्ह`ज, क्रौंले, ड्रायडन, पोप, प्रे. मिल्टन
त्याच्या आजाच्या मागून स. १५८४ मध्ये नवाब झालाहा
गादळोवर बसल्यानंतर आपल्या मेटळीत येईल अशी अकबर…
शहास खात्री वाटत होती. पण हा गेला न[हो
तेव्हा
अकबरार्ने याच्यावर अबदुल रहोम यास पाठविले (१५९१).
अवदुलनॅ प्रथम जाचीबेगचा पराभव केला व पुढें पुढेंद्दि
वगैरे दहा कवॉची चरित्रे लिहून स. १७८१ मध्ये येथ पुरा
त्याच्या सेन्याचा न[शच हे‘त गेला म्हणून त्यार्ने अकबरार्वे
केला. बाँनसनच्या एकंदर ग्रंथांत हा सवॉ‘त्क्रु'ठ असून तो
मांडलिकत्व पत्करले. त`[ स्वत“:
१७७३
साली
नोंनसनते
शैवसषीअरच्या नाटकाची सटोंक आवुत्ति मोठया प्रस्तावकै
सह काढली. जौनसनचा शैवटचा ग्रंथ ‘कविचरिर्ने
’ हा
त्यार्ने १७७७ स[ल"[ म्हणजे वयाच्या सत्तराव्या वर्षी
हाती
अकघरास
जाऊन
भेटला
( १५९२ )॰ तेंव्हा त्यार्ने त्याला मोठी अमिरळो दिला. मात्र
ताबडतोब लोकप्रिय झाला. यापुढील जॉनसनच्या आपु’
घ्याचीं वर्षे इष्टमित्रांवें वियळोगदुऱ्ख व वार्पवयक्केश यान
जाऊन तों जलोंदरानें स. १७८४ मध्ये मरण पावला. त्याचें
तेव्हापासून निधप्रांत मोगलांच्या साम्राज्यात मोडूं लागला,
शव वेस्ठमिविस्ठरच्या विख्यात
त्याचा पुत्र मिलाँ माझी हा ठठ्ठचाचा नवाब बनला. [ बांल]
स्मशानमूमत्त ठेवण्यात
ज्ञानी हा वुऱ्हस्पापुरास स. १५९९ त मेला; व त्याच्या मागून<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्र‘हेंप्य त[नकव्श- (ज) १२९ जातेफ्यू'ळ त[पंफळळंव्दृऱ्हाड‘मघ्यप्रांत त[टुक[ मेहकर, [जल्हा जारॅफराचाद ) सटझर्णियर यान येथझिंळ् कांहीं लाकस्कि ग्लिह्वा घमा'वो [द्क्षप् बुलढ..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्र‘हेंप्य त[नकव्श- (ज) १२९
जातेफ्यू'ळ
त[पंफळळंव्दृऱ्हाड‘मघ्यप्रांत त[टुक[ मेहकर, [जल्हा
जारॅफराचाद
) सटझर्णियर यान येथझिंळ् कांहीं लाकस्कि ग्लिह्वा घमा'वो [द्क्षप्
बुलढाणें. मेहकरच्या उत्तरेस सुमारे१० मैलावर हे खर्डेगांव दिला येथ जेंसुहट लाकाच एक[ विश्वविद्यालय असून ड[’[`मन[…
आहे. लळोकस'ख्या सुमारे दोन ह.जार गावास मडळी आहे पूवा
कन पथाचा एक मठ ह`[त[.१६५८स[ला डच लोकांना पळोतु-
हा गांव देऊळगांव ( राजाच्या ) जाधव घराण्याकडे होता.
गांव लोकात हाफून लाविले येथे १८१८ त इंग्रज मिशनरी
गावाच्या मध्यभागा एक
न स,
झाला.
दिपमाल
आहे.
नावाच्या एका त[घुची जुना समाया आहे.
येथें मुकुंदराज
हा
मुकुंदराज
प्रख्यात विवेका‘सेघुकार मुकुंदराज नसून दुसराच असावा.
१८२२ त अमेरिकन
जाफरखान-या
मिशनरी
मेडळाचा
उमदतु-उल॰मुल्क हा
प्रवेश
किताब
येयाल बाटिलकळी शिदखेडकर जाधवराव घराण्यात पूबाँपार होता. याचा बाप सादिकखान हा शहाजहान याचा गीरबक्षो
होती. येथें या जाधवार्वी एकगढो बांधली आहे. बुलढाणा ` होता. शहाजहाननें जाफरखान यास पचहजाराची मनसब
जिल्हा होण्यन्यूर्वी या गांवळीच ( अव्वल इंप्रतीत ) निल्त्यार्वे ‘ दिली व अळीरंगझेवार्ने त्याला आपला मुख्य वझीर केले
मुख्य ठिकाण होते. [ काळे-वऱ्हाडचा इतिहास ]
ऱ ( १६६० ) हा शहाणाव ढूरदृष्टांचा होता. हा स. १६७०
जांतौजी निंबाळकर-हा मोंगलाहैं
( निजामर्चे त[दछो` यथें मेठ[,पुढें काहा दिवसानी त्याच्या अस्थि
राज्य ) मधळोल रावरंभा निंबाळकर घराण्याचा घूळपुस्षयाचा
दिक्कीहून काढून आया येथे नेल्या. हक्की आग्न्यास यमुनेच्या
पेशव्यांच्या ॰ उजव्या तीरावर यावे थडगै आहे. [मआसार-ईं-अह्मा'र
'
५
१
'०
'(ध्
"
वाहून पुष्कळ वळ[ पडत अस. मागलाइत सवात माठो बरा… हु गिरी; चील-अळोरि, बायाप्रॉ. डिक्शनरी ]
बाप पुलतनिजी.
हा पेशव्यांच्या राजकारणांत
ठयांची जहागीर
या रावरंभाचीच आहे.
निजामुल्मुल्क
तेल्यानंतर गातीउद्दळोन यास गादीवर बसवून मोगलाईं हाता-
जाफराबाद, त त्या सत्…मुबईं इलाख्यात काठेंवाड
परेळिलाटेकल एजन्तीमघ्यें हे संस्थान आहे. हे सेस्थान कोंकण
खाली आणण्याच्या नानासाहेब पेशव्यांच्या मसलतळाला याची
किनाऱ्यावर
अनुकूलता होती. त[राबाईंते निजामाकडे केलेले पेशव्यांच्या
विव्द्व कारस्थान ( १७५१ )मळोदून सलाबतजगाचा व न[नात[हेबांवा स्वेहाचा तह याच जानोजीते पानगळ येथे घडवून
आणला. या कामासाठ'व् जानोंची त्या सालच्या आगष्ट माहे… ळं
मुंबईपासून हे सस्थान १६५ मैल आहे. येथे दरवर्षी २५
इंच पाऊस पडतो. ज्यावेळी मों'ऱ्ल वाद्शहांची सत्ता
ज'जिऱ्याच्या
नवाबच्या
अमलाखाली आहे.
काठेंबाड मुळुखति कमी कमी होऊ लागली
त्यावेळी म्हणजे
स.१ ७३६ च्या सुमारास ठिकठिकाणचे ठ[ण्`[द[र स्वत॰त्र झाले
करण्यास
व त्याची मुसुलमान लोकांची [शबंती व मुळचे कोळी लोक
पुष्कळ दिवस येऊन राहिला होता. जानळोजी बहुघां करमाळे
कार-
ह्यांस घेऊन चांवेग्निळो सुरू करून सुरतेंच्या व्यापारास
बराच प्रतिबंध केला. तेव्हा जनिरा येथळील शिदो [‘हेलाल
बुडबार्वे असे होते, त्यास
याने ह्या लोकांचे बँड मोडून टाकले, त्यांची जहाजें नाहाशौ
त्यात
पुण्यास
येथे राहत असे.
पेशव्यांच्या दरबार"!
वाटावाटळो
नानासाहेब पेशवे व युती याचे एक
स्थान निजामवै राज्य सपशेल
जातोजी मधून मधून मदत करी; परंतु हे कारस्थान शैव… ` केली व जाफराबादच्या ठाणेंदाराकढून जल्वर खंडणी
टास गेले न[हो. विश्वासराव पेशव्यानें सिद्खेडची जी स्वारी मामितलीहळो खंडणी देण्यार्वे सामर्थ्य ठणिदारांत नसल्यामुळे
निजामप्वर केली, तीत जानबा हा निजामातर्फे हजर
( १७५७ ). उदुगौरच्या लढाहेंत हा इतर नसून
राहिला होता. [ राजवाडे खड, १, ३; भाऊसाहेयांची
न[नासाहेबांची रोजनिशळी; त[नै-फ्त्रै, यादी’ ]
जाफन[…या शहराचे तामिळ न[व यहानसू असे
होता, ` त्यार्ते जाफरावाद स’स्थान शिद्दीस विकले. परंतु त्या शिद्दीत
घरीच _ त्या सेस्थानची व्यवस्था राखता न आल्यामुळे त्याने हे
संस्थान १७६२ मघ्यें र्जजिऱ्याच्या नबाबाच्या ताब्यात दिले
बखर;
आहे.
हे सोलीव ब`ट[तील एक गांव आहे. येथॉल लोकसंख्या
१९११ साली ४०४४१ होती. येथील न[रळांची वाढ अलीकडे दुंचठली आहे. येथील मूळचे रहिवाशी तेबाखु उत्पन्न
करून ती परदेशी पाठवितात. येथे दर आठवड्यात आगबोंट
येत असल्यामुळे येथील व्यापारात बरेच उत्तेजन मिळाले
आहे. १९०० साली या शहरी आगगाडी चालू करण्यात
व आपण त्या नबाबातके त्या सस्थानचा सुभेदार झाला.
ह्या सेस्यानची लोकसंख्या सन १९११ मध्ये १२३७३
होती. ह्या सस्थानची मुख्य पिके बाजरी, कापूस व गहूं
ह”[ होत. यथें इमारती बांधण्यास उपयोगी दगड पुष्कळ
मिळतात व जार्डेमरर्डे कापडा’हें तयार होते. एकदर
तेस्थानर्वे उत्पन्न सन
होते.
१९७३-४ मध्ये ६२००॰ हजार
त्या सस्थानांत मुख्य शहर जाफराबाद आहे व तेथे
म्युतिनिपाळिटळो आहे.
श ह र.…जाफराबाद तेस्थानर्चे हे मुख्य शहर
आली. येथें सरकारी एजट व जिल्हान्यायार्धांश राहतात.
आहे.
येथे वरिष्ठ फौजदारा न्यायकचेरीची बैठक असते. तेथील , येथील लोकसंख्या (१९११ ) ५५८८ असून हे समुद्र…
त[ड[च्या झाडांपासून एक प्रकारर्चे सूत काढतात.
किनाऱ्यापासून एका `मैलावर रणाद्दे नदळोच्या तीरावर आहे
हे शहर तामिळ लोकांची ख्रि. पू. २०४ या वर्षी स्थापन व हो नदळो दळणवळणांस फार सोयीची आहे. त्यामुळे
केले. येथे त. १६ १७ पयेत तामिळ राजे राज्य करीत होते;
ह्या शहराचा व्यापार मोठया प्रमाणांत चालतो. ह्या शहराचे
फ्रतु १६१७त हे पोर्तुगीज ल`[क[न’॰[ घेतले. स. १५४४ मध्ये
हे नांव गुजराथच्या मुझफर न[वाच्या नबावावरून पडलेले
0<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५३
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>म’हांराट्रीय शांनकळोरा. ( ज ) २३०
;नाफराबांद्
ज[भळी जमळीनदारळी
ह्मा शहरी जंजिंऱ्याच्या नबावाचा प्रत्तिनिघि म्हणून )
ना या ल शप् ख[.-शुल्कयबुर्वेदाफैकॉ वाजसतेयी यांच्या
स्नरा
येदावेंफॉं ज[व[ल हा एक काखामेंद् असल्याचा उक्केख
एक यामलतदार असतो व त्यास व्यायाघळोशप्चा व मुलकळो
; चरणव्ग्रूहोत आहे (चरणव्यूह पहा ). ज[व[ल शाख्त्वद्दल
कामयाराचा असें दोनद्दि अविकार आहेत.
ज[फरप्व॰द्…सवुक्तप्र[त, जळोनपूर जिल्हा व तहशिलो’ माहिती पूर्वी ज्ञानकोश [ते. २ पृष्ठ १९६ येथे दिली आहेच.
आर्हे'
तळोल हे शहर गोंमतळो नद्ळोच्या उजव्या किनाऱ्यावर वसलेले
असून आय…रळोद्दिलखंड
रॅल्वेंवर जोनपूर शहरापासून
५ मेल आहे. येहूंन नुकताच एक फांटा अलाहावाद्ला नेला
आहे. याची लो. ते. १९०१ स[ल“[ ३६१८ होती. या
शहरास'बॅंपाँ दंतकथा बऱ्याच आहेत.
१३२१ सालात
ग्यामुर्दान तघलखते
मोड करण्याकरिता
लढाईच्या ऐवजव्
मुसलमान केर्के.
आपला मुलगा ज[फर याजला रजपुताचा
ज[फरावादेस पाठविलैं होते. व्यार्ने
धर्मावर चचौ करून पुष्कळ रजपुतांस
पुढें ज[फररवातात त्तेर्थांल मुभा देऊन
गांव`च न[व ज[फराबाद् ठेंविकैं. १३५९ स[ल“[ फिर. 1
तघलखतें दुसरे शहर बनविण्याचा प्रयत्न केला होता. तेथे
देवळें, ड्यारतळी, थडगों वयेरँ घरळीचशळी आढळतात.
येये कागद तयार करण्याचे कारखाने
बरेच होते.
पूर्वी
आतां
चरणव्ग्रूहाच्या एका हस्तलिखित प्रतौतोल र्थंकेत द्दिळेंल्या
काब्‘लेकाषुराणांतोंल एका अवतरणांत‘ जमद्प्नळोचा पुंज जय
व जयाचा ज[व[ल ’ अता उक्केख दिला आहे व त्याच टांवॅट्रेत
सहृग्प्द्विख्'व्डरॅतांल एका उताऱ्ययेंत ‘ ज[व[ल हेपक्तिपग्वन
असून त्यांची वस्तों पयळोष्णळो नद्ळीतळीरी
असल्याचा उढेंरव
केतेला आढळतो. वऱ्हाडांत अकोला जिल्द्यांत “ ज[व[लसघ ” ज[व[चळी एक सस्थाद्दि असल्यार्वे समजते.
या या लॉ प नि प दृ॰-ज|व[ल[च्यान[व[वर एक’द्र त[न
उपनिषदे आहेत. एक ज[व[लद्ईंळानोंपनिपदु, ड्रुसरें नृहज्बा‘
वालोपमिंपद् व तिसरे ज[व[ल्पुपनिंषदू. पहिल्यामघ्ये योगा'
म्यळातासंवपीं माहिती अधून दुसऱ्यांत प्रजप्पतांपासुन उत्पन्न
झालेल्या भुसुंड?” मस्ममद्दिया कथन केला आहे व त्याला
त्या उप्रांनपदांतच‘ड्रुहज्तावालामिंघां मुळिक्तक्षुति‘ असे म्हटरॅठे
काहीं एक नसून कारागीर लोक गांव सोडून कलकत्ता वगैरे ` आद्दे. तिसऱ्यांत ज[व[लोनॅ पेंप्पलार्दास भस्मयारणमाहात्न्य
सांगितलॅं आहे. या उपत्तिषट्रांत ज[व[ल या व्यक्तींचा उव्द्वैख
परंतु उपा‘नेषदांतौल
. नसुन ज[व[[ले अते न[घ आढळते.
ज[व-र्हे न[व काहीं ठिकाणी पेंस्द्स व कात्रूळाच्या फळास ऱ् विषयसठिंयामुळें कदाचित ज[व[लव ज[व[लि या व्यक्तीं दोन
लावतात. परंतु ह्मारँवरळोज ज[व ज[व[रैच निराळे झाड आहे नसुन एकच व्यक्ति असावी अशी कल्पना होते.
ठिकाणी
आहेत.
उद्रनिकाँहाका’रॅतां गेलेले आहेत.
येथे रे शाळा
व त्याच्या दोन जाती असून एकळोस आंबट
गोंड ( मलाखळो ) ज[व असे म्हणतात.
झाड उंच असतें व त्यास त[वडया रंगाचीं
त्याचौ फळे पांढरा व मोठी असतात. व
ज[न व ट्टसरळीस
र्जाबु घोडप्-ष्-पुंचईं, रॅवाफांठप्. न[स्वकोठ सस्यानते
आंबट ज[व[र्वे हें मुख्य ठिकाण. हे वायव्येस क्षुमारें १[२ मैलांवर स्रोटवार
फुले येतात; व ’ येथें येथळोल सरदार राहतो. येये स. १८५८ त व्या व केवळ
त“[ मापँशळोपें व हे यांच्या पुढारळीपणळाखग्ल’व् न[इकांन‘ळो एका ब्रिटिश ठुकडळीवर
पौष या महिन्यांत येतात. मलाखो ज[व[र्चे आड वहुतकलन
हल्ला केला होता. येथे एक शाळा व रुग्णालय आहे.
मलाका तेटांनून आल अता’वै. हे झाड 'उच वाढत न[हक्त. भ्
ज[व्लोस्फांव, प[ल( १८४७-१८९४ )…या रशियन
यांस पांढऱ्या र'याचीं फुलें येतात व फळे पिवळसर असतात.
विंद्रुग्च्छास्त्रज्ञाचा जन्म रशियांतांल सरडाव्स्ष् गांवळी झाला.
तों मधुर असून त्यांस ठुवासद्दि येतो.
दोन वेळ पिकतात. “ पेंस्ऱ्
लैखळिह पाहावेत.
ह? झार्डे वर्षांतून
व “ काड्रुळा ” या शव्र्दाखालोल
१८७१
साली त्याला रशियनसरकारते त[राय'न्नखात्यावर
डायरेक्टर नेमलॅ होते;
परंतु
१८७५
साली त्यार्ने या
ज[गेंचा राजीनामा देऊन विद्युद्दळोपांत लक्ष्य घातर्ले. १८७६
जांवघप्न-वह्मदेवाच्या ज[भयीपालून उत्पन्न झालेला हें सखी तळो पॅरीस शहरा रहावयास गेला, व या वर्षाच्या
वानर हा मोठा पराकमळो होता व रामावतारा याने रामाला अखेरीस त्याते एक बैद्रुग्त्तिक मेणचत्ती शोधून काढला; या
पुष्कळ सहाय्य केल. हा कूष्णावतार होईंपर्मेत होता असे मेणवत्तांस त्यावैच न[व [देखें आहे. काबै’नच्या र्फाङया
वाटते.
याशॉ किंवा याच्या वर्शातौल
कळोणा एका
ज[व-
सयान्तर ठेवून त्यांच्या दरम्यान योग्य
विद्युद्रोघक पदार्थं
वावाशौ क्रुष्णाते स्यमंतकमण्याच्या प्रसंगाते युद्ध होऊन बसवून त्या र्फाड्यांतून विद्रुग्त्प्रवाह पाठवून एक प्रकारचा
त्यार्ने आपली कन्या ज[ववतळो कृष्णास दिली होती. [या. : द्वीप तयार करतां येतो, अते त्याने दाखवून दिल. काही
रा. न[ल व युद्धफांड .]
ज[व[ल-एक क्रा’षे. याचेच सत्यकाम असे दुसरे गांव
आहे.
याच्यासंबेघळी छाद्ळोग्य व नृहदारण्यक उपनिषद्ति
आलेलो कथा ज्ञानकोश विभाग २, पुत्र, १६६ येथे दिली
आहे. ऐतरेय याह्यणांत ( ८. ") क्षन्नियांनां होणाऱ्या
राज्याभिषेकप्रसगौ पठण मरावयाच्या मेन्नासवेर्धी ज[व[लामें
आपते एक विशिष्ट मत दिल्याचा उक्केख आहे.
काळपर्येत या दिल्याचा प्रसार झाला.
जास्त उपयुक्त अशा
दिवे मार्गे पडले.
विंद्युद्दीपप्ची
परंतु याद्दिपैक्षां
मुक्ति निघाल्यामुळें
ज[व्लोस्काव याव्ळा
हें
विद्रुग्च्छाघांत ट्टसरे
फांह'व् शोध लावले आहेत, परंतु तों रशियात परत गेल्यावर
दारिद्र्याँत मृत्यु पावला.
ज[भळी जमीव्द्भ्री-श्राध्यप्रांत, भण्डारा जिल्हा,
ताकाको तहसिलोच्या वानव्येस हळी जर्मानदारळो अलून
।र्हेचँ<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५४
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जांम्ळं मंढ्याट्रीयशांनफॉंफांज्यांन्त्ड्ट् एक'द्र क्षेत्रफळ १५ चौरस मैल आहे. पैकॉं हु जमल "` आहे. जमीनदार राजपौड असून मांडला राजांच्या वेळे- जामदारखानंप् स्पयांनें आहे हा प्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जांम्ळं
मंढ्याट्रीयशांनफॉंफांज्यांन्त्ड्ट्
एक'द्र क्षेत्रफळ १५ चौरस मैल आहे.
पैकॉं हु जमल
"`
आहे.
जमीनदार राजपौड असून मांडला राजांच्या वेळे-
जामदारखानंप्
स्पयांनें आहे हा प्रांत बहुतेक डोंगराळ असून शैर्तांर्वे उत्पन्न
कमी येते.
केली वाहणाऱ्या क्रुळांयां विशेष हक्क न[हत्त.
पासून हा जमीनदारा यांच्याकडे चालत आहे. उत्पन्न१३ ॰‘॰
येथील जहागोंरदारास
न. न ठाकरेळो ३७५ रुपये.
येईल. तेव्हा तो क्रुळाकड्न जमीन काढून येतो. या भागांत
बांमूळ-या वुक्षास सस्कृतमघ्ये जेवूवृक्षरप्जजबू; मराठींत जांभूळ; गुजरार्यांत ज[बुडा इत्यादि न[र्वे आहेत. हिंदु…
स्थानांत ज[मळीबों झार्डे सवैच होतात. हा नृक्ष फार डच
वाढतो. याच’[ पाते बक्रुळळोच्या प[न[प्रम[णें असतात.
ळोच्या झाडास
वैशाख-ज्येष्ठांत फळे येतात.
ज[म-
या फळांचा-
जामतारा-बिहारऔंरिसा. सताळ परगण्याचा नेर्स्टत्टभ्
कडील एक पाँटविभाग. उत्तर अक्षांश २३॰ ४८’ ते रउंष्‘
१०’ व पूर्वे रेखांश ८६॰ ३०’ ते ८७॰ १८’.क्षेत्रफळ ६९३
र'ग बाहेरून काळसर व आतून त[वूस असतो. जगलो ज[म-
चरेरस मँल.
( १९११ ) २०५६४६.
फळ मोंठो असून गोड असतात.
त्या झाडांस रायर्जासूळ
असे म्हूंणतात. ज[सूळ हे शरळीरास [हेतकारक
आहे. ज[म’
ळीचा छाया कार थंड असून सुखदायक असते.
ज[भळांवै
लाकूड फार चिवट असते. ते पाण्यात कुजत न[हो. हेलोत्रूव्ड
इयारतकायासा‘हे उपमोंगॉ पडते. ज[मळळोच्या ल[कड[त
पाणी स्वच्छ करण्याचा मोठा गुण आहे. ज्या तळयांत
शेवाळ वगैरे झाल असेल त्यांत ज[भळीवै ठरेंकळे टाकठे तर
पाणी स्वच्छ होते. याचे औंपघळी उपयाँगांहे बरेच आहेत.
र्जाभेर्तीर, बाळ गेगाघग्ऱ्
(
१८१०…१८४६
)…
एक महाराट्रोय पंडित वप्रेथकार. राचापुराजवळ पाँभुर्के” गांवळो
यांचा जन्म झाला.
यानळा इंग्लिश, सरकत,
कानडी, फारसी
त्याच्या मर्जीस
शिक्षण फार कमी आहे. प्रख्यात तेटया भिल्ल हा या मेळ,`
घांर्टातच वावरत होता. [ काळे…वऱ्हाडचा इतिहास ]
ळीर्ची फळें न[रळोक असतात.
परतु चगळीच्यांतळोल झाडांची
र[ज[ म्हणतात;
हा प्रदेश खडकाळ
ज[मद्ग्रखप्नप्,
आहे.
लोकसेख्यां
यांत एव'त्र्द्र १०७७ खेडी आहेत.
ज[ व ता.…यामदारखावा
म्हणने
राजाचे प्रप्वर्णांगार ( वस्त्र व कापडलत्त्याचीं
काठो );
हा
(
कारखाना
‘ अठरा
अठरा
कारखाने ’
काऱ्याचें काय काम असे व
कारखान्यांपैफाँ
पहा
).
एक
आहे
यावरील
आये-
त्याबद्दल सरकारांवून त्याला
काय सन्मान व काम हक्क मिळत त्यांची यादी खाली दिली
आहे. हे [’नेयम सातारने प्रतापसिंह छत्रपति यांनळो तयार
करविले होते. प्रतापाँसहानें याप्रयाव्ळा अठरा कारखान्याचे
व इतराहे राज्यकारभारातळोल अनेक खात्यांचे घोर [नियगा
बांवून [देते हळोते. ज[मखान्यावरच्ल
ज[मदार म्हणत. हळां ज[मदार
हे एक
मुख्य आपेकाऱ्यास
आडनांव
आहे.
वगैरे भाषा येत असून भारतीय व पाश्चात्य ज्योतिष व इतर
द्ररैया म्हणने` व्यवस्थापक; हक्कीज्यास ठुपप्‘रेटँडट म्हणतात
विंयांतांहे हे निष्णात हळोते.स.१ ८२९ मध्ये एलफिन्स्टन विद्या-
तसल्या दज्र्योचा अधिकारी. १ द्रळोगें व कारकून व
ज[मदार यांनॉ एकंढ्र कापड शिलकळो व खरॅदॉ वयेरे जमा
लिहून, ज[मदार यास यादॉप्रमार्णे नसू करून देऊन खचँ,
लयात गणितशास्त्र व ज्योतिष शिकविण्याला य[न[ प्रोफेसर
नेंमिंर्ले. मुंबईतील
जिआँग्नफिकल ब रॉयल एशियाटिक
सोसायटी यांच्या विद्यावुद्वीच्या प्रगतीला याळशास्त्रयानॉ
पुष्कळ मदत केली. यानीं कित्येक ग्रंथ तयार केले, त्यां’
पँफॉं वालव्याकरण, नळीतिकथा, सारसेप्रह, भुगोंलविद्यां,
इंग्लड देशाचा इतिहास, एलफिन्स्टनकृत हिंदुस्थानच्या
इतिहासाचा स्क्षिप, इत्यादि होत. मृगोलशप्स्त्र व गणितभाग या ग्रंथाचे मराठी भाषेत उतारे त्यांनीच केले. शिवाय
मरेर्वे व्याकरण शो'ळिघर्के.
इपेंण न[वावै सामाधिक पत्र यानीं कित्येक वर्षे चालविंल.
हे पत्र मराठी व इंग्लिश भाषांत
होते. [देग्द्शनै न[वावै
देणगळो,
येजवानळो व हुजूर पोशाख एकद्र यार्दावर
ळिहून
नंतर कापड, आहेप्रयार्णे खचँ होणें ते व्हावें. या कामांत
काहीं लयाडी न करता इमानेइतवारें सावघगिरळीनें वर्तोन,
कापडाचा जमाखचँ चुक लागो न देतां वरयेवर सरकारात
[हेशव दाखवून, क्लिक याको कळवनृत ज[वळी. सद्रदूं
स्मिद्देलैप्रयांये बेदोवस्त जलद्ळीने हुशारी राखाँल व चाकरंप्
करून दाखवाल त्याजवर सरकार मेहेर होईल. स्वच्छतेमे
असत जाते. घरास वगैरे ज[तां येतां हजोरनळोस यास रुट्टा
होऊन ज[त जाते. एक असामी
कारकून यांनी ज[रंऱ्प्रमर्णि
मासिक पुस्तक याच्याच आश्रयानें कांहीं वर्षे निघत होते.
जामखेड-…पुंवदे. अहमदनगर बिल्ह्माचा एक ताछुका.
हुबूग्र नेहमी असावें. ज्याची विनति व रद्वद्लळी करणें तों
त्याचे समक्ष करू नये. कारखाने मजकूरवे कामगिरॉचे
उत्तर अक्षांश १८" ३३’ ते १८॰ ५२’ व पूवै रेखांश ७५’
होता. स. १९०३’४ सालळोउत्पन्न १०७००० रु.हळोते.ज[मग्सेड
इरादें आहेत ते चप्लतच आहेत. परंतु सरकारचे मनांत जो
कामांत वाकव दिसेल त्यास कामगारळीस घाडतांल. तळो
कारखान्याचा इरादा नव्हे. सरकासंतून कायदे चालावयार्वे.
कापड खरेड्ळी करणें व दरपेठेढून आणावयाचें ज[हल्यास,
हे ठाप्याचें गांव असून तेथे सरकारी कचेऱ्या आहेत. जव-
खरेद्ळी करावयास ज[ईंल त्याजबरळोवर कारकून व ज[मद्प्र
ळच रामेश्वर महादेंवार्ते स्थान आहे.
चौकस, सरकार किकायत कराल, त्यास पाठविले ज[ईंल.
राबत्यास सणगें लागतांल तों कारखान्यातून घ्यावॉ. खा`स
११’ ते ७५० ३५’. क्षेत्रफळ ४६८ चौरस सेल. यांत एक
गांव व ७५ रेवडॉ आहेत. लोकसख्या १९११ मध्ये ७८९६"
जामगङ-वऱ्हाडांतोल नेळपांट प्रांतात ज[मगड ही
एक लहानशी जहागीर आहे. तिचे उत्पन्न साडेचार हजार
३०
पोशाख व दागिने सणगावे सरकासंत
तयारळी
करून द्यावे.<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराब्रूयि शप्नकळोश ( ज ) २३२ ज[मनगर कारखान्यात ज[मदार व शिफ्ळी व पटयेगप्र व परीट यांजपासून सरकारकाम घेत असाचे. केले दुपट्टे व चाद्रा ( छग्पतव्च्या ) अंगावर घालणे त्या ज[मदार यांनळ..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराब्रूयि शप्नकळोश ( ज ) २३२
ज[मनगर
कारखान्यात ज[मदार व शिफ्ळी व पटयेगप्र व परीट
यांजपासून सरकारकाम घेत असाचे. केले दुपट्टे व चाद्रा
( छग्पतव्च्या ) अंगावर घालणे त्या ज[मदार यांनळो चुपूळान
याव्या.
ज[मदारखान्याकडून
वर्टी पदाची
न्यावयाच'व् तेथें न
जार्मांनकळी
ग[व[च्या दृक्षि`णस ३२ मैंर्लावरदें ६५१७ (इ. स. १९११)
लोकवस्र्तांचें गांव आहे. येथुन मुलतान व सक्कर या वाकूस
पुष्कळ नांळ रयाना होते. इ. स. १८७३ मध्ये येथे म्युनि’रँस-
प[[^लटं[च्[`[ स्थापन झाला.
’
ज[मरप्ब कालवा-मुंबई" इलाखाविघप्रांतांतील हेर-
लमपुन्नरिंसाहानिंप्नात्त वहेंगेरे आहेर न्यावयाने ते, कारकून
व ज[मदार यांना घेऊन जावे. कारखान्याकडॅ दा[गने येवून
र[ब[द्, थर आणि प[रकर या जिल्शांसून गेसेलाएक कालवा.
द्यावयावै ते कारखानदारयाच्या गुचारर्तांनें द्यावेस्'भ्फांर्ताच्या
१ ० मेल रुंद इतका जमीन मिजते. कालव्याचीं एकेइर लांबी
१ १७ मेल असून त्याचा एक काय ६३ मेल लांब आहे.
नवेघर २४ इ. स, १८९९ ररेजॉ हा कालवा उघडण्यांत आला, यास ए'कदर खचँ ८४६ लाख रुपये आला.
इ. स. १९० ३-४ मध्ये खचेचेच वज[ ज[तां ४,३लाख’ रुपये
उत्पन्न झालें. त्या साल‘[ ४५१ चौरस येलानां पाणी मिळाले
येत्या व देवघराकडे शिलाईंवें सामान, रेशळोम, कलाबतु वगैरे
जें लागेल ते खरेदी करून काम करीत जाते. ज्या कारखान्यार्केडें लागेल तसं द्यावे. रेशळीम, कलावसू खरेद्ळी करून जवाहृळीरखान्याकडेवगैरे लायेल तते देत ज[णें. १ कापड देंणमीस
व कारखान्याकद्वे सणर्गे खचट्वें होये त‘[ व दागिने सणगप्चे
पडून देणे व तयार करून देणे त्याहुबां कारखान्यांपँफॉं
खचँ व्हावा. [ इतिहासस्'ऱग्नह पु. ६, अंक ७।८।९. ]
जामनगर-’…पुंबहे, काठेंवाडांतांल एक सत्थान व
त्याचे मुख्य ठिकाण ( नवानगर पहा ).
जामनेर, तालुका-मुंबई. पूर्वोखानदेंश जिल्हा. वयाचे
क्षेत्रफळ५२७ चौमैं. असून,त्यांत १५७ गांर्वे आहेत. एवट्रइर
लोकसख्या १ लाख असून, उत्पन्न अडीच लाखविर आहे.
पाणीपुरवठावराअसल्यानॅ तालुक्यांत व[ग[यत जमीन पुष्कळ
आहे. हवा निरीगळो आहे. अजिठ्याचा घांट जवळच आहे.
शह र. ’…पुंवइ इलाख्यांतांल पूव खानदेश जिल्ह्यांताल कान
नदावर हे गांव असून याच न[वाच्या त[ळुवयार्चे ठाण आहे.
यूवा गांवाससोंवता तट असून एक मुईंकाट [कला असल्य[॰
पुढे हे महत्त्वार्चे [ठकाण हाते. येथे पूवा न[ठें वाडे असून
आतां ते मोडकळव्स आसेल आहेत. पेंशवाईंत हे गांव
रास्त्यांकडें सर'जामळादाखल होते. या त[छुक्याचा जमान
अत्यंत सुपीक आहे. दुष्काळ ववा’चेंतूंच पडतो. सस्थनांतळील
ज[मठो या गांवचळो ज्वारी प्रसिद्ध आहे. फांचसात करेसावर
अबिंठ्याचीं लेर्णां आहेतहढो कापसाचा व्यापार येथे पुष्कळ
चालतो. सरकळो (कापसाची ) काढण्याचे व गट्टे बांधण्याचे
कारखाने येये ७|८ आहेत,[ खानदेश ग्याझे ].'
ज[मपुर, स ह शळी ल,… पंजाब,… ह्ऽरागाझीखान [जल्ह्मावी
हळी तहशोल उत्तर अक्षांश २९ ° १६’ आणि २९ ० ४६’ व
पूर्वे रेखांश ७० ॰ ४’ आणि
७० "` ४३’. क्षेत्रफळ
८३१
हा चार नद्ळीचा असून त्याते सरासरी १३०
होते. कालवा उघडण्यापूर्वी पुष्कळ
जमीन
मेल ल[वव
ओसाड
होती.
आतां षंजवि, कच्छ, जोधपूर, बेसलमीर, कोळिहस्तान वगैरे
भाग[त"[ल लोकांनों येथे वसाहत केली आहे.
चिवाब काल-
व्याच्या धर्तीवर येथे वासहत करणारास जमीन दिली आहे.
जामों (१४ १४-१ ४ ९२)…- त्रूरुद्द्ळोन अवद्रुर-रइमान
बिन अहमद हा इराणी कवि ब गूडतत्त्ववादो खोरासानमप्र्ये
ज[म येथे जन्मास आला. तो आपल्या कवितेत ज[म शब्दा,
वर अर्थी कोटी करीत असे. एक ज[मी हे त्याचे न[व असून
त्याचा दुसरा अर्थ दारूचा प्याला असा आहे. इमणांतळोल
अभियान असा हा शैवटचाच कवि होयहा हुफो तत्त्वज्ञानवादो
होता. त्याच्या तळीन दिवार्णात मावप्र्गुण व बोंघपर लघुकाव्थें
यांचा समावेश होतो. वह[[’रेस्त[न( वसतोंद्यान ). हा त्याचा
प्रमुख गद्य ग्रंथ होय. हेफ्ट औंरंग
( सात प्तिहासनें )
हें त्यार्वे एक अदृमुत काव्य आहे.
जामीनकॉँ…ज[म”[न हा शब्द फारशळो असून या अर्थाचा
सस्क्रुतमघील शव्द् ‘प्रतिभृ’ असा आहे.कायद्यामघ्ये ज[मीनका
( ग्यारंटळी ) म्हणजे एका मनुष्याने दुसऱ्या एखाद्या म[ण॰
साला कबॅंफड किंवा इतर क[ह”[ कतेव्य करणें असेल ते
त्यानें न केल्यास, त्याबद्दल स्वत: कबे फेडण्याचा किंवा ट्रेड
देण्याचा करार करणें, असा अर्थ आहे. अशा करारात
मूळ घनको, दुसरा त्र्[द्वणकों आणि तिसरा ज[मीन असे त[न
इसम नेहमी असावेच लागतात. शिवाय ज[मीवाला कबैफेङ
चौरस मैल. या तहशिलव्च्या पूर्वेस सिवूनद् असल्यामुळे
करावळो लागल्यास चटुणको कतेव्यमुक्त होत नाही. तर तो ज[मळी‘
सिंहूंस पूर आला म्हणने या भागालाळिह पूर येतो. तसेच
लागबडळीस याचेच प[ण्[`[ मिळते. लो. स. (सन१९२१ मध्ये)
न[ला जवाबदार होतळो. फौजदारा काययांत आरोपी किंवा
वारंट घुटळेला साक्षीदार हजर रहाण्यासेर्बथाचे’प्हे ज[मळोनकळो
८५४९६.प[ऊस आ‘वेश्चित असतो. हळात दोन गांव व १४१
खडी आहेत. हळोत असठेते ह'रद् न[वार्वे खें‘ड इतिहासदृष्टया
थो`डते महत्वाचे आहे. इ. स. १ ९० ३-४त तहासेलॉचें उत्पन्न
१.५ लाख हेत्त.
घेतात व त्याला हैग्नर्बीत ‘ बेल ’ म्हणतात.
गां च,…यामपुर तइशिळोर्वे हें मुख्य ठिकाण आहे. उत्तर
अक्षांश २९ ° 3.९’व पूर्वे रेख[श७॰ ° ३९’. डेरागाझोखान
ज[मोन रहाणें म्हणजे
दुसऱ्याकरिंर्तां विनाकारण
त्रास
घेन्ग असल्यामुळें ज[मळोनकळोविषयां हिंदूंच्या जुन्या कायदे
क[र[न“[ प्रतिकूल वृत्ति दाखविली आहे; आणि व्यवहारातळिह
‘ ज[मीन कोणा राहू नये ’ असा उपट्रॅश रूढ आहे. मनुस्मृतग्त
ज[मळोजकासबंघी पुढव्ल वचनॅ आहेत;-॰-<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रॅग्य शप्नकळोश- (ज ) २३३ जामैंप्द् [ प्रतिभाव्यै वुथादानमाक्षिक तौरिकं च यत्र [ द्ण्ङझुष्काबतेंषच न पुत्री दातुमहँति ।। × × अमदानींत [ × ज[मीनकाबद्दलचा कायदा, करा- राच्या..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रॅग्य शप्नकळोश- (ज ) २३३
जामैंप्द्
[
प्रतिभाव्यै वुथादानमाक्षिक तौरिकं च यत्र [
द्ण्ङझुष्काबतेंषच न पुत्री दातुमहँति ।।
×
×
अमदानींत
[
×
ज[मीनकाबद्दलचा
कायदा,
करा-
राच्या कायद्या ( इंडियन कँट्रॅवट अफ्ट ) मध्ये आहे, आणि
ज[मीनकळो
हाळिह
सामान्य
आलेले
एक
प्रकारचा करार
कराराप्रमणिच दोन
किंवा
असल्यामुळे
अधिक
वयांत
व करार करण्यास पात्र असे पक्षकार लागतात व
त्यांनळो उमयतांच्या
सम्मतोंते योग्य मोबदला ठरवून
ज[मीनकाचा करार करावा
लागतो.
आणि
त्यांत कपठ,
लवाडळो, येरसमनाविंशळो वगैरे येर गोष्टी असल्यास तो
करार रद्द करता येतो. ज[मीन रहाणळाराचा जवाबदारी
सामान्यत: मूळ ऋणकोइतको असते, आणि वटुणको आपली
जबाबदारी पार पाडप्'यास असमथे ठरल्यावर मग ज[मीन‘
दाराला जवाबदार मरतांयेते. प्रचळित [हेद्रु काययांतश्वि
ज[मीनफॉंवद्दलचे वापाचे देग्ग फेडण्याचळो मुलावर जवाबदारी
पडत नाही.
फौजदारी काययांत( १ )जप्मीना'वै व ( २ ) [^
ज[यावाचे असे गुन्धांचें दोन
बग असतात,
ज[र्मानोंच्या गुन्ह्यांतांहे
पुरावा
सबळ
ज[मानावर खुले करावे
प्र[स[जर, कलम ४९७ ).
हक्कीचा ब्रिटिश
असा
द्दिदुस्थागांतांल
आहे ([^’
मलाक्का येथील होय. [हेड्रुस्थानांत याची लागवड कार थोडी
करितात.
ला न न डॉ चा प्र का र.-निचर[ असलेल्या विकण मातव्च्या
जमीनीत याची लागवड चांगलो
होते. वाछुकामय
पाणी स[चण[ऱ्या जमळीनोंत हे चांगले वाढत
आणि
नाही.
याला
उष्ण आणि सदें हवा लागते व तसेच ६० किंवा ७० इंच
पाऊस दरवर्षी लागतो. नव्या बियांपासून रीपँ तयार करून
त॰[ रीपें सेबयेनमुहांत लावितात आणि त्यांचा ऊन आणि
वारा यांच्यापासून बचाव करितात. कीरडळो हवा असलो
म्हणजे या र`[प[न[ र`[ज पाभ्ब्ळी यालार्वे लागते. ह॰[ दोन तीन
फूट उंच झाला म्हणने त्यांचे स्थानांतर करून
२". पासून
तळोस फुटांच्या अतरावर त“[ पुन्हा लावतात. लहान झाडांचा
. तण व इतर गुरफटून टाकणांऱ्या
वेलोपासून बचाव केला
कोणता
व
माझी
कोणती हे ठरवून, १० मादौगणिक, हवा ज्या [देरोंने’ येते
तिकडे, एक तर ठेवावा म्हणजे हयेमले पुंकेसर त्नांकेसरीत
येऊन [वळतात. सातव्या वर्षा झाडांनां कळें येऊं लागून,
झाड
१५ वर्षाचे होईंपयत फळांचे उत्पन्न वाढत असते.
हे
झाड फार सुंदर दिसते व फळ पक झालो म्हणजे पेंरूएबढी
कायदा
इंग्लंडच्या
काययासारखा असून इतर पाश्चात्य देंर्शातद्दि ज[मौनकाचा
कायदा अशाच प्रकारचा आहे.
जामौट्-वऱ्हाड. जिल्हा वुलढप्णें,
वायफळ, ज[यपत्री-या झाडास लेटिनमघ्ये [सारे'
[रेट्रका फेप्रन्स, इंप्नजळोत नटमेग, सेस्कृतांत ज[त्तिफल,मराठोत
ज[यफळ, गुजराथींतट्यु [हेदॉत ज[यफल इत्यादि न[वे आहेत.
हेनेहमाँ [हेरर्वे राहणारे झुडूप आहे. याची सूळ उत्पत्ति
पाहिजे. फुले येऊ लागलळो म्हणजे नर
न-
आणि बिन
नसल्यास आराळोद्रुपँला
कायदा
ज्ञारिनया-मभ्ऱ्यद्दिदुस्यानांतोंल मोपावर एजन्सळोर्तांल
] मुमिंयात.
त्रयऱ् परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणऱ् प्नतिसू: कुल ।
(मनु. अ. ८ ’लो. १५९ व १६९)
ब्रिटिश
ज[यफळ,"ज`[यपन्नी
त[छुका
जळगांव.
जळगांबच्या वायव्येस६ मैलांवर हे ३१२८ लोकसंख्येचे
गांव आहे. पूर्वी हा गांव विडयाच्या पानांका’रेतां फार प्रसिद्ध
होता. हर्ली देंखज्ल येथे पानांचा व्यापार चालतळो.
गांवाच्या
उत्तरेस महादेवाचे देवालय आहे. देवळाच्या दक्षिणेस एक
पाण्याचा साठा आहे. त्यांतांल पाणी कमी आटत न[हळो. येथे
पार पवलाद्शहाचा द्रगा असून तो [देक्रांचा वाद्शहा
अल्लाउद्दीन वोरी याच्या वेळेस ज[घला आहे असे म्हणतात.
वकर-ईंद्च्या वेळेस येथे उरूस भरतो. हे ठिकाण मुसूल’
होतात.
उ त्प ब.…उत्तम फळे आलेल्या झाडाचळो १५०० पासून
२०० ० पावेतों फळ गोळा करावयास सापडतात. आत ज[य‘
फलाच्या समोंवतौ ज[यपत्रो असते. वरील ज[यपत्रो काढून
घेऊन आंतळील फले विस्तवावर सावलीत वाला‘वेतात. › नंतर
बरचळो कवचळो काढून आंतौल ज[यफलाला कोड लागू नये
म्ट्वणुन बुवा लावतात, तसेच ज[यपन्नळो चटईंवर पसरून
वाळवितात. जशी न[रळाला बाहेरून करोटो असते तसे‘
ज[यफळासा’हे वाहेरून पातळ कवच असते… ते फोडले म्हणजे
ज[यफळ बाहेर पडते. ज[यफळप्पामून न उडणारे व पत्रो॰
पासून फार उपयोगी असे तेल निघते. तेलाचा सुगंथीं तेल
करण्यासाठी उपयोग करिंतात. येद्यशांआप्रमणि ज[यकळ हे
यानीं कारकव्दॉत महत्त्वाचें होते. येते त्या कालो एक टांव’;॰ हें उत्तेजक, पाचक ब वाबुनाशक आणि शांत प्रमाणांत
येत,
याचा यूरळोपियन पाकशात्नांत
सा'ळ होती. येर्यांल ज[मोद्ळी येते इ'प्रजळो अमदानळोर’मॉ चालत
ल्यास कैफ आणणारे आहे.
येर्थांल [केला एळिचपुरच्या जवाचाच्या कारफळोर्दीतळोल वाघ-
बराच उपयोग करतात.
लेला आहे. इ. स. १८४१ व मुगुठराव न[वाच्या एका
गराठयार्ने मी शिद्याच्या घराण्यातील आहे असे प्रसिद्ध करून
न[मोंद्चा [केला तिचामळाकहाँल लोकांपासून [हेसकावून व
वायफळ असे गांव आहे.
वस्तुक्षेन्नब्-र्मंहेद्रुस्थान, वव्हदेश,
बरेचसे लोक जमवून बंड उभारले; मोठया प्रयासार्में निजामानॅ ॰त मोडले. [बुलढाणा ग्याझे. ]
मे ण व तो चे झाड
( जगलो
अकोड
).…यालाळिह
ब
मलायाट्रांपकल्प
येथेंथहे सापडते. व्यन्नद् येथे हा आहे विपुल असल्यामुले
[ तेये तों आपोआप उगवतात असे म्हणतात; परंतु वास्तविक<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५७
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "त“[ मूळर्ची हिद्रुस्थानांताल बागैमध्’ये किंवा नसून शहरात रस्त्याच्या वाजूते व रेवडघांत हो झार्डे लावलेलो आढळतात. हिंदुस्थानच्या सूत्रे भागांत सून ते आगस्ठच्या [, परदाराभि..."
237324
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>त“[
मूळर्ची
हिद्रुस्थानांताल
बागैमध्’ये किंवा
नसून
शहरात
रस्त्याच्या वाजूते
व रेवडघांत
हो झार्डे लावलेलो
आढळतात. हिंदुस्थानच्या सूत्रे भागांत सून ते आगस्ठच्या
[,
परदाराभिमतेषु प्रट्टत्ताड्रुव्’म्महोपाते: [
उद्वेजनकरेदेंण्हैरिंछन्ना'येत्वा प्रवासयेतू [।
हू[
तत्समुत्थळोहि लोकस्य ज[यते बणेंसेकरन् [
येन सूलहरीऽवमँ: सर्वे न'शम्य कल्पते ।
दरम्यान या झाडाची फळें पिकतात; प'रतु पश्विम भागांत
मात्र हिवाळ्यापयैत पिकत न[हच्त. फळांमध्ये सेकडा ५० टू
याप्रमाणार्ते
जारकमैं
महाराघूच्य शभ्नकोंश ( ज ) २३४
ज[रकमै
तेल असते.
र्पोकिनेशिया येथून
दिव्याकरितां
हेतेल वापरतात.
मेणबत्याकरितां ते यूरीपमघ्ये ज[ते.
कित्येक येळां फळांचा मगज बारीक बांबूस बांधून नैसर्गिक
येणबत्यांप्रमाणें ज[ळतात; ब म्हणुनच या झाडास येणबत्तांर्वे आड असे गांव आहे.
हे नांव असून तेथून ते
सिलोनमघ्ये या तेलास केकुंन
परदेशी
द्हा वयाच्या शरेथांवरून
रवाना होत असे. गेल्या
असे दृष्टीत्पत्तीस आले आहे का
×
×
न सभाषां परख्मीमे: प्रतिणिद्व: समाचरेतू ।
''[
[
×
×
पुमांस दाहयेत्पापं शयने तप्त आयसे ।
( मवुरुमृति, अ. ८ ‘ग्हों. ३५२
इतर गुन्ह्माप्रमणि यांतहि ज[त्यनुसार
आ’घेकपणा अवलंबून आहे. ममुस्सूतांच्या
सुरू करण्याइतर्को त[
मध्ययुगॉन हिद्रुरप्ज्यांत
चालू होता.
यानसेस्थावारेव’रीज
हिंदुस्थानात इतर कोठेंच यांपासून तेल काढीत न[हच्त.
बम्हदेशांतव्ल क[ह"[
रोगणाकरितां
भागांत
उपयोग
लारवेच्या
॰रग[बर`[बर याचा
करतात. पण त[ळ किंवा सरबुं
यांन्च्या तेलापेंक्षां
यांत कोणतेच ज्यास्त गुण न[ह[त.
ब[ज[र[त बांगला किमत येद्देल असे या बळोबांपासून तेल
काढण्याचा रीत व निरनिराळ्या प्रदेशांत हें झाड किती
उत्पन्न देते आणि त्यापासून कितपत फायदा होईंल या
दोन दृष्टांते या झाडाचा विचार करणें अगर्दी जरूर आहे.
[व[ठ; मते,]
जारफम्रे ( थॅडल्ठरी )…विवाहित पुरह्रषाते किंवा
खळोते अन्य घांशळो किंवा पुरुषार्शी स्विघ करणें या गुन्ह्माला
कायगांत ज[रकपँ म्हणतात. या गुन्ह्मालाशिक्षां ठेंक्णांत
विवाहसंस्येचे
सेरक्षण हा मुख्य हेतु आहे.
[हेदु समाबांत
विवाह हो धार्मिक सेस्था समजतात आणि त्रांचे पप्ततेवत्य
हा सवेळोच्च गुण फार प्र[च^[न काळापासून मानला गेला
आहे. पातिबत्याचे अत्यंत महत्व ब ज[रकमकुंचीं अत्यंत
निंदा वैदिक काळीहि केलेला दिसते. देवांचा राजा इंद्र
याते वुषणश्वाच्या चायकोर्शी, अन्नैयळोत्र्ढषोच्या अपाला नामक
×
मतौरे लघयेद्या तु हांड्यातेगुणद्र्पिता [
तां श्वामें: खाद्येदाजा सेस्याने बहुसंस्थिते॥
हाँ झार्डे [हद्रुस्थानांत सर्वेन्न सापडतात. पण तेलाचा व्यापार
विपुल न[ह[त्[.
×
तें
३७८
शि` चा
).
कमी-
नियमानुसारच
व मौगल-मराठेंशग्होत
अम्मल
सइरहू हिंदु समाजव्यवस्थेंवर परकीय विहानांचें अनेक
आक्षेप आहेत. बघ, अवयवछेइन या शिक्षा फाजळोल, कडक
व ज[त्यनुसार शासनमेद् हे तत्त्व अन्याय्य असे सर्वे साधारण
आक्षेप असून इंदाद्दि देवादिकाचीं ज[रकमैंकुंत्ये व काम…
सूत्रांर्तांल स्नियांच्या न[[तेमत्तायेषर्यांये उल्लेख, पुत्रांये क्षेत्र,
ज[दि ट्हाबारा
प्रकार
या गोष्ठी कनिष्ठ न[तिमत्ता द्श॰
वितात. शिवाय बहुभायापद्वति, जरठक्रुमारीविवाह, वगैरे
रूढी वैवाहिक न[तिमत्ता शिथिल करणाऱ्या आहेत. हे सर्वे
आक्षेप लक्षांत येऊन इंडियन प[नल कोडावो रचना
आघु‘
निक पाश्चात्त्य कायदेपद्वतविर करून ज[रकमाँच्या गुन्ह्माला
५ वर्षे केद् व द्ण्ड किंवा नुसता ~द्ण्ड अशी शिक्षा स[मि‘
तलो आहे. शिवाय या गुन्ह्यांत बइकर्मी त्नांला शिक्षा न
करता फक्त मुख्य गुन्हेगाराला शिक्षा व्हावी,
असे
ठरा ॰
ण्यांत आले ( प[नल कोड, कलम ४९७ ),
वा ह्य-इ ति हा स.…पागैतिहासिक काळांत नेव्हांविवाइ
हा सस्थानळीट अस्तित्वात आलळो नव्हती, तेव्हा रानटी स्थितों’
तळोल पुसष झियांवर मालमत्तेप्रपाणें हक्क सांगत, व झी पळविंणा-
रन्रीशौ आणि गौतमवटुर्षांच्या आहेल्या नामक पत्नव्शळो
ज[रकमँ केल्याचा व त्यामुळे त्याच्या अपाला एक हजार
क्षते पडल्याचा उक्केख आहे. अश्वळोदेवानॉ च्यवनाच्या
सुकन्या नामक भायेर्शी ज[रकर्मं केल्याची कथा आहे.
रामायणांतौल रामाचे चरित्र हे उच्च वैवाहिक न[र्तांचा
ऱ्यास चरेरीच्या गुन्ह्यांप्रमाणें शिक्षा करीत. ज[रवमोंमुळें नळोति-
केवळ आदेश आहे. महाभारतांतांल द्र्रेपद्[,स[[‘वेत्र`[, द्मयेतळो
विवाहसंऱ्बघ जोडण्याचळो कल्पना रूढ होऊन एकाच वेळी
एका पुण्याचे अनेक झिया किंवा एका त्नांनें अनेक नवरे
वगैरे अनॅक स्नियांच्या कयांत प[[’तेवत्य्[…गुणाचे त्होप्र
गायिर्के आहे. स्मृमींग्रंथांत कायदेशमवज्ञांनॉ या गुन्ह्माला
कडक शिक्षा सांगितल्या आहेत. ज[रकर्मांपुळें समाजावर
अत्यंत घार परिणाम होतात असे सांगून मनूते ज[रकमां
द्यांप्रमाणें पुव्षालाहि घोर
[शक्षा सांगितला
आहे;
इतकेच
नव्हे तर, परवांसभाषण,
सागितला आहे,
अगस्पश वगैरे न[ष्टांनांळिह द्ण्ड
म्नष्टता येते किंवा वैवाहिक करार मीडतो वगैरे कल्पना त्या
काळी नव्हत्या. वानर, कोंबडी वगैरे पद्रुग्जातौचे नर ज्याप्रमाणें क[ह“[ भावांना
स्वसत्तेखालीं घेऊन इतरीनां प्रतिकार
करतो त्याप्रमणि आद्य भानवळो स्थिति असलो पाहिजे. पुढें
करण्याची चाल प्रच[र[त आली. तेव्हा झीयांनां परपुरुषसे'बघ न होऊं देण्याबद्दल पुस्षवये अधिकच वक्ष बनला
व वट्कमॉ त्याला देहात शिक्षेसारख्या कडक शिक्षा होऊं
लागल्या. इतकच नव्हे तर आग्लिर्केतांल एका [नेप्रो ज[र्तांत
[’रेवयांकड्रुन चारिव्यशुद्वळोचा पुरावा म्हणून नियतकालिक
दिव्य करा’वेण्याचौ पद्धत आहे ( मिंतूकिंगल्वे-ट्रॅव्हल्स इन<noinclude></noinclude>
4r297jzm6xv7whd45ktjt8jvhu9836p
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५८
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2026-09-23T07:09:49Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दाराट्रीय त[नफॉंश. (ज्ञ ) २३५ ज[रकमै जो’अँटाऊन वेत्ढ अमफेका, ४९७ )… पुरुषांची परषुरुषस'बंघाविषयॉची ही नवऱ्याला आहे. त[ब मत्सरबुद्धि हा मानवसमाबांत एका आद्य अवत्थेंत अनिर्वेय..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दाराट्रीय त[नफॉंश. (ज्ञ ) २३५
ज[रकमै
जो’अँटाऊन
वेत्ढ अमफेका, ४९७ )… पुरुषांची परषुरुषस'बंघाविषयॉची ही
नवऱ्याला आहे.
त[ब मत्सरबुद्धि हा मानवसमाबांत एका आद्य अवत्थेंत
अनिर्वेय घांपुव्पव्यवहप्रळिरथति ( प्रेस्मित्कयुड्टी ) होती,
असा या मनाला प्रतिकूल पुरावा आहे. बहुतेक रानटी
ज[तोंत या गुन्ह्माला वध, अवयबच्छेइन वरेम्रे शिक्षा रूढ
असलेल्या आढळतात. नवऱ्यावै बद्कमे ह[ चायकॉंक्सिद्व
घेतल्याते नवऱ्याला हळो परवानगी मिळते; या घढरफीटाच्या
गुन्हा असून तिला त्याबद्दल दाद मागसां येते, अशी स्थिति
फार याडया समानात
आढळते. या गुन्ह्माबदृल
विवाह,
से'बप तोंडण्याचा ( ड[यव्होसे ) हक्क वायकोंला कांहीं
रानटी समाबांता‘हे दिलेला आढळतो.
ईंजिंप्तमध्'पें फार प्राचीन काळी मुद्रा ज[रकपँ हो गुन्हा
मानला जात असे. याला पुरावा ५ वा रामँतिस ( ख्रि. पू.
११५॰ ) याच्या कारकळोर्दीतांल एका लेखावरून मिळतो.
अथेन्स येथील प्राचीन प्रांक काययांत ज[रकर्माबद्दल पुरुष
व स्रो दोघांसांहि गुन्हेगार घरळीततथापिं स्मिगांच्या वावतळोत
कायदा फार कडक होता. कारण शुद्ध प्रांक घराण्यात
रकान्री मेसळ होऊं नये असा प्रांफांचा कटाक्ष होता. ज[र`
कमाँचळो व्याग्ढ्याहि पुढें व्यापक करून विवाहित स्रोप्रमार्णे
क्रुमारिंर्फार्शी किंवा विघवशि'व् वद्कमैं करणेंळिह गुन्हा सम०
जण्यांत येऊं लागला.
गुन्हा करतांना पकडलेल्या गुन्हेग[र[ल[ एकदम ठार मारण्याचा हक्क फायद्यार्ने नवऱ्यास
दिला होता. पण त्याहून कमी किंवा केवळ नुकसानभरपाई
दाखल द्रव्य मानण्यात
सवलत
असे. ज[रकर्मी वायकोला
नबऱ्यानें सोडचिठ्ठळो देणे भाग असे व तिला सर्चजतिक
र्देवालयांत मज्ञाव असे. ज्यू उर्फ यहुद्’ळा लोकट्टेमध्रेंग् बहुनायाँ'
पद्धति वेद होऊन एकपत्नों’क पद्धति सुरू झाला
तरी नार-
कमोंसेबंघळो कायसांत फरक झाला नाहळो. विवाहित घांशंळो
बद्कये करणें यालाच
जारकमँ समज्ञतात.
अविवाहित
त्नांच्या वावतोंत हा गुन्हा होत नसे; कारण अशळी झी त्या
पुरुषाची बायको होणें शक्य असे, दृतकँच नव्हे तर असा
सेवंप झाल्यास त्या स्रोपुंरुपांचा कायदेशीर विंवाहच मानला
जात असे. मोंझेस कायधांत
ठार करण्याची शिक्षा
ज[रकर्मांला
सांगितला आहे.
द्गड मारून
पण पुऱ्‘द्वै हळो शिक्षा
बंद पडली. वैवाहिक हक्क नष्ट करून सळोडळिचठ्ठळो देण्यात माग
पाडणें तसेच वद्कर्मी स्त्रळो व पुरुष या’गं आपसांत लग्न लाब‘
ण्यास परवानगी
ढरविंल्या.
न देणे,
या
ड्त्लानळो कायद्यांत ज[रकमाँला,
ण्याची जुन्या यहुदी कायसांतोंल
शिक्षा
दगड
नंतरच्या कायद्यामें
मारून बघ कर.
शिक्षा आहे. पण मह'मद्
पँगंबर'च्या आयैशा न[वाच्या न[यकरेबद्दल सेशयाचा प्रसेग
आला, त्या वेळ? जारकमौबद्दल शमर फटफ्यांची शिक्षा
द्यावा, असे महमेदाचें लोक क्रुराणांत आहेत; यामुळे कायदेंपाँडेतांत या शिक्षेबद्दल मतभेद आहे. प्रत्यक्ष गुन्हा कर-
तांना पकडस्रयास नवऱ्याते द्ळोघांसांहि ठार मारार्वे अशळी काय’
याची मुभा आहे. शिवाय तिवाहसेबंघ तळोडण्याचा हक्क
कोणी
साक्षीदार नसला तर"! नुसता शपथ
प्रकाराला ‘लायान’ असे म्हणतात.
ख्रिस्ती घमँग्रेथर्ताल दहा
आपल्या
पुप्रतिद्व आज्ञांमईंये “ तुं
इळानाऱ्याच्या वायकळोचा अभिलाष
थारेसां कामा
नये ” अशी एक आज्ञा आहे. डोंगरावरील प्रवचसांता’हे येशु-
ख्रिल्ताते ‘व्या’मेचार करू नये’ असे सांगितले आहे. इ. स.
३०५ मघ्ळेंप इळिवैरिसच्या कॉँन्सिलने' बे ठराव केले त्यांत
व्यभिचाराला शिक्षा सांगितल्या आहेत; त्यांत वयाची
शिक्षा नाही. पण कक्सिटन्ठदेंन बप्द्शहानें वयाची शिक्षा
पुन्हां सुरू केली. पण तो रानटी शिक्षा अप्रिय ठरून पुन्हां
ज[हैटा‘नेयनते वयाची शिक्षा वेद कैलळो. व्या’मेचार
हे पद-
त्फौढ करण्याला पुरेसे कारण नैहर्मांच मानण्यात आले आहे.
पण हंग्लडच्या काययांत वायकळोला नवऱ्याक्सिद्वा
घटरफौढ
मानण्यात हे कारण पुरेसे न[नळोत नाहीत.
पाररेंयांच्या ग्रंथांत या गुन्ह्माचळी फार व्यावहारिक दृष्टीने
चवळो केली आहे. ज[रकमँ व ळिवरेप्पत: कुमारिफांगां क्रुमागैप्रवुत करणें हा भयंकर गुन्हा मानला आहे. कारण त्यामुळे
वशम्रष्टता होते, माणसांर्वे सेयमन नष्ट होते व नवऱ्याच्या
कायदेशीर हक्काला चाप येतौ. ह्या गुन्ह्मामुळें द्रुवनाकडेहि
प्रवुति होते, कारण ज[रकमॉ स्निया गमँपात करतातव्यभिचारकर्मार्ने सर्वे समाजाला कोड लागते; कारण पुरु.
षाला ज[रकमँज सेतति पळोसरैग्‘प् माग असल्यामुळे त्या सेत॰
त[च्या सेगतोसे अळीरस सेतति बिघडते. या गावाला प[य॰
स्थित म्हणून कांहीं यामिक तिथी, अनाथसेगोपन, दानघमैं,
वगैरे सत्क्रुत्ये करण्यास सांगितले आहे.
बों'बँ टाऊन-'हे शहर [बेटिंश ग्वायनाची राजधानी
व वसांइतसरकारर्वे ठिकाण असून डेसेरारा नदीच्या
मुखावर उ. अ. ६॰-२९’-२४” न प. रे. ५८॰-॰११’-'३_॰”
याच्यावर आहे. डच लोकांच्या ताब्यात असतांना याचे
नाव त्टँबोंक होते व स.१८१२मव्यै बाँबे टाऊन न[व पडले.
या भागांतांल हे फार छानदार शहर आहे. येथॉल रल्वे
रुंद व सरळ असून मध्यभागी त्मिलेपुष्पाच्छादिंत कालवे
असलेले दुहेरळी रस्ते
आहेत.
रत्त्याच्या
दोन्ही
बाजुस
गवताळ पट्टथा व छायेचीं आर्डे आहेत. मुख्य घरे क्गी.
च्यांनीं वेष्टलेलळो आहेत. येर्थाल घरे विटांच्या चवुव्यांक्ट्
लॉकडांची न[घलेलाँ आहेत. मुख्य इमारती म्हटल्या
म्हणजे
शइरच्या
मध्यभागी
असलेल्या
नावेंजनिक
कचेंऱ्या, न्यायकवैऱ्या, नगरमङप, अँपिंलकन व ररेमन
कॅथोलिक कँथळोडूग्ल, कित्येक छावदार प्रग्येनामंदिरे, स्थानिक
पेंढ्या,
विमप्ग्टर्हे, भिक्षापइ, इस्पितळ्, फ्द्दार्थंसेनहालय,
पुरतकालय, वाचनगृप्ध्दृवनत्पातेसेप्रह ह्या होत. शहराच्या
मध्यभागी हवा खाण्यास नागा व रत्तें बांधलेले आहेत.
येथील राज्यव्यवस्था मेअर व नगरकींन्सिल यांच्या ताब्यात
आहे. लोकसंख्या सुमारे ५॰,॰॰॰ आहे. वार्षिक उत्पन्न<noinclude></noinclude>
41eskzvbivcggyvjc84vpfnwqzap1v0
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/५९
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112282
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2026-09-23T07:10:06Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महप्राट्रीप शानफॉंश. (ज) जोर्वे राते जो’बॅं राजे २३६ ५॰॰॰॰ पर्हेड आहे, (पर्वाच्या न[बळो नगरसफाईं, आर्याने | क[ह“[ काळ कैदेत ठेवले. नंतर तो लळीस्ठर हाऊसमध्यै बन, रस्ते, पाणीपुरवठा, रस..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महप्राट्रीप शानफॉंश. (ज)
जोर्वे राते
जो’बॅं राजे
२३६
५॰॰॰॰ पर्हेड आहे, (पर्वाच्या न[बळो नगरसफाईं, आर्याने | क[ह“[ काळ कैदेत ठेवले. नंतर तो लळीस्ठर हाऊसमध्यै
बन, रस्ते, पाणीपुरवठा, रस्त्यांची रॉबनाईं व मोंऱ्या ह्या स्वतंत्र राहूं लागला व दरवारा समार'मांत सामील होण्याची
आहेत.
टेलिफोन, व पोष्ठअस्मिब्से आहेत.
दोन चांगले
त्याला मनाईं झाला होती. त्याचा विवाह स. १७०५ मध्ये
लरेखंडावै कारखाकैशुष्क गोंदळी, त[ढूळ, विंडया, स[बण,चूठ,
अनस्पँबचा क’ररेलाईंन हिच्याशी झाला.
चाकळोतेढ, मेणबत्त्या, व बर्फ यांचे कारखाने
कारणी होता. वापलेककिया मांडणामुळें दुसरा बेळीर्न
व[प[चा प्रधान वालपळोल यास अघिकारावरून काढून ठाकणार होता व त्याकरिता स.१७२ ७मघ्`यै राज्यावर येताच सर
येथे आहेत.
हे शहर रेल्वे व बोटी यांची न्यू थेंमस्ठरर्डेम व डेमॅरॉराचा
पाश्वेम
य[श[
किनारा
जोडलेले
आहे
व वाक‘प्च्या`
णिल्ह्यशि’व् आगवोटीर्ते दळणवळण सुरू आहे.
तो माठळी राज-
स्पेन्सर कॉंमव्न यास त्याने राजा या न[त्यावै पा’हँले भाषण
तोंजै राजे…या न[वावै राजे युररेणंतोल इंग्लड प्रांत
इंग्लंडच्या इतिहासांत या नांवाने चार राजे असून
तयार करण्यास सांगितले. पण फाँमटन यास ते
मदत घेतलळी.
` सळाघेना म्हणून त्यार्ने वालपोलचीच
या गोष्टीचा फायदा घेऊन कॅरोंलाईंन राणींर्ते वालपरेललाच
प्रयान कायम ठेंवण्यावद्दल राजाने गन वळविले. याची
प दि ला आँ जें ( १६६० ).…हा जर्मंनव्सांल हॅनळोव्हर
रॉतला एकैंक पर्हेड मरेचीत बसण्यांत त्याला मोठा आनंद
या देशांत आणि हेंनोव्हर वसेपसनळोयाप्रांतांत आले आहेत,
पण इंग्लडरेवरळीज सर्वं ठिकाणचे बाँबॅं राबें विशेष महत्वाचे
नाह‘व्त.
ळिहन
ते बहुतेक महत्वाचे आहेत. त्यांच्यासंबंथॉ रानकळोय बुद्धिमत्ता अगदीच सामान्य प्रतळोची होता. एखाद्या कर्वेव्यगोष्टींची माहिती त्या देशाच्या श्तिद्दासांत दिला आहे. या , निघु कारक्रुनाप्रनाणें वक्तश'ळीरपणाने' वागर्णेवखर्बोत काटकसर
ठिंकार्णां त्यांचा खासगी जीवनक्रम देण्यात आलाटुंआहे.
करणें यांतच त्याला सगळा मोंठेंपणा वाटे. आपल्या [तेजोप्रांताच्या राजघराण्यांत स. १६६॰ मध्ये जन्मला. त्याचा ` होत असे. त्याचा एक उपयुक्त गुण हा होता कॉँ, स्वत:…
इंग्लंडच्या राजघराण्याश”! नजींकचा आप्तसंबँय असल्यामुळे पेक्षा अधिक हुपार व र्क्सबगार इसम कोण आहे हे
तो इंग्लंडची अन राणी विनवारसळो वारल्यावर इंग्ल्द्वैडच्या त्याच्या झठकत्रु घ्यानांत येत असे व अशा माणसांचा ` सल्ला
गादीवर आला ( १७१४ ). तत्पूर्वी त्यार्ने इंग्लडचा राजा तो अगदी निनतकार मान्य करळीत असे. यामुळेच दुसरा
तिसरा विल्यम व [हेंहगपक्ष यांच्यांर्शी सख्य ठेवून स्पोनिश-
ज[जें स्वत:ची अधिक
वारसा-युद्धांत इंप्लेडला मदत
राजकहेंरणक्रुशल प्रयान वालपोल
केली होती.
पण
त्याचे
कौटुंबिक वतेंन प्रयमपासून आक्षेपार्ह होते. स.१६८२ मध्ये
त्याने लग्न सोफियावरळोबर झाले होते. पण व्हसेलेस ( फ्रान्स)
हुशार राणी कँसेलाहैन व अधिक
यांच्या तेत्रानें निमूटपणें
वागत असे. पण पुढें पालेसेटांत वालपरेलला विरोघळो असा
एक प्रबळ पक्ष निर्माण होऊन स्पेंनवरोवरच्या युद्धांत वॉल-
च्या राजदरवारळो वागणुकोप्रमासेच जर्मनीतील राजद्ऱवादूऱ्प्
पळोल राट्रांत अत्यत अप्रिय बनला; आणि स. १७३७
पुरुषांची वागपूळाक फार अचीतोंची असे. अनेक उपस्निया
ठेवण्याची राजें लरेक’प्चळी चाल असे. त्याप्रमाणे जेंळोबँसेद्दि
उपा‘न्नेया ठेवल्या, त्यामुळे सोफिया राणी बदचार्लाची
कॅ‘रौलाईंनच्या ड्रुत्यूनेतर लवकरच
मध्ये
सर्वे आधार तुटून व[ल॰
पाल प्रयान पदच्युत झालापुढ अप्विटुयन-वारसां-युद्गा सुरू
झाल्यावर हँनरेव्हर प्रांताच्या रक्षणाकळिरतां दुसरा जाते
निवालळो, व अखेर दोघांचा घटस्फोट झाला. दुसरा गोष्ट
म्ट्णतै जे’प्र्न परदेशांतच वाढल्यामुळे इंग्लंडच्या राज्यकारभारपद्धतळीन्री त्याला माहिती नव्हती, त्यामुळे तो राजा
स्वत: युरोपात लढळाईंवर गेला आणि रणागंणाबर इंयजाच्पा-
झाल्यावर इंग्ल'डांत प्रघानमेडलाची
टाच्या ( राष्ट्र[च्या ) ड्च्लेप्रमाव्ळा नेमर्णे त्याला
सत्ता वाढलळो.
इंपजळो
पेंक्षां हँनळोव्ईंस्मिसांच्या हिताकडे अधिक लक्ष्य दिले गेल्यामुळे
बाँबँराजळा इंग्लडांत अप्रिय झाला. मुख्य प्रयानहि पालेमेंभाग पडले.
भाषा त्याला येत नसल्यामुळे त्याते इंग्लडांत बरेच जमेंन
चाकरनरेकर व उपस्निया आणल्या होत्या. तरळोळिह त्याला
स. १७४५ नंतरच्या बहुतेक राजफॉंय महत्वाच्या व राष्ट्रहि॰
ताच्या गोंष्टींवै श्रेय जळो‘र्तेला नसून त्याच्या प्रयानांनां आहे.
प्रांतात जाऊन रह[त असे. तथापि त्यार्ने एक मोठया
शहाणपणाचळो गोष्ट केली, ती विहगपक्ष ब वालपोल यांच्या
बाँज्प्ळाचा नातु व फेडरिंकचा मुलगा दुसऱ्या नॉनेंनेतर ग[द[॰
वर आला. फ्रेडरिक न[रल्यानेतर ( १७५१ ) त्यार्ते शिक्षण
तो वरचेवर हेंनळोव्हृर
ड्'य्लहेंर्डात चैन पडत नसल्यामुळे
वि स र[ बॉ ते ( १७३८-१८२०
).…हो दुसऱ्या
होतो पूर्णे विश्वासाने सत्ता दिला, त्यत्युर्के त्याचळो सर्वे त्याची आई व तिचा प्रियजन सल्लागार अले व्यूद यांच्या
. देखरेखोखालाँ चैनों जगापासून अलिप्त अशा स्थितौत झाले,
कारकॉंदें निर्विघ्नपणें पार पडलो.
दु स रा
ज॰[ कँ( १६८द्॰१७६० ).…हा
पहिल्या
बेंळीर्नया मुलगा. बाप द'ग्लडचा राजा झाला त्यविळीं हा
एकतौस वर्षांचा होता. त्यार्चे वापाशळो पटत तसे व ते
[वकळोपास
गेले.
फादर)
त्यावरून
लिद्दिळेंल्या ‘पेंट्रियट र्किग’ (देशभक्त राजा) या
पुस्तफांलाँल तत्त्ववचर्ने
त्याला
शिकविलाँ.
[ढेहगपक्षावें
वचैस्व नष्ट करून स्वत:च्या ह[त[ अथिकारसून्नै घेर्णे हें
असे त्याच्या मनावर [’वेबनेमण्याच्या प्रश्नावरून हें [वण्य[त आल होते स्वत: इंप्रजा भाषा जाणणारा व इंग्रजी
भांडण दुसऱ्या तेळीजच्या एका मुलाला
वेळी घमोपता (गाढ
कॉंहेंत्रोकनें
पहिल्या
बाप्तिस्मा देण्याच्या :आयुष्यार्चे इतिकतव्य होय
जाजन'
त्याला | राजकारणात वाढलेला असल्यामुळे प्रज्ञर्चे हृद्वात जाणणारा<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६०
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "बॉर्न राज्ळो महाराष्ट्रळीप सळानफॉंश. (ज) २३७ जॉर्जिया , होता. वैवाहिक वाबतौतहि मागांल जाते राबांपेंक्षां त`[ फार मेरी रॉविनसनर्शी प्रेमस'बंघ होत[,पण सेरी अन फिद्झरबगें स्तुतिपा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>बॉर्न राज्ळो
महाराष्ट्रळीप सळानफॉंश. (ज) २३७
जॉर्जिया
,
होता. वैवाहिक वाबतौतहि मागांल जाते राबांपेंक्षां त`[ फार
मेरी रॉविनसनर्शी प्रेमस'बंघ होत[,पण सेरी अन फिद्झरबगें
स्तुतिपात्र याला, कारण केवळ राजकारणाकळिरसां प्रेमविपय
या
दुय्यम ठरवून त्याने प्रेमपात्र बनलेल्या लेडो स[र[ लेनळोकसम्
कायद्यात न जुमानता त्यार्ने तिच्याशी स. १ ७८५मध्ये गुप्तपणे
विवाह केला. तरी स. १८११ पासून तो लेडळो हटँफौडे व
ऎवबाँ चार्लीटोंसोंफीयावरोंबर विवाह केला. राज्यावर आल्या-
वर लवकरच त्यार्ने हरयुक्तींते पालेपँर्टात राजाच्या
आते
रोमन
कॅथोलिक
विपवेवर
अत्य’त
आसक्त
होऊन
नुसार मते देणारा असा ‘किग्न फ्रेंडसू’ ( राजाचे गित्र)अश[
१८२१ नेतर लेडळो कोनिपेंम यांच्या प्रेमपाशांत तळो गुरफढला
होत[.य[ गैरकायदासेवंघाखेरीज त्यार्ने १७९५ त बळिन्स्वकचीं
न[वाते सेवोघला जाणारा पक्ष बनविला. अशा स्थिर्तोत
कोणतेहि राष्ट्रपोरणी प्रयान'मडळ् फार वेळ अधिकारारूढ
प्रिन्सेस कँरळोलाट्टेन हिच्याशळो कायदेशीर विवाह लावला, व
स.१८२१ मध्ये ती मरेपर्येत या विवाहचें मोंठेंच प्रकरण
राहसे शक्य नसल्यामुळे दहा वर्षांत सात बेंळां प्रमानमडळ
मानले होते. तों कार चैनळो व उघळ्या
बदलले. अनियंत्रित
सत्ताभिलाषी राजा
करी.
व लोकसत्ताप्रेमळो
ह[ लढा लढण्यास ने‘[॰जराजा लरेकप्रियच
बनला. विद्वान राजकारणी पुढारी या लढ्याला विगोंथीं होते
तरी युद्व झालेच व त्यात इंग्लंडला पूण्ळी अपयश आले.
त्याबरोबर राष्ट्र पुन्हो रानपक्षाऐवजो प्रयानपक्षीय
बनले.
फोडली.
स.१८२१ मध्ये गादव्वर आल्यायर त्याच्या
बॅंर्हजसेफांहो वेळ नमते घेतले पण स.१७८४म‘६र्धे सधि साधून
विशेष यशस्नों कारकार्दीचे श्रेय बॅन्तिला आनायासे मिळाले.
असे. स. १७८८ मध्ये
आला. पण हैं।. विलिस
१७८९ मध्ये तो बरा
राजकळीय वाबळो त्याने
विवाहोच्या
प्रकरणात पुन: र’ग आला. रपिंयाभिषेकादि समार'मांत हॅरी…
लाईन राणीबर ज[तेसे बहिष्कार घालण्यार्चे ठरविले. विवा-
स्वत:च्या पसतीचा धाकटा पिट यास प्रघात नेमिंले. पिठच्या
ने‘र्हेजला सेतकाची आवड
में'ढूत विकार होऊन तों वेडा
तौग्यपणाच्या उपायांनों स.
पडून राजफांताच्या सर्वे
अनुकूल असत व पालर्मेंद
त्याच्या कतेफेडळोकळिरसां रक्कमा मैसूर करीत असे. पण या सव
गोष्टींमुळे तिसऱ्या ज[ज्ळीशळो त्यार्वे पक्के वाकर्डे आले होते.
तसेच त्याच्या दुराचरणामुळें ब उघलेपणामुळें सामान्य जन…
तेत तळो अत्यंत प्रिय झाला होता, इतका कळी रस्त्यांसून
जातांना लरेक त्याला हसत व (११८ ३७ मध्ये तर तो पालेसेठमघ्ये नात असतांना लळोकानॉ त्याच्या गाडॉचीं त[बदासे
आणि शब्सनशांत्नांतळोल तत्त्व व व्यवहार या दोन्ही दृष्टींनळो
चूक असलेला
परंतु ळिव्हगपक्षाची नाजू त्याते घरल्यामुले फॉक्स,
रेळारिडन वगैरे पुढारी त्याला
राष्ट्र यांमघांल हे भांडण विकळोपास गेले असते, पण ने’निच्या
मुदैवामें अमेंळिरकेबरीबरच्या भांडणांत कर बसविण्याचा
अधिकार सांगण्यात राजा व राष्ट्र यांचे ऎकमत्य आले
असल्यामुळे कर्जे
त्याच्या ` हानंतर पहिल्या अपत्ययजन्माच्या वेळीच ज[सेर्ने राणावर
याच्या दुराचरणाया आरळोप देवून तिला विभक्त ठेंवलळी. स.१८१`८ ते
झाला. ’ १८ २ ॰पयैत ती दटाकॉत राळिहलोंआणि बॉर्न राज्यावर येतांच
परत हंग्लज्ञांत येऊन राज्याभिषेकादि समारभांत सामील
पिटवर
पार्लमेंठ) , होण्याचा [तेनॅ प्रयत्न सुरू केला. उलट ज[ईंन्से तिच्याबरील
पिंठमें कॅथॉलिक लरेकांवरळोल राजफाँय नियंत्रण भ् पूर्वीपासूनच्या ज[रकमॉच्या आररेंपाची चौकशी करून निकाल
नतर
दूर करण्यार्चे ठरविले. त्यास जेळीर्नते’ विरोध केला व पिठचा करण्यार्वे काम एका कळिमटोंकडें साँपविले व त्याचा निकाल
राचीनामा स्नींकारून थेंडिगठन यास प्रयान नेमले. वट्रथोळिलक ज[बैला अनुकूल झाला. पण १८२१ मध्ये तीच मरण प[व॰
सोंपविल्या.
पण आयरिश
युनियन ( सयुफ
लळोफांस काहोळिष्ट् हक घावयाचे न[होत या
अटांवर
त्यार्ने
ल्याते हे प्रकरण कायमचे मिठले. र[ज्य[रे[हण[नतर
आय‘
पुन्हो पिटला, तो वारल्याबर फॉवसला, फॉक्स न[रल्यावर , लेड व स्कळोठलेड या देशांत भेट देऊन ज[र्ननें तिकडे बराच
परेटँल’डच्या ढसूकला प्रधान नेमले. इ. स. १८०४ मध्ये ‘ लोकप्रियता सेपादलळीपण इंग्लंडमध्ळो त`[ अखेरपथेत लोंकति
ब्रेळीअँचँ डोके पुन्हो निवडले, पण तो लवकरच
बरा झाला
अप्रिय राहिला. तो १८३० मध्ये मरण
होता. १८११ मध्ये पुन्हां त्याला वेड लागले व दृष्टांहि गेला
व अशा स्थितीत नऊ दहा वर्षांनी तो स. १८२० मध्ये
पावल्यावर
त्याचा
भाऊ चवथा विल्यम `राजा झाला. सध्याचा पाचवा ज[नै,
राजा सातव्या एडवर्डेचा मुलगा असून त्याच्या मृत्यूनंतर
वारला. या काळांत ४ या वॉर्न प्रिन्स रीजेट (राजप्रतिनियळी)
होता ज[र्नला त[[फेया राणीपासून नऊ मुलगे व सहो मुलळी
स.१९१० त गार्दावर आला.
बॉस्निया-पूर्वी हे ट्रान्सकाकशि’पामघोल राज्य असून
ऎत्तिहोळिसकदृष्टया २०० ॰ वर्षांपेक्षा जास्त
आल्या. त्याला वैवाहिक शांति व सुख उत्तम लाभले.
च व या बॉ ज्व्( १७६२…१८३० ).…हो तिसऱ्या
बोंर्नचा थोरला मुलगा १८२० मध्ये राज्यावर आला. तो
पुरातन काळवै
आहे. त्यार्वे पहिले प्राचीन नाव कार्दिल किंवा काथेव्हेलि हे
होय.
इराणी आणि
ग्रीक रेप्मन लोकांना
याची अनुकसे
जात्या हुपार असून त्याला प्रांक,लेटिन, यांचे चांगले शिक्षण
गुक्लिपिं आणि आयवैरिया या
मिळाले होते. शिवाय तळो फ्रेंच, इटालियन व जमेंन वोदूंघ्
याचे व्ह्रस्थान हे आर्मोमेयन आणि मुझिया हे रशियन नाव
ज[व[नीं माहिती होती.
आहे. काप्’र्टेल आणि करनेटिया या दोन प्रदेर्शाचा अतभौब
चेनळो ’ करणाऱ्या खऱ्या ज[र्जियाच्या मयोंद्’:-उत्तरेस ओस्से-
शके. गायन व इतर कला यांवळोअभिवा‘वे त्याला असे. प्रथम
आईंवापांच्या कडक शिस्तीस वाढून पुढें खँरनृत्तांमें
करू लागला व अखेर फ्आ दुब'तेनळी बनला.
प्रथम त्याचा
[
टिया
आणि
दाविस्तप्न;
दक्षिणेस एरिव्हन
आणि कार<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महणिट्रीयष्ठांनफाँश’छ्ये) २३८ जॉर्जिया जॉर्जिया सेस्’थानॅ, पश्चिमेस मुरिया आणि इयेरेटिया अद्या होत्या. या [ या ठिकाणी आलेल्या आये लोकांच्या कामामुळे आयेयाकडून राज्यांत निरन..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महणिट्रीयष्ठांनफाँश’छ्ये) २३८
जॉर्जिया
जॉर्जिया
सेस्’थानॅ, पश्चिमेस मुरिया आणि इयेरेटिया अद्या होत्या. या [ या ठिकाणी आलेल्या आये लोकांच्या कामामुळे आयेयाकडून
राज्यांत निरनिराळ्या वेळीं गुरिया, मिग्रेळिया, अबखासिया, चार पांच हजार वपाँपूर्वी येथे आले हे लोक कावेघ्शसमघांल
इंमॅरेटिया आणि दापिस्तान हे प्रांतहि मोडत असत व अतिशय जुन्या सेस्क्रुतीचे असून त्याच्यात काहीं अत्युत्तम
फार येयेवामू असतात आणि
याचा विस्तार उत्तरेस कप्केशसरगिंपाखून दक्षिणेस आरास’ मानसिक गुण आहेत. हे
पर्थेत असे. १९१७ मालपर्मेत टिफ्लळीस आणि क्रुटेस या य[न[ गाण्यावजावण्याचा अतिशय शोक असतो अशळो यांची
दोन रशियन प्रांतात नॉर्जियाची विमागर्णळा आलो होती. पण ख्याति आहे. तथापि हे फार क्रूर आणि दुष्ट असून अति
महायुद्रांत रशियाच्या साम्राज्याचा नाश आल्यानंतर जॉर्जि- मद्यपान करणारे असतात. हे देखणे असून कसरती न[घ्याचे
याते आपल्याला स्वातंत्र्य प्राप्त करून घेतले. प्रथम क[ह"[ असतात. मुमुलमानचिं` राज्य असतांना येथून तुर्कदिवस ट्रोन्स्कळो’र्कशियस फेडरल रिपब्लिकमघ्ये याची गणना झनान्याताठ’व् दोसळो आणि ओस्मानलळो सेन्याताटंळो शिपाईं
होत असे पण पुढें ज[र्कियचिं रिपब्लिक अगदळो स्वतंत्र पुरविण्यात येत असत. रशियन अस्सल पुरु होण्यापूर्वी
येथळोल समाजात उमरावरॅच्या व बड्यां लरेकार्वे फार प्राबल्य
स्थापन झाले.
या जालिंयाच्या रिपब्लिकमघ्ये [टेप्द्धिस’ क्रुटँस, नाटुम, होतेकरेणार्वेहि बॅरवाहेठ करण्याचा आपला हकआहे असे सम
अट्रॅविन या प्रदेशांचा समावेश होतो. याच्या उत्तरेस कॉले- जत व त्या हक्कांची बजावणीहि करीत असतपण आतां जॉर्जि-
शियस पर्वताची राग, पश्चिमेस काळा समुह व तुकँस्यानची
यन लोकांना मुस्थिति प्राप्त झाली असून ते उच्चळोगळी बनले
सरहद्द असून दक्षिणेस व पूर्वेस अनुकसे, एळिरव्हेन, व अझर’
वैजनची रिपब्लिक सेस्यानॅ होती. अद्यापिळिह या रिप|हैल०
आहेत व सर्वं तऱ्हेसे त्य[न”[ आपलळो प्रगति केली आहे.
गेलेल्या न[होत. टिक्लिसच्या ठळार्जूत क्रुरानदळी वहात
आपल्या पराकमानॅ गिळविलेल्या स्वात'त्र्याची त[ची परंपरा
त्यांच्या मागे असल्याते नॅमैं‘नयन लोकांकडे लरेकचिं [”वन्शप
लक्ष्य ओढले जात आहे. या लोकांमध्ये जात्तिनिषयक अमि
ट्रॅन्सफॉ’कशियन टणूंतौल इतर सर्वे जातीच्या लळोफांपेंक्षां
कच्या भौगोलिक मर्यांमा सेपूर्णे ब स्पष्ट तऱ्हेसे आखल्या ‘ जळोजियन लव्क हया अधिक मुघारलेले आहेत, शिवाय
असून ती कास्पियन समुद्राला मिळाला आहे.
गेलो
क्रुटेस, वाटुम
दत्या‘ळिद मुलखासून लहान लहान नद्या वहात गेल्या असून,
त्या काळ्या समुद्राला मिळाल्या आहेत. र्दोगराळ प्रदेश
सोडून वाकळोचा सर्व प्रदेश सुपाँक आहे. जमल मुबलक आहे.
मैंरेप्नाज, कळोळसा, त[बें’ वगैरे खनिज सेपत्तळोहि पुष्कळ आहे.
हे न क ळ,…जव्र्जियाचे’ हार्वीवै क्षेत्रफळ २८० ॰ ॰ चो.
मानापेंक्षां राष्ट्रळोय अमिमानच अधिक आढळतो व या दृष्टांनॅ
ट्रॉन्सवेऱ्फेशियन लोकांमध्ये न[[बेंयन लोकांत हा मोठा फरक
आहे. अमुमवान्ती शहाणपण या न्यायनि पारतत्र्य'छुप्खलेमघ्ये
अखड दुऱ्रवे भोगावा लागल्यामुळे स्वत:च्या आत्मविश्चासम्च्या
मैल अहि.एरिव्हन व अतरवेवनच्या सेस्थानांच्या सरहद्दी-
अनुभवाच्या ज[रावर आपले स्वातंत्र्य मिळविल्यावर बाँर्जि-
वरील मुळुखासेवेघी अद्यापि लढा सुरू असल्यामें त्यांतून तो
यम लरेकानॉ आपला राज्यकारभार मोठ्या क्रुशलतेसे च[ल॰
विला आहे. समाजसत्तावादाकद्दे यांचा कल असला तरी
प्रदेश जॉबियाच्या वाव्यास येहैल त्यार्वे क्षेत्रफळ वरील
संख्येत जमा करावें लागेल. लोंकसंख्येर्चांहि तीच स्थिति.
स. १९१६ च्या खान्ऱमुमारीप्रमार्णे वादग्रस्त टाबूंतील लॉकसेख्या वगळता ब[क[च्या मुछुखांतील लोकसंख्या २७७० ० ० ०
होती.; व यामध्ये, जानियन, रशियन, युरोपियन, आर्मेनि’
यन, मुमुलमान व द्रुतर क'प्हो ज[तीवै लोक होते. वादग्रस्त
टावूतील सेख्या १५००० मरेल असे वाटते.
ह ळ ण व ळ ण.…ज[[जेया एरिव्'हन, अझरवैजन किंब०
हुना सवे मघ्यआशियाचें प्रमुख बंदर वाटूम असून ते जॉर्जियाच्या ताब्यात आहे. त्यामुळे वरील सवे प्रदेंशप्चें न[कच
ज[र्लियाच्या ताब्यात आहे म्हटले तरी चालण्यासांररर्वे आहे.
या वदरापासून एरिव्हन, एरेझ्रम, न[कू,
टॅक्सि, आशिया-
म[यनर इत्यादि ठिकाणी रँल्वै गेला आहे. माझा बदरा~
हे लोक वेप्ल्सेघिकपयाच्या तत्त्वाला सर्वस्वी प्रतिकूल आहेत;
व त्यांनों सप्’धे सांपर्डेल तेथे वतेब्हो वे[ल्श’[`वक[न[ कसून
विरोध केला आहे.
चवथ्या शतकाच्या
आ'रभळो
कान्स्टंटाड्न दळो ग्रेट याते
पष्ठविलेल्या घमौपदेंशकानीं येथे ख्रिस्ती घमींच न[जासेपण
केले. त्या वेळेपासून मोंवतालच्या मुमुलमानळो घमीला द[द
न देतां येथील लोक असून ख्रिस्ती घमौच्या पुराणमतनादळी
पेयालाच चिकटून आहेत.
येथील
लोक
कायेलो
भाषा
बोलतात.
या
भाषेचा अणि दन्डोमूरेम्पियन भाषांच्या क्रुळाचा सूळापासून
स'वंघ न[हो दतर्केस नव्हे तर तिचा दळोन उत्तर काकैशिअन
बगं॰[श’[ देखील वर्णोच्चाराशिवाय कळोणच्याच प्रकारचा सवय
मुळे ज[जिंयाला विलक्षण महत्त्व प्राप्त झाले आहे.
लो क व स्ती.॰-बाँर्बियन लोक कळोणच्या वेशल्वे असावे
दिसून येत नाही. मध्य आणि पश्चिम न[कैशिअन प्रांतातील
याविषर्यो पूर्वी बरेच मतवेविव्य होते प'रतुआतां असे निश्चित
या भाषेत
झाले आहे का, हे लोक पाम्बक
उच्चारण्यास सुलभ नसल्यामुळे कानाला मधुर लागत नाही
नावाच्या उंच प्रदेशत्मिल
भाषांची आणि या भाषेची वर्णीच्चारपद्धति एक असल्यामुळे
त्या
कदाचितूं
लिहिता
येतील.
हो माया
व्याक्र.
मूळच्या लळोफांवे वेशन आहेत आणि हे बहुतकरून पश्चि‘
व बोलताना श्रम होऊन अडरबळल्यासाररर्वे होते.
गेकर्डाल टोंगरपठारावरून
रथाचे नियम चांगले असल्यामुळे लिहितांना त्रास होत नाही.
आशियामायनर
आणि यूररेप<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६२
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महप्'रग्प्ट्रीय‘,हृग्मन'फोश.(जं)ऱ्<३॰` जॉर्जिया बाँर्जियन लिपी आमेंनियन ळिलपविंखन तयार केली ळु ण्ळूद्वी |भ् या, हूंलाक्षरांवे करण्याकरिता ट्रॉन्स्कॉ‘वड्रेशियन लोकांनॉ आपल..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महप्'रग्प्ट्रीय‘,हृग्मन'फोश.(जं)ऱ्<३॰`
जॉर्जिया
बाँर्जियन
लिपी आमेंनियन
ळिलपविंखन
तयार
केली
ळु
ण्ळूद्वी
|भ् या,
हूंलाक्षरांवे
करण्याकरिता ट्रॉन्स्कॉ‘वड्रेशियन लोकांनॉ आपल सैन्य उभारर्के
व आपल्या सरक्षणाचीं तर्वांवज्ञ मुख केळी.
दान प्रकभ्र आहेत व या दोन्इळोवै स्वरुप ड्तवहुं वेगर्हेघ् आहे
लैन्तिनव्’या मनात ट्रान्सकॉ’कशियन टापू आपल्या ताब्यात
असून तळी तद्देशळोय मृळ्प्’क्षरांत ळिलाहेतात.
या
फाँ हे दोन्हो निरनिराळ्या दोन ळिपाँवै प्रकार आहेत असा
आपण अस
भास होती. पाचव्या शतकांत या भाषेत यायनलर्वे भाषांतर
कर्ले असें म्हणतात.
या’ळिशवण्य मोंगला काव्ये, महाकाव्ये
कार नालविप्याकरिंतां
आणि धार्मिक प्रे'या’हे या भापेंत रचले आहेत.
दोन वर्षांत जॉर्जिया ए! रशियाचा प्रांत म्हणून गणला ज्ञात
एक
सुभेदार पाठवून
दिला.
पण
` टिष्ठिस येथे येताच या मुये’राराला अर्धचंद्र मिळाला.
त्यामुळे,
इ ति हा स,…मद्दापुंद्व मुक्त झाल्यापासूनच्या पहिल्या
होर्ते व त्यासप्ठो त्यार्ने या प्रांतावर अघि॰
चिडून
जाऊन
या
मुमेदाराऱ्ने
आमें’नियन बेङखाँरांच्या सहाय्यार्ते व
१००००
बोल्शप्ऱ्ग्रॅक आरमप्‘
राच्या सहाय्यार्ने या ठापुंन बोंल्शेठिइकांचा अंमल चसविंला.
व ताबाँर लोकांचीं एकनात कत्तल केली.
या कॄऱ्यामुर्के
होता. आपला देश लवकरच स्वत'त्र होईल अशी प्रत्यक्ष
कॉंर्जेयन लोकांनाद्दि महायुद्धाच्या प्रार’र्मी कल्पना नव्हती.
पण काळाचा महिमा अतफ्र्थ आहे. या कालाच्या आनु‘
ज्ञळो‘र्जियन व आर्मेमिंयन लोकांर्वे तातोंर लोकांशी ऐक्य
होण्याची सघि याच नष्ट झाला.
कुल्यामुळें स. १९१७ च्या नसत नट्रर्जूत रशियात लवकरच
फांति घडून येण्याची चिन्हे दृग्गोंचर होऊं लागलो व या
मध्ये वेस्ट ळिलटोव्हृस्क येथें रशिया व ज्ञमेनळी यांच्यात तहे
कांतळीमहँय आपल्या भावी स्यातंच्यार्ची
चळोजें स्ज्ञलळो आहेत
असे बोंजिंयन लोकांनां बांठू लागत्व्‘. सबंध ट्रान्सकॅकिंळाशयाच
स्वतत्र होईल कौ काय अशा प्रकारचे कयासग्हे बांधण्यात
येऊं लागले होते.
आणि खरोखरच त्याप्रयाणें घडून आल.
याचळी फळेंद्दि लोकरच दिसून आल‘. स १९१८ च्या याच…
होऊन ह्या तहान्वर्ये आर्मेनियाचप् कांहीं
प्रांत व नाटूमचग् कांहीं भाग
प्रदेश, जॉर्जिया
तुऱ्र्मोनां देण्याचें या दोघां
राट्रांनों ठग्घि`ल. त्याप्रयाणें आपला भाग
का’रेतां तुर्की हैस्त्र त्या भागांत आर्ले.
ताब्यात
वेण्या‘
बाटूम दे तुर्कोच्या
हातांत ताबडतोब पडले. या ट्रान्सकों’कँशियन लोकांत
स. १९१७ च्या सप्र्टेवरमथ्र्ये रशियात राज्यकांतळीचा शवट
ऐक्य
असर्ते तर त्यांत? वुर्कोनकॅ विरोध केला असता. पण
होऊन रशिया हें रिपब्लिक वनलॅ. अर्थातच ट्रान्सकॉंफेशियन `
प्रांतांनाक्रुहे आपल भावेतव्य ठरविण्याचळी सघि येऊन ठेपल’प्,
हो सत्य त्या टायूंतव्ल लोकांत"! याया ज्ञळाऊं दिला न[हो.
बॉजिंयन व आमेंनियन लोकांमव्यै स्यात'त्र्याचो लालसा
उत्पन्न आल्यामुळे त्यांच्यामध्ये चटकन ऐक्य झाल. पण
याशियाय या टापू’त तात्-ट्रेर लोकांयाद्दि भरणा होतात्यानग्द्दि
आपल्या मसलतोंत ओढून घेव्ळा भाग आहे
असे
जॉर्जियन
व आमेंनियन लोकांतां वाटत होर्हे व ते योग्य’प्हे होते.
यासाठी टिळिफ्लस येथे स. १९१ ’ च्या आगस्ठमघ्ग्रॅच ट्रॅन्प्तकव्कशियन लोकांनॉ निवडून द्दिठेल्या प्रतिनिधींची बैठक
भरला व त्यांना स.१९१ " च्या सप्टँवरमथ्ये आपले स्वातंत्र्य
नाहोर कॅर्के. या वेठकॉत नरँप्ग्नयन लोकांनॉ प्रप्मुल्प्यानें
भाग घेतला होता.
पण अशा रळीतऐनें या टायूंतळील लोकांनों आपल संयुक्त
रिपब्लिक स्थापन के'ल तरी ते फार दिवस टिंकणार नाइळो
अशी भोति प्रथमपासूनच वाटत होती. या टार्मूतांल
निरनिराळ्या सेत्थानांमघ्र्ये परस्पर'प्पघ्र्ये द्वेपाम्प्रे घुमसत
होता. संयुक्त रिपढिलकमघ्यें जाळोर्जेयार्चे प्राबल्य असल्यामुळे
इतर सस्थातांनां या जॉप्’जेयाविंपर्यां हेवा वाढत होता. फक्त
एकाच बाचतोंत या सर्व स्'रस्यानार्वे ऎकमत्य होतें व तें
य्ठ्णजें वोल्शनिझमच्या तों सर्वे राट्रॅ विल्भ्द्व होतां हे होय.
स. १९१ ७ च्या नळोव्हेंवरमघ्र्थे लेनिन, ट्रांटस्कळी हे आ’घे-
कारारूढ झाल्यामुळे त्यांनों तुक’हें सरहेट्नृवरळील आपल सैन्य
काढून घेण्यास सुरुवात केली. त्यामुळे तुक’दृचळा या टापुंत जोर
होण्यावीं न्विन्हँ दिग्टुं लागलो.
३१
याक्सिद्ध आपल
रक्षण
यांच्यांमघ्र्थेच दृहो असल्यामुळे
आपले
स्वप्त'त्र्य नाहोर
करण्यापळीकडे यांच्या होवून तुकन्नर्के विरोध झाला नाहीं.
१९१८ च्या मेभाद्देन्यात, सयुक्त रिपब्लिक मॉडल’ व प्रत्येक
सस्थानार्ते आपल वैयक्तिक स्वातंत्र्य न[होर केर्ले. अर्थातच
या सस्यान'प्न'ण् आपाग्र्हे स्वातंत्र्य स्वतऱ्च्या जोरावर राखणे
भाग पडत्ऱ्ऽ. पण इतका तयारळी कोणत्याच एका सेस्याना’
जवळ नव्इतळी॰ अशा !’हेयतळीत बॅग्नियानें शहाणपणानें जमेनॉट्युळाळो खून बांघळें. जर्मनी व नॉर्जिया य्ऊद्धेच्यामघ्यै तह होऊन
नॉजिंयन रिंपाम्’व्लकर्चे सरक्षण करण्यावै ज्ञमँनोर्ते कवूल कल.
नाटूम वेद्र तुर्कोच्या ताब्यात होते तरी तेर्थाल बों’र्लियावे
हितसंबंध
ड्रुरक्षित
राखण्याचँ’ण्हे
अभिवचन
ज्ञमँनळीकढून
बों‘र्जियाला मिंळार्ले व हें वचन जर्मन सैन्य या टापूत असे
तो ज्ञमेंनळीर्ते पाळर्लेद्दिपण महोयुद्वावी तहेकुवीं आल्यानंतर
सर्वच
पा‘रेस्थिति
वद्ललो. दोस्तराष्ट्रनिळी जर्मन व तुर्की सैन्यावें या ढूप्न्स…
कळो‘कॅशियन टायूंसून उच्नाटण कलन, आपलै वर्चस्व तेथे
स्थापित केल. पण दोस्तांनी बॉ’र्जियाच्या रिपब्लिकच्या
कारभार'ळात अडथळा आणला नाहो. रेल्वे मात्र आपल्या
ताव्’ग्'प्त घेण्याशियाय त्यानां गत्यंतरच नव्हते.
या अवघीत सरहद्दीवरकुंल कांहीं मुठुखांस्ळोबेर्यो एरिंव्होन
व नळो’र्जिया यापघ्यें तदा आला. पण ब्रिटिश अधिकाऱ्पांच्या
मध्यस्र्धांनॅ तळो कसप्वसण् मिंटचण्यात आला. पुढें स.
मध्ये र्धेरिंस येथें
शांततापा’रॅपद्
भ्ररलो.
त्या
१९१९
पारेपदेस
बाँर्जियाचें प्रतिनिघिमेङळ इतर होतें. ट्रान्सकॉँकोहैप्यन
प्रश्नाचा या पा‘रँपदेंत काळबौपूवक विचार केला जाईल अर्ते<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६३
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान ""- र्करुं जप्प्ज्ञ'ग्ग् वाटत होते. जॅप्रै‘जया मद्दळाराषीयज्ञानकाश(ज्ञ)॰<४० , पण रशियाच्या समतळीशिचाय या प्रश्नाचा निकाल लावता येणें शक्य नव्हते. रशियांतच अद्यापि बंदर राहूं द..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>"- र्करुं
जप्प्ज्ञ'ग्ग्
वाटत होते.
जॅप्रै‘जया
मद्दळाराषीयज्ञानकाश(ज्ञ)॰<४०
,
पण रशियाच्या समतळीशिचाय या प्रश्नाचा
निकाल लावता येणें शक्य नव्हते.
रशियांतच अद्यापि
बंदर राहूं देण्यापेंक्षां व आपला
जाण्यापेक्षां आपल्या
प्रदेश तुर्की अमलाखालाँ
राष्ट्रप्वै नशीब
रशियन
लोकांच्याच
स्थिरस्थावर झाल नसल्यामुळे या प्रश्नांचा त[गोंपांग विचार
करण्याला रशिया तयार नव्हता. त्यामुळे या प्रश्नाचा
हातीं देणे ज[[जेंयाला अधिक स्रोहैस्वार नाटके व त्याप्रमाणे
१९२१ स[ल”[ ज[[जेंयामघ्में रशियन बोल्रळोघिक अमल चाछु
काळजींपूवक विचार करण्याचा बेत या परिषदेर्ने पुढें ढक
लळ[. कफ ट्रप्न्सकॉंरैकव्शयन प्रांतांतील सस्थानें स्वतंत्र
झाला.
आहेत व निरनिराळ्या र‘ण्स्थानरंच्या सरहद्दी ठरविण्यात
याव्यात एवर्ढेच या परिषदेत ठरविण्यात आहे'; १९१९च्या
इ. स. १९२४ च्या सप्र्टेवरांत बाँर्बियाच्या प्रजासत्ताक
राज्यामध्ये, जळोकिंयन आणि स्ग्ळोढिहएट लोक यांच्यामध्ये
कडावयावे युद्ध आल.
वेडखळोरांनों, ट्रान्सफॉंकेशियन रेल्वे
ओंगस्च्पयत या टप्यूंत दोस्तांवे सैन्य होत. पण त्यानंतर
कांहाँ थाङया सैन्वप्शिचाय सगळ सत्य काढून घेण्यात आल.
१९१९ साली जनरल डेळिनाकनन वॉल्शावक रशियाक्सिद्व जोराचळो चळवळ सुरू केली. या बाबतीत त्याला पुष्क॰
ब्दच अनुयायी मिळाले. हो डेनिफैकन ट्रान्सफॉंकॅशियन सस्था-
आणि कु"टस हो शहरे व्यापिलो. ब्रिटिश, फ्रेंच आणि बेल्जियन सभासदांनी बोंलिंयांत चाललेला हो अंदाघुद्ळो बारका’
याच्या क्कात्रंऽयाविरुद्व होता.
विं`शषत: या टम्पुंतळोल रशियन
ईंनें पहम्ण्याचळी, राष्ट्रसघास ( लोग अनृफू नेशन्स ) विने’क्रूत
वर्वेस्चाला पुंर्ढे मागें बाँर्जियाकडून विंरॉ'व होईल या मौर्तांनें
डेनिफिनचा बोंल्ज्ञेविहकांनॉ पराभव केल्यामुळे डे[मे[’कनच’[
मांधि नष्ट आलाखरळो. तथापि बोंल्शळिव्हकांनॉ आपला अंमल
केली. त्याचप्रमाणे देशांत पुनश्च [तता प्रस्थापित कर॰
ण्याचळी खटपट करण्याचींप्’हे राष्ट्रसे'वम्स [वनॅकुंत करण्यात
आलो. सोव्हिएट लोकांच्या तलांवर विश्वास नसणाऱ्यांनळो
सोव्हिएटचिळो वदनामौ वरण्याच्या हेसूनें पुष्कळ वेळां सौढिह'
ट्रान्सकॉँकोंशयन टप्पुंत बनविण्याची चळवळ सुरू केल्यार्वे
हैं निराळेंच सकट बाँर्जियावर आल. बोल्शेठिंहकांनॉ, अझर’
असणें शक्य आहे.
वैझन, एरिव्हन सस्थार्ने कावळीन करून तेथें आपला अमल
वसविला व न[र्जियावर स्चारा केला. पण हो स्व[र^[ जॉर्जि-
र्तोच अझरवैननमघ्यें एक नर्वे बँड उपरिथत झाल्ऱ्ऽ. वक्रूच्या
यार्वे सौंर्यांमें परतविलो. पुन्हां बोल्शेविक लोक जौजियावर
तेलाच्या खाणीत काम करणाऱ्या हज्ञारों मजूरांनळो व शतांत
स्चारळो करावयाचेच पण पोलङवर मोंहोम सुरू करण्याची
रशियाला अधिक जखरळी भासल्यामुळें रशियाने बॅंप्बिंयावर
रावणाऱ्या द्देळातकऱ्यांर्नो हे वण्ड उभारत्वे’ होते. याच’ळो कारणें’
( १ ) रशियन लोकांकडून खाणीत काम करणाऱ्या मट्टारानां
होते. पण
बाँर्जियार्चे स्वातंत्र्य नष्ट करण्यार्चे त्याच्या मनात
सैन्य पाठविण्याचें रहित केर्ले; व बाँर्किंयाशीं तात्पुरता
तह
फैला. या तहान्वर्थे याटुम्भ्चा प्रांत व वद्र जॉर्जियाद्या
ताब्यात आल.
राष्ट्रस'घानें बाटुम हँ स्वतत्र न करण्यार्चे याच सूयारास
आपल्या ताब्यात घेतली आणि सबंध कॉंकेशसभर लष्करी
कायदा प्रस्थापित करण्यात आला. मोंल्ट्रॅप्त’ठेइक लोकांना या
युहांत अनेक वेळां पराभव झाला; आणि ब्रॅउखरेर’ळानीं, टिष्ठीस
एटांनॉ केलेल्या कत्तलळीबों वणेंर्वे अत्तिशमोक्तींपूणें अशौ केलाँ`
बाँर्कियांतांल ह्या राज्यफांतळीचा पूर ओसारतौ न ओल्रतौ
मिळणारी मसूरी अगदीच
अल्प व अपुरा
होतो.
(२ )
शैतकऱ्यांनॉ पिकवितैल्या गठहाला अगदॉ थोडी किंमत ॰यद्दे.
राष्ट्रसघन्ति ( लोग ऑपूव् नैशन्स ) केलेल्या पथ्यस्थॉबद्दल
सोव्हिएट सरकारास मनातून खूप
सताप
आला व पश्चिम
प्र[त[न'[
युरोपियन राड्रुप्नळी, सोव्हिएट सरकाराबिंस्द्ध झालेल्या वंडास
सहोनुसूप्तदशावलो अतासळोळिव्हएट सरकप्रन निष्कष काढला
जॉर्जियाच्या ताब्यात ह[ टप्पू आल्यावर त्यार्मे मुत्सद्दीपणार्ने या ट|यूंतळील अबेरियन न[वप्च्या मुसूलयान ज[तांला
तांव्हिएट सैन्य ड[गर[ मुळुखांत चवरोन परत पाठविण्यात
आल.
सप्र्टेवर महिन्याच्या अखैरास, स"॥व्हएट सनिक
टिष्ठांस शहरात शिरर्के. त्यावेळी, [टेष्ठीस शहरातील कित्येक
स्थानिक स्वातंत्र्य देऊन टाकून आपल्या चानृला वळवून
रहिवाशांना बेकाकडून फाशळो देण्यात आलें.
ठरघिल्यानें
राट्रस्’प्चामें
ठेंवण्यार्वे ठरविंल.
ह!
टापू
न[[जयाच्या
त[व्गांतच
फक्त एरिव्हृन व अझरवनन
न[त्र तें बंदर खुल अतार्वे अशी अट घातला,
घेतर्ले. पण अश[ रळोतांनें ज[र्जियाला आपल्या टार्मूतांल
अंतगेंत कारभार व शांतता प्रस्थाळिस्फां करतां आली तरी
बोंल्शविक रशिया व तुर्कस्तान या दोन्ही राष्ट्र[च[ बागुलबोचा
जॉजिंयाला चैन पहूं देत नव्हता.
लोकरच त्या व[गुल॰
मोंचामें डळोकँ वर काढण्यास सूरुचात केली. एकीकडुन तुर्कोनॉ
व दुसरळोकढून रशियनांनों या ट्रान्सकाकशियन ट[प’वर चाल
केली; व आर्मेनिया वरेम्रे भागांत राशयनांनों आपला
अमल
स्थापन केला.
ज[[र्जेया एकटा या हक्कघांतां त[ड देण्यास
समर्थ नव्हता,
तेव्हां त्याला नमते' घेण्याशिचाय गत्यंतरच
उरले न[हळो.
पण त्यातल्यात्यात तुका’च्या ताब्यात चाटूम
बाँर्किंया-अमेरिकैंतोंल
सयुक्त
सेत्थान या त्तेस्थानर्चे क्षेत्रफळ ५९२६५
सस्यानांवैकॉँ एक
चौ. म असून,
व्यापक! ५४० चा. मैलाचा भाग पाण्यात व्यापिला आहे.
लो. स.
( बुल १९१८) २९२५२ १७. अटलान्टा' हे
राजघानीर्चे शहर आहे.
बँस्टिस्ट आणि मेथॉडिस्ट या पथांच्या लोकांची सख्या
फार असून सबंध सैस्थातांतांल लाकर'ऱ्ख्येच्या [नम्म्याडू‘न
अधिक लाक बँळिप्टस्ट पंपावै आहेत.
प्राथमिक शिक्षण
सक्तचिं झाल न[हो, स्टॅट स्कूल कमिशनर ’ न[याचा लोक‘
नियुक्त अधिक्रारळो शिक्षणखात्यावरळोल मुख्य असतो. दर<noinclude></noinclude>
1p06w8j2epxtxx0s5p0m1dh7r56404q
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६४
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महण्याट्रोबणनफॉंश (ज; २४१ जालदर जा'प्ठेंदर दोन वर्षांनी हा नवा निवडतात. प्रत्येक परगण्य[(कींम्टों)वर एक ‘ मुपरव्हायझर,’ असतळो ‘ युनिव्हर्सिटी ऑफ जॉर्जिया, हा जिल्हा धियास आणि सत..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महण्याट्रोबणनफॉंश (ज; २४१
जालदर
जा'प्ठेंदर
दोन वर्षांनी हा नवा निवडतात. प्रत्येक परगण्य[(कींम्टों)वर
एक ‘ मुपरव्हायझर,’ असतळो ‘ युनिव्हर्सिटी ऑफ जॉर्जिया,
हा जिल्हा धियास आणि सतलज या दोन नद्यांमध्ये आहे.
दादेणिस सतजल नदो असून पलोकडे ळुधिआना, फेरोंज्ञपुर
अथेन्स, जॉर्जिया
नै’प्र्थं
जिल्हे; ईशान्येस होशिभारपुर जिल्हा. सतलज नदळीचँ खोरे
या उच्च शिक्षण देणाऱ्या
जरा उचावरच आहे तरळी प्रदेश सर्वे सपाट आहे पाश्वेमेस
[न्बॅआस नदोकडे या प्रदेशात थोडा उतार आहे. हा प्रदेश
स्कूल आँपरॅ टेक्रौंलळोची
ज[जिंया अप्रिकलल्चरल कॉंतेज
तळीन प्रमुख सस्'या आहेत.
आणि
कापूस, मका, ओंट, गहूं हळी महत्वाची पिपहुं, आहेत.
उसाची लागवडद्दि दिवसँदिवस वाढत्या प्रमाणांत होत आहे.
सुपीक असून शळोख लोक या भागास ‘ पचावची चाग ’ अते
४२००॰ ची. मैलाचा प्रदेश व्यापिला आहे' घोडे, खेचर,
म्हणत असत.
सवै प्रदेश मळहैंचा असल्यामुळे सूस्तरशास्त्रदृष्टया या
भागांत मिशिष काही न[हळी. त्याचप्रमाणे येतो या भागांत
डोंलर र्किमतौचळो खनिज मालाची निगैत झालो. त्तेस्थानात
भागास हे नांव मिळाळें अते
या सस्यानांत पाद्देन वुक्षांचीं ‘द्दा'टं अरण्ये असून
त्यांनों
गाय, येढो व डुक्कर हळी संस्थानात आढळणारॉ प्रमुख जना’ , बरळोच वाढल्यामुळे नैसर्गिक वनस्पत‘ष्ठेची
चाड कार नाह‘[.
वरे’ होत. शैतीच्या कामाकरितां, पहिल्या दोन ज[तोंच्या ’ आले आणि बोरे याची या भागांत लागवड करतात. ठांडगे,
जनावर[च[ मुख्यत्र्वेकखन उपमोंग होतो.
काळवळीट, सते, ड्ळोतांर्तांल उदळोर मनस्ची असून पिकास फार
माते मारण्याचा ध्'ळादाद्दि सस्यानांतोल महत्वाच्या घेयां’ त्र[स॰देत[त.सप[ट[वर येथील हया समशीतोष्ण आहेचून्न आणि
पँकळो एक आहे. सोंर्ते, ज[दळी, कोळसा, लोखंड, मैंगेंनळीजघातू’ जुलइ महिन्यांत उन्हाळा असतो. परंतु फार भासत न[हळी.
र्वोवसाईंट मॅफाहैट, चुनखडळो, नैसर्गिक सियेट, कावेचीं मातां, पावसाळ्यात [हेवतापाचीं स[थ लोकांस बराच त्रास देते.
शखजिरे वगैरे खनिज पदार्थ त्तेस्थागांत विपुल सापडतात. पावसाची सरासरळो २४ इंच आहे.
जळोणियांत त[पडणारा सगमरवरळी दगड सुवकपणावद्दल
इतिहास: ……श्रांशकरातें' ज[लयर राक्षसाचा परामव
प्रसिद्ध आहे. १९१५ साला सस्यानांसून ५७९४६८८
या भागांत केला अशी एक कथा आहे,
त्यावखन या
म्हणतात.
ख्रिस्ती शकाच्या
कापडचि कापूस दावण्याचे व पट्टे बांधण्यावै अनेक मोंठ‘
आरंभी कनिष्कांच्या कारकळोर्दीत
भरलेल्या बाँद्वतेगौतळीसव‘
मोठे कारखाने आहेत.
जलमामाँर्ते आणि खुष्कळोच्या मार्गाने प्रयास करण्याची
यात ज[लदराचा उक्केख आलेला
आहे. सातव्या
शतकांत
ज[ल'वर न्निगतौच्या राजधाननृचें शहर असून ते रजपूत
त[थनें पुष्कळ आहेत. सावन्ना हें मुख्य बंदर असून मोड… ’ राज्य होशिआरपुर व कांया हे जिल्हे आणि चेचा, मेडों
व सुकेत हो सस्थाते यांनळो व्यापलेल्या प्रदेशावर होते अते
चिनी प्रव[स`[ ह्युएनत्सग म्हणतो. नवव्या शतकांत काश्मी’
२०१३९९४८ ग्मैंडांची निमैंत झालो, कापूस, सरफॉर्वे तेल रचा र[ज[ शकरचद्र् यार्ते त्रिगतळोचा राज[ पृथ्वव्चेद्वा याचा
व पेंड या जिनसळा निगैतळोतळोल मुख्य होत. टक्टाहैन तेल पराजय केला असा उक्केख ‘ गजत'रणिर्णीत ’ आहे. इ. स.
आणि इमारतळो र्लाक्रूडाहे येथून पुष्कळ रवाना झाले. १९१५ दु १०८८ च्या सुमारास इब्राळिहमशहा घरेरळीर्ते ते शहर
चार्ली येणे ७४८२ येलांचा वाफेच्या याडॉचा व ४८५ मैलाचा ` काबीज केल. त्यावेंळेपासून हा प्रदेश लाहोरच्या हुम्ग्रांत
वितेच्या गाडीचा रस्ता तयार होता. १९१७ सालळो, मोडत असून त्यावर मुमुलमानळो अंमल होता असे दिसते.
सय्यद घराण्याच्या कारफॉंर्दीत( १४१४-५१ )या भागां’
ज[[नेंयांत’ १९ सेंदिंहग्ज बँका असून त्यांत ५॰भ् ॰॰
मोंटॉ जहाबें सूद्धां आत येऊं शकतात.
१९१३ सालीं या
न्बदरांतून, १०५६७०७ प्मैंड किमतळोच्या मालाची आयात व
लोकांत? ठेंग्ळी ठेंनिल्या होत्या.
वर त्याची सत्ता [’ठेंशिप नव्हतळो;
ज[[र्जेयाची ( ड्रुसऱ्या ज[बँ
रामाच्या न[बप्वरून )
वपाहत, १७३३ साला स्थापण्यात आला. ४४
सभासदांचे
वरिष्ठ मंङळ(सतेट) आणि १८९ सभासदांचे प्रातोंनेधिमंडल
( हाऊस ऑफ रिंप्रेसॅटॅटिव्हबु) असते. दर दोन वर्षीत’ळो
वरिष्ठ मंडळ आणि प्रातेनिघिमंडळ यांतील सभासदांची नवी
निवड होते. काँग्रेसमध्ये या सस्थानतर्फे तेतेटमथील आणि
‘ हाऊस ऑफ रिप्रेट्रश्चिव्हडूळा ’ मधील अनुकल्लम दोन आणि
चारा सभासद पऱठविल
ज[तात
[ सदमेप्रेथ [दे स्टॅटमन्स
इयर बुक, १९१९;
रिपळोर्टे, इ.]
तेस्थानांतोल वेगवेगळ्या खात्याचे
त्यामुळे येथे त्या सुमारास
वरळोच गडबड झालो. त्यांत खोखरचा र[ज[ जसरथ याने
आरंभलॅलो मोहीम प्रसिद्ध आहे. इ. स. १५५५ मध्ये
हुमाहूंनच्या निश[ण[खालो मोगल सैन्य येथेच जमा झालें
व याच्या आसपास १५६०साल“, हुमाशूननें न[हेरामखानाचा
पराज्ञय केला. ज[लदरचा शवटचा व प्रसिद्ध सुभेदार
अदळीनायेग
हा होय. अहमदशहा
द्रुराणींर्ने सूरमहाल
न
कतळीरपुर या दोन शहरांची कूट केला होता. विशषत: कतौ‘
रपुर शहरातील पवित्र स्यार्ते द्रुरार्णनि म्रष्ट केला. या
गोष्टीचा सूड म्हणून शिसांनॉ ज[लघर शहर इ. स. १७५७त
ञ|ळल॰
जाळेद्'र, जि ल्ह[॰--पेज[व; ज[लदर बिभागांतोल एक
र्मोगलो पातशप्हऱ्‘स शिखांनॉ ज्यावेळी विरोध हुख केला
जिल्हा, उ, म, ३० ॰ ५६’ ते ३१ ° ३७’ व पू. रे. [ त्यावेळी त्यास या जिल्ह्यांत पुष्कळ अनुयायी धिळाल.
७'९ ° ५’ ते ७६ ° १६’. क्षेत्रफळ
१३४२
चौरस मेल. [ पुष्कळ छोटे'द्योटे सरदार त्यास मिळाले व तलवारळाच्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६५
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय झुग्नकोंश,(ज)२४२ ज[लदर ज[ळंदर जिल्ह्याचा अधिकारी डेप्पुटळो कमिशनर जोरावर आपला स्वतेत्र सत्ता ड्रुयावच्या निरनिराळ्या भागांवर त्यांनों प्रस्थापित केली. इ. स. १७६६ म..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय झुग्नकोंश,(ज)२४२
ज[लदर
ज[ळंदर
जिल्ह्याचा अधिकारी डेप्पुटळो कमिशनर
जोरावर आपला स्वतेत्र सत्ता ड्रुयावच्या निरनिराळ्या
भागांवर त्यांनों प्रस्थापित केली. इ. स. १७६६ मध्ये ज[लै’
नराच्या कारकीर्दीत
दर शहर फैद्गुरल्लापुरिआधिसलच्या तब्व्यात
विस्ट ज[लदर नायक सरकारात
गेल. त्यावेळी
या ससूहाचा पुढारी खुशप्लसिंग न[चाचा होता. याचा
पुत्र
बुवसिंग याते ज[लदरास भुईकोट [कैया बांधला. याप्रमाणे
निरनिराळ्या ठिकाणी या भागांत पुष्कळ ग[व[स तटबेस्ळी
निरनिराळ्या लहान लहान राज‘न्नळी केलळी.
जितसिंग
हा सर्वीत प्रवल
होता. इ. स.
महाराजा रणजिता’सॅयानॅ हा प्रदेश जिंकला.
मध्यंतरी
रण-
१८११
मध्ये
पा’हेलो शीख
लढाहै सपल्यानंतर ज[लदर हुआन वि‘ळिटशांकडे आला.,
उभारऱ्व् होते. त्यावेळी क्रुपुरथलाचा र[ज[
रभ्’गथीरा‘तेंग यार्ते या भागांत शांतता ठेवण्यात बरीच
मदत
केला. नफॉंदर येथील दरगे व नृरमहाल येथील हूंरजहानची
सरा’द हो प्राचीन ठिकाणे या जिल्ह्यांत पहाण्यासारखाँ
आहेत. लोकसंख्या ( १९२१. ) ८२२५४४. या जिल्ह्यांत
चार तहनिलो
आहेत
व ८ म्युनिसिपाळिलटया
आहेत…
असतो.
अक’
लाहोर सुभ्'यर्लोल द्रुआव
मोडत होता.
अकबरा-
नतरच्या मोगल न[दशहनिळी राज[ तोडरमल याते सुरू
केलेला नगदळी सारापद्वा‘ते बंद केली व जो कोणी ज[स्त
पैसा देण्यार्वे कबूल करील त्यास त्या भागांतांल खेडॉ
खचार्ने देऊं लागले. शिखाच्या
अमदानोत तर हेंद्दि वेद
झाल व ज्यास जितकँ ज्यास्त मि`ळल [तेतर्के येण्याची प्रवुत्ति
होऊं लागलो.
महाराजा
रणनितसिंगाते कांहळो सुधारणा
करण्याचा प्रयत्न केला. इ. स.
१८५७ सालच्या बेडांत ज[लदर व फिलर येथळील काळ्या
लेंम्यार्ने वेड
हा जिल्हा
णिळिटशांकडे आला.
रुपये उत्पन्नाचा
सरकारसारा
१८४६
त्यावेळी झालेल्या पहार्णांत १३।। लाख
हा जिल्हा होता.
१९०३-७४
साली
१४०५ हजार व एकंदर उत्पन्न २ ०२५ हजार
रुपये होते.
या जिल्द्यांत ज[लदर, करतारपुर,
नृरमहाल,
मध्ये हा भाग
अलवप्लपुर,
फिलर,
राहोण, ’ळंनयाशहर, बंग आणि नकोद्र अशा ९
म्युनिसिपालिटया आहेत.
व ह तों ल.…नालद्र जिल्ह्माची
उतरेकडळोल तहसव्ल.
या [जेंल्द्यांत मुड्रुलभान इळाकडा ४५, हिंदु शकडा४०व शीख
इग्कड[१४आ`हत. या जिल्त्गांत सवे लोक पंजाबी भापळाबळोलत[त॰या जिल्ह्यांतळील बहुतेक जमीन लागवडळीखालळो आहे.येथे
उत्तर अक्षांश ३१॰ १२’ ते ३१° ३७’ व नूवेरेखाश
७५. ’ ९६’ ते"५ ° ४९’. क्षेत्रफळ ३९० चरेरस मैल लोक‘
गहूं, हरभरा, जव व मका ह“! मुख्य पिके
लागवड यहुंग् करतात.
असून शिवाय करतारपुर आणि अलचालपुर ह“[ गांवे व
आहेत.
ऊंसाची
इ. स. १९०३…४ मध्ये एकंदर १३५७ चौरस मेल
जमीनळोयेकळो १ ०९३ चौरस मेल जमीन लागवर्डाखालळो होता.
आतां याउपर ज[स्त जमीन लागवडॉखालळो येद्देल अहैंय्
दिसत नाहीं. या भागांत
विहिरी
पुष्कळ
आहेत.
गुरांचौ
अवलाद या जिल्ह्यांत चांगली नसल्यामुळे दरवर्षी इतर
जिल्द्यांसून शतकामाकरितां पुष्कळ गुरे विकत आणावळी लाल.
त[त.ऎनों-ह॰अकवर`[मघ्ये ज[लदर दृआबांतज्ल घोड्यांची अवलाद प्रसिद्ध आहे असा उत्त्ट्रेऱ्ख आहे.परंतु हक्की तते दिसत न[ह”[.
येथें फक्त ८८५ एकर जमीन सरक्षित जमल म्हणुन असून
त्यात शिसया व कळोकर यांची लागवड केलेली आते.
या भागांत ककर विपुल आहे. क्षारयुक्त जर्मानव्तून सोरा
तयार करतात.
सूतो विणकऱमावे हातमाग या जिल्द्यांत बरेच चालतात.
सख्या
(१९२१) २८९३९६.
ज[त्'ठदर हे मुख्य
ठिकाण
४०५ रेवडॉ आहेत. १९०३-०४ सालळी या तहसिलव्चँ
एक'दर उत्पन्न ४.८ लाख रुपये होते.
श ह र‘…पज[व, ज[लदर विभाग व जिल्हा. उ. अ
३१ ° २०’ वपू. रे. ७५ ° ३५’. हे नॉर्थ वेस्टनै रेल्वेवर
स्टेशन असून मुवद्देहुन १२४७ मैल आहे. लो. स. (१९११)
६९३१८. ज[लदर देत्याच्या पाठीवर हेशहर बसविले
आहे अते पुराणे सांगतात. शहराच्या भोवतालचा भाग
पवित्र मानला जात असून त्याची यात्रा पुण्यफलदायक
होते अते सांगतात.
ह्युऐनत्सग दोन वेळां,
( एकदां इ. स. ६३४
मध्ये व
दुसऱ्गांदगें इ. स. ६४३ मध्ये ) ज[लघरला आला होता.
त्यावेळीहे उत्तर [हेदुस्थातांतेष्टल राजयानळोये शहर होते
अते वर्णन आहे. हवैशिलाळिदत्याते हुग्एनत्स'ग चीनला परत
ज[व[ना
त्याला पींहोवविण्याकरेरतां मुद्दाम
ज[लदरच्या
खुद्द ज[लदर शहरांत रेशमौ विणकामावै २५० हातमाग
राजास वरळोवर ळिदळे होते. काढल्या तरी
इ. स. १८९९ मघ्र्मे होते.
चीनतांवळो ज[ल'वर रामाला र्बोद्वघमौच्या वरिष्ठ अधिकाऱ्याते
लाकडी
सामान,
खुच्र्यो वगैरे
येथें व`र'च तयार होते. या निल्ह्याचा बहुतेक व्यापार शतकाविपयकच आहे. गहूं, कापूस, सुती व रेशमळो कापड वयेरे पदार्थ
येथून बाहेर ज[तात. नोंथे वेस्टने रेल्वे या जिल्ह्यांसून गेली
असून तिचे या भागांत क'[ह“[ ठिंकार्णी फांटे
या जिल्ह्यांतळील रस्ते चांगल
नदीवर
होड्या चालतात.
आहेत.
विपिश
होणार आहेत.
पावसाळ्यात सतलज
अमदानीं सूसृ झाल्या-
पासून या जिल्द्यांत कधीं दुष्काळ पडला न[हव्.
काळांतल्या एका
सवय हिंदुस्थान'प्तोल वळीद्वधयेशासनाचा व भिठूकॄ’नां शिक्षा
व बक्षिते देण्याचा
अधिकार
देऊन
ठेंविला
होता. हाच
र[ज[ सत्रे दिंदृस्थानमर [हेडून ज[गज[ग्।“[ त्यार्ने स्तूप व मठ
न[प्’येले, पण या विथानाची सत्यता सिद्ध करण्यास कांहळो एक
पुराचा त[पडत न[हो. उत्तर हिंदुस्थातांत सातव्या शतकांत
बहूंतेंक ठिकाणी जरी बौद्ध 'वमीस उतरतळोकळा लागलो होतां
तरी ज[लदर येथे ह्या थपोची वडतळो कमान होतळो. तेथील<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय ज्ञानकोश… ( ज ) २४३ जालना पचातांढून अधिक असलेल्या बौद्ध मठांत दोन हजाराहून जालारळी शतकांत मुसुलमानों सत्ता हा भाग हस्तगत करीपयेत बुहो शिद्यांच्या ताब्यात होता. येथ..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय ज्ञानकोश… ( ज ) २४३
जालना
पचातांढून अधिक असलेल्या बौद्ध
मठांत दोन हजाराहून
जालारळी
शतकांत मुसुलमानों सत्ता हा भाग हस्तगत करीपयेत बुहो
शिद्यांच्या ताब्यात होता. येथे एक मशीद व एक सराहै
पहाण्यासारस्व्या आहेत. त्या स. १५६८ मध्ये बांधल्या
असल्या अर्ते त्यावरील शिलालेसांवखन दिसते. [हेड्रु देवळां'
मध्ये आनदस्वार्मांवे देऊळ साधारण मळोठें आहे. स. १७२५
पासवा तेथे टिकून राहिली होतो.
मध्ये ज[लवा येथे किल्ला बधिला होता. परेतु हलळो तळो मॉड-
ज[स्तों भिक्षू होते.
पण इकडे येन पंथाच्या त[न ब्राह्मणी
देवस्यातांत अजमाते सारे प[वशेंच उपासक होते. १ १ व्या
ज[लेदर येथील ळिभदू'य्नों
अभि‘यमाँचा विरेळाष अभ्यास केलेला असे. ट्टाएनत्सग ६६४
फळीत आलेला अळिह.ज[लन[ते[ल यागांत फळफळावळ्
पिकते. तळी सत्रे ॰मुवद्दे व इतर ठिकाणी रवाना होते.
नप्ये लष्करी ठाणे स. १८२७ मध्ये बांधले होते
ठिकाणी स. १९०२ पयेत निचामची कांहळो फौज
मध्ये ज`[ अभिघमँ भाष्य शिकला तो येथील चद्र्वणे
नावाच्या आचायवृपाशी होय. इ.स. १०० च्या सुमारास
सम्र’ट् कनिष्काने भाष्ये रचण्याका’रॅतां जळो पळिरपद पळोलावलळी
पुष्कळ
सालव त्या
होता.
आतां हे लष्करी ठिकाण नाही.
होतो तो त[रानाथाद्दिकांच्या मते ज[लदर येथील एका
मठांत भरला होतो, पण हुग्एनत्स’ग याचे म्हणणे अते का
हो सभा कादमॉरमघ्थेव नक्की भरलो. कदाचित असॅहि असेल
फौ प्रथम ज[लदर येथे हो सभा भरून पुढें उन्हाळया’
निमित्त त्याची अधिवैशनॅ काश्मीर ग्रँर्थे झालो.
ज[लवणकर, न[रप्यणबोवा-एक महाराष्ट्रळोय सन,
कवि. याचा जन्म शके १७१५ व झाला व शके १७९०
आषाढ वद्य ५ मी रे[ज्[[ ते समाधिस्त आले. हे वाळपणा'ऱ्
पासूनच चांगले वेराग्यसपन्न होते. यान॰[ गिंरनार पबँता`
ज[लदरला ब्रिटिश सैन्याची छावणी आहे.येथे स. १ ८६ ७ त
वर बारा वर्षे राहून तळीव तपश्वया केळी. यानळी मुमुक्षूये सप्त…
&
म्वुनिळिसपाळिलटळोची स्थापना आलोथॅर्थे ५।६ हायस्क्रुले व एक
सागर रचले आहेत ते येथेप्रम[णे८…( १ ) हा[प्तस[गर,(२)
कॉलेज आहे. स्नियासाठो कन्यामहाविद्यालय ज[व[ची एक
विज्ञानसागर, ( ३ ) बोंधसागर, ( ४ )कैंक्तयसागर, ( ५ )
संस्था आहे.
भ् आनंदसागर, ( ६ ) शड्रेत्तिसागर, व( ७ ) कस्णासागर.
जालना. ता छु का.…हेदावाद सस्यान. औरंगाबाद
न[रायणवळोव‘ळावै हे सत्रे ग्रंथ ओवळीवद्वा आहेत. सप्तसागरां’
जिल्द्यांतळील अगदी पूतेकडचा त[छुका असून त्यार्वे क्षेत्रफळ
पकॉँ करुणासागर हा प्रेथ फार चित्तवेयक आहे. याचे शिष्य७४४ चीरस मैल आहे. लो. स. ( १९११ ) १३७६८१.या प्रशिष्य काशी, लष्कर, रेग्'लसा, यार, देवास, पुणे इत्यादि
त[छुवयांत दोन गांये आणि “.५० रेवडॉ आहेत.
रेवडॉ जहागांर आहेत. जमोंनमहसूल
इ. स.
पैकी ५९
ठिकाणी आहेत. वरील प्रेथांशिवाय गुस्पादुकाष्टक, चिद्र॰
त्नमाला, बोंथाष्टक, विचारमाला, निपाँणपचक वगैरे अनेक
१९०१ मध्ये
२'५ लाख होता. जमळोन काळी असून उत्तरेकडे आणि
पूर्वे'
स्फुट प्रकरणे यानी लिहिली आहेत. शिवाय अभंग, पदे
न[रायणपोवांची कविता फार साध्री,
वगैरे बरीच आहेत.
कडे थोडऱ्' डोंगराळ आहे.
श हूं र॰-॰नालना ताळुवयाये मुख्य ठिकाण
कुंडालेका नदळीच्या दक्षिण तळोरावर वसलेले
१९“ ५१’ व पू. रे. ७५" ५४’.
लोकसाठुया असून वैकां १२८९१
आहे.
असून ते ` सुलभ आणि अध्यात्मज्ञानपरिपूये आहे, असे रा. अजगांक्उ. अ.
कर लिहितात. [ महाराष्ट्र कविचळिरत्र. ]
१९११ स[ल“[ १८९९४
[हेढू होते. रामराजाच्या
जालापहाड-बंगाल, दानिछिंग
त्टॅशनच्या वर असलेलळो टेकडी. उ. अ. २१" १’ व पू. रे.
वेळीं चालना अस्तित्तांत आले अशी स्थानिक दंतकथा आहे.
८८० १६’. दप्र्किकिंग येथील लष्करी ठिकाण येथे आहे.
येथील परेड ग्राउंड समुद्रसपाटव्पासूव ७५२० फूट उंच आहे.
सांता या ठिकाणी राद्दिलळो होती म्हणुन यास ज[नकापूर
म्हणत असत. परतु पुड एका मुसुलमान थामत काष्टयान
ज[लारळी-श्राशस इकार-यांतील एक जात. वस्तळो सूमारॅ
त्यावै न[व ज[लना अते ठेंवलेअकवराचा नमो अमूल फझल
२४
हा कांहीं दिवस येथे राळिहला होता. व अ‘वरगदेळाव दक्षिणेची
सुमेदार असतांना वार'वार येथे येत असे.
शहाजप्दा शह्मअलम
सगमतेरनचीक लढाई दिला. पण तोंत मोंगलोचा पुरा परा-
भव झाला, शिवार्गार्ने पट्ट[ किला व तेथून आडवाटेते राय…
गडास तळो कूट पुखखप पोहोचविलो. पुढें राजारामांनॅद्दि हे
शहर इ.स. १ ७ ० ०च्या पुमारास छुटलेया वेळीं मॉगल त्याच्या-
हा परगणा
हें मुख्यतर्दै
तेंळगु करेंळंरै, भोईं ( फ्प्लग्न्री
प्रमाणेच गंगमकछु
अते ज्ञात्तिनाम आहे.
ज[निविषयक
आचण्रकमैं, यामिक समारंभ इत्यादि ज[बतोंत
लोकांचे मोंला लोकांशी निकट साम्य आहे.
वर चाळून आले असतां त्याते त्यांचा पराभव केला. याला
ज[लनापूर अतौहे नांव होते.या गांवव्च स. १५९७ व
याचा पराभव केला होता. स. १७५७-५८ व
अहि,
साली असाची अते कांहॉ मानतात. तांप्रत, म्'ग्जम आणि
विझमापट्टमु या जिल्द्यांसून याची वस्त्तां आडळते. मासे
मारणे हा याचा मुख्य धंदा आहे. यांना गगावमुसमु (गेगेंचे
लोक) अर्धे न[व असून कब्वेरा करेळ्याच्या ज[तळीला याच्या
व त्याचे सरदार यांन'व्
अप्दिलद्दाएळानॅ मोंगळ हेंनापति खर्गिखप्नार्वे व रामा जगन्नाथ
द्वार
वाहणारे), आणि शैतावर न[गर घरणारे गडळी असतात.
ज[ल ( ज[ळे ) या शब्दापासून ज[लारी या न[वाची व्पुत्पा‘त्ते
इ. स, १६७९ व
शिवाजीने हे शहर लुटले. तेथे पुष्कळ कूट मिळाली. त्याला
अडविण्यास
न[[जेंलिग
जिल्दां.
ळं
ज[लारी
ज[लारी लोकांत दोन वमँ असून दोन्होळिह स्त्रझानिशरीरस'बंप करणाऱ्या आहेत. पनरेन्डु कोटला (वारा लांब) आणि<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रोय ज्ञानकोश. ( ज)२४४ ज[ळिआ एडुकोंटला (सात खाव) अशी मांडवाच्या खांबांच्या स'वंया' (३)ज’ळेअ[ "). ज[लप्न देवाची. हालार जिल्द्यांतळोल निराळी वरून या वर्गांची न[वे पडला आहेत. पनरे..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रोय ज्ञानकोश. ( ज)२४४
ज[ळिआ
एडुकोंटला (सात खाव) अशी मांडवाच्या खांबांच्या स'वंया'
(३)ज[[’ळेअ[
").
ज[लप्न
देवाची. हालार जिल्द्यांतळोल निराळी
वरून या वर्गांची न[वे पडला आहेत. पनरेन्डुकाटलाह आप- [ खंडणी देणारा तालुका. यात १० रेवडों आहेत.
त[ळुकदप्र
र्णास एडुकळोटला ज्ञातांपॅक्षां श्रेष्ठ समजतात. कारण एडुकों’ श्राळवा भ्रायाद् आहे. व्याचामळ् पुरुष देंपेंन्री न[पांन्“ हाताटला आला हा अधमँसतळित आहे अते ते समजतात. . ज[ळिलआ शहर उड नदाच्या पूव तीरावर नवानगरपामून
इतर तेलसू ज[तळोप्रमाव्ळा ज[लारी लोकांतेव्हे एक ज[[ते- ` सुमारे २० मैलावर वसले आहे.
मडळ असून त्याच्या अधिपतास पिता अते म्हणतातडळोलो’
वैहर नामक एक कनिष्ठ अधिकारी असतो.
अयेरेया ज[तळोच्या [रेवानाप्रनाणें ज[लारी ज[तळोची विववा
याकटचा दळीराशी लग्न करते. पेंहुपट्ट ग, विझपापट्टग, विमलापट्टण आणि रावलपट्टण या चार शहरातील प्रतिनिधी व[
प्रत्येक लप्नसमारंभास आमंत्रण असते.
धार्मिक कृत्यात ज[लारी हे वाचावे अनुकरण
करतात.
सया‘हेत केलेल्या ज[ल[र[च्या मृण्सूतौपैकां क[ह"[ अशाप्बग[ल"[ व[बु:-…हा काळ्या
रंगाच्या
घोड्यावर
आखढ
झालेला असून माते मारणाऱ्या करेळ्यानां आशीर्वाद देत
आहे असे दाखविले आहे.
सामलम्म[:-- अगांत
[हेरव्या
रंगाचा
असा घातला
असून त[पाच्या साथंळोपासूव हो कोळयार्वे रक्षण करीत आहे.
राजन्याऱ्-हो एका ह्यांची सूर्ति असून, [हेच्या उजव्या
हातांत तलवार. आहे, व हो काळ्या हत्तीवर आखड आलेलो
दाखविला आहे. पान [रँवयातां ह्या देवतेच्या कुंपाप्रसादार्ने
पुत्र होतात असा समज आहे.
येरनम्म[ऱ्-[^हच्या डाव्या हातांत
तरवार
असून
हो
अश्चाखढ आहे.
हा देवता करेळ्यऱ्'टँ, बुङणें वगैरे ’अपयातांपासून रक्षण करते.
भ[ग^[रथाम्म[:… दिला आठ अथवा वारा मुचा
हो
गचाखड
आहे. पटकी,
असून
हगवण इत्यादि आचारांपासून
हो देवता कळोळ्यचिं रक्षण करते.
नुकलम्पाब्-हो देवता देवीच्या आनारापासून कळोकयानां
रळिक्षते.
ओरळोतौन्डळी अम्मवारत्र्न्- ही देवता वादळापासून बोंटॉवै
रक्षण करते.
भागदेचीऱ्प्हळी व्याघासढ असून क`[ळ^[ ज[तांर्वे पटका-
पासून सरक्षण करते.
॰
वयळीकत्रुल अम्पवाल्ऱ्ळंह्मा
देवतेला तहत डळोळे असून
( एका मातीच्या कुंभाला हजार भोके पाडून हे डोके दाख[`व`ल आहेत ) हो कळोळळी लाकांन् या स्वास्थ्याकरितां व
कल्याणाक‘रेतां अहनिश झटते. [थस्टँन]
बाळिश्रा-मुवद्दे, काठेंवाड. (१) ज[लिया आयाजळी
चोकठाण्यातळील निराळी खंडणी देणारा त[ळुकायेर्थाल त[ळुक
जालोर…राजपुताना. जोधपूर सस्थानांतांल ज[लोर
जिल्ह्माथे मुख्य ठिकाण. जोधपूरच्या दक्षि`णस ७५ मैलांवर
आहे. उ. अ. २". ० २१’ व पू. रे. ’२ ° ३७’. लोकसंख्या
( १९११ ) ०६२४. येथे पोस्ट शाळा,. दवाखाना या सोयी
आहेत. येथे सूतळो कापड, उंटार्ची ळिजर्में व पचरसळो थासूची
नक्षी काढलेलळो पाण्याची भांडी तयार होतात. याच्या दक्षि‘
णेस र्टेकडळोवर विला असून तो राजपुतान्यांत प्रसिद्ध आहे.
परमार रजपुतांनों तो बांधला असून अद्यापि त॰`[ चांगत्य
[स्थतात्ऱ आहे. [कला ८०० फूट लावव ४०० फूट रुंद
असून [केलयाचा चढण सुमारे ३ मैल आहे रस्ता दगडी
’ असून निसरडप् आहे बाराव्या शतकाच्याअखेरळीपयेत [केला
परमाराकडे होता. त्या…रेतर नडळोलचा चव्हाण राव कळीत्ति
पाल यान्न्‘कुं घेतला व तेथें आपली रा जधानो केलोपुहँ त्याचा
न[सू उदेळिसग याच्या हातून शमघुद्दत्न अल्तमश याते इ.
स. १२१ ० च्या सूमारास घतला होता. परंतुपुन्हा त्याच्या
हवाला परत केला. या'नतर शभर वर्षांची अलाउद्दीनाते वेढा
घासून ख'द्वेराव चव्हाणकडून घेतला. याच वेळीं अलाउद्दसैनार्ने
बांधलेली त[न घुमटांया मशीद
सन १"४॰ च्या सुमारास किल्ला व आसपासचा भाग ज[घ‘
पूरचा रा ना मळालदेव यान् या अमलाखाला आला.
ज[लान, [ज ल्ह[.-समुक्तप्र[त,
अलाहाबाद
विभाग.
उत्तर अक्षांश २५न् ४६’ तें २६" २’०’ व पूर्वे रेखांश ७८'
५६’ ते ७९" ५२’. क्षेत्रफळ १४८० चौरस मेल. हा जिल्हा
ळिन्ना’टॅश पुंट्रेलखझाचा
अगदी
त्याच्या चारी दिशांस यमुना
उतरेकडचा प्रदेश असून
नदळो व यमुतेस
बटवा आणि फूज नद्या आहेत.
नाते हा जिल्हा
व्यापलेला
मिळणाऱ्या
पुंदेलरवडच्या सपाट मेदाआहे.
जमीन
मळीची असून
नुनखडळी किंवा ककर येथें सापडतो. येथें वनस्पती फारशी
न[होत. वाभुळ आणि रेवर हो आर्डे दृष्टीस पडतात. क[ल्षी॰
जवळ कानपूर येथील कातडळो कमावण्याच्या कारखान्यात
पुरवठा करण्याकरिता ज'गलखात्यानें वाभळळोची लागवड
कळी आहे.
प्रप्णी:-…रानडुकरे, काळचीटनित्ते, हे पुष्कळ त[पङतात.
वाघ इकडे" न[होत. नद्यांत माते सापडतात. हवा उष्ण व
करेरडळो असून निरोगॉ आहे. वर्षाचे पावसार्चे सरासरी प्रमाण
३२ इंच आहे. १८६८॰…६९ साली फक्त १३ इंच पाऊस
पडला होता.
इतिहास:~या जिल्ह्याचा प्राचीन इतिहास उपलब्ध
द[र सखेंया रजपूत आहेत.
( २ ) न[[लेआ भानजळो. चौकठाण्यातांल द्रुसरा एफ
स्रतेत्र रंवडणळो देणारा तालुका. यासिंया सरवैया रजपूत
नाही.
आहेत.
इतिहासात
॰
अद्यापि पुस्थितां‘त आहे.
अठराव्या
भाग
शतकापासून
घेतला
आहे.
या भागार्ने
राजकांय
११९६ साली कुतवुद्द्ळोन<noinclude></noinclude>
fliq3he5f8sw5y01vh7zflakis6xtf3
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६८
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "&. ”~ मद्दाराट्रीप न[नकळोश. ( ज ) २४५ ज[वजी दादाज्ञळी याते काल्पीं शहर जिकलै होते. यमुनपार होण्याकारते’प् रॅकडें पिंगठ व पिवळी ज्ञमाँन आढळते. अइळीर लोक तुपाचा काल्पाँर्हे महत्त्वळा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>&.
”~
मद्दाराट्रीप न[नकळोश. ( ज ) २४५
ज[वजी दादाज्ञळी
याते काल्पीं शहर जिकलै होते.
यमुनपार होण्याकारते’प् रॅकडें पिंगठ व पिवळी ज्ञमाँन आढळते. अइळीर लोक तुपाचा
काल्पाँर्हे महत्त्वळार्वे ठिकाण असल्यामुळे येथें आसपास [ पेक्षा करतात. या जिल्ह्यांतळोल जमीनदारी आणि पालिपुष्कळ लढाया झाल्या आहेत. बावरच्याबिरुद्व लहृण्श्र[॰[ दारी या जमळोनमहरनूल पद्धत“! आहेत.
क[रत[ [इदू राजे या ठिकाणी जमले हळोते येथूनच त्यांना ` ज्व[र’[,गहूं, अरहेर, बाजरी हां घान्ये येथे पिंकतात.
देखील येथे
पिंकतौ.
वावरवर चाल केली व त्याचा फत्तेपुर ळिशकव्च्या लढाईत गळितान्री यान्यै व कापूस
.डुंदेलरवेडॉर्ताल
इतर
भागांप्रमणि
ज[लळीन
जिल्ह्यांताहे
वळावरानॅ पराज्ञय कलाअकवराच्या क[रक[द्[त हे सरकारर्चे’
तेतक्रॉवा घेद्रा फार अनिश्चित आहे. शतकव्स्या सुधारणा
मुख्य [‘ठेंकाण होते. अकबराच्या कारफॉंदॉतच्या अखेरीस
पुंदेल्मांबाँ काल्पीं शहर हस्तगत करत-[ घेतले होते. न[रा’तेग करण्याचा प्रयत्न चालू आहे.
देयाते या ळिजल्ह्यांया भागजिकन घेतला हळोताव त्यावै’
येथील गुरँ हलक्या प्रत[च[
आहेत. इ. स.
१८८६
जहांगार न[द्शहार्ने कबूल केल
पयैत तेतळीकरि’भं पाण्याचा पुरवठा फक्त [व[हेरीपासूनच
होते. शदाजहानाच्या अमदानात याते बँड कल. प्यात
त्याचा पराजय झाल्यामुळे तों सर्व प्रदेश गमावून वसला.
ह`.’त अते. इस्रो वठऱ्रा क’नॅ‘प्ल घुख् झाल्यापासून बागायती
जमीनीचे ॰क्षत्र वाढत आहे.
या
प्रदेशप्वरील
स्वामित्व
याच वुदेल्यांच्या एका
शाखेने हृमळोरपूर जिल्हयात टोंक वर
काठळें आणि त्याचा पुढारी छत्रसाल यार्ने आपल्या राज्यात
ज[ळींन जिल्हा स[म‘[ल केला. अठराव्या शतकाच्या आरंभी
ज्ञेव्र्दा अलहाताद्च्या सुमेद्प्रार्ते छन्नमालवर स्वारी केली
कंवर आणि सोंरा हे खनिज पदार्थ या जिल्द्यांत सांप”
डत/त. पूर्वी येथे हुतों कापड तयार होत असे. परंतु कानपूरचें
गिरणळोत आतेट्टेल कापड मिळु लागल्यामुर्के हे; धंदा वसला.
येथून हरमरा, गळितार्वी धान्ये, कापूस आणि तूप बाहेर
तेव्हां त्याने मराठ्यांची मदत माप्‘ग्ळोतलळी होती. इ. स.
१७३४ मध्ये ह! मरण पावला. त्यावेळी त्यार्ने आपल्या
ज[तात. न[मलळोवळो ^स[ल कानपूरला क[त॰डॉ कमावण्याकरिता
राज्याचा एकतुंप्’तेंयांश भाग मराठ्यांच्या स्ऱ्वापांन केला.
मराठयांच्या कारर्कादॉत येथें व[रंव[र वेडाळी होत असे.
ज[ता.
इ. स. १७९८ मन्-पँ ब्रिटिशांनों काल्पी कावळोज
उत्तरेकडील तहतोंल उ. अ. २६॰ते २६॰२७’ वपू. रॅ०
केल होते.
पाठविंतात. या जिल्ह्यांतून जळी. आय. पळो. रँल्वॅचा एक फांटा
त ह सौ ल.…सयुक्तप्रांत.
ज[लौन
जिल्ह्माचळो
अगदी
परंतु त्यावेळी त्यानों तेंसळोङळें. वसईच्यातहान’तर एक ७९ ३’ ते ७९." ३१’. क्षेत्रफळ ४८१ चौ. मैं. व लो. ते.
वपट्टेन‘ झालेल्या तहांत पेशद्यांज्ग्ळो सन १८०३ मध्ये लष्कर… ` (१९११) १६२१९१. यातहसिकॉत दोन गांर्वे व ३७५खैडॉ
खबाँका’रँतां म्हणुन हे ब्रिटिशांच्या
ळच[
प्रदेश हिंमतवहाद्दराच्या
हनालळो केल. यमुतेजवहवप्लॉ केला होता. कारण
॰ त्यार्ते ग्नि’टँशांस न[गलळी मदत केली होती. ज[लळीन जमीनपारीवीं व्यवस्था समाधानकारक नसल्यामुळे ब्रिटिश सर०
कारनें सन १८३८ पासून सर्वे व्यवस्था आपल्या हातांत
आहेत. १ ९ ० ३-४स[लळो जमीनयाऱ्यार्चे उत्पनरे १ ६ ० ० ० आणि
इतर करांवदृल ".१००० रुपये होते. १९” ॰~१ स्रालाँ २"५
चौरस मैल कोंरङवप्हूं लागवडोंखालॉ असून २५ चौ. मैं
यामाइतळी होतो.
गां व. …- लळीन तहसळोळीवै मुख्य ठिकाण असून ओंरा-
घेतली. सन १८५७ च्या बैर्डात या भागांत फारच गडबड
ईंपांसून १३ मैलांवर आहे.
उडालळो होती. सन
`र.
ते. ( १९११ )
८२७७.
७९" २१’. तो.
अठराव्या शतकांत ज[लळीन हे त्यावेळी असलेल्या मराठी
१८९१ पर्यंत ‘नॉन रँग्युल्ड्रेशन’ प्रमाणें
या [गेल्याचा कारभार होत होता.
या [जल्द्यांत प्र[च[न इमारती फारशप् न[हव्त. ओरद्दे
तहसिलॉतळील अकोंरी गांवळी दिक्कीचळा र[ज[ पृथ्बांराज आणि
बुंदेलरवडचा राज[ चंदेल यानळो लढाईं झाली होतां. काल्पळी
यैद्प पुष्कळ मुघुलमणांचीं थडगॉ आहेत.
उ. अ.
२६“
८
’ व पू.
राज्याची राजधानी होते. अद्यापांहि तेर्थांल वजनदार
लोक
मराठी न[ह्मणच असून
आहे.
पुष्कळांनां
ड्नामौ
जमीन
तह सिलळी, कवैऱ्या,’ द्याग्त्राना, श[ळ[ वगैरे सळोयळी येथें आहेत.
ज[व‘ज्ञळी ट्प्द्प्जीं चारेंयगीं (स. १८3९’१८९२ )…
या जिल्द्यांत ५ गांवें आणि ८३६ रँव-डॉ आहेत्. बुंदेलखंडांच्या बदलत्या हयापम्ण्यामुळें लोकसंख्येची नेहमी चढ०
एक महाराट्रोय छापखानदार. ज[तळोर्ने मराठे. जन्म पुंवहँस
( १८३९ ). हे छापखान्याच्या घेघांत केवळ रवपराकयार्ने
उतर होत असते. स्श्रेकसस्व्या (स.१९२१ ) ४०५४३९.
या जिल्ह्यांत चार तहसिलळी आहेत. ओरहैं, काल्पळी ज[ळींन,
९४ असून
भुमुलमान
उदयास आहे. आ'रमॉ हे तीन व्पयांवर नोकर होते. तेच
पुढें स्वत: मालक द्दळोभ्ऊन दरमहा चार चार हजार रुपये
लळोकांस पगार न[ठू लागले. १८६४ सालात यानॉ स्वतंत्रपणे
सन लोंक पाश्चात्य [’हेद्ळो भाषा
बाँलतात.
टाईप पाडून विकण्याचा घेरा आ'रभिला. १८६९ त स्वत:चा
आणि कुंच [हेदृचा वरती
द्ग्कडम् ६ आहेत.
शकडा
र्पोठमापा बुंदेलों आहे.
छापखाना घातला. याच सुप्रसिद्ध छापखान्याचें न[व 'निणेंय
स[पर ’ होय. नवीन ’सुद्र अनेक प्रकारचे टाईप करण्यात
पडला
न[हळो. कान्स न[वार्वे तण घेतात ) आणि पुस्तक युवक छापण्यांत यानॉ मोंठळो काळो’ते मिळावेलळो.
शैतळो:॰-येर्थे गहू बांगला पिकतौ. बांगला पाऊस
तर पाणळो द्यार्वे लागत
फार उगवत असल्यामुर्के मिंकार्चा फार नासाडॉ
होते. उत्त० , गुणी प्रेथकारांनां यान“[
ययाशक्ति
सहाय्य
कल.
सेल्कुंत<noinclude></noinclude>
nf2xxbdi7vt2l6zmebaf4n8kye17izh
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/६९
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महप्नाट्रीयशानकऱ्ग्श. (ज)२४६ ज[वड ज[घरा’ मराठी, हिंदी, गुजराथी व इंप्रजळी भापँत महत्वाची हैं।कडों होता. पुस्तक केला होता. पुढें अयाझ्त्खानळाते आपला प्रसिद्ध करून वाडुमयांत अमू..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महप्नाट्रीयशानकऱ्ग्श. (ज)२४६
ज[वड
ज[घरा’
मराठी, हिंदी, गुजराथी व इंप्रजळी भापँत महत्वाची हैं।कडों
होता.
पुस्तक
केला होता. पुढें अयाझ्त्खानळाते आपला
प्रसिद्ध करून वाडुमयांत अमूल्य भर घातली;
व प्रेथकारांस
चांगले उत्तेजन [देले यांच्या
सत्थान. महासागर
जिल्द्यांतळोल एक
गांव. उत्तरअक्षांश २४’ ३६’
इ. स.
१९११ त
एक मुलगी अमो~
` रखानास दिलळो. यानंतर अमोररवानाते गफुरखातास अ[प॰
मृत्यु ५ हें त्याकडे नोकरीस ठेंळावॅल’ व आपण दूर त्वब्रीस गेला असता
त्यास होळकर दरबारी आपला विश्वासू वकळोल म्हणून नेमले.
रष्खांश
७४’५२’.
अयाझखानाते अमोंरखोवास मदत
निर्णयतागर
छापखान्याचा लगैकेक अद्यापि कायम आहे
एप्रील १८९२.
जावड-मध्यहिंठुत्यान. ग्वाल्हेर
त्या मघ्यरतांत
६५१५
नंतर २१ डिसेंबर
सन १८१८ ररेर्जी मद्दिद्पुऱचीं लढाईं
व पूवै'
झाल्यानंतर मद[स[रचा ज`[ तह झालात्यातळोल बाराव्या कल-
लोकवस्ती
मान्वमें असें ठरले का, नवान गफुररयानाकडे सजीव, मल्द्दा‘
होता. घेवाडच्या सत्यानिकानीं सुमारे ५०० वर्षांपूर्वा’ हा
रगड, काळ, ज[वरा आणि
गांव वसविंला. राणा सयामप्तिह व त्याच्यापासून
पिपलोंदापासून खंडणी घेण्याचा
गार्दावर
वराडप्
यांची वालकळो यावळो
व
अधिकार असावा… त्याच.
वसलेला जगतसिह यांच्या कारकळोर्दीत गावासमोंवतळी अस॰
लैंला कॉंठ बांधण्यात आला. १८१८ व पेंढारी लढार्दीत
प्रमणि गफुरखानाते न्सिटॅतांस त्य[न“[ दिलेल्या मदतळोदाखल
५०० घोडे, ५०” पायदळ व चार तळोका द्याव्या असे ठरले
णिद्याच्या
भाऊच्या
होते. अमोरखानामें गफुररवान ह[ आपल्या वर्तांते’ मुखत्यार
हातांत ह[ भाग होता. याते पेंढारी लोकांच्या छत्रू न[प’
असल्यामुळे तो मालक हळोऊं शकत न[हॉ अशी नकार केला;
परंतु त्याचे क[ह”[ एक चालले न[द्द‘ड्र.
ह[त[रव[ल”[
असलेल्या
यशवतराव
काम आणि फाझलखानास मदत [देठ-यावरून त्रिटिशांनॉ ह[
गांव त्या स[ल”[ सर कला. परंतु पुन्हां हा गांव शिंद्यास
परत देण्यात आला. इ. स. १८४४ तालळी ग्वाल्हेर येथे ठेव…
केल्या लष्कराच्या खचळीकरिंता तो ब्रिटिश सरकारकडे आला.
इ. स. १८२५ त गफुरखान मरण पावला.
याच्यामागें यावा अज्ञान मुलगा यास महमदखान ( इ. स. १८२५‘
परंतु तो पुन्हा इ, स
नजराणा देण्यात आला. प्रणमत: सर्वे कारभार गफुरखा‘
नाच्या विधवा स्त्रळोकडे होता. परंतु गैरव्यवरया झाल्यामुळे
१८६’ व [इळायाकर्डे गेला.
येथे व्यापार बरान वालनळो. पूर्वी येथें रंग तयार होत
६५ ) मसनदळीवर वसला. या वेळीं होळकरास दोन लाखांचा
असे. प'रतु पाश्चात्त्य कृत्रिम रंग व[ज[र[त येऊ लागल्यामुर्के
तो अधिकार दोन वर्षांनी तिजकढून काढून घेण्यात आला.
हा व्यापार वसला आहे.
इ. स. १८४२ मघ्र्वे त्रास महमदस्वान
ज[क्रप्, ते त्या न.…’मघ्य[हेट्टत्थ[न[त्[[ल माळवा एजन्सींर्वांल एक सत्थान. क्षेत्रफळ ५६८ चळीरस मेल. या सह्या,
नावे भाग बरेच [ठेंकार्णो विभागलेले आहेत. यातळोल मुख्य
मिळाले यानॅ इ॰त॰ऱ्’ग्’८५`ऽच्य[ वडाच्या वेळीं चांगला मद्त
भाग उत्तर अक्षांश २६' ३०’ ते ३४' ५५’ व पूर्वे रेखांश
७५॰ ,.’ ते ७५“ ३०’
यांत
आहे.
याचे सर्मोवतळी इंदूर
सरथान, ग्यालेरचा काहाँ भाग, रतलाम संस्थान, रानफु
त[न्गांतोल प्रतापगड आणि
पिपळोदियावळी ठ[क्रुर[त ह’[
आहेत. ज[वरा गांव याचे मुख्य ठिकाण असून त्यापासून
संस्थानात हे नांव मिळाले आहे.
चवला आणि क्षिया या
नद्या या सत्यानांतून वहव्तात.
ड्तिह[स:॰-गुपु.ररव[न ह[ रवात येथील अफगाण
एव्ता. यावा अ[ज[ अवदुल मगींदखान ह[ नशळोय काढण्या०
का‘रेतां प्रथम [हेटुल्यानांत आला. याच्या दोन मुलांनी
( अवद्रुल हमीद आणि अववुल रास ) गुलाम कग्दळीऱखान
याच्याकडे नोकरी धरली. या गुलाम कादळोरखावार्तेच इ. स.
१७८८ मघ्र्मे वूभ्द्र् बादशहा शहाअलम याचे डोके फोडलै
होते. पुढें [ट्रेप्द्यार्ने गुलाम काद्ळोराचा वध केल्यावर हे दोघे
रॉद्दिलखंडांत वस्तळी कदऱ्न राहिले.
मफुरखान ह[
अवद्रुल
यास सर्वे अधिकार
केली हळोतळी.१'४ लाखाचळी खंडणी यास द्यावळी लागते. याच्या
अमदानॉत मुसलमानी कायद्याप्रमाणें' दत्तक घेण्याचा सनद
मिळाली हा इ. स. १८६५ मध्ये‘ वारत्’यावर याचा अज्ञान
मुलगा महंमद ड्रयाएलग्यान मसनदळीवर वसला. याप्हे वेळीं
होळकरांस दोन लाख रपयाचा नजराणा देण्यात आला. या
नवाबास सर्वे अधिकार इ. स ८८७४ मध्ये मिळाले. याचीं
कारफॉंर्द सेत्थानला चांगली गेला नाही व सस्थक्कास १६
लाख रद्दपयांर्ये कन्नै झाले, याशिवाय ब्रिटिश सरकारचे तांन
लाख रुपये कर्नाऊ घेतले होते. हा इ. स. १८९५ मध्ये
मरण पावल्यावर याचा मुलगा ड्कातेंखार अलव्स्वान ह[
गार्दावर वसला. ह[ या वेळी यारा वर्षांचा असल्यामुळे सर्वे
कारभार यावा चुलता यार महमदस्वान याजकडे सोंपकिं
ण्यांत आला. इ स. १९०६ व सर्व अधिकार या नवा’
वास मिळाले. यास [हेज्ञ हायमेस आणि फकोरउद्दीला नवान
तालतर्जम या पदव्या असून १३ तोंफांच्या सलार्माचा मान
आहे. लोकसंख्या ( १९११ ) ७५९५१.यासत्यान[त हिंदु
ईंग्कडा ॰४, मुमुलमान रँप्कडा १९, "जन रँ[कड[ ४ आणि
वन्य ज[तांय इळाकचा ३ या प्रम[ण[त आहेत.
आयाशखानच्या मुळीर्शी लग्न केले. हा अयाशखान ज[वमाळव्यांतौल उत्कृष्ट जमीन या सरथानांत आहे. ज्वारी,
पूर दरवारी एक मानकरी होता. नयपूर आणि बॉघपूर कापूस, मका, गहू वठेंग्रॅ पिक येथे होतात. अफ्ड्रुचळो लागवड
या दोन सत्यानांच्या सत्यानिफांमघ्थें उदेपुरच्या कुष्णा- ; येथें पूर्वी फार होत असें. राजपुत[न[-म[ळव[-॰रेल्वें,
कुभांरॉक्द्दल लढा पडला असता अर्मांरखावानॅ मध्यस्थी केला बो. वी. सळो. आय रेल्वेचा फ[ठ[,रतलाम…ग`[घ्र[-वर`[ड[ रेल्वे
हमीद याचा सव`[त धाकटा
मुलगा हळोय.
याते म’हमद<noinclude></noinclude>
t9w9xc958wn0341a24ustxvbcaryx5v
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७०
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जावळी जप्’वां या सस्थानांतून जातात. या सत्यानाच्या सप्त तहशिलळो आहेत. ज[वरा, त[राडा, वारखंड, मल्हारगड, नवानगंज, सजळोत आणि ड[ळ मंडळावळ. जमिनीची पहाणी अद्यापि आलेलो न[हळी. सरयानर्वे..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जावळी
जप्’वां
या सस्थानांतून जातात. या सत्यानाच्या सप्त
तहशिलळो
आहेत. ज[वरा, त[राडा, वारखंड, मल्हारगड, नवानगंज,
सजळोत आणि ड[ळ मंडळावळ. जमिनीची पहाणी अद्यापि
आलेलो न[हळी. सरयानर्वे उत्पन्न सळाडेआठ लाख आहे.
ग[ न.…मघ्पद्दिदृत्यानांर्तांल ज[वरा सत्थानचीं राज-
राव हे शर हप्ते. [शवग्जींते ‘ देशमुखांचा
जमाव बरावर
घेऊन जमावाच्या बळें युद्ध करून ज[ऊलो घेतलळी ’( नेघे
शकावलळी [, स. १६५५ मध्ये ही गोष्ट घडलळो. पुढें दुसऱ्या
वर्षी चेद्र्रावापासून रायरीवा किल्ला घेतला. त्यावर चेद्र्रावानें
आदिलशद्दार्शी [शवाजळोविर-द्व मसलत
चालविल्यानॅ
त्याची
घ[न^[ असून अज्ञमीर’खांडवरॅ-रेल्त्रैचें स्टेशन असून मुंबईहून
चौकशळो करून ळिशवाजळोते त्याला व त्याच्या मुल[न[ देहांत
४३२ मैल लांब आहे. उ. अ. २३॰ ३८’ व पू. रे. ७५॰ ८’.
लोकसख्या ( १९११ ) १८०५४. येथे अवश्य असलेल्या
कचँऱ्या वळेगरे आहेत.
जावळी, ता ळु क[.…ह[ मुंबई ड्लप्ख्पांतळील सातारा
शासन केले व सर्वे ज[वळी प्रांत ख[लस[ केला. [ तातारा
त्याले; जेथें शकावळो; मोंऱ्यांची बखर. ]
ज[व[ळं-मलायाद्वाळापकल्पाच्या ॰मुद[ बेटाच्या समूहांनळील
जिल्ह्माचा उत्तरेकर्डाल त[ळुका.
व
उत्तर अक्षांश १७प्द्२’ ते
१७°५९’ व पूवै रेखांश ७३°३६’तेस७३‘ ५९
या दरम्यान
एक मोंठें बेट.
रुंदी
या बेटाची लावळी पश्चिम ते पूर्वे ६२२ मेल
५५
सरकारची
मैल
वसाहत
आहे.
या
डच
न[त्यामें
ईस्ट
इंडीत
ज[व[ला
महत्त्व
असून त्यार्चेक्षवफळ ४२३ चा मल आहे. यात मालकमपठ
या लहानशा विभागाचा समावेश कला आहे.
आहे.
आले
आहे. मद्रुरा व इतर
किरकोळ
बेटे
घरून ज[व[र्वे क्षेत्रफळ ५०९०° नो. मैं. आहे. पुलो पनैटन
यांत एकंदर गांर्वे २४९ असून याची लो. स.. ७॰ ह्चारांपर्मेंत
मुख्य देठ तुंद[ त[मुद्र्घुनळीत असून त्याचे क्षेत्रफळ ४७
चौ. ते. आहे.सटॅवियाच्या उत्तरेस ‘द्वाळीपसहत्र’ वसलेले आहे.
पश्चिमेस ॰सुदा सामुद्र्घुनळीते ज[वा व सुमात्रा अलग केलो
आहेत तर पूर्वेस बलो मामुदघुनळीमु’टंव् बलिद्वीपकल्प व आता
आहे व एकद्र उत्पन्न १ लक्ष नपये आहे.
हा भाग येउ असतो.
उन्हाळ्यामघ्ये
त[छुकयार्वे मुख्य ठिकाण मेढे गांव
असून तेथें पाऊस सरासरीने ८१ इंच पडसळो.
याच तालु-
क्यात महाबळेश्वर, प्रतापगड वगैरे ठिकाणें आहेत.
ग[ व. …जावळी हे खंडॅ प्रतापगडापासून
ह‘॰[ वेगळी आलो आहेत. ज[व[च्या दक्षिणेस हिंदी महप्सष्टगर
पूनस
एका
श्रार्देण्ळाच्या फांठो ३ तेल आणि मालकमघेठेंच्या वायव्येस
व उत्तरेस ज[व[चा समुद्र आहे.
ज[व[वै तीन भाग पाडण्यात येतात.
पश्चिम ज[व[त
ड[गर
वारणा
बॅंठम, कत्रंग व प्रेय'गर रीजन्सळोहेंआहेत व या सर्वीर्वे मिळून
नदॉफ्र्मेंत्न पसरलेले आहेत. हें खोरॅ मुड्रुलमानांच्या
अमद्प्.
नळीच्या आथळोपासून मराठ्यांच्या ताब्यात होते.
पूर्वी हे
१८॰॰॰ चौ. मैं. क्षेत्रफळ आहे. या भागांत दक्षिणेकडील
प्रदेश ॰उच व उत्तरेकड‘व्ल सखल आहे. प्रेयगरचा पबँत या
३ मैल
अतरावर
आहे.
ज[वळोजवलवै
शिर्के न[वा'च्या घराण्याकडे होते; व हलळोद्दि त्या घराण्याच्या
वशताकडे, स[त[र[ जिल्ह्माच्या दक्षिणेकडील क[ह’[ रेवडॉ
आहेत.
विचापूरवा पहिला राजा युयुफ आदिलशद्दा यार्ते
मोरे न[वप्च्या एका मराठें सरदारास १२००० पायदळ
दऊन हे खोरे ळिशवयापासून कावाज करण्यास पाठळिवल.
व्यार्वे शिक्यास
तेथून काढून लावून
महमडक आणि माळिहतै या
त्यामुळे मळोरे यास "‘ ऱ्’वद्र्राव
व्याच्या वाजचें
गुंज्ञऱ
ल[क[ची पुंडाट्टे बंद केली.
ही पदवी वादशद्दाते दिली.
व्याच्या यशवेतराव नांवाच्या मुलाने अहमदनगरच्या
निजामशहाच्या काबेशा पसरपृरजनळ् ची लडाश् झालो
बुऱ्द्दाण
त[स
भागांत असून त्यावर बै'हँप्म, पेंकलागम, तेगळ्,वडंग, युक्त
इत्यादि पठारे आहेत. प्रेय'गर या वटेठिहया व वठम यांच्या
सरहद्दीला चिकटून हळीम‘न पर्वताची राग गेलो आहे.
मघ्वजावा द्दा सर्वीत लहान भाग आहे. यार्वे क्षेत्रफळ
१३ २०० चौ. घे. आहे. यात तेगळ ,पेंकलोंगम वन्वृंमात्त, बगेंन,
केहूं, ज[कजकता, सऱकता या मुळुखांचा अतभीव होतो.
पूर्वे ज[व[स टेवेग, मदिथन, कै[दर[, घुरवय, पझुरण,
बेमुकॉँ इत्याप्द प्रदेश माउस असून त्यार्चे क्षवफळ १७५“
चा. मृ. आहे.
क्षेत्रफळाच्या
'
दृष्टांनें पह[स[
पुष्कळ शांये दाखवून शत्रूचा वावटा [बेंक्रून आणल्यामुर्के,
त्यास त्याच्या वापाच्या ज[गेवर तेमिले, व त्यालाद्दि
चेद्र्राव पदवळो दिली. या घराण्याच्या तात पिठ्यांनों या
प्रांतावर अ'मल गाजष्ठ’वेंला. विचापुरच्या मुमुलमान रॅ[ज[न”[
ज्वालामुखी पर्वेतार्ने
त्याच्या त्वामिमक्तींवद्दल सळो प्रांत कवळ न[वाला खंडणी
घेऊन त्याच्याकडे साँपचिला होता. प्रथम शिवाजीने मोंऱ्यास
ते जिवंत आहेत.
आपल्या न[सूस वळविंण्याचा प्रयत्न केला परंतु तो वळला
न[हळी. त्यानॅ [वैजापूर सरकारकडून सिवाजळोस कैद करण्यात
आलेल्या श[मर[ज
ज[व[च्या
ड्समास
तेव्हां शिवानांनॅ त्यास शत्रु मानिले.
वळकठ
तेव्हां वाट
दिली
मोंऱ्याजवळवै लोक
असून त्याचा मुलगा, भाऊ आणि कारभारी [हेमत-
३२
ज[व[चा
युक्त आह.
प्रदेश
पुष्कळ
डे‘[. व्हर्वेकच्या मते
ज[व[मच्ये १२५ ज्वालामुखी डोंगर आहेत.
पश्चिम ज[व[त
११ ज्नालत्युखी असून ते सत्रे हक्की निऱ्सत्व झाले आहेत.
प्रेयांगरमघ्ये यांची सख्या ५० असून त्गर्पिकाँ ५ काय
मघ्यजावामघ्में अवघे
५ जिवंत आहेत.
मघ्यचावामघ्'ग्रं‘प् पैकळी २ [जवस असून पूर्वंजावामघ्यें२ १घेकॉँ
५ जिवंत आहेत. वैर‘,[ वान, मूळिरथो लढू, ळिवालस येथे
प्रत्येका २ उवालामुखव् असून ते सव [नज’[व झालेले आहेत.
रलामठमघ’त्ल २ ज्रालामुखापेंका एक मात्र अद्यापि जिवंत
आहे. ज[वामथळोल प्रदेशाच्या निरनिराळ्या भागांत, सुपीक-ता
व न[पळोकता य[र्वे,तसँच उचसखलतचँ प्रमाणभिंव आहे.म'या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७१
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मइत्साट्रीयशांनफॉंण्॰(ज्ञ)२४८ ज’प्घप् जांषा' व पश्विम ज[वामघील किनन्यालमतवा टापू सखल,दलदलळोच[ येथेच आढळतात. कन्निलन न[वाच्या पक्ष्यप्चीं गोड आवा’ असून वाकळीचा लागवडोंला योग्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मइत्साट्रीयशांनफॉंण्॰(ज्ञ)२४८
ज’प्घप्
जांषा'
व पश्विम ज[वामघील किनन्यालमतवा टापू सखल,दलदलळोच[
येथेच आढळतात. कन्निलन न[वाच्या पक्ष्यप्चीं गोड आवा’
असून वाकळीचा लागवडोंला योग्य व सुपीक आहे. वन्यूमस
ज[वद्दल फार प्रसिद्धी आहे.
व वगेलनच्या प्रदेशांत वाळचँठ आहे, तथापि कांहीं भागांत
तांदूळ उत्तम
गावाच्या पाण्यामध्ये माशांच्या हेजप्रों ज[ता आहेत
पिकतळो. त्रूर्वंवाव'ळात ही वरळील प्रकारची , अतें तज्ज्ञांनळो सिद्ध केले आहे. हे माते निरनिराळ्या रंगाचे
रिंथत्ति आहे.
न द्या.…पश्चिम
ज[वामघ्पें चौ तरम व
मुक्ष्यतथ् दोन नद्या आहेत.
[ व निरनिराळ्या तऱ्हेचें असतात. वटॅन्दियाच्या भागांत
वो मनुक या ’ जवळ जवळ ८० प्रकारचे माते खाण्यासठीं उपयागांत
त्यामधून न[वामाफैत कॉफी व
आणले जातात. सापांच्या
२४
हून अधिक जातो आहेत.
मिंठाचीं नेआण होते. मध्ये ज[व[मघ्र्मे पमलळो, चींमल, मोंगों, [ किड्यांचे प्रकार तर अमणोतन आहेत…
तेरयू नोयाव'तु, उपक इत्यादि नद्या आहेत. यांच्या कठिचा ’
व न स्प तों॰--त्तिर[’नर[ळ्या वनस्पती, आहे, लता इत्याप्रदेश फार बुपळीक आहे. या नद्यांमध्ये दगड खडक वगैरे दिफांचौ ज[वा येथे समृद्धि आहे. वनस्श्तिशप्स्नाच्या अभ्या-
असल्याकारणाने या नर्णामयून न[वा न[लणें द्रुष्कर होते. सफांला ज[व[दून दुसरे महत्त्वचिं स्थान मिळन्ग कठोण
पूवेंजावामघ्र्थे लहान लहान नद्या पुष्कळ आहेत. सोंलळो, बुइटेनझळोगें येर्थांल वनस्पतोंचळो याग अतिशय प्रसिद्ध
गेंठग, बँटस या त्यातल्यात्यात मोठया नद्या असून त्या , त्यात हेरएक तऱ्हेवै वृक्ष, लता, वनस्पती यांची
नथांमघून नौका न[लवितां येतात.
॰
[ आहे. जुन्या काळच्या अरण्यावळी ययाथे कल्पना
सू स्व र.…वावामघोल बहुतेक सर्व भागांत
आहे.
असून
समृद्दि
यावळी
तुतळोव
याताठो छिबोंडास येथें अरण्य राखून ठेवण्यात आते आहे
अगर चतुर्थ वुगांर्तांल अवशेष स॰[पडतात. कथित एअव्र्तांन
युगांतौल अवशेष, रॅताड दगड, रवडूंचें दगर्डाहे सापडतात,
व ते वाटेल त्याला पहावयाला मोकळीक मिळते. सुमारे
हे वा या न.…पश्विम ज[वामघळील हृवामान निश्चितपणें
सांगतां येते पण इतर भाषांतील इवामावामघ्यें वारंवार
बदल होत असल्यामुळे त्यासवंर्बी नक्की अनुमान काढता
येत न[हाँ. एकदरींर्ने ह्या "नव्या आहे. त्यातल्यात्यात
तळोन हजार इतक्या निरनिरळिया प्रकारच्या वनस्पती
ज[व[मघ्यें आढळतात. उन्हाळ्यात सबँत्र हिरव्यागार पलवराजळोते’ खेंर्डीवाडॉ व शहरे आच्छाइलैलळो असतात.
लोक सं ख्या॰…यावद्व॰`।पसक्रुतांचा सविस्तर इतिहास
पहिल्या विभागांत ( प्नक. ६ तें ) आलाच आहे. या
पूवेंजळावा व मथ्पजावावा काही भाग हे विशेष उव्ण
आहेत. ज[व[मघ्थें उन्हाळा व पावसाळा असे दोनच
ठिकाणी थोङक्प्रांत गोषवारा व इतर माद्दिता आढळेल.
ऋतू आहेत.
सख्या ( मदुराप्रांत वहन)
ग्रूररैपप्रमाणें येथे वेगवान वारे घुटत न[इळोत.
मेघगर्मवा, विजप् वगैरे प्रकार नेहृमॉ आढळतात,
पण
विजपिप्सून प्राणहानिं कचितूं घडून येते. ज[मेवारळो, फेद्रुळावारळी,
१९०५ सालच्या
खातैहुमारळीवव्न
पहाता
ज[व[चीं लोक-
३००९८००८ होती. येर्थाल
वस्ती मुख्यत: ज[व[नळोज, ‘सुडानळीज व मदूरळोज अशा तीन
ज[तव्च्या लोकांची आहे. ज[व[नौज व हुवानळोज यांच्यामध्ये
माचँ इत्यादि महिन्यांत पाऊस जरैरानें पङतों. पूर्व व मध्य
स्थूल फरक म्हृटला म्हणजे ज[व[नळोज लोकांवर हिढूघर्मांवा
ज[व[मघ्में उत्तर किनाऱ्यापेंक्षां दक्षिण किनाऱ्याच्या वाडूच्या
प्रदेशांत अधिक व लोंराजग् पाऊस पडतो. मघ्यवावामच्यें
इतर सत्रे भागपिक्षां पर्जेन्याये मान अधिक आहे.
या प्रो.-गावामध्ये सरक, डुकरे', वॉटर्गे व स्ता ज[तळोर्वी
न[हूंळो हा होये. तौन्हेळीद्दि ज[र्तीचे लोक मलयवशांवे आहेत.
पण परिस्थितीमुळे या तांन्ह्रळी ज[तळोमध्ये "[ळोङप्फार फरक
इरिर्णे, फांता’जेल नांवावा कस्तुरळीवुगासारखा असणारा प्र[णि,
वाघ, चित्ता, ज'गलळो मांजर, शिकारी
क्रुत्रे, कलळोग न[वाचा
एक प्र[[‘णे, क्रुप्’बेन, बुक, ळुटंग्ळा, कोळी या ज[तोंबाँ माकर्डे,
ससळा, उंदॉर, अस्वल इत्यादि प्राणी आढळतात.
१९॰॰ त[लाँ ज[व[मघ्यें ४१० प्रकारचे पक्षी होते अतें
व्झेर्बंरमन न[वाच्या एका सशळोपकार्में म्इटर्ढे आहे.
यांपँकॉ
पुष्कळसे पक्षी मनुष्यवस्तळीच्या भागांत क्कावैनच आढळतात.
परिणाम झालेला दिसतो व तों ॰मुदानळीजवर झालेला दिसत
पडला आहे. ‘सुदानोंज लोकांच्या
शरीराची ठेवण व त्यांची
राहणी मलयवशींय लोकांतारस्वळी अद्यापि आहे. हे लोक
पश्चिम भागांत रहातात. पूर्व ज[वामघ्ये व विंयेपत: मदुरप्वेंटांत व त्याच्या आसपास
मद्रुत्ळीज लोक रहातात. तैगल-
पेंक लोगन, वगेलन, केद्रु, तेमर’ग, जपुरा, सुरकर्तां, वन्यूमास
इत्यादि ठिकाणी ज[व्हानौज लोकांची वस्ती आहे. या तीन्ही
ज[त’व्च्या लोकांत ज[व[नीज लोक अधिक सुघारतेले आहेत.
समुद्राच्या, सरोवराच्या अगर नदळोळिकवाऱ्याच्या प्रदेशांत
सख्येर्तेद्दि त्याचाच नेवर पाहेला लागतो.
ज[व[मभौल लोक वर्णांते प^[त पिंगठ रंगाचे आहेत.
षद्कँ’ तमाणे
त्यातल्या त्यांत ज[वानळोज
इत्यादि
पक्षी
आढळतात.
घुवडार्वेद्दि येथे
अस्तित्व आहे. ज[व[मयाँल पोर हिदुस्थानांतळाल मोरापेंक्षांद्दि पुंदर असतो. र्पोपटाच्या येथें दोन जाती आढळ्तात'
पाँपटांनांद्दि अनुकरण व बोलण्याची नक्कल करणें या बाबतीत
मागें टाकणारा व केवळ ज[वामघ्येव त[पङणारा असा एक
पक्षी आहे. मधमाशांच्या व पुंग्या’च्या निरनिरढ्या जातो
हे अधिक
कृष्णवर्णीय आहेत.
या `लाकचि डोके भुरे अगर काळ असून त्यांचे र्केस लांबलचक
काळेभौर व राठ असतात. वक्षस्थलब्वर अगर इतर अव॰
यवावर
र्केस आढळत न[हॉ.
अंगाबांघ्यार्ने ज[व[नॉज हा
॰सुवानव्जपैक्षां उंच असतो पण तुंदर्लीज हा अधिक घष्ट०
पुप्ट असतो. मदुरौज लोक उंच व घष्टपुष्ट असतात. बुंदर्लीण<noinclude></noinclude>
ta070yh5zjl2ka82d7420wfp0n0241i
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराहू’प्य न[नफॉंश. ( ज्ञ ) २४९ लळोफांवै डोके तिरकस असतात. ज[व[तव्ल लोकांचे न[क चपर्टे व लहान असते पण न[कपुङया फुगीर असतात. अळोव् ज[ड असतात. दांत ज[त्या पांढरे पण निगा न रास्वव्'यार्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराहू’प्य न[नफॉंश. ( ज्ञ ) २४९
लळोफांवै डोके
तिरकस
असतात.
ज[व[तव्ल
लोकांचे न[क
चपर्टे व लहान असते पण न[कपुङया फुगीर असतात. अळोव्
ज[ड असतात.
दांत
ज[त्या पांढरे पण निगा न रास्वव्'यार्ने
जीवा
कापड तयार होते. जपरा हे १७ व्या शतकांत मतरम
रागांच्या राजघार्नावे' शहर होते. ज`[गक[ हे सदर मोंर्ती
व माणर्के यांच्या व्यापाराबद्दल फार प्रसिद्ध आहे. पसर’
गदेहे येडू जुन्या राजघराण्यातील पुरुषांवीं यडगॉ आहेत.
श ती,…वावाच्या एकंदर जमौर्मंपिफॉं इळाकडा ४॰
पिवळे झाठेळें असतात. द्दिसप्गांत ज[व[नांज व मटुरान
हे तुंद्र्गिळोजपेक्षां तरतर’रैत दिसतात. पुव्षांपेंक्षां बायका
अशक्त असतात. पळोतवणें हा वायर्फाच्या सौंदर्याचा निद`
एकर जमीन शतकळोचीं आहे. ज[वामघ्र्ये मुख्य पळोक तांदुळांर्वे
शैक समजला जातो.
आहे. त्याशिवाय त[रबर, प्तिक्रौंना, कळो‘फौ, तेवाखू, चहा, नील,
ज[वातांल लोक पूर्वी वुद्वनिपुण व
शूर लोक होते पण हेल? ते शांत, तापें व मेहेनतळो बनलेले
आहेत.
ज[व[मघील परे' बहुतेक वांसूचीं असतात.
र्फाहाँचीं घरे
लाकडंळावाद्दि असतात. श्रीमतांचळो दगडी घरे असतात. या
लोफांर्वे मुख्य खाद्य तांदूळ आहे. हे लोक माते व मांसद्दि
इत्त्याळिद वस्तूण्हे येथे पिकतात.
पुष्कळच आहेत. ज[व[मघ्में
साखरेचे कारखाते
१९०५
ज[व[त
सप्लो १० २८३५७
टन म्इणने सुमारे १५॰॰॰॰ध्॰ पळीडांचीं त[खर तयार
झाला. त[य्डरेखालोखाल निकॉचें उत्पन्न येथेच पुष्कळच
आहे.
ज[व[मध्यें म्हशी, माहे, बैल, घोडे, कुत्री मांजरे
खातात. यावी कौटुंबिक पद्वतोंचीं रहाणीं आहे. वरिष्ठ वर्गांत ,
वहुपत्नळीकत्वाचळी चाल खंड आहे. पण खालच्या वर्गांत पुष्कळ आहेत. म्इशोवा प्रवेश ज[व[त हिंदूंच्या मार्फत
बहुधा एकपत्नव्कत्वच रुढ आहे. ज[व[मर्यांल लोक मुसुलमान
आहेततें वाटतात. पण ते खरेखुरे षुढघर्मीय आहेत. त्यांचे
॰आवारविचार मुसलमानी आवासंपेंक्षां पुराणवन्यघर्मांच्या
आचारविचांरांर्शी जुळते आहेत. वरिष्ठ ज[तोंचीं रहाणीं
मात्र इस्लामी पद्धतीची आहे. मकँला ज[णें हे पवित्र
कर्तव्य होय अशळो ज[व[तांल लोंकाचो समचूच्त आहे.
प्रत्येक शहरांत एक तरी मशीद आहेच. स्मिस्तळो उपदेश‘
र्फावो येथें फारशी ड[ळ शिंजलेलळी दिसत नाही.
ज[वाचळी राजधानी वटेठिइया असून तिनळो लोकसंख्या
सवालक्ष आह. या[शवाय ते'रग, अऽळोर, पद्देग्लग, टॅगै‘रग,
आला असावा. ज[वा येथील घोडे खुबें पण सुरेख असतात.
ज[वामघळोल लोक घोढयावर वसण्यांत फार तरबेज आहेत;
व ते घोडयाच्या उत्पत्तांच्या वावतां'त फार काळजी घेतात.
ख नि ज ते प त्ति.- खमिंजतपतांच्या वावतां'त मात्र
जावा फार मागें आहे. सोन्यावार्दावा ज[व[त अभाव
आहे. बॉकजकर्तो येथे व इतर क'ळाहाँ भागांत मैंगनीजच्या खाणी आहेत. चिलचप येथे लरेइबुंवकाच्या
खाणी आहेत. कोळसा पुष्कळ ठिकाणी पण थोडया
णांत स'ळापडतो.
डे
त्रोटर्वे
ज[व[त
रेताड
प्रमा-
पेंट्रोळिलयमचा शोध
नुनयूमीं, सुकैद्'ग
लावल्यामुळे हा एक महूंत्त्वावा पवा ज[व[त सुरू झाला आहे.
याशिवाय गमक व मिंव् यांच्या खाणीद्दि ज[वामघ्यें आहेत.
तख्त, तसळोकमलय,
इत्यादि शइरे आहेत. पडेंग्लग
येथें गंघकावेव उष्ण झरे आहेत. घुटुंय्झोगें र्मंर्थे हुदर
वाया आहेत. प्रेयगर जिंल्ह्यांत घवघवे पुष्कळ आहेत.
ढ् ळ ण ब ळ ण॰…सप[ट
प्रदेशावर, पठारावर व
काहीं ठिकाणी ज्वालामुखांच्या टज्यूंतूनद्दि रेल्वे गेली आहे.
समरंगऱ्जरेकजकर्तो, वटॅदिहृया-चूटेसोगें हे रेल्वेचे फांटे
सुकचूमी हे हवेचे ठिकाण आहे. [’चेचल’का येथे कॉंफॉं
मोठया प्रमार्णात तयार होते. तसिकमलयाचा टापू
दृष्टितींदर्यांच्या दृर्टार्ने अत्यंत मनोहर आहे. वैररँबॉन
प्रसूरब आहेत. याशिवाय घुरवय-पड्रुरुअन, बंर्माल-मुकंग,
सिड; र्बो - -परन,
कर्टीस्रॅ`[न`[-… दुलग, बुर्टेझोगै ……चिय'झर,
व’गरे बरेच रेल्वेचे फांटे आहेत. सुमारे ३५०० येलां'घ्या
टावूत तारा पसरलेल्या आहेत. नौकानयन सुरू. आद्दे,
नूर्टेझीगै, कव'ग, वन्यस, र्वडग, चत्तर,
येथें जुन्या वुलतानचि
राजवाडे, चिनी देवालय,
उपासवामदळोर, ळिमठागरॅ आढळून
येतात.
ख्रिस्ती
इंद्रमयू वदर
त[द्रुलप्च्या व्यापारावद्दल प्रसिद्ध आहे, तेगल येथें साखर`चे पुघ्कळ कारखाने आहेत. पेंकंलोगन व बेटग हाँशइरे‘द्दि
व्यापारावद्दल प्रसिद्ध आहेत.
सेंमरंग येथें
प्रिन्स
ऑफ
गांबांत ट्रमवे वाढू आहेत.
रा ज्य व्या व स्यात्-बेर्डे
हे सगळ्यात याकर्टे
परि’
माण होय. अशा कांहीं रेवभ्डयाचा मिळुन एक जिल्हा,
अशा कांहीं जिल्द्यांये मिळुन एक खाते, अर्शी काहीं खात?
बाँरेज किल्ला, कॅ’थें’प्ळिलक चचै, प्रौटेस्टंठ चर्च,
मशीद
व
मिळुन, एक रेसक्डन्सी होते. प्रत्येक रेसळोडेन्साँवर एक डच
एक लष्करळो दवाखाना
रेल्वे सुरू
मनुष्य मुख्य असतो, व त्याच्या हाताखालाँ एक असिस्टंट-
करण्यात आलो असल्यार्में या शहृराचें वेमव वाढत आहे.
डॅमकहें शहर पुराणप्रसिद्व आहे. येथे स. १८४५ मध्ये,
रॅसाँर्डेट, एक कट्रॉलर व कांहीं अधिकारी असतात. पुरकतळोव जळोकजकता या सस्थानांच! कारभार रेसिहेंडेंटच्या देख-
तेंथळोल सूलताननॅ एक “सुदर मशीद बांधली होता. तिचा
कांहीं भाग अद्यापि राखुन ठेवण्यात आला आहे. तात
रेखाँखालो हुलतान पहातात.
वेळां डेंमकला गेल्यास मक्कायान्नेर्चे श्रेय मिळते. या ठिकाण“!
ज्ञानकोश, विभाग १ ला… यावद्वीपसय्कृति हे प्रकरण पहा,
पुष्कळ थडगॉ आहेत. सलतिग
प्र[ चो न अ व ते प.…जावामच्यें फार प्राचीन
अवशेष फारते सांपडत न[हेळोत. मधून मधुन दगडी
आहे.
येथे नुकताच
येथे लष्करानां राहृण्यावो
जागा आहे. र्केदलहे ताखरेवट्ल फार प्रम्‘तेद्व आहे. क्रुदस येथे
॰
या या, या इ'म य व सं स्कृ [ते.-…‘द्दिद्गुग्त्यान व जग’
फांलवै
ट्ला-<noinclude></noinclude>
19u4215vpo5hjgeu9s9fij8htwb75qj
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७३
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रळोय ज्ञानकोश, (ज [ २५० ज[वा रावे अवशप दृष्टीस पडतात. द्दिढूराजटॅवा अमल जन्म ज[व[बर देवतांच्या मूर्ती आहेत. दक्षिणेच्या वासूला चतुहेंख ब्रह्म- असतांना त्यच्चि[ अमवानों..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रळोय ज्ञानकोश, (ज [ २५०
ज[वा
रावे अवशप दृष्टीस पडतात. द्दिढूराजटॅवा अमल
जन्म
ज[व[बर
देवतांच्या मूर्ती आहेत. दक्षिणेच्या वासूला चतुहेंख ब्रह्म-
असतांना त्यच्चि[ अमवानोंत ज", देवालये व मठ बांधले
गेले त्यांचे अव`शप मात्र पुष्कळ स[पडतात व त्यावरून
सत्कखीन शिल्प ळिकतळो उच्च दर्जाचे होते याची साक्ष पडते.
देवाचळो व उत्तरवासूला विकूचीं देवालये आहेत. याशिवाय
चडळोतेवू, चडळो लेवग इत्यादि पुष्कळच देवालये आहेत.
काही काहीं देवालगांवर लेख खोदलेहेञ् आढळतात.
पनवरम येथोहे देवालयाचळा ससूहृ आहे. येथील मुख्य
दवालय खादकामावा नमुना म्हृपूळान प्रसिद्ध आहे, बाहेरच्या
पूर्वे व मध्य ज[वामध्र्ये द्दिढूपद्वतळोची देवालये दृष्टीस पडतात;
पण या दोन ठिकाणच्या देवालयात फरक
आढळतो.
मद्रु`
रेल एकद्दि द्दिढू देवालय नाही. फ्रेंडलरळोजन्सौमव्यै तां गांवे'
द्वारपाल'ळाच्या सूत’हँवा पोशाख
आहेत त्या गांवाचीं न[वे पाहिला असता
पूर्वी त्या ठिकाणी
या न[त्यार्ने प्रेक्षणीय आहे.विनळी लोक'ण्चें या देशाशळो पुष्कळ
रँग्वांबों व नौहांचळो देवालये होतो असे न[थ्ते. वुद्वाचळो देव[॰
लये आठव्या ते दहाव्या शतकाच्या दरम्यान बांपलाँ
दळणवळण असल्यामुळे चिनळो शिल्पार्वे अव`शप येथे त[पड-
गेलो असप्वळीत अता इझरमनया तक आहे. मघ्यनावामधोल
देवालयापेंक्षां पूर्वे ज[व[सळील देवालये नंतरची दिसतात महा-
राना घळोरथ आदित्यघम’प्ते त[तमजला विहार बांधल्यावा जळो
उढेख मेनगकावू शिलालेखात आहे, तो विहार ‘ बोंरॉबुदर ’
[’चनळो शिल्पकलेवा
अव`शप
तात. व त्याचा अभ्यास करणे मनोरंजक व उपयुक्त आहे.
३ ति हा स.…यानद्वाप या न[वावसन ज[वा हे' नांव पडले
असावे अते दिसते. ज[वा देशाचा इतिहास देखील विश्वस-
नीय अता मिळत न[हो. वावद
डफ
पुराणे यांच्यावसन
बो थोडा फार इतिहास उपलब्ध होईल तेवढाच.
ज[व[मप्ये
१५ व्या शतकापर्मेत हिंदू लोकांची सत्ता प्रचलित होतो, या
होय अस कित्येक मानतात. ८४० सालच्या एका ताम्र’
पटांत डिएग हा ज[वामघळोल एक पवित्र ड[गर होय अते
द्दिढूसतैच्या कालाचें मुख्यत:
म्हटले आहे.
म्हणते ( १ ) वींद्वकाल, ( २ )हैंळावकाल व( ३ ) सघिकाल.
जावामघळोल देवालयाचीं रचना
असें फग्ट्टेसनर्ने
म्इणर्णे चुकीचे
फ्द्धर्तावा आहे
पठारावर शिव,
चालुक्य
तऱ्हेची
आहे
म्हटले आहे, पण इझरमनर्ते फग्यूंसनच
आहे अते दाखवून, दवलया'वा वाड द्राविडी
अस स्पष्ट व सप्रमाण सिद्ध वेढहूव् आहे. ’न्डेएंग
द्रुग’ळा, गणेश यांची देवालये दृष्टीस पडतात.
त्याचप्रमाणें चडीअर्जुनळो, चडोक्षीखङळी, चडॉषंतदेव, चैडळी
परकोंसेंता यांची देवालये आहेत. या पठाराच्या ईशान्येस
तान
विभाग
पडतात.
ते
ज[वामघ्ये ज्या अनेक
राजघराण्यानळो राज्य
केले
त्यांमध्ये मनपाहेत न[वाते राजघराणे फार प्रबल म्हणुन
प्रसिद्ध होते. या राजघराण्याच्या सत्तेखाला ज[व[राष्ट्रप्ची
सत्ता परमुळुरवावर देखील पसरला होती. त्यानंतर
मुसल’
यान लोकांच्या स्वाऱ्याना आरंभ झाला. य[न"[ काहीं
काळ-
पर्येत आपला अमल ज[वावर वसविंला पण त्यानंतर युरो,
दरवतो व परकंतितायांचींदेवालयें आहेत. पूर्वेस पडफीदेवालय आहेत. वायव्येस पुष्कळ देवालये असून त्यात सचर्फाचें
ळिपयन लरेकट्टेची टोंळयाड नावावर येऊं लागलो. १५२०
सखी पोर्तुगीज लोकांना येथॉल रद्दिवादयांकडून व्यापाराची
परवानना मिळविली. पुढें या शतकाच्या अखेरव्त डच
देवालय चांगले आहे.
लव्क'प्नॉ आपला पाय रे[वण्यास सुरुवात केली. या सुमारास
दक्षिणेस चडोंभौमाच उत्कृष्ट देवा-
लय असून त्या देवलाचा आकार मनोऱ्यातारखी आहे.
एका
देवळाची
रचना
चालुक्य
पद्वनळोची
या
ज[व[बर मतरमर्वे राजघराणें राज्य करीत
होते. या
राज,
आहे.
घराण्यातील राते आपल्याला ज[व[वे॰॰सम्र[ठ म्हृणत्रूना घेत
ज[व[मन्-यें जी हिंदु देवालये आहेत त्यामध्ये वोरा’बुदर देवा,
असत. त्याच्या अमवानात ज[व[चा राजयाना कतसूरा
हा होता. यांच्या अमदप्नोंत डच लळोकानॉ जफत्रा व
त्याच्या आसपास आपला अ'मल बसवला होता. १७०५
त[लॉ डच लरेफांनळी नावाच्या राजाशळी तइ करून प्रेयेगरर्चे
लय हे सपाँत भव्य व कलाकीशत्याच्या दृष्टीने जगांतळील
आते प्रतिद्व देवालयामघ्ये मोंडण्याताररव आहे. हे वेञ्डू रॅसि.
डेन्सव्मघ्र्धे प्रोगोच्या पश्चिमेस थोड्या फार अंतरावर
आहे.
हें देवालय एका डोंगरावर असून त्याकडे ज[पयाताठळो यार
मोठे जिने चढळावे लागतात. या देवळांकडे ज[तांना मधुन
मधून द[ग`[व[ उभारलेले आहेत. या देवालयार्चे शिल्प अशा
तऱ्हेचें केले आहे कळी तें पहात॰[च मनुष्यार्चे मन सतारापासून
शहर मिंळविलेस. १७४५ मध्ये वैरळोर्दोन ते चन्यूनगीपर्मेतवा
सत्रे मुलूख डच लळोकानळो आपल्या ताब्यात आणला.
स. १ ’५५ मध्ये मतरमच्या राजघराण्यात वेवदशप्हेळो माचूळान
सुरकर्त व ज[वजकलँ अशी दोन राज्ये पङर्ली.स.१८॰ ८ मध्ये
परावृत्त व्हृर्वि. पायथ्यापासून तों [”शखरापयेतवा महायान
पंथाची तत्वे खोदलेली आहेत.या देवालयात बुद्धाच्या
बतंमते राज्य डच लोकांनी जिंकले.
मुर्ती पसरलेल्या आहेत.
आपलळो सत्ता प्रस्थापित केला. यावेळी
सुरकत’ग् सस्यानात प्रवचन येथे हिंदू देवळे पुअघ्ळ आहेत.
येर्यांल देवालयाच्या ससुहामोंवतळो तिहेरी तट पसरला आहे.
दुसऱ्या व तिसऱ्या तटाच्या मध्ये १५७ लहानलहान देवा…
लये आहेत. पश्चिमेकडील तटाच्या मध्यभागी एक मोंठे
देवालय असून त्यामध्ये कालस्वरुपळो ["शव,गणेश,दुग॰[ इत्यादि
स. १८११-१८१८
या
अवघीत
इंपिंलशर्तेनळो ज[वाबर
ज[वाच्या
राजघरा-
ण्यातळोल दक्षवेगर या धाडसी व चतुर पुरुपर्ति या परकीयांच्या ताव्यातून आपलॅं राज्य तौडविंण्याचा प्रयत्न कैला-
पण द्रुदे’वानें तो फसला व डच लरेकठेंची सत्ता ज[वावर
पूणपणें प्रस्थापित झाला. डच इंडियन सैन्याने दळीपवेगरला
पकडण्याताटों सतत पांच वषं धडपड चालविलों होतो, या<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्द्यराष्ट्र’श्य प्प्नफॉंश. ( ज ) २५१ जप्विंट्खान कामांत डच लव्कचिं १५००० सैन्य कामाला आल. जाहिरात कायदा, शास्त्र व वैद्यफी या शाखा आहेत. पण याशिवाय येथें र्दाप’रेगर स'ग्पडला न..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्द्यराष्ट्र’श्य प्प्नफॉंश. ( ज ) २५१
जप्विंट्खान
कामांत डच लव्कचिं १५०००
सैन्य कामाला आल.
जाहिरात
कायदा, शास्त्र व वैद्यफी या शाखा आहेत.
पण
याशिवाय येथें
र्दाप’रेगर स'ग्पडला नाहाँहा असप्मप्न्य पुरुष स. १८५५ मध्ये
मरण पावला. अयापिद्दि याची स्मृति बाव'नळोज लोकांमध्ये
लष्करी शिक्षणाची शाळा, गग्यनशप्ळन् व व्यापप्रा शाळा
आहेत. येथे पेट्रोलियम, मळोठ’, धातू, इमप्रतळीवै ल'ळाकूड, फळे
ताजळो आहे; व डच लोकांना हांक्रून लावून पुन्हां
चालू केला. व्यापाराला त्यांनों उत्तेजन दिल. त्यांनळी मुत्स’
वगेरेंया व्यापार आहे.
सन १५६४ मध्ये प्रिन्स अलॅवश्नांडर लॅपसनांनु यान
जाती मोंल्देक्रुव्इयाचळो राजधानी केला. हे शहृर पूर्वीपासून
ब्’वदेग्करतां प्रसिद्ध आहे. जासौ तातेर लोकांनी स.१५१३ त,
बुक लोकांनी १५३८ व व रशियन लळोक'ग्न'प् स.१५८६ त
ज[ललैं. १७९२ मध्ये जप्सळोच्या तद्दानॅ दुसऱ्या द्सळोटर्किश युद्धाचा शवट आला. स. १८२१मघ्ये प्रीक लौक'प्ती
केलेल्या बंडग्मुळें बुक लोंफांनळो हे शहर सन १८२२
द्दीपणार्ने, ज[वामयळोल त्तेस्यार्ते खालसा न करता तों एतद्देशीय राजघराण्यातील पुरुषांच्याच ताब्यात ठेंवलळी. तेथळोल
त हल्ला करुन घेसर्के. १८६१ मध्ये बुखारेस्टला राजधानी
॰नल्यामुर्के या शइराऱ्त्र वरेंच नुकसान झाल.
एतद्देशळो॰
याचळो सत्ता प्रस्थापित करण्यासाठी द्ळोपबेंगर हा पुन्हां पुंय्वळो,
वर अवतरणार अशी
आहे. या
भावण्या
अद्यापिहिं लोकांची भावडी समड्रुत
समजुतळीला
वळळो
पडून
फांइ’व्
कांहीं
पुढाऱ्यान“! तळोन च,र वळां बॅर्ड'प्हे कळी पण त्याला यश
आले नम्हो. १८५० तालापाड्रुन डच लरैकठेंचो सत्ता पूणेपर्णे
प्रस्थापित होऊ लागली. त्यांनों डच
रद्दिवर्नियांर्शी
मिळते
आस्तें आस्तें र्फेलाव
कायदा
या
भागांत
प्रयत्न केला.
शिक्षणाचा
जासुद्-ह्मा झाडास लँटिंनमघ्ये अँटिंआरिस टॉक्सि’
करण्यास सुरुवात केली.
याशिवाय
व
कँरिंआ, इंप्रजळोत उपास ट्री व इतर भाषांत जातुंद्,
करवत, अळी इत्यादि नर्वि आहेत.
हीं झार्डे ब्रह्मदेश,
पा‘श्वेमवाट व सिलळोन यांमधील
जगलरॅत आढळतात.
विभाग,
या झाडप्पानृन पांढरी राळ निघते, तिचा विषारी वाण
घेण्याचा
इतर वावसळोताहे वऱ्याच सुधारणा घडवून
अशा तऱ्हेव्ळा आपली सत्ता चिरस्थ ळायळो केलळो.
[ सद्मेग्रंथ-द्दिट्टस्यान आणि
आणल्या
जग-ज्ञानकोश
स्टँफौडे रँफुळोस-द्दिस्डरळी आफ गावा ( 'ळडन १८३० ); जेग‘
करण्याकडे उपयोग
इत-जप्वा; सिडमोर॰दि गॉर्डन ऑफ दि ईस्ट, न्यूयॉर्क
१८९८ ; डे…द्दि पॉलिसी अँड दिं' अँडस्तिमेस्टूंशन ऑफ दि
वाखाचें दोर मजबूत होतात. तंतु काढून त्याचे दोर करतात.
डच इन जावा ( लडन १९०८ ). ]
जप्विद्स्रान-मराठो ऐतिहासिक कागदपत्रात याचे
करतात,
आंतरतालळीपातृन
केलेल्या
ताल ( ताग ) पाण्यात भिजवून तळी आपडून वाख काढण्यात
येतो. ( चूड म्हणुन झाडाचे थळोर्डे खोड ठेवून झाडाची सवय
साल काढून त्तिवा धान्य ( पळोतळो तयार होत असत्यामुळें )
नांव ज[वितरवळान अर्ते यैतें. हा मूळचा रवाना असून अहेमद्’
भरून ठेवण्याकरिता उपयोग करतात. यावस्द्न पश्विम ब्हेकु
शहा ( दिक्कोचा ) व त्याचळो
स्थानांत या झाडांना" पोत्यार्ची झ।र्डे”अर्ते म्हणतात. बिया
तापद्दारक व आमशिप्नातेबँघकाहे आहेत.
आहे यांचा मोठा आवडता
होता. त्यानळो याला मोठा अधिकार देऊन व अमीर
करून
जाहिरात-विसप्र्वे शतक हे जप्द्दिरातांर्वे युग असें
नवाव बहादूर हां पद्व’ण्द्दि दिंलळो. यार्चे वजन पळातशद्दावर
असलेले द्रवारो मडळीस पह्रविंना. शवटों त्यांपँकॉं नवाव
मानतात व तें पुष्कळ अशक्त खरँप्’हे आहे. आधुनिक व्यापारा-
सफद्रजग याऱ्न त्याला मेजवानळीस बोलावून आणून त्यावा
ज्ञगांत जाद्दिरार्ताला
अंद्म्जावाहेर महत्त्व प्राप्त झाले आहे.
‘कळियुगांतळोल प‘वरावो विंया’ अस जे रा. न. चिं. केळकर
खून करविला ( आगष्ट १७५२ ).
जालषंद्-हे फुलझाड आहे. ते सुमप्रॅ पुव्पभर वप्डर्ते.
यान'व् एके ठिफार्णां जाद्दिरातौर्चे वणेग कैर्ले आहे तें अगदी
त्यास सएकृतमघ्ये जपा, मराठींत ज[सवद् हो नग्बें' आहेत,
समर्पक आहे. पाश्चात्य देंशरंतच काय पण भौतिक ढुयारणेंत
ह्या झण्डब्च्य,‘ पांडरळो, तावडळो, भगवा अशा हुयारॅ १८ जातो
फार पाठोमामें असल्व्ल्या आपल्या
आहेत. ज[सवदोर्चे आड मूळचे चळोन देश'प्तळोल अट्टन
हेहॉ
दिंडुस्यानांताहे
शहरा-
तूनच नव्हे तर ट्रेनडोंपाडॉद्दि जप्‘प्हेरातोंचब् टुळहुलाठ झालेला
सपाट प्रदेशरंतळोल सत्रे वगांच्यांत हाँ झाडे लावलेली आडळतात. या झाडाच्या सप्लळोपालून धागा निघतो व याच्या
वाढत चालल्यार्वे दिसून येते.
घांता‘हे उपयोग होतो.
नवळो गोष्ट करव्त नाहीं, हा मनुष्यमात्रावा स्वभावघम आहे.
फुंठांपानृन रंग तयार होतात. फुलांचा एतद्देशीय औंप-
जाली…जासळो हें याच नावाच्या व्म’प्मेयाच्या भागाचे
मुख्य ठिकाण अहूंन, वहळुइ नर्दाच्या कफैवॉ
आहे.
येर्थाल
लोकसम्टुया सन १९१८ मध्ये ७६१२॰ होतो, गासौंबे गेले.
ठवाकेर्शाने
यांच्यार्शी आगगग्डव्नॅ
दळणवळण
आहे.
ही
मोंल्र्डेच्व्इयाच्या राज्यकारभाराचळो व रोमन कॅथोलिक यमळीच्या
दृष्टीस पडतो; व प्रत्यहाँ ज[द्विरातव्चळो
फळाययाशिवाय
अथवा
जसराशिवाय
लोकप्रियता व प्रसप्र
कोंर्णांप्‘हे एखादी
लाद्विरातांमघ्र्ये वरळोल कळोणता तरी हेतु सळाघ्य होत असल्याशिवाय स्याचळो इतकळो वाढ झालीच नसतो. जाहिरातव्ला
आज र्जे विलक्षण मष्ट्त्त्व प्राप्त क्षांर्हेऽ आहे… त्याड्र कारण
जाहिरात देण्याची आज ज्ञसरा माहूर लागला आहे एक्टँच
बघून जप्द्दिरातांपावून चराच काय या आहे अशी लोकांची
मुख्य अध्यापकळावा जागा आहे. येथे स. १८६४ मध्ये प्रिन्स
खात्री पटत चालला आहे हेद्दि द्रुसरें आणि महत्वाचे कारण
क्रुझ्गर्ने विश्वविद्यालय स्यापिट्रव्; व त्यातवाद्द्'मय, तत्त्वज्ञान,
होय. जप्द्दिरातव्चळी उपयुक्तता लळोकांन'ग् पडत
वालल्यामुळें,<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मइप्सष्ट्रळीयशांनकळोशछ्येल्फि‘रऱ जाहिरात अमेरिकेत या शऱस्नाचा शिक्षणकम'ळात समावेंश करण्यात आला आहे; व या विषयाचा शखीय फ्द्वतांमें अभ्यास कर॰ ण्याचा प्रयत्न सुरू झाला आहे व्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मइप्सष्ट्रळीयशांनकळोशछ्येल्फि‘रऱ
जाहिरात
अमेरिकेत या शऱस्नाचा शिक्षणकम'ळात समावेंश करण्यात
आला आहे; व या विषयाचा शखीय फ्द्वतांमें अभ्यास कर॰
ण्याचा प्रयत्न सुरू झाला आहे व्यापाराच्या वाढीला जाऱहे
रात हे महच्वार्चे साधन होऊन
नसल्यामुळे त्या साघनाचा
^
जप्हरात
झपाटयातै होऊं लागला. या विर्येत अमेरिर्कर्ते सगळ्यांत
आघाडळो मारलो.
जाद्दिरातोंला
शाब्रीय स्वरूप देण्याचें
सर्वे श्रेय अर्मेंरकॅला दि’ल पाहिजे. अमेरिकॅत साडिना
जाद्दिरातांवर ६॰ ॥० कोट? डॅ’प्लस खचै हनृतात. इग्लड…
शास्त्रळोय पद्वतळोर्ने अभ्यास करण्याची जरूरळी विद्वानाना भासू
मध्ये जाण्हेरार्तांवर सालिना द्द्दा कोटी पौड खर्च होतात, या
लागलो आहे.
ज्ञब्द्दिरातोंचा उगम अगदी अलळोकडे झाला हळो गोष्ट खरा
आहे. पण पूर्वीच्या काळीद्दि जाग्’हेरार्तांची कल्पना अगदीच
अपारेधित हळोतों अर्ते नाहीं. हळां ज्याप्रमाणें या साघनाला
वरून जाद्दिरातळीचा व्याप किती प्रचेड आहे हे दिघुन येते.
महान प्राप्त झाल आहे व त्याला शखीय
स्वरूप देण्यात
आल आहे, त्या प्रकारची स्थिति प्रप्चदेंन काळी नव्इतळो;
पण जाद्दिरार्तांच्या मुलाश'व् असलल तप्च प्राचीन काळींळिह
लोकांना समत
होते असे दिड्रुन येते. पूर्वीच्या काळवै
व्यापारी लोक आपल्या मालाचा खप वाढा‘वेंण्यासाठो, विरनिराळ्या लोकांना आपला माल दाखविर्णे, आपल्या परिच-
याच्या
मेडळींफडून
त्या मालाची
शिफारस करावेणें
इत्यादि उपाय अंमलात आणींत असत. निरनिराळ्या उत्सवाच्या प्रतंगों अगर णघांच्या प्रसंग“! ॰‘आपला माल तेथे
नेऊन त्या ठिंकाभ्ऱ्ळा नमलॅंत्ऱ्या, विरा‘तेंराळ्या स्थानाढून
आलेल्या लोकांत आपल्या मालाचा प्रसार करीत असत.
इतका अतोनात खवे जाद्दिरातां‘वर करण्यात जाहिरातीपाद्रुनुन काय फायदे होतात असा कळोणी प्रश्न केल्यास तो
अयोग्य होणार नाही. पण जाद्दिरार्तांपाडून कोणते
फायदे होतात हे पहाण्यापूर्वी जाद्दिरातांर्वे प्रयोजन काय
हे थोडक्यात पाहिर्ले पाहिजे. जाद्दिरातांवे मुख्य उद्देश
म्हणजें( १ )आपलामाल गिंऱ्इळाइकाच्या नजरेस प्रप्मु’
ख्यार्ने आणणेंव ( २ ) तो ज्याची विकत घेण्याची इच्छा
नर्घल त्याच्याग्’हे गळ"; उतरविर्णे: हे द्ळोन्होळिहृ उद्देश महत्वाचे
असल तरी त्यातल्यात्यात दुसरा
आहे.
कारण
माल
उद्देश अधिक महत्वाचा
कितांद्दि बांगला
असला
अगर
लोकांच्या डोळ्यांत तों मरल’तर प्रत्येकजण तळो वैद्देलच
अर्ते नाही. फार आल तर तो त्या मालाची शिफारस करील
पण नुसत्या तोंडी शिफारसाँनॅ त्या मालाचा खप व त्यापाडून
व्यापाऱ्यांनाद्र्व्यप्रप्प्ति थोडीच होणार
आहे.
अर्थात; तो
तात्पयै या ना त्या कोणत्यातरी स्वरूपात या जाळिहरावींची
माल जेंणेंकरून गिऱ्हग्इक विकत घेट्टेल अशा प्रकऱरची मुक्ति
कल्पना तत्कालोन लोकांत प्रट्टळात होती. फक्त इतर साधनांची
त्यावेळी अनुकूलता नसल्यामुळे त्या कल्पनॅच्यावाढीलायथो’
अमलात आणली पाहेजें. यासाठी गिऱ्हाइकळाला मोह पडेल
अशा प्रकरची जाहिरात देणे हे! एक मइत्त्वाचा उपाय
बित अवसर
आहे.
मिळाला
नाहीं. प्राचीन काळी
हृहॉप्रमाणें
अर्थांतूं ज्या मानार्ते ज्याची जाहिरात लोकांना
द्ळणवळणाची सायर्ने विपुल नव्इतळो. मुद्र्णकत्श्वेचा जन्म
अद्यापि झाला नव्हता. नृत्तपत्रांची सोय नव्हृतळो. अर्थात
अधिक पसंत पडेल
त्याचाच माल
अधिक खपणार
हे उघड आहे.
यामुळे कोणती जाहिरात लोकांना प'सत
जाण्हेरातव्ला अत्यंत उपयुक्त साघनाचा त्या वेळी अभाव
असल्यानॅ या शास्नालार्दुहळांर्चे स्वरूप प्राप्त होणें अशक्य होंतें.
१५व्या शतकांत मुद्र्णकठेचा जन्म झाल्यानंतर जाहिरातळोची कला झपाट्याने वाढू लागलो. इ'ग्र्लडमच्ये स. १६२२
पडेल इकडे व्यापाऱ्यांच लक्ष्य जाऊं लागले. त्यामुळे या
च्यामे महिन्यात पाद्देर्ले वृत्तपत्र प्रसिद्ध झाल. त्यानंतर २५
मनुष्याच्या मनळोवुत्तीर्चे अध्ययन करण्याची जरुरी उत्पन्न
हळोव्ळा कमप्रग्प्तच झाल. अशा रीतीने या विद्येचा निरनिराळ्या
वपाँनों म्हूंणजे स. १६४८ मध्ये वुतपत्रर्देतून पां’हेंळी जाश्चि
रात
फडकलळो. ही जाहिरात खालीलप्रमाणे होती.
‘ डिव्हाट्रेन चवै ऑफ
ट्रॅर्रलड या नांवाचें ट्टेग्ल०
ङच्या
पाद्यांन"! नावाजलेले, लडन शहरातळोल प्रसिद्ध
जाद्दिरातांच्या विद्येचा शप्रत्रीय रप्तळोर्ते अम्यास करण्याची
आवश्यकता भातुं लागलो. गिऱ्हाइकांना कोणत्या प्रकारचा
जाहिरात पसंत पडॅल या विषयाचा विचार वरतां करता
अगांननू अभ्यास सुरू झाला. या विदेग्च्या अभ्यासकांच्या मते
ज[द्दिरातळीमघ्ये खालील गोष्टींचा समावेश झाला पाहितें.
( १ ) जाहिरात
चिंत्ताकपेंक असली
पाद्दिबे.
अधिकाऱ्यांना सया’हेत केलेले, ठुल्स्त्या करून वाडविलैर्ले,
इंग्लंडच्या प्रधानमंडळाप्वेरूद्व घेतल्या गेलेल्या आक्षे’
पाना समर्पक उत्तरे ज्यांत नापडर्तांल अर्ते, जोसेफ हे‘नस्कॉंट
हे ज[व्हेरार्तांवे आद्य लक्षण होय, जाहिरात जर चित्ताकर्पक नसेल तर लोकांर्चे लक्ष्य तिकडे बेघणार नाहाँऱ्व त्यामुळे
आणि नॉबै ग्रँऱ्व्इर्ट यांच्याकरिता छापून प्रसिद्ध
देखिल
पुस्तक आहे.
ओल्ड
जिकडे तिकडे जाद्दिरातच्ना पाँक आल्यामुळे, लोक जा'प्हे’
अशा वेळीं त्यांचे लक्ष्य
रातों वाचण्याचा कंटाळा करतात.
याच्या प्रती स्टेशनसै द्दाल व
वैज्ञमर्यांल गोल्डन फुळीस येथें प्तिळतांल, ’
प्रथम प्रथम पुस्तकांच्या व औंषघांच्याच वात्हरातळो
वतमानपत्र’प्तून चमकत असत. पण पुढें सर्वे प्रकारच्या
जाहिराती वृत्तपत्रांतून चमचूर्दे लागल्या. मृद्रणकळेचा
प्रसार सर्व राष्ट्रट्वदूंप्न होताच जाद्दिरानाच्या कलचाहि प्रसार
ज्ञऱ्ळिहरात देणाऱ्याया माल फार खपणार नाहीं.
इक्की तर
त्याची इच्छा नसतांप्हे ज्यामुकँ वेवलॅं जाईल अशा चिंत्ताक
पेंफ तऱ्हेंवो जाहिरात असली
पाहिजे.
हहॉच्या व्यापारी
चढाआढीच्या युगांत ज्याची जाहिरात अधिक
त्याच्या वस्तूचा खप अधिक
अशी
त्यामुळें जाहिरात देणाऱ्या व्यापाऱ्यानें
स्थिति
मपकेदार
आलो
आपल्या
आहे.
प्र‘ळितस्प॰<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रळीय सानफॉंश- (ज) ण्याच्या जाहिरातीपक्षां आपली जाहिरात कशी मपकेयार हळोईंल, कळोणत्यास्थळी, अगर ॰क्तीकोठेंदिलाअसनातालोकांच्या चटकन नजरत मरल या सवाचा काळ्जापृवैक विचा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रळीय सानफॉंश- (ज)
ण्याच्या जाहिरातीपक्षां आपली जाहिरात कशी मपकेयार
हळोईंल, कळोणत्यास्थळी, अगर ॰क्तीकोठेंदिलाअसनातालोकांच्या
चटकन नजरत मरल या सवाचा काळ्जापृवैक विचार करून
जाहिरात"[दला पाहिजे. नवान नवान साधनांच्या व तुंथा'
रर्णांच्या वाडज्वरळोवर जाहिरातांर्वे दु…[त्र व्यापक झाल आहे.
नवीन नवीन जाहिरातीची सायन अस्तित्वात आलो आहेत.
चित्रांच्या द्वारें, विछुत्प्रवाद्दाच्या सहाय्यार्ने, फीर्तोच्या द्वारे“,
अशा अनत तज्ञांची मालाची ज[[हेरात देण्यात येऊं
लागलो आहे. यामुळे जाहिरात देण्यार्चे’ काम दररळोव कठीण
होत
चालल
आहे.
(२ ) ज[[हरान
मामाक
वखूचक
असला प[[`हृ`ज्[.ज!हिरात यावयावा ता अगडवेंत्र शब्दांनीं व
भाकड वण्ळीनानीं भरला नसला पाग्‘हेबें. तर जाहिरात चटकद्[र असलो पाहिजे. जाहिरात वाचताच
वस्तूचे फायदे
काय आहेतहे त[वडतोंव गिऱ्हप्इकाच्या लक्ष्यात आल
पाहिजे. ( ३ ) जाहिरात लोकांच्या मनात कायम राहील
अशा प्रकारची असली पाहिजे. (४) ज[हिरातीवकन
जाहिरात
२५३
भागांतून भितीवरून
[मतीवरच
जाहिराती लावावयाच्या अगर
जाहिरात
रंगवावयाचा;
गाडचाच्या बाहेरच्या नावृंवर जाहिरात“!
त्या
आगगप्डघांमवून,
निकठवावयाच्या
असा एक या दोन, पुष्कळच तऱ्द्दा सांगता येतील. अशा
प्रकारच्या भिंतीवर अगर फळ्यविर जाहिरातळो देण्याने
मालाचा खप पुष्कळ वाढती. रस्त्यार्वे जाणाऱ्या येणाऱ्याच्यानजरसनित्य त[च जाहिरात पडत असल्यामुळे ता
जाहिरात पद्द्यणाऱ्यांच्या
मनात त[जा
रहात
व
त्या ज[[हेरात’म्तील माल एखाद्यास खरेद! करावयाचा
त्यामुळे,
अस॰
ल्यास तो त्याच दुकानात नेमका जाती, वृत्तपत्रांतून अगर
मासिकातून जाहिरात देण्याइतकाच या प्रकाराने फायदा
होतो. पण घराच्या अगर सावैजा‘नक भिंतीवर चित्रे काढणे,
जाहिराती निटकावेणे, यामुळे शहराचा साघेपणा व सर्मेंदयै
कमी कमी होत जातें, असें कांहीं विद्वानाना प्रतिपादन
करण्यास क्षुव्वति केला
आहे.
काही
कांहीं भिंतीवरच्या
चित्रात अलोलपणा असतो. त्यामुळे लोकांच्या मनावर
वाईट परिणाम होण्याचा सभव असतो. या दोन दृष्टींनीं इळो
जाहिरात लोकांच्या मनोवुत्तीना वरोवर पटॅल अशी असला दुसरी पडत अनिष्ट असल्यामुळे त्याला आला वालण्या॰
पाहितै.( ६ ) जाहिरात जुन्यावस्तूंवा खप वाडविणारा
साठ? प्रयत्न क्षुरू करण्यात आल आहेत. निदान अगदी
व नवीन वस्तू वापरण्याची चटक लावणारळी असलो पाहिजे. . अ’ळील जाळिहृरप्त असेल तर ती कायद्याने वद् करता
लोकांना त् [ वस्तूच्या गुणावइल खात्री पडलो पाहिजे. (५)
जा
लक्षणे
आहेत
मुख्यत:
हिरा ती ची या व मे॰…ज[हिरात^[ची
मुख्य
सांगितल्यावर
जाहिरातांची
सायन कोणती
त्याचा
विचार करू'.
हदृटेंळोचा जाहिरातदप्र
खालील
साधनाचा
उपयोग
करतांना आड॰
ळतळो. ( १ )मातिर्के, बुत्तपत्र इत्यादि; ( २ )धित’ग्, दिवे,
कळे,
इत्या’दे; (_ ३ )पत्रेव
माहितांपर्चे; ( ४
कटलाँग,
येते. स १८९३ मध्ये लडन येथें छापा नावाची सार्वेजा’तेंक
[ठकार्णां जाहिरात देण्याच्या अनिष्ट परिंणामाला आला
घालण्यासाठो एक राष्ट्रळीय सभा स्थापन झाली. या सैस्थैर्ते
आपल हे कार्य क्षुरू केल्यामुळे या प्रकाराला आळा नसत
चालला आहे. स१८९४ च्या लडन विप्‘त्ऱ्डग्स अपटनें,लडन
का'उटी कींन्सिलर्ते इमारतीच्यावर तीन फुटांपेंक्षां अधिक
व (५ )नाठक, [`सनॅ`मा, इत्यादि.
उचीवर अगर मोठा खांब र`प्नून त्याच्यावर
यात वृत्तपत्र, मासिके यांचा नंवर सवात पहिला लागतो.
पाश्चात्त्य व पावात्य देशांतहि वर्तमानपत्रे व मासिक यावा
खप वाढत्या प्रमाणावर असल्याकारणाने ट्टतपत्रवाचकांचळो
लावण्याला
सख्या सारखी फुगत असल्यामुळे अशा वृत्तपत्रांतून व
केला आहे. स १८५३ मप्ये
मानिकांतून जाहिरात देणे हे फार काययार्चे असते’.
हृर्कीच्या वृत्तपत्रांच्या उत्पन्नाची जाहिरात ही मोठी
वाव होऊन बसला आहे. वुत्तपप्रकार जाहिरातवा-
दोन्ही वावृंवर जाहिराती
रत्वियळासठीं पुष्कळ सवलती द्यायला तयार असतात, याचे
कारण त्यांना वगेंर्णांदारापेंक्षां ज[हिरातवारांच्या जाहिराती-
रात लावू न देण्यासाठो
पाढून होणारे उत्पन्न अधिक असवें.
ज्या वुत्तपत्रा-वा अगर
मासिकाची खप सर्वांत मोठा अलेंल त्याच नृत्तपत्रग्कडे व
वेदळी
केलो
आहे.
त्याचप्रमाणे
जाहिरात
दुसऱ्या
एका कायद्याने, विठुत्प्रकाशद्वारां अगर सर्व लाईंटच्या सहा-
य्याने लोकांच्या नजरेस आपलळो जाहिरात आणण्याची मनाहैं
ग’डयांच्या अगर मोटारफैच्या
छापण्याला
प्रतिबेव करण्यात
आला. सावैजा’नेक जागळो मोठया अक्षरार्ने जाहिरात देण्यनि
जर त्या भागाबें सळो‘दये कमां होत असेल तर ती जाहि॰
एडिंवरँप्मत्ये
स्वतंत्र कायदा
करण्यात आलावइंग्लडमघ्’य तसाच कायदा होण्याची
चिन्हे दिसत आहेत.
सानेंजनिक भिंतीवर, जाहिराती डकविण्य।ज्य[ वावतव्तहि
हळू हृकू कायदे होऊं लागले आहेत. स. १८३९ च्या
मासिकाकड" जाहिरातवार जातात; त्यामुळे, वृत्तपत्रांना
उतम जाहिरातवार मिळतात, वाचकांना अगद्ळो थळोडक्या
मेटूसींळिटन र्पोर्लास थेंक्टान्वयें अनधिकृत ज[गों जाहि-
किमतीत पुष्कलसा मजकूर
राती डकविण्याला बंदी करण्याचा हक
वाचावयास
मिळतो न जाहि-
रातवाराला जाहिरात दिल्यापालून फायदा होतो. अस’ऍ
परस्परावलवनाच न[तें आहे.
या वूत्तप-नाच्या व मासिकाच्या
ज[हिरातीर्वे
साधन
म्हणजे
साघनाशिवाय
नावातील
मुख्य
आला
आहे.
[दे इडिपें’डट
पोलिसह्मां देण्यात
अडव्हृर्यंझे’जेग थॅक्टप्न्क्र्थे
दुसरे
अखील जाहिरातांवद्दल खटला करण्याचा हक नागरिकांना
देण्यात आला आहे. स्टॅशनावर ज्या अनेक जाहिराती
मुख्य
चिकटा’वेंण्यांत येतात त्यार्में उतारहेचा गोंधळ उडतळो या<noinclude></noinclude>
tbg2dopr5ry3rcz4oax77vh2vk7ezls
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जाहिरात महेल्गाट्रो’यष्ठानकॉँश, (ज) २५४ जाहिरात सववावर त्यांना आला घालण्याचाहि चळवळ सुरू झालो आहे. यावा अशा प्रकारचा चळवळ पण या चळवळीत अया^प येश' अऱ्लल नाहा व येण्याचा‘हि त्तेस..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जाहिरात
महेल्गाट्रो’यष्ठानकॉँश, (ज) २५४
जाहिरात
सववावर त्यांना आला घालण्याचाहि चळवळ सुरू झालो आहे.
यावा अशा प्रकारचा चळवळ
पण या चळवळीत अया^प येश' अऱ्लल नाहा व येण्याचा‘हि
त्तेस्या स्थापन साली आहे.
रंग दिसत
अमेंरिंकाऱ्-अमेंरिंकेतील सर्वे सस्यानाना आपल्या
सस्थानात जाहिरानासव'याँवै नियम करण्याचा अधिकार
न[हो.
याशिवाय गिऱ्हाइकाकडे आपल्या मालाच्या वर्णनाची पत्रे
पाव्विणे, आपल्या मालाचा क’ठलाग पाठविणे, इत्यादव्हि
अनेक प्रकार आहेत.
सार्वजनिक ज[गों जाहिरात
करण्याकन्रेतां स्मित्झलडमच्ये
आहे. या सस्थानापँकां पुष्कळ सस्थानान‘व् आपल्या सस्या’
‘ न[तील म्युनिप्तिपँळिटयांकडे हा अधिकार सव्पविला आहे.
इतर प्रत्येक सस्थानचें नियम येथे देणे शक्य नाहीं. पण त्यांतल्या
देण्यप्वद्दलवे नियम
देर्शातूनाहे झाले आहेत त्यांचीहि योडवयांत माहिती देणे
त्यांत विंयेप महत्वाचे नियम पुढीलप्रमाणे आहेत.
जस्न्राच आहे
सस्थानन, लाथ् राच्याजाहिरातीना बेदाकेला आहे. सावजानक
फ्रान्स: …खासगळी इमारतीवर जाहिरात चिकठवू देणे
न ॰
देणे हे त्या इमारतीच्या मालकाच्या मनावर अवलवून
असतें. सार्वजनिक जागी सरकारा जाहिरातीशिवाय काण’
त्याहि इतर जाहिराती निकटनिण्याची नदी आहे. सरकारळो
जाहिराती
रंगीत
पांढऱ्या
कागदावर
कागदावर
लिहिलेल्या
व
असल्या
इतर
जाहिराती
पाहिजेत
असा
न्यूयक्रुकप्
रस्त्याच्या न[नृन जाहिराती लावण्यास मसच्यूसटसुनें वॅदा केला
क्रीलाबेयानें साबँजनिक जागॉ जाहिराती वाटण्याला देखील
वद्ळो केला आहे. शिकगळो, बोस्टन या
सस्थानानों जाहिरा-
तीच्या सबेथांत फार कडक नियम केल आहेत. फ्रान्स,
वेंल्जम, इटली,. स्मित्झईंऽडमधील कांह’व् प्रांत व युनैटेडा
स्टॅट्नमघील कांहीं सस्थानाना सावेंजनिक जागॉ जाहिरात
कायदा आहे. जाहिरातीचा आकार, वगैरे वावळो व्र॰
विण्यावा म्युन्सिसैपाळिट्रषांना अधिकार आहे. अ’लोल अगर
लावण्यास कर वसप्‘बेंला आहे.
जा हि रा न न स्था.…जाहिरात[चा अतिशय व्याप
आक्षेपाहँ जाहिराती लावृं न देण्याचा पोलातीना पूणे वाढल्यामुळे व व्यापाऱ्यांना तर जाहिराती उत्तम रँप्तीने’
इक आहे. श[[मव॰त स्थानाच्या सौंदयाचा न[श होत
तयार करती येत नसल्यामुळे या कामासाठी स्वतंत्र सस्था
उदयास आल्या आहेत. ट्टेग्लडमघ्ये व अमेरिकेम’टॅये तर या
असल तर तेथे जाहिराती लावण्यात येऊ' नये अशा प्रका'
सस्या इजारान‘व् मोजण्याइतवया स्थापन झाल्या आहेत.
रचीं चळवळ करण्यासठीं १९० १ साला एक सस्था स्थापन
झाला आहे.
या सस्यांत जाहिरा ',”[ उत्कृष्ट रँ[ती॰न्`॰[ जाहिरातदाराना तयार
जमेंर्मं[ऱ्…रंपाँ[रेयल कमशिअल आँर्डि’नन्सच्या जुन्या , करून देण्यात येतात. यासाठी उत्कृष्ट लेखक व चित्रकार
कायद्यान्वये, सार्वजनिक जागी जाहिरात देण्याला पळोलोस- या सस्थांनळो गुंतर्विललै आहेत.
जा हि रा ती वै का य दे व ती दे.…जाहिरातीमुर्के
परवानगी लागते. ज[हिरातीसठीं मुद्दाम खांव वगैरे पुरण्यांत
सळोटयांपॅक्षां फायदे अधिक होतात हे निऱ्सशय आहे. कांहीं
आल आहेत; व त्याच विवक्षित ठिकाणी जाहिराती निकट,
विल्या पाहिजेत. स्वत:च्या मालाच्या अगर इतर वाबाँसबं- निद्वानानळो यास'वपांत एक आक्षेप उपस्थित केला आहे;
व ती म्हणजे पैशाचा व्यय होय. या विद्वानाचें म्हणणे अर्ते
यांत परवाल्यांना जाहिराती निकठवण्याचा अधिकार आहे.
सावैजनिक वाहनाच्यावर जाहिराती चिकडनिण्याला पूणे आहे का एखादे"! नषी वस्तू अगर एखादा नवान शोध
लागला तर ती लोकांना कळळावा यासाठी जाहिरात देण्यास
वंइळी आहे. सट्टेदेर्यविनाशक जाहिरातीनाहि मनाहै आहे.
बाँहिटूयप्-जमँनींप्रमाणेच आँद्दिटूयांता’हे जाहिरातीसबं- हरकत न[हो पण प्रत्येक जुन्या पुराण्या वस्तूंचीहि जाहिरात
धावै कायदे आहेत. हेगेरीमघ्ये यासवंयांत कोणत्याहि देणे अर्थंशप्स्त्रट्ष्टथा हानिकारक आहे. याचे कारण जाहिरा’
प्रकारचा कायदा करण्यात आला नबून जाहिरातीसवंघांतील
तीवर जाहिरातदार नो पैसा खच करती त्या मानार्ने तो त्या
सर्व अधिकार म्युनिसिपालिटयांना
आहेत.
वस्तूची किंमत वाढा’वेंती व त्यामुळे ज[हिरातदारावै नुकसान
इटली:-॰-हे`गरळीप्रमाणेंच इटळीमघ्वॅहि जाहिराती कोणत्या
स्यळळो लावाव्यात इत्यादि'सचथावे नियम ठरविण्याचा म्युनिनिपाळिलटयांना अधिकार देण्यात आला आहे.
न होतां ज[द्दिरातीचा खर्च वास्तविक गिऱ्हाइकावर पडती;
पण हें प्इणणे खरे नाही. कारण ज्या मानाने एखाद्या
देण्यात आले
स्मित्झर्लेड:…स्नित्झर्डेडमघील सर्वे प्रांतांना एकाच प्रका-
वस्तूची जाहिरात व ग[ज[वजा
त्या वस्तूचा खप अधिक
आघेक होईल त्या मानार्ने
होती व मालाचा खप अधिक
रचे जाहिरातीचे नियम लादूंप् न[इळीत निरनिराळ्या कँट’
न्सना आपापल नियम ठरविले आहेत. द्द्यूरिचमघ्ये जाहिरात देण्याची स्थळे ठरविण्याचा पोलिसांना अधिकार देण्यांत
होत गेल्यास तों माल अधिक स्वस्त दरनि देणे व्यापाऱ्याला
आहे.
कमी दजळीचा माल केवळ भपकेदार जाहिरातीच्या योगार्वे
परवडतें. त[त्५ये वरळील आक्षेप खरा नाही.
ट्टसरा आक्षेप
असा आहे क’॰[ या जाहिरातीच्या योगप्नॅ कमी प्रतीचा
आला आहे. वर्मंमघ्ये ती अधिकार म्युनिसिपळिटोचा आहे. ढं’ मालहि खपला जाती व त्यामुळे अश[ प्रकारच्या कमी
ल्युसँनमघ्ये खोडया वणेनाच्या अगर हलक्या मालाच्या डे द्ज’प्च्या मालाला अधिक उत्तेजन मिळतें. पण हेंद्दि म्इणर्णे
जाहिराती जाहीर ठिकाण? लावण्याची बँदळो करण्यात आला
खोटे आहे. कारण या व्यापारी चढाओढोच्या काळांत
स्थानसटे'दयेहानिकारक जाहिरार्तांना बैदळी करण्यात<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७८
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जाहिरात महाराट्रॅयिक्कां.(ज)२५५ क'ळाहाँ काळ खपला तरळो तेवढी अस्सल व उंचीं मालार्चाव सरशी होते व कमी द्‘नळीचा माल बाजारात खपेनासा होती. मालावीं जाहिरात देतांना देखील सत्याचाच अव..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जाहिरात
महाराट्रॅयिक्कां.(ज)२५५
क'ळाहाँ काळ खपला तरळो तेवढी अस्सल व उंचीं मालार्चाव
सरशी होते व कमी द्‘नळीचा माल बाजारात खपेनासा होती.
मालावीं जाहिरात देतांना देखील सत्याचाच अव-
लव
करणें
फायदेशीर व आवश्यक
अलळाकर्डे अनुमवास येत चालले आहे,
आहे असें
जाहिरातीचे
फायदे सांगण्याची विशप आवश्यकता न[टॅऱ.
कारण जाहि-
रातीचे फायदे पुष्कळच आहेत
व ते सवकुंनठें विदितच
असतात. ज[हिरातीर्ने नवव्न मालाची माहिती होते. कोणता
माल कोणत्या ठिकाणी मिळतो
तें कळत,
वस्तूचा खप
अधिक होऊं लागतो, राष्ट्रळोय व्यापारावळो प्रगति होते; मनुष्याच्या गरजा वाढतात व त्यामुळे जागतिक सुथाररैमस मद्त
होते, जाहिरातीचा शैक्षणिक दृष्टयाहि कार फायदा आहे.
हिट्टत्थानऱ्-या विधेत हिद्रुल्थान हा अद्यापि इतर
राट्रांच्या फार मागें आहे. पण
ही
स्थिति
हुघारण्यासाठो
हिद्रुस्यानर्ते नेटाचा प्रयत्न केला पाहिजे. जागतिक व्याप[र“[
चताआडोंत हिंदुस्थान टिकावयाचा असेल तर ती पाश्चा'
ह्यांच्या निरनिराळ्या कला साध्य कलन घेण्यानॅच टिकेल हें
निर्विवाद आहे. हिदु'त्यानांत
काहीं
काहीं वस्तू पाश्चा'
त्यांच्या वस्तूंझ्तवया उत्कृष्ट तयार होतात. पण त्या वस्तूंचळी
जाहिरात दिला व मेल्यानॅ लळोकानां त्या वत्तू करैठें
तयार हातात व काठ [मेंळतात हें समजतच न[हृळो. व त्यामुळे
परदेशी माल घेण्याकर्डे लोकांची प्रत्रुत्ति जाते. मुर्दिळाद्प्याद्
येथें तयार होणाऱ्या रेशमी इप्तरुमालासवेयाचौ
गोष्ट या
दृर्टानें मननळोय आहे.
ड्रेग्लङमघक्ति एका छु…[हूंत्यानें
इंग्लडा
क्षांळेला ह्यतद्माल
तयार
मुर्शिदाबाद येथे
मयळोल एका कंपनळीतून विकत घेऊन वगालमघील एका
आ‘चेंफारीं मिन्नाकडें पाठवला व तशी प्रकारचे आणखी
काही हातव्मळाल पाठवून देण्यास'बँथार्ते त्याला लिहिले.
या आघेकाऱ्यार्में हा हातरुमाल कोठें होती यासबंर्थीचळो खूप
चौकशी
हातल्माल
केला. पण
त्याला पत्ता
लागेंया;
ज्ञेवर्टी हे
कोठें तयार होतात यासबेपींचळी माहिती इंग्’लङ-
मघ्में ज्या कॅपनोंतून ड्ग्'ळे’डंमर्धांल गुइत्थनि हा द्दातल्माल
घतला हाती त्या कपनोला विचारण्यास त्याने आपल्या
इंग्लंडमधील मित्राला लिहिर्के. त्यार्ने चौकशी कख्न हे इ[त॰
ख्याल मुर्शिदाबाद य`र्थे तयार होतात अस॰ त्या कपनोहें कळ
निळें. आश्चर्ये हे कळी हा मुर्शिदाबाद प्रांतावरचाच आ’धेकारा
होता व असें अलूनहि याला मुर्शिदाबाद यंथॅ हातत्ठ्ठमाल
होतात ही कल्पनाहि नव्हती. याचे कारण या मुर्शिदाबादमथोल कॅपयार्ते स्वत:च्या
मालाची
जाहिरात
मोठमोठ्या
वतैमानपत्रांढून कपाँव दिलळी नव्हती. त[त्पथे हिद्रुरयानळि
तळि प्रत्येक व्यापाऱ्याहेंना आपापल्या मालाची लळोकानां जाहिरातीच्या द्वाण्रॅ माहिती करून देणे आवश्यक
आहे.
जाहि`
रातीत देते घालर्णे म्हणते व्यापांरांत भांडवल घालण्यासार‘
खेचआहे. त्याचा एकदम
जरळो कायदा दृष्टांत पडला नाही
तरळी त्याचा अखेरांस कायदा झाल्याशिवाय रहात
३३
नाहीं
जिगणीं
जाहिरल्लाच्या योगानें व्यापारार्चे क्षेत्र विस्तृत होते. मालाचा
सर्वेच्च वोढ्याला होण्याला जाहिराताशिवाय आजकाल दुसरे
काणतीहे सुलभ सायन न[हा ही गोष्ट आपल्या
व्यापाराची
उन्नति व्हावळो अशी इच्छा चाळगणाऱ्या प्रत्येक हिद्ळो ड्समार्ते
लक्षांत ठेवली पाहिजे.
इतर
देशांत
जाहिरातीसवयार्ते
बे नियम
करण्यात
आलें आहेत तशळा प्रकारचे नियमाहे हिदृल्थानांत झक्लि
आढळत न[हौत. स्थानिक म्युनिसिपालिटयांती त्या चावतळोत
कारसँ लक्ष
[ठेंकाणीं
घातलेले
जाहिराती
[”द्सत
न[हाँ
त्यामुळे वाटेल
त्या
चिटं-कबिंण्यात येतात. कळिचतु अशोक
जाहिरातीप्हे न्विकटोंलल्या आढळतात. तर म्युफीसेपांळि'
टथांनीं यासवेघीचा नियम करणें अत्यंत जसर आहे.
[ सद्र्मंग्रंथ:…ट्टे.एतूं.होंल-थेंडव्इर्टीयझिंग अँल्ड प्रोप्रेस:
डिळ स्कोंट-दिं थोयरळो अ’न्ड प्रौवेंठस ऑफ अडव्इटॉयझिग;
ड्रुमन ए डेवीज-प्रावठकल
याव्लासटी; प्रो. हेस…प्रांङविं’टव्हे
अङव्हृटोंयझिंग; त[वर-[वझिंनस आमा’नड्रेय्शन; आस्पोनहँङवुक आफ अडव्हृटीयझिग; माईंळामन-[चाझ्निस अन्ड
ट्रेड; केतकर-सकळीणें लेख. ]
जिऊ गझला-शिवाजी व अकज्ञल याच्या भेटीच्या
प्रसगांत ळिजऊ मद्दाला हा ळिशवाजाचा अंगरक्षक अलून
खानाच्या मृत्यूनतर त्याचा सरदार सय्यद वट्रां हा शिवाजीवर चाल कस्वन आला, तेव्हां
निऊचा
यार्तेच तदा यास
ठार केलें". निऊचा द्दामहावकेश्वराज्ञवळील ( सातारा बिल्ह्यां'
तील ) र्कोढवळें येथोल रद्दिवासळो. हा गांव वाईमद्दावळे’
श्वरच्या जुन्या वाटेवर बेळेगनना’क आहे. तेथें [‘जऊचावे
वंशज आहेत. त्याचे आडनांव सकपाळ प्तिऊवाचा मुलगा
यास ( वेड्या ) शिवछत्रपतीनें जॉरखोऱ्य'ळात
सीताराम
३1४ गांवा इनाम दिठें. महालप् म्हणजे; ऱ्’.[वी
[’जऊया हा
ज[तीर्ने न्हावा हाती. ‘ होंताजिवाम्इपूग्ज वाचला [शवा’अशी
एक म्हृण अफजलप्रकरणांतील वर सांगितलेल्या प्रसंगावस्वन
पडली होती. हुक्रुमाचळी अमर्यांद्प् स्कियामुळें शिवाजार्ने
पुढे' जिऊवास कामावसन दूर करून देहांत [”शक्षा दिल्याची
हेकळीकत एका वखरळोत आढळते. जिऊयाचे वंशज आज
२५०वपवपंन्द्दावळीपणाचा यदा करीत न[हात. [ शिवदिप्ग्य’
जय,: या. ३. से. मंडळ-पेचमतमँलनवुत्त. ]
जिगणीं-म’ऱ्यहिदुल्यान, बुंदेलखङ एज्ञन्तीतील एक छोटे
सनद्ळी सरयान. क्षेत्रफळ २२ चौरस मेल. उत्तर अक्षांश २५
४५' व पूर्वे रॅखट्टेश ७९ ° २५” यावर असून लोकसख्या
(१९० १) १७॰॰ आहे. येथील जद्दप्गांरदार बुंदेला रजपूत
असुन, छत्रसाल राजाचा पुत्र राव
गिराचा सस्थापक होय. पूवा हा
होती. परंतु मराठ्यांच्या रवघ्ऱ्या व
कमी झाला आहे. हिचे उत्पन्न
दळोत ळिजगणंण् हें मुख्य गांव आहे'
पवमासग हा या
जहृप्गार बराच
इतर कारणामुळ्
१३०॰॰ रुपये
ज्ञहा‘
म’ठळी
बरीच
आहे.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/७९
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जिजाबाई ळिज्ञज्ञायप्ईंश्रा[ठ[ साम्राज्याचा सस्यापक जळो शिवाची [ ता. ६ त्याची हा आहँ. निजामशांहोतील सरदार शिंद्खेडचा रहाणारा छुखजो जाधव याची [`जजावाहै हो मुलगी. हिच्या आट्रॅर्वे..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जिजाबाई
ळिज्ञज्ञायप्ईंश्रा[ठ[ साम्राज्याचा सस्यापक जळो शिवाची [ ता. ६
त्याची हा आहँ. निजामशांहोतील सरदार शिंद्खेडचा
रहाणारा छुखजो जाधव याची [`जजावाहै हो मुलगी. हिच्या
आट्रॅर्वे नांव म्हाळसावाहें. ळिजजावाद्देचा जन्म स. १५९५ त
झाला.
जिजाबाई
मद्द्यराट्रॅप्य ष्ठानफॉंरा. (ज)२५६
हो चार वर्षांची असता ( १५९९ ), न्तिमग्याच्या
सर्णात रंगपचमळोच्या दरबारात
मालोजी
भोसले
बैखुळकर
९
"
,.
प्रेष लावून हे लग्न घहें त्रून आणळें( १६०४ ) पुढें शहाजी
हा निजामशप्हेळोचा सवग्रॅधिकारा आल्यावर त्यार्वे व जाधव'ळाचे
न[कर्डे आलें.
माहुलीनि’क्कयावखन
शहाजी
[’वेजापुराकडे
परतजात असती दिवस भरत आल्यामुळे चिजाचाद्देस
शिवनेरळो यथ शहाजळीमें ठेंविल; [शवनेर त्याच्या ताब्यात
दिवशी
"
निजाचादे हो माती, निश्चयो, थाडसळो व स्वतत्रवूत्तांची
होती. शहाजाच्या सत्ठ्यावव्न ती शिवातीस लहानपणापासून घेऊनपुणेंयेर्थे राहिली. [`त`नें शिवाचीस राजास
अवरेयक
असें सत्रे प्रकारचें शिक्षण दिंर्के.
( हा ठुखतीच्या पद्रॉ नोकर होता ) याचा पुत्र शहाज्ञळी व ऱ्रामावणादि पुराणांतांल
हा यांचा ज`[ड[ पाहून थट्टेर्ने ळुखजानें त्याचे लग्न लावावे
अस म्हृठर्ले. तेंच खरे घह्मन मालीजळोर्ने जिजाला मागणी
यातली; परंतु ळुखजळोर्ते म्हाळसावक्रुइच्या सांगण्यावरून तें
नाकाप्रँळें तेव्हा मालव्जळोन ळिनजामशहाकडून ळुखजळोस
लूयेंप्रहृणाच्या
जानेवारी १६६५ रॉजॉ
[जजावाइचा तुला झाला हाती.
"
कथा
व
महाभारत,
आपल्या
पूवेंबांच्या
शीयरँच्या गोष्टी सांगून, ततेंच मोंसल्यांच्या क्रुळांत शककतौ
निमौण होऊन ती [हेदूहेंर्वे स्वतंत्र राज्य स्थापन करणार
आहे असा देवीचा वर मालरेजळीस मिंळांल्याचांहि गोष्ट सांगून
तिचे वालशिवाजाच्या मनांत राज्यासरथापकावे गुण व
शककती ती मीच हो भावना निर्माण केली. कयापुराणे,
साघुसतीर्ची दशर्ने वगैरे यामिक गळोष्टीकर्डेब्‘हेनिइळा त्यार्चे चित्त
लानिर्के होते.
यत असे.
ती स्वत; शूर अतून, तिला त्मि‘हेती वाचता
तिने स्वत:च्या अखत्यारीत
पुष्कळ कारभार
टाकले होते. शहाजी कर्नोठकनि असती व शिवाजी लहान
असतां, पुण्याकडळोल जहागिरळोचा सर्व कारभार ती जातीने
होती.
नवऱ्यार्वे व यामार्वे नांकर्डे आल्यामुळे [जजावाइ
पहात असे; तिचे न्यायनिवाडेहि दे`ल होते. शिवाजी मोठा
सदोदित शहाबीवररेंवरच (त्वन्यर्मशकाऱ्याताइ) अस.
आल्यावरहि मोंठमौठया मसलतीत ( ठ. शहाजीची कैद )
तिला शिवाजींच्या पर्वी
ळू तीन चार मठें
.. आली इ `[र्तीऱ्॰ परेलुं७ तो ऱ् व महृत्त्वाच्या घडामाडों
` त ता` "[तची सल्लामप्तलत घल
` अस॰`
अल्पवयळीहोऊन वारली. नंतर सम्राज्ञी हा पुत्र झाला
समाजहुथारणेच्या वावतीतहि [’तर्ने त्या काळी अघाडों
( १६२३ ). त्याचे लग्न शिवनेरळोच्या ["कक्केदाराव्या मुलीशी
झाले (१६३०). या सुमारास जिजाबाई हो ळुखजळोच्या हाती
लागली होती. परंतु तिचे शिद्रेवडास ज[ण्यार्वे न[कारल्या॰
वतन त्याने शिवनेरासच तिला ठेंनिर्के. समाजाच्या लयाच्या
प्रसगॉच शिवाजींचा जन्म[ मिती शके १७५१ फाल्गुन वद्य ३
स (१९ फेवुवारळी स. १६ ३० जुनी पद्घात) झाला. या साली
शहाजीचे
तुकावाईं
इच्याशा
लग्न
लानिल
होते
पुढे
जिजावाइस [तचा वुलता जगदेव यान आपल्या परा नेले.
मध्यंतरी र्मोगलांनों शहाजळीचा अपमान करण्याकरिंती तिला
शिवाजीसइ पकडल होते( १६३३ ). परंतु जगदेवाच्य
स॰[गण्यावव्न त्यांनी तिला मुक्त केल .तेव्हा शहाजार्नेप् तिलभ्प्
पुणतांव्यानचीक विजापूर येथ सुरक्षित नेऊन टॅ[वल(१६ ३४),
निजामशाही नष्ट झाल्यावर स्वतंत्र राज्य रयापण्याचा
शहाणीचा निचार होता व त्यास अनुसरून त्याने अनेक
उलाढाल्याकल्या.
त्याव ळुखजाच्जा बहुतेक डलाढ्यल्या
बिजावाईंच्या
शिक्षण
तिला
डळोळ्याखाछून
गेल्या होत्या. राजकारणाचे
शहाजींकडू‘न
प्राप्त
झालें
शहाजाला अनेक कारणांमुळे रवतेत्र राज्य रयापिती
होते.
आर्ले
न[हा. तेव्हा ळिशवाजाकडुन ल्थापवार्वे असे ठरवून शहाजार्ने
त[ कामगिरा निजावाईंच्या हातून ( आपल्या अ'त: रथ मद्-
मारली
होती. फलठणचा वजाजौ निंबाळकर हा
मुक्षुलमान
आल्यानंतर जिजावाद्देर्ते समरत मराठामँडळ मिळवून, त्याला
द्रुळाद्ध करवून
त्याच्या
मुलास ( महादजी ) आपली
नात
(शिवाज्ञीची मुलगी सखुवाट्रॅ ) दिली ( १६५७ ).
पुढें
ळिशवाज्ञळोशी तह करण्याकरिता [वैजापूर वरवारर्ने शहाजींस
पाठविले. त्यार्वेळी या पनिपत्नॉची ( जवळ जवळ १५|२०
वर्षांची ) भेट झाली. आपण मनांत परठेला त्वरा‘य’
स्थापनेची हेतु, जिजावाईंर्ने शिवाजळोकडून पार प|डनिल्यार्वे
पाडून शहाजळोला फार समाथान व[ठर्के( १६६२ ). सहा
महिने शहाजी इकर्डे राहून नंतर परत गेला. पुढें थोडयाच
दिवसात शहाजी वारल्यामुळें( १६६४ ), निजावाद्दे सती
ज[त असती तिला ळिशवातीर्ने मोठया आप्नहार्ते राहृचिलैं.
अकझलच्या युट्रांत (कदानितूं अनिष्ट पडल्यास) राज्याचा
वेदोवत्त कसा
करावयाचा,
याची
सलयार्मे शिवाजळोर्ने केली होती
निरवानिरव
अफझल
[’हेच्याच
मेल्यावर या
एकंदर प्रसंगळावर जिंजावाइचे अज्ञानदास (पहा) शळाम्ह्रराकडून
एक प`[वाड[ रनविंला. ळिशवाजानप्त च्या तचातासठीं (देवता
चन, दानधर्म वगैरेर्चे) एक रवत’न रवात( "खाण, चिटणीस,
फडणीस, षोतनीस, पुराणिक ) च `ठनिळें होतें. प्रजेंचा
परामश ळिशवाजापेंक्षांद्दि ती जास्त घेईं.
सइ’वाहै वारल्यामुळें
तीच्या जारावर) करनिण्याच ठरावेलैं न त[[तर्ने पार पाडली
लहानग्या समाजाची काळजी सर्व प्रकारे जिजावाईंच करळो.
अर्से कैं. न[षुदेवशखी खरे वगैरे इत्तिहासज्ञांचे मत
पुढें मनांत वाळगळेंला शवटचा द्देतुस्शिवाजाचे राज्यारळोइण)
ज्येष्ठ शुद्ध त्रयोदशी शकै १५९६ रोजी वाढून, अकरा
आहे.
ग[ग।मट्ट[नें तिला शिवराजप्नशस्वीत जनजीवनदप्नद्देतु व
सकलारिनिवाशिनी हृळो विशषन्ग् लानिली होती. महावळेश्वसृस ×, [दुवसांनळो ज्येष्ठ वद्य नवमळीस युववरॉ दौनप्रद्दरॉ रायगडच्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८०
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जिंजी महाराप्लॅंग्यशानकोशळेंज्यांऱ्त्‘भ्ऽ जिजाबाई ख[ल’[ पाचाड येथे राजमाता जिजाबाई ळिदवगत झाली ( ता. १७ हून १६७४ ). तिच्या न'ळावाची जिजप्पूर म्हणुन वळो नेइर्मा देत असे. “ वळळो दे..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जिंजी
महाराप्लॅंग्यशानकोशळेंज्यांऱ्त्‘भ्ऽ
जिजाबाई
ख[ल’[ पाचाड येथे राजमाता जिजाबाई ळिदवगत झाली
( ता. १७ हून १६७४ ). तिच्या न'ळावाची जिजप्पूर म्हणुन
वळो नेइर्मा देत असे. “ वळळो देण्यासायाँ नव“[ नव? माणसँ
मिळायैण्याकरिंनां ळिजजायाईं रात्रो नेहमी पन्हाळ्याच्या आस-
एक पेठ पुणें शहरापासून जवळ असलेल्या प[प[ण न[वाच्या
गांवाजवळ वसलेली होती, तेर्यांल महादेवाच्या देवळाचा
प[स हेरांच्या टोळ्या रवाना करा आणि गडाच्या आंतील
एका गडींत एका ठिकाणी वळळो देत. ” हो स. १७७२ त मरण
ज[र्णोद्वार तिनृत्र केला होती. [शिवदिळिग्वजग्रूसप्तप्रकरणात्मक
पावला. [ इचलकरेजाचा इतिहास; डफ; मराठी रियातत
चा‘रेन; मराठी रिंसायत, पु. १; वुसातमेसळातीन तजावरचा
या. २;म`[डककॄत कोल्हापुर ग्याझोटेयर; म. इ. सा. खेड ८.]
[ळुजा‘ऱ्र्मंराम …आसाम प्रांतीत गळोलपांरा जिंल्ह्यांत उगम
श्चिलल्फिड्रुट्टेभा, ड्. ते. मे. चतुर्थंसँर्मंलनट्टत्त. ]
जिजाबाई
( थाकठळो )…हो
कॉंल्हापुरकर
पहिल्या
पावून या निल्ह्यम्च्या दक्षिण भागांत सुमारे १ : ०यैल वहात
समातीची बायको व त[रावाहैंची सून. या सासवामुनांर्वे कार
न[कढें होते. हिचा व इचलकरजाकर अनवाईंचा वटुणानुव'घ
अस. वारणातीरॉ झालेल्या लढाइत श्रानिवासराव प्र[तनि न[र्ने
समाजाचे सव कुटुंब केद केले होते, त्यात हा होती पुढें
[हेला व हिच्या सवतीनां पन्हाळ्यास षीहोचा’वेंण्यात आले.
हो वादे फार हुशार व राजकारणी होती. समाजळी वहुघां
गेल्यावर वह्मपुत्रा नद’[स मिळते. हिच्या तीरावर लास्वीपुर,
’हेच्याव सल्यार्ने वागे. [हेर्में मगवतराव अमात्यास लिहिलेली
राजकारणविपयपर वरॉच वर्षे प्रसिद्ध आहेत.
हो स्वयावार्ने
कूर असून कडक शिक्षाकरणारळी, फार पोरर्ण[,स्वकायैस[वनांत
मागहैंच्या ऱ्ययान्यायाकडे न पहाणारा, सशया अशी होती.
कळोल्हापुरर्वे राज्य स्थापण्यार्ये क्रेचसँ श्रेय तिला आहेशळाढूच्या
वेळी व पुढें थोरल्या माघवरावाच्या वेळी कोल्हापुरराज्याचा
दक्षिण
सालमारा
आणि
सिगांमारळो
हो
गांटेंव' आहेत.
उन्हाळयात होडया सिगळोमारळोपर्धेत येऊ शकतात.
[अती-हा [केला मद्रास इलाख्यात मद्र्प्सच्या मैंत्र्द्रेत्येंस
४० कळोसांवर दक्षिण अकरेंठ प्रांतीत आहे. हलाँर्ये [बेबी
खेंर्डे
॰ वस्तीचे आहे. [केला राजगिरॉ, कुष्गगिरळी वचैद०
रायद्रुट्टेळा अशा तीन र्टेकढ्या मिळुन वनवला आहे.
त्यात
राजगिरळी ॰टंकडळी मुख्य व उंच आहे.निन्हो बाजळू'नों सरळ उंच
कडे आहेत व उतरेकडूक्त एक लहानशोवाठ आहे.
मानता तिहेरळो मजबूत तठ अशून वर
किंल्लया-
जाण्याचा वाट
मजा
चू'त व अरुंद केला आहे. सतराव्या शतकातील लढाईच्या
पद्वतीनॅ व सामुग्नळोर्ते दहा माणर्ते दहा हूंजार जण[न[ राखून
ववावहि त्याचमुळे आला. तारावाहैंप्रमाण हा हट्टा नमन प्रसगों
घरतील अशी भक्कम व्यवस्था येथे दिसुन येते.
तडजाड कलन कार्ये साघणारा
केव्हा व कोणी न[‘वला हे समजत न[हळी. पण ती एकंद्रळीत
[वैजयानगरच्या राजाच्या हाती होता यात सशय नाही. या
तीन र्टेकड्यांर्मोवती त्य[न[ एकमेकानां जळोट्टन तटबंदी केलेली
हाती.इ . स. १७३०
च्या
सुमारास तिनें व राजम’डळांचे न[कर्डे आले होते. हा ड्रुळुमौ
होती.
एकदा तर हिने करवळोरच्या शकराचाग्रीच्या
मठाच्या जार्गेतच स्मशीनाच्या मिती यातल्या. त्याबद्दल
आचार्योती थेठ पुण्यास पेशव्यांकडे फिर्यांदळो केल्या; पेंश’
व्यानीं तिला याबद्दल सांगितले. पण तिनॅ आपला हेका
तडीस नेला. ती थोडीशी वह्मट्टेष्टीहि होती. हिचे नानासाहेब
पेशवे यांच्याकदून कळोल्हापुरर्वे राज्य राखाँन अर्ते वचन
घेतव्ट्ट होते. या वचनापुळेंच पुढें राववाजाच्या कारकीर्दीत
काल्हापुरकरानळी
पेशव्यांच्या राज्यात अतिशय
धुमाकूळ
घातला असतां, व कॉंल्हापुरर्ये राज्य नामशेष करण्यावें
सामर्थ्य परशुराममाऊसारख्या सेंनव्पतीच्या अगों असतीहि
हें राज्य खालसा करण्याचे पेशव्यांच्या मनांत आले न[हो.
न[वासाहेव पेशव्यानळो या वाईंला पुण्यास आणून तिचा मान,
सन्मान कला हाता. [हव माहर त[रगलकर [’रंदि पराण्यटुं"
तील होते. [’हेच्याच र्मातीर्में रामराजास पळानगांवळो गुप्तपणे
ठेवण्यात आढें होते. त्याला ठार मारण्यासाठी तिने एकदां
चावडयावर स्वासोहें केली. समाजळी निष्ठात्रेक मेल्यावर हिचे
शिवाजी न[वाचा पुत्र दत्तक घेउभ्न राज्यकारभार आपल्या
हाती घेतला. प्रथम पेशव्यांनां या दत्तकास
हरकत
घेतली
हा [केला
आहे. चाहेतन दगडांचा तठ व आतून [बेटांचा तठ व मध्ये
पहारेकरी
वगैरे'साठो जागा,
अशी
त्याची रचना आहे.
[केक्कयात ळिकत्मेंक सुंदर इमारतीचे अवशेष आहेत.त्यांत दोन
देवळे, कल्याणमहाल व क`.'ठ[॰र" वगैरे पहाण्यासप्रखाँ आहेत.
कल्याणमहालाच्या मधल्या चौकात आठ मजली मनोऱ्यासारखी एक इमारत आहे. याशिवाय स्नान’वै चफैर’ग, तोफा,
व केद्यांवळो विहळोर वगैरे पहाण्यासारखी आहेत. चझिलीद्रुर्गे
ज[व[ची चवर्था टेकडी आहे पण ती वरील तीहोशी जळोडलेली नाहीं.
त[मिंल लीका'त [जजळोवर एक पोवाडा आहे. ती तिकडे
फारच लोकप्रिय आहे. येथे दे’ळिशग राजा होता. तों स्वतंत्र
वाण्याचाव करारळो अहे. त्याने कळोणालाद्दि खडणी वगैरे [देली
न[हळो. ती ख॰द्[ पाँडॅस्वार होता. त्यामुळे भौर’गझेंवाला त्याचा
अभिमान वाटे. कनौठकच्या नवाचाला हे सहन न होऊन
त्यार्वे स्वारी केली. फांहळो देनघठनऱ्प्‘ देळिशग राजाचा पराभव
झाला व त्याची राणी सती गेली वगैरे कथा या पोवाडघांत
आहे. ‘1५६६ सालापयत येथ [हदू सत[ होती त्या स[ल‘[
होती. हिच्याव कारकार्दीत इंप्रजाती मालवणचा किल्ला
त[लीकळोठप्चा प्रसिद्ध लढाट्टे होऊन जिजळो पुपुलमानांन् या
घेऊन ककुल्ह’[पुर दरयाराशी तह केला मालवण मेल्यावद्दल ‘ त्नाव्यांत गेली. स. १६४९ व शहातीर्ने हा [केला सर केला.
कनोठकच्या मळोहिमैंत आदिलशहाच्या त[व्यद्देवून शिवातिला कार वाईंठ नाटके व तिन ती परत घेण्यावद्दल सकाचे
हुकूम सव्डठे. हा पन्हाळ्याच्या देवाला [जवत म[गस[च॰_ . जीर्ते हाकावाजकेलावत्याच[वदोवस्तकेला(मे१६७७)वते॰यै<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रोयज्ञानकोंशभ्(ज)२५८ किं जी ळिहु [जद् हुमा स्थापून रघुनाथपेत हणमत्यास तेथील सुभेदारी दिली । सन, पु १; वेरिंग‘बुंदला; निक्कस-म्हैलूर भा. (. स. म. आणि सात लाख होनांचा जिंचीचात..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रोयज्ञानकोंशभ्(ज)२५८
किं जी
ळिहु
[जद्
हुमा स्थापून रघुनाथपेत हणमत्यास तेथील सुभेदारी दिली । सन, पु १; वेरिंग‘बुंदला; निक्कस-म्हैलूर भा. (. स. म.
आणि सात लाख होनांचा जिंचीचातुंभाव्यफोजळोस दूघभातास [ चतुर्थसमेंलतवूत्त; इंपे, गॅझे. पु. १२ ].
जहागीर दिलापुढें सभाजळोर्ते रघुनाथषंतास काढून शप्मजी पुंद्दे [
जिंठुळीया-‘जितुलॉया हा उत्तर आफ्रिकेतील प्राचीन
नंतर
[ जिल्हा असून र`[मन ग्रंथकार ह्यांत माऊंट आरास व अँठ-
राजाराम महाराट्रांढून निघून येथे अ[ल्यावर,(१६८९नववर)
७ वर्षे औंरंगझेवार्ने [कक्कयास वेडा देवविला. परंतु राजाराम
लास यावर रहाणारे लोक व साहारा मैदानाच्या उत्तर भागां-
व हरजा महाडळोक यास सुमंदारळो दिला ( १६८१),
तील अळोलाव्याची जामा यांचा समावेश करतात. हे ल`[क
त्याच्या हाती लागला न[हो. घेढ्यार्वे काम झुन्हैफकरखानाकडे [ तीत्रो नद्रुहूंन वबेर वशांतील असावे. येथे रहाणारे त[प्रतवे
होत; त्याने सन १६९० च्या आगष्टांत वेढ्यात प्र[र॰म बेला. ’ लोक त्याच वशांतव्ल अलून ते अद्यापि म्रश्यावृत्तीच आहेत.
इतके दिवस किल्ला पडला नाहो यावरून त्याची हूंळचीच यू घोडे पाळण्यावइल त्याची प्रतिद्धि होती. ते कातडी अमावर
बळकटी,
आतील
( घेत असत व मांस व ढूघ घेत असत.
पिवळा रंग कर॰
साधून हा [कला [ ण्यावद्दल या ल`[क[ची कार ग्ऱ्ऱ्याति होती.
या निल्ह्यांतील
युद्वतापुप्रांची व घनधान्याची
वगैरे गोष्ठी लक्ष्यात येतात.
अनेक ड[गर
निपुलता
बांधलेला आहे. त्यावेंकॉ दोन तर फारच 'उच आहेत.
एक [ लोकांचा प्रथम उल्लेख जुगुर्थांइन युद्वति येती. ख्रि. पू. २".
एक मॉगलसरदारार्ने एक एक ड[गर वाटून घेतला. तुरुंग । त अव्गस्ठसचे मॉरेटँनियाच्या राज्यावरोवर [जतुलग्याचा
लवणें व तोफा चढावेणे इत्याण्दे सत्रे उपाय त्यानी केले, [काहीं भाग दुसऱ्या जुवाला दिला होती. जिंतुलळीयन
परंतु उपयाग झाला नाही. शिवाय आचूच्चाड्रुचे सरदार व ट् लळोकानां वेड कलन रोमन लळोकाचळो कत्तल केली. ६ व्या
मनाची सताची हे गैनापती वारंवार त्यांच्यावर तुटून पडत;
शतकात त्याचाकळोससर्ने पराभव केल्यामुळे ते राजाला
त्यानां छुटोत व रसद ळिमकुं देत नसत व औंर’गझेंवास शरण आले. इ.स. ४० त मोंरेटॅनिया हा रोमन प्र[त झाल्या`
जिचीची वातमांहि कबूंप् देत नसत ( डिसें. १६९१ ). राजा-
वर रोमन गव्हनैर [जतुलियांत स्वारी करीत असत. नाय-
रामास तयाची ( कोल्हापूर घराण्याचा सस्थापक ) नावाचा
गर व इधिओपियाच्या सरह्रद्दापर्धेतचा सत्रे बितुलीया रोमन
मुलगा येथेच झाला
साम्राज्यात
( १६९३ ).
हा मराठ्यांना मिळेल म्हणून
शहाजादा
कामवक्ष
समजत.
येथील
लोक
सैन्यात
दाखल होत
झुल्फिकरनॅ त्यास केद केले. [| असत. या प्रदेशावर रोमन सत्ता असली तरी रोमन संस्कृ-
[
त्याच वेळीं सतीचीर्ने झुप्तिककरचा पराभव केला. तेव्हा त्याने तीचा यावर फांहोच परिणाम झाला न[होसें वाटतें.
सताजळोशी तह केला व तो नांदिं'वाशकहैं निघून गेला .`
र्जिठूप्रळंदैदरावाद सस्थान. परभणी निल्ह्याचाउत्तरें'
( १६९३ जाने. ). त्याच्या सैन्याची इतकळो हलाकळी झाली [कडील त[ळुका. क्षेत्रफळ १,४९६ चौरस मेल. ली. स.
कफ्रँळा बारा कळोसरॅच्या मजलीस एक महिना लागला. औंर'ग- [ (१९११ ) १२९५४४. या त[छुव्स्यात एकंदर ३२० रेवती
झेवार्ने सांगितल्या‘ग्सन पुन: ( १६९3 सप्टेबर) लिंजळोस [ आहेत वेंफॉं 3. “ जहागांर आहेत. इ. स. १९०१ मध्ये
क्षुळिल्फकरर्ते बेडग्‘वातला. तेव्हा समाजाने पुन: त्याच्यावर । जमोंनमहखूल ३'२ लाख स्पये होती.
हक्के कङन त्याला इ.स. १६९६ च्या एप्रिलात [
न्तिद्,सस्य[न.…हे पजाव इलाख्यातील फूलाकेयान
घेती
उठप्’वेंण्यास
माग
पाहिले.
त्यावेळी
दुंर्गत्फ'
कर खाली कनोठकात गेला. शहाजळो तंजावरकर हा राजारामास मदत करळो, म्हणून त्यार्ने त्याला तया देऊन कन॰[॰
ठफांर्तांल मराठयांचा
चानें [सजा घेण्याचा
सस्थानांपँक'व् एक सस्थान असून याचे क्षेत्रफळ १२६८ ची.
मैंल आहे. या सस्थानांत समृर, [जद आणि दादळो या तांन
तहसिली अडून त्या अगदळी निरनिराळ्या वसलेल्या आहेत.
प्रांत काबीज केला.
पुन्हां औंर‘गझे- हें त्यफैच्यनिंध्ऱ्यें इतर सस्थानांचा अगर खालसा मुलूख आहे.
सक्तींचा हुकूम सोडल्यार्में क्षुप्’ल्फकरर्ते [ सग्रूरर्हे राजधानीचे [ठकाण आहे. या सस्यानांत पोठळी
स.१६९७ च्या नोव्हेंवरति वेढा दिला.
शवठळो राजाराम हा [’ न[व घेण्यासारखी
अशी
ब्ग्दळो न[हो.
बहुतेक सत्रे प्रदेश
सत्रे मंडळांसह [केदृर्टवांदूळान निसठल्यावर ( डिसेंबर ) रिकामा ‘ सपाठ आहे. सस्थानची लीकसख्या ( १९२१ ) ३०८१८३
किया मोंगलार्ते घेतला. या वेढ्यार्चे महत्व तत्कालीन यूरो । आहे. दर चँ`[.गैल[स, ली. स. वे प्रमाण २२२
क्विन लीकास फारच वाटत होतें. त्यांनी त्याला यास देशी- ` सस्थानवे उत्पन्न १५ लाख आहे.
तांल ट्रॉयच्या घेढ्याचो उपमा दिला आहे. रा. सरदेसाद्दे
कनौल व राहठक भागांप्रमाणें येथील वनस्पती
म्हणतात की, जगांतील प्रसिद्ध वेंड्यांत याची गणना झाली
वन्य प्राणी पतियाळा सस्थानांप्रमाव्ळा आहेत. संस्थान
प[[द्देबें.मोंगल[हुं[[ येथॉल हवा मानवेना म्हपूळान त्यांची [जनी
निराळ्या ठिकाणी वसले असल्यामुळे हवा एकसारखो
सळोहूंन अककुंठ हे ठब्णें केर्लेपुन्हा पराठयानळो हा किल्ला केव्इ'प् , जिंद तहतिलीत हवा दमठ व स्थित आहे. इतर
काबीज केला तें समजत नाही. पण ती त्यांच्याकडे २२ वर्षे तहतिलीत हवा कोरली व [’नरागौ आहे. पावसाची
होता.
पुढें तों फ्रेंनांनॉ घेतला आणि
मागाहून हैद्- ऱ् सरा १० इंबांपांहूंन १२ इंच आहे.
रार्ने स.१७८० च्या सुमारास घेतला. मराठे लीक (व मराठी रे
आहे.
अतुंन
निरनाही,
दोन्ही
सरा-
इतिहास-या सस्यानाचा स्वतंत्र इतिहास इ. स.
कागद्पत्रं ) यास चेवळो म्हृणत असत, [डफ-पु, १; रिंया- | १७६३ सालापासून आहे. लिंदचा राजा हा फुलकियान<noinclude></noinclude>
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीग मानकळोश- (ज) २५९ [जद र्षि [ट्रेनद वशांतील मुकपुल्प जा फूल त्याचा नातु सुखबेंन याच्या शीख शाखेंतील आहे. या पुखचेंनास तीन पुत्र होते. षुखचेन इ. स. १७५१ मध्ये मरण पावला. त्य..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीग मानकळोश- (ज) २५९
[जद
र्षि
[ट्रेनद
वशांतील मुकपुल्प जा फूल त्याचा नातु सुखबेंन याच्या
शीख
शाखेंतील आहे. या पुखचेंनास तीन पुत्र होते. षुखचेन इ.
स. १७५१ मध्ये मरण पावला. त्यानतर राज्याचे तीन
१८४७ साली यासेस्यानास :..ग्'डणी माफ केली. दुसऱ्या
शीख लढाईंत ससपींसग हा स्वत: ब्रिटिशांच्या वात्रूळार्ने
भाग झाले. त्या पुत्रांपेंकॉ गजपा’तसिंग
लडत
आघेक
साहृसळो
लढाईत त्यार्ने
होता.
इंग्लिशांस
१८५७
चांगली मदत
सालच्या
बैडांत
केली.
वंडवाल्याती
इ. स. १७७४
दिली काबीज
केली असतां हाच प्रथम दिंलळोवर
चाछुन गेला. 'नतर त्याच्या मागून इ'प्रजा सैन्य गेले.
या कामागराव-ट्ल वहाद्रुरच्या नचायाचा खालसा केलेला
द’द्र्ळो प्रदेश, दोन लाख रुपये ( सालिना ) उत्पन्नात व
म'न्ऱ्‘ळो नामा क्षेत्थानचा राजा व गजपा’तसिग याचे वैमनस्य
क्रुळारान परगण्यांतील १३८॰॰॰ रुपये उत्पवाची १३रेवड”[
आले व गजपतिसिगनि न[भासस्यानांतछ्ल
अ[मले[ह, भाड-
(एकेदर ६०० मैलाचा प्रदेश) यास बहाल करण्यात आली;
सन आणि सहूंर हे परगणे कावळोज केले. पुढे पतिआलच्या
व राजास १ १ तीफांच्या सलामळोचा मान आणि इतर फुलकियन सस्यानिकाप्रमागै दत्तकाथे अधिकार देण्यात आले.
राजा सखपसिम इ. स. १८६४ मध्र्थे मरण पावला.
त्याच्यापासून त्याचा पुत्र रघुबोंरसिग यादळोवर वसला.
होती. इ. स. १७६६ मध्ये जिंद हो त्यार्ने आपली
राज,
याची केली. त्यावेळी हा ळिदध्ढी पावशहिळोचा मांडलिक असन
[देकळोपातशाहोस खडणीद्दि देत अस. इ. स. १७७२ मध्ये
त्याला दिळांवाल्यानै राजा हा किताब दिला
राजाचे पहिले दोन परगणे परत केले. परंतु सहूम्रचा
जिंदसॅस्थानांतच समावेश झाला. पुढील वर्षी ळिदक्कीच्या पातशहाम्द्वै जिंद सर करण्याचा पाठ घातला होता. परंतु सवै
पुलक्तियन राजे एकत्र आल्यामुळे तों घेत साधला न[हो. इ.
स. १७६५ मध्ये गजपतिळिसगनि [`जदचा किल्ला बांधला व
लवकरच पतिआळच्या राजास रड्रेहठकच्यास्वारॉत मदत
केली. त्यावेळी त्याचे फार नुकसान झाले. तथापि पुन्हा
त्याने इ. स. १७८० साली मिरतवर चाल केली. परंतु त्या
वेळीळिहत्याचा पराजय आला वत्यास मुसुलमान सवा'
यान देखील निरनिराळ्या प्रसंगी निटिंशसरकारास चांगली
पतीनें केद केले. वरावशळो खडणी दिल्यावर त्याची
सुटका झाली. इ.स. १७८९ मध्ये तो मरण पावला.
त्यास दोन पुत्र होते. राजा वाघासेंग यास जिंद व साफेदन
परंपरेने
हे भाग मिळाले व सुपसिगास वद्रुखान भाग मिळाला.
राजयानॉ सहूंर होत आहे.
ब्रिटिशर्मेवस्द्व ती जा कारस्या'ने त्या काळांत आली,
त्यात राजावामयिमार्ते मुळीच भाग घेतला न[हो. हा
[’केइप्न सस्यानांत या सस्यानास अग्रेसरत्वाचा मान मिळाला
आहे. हा १८८७ साली मरण पावला. याच्या नंतर
त्याचा अज्ञान नातु राजा रणप्मेरसिंग मादळोवर वसला. हा
प्रख्यात रणनितसिगाचा मामा होता. लाडे लेक याला
कार
मदत केली. याच्या
लात आल्यामुळे
कारकॉदळी’त नवव्न
धारापद्धति
उभारले, परंतु त्याचा तत्काळ मोड केला. इ_ स. १८७८
मघ्ट्रद्वै या राजाने अफगाण लढाईंत मदत दिली होती. या’
प्रौत्यथें या राजास राजा… इ… राजगण हा किताब वश…
मिळाला.
त्यार्ने लोकोपयोगी कामे केली व सयूर गांव जयपुर शह`
राच्या
पद्धतीवर
वसा‘बेंण्याचा
प्रयत्न केला.
सस्थानची
याच्याच प्रयत्वामुळें फुल‘
मातीत अस. सतलजच्या काठची सस्थानॅ जिंकून घेण्याच्या
अज्ञान असताना राज्याचा कारभार
हेदूळाने रणनिती’स'गानें स्वारी केली असती ( त्याच्या निवडू)
हा पतिआळाच्या राजास मिळाला. यार्ने पुढें ब्रिळिठशांस
न्तीकडे होता.
१८९९ साली त्याला राज्याचा
अखत्यार मिळाला; हाच हेहँग् मादळोवर आहे. याचा
पुष्कळ मदत केली.
हा १८१९ मध्ये मरण
त्याच्या मागून त्याचा पुत्र सगतसिग ग[द^[वर
आय. या पदव्या आहेत.
तो १८२२
साली मरण
पावला.
वसला.
पावला. त्याच्यापासून त्याचापुत्र
फतसिंग गादीवर आला. यावेळी या प्र[त[त फार यामत्रूम चालली होतो. म्हणुन फत्तेर्सियास काहृ'व् काळ राजथानळोचा
त्याग
करावा
लागला.
हा
१८३४
सखी
अम-
सुमारे ५० रेवडंचांतोल ल`[क[त”[ वेड
कौन्सिल
अळोफ रिजक्रुलजन्म
१८०९ साली त[लायाला जा. सळो. आय. हैं. व के. सळो. एतू.
पासचा
जिदराज्यांतील
बिदच्या आस…
भाग प्राचीन क्रुव्क्षेन्नाच्या हर्दोत मोडतो.
या
राज्यातील सफिदनमोंवतालच्या प्रदेशांत पुष्कळ प्राचीन
काळच्या इमारती वगैरे आहेत. महा‘भळारतीतील कथांचा
येथील पुष्कळ [ठेंकाणांशी सबंध दाखविण्यात येती. या
निपुन्निक मरण पावला. तेव्हा त्याच्यामागून १८३७ साली
सँस्थानांत ७ गांर्वे आणि ४३९ स्वैडॉ आहेत.
त्याचा
गन्नपातेसिगाकडे असलेले जिंद व इतर नऊ परगणे त्याच्या-
दोन निझामती ( जिल्हे ) आहेत. यापेंकळो समूर निआमतीत
समुंर तहर्तांल अशून जिंद निझामतीत जिंद आणि दावी
कडे अड्रुन त्यांचे सालिवा उत्पन्न २३६०० ' स्पग्रॅ होते.
न[कळोचा गजपतिसिगऱनंतर मिळविलेला साळिलना १८ २ ० ० ०
शकडा १ ०.६ शीख लीर्फावळो आहे. जिंद हो निझाम सस्या’
चुलत भाऊ
सखपा‘सँग हा यादळीवर वसला. यावेळी
रुपये उत्पन्नाचा मुलुख ब्रिटिशांनी
सस्ऱ्पसिग
पतियालाच्या
राजाशी
या तहासला आहेत.
यम
मुमार १; वस्ती
या सस्थानांत
[हेवृंची आहे व
आपल्याकडे घेतला. टुं नच्या अर्भियकडे असुन तिचे क्षेत्रफळ
मित्रत्वार्ते वागत
असून ब्रिटिश सरकारशी प्रथम प्रथम त्यावै वर्वेन मिवत्वाचे
अधुन तीत
१०८० चौ. मैं.
जिंद. साफेदन, दाइळो, कालेयाण आणि वरांद्
हॉ पानं व ३४४ खेर्डी आहेत. जिंद तहूंर्यांळ हो ४८९. चौ.
नव्हते. पुढें मात्र ती [वळिटशसरकारचा दळोस्त झाला. पहिल्या [[ मे. ची अघून तीत २ गांवें व १६३ रेवती आहेत व वतूल<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८३
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2026-09-23T07:14:30Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मइळाराट्रीव मानफॉंश- ( ज ) २६० जितफाँति २॥ लाखांचा आहे. मुख्य पिके गहूं, जवस, इरमरा, कापूस, ऊंस वगैरे आहेत. सॅरथानांत सोन्याचादळोच्या कलाक्रुसरावै [’गेन्नस, कयावठेल्या कातड्यावै स..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मइळाराट्रीव मानफॉंश- ( ज ) २६०
जितफाँति
२॥ लाखांचा आहे. मुख्य पिके गहूं, जवस, इरमरा, कापूस,
ऊंस वगैरे आहेत. सॅरथानांत सोन्याचादळोच्या कलाक्रुसरावै
[’गेन्नस, कयावठेल्या कातड्यावै सळाम’नळांकडों कांतळोव काम
,५
ग्जनगर
गेप्पप्ल कथा हे आणखी दोन ग्रंथ आहेत अर्ते क्कयाटर्चे म्हृणर्णे
आहे. [ पळोटवैन रिपरेटँ, ४ ( बॉ. वै रा. ए. तो १८९४ ).]
वकापड तयार होते“. सराद्देद कालव्यावर शकला ७.६ इतका
जिनगर-॰यांचीं बहुतेक वस्तळो मुंवद्दे इलाख्या’त मराठी
!’गेल्द्यांतून आहे. जिर्ने करणारे ते प्तिनगर; म्हणून या
सालकों सत्यानवी आहे.
लोफाँनां
१९०३-०४ साली १२१ चौरस
चांभारांप्रमा'र्गे
हलके
समजतात,
”[
मेल उन्मत्त…या कालव्याच्या पाण्यानॅ भिनली होतळो. कुणि-
न्हावळो यावळो इजामत करळीत
अळाना-पुरळो-जाखल रेलवे १९०१ साली
सस्थागांत
बुक करण्यात आली. या रेल्वेर्चे चारपचमांश भांडवल
सरथानमें दिल असुन सर्वे व्यवस्था नॉर्थ-वेस्व्म्ग् रेल्वेकडॅ.
का आहे… कारंनकार
कातड्यावै
ळिज्ञनगर व करनगार
यांच्यात रळोटोंवेर्टाव्यवहार चालतो.
सोंपविली आहे.
त्रिनगरांत
याबद्दल एकदर
५५ रेल्वे घेते. सेमूर हे ठिकाण
उत्पन्नावैकळो इळाकडा
याव
रेल्वेवर आहे.
निझामतळोवे
व
तह्रसिलरै’व मुख्य
दरम्यान असून ते सदन पंजाब रेल्वॅचें स्टेशन आहे. येथळोल
लोकसंख्या नवल जवळ ८ हजार आहे. हे पूर्वी सत्यानच्या
राज्ञघानव्वे ठिकाण हॉतें, अयाणि‘हे राज्यारोह्रणसयारंम
येर्थेव होंतळो. क्रुझक्षेप्रांतहें गांव वसर्ले अलून पांडवांनी
या ठिकाणी ‘नयेतौदेवी’वै देऊळ याघलैं असे म्हृणत्नातू
पुढें या दैवळळासमॉवतों गांव वसला व त्यास जयंतपुरळी हेनांव
पङलॅ ( त्याचाच जिंद हा अपभ्रंश होय ). मुवुळमानळो
नव्हते. परंतु
प्तिदचा पहिला राजा गज्ञपप्तेंर्सिग यावे
पण्खून याचा
दिळांच्या
उर्जित
यादशहार्ने
चित्रकार, सुतार,
काळ
१७५५ साली
हा गांव जिंकल्या-
आला,
रहोम
दप्दखान
करण्याकरिता सैन्य र्देऊन पाठविले
कासार वगैरे घेद्दे
चालतात, यावे उपप्घ्यें याम्ह्रण असतात.
ज्यांनां इतक्या
१ ॰१ ७",
साली
यास हा गांव सर
होते; परंतु त्याचा
बाराव्या
शतकांत,
मेगळवैठ्याच्या
दण्माजॉषंतार्ने
यान्याचॅप् कोठारे ळुठल्याचीं व विठचा महारान्क्त षंताला
सहाय्य केल्याची गोष्ट खरोखर घडली; त्यावेळी त्या विठया
महारास ( ही ऐतिहासिक व्यक्ति होंतळो; विठ्ठल म्हणने
पंढरपुरचा विठोबा देव नव्हे ) वेद्रच्या बादशहाने महारावै
पूदौपांर चावन इक करार कखुन दिल. त्या चावत्रांमघ्र्थे
जिनगर जातळोकड्रुन महारांनां पुढील वत्तु इकादप्खल
देण्यम्वद्दलचा करार होता. जिनगरार्ने लग्न झाल्यास या रु.,
मर्तिक झाल्यास इ.! स.. न[गराचा वेल मेल्यास आठ
व म्इशकुचें कातर्डेग्’हे महारास यावे. महाराच्या
कड्रुन ते अनेक हक्क होते, त्यांत जिन्गराकडून
जिनफॉंप्ळूते‘एक नैव ग्रंथकार.
शिष्यर्पिकॉ
जिनफॉंर्लि
कथानक नांवप्र्वे पुस्तक
स्रोमसुंद्ऱच्या पांच
एक
होता.
चेपकयैष्टिजिनकळोतमिं ळिलद्दिर्ले असुन
प्रतळोवर सवतूं १४९७ हा
मद्रास ड्लास्व्याता’हे काहीं जिंनम्प्र आहेतझ्त्यांची माहिती
आहे
तिचा गोषवारा
देत आहो.
यांचा विशप वस्त्रळी वेद्र्मिंरा ताछुक्यांत आहे. तेथें हे
करतात. एक काळी ते शिल्पकार
आणि कारागीर होते अस म्हृणतात. हे मूळचे रटॅझु अलून,
उत्तर सरकारातून ते चेद्रा‘गेर’प्च्या राजाच्या
कारेत'प् म्ह्रपूळान आल. राजाच्या पदर?
कम्याल जावळीच्या नोकरांवर
पदर'प्
नळोकरळो-
चाकरळीस असलेल्या
योग्य नजर ठेवण्याच्या कामी
राजाने यांचा ठेवून घेतलें. कालांतराने कम्याल जातींच्या
लोकांची त्यांच्या उद्धठपणप्मुळें
राज्ञदरबारावून
हकालपट्टी
नयाहृस्तळिला’रेवत ग् याच्या अमलाखाली त्यानळो हा कम तोडून दिलात ते
दिली आहे तोच ’ घोड्याचे खोगळोर वगैरे करण्याचा घेदप् करूं लागले. या
याच्या
जो मिती
जिंनकव्तचिं सवतूं हें
१४९४ मध्ये नमस्कारतत्त्व नामक ग्रंथ लिहून त्याज्ञवर
र्टाकाद्दि लिहिली. गिनकक्ततत्वे
हक
आहे. " धन्यशप्लिचरित्र’ ` होऊन, त्यांच्या जागॉ राहु हे कार्ये करूं लागले.
केलेले
बिनकळीत’क्रुव होता.
वहुघां प्रेथरचनेवो असावी,
वरील
[मेलन असत. [,भा. इ. म. चतुथें सरेंवलन वु. पृ. ६०, ६१ ]
चिवें रगा‘वेण्यार्चे' काम
इतिहास; टार्हप्स-इंडियन
घ‘रा लय
असल्यास त्याला जिनगरावे करा व पुंहावळी फुकट
द्याव्यात. याप्रयाव्ग् महार या वठुतैद’रास गांपांतळोल प्रमे-
आहेत. येर्थाल फत्तेगड क्रिल्ला राजा गनपतिसिग यानें
बांधला; हान“! त्याचा तुरुंगाप्रमार्णे उपयोग कला जातो. येथें
स्थानिक व्यापार क्राय आहे. [इंपें० म्या. पु. १४;
गोडबॅप्ठे-एतद्देशव्य सत्थानचा
ईयर बुक, १९२२. ]
आणे
( ओढून नेण्यास ) महारास यावेत; तर्तेच मे`लल्या वेलाचें
न“, थस्द्वैननें दिली
वेवरने' त्यार्वे भाषांतर
करात न[हाँत.
लॉहार,
पराभव होऊन तों मारला गेला. येथें प्नानांन देवळे पुष्क्रष्व्
याचा कतो
काम
क्षत्रिय सळोमवेशळी ’ लीकाचँ.’ मगहेतळो ‘ तौमवर्शा क्षत्रिय ’
या लेखांत त्वतेत्र दिली आहे; शिवाय ‘ न्वितारळो ’ पहा.
ठिकाण. उत्तर अक्षांश २९॰२॰’ व पूर्वे रेखांश ७६॰१९’ या
काळांत यास फार महत्व
एक करज्ञगार किंवा कारॅज्ञकार ( का'रनळो करणारे ) य्हूंणून
पाडण्यात येतात. येथील रुप-
असुन त्याच्या मदतांर्वे राजा हा राज्यकारभार पहातो.
जिंद
दुसरा
दिवस ‘ जिनगर ’ म्हणून सबोंघिळे जात असे त्या ‘ आर्य
या वळी किमत सुमारे १२ आण आहे. येथें सळोन्याचीं नप्र्णां
देखील पाडण्यात येतात. निरनिराळ्या मत्र्यार्चेएक कळो'सिल
गांव.-हे
याच्यांतच
नाणे पाडण्याचा हक्क
सरथागांत टांकसाळ असुन सस्थानला
आहे. परंतु न[णीं कचिंतच
या
न[हाँत.
शिवाय
जिवाच्या घंद्यावव्नन त्यांस जिनगर हे गांव पडलै.
बिल्ह्यांत,
जिनगर
लोक
ल'ळाकलावर
खोदकाम
वक्कारळो
कर॰
दग्नकल्पउं , व श्रीपाल’ ; ण्याचा धंदा करतात. ट्ळो कला च्यानों कित्येक मुसुलमानांस<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८४
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2026-09-23T07:14:42Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "ळिज्ञनप्र‘म महाराट्रांयशानकोंषा.(ज)२६१ जिनीअप् ळिशकविली असून, मुमुलमान लळोक या कर्लेत फार वाकव- आहेत-येथे पुष्कळ दप्नधमैं करणाऱ्या सस्या आहेत.प्रवाहा- गार झाले आहेत. पासुन वळ..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>ळिज्ञनप्र‘म
महाराट्रांयशानकोंषा.(ज)२६१
जिनीअप्
ळिशकविली असून, मुमुलमान लळोक या कर्लेत फार वाकव-
आहेत-येथे पुष्कळ दप्नधमैं करणाऱ्या सस्या आहेत.प्रवाहा-
गार झाले आहेत.
पासुन वळिन उत्पन्न करण्याचा कारखाना आहेली.स्॰प्.(१९१८)
कर्जूल जिंल्ह्यांत जिनगरांनों रोंगण देऊन तयार कैकेव्ऱ्ऽ
लाकडी सामान
नेलीर तिल्ह्यांत,
आतैशय
उच्च
दजळीवे
जिग्निगां-वान्ङळु हे लोक
असते.
मुलीचीं
खैळर्णो, लॉकडों चित्रे, व करेरळीव मुर्ती करतात. न्निचनापक्की
येथे द्दि'दूवो पवित्र देवळे, कृत्रिम पुष्पें, वेलगाढ्या इत्यादि॰
काच्या डुवेदृव नमुन्यार्वो लीकडॉ चित्रे तयार फैली जातात.
प्’जेनप्रम-‘हा व्द्र्पलीय गच्छावेफाँ होता. सघळितल
कावा तो विद्यागुरु होता म्हणून उत्नेख आहे. त्यानॅ ‘ सम्य‘
वत्त्वसत्पर्टाका ’ प्रेयावर टॉक! केली आहे. सघविलक अर्ते
स'ळागतळो कळो, जिनप्रसार्ने दिलीत राज्य करणाऱ्या शण्‘ऱहे महे-
१३९".॰ ०. हे पहिल्यामें रामन लीकाच्या ताब्यात होते. ५
व्या शतकात हे वर्गेडीयन लोकांच्या हाती आलपुढें १०३२
साली दुसरा फीनॅरदृ बादशहाने घेतलें व धमेगुरूस बक्षीस
केल. ११६२ व हान धमँगु'क स्वत:ला या शहराचा राजा
म्हृणबूं लागला. या'नतर १२६३ व हें हेंव्हँप्यराजवराण्यांत
अलि,१५३६साली येथे जान कालव्होन गांवाचा धमेंमुघारक
रहावयास आला व काहीं दिवस त्याने या शहरावर सत्ता
चालविंली. १८१४ साली प्रातिनिधिक सत्ता स्थापन झाली.
पुढें १८४७ साली प्रजासत्ताक पद्धति अमलात आली, व हो
पद्धति थोडेफार फरक होऊन अद्यापि चालू आहे.
मदप्स ‘ पड्दईंळानों ’ ग्रंथाच्या योगांर्ते 'जैन वनावेर्के. व
‘ शप्कक्रुलक्ष्मप्पालचूवामणि ’ अशळी त्याला पदवळो दिली.
हा दिध्वव्चा राजा महंमद तधलक असला पाहिजे. त्यार्में
र्जिनध्वरमुरि-एक
जैन
ग्रंथकार.
याचा
गुरु
चेदक्रुलांतळील‘व'वेमान’नांवाचा ललून ळिजनचैदृ, अमय`दव व
पड्दईंळानींवसन त्याच्या शिष्यार्ते ( राजरोंखरातें) ‘पट्द्`
बिन'मद्र् न[वाचें यावे शिष्य होत. ‘वुद्धिसागर ’ त्याचा वेधुं
किंवा आप्त होता. ‘खरतरसावुस'तत्ति’ त्याजपालून आली.
( पहा ). ‘अष्टकवृत्ति’ नावाचा ग्रंथ त्यार्ते सवतू १० ८ ॰मघ्र्धे
हैंप्नसमुच्वय ’ गांवार्वे पुस्तक ळिलाहैंर्ले. तेव्हां जिनप्रम सवतू
रा’वेला. त्यावेळेस तो जाचालपुर येथे रहात असेंएका वागुयु॰
१४०० च्या सुमारास होऊन
द्यांत जय
सवत १३८१ पासून १४०७ पर्मेत राज्य केल. जिनप्रमक्रुत
गेला. [ पटिसैन रिंपोटँ, ४ या
हा
(बॉ. रॉ. ए. सळो. १८९४. )]
जिनळीव्ग्-ईं
सवड्रेत
मोंठें
सरळोवर
युरोपच्या
मध्यभागी आहे. याचे क्षेत्रफळ २२3. चौ. मैं. असून याचा
आकार चेद्र्फीरासारखा आहे. लांबी सुमारे ४॰।४५ मै.
आहे.याची पश्विम व पूवे टोंर्के अनुकर्मे णिनळीव्हा वव्हॅळे यात
मिलाल्यावस्न्न
पदवी
मिळाली. गुजराट्रग्त
राज्य करीत असता
केल.
राजापासुव
त्याला ‘ खरतर ’
‘ द्रुलम
‘ षंचळिलगिप्रकरण "
राजा ’
न'प्वार्चे पुस्तक
‘ वव्रचा‘रेत ’ ग्रंथ जिनैश्वरदूळारिंट्टात असून सवतू
१०६१. मध्ये आशण्पली येथे ‘ ळिलप्वतळीकथा’ नामक प्रेम
व द्दिडयानकयाम येथें ‘कथानकक्रौंश’ नावाचा असे
अघुन सवे दक्षिण किनारा फ्रान्स देशांत मोडतौ; सरोवराचा
तीन प्रेथ प्रस्तुत प्रेधकारावै होत. यावे" मूळर्वे नाव क्रुशवे-
चाकळीचा सवे याग स्वित्झलडंमव्यै येतो. प्रसिद्ध ऱ्होन नदी
श्वर असून चापाचें नाव याम्इणसळोम होते. ज्या वेळेस त्यार्मे
दळोक्षा घेतली त्यावेळेस प्तिर्नश्वर हे नांव मिलालॅ. ‘ खरतरग'च्छ ’ पहा. [ पव्टर्तेन रिपोटँ ४.]
पूवे टॉकाजवल आंत ळिशङन पा'थेमेल बाहेर पडून गिनळीव्हा
शहरातून वहात जाते. यावे पाणळो सर्वे ठिकाणी निळे असुन
ज्या ठिंकाणीं ऱ्होन शिरते तेथून जसजसे पुढें यावे तससस’
त निवळत ग्ळोलैं आहे. येथे स्वित्झर्लेद्यांतांल इतर सररेवरां’
प्रमाणें पुष्कळ माते सापडत नाइक्रुत. सरोवरात बांधलेल्या
प्रावळोन काळच्या वसत्तिगृष्ठां'वे अवड्रेसप येथे विपुल सापडतात.
याच्या उत्तर व दक्षिण किनाऱ्यावख्न रेल्वे गेली आहे.येथील
वृप्’टॅसहेंदर्म अत्यंत रमणीय व आल्हादकारक आहे.
क्रिहा-हँ स्वळीत्झरलङ देशांतळोल एक शइर.
ग्रँर्थे प्रोटेस्टंट षंयाचें एक तुंदर देवालय आहे. या देवालया॰
जवळ प्तिलेखाना आहे. या ळिशलैस्वान्यांत अलिकडे ऐळित’
हाप्‘स्ळोक पमार्थसयहालय आहे. येथे १७०९ बांधलेंली
पॅलेरेस डॉ जस्टीन नावाची एक इमारत आहे. याशिवाय
स. १५५९ त बांधलेली येथील विद्यापिठाचीं इमारत पाहण्यासारखळो आहे. येथील आणखी इमारती म्हेटल्या म्हृणबे
क्लिटोंप्’रेया गायनशप्ळा, नाटकमृहे, रशळोयन देवालय वगैरे
होत. येथे एक नवीन भव्य पदप्र्थंसप्रहालय बांधले आहे.
ततेंव एक वेधशाळा अतून घड्याळे, रसायनशास्त्र, औंप'ये',
व्यापार, ललितकला वगैरे औंधोगिंक शिक्षण देणाऱ्या शाळा
जिमीआ-इटलौ.
याच
न'ळावाच्या
प्रांतार्वे राज-
यान'ळोचें शहृर व लिगुरियावे बेदर. हे ठेगर्दोनैच्या
वायव्येस रेल्वेने _ ११९ मेल आहे; कँ’प्म्युनचीं लोकसंख्या ( १९१५ ) ३००१३९
आहे. हे व्यापाराचे
शहृर असून आचो‘वेशपवे रहाण्याचें ठिकाण आहे. येथे एक
विश्वविद्यालय आहे. इसवी सन १६२६ पावून १६३२ पयेत
०हाय येथॉल डट्टक'ळानळीऱ्जिनोंआर्चे स्वातंत्र्य हिराऊन घेण्यार्वे
प्रयत्न केले, परंतु त्याचा काही उपयोग
जिनरेआची
मध्ययुगांत
झाला नाहीं.
बांधलेली प्नायैनाम'दिंरे
कार
ड्रुवक आहेत. ११२६ साली खैन्ट मँप्टेओचे’ मंदिर गांधर्ले
गेंर्के. सैन्ठ लेळि'रन्झो मंदिर कार युवक अचूळान तें पोप दुसरा
गिठेशळोवस ह्यानें १११८ साली पावन फैकैं. तेन्ट अँडूवू
आणि वेळ इमैशिंअस हो दोन मोंठो मंदिरे आहेत.
जिनोंआमघ्र्ये असलेल्या पंधराव्या शतकातील इमारतां जरा
इतक्या युवक नसल्या तरा काहीं खासगी घगंमध्र्ये उत्कृष्ठ
कारागिरव्वे अवद्देप्प अजून दृष्टीस पडतात. येथे पें‘लझोरेप्सळो
आणि
पॅ‘लसोविआस्को
हे दोन प्रप्’सॅद्व राजवाडे आहेत.<noinclude></noinclude>
36tpgil8eqfxld8jllf4sc5ul31d697
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८५
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दत्सट्रीय नक्की, ( ज )’२न्,२ जिन्सौत्रळाले पाहेल्यांत वाचनालये आणि चित्रांच्या गें’लऱ्या अळिह्त. दुसरा तर कलाकींशस्याचा खन्तिनाव आहे. येथें एक विश्वविद्यालय स्थापिल्ऱ्ञ्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दत्सट्रीय नक्की, ( ज )’२न्,२
जिन्सौत्रळाले
पाहेल्यांत वाचनालये आणि चित्रांच्या गें’लऱ्या अळिह्त. दुसरा
तर कलाकींशस्याचा खन्तिनाव आहे.
येथें एक विश्वविद्यालय स्थापिल्ऱ्ञ् गेले.
या विश्वविद्यालयात कायदा, वेद्यक,
सन
१४७१मघ्ये
जिब्राल्टर
कमैठ असे. स. १८७६ व हें एमु. ए. झाले; फांहो वर्षे
शिक्षका'वे काम करून हे विल्सन केंळिलबांत सस्क्रुतवे
प्रोफेसर आले; आ’घेकाऱ्यांचा व याचा एका सामाजिक वाव‘
ट्टगष्टेशाख, तत्त्व-
ज्ञान या शाखा आहेत. या त्रिश्वविंद्यालयाला जोडूनच
एक
तोंत बेबनाव होऊन यानळो १८९० साली राऱ’जनट्टमा
दिला; पुढे राप्हेरेग्रँल सारे आयुष्य त्यास"! विंद्याव्यासगांत
वाचनालय, वेधशाळा आणि वनस्पत्तिशास्नाभ्‘यासाकरितां
एक यान आहे. येथें मोंठमोंठाली कलाभुवर्ते आणि गायन-
यालविंले.
शाळा आहेत. टिआझफ्रिरारळी हो व्यापारी पेंव् आणि ट्रामगप्र्डार्चे केंद्र आहे. व्हाया रेप्मा हें दुसरे व्यापाराचे स्थान
जातव्चळो चांगली सविस्तर माहित? पहिल्या विभागांत ८
व्याप्नकरणां'त दिलेला आहे. या लोकांची सद्यऱ्स्थिळाह्‘ऱ्,
यांचा हूंरेप्पा'त होणारा छळ, भारतळीयांशळो सादृद्य, जिप्स’प्
आहे. येर्थांल सडका रुंद असून कार चांगल्या आहेत. कापूस
र्फातण्याचे आणि कातडॉ कसावण्यावे घेदे सबँत्र आहेत.
जिप्सों~॰या वहुत`क
जगभर
पसरलेल्या
भाषा व इतिहास या सवनिं विवेचन त्या ठिकाणी
कोंळवप्, कापूस आणि धान्य हो परगांवाहूंन बिनरेआस
येतात. प्रग्चळोन काळापासून प्तिनरेआ हे व्यापारळी बँदर आहे.
आहे. हिंदुस्थानांर्तांल वजारा व झियारो
पहिल्याव्च् प्रांक लोक येथे आले.
तर्तेच जाट व डोस हे जिप्सळी
विचार केला आहे. ळिजप्सळोचळी
स्थानी यांची प्रकुंतिङप भाषा
दाखविले आहे त्याचाद्दि या
आले,
जिनोआर्ते
त्याच्यानंतर रेम्मन लोक
साऱ्या लोफां’वेल्’द्ध
केल्या. पिसाच्या मदर्तो’न प्तिवेप्आच्या
बऱ्याच
लढाया
लोर्फानळो सार्डे‘प्नळी
यांतून मुसलमान लोक'ण्न’ळा हांकून लाविल’. यामुळे दोन प्रवा‘
सत्ताक राष्ट्रळात लढाइ क्षुपली आणि त्यांत पिसाचा सर्वतोपरी
नाश झाला. काळया समुद्राच्या किनाऱ्यावर लेव्इन्टामघ्यै
आणि इतर ठिकाणी तटबंदी [केले बांधले गेले. मध्ययुगांत
प्तिनळोआच्या लोकागां व्यापारात आणि दर्योवर पुष्कळ जय
मिंलालेर्मं’जनळोआच्या लोकांत आपसात कार दृहो होतळोफ्रांहो
आहेत कॉँ
मुलमापळा हो
हा`य असें
प्रकरणात
ब्रिटिशट्टेचा किल्ला आहे.
मिळाले. पण त्याच“! परकीय सत्ता कबूल केल्यावरोवर त्यांचे
खङकाच्या सर्मोत उंच टोकाला
लावून दिला.
१७ व्या शतकात ळिजनळोआवर फ्रेंच लोकांच्या तोफांचा
मार
झाला
आणि
पिओझाच्या पराजयानंतर
लोक आँस्ट्रॅप्’लेयाला मिळाले.
परंतु
लवकरच
साद्देचार्ते
ळिदल्फिया
खात्रीवस्द्न
एक
काय या प्रश्नाचा
गुजराथी व राजजे रमणभाईंनों
उहँट्टख केला आहे.
जिक्काटंर
हो एक
आहे. ळिजव’ल्व्रचीं दक्षिणोत्तर लट्रॅवळो तौन मेल
पाव ते पाऊण मेल आहे जास्तोंत जास्त देवो
आहे. येथील किल्ला ७४६ साली बांधिला
खडकव अडीच मेल लांब असून उत्तरटोंकाच्या
हुळकेदप्र आहे व त्याच्या पलीकडे असलेल्या
एका रेताड पट्टव्नै' तो स्पेनला जोडला गेला आहे. जिब्राल्टर
“ अळो हाराज अवर ”
अर्ते म्हणतात.
ळिजत्राल्ठरची हवा निरोगी असून
हिवाळ्यात
समशी-
तोष्ण व उन्हाळ्यात साधारण उष्ण असते. दरवर्षी
साधारणत: ३४.४ इंच पाऊस पडतो.
इछीवै जिब्राल्टर शइर आ’लेकडे वसा’वेलेले आहे. जिया-
गिनळोआवे
ल्ठर`च रहिवाशी मिश्र महाब'शाचें अलून स. १९११ च्या
अदूंरिंट्र-
खानॅक्षुमाराच्या वेळीं तेंर्थाल लोकसल्या २५३६७होतां.
जिब्राल्टर हौवसाहृत असल्यार्चे वर
सांगितलेत आहे.
यन लोक'ळानठें आपला ताबा सळोडावा लागला. दोस्त राट्रांकडून प्रजासत्ताफांनां स्वातेत्र्व दिले जाट्रेल एवढ्या ले’डि
वेन्टिक
हो
जिब्राल्टर…भुमघ्यसमुद्राच्या पग्विमप्रबेंशभागां जियाल्थ्र नांवाचा
विशेष नुकसान झाले नाहे"… ३ ८ ०साली जिनोआच्या लोफांनळी
व्ट्टेननृसच्या लोकांचा शिओंजळो येथे पराभव केला. स. १५२८
मध्ये अँण्’डूंआ र्दोराआनें र्फेवांची सत्ता झुगध्स्वन दिली.
१६व्या शतकाच्या आ'रमॉ प्रसिद्ध जिनळोआ येथळील खलाशी
स्मिस्तव्फर कीलनसर्ने स्पँणिश लोकांना नवच्न जगाचा शोध
जात
आल
जिप्सळो शाखा असावळो अशावद्दल पुरावे तेथे दिले आहेत.
राज्ञवसाहृत
अतून हॅदळी
१४३९ फूट
मेला. येथळोल
टिकार्णां तो
लोक घिवेलाप्रनच्या वाचून मिळाले तर कांहीं ग्रूहैञ्पच्या बाजूस
घ्रमणशळोल
जिनोआच्या
लोकांनी र्फेचाविस्द्ध १८१४ साली बंड केले, परंतु णिनळोआर्ने सार्डिळिनआच्या अन्तग्’ळात रहावे या पॅरीस येथे झालेल्या
य`थें स्थानिक राज्यव्यवस्था मुलीच
नाहृ’व्.येये शिक्षण
सकाँर्वे नाहो तरळो शार्केत जाणाऱ्या बिंद्याथ्'य'क्रुचा सख्या
( १९१७-१८ )२८१६ होती. १९१७ सालचा वलूल
१२५८७६ पतेंउ असुन
खर्च
११९६३६ पाँऱ्उ होता.
सवन्त जास्त उत्पन्न जकातळीचें आहे. येथे व्यापार मुळीच
केली. हो गोष्ट हाणून पाडण्याकरितां जळोसैफ मँझिनळीला] नाहीं जियाल्टरचा मुख्य घंदऱ
म्हणजे तेथून जाणाऱ्या
तहातत्ल अटीर्ने
जिनळोआतळील लोकसत्ताक राज्यपद्धत्ति नष्ट
पुष्कळ प्रयत्न करावे लागले. प'रतु त्यांचा काहीं फायदा [ आगवोटोनां कोळसा पुरबिंर्णे
हा होय. यामुळे हजारो
रोजगार मिळाला आहे. येथें उपयोंगांत असलेली
जिन्सोंचाले’ श्रीधर गरेगशां १८५२-१९०३ `… हु नाणी, वजर्ने व यावे ही स’वे ब्रिटिश आहेत.
एक महाराट्रॅळोय पडित. यावे वाळपण अत्यंत हालआये- २० व्या शतकाच्या आ’रमांच जिन्नाल्ठरच्या सरक्षणा’
झाल! न[हा.
ष्टेत गेले. स्वभाव फार करारळो अग्नें, तसँच आवरणाद्दे फार
' लोफांनां
च्या साधनांत बरेच फरक करण्यात आले.
नव्या तऱ्हेच्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महप्सट्रीयक्षांनकोरा॰(ज)२६३ जियप्गंज्ञ तोफा आणून त्या उंच ठिकाणी ठेवण्यात आल्या आहेत. ळिज्ञराईंतखप्नां [ त्याच्या नाकपुड्यांजवळ केस असतात. वाछुकामय प्रदेशा' आह. दु तुन जातान..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महप्सट्रीयक्षांनकोरा॰(ज)२६३
जियप्गंज्ञ
तोफा आणून त्या उंच
ठिकाणी ठेवण्यात
आल्या आहेत.
ळिज्ञराईंतखप्नां
[
त्याच्या नाकपुड्यांजवळ केस असतात. वाछुकामय प्रदेशा'
आह. दु तुन जाताना वावटळींमुळें उङणारा धूळ त्याच्या नाकात
जिब्राल्टर येथे नवीन धक्का बांधल्यापुळें आरमारी ठाणें तू जाऊं नये म्हणुनच कीं काय, निसगांर्ने त्याच्या नाकातोंडाम्हणून त्यार्चे महत्त्व जास्त वाढले आहे. नवीन घकयाला ळू समळोप र्केसाचीं वाद केलेली दिसते. इतर कोंणत्याद्दि चतु'
या यामान तोफांचे गाळ र्फेकण्याचा टापू वाढला
५
"’
०
"
न्यू मोल म्हेणतात. वेदरार्मे ४४०
एकर
५
‘
[
जागा व्यापली
ष्पादप्पँक्षां जिराफाच्या डोळ्यांना फार दूरवर दिसते व
आहे. त्यांवेक’व् २५० एकरांत आहोटळीच्या वेळीं मुद्धपँ ३० चरताना मागे वळून पाहिल्यास त्यास मागवेळिहे पदप्पँ
फूट पाणी असते.
हें फार लांब अंतरावव्न पहाता येतात. आत्म'सरक्षणा'चे
१४ व्या शतकाच्या आरंभी हा किल्ला ळिअँऱन व कँस्ठा- हें त्यार्चे मुख्य साधन म्हटले म्हणने त्यार्ची शिंगे व पुर हे
हैंल'व्या राजाच्या ताब्यात होता. नंतर तो मोरळीक्कीच्या होत. मान वळवून नंतर त्याला आपल्या दिंळागांचा उपयोग
राजाच्या ताब्यात गेला. पंधराव्या
शतकाच्या आर'र्भा करिती येतो; परंतु त्याच्या पायात एवर्ढे सामथ्यै असते कीं
स्पेनच्या वारसासवधळो झालेल्या ब्रिटन व स्पॅन या दोन
ल.!थेसरशळो क्सिफ हा सिंहासद्दि लीळवितो अते माणतात.
त्यावळी चालण्याचीं पद्धत फारच विचिप्र असते. आपली
मान वर कसन’प्हे न सापडणाऱ्या वुक्षांच्या डहाळ्या तो
ळिजमेर्ने सहज आपल्या आटोक्यात आणतो.
नु’काच जन्मास आलेला जिराफ सहा फूट उंच असतो.
दक्षिण आफ्रिकेत वरेच जिराफ आढळतात. जमिनीपासून
राष्ट्रद्देमर्थांल युद्धद्वैत जिन्नाल्टरचा किल्ला ब्रिटिशांच्या ताब्यात
सुमारे १८ फूट उंचीवर असलेले त्याचें डॉक, त्याची खाली
जियाल्टरचा ळिकल्ला प्रेवेडाच्या राजाच्या ताब्यात गेला, व
त्याच शतकाच्या
मध्यंतरी तो स्पेनच्या ताब्यात गेला.
स्पेनच्या साव्यांत असतांना, त्या ळिकल्याचळो तटबँदळो इतकळी
मजबूत करण्यात आली कीं सवे युरोपमर हा किल्ला अभेद्य
मानला जात होता.
गेला. स्पेंनमें हा किल्ला परत
घेण्याचे वरेच प्रयत्न केले. धसरत येणारी पाठ, व काळे ठिपके असलेला व दरिंणाच्या
अयेरिंकैर्वे स्यप्लँत्र्याफरितां केलेल्या युद्धाच्या वेळीं स्पेनने [ रंगळासार'डंया असलेला त्याच्या शप्‘रेराचा 'रग या सवै गोष्टींजियाल्टरला वेढा दिंला( १७७०, ); तो सन१७८३पर्थेत चालू , मुले या प्राण्यात पाहेणासंस पोठें कौतुक वाटते. कांहीं
होता. परंतु स्पेनला त्यांत यश आहे; माझी. त्या'नतर सन ’ खाताना व पितांना त्याला आपले पुढील पाय पसरावे लाग’
१८०१ मध्ये पुन्हा स्पेंनर्ते जिब्राल्टर घेण्याचा प्रयत्न कला तात. काहो सकट आले कीं, हा प्राणी आपल्या लीन तग॰
ज्यांच्या जोरावर पुष्कळ वेगाने पळू शकतो. अळोकापळो
पण याद्दि वेळेस स्पेनचा पराभव झाला.
जिंयप्गेज्ञव्-बेगाल इलाखा, मुर्किदावाद जिल्हा. लाल’ नावाच्या एका जातीतील णिराफाच्या पायावर झिया…
नाग विभागांतील हे एक खेडे अलून मुर्शिदप्वाद शहराच्या घोढ्यप्प्रमाणें पट्टे असतात.
जिरास्-मघ्यप्रांत. जिल्हा वर्षां. दिंगणघाट तप्शील.
उत्तरेस ३ मैलांवर
भागौरथळो नदीच्या डाव्या तीरावर
आहे. उत्तर अक्षांश २४ ° १५’ व पूर्वे रेखांश ८८ ° १६’.
लोकसेख्यप्( १९०१ )
८७३४.
येथील व्यापार जरी
दिंगणघाटपासून २० मैलावर हे मोंठें खेडे आहे. क्षेत्रफळ
४००० एकर. लोकसख्या (सन १९०१) २२००. येथे शेख
पूर्वीच्या मानानॅ कमी
झालेला आहे तरळी ताग, तांदुळ,
ख्वाजा फरीद नावाच्या फकारावै थडगे आहे. येथे खाण्याची
रेशीम, साखर इत्यादळीचा व्यापार वराव चालतो. नदीच्या
दुसऱ्या तीरावरील अझ्’रामग'ज
हे ईस्ट इंडियन रेल्वेर्वे
पाते होतात. पूवळी’ हे परगण्याऱ्प् ठिकाण होते. हातमागावरोल
कापड व र्योगढ्या येथे तयार होतात.
स्टेशन अतून या दोन गांनामध्यै फेरी
वळोट नेहेमी चाकुं
असते व अझळोमग्‘प्ज म्यु’ळिनसिपाळिटळीचा ताबा या गांवावर आहे. `
ळिन'रग-ळंआसामपधळोल
खाती र्दोगरांतच्ल एक छोटे
जिराद्देतखाना’
जा व ती…
जिराईंतखाने
प्नातऱ्काळी अंघोळ कसन, आपले कारखान्यात
यांनी
येऊन, सर‘
कारळी हेत्यारॅ, पट्टप्, भाला, वर्षी, गुप्तळो, गुदो व खाद्य व
सस्थान.
तेगा, पेशकवज व फरसटप्ळ, फि'रग व तीरकमान,
जिरळ कामसोळी-हुंग्व’इ इलाखा. रेवाफांठामधळोल
छोटॅ सस्थान. यांत दहा गांवे अधून वार्षिक उत्पन्न अजमाते
रहै, कट्यार, बुकभाला, पिस्तुले, याकमार व गलेफ ढालावे
व वंट्टकळोवे व हुद्दे तरवार'ळावै व ट्टर्विणी व वड्याव्व् वगैरे
चार पांच हजारावे आहे. त्यांत पुन्हा तीन वाटण्या आहेत.
सदरहूंचीं देखरेख रेग्जवे रेप्ज झाडून पुचूळान, गेज लागला न
लागला हे पाहुन, वर`चवर ळिशकल करवून, गलेफ नवे जुने
[जराफळंचतुष्पांद्
जनावरांन हा बराच ठेव प्राणी
साम्प्डु०
असुन हरीण, काळवळीट व उंट यांच्यासारखातो [’देसतो. इतर
करावयाचे जाइल्यास व तरवाराच्ची म्याण व नथण्या,
प्राण्यांशग् तुलना केली असतां, जिराफवे वरेच विशेष असलेले
इत्यारास जते असावयाचें तते करण्याची आज्ञा होद्देल त्या
प्रमप्र्णे, कारभारी याजकडूंन सरंजाम घेऊन, तयार कहन,
आढळून येतात. लावी, वारळोकपणा व मानेचा लवचौकपणा
ज्या
या बाबतीत इतर चतुष्पादर्पिक्षां हा एक विशिष्ट असा प्राणी
असून वाळुकामय प्रदेशात सचार करण्यास योग्य अशीच
ज्या इत्यारावे त्यास माफजतीर्ते
त्यावीं एकंदर रचना आहे. त्याचें डॉक
वेळेस ते इतर करीत जाते. व ज्याने तसलमातांस ते हत्यार
३४
उटासारखें
असून
येऊन वदंप्वस्त राखाँत
ज[वा. ज्या समणी ते हत्यार आणावयाचा हुकूम होईल त्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/८७
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2026-09-23T07:15:22Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जिरै महांराट्रीयंशांनक्सि- ('ज)२६४ असल त्याची चौकशी पेधरा पेधरा दिवसांनीं राखाँत जावळी. स्त्र’रांच्या समयी हत्यारे इरकेळाणाकडे द्यप्वयाचळी आज्ञा होईल त्याप्रमणि देऊन स्वार..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जिरै
महांराट्रीयंशांनक्सि- ('ज)२६४
असल त्याची चौकशी पेधरा पेधरा दिवसांनीं राखाँत जावळी.
स्त्र’रांच्या
समयी
हत्यारे इरकेळाणाकडे
द्यप्वयाचळी
आज्ञा
होईल त्याप्रमणि देऊन स्वारी आल्यानतर ती हत्यारे
मागतो नौकशव्वे पाडून घेऊन कारखान्यात ठेंवळीत जाव'व्; व
व इत्याराचा आडा सावघमिंरावे राखाँत जावा. शिकलगार
व जिनगर व लीहार वगैरे कामगार यांजकडे जे काम ज्यचि
असेल ते त्याजकडून तोकसींर्ने सरकारमर्जीपसत अते करवून
कारखान्याचा वदोवस्त शाबूत ठेंवळीत जावा. कामगार आपले
काम हुशारींनें करणार नाहीं, त्यास ताकाग्द कलन नळीट कर’
नावे. ताकिदव्प्रमळार्णे न वागतो, सरकारकाम गैरउपयाँणी
कहुं लागल्यास सरकारांन
समजावून वेदोवस्त
करून
घेत
जावा. हुशार्रावे वागल्यास नाव व कानूकायदें चालवावयावे
विंतपशोल:…
१ पूजा मवानोंचौ व नैवेद्य पूव‘द्वै’पालून चालत आला त्या॰
प्रमाणें सरकारांवून पावत जाईल. १ कारखान्याचीं पूजा व
दक्षणा पावत जाईल. १ कारखाने मजकूरचे धसास रवेडग् व
वकरे व खचींस रुपये सरकासंतून चालविले जाईंल.१ हुयाचीं
पूजा व खेंडा व नैवेद्य व नारळ, ठुजर याजकडे
तिमे
व
जिराईंतखावेकडे निरेर ळिशस्तेप्रमाणें करीत जाणें. १ निशाण मगवे
व जरळीपटवऱ्यास वकरे व नैवेद्य येतो त्यांपेंकळो केसरकर यास
पुंडों व फरा एक, पाकळी निये राहील ते
भोसले
निमे
व
जिराईंतखावे निमे करणें. १ सरकाराचा घट उटतेवेळेस
नकरे मारावयार्वे त्यास तरवार जिरादेतखान्याकडून
घ्यावयाची रुमाल भरल्यावर णिराईंतखाम्याकडें येतो तो
पावत जाईल. १ नैवेद्य श्रोअबावाईंचा पावेल. १
शिकलगार
नातील भागांत याची लागवड होते. हिंदुस्थानात हो आर्डे
स्थानिक व आपोआप उगवलेली ( रानटी ) जरी दिसली
तरी हो मूळची येथील नव्हेत.
खरे जिरे इजिप्त व भुमघ्यसमुद्रानज्ञीकचा प्रदेश यांमध्ये
होते. उत्तम प्रकारवे र्जिरं माल्टा येहूळान येतेजि'रं थूररेपखर्डातील लोकात फप्र प्रावळोन कालापासून माहित आहे.सतराव्या
शतकात इ'ग्लङमघ्ये याचा उपयोग मसाल्यास करीत असत
व अत्रूळानाहे जमेनळोमघ्ये याचा मसाल्यास उपयोग करतात.
मध्ययुगांत यूररेपमर जिं'र उपयोगात आणीत असत. जिऱ्यांत
शकला ३ ते ४ तेल असते. या तेलार्चे विशिष्ट गुरुत्व ०.९१
ते ०.९३ पयेत असते. युरोपमध्ये या तेलाचा मुल्य उपर्याग
मर्धे करण्यात केला जातो. हिद्रुस्थानट्वेंतळिहे जिऱ्याचा उपयोग
औंपधळाकडे करतात. हे रक्तशरैधक व दाइशामक आहे.
व्या पा र.…सयुक्तप्रांत व पजाव यांमध्ये मुख्यत्वेकरुन
जिरे पिकते, ह्याचा व्यापार मोठा आहे. मवासँत वेगालमधून
जिरे येते. अलीकडे हिंदुस्थानमधील जिऱ्याचौ निरेप्त वाढत
चालली आहे. बहुतेक व्यापार घुवईं, बंगाल आणि तीलोन,
स्ट्रॅटतेटलमेंन्ट व ब्रिटिश आफ्रिका यांमध्ये चालतो.
येटब्रिटन हे प्रतिवर्षी २० ते ५०
हेड्रेडवेट जिरे
खरेदी करते. वायव्येकडोंल सरहद्द, तांवडसमुद्र व इराणावे
आखात यांमघुन पुष्कळते जिरे हिंदुस्थानात येते.
मुख्य व्यापारानॉ
ठिकाणे
मरकत हो होत.
जिळेंटिन-जिलेटिन
जबलपूर,
हे
गुजराथ,
प्राण्यांचे मांस,
अस्थी,
व जिनगर व कारंत्तकर यास वकरे व नैवेद्य पावेल. १ हुजरे
कातडॉ. द्रुवरे' व शिंगे इत्यादिक'ळापामून
यांजकर्डाल इनामावो व सतका याची वाटणी एक असामीचळो
घेत जार्णे. १ प्रथम तरवार्रप्चळो परीक्षा करून सरकार चौरंग
असतो. कच्चे कातर्डे व चामडे हो कापून काढल्यावर
वकरे याचा
सरकारच्या
तात. हा पदार्थ ओंलाव्यार्ने विघढून जाऊं नये म्हणून
"कलन मारतील; तें वकरे फरास यांचे व
अगावरील गेला ब्लिकलगार याचा. १ ळिशके
कटयार सरकारातून सरदारास देतील. त्यांजकडून इनाम
यावयाचा तो मागून घ्यावा. १ सरकासंतून ढालतरवार
कोणास बक्षीस देतील, त्याज्ञपातून इनाम यावयाचा, तो घेत
जाणें.१ मोंक्रुलअष्टमौस निशाण व लोणी व गणेशचतुथॉबद्दल
नैवेद्य व घुगऱ्या मेसक्रुमाय राणीच्या व दिपबाळीवद्दल तेल,
अरगजा व फराळळास ळिशवरात्री व आपाढीका’प्तेकळी व तुळशव्र्वे लयावइल ऊस, आवठे व होळींचा नारळ व खोवरे व
सफांतोंनद्दल तीळ व हुगडॅ व खण द्सा’रेयांत व नागषंचमोस
साच्याची आष्टी व द्रमाइग् पौर्णिमेस सवाष्ण व खण व
राखीपौर्णिमेवइल पोवती सालावाद शिररॅतैप्नमर्पिळा सर्वी.
वरळोवर पावत आल्याप्रमार्णे पावत जाईल. ‘अठरा कारखाने’
पहा [ सेद्भेग्रंथ:…इतिहास्प्सेप्रहृ पु. ६ अं. ७।८।९]
जिरे (गौर्डे ) ……लेठिनमघ्ये फ्धुंणिनम सिप्‘मेंमम, इंप्रणीत
॰फ्युऱ्’मेन, सस्टेन्तांत ज्ञीरक, मराठींत जिरे, दिंदफ्त जिरा, इत्यादि
नावे आहेत. वेगाल व आसामखरळीज इतर सर्वं हिंदुस्था-
पदार्थ ग्ल्छू
तयार
याच?
रतलाम व
करतात. हा
किंवा सरस या पदाथ'पिंक्षां जास्त शुद्ध
वो
निरुपयोगी भाग शिलक रहातो त्यापासून सरस तयार कर॰
त्यास लारेवच्या फॉंडबा मिंसळतातणिलेर्टानट्युल्यूव इसिंग्लास
यांच्यात रासायामेकदृष्टघुप् कयेंहोच
फरक
नाहो. माशांच्या
हाडांपावून तयार केलेला सरस या देशांत कार उपयरेग'ळात
आणतात व तो सवत्र विकत स्किव्तो.
सरसद्वैत खाली लिहिलेले प्रकार आहेत:-( १ ) हाबापालून
तयार झालेला; ( २ ) कातडीचा सरस; ( ३ ) माशापाछून
तयार केलेला. उंच प्रतीचा सरस त[बुस व पिवळ्या रंगाचा
असून त्यांत कचरा किंवा बारीक इतर रंगाचे ठिपके नसतात.
तो फौडला असतां आतून फांचेसाररवे तुकडे पडतात. क्लिटिन पाण्यात ळिमजत ठेवल्यास फुगते व त्यानंतर थोडीशी
उष्णता दिल्यावरीवर बिरघळून गोंदासारखें चिकट होते.
सरसद्दि प्रथम पाण्यात भिजवून नंतर त्यात मैदानावर कडवित्न्यास फार चिकट होतो व निरनिराळ्या कामाकडे
विले-
टिन व सरसाचा सिसेंटसारखा उपयोग होतो. सरस चांगला
तयार झाला म्हणजे त्याची ळिचकटण्याचळो शारीं फार वाढते.<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जिवमाहादग् नक्षी महाराष्ट्र’पैय ग्प्नफोण्. ( ज्ञ ) २६५ अगपाँ नवव्न तयार झालेल्या सरसापेंक्षां बरेच दिवसाचा जुना सरस जास्त उपयुक्त असतो. जिक्यादप्दा वक्षी-दोलतरपिं शिद्यघेचा त..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जिवमाहादग् नक्षी
महाराष्ट्र’पैय ग्प्नफोण्. ( ज्ञ ) २६५
अगपाँ नवव्न तयार झालेल्या सरसापेंक्षां बरेच दिवसाचा
जुना सरस जास्त उपयुक्त असतो.
जिक्यादप्दा वक्षी-दोलतरपिं शिद्यघेचा तेनापति;
जींवफघितामणीं
त्याच्या मुलाखती आल्या, त्यांत र्मेङम र`[ल॰ड[हे भाग वेर्दु.
यापुहँ रालड पा"समघ्य राहूं लागला व जें’कॉँघिन पक्षाचा
सभासद झाला. लवकरच मॅडम तेलडच्या वेव्फॉंत।वसाट,
मष्ये हा
पाँटिंयन, राविस्पेंरी, न्यूझोट असले गृहस्थ जहूं लागले.
दौलतराव शियावरॉवर खज्याँच्या लढाईंत होता. त्या लढा’
ईंत याच्याकडे दुय्यम तेनापतौर्वे काम होते. शिद्याच्याकार-
स्वत: ती जरी सुंदर नव्हती तरी कार मोहक होती.
मैंडमवो राजकारणातील मते स्पष्ट व परिणामकारक असत;
जातीचा शणवॉ; आडनाव केरळोकर.
सन
१७९५
भारी मडळींत हा प्रमुख असून दोलतराव (वयाते लहान
असल्याने ) त्याच्याच अनुरॉ'वानें चालत अते. सवाद्दे माध०
वरावाच्या मृत्यूनंतर यशोदाबाहेंच्या गांबांवर दत्तक देण्याविषणी न[ना फडना‘वेसानॅ जी खूचना पुढें मांडली होती,
तिला तुकीजळो होळकराप्रमाणें आपलीळिह समति देण्याविपयीं
यार्ते आपल्या धन्यास अगोदर सल्ला दिला होता. परंतु
बाळाजीं विश्वनायाचा औंरस वंशज हयात असतांना दत्तक
वेण्याबिपयीं आपण सल्ला दिला ते बरोबर केले न[हो अते
तिची वृत्ति शांत व निरीक्षण शक्ति तीक्ष्ण होती.
वडेवडे विद्वान जमले असतांद्दि
ळिजरनॅडिस्ट पक्ष अधिकारारूढ
अन्तेव्ववस्यामेत्रो नेमण्यात
तिला अध्यक्ष
झाला तेव्हा
आले(
१७९२
वेठकाँत
निवडळोत,
र'ळोल'डला
).
याच
सुमारास देशत्यागां लीकांविरुद्ध व न[न-ज्यरिंग लीकांविंरुद्व
काढावयाच्या हुकूमावर राजाचा सहा मि`.ळना तेव्हा त्या
सथळोचा फायदा घेऊन र्मेडमन लई राजाला एक
पत्र
पाठार्वेले
त्याचे उत्तर
आले
न[हेळो;
तेव्हा तेच
मागून त्याला वाटूं लागल्यामुळे यार्वे मरतेसमयाँ दोलत- भ्पप्र भर कॉँतिलमघ्र्ये राजापुठें मोंठयानें वाचून दाखविले.
रावास जवळ बोलावून त्यास तते सांगितले अते डफ म्हणतो.
हा इ. स. १७९६ मध्ये मरण पावला. याच्या पश्चात याच्या
मुलाकडे कांहो दिवस वक्षि’णिरी दोलतरावार्ने चालविली
होती. [ डफ-पु. ३; खरे…ऎ. ले. सप्रह, ख'ड ७-९. ]
जॉन
मेरी रोंळंङ ( १७३४-१७९३ )… हा फ्रेंच
मुत्सद्दी १७३४ व जन्मला.
त्याला वियाव्यास्त्रुग अलून तो
तेथे ते इतके पसत पडले का,
न[म्याचें
असतुष्ट
लोकांच्या
जाहीर…
स्वङप त्याला मिळुन त्याच्या प्रती देशभर
व[टण्यांत आल्या. तेव्हा दूर केलेल्या लीफांनाच पुन्हा मैत्री
नेमण्यावद्ल देशभर मागणी ड्रुख झाली;
ठरविण्यात आले
राजाला न[लायक
व रळोलड व ड[टन याच्या हातांत पुन्हा
कारखान्यांतौल इन्स्पेंफ्ट्रर अशा नळीकऱ्या त्यार्ने केल्या. त्यार्ने
अघिकारसत्रै देण्यात आली.
पण या सभारास राज्यफांतीच पाऊल अति ड्रपाटयान
पुढें पडत होते; आणि ज्वलन; जहाल ( माटन ) पक्षाच्या
याचवेळी स्वदेशाच्या व्यापाराघिपयांळाहे चांगली माहिती
भोतानें राजमाता व्लायला नेण्याचा राल'डन’ सूचना आणली
अखेरपर्यंत टिकला. प्रथम कांहो वर्षे कारकून व नंतर
मिळविली.
ती त्याला पुढें सावेजतिक आयुष्यात मोंट्या
योग्यतेस चढविण्यास कारणीभुत आली. १ ७८१ साली त्यानं
लय केले; त्याची बायको
मॅडम
रोलड
हो इतिहासात
व रेव्वस्पॅरी वगैरे पुढाऱ्यांवर टोकेचा मारा चालविला. या
कारणांना तो अप्रिय झाला.
कागदपत्र नाइत्ते आल्याचा
शिवाय सरकारी महत्वाचे
त्याच्यावर आरोप आला.
प्रसिद्ध आली. ती पेंळिरसमधळील एका कारागिराचळी मुलगी ततेच राजाचळो चौकशी कन्व्हेन्शनच्या मतानें न होता
होती. लहानपणापाचूप्न तिला ळिवथेंचीं मोती आवड असुन ‘ देशातील सवे लोकांच्या मतावे व्हावळो, असा ( जिंराडिंस्ट
तिवळो बुद्धिमत्ताग्हे व[गली होती. आपले शिक्षण तिने पक्षाप्रमाणें ) त्यार्ते आग्रह धरला. या तव कारणांमुळे
बहुतेक स्वकष्टावे केले. प्च्छूटप्कॅ, व्होल्टॅअर, कसा, मटिक (राजाचा वध झाल्यावर दोन दिवसानीच) रोल'डला
यांची ती भक्त होती. ती आपल्या नवऱ्याइतकळो विद्वान आपल्या ज[येचा राजीनामा द्यावा लागला ( १७९३ ).
पुढें रॉलड पतिपत्नावर निंदारॉपांचा मारा लोकांकडून
अषुन बुद्धिमत्ता व कार्थक्रुशलता यांत तर ती त्याच्यापेक्षा
वाढू
झाला. तेव्हा त्यांच्या [नरसनार्थ एकदां मडम स्वत:च
श्रेष्ठ होती. पतीच्या सहकारिंतेते तिने फ्रेंच राज्यकांतीच्या
आरेभापाचूग्न स्वत: त्याला वळी पडेपर्मेंत फ्रान्सच्या अतेव्लामघ्ये गेली. तेथें [तच्या भापणाचा पारणाम होऊन
भवितव्यतेवर विलक्षण परिणाम घडवून, आणले.
जळोन समेनप् तिला निरपराया ठरावलतयाय्‘पे तिच्या शवृंना तिला
ररेलड यात त्याच्या व्यापारविंपयक लेखांत मेंडम ररेलेडवै केद केले, तेव्हा मिस्टर रव्लेड गुप्तपणानॅ सअप्रेडला पवूऽन
सतत सहाय्य मिले. राज्यकांतीला सुरुवात झाली त्यावेळी
मेला ( १ ०९३ ).
त्याच्या नावानें राजकारणावर जे लेख येत ते मेंडम येलेड
खुद्द लिहा व नवऱ्याच्या ज[व[वे प्रतिक करी. त्यांत राज्य’
लेख लिहून ठेंघि`ल. ८ नव’वर १७९३ ररेज’ट्र तिचा
गिलोटोंनवर वध करण्यात आला. पत्नळीच्या वयाच्या व[त॰
कांतीतील अगदॉ पुढारलेल्या पक्षार्चां मते
माते दोन दिवसानी मिस्टर रव्लडनें आत्महत्या केली.
प्रतिपादिरें’ऽली
केदेत असतां तिन आपल्या चा‘रेयावर
असत. पुढें जीन हा ळियाँव्स म्युतितिपाळिटळीतर्फे एका
ज्ञीव’कळिचतामणळी-‘हा एक तामिळ भापेतोल येथ
प्रकरणात पॅरिस येथळोल कॉंळाव्स्टटयुअट अस’व्लीकडे डेप्युटी ` अतून त्यामध्ये ज[वकचारत्र वणेंन केले आहे. हा तिरुत्तकदेवर
म्हणून ( १७९१ ) पत्नांसह आला. तेथील मुकामांत यान [’लाहेला. ज नैव ग्रेथ प्रथम सस्क्रुत्ऱ्मघ्यै होऊन नंतर
भावळो जिग्रँडोंस्ट पक्षाच्या वऱ्याच वजनदार पुडन्गांशग् प्रचलित भाषांमध्ये आले त्यांवेवग्ग्च जावकाचतामाण हा<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "सौवधन किल्ला टाकल्यामुले माथ्यावर जातो येत न[हो. वर पाण्याची पांच एफ प्रेम आहे. हली हा तामिळ भाषेतील महाग्रेथ समजला ज[तो. ज[वकचरिप्रपिंर दुसरे सस्कृत ग्रेथ म्हटले म्हणजे व[दॉमर्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>सौवधन किल्ला
टाकल्यामुले माथ्यावर जातो येत न[हो. वर पाण्याची पांच
एफ प्रेम आहे. हली हा तामिळ भाषेतील महाग्रेथ समजला
ज[तो. ज[वकचरिप्रपिंर दुसरे सस्कृत ग्रेथ म्हटले म्हणजे
व[दॉमर्सिह
टांफाँ आहेत. [ पुणें ग्याझे; इलियट. पु. ७; डफ पु. १.]
बीचनफांर्दविचांर. या ["या वि ष य क…या विषयास
याचे ( १ )गद्यन्यितामणि व ( २ )क्षत्रचूळाडा-
. ज[वन्वरचपू व
( ३
अण्’प्’णे, इप्’रॅचेद् यावे
पणि
जॉवनफप्र्थविचाग्:
महाराट्रीय सावकाश. (ज , २६६
आर’न करण्यापूर्वी ज[वन म्हणते काय,
( ४ ) जीवन्धर नाटकहे होत. यांयेकळो ज[वव्धर नाटकाच्या
याविपया विचार
मफ्राहोंपाघ्याय पा’पॅडंत स्वामिनाथ ऎय्यर याना १८९ 0.
केला पाहिजे. जळोवनपेंशौकदून ती सतत चळवळ अगर धड॰
पड तिच्या अतऱ्स्थितीना पर्लिंस्थतीर्शी मेळ घालण्यासाठी
चालू असते, त्या चळवळीलाच जीवन अगर जीवित म्हणावे
साली ज[वकत्वसामणोचा कांहो भाग प्रकाशित केला.
त्याच्या प्रस्वाववेतते म्हणतात को, महापुराणामघ्ये जळो
चळवळ प्ररेटरेऱ्श्च'ड्रम ( जळोवनरस ) बुंचच् जिवंत व्य'कॉकडू'
हस्तलिखित
प्रतीचाळिह अद्याप शोथ लागला नाहो.
६३ शलाका पुरुषांना चारेत्रै दिली आहेत त्यात ज[वकार्चे
चारेप्र दिल आहे. त्याप्रमाणेच श्रन्'पुराणामध्र्थे २४ तीर्थं’
कर[च“[ चरित्रे आहेत. त्यांवेकळो श्नळोवघेमानचारेयामघ्यें
जौवकाचा उल्लेख आहे. वरील
ग्रेर्थाशीं ताडून पहाता असे दिसते
हा प्रेम
कारण
गद्यचितामणि व’गरे
की जऱ्वकन्यितामणि
नसून गद्यळिवतामणीच्या आघारे केला आहे.
यांतील बरेच
लोक
व कल्पना
अशी व्याख्या हवेऱ्ट स्पेन्सरर्ते
केली आहे,
नच होणे शक्य आहे. केवळ जावन या कियेबा विचार
कतैव्य असता ती व्यक्ति कळोटकादि क्षुद्र् प्राण्यापेंकळी आहे
अय्’र व्यायणननादिं उच्व प्रप्प्यांघेक‘व् अगर प्रप्णिफौटळो
किंवा उद्धिज्जकोंटळो यापँक’टॅ आहे हा विचार दृ‘ष्टे व[ड केला
पाहिजे कारण प्राण्याना आकाररचना याचा विचार विकास‘
व[द'ळात केलेला बरा, म्हणून या जळोवनक्रियेचा जेवढ्या सोप्या
व साच्या तऱ्हेर्ते विचार करता येइल
गद्यळिवतामणी'
व अर्थात हो
तेवढाच विचार येथे
वग्वन घेतलेल्या दिसतात. यांतील क्ऱ्थाभाग श्नळोपुरा- वनस्पतित्रोवनविचाराला उपळोढूघात म्हणून केला णांहेबे.
: प्रथम जीवनाची मुख्य लक्षते सांगून जीवनपँशॉ अगर सजळोव
प्रांतील कथाभापापेंक्षां थोडा भिन्न दिसती.
व्यक्ति व निर्जीव वस्तू यांतील फरक निश्चित केला पाहिवे.
परंतु निरुत्तकदेवर
हा गद्यन्यितामणि
किंवा
क्षय-
नृडामणि या प्रेथांचा उक्केख करीत आहो व याचा टोंकाकप्र
नच्छिनारक्विमिआर हा या ग्रेथ’ला केवळ सच्छवपुरानाटेंप्
माध्यम
म्हणतो;
यावरून
याच्या काली तरी
हा
ग्रंथ
दुसऱ्या ग्रंथग्र्वे रूपांतर असा समजला ज[त नड्रुन त्ळो
महव्पुराणावसनच धतलाआह असा समज असावा. या
ग्रंथाचा काल १० व्या व ११ व्या शतकाच्या दरम्यान
घ‘म्रेगत
( क्रुप्पस्वामिशध्स्त्रळी यांचा इ. में. (१९०७)
मधील लेख पहा.).
जीक्घन किल्ला…हा विध्लानाणेवाटाच्या तोंडावर
पुण्याच्या वायव्येस ६५ मैल व जुत्ररच्या फ्श्विर्मंप्त १६मेलां॰
वर अछून` तो समुद्रसपार्टापाखून ३००५० फूट उंच आहे.
घाटघर खडथाच्या सरहदॉत ह्या खडयावा समावश
होतो. किळयप्च्या चारा व[दूंप्स कडे तुटलेले आहेत, कॉंकणवै
न[हूंचा
भाग तर
फारच
खाल
आहे.
याची
लाव]
१
द्वार द्रुंद्ळो ",... यार्डे आहे. हा [केला जवळ जवळ
शिवतेरीनारखाच आहे. ळिकलयाचा चलाव एक मैलाचा
पण फार अवघड आहे. वर कांहीं तोड लोकांच्या वेळचळो
करेर'प्व लेणी आहेत. ह्या क्रिळयावस्प्द्दन साष्टांच्या र्टेकडथा,
तुंगप्र, वसईं, कामणगड हा ठिकाव्व् व निर'प्र दिवशी समुद्र
देखील दृष्टीस पडतो.
अहमदनगर येर्थाल निझामशाहो घरार्णे स्थापन कर॰
णाऱ्या पहिल्या अहमदर्ते हा किल्ला १४८९ साली घेतला
होता. पुढे १६३७साली शाद्द्यजींऱ्ट्टा मॉगलांना दिलेल्या पाच
किल्यांमथ्र्ये हा एक किंल्लाहोता. मराठी राज्यांत या किल्यावर
राजकग्य केदळो देवास असत. हा स.१ ८२०त ॰इप्ननांनळो पाडून
प्रग्णिज अगर
उद्धिज सजळीव व्यक्तींचे शरीर अनेक जीवन-
पेंर्शाच्या योगाने बनलेले असते.
या घेशळोवै मौठाले समुह
असन त्याते जननपरेपणवुष्ट‘द्वे हे व्यापार स्वनंत्रपणें व
अव्याहतपर्णे त्या सजीव व्यक्तींच्या शरीरात चालू” असतात.
तसेच त्यांना अपघात, धळोका, विपव[या,आत्मविपश`[पण[मुर्के
आलस्य व मरण वगैरे आपत्ता आल्याने त्या व्यफोचै‘जळीवन’
[हे थांवण्याचा प्रसग येतो हे पहिले लक्षण होय. कावेन,
हायड्रोजन, आँकिसजन, गधक व नायट्रोजन या सायारण व
पसिवैत मुलमृतद्र्व्याते नैटूळोजनविशिष्ट असा प्रळोटांड नामक
पदार्थ सजींव व्यफॉंच्या शरीरात असतो. हा नैट्रॉजनसामेंश्न
पदग्ये सजीव व्यक्तींच्या शरीरास्वेराज इतरत्र बनत नाहळो.
याचप्रभार्णे पिप्ट व वसायुक्त पदार्थांचा उत्पत्ति हो या सजीव
व्यक्तींत होते. परंतु त्यांचळो उत्पत्ति इतरत्र देखील होव्ग् समवनळोय असतेजावनपेंशळोत का'हो प्रकारवै क्षार व पाणी होहि
बनतात. इतक्या साधनानों व द्र्व्यांनळो परिप्छुत असलेली
परंतु त्या द्र्व्यांतील वैयक्तिक व स्वतंत्र गुणाढून भिन्न गुण-
धमौचळो हो सजळीव व्यक्ति असते.
आता सजळीव
व्यक्ति व
निर्तींव वळू यांमधळोल फरक कोणता हैळिह व[रकाईंर्ने निश्चित
केले पाळाहेबे. नितीन वस्तुंत स्फटिकमय रचना असते व
सजळोव व्यफाँत ती नसते हे एकदां प्रचा’लत मत अमात्य,
मिथ्या व आभासमय आहे.
सजीवांमध्ये चैतन्य असणें व
निज’व्वति ते नसते हे लक्षण
अधिक याह्य व सत्य
“तथापि त्यांतील अपवाद येथे कथन करीत
न[हळो.
आहे;
शीत,
उष्ण, क्षांऱ, विद्युत् वगैरे व[ह्य साधनाने सजीव व्यक्तीवर
पारेणाम होतो. तथापि मित्र प्रकारचा तो तिज्’प्ळीव वस्तूंवरद्दि
होतो. प्रजोत्पादन हे लक्षण सजळोव स्थितिद्शक मानतो येते.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/९०
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीयशांनफ्त्मि ॰रज्ञ) २६७ नांव नकप्र्थविचार परंतु खनिज ( निर्तीव )वर्गावैकों पारा पडून त्याच्या नारंप्क गव्ळ्या वनतात. त्याचे पेशोवधैनाच्या योगनि होणाऱ्या प्रबोत्पाद्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीयशांनफ्त्मि ॰रज्ञ) २६७
नांव नकप्र्थविचार
परंतु खनिज ( निर्तीव )वर्गावैकों पारा पडून त्याच्या नारंप्क
गव्ळ्या वनतात. त्याचे पेशोवधैनाच्या योगनि होणाऱ्या
प्रबोत्पाद्नार्शी साम्य जुळवून देतात. ज[वनपेंर्शार्चे वघन या
र्जावनकप्र्यघियार
घन झालेला असतो… द्दळीच स्थिति पेशोश्चित्तिकेजवळ
असते. त्यामुळे पेंश्मि’मत्तिकँस तत्ळो'च ज्ञलस्थानास एक
प्रकारचा आधार
पेशिभि'प्त्तेका व जलत्थान
मिळतो.
ह्या
तऱ्हेव्ळा होते व कळोणतांद्दि जळोवनपेंशो अगोंद्रच्या पेंशोपामून
निन्‘सत झालो असली पाहिजे ”ह मत तर इझी मान्य आहेच.
दोहँऱसधील जोवरसाचा साग इतर ज्ञप्र्वेपिक्षां पातळ असतोझ्व
म्हणून सजप्व व निर्बीव थांवळील मुख्य भेद् रासायनिक स्वखपाचाअहूंन आ’तसमिथ पद्ग्थें बो प्रळोटळोङ तो सजळोवगेंत साप-
हो तळोन्हो सजीव असून सव जीवनकार्ये ह्यांकट्टनच होतात.
जीवरसाचें रऱ्रिं रासायनिक पृथक्करण सवेतन स्थितीत होणें
ङतो,व निर्बीवढेत सापडत नाह”! एवर्ढे लक्षांत ठेंवलॅं णाद्देबे.
शक्य
काही तऱ्हेवै ळिकर्डे,कळोटक,.जत वगैरे प्राणी व[ळचून अगर वफाँत
कोणत्या स्वरूपाचे असतात हें सांगतां यैग्ग कठिण आहे.
ठेवते असता
ह्याच पातळ रसात जीवनपिंड असतातर्केद्र्ट्युळोवनपिंडर्लावरस
नसुन
त्या
स्थितळीतळील
रासायनिक
घटक
परिहिथतोत
सर्वे साधारणपणे जोवरसठेंत कारवन,ह्रप्यड्रोजन, अळोऱकेसज्ञन,
त्यांस ठेंवनठेंव ते जिवंत होतात हा अनुभव आहे.तर्तेच यळोग-
नायट्रोजन, गंधक व फौरफरस असे शूलघटक पदार्थ आत…
साघन व प्राणायाम याच्या अभ्न्यासार्ते जिव्हा ताछुरंप्रांत घालून
मन अतर्मुरव करून समाधि लावली तर छुतप्रण्य स्थितळोत
ळतात. ह्माश्विमूळ् पदार्यांपातून वेगवेगव्हुं रासायनिक संयुक्त
पद्प्थ वनलल आढळतात. पण त्या सव पदाथातून कोणत्या
विशिष्ट पदार्थांत सचेतन शक्ति असते हे सागणें सवय न[हळो.
हे पदार्थ केव्हाद्दि स्थिर नसतात. ह्यांमघ्ये’ एकसारख्या
ड्रुतवतू होतात.
परंतु अनुकूल
योगी कित्येक दिवस असतो व पुर्ढे तो समाधि उतरून शुद्धीवर येतो अगर निवत होतो .हो स्थिति खरा मानण्यात वरळोव
नागा आहे व यावस्वन सजळोव व निर्बीव गांतळाल भेदांताल अनि,
श्वितता वप्तघिण्यास एक सायन उपलब्ध आहे अतै म्हटले
डामोडॉ होत असतात.
ह्या घडामोडींची कारणें
आंतर
असोत अगर बाह्य असोत परंतु त्यामुळे कर्बी कघी एखादि
तर्तेच उत्तर व दक्षिण घुयाकडॉल काहीं प्रऱणळो
बाह्यशक्ति करारात सठिते, तर कर्घप् शरीरातील पूर्वे णक्त‘म्ना
तेथील अति कडक हिवाळा येण्याच्या सुमारास त्यांच्या
अंगावरळोल लाँकर अति वाढून ते चारसहा सद्दितै सदप्निद्रा’
वश होतात तोटॅहे प्रकार असाच आहे.
व व ला ।‘ते वि व य क.
प्रथम सर्वे नीवनास आघारभुत
अशा जोवरसाचा
अथवा निद्र्साचा विचार करणें भाग आहे. त्याशिवाय तो
विकास होऊन तिर्वे उपांतर होते. त्या घडामोडी फार व्यक्-
तरी चालेल,
स्थित र’प्तोनें चाललेल्या असतात. त्यांत यिघळाङ फार कनितूं
होतो. शारीरिक व रासायनिक
घडामोडी
सुसंगत
चालव्ळा
हेंच सचेंतनत्वण्चें खरे लक्षण होय. जेंव्हा असल्या घडामोडॉत विसंगतता उत्पघ होते तेव्हांव त्यांतळोल चैतन्य नाहांर्ते
होऊन मृतस्थिति उत्पन्न होते.याहेसन अवद्र्व्यें शोषण करणें,
सजीव व्यक्तींचव् जोव-
त्यांची योग्य जागी पाठवणळो करून त्यापासून तेक्सि पदार्थ
तयार करणें, अनवश्यक वस्तूंचा त्याग करणें, श्वासरैब्दनासद्वारा घडामोंडंळोस लागणारी शक्ति पुरनिपेंळा अथवा नूतन
ताद्दि मेट… नसतो. अनप्रहृण, वर्धन व प्रजोत्पादन या
गोष्ठी सर्वे साधारणपणे प्रत्येक सजळोव व्यफाँत अढळतात, व
त्या गोष्टी म्हणबेव व्यक्तींची मुख्य जळोवनकार्ये होत, हो
उत्पत्तोस चलन देणें वगैरे सर्वे जीवनकायें जीवरसाकडून
अथवब् कँद्र्ळादिंचींवनपिंडाकडून होतात. साच्या शकट्रेसादे
बोवनकथिं केवळ जळीवरसाच्या सवेतनत्वप्मुळेंच घडून
येतात. म्हणुन वनस्पती व प्राणी यांच्या प्रत्येक बोंवन॰
त्या पद्प्र्थांचें सात्मांकरण करणें व ततुद्वार.’ जळीवरस वाढविणे
व पुन: तो जीवरस शरॅप्रवुद्वळोसाटॉ रवच’व्गै, हो सर्वे कार्ये
विषय वरळोवर समजणें शक्य नाहो.
नफायें केवळ जीवरसावर अवट्टेऽवून अड्रुहूंन वनस्पति-जीव…
रस व प्नग्ळिण-जळोवरस ह्या दोह’म्च्या मुलभूत गुणघमौत कोण-
कार्योचप् उत्पादक जीवरस आहे हें निश्चित होय.
प्रत्येक
ओंपट पद्प्र्योपप्खून नायट्रोजनयुक्त पदार्थ तयार
जीवनरसाकढून होतात.
मुळचा जीवरस,
मुळ्या,
करणें,
फांद्या,
सवेंतन पेंशें'ळात जळोवरस असतो. त्यामुळे त्या पेंशीकडून फांहॉ
कळ्या, पाते, फुत्ऱ्ऽ वगैरे अवयव उत्पन्न करण्यात
विशिष्ट जळोवनकायै घहूं शकते. असल्या पेंशांस अथवग्
पेंशिंसमुच्चयास ईंद्रिय अशी तेज्ञा देतात. अशा पेंशोखप
अगर पेंशिसमुच्वयस्वप इंद्वियाकडूंन घडणाऱ्या ज्ञीवन-
जाऊन पुन्हां नवळोन जीवरस त्याच मागोंनों वना‘वेंण हेंव
कप्यळीच्या सळोगांतेस ‘ जौवनकप्ये-बिचार " असे म्हणतात.
जळोवरस (प्रोटोष्ठाझस )8… प्रत्येक सचेतन पें’र्शग्मघ्थें तौन
रवचिंलप्
जौवरसार्वे खरे लक्षण होय. शरोरट्टद्धि तर्हेच वॅशड्रुद्धि हें
जीवरसावे स्वाभाविक घमैं आहेत.यात्तविंक वनस्पति अथवा
प्राणि'श्ळारळोर हें बीवरसार्चे पळिरणत रूप आहे. कारण वरळीराचा
प्रत्येक घटक भाग
जळोवरसान्-या
घडामोंडॉचें फळ
फार पातळ नसुन घट्टद्दि नसतो. तो पारदर्शक असून कणळो'
आहे. म्हणजे शरोरघटकपेंर्शात जीवरस प्रत्यक्ष आपल्या पूर्वे
अथवा रुपांतर स्थितच्त असतो. शर्रारट्टद्धि करण्याच्या कामी
जोवरस सळोयळोसाठो निरनिराळे खण तयार करुन त्यांत तो
दार अथवा रवप्ळ असतो.
थळोङथा’वटुत प्रमार्णात राहतो. असल्या रवणास आपण
मुख्य भाग असतात. (१) पेंद्रिस्मित्तिका,(२) पेंशींद्र्व्यै व (३)
जळोवरस. ह्यांम'र्ये महत्वाचा भाग म्हणजे जौवरस होय. तो
गीवरसांत ‘ केंद्र ’ म्हणून एक
पिंड असून दुसरे अनेक जोवनपिंङ असतात.
जलस्थान अधून
त्यासभो’वतों
जौवरसाचा
माग
पेशी
मध्यभागीं
म्हणतो. सचेतन स्थिर्तांत पेंर्शापेंशॉचा परस्पर संबंध भित्ति‘
किंचित
र्फेबून पसरणाऱ्या जळोवरसम्च्या ड्रुरेम घा’यामुर्के कायम<noinclude></noinclude>
2lp442fmsz869t61om8dn1f84u6uddf
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/९१
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जीवन कप्र्थेविचार जीवनकायोंवेचार महाराष्ट्ररेय नप्नकव्र्दैध् ( ज ) २६८ असतो. यामुळे सर्वे शरीरात जीवरसाचीं एकहूंत्रता असते. येतात. पेशीचळो जाडी व आकार या एकलूनतमुळ् एका ठिकाण..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जीवन कप्र्थेविचार
जीवनकायोंवेचार
महाराष्ट्ररेय नप्नकव्र्दैध् ( ज ) २६८
असतो. यामुळे सर्वे शरीरात जीवरसाचीं एकहूंत्रता असते.
येतात. पेशीचळो जाडी व आकार
या एकलूनतमुळ् एका ठिकाणी पडणारा
द्ना दुसऱ्या जाग”! पेंशीपेर्शानृन सहज
होणाऱ्या र्जावनकायोंवर अवलॅवृन असतात.
उत्तेजनरूपळो सवेरळीतळोते पोहोचते.
अशी प्रकारचा सवे शरीरात सार्वत्रिक स'वंघ
हो केवळ पेशीकढून
इंद्रियळोत्पत्तिम्… पेशीच्या सर्व भागळो वीवरस
सारखा
असणें अवश्य
पसर`लला असतो अते वाटण्याचा सेमव आहे;पण वस्तुस्थिति
तशी नसते. एकाच पेशीतळोल र्गावरसाच्या घटर्नेत थोर्डे’
केंद्र ( न्यूंक्कस ):-…जळोवरसाच्या विशिष्ट पिडास आपण
बहुत वेनित्र्य असते. त्या जव्वरसाच्या वेनित्र्यापाड्रुन प्राथ-
व द्दितानहृ आहे.
र्केद्र् म्हणतो. जळोवरसाचें घटक
असतात.
परंतु
केंद्राच्या
नेहमी वद्लणाऱ्या
त्यिर्तांत
फॉंमव्डिया
नांवप्च्या
घटफांच्या मूळ रिथतोंत फारसा बदल होत नाहो.
कडींल शखीय शीपांर्ती जळोवनकायाँवै
घटकाकडॅच
येत आहे.
गुणपर'परा
र्केद्र्घटफांकडून होते असा समज आहे.'
ह्या र्केन्द्रघटक'ण्र्चे
प्राकृतिक अगर
आले-
चालकाव या र्केद्र्‘
चालू ठेवण्याचे काम
रासायनिक
विशिष्ट
प्रकारचे स्वरुप नेहमी असते असे मात्र म्हणता येत नाही.
कॅद्र्रसर्गेत
केंद्रबिंदू असतात.
कारवन,
हायड्रोजन, नाय-
ट्रोजन, आण्केसजन वगैरे मुख्य घटक र्केद्र्ति ततेच जॉनरस'ग्त आढळतातघ'रतु जत्वरसात फारकरस हा विवेप्प आड,
ळतो. शरीर-……वुद्वीत अथवा वसवुडॉत र्केद्र्च पुढाकार घेते.
नवी पेशी उत्पव करण्याचे काम र्केदाकडूनच होते. पूर्वे.
र्फेद्राचळा विभाग होऊन नवीन केंद्र उत्पन्न होते व ह्यापांसून
नवी पेशी तयार होते. नवीन होणाऱ्या पेशी एकाच शरी-
मिक
इंदियरचतेस
आ'रम होतो. एक
पेशीमय
वनत्पत’प्‘तोंल इंद्रिय-रचनैचा शोध १८६१ साली अतेत्ट
बुक नांवाच्या शास्त्रज्ञाते लाविला. पेशीतळील जोवरसावे कमी
अधिक घनत्व ततेच र्केदादि जोवनपिंडचिं सफौणेंत्व म्हणजेच इंद्दियरचना असे त्याने म्हणणे आहे. हूत्स पेशीत
मुडां श्नमघिभाग अथवा कामाची वरॅटणळो झालेली
पेशीच्या काही
एका
भागप्कडूंन
एक
आढळते.
कायै होते व
दुसरे कायै दुसऱ्याकडून होते. म्हूंणने कार्याभेवतेप्रमाव्ळा
इंद्विमरचवेस टुरवात होते.
जरळो वात्गतेऱ् एकपेशीमय वन-
स्पतींत सवे जीवनकार्ये एकाच ठिकाणी चालतात अते वाटते
तथापि तो सत्रे एकाच जागी होत नसतात.
त्यांतदिं भिन्न
भिन्न भाग भिन्न भिन्न कामे करीत असतात.
भागांमध्ये इंक्सि…रचतेचा उगम असतो.
त्याच
भिन्न
एकपेशीमय वनत्पतळोचळो सर्व कामे एका पेशीत होतात,
पण वडुपँशीमय वनत्पतोत र्तीं कार्ये निरनिराळ्या पेन्सिसनुचगांत होतात. पेविप्-विभाग होऊन नवीन पेशी उत्पन्न
रात राहिल्या तर पूवे शरळोर वाढू लागते. या त्या पेशी होतात व पेशीवी सख्या वाढत जाते. सारख्या आकाराच्या
स्वतंत्र होऊन आपली नांवनकार्ये करू लागल्या तर वेशीचौ
.
.
. श्
_
‘ पेशीचा सघ एकत्र होऊन तो विशिष्ट ज’प्वनकार्यांस
वाढ होते. शरीर-बुद्धि व वश-वुद्धि ह्मामघ्यच सर्वे वाचन, ऱ्
९
।
(`
`
फप्याचप् अरींभपिं हात्तग्-
वीवनपिंङ (ष्ठास्किट्स):…र्गावरसांताल र्केद्र्म्सारखे दुसरे
उपयळेप्गळो
पडू"
लागतो.
असल्या
पेशिसयास
पेविग्जप्ल
म्हणतात.
पुष्कळ
पेन्तिचाते
एकत्रित
होऊन वी भाग तयार होतो त्यास
अवयव अथवा
महत्वाचे भाग म्हणज नांवनपिंउ होत. हें लहान मोठ्या आकाट्टेद्रिय असे म्हणतात. निरा’नॅराळ्या वनत्पतोंमघ्र्ये इंझीय'प्चळी
रावे असून त्याचा रंगद्दि वेगवेगळा असतो. रेगाप्रमाणें जळोव- ; वाड कमी अधिक होते. उच्च वनरपतां‘त आढळणाऱ्या मुल,
नकार्योत त्यांचा वेगवेगळा उपयोग होतो. श‘र्फेरादि ओपट
स्कॅन, पण इत्यादि इंद्रियांवी उत्पत्ति पेश्चिचालघेच्या सघटित
पदार्थांची उत्पत्ति ह्या जळिवनपिडाकहूंन होते. र्केदाप्रमाणेंच
पहिल्या
र्चांवनपिंडावै विभाग
होऊन
नवीन जव्वनपिंड
॰ष्त्पव होतात.
र्प।ते…ळिमत्तिकप्
भिंत्तिका
(तेल वे‘प्ल ):-न^।वरसाप[मूत
उत्पन्न होते. तिचें रासायनिक
घटक
पेहुद्देप्-
सत्वाग्दे
भागापातृन होते व प्रत्येकाचें नांवनकप्यें वेगवेगळे असते.
पेशीचळो आवश्यकता:…वेगवेगळ्या पेशीच्या ऐवर्जी एकच
पेंशि विस्तृत होऊन शरीरनृद्वीर्चे काम भासणार नाहो
काम ट्र वेगवेगळया पेशीमघ्यें जळीवरस रहाण्याऐववी एकाच
पेशीत तो का राहूं नवेट्र वेगळ्या पेशी असण्यार्चां जख्रळी
कायट्रे अशी प्रकारचे प्रश्न उत्पन्न होण्याचा समय आहे.
पदार्थांतार‘ऱ्नच असतात. पेक्सिमेप्त्तेकेचीं वाड आतून बाह्य…
प्रदेंशी होते. पेंरींण्भित्तिकच्या याद्देल्या तेद्रिय घटकात हें जव्वरस'प्सळोल र्केवास मोठया
कमाकमार्मे निरिंद्रिय द्रव्र्दे जमून तो पुढें सकव्णे होते.
वित्ड्रुत प्रमाणावर वनतेल्या
पेशीमघ्यें सर्वे वीवनघडामोडोंवर उत्तम रळोतोते तावा ठेंवितां
तिच्या वेगवेगळ्या कायाँप्रमणि तेदिय घटकात रासायनिक हें येणार नाहो. र्केट्टण्चळी शक्ति मर्यादित मागावर चालू शकते.
फरक होऊन तो पुष्कळ वेळां लांकडासाररवी बुळबुळिळत तर ` त्यामुळे तोयांसाटळो वेगवेगळे खण अगर पेशी उत्पन्न करून
कवी नाटलव्च्या बुचाप्रमाणें चिवट होते. तिचळो जाडी कमळो॰ ॰ प्रत्वेफांत वेगळे र्केद्र्यदि जौवनपिंङ' उत्पन्न होतात. नळोवनकायै`
अधिक असते. तिच्या प्राथमिक स्थितोंत तो
फार
पातळ ; हुलम रव्तोते व व्यवस्थितपणें चालण्यास एका
असते.परसु जीवरस'रतून पेशीघटकट्राव्यावै थर वरचेवर त्यावर अधिक पेशी असण्यांत फायदा असतो
जमून चाड होत जातेफ्रंतु थर कमळोअघिक जाड झाल्यानें
भित्तिकैस मळमुत्राक्रुति, वळीदार, स्वनिदार, वगैरे ॰ओं’कार
विभागास
उतमप्रकारे
पेशीपेक्षां
व अस॰
पूणें अवकाश मिळून ह्या स्थिर्तीत जळीवनकथिं
चालतात.
नाहो
तर
एकाच
ठिंकार्णी<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "र्जीचनकर्म्यविचार निरनिराळ्या व कदाचित महाराट्रीयज्ञानकोंश॰(ज)२६९ जॉयनफप्येंविंचार असतां सक्रुतूं दर्शनीं अतें दिसून येते का त्यांची उत्पत्ति कार्योचीं गर्दी होण्याचा स..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>र्जीचनकर्म्यविचार
निरनिराळ्या
व कदाचित
महाराट्रीयज्ञानकोंश॰(ज)२६९
जॉयनफप्येंविंचार
असतां सक्रुतूं दर्शनीं अतें दिसून येते का त्यांची उत्पत्ति
कार्योचीं गर्दी
होण्याचा समय आहे
त्यामुळे परस्परांत विरळोघ उत्पन्न होण्यास
पूवै जळीवरसापातून अथवा पूर्वे जोवनपिडापातून होते, पण
वाव मिळेल. ह्यांचसाठी पुष्कळ पेशी उत्पन्न होऊन पक्की…
जाल किंवा ईंद्विय यांचळो उत्पत्ति होण्यार्ते अधिक सोय होते.
केंवादि जीननपिडांनां सक्रुत्तित ज[गेंत रहावे लागते
बेव्होअगर्दी त्यांच्या मुल उत्पत्तोचा विचार आपण कहंऱ्
लागतो तेव्हां मात्र तो उत्पत्ति कशी झाली ह्याबद्दल
आपली मत्ति कुंठित होते. फांहो तत्त्नवेत्त्यांच्या मनार्ने
म्हणुन जरळो त्गांवी शक्ति मर्यादित झाली, तथापि तो
अधिक व्यवस्थित होते. पेशिभित्तिका ज[गजागॉ उत्पन्न
होऊन जोवरसात तजितनानळो कायम रहाते. निरनिराळ्या
पेशी उत्पन्न होण्याऎवल्प्ळो एकच पेशी विस्तृत होत राहिली
जौवनपिडा'च अथवा जळोवरसन्दि अस्तित्त्व दुसऱ्या गळोलावर
अड्रुव तेथून ते आपल्या द्रुपगोलावर उल्फापातावरौवर तारे
पडण्याच्या झटवन्यांत इकडे आले. जरी हें मत याह्य मानिर्हेऽ
ग्लानी अगर वुद्वा’
तथापि त्या गोलावर सुडां प्रथम त्याची उत्पत्ति कशी झाली
हा प्रश्न तसाच रहातो. फांहो शास्त्रज्ञांच्या मते एकदा असा
वस्या कालांतराने येणें साहजिक आहे. परंतु नवीन पेशी
उत्पन्न होण्यात नवीन जौननपिबांचळी उत्पत्ति होते व त्या
योये त्याचा तरतरिंतपणा कायम रहातो. जुन्या पेस‘ऱ्तव्ल
एक अनुकुल काल होता कीं त्यामध्ये आपोआप निंरेंद्रिय
द्र्व्यापालून रासायनिक कार्ये घडून ज्ञीवनर्पिउ तयार झार्ले
व पुढें कमाकमाते त्यांचे विभाग होऊन त्यांची बुद्धि होत
तर त्यांतोल जळीवनपिडास नैसर्गिक
जळीवनविडास थकवा येत जातो व त्याप्रमाणें ह्मांचळी नळीननकार्ये ष्णि‘थेंल होतात पण नवीन जींवनपिंड असल्याने जीवनकार्योत रनउ पडत नाहो. हे जीवनपिंड तत्ट्टण व कावेक्षग
असतात. ह्या कारणांभुळेंच जुन्या रवीडाचा गाभा पोकळ व
सुत झाला तथापि व[ह्यांगों नवीन पेशीचा भरणा असल्याने’
पाते, फुर्ले किंवा फळें येणें बंद होत नाहीं. म्हणुनच वरचे…
वर नवीन पेशी उत्पन्न होण्यात फायदा असतो.
जळोवरसाच्या गरज्ञ[:…-जौवरस[वीं पहिली गरज म्हणने
पाणी होय. पाण्याशिंवाय जळीवरसाचें अथवा जळीवनपिडाचै
सवेतनत्व कायम रहाणें शफय नाहो. जीवरसावै पोपण
गेली, कायैकारर्णांचा शुष्क विचार
प्रथम
जौवनपिंङ
उत्पन्न केल
वाढविण्याचळो शक्ति आहे,
अते
न करता परमेश्वरार्ने
वत्यांना
स्वत:ची
काहींचे
मत
परंपरा
आहे. त्या
मतानॅ मनावे कदाप्’चेतूं समाधान होईंल. परंतु जिज्ञासा
खु‘दून जाण्याचा स्थित
आला वसल. काहोचें मत
रचे ज्ञीवनपिंउ आपणास
त्यांना अनि शीत अथवा
आहे व त्यामुळे शीस्त्रळोय शीयास
असे आहे की हदृर्टी ज्या प्रकाआढळतात तते पिंड पूर्वी नव्हृतै॰
आ’ते उष्ण स्थिति मातवन अते.
अगदी साध्य निरिदिंय पदार्थापाखून विकासकमांत द्दक्कोचे
सफाँव्ग् जळोवनपिड कभाकमाते
उत्पन्न झळि.
निर्बीव पदा’
पाण्यावर अवलचून असते, पाण्यामुळे पेंशीत टणकफ्णा
र्थांपाक्षुन ल्फियेतरे होत
येतो. रवरळी फुग्यांत हवा मरल्यावर तो जसा टणक होतो,
त्याप्रमाणे जीवरस'ळात पाणी आल्यावर पेविळामित्तिकवर त्या
पाण्याचा ताण नसून तो टणक होते. प्रथम पाणी बेव्हूंकु
झाले. विकासवादाचा पुरस्कार करणारे डार्विन, हॅक्को, वॅलेस
वयेरे प्रसिद्ध तत्त्ववॅत्ते ह्याच रळीतौनॅ जळोवनपिडाच्या उत्पत्तीविषर्यो लिहितात. डॉ. शफरसाररेव रसायनशास्त्रज्ञ जीवन…
जीवरसात शिरते त्यावेळी ते त्यांत पूण्रै मिसछून जाते. पण
पिंड रासायनिक प्रयोगशाळेत तयार
लवकरच वावरत वगळा
आली आहे असें जोराने सांगत आहेत. नुकतेच ज्यांचे
सिद्धांत सर्व शास्त्रज्ञांस समत झाले आहेत असे सुप्रसिद्ध डॅ’[.
जगदश्चिचैद्र् वळोस म्हणतात कळी पदार्थात निवीव व सजीव
होऊन
जलत्थान
त्या ज[गॉ पाण्याचा साठा होता. सवे
त्थानाचळी साय
असते.
सवैतन
उत्पन्न होते व
पेशात जल…
पप्णननस्पर्तीना वाटेल तेव्हां पाणा
होत
प्रस्तुतवे जीवनपिड
करण्यासारखी
तयार
स्थिति
मिळण्याचा तेभन अतूनद्दि त्यांमध्ये जलस्थार्ते असतात व
असा भेदभावच रहात नाही. त्या सव’र्हेमघ्र्थे एकच प्रका-
हो ज्ञलस्थाते पेशिंरसनि भरलेली
रचे चैतन्य आहे. पान भिन्न भिन्न बाह्य कारणांनी ते
वेगवेगळ्या रळोतळीते व्यक्त होते अर्थात जीवनपिंडाचीं
उत्पा’त्ते अमफ्यापावून झाला असा वेगळा प्रश्न राहूं शकत
नाहोज्या पदाथ’दृस काहो कतणळामुळ विशिष्ट उत्तेजन॰ मिळते
ते पदार्थ त्या उत्तेज्ञनानुसार विकास पाचू लागतात व या
असतात. म्हणजे केव्होद्दि
पाण्यासारस्व्या अत्यंत उपयुक्त पदार्थाची अडचण पडूं नये
म्हणुन त्या त्यिर्तांत तुवां पाण्याची तरतूद वनस्पतळो का‘रेतात.
दुसरा अवश्यक वस्तु म्हणजे णुद्व हवा होय. शीवरसास
व वीवन’विडास रेवळतों हवा अवश्य मिळाली पाहिजे. हवा
पाण्यात विरून तो सर्वे शरीरात घसरते. हवेप्रमाणें अन्नाचळो
लहरी असते. अन्न सैदिय असो अथवा निर्सिद्र्य असो,
तथापि तें शरीरात शीपिलँ जाण्यास अथवा पेंशीचून दुसऱ्या
ज[गॉ पसरण्यास पाण्याची अवश्यकता
असते. म्हणजे
सवे
वस्हूंत पाण्याचा उपयोग पहिल्या प्रतळीचा असुन त्याशिवाय
कों’गर्तेहि गीवनकायै होणें शक्य न[हो.
जीवरसध्ध्‘या उत्पत्तीविषर्यो निरनिराळी
व जीवनर्पिड कसे उत्पन्न होतात
मते:-…बाँवरस
व्याविषर्यां विचार
केला
न्यायाप्रमाणें जीवनपिचाचीं उत्पत्ति झाली असावी.
जलशीपण.-…सवैतन
शरळीरातेप्ल
जीवनपिंडाच्या
शीर’गरेक व रासायनिक घडामॅप्डीस पाण्याची अवश्यकता
अत्यंत असते व ते पाणी शोधून घेणे हे एक प्रमुख जीवन…
कार्य आहे. जलशीपण करणें हा पाण्याशी निकट स‘बँघ
येणाऱ्या प्रत्येक सजीव पेशीचा स्वभाक्घमै असन तो अगदी
सूक्ष्म अशा एक पेंशीमय जसरथ वनस्पतोपाखून
तों तहत
मोंटमोंठया वुक्षांफ्यत ष्प्क्क जवळ सारखाच असतो. अगदळो<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/९३
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराधूंप्य न[नकळोश. (ज) २6० जळीवनकळाथीस्विग्ग्ऱ् प्राथमिक त्तउस्थ साध्या वनस्पतळो म्हणते पाण्यातील तवग जविनकायोंर्वेचार रसाकपैण’कियेंत रसांवै परस्पर मिश्रण अथवा आकपेण पे..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराधूंप्य न[नकळोश. (ज) २6०
जळीवनकळाथीस्विग्ग्ऱ्
प्राथमिक त्तउस्थ साध्या वनस्पतळो म्हणते पाण्यातील तवग
जविनकायोंर्वेचार
रसाकपैण’कियेंत रसांवै परस्पर मिश्रण
अथवा
आकपेण
पेत्ति-
किंवा समुद्र हैंण्वालासाररवे जलसृइ साधारणपणे आपल्या होतेपण ह्या क्रिर्येत अशी ठिकाणी एकागोंपणा रहातो.
शरज्राच्या सर्वं पुंप्टमागाचा उपयळोग पाण्याचे शीपण कर… मित्तिकच्या आतील अमास असणाऱ्या जीवरसाच्या
ण्य.च्या कामी करतात. परंतु मूस्थ वनस्पती ज्या मानार्मे . मुळें आतून बाहेर पेविळारस जाण्यास अडथळा होतो.
वातावरणांत न[देंडू` लागल्या, त्यामानाते ह्या शीपक भागांचा रून वाटेल त्तितर्फे पाणी जाऊ शकते पण आतील
सकळोच होऊ
लागला
व शेवटी
पाण्याशी
अगदळी
सांनिघ्य पावणारा तो भाग त्याची परिणळित होऊन
एक स्वतेत्र इंद्दिप अगर अवयव
बनते.
थरा-
वादे…
पेप्’ऱ्श‘
रसास व[द्देर जाण्यास मागें मिळतोच अते न[ह’व्.
त्याचे '
शीपणकार्योतळोल ज[वरसाची आवड:…पेशीत^[ल जॉन…
निकट
त्या अवयवासच
रसाचा थर जलशीपणास उत्तेजन देण्याच्या कामाँच केवळ
महत्वाचा आहे असे नाही, तर त्या पाण्यात ची द्र्व्र्धे विर-
सवॅसायारणपव्ग् ‘ मूळ ’ म्हणण्याचा प्रघात आहे. द्यामूळालूनच ॰जलशीपण होते. मुख्य मुळावर पोटमुळ्या अलून
लैली असतात त“[ किर्ती व करेणची शीपण करावयाची, हे
त्या सवाच्या अयाजवळ
ठरविण्याच्या वावतोंतळिहृ त्याकडूंन मळोक्षी महत्वाची
हजारळो शोपक’र्केस
असतात. ह्या
काम…
शीपक-ऱ्र्केसाकडून जलशीपणावें काये सुरू होते. पाण्याचा
निरळो घडते. पाण्यात विरणाऱ्या सवेच क्षाराचा शिरकाव
अश
चीनरस'ळातुन होतो अते
कोणी
समवृं
पोपणकायास
पडत
असतळोल तरच
जमळोनळीतकुल
नूक्ष्य कर्णामोंवतो विलगतेला
तेथून तो अश वेगळा केला जाऊन
शीवून
असतो.
घेण्यार्चे काम
कँसाकडून होऊ शकते. तेकडॉ शीपक ऱ्कस शीपण करण्याचें
उपपोगळी
नये.
विरतेले
॰त
क्षार
जीव-
रसाच्या थरांतून जलस्थानांत यंऊ‘ शकतात. पुअऽळ वेळां
काम करीत असल्यामुळे मोठमोठ्या बुक्षांसारख्या वनस्पतोस विरतेल्या क्षांराच्याघनतेत फरक होत गेला म्हणजे ते
जळोवरसावून शळोपिलै जाऊ शकतात. प्रथम जरळो त्यास अड’
पाण्याचा पुरवठा होतो.
`
अन्यळोन्य रताकषेण अथवा रस… सप्’मेंश्रण2०-एक कमी गळा होत असे, तथापि पुढें त्यांच्या घनतेतळोल फरकामुर्के
व अधिक घन अशी दोन द्र्वकप रसाम’त्र्यै फक्त एक
तूरेम
त्याचा अपायकारक
परिणाम
नाहोसा
होऊन तो पोषण…
चमेपटल ठेंविठें तर ते दोन्ही रस त्या चमँपटलातून एक…
कार्यास उपयळोगळो पट्टे शकतो. म्हणूनच त्याला आत स्थिर…
मेक’ळाकर्डे जाऊन परस्पर मिसळू लागतात. हो किंवा त्या रस…
ण्यास हरकत रहात
द्रुगांतोल घनतेच्या ळिमन्नपणावर अवलत्रून असते. रस…मिंश्रयांत परस्पर विल्द्व दिशेंकडे ज[णारे होन प्रवाह सुरू होतात.
पहिला प्रवाह पातळ रसातून ज[स्त घन रसाकडॅ पुरू होतो,
दुसरा प्रवाह उलट घनरसठेंलून पातळ रसाकडे असतो. प्रथमतऱ् त्यामानार्वे
पाहेला प्रवाह सुरू होऊन
दुसरा
प्रवाह
सुरू होण्यास कमी अधिक वेळ लागतो. ह्या रोतोर्ने मिश्रण
सुरू झाल्यावर होन्हो
रसर्तेची घनता साररवी होहैंपावेतो
ते मिश्रण चालू असते. दोन भिन्न घनतेचे रस परस्पर'ग्त त्या
प्रकारे मिस्ऱ्ळव्ग हा त्यांचा शप्राळिरक स्वभावथमें आहे.विन्त्येक
वेळां एकच रस दुसऱ्या रसाकडें अधिक ज`[रा`न आक’ग्पेला
नाहो.
पिलसरळीन
हा पदार्थ साध्या
स्थितीत जच्वरसात केव्हाप्‘हे शिरूं शकत नाही. परंतु तोच
( ग्लिसरोंन ) पदार्थं पुष्कळ वेळ पाण्यात राहून त्याची
घनता कमी झाली, तर जीवरस'ण्त शिंरण्यास योग्य होतो.
प्रथम त्यामुळे जळोवरसयेंत सजेंच उत्पन्न होऊन जलस्या’
नांतून पाणी बाहेर जाऊन पेशीतोल ताण कमी होतो. पण
पुढें घनतेत फरक झाल्यावर जोवरसावी तेकळोच-स्थिनि
न[हळाशी होऊन ळिग्लसरळीन हा पदार्थ साच्या पाण्याप्रमणि
वाटेल तसा
आंत जाऊं
शकतो,
ग्लिसरळोनप्रमाणेंच आल…
कळोहल किंवा मद्याकँ र्बावरसात फिरू शकत
नाहो. पण
त्याची हो घनता फार कमी झाल्यावर त[[हे साम्या
पाण्या’
जाऊन तो दुसऱ्या रसास पूर्णेपणें मिंसळतो व दुसरा पहिल्या
साररवा फिरू शकतो. जळावरसऎतुंन एखादा पदार्थ विरलेल्या
रसाकडे आकव्‘पला ज[तच न[हो. असे झळि म्हणजे मिश्रण
[’स्थत'प्त जलस्यान'ळात श्चिरणें झाल्यास त्याचँ प्रमाण फारच
बूक्ष्म असते पग‘हेते. जळोवरसास अवश्य लागणाऱ्या क्ष’रांर्चेच
एकांगी होते.
शीपक-र्फेसद्देकडून होणारे अन्योंन्य रस[कपैण:-शीषक…
कँसांच्या चारळो वाहूंग्स भित्तिका अवून आतील अगप्स जाव,
काहो एका विशिष्ट प्रमाणांत शीषण होऊ शकते. पाण्याच्या
परमाणुवर ततेच त्यात विरल्'ऽल्या क्षारा'च्या परमम्णूंवर जीव…
ज्ञलस्था०
चें आकपेण भिन्न भिन्न प्रकारे होते. म्हणून वनस्पतळोमघ्यै
जमीनी-तोल
जमौन’ळोतून पाणी शरेप्पेंलँ जाते. त्यांताल क्षारांवै प्रमाण तसेच
पाण्याशी येतो. म्हणुन जलस्थानांतळोल पेशीरसांत व जर्म[ची…
त्या जमीवीतळील पाण्याच्या क्षारप्चें प्रमाण वेगळे असते.
एकाच ज[गॉ वाटणाऱ्या निरनिराळ्या जातींच्या झाडांची
राख करून तिचे पृथक्करण करून पाहिल्यास असे दिसुन
येईल की तेथील पाण्यात असणाऱ्या क्षारांच्या प्रमाणाढून
रसाचा पातळ कणादार थर असतो. व मध्यभागी
न[त पेशिरस
असतो. शीपक
र्केसकँचा
स'बंध
तील पाण्यांत ‘ अन्यळोन्य रसाकपेण ’ क्षुस्व होते. त्यायळोनाते
जमींवीतृन पाणी जलस्थानांत आकर्पिते जाते. त्यास अडथळा
पेश्मिभेत्तिकैकडूंन होत नाही. जमौनींतोल पाणी पुष्कळसे
शरँळोपेंरऱ्ऽ जाऊन ते जलस्थानांत सठिविरऱ्ञ् जाते. मात्र ह्या
ठिकाणी एक वित्रूगष लक्षांत ठेवण्यासाररवी गोष्ट म्हणजे जलत्थानांतून पेश्विरस कळिचतच व[देंर जातो. साध्या अन्योंन्य
झाडर्तेतोल क्षारांर्चे प्रमाण निराळे असते, एवर्ढेव नव्हे, तर
निरनिराळ्या ज[तोंतद्दि हे प्रमाण आढळते. अश[ प्रकारे
जमंप्नॉतोल पाण्यात क्षारांचें
कयेंहोहि
प्रमाण असते तरी<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/९७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीथ सानकॉँश- ( ज ) २७२ जीवनकग्र्थविंवोर‘ सैबेघ होऊन कबाँम्ल रस तयार होतो व हा रस क्षार विर॰ विषयास उपयळोगळो पडतो. कते‘ळिह असळें तरी जमिनीतोल कठिण क्षारावर ह्या अम्लाचा रास..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीथ सानकॉँश- ( ज ) २७२
जीवनकग्र्थविंवोर‘
सैबेघ होऊन कबाँम्ल रस तयार होतो व हा रस क्षार विर॰
विषयास उपयळोगळो पडतो. कते‘ळिह असळें तरी जमिनीतोल
कठिण क्षारावर ह्या अम्लाचा रासायनिक परिणाम होऊन
ते विरतात व पुढें त्यांना शिरकाव शरीरात होऊन पोषणकार्योत त्यांचा मोठा उपयोग होतोमूलजन्य शक्ति अथवा दावऱ्-ळंअन्पोन्य रसाकषेण
क्रियेर्ने जमिनीतून पाणी शीषिळें जाऊन जते जते ते
जलस्थानात साठू लागते तसतसा त्या पाण्याचा त[ण पेशि-
जंविनकप्योंवैचांर
वर जाणारा पाण्याचा
प्रवाह बाहेर
गळून
व[हूं लागतो.
परंतु व[ष्पध्च्छूवास सुरू असता अशा प्रकारे पाणी वहाण्याचा
सभव फार कमी असतो.
कारण त्या स्थितीत पेशिमित्तिकेवर तणाव उत्पन्न होत न[हो म्हणून तो फांथ्ण्याची
भोतोद्दि कमी असते. विनाकारण पेशिरस वाया जाणें हे
एकंदरीत नुकसानकारक असते. पेंशिरस'ळात तेद्दिय वनिप्‘रे’द्रेय
द्र्व्में असतात. असा पेशिरस जमविण्यास झाडाची शक्ति
कितो तरळी खर्थ झाली असते. परंतु जर तो पेशिरस
भिर्तिकवर वतूं लागतो. एक पेशी पाण्याते ताणलळो गेल्यावर
ज[वन_काय॰।॰त उपयोगी न पडतो कवळ बाहेर गळून जाईल
त्याच प्रकारची [हैथा‘ते दुसऱ्या पेशीत उत्पन्न होते. कारण
त्या पेशीत व पहिल्या पेशीत अन्योन्य रसाकपेण-किया
तर झाड'प्चें नुकसान फार होईल.
क[ह"[ वेळी अशा व[हेर पळणाऱ्या पेशिरसातून विरून…
सुरू होऊन पहिल्या पेशीतून दुसऱ्या पेशीत पाणी जमा
योगळो पदाथचिं विसर्नन होते. पण त्यावरळोवर पुष्कळ पोषणीं-
होत
गेल्याते
तेथव्ल
पेशिभित्तिकॅवर
फ्क्वियासारखा
त[ण नसतो. एवढ्या वेळांत पुन: जमिवीवून नवीन पाणी
पहिल्या पेशीत
येते.
अशी
रळोतोनें पहिल्या
पेशीपासून
द्रुसरॉत द्रुसरळोपासून तिसरॉतनिसरव्पासून ववथॉत तो क्रिया,
सुरू होऊन सर्वे पेशीत पाणी भरते जाऊन त्या तापुंप्
लागतात. याप्रमाणे हो तणावाचळो स्थिति मुळयांच्या साली…
तोल (कॉंट्टनस) प्रत्येक पेशीत उत्पन्न होते. ह्या तणावांच्या
सकळिलत परिणामामुळे तेथे एक विशिष्ट शक्ति उत्पन्न होते.
हो मुळ्यांतोल पेंशीच्या तणावार्ने उत्पन्न होते म्हणून तिला
‘मूलजन्यशान्के‘ अते म्हणतात.
स्तभासभोवतो सालार्वे वॅष्टन असल्याकारणाते त्या तणाव…
जत्य शक्तींवा परिणाम स्तेभावरसूद्वा होतो. स्तेभांतोल
काष्टवाद्दिन्यांत ह्या तणावाते
सालीर्तांल तणाव
पेशिरसाची
उछूपास
होऊन
कमी होतो. परंतु पुन: नवीन
पाणी
पयोग‘ळापदार्थं गळल्याते तोटा होतो.
केवळ त्याज्य पदार्थ
न[हच्ते झाले असते तर फायदा झाला
स्थिति फाचेतच असते.
व[णोत्सबँन
काधिक पाणी
असता
पण अशी
अथवा न[ष्पोच्छूवासऱ्-जलस्थानांत अधिजसजते शमैपेठें जाहँल तसतसा त्या पाण्याचा
उपसा होत जार्णेदिं अवश्य आहे.
पूर्वे पाण्याचा उपसा
होत गेल्यारवेरळीज नवीन पाणी शळोषिर्ले जाणें शक्य
न[हो.
नवीन पाणी वरचेवर आल्यारवेरळोज पोपणीपयोगों अवश्य क्षार
शरीरात कते
येत जाणार ट् े शोपिल्या जाणाऱ्या पाण्यातील
क्षारार्चे प्रमाण फारच सूक्ष्म असते. अशा स्थितोत नितर्के
पाणी वरचेवर शीषिर्ले जाईल तितक्या प्रमाणांत पोष्टिक
क्षार शरळीरात येण्याचा सैमव आहे. पाणी एकसारखे
शरळीरांत येत ग्ळोहँ तर ते सगळे तेथें मावणें शवय न[हाँ.
म्हणून पाण्याचा उपसा व[हेर होत जाणें अवश्य असते.
तेथे जमुन पुन: पूवीसारखा ताण उत्पन्न होतो. यश्प्रमाणें
सूर्यप्रकाशीत शरोंरांतळोल पाण्याची वाफ होऊन तो वाफ
नवीन पाणी वरचेवर शीपिळे जाऊन
हवेत मिसळते व त्यायोगे पाण्याचा उपसा होत गेल्याने
नवीन पाणी शिरण्यास मागें मोकळा होतो व त्याबरोबर
वाहिन्यांत होऊन
पाण्याची
परंपरा
त्या उच्छुवास काट
एकसाररवी
कायम
रहाते. हळी सूलजन्यशाके म्हणते शीपित्या जाणाऱ्या
जाणाऱ्या पाण्यामुळ उत्ताजत काढल्या जावरसाकडून
अवश्य क्षाराते’प्हे शीषण
होते. पेशिरसाच्या व[ष्पळीमवनास
मिळणारे एक प्रकारचे प्रत्युतर होय. ह्या शक्तळीते सूळांतून
खोडांत व खोडांसून पानापयत पेशिरस चढण्यास मदत
‘ व॰ष्पळोत्सर्नन’ अथवा ‘ व[ष्पोल्छुवास ’ म्हणतात.
साच्या पाण्याचा व[ष्पोच्छूवास व पेशिरसाची व[ष्पोच्छूवास
ह्या दोहोमच्र्ये फार फरक असतो. उष्णतेच्या कमी अधिक
होते.
नावाप्रमाणे अथवा
सूलजन्वशत्तांचे चमत्कार:-॰…कमी
कथळो कडू
आपोआप फाडून त्यातुन पेशिरस व[हूं लागतो.
अशा
रळोतळोते वाहण्यामुळे झाडाची खरानळो
होते.
[तेन
पेशिरस
त्याचा
परिणाम त्या झाडाच्या
पोपणकायहेंवर होऊन झाड
व[ळून जाण्याचा संभव असतो. झाड फांटुन पेशीरस
वाऱ्याच्या
कमी
अधिक
बॉराप्रमाणें
साध्या व[ष्पळोच्छूवासांत पाण्याची वाफ होऊन हवेत मिळते.
हो किंवा केवळ प्राकृतिक आहे. परंतु पेशिरसाच्या व[ष्पो`
च्छुवासात वेगळा प्रकार आढळतो. पेशिरसाची व[फ होणें
अथवा तो अमुक एक विशिष्ट प्रमाणात होणे हो गोष्ट केवळ
चमत्कार
उष्णतेवर अवलंबून नसते. पेशि-रसाची वाफ होऊन हर्वेत
मिसळणें व त्यामुळे नवीन पाणी शळोपण्यप्स मदत होणे
आहे. पानांच्या अप्रांबून दवासारखें रस…विदृ सकाळी
आलेले आढळतात. ह्यांचे कारण तुवां सूलजन्यशक्तळीच
अथवा अन्न… क्षाराप्’दें पदार्थ शळोविठे जाणें वयेरे गोष्ठी केवळ
जड स्वरूपाच्या नसून त्या शर’प्रांतोल ज[वनपिंडर्देच्या
होय. राशी पानांसून व[ष्पोच्छूवास होत नसल्याकारणानें
पानाच्या अयात आलल्या पाण्याचा ताण अधिक होऊन
ज[वनात्मक
व[हूं
लागणें
हा
सूलजन्यशक्तळीचा
एक
कित्येक वेळां अप्नाकडळोल पेशिभित्तिका कळून जाते व खाछून
रासायनिक
घडामीडोंप्रमाणे
होत
असतात.
परिंळारेऱ्थतोप्रमाणें पेशिरसाची वाफ कमी अधिक होऊं देणे
अथवा तो अजिबात बंद करणें, ततेच तो व[हेर जाण्याचा<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/९८
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "र्क्सथतानकोंश.(ज्ञ)न्रऽइ जीवनकार्थनिचार त्या व[सूवर फारसा होत न[हळो. भित्तिका पातळ असल्याकारणाने मागें खुला ठेवणे अथवा न ठेवणे वगैरे कार्ये ज[वनपिडॉच्या उत्तेजनकायाँवर अवलचू..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>र्क्सथतानकोंश.(ज्ञ)न्रऽइ
जीवनकार्थनिचार
त्या व[सूवर फारसा होत न[हळो.
भित्तिका पातळ असल्याकारणाने
मागें खुला ठेवणे अथवा न ठेवणे वगैरे कार्ये ज[वनपिडॉच्या
उत्तेजनकायाँवर अवलचून
असतात.
म्हणूनच
साथें
खुले होते व त्यांतून आंतोल अंगास असणाऱ्या व[तस्था’
न[तोल व[फेस व[हेर पडण्यास आपोआप मागें खुला होतो.
जर रक्षकपेशिद्वयांन तणाव उत्पन्न होणार न[हो तर तिच्या
व[ष्पळीत्सर्ननावे फायदे:…पेशिरस[चा व[ष्परूपा उच्छुवास
पाणी
शर[र[त
शिरण्यास एक
प्रकारर्चे
दळोन्हो वाचू सारख्या निल्या राहून त्यांताल त्वगू-र'न्न जवळ
उत्तेजन मिळते व त्यावरळोवर अन्न…क्षारविं शोषण होते.
अशा ठिकाणी पेशिरसास व[ष्परूप देण्याची काय जरूरळी
जवळ नद राहील.
आहे, तर व[ष्परूपाते केवळ पाणी न[होते होऊन नित्तिदेंय
अन्न-क्षार शररंरांत शिल्लक राहतात. त्या रातोते अन्नक्षार
शरव्रात राखुन पाण्याची तेवढळो व[ष्परूपार्ते विल्हेवाट लागते.
व[ष्पोच्छुपासाते शरव्रातोल
अधिक वाढत न[हो.
उष्णता विशिष्ट
अंशापेक्षां
सूर्यप्रकाशात पाते, फांद्या, खोड
वगैरे भाग एकसाररवे तळपत राहिल्यार्ने त्यांच्या शरळीसंतोल
उष्णतेवै प्रमाण फारच वाढते असते. पण वस्तुस्थित्ति
उलट॰ ` आढळते. ^ वाष्पोच्छूवास-क्रियेंत पुष्कळशी उष्णता
^
उलट दुसऱ्या व[चूग्ची
त्यावर तणावाचा भोर
पडून तो अधिकच त[णलळो जाते. त्या स्थितोत दुसरी व[नृ
तणावाकडे कलल्यामुळें रक्षकपेशिद्वायांतोल त्वगू-र’घ्र अधिक
व[ष्पामवन व ववस्पात-शररेरांत होणारा व[ष्पोच्छूवास ह्या
दोन्ही कार्यांत मळोठा भेद असतो. एक कार्थ केवळ जड
तर दुसरे ज[वनात्मक आहे.
आल्पाते नवीन
जॉव्रवकार्थळा’चेचार
’
त्वगू-रंप्रांत बाहेरून वायु अति शिरतो म्हणून ते उघडते
अते न[ह‘व्. केवळ व[ह्यत्वचेच्या रक्षकपेशव्च्या कमी अधिक
तणावाप्रभाणे त्वगू॰र’प्र वित्ट्टात अथवा सकुविंत होते. कमी
अधिक सकरेवाप्रमाणे अथवा विकासाप्रमाणे न[हेरून वायु
शीपिण्यास मु॰द्व॰[ अडथहुंय होतो व त्यायोगे क[रवनकवेवि…
पाक अथवा सस्थापन [कवा श्चासाश्चास ह्यांसारख्या जत्वन’
कायोत अडथळा उत्पन्न होत असतोना तुवां वऱ्ष्पळोच्छूवासास
, सोय व्हूंप्वोम्इणन त्वगू-र'ये बंद अगर उघडी ठेवली
खच हाऊन फाजाल उष्णतेचा अपायकारक परिणाम ट[[ळला ;
ळू ,
तें
ष्भ्च्ग् स .,
जाता, न[हा तर त्या उष्णसन शरफैराताल नाजकळू वाचन… 1 जातात ह्याक्तनच ’क्तफांया [ल बा पा द्या [च मट्रग्स्ना
’.
”,
५५'
०
,…
,.
पिडादि पदार्थ मृत होऊन सर्वे ज[वनकाये बंद
असतो.
`
पडली
,
ज
॰-
लश्नांत येण्यासारखे आहे.
यद्या’पे सूर्यप्रकाशरूपळी काहो शक्ति रेगदेंयपदार्थळी- ` रहाण्यास अप्रत्क्षरळीतोनॅ एक प्रकारचे उत्तेजन मिळते. कारण
त्प‘तोत खर्थ होते तथापि
उरलेल्या
उष्णतेचा
परिणामद्दि ’ राया तस‘च दिवसा
शोषण-…कार्थ मुंलाकड्रुन वाळू असतें
राहिला नसता. हें व त्याप्रमाणे रक्षकपेंशीत
पण व[ष्पळोच्छूवातोत तो उरलेली उष्णता रनर्व होऊन त्वगू-रंप्र उवर्डे रा[‘हेंळें
आपोआप तो अपायकारक परिणाम टाळिला जातो. ह्या उघडी असत न[ह‘व्त.
दृष्ठांते विवार केल्यास बाष्पळोच्छूवासार्में एक मोठीच कामगिरी पिंड प्रकाशाते उत्तेजित
शोधून घेतात व त्यायोगे
साथते ह्यांत सशय न[हो.
ज[वनपिंडपिंर अपायकारक झाल्याशिवाय
वाष्पोच्छूवास
व त्वगूरंथ: …पेशिरसाची वाफ झाल्या…
वर तो ‘ त्त्रगुण्रंध्र’ नावाच्या विशिष्ट छिद्रांनृन शरळोरापाहेर
जाते.
त्वम्-रंर्धाची योजना केवळ व[य्पाच्ट्रॅवासाठो असते
असें म्हणतो येणार न[हो. च्वगु-रवाना उपयोग, शकँरादि
तेदियपदायोंत्पतोस अवश्य असणारा कमाँम्ल वायु शरारांत
शीपणें अथवा आतून आक्सिजन व[यू वाहेर सळोडणें, त्याचप्रमाणे
प्रकाशप्मुळे च्वगु-रथ उघर्डे
श्चासोच्छूवास-वित्र्येतोल वायूच्या फेरवदलास
वाव
देणे वगैरे गोष्टीकडे होतो. ह्या योष्टीवरळोवरच व[ष्प`[च्छूव[स॰
कप्यासाहेत्यांनृन वाट मिळते. पेशिरसाची वाफ झाल्यावर
प्रथम तो पेशिमघ्य पोकळयांत अथवा व[त-स्थानांत जमते.
सर्वे वातस्थानांचा परस्पर सवय असून त्यांची बाह्य अ'गें
तणाव उत्पन्न होऊन रात्रव्सुद्यां
पाहिजे. पण राशी त्वगु-रंघे
दिवसा रक्षकपेशीतोल
होऊन ते अधिक
नविन…
पार्णां
पेशीत अधिक ताण उत्पन्न होऊन
त्वगू’र'ये खुली होण्यास मदत होते. रात्री प्रकाशाचा
अभाव असल्याव्च् ज[वनळिपडांस प्रकाशाचे विशिष्ट उत्तेजन
मिळत न[ह‘व्व त्याचा परिणाम रात्रां रक्षकपेशीत कमी
शोषण होऊन त[णा’हे दिवसासारखा उत्पन्न होत न[हो.
अर्थात, अशा स्थितोत त्वगू- रदृऱ खुली राहणे शक्य नसते.
म्हणजे प्रकाशाचा अप्रत्यक्ष उपयोग तो खुली राखण्यास
होतो.
पानाच्या वरील व[हूंग्पेक्षां खालील व[जूवर हजारो त्वगुंहें रर्धे असतात म्हणून त्या व[लुंतून व[ष्पोच्छुवास अधिक
होतो हे निराळे हे सांगण्याची जरूरळी न[हो.
व[ष्पात्सब्त्रैन व प[रे[’स्`थति:…व[ष्पे[त्सर्नन परिस्थिती
म्हणजे त्वगु-र'ये होत. अर्थात वातस्यानांत जमणारळो प्रमाणें कमी अधिक जरेराते चालते. हवेत उष्णतेंटेंर प्रमाण…
वाफ त्या त्वगू-रंप्रांनृन ॰पडते त्वगू-र'घ्र उघडणे अथवा हुं अधिक आते असतो वाष्पोत्सज्’प्न अधिक होते पण उलट
वेद होणे हे त्वगु-रंयाजवळील रक्षकपेशीच्या कमी
अधिक , तेच प्रमाण कमी झाळें किंवा हवा र्थड झाली तर त्याचा
जेव्हा रक्षकपशीतोल पेशि… ळू’ परिणाम बाष्पळोत्सर्ननावर होतो. दमट हवेपेक्षां कोंरडया
रसामुळें पेशिमित्तिका तणार्मूळा लागते त्यावेळी त्वगुं-र'प्र हवेत ते अधिक होते. कोरडवा हवेप्रमार्णेच सव्साटयाचा
अधिक उघते अथवा विस्तृत होते. रक्षकपेशीच्या भित्तिकेंची ; वारा सुटला असतो व[ष्पोत्सज’न अधिक
होऊन पाते
रंयाकडळोल वासू अधिक जाड असल्यानॅ तणावाचा परिणाम
मळल्यासारखळो होतात. कोंरडया हवेत जरळो व[ष्पोत्सर्नन
तणावावर
अवलंबून असते.<noinclude></noinclude>
2e0zsdwjva9u2r9tr2yljwr9e8gnk1z
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जळीवनफप्र्थघिचार अधिक होते, लाँवनफार्थघिचार महाराट्रीय सावकाश… ( ज ) २७४ तथापि फॉंरडवा जमीनीतोल ररेपटयांसून ते कमी होते. ह्मावप्रमाणें सढहुंवनळोन व सर्दे हवा ह्या दोन्ही रिथ..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जळीवनफप्र्थघिचार
अधिक होते,
लाँवनफार्थघिचार
महाराट्रीय सावकाश… ( ज ) २७४
तथापि फॉंरडवा जमीनीतोल
ररेपटयांसून ते
कमी होते. ह्मावप्रमाणें सढहुंवनळोन व सर्दे हवा ह्या दोन्ही
रिथतोत वाष्पोत्सजप्न अगदळी उलटरळोतोने चालते. जेव्हा
जमीनीत पाणी पुष्कळ असते अशा वेळी मुळीकड्रन अधिक
पाणी शीषिळे जाते; व अर्थातू त्या प्रमाणात व[ष्पोत्सर्नन
अधिक होते. पण उलट जमीनीत पाणी असते तर कमी
इतर परिस्थितोप्रमाणें व[ष्पोत्सजेन कमी अधिक होत असते.
पेशिरसग्चा उत्प्रवाहऱ्-ष्मीटमीठ्या
दोन दोनरॅळा कूट
उंच वाटणाऱ्या वृक्षांच्या णेडवाकडे असणाऱ्या र्फायांत
अथवा पानांत मुळाकडून शीपिकैं ज[र्णांर पाणी कर्ते पाही…
ततेच
चते हा मोठा प्रश्न आहे. ह्याविषर्यो निरनिरळ्रा शास्त्र…
ज्ञांची मते वेगवेगळी आहेत. ‘ त[ड[त पाणी कते वर
चढते, ’ हा प्रश्न अड्रुऱन जसा ड्रुटावा तसा मुटळेला नाहो.
जमीमीतोल विशिष्ट क्षारावरतुडां व[ष्पोत्सर्बंन क[ह"[ अशी
अवलचून असते. प्रखर प्रकाशीत व[ष्पोत्सर्बंन अधिक
होऊं लागते. अशा [’रेथतोत व[ष्पोत्सर्ननग्त खर्च होण्याऱ्या
व[ह्य हवेच्या विशिष्ट दावामुळे अगर वजनामुळे मुळ्यांमघ्यें
पाणी वर चढते असे कांहोवै मत आहे. परंतु पदार्थ…
विज्ञान-तासांत टरवितेला हवेच्या दावाचीं किमान मयोदा
पाण्यापेक्षा कमी पाणी मुळ्याकडून
तोल फुर्टापेक्षां अधिक नाहो. अर्थात दोन होनते फूट
पाणी वर चढणे केवळ हवेच्या दावामुळे वनस्पति… शरीरात
पाणी शीधिठें
जाऊन
व[ष्पोत्सब्रँन
कमी
होते.
शळोविते ज[हेल तर
त्याचा वाईट परिणाम वनस्पतोस मीगग्वा लागतो. हा
वाईट परिणाम टाळावा म्हणून ज[वनर्पिडास व[ष्पोत्सर्बंन
पानावर
घडून येते हे सव`[॰न[ पटत नाहो. कांहोच्या मतामें केश[…
कर्वेण-कियेते व[[हेनव्सून पाणी वर चढत असावे परंतु नाहि…
एक प्रकारचे तेरक्षक आवरण उत्पन्न करून वाष्पोत्सर्नन कमी
नींवी परंपरा मुळापासून रेप्डवापर्थत साररवी नसते. शिवाय
केले जाते.
काही विशिष्ट मर्थंदिपलीकडे केशाकर्षण
वेन करण्याची सरेय करणे भाग
पडते,
कॉँवळ्या
आवरणापुळे प्रकाशाची आव आंत कमी पोहोचते म्हणून
चालत नाही.
म्हणून
इतक्या
लाववर
ळिकयेचा प्रभाव
पाणी
चढण्यास
पेशिरसाची वाफसुद्रां त्या प्रमाणांत कमी होते. कित्येक
वेळ[ मेणासारख्या पदार्थाचा लेप पानावर तयार केला
केशाकर्वेण कारणीभुत होत असेल असे समवत नाही. केवळ
जातो. मेण हा पदार्थ ऊष्णतावाहक नसल्यामुळे प्रकाशाची
असेल अशी कल्पना केली, तर तो किया फार सावकास
होणारी असते व अशा स्थितोत त्या क्रियेने इतके पाणी
उष्णता आंतोल
रसावो
भामात शिरत
वाफ कमी होते.
न[हो, व त्यामुळे पेशि॰
कित्येक वेळी कडक
प्रकाशाने
अन्योन्य-रसाकर्थण-कियेते पाणी इतक्या दूरवर पसरत
मुळासून ॰शडवापर्थत अव्याहतपर्णे
इतक्या लवकर होणे
जावनपिंड उत्तेनित होऊन प्रकाशीत तुद्यां त्वगु-रंटूग् वह
कठिण
करतात.
क[ह“[
उत्पन्न होऊन वाफ
ठिकाणी पानावर
उष्णता कमी केली
पडते पण प्रकाश
देणारे मित्र घनतेत विरल्ट्रेळे पदार्थ अमुक एक काम प्रम[॰
ठिकाणी त्वगू’रंप्रांजवळ येकडेंप केस
व[हेर जाण्याचे मागे वेद होतात. क'ळाहो
दाट केस वाढून पानास पोहोचणारळी
जाते. ज्या ठिकाणी पाणी फार कमी
कडक पडतो अशा ठिकाणी उत्पन्न
होणाऱ्या वनत्पतोच्या पानाचा आकार
जातो. पानांचा आकार
लहान आल्यामुळे
णांत व[ष्पोत्सजेन कमी होते.
सकुविंत व अणुकुविंदार
फार लहान केला
तितक्या
प्रमा’
फांहो पाते काटघांसारखाँ
होतात.
त्यामुळे व[ष्पोरसजेन
दिसते.
ततेच
ण[त चौहोकर्डे पसरलळे
अत्योन्’य-रसाकषण-कियेस चालन
आहेत
असे क[ह”[ तोगवत न[हो.
णूलजन्वशत्तांर्ने पाणी नेहमीच चढत असेल अर्सेद्दि गृहोत
धरतो येत नाही. कारण जेव्हा वातोत्सईंळान-किया जळोरात
चात्'ड्रु असते अशा वेळी मूलजम्यशक्ति अगदा सुक्ष्म [रेथतोत
असते. व्न्डवऱ्सन, ज[लळो, अस्कनसळी वगैरे शास्त्रज्ञांच्या मताने
मुळांतून पाणी वर रेनचिळे जाण्यास पानांतोल व[ष्पव्त्सर्मन
पुरेते आहे. पानांतोल
वाह्यांमाकडे असणाऱ्या
पेशिरसाची प्रकाशाच्या उष्णतेते वाफ
पेशातील
होऊन तो पानातील
फार कमी होते. कडक उन्हाळा फार दिवस टिकला असतो
व[त॰स्थान’ळात जहूं लागते. अशा वेळी तेथळील पेशीरस घन
वनस्पतोसून फाज्ञील व[ष्येत्सजेन होण्याची मीति असते.
अशा स्थितोत व[ष्पोत्सजेनाची साघर्ने ची पनि, तोच अबो-
होऊ लागतो. पण त्याच वेळी इतर पेशीतोल पेशिरस घन
असत नाही अथळीचू त्या दोन्ही पेशिरतोत अन्योन्य-रस[॰
वात गाळून ते कमी केले जाते.
कर्पण सुरू होते व
पाने गळल्याने शवहैरग’दे
पदार्योत्पत्तीस अडथळा येतो तथापि फाजळोल व[ष्पोत्सतेननि
षुत्रूव्न जाण्याच्या ऎवजी किविंतुका-ष् जळोवनपिड तेक्रुचित
व सुप्त ।”स्थतोत ठेवणे वरे.
एक मत व एक सजीव अशा दोन सारख्या आकाराच्या
खालून पेशिरस वर चहूं लागतो. होच
पर‘रा खाली जमीनीत असणाऱ्या मुळयग्पर्थत पोहोचते व
त्या सर्वीतून पेशिरस ह्याच रळीतोते वर चढतो. हो विचार…
ह्यचि परीक्षण केल्यास
सरणी एकंदरीत वरळी दिसते. पण जते जरऱ्‘ वाष्पोत्सर्जेनानॅ
एकळोकडून पाणी न[होते होहेल त्याप्रमाणे खाबूञ्न अन्योन्यरसाकर्पण किया चालू असली पाहिजे. नेहमी हो किया
अते आढळून येहैल कळी मृत पानांसून व[ष्पोच्सजेन अधिक
फारच सावकाशरळोतोने होते. अर्थाचू इतक्या जलद पाण्याचा
जोराने होते.
एकसारॅखा प्रवाह त्याच एका विघ्येते चालू; राहोल अस
कभ्शीहे म्हणवत न[हळी. कित्येक वेळां वाष्पोत्सबॅंन’क्रिय!
पानांसून वाष्पोत्सतेन
कर्ते होते
ह्याचें कारण त्यांत वाष्पोत्सज्ञेन कमी अधिक
करणारे जीवनपिंड असत न[होत. पण सजाव पानांत
वावनपिंड असल्याने पाण्याच्या पुरवटयाप्रमाणे अथवा ’ चाद्रुहें नसतोनासुडां
पाणी खाछून वर
चढत असते. अशा<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय ज्ञानकोंद्म् ( ज ) २७५ | पु, जाता. जते हृदयात सारख्या वेळेच्या अतरळिन सारखे “ दिथतळोत वाष्पन्त्सतेनातेच पाणी वर चढते’ हौ उपपा’त्ते कशी टिंकणारद्वै कित्येक जागळो अन्यो..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय ज्ञानकोंद्म् ( ज ) २७५
|
पु, जाता. जते हृदयात सारख्या वेळेच्या अतरळिन सारखे
“
दिथतळोत वाष्पन्त्सतेनातेच पाणी वर चढते’ हौ उपपा’त्ते कशी
टिंकणारद्वै कित्येक जागळो अन्योंन्वरसाकर्पणक्रिया एका
जळीवनकर्म्यन्निचांर
ळे
थक्क मिळत गेल्यामुळे रक्तप्चग् प्रवाह ढूरढूर
,
र्बावनकळाग्रँबिचार
पसरतो. त्याच
विशिष्ट दिरोंते होण्यासारखळो स्थिति असून तुवां प्रवाह
प्रमाणें मुळगांमघ्यें
उलटा जातो. एव'त्र्द्रळोत अमुक
एक
विशिष्ट क्रियेने पाणी
सकळोचघक्फ्याते पेशिरस खाछुन तेड्याकठें चढत जातो. उते'
वर चढते हें निश्चित
येत
नाहो कांह’व्नों केवळ नृ जनजग्य-स्नेकोंच खालून वर
सांगतां
अप्राकडळोल भागांर्तांल उत्तेजनजन्थअधिक लवकर होतो. म्हणजे
सचेंतन पेंशॉकढून हें कायै केले जाते असे प्रतिपादिरँव् पण
स्ऱ्टूळोसवरते ह्माघिपयाँ प्रयोग केला. त्यार्ने र्फाहळी कलमे
मीरबुदाच्या पाण्यात ठेवून त्यांचा त्यावर कसा काय परिणाम होतो हँ पाप्द्देळे. मोरवुद्प्वा अस पानापतेत येऊन
उतजनजन्थ सकळोनानॅ पेंशिरसाचग् प्रवाह खालून वर अधिक
पळोहोवलेला त्याला आढळून आला. तो वर येतांना मध्येतर’व् असणाऱ्या सवै पेशी मृत झाल्या ह्यावरून त्याते अनु-
मान बसप्’वेते कळी सवैतन पेंशौकडूनच पाणी वर चढविर्के
जाते अते नाही. ह्याचप्रमाणें मुळगांवर अग्थणार्वे पाणी
सिद्ध ड्राळे आहे व"! वहन खालळो येणारा सेकोंच-जन्यश्नवाह
सावकाश चालतो. त्यात खाटूऱ्न वर जाण्यात दिसणारी
त्वरा आढळत नाही. पेंशिरसाचा प्रवाह व उत्तेजनाचीं दिशा
ह्या दोहोवा फार निकट स‘वघ आहे. वाळाद्देन्यांठून पेशि-
ओढून आंतोल पेशा
झपाठ्यार्ने जाऊ“ शकतो. जर काही कारणाने मुळ्गांच्या
अप्रास उत्तेजन
मिळण्याऐवबाँ
वर पानाकडे
मिळु लागले
तर तेकळोचाचळी दिशा वरून खाली होईल. पण प्रयोमार्ने अते
टाळिकल्या तथापि मुद्रा पानां-
रसचि प्रवाह ततेच उत्तेजनांचळा प्रवाह देसारख्याच झपा-
तून वाष्पाँत्सतेन एकदां सुरू झालें म्हणजे मागाहून सवैतन
पेंशॉवळो ह्या कार्योत फारशी जसरळी नाह’ळो. डॅळो. बोस यानळो
ठ्यांते चालतात. प्रवाहास आडव्यापॅक्षां लव दिशा अधिक
सरैयाँचौ असते. जरळी आ'रमीउत्तेजनजन्व-सकोंचाते पेशि-
ह्या'सवघी
रसास चालत मिळते, तथापि वाष्र्पोत्सर्जन,अन्मोंन्यरसाकर्षण,
एक
मारून
निराळीच
उपपत्ति
दिली आहे.
सवेतन
पेंशॉच्या जीवनझियेतेच पाणी मुळ्यांतूंन तेज्यापयैत चढत
जाते असे त्गांचै म्हणणे आहे. मात्र घडामोडी निरा‘तेराळ्या
उतेजनापाग्ड्रुन उत्पन्न होतात. जमीमीर्शी मुळयांचा सबेघ
येणें ततेच त्या जमीनीत घुसतांना त्यांच्या वाढत्या भागाची
वाचून झीज होणे अथवा शोषक-र्केसाकहूंन अन्योन्यरसा-
कर्पणकियैते पाणी शोधून
घेतल्यावर पेंर्शीत ताण उत्पन्न
मृलजन्यशक्तींचा ताण वगैरे गोंष्टळोनों ते चालत अधिक
जोराते चादूंव् होते. शरीरातील सवेच सन्नैतन पेंर्शीत जीवनवडामीडों सारख्या बोरळानें होत असतात असे नाही. म्हणून
जेथें जेथे अधिक काथेशॉल पेशी असतळील तेथे अधिक
जोराते उत्तेजनजन्थ सकॉच उत्पन्न होऊन पेशिरस पुढें
पुढें ढकलिला जातो. पेशिरसाच्या उत्प्रवाहासेवंपाँ मी ड[क-
टर साहेवांचीं उपपत्ति अधिक सयुक्तिक दिसते.
अवक्षार-वनरपतोंचीं अन्न-द्रव्ये तेद्रिय व ळिना’रँ’द्रेय
वगैरे कारणांनी मुळ्यांच्या अप्रभागप्स उत्तेजन मिळुन
क्र चढण्यास व्यायाम चालन मिळते. एकदां ते चालन
क्षार जमीनॉतून
अशी दोन प्रकारचळो असतात. त्नाराद्रव
"”
मिळाल्यावर पुढें आपोआप ते पाणी सरकत जाते. प्रथम शोधिके जातात व तेदिव अव शा’ऱरात तयार कैर्के जाते.
उतेजवामुळे शापक-र्केसर्टेतच्ल जलस्थावचा सकोंच होतो व , जमीनीत नाना प्रकारचे क्षार पाप्यात विरणारे असतात
त्याथोर्गे त्यातील पेशिरस पुढील जलत्थागांत जातो. पुढून ` म्हणून ते त्या जमीनोंत डगवणाऱ्या वनस्पतींमध्ये असतातो रस पुन्हा नवळोन ज्ञलरयानाकदे जातो म्हणने एकदां तच अते नाहळो. अल्युमिनळोयम घातुवै क्षार बहुतेक जमी॰
चव्'लन मिळाल्यावर त्याचा परिणाम फार दूरवर पुष्कळ वेळ नोंत असतात पण पुष्कळ वनस्पतींत त्या'चा अंशसुद्धां आढळत वाहळो. समुद्राच्या पा°यांत आयोंप्डेनचा अंश फारच
होत रहातो. भुळरॅढून पेशिरस वर चढण्यास एकच उत्तेजन
पुरँ होते असे नाहीं. तर निरनिराळ्या उलॅजनांच्या सकाहैव्त थोडा असतो पर'तु समुद्र्हैळावालात त्या क्षारार्वे प्रमाण पुष्क्तळ
होणे, किंवा जमीनोंत वेगवेगळे
रासायनिक
क्षार असणें
परिणामामुळे पेशिरस वर चढतो. ववस्पातेशरळोरांत उत्तेजन
ग्रहण करणारी पेशिजाटॅ सर्वे जागॉ असतात. त्यांना एकदां
आरभी उत्तेनन मिळार्ले म्हणजे ते पुढें एका पेंशिजालापाठून
द्रुसऱ्यास व द्रुसऱ्यापाबूऱन तिसऱ्यास पाँहोचत जाते. उत्ते-
स'ळापडते. ह्यप्वसय् अवश्य क्षारांचें शोषण करून ते क्षार
जलह्थागांत वनत्पतो साठा‘वेतात. व्यक्तीं तितक्या प्रक्रुतो
अशी स्थिति असल्यामुळे वनस्पतींच्या क्षारशोपणीत भिन्नता
आढळते.
एकाच जमीनीत उगवणाऱ्या
एकाच
जावळीच्या
जवाप्रमाणें पेंश्चिरसाना प्रवाह एका पेंशिंजालापावून द्रुस॰ वनल्पतोमघ्र्ये सर्वे निरिद्रिय क्षार सारख्याच प्रमाणांत शोर्पिल
ऱ्यात चाछु होतो.
` जातात अहे'ग् नाही.
क्षार-शोपण प्रत्येक वनस्पतीच्या
एका पेशीत उत्तेजन मिळाल्यावर त्यातील जलस्थानाचा
नीवन॰व्यापारावर अवळेचून असते.
सकोच होऊन पेशिसर दुसऱ्गांत जातो. परंतु पुन्हां त्याच
क्कीरींन ( हर ), गंधक, फारफरस ( स्फुर ), सिठेका
वेळी पहिल्या पेंर्शीस उत्तेजन मिळुन नूवव्’सारखाच सकळोच हुं ( सिकत ), पोटॅशियम ( पालारेंळा ), तोडिवमृ( सिंधु), फॅलउत्पन्न होतो. अर्थात त्यावरळोवर पेशिरस पुन: दुसरीकडे हेंऱशियमृ( स्वट ), मेंप्रेश्चियमू ( मग्न), लळोह, मॅगनोझु.
जातो. याप्रमाणे सारख्या वेळेच्या अंतराने एकसारखाँ ढं (मेगळिक ), वगैरे धातूंचे
उतेजते पाद्देल्या पेंशॉस मिळतात व त्याप्रमाणे प्रवाह सारखा ( पुष्कळ वनस्पतींत आढळतात.
क्षार थोड्याफार प्रमाणांत
ह्या सर्वे क्षारत्वेवा उपयोग<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०१
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रोय ज्ञानकोश.(ज्ञ)२6६ जळीवनकायैबिचार सारखा होतो अते नाहळो. ल्पुकन्स नावाच्या शास्त्रज्ञनि रसावे अथवा जळीक्नक्रार्यविचार जॉवरसांतोल र्केद्र्द्देवे मुख्य घटक वनत्प..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रोय ज्ञानकोश.(ज्ञ)२6६
जळीवनकायैबिचार
सारखा होतो अते नाहळो.
ल्पुकन्स नावाच्या शास्त्रज्ञनि
रसावे
अथवा
जळीक्नक्रार्यविचार
जॉवरसांतोल
र्केद्र्द्देवे
मुख्य घटक
वनत्पतोस कोणत्या क्षासंचीं अवश्यकता आहे हे सप्रयोग
काहीं वनत्पतोविपयाँ ठरविर्के. इतसंनव्द्दि प्रयोग कसन
होत.
हवेमघ्र्धे हैं।कदा ८० टक्के नायट्रोजन वायूर्वे प्रमाण असून
काहो निळिशघ्र क्षारांवो अवश्यकता सिद्ध केळी. सवैसाधारण रळोतत्र्ने प्रत्येक वनत्पतळोस नायट्रोजनक्षार, गंघकक्षार
त्याचा प्रत्यक्ष उपयोग वनरपतोगां होत
पेंईंग्त्पारेंकक्षार
अवरेंयकता
क्षाराचळो कमतरता असते तेणील वनस्पती पुष्ट होत न[ह'व्त.
प्रत्यक्ष र्नावरसान् या मुख्य पटकात तोटा पडू” लागल्याते
वनत्पतळोस बांगलळो पुष्टता मिळुन
नवव्न वाढ होते कठिण होते. हाच स्थिता गमक व फात्फरस
क्षप्राच्या अमावाते उत्पन्न होते. देहि क्षार इतरांप्रमाणें
ततेच
पोटयाच्चियमु मॅ’यो’शैयमु.
शियमु, व लव्ह ह्या धातूंच्या क्षारांचळो अत्यत
आहे अते
फाल'
सबैमान्य निद्व झालें आहे.
पोटँर्शियमु क्षारामुष्ठें
पद्रुतेव फळे येतात असा अनुभव आहे. जर जमीनीत
पॉटॅर्शियमु 'यातूवा अभाव असला तर त्या ठिकाणच्या
वनत्पतो वुकू‘ लागतात व त्यांस फुर्ढे येत
नाह‘च्त.
पोटॅ-
शियम क्षारधि तेद्रिय पदार्थांच्या उत्पत्तीस चालन मिळते
व तेदिय पदार्थ बनत गेल्यावर शरीरास पुष्टी मिळते.
मँग्रेशियमु धातूच्या क्षाराचा उपयोग पोटॅशियम क्षारा-
नाह’व्. म्हणुन तें
क्षार जमीनोंतून शोधून घेते भाग असते. ज्या जमीनीत ह्या
जमीन‘व्तूनच शोपून घ्यावे लागतात. गंघकक्षार र्केद्र्र्फेत असत
नाहोत पण जोवरतांत असतात. र्केद्र्रेत फौत्फरस क्षार आढ०
ळतात त्यांना त्या ठिकाणी कोणता प्रत्यक्ष उपयोग असतो
हें कळत नाह"।. प्र।।णवग`।च्य। मज्जातेतूंमच्य सुद्धा फारकरसक्षार आढळतात व मुद्दाम फप्त्फरस पदाथ असणारॉ
बाज अथवा फळे अधिक खाण्यात यावॉ अते डॉक्टर लोक
प्रमाणेच वायट्रॉचनयुक्त तेद्रिय पदार्थ वनाबेंण्यास होतो.
सांगतात. त्यायोगे मत्नात्दूवूनां पुष्टी मिळते अते त्यचिं
हरितू द्र्व्याच्या घटकपदायाँत मँमँझिं’ग्मू क्षार आढळतो.
म्हणते आहे. यावरप्द्न कवाबितू पेंथोतळोल र्केद्र फॅळीत्फरसार्चे'
रयान असल्यामें ते मजातेनृहुंग् काम देणारे स्थान असावे
असा कित्येकाचप् तर्क आहे.
हेक्षार-‘शोपणास पाण्याची अवश्यकता असते हें पूर्वी
सद्देनितल्हेंच आहे. पाण्याचे घटक आविसजन व हायड्रोजन
हरितूद्र्व्यावा उपयोग कबेनसत्यापनक्रियैस फारच मीठा होतो.
अथळोतू म‘मोर्दोयमू क्षाराचौहै महत्त्व नितर्फेच अधिक आहे
फॅलशिंयमु क्षाराचा उपयोग सरक्षक असतो. नायट्रॉ’
जनत्रुक्त तेदिय पदार्थ उत्पन्न करण्यास ह्याचा प्रत्यक्ष उपयोग होत वाहो. वाढत्या क"।व॰।त कॅलशियमृ क्षाराते
नांवद्दि आढळत नाही.
नाहळी.
ह्याळिशवाय
हर्वेवून कारवन व आक्सिजन असे दोन पदार्थ वायु…त्वख्‘
म्हणून जळीवरसाच्या वाढीस
प॰।त शळोपावे लागतात म्हणने कारवन हायड्रोजन, आकिंसजन व नायट्रोजन तते’च गेघक, फॉंत्फरस, पळोटेळिशयम, मॅने-
ह्या क्षाराचीं अवद्यकता नसते. परंतु शरीरात उत्पन्न
होणाऱ्या आवतेळिलक अम्लासारख्या विपारळी अम्ल’प्चा बिघा-
तक परिणाम नाहीसा करण्यास क्यालशियमृ क्षाराचा उपयोग होतो. ।हैंकपर व पेंफर ह्या शरित्रइळा‘द्वायानळो फ्यालक्षाराविपयळी
जसरळो
परंतु त्याच जागी पळोटोदेंळोयमृ किंवा
मँमेशियम क्षार आढळतात.
शियमु
असतात हे निराळे सांगण्यावो
पुष्कळ
शोध
केले
आहेत.
ह्या
शिंयमु, कँलशियमु व लोह अशी
द्ह। द्रव्पें वेगवेगळ्या
त्रख्प'व्त वनस्पतींत आढळतात. ह्या द्र्व्गांखेरींज व्यळिक्तमान्न
वनत्पतोत काही विशिष्ट द्रव्ये आढळतात.
वनर-पतोस क्कोरळीन-द्धव्याचळो अवश्यकता
कुटू नावाच्या
असते व त्याप्रमाणे
पिंझ्ळघ् ॰रगावै चट्टे उत्पन्न
तो पदार्थ त्यांत सध्ठावेतेला आढळतो. गवतामव्में सिळिलका"
होतात व तो पाते तेद्रिय पदाधोंत्पतांस निउपयोगॉ होतात.
द्रव्य असते म्हणते व्यप्र्किमात्र वनरपतां'त आढळणाऱ्या
विशिष्ट द्र्व्याना विचार वाजस ठेंत्रिला असतां वरळोल द्हळा
क्षाराच्या अमावाते
पानावर
अर्थांतु ह्या क्षारावा उपयोग तेरक्षकच आहे अते म्हृणर्णे
भाग पडते.
लोंहृक्षारार्ने जळोवनपिंडांत हरित…द्र्व्य उत्पन्न होते.
हरिंतृ-जळोवनर्षिझंत लॉहृक्षाराचै प्रत्यक्ष अस्तित्व असत
नाही. तथापि त्या क्षाराचा अभाव ज्ञम‘झ्नळोत झाला कळी
तेथांल पाते पिवळी होऊं लागतात. जींवनपिंडास लरैह-
द्रव्य प्रत्येक वनह्पतात अवश्य
आविसजनहृ`द्ळोन पदार्थ
कवळ
असतात.
पका कारवन व
जमानातून
क्षारास्थतात
पाण्यावरळोवर शळोपावे लागतात. ह्या द्हो पदाथापालून निर
निराळे तेदिय पदारुय तयार होतात. व त्याच तेद्विय॰॰पद्।'
र्थीवै सर्वे वनस्पति-शरीर वनतेर्के असते. त्या पदाथींत
क्षारत्न एक प्रकारचें उत्तेजन मिळून त्याचा उपयोग हा’रँतुं- , तेदियत्व उत्पन्न करणाऱ्या हेंळाकडों र।सा’नियक घडामोडी
द्रव्य उत्पन्न करण्यात होतो. मँस्लिश व वेनेह्कळो ह्या शास्त्र- वनस्पतींच्या शरळीरांन अव्याहत चालू असतात व अशा
ज्ञांनॉ अते सिद्ध र्केते आहे कळी केवळ ळिहरव्याउम्न्ऱ्च वनरपतों’
नाच लळोहक्षाराचळो अवश्यकता असते अते नाहो तर हारेंतूं‘
घडामीडों म्हणतेच त्यांनी ज्ञीवनकायें होत, ह्या घडामोंउळोस
प्रथम जौवनर्पिडाकडून जाऊन मिळते व एकदा ते काये बुक
द्रव्य
झाले म्हणजे ते एकसारखे चालू होते.
हरितु-द्र्व्यय'त्र. …हवा पाणी व अन्न… क्षार ह्या त्रयो-
नसणाऱ्या
आलिंक्वगचिं हुद्वा’
चालत नाही
लरेंहक्षाराशिंवाय
ह्या चार क्षाराशिवाय नायट्रोजनक्षार, गंघकक्षार व पें’त्र्प्त्प- " पावून वनत्पत’ब् आपल्या शरारात ते।द्र्य अन्न तयार फां’रेंतप्त'
रस… क्षार यायां मोंठो आवश्यकता अलतें-
हॅक्षार जाव- } सद्रिय अन्न तयार करण्यास योग्य अशा ।वाशष्ट रचना<noinclude></noinclude>
oe3q4jdqdv2f6l6kxf6o15j0rd6xh8l
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०२
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "र् .९ महाराट्रीप मग्नकींश, (ज ) २७5 जावनकायविचार ज्स्किनफायऱ्बेंच्प्प्र त्यांच्या शरीरात असते त्यास होरेत-द्र्व्य-येन्न म्हणतात. } पदाथ' ववा‘वेण्यार्वे मुख्य कार्य उत्तम रातोत..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>र्
.९
महाराट्रीप मग्नकींश, (ज ) २७5
जावनकायविचार
ज्स्किनफायऱ्बेंच्प्प्र
त्यांच्या शरीरात असते त्यास होरेत-द्र्व्य-येन्न म्हणतात. } पदाथ' ववा‘वेण्यार्वे मुख्य कार्य उत्तम रातोते साघेल, त्याप्र’
त्या यत्रांत पुष्कळ हरितुं-न्रीवनपिड असतात. प्रत्येक हरिद्- माणे ते जीवनपिंड योग्य तो तजवव्ज करतात.
जौवनपिंड जळोवरसात्मक असून त्यांत हरिंतुद्र्व्य असते.
किरणानें पृथकरणऱ्……क॰।चँच्य। त्रिपार्भावर प्रकाश
(
हृरिकॄद्र्व्यामुळेच पानास रंग येतो. हरितूं-मीवनपिंडापाखून भ् प्रडला असतो त्या प्रकाशार्वेविघटन अथवा पृथक्करण होऊन
हरिंतुद्रव्य वेगळे करतां येते. मद्याकँ ( आलकळोहल ), ईंथर, त्यापाढून रंगळो वेरगळो सात प्रकारच्या किरण-शलाका उत्पन्न
क्कीरव्फॉं’मँ, वेनझड्रेल, सारख्या रसात द्दिरवव् पाते ठेवून हळिरतू× ळू होतात. प्रकाशाचे निरनिराळ्या रंगांतळोल किरण निरनिवेगळे केर्ले जाते. सोडा, पोट्ररेंळा वगैदू’
राळ्या लांवाच्या लहरींचे आहेत हें त्यांच्या पूथकॄत स्थितीत
द्र्व्यच्चीवनपिंडांपांड्रुन
पदार्थांचा अंश असलॅल्या पाण्यात द्दिरबाँ पाते ठेविलाँ अस॰ ‘ स्पष्ट दिसते. तोवडा, नारि’मी, पिवळा, हिरवा, अस्मानी,
तांद्दि हूंरिंतू-द्र्व्य वेगळे होते. हरितू-द्र्व्य उत्पन्न होण्यास निळा, व जांभळा अशा निरनिराळ्या रंगांचे सात किरण
लोंह-क्षार लागतात. लोंहरंश नसलैल्टऱप् मषीवींर्तांल उग्प्ड्. मिळुन पांढरा किरण बनतो व असे. पांढरे किरण क'ण्वैच्या
णाऱ्या वनस्पतोबॉ पाते फिकळी होतात. तोहक्षाराप्रमाणेच ‘ ।‘त्रैपांर्भांवर पडते असतां त्यांचे सात घटककिरण वेगवेगळे
हरितु-द्र्व्योत्पत्तोस प्रकाशाची आवश्यकता असते. म्हणूनच
होतात. पृथकॄत प्रत्येक किरणाचळो परावतेन-श्र्भ् शक्ति वेग-
अंघाऱ्या जामी अथवा सावलच्त वाढणाय्या वनस्पतो फिकट , वेगळी असते.
होतात.
प्रकाशामें पानांतोल
जळोवनधिड उत्तेजित होऊन
हबॅंरंतू-द्रव्य त्याजकडून उत्पन्न कळे जाते. हरितूं-द्र्व्में असलेल्या
रसावर प्रकाश पडला,
तर त्यांताल काहो किरण
शोधून घेण्याची शक्ति त्यास असते. ततेच तो रस प्रकाशात
दोन वेगळ्या वानूते पाहिला
तर तो दोन वेगळ्या र'गांना
दिसतो. प्रकाशाच्या पलळोकडळील वब्ड्रुस तो हिरवा जशाचप्
तसाच दिसतो; पण जिकडे त्यार्चे परावतेन होते त्या वाढून
तो रस लाल
रक्तप्सारखा
दिसतो.
ह्या उलट
ताते
रफ
दिसते. म्हणजे ते प्रकाशाकडोंल वाड्रस लाल व परावतेन
होणाऱ्या वाचूऱस हिरवे दिसते.
वनत्पा’तेणेदाप्रमाणे
होरतू-जळोवनपिंतास
वेगवेगळा
किरण व हरित-॰र्तांवनपिड ह्यांचा परस्पर सेवेचा-ज्या
प्रकारे काचेच्या त्रिपाश्वरँर्ने किरणाचें पृथक्करण होते, त्याप्र॰
मागेच हप्’रॅत-जळीवनपिंडाते तुझं किरणांदु पृथक्करण होते.
" मात्र या तोहोत फरक असतो. पहिल्या पृथकरणांत सातो
किरण वेगवेगळे दिसतात.
पण दुसऱ्या पृथक्करणांत कांहो
. फिरणांवें शोषण होऊन केवळ उरत्र्टेले किरणच वेगळे दिसते
तात. ळित्रपाधोंस किरण श`।पण करण्याचळो शक्ति नाहीं
परंतु
पानातील हरितहॉजळीवनमिंदास तशळो शक्ति आहे काच
न्निपाधोंत पोकळी कसन त्यात हरितुद्रव्य रस भरला व
त्यायोमानें किरणांचे’ पृथक्करण वसँ होते हे पाहिले असता असे
अटुढळेल क‘ऱ् वेहमी वेगळ्या होणाऱ्या सात किरणापँफॉं कफ
आकार येतो. काह“! पाणकेंशट्वच्या जळोवरसात हरितू-द्र्व्य पूणें
नारिंमी,पिवळे व ।हेरवे या तोनचर'गांचे किरण वेगळे होतात
व वाकावे चार र'गांवे तांबडे, अस्मानळो, ळा’नळे व जद्देभळे हे
निरळे जाऊन त्यास कोणताप्द्दे विशिष्ट आकार येत नाही.
परंतु स्पायरळोपायरासारख्या पाणकशांत हरितूं-ज्ञीवनपिंड
व उरत्ठेंल तोन न शोळिपळे गेल्यामुळे वेगळे झालेले दिसतात;
मळघूत्राक्रुतो होतात, झिमियामघ्र्मे त्यास नक्षत्रासारखा
आकार येतो. उच्च वग`।॰त साधारणपणे त्यास वाटच्ळा आकार
असतो. उच्च वर्गांत
कमी अधिक प्रमाणात हरित-द्रव्य रसाकडुन शळोषिते जातात
म्हणजे त्रिपाश्वव्च्या पोकळीत ठेंविलऱ्ल्या हरितू- द्रव्य रसातोल
हरितु-बीवनपिंडप्वडून प्रकाशाचे कांहीं किरण शळोयिलै
अवयवत्चना पूणेत्वास पोहोचल्यामुळे ‘ जाऊन उरलेले किरण वेगळे होतात. हो विशिष्ट शक्ति जीवन…
हरितुंर्शीक्यनपिंड साधारणपणे पानांत
विशेष आढळतात.
कायोत फार उपयोगी पडते. ह्या रोतौनॅ प्रकऽशांतोल किरणे
प'रतु ह्यांतव्हे मघ्यांगों ते पुष्कळ असतात. वरळोल भामापेंक्षां
खालील माग अधिक फिका असतो. वाघ्नत्वर्चेत हैं पिंड
सहसा आढळत नाहीत. त्वगू-र'याच्या रक्षक-पेशीत मात्र
शोपून त्यांचा उपयोग तेप्न्द्रय पदाथींत्पत्तांस लागणाऱ्या
हे असतात.
मद् प्रकाशात हरित-जीवनपिंड पूणे रोतोते
चळोह’न्प्वाबुंकडे पसरतात व हो स्थिति कबँनिपाकास अथवा
स'त्यापतेस अधिक चांगला असते. प्रकाश कडक असेल तर
त्याची तांवता टाळण्याकरितां पानांतोल वाह्यांगास असणारे
इळिरबू-जींवनपिंड आंतोल वाजून वळून त्यांवे पुंज तयार
होतात. पुंज यनल्यार्ने कडक प्रकाशापातून त्यर्फेचें संरक्षण
होते. कडक प्रकाशात पानाचा पृष्ठभाग एका बाजूला
वळून
अवब्ट्टेय शक्तळोना पुरवठा करण्याकडे होतो. प्रकाशातोल सात
किरणांपेंकळो कवळ चार किरण कवेसरथापन-कायोस अथवा
कवेविपाकास फार उपयोमी पडतात असा अनुभव आहे,
मात्र हें किरण सारख्या रळीतोते शळोषिळे जातात अथवा ते
सारखेच उपयोगी पडतात अते नाहीं. सर्वे किरणांत
तांबडे किरण सात्विक पदाथींत्पत्तांस अधिक उपयोगी
पडतात व ते त्या मानानें जकुंवनपिंडऱ्कडून अधिक
शौषिले
जातात. त्या खालोखाल अस्मानळी व पुढें निळे व जांभन्ळ
अशा कमाकमाते उपयोगी पडतात व हाच अनुभव किरण ’
व्यवस्था होते. म्हणने ज्या प्रकारे कडक प्रकाशामुळें स्वतऱ्चें
शांपणांत दृष्टीस पडतो. प्रकाशर्टेतोल उपयुक्त किरण शोषण
कसन त्यांचा उपयोग सात्विक पदार्थ वनविंण्यप्स करणें हे
नुकसान न होतां प्रकाश
जींवनकार्योतोल एक मइत्त्वार्चे कार्य असल्यानें हरिद्-
त्यांच्या शक्य तितक्या थोड्या भागावर प्रकाश पडेल अस^ ।
अधिक
शव्ग्षेला जाऊन
तेक्सि<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०३
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रव्य प्रप्नकप्रो. ( ज ) २७८ जोवनकप्र्थविम्रार जव्वनळिपडांवे अथवा त्य’ळातोल हळारेत-वव्वार्वे ड्तर्के महत्त्व असते. कारवन सस्थ।पन.-॰प।नावर असणाऱ्या त्वगू॰र॰ध्र॰।- मू..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रव्य प्रप्नकप्रो. ( ज ) २७८
जोवनकप्र्थविम्रार
जव्वनळिपडांवे अथवा त्य’ळातोल हळारेत-वव्वार्वे ड्तर्के महत्त्व
असते.
कारवन सस्थ।पन.-॰प।नावर
असणाऱ्या
त्वगू॰र॰ध्र॰।-
मून हरिंतू॰जळीवनपिड।च्य। साहाण्याते हवेतील
कर्यांग्'लवत्यु
नू
।
शोपिंला जातो. तो वायु पानांत आल्यावर पानाच्या घटक-
र्जानृनकार्यंप्’वेचप्र
नाहो अते काही शास्त्रज्ञांनां वाटते. पोलाँसळी नांवाच्या शास्त्रज्ञाते' हिरव्या सयेतन पानांत फारमलाडेहाइड पदार्थाचे
अस्तित्व फार सूक्ष्म प्रमाणांत वरचेवर आढळते अते सिद्ध येते
आहे. ततेच
प्रकाशामघ्येच कारमलदिहाइड पदार्थ पानांत
तयार होतोएरव्हो अंधारात हा तयार होत नाही अते त्याच्या
सयोग
पाहण्यात आते आहे. यावरून हा पदार्थ हरिंऎणीवनपिंडाहोऊन त्याचे कवाम्ल तयार होते. पेळिशरसात मुळयाकडून कडून पानामघ्यें कवे-सस्थापन कियेत प्रथम तयार वेढला
शळोधिठेळे पोट्याच्चियम क्षारादि पदार्थ असतात. जरी या ` जातो व पुढे न्यावे दृढळोकरण होऊन साखर होते व त्यास
पदार्थांचा प्रत्यक्ष उपयरैग तेस्यापन‘कायोत नसतो तथापि
सत्वार्चे दृश्य रूप येते. यारळीतोते फारसलळिडहोड्ड पदा’
या विशिष्ट पदार्थांच्या अभावळो कबेंसस्थापन'कार्थ होऊं शकत ’ र्यांवा विपारज्पणा जौवनपिंडास जाचक होत नाहो.
नाहळी. म्इणवे असते उपयुक्त शोप्’पेत क्षार अप्रत्यक्ष रळीतोनें
साखर फारमलधिहाड्ड पदार्यांपासून वनते पण साखरे‘
कर्थतेत्थापन-कायोस अवश्य असतात. पेंळिशरसठेंतोल या पासून सत्व वनण्याचळो अवश्यकता कव्णतो अथवा त्यापासून
कायोस प्रत्यक्ष उपयोगळो पडणारा पदार्थ म्हणजे _ पाणी होय.(.
फायदा कोणता असा प्रश्न उद्धबूं शकतो. ततेच साखर
. ×
,.
९
शा
या पाण्याचा कवाम्लवायू
सयाग होऊन आलेल्या कना- . हो विंरणारळो असल्याने पानांत तयार झाल्यावर ता दुसऱ्या
पेंशिंजालात असणाऱ्या पाण्यार्शी अथवा पेन्सिरसाशळो
म्लावे पृथक्करण हळिरनू-जींवनपिंडाकडुन कळे जाते. एक भाग
जागी मुदां सहज जाऊं शकते, त्यास उत्तर एवढेच
कर्थ ( काबैन ) व दोन भाग उज्ज (हायड्रोजन) व तळोन
येईल कळी कवे-सस्थांपन होत
भाग
पदार्थ असतात.
प्रमाण वरेंच मोठे असते. त्याच वेळ“! जरळी साखर दुसरी-
त्यापासून एक भाग कारवन, दोन भाग हायड्रोजन व एक
कडे पाठविण्याचळो तजवव्ज केली तरळो तो सर्वे लवकर पानां’
सून द्रुसरव्कडे जाणे शक्य नसते व त्या अवमीत तिट्रव प्रमाण
प्र|ण ( अव्किसजन)
अते घटक
भाग ऑकिसजन अते वायू असलेला
एक
फारमला’डेहाइड
नावाचा सधुंक्त पदार्थ तयार होतो; व युटया
दोन भाग मोकळे
होतात.
पानांत अधिकाधिक होत येते तर त्याचा
साखर
परिणाम
वनण्याचें
जळीवन’
पिंडावर ततेच जीवरसावर होऊं लागतो,: त्यामुळे त्यांच्या
पदार्थाच्या दृढळी- : कार्योत अडथळा उत्पन्न होतो व तितक्या प्रमाणीत नवीन
हे अळोकिसजनवे
मिसळतात व तावडतोव फप्रमलाँडहाड्ड
अतेवेसजनचे
असतांना
देतां
भाग हवेत
करणाते त्यापासून एक प्रकारचा साखर तयार होते. साख- . साखर उत्पन्न होण्याचे काम बॅद् होईल. म्हणून पाँडया वेळारळेचें पुढें सत्व वनते. शरळीरांत सत्व हाच पहिला दृश्य पदार्थ
होतो. काहो शास्त्रज्ञांच्या मतामें कर्बोम्लवाग्रू पानांत आल्यावर त्यावै कबीम्ल तयार
होण्याची आवश्यकता नसते. त्या
करितां त्या साखरेचे अविंदाव्य सत्वकण नसल्याते बाँवन’
पिंलाचें कप्ये पूव’हेंसारखेच द्द्यपाटयाहुंव् चालू राहते.
व्हाड्न्स
असे घठऋ पदार्थ
नावाच्या शास्त्रज्ञान साखरपासून सत्वकण वनण्यासनमी
निराळा उपपा’ने दिली आहे. तो म्हणतो प्रथम विघटळीकॄत
घटकापाक्षुन फारमलळिडहाड्ड तयार होते व त्याचा साधी
जन दोन भाग व अनृकिसजन एक भाग अते पृथक्करण होते.
पाद्देला कवेएकप्नाणिद् ( कारवन म`।न।स्काइड ) व उज्जवे
दोन भाग यांचा काहो विशिष्ट प्रमाणांत रासायनिक तेयोग
पचन
होऊन
हे
नायट्रॉजवादि पदार्थ पानांत
मोकळ्या
।"रथतोत
आढळतात. त्यांचा साखरेच्या
रसाशव् रासायनिक संयोग होऊन प्रतांद् अळोजस पदार्थ
होऊन त्यापासून एक भाग कर्वे,
तयार होतो. हा प्रतोद् पदार्थ जोवनपिंडप्कडून पचघिला
कबाँम्लवायूळेप्’वच पृथक्करण होते. कबाँम्लवाग्रूमष्र्ये एक भाग ’
कर्थ व दोन भाग प्र।ण्। ( ऑक्सिजन )
असतात, त्यापासून कर्थएकप्रळाणिद् ( कारवन मोंनास्काहड ) ` साखर बनते. ह्या साखरेच्या रसाशळी नायट्रोजन, गंधक व
म्हणावे एक भाग कवे व एक भाग प्र।ण ( थॉकिसजन )अते फॉंस्फरस हें पदार्थ मिसळून नायट्रोजनयुक्त प्रतांद् ( प्रळोर्टाड)
वायू… असणारा एक सेयुक पदार्थ व एक भाग युटा ऑक्सि- अगर ओजस पदार्थ तयार होतो. नायट्रोजन, गंथक व
जन अशा प्रकारर्चे त्वावे पृथक्करण होते. कबौम्ल फॉंस्फरसहॅ पदार्थ क्षारस्थितोत मुळांतून शळोषिलै जाऊन
वाग्रूप्रमाणें'च पानांत येणाऱ्या पाण्यार्चेळिह हायड्रो’ पानांत येतात अथवा
पा‘हेल्या
प्रतळीद् पदार्थांचे
दोन भाग उज्ज व एक
भाग प्राण असा एक तेदिय पदार्थ तयार होतो व उरलेल्या
प्नाणावे होन्हो भाग मॉकळें राहून हवेत मिसलतात. हो
जाऊन त्याचें जीवनपिंडाशा
पुणे सात्मीवरण होते. पण
लवकरच जळोवनपिडाकढून सत्त्वाचीं उत्पत्ति होऊन त्यास
तयार होणारा तेदिव पदार्थ एक प्रकारच्या साखरेंसारखा
असतो अथवा फारमलाडेंहाहडसारखा विषारी पदार्थ तयार
तेल्युलळोज वट्वेंळिर पदार्थ उत्पन्न होतात. बाँजामघ्यें
होतो. मात्र पुढें फप्रमलडिहाड्डपासून लगेच साखर होते व
रताळी, बटाटे वगेरें कदादि
साखरपाडून सत्व वनत.
फारमला‘डेहाइड हा घिपारळी पदार्थ असल्याकारणाने“ ळितवै
अस्तित्व सतोव शरळोरर्तेत अथवा जळोवनपिंबांत मानणे योग्य
ते पौष्टिक अन्न वेगळे होऊन त्या विशिष्ट भागांत साठा’वेते
जाते. म्हणजे प्रथम जीवनपिंदाकडून एखाद्या विशिष्ट
दृश्य सत्त्वकणावे घनस्वरूप प्राप्त होते. त्याच र॰।त’।ते तेल,
ततेच
भागांत बेव्हो तेव्हां पौष्टिक
अन्नाचळो साठवण होते, तेव्हां त्याच रळोतळीते जळीवनर्पिडप्कडून<noinclude></noinclude>
r164s52m8du1t55n5rrp24fguenzve8
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "लाँवनकप्र्थंविचाग्: महाराषीय” " ,. शांक्कीश॰(ज)` २७९ स्थिर्तींत सध्त्मीकरण झाल्यापासून पुन्हां तो पदार्थ जीवनपिंडाच्या शरोरप्पाधून वेगळा होवो. प्रत्यक्ष साखरॅपाहूंन सत्त्व तय..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>लाँवनकप्र्थंविचाग्:
महाराषीय”
" ,. शांक्कीश॰(ज)` २७९
स्थिर्तींत सध्त्मीकरण झाल्यापासून पुन्हां तो पदार्थ जीवनपिंडाच्या शरोरप्पाधून वेगळा होवो. प्रत्यक्ष साखरॅपाहूंन सत्त्व
तयार होते अते अप्तां कोणी म्हणत न।हाँत.ज।॰वनळिपडाच्या
प्रल्यक्ष साहाय्यार्ने त्यांच्या शरळोरप्पातून असले पदार्थ उत्पन्न
होतात असें सवेंसमतासैद्व द्द्यळि आहे.
।
।
वर्दुग्रूवेंप्रयाण फारच
जौत्रनफामँविचा'र
सूक्ष्म असते.
तेव्हां एवढा पुरवठा
फेकून होता ट्र पृध्ब्रावरळील ज्वप्लामुखळो पर्वत'प्पासन पृथ्वीच्या
पाटाताल कबाम्ल वायूचा ळींव् सारखा बाहेर पडतो तसच
ज्यालाप्रयाद्दीझऱ्पांतून ता वायू बाह्य हूंर्वेत ।मसळत
: असतो. सबै सजीव ट्टाष्टांच्या श्चासोंच्छूयासप्वरोंबर बाहेर पडप्रकाश व कर्बंसत्थ।पन:-॰ इर्तेतळि कर्बोम्ल वायु णाऱ्या कबौम्लवप्यूचौद्दे प्रयाण लक्कांत येण्यासारखे आहे.
स्पोषेळां जाऊन त्यांतोंल पदायाँर्वे सरयापन वनस्पति- . इतक्या सर्वे ठिकाणाहून मिळणारा हा याग्रू एकत्र झाल्यावर
शरळोसंत होते. केवळ कबँ अशा स्वतंत्र स्थिर्तीत
त्याचे
सत्थापन होंत नाही. कोंणत्याना कोणत्या तरळी तात्विक
सैद्रिप फ्द्प्पाँत ते होत असते. वनस्पति-शरोरांत पाण्याचा
भाग तळोननतुयाँशांपेक्षां अधिक असतो. हा भाग सोडून
उरलेल्या कळोरङया भागांत ।नम्याढून अधिक केवळ कर्वे
हृर्वेतोंळ त्या वायूचे प्रमाण वास्तविक किती तरी वाढते
पाद्दिज्ञे. पर'तु
इर्वेतांळ त्या यायूर्चे प्रमाण नेहमी
सप्रखेंव असते. त्याचे
कारण
वनरपर्तींकडून
एक…
हा याग्रु
शोषिला गाऊन त्यापासून र्तेद्रिय पदार्थ बनतात है होय.
हर्वेतळील कवींन्लांचै प्रमाण जे आज
हजारी
वर्षे सारस्र्वे
पदार्थांचा भाग असतो. इतका सगळा कर्वे पद्प्र्थं ह्याच
रॉर्तांते शरीरांत सैस्थाण्वि होतो. हें सत्यापनकायै केवळ
दिवसां प्रकाशांत चालते. हें कळायै घडवून आणण्यास हृरिनऱ्
कायम
जीवनपिंङ व प्रकाश हाँव कारर्णांसुत होतात. कवीम्ळ्
यायूर्वे ततेच पाण्यार्वे विघटॉकरण ह्ररिंतूनांवनर्पिडाकडूनन
परस्परविरॉघी आहेत. एकप्ते कबाँग्न्लाचें प्रमाण वाढत्व्'
पप्’द्देन्नै पण त्याच्या उलट दुसरी किया वनस्पळा’तेंसरव्र'ग्त
प्रकाशांत
होऊं
शकते. ’या विघटोंकरणकायाँस पुष्कळ
शक्ति स्वचँ होते. कबाँम्लयायूपामून कत्रैएकप्नाणिद्दू कारवन
मोंनात्काइड । बनण्यास अति उष्णतेचीं अवश्यकता असते.
रसायन-प्रयोगशाळेत असप् पदार्थ बनविण्यास एक इज्ञहुर
र्तेटिप्रेङहूंन
अधिक
उष्णतारूपळी
शक्तींचौ जस्त्तां लागते.
ड्तकॉँ उष्णताङपेंग् शक्ति वनस्पतींमध्ये कोठून उत्पन्न होते €
वनस्पतिपारळीरांत इतफाँ उष्णता प्रकाशांलून मिळण्याचौ
सोय असते.
इरितु-णीवनपिंड प्रकाशांतळोल किरण शौबून
आहे
ते केवळ हीं दोन परस्परबिरोघळो कार्ये
घडत असल्यामुळेच आहे. सचेसन ड्रुष्टांचा श्चासरैच्छूवप्स
व वनस्पति… सरत्रांत होणारँ‘
कर्वे…सत्थापन हीं दोन कार्ये
होत गेस्थचि पांहेंलाँचा परिणाम नाहाँता होतो व ह्या
कारणामुळेंच यायूचौ नसता आन लाखो वर्षे निवडली
नळाहृ‘व्. एखाद्या विशिष्ट जागी कांहीं कारणाने ह्या वायूचँ
प्रमाण अधिक होण्याचा सभव आहे. पण एका खेळतो
’असत्’याते तो वायू दुसरीकडे पसरला गाऊन पूर्वीर्वेन
प्रमा’ऱ कायम राद्र्ते. इक्की
आढळणारे
पूर्वीपेंक्षां फार कमी आहे. प्र।च^।न काळी
वाड फार विस्तौणे होई. त्या काळी वाढलेल्या
याग्रूते प्रमाण
वनस्पतीची
वनस्पतींची
व अशा उष्णतैच्या
अरण्यै ज्ञशौच्या तशीच कांहीं जागॉ हूंक'पातारख्या कार‘
सक्तींर्तेन बिवटांकरण-कायै होत असते म्इणष्न पुयेंबिंयापालून
ण'ळानों जमौनळोखालाँ द्डपलॉ जाऊन त्यांच्या द्गडॉ कोंळ’
साच्या खाणी
तयार झाल्या. तो काळ
फार प्राचीन
अस।व।॰ परंतु काळानुसार ते प्रमाण कमी होत जाऊन
यास उष्णतेच्या स्थितोंत
आणतात
निघणारा प्रकाश क्नत्पतछ्स पळोहोंनल्यावर त्यावै शोषण होते
व पुढें त्गांह्प्प्` रूपांतर उष्णतेत होतेहा शक्तींचा पुरवठा प्रका-
शांछून झाला नसता तर सर्वे र्गावनकार्थे बहुतेक वेद पङलॉ
अप्ज्ञ प्रत्तुतच्या स्थितळोस पळोहॉचर्ले व त्या प्रमाणांत
वनस्पतींची वप्ढ कमी झाली.
सचेंतन तृष्ठीस पोषण देतो. वनस्पतीची वान मुद्रा अप्रकबँ’तेस्थापनकार्योत त्वगू-रँघांचा उपयोग: …कबाँम्ळ
त्यक्षरँण्तांर्ते लूयैप्रकाशावर अवलवून असते. सव माणि- _वप्धुं शोषण कसन घेण्यास त्वगू'रप्राचा मागें उपयोगी
वगें पळोषणासठीं वनत्पर्तांवरच अवलंबून असतो. काही पडतो. पाणवनत्पतांमर्थे जे बाह्यांगॉ
आवरण असते
प्राणी मांसाहारी असतोंल पण त्या मांसाहारी प्रप्ण्यांर्वे त्यांतून हा वायु आंत शिरण्यास अडचण पडत नाहीं.
सक्ष्य अन्य प्राणी प्रत्यक्ष अगर अप्रत्यक्ष वनस्पतौवर अवजमीनीवर उगवण्याऱ्या
वनस्पतींमध्ये
त्वगू-र'घ्रळाचा
कंवून असतील. अर्थात सर्वे सवेतन तुंप्तीर्वे र्णांवन सूर्य- विशिष्ट यांजेना असते व त्यांतून तो वायु आंत शोपून
असतां. चूग्रँनारायण प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रोतांनें सर्वे
प्रकाशावर अवळेचून असते. तोंव नगांतौल सर्वे तेंद्विय पहा` ’ घेण्यास सोय होते. प्रकाशांत त्वगुं-र'र्वे उघडॉ असतात. म्हणून
याँवप् उत्पादक आहे. त्याशिवाय नया तेद्दिय पदार्थ अस्तित्शंत येणे शक्य नाहीं.
प्रकाशांतच त्या रंप्रांतून
’ त्वगू- र’र्धे
वेद
त्या वाग्रूर्चे शोषण
अतळेंस्यप्
होऊं
शकते.
स्मिर्तांत तो वत्यु शळोक्विप्
कबाँम्लयाग्रूवा पुरवठा:-॰सबँ
सैद्रिय पदार्थाचे हु जाव्प् शक्य नसतेंद्दा वायू शींपिला गेल्याशियाय कर्वंसस्थाफ्न.
कर्वे हा एक अवश्य भाग असतो. किंबहुना र्तेदिपत्व ’ काथे घडणार नाहीं. अर्यांतू प्रकाश, त्वगू-र'र्थे व हा याथुण्
येणें म्हृणबे कबँपपार्थाशॉ
एकरूप होणें होय असे
कांहाँनीं म्हृटर्ले आहे. अपौतु सर्व हैं।द्रिय पद्प्र्थं बनण्यास
केवदया तरी कबौम्ल यायूचीं जसरळो पाहिजे. द्वैत त्या
३६
ह्मा तोंन्होंचा ह्या कवट्टेर्शा अत्यंत निकट सबंध असतो.
न[यट्रोज्ञयुक्त प्रतळोद् (प्रोटोंङ) पदार्प-ओज्ञसू फ्दार्थंऱ्…
वनस्पति’शरळोरांत केवळ,
तात्विक
सेद्विय
पदार्थ असताक्<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०७
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महारा’ट्रांय पक्कोप्. ( ज्ञ ) २८० जीवनकप्र्थविचांर असे नाहीं, तर इतर तेद्रिय पदार्थद्दि ळतात. सर्थ तेद्विय शकत त्यपिंरॅप्वरच आढ- पदायाँसघ्ये न[यट्रोजनधुंक्त पदार्थ नाहीं. अर्थ..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महारा’ट्रांय पक्कोप्. ( ज्ञ ) २८०
जीवनकप्र्थविचांर
असे नाहीं, तर इतर तेद्रिय पदार्थद्दि
ळतात. सर्थ तेद्विय
शकत
त्यपिंरॅप्वरच आढ-
पदायाँसघ्ये न[यट्रोजनधुंक्त पदार्थ
नाहीं. अर्थात सात्विक पदार्थाच्या अभावॉ त्या
थॅरफरेजिन पदार्थाचा रासायनिक सैयळोग त्याशीं न होऊन
ते पदार्थ मोकळ्या स्थिर्तीत आढळज्प् साहजिक आहे.
तेव्हां वाढता भाग प्रकाशांत असतो त्यावेळी सात्विक पदार्थ
अधिक महत्वाचे आहेत; कारण त्यापाचूनन प्रतळोद् ( प्रोटळोड)
किंवा ओजतुं पदार्थ तयार होतात व
ज‘प्वनकार्थविचार
हेच बांवरसाचें
उत्पन्न होऊन मोकळ्या थॅरफरेंजिन
अथवा जींवनर्पिडावे खरे घटक होते. सात्विक पदार्थांना
उपयळोप प्रतोंद् पदार्थ वनण्यास होतो किंवा जोवनकायाँस
किंवा अमिडो-अ‘श्विदृ’
अवश्य लागणाऱ्या राजांचा पुरवठा करण्यांत होतळो. सात्विक
सारख्या पदार्थार्शी रासायनिक सयोग होतो. सेयोगाते
उत्पन्न होणाऱ्या प्रोउळोड पदार्थांचे पमैवसान जीवरसांत होते
गंधक व फार-फरस हो दुसरी वव्र्वे मिसळून त्यापातून
प्रतळोद् पदार्थ तयार होतो.
इवेंसघ्र्ये रँळाकडा ८० टक्के नायट्रोजन-वायूर्चे प्रमाण
म्हणून त्यावेळी असले अत्फराजनसारखें पदार्थ मोकके
अस शकत वादात. पण अंधारात ह्या च्या उलट स्थिळूत होते.
वनत्पात- णरारांत अस्फरबिन पदार्थ दोन रॅय्ताते उत्पन्न
होण्याचा स्थित आहे. पूर्वे प्रळोठळोङ पदार्थाचे पचन व विवटी`
अवूनद्दि त्या वाग्रूवा प्रत्यक्ष उपयरेंग वनत्पतोंनढे वायट्रो‘
करण होऊन थॅत्फरैजिंन पदार्थ उत्पन्न होऊं शकतात;
जवाकारता जयळीनोंतूंन न'प्यट्रांजनक्षार मुळ्यांकडून शोपून
घ्यावे लागतात. हा शोध प्रथम बोसिगॉल्ट नांवाच्या शास्त्र-
किंवा
ज्ञाने लाविला. जमौनळीतून द्र्वस्थितींत मुळ्यान्वयें नायट्रोजन
होतात अशा रातान उत्पन्न होणाऱ्या ढे’च्रफरें’बिन पदाया'
पावन स।।त्त्वक पदायाच्या रासायनिक सयळोगान प्रताद्
पदायाँवर विशिष्ट रासायनिक कार्थ पडून त्यांत नायट्रोजन,
वर त्यांवर रासायनिक किया सुरू होऊन
त्यांर्वे गयकाम्ल्ऽ तयार
दोन्हो
त्यापासून
अत्फरा’बेंन पदार्थ उत्पन्न
पदार्थ वहूं शकतात
प्रताद् पदाथीच उत्पातस्थानऱ् ……हें पदार्थ अमुक
एका ।वशिष्ट जागाच तयार
हातात असें न।इ"।.
वनत्पतळोच्या सर्थ सवेतन पेंळिराजखोत हें पदार्थ हो’ऊ शकतात. एखाद्या विशिष्ट भागांत ते अधिक बनतात तर दुसऱ्या
त्यांवै नवाम्ल
ग्‘ळाघकावे क्षार शेंम्पिळे जाऊन
होते. डॉ
वायट्रेउ क्षार शोपिल्यावर
अमोंग्नया वायू मोकळा होऊन
क्षार इतर क्षारांवरोबर शोषिळे जातात. ते शरीरात आल्यातयार होते. ह्मावप्रवाणें
जमौनळोतून
आले व साघ।
फारमलडिहाडूडसारखा पदार्थ अथवा सावळो साखर ह्यांचा
रासायनिक सवळोग होऊन त्यापाग्ड्रुन प्रतौद् पदार्थ उत्पन्न
होतो.
’ ज।ग"। त्यांच्या उत्पत्तीचे प्रमाण फार कमी असते. साधारण… कित्येक शास्त्रज्ञांच्या गतार्ने जमीनोंतौल्ऽ वायटूळोजनयुक्त पणें पानांत अथवा प।न।सारख्य। हिरव्या भागांत ह्यांची
तेद्दिय पदायाँवर लूक्ष्म जेतुंच्या विदावणळिकयेते अमोनिंया उत्पत्ति अधिक होते. रिंकपर नांवाच्या शास्त्रज्ञाचै अते
वायु मोकळा होतो व ह्या
अक्किजन वायूचा
परिणाम
अमोंनिया वाग्रूवर इवैर्तांल
होऊन
म्हणणे आहे की त्या पदार्थांची उत्पत्ति इरितूंज्ञळोवनपिव
व तुंयैप्रकाश ह्यांवर अवलंबून आहे. खरोखर ह्या पदार्थांच्या
उत्पत्तीस चूळार्थप्रकाशाचा किंवा हूंरितूजच्वनपिडाचा अप्रत्यक्षच
नायट्रॅठ-क्षार तयार
होतात व ते मुळ्यान्वर्ये
वनस्पतीच्या शरीरात शोषि‘ले
जातात. शींषित न।यट्रेउ॰क्ष।राप।खून पुन्हां अमोंनिया
मोकळा
होऊन
अमिर्डळा-अ‘सिड
तयार
होते, व
उपयळोग असतो. केवळ
पदार्थ बनतात अते म्ट्णव्प् चुफीवै होईंल अवारात मुहां
प्रसाद पदाथ वन शकतात. भाकित वर्गांर्तांल्ऽ वनस्पती
द्यावा
सात्विक पदार्थांशॉ सयोग होऊन त्यांत गंवकाम्लार्वे मिश्रण
झाले" म्हणजे प्रोठोउ पदार्थ वनतेग्. पहिल्या उपपर्तापेंक्षां
हो उपपग्लि पुष्कळ शास्त्रज्ञांस मान्य अद्दि. कारण वनर्सातशरोरांत र्धेस्फरँजिनसार’ते बॅंमिडो--डेंर्नोसिउ
प्रकप्शांत ह्रितू-गीवनपिंडाकढून हे
वाश्रट्रॅठ-क्षारापासन आपल्या
वनबूं शकतात.
पदार्थ पुष्कळ
सात्विक
रारींरांतद्दे
पदाथ अ'यारांत
पदाथात्पत्तोस अवरेंय
लागणारी
शक्ति लूर्थकिरणांतून मिळते. तशळो शाक्त प्रतेऱ्द् पदार्थ
वेळां आढळतात… झावाच्या वाढत्या भागांत हे पदार्थ आउ-
बनविण्यास
कोठून
मिंळतेट्
सात्विक
पदाथात्पत्तांत
ळत नाद्दात. कारण त्या जागी वाढ होत असल्यास पुष्कळ
खूर्थकिरणस्वपाँ शक्ति गुप्तस्थिर्वांत सांठा’वेंलाँ जाते. त्या
नवीन गीवनर्पिउ व जीवरस बनण्याची आवश्यकता असते; ` विंलेल्या राफोवाव उपयळोग ह्माकामळी होतो. कारण
।
सांठती
म्हणुन त्या भागांतळोस सर्वे अरफरॅ’जिंनसारख्या अमिडों॰ गुप्त शक्ति दृश्य स्थिर्तांस आणणारा एक त्व'तन्न जीवनअसिडप्चा सात्विक पदार्थांशॉ सयोप होऊन प्रताद् पदार्थ ।` क्रिया अहोरात्र वनस्पति शरीरात चालू असते त्यापुढे
क्ततातु’ व ह्यग्
तयार झालेल्या प्रतळोद पदार्थांर्वे सात्नळी- तूयैप्रकाश अप्रत्यक्षरातानै प्रताद्- पद्प्थेंरिंपतीसद्दि कारणी'
वाढ भूत होता र्फाहोन्-या मतानें ह्यास नूर्थप्रकाशांवा प्रत्यक्षद्वि
जीवना’पॅडांचळो
जीवरसाचो व
करण होऊन
होते. ह्या कारणामें वाढत्या भागांत अ’त्फरेंजिंनसाररँव उपयोग होऊ शकता प्रकाशांतास अस्मानीं किरणाकडून
खुले नायट्रोजन पदार्थ अढळ्त वाहोत. तळो वाढता भाग हे पदा॰थ वनण्यास सहाय्य होते.
अघारांत असला तर त्या भागांत अमिबो-बॅंसिड पदार्थ
प्रतौद् पदार्थाच्या रासाया’नेक पुथकरर्णात कारवन.
श्नांढदृट्टे लागतात. ह्मार्चे कारण अर्से कळी तों वाढता मागहायड्रोजन, अ।।कैसजन व नायट्रोजन अशॉ द्र्व्यें आढळतात.
सूर्थप्रकाशांत नसल्याने सात्विक पदायाँवळी उत्पा‘ते होऊं ततेच काहीं ठिकाणी फॉरफरस व गंधक हो।‘हें अर्पिळ्तात,
।
।<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय शासक-रेवा. (ज) र्जावनकर्म्यविचार प्रतोंद् पदार्थाच्या राखेंत क्कोराइड, फात्फैय्, सल्`पऱ्थ्, कारवळिनट वगैरे असून कॅलशियम, मॅयेशियमृ, लोह व परेंरँशि' यमू क्षारांचाहि क..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय शासक-रेवा. (ज)
र्जावनकर्म्यविचार
प्रतोंद् पदार्थाच्या राखेंत क्कोराइड, फात्फैय्, सल्`पऱ्थ्, कारवळिनट वगैरे असून कॅलशियम, मॅयेशियमृ, लोह व परेंरँशि'
यमू क्षारांचाहि किंधितू अस
सापडतो. वनस्पति-…शरव्रति
प्रतळोद् पदार्थास नेहमॉ विशिष्ट वेगळा आकार
न।ह’।.
बहुतेक
येतो अते
वेंळां ते पदार्थ जीवरसाशॉ सात्मोंक्रुत
झालेले असतात. कांहो वळोषांत नैसर्मिकपर्णेच ते जळोवरसा'
पासून वेगके होऊन त्यात विशिष्ट स्फच्ठकाक्रुति येते. एर'डी’
सारख्या सतेल्ऽ वाज्ञांत खाऊच्या पुडयासारखा अथवा
मधुरा चेवूसारखा आकार प्रताप पदार्थास येतो. काहीं
ठिकाणी साधारण लह।नमोठा,वाटॅ।ळ। आकार येतो.
अ अशी व या र्थ क। हो ख ठ प टों-स्वतभ् तेद्विय अन्न
तयार करितां येत वाहो असा काहो वनस्पर्तींनां तेळिद्र्य अन्ना-
सठीं दुसऱ्यावर अवर्लवून रग्हार्वे लागते. अशांनां परावलेबीं
वनस्पती अथवा ड्रुक्षाद्नळी म्हणतात. अमरवेल्ऱ् वावान्-या
वनस्पतास
नेहमी
दुसऱ्या
ड्रुक्षाचीं जरुरी असते.
तिला
कवत्म्ल शोधून स्वत:च्या शरीरात कबै-सस्थापन कारॅता
येत नाही. कर्व-सत्यापन-प्कैंयेस अत्यंत आवश्यक ते हरिंतु॰
द्रव्य ते त्या वनस्पतळोमघ्ग्रॅ फार'स असत नाही. तो वनस्पति
पिवळट असते.
मांसाहारी
वनस्पतामुद्धां
ह्याच मालिकेत
येतात. त्या स्वत: तेद्दिय अन्न तयार करण्याच्या भानगडॉत
न पडता
त्य।न। फौटकादिं
खाव्ळान आवडते. लहान किडे
व फौडक गुंतून त्यांच्या मक्ष्यस्यानी पडण्यास मधुर रसा-
त्पाद्न करण्याचा नैसर्गिक सत्य त्यांच्या शरीरात असते.
मधुर रसास ळुव्थ होऊन ते कठिक एकदा त्यांच्या तावर्डीत
साँपडलॅ म्हणजे पुन्हा त्यांनां वाद्देर ज[र्फे केव्हाद्दि शक्य
नसते. किडे पकडण्यासाठी त्पांचळो सरारववा विशिष्ट प्रका॰
रवी होते. काहींच्या पानांचा देठ पोकळ है।ऊन त्या र्पोकळीत पाचक…रस जगतो.
देंठाचा वरील भाग ज्ञांकणासारखा बनलेला असतो. मात्र ते शांकण उघर्डे असते. ह्या
उघड्या मांगातून रस पिण्याकारेंतां किडे त्या पळोककाँत
शिरतात. किडे आंत गेल्यावर वरात ज्ञांकण वेद होते.
अविंळास रसास ते किडे मस्वन जातात. हळूहळू त्यांच्या गर!“रावर त्या अन्लरसावा
परिणाम
होऊन
त्या किज्यांच्या
गरळोरातांल सर्थ तेद्रि’य पौष्टिक माग विरून त्याचे वनस्पति'
रारळोरति पूर्थ शोषण होते.
काही मांसाहारी वनस्पत‘ड्रंग्या
वाह्यांगांवर चारी वाहूंप्स
पिंडमय कस असून त्या आकपक होतात र्केतांच्या काणत्याद्दि मागॉकिंडा
क्रिडा मच्यवाचूऱकड
वसला तर तो
अगमिंला
के’स मघ्प्रांगाकडें
ज।त`।
ह्य।`व`ळस
कळून
कसांवून
।
जोवनकग्र्थविंयार
२८१
वनस्पतोंस तात्काळ होऊन प्रथम मध्यभागी त्याला खेंचुंन
चारा वावृंकडून रस उत्पन्न करण्याची तजवीज होते.
र्केसांच्या वाकूवर जीवनपिंड असतात. वहुंसावर क्रिडा
नसल्याने ते उत्तेजित होऊन त्यांतून रस’स्राव होऊं लागतो.
त्या किढ्याच्या सरारत्विल सर्व उपयळोगां पडण्यासाररवा
भाग शोपृन झाल्यावर तो वनस्पति पुन्हां नवळीन किंड्याचळो
वाट पाट्टे लागते.
कित्येक वेळां दोन परस्पर
भिन्न जातव्च्या
वनस्पर्तांचें
साहचर्थ होऊन त्गांपालून परस्पर फायदा होती. त्यांपैफाँ
एक वनस्पति एक काथे कळिरते. त्या दोन्हींचा परस्पर उप-
योग असल्यामुळें त्या दोन्ही एकत्र रप्हूं द्द्ळिच्छतात. ते कार्थ
एकाला करिता येते ते कार्य दुसरौकडून होणे शक्य नसते.
तर्तेच दुसरी-ते कार्थ पद्दिलोंस करिता येत नाहीं. पण त्या
होन्हळी एकत्र राद्दिल्यळि'न दोन्हळोच्या
विशिष्ट गुणामुळें
परस्पर फायदा होता. अशा विशिष्ट सयोयास सहकारी साहचयै अते म्हणता येहैल्ऽ.
प।णकँशवये व अप्लिववगॅ ह्यांमघ्यै पुष्कळ वनस्पतव्चा
अशा प्रकारचा सहकारी स‘बंव येतो. पम्णकँशांत हारेतुज्ञीवनपिड असल्याकारणाते, त्यांनां सात्विक तेद्विय पदार्थ
बनविता येतात. आलिंववर्मोत त्यांचा अभाव असल्यामुळे
तां गोष्ट त्यांनां साध्य नाही. परंतु हवॅतून प।ण^। अथवा
ओलावा अग्विव-वनस्पतोंनां आपल्या वाग्यात्वये शोपिता
येतो. असल्या भिन्नथर्मोय दोन वनरपतोंवा सव'थ एकत्र
आला असता, दोन्हीकडून दोन विशिष्ट कार्ये घडून होहा‘
वाळिह
फायदा
होता
अगसव-वगातौल
वनस्पतीच्या
क्वि।वल्क…वनत्पति
गुन्छव होय.
प्तिलावल्क अशात
पाणकेशीय व
साहचर्यांमें उत्पन्न होते.
म्हणने द्ळोन ।भेन्प्ग्वगां‘प
वनस्पतींचा
त्या मिन्नवगॉय वनस्पती एकत्र राहिल्यार्ने
दोहोचीं जीवनकार्ये सुरळीत चालतात.
कांहीं वनस्पतव्च्या मुळ्यावरळीउ शोपक र्फेस कित्येक येळां
कद्व‘हो कारणांनी मडन जातात. अशा स्थितोंत शोषक र्केसचिं
काम दुसऱ्या रातोंते झार्के वाहो तर त्या वनस्पतींचा उपासमार होऊन त्या मङन जातात, परंतु त्या मुळ्यां'वा व
जमिनळोत असणाऱ्या र्फाहो विशिष्ट अण्विव वनस्पतळीचासाह’
चर्थ स'बंथ होऊन परस्पर फायदा होतोजमिंनींतोंत्व् अस्लिव
वनस्पतो त्या मुळयात बुडून आपण यांतून अन्नशोषण कर.
तात पण त्याबरोबरच त्यांच्या यऱ्ग्याकहूंन जमिनीतून क्षार…
युक्त पाणी शोपिळें गाऊन ॰त त्यांच्या गुंळ्गांत येते. जरी
यामुळे यांतौल श्रोडेहै रेनेद्विय अन्न नाहृनृ'ते झालें तथापिं क्षार-
स्वाक्कि, चिकट रस उत्पन्न होऊन त्यायळोर्ते तों किंवा पूणपव्ळा
युक्त पाण्याचा पुरवठा त्याकडून झाल्यार्ते त्या
पकडला जातो. पळून जाण्याकरिता जसाजसा
धडपड कडं लागेल तसतसा अधिकाधिक रस
स्पतीचा तोटा होत नाही. कारण त्यावेळी पाणी शोषण कर॰
णारे ह्यांच्या मुळ्यावरळोळ शोधक र्केस वाहच्ते झाल्ट्रेलॅ असतप्त परंतु हा विशिष्ट स'बंथ घडून दोघांचाहि फायदा होतो.
तो तिला
चोहोकचून
येऊन त्याचा धडपड व्यथे होते ह्या रतांत तों क्रिडा
तेवटा मरतळो व त्यार्चे शरीर त्या रसास विरघछुन पहिल्या…
प्रमार्णे त्यार्वे शोषण होते. किंवा र्केसावर वसल्यार्वे ज्ञान त्या
मुख्य वन-
हां स्थिति जेगळति उगवणाऱ्या °`य्ग्।`।ठम।टत्र्य। उच्ववगाय वन॰
सृपतोंमघ्र्थे घुद्धां आढळते जर साहचयेरिथतात एक वनत्पति<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१०९
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय ज्ञानकोश. (ज, २८२ जोवनकार्थविचार फांहो काये न करता केवळ दुसऱ्यावर तेद्रिय अन्नासाठळो अवलंबुन राहोल तर मात्र तो सर्येथ नुकसानकारक जीवनकार्थधिचार हो।द्दे त्यांना ज..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय ज्ञानकोश. (ज, २८२
जोवनकार्थविचार
फांहो काये न करता केवळ
दुसऱ्यावर तेद्रिय
अन्नासाठळो
अवलंबुन राहोल तर मात्र तो सर्येथ नुकसानकारक
जीवनकार्थधिचार
हो।द्दे त्यांना ज[तिस्चभावच समजला
पाहिजे.
पण ह्या
होतो.
स्वभावाक्सिद्व कांहीं वनस्पती वागतात, अशा वेळीं त्यांमध्ये
पण स'बंथ झाल्यावर दोन्हो वनस्पती थळोर्डावहुत परस्परास
मदत करतील तर असा संबंध केव्हाद्दि नुकसानकारक होत
धागे वुसविते व ततुद्वारां स्वत:चे केवळ पोषण करते.
त्यामुळे अमरवेंळोच्या आश्नयदात्या पोषक वुक्षाचा वास
कांहीं व्यंग उत्पन्न झाले असते. एक वनस्पति दुसऱ्या
वनस्पतीवर आपला नविन-कारभार चालमिते, ह्याचा अर्थ
असा का तिची स्वतंत्रपर्णे पोषण होण्यासारखाँ तेसगिंक
स्थिति नसते. त्यामुळे तिला परावलवा होव्ळा भाग पडते.
दुसऱ्या वनस्पतळोवर मुलमतेते जव्वन चालेल अशी व्यवस्था
लवकरच होतो. जेव्हा एखाद्या
त्या परावलवळो वनस्पतींत आपोआप
वाहोअमरवेल दुसऱ्या ड्रुक्षावर उगवून त्यामध्ये आपले शोषक
वनस्पतविर
आळिववग’व्य
र`।ग पडतो तेव्हा मुहां अशाच प्रकारची स्थिति उत्पन्न होते.
आश्रयदाव्या
वनस्पतळीते
मेहनत
करून
स्वतऱ्कळिरतां
उत्पन्न होते.
प्र।ण-
रक्षणास लागणारे सैद्रिय अन्न त्या वनस्पतीला कोठून तरी
मिंळार्वेणें भाग असतेते प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्षपणे मिळविण्या-
सव'थळो खटपट सर्वं सचेंतन ट्टाष्टीत अहोरात्र चाछू असते.
सैद्रिय अन्न उत्त्पन्न कराव पण ररेगळोत्याद्क दुसऱ्या वनस्प’
तीर्ते त्या अचावर ताव याव्न त्याचा खुशाल उपयोग
क`।ण^। दृसऱ्यास ळुवाडून ते मिळबितात, तर कळोणीं ते स्वतऱ्
करावा हो भ्स्थिति रळोगपोडित वनस्पतीमघ्ये अढळते.
बांडगुळें परावळेवळी असतात, पण त्यांमध्ये हा’रॅतुज्ञीवन’
मर्णांत फरक असतो.
पिंड
असल्याकारणाने त्यांनां स्वतेत्रपणें
निराळ्या रळीतीर्ते तयार कारँतात,
इतकाच काय तो दोन्ही
कर्थ-सस्थापन‘
या व क अ व चा वि व ठ क र स.…कबँ-॰सस्थ।पन॰
त्यांचा जमोंनळोर्शी प्रत्यक्ष सवय नसल्या-
पासून कमी नुकसान होते. तेव्हां आश्नयत्रूक्षार्ची पाते गळून
कियेर्ते वेगवेगळ्या प्रकारच्या सात्विक पदार्थांची उत्पत्ति
होते. सत्व,साखर, तेल्युलळोज (पब्लिक द्रव्य/› ड्न्युळिमू, सयेद
( मेद्युक्त’ मेद्स ) पदार्थ वगैरे निरनिराळ्या प्रकारवै
पदार्थ वनस्पति’ शरळीर'प्त आढळतात. ह्यांची उत्पत्ति प्रत्यक्ष
सर्वत्र शिधिलता उत्पन्न होते, अशा वेळीं स्वत:च्या पानांत
ती ते’ळिद्र्य पदार्थ बनवितात. व स्वत:ची गरज भारावून उर`
वा अप्रत्यक्ष रळीतळीर्ने कर्थ-त्तेस्थापनक्रियेवर अवलंबून असते.
ह्या सर्वे पदार्थात कर्थ ( काबैन ) हा प्रधान घटक असतो,
लेळें तेकुंद्र्य
एवटॅच नव्र्हे तर सर्थ तेद्दिय पदार्थात कारवन पदार्थ प्रधान
कार्थ करता येते.
मुळे ती ज्या झाडावर उगवतात. त्यांतून क्षार व पाणी एव-
ढ्याच वस्तू शोपून घेतात. म्हणते अमरवॅलापॅक्षां बांडगुळा-
अन्न आश्रयदात्या
नृक्षप्सळिह पोहोचवितात.
म्हणजे नेहमी आश्रयदात्या नृक्षखून जे कांहो घेतले जाते,
त्याचा मोबदला किंवा स्वतऱ्स आश्रयदात्या बुक्षक्रिडून मुर-
ळीतपन्प् क्षारयुक्त पाणी मिळत जावे म्हणून त्याबेंळीं त्याला
योडोवहुंत मदत केली जाते.
र्शिबोवगोंतौल वनस्पतीच्या मुळ्यांवर फोडासाररष्या
लहान लहान गुठळ्या येतात. या गुठळ्या म्हृणबे सुक्ष्म
जतूच पुंज हात. ह्या सूक्ष्म जतूस हवतील खुला नायट्रोजन
घटक
असतळो.
वनस्पति-॰ज्ञरळोरर्तेत असा
एकद्दि तेद्रिय
पदार्थ न।ह’। की त्यात कर्वे पदार्थाचा अस नसतो. ह्या
कबँतिशिंष्ट तेद्रिय पदार्थांचा
उपयोग वनस्पत्ति×जॉव
न।त अन्न ह्या दृउळोर्ने फार मोठा असती. नप्यटुळोजनयुक्त
प्रतीद्-पदार्थांत सुडां कर्वे पदार्थाचे अग
पदार्थांपेंक्षां नत्रयु‘क
प्रोटॉडा-पदार्थ
असते. सात्^वक
अधिक महत्वळिच
पदार्थ तयार करण्याची शक्ति असते, ते लूक्ष्मजतू त्या
मुळ्यांत्रून तेद्रि'य पदार्थ भक्षण करून शरळोर-पोषणासाठळो
असतात. कारण त्यापाखून पुढें प्रत्यक्ष जव्वरसाचो उत्पत्ति
होते.
ज्या ज्या भागांत वरील तेत्द्र्य पदार्थांचा साठा आलेला
असतो, त्याच ठिकाणी त्या पदार्थांचे पचन होण्यास
त्या
अथवा पचन
वायु शोषण
मुळ्यावर
कलन
स्व…सरव्रात न[यट्रोजनवुक्त तेद्वि’य
अवलॅनृन
असतात
पण
स्वत:
हृवेंतून
होण्यासारखळो स्थिति उत्पन्न करण्यास
पाचक
नप्यट्रळोजन शोधून नायट्रोजनयुक्त तेदिय पदार्थ त्या मुळ्यांत
द्र्व्याचीं योजना झालेला असतेविंशिष्ट तेद्रिय पदार्थास विशिष्ट
आयते तयार करून ठेंबिंतात. अर्थातू मुळया व ते सूक्ष्म ‘जतू
रासायनिक वाथक द्वाव्याची जसरळी असते. एकच पाचक द्रव्य
ह्यांचा परस्पर ‘ देवाण व घेवाण ’ अथवा
सर्थ ठिकाणी सारखे उपयोंगॉ पडते असें नाहो. रताळीं, बटाटे,
सहकारी
स'बँ‘व
येतौ व त्यामुळे द्ळोहोचाहि परस्पर फायदा होतो.
मका, गहूं' वगैरे पाचक पदार्थात सत्व सांठविरे’ड्रेल असतेरैकव्हां
तेव्हां वनस्पतोंनां स्वत: जमळोनोंवून क्षाराप्दे पदार्थ
शोधून स्वतंत्रपर्णे ॰सॅद्रिय अर्वे ववा‘वेता येतात, तेव्हां त्य।न।
असतो,
दुसऱ्या वनस्पतांचीं जरूरी नसते.
पण तेव्हां स्वत:ची
असल्या सत्याचा उपयोग उगवत्या तीज-॰गर्मं।स व्हावयाचा
अशा वेळीं त्या जागळी असणाऱ्या प।चक॰॰द्र्व्याचा
पाहिजे असतेलूर्थप्रकाशांत इस्वि-र्जावनपिडांकडुन-सात्विक
परिणाम त्यावर होऊन त्याचा एक प्रकारचा सत्वरस अगर
णर्फेरारस तयार होता व त्याच स्थितीत त्याचा उपयोग
चीज…गभौत होऊं सकता. सत्व हा पदार्थ पाण्यांत विर-
र्तेद्विय पदार्थ तयार करणें हा सर्वसाधारण हा’रॅतू-वनस्पतीचा
णारा
स्वभावपर्थच आहे.
तिचा उपयोग होऊं शकत नाही. अर्थातू सत्वास शकँर।॰-रस
स्थिति आणणे अवश्य असते. हो स्थिति उत्पन्न करणारे
एखादी वाचू ळेगउळो असते अशा येळेस त्य।न। दुसऱ्याची मदत
ततेच सात्विक पदायाँपाशून वायट्रिक
व सल्फ्युरिक अग्ऱ्लाच्या सयोगानें प्रतीक-पदार्थ ववार्वेणें
नाहीं व॰ कोणतीद्दि
वस्तु पाण्यांत
विरल्थामिवाय<noinclude></noinclude>
6eje9eg1ovmcfh4dzd11ch8isdkxo2i
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रळीय सानफॉंरा (ज ।२८३ जळीवनकार्थविचार ‘ ड[यस्टेज ’ नांवावै पाचक द्रव्य असते. जेथे जेथें सत्याचा साठा असतो, त्या त्या जागों ह्या पाचक द्रठयाचीं योजना झातेळी असते. तेव्ह..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रळीय सानफॉंरा (ज ।२८३
जळीवनकार्थविचार
‘ ड[यस्टेज ’ नांवावै पाचक द्रव्य असते. जेथे जेथें सत्याचा
साठा असतो, त्या त्या जागों ह्या पाचक द्रठयाचीं योजना
झातेळी असते. तेव्हां पाण्याचा ओलावा वळोजास मिळतो
तेव्हां त्या अळोलाव्याते त्यांताल पाचक द्रव्य उत्तेजित होऊन
आपली निवडक झिया सत्वावर का’रते व त्याचा परिणाम
असा होतो कळी, हळूहळू पूर्वीचे न विरणारे सत्वकण पाण्यांत
जीवनकार्यंधिचार
फरक नसल्याने या अन्नाचे पवन होण्यास द्ळोहोताद्दे एकच
प्रकार'वॉ पाचक द्रव्ये असतात. अन्नमेदाप्रभाणे' भिन्न पाचक
द्र्व्याची जरूरी असते. प्नाणिरारीराचळो रचना धिन्न असल्याने
त्यांत पाचक
द्रव्ये उत्पन्न करणारे
विशिष्ट पिंड असतात
व त्यांतून जरूरीच्या वेळीं तसलाँ द्रव्ये अगर रस उत्पन्न
क्सिन त्यापासून शोषणास योग्य असा सर्कस-रस तयार
है।ण्याचीं नैसर्गिक तजवीज होत असते. पण वनस्पति-करी…
र।त तशा प्रकारचे विशिष्ट पिंड असत वाहां'त. पण जेथें पौष्टिक
होतो.
हैं डायस्टेज पाचक द्र्व्य बौजांवून पाण्यांत अथवा
अन्नाचा साठा असतो, त्याच ठिकाणी त्या अन्नावररैवरव
रिंलसरीनांत वेगळे काढितां येते व पुढें अक्कोहलाचा उपयोग
पाचक द्र्व्याचा सुडां साठा होतो. तेव्हां पाण्याचा ओलावा
त्यास मिळतो, त्यावेळी ती पाचक द्रव्ये उत्तेप्जेंत होऊन ती
केला तर तळाशी त्या द्र्व्याचा साखाद्दि वेगळा होतो.
डायस्टेजासारखाँ ड्म्युतेज, ग्लहूंकेन, सायटेज वगैरे पुष्कळ
पाचक द्रव्ये शाअयेत्त्यांर्नो शोधून का‘ब्ढेळी आहेत. खजूर,
सुपारी वगैरे व।ज।त तेल्युलळोज
नांवाने पौष्टिक पदार्थ
असतात. द्यांस घिरविणारे' पाचक द्रव्य सायदेंज नांवार्वे असते.
आपला निवडक अथवा पाचक कार्ये सुख करतात. पाचक
द्र्व्यानॅ अघिदाव्य पदार्थास द्र्वता येऊन तो पदार्थ द्र्व‘
स्थितीत वनस्पति-॰रारीरति पेंशोपातून पेंशॉत पसरत जातो.
हन्ग्रुलिन नांवाचा तेद्विय पदार्थ ड[ळिया वनस्पतीच्या मुळयांत
काही पदार्थांचा तात्काळ उपयोग होतो व काहो पदार्थ
अडचणीसाठो अथवा पुढील उपयोगासाठी झाडांच्या काहीं
पुष्कळ आढळतो.
अलफौहृल
भागांत तांठावेळे जातात. त्या तेद्रि'य पदार्थात प्रधान घटक
ह्यामध्ये ठेंविल्या तर त्या इन्युग्’तेन पदार्थाच्या स्फटिकाक्रुति
काबेन पदार्थ हा असतो. हा पदार्थ हर्वेतून शोषिला जाऊन
बनतात.
ह्यांचीं फलरळाकँरा तयार करणारे
द्रव्य
प्रकाशसपी सक्तळोपुळें शरीरात सस्थापित होतो. ह्या फार्योत
इत्युळेज
होय.
द्रव्यानै
प्रकाशांतील शक्ति त्या पदार्थात गुप्त रीतळोनॅ सांठा’त्रेलों जाते
व तीन शक्ति श्वळासळोच्छूवास कार्योत मोकळी केळी जाऊन ती
सर्वे जीवनकार्यास उपयोगी पडते.
हक्षु-राकॅरेवे
त्या मुळ्या ळिस्पा‘रेत्: अथवा
इनूव्हरटॅज
लैब्ह्युळोज,
नांवाच्या
पाचक
पाचक
डेवसट्रॉजसाररेव पदार्थ तयार
होतात. ऊस, वुक'द्र ( चीड ), वगैरेमघ्ये असलो ड्क्षु॰-र।ध्हैरा
पुष्कळ असते. वनस्पति-॰रारज्रात तेलादिं समेंद् (मेंवयुक्त )
पदार्थ कते उत्पन्न होतात?, ज्या पेंशोत कबँसस्थापन
होते त्या पेंशींत कैव्हांळिह तेलादिं समेंद् पदार्थ सहसा
नसतात. पर’तु पुष्कळ वळोबांत तेलाप्’दे पदार्थ सठिविलैले
असतात. हे पदार्थ कर्वे पदाथळीपातून तयार होतात
त्यांत ससय
वाहो.
कारण
पानांतील हरितब्द्र्व्यांकढून
श्वा सळो च्छ् वा स.…सयेतन शरीराच्या अवश्य ज्ञीवन॰
कायोंयेकळो श्वासाच्छुवास हो एक फार महत्वाची क्रिया आहे.
शरीर सयेतन
आहे
तोंपावेर्तो हो किंवा अव्याहृतफ्व्ग्
चाकू राहते. ह्या क्रियेत कांहीं प्रभाणांत बाह्य हवेंतून शरीरात अस्थिसजन-वाग्रूचें शोषण होऊन उलट शरीरातून
कबाँम्ल वायु व किंचित पाण्याचा अंश वाद्देर येतोम् वात्ग
शोषिल्या जाणाऱ्या कबोंम्ल वायूपाडून ते कर्वे तयार
हर्वेतून शोधून
होतात त्यांवर काहीं विशिष्ट रासायनिक काये घडून काहीं
ठिकाणी त्यांचे पयेवसान हे तेलादि-॰पदार्थ उत्पन्न करण्यात
होते. असले तेलादि समेद् पदार्थ जेंव्हा वळोबांत अथवा
वउकद्र्व्यावर रासायनिक
कबाँम्ल वायु व पाणी हो
वाह्यांगॉ उच्छूवास होतो.
अस्थिर असतात. त्यांमध्ये
बौबासारख्या दुसऱ्य'प् भागांत साव्तेले असतात तेव्हां त्यांस
‘ लायपेंज ’ यांवाच्या पाचक द्र्व्याते‘ द्रवरूप येते. त्या
पाचक द्र्व्यार्ते त्यापासून मेदाम्ल व क्लिसरीन बनून ती
दोन्एळो पाण्यांत विंरवळतात
पण पुढें त्या मेदाम्लापखून
साच्या द्रवरूप काबैन पदार्थात स्वपांतर होऊन त्याचें पचन
होते.
’ तेलाद्दि समॅद् पदार्थीप्रमप्णेंच नप्यट्रॉजनयुक्त प्रतीद् पदार्थाइवाद्दे ट्रिपसळीन नांवाच्या पाचक रसनि पवन होऊन जौवरसाशो
त्यांर्वे सात्मळोकरण होते.यात्र्माकरण झाल्यावर ममिअमिडों"
घेतलेल्या अगकेसजन वाग्रूमुळें तीवरसाच्या
कार्ये घडून तेवटों त्यापाबूळान
उत्पन्न होतात. व ह्या दोहाँच्या
जळीवरसावो घटक-द्रव्ये नेहमी
एकसारखो वडामोड होत असते.
शोपिरै’ऽल्या आक्सिजन वायूचा जबिरसाच्या वटक-द्र्व्याशो
सयोग होऊन पूर्वीपेक्षां त्यामध्ये अधिकच अस्र्थये उत्पन्न
होते. त्यायोगें जीवरसाच्या घटक-ट्राव्यांत निवटीकरण सुरू
होऊन त्यापासून सार्थ व सकर्णि सैयुक्त पदार्थ उत्पन्न
होऊ' लागतात. त्यांयेफाँ काहो संयुक्त पदार्थ पुन्हां जीवरतांत सात्म’प्भृत होतात. ह्या रोतीर्ने तयार होणाऱ्या साच्या
पदार्मीत कबाँम्ल वायु व पाणी ह्यांचा उत्पा’त्ते होते. जळीव’
रसास आधिन्सजन वायु मिळाला न।ह”। तर त्याची
जळोवन-
आलेंड नांवाचळो द्र्व्र्ये शिल्लक राहतात. एर'डळोसारख्या वळीबांत
प्रतीद्-पदाथॉस विशिष्ट स्फटिकाक्रुति येते. इतर ठिकाण?
फार्येवद् होतात. जळोवरसाचँ चैतन्य कायम राखण्यास प्राण"
त्यास अमुक एक आकार
आल्यावर जोवनकाय करण्यास त्यास उत्तेजनात्मक शक्ति
मिळते. शरीरात साठावेठेल्या तेरँद्र्य पदाथ’चिं विवटीकरण
येतो असें नाही, श्रमण-शरीरात
प्रतीद् पदार्थाचे पचन होण्यास अशाच
ट्रिपतीन-द्रव्याची
जरूरी असते. वास्तविक वनस्पतीच्या व प्राण्यांच्या अन्नरॅत
वाग्रूचळो आवश्यकतराअसते. प्राणवात्रूचा जळोवरसाशो सब॰य॰
कलन त्यांत उत्पन्न होणाऱ्या
सलांते जीवनकायाँस
चालत<noinclude></noinclude>
03rrwl8duz7fpe0j3v3shilrpd85fgj
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१११
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मइल्लाट्रोयज्ञानकौश.(ज)२८४ जळोवनकप्यर्थविंचार देव्ग् हेंच श्चासौत्त्छवासफियेचँ मुख्य कामे असते. ह्या क्रियेत एका व[ग्रूर्वे अंतऱ्शोपण होऊन अ'ळावून दुसऱ्या प्रकारचा वायु बा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मइल्लाट्रोयज्ञानकौश.(ज)२८४
जळोवनकप्यर्थविंचार
देव्ग् हेंच श्चासौत्त्छवासफियेचँ मुख्य कामे असते. ह्या क्रियेत
एका व[ग्रूर्वे अंतऱ्शोपण
होऊन अ'ळावून
दुसऱ्या प्रकारचा
वायु बाहेर पडतो म्हणुन ह्यास ‘ श्चातोच्न्छूवास’ क्रिया म्हण०
तात. हो किया स'ट्टेतनत्वाची खूण समजली जाते. दिवसां,
रात्री, मुसावत्र्धेत किंवा जागृतावत्थेंत हो किया शरळोर मृत
होहैंपर्थेत चालू असते. हो किया थांवणें म्हणजे मृत्यु येणें होय.
श्वातोच्छवास आणि कबै‘तेत्थापन-तुलनप्-कवैसत्थापन-क्रिमॅत तयार होणाऱ्या तेद्दिय फ्दाथीत प्रकाशाची
किरणसपळो शा’के
गुप्त रँग्तळोर्ने एकवठलौ
जात असते.
तों
शक्ति श्वातौप्‘छुवास-ट्ट’क्रॅमॅत मोकळी केली जाऊन जौननकायें
आंयाहतरळातोर्ने
चाछू राहतात. प्रकाशाच्या श’कळोवै रुपांतर
तेद्रि’य पदाथीत कबँ-सत्थापन-क्रिग्रॅत होते. पण हो शक्ति
पुन: मोकळी होऊन जळीवनकळायोस उपयोग? पडते. कबै॰
संस्थापन व श्चातौच्दृटॅवास ह्या दोन कार्योचा अति निकट
सबंध आहे. एक कार्य नेहमी व[ळूहुं असते
पण
दुसरे कार्थ
कांहो विशिष्ट परिंस्थितोंतच चालूं शकते; एकास
प्रकाशाची
अत्यंत नसते तर दुसऱ्यास प्रकाश
असो वा नतो
तरळी ते
कार्य चालू राहते. एफोते कचीवै नवीन नवव्न सयुक्त पदार्थ
बनविले जातात अर्थात त्यायोगे शरीराचे वनना‘हें पूर्वीपेक्षां
जीवनकर्म्यविचार
रंप्रांढून बाह्य हवा आंत शिरल्यावर ती व[तत्थानांत
जमते. व[तत्थाते शरव्रांत चीहोकडे अड्रुन त्यांचा परत्प॰
राशी सबंध जुडठेला असतो. त्यामुळे च्वगु… र'घ्रांतून
शिरणारळो हवा व[तत्थान'प्नून चोहोकडे पसरत जाते व
तनूद्वारा अतऱ्त्थ व खोल भागॉ
असणाऱ्या सचेतन
पैशॉस खुली हवा मिळण्याची सत्य होते. हो व[तस्थाते
उत्पन्न करण्याची व्यवत्या नैसर्गिक असते. ह्यावातत्यानां-
तुन बाह्य हवा व शर्रारात उत्पन्न होणारे कवळीम्लान्दि वायू
ह्यांचा परस्पर सबंध येऊन ते आंत व[ट्टेर रेवळ्ते राहतात.
ह्या वातत्थानांतोल रेवळतो हवा व बाह्य हवा अगदी
एकच प्रकारची असते अते न[ह’व्. भिन्न अवयबांत ततेच
भिन्न परिंस्थितव्त वातत्यानांर्तांल खेळल्या हवेत बदल
होत जाये साहजिक आहे. कर्थतेत्थापतेस उपयोगी पड॰
ण[र[ कयाँम्लवायु अथवा श्वातोच्छूवासन्तियेसाठो शोक्सि[
जाणारा प्राणवायु किंवा ह्यांत उलट उत्पन्न होणारा कबाँ'
म्लवायू वगैरे
वायू त्वगू-रंप्रांतून
व व[तरथानांतूनच
रेवळते राहतात, पाण्यांत उगवणाऱ्या वनस्पतींमध्ये त्वम्रर्दुग्’ असत न[होत. अशा ठिकाणी बाह्य ह्या शर्रारात
शिरण्यास अडचण पडते. म्हृणुन अशा वनत्पतोवर नेहमी
अधिक होते पण दुसऱ्या क्रियेने त्या बनविलेल्या पदार्थात
येणारे ‘त्वक्कवव’ येत न[हो व पेशिभित्तिर्केतून पाण्यांत विर-
विघर्टाकरण सुरु. होऊन कर्यांम्लवायु व पाणी हो द्र्॰ये
व्
उत्पन्न केली जातात. एकामें नव्या पदार्थांची पट्रना होतेत, व
ललळी हवा आंत शिरते.
फांहो ठिकाणी अडचण पडू
नये म्हणून प्रसगाकरितां
दुसऱ्याकडून त्यांची विघात होतो. असल्या विंघातक क्रिग्रॅते
व[तत्थाते योठळो होऊन तों हृवेर्ते पूण्ळी भरून जातात. ह्य
जरी जोवरस कमी
हवेचा उपयोग त्यांनां वाटेल तेव्हां करितां येतो, कमळ,
फांदें वगैरेंमच्ये पानांच्या देंठांत हवा भरलेली असते.
कमी होत जातो, तथापि ह्या
बिंयातक
कियेंत बाहेर मोकळ्या होणाऱ्या ठ्ळाकळोते' नवव्न सघठ्यात्मक
कायोस चालत मिळून अधिकाधिक र्बावरस उत्पन्न होत
जातो. सत्रे सचेंतन पेर्शीत अशा प्रकारची घङप्मोंद्र चालू
असते. सर्वे सचेंतन पेंशा'त श्चासद्वैच्छूवास-क्रिया चालू असते.
पण कबँ-सेत्थापन-क्रिया याच पेंशॉत चालते अहे न[हो. ह्यास
वगळी’य वनत्पत‘प्सव्र्ये श्वास्रोच्छूक्प्सास मोकळ्या
विशिष्ट जागा व विशिष्ठ परिस्थित्ति ह्यांची आवश्यकता असते.
ज्ञसरळी नसते.
ज्ञीवरसाकहून सत्थापित शक्तीचा विकास करणें हैंच श्वासळो-
तोंवै पोषण चालते, त्यातूनच त्यानां श्वातोच्छूवासासाठीं
प्राणवाचूक्रू मिळवितठें येतो. उसाची रस उघडा असला म्हणजे
च्च्छू’गसावें खरे स्वसप आहे.
श्चातौच्छवासात
शोघिल्या
जाणाऱ्या प्राणवाग्रूवा प्रत्यक्ष परिणाम जॉनरसाच्या घटक
पदार्यांवर होतो, व त्यामुळे मोकळ्या होणान्या सक्तळीतेच
इतर सर्वे जीवनकव्यै चालतात.
यावरून श्वातोच्छूवाताकैंर्मंर्वे महत्व कळून येणार आहे.
काहो वेळ इतर र्नावनक्रिया बंद राहिल्या तरळो चालण्या’
सारखें असते पण हो क्रिया वाळू असव्ळा अवश्य असते, कारण
ह्या किग्रॅवर इतर सत्रे क्रियांचा आधार असतळो.
श्चासळोच्छुवासास मोकळी हवा पुरळीवण्याचीं सोया…शरीराच्या सवै सवेतन पेंश’प्‘तून श्वास्रोच्छूवासाची क्रिया
चालू असते पण त्यांतोल कित्येक पेशी अ'तत्य असतात.
अशा पेंर्शीनघे आँविंसज्ञनवायु मिळण्याची सळोय कशी
होतेटुं खुली
अशी
हवा
सर्वे करारात खळतो
शरारातव्र्थवस्था होत
असते.
मोकळ्या
हवेशिवाय,
च्छूवास
हतेर्शिवाय श्वातोन्छुवास चालण, मोकळ्या
निदान उच्ववर्ग'र्हेय अशा वनत्पवॉत श्रातो`
व[लणें
तो एक दोन
शक्य
नसते. काहीं
क्षुद्र् आळिलवप्रष्णवायूची
ज्या र्तेक्तद्र्य पदार्थावर त्या आळिलच’वनत्प'
दिवसानी
फसफतून
आंबट होऊ
लागतो.
ह्माचें खरे कारण, म्हणते त्या रसरंत उत्पन्न होणाऱ्या
विशिष्ट क्रिण्व वनस्पतींची श्वऱ्सोंच्छुवास-क्रिया होय. रसास
ज्ञकँरा हो खाद्य वस्तु असते. ह्यांखाद्य वल्नूवर हवेतील
किण्वाळिद् वनस्पतींच्या सक्ष्म
नननपेंशो अथवा
उगवून त्याची तेथें श्वासरैच्छूवासत्रं क्रिया
बांअकल्पें
सुरू होते. अशा
वेळा त्याच्यापुप्कळशा पशा त्या रमांव्श्‘ पुणे वुडालेल्या
असतात. त्यांना द्दववून अण्वसनन
जसरळो भासत
न[हो.
व[यु शापून घेण्याचा
अप्प्बेन्सज्ञवासाठीं रसांतील
तेद्दिय…
पदार्थाचे ळिवघथ्ळोकरण त्या सुरू करितात. विंघर्टाकरण व[लूं
झाल्यावर त्या सक’प्ण्’ग् पदार्थांर्ताल अगकेसज्ञनाचा उपयोग
राहण्यास योग्य श्चासळोच्छुवास- कार्यऱ्स होतानिराळां मोकळा अप्प्फ्सजनवायु
पांनप्ताळ
व्नैगू-॰
] हूंवेंतन न शाषंण करितां व्या सेफांणे पदायार्तांलच
ता वायु ह्य!’<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११२
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दाराट्रॅप्य सानकळोश’ ( ज ) २८५ जळीचनक [येंविचा'र जैप्घनफाथैश्विच्प् [र कार्यास उपयोगी पडतो. विघटोकरणांत कचीम्ल, अलकरेइलादिं पदार्थ उत्पन्न होतातया रोतोनॅ श्वासळिच्छूवास कर..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दाराट्रॅप्य सानकळोश’ ( ज ) २८५
जळीचनक [येंविचा'र
जैप्घनफाथैश्विच्प् [र
कार्यास उपयोगी पडतो. विघटोकरणांत कचीम्ल, अलकरेइलादिं पदार्थ उत्पन्न होतातया रोतोनॅ श्वासळिच्छूवास करता
घडामोडी तेहमाँ व[छू राहर्णे अवश्य आहे. नुसती विघातक
येण्याच्या शक्तीमुळे त्यांचा उपयोग
न राळिहलळो तर मात्र त्यायोगे नुकसान झार्के असते. केवळ
पिण्याची
क्रिया चाळून नवान तेद्वियपदार्योत्पादनाचीं परंपरा
दास तयार
कायम
करण्याकडे होतो. किण्व वनस्पतोसारख्या अशा ट्टसऱ्या
पुष्कळ आळिववगॉय वनस्पती आहेत की ज्यांनां मोकळ्या
घटनात्मक कार्ये चालून अधिक तेदिय पदार्थ उत्पन्न आहे
अव्यिसजनची जखरो नसून च्या स्वतेन्नप'ट्रे'.‘ तेद्रिय पदार्थात
पाळिहतेत.
विघटींकरण सुरू कङन आपळी श्चासऱछूवासा’कया चालवू
शकतात. वस्तु सहूं लागली असतां याच प्रकारे खूक्ष्मनंतूंची
श्चासव्हिवासाफेया चालू असतेतेद्रि'य वस्तु सडूंळागलळो म्हणजे
तिच्यावर पोसल्या न[णाऱ्या वूक्ष्मबंतुंच्या [’वघटळीकरणशकांते
वेगवेगळ्या रासायनिक क्रिया सुरू होऊन गैवटंळो कवळीम्ल्ऽ,
होय.
पाणी
किंवा न[यट्रीजनासारस्वळो
विंवातक [कैया चाळून
काहीं फायदा न[हो.
ह्या सवनिं अलिप्त ध्येय म्हणजे जीवरसळात्पाद्न
जोवरस शर^[र॰[त्[ अधिक उत्पन्न होत
खरळो शरीर-॰ट्टाद्वै झाली.
गेला म्हणजे
जळीवरस अधिक उत्पन्न झाल्यावर
नवान वाढ हो'ऊ लागते. शरीर-घटक याग उत्पन्न कर॰
ण्यांत नीवरस खाँचेळा जातो पण तो नळीवरस घटनात्मक
झियानौ पुन्हां नवफैन बनतो. वनत्पतोचे-मुळ्या, खोड, पाते,
कुठें, फळे वगैरे सर्व अवयव जीवरसाकडूनच उत्पन्न होतात.
सान्न‘व् द्र्व्ये उत्पन्न होतात.
[बेवटळाकरर्णात त्यास मिळणाऱ्या ऑविसज्ञन व[यूनैर ह्यांची
हें अवयव तयार होताना
जीवरसाऱ्’ळो
रूपांतरे
श्चासच्छ्वासकिया चालते.
शेवटी त्यास विशिष्ट प्रकारचा कायम
आकार
म्इपूळान फसफसणें,
त्यावरळोघरच
आवणें किंवा
सङर्णे या सर्वीस मुलसुत कारण म्हणजे ‘ श्वासक्रुछूवास ’किया
होत
होत
येतो. त्या
रदेंर्तांते जळोवरस खाँवैला ज[व्ळा हें जळोवन-दृष्टया कायदेशीर
होते. कारण त्यायोगॅ शरीर-घटक भाग निरनिराळे बांथिते
ज[ऊन शरळोर नृद्धिगत होते. एका पेंशव्पालून दृसरा पेशी
होय. या सर्व किय'प्त अंतिम उत्पन्न होणारे पदार्थ एकच
प्रकारचे असतातसाव्या श्वासव्छ्वासफियेंस मोकळ्या ऑफिस-
उत्पन्न होणे किंवा पुष्कळ पेश’व्चा सघ एकत्र होऊन
जनची अवश्यकता असते पण तेव्हां तो प्रत्यक्ष त्या स्थितव्त
पाते
मिळत नाही तेव्हां तेद्रिय पदार्थात विघट’प्करण सुरू करून
जाते व अवयव तयार होणें, ह्या सर्व गोष्टी शरळीर-बुद्धी'सवेघळो
त्यांतील अव्क्सिजनचा उपयोग श्चासवूदृद्रुवासफियेकर्डे करतात.
उच्च वर्गांत मुद्वघे कित्येक वेळा वॉते उगवतोना अशा
असून शरीरात चालणाऱ्या घडामोडॉची द्योतक न्विन्र्हे होत.
अशी
नाही.
प्रकारे श्वासान्ड्वासकिया मुख होते. पावटयासारस्वळो बीजे उग॰
वतोना अलकरेहलादिं पदार्थ उत्पन्न होतात.
मोकळा वायु त्या स्थितीत
मात्र त्यानां
स्थितोंत
शरळोर’वुद्धि होणें शक्य
सा
जळोवरस
चाकून अधिक जीवरस
स्थिर रहणि
शक्य
त्याचे विघटळोकरण होऊन त्यास स्थिर आकार
नाही.
येत जातो
व ह्या स्थिर आकारासच आपण ‘ वाढ ’ म्हणतो.
विवक्षित येळेपलळीक’डें त्यांनां मोकळा वायु मिळालाच पाहिजे
अशा
झाल्यारेवरळीज
अधिक घटनात्मक [‘कया
उत्पन्न होइल.
मिळु देतो उपयोगी न[ह“[.क[हो
न[हग्तर वव्र्जे मरऱ्ढन जातात.
घडामोड
नाव:-॰बाँ उडून रापा तयार झाला व त्यावर खोड,
याल्ऱ्णान्या
”[[मोछूवर्क्सकग्रेस ‘ अतऱ्श्चासळाच्छूवास ’ असें म्हणतातरवरळो‘
फांद्या, पाते वगैरे भाग
दिमुं लागले म्हणते त्या स्थिर्तास
स्वर द्ड्रेन्हळी श्चासव्च्छूवासकार्योत तत्त्वतऱ्फरक नसुन ते कवळ
आपण त्या मोजावी व[ढ झखी
ऑफिसजनवायु मिंळावॅण्याचें दोन मागे आहेत.
श ९? रा च्या घ वा गो डॉ.…श्वातोच्छवासकियेते शरळीरांतळोल तेट्रिय पदार्थ मोर्डिल जातात. म्हणते श्वातोच्छूवास्रा
[कैया बिंवातक आहे, पण त्यावरळोवर देहि सुचवि'णे
पालून पेंशळी उत्पन्न होऊन त्या सर्वे पेशींचा तेघ एकत्र
राहून मुख्य शरीराचा भाग मोठा होऊ लागला म्हणजे
अवश्य
आहे
कदूं त्यामुळे मोकळ्या
होणाऱ्या
शसभ्गेंते
जळोवनकाये व्यवस्थित चालून शरोरावयव घटनात्मक कार्यास
उत्तेजन मिळते. असल्या विंघातक पर'तु उत्तेजक [”कयेर्ने
जावरसाच्या घटक द्व्यांर्वे विघटोंकरण होऊन तो कमी होत
जातात पण त्याबरोबर द्रुसरळीक’डूंन नवीन नीवरस तयार
होण्याची तजचीज होत असते.
व त्यापासून सपांतर होत ज[ऊस
नवीन तेद्दिय पदार्थ वनणें
गेवटों त्याचें चीवरसळो~
त्प[द्न॰[त पर्थवसान होणें हो सर्व कार्ये घटनात्मक आहेत व
त्यांस श्चातोब्दांवासाकियेकडून उत्पन्न होणाऱ्या
शक्तींमुळें
।
त्याची वाढ झाली अथवा वनस्पति एक पेळिशमय असली
पण तिचा पूर्वीचा सूक्ष्म आकार न[होता होऊन तिला मोठप्
आकार अ[ल[,तरळो मुद्दे त्या पेशळोची वाढ झाली असे
समजतात. आतां ह्या सर्वे स्थितळीत अते अप्ढळेंल की अन्न
द्र्व्र्ये शळोपित्’यावर त्यास तेद्वियत्व येऊन त्यांचे जीवरसाशळो
सात्मळीकरण होते व त्यामुळे अधिक जावरस उत्पन्न होतो
व जळीवनळिपउ'प्ची सख्याळिह अधिक होते. म्हणते निरनिराळ्या पेशींची वाढ अथवा एखाद्या मोव्याशरळीराची
वाढ ह"[ केवळ त्यांतील जळोवरसा'च्या व ज[वनपिडा‘च्या
वाउळीवर अवलवून असते. नाव म्हणजे केवळ मोठा आकार
असें म्हणतो येणार न[हो. पेश’व्त पाणीशोषिबें जाऊन
व[लन मिळते. जोवरस तयार झाल्यावर त्यापैकळी कांहळो
श्चातोच्छूवासाच्या विंघर्टाकरर्णात न[होसा होतो. परंतु
त्यांस मोठा आकार
नवळोन जोवरसाद्दे त्याबरोबरच उत्पन्न होत असतो.
म्हणून नुसता आकार
व[ढ’प्चें चिन्ह नव्हे.
घवामोर्डाते नुकसान होत नाही.
असल्या
शरळीरस्वास्प्यास असल्या
अते समजतो. ततेच पेशी-
येतो व
त्या
पाण्याचा
उपसा
ट्टसऱ्या पेंश'व्त आल्यावर पुन्हां तो आकार संकुचित होतो.
मोठा होव्ग् हेच केवळ खऱ्या
रसाळ्याच्या किंवा वट[टय[च्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११३
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मद्दर्क्सयष्ठानकळोश. [’ज`/२८६ जीवनकार्थवित्रार गांठ’प्‘त तेद्वियर्जि नसून व त्याते वजनहिं अधिक नवळीन जीवरसाची अगर नाही त्यांस मोठा आकार येतो होते; पण तोपयेत त्यात (वरळी वा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मद्दर्क्सयष्ठानकळोश. [’ज`/२८६
जीवनकार्थवित्रार
गांठ’प्‘त
तेद्वियर्जि
नसून
व त्याते वजनहिं
अधिक
नवळीन जीवरसाची
अगर
नाही
त्यांस
मोठा
आकार येतो
होते; पण
तोपयेत त्यात (वरळी वाढ
झाली
काढण्याचा समय असतो.
परंतु हो स्थिति येऊ' न देण्या-
उत्पत्ति होत
करता पेंशळोतोल जीवनपिंडाकडून तेल्युतोज्ञ द्र्व्याचा थर
भित्तिकेच्या आंतोल अयास जमनिळा जातो व त्यामुळे पेंशि॰
अर्ते य्इणर्तां
मित्तिका अधिक लाल व टणक होते.
बौपर्थत
जळोवन-पिंझंची
जविनफांयीवैचांग्.
त्यांत
अर्थातू अधिक पाणी
येणार नाही. कारण केवळ तेद्रियाते एकेजागं'प् असणें
तोषिर्ले जाऊन अधिक तणाव सहन करण्यासारखी ताकद
म्हणजे जीवरस नव्हे. त्या तेद्रिस अश्नांत जळोवरसाची स्थिति द्े त्यात उत्पन्न होते. म्हणजे तणावामुळें पेशिभित्तिकेच्या
येण्यास किती तरी जीवनात्मक रासायनिक किया झाल्या
पाहिजेत. बांजामघ्यै ठुद्धां तेदिय अन्नाचा साठा असून तो
वाढीस सुरवात होते व तीस वेगवेगळा आकार येत ज[तो.
पाण्याने जळो स्थिति एका सवेतन पेशीत उत्पन्न होते तोच
स्थिति हळुहळु इतर पेशळीत उत्पन्न होऊन त्यांचीद्दि वाढ
फुगलैलळी असतात.
पण जेव्हो तो बाँबे अथवा वर सामि’
ततेल्या वट[टयांच्य[ गांठो उगर्जू लागतात त्यावॅळळो त्यांर्वे ` होत जाते. वाढत्या कॉँबांत अन्न पाण्यातून येते. तेद्रिय
वजन जरळो कमी आते तथापि त्यांताल जळोवरस अधिक होऊं
लागतो. तेव्हो त्यांची खरळो वाढ बुक होते. त्या तेद्रिय
अन्नप्चें पचन जोवरसाकडून होड्या अधिक जळीवरतोत्पाद्न
होते व पुढें त्या जौवरसाचा सर्व नवीन पेशी किंवा पेशिजाते उत्पन्न करण्यात होतो व हळू हळू पूवे शर’ळार वाढत
जाते. बाँवरसाची उत्पा’त्ते होईंपावेतो त्यामध्ये घटनात्मक
कार्ये चालतात व पुढे जोपरसाचा रवये होऊ लागून नवळीन
पेशी किंवा पेंशिजाळें तयार होऊ लागतात, त्याबेंळीं निघ-
टना बुक होते. वाढीस घटनात्मक व विघटनात्मक कार्योचा
अतमोंव होतो. त्या दोन्हळो कार्योवै मुते स्वरुप म्हणजे
शरीर-बुद्धि होय. म्हणून नाव हो साधी एकच किया
नसून तो दुसऱ्या अनेक ["कयाची द्योतक आहे. घटना अगर
विघटना होण्यास एकसारखे चालन मिळात्ऱ्ऽ प[[^ह`न.हैं चालत
अन्न तयार झाल्यावर त वाढत्या कानात पेशव्सून पसरणें
किंवा त्याची पुढील जळीवरसगेंत विल्हेवाट होणें ह्या सर्वे
वाढीच्या ग`स् ,^[ पाण्यावर अवलबुन असतात.
उष्णता: …जौवरसाच्या व जॉवर्मापडाच्या घटनात्मक
कायोस कांह‘व् विशिष्ट उष्णतेची जरूरी असते. मात्र मिन्न
वनस्पतींमध्ये वाङळोसच'थळो उष्णतेऱ्’र्मं प्रयाण भिन्न असते.
अति कडक उष्णतेच्या अगर थडीच्या स्थितोत वाढ अजा’
वात थांबते. आर्टिक महोसागरांतोल उष्णतेच्या अशार्वे
प्रयाण काहो जागी जवळ जवळ शल्य असते. तथापि त्या
ठिकाणी काही पाणकेशाच्या जातो वाडूं शकतात. बँक्टिरियासारख्या सूक्ष्म वनरपतळी उकळणाऱ्या पाण्यात तुवां दम
घरून व[हूं शकतात. त्या विशिष्ट पाणहेंकशांची थेंङळो अथवा
निरनिराळ्या उतेजनांच्या समुच्चयास असो. घटना व [’वघ-
बँक्टिरिंयांची उष्णता त्या दोन्ही स्थिती साध्या वनस्पतींना
कैव्होद्दि मळाववणार न[होत. उष्णतेमुळे जौवनर्पिडांत क्भी
अधिक बोरार्वे उत्तेजन मिळून त्यांच्या घटनात्मक कार्यांत
फरक होत जातो.
मोकळी हृवा:-॰॰व[डॉस आकिंजन वायु अवश्य लागतो
टना हो दोन्ही उत्तेजनप्रत्युत्तरस्ऱ्पाँच कार्ये होत व व[ड-
हें निराळे सांगण्याची
हुद्दे त्यावरच अवलत्रून असते.
वाढें[स लागणाऱ्या आवश्यक
श्चातौच्छूवासाफिया न[लव्ळा शपथ न[हळो. व श्वप्तौच्छूवप्स
फियेर्तेच सर्वे घटनात्मक कार्यास शक्ति पुरनिलळी जाते.
अग्निसजन वायु ह[ वनस्पतींना प्रत्यक्ष खाद्य पदार्थ म्हणून '
उपयोगी पडतो अते न[हळो तर त्यायोगांनें पूर्वी सठेंठनिलेल्या
अगर उत्तेजन व[ह्यपयिह्थतळोते जीवरसावर व जळीवना‘पेंडावर
होऊन त्य'प्च्याकडून प्रत्युतरसपळो वाढीवै काये होते.
मात्र ते प्रत्युत्तर तात्काळ उतेननास अतो अथवा पूर्वीच्या
पदार्थात अन्नास पहिला सान असतो.
गोष्टी, अन्नऱ्ळंअवश्य
अन्न[’[`शवाय जींव‘
रस व जीवनपिंउ व[ढव्ग् अथवा पुष्ट होये शक्य नाही. मरपूर अन्न मिळाल्यावर त्याचे पुणे पवन अथवा सात्मोकरण
होऊन जळीवरसाची परंपरा कायम राहते व त्यामुळे नवीन
जसरळी
न[हो.
कारण
त्याशिवाय
तेद्रिय पदार्थाये निघटीकरण ठुस्व होऊन घटनात्मक कार्योस
शा’क्त पुरनिलळो जाते.
घटनात्मक कायोस जोर मिळतो. अन्नाच्या अभाव'व् जळोवन-
सवै आवश्यक गोष्टींची पूर्तता असूनळिह सचेतन पेशींची
कार्ये शिथिल होतात. म्हपूळान ज्या ठिकाणी नचीन वाढ
होत असते त्या जागी अन्नरस-प्रवाह सारखा येत रहोगै
अवश्य असते.
प[णी:…अन्न[इतकाव वाढीस पाण्याची अवश्यकता
वात सर्वकाळ”! सारखी होईल असें न[हळो. वाढीचा प्रारंभ
सूक्ष्म प्रमाणात होऊन तो पूर्णांवस्येस पोहोचते व पुन्हां कमी
असते. कारण पाण्याविंना शोपणादि जोवनकार्ये चाबूऽ शकणार न[हळोत. पेशीत पाणी झाल्याशिवाय पेंळिशमित्तिकैवर
तणाव उत्पन्न होणार न[हो व तणावाशिवाय पेशींच्या वाढीस
उत्तेजन मिळणार न[हो'. म्हणते प्रत्येक सचेंतन पेशींच्या
वाढीस पहिंल उत्तेजन केवळ पाण्याते उत्पन्न होणाऱ्या तणा`
व[मुळें मिळते.
तणावानॅ व[धांगों फुगतेलळो पेळिर्शीमाँत्तका
कमी होत तेवटॉ अगदॉ न[होशी होते. उत्पत्ति, परिंणनि
व लय ह्या तळीन्हळो स्थिती प्रत्येक ठिकाणी सारख्याच आढळतात. वाढत्या मागांतोल पेशीत जीवरस व जोवनपिंड
अधिक अस्थिर असतात. त्यामुळे तेथें पेशिळंविभाग एक,
सारखा होत जाऊन पुष्कळ नवीन पेशींची उत्पत्ति होते. पण
हो पेंशि’ विभाग-शक्ति एकाच ठिकाणी फार वेळ टिकर्णे
शक्य नसते. जुन्या पेंरॅन्खील तळी शक्ति न[हॉशळी होऊन ती
केवळ नवान उत्पन्न होणाऱ्या पेंशव्म'र्थे आढळते व हळुहळु<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११४
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "ज[वनकार्या‘बॅचळार मद्दारांट्रीय ज्ञानकोश, ( ज ) २८७ र्जाबनकप्र्यविआर जुन्या पेर्शीनां कायमचे स्वसप प्राप्त होते. वरचेवर नवान त्याचा अन्य रातोते खात्री पटावणणेंवगैरे कियांमघ..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>ज[वनकार्या‘बॅचळार
मद्दारांट्रीय ज्ञानकोश, ( ज ) २८७
र्जाबनकप्र्यविआर
जुन्या पेर्शीनां कायमचे स्वसप प्राप्त होते. वरचेवर नवान [[ त्याचा अन्य रातोते खात्री पटावणणेंवगैरे कियांमघ्येच जाणीवेचा
पेंशळोची उत्पत्ति होत गेल्याने शरीरट्टद्धि होते व ह्याच रीतन्ते अतमोव होतो. जयानात वळोजेवडा व[कर्डी उगवत असतो
सर्वे अवयवांची वाढ होते.
वरळी नेहमी मुळ्यांचा मोड जमीननात घुसव्ळा व रवळोडट्या
प्रथम पेंशळोची विभाग-शक्ति जळोराची असल्यामुळे शकतो अक्रूर जमळोनीवाहेंर वाडर्णे, ततेच फांद्या लाव अ'द्धृबुड होव्त्,
नवळोन पेशी उत्पन्न होतात.
त्यांतोल
एकसारखे ट्टद्धिगत होत असतात.
ज[वरस व जळोवनपिंउ ऱ्र्किंवापामें
[
एकमेकाखालळी
न
येता तो साधारणपणे प्रक[॰
[
पण काहळो कातार्ने तो ` शाक`ड कलतो राहणे वगैरे चमत्कार उत्तेजन-प्रत्युत्तर
शक्ति फांहळी [र्वोरैळोष्ट पेर्शीतच सका‘तेत होते व पुर्ढे पुढें कार्याची यॉतक सपें आहेत. उत्तेजनप्दि कार्याचा सकळित
तेथून तोद्दि न[होशळो होते. त्या स्थितोत त्या अवयवांस पणे पारॅणाम वनस्पतींच्या वाढीवर होतो. कित्येक वेळा उत्तेजन
व कायम स्वरूप प्नाप्त झालल असते. ततेच अवयवाच्या
मिळण्याचें ठिकाण वेगळे व त्यास प्रत्युत्तर मिळण्याची
प्रत्येक व[चूच्या पेशळोची वाड एकसाररवळो होते असे नाही.
जागा वेगळी अते होते. म्हणजे त्या दोन्हो कार्याची जागा
त्यामुळे व[बुवाचूग्च्या व[टॉत दुहां फरक होतो. हसराजाच्या एकच असते अते न[हो. ह्यांवसन असे म्हणता येट्टेल कॉँ
पानात अयाकडून बुडाकडे एक रवरेपेंवजा पुंडाळी झालेली
असते. ह्मार्वे कारण असे क[ योटाकद्दील
व[नूपॅक्षां
पाठो-
पसिहैथर्तांर्चे’ ज्ञान वनस्पतोस मिळुन त्या ज्ञानाप्रयाणें कमी
अधिक
फरक
त्यांच्या शरीररचतेत होतो.
कडॉल व[त्रूप्च्या पेशा अधिक तणाणल्या जाऊन त्याची त्या
व[त्रूप्ची नाव अधिक होते. ह्यामुळे त्या पानाची अयाकहूंन
शोधार्थ मुळ्या लांबवर पसरत
घुडाकडॅ तुंडप्ळो वनते.
तून मधुर रसत्पर्थ काळा असतो
पुढें मोटग्कडळाल अथवा
वरील
बांबूच्या पेशी अधिक तणापू'पुं लागतात व वाटांवे क्षेत्र बद्लते तेव्हां आपोआप तो गुंडाळी सुटून पान सरळ,
ताट होत जाते. अर्थातुं बाजूच्या वेगवेगळ्या
उर्मे व
व[र्टार्ने असा
फरक होतो.
प्रकाश, जमळोनींतोल क्षार, हवा, गुरुत्वाकर्षण, पाणी
वगैरे निरनिराळ्या गोष्टींची परिणाम अप्रत्यक्ष रीतोनें शरीर-
कलल्या राहणें, कळीटकमक्षक
पाण्याच्या
ज[णें, प्रकाशाकदे फांद्या
ड्रातेरा’ वनस्पतीच्या र्केस'प्-
व[हूं लागणे, लाजाळुचे
लावणे, खूर्थकमळार्वे प्रकाशाप्रमळाणें याना [‘फेरावेर्णे वगैरे
गोष्टी वनस्पतींना ज्ञान प्रहण करण्याची शक्ति असल्या-
बद्ळ-र्वी प्रत्यक्ष उदाहरणे आहेत-
ज्ञऱनत'तूऱ्-विळिशष्ट प्रकारर्चे ज्ञान एकदा झाल्यावर ते
प्रप्प्त
दुसऱ्या जागी ’पाँहोचनिण्याची योजनाद्दि शरीरात असते.
मात्र वनस्पतिशरीरांत प्राणिवमोयेक्षां हो योजना वेगळ्या
होऊन ते वेगवेगळ्या र्दिशेकडे पसरतात. मुळयाची वाढ
जमीनीत होणें किंवा फांद्या वयाने जमौनीवाहेंर हवेत पसरणें
दुसऱ्या जागी पोहोचा’वॅळे जाते त्या ज्ञानतंतुंर्वे जाळे सवे
वुर्दावर होतो व त्यायोर्गे शरीरास वेगवेगळे आकार
वगैरे व[ढीते चत्मकार वरील कारणामुळे घडून येतात.
ते वे व ना अ थ वा जा न.…ववस्पतोच्या
समोवतालची
परिस्थित्ति कैव्हांळिह एकसारखी फारवेळ टिकर्णे शफ्य
न[हो. त्यांत बदल सारखा होत असतो. बद्लाप्रसार्णे वनस्पतोस वेगवेगळे उत्तेजन मिळून पारेंस्थित्ति व त्या वन,
तऱ्हेंची असते. याणिवर्यात ज्या ज्ञानतंतूकडून ज[गने ज्ञान
शरीरांत पसरछेर्के असून ज[गवागी त्यांचे विशिष्ट पुंजके अस…
तात व सर्वांचा सबंघ ड[क्यांत असतो. अशा प्रकारची ज्ञान
व[हण्याची रचना वनस्पति-शरीरात असणें शक्य न[हो; पण
सचेंतन अशा पेशळीचा सवै शरीरात
कारणाने त्यांतोल जीवरसासून अगर
सरंबथ आल्याजीवनापेंडाकड्न
स्पतोवा जळोवनकम ह्यांमब्ये एकवाक्यता उत्पन्न होते. वेगवेगळ्या उत्तेजनाप्रपाणें वनस्पति आपला जीवनक्रम बद्’
एका
ळीत असते. अन्नद्र्व्प'र्पि क[ह”[ वियातक पदार्थ असला
शरॉरातोल सर्वं सवेतन पेंशळोतोल ज[वरसाचा परस्पर स'क्घ
असतो व ह[ सबंध बोपावेतौ कायम असतो, तोपयेत
क”! ताबडतोब त्याचा परिणाम जीवरसावर व जीवना’पॅवावर
त्यांतून ज्ञानवाहनास फार उत्तम सोय असते.
होतो. उपासमार झालो अथवा श्चातोच्छूवास …कार्यात
ओंधिसजन वायूच्या कमतरर्वंमुळे अडचण पडूं लण्ळालळी,
किंवा हवेमघ्ये उष्णतेर्चे प्रमग्ण कमी अधिक व[हूं लागर्ले
तर त्या त्या विशिष्ट गोष्टांप्रवाणें वनस्पतोवर बांगला
[’ठेंकाणर्वे ज्ञान दुसऱ्या जागी
पोहोचविळे
जाते.
जावरसाच्या
घटकपदार्थांत तेकळोच अगर विकास होऊन ततूजन्य फरकार्वे
ज्ञान चौहोकदें परेहोचनिळे जाते. थेर्डामुळे अथ" उष्णतेर्ते
ज्ञान पोहच्चण्यप्च्या गतोत फरक होतो. कार कडक उत्तेजन
मिळाळे असतां त्यापासून
उत्पन्न होणारा
सकोच
अगर
जीवनात्मक काये जीवरसाकडून अथवा जीवनर्पिडाकडून
विकास तितक्याच जळोराचा असतो, थकव्यामुळे ज्ञानशक्तिद्दि
मद्प्वते. जर ज्ञानतंसूर्चे काम केवळ एका जायते उत्तेजन
वेगवेगळ्या परिस्थितोप्रयार्णे बदलतो जातात. त्या बदल…
ण्याचा अर्थ एवढाच घ्यावयाची क॰[ पसिहै‘पतोची जाणीव
शरळोरात डुद्धां झानतेतू असतात.
अथवा वाईट परिणाम
होऊ लागतो.
म्ष्णजे वनस्पतोची
दुसऱ्या जागी पींहोवा'बॅणें एवर्ढेच असेल तर वनस्पा’तेसचेतन पँशळी,
पेशि-॰
जीवरसास अगर जोवनपिंडास होते. बाह्य उत्तेजन स्वळीकासन
त्यास प्रत्युत्तर देव्प् म्हणजे जाणीव असणें होम.उतेजन प्रहण
मालिका अगर पर'परा, काँ ज्यातून प्नहण कैरेग्रॅल उत्तेजन
दुसऱ्या जागी मोहोचविल जाते व उलट त्या उत्तेजनास
करर्णे,त्य[द्रुप्रत्त्युत्त्[र देन्ग अथवा तेउत्तेजन मिळालैं आहे
मिळणार प्रत्युत्तर तशाच म[ग
७
पोहाचते,
त्यातच
त[वतेतु<noinclude></noinclude>
pgku65vamz1ylhdaitipzqqoyvn0766
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११५
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महोराट्रीय णनकरेश (ज्ञ) २८८ जीवनकार्थघिचार जींघनकप्र्थविचार म्हणणें भाग आहे. हो ज्ञानतेतु-रचना तेकोंफै नसून वनस्प- काये होऊं शकणार न[हो. तळोच्या साध्या जावनास या`ऱ्य तशळोच तो अ..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महोराट्रीय णनकरेश (ज्ञ) २८८
जीवनकार्थघिचार
जींघनकप्र्थविचार
म्हणणें भाग आहे. हो ज्ञानतेतु-रचना तेकोंफै नसून वनस्प-
काये होऊं शकणार न[हो.
तळोच्या साध्या जावनास या`ऱ्य तशळोच तो असते,
व पुन: वेशहुळाचीत शरळोरट्टाद्रे होऊं देव्म् अवश्य असते.
व श वृ [द्वै.॰-पेशींच्य[ कमी अधिक व[डळोप्रमाव्ळा वनस्पा‘ते कमी अधिक
प्रम[ण[त मोटळी होते. जापर्थत नवान
वाढणाऱ्या पेशळो एकाच
व्यफाँची
होणाऱ्या
व्यवहार
व्यफाँची
शरीरात राहतात,
तोपयेत
वेशवुर्दावे प्रक[र;॰-…वशवु[द्वै वेगवेगळ्या रीतोते होत
असते. काहो ठिकाणी वनस्पतोच्या मुग्घ कळिका वेशवूद्वीस
उपयोगी पडतात. यांना `ड`[ळे’ असे म्हणतात.
अळु, गुल,“
उत्पन्न
जळोवनपुष्कळ
तेव्हो
छबू, वेळ वगैरेमहँय असल्या ड[ळ्यांकडून वेशविस्तार होतो.
व्यक्तींच्या
जागी त्यापासून मुळ्या फुटतात व अशा मुळ्या फुटलेल्या
र्फाद्यांची स्वतंत्र ररेपटॉ तयार होतात. कलमापासून अगर
वाढ होत असते. परंतु जेव्हो पेळिशविंमागाने
नवीन पेशीं परस्पर वेगळ्या होऊन आपला
स्वतेत्ररीतोते चालवू लागतात, त्यावेळी
वाढ होते. तेव्हां पेशा एकत्र राहतात,
त्यांकडून होणाऱ्या चीवनकार्याचा उद्देश एकाच
एकाच
म्हणून शरीरवुद्धळिन'तर वेशवुद्धि
स्वास्थ्यासबंथॉ असतो. पण वेगळे शरीर उत्पन्न आते कळी
प्रत्येकाचा जीवनक्रम वेगळा होतो. वेगवेगळी स्वतंत्र
जमिनळोवर पसरत
जाणारी गवताची प्रत्येक थांबता
र्फादा
हुद्व'ळा अशाच रीतोर्ने वेशवाटळीस उपयोगी पडते. ज[ईं, जुहैं,
मोगरा वगैरे फुंलझडांच्या फांद्या ऊमिगीवर पस'सन जागफांणांपासून ची व[र्डे तयार होतात त्वार्वे मुख्य कारण म्हणजे
कायेक्षम शरीरे उत्पन्न होणे म्हणजे वशट्टाद्वि होव्ळा होय.
त्यावरील होतेच होत.
जीवनकार्यायेकळो वेशनृप्’द्धे होव्ळा हें एक फार महत्त्वाचें आव,
पिकास नेहमी वंशवुद्वीस ड[ळ्यांचाच उपयोग असतो.
तेव्हां खोडावर अगर फांयावर असल्या कळयांची उत्पत्ति
होऊं लागते त्यावेळी तो उत्पात्ते वेवळ शरीरवुद्वीसाटळोच
श्यक काये आहे, प्रत्येक शरीरास मरण अगर लय ही
स्थिति केव्हो ना केव्हो तरी प्राप्त होते. जर मरण हळी
स्थिति नैसर्गिक आहे तर प्रजोत्पादन अगर पुनस्त्पा’त्ते
करून मरणामुळे होणाऱ्या वशऱ्होसाचें नुकसान
काढणें हो दिथलिं सुद्धां साहजिकच आहे. एकच
अव्याहतफ्व्म् सवेतन राद्दित्ऱ्: तर वेशत्रूतोची जसरी
भरून
शरीर
नाही.
पण तो गोष्ट शक्य नसते. म्हणून शरीर न[होते होण्यापूर्वी
त्यापासून ततुसदृश नव शरीर उत्पन्न होणें अवश्य असते.
कविंतू
प्रसणी
अन्न मिळुन
एखादी
वनस्पाते रळोगरा’हॅत राहून भरपूर
पुष्कळ काळ
व[चु
शकेल.
ह्या स्थितोत
निला वशवुद्धि करण्याची आवश्यकतग‘हे वाटणार नाही.
परंतु कारणपरत्र्वे अन्नप्रहणाळिद् व्यवहारात फरक
शरीर-॰ट्टद्धि थांवेल व हो स्थिति पुढें राहिली तर
पडून
ते पूवे
शरीर ड[सळून समूळ नष्ट होण्याची भ्गींते असते. अर्थात
हो प्रतिकूल स्थिति प्राप्त होण्यापूर्वी अथवा त्या स्थितीचा
प्र[र॰म
असते.
शरीर
अवश्य
होताच ताबडतोब वेशवुडव्ची तजवच्ज करणें अवश्य
ईंप्तजवळीज करीत असतांना केवळ एकच नचीन
उत्पन्न न करतो तेकडॉ नवळोन शरीरॅ उत्पन्न करणें
असते. कारण ह्या उत्पन्न केल्या जाणाऱ्या शरीरा-
रताळी, गळोराडू', बटाटे, ऊंस वगैरे
असते. कळवा वाइन त्यांच्या फांद्या होर्णेहे लक्षण केवळ
शरीरनृद्वीद्देच आहे, पण कग्रणपरत्वे शरीरट्टा’द्धे करणाऱ्या
कळ्यापासून वेशड्रुद्धि साघतेअशा ठिकाणी शरीरट्टा‘द्वे व वेशड्रुद्धि या दळोहोत फरक नसतो.य[र्वे कारण म्हणजे वनस्पतांवे
शरीर हे एकत्र राहणाऱ्या पुष्कळ पेशींचा सघ होयसघांतोल
काही पेंशीं स्वतंत्र होतात व आपला
जीवनक्रम स्वतंत्र
चालविंतात. त्यांवेकॉँ पुष्कळ एकत्रच राहून तो सघ पुष्ट कर॰
तात, सूक्ष्म वनस्पतोत पळोषण व पुनरुत्पाद्न हो दोन्हो
कार्ये प्रत्येक पेंशव्त होऊं शकतात. पण हो प्रत्येक पेंशदेंची
नैसर्गिक स्वायत्तता पुढें रहात नाही. उच्च वर्गांत पैशाच्या
कामाची व[टणी होऊन अशा स्वद्रुयत्तता प्रत्येक पेशींत टिकन्प्
शक्य नसते. त्यांयेफाँ काही विशिष्ट पेशींनांब तो गीष्ट साध्य
असते. तेथे सूक्ष्म वनस्पतींत पेंश्मिवेभायाते उत्पन्न होणाऱ्या
प्रत्येक पेशींस स्वतंत्र जीवन चालवितांयेते त्या ठिकाण“ केवळ
पेन्सिविभाग वशवूद्धीस पुरेसा होतो.
क[ह”[ ठिकाणी श्रम-
विंभागाच्या तत्वाप्रमार्णे कांहो पेशीं पोषणकाये करतात
व काही वेत्रवळ पुनस्त्पत्तीवे कार्य करतात.
म्हणजे सर्वे
वेक‘व् तेकडळो शरीरें चीवनस्पवे‘त न[होशीं होण्याचा सभव
पेशींची पूर्वीची उपजत पुनरुत्पादनशक्ति काहीं [’वेक्रुश’ट पेशीं-
असतो. नव्होशॉ होऊन उरलेल्यायेकॉं निदान एरवादे’ दुसरे
मघ्येच तेककुंलत होते.
तरी वेशट्टद्धीस उपयोगी पडावे म्हणून ही योजना दृश्यते,
एखादेच शरीर उत्पन्न जाते व पुढें व[हो कारणाते तें
न[होते काळे तर वश लुंटून तो पूवे वनस्पति अस्तित्वात
होतो किंवा नव्हतो
अशळी स्थि’ते उत्त्न्न होण्याचासैमक्
आहे. नूवे वेशाची पर'परा सतत पुढें चालविणें हे सत्रे जीवनकार्यार्वे अंतिम ध्येय आहे अते वाटते. ह्या कार्यात आत्मरक्षणाची अंतमोव होतो. पोषण व पुनरुत्पाद्न हाँच कर्कि
सनेतनत्वाची खरी लक्षणे’ होत व ह्माद्दि कार्यात आत्मरक्षणाचाद्देनु असतो. आत्मरक्षणास शरीरट्टाद्वे ततेच वशवद्धि
घडवून आणर्णे अवश्य असते. केवळ एकाच गोंष्टांक्ड्रु तें
व्यक्ति बनतो येते.
यांवेकळो क[ह’[न[
स्वतेत्रपणें नचीन
योग्य स्थितोत मुळ शरीरापासून त्या
स्वतेत्र होऊन प्रत्येफी नवे शरीर उत्पन्न होते. असल्या पुनस्त्पाद्न साथणाऱ्या पेंशास
जननपेशीं म्हणतात. ज[त्तिळिभत्र-
त्वाप्रमप्र्णे त्याद्दि पुष्कळ प्रकारच्या असतात.
काहीं जननपेशींचा
उद्धव
ओलसर
चांगला होतो. पाण्यात या`ग्य जागा मिळविण्यासाठी
जननपेशांस वल्हळीवजा शपटया
असतात.
हकडून तिकडे व[ऱ्याबरोबर उडून
जार्गेतच
काहो
कॉंरडया ज[येत
जाण्यासग्रखें
काहींचे
शरीर हलर्फे झालेले असते. ततेच हवेचा बरा वाईट परि॰
णाम होऊ नये म्हणून एस्वादें दुसरे आवरणाद्दे त्यांवर येते.<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जीचनआर्थविवप्र महठ्याट्रीयांशांनफौश-(ज)२८९ जोवनकप्र्यघिचांर आढळतो. [ वेगळे असते. गमेंसस्करिं झालेल्या स्त्र’[तत्व॰गमोण्ड[पासून त्यामध्ये दोन पेशळोचा सयोग होऊन एक वेगळी पेशा..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जीचनआर्थविवप्र
महठ्याट्रीयांशांनफौश-(ज)२८९
जोवनकप्र्यघिचांर
आढळतो. [ वेगळे असते. गमेंसस्करिं झालेल्या स्त्र’[तत्व॰गमोण्ड[पासून
त्यामध्ये दोन पेशळोचा सयोग होऊन एक वेगळी पेशा उत्पन्न [ चीज उत्पन्न होते व पुंतत्त्व…र्केद्र्[र्वे काम कवळ त्या गमो०
त्याहून [तेराळाव
एक
पुनल्त्पत्तोवा प्रकार
होते व [’तेला वेशड्रुद्धि करण्याची शक्ति
असते. तो तेयुत्ता
पॅशीं योग्य परिळिस्थतोत वाढून [तेजपासून पाहेल्या शरीरा'
सारखा एक निड्रुत रीपा तयार होतो. सयोग पावणाऱ्या
त्या दान्हो पेशीं कित्येक वेळा सारख्या कायेक्षम असतात.
त्यावेळी सायारणपव्ळा दोन्होच्या
आकारात
फरक
[ ण्डाशीं एकचीव
असते.
अशा
प्रकारचे उत्तेजन
मिळाल्याय्वेरीज्ञ
फैव्होळिह
गमोण्डापासून वळानन्टिपाद्न होत न[हो. साध्या तेयोग-कार्यात
सयोग
नसतो. ऱ् तर्तेच
पण काहीं ठिकाणी सयोग पावणाऱ्या पेश’क्रुच्या
आकारात
व काय्हँक्षमतेव पुष्कळ येद् असतो. उच्ववर्मोय वनस्पतींत
हो येद् स्पष्ट वतोव असतो. त्यात पुल्प वसाँ ळिग०
दर्शक न[वेळिह देतो
येतात. खाँपु'ल्प-तत्वावा एकजळोव
होऊन त्यापासून गये होतो व पुढें त्यास चीजाहैथत्ति
होऊन व[जरेत्पाद्नास उत्तेजन देण्यासंबची
पावणाऱ्या दोन र्केदाच्या आकारात भेद
अमुकव ॰कंदापासून चीन उत्पन्न होते
नसतो.
अतेछि
न[हो. तेर्केद्वास्वतऱ्चीजाया तोडूग्. दुसऱ्याकडे जाते व
त्याच्याशीं एकगीव होते, अशा वेळीं जागा न तोडणाथा
केंद्रापासून चीज उत्पन्न होते व त्यासच वाटल्यास त्वळोतत्त्व-
गमोण्ड म्हणता येईल. खरोखर सयोगकार्यात अशा प्रकारचा
कोणता भेपमिद् नसतो.
वश…वुद्वळोची तजचीज
स्रो-पुल्प असा
ळिलगभेद्
का असावा टु ……त्या
प्रश्नार्चे उत्तर देगै कठिण
आहे. त्नांपुल्पलिगमेद्
केवळ श्रमनिम्रागतत्त्वाते उत्पन्न झाला असावा. [वेशिष्ट
होते. साधारणपणे शरीराची वाड व[गलळो पक झाल्यावरच मोहोर व फुते येऊ लागतात. अर्थात प्रथम शरीर०
व त्याप्रवार्णे कार्याची वाटणी होते. ह्या तत्वावर घांपुस्ष’
वाड पूणे होणे हे वश…वद्धीचें पहिले साघनच होय. शरीर-
ळिगद्शक अशा
सकार्थतेप्रमागै पुवव्ज्र्मांवन साघणाऱ्या अव’च्वांतोहे सकाणेंता येऊ लागले. स्पायतेगायरासारख्या दोन साध्या पाणकश'ववस्पतोत पुतल्त्पत्तोच्या अवयव'प्त सकळोणता अगदी
भेदभाव उत्पन्न होण्यापूर्वी शरीर॰[सून
प्राप्त होते.
असतात
होत.
नसते.
त्या
म्हणुन
फूळे
किंगद्दृप्तक
विशिष्ट
फुलें
वनस्पतोची
हो
झाडावर येऊन
पेशा
जवतेद्रिये
पेशी
पेशव्स विशिष्ट प्रकारर्वे काये दुसऱ्यापेंक्षां सहज करता
कामांची व[टणी
झाली
येते
असावी. असा
फांहो
विशिष्ट पेशळो
व[हेर पडून एकयेकाशळो तेयोग पावतात व त्या तेयु‘कपेशीं‘
॰
’.…"
९
५५-
॰
"
कडून वशड्रुद्वाव काम होत सयाग घडवून आणण्यात त्या
असणाऱ्या
पेशळो परस्पराजवळ येव्ळा अवश्य असते. अथन्तूत्यानां गति
तें कामे सहूंज्ञ कडे शकतात,
उत्पन्न करण्याहोंगौ शरीररचना मिळते अथवा वल्होंवनाट्टेप्फ्‘
त्यायेफॉं कोणत्याद्दि दोन समोरासमोर
पृमव्व्पांद्न करणाऱ्या
फुलात
पुनव्त्पत्तीच्या वेळीं त्या पेर्शीतोल जावरसाव्दे सर्वं पदार्थ ` टयाची तोय करणे भाग असते. ह्य'हूनउच द्जळीच्या वनस्प०
एकत्र सक्रुधित होतात. दोन्ही पेशळी परस्पराकडे वाढून तोत सयोमास अशापेशळी उत्पन्न केल्या जातात. परतुत्यांच्या
त्यांतोल पदार्थांचा सयोग होता. एका पेशींतोल ज[वरसाळिद् : आकार व चलनकार्यात भेद उत्पन्न होतो. पुढील उत्पन्न
पदार्थ दुसऱ्या
पेशव्त
जातात व
येथें असणाऱ्या होणाऱ्या असल्या पेशींत ह[ मेद अधिक स्पष्ट व दृढ होतो.
पदार्योशळो पूर्ण
एकजीव
होतात.
व त्यापासून एकळोवा आकार मोठा होऊन तोत पौष्टिक द्रव्ये सठिविं.
एक
नवीन
स'युक्तपेंशी
तयार
होते.
तो
ववळोन . ण्याची तोयहोते. त्या पोष्ठिकद्र्व्यच्चि उपयोग सयुक्त पेंश[च्या
पेशी फांहो काल विश्रांती घेऊन पुढे योग्य कालाते आपो’
जननस्थितोत होता. द्रुसरीवा आकार वारीक रहोतो व तां
आप वाढून निनपाहूंन नवव्न वनस्पति उत्पन्न होते. ह्या पेशींचलन-काये अधिक व[गर्ले करूं शकते. अर्योतृ
उदाहरणांवळोल छूळच्या दोन्हळो पेशा सारख्याच आकाराच्या ’ ह्यावेतो त्या दोन पेश’ट्रत श्रम…विंभाग अगर कामांची वाटणी
व सारख्याच कायेक्षमतेच्या असतात.
होऊं लागते व त्याच कारणाते पुढें स्रो-पुल्षर्भद् उत्पन्न
फुलांतोल वितेष महत्वाचे भाग म्हणजे पुंकेसर व त्नांकेसर
होत. पुष्पकळोश आंतोल मानाच्या सरक्षणास उपयोगी पडतो.
पुष्पमुगुवाचा उपयोग अप्रत्यक्ष रीतोनॅ गयेघळारणेस होतो.
पण प्रत्यक्ष कायेकारी पुं`कसर व वांकैसरच होत. पुंकैंसरावे
होतो. मोठा आकार,
पराग स्रोकसरायावर पड्रुन त्यांची वाढ
परागनळिलका तयार
होते. हो
होते व त्यापासून
परागनळिलका
व[जाण्डांतोल
गर्थहोंशापर्थत पोहोट्टन त्यांताल पुंतत्व-वेंद्भ आंत श्मिते.
अन्नसामुप्रळो व चलनाभाव ह्या गोष्टी
न्नी-पेशींत ट्टढ होतात व सूक्ष्म आकार.
अन्नभाव व वारे.
क्षमता हो लक्षणें पुरुप-पेशींत वुळिद्वगत होतात. एकदा
ह्या
गोष्ठी पूर्णपर्णे प्रस्थापित आल्यावर पुढील वरच्या द्चीच्या
वनस्पतोमघ्ये झीपुरुष’ळिगद्शक जननेंद्रिये ह्या अमविभांमतत्त्वावरच
बनत जातात व त्यांत अधिकाधिक
भेद
उत्पन्न होत जातो मात्र गर्थ‘यारणा सहज रीतोते घडून
येईल अशी रचना प्रत्येकास येत जाते. [”वक्रुशष्ट रचना असणें
हो स्थिति येद्देपयेत गर्थकळोर्शातोल त्वळोतत्त्व-गर्याण्ड संयोग[स तयार होते. पुंतत्त्व’र्केट्रा व ब्रॉतत्त्वयाभौण्ड ह्यांचा
सयळोग होतो व त्या कार्यास गभेयारणा अते म्हणतात. सा'या
हो गोष्ट दुय्यम महत्वाची आहे. जेव्ग्कस्ऱ्न पुंतत्वृपेंशोस
सदूजरीतानॅ चव्तत्वपेशाशीं अगर गमोण्डब्’शन् सभोग
सयोग व गर्भधारणा ह्या दॉन कार्यात तत्त्वत: फरक नसतो.
एकचीव होणाऱ्या र्केदांवा आकार भिन्न असून प्रत्येकाचे कार्थ
पावतो येद्देल तो रचना प्रत्येकास मिळते. केवळ श्ननार्वेभाग
तत्वावरच तो विंध्य-भेद उत्पन्न होतो… स्रो पुव्पळिममेदामुळे<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११७
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीयज्ञानकोंश-(ज)२९० ज्ञळीवनकप्यैविन्नार अर्भकाचीं सोय होते. ज्या पेंशळोमुळें अथवा पेंशिंरचनेर्मुळे झीचनफांयैघिम्रार विशिष्ट गुण एकत्र होऊन त्या वनत्पतोचळी उत्पन्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीयज्ञानकोंश-(ज)२९०
ज्ञळीवनकप्यैविन्नार
अर्भकाचीं सोय होते.
ज्या पेंशळोमुळें अथवा पेंशिंरचनेर्मुळे
झीचनफांयैघिम्रार
विशिष्ट गुण एकत्र होऊन त्या वनत्पतोचळी
उत्पन्न होणाऱ्या अर्मकास पोषण व सरक्षण यादृष्टांनॅ प्राथमिक
राहण्यास एक प्रकारर्चे उतैज्ञन मिळते.
सोय होते, त्या पेशीत अगर पेंळिशरवेनस स्त्रळीलिगद्ड्रेळाक इंदिंय
समजणे योग्य आहे. उलट सयोगग्स अथवा गमैथारणेस
एकीकरण
ज्या पेशळोकडूंन अथवा
पेसियाळिकेकडून
प्रत्यक्ष चालत
मिळते त्यास पुरुपळिलगद्ईंप्क इंदिय मानार्वे लगिंल. झी
गभेथारण कळिते व पुरुष गमे'सस्कार करतो. एकाचे काम
गर्भ धारण करण्यार्चे असन दुसऱ्याच गभ'सस्कार कर॰
म्यार्वे असते. ह्या दोन भिन्न थ्कायाप्रयार्णे प्रत्येकाची रचना व
ठेवण हा वेगवेगळी होतात.
" वश-वुडॉत त्तेयोगचिं महत्ता-वश’वुद्वीच्या वेग०
वेगळ्या प्रकारांत सयोग व गमैघप्रणा अधिक त्तेकोर्णतेचीं
असतात. तथापि क्षुहां वनत्पतळी त्या मार्गाचा अवलंब
करून
वेश॰घिस्तार
करीत
असतात.
सयोंगानें उत्पन्न
होणाऱ्या नवीन अंकुरात अधिक ओम व प्रगमनशव्लता
आढळते व जीवनत्पर्थेत ह्याच गुणांची अवद्यकता अस॰
ह्यामुळे वनस्पतळी प्रसंगवशप्तु त्या सफौव्गमागनृप्व अवलवन
करून वळीतोत्पग्द्न करितात. अगर्डिव
अगर पप्णवहैंश त्या…
सारख्या साच्या वनस्पतोंतांल पुनर’त्यादन-काये साघणाऱ्या
जननपॅशळी व सयळोगजन्ययेशा त्या द्ळोर्दोचळी तुलना केल्यास सकटसमयाँ कायेशोल वड्रेळाणद्देसइज कवूऽन येते. सयोगजन्य
पशग्त अधिक द्मद्ळारपणा असुन प्रतिकूल रिं-थतत्ति न उग्रक्र्तां ह्क्रुथफ्व्प् विंश्नांत्ति घेऊन अनुकूल
स्थिति
त्या वाट पप्हूं शकतात.
सर्वे जननपेशॉत
पण तो
शक्ति
येंहेंफ्प्र्वेर्तो
नसते. म्हणून सेयोंग साधून प्रतिकूल कालात सैकटास तोंड
देणाऱ्या पेशळीकडून प्रस‘गवश!तुं वश्याट्टद्धि कर”ण अधिक
साहजिक
सयोगप्चा
आहे, प्रतिकूल काल नसेल तर
अनलनवनरपतो
करळोत नाहोत.
’सयोगाळिशवळाय
अन्ययामाँन्ळा
पूर्वे शरीराच्या
शाखा
वश…वुद्धि
होते
अगर पेशा वेगळ्या होऊन
वहुतेक
तेव्हां
बदल होणें साहजिक आहे. अर्थातु त्या वद्लणाऱ्या स्थितीस
योग्य अशी योजना म्हणजे सेयोगार्ते वेशवुद्धि कर॰ण होय.ह्यां॰
थेंर्पिग् उत्पन्न होणाऱ्या अ'क्रुरात त्नीपुरुयावे गुण एकनटल
जाऊन त्यांचा उपयोग वद्लणाऱ्या परिद्दियतोत कायदे
शोर होतो. बांवनकलहोत टिकणाऱ्या गुणांचा परिपाक ह्या
शाखा वाढून
जर वेश-वुद्धि एकसारखी होत गेली तर काहीं कालानें त्या
शिकुंथलपणा येतो. हें ज्ञेथिल्य
‘हेंऱ्योग
होणें अवश्य असते. त्'द्ययोगजन्य पेंशनूत
होऊन वंशनृद्धि
स्रोपुरुषचि
मींनोत्पप्द्न तेइमळो होत असेल अशी कल्पना होते. पण
निसर्मोत पुष्कळ वेळां ह्माढून भिन्न प्रकार आढळतो. भिन्न
फुलातांल स्त्रळोपुरुप तत्व…र्केद्रांचा
सयोग होऊन बॉबीत्पप्द्न व्हावें अशा नैसगिक योजना असते. कांहीं फुलात
पुंकेसरातोल परागकण व त्नांकोंशघिळील वीजाण्है ह्या दोहँळावो
पक्क होष्’याची वेल भिन्न असते.
परागकण स्त्रळोरैकसराप्रावर
पडून बुद्धां कांहीं वेळां स्त्रळोकळोशांतोल बाँजागर्डे पवना नसल्यामुळे त्यांची परागनळिकावनून पराग-…वाळिढन’ळोत शिरण्यास
प्रोत्साहन मिळत नाहो. ह्या स्थितव्त ते परागकण वाया
जातात. परंतु असले परागकण वाऱ्यामें उडून साष्जिक
ठुसऱ्या फुलाक्र पडले व त्यावेळी तेयळील वळीजयिर्डे पहा व
परागोंत्हुक असलो तर त्या परागकणांना उपयोग होऊन
त"! वळोजाण्र्डे गर्मीक्रुत होतात. म्हणजे त्या दोहोचीं पक
सफर साधण्यात निसनौ॰
होण्याची वेळ “भिन्न असल्यानॅ
कडूनच मदत होते. काही फुलाची ठेंवण अशा असते का
पुंकेसरावर्राल फ्रागपिटिंका
वाह्यांगास ट्टेकललैत्’या असुन
त्यांताल परागकण बाहेर पडतात, त्यामुळे त्यांचा उपयोग
त्या
पुंळांतोल
वॉजाण्डास
फांहोच
होत
नाहो. अशा
कणोचा उपयोग गमँघारफैस होत नाहो व वित्यैकवेळां उलट
न्रैदृमॉ परिस्थिति एकसारखोकायम टिकच्ग शक्य नसतेत्यांत
नऱद्दच्र्ले करण्यास प्रसगविद्वैळाषी
सकर साधण्यात निसगळोवीं मद्तऱ्-एकाच फुलांत पुंकोंश
व त्नांफीश ह्या होहोचीं
योजना असल्याकारणानॅ त्याच
फुल'ळातोल परागकणामुर्के त्नांतत्वकँद्र्ळार्चे समीकरण होऊन
त्या
नाही, तर ह्या रँप्त’ळानॅ वश…वुद्धि होण्यांत तोटा नाहो. पण
वनस्पतींत एक प्रकारचा
साघितों. वाह्यतऱ्
तेव्हां
फ्रिप्‘हॅथति एकसारखी कायम राहिली व त्यात बदल झाला
पृवेशारँवयाघून नवीन
तेयोपानॅ
व’प्नांत अदिवापपिंक्षां फारसा फरक असेल अते वाटत नाहो.
परंतु वत्तुस्थिळित वेगळी असते.
ठिकाणी फुलातील पुंकेसरावी बिणिष्टठेंवण म्हणजे एक तऱ्हेंव्ग्
सफर साधण्यात मदतच होय. कित्येक फुलांत स्वत:च्या पराग
रवतेत्रपग्ग वाढतात. ह्या रोतांर्ने उत्पन्न होणाऱ्या रॅप्पड्यांत
पूर्वे रँप्प्यळिचच गुण तंतोतंत उतरतात. जर सभोवतालचौ
यीगानॅ होतो. तर्हे‘च
होणें ह्मांहै उद्देश
सुस्थिति कायम
निरनिराळ्या गुणांचे
काहो
ते सइजगत्या आंतोल खाँकेसायावर पडले तर :तो
स्त्रव्कोश
द्रुवरटून जातो म्हणजे स्वतऱ्वै परागकण त्वतऱ्स विषारी
होतात. पण त्यात दुसऱ्या फुलांतोल परागकण मिळाले तर
त्यांचा उपयोग होऊन बाँबोत्पाद्न होते. म्हृणर्जे त्या बांकाशास वक्ते उत्पन्न करण्याची शक्ति नसते असे नाही. भ्अर्थांतू
स्वत:च्या वांपुरुषतत्वपेंशळीचा परस्परास उपयोग न होतां
दुसऱ्या फुंलास होतो, तेव्हां अशा ठिकाणी सकर साघणें
हाच एक उद्देश दिसतो. याकळ्ग्रांवे भपकैद्ग्र रंग व सुवास
त्याची रचना, मधोत्पऱद्र्क पिंड, तसेच फुलांच्या उमल'
ण्यान्’या वेगवेगळ्या वेळा वगैरे गोष्ठी अप्रत्यक्षपणे लेकर घडवून
आणण्यात मदत करतात. फूलपप्य्यरासळारख्या फौटकाकडून
परागकण एका फुलापप्सन दुसऱ्या फुलात पळोहोचावण व
ततुद्वारा सकर घडवर्णे ह्या कायात प्तिसगाचाच मदत असते.
पराग पप्इप्र्चावैण्यास वारा पाण्याचा प्रवाह अथवा किडे
उपयोगी पडतात. मात्र हें कार्ये त्याकडून मुदूळात व<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११८
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीयन्नानकोश॰(ज्ञ)२९१ बाँवन्मुंक्त तुषार व्यवस्थित होण्यास त्यांची ठेवण, आकार, रंग, सुवास वगैरे यांच्या कपांवस्वन स्पष्ट दिसते. गोष्टीं वेगवेगळ्या प्रकारच्या आढळतात...."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीयन्नानकोश॰(ज्ञ)२९१
बाँवन्मुंक्त
तुषार
व्यवस्थित होण्यास त्यांची ठेवण, आकार, रंग, सुवास वगैरे
यांच्या कपांवस्वन स्पष्ट दिसते.
गोष्टीं वेगवेगळ्या प्रकारच्या आढळतात.
दुसऱ्या अकात
सकर होऊन उत्पन्न होणाऱ्या व[बांत अधिक बोंम व
तरतरळीतपणा असतो. ह्यांचे कारण असें दिसतेकळो दोन भिन्न
आहे.
सयातोय वनस्पतींच्या स्त्रन्पुरुपतत्त्व-पेशॉवा सयोग शाल्यप्ते
उत्पन्न होणाऱ्या व[जां’वर अधिक उतेजक परिणाम होत
असावा व त्यामुळे वळोनांक्रुरात अधिक बोस येत असावा.
सारांश शरीर…वुद्धि व वेशवुद्धि हो दोन कार्ये म्इणवेच
जींवन होय व ह्यांतच इतर सव साथतोंभन कामांना अंतभाव होत[.ल्त्थूलयानानॅ [वशिष्ट काये विशिष्ट-इं द्वियाकड्रुन
होते व त्याच गोष्टींचे ठोकळ वणन या निव'घांत करण्याचा
प्रयत्न केला आहे.
॰ जॉक्का-एक महोररिंटू'प्य सतकवि. [‘नक्षांमराज्यात
यैकैइळुळ’ळाजवळोल अन्वार गांर्वी यांना मठ आहे. यांस
[तेकडे मुत्तेग्‘श्वर म्हूंणतात; हे झातेश्वरतंप्रदोयां होते. श्रीज्ञाने-
श्वरानंतर यांवेच नांव तिकडे घेतात. ज[वन्मुप्के, गौताप्रभाकर व ज[वन्मुक्तिवायय वगैरे प्रेम यांनी केले आहेत.
[ सतका'वेकाव्यवूळा’चे ]
जुद्दे-जाईंप्रयाणें जुईंनाद्दि वेल असतो.
या झाडास
सत्कृतमघ्यें यूथिका, मागघळी वासतळी, लाटिंनमघ्’ये बॅसा’मेनम
अव्रिंवयुर्लटम व मराठीत जुहैं अते म्हणतात. जुईंच्या
वेलास
न्निद्र्के
म्हणते
तान पाते
एका ज[गों अशी
असतात. जाईंच्या फुलांपेक्षां जुहेंचै फूल र्किचित् लहान
असते. परंतु दोन्हो फुलांचा सुवास बहुतेक सारखाच
असतो.
डुम्ईंवे औषधी गुण वहुत्नेक ज[ईंप्रमाणेंच आहेत
अते म्हणतात.
जुगप्र-मनुष्यप्रग्ययाते
प्रकारचे खेळ शोधुन
काढले
प्रिय असे.
त्रूग्त
प्रप्र्चांन प्रांक व जर्मन लौकातद्दि फांशचिं चूत फार
सामान्यत: अते दिसते कळी, ट्टय्गया, युद्ध व
वाणिज्य यांवर ज[वन व[लविणारे लोक छुतप्रिय असतात,
कारण त्यांची त[पत्तिक स्थिति फ[र अनिश्चित असते व
म्हणूनच ते आकस्मिक द्रव्ययाप्ति करून घेण्याला लोंळुप
असतात. उलटपक्षी कॄप्‘पेंजळो'वळी म्हणजे स्वकष्टाते उप-
जीविका करणारे लळोक अत्यंत परिंश्नयाते मिळवितेर्दू द्रव्य
डुगारार्ने म्हणजे यदृत्त्छापांन रेवलार्ते ॰गयावण्यास तयार
नसतात.
'
प्रळोक लोकात होमरकाळी व[र व[नृ असलेल्या फ[श[न"[
व नतरच्या काळांत सहा व[हूंच्या फांशर्ना खेळत. रामन
लळोऋ न[ण्फांनों ( ट्रेड आँर टेल ), व फट्रॅशानळो द्रुग्त खेळत.
हैजिप्त, व[वळीलळोनिया, चळीन वगैरे देशात यार्चान काळांत
कुमार होतो. इस्रायल तोफ मात्र पूर्वी बराच काळ क्वा’षेजीक्ळो
असल्यामुळे त्यक्टियामघ्र्ये हें व्यसन नव्हते.
तु गा रळी वै प्र का र ……जुगप्र खेळण्याची दुष्ट श्च्छा
तान कारणांनी होते: (१) द्र्व्यप्रासाचण् इच्छा, (२) करमणक
व[ ३ ) धुंयत्सा [कवा लढण्याच्ची नैसागक प्रवुत्ति. धिस्थैपणान कष्ट कलन द्र्व्याजन करण्याचा माणसाला जाव्याच
कंटाळा येतो व अनायारँन घनयाप्ति व्हावी अशी ड्च्छा
असते. रांजच्या ठराविक जीवनकयाचा कटाळा आल्यामुळे
कांहीं करमपूप्क असावळो असें वाटते. पण यशापशय
यदृच्छाघीन असळेंल्या रॅवळ’ळात यशस्वी इसमावर ईंशवुणा
आहे असा समज होतो; आणि उलटपक्षी अपयशी माणसा-
करमणुकळोका’रॅता ते अनेक
कडॅ काही कमीपणा
आहेत
मानहोनि वाटत न[हो. इतकेच
त्यांत यदृच्छाघीन
मृच्छकटिक न[टर्फातळील
खेळणारांर्वे भांडण चांगर्ले वर्णिले
किंवा दोष येत नसल्यामुळे त्यांत
नव्हे बऱ्याच वेळां
अपयश
असलेले किंवा नशळोवावै देवल ( गेम्स ऑफ वान्स ) हो एक
प्रकार आहे
असल्या खेळांत यशांपयश रँवलणाराच्या
आलेल्या इसमाला एकदम यश मिळून सर्व पप्रडें‘ फिरण्याची
कीशल्यावर अवलबून
जुग|रळोचें अनेक प्रकार आहेत, पण कोणत्याद्दि प्रकारांत
गनावणारे जितके द्रव्य व[लविंतात त्यार्पक्षां न्तिकणाऱ्यांनां
नेहमी कमीच मिळते. जुगारळोच! मुख्य प्रकार घोड्यांच्या
नसते, तर काकताळोयन्यायवतू
असते. सोंगट्या, फांते, पत्ते, हे वहंर्शी या जातीचे खेळ
होत. असले रॅवळ फार पुरातन म्हणजे मग्नवळोत्पत्तांइतवेव्
जुन आहेत.
भविंहँय काळांतोल अज्ञात गोष्टी जाणण्याच्या
अखेरपयेत आशा असते.
शर्यती.
याला हुघारकेल्या देशांतद्दि कायद्याते
परवानगी
प्रबळ इच्हेंमुर्के हें मनुष्याला सुचले असावेत. चिठ्ठया टाकून
दि`ललळो असल्यामुळे हो कुमार कार मोठया प्रमाणात चालते.
भविष्य ज[णण्यावा प्रयत्न करणें याच्यासारखाव हा प्रयत्न
आहे. याप्रमाणें हे रेवळ अस्तित्वात आल्यावर या रेवळांना
उत्तेजन याते म्इणन काहो मालमत्ता, पसा, पणास लावावा
हो प्रनृ[त्त होते. हो पण लावून ॰ड्रुरजितोचा खळ रवळण्याना
प्रवृत्ति कैदक आयात व पर'परॅते सर्वे भारतांयांत [‘देसन
इंग्लंडमध्ये घोड्यांच्या शर्यतळो न[हॉत असे वर्षातून फार तर
येते.
अते चूत किंवा जुग[र खेळून सवेह्मान ज्ञालल्या
१० दिवस जातात.
फ्रान्स देशात १९१० सालॉ १३० लक्ष
फ्र्हेड पैसा या ड्रुगप्रंळोत लावला गेलाठुआणि इंग्लंड मघ्र्थे निदान
फ्रान्समर्धाल रकमेन् या [तप्पट
तरी
रक्कम
लावला
जाते.
[शवाय प्रत्यक्ष शयैतोंच्या मैदानावर व्या न राहता त्या
शर्यंतव्त ‘ स्टार्टिग’ प्र[इझच्या’ पटू त[ते पैसे लावणारे ड्सम
एका माणसाचे दु:ख ऋग्वेर्दातळील एका हुप्रासद्व नृकांत
( १०॰ ३४ ) वर्णित्ऱ्ञ् आहैं. द्युताची आवड भारतांयांत
किती व[ढलळो होतो व त्याला ळिशष्टसमतत्त्व किती प्राप्त झाल
घेता इंग्लंडमध्र्थे नुसत्या घोङयकिया शयेतोच्या ड्रुगारॉत५६ ॰
होते, हो गोष्ट महाभारतातील नलद्मयेतो व कळीरवपांडव
अनेक प्रकार आहेत ते ( १ ) फुट~~न`व्लवरचे कूपन”वे[’टग,
ट्ञर इसपांच्या दुप्पट तर‘ळो असतात.
लक्ष पट्वेंढ पणास
लागतात.
या
हा तव रक्कम लक्षांत
शर्यर्तांशिवाय ड्रुगाराचे<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/११९
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "नुग्रेळारलप्टिहृया महाराटुंळोय न[नकव्श. (ज्ञ) २९२ ( २) [ककटमघाल नळोळालग ,(३)स[यकलच्या शयता, ( ४ ) इतर मताची खेळ, ( ५ ) पत्यावै ब्रिज वगरे ड[व, ( ६ ) नाण्यांच्या हेड-टॅलची ळिजताजित, वगैरे. रवाणी..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>नुग्रेळारलप्टिहृया
महाराटुंळोय न[नकव्श. (ज्ञ) २९२
( २) [ककटमघाल नळोळालग ,(३)स[यकलच्या शयता, ( ४ )
इतर मताची खेळ, ( ५ ) पत्यावै ब्रिज वगरे ड[व, ( ६ )
नाण्यांच्या हेड-टॅलची ळिजताजित, वगैरे. रवाणीच्या प्रदेशात
त्यामुळे क्रौंरवपांडवाद्दिकाच्या हूग्तासाररवे याठाल राजेरजवा'
नुगारळीवै अट्टे पुष्कळ असतात व तेथे हा शवटना ड्रुगारळोच!
न[हळात. ब्रिटिश अमदानळोत येथे इंग्लंडच्या काययासारखेंच
प्रकार फार चालतो. घोड्यांच्या शर्यंतोशिवाय इतर ड्रुग[॰
राच्या प्रकार[न[ कायद्याची मनाई असल्यामुळे अर्थात हे
प्रकार
बोलत केवळ गुप्त ठिकाणी चालतात. या सर्वे
फायदे आहेत.
ठिकाणची
देशात
रक्कम जमेस जर यरलळो
दरसाल
उडत असते
तर
अदमासे १० फोटो
प[[’ह`तेत.
परेड
सट्टेयाची व…ड्रुमार यांत एक महत्वाचा फरक
[तेना यदा हो जुयारळोनाच
प्रकार आहे,
जगप्रंळोत
शिक्षा असे, इस्लामी कायद्याचा जुगारळीला प्रतिबंध आहे.
द्लालळी.
ते ति क आ क्षे प.…वेमुयार कुमार रेवळग्ग दुष्पा’रेणामळी
असल्यामुळे
असते याबद्दल मतभेद नाहो. पण मयोदित प्रमाणांत कुमार
रेवळन्ग हे ड्रुट्रां अक्षिपांदै आहे ड्रुग्'प्रव्च्या व्यवसायात
पैशाची मोंठो उलाढाल होत असली तरळो त्याते अर्थशास्त्र,
दृष्टया समाजाच्या सपत्तीत यरिंकाद्देता‘हे भर पडत नाही.
करमणुकळीरवातर जुगळार रेनळणें हेंद्दि तेतिकदृष्टया समवैचीय
नाही; कारण पैसे कमावणारांनां बुरव होते पण पैसे गप्नाव'
ण[र[न[ ट्टऱ्ग्व होते. तवव हो असुरळो जातांना आनंद होय;
त्याने मनुष्य कठोर व स्वार्थी बनून त्याना नैतिक अथऱ्यात
पण जगप्रळीच्’या
वळणाच्या रेल्वे,पप्स्ट तार, नगरे आधुनिक मुयारलल्या साथ’
न[च[ ततेच छापखान्या'वा उपयोग कल्’न घेतला आहे. इत’
न्ष्च नव्हे तर, सावैन्निक ळिशक्षणंसस्थांचेळा जुणारळीला मदतच
होते; कारण निरक्षर समाजात जुमारव्वे प्रकार कमळो चालतात.
का व ’या चें नि ये न्न ण …ड्रुमारळोया नाद अनयोवड्रु
आहे याबद्दल मतभेद न[हो. इंरलडना मुख्य प्रधान लाढ
कळी, “जुगार म्हणने
राट्राना नैतिक अथऱ्यात करणारे एक अज्ञन्न एंजिन आहे,’
या व्यसनाच्या प[य“[ इंग्लंडमध्ये एका दहा वप[त(१८९५ ते
१९०५.) १५६ आत्महत्या, व ७१९ चळोऱ्या झाल्या आणि
४४२ दिवाळी निघाला. घुयारतेल्या देशात कायद्याने हुमा,
रोला प्रतिबेघ केलेला
असतो.
सुमायामघ्ये ड्रुगार‘ळाला कायमची मनाट्रे आहे, पण फांहो
विशिष्ट प्रसंगी कव्वड्यांच्या झुंर्गाच्या जुमारळोला परवानगी
ठेवलेली आहे. चीनमध्ये जुमारळोच्या गुन्ह्माला मरणाची
कायदेशीर व्याख्येत येत नाहो. बुयार्रान्या व्यवसायाने दळण…
व[कन्सफाल्ड यार्ने असे म्हृ टल आहे
डयांवे किंवा सामान्य जनसमागांतळे न्यूतप्रसग ग्रंथांत नमूद
इंग्लंड
एका
ळिशवाय सरे८व[ज[र[त[ल
मागलमराठे अमद[न“[त मगुस्ट्टेतोनाच कायदा रूढ होता व
इंग्लंडमध्ये जुमार‘ळीविव्द्व
कायदा प्रथम स. १६६५मच्यें झाला. स १६९८मघ्यें हौटरींनां
होत जातो. आयते घन मिळविण्याची
मनऱ्प्रत्रत्ति जुगारळी-
मुट्टठ वळावते, आणि तिद्याकलतिपुण्य, ;यायळिप्रयता, जनावद[र^[ वगैरे उच्च प्रकारच्या गुणांचा अभाव
त्तेची तफदळील होण्याचे न्याय्य मागे ( १ )
श्रम आणि ( ३ ) अदलाबदल ( एफ्स्र्तेज )
जुमारळीसघ्यै ज्ञेणताळिद्रु मळोवदला किंवा किंमत
इरण होते, सवव तळो एकप्रकारची
चाललेला दरोडेख्‘ळोरॉच होय.
होतो. मालमद[न , ( २ )
हे चीन होत.
न देता द्रव्य-
उमयतांच्या
समतळोते
सावैजमिक बुमारळोवॉ मुद्दे नष्ट केलळो. तरळी डुमारळोचें प्रमाण
व्यापारांतोल सट्टेपद्वति हो नुसार नव्हे. यदृच्छा
( न[न्स ) सट्टयाच्या ब्या’गरात असते अस म्हणतात, पण
वाढतच होते. म्हणून स. १९० १ मध्ये एक कमिटी नेमलों गैलळो.
ते खरे नाही. मालाच्या किमतोची
शिफारस केला व इतर सर्वे प्रकार वेद करण्याकरिता अधिक
कडक कायदे तुवा‘वेते. घरातून चालणारा खाजगी जुगार
बेद् करणें शक्य नसते तरळी डुगाराच्या योगाने आतेल्या
जगांतळील घडामोंश्र्डंळोवर अवलंबून असते, त्यामुळे किंमती…
मध्ये काय फेरफार होतव्ल त्याचा अदमास उर्फ भविष्य
कळण्यास जग[त’[ल व्याणराची माहिती व अर्थंशास्राचे ज्ञान
लागते. पुढेभाव व[ढतोंल म्हणून आगाऊ रवरेदो करणें
कथक्रुवद्दल काटक्रुत फिर्योद चालणार न[हो असा कायदा
हे समाजट्ष्टयाद्दि
वेकायदप् ठरविण्यात आलें. १८४५ व १८५३ च्या कायसाते
तिते घोडथळिया शयैतोंच्या जुग[र“[न[ परवानगी देण्याची
आवश्यक
चडउतार हो व्यायारळी
न न्याय्य
आहे. उलटपक्षी
आहे. इंग्लङमघाल १९०६ सालच्या स्ट्रोट वेंटिंग अँक्ट ’ डुगळारार्ने कळोणतेद्दि समाजा‘हेत सावळे जात न[हो. सट्टेवाजग्त
ते या व्यसनावर व्यापक [नयेन्नण आहे. या गुन्ह्यास पप्’हेत्’या सुहां मालाची देवघेव करण्याचा खरोखर उद्देश नसेल तर
वेळा १० पींढपयत, दुसऱ्या वेळा २॰ पौड, व [तसऱ्या वेळी हो कायदेकार्टीत ड्रुनारच समजला जाते. विमप्कपन्यांचप्
३० पो'ड किंवा ३ मळिइतेपयत साधी[कवा सक्तमजुरा कैद
धंदप् होड्रुगप्रच आहे असा आक्षेप येतात, पण तो ट्टक
अशा प्रकारच्या शिक्षा ठेवल्या आहेत.
आहे. कारण धोका टप्ळणें’होच विम्याच! उद्देश असल्यामुळे
हिंदुस्थानात प्राचीन राजेच धूत रेवळत असत. तथापि त्यामुळे जीवित आ’घेक हुरा‘क्षेत होते. गुंमार’ति मान्न थनत्म्रा‘तेकाराच्या काळी जुयार‘ळोला कायद्यार्ने प्रतिबंध करण्याचा
होति हो एकच दुष्परिणाम सदासवेदां ठरलेला आहे.
प्रयत्न `क`लला दिसतो. दिवाणीं कायद्यांत हूग्तमद्याद्दि व्यस-
नाभुळ यापाते केरेठर्ले कवे फेडण्याची जवावदोरळो पुत्रावर
नसे. शिवाय ढूग्त रेवळर्णे हा गुन्हा ठरवून त्याला होत
तोडणे हो शिक्षा सांगितला आहे. मध्ययुगीन राज्यांत व
[ लाकाचें [मळून डुगऱरलगव्हृया
[
[ राज्याची मुहूतेमेढ र`[[’वेलळो
डुगोस्ल्श्र्व्हिया-सव्र्ह, कोट व
साला [डसवर
महिन्याच्या
स्लोव्हेन या
कि हा
हे राष्ट्र वनळे आहे. १९१८
पहिल्या
गैलळो.
तारखेस या
स्वतंत्र
वेकरिंलऱ्प्व्हेकियाच्या<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१२०
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराष्ट्रळंप्थ सानफॉंश. ( जं ) २९३ जुगळोल्ळक्वि राज्याची न[णप्रतिप्रा अवघे दोन र्मांहेवेच अगड्रेदर झाला [ जुगौस्लप्ग्न्दिया ण्याचळी चळवळ सुरू केला. विशप स्टू[सयेयर या प्रसिद्..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराष्ट्रळंप्थ सानफॉंश. ( जं ) २९३
जुगळोल्ळक्वि
राज्याची न[णप्रतिप्रा अवघे दोन
र्मांहेवेच अगड्रेदर झाला
[
जुगौस्लप्ग्न्दिया
ण्याचळी चळवळ सुरू केला. विशप स्टू[सयेयर या प्रसिद्ध
होतो. ड्रुगोस्लगहेंहयाच्या स्वतंत्र राज्याला पुढें काहो दिन, ’ पँडितार्ने या चळवळीला याठिंनादिला व दक्षिण स्काव्इ
लोकांसाठी, दक्षिणस्लाव्ह [”वद्यापळोठ स्थापन केर्ले. या पळोघांत
त[तेतर युरोपमधील प्रमुरव राट्रांनों आपला मान्यता दर्श॰
निळी जुगोरलाव्हियाच्या राट्रांत सर्विहया, मॉटिंनरेंयो, कौएपुगास्लाव्द्दाच्या एकाकरणाच्या चळवळीच्या ळिदशेते बौद्धिक
[
शिया, स्लळोव्होनिया, ड[लमेटिया, वनट, वचऱ,वरंज,व`[खिया- नृ प्रयत्न सुरु झाले. स्वत: स्ट्रास`मयरर्ते इतर राट्रांत या
हृतेणो’ठेंहना इत्यादि देशांचा अतर्भाव होतो. १९२१ साल? …: चळवळीला पाठिंबा मिळवण्याचा प्रयत्न केलासा’र्धेइयाचा राजा
या राज्याची लोकसेख्या १२१६२९० ॰ होतो.
प्रिन्समायकँल व माँटळीनळीप्रीना राजा प्रिन्सडॅतिलळो व[नोंद्दि
जुगोंस्लाव लळोकानों आपल्या स्वतंत्र राज्याची स्थापना या चळवळीला मदत करण्यार्चे आश्वासन दिले.
करण्याची चळवळ अगदो अलीकडे चालू केली असें एक
विमान करण्यात येते पण ते खरे नाहीं. १५ व्’[[ शतका‘
यापुनच या चळवळीला खूक्ष्म आरंभ झाला होता. १६ व्या
शतकामध्ये ड[लमेटियाच्या प्रदेशांत उस्’र्तोक ज[तव्च्या न[वै
लोकांनी आपला स्वतेत्र वसाहत स्थापन केला होतो, व
त्याचप्रमार्णे दक्षिण हंगेरी व स्लोंव्द्दानिया येथें सविंहयन
लॉफांनॉ वसाहती स्थापन केल्या होत्या. १ ७ व्या शतकांच्या
पण स.१८६ ० च्या सुमारास या फ्रेंच,-स्लाव्ह चळवळीला
भटँग्कर धक्का बसला.
प्रशियाते अपूवे जय सपादन केल्या-
मुळे अक्रुहिटुयाया पराभव
होऊन
अव्प्हैटूयाला
हेटेंळाराणी
समेंट करणें माग पडते. त्यामुळे हेशैरळोला आपला पुलतानशाहो या छोटया र[ष्ट्र[वर मागविण्यात आयतळीच सश्चि
निकाली. आपल्या राज्यातील ड्रुगोरलाव्ह चळवळीशॉ पर,
राष्ट्रळोय स्लाव्ह लोकांचा तेवेघ
यासाठी
ह'गैरळीते
व्हिएन्नामव्यें’ पँनस्लाव्ह् चळवळीला
येऊ
नये
[’वर`[॰
पूवळीपाँत रगूसाच्या ड्व्हेन पुंडुलिकते व त्याच्या र्भावत[॰
प्रयत्न केला.
लच्या कवळीनळी सर्विहया व वोस्मियामचळील
लरेर्फाशळी
आपला रक्तळाचा सवय आहे अशी भावना जागृत करण्यास
चक अशी पँनकोट ( विश्वकोंट सघटनाचळो ) चळवळ पुरु'
सुरवात केली होता. फिद्दे’रामेक न[नाच्या काटमघील, क‘र्योलिक उपम्घ्यायनि, रशियात असताना अखिल स्लाव्ह
कृट्ण्गांत आळी.
१८८३-१९०३ सालापय’तच्या अवर्थीत
दक्षिण स्लाव्ह लरेक[न[ फारच वाईट दिवस प्रम्प्त झाले.
सर्दिहयाना राजामिंलन याते णांड्रिया-हेगैरॉशळो
गुप्त तह
लरेफांच्या एकळोकरणाचीं कल्पना प्रद्रुनात केला होतो.
पण या कल्पनांना मूते स्वरुप देण्याचे काये नेंपाँळिगनते
करून आँळिस्टूया-हेगेरोक्सिद्व जळो चळवळ होईंल तो दडपून
घडवून आणले. त्यार्ने स्कॉँव्हेनया प्रांत कोंएशिया व ड[लमे[’टेया थांमघील वराच भाग निराळा काढून, त्याला ईळिरिं’
यन राष्ट्र अते स्वतंत्र न[व [देते व ते आपल्या फ्रेंच साम्रा-
अतऱ्स्थ द्रुफळी मानला व त्यामुळे त्यांच्या चळवळीत जोग
ज्याशळो जोडून घेतलें. अर्थांत त्याच्याभ्'नतर त्याचा प्रयोग
दिवस लाभथ्यार्वी चिन्हें [देवू लागळीं. प्राग येथें असतांना
स्लाव्ह तल्णांवर प्रो. मसरिकच्या शिकवणींचीघिलक्षण छाप
फारच थोडा वेळ
टिकला
पण
त्याची हो कल्पना
माग
व्होडनिक कवीने होतो वरुन, तळी येऱलावण्यास आरंभ केला.
चूडेंढिहटगज न[वाच्या अद्वितीय पंडितानें या कल्पतेत
चैतन्य ओतळे. याते व[ट्मया'घ्या द्वारा सव्हे व फॉंट हे
लळोक एकत्रच आहेत व यांच स्वतेत्र राज्य शक्य तितक्या
लवकर नियाण झाल पाहिजे अशा
भावना जागृत केला.
मण्यार लाफांकडूंन९ यगू कल्पनला मुते हूचरुप देण्याच्या
कायात अडथळा यइल हे या पक्क जाणुन होता.
पण त्याने
आपली चळवळ तेवढ्यापुळे धांववलळी न[हो. या त्याच्या
चळवळीला हळू हछूऽ लोक मिंदृ'ड्रु लागले व माँठेनिप्रोचा युवराज पाँटर यातेहि या चळवळीला आपली पूर्णपणे सेमत्ति
दर्शविला.
हेगैरामघ्र्ये या चळवळीच्या पुरस्कत्र्योनॉ ते वेड वेर्हेलै
त्यांत त्यांचा पूर्पोपणें पराभव झाल्यामुळे हैंगैरच्ते यांच्यावर
सुलतानशाहो गाजा‘वेण्यास सुरवात केली. या चळवळीचा
जनक मन व येलासिंक यांनॉ [मेरारॉते' प्राण सोंडलवईंळिरिं
यन राष्ट्र स्थापण्याची कल्पना रसातलाला गेला. पण अशा
रळीतड्रेर्ने ईंळिळीरयन
राष्ट्रस्यापतेची कल्पना
नष्ट झाला तरी
त्याच्या वदलळी जुगोस्लाव्ह ल`[क[न’[ जुगोस्लऱ्व्ह राष्ट्र स्थाप-
टाकण्याविपया
आश्वासन
[दटुंअ जूगौस्लाव्ह
राहिला नाहो.
पण १९०३ च्या सुमारास
लळोकामघ्योद्दे
पुन्हो या चळवळीला
वरे
पडून
त्याच्या मनांत पुन्हां हूंगोस्लाव्ह चळवळ पुरु करकळोट व सव्ह लोकांची एकप्र
झाल्याशिवाय गत्यंतर नाही अशी भावना [वेनारळो माणसास
जागृत होऊ लागला3व त्याप्रमाणे त्याची सघटना करण्यास
सुरुवात केला साव्हयन द्रवारतेद्दि या सघटनैला अपुफूल
मत द्शविंल. याच सुमारास हेगैरौत राजा व प्रजा यांमध्ये
विंपुष्ट माजल्यामुळे या संघटनेच्या पुढाऱ्यांनां नामा स्नेघि
मिळाला. कळोएशियामथील ४० प्रतिनिर्धीनव् ट्रेषिक व
’ ण्याची प्ररणा उत्पन्न झाला.
पुपदेंलळो याच्या नेतृत्वाखाली कौल व सव्हे यांच्यामघील
एकाच्या अवइयकतेवै महत्व प्रतिपादन येते. सर्दिहयाच्या
प्रतितिर्यांनींहि यास आनंदाने तेमति विलो- कोंट व सव्हँ हे
ल`[क एकराष्ट्रळीय आहेत असा जाहोरनामा लवकरच काढ’
ण्यांत आला. हंगेरॉर्ने साम-दाम-देड-भेद या चारी शत्नांचा
उपयोग करून पाहिला पण या एकाचा भेग झाला न[हो.
व[ल्कनयुडांत बाल्कन राट्रांनीं तुकैस्तानवर विजय मिळ-
विल्यार्मुळे तर या एफॉला चांगलाच जोर चढला. आँरिंट्रया
हेगैरळीर्ने हो एका मग प[वण्यासाठ’[ जुळुमाचा कळस
ण्यास सुरवात केली होती. पण सर्डिदयाते त्याला
करर्भाक<noinclude></noinclude>
lumre9mlhjwuds0qyah5iuntckxe0be
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१२१
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "जुगळोल्लाव्हिया मह्यराष्टीयज्ञानकीश ( ज)२॰४ जुगोस्तप्व्हिया …भ्, ,-.…_…_ _…_.….,॰..- …ळं “ळवळींत विंद्यांथ्याचा खूप [ राष्ट्र होणें ज्ञह्रऱ आहे, जूगोढ्याप्’हेंहूंयार्वे अंतिम ध्ये..."
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>जुगळोल्लाव्हिया
मह्यराष्टीयज्ञानकीश ( ज)२॰४
जुगोस्तप्व्हिया
…भ्,
,-.…_…_
_…_.….,॰..-
…ळं
“ळवळींत विंद्यांथ्याचा खूप [ राष्ट्र होणें ज्ञह्रऱ आहे, जूगोढ्याप्’हेंहूंयार्वे अंतिम ध्येय
ड्रुगोस्काव्हूं चळ
व[तलळी न[ह‘[.
भरणा होता व त्यांचा बहाल गतें त्यांच्या पुढाऱ्यांनांच स्वत:चे पूण्र्हे स्यातत्र्व प्रस्थापित करणें असन, या र[ष्ट्र[च[
[
पटत नव्इतों पण ळिवयाथ्यानां आवरणं या पुढाऱ्यानांशक्य शग्सनपद्घा‘ते लाकसत्ताह्मक व पालमेंटऱळी प॰`द्धत[च[ असावी,
यावा,
नव्हते. या विद्याघ्यानों आपल्यावर वुत्यूम करण्याऱ्या , सार्वत्रिक मतदानपद्वतोंचा स्र्वांकार करण्यात
[
आड्रियाटिंक समुद्र सर्वीनां खुला राखण्यात याना अशा
प्रकारच्या अटी ठरवण्यात आल्या. ट्रेविक वगैरे पुढारी
शहूंच्या पुलाऱ्यान[ यमसद्याला पाठवण्याचे प्रयत्न करण्या…
सा’द्दे कमौ` कल
न[हळो,
त्यांपफा
क[ह[न[
यशद्दि आलें.
या बिंद्याथ्प्रपिंकज् फांहग्ना सारज्ञव्हों येथे आचैङघूक
फाप्न्सस फाङनङचा सन केल्यामुळे या हृत्येंचा भयंकर परि-
परत सर्विहयात
णाम होऊन महायुद्धाला सुरवात “सल्ला.
प्रसिद्ध आहे. या डेक्केरॅशनला त्दैळोद्देड बाँबँनॅहि पाठिंबा दिला
पण हंगैरळीऱ्व पांर्लेमेंट अद्यापिळिहूं शुद्वळीवर आल नव्हते.
महायुद्धाच्या प्रथम भागांत
आलेच
त्याचे मोंठें स्वागत
आले. ही व[ट[घ[ट ‘डेक्करेद्वेळान आँफ्, कोकूड्रे’
या ठ्ठागौस्लाव्ह लड्रेफांवै
करण्यात
या न[नार्ने
भपकर हाल झाले. याच्यायैकळी हजारो लळोफांनां द्रुग्त्ग्रूचा
मागे स्वळीकऱरावप् लागला. किंत्यैफांनां तुरुंगांत र्कोवण्यात आल.
त्याच? आपल्या साल्ऱ्मेंटमघ्यें कुगॅ।स्ल[व्हज्य[ प्रतिनिथींन'प्
मज्जाव केला. त्यामुळे पुगोस्लाव [चढून गेले व त्यांनी
मुद्रणस्रातेत्र्य व न[पणस्या‘तत्र्य बंद करण्यात आट्य्. वळोस्मियामध्ये तर जुलयाचळो परमावघी झाली. पण एवढयान‘द्दि धीर
पुन्हांलोंराऱ्ळा आपलळी चळवळ पुरु केळी. वोल्शळाव्हृक
रशियार्शी आँस्टियार्व्हगॅरळीर्ते मी तहाचीं व[ट[प[ट पुरु केल“ [
होतो, त्य[व[ट[घ[ट[ला [पल्या तक स्वतंत्र प्रतिनिथळी
स्वचुं न देत[ क्रुगोत्लाव्ह
महायुद्धात
चळवळ
जिवंत
राहिला होंतळी.
सुरुवात होण्यापूर्वी, र्दो. ट्रॅबिक, पुमिंळीप्रमृलिं हें देण्यात यावे अतें त्यांना प्नातपम्द्न करण्यास सुरवात वलों.
पुढारी अर्दिहैट्रेया-‘र्देगरळीतून पळून गेले होते. त्यानों परराट्रांत या चळवळीला आरंभ केला. ठिकठिकाणी या चळवळीसाडॉ शाखा काढण्यात आल्या. प्रथमत:
-
प्रथम इटली हा जुगोंस्लाढिहथन एकव्च्या विरुद्ध होता-
फ्ण प्रेळिसर्डेट विल्सन व लव्ईंड बाँउळी याच्या स्वयंनिणेंयाच्या
या वळवळांर्चे
तत्त्नाला देण्यात आदेल्याणा‘टॅव्यामुळें, इटलळीतप्’द्वे आँरिट्रया-
नूगोस्ला'
दिला. आड्रियाटिक समुद्र सर्बोनां खुला टॅवण्यासठीं पुन्ष्रँ
होते. पण तेथील सरकार जुगोस्लरव्इ , हॅळोट्वरोसघांल छोटया राष्ट्रर्तेनां स्वयंनिणेंय मिळावे अशी हृच्छा
असल्यामुळे हें केंद्र वद्छून लङन येथे उत्पन्न झाला. लवकरच डे‘[॰ ट्रॅविक व स्मिमँम्र टळोरें
य'गुंच्यामघ्यें खासगी खळबळ हळोऊन, इटली व बुंगौस्लोंव्ह
लढत येथे द्रेंत्तसरलार व ड्टला यांच्यामध्र्थे एवळीच्या आवरयकत्ट्रेवद्द्ल चर्चा झालो. व[ट[घ[`
तह हळोऊव त्यात इटलीने दोस्तराट्रांच्या टव्त इटलीने डुगौस्लाव्हूंच्या स्वातंत्र्य-चळवळीला मान्यता
मुख्य केंद्र रॉमशहरीं
चळवळीला विरुद्ध
आणण्यात आर्ले.
१९१५
साला
यांच्यामध्ये गुप्त
व[त्रूळार्में महाबुदांत
भाग
[हेंइथन मुलखांतळोल
वराच भाग
कबूल केळें; त्यामुळे तर या
घेतल्यास
त्याला
देण्यार्वे
तोंडर्वे पाणी पलात्ऱ्ऽ. पण एववयार्ने घोर
त्यानी
रशियार्शी
सयान
दोस्तराट्रांनों
चळवळीच्या पुरस्कत्यग्ऱ्च्या
बांवलॅं.
रशियन
स्वचुं न देत[
सैन्यामध्ये
चळवळ करण्यार्वे दोघांनी ठरविरेंत्र्. हळो व[टम्याट ‘पॅवट ऑफ
ररैम’ या नावाने प्रसिद्ध आहे.
याच सुमारास प्रम्ग येथें एक मोठी कॉंग्रेस भरलळो. या
काँग्रेसला चेक, पें’प्ळिश, इटालियन, रुयासियन, स्लोव्हाक
२३॰॰ ॰साईंट्रेथन लॉफांर्वे एक पथक तयार झार्के व या पव-
व हुंगोस्लाव प्रतिनिधळो हजर होते.
फार्ते ङळोब्रूजाच्या रव[र'[॰त बांगला पराकम गाज्ञविंला. पुढें
स्वप्तत्र्यप्रखोसाटॉ परस्परानां
[‘देलैं. अमेरिवट्रे'नें’ रोमच्या
कुगोस्लाव लोंव.[न[ अधिकच
लोकांचा पुढारळो करेंरड्रेसेंक हा
येथे ऐफ्यपारेंपद् भरघिळी व
रशियाचा पराभव आल्यावर इंग्लंड व फ्रान्सच्या सैन्यात
यानॉ न[र्वे नोंदविलॉ व सँलरैनिकाच्या रणक्षेत्रांत व[नीं
’
अप्यर्के न[व याज्ञविळें. इकडे खुद्द आँन्टिट्रया-हॅव्ळारॉतद्दि
चाल्हैस राजा व[द्शहा झाल्यापासून व[तप्वरण निवळं
लागलें होतें. त्यामुळे पांर्लर्धेर्टातांल, स्लाहेंहन, कोट व
सव्ईं लोकांच्या पुढाऱ्यानळी आपला ड्रुगोरुलाव्हृ पाकँच्म्व्ट्ळी
क्कव स्थापन केला होता. यानॉ छुगोंस्लाव्हच्या स्वातंत्र्या'
साठ‘व् खटपट करण्यास सुरवात केला. अमेरिका युडांत पडल्यानतर स्वयाँ’नेर्णयाच्या तत्त्नाला महत्व प्राप्त झाल होते
व त्या तरयाचीं कास धरुन पुगरेंस्दॉव्इ लॉकांनग्द्दि आपल्याला स्व[तत्र्य मिळण्याबां आग्रह धरला.
१९१७ सालच्या बुल महिन्याच्या २० व्या त[रदेवस
पसिक हा
सर्विहयाचा प्रधान व डॉ. टूंळिवक याच्या-
मध्यें गुप्त व[टप्घाट होऊन
त्यात जुगौस्लाठइ हेंस्वतंव
या सर्वे प्रतिनिपींनळी
साहाय्य करण्यार्वे अभिवचन
अँकटला समळित दिल्याने तर
उत्साह आला. बुपोस्लपिं
होता. यार्ने स्लाव छुब्लियाना
त[त स्लाव लोकांचे दृढ ऐक्य
कर्ते होईल यास'र्वर्धीचीं चचौ केळी. इकडे ऑळित्टूयाचळो सत्ता
हळूहळू शिथिल होत होत॰[.घ[न्याच्याटंचाहैमुळें जिकर्डेतिकडे
मेबेद्शांही गाजला होती. क्रुगौस्लाव्इ लोंकर्पिकॉं एक[ बंड…
खीर टोंळीनें ड[गराचा आश्रय करुन आँप्’हेटूयन सैन्याला
सतावून
टाकण्यास
सुरुवात
केली
होती
अशी
बिकट
परिरियाते उत्पन्न झाल्यामुळे दक्षिण स्लाव्ह लोकांचा
त[ड[‘वेंण्यासाठ’ळा आँदिटूया'हॅगेरळोनै आपले
प्रयत्न
प्रश्न
सुरु केले.
पण या प्रश्नाचा विचार व[स्तविंक नुगोस्लाव्ह लोकांच्या
द्दितस‘वंघाकडॅ दृष्टि ठेवून न करत[ आपल्या
साम्राज्याच्या
[र्हेतप्कडॅ लक्ष ठेऊन केल्यामुळे या प्रयत्नाला यश
आल<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मइप्सट्रीयनानकॉँश॰(ज्ञ)२९५ जुगीस्लाढिद्द्या जुगोंस्त्यांहुद्दया न[हाँ. याच सुमारास शांततापारँपट्रॅर्वे अधिवेशन भरण्याचें ` पण याच पुमारास नवीनच गट्रेष्ट घडून आलळी. हेंप्रि..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मइप्सट्रीयनानकॉँश॰(ज्ञ)२९५
जुगीस्लाढिद्द्या
जुगोंस्त्यांहुद्दया
न[हाँ. याच सुमारास शांततापारँपट्रॅर्वे अधिवेशन भरण्याचें `
पण याच पुमारास नवीनच गट्रेष्ट घडून आलळी. हेंप्रिव
निश्चित झाळे’ होंतें. त्याला आपल स्वतंत्र प्रतिनिधी पाठवि' प्रांतान आपर्के स्वातंत्र्य पुकारले च ट्रॅविक व त्याचे सखी…
ण्याचा ड्रुगळोस्लाव्ह लोकांनी निश्चय केला.
व[र यानां आपले परदेशीय प्रतिनिधी या नात्यार्ते मान्यता
प्रेसिर्डेट विल्सननें आँरिटूयाइंगेरळोकडे स्वयेनिर्णेयाच्या हें दिली व स्थित्झर्ढेड येट्टटँ जुगोझ्याव्हैंवयासॅव'घळी चर्चा करु-
तत्वछ्येबेधळो एक ललिता प[ट[र्वेला व त्या धर्तीवर सर्वे
राट्रांनों आपर्ढे राज्यकारभारार्ते ध्येय आंलार्वे अर्ते कळनिलॅ.
अव्रिंटूयाह'गेंरक्तला या स्वयळीनर्णेयाच्या सत्याला मान्यता
ण्यास त्याना अधिकार दिला. त्याप्रमाणे जिनळोव्हा येथे
जुगोंस्लाव्हांवे प्रतिनिधी जमले व त्यानॉ व[ट[व[ट करुन
एक
मपुपा तयार केला.
या तयार
के`लल्या मपुच्चा`
देण्याशिवाय गत्वतरच नव्हते. त्याप्रमव्णें ठुसरिकमें व[द्‘ [वर मासिक, फॉंरड्रेतेंक, ट्टेयिरु वगैरेंच्या सह्या होत्या.
शाही जाहीरनामा काढून ऑळिल्टूयावे जर्मन, चेक, पुगळो- या ममुद्यान्वयें ड्रगोस्लख्हठेंत्चतंप्र राष्ट्र असुन इतर
स्लाव्ह, युक्रेनियन असे चार भाग पाडून या चारा भ[ग[॰ ’ राट्रांर्शी ड्रुगोस्लाव्हचा समान द्लाँ आहे अर्ते जाहीर कर॰
ताल प्र[तनि'व“[व”[ एकमकळिया सव्ग्ळू॰यानॅ आत्ट्रयाच! राज्य ` ण्यांत आलॅं. तरी पण ड्रुगोंक्काव्ह लोंर्फातच अद्यापि द्रुकळी
कारभार च[लव[व[ अहें प्रसिद्ध केलें, पण आद्दिटुया च ट्रेगेंरो . गाजलेला होतो. याच सुमारास इटलीला ड्रुगोंस्लाव्इच्चि[
आपल्या ताब्यात आणण्याची इच्छा
या द्ळोघांनोंद्दि या तत्यावरठुचूत्र्म नागार्वेण्यार्वे ठरविल्या० मर्दुमघळील॰९ प्रदेश
"'१
९ ६२
"
५
"
शिवाय या ज[हळोरनाम्याला समति देण्यार्वे कोंरकुखेकर्ने नाका- ' दृराल्यामु’यंप्’ पंगि' र्यांर्दैफ्ल सन्य ळु|व्लज्ञनच्य[ राखप्न रॅक्यन,
रर्के.
प्रेसिर्डेट विल्सननें याच पुमारास
आँरिंटुयाहंगेंराला
स्वळिलता पाठवून वैकोंस्लाव्इ व ड्रुगोस्लाव्ह लळोक[न[स्व[ टुंव्प
देण्याबिपयळी कळविर्के. याना फार परिणाम झाला. यामुळे
केलें. हें सकट निवव्रण्याताठळो श्वेग्रेवनें सर्दिहया, माँर्टानित्रो
इत्यादि राट्रांचीं मदत मागितला. एवटॅच नव्हे तर पुंळागों’
ऽलाव्ह संस्थानात ऐक्य घडवुन आणून ड्रुगोंस्काव्हच्या
वृंगोंस्लट्यु-इं लोकांना फार आनंद झाला व त्या आनंदाच्या , राज्यकारमाराचीं धुरा सर्दिहयाचा राजा अलेक्झांडर याच्या
भरात बुगोस्लाव्ह् शिप[य[न’॰[ आपल्या अंगावरळोल ऑल्टियाहगेंरळीचळो पदके ळिभरकात्रूव [ ला.
घोप्स्नया व ड[लमेटिंया
प्रांतांतील लोंफांनों स्वातंत्र्य पुकारुन आपले
रा'ट्रॉयमंडंळ
ह[त[त दिल’टुस् त्यामुकँ ऐवयाला
त्रुळागोस्लाठहृचप् राज्यकारभार
द्द्ष्टअता
परिणाम घडून
चालविण्यासाठी एक
राट्रोय
मंडळ निवडण्यात आलें. या मेद्दलाचै पळोट्रिक व कळोरॉतेंक हें
वनत्रिल्वृंघ् कोंटिंयन लोकांनी फ्हूंममघांल हंगेरियन शिंपा’
याना वि: शस्त्र करून फ्यूम आपल्या ताब्यात घेतल. लगेच
आटवङयाच् व! आंत कॉटियान आपल स्वातंत्र्य पुकारल
अनुक्रमे प्रयान’दूड्रुपप्रयान झाले, डॉ. टुंविक यास परराट्रपां’त्रे निवडण्यात आठें व णसिक, ट्रनिक, द्योल्यर यांनां
श'ळातनापाँरपदेत प्रत्तिनिघि म्हणून व[ङण्यांत आलें.
ण्याचा व अशा रीतीने इटलळामध्र्थे व ड्रुगळोस्लाव्प् राट्रांमध्थें
रछ्ट्रे याच्र्णांवस्च्द्व टरेंफांना
ड्रुर्गस्लाव्हृ राट्रार्वे अस्तित्वच कबूल नव्हते.
पण इटलीला
अव्स्टियार्ते यावेळ”. मुत्सद्दत्पणा क्तदृवूव आपल सर्व आरमार
भ् ड्रुगोंस्लाव्हांनीं जे आपल राष्ट्र स्थापले त्यापुढे इटलीच्या
नुगळोत्लाव्हांच्या ताब्यात देऊन त्याना आपल्याकडे वळवि- अं॰[[च[ तिळप्रांपड उडून गेला, त्यार्ने हुंग्‘गोस्काव्ह व दोस्तबिघाड आणण्याचा प्रयत्न केला व त्याला त[त्पृरतें यशद्दि
आलॅ. इटलीला ड्रुगोस्लाव्हांच्या बद्दल मनांत तंशय उत्पन्न
झाला व प्तिऱ्व ड्रुगोंस्लाव्हांच्या स्वातंत्र्याच्या चळवळोविल्द्व
खटपट करण्यास प्रारंभ केला.
याने"
केवळ
त्याची
अशी
तैर्विहृयाचा प्रधान पाश्विक
पें‘नस्लाव्हचें व[रण स्वळोफारत्ऱ्ऽ. पण डॉ. टुंविक याला
स्लाव्ह लळोकचिंच एकळीकरण व्हावें अर्ते व[टत नव्तें.
दृष्टि अखिल बुगोंस्लाव्हांचें स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित व्हावें
होतो, त्यामुळे मासिक व टूंविक व[च्यामघ्र्मे बेबनाव
भळिडमार करण्यास सुरुवात
केली. इकडे प्रेसिर्डेट विल्सननें तर या परिंपर्देच्या पूर्वी
ते परस्पर राघ्ट्रांतौल गुप्त तह आले असतील ते रद्द आल
आहेत असे जाहोर केलॅं. तर ड्टलानॅ लडनमघ्र्ये इंग्लंड व
द्व्त्तराष्ट' याच्याशा 'जळो तह झाला होता तो तह
आणण्यासाठी
दोस्तराव्ट्रांन'ळा
आव्हान
केल.
अमलात
अशा दुहेरी
कार्मीत स[पडल्यान लाईंड जाज व क्केमंकळो याची फार त्रेया
उडखी.
इटलळो व प्रेसिर्डेट
विल्सन यांच्यामध्ये स्वडाज'गी
उडण्याचा प्रतंग आला. इटली व ड्रुगोंस्लाविहृयामघ्र्ये समैंट
उत्पन्न झाला. पासिकर्ने, सर्विहयाला बॉस्निया प्रांत [’मेळाया
अशी खटपट चाछु केला; पण सर्विहयाचा अमेरिकेतील पर’
राष्ट्रमंत्रो मिहज्लाढिहक यामें प्रांतिक व अमेरिका यामधील
पत्रव्यवहार दाबून टेवल्यानें त्याला त्याच्या जागेवरून हांकून
लावण्यात आलें. इंग्ल्ट्रङमर्थांल ज[व्हानोंविहक या परराव्टू
व्हावा या ड्च्दृड्रेनॅ पुष्कळ उपसचना शांततप्पळिरपदेंत आल्या
मेत्र्यान बुगोस्लाव्दैवयातंवर्यांचो एक याचना तयार केला व
प्राप्त झाला शवर्टी
त्या याजनैला व[ल्फीरनॅ समात
दिली.
अशा प्रकारची चमत्कारिक
पदेच्या सुव्वखीमूर्वीचो होता.
३८
या[टक समुद्रांसबॅपृळोचा प्रश्न यावर तर भयकर
रर्णे माजली.
डी. अवझियो यान पुंड्रुम बेद्र आपल्या ताब्यात घेतले व
याला दोस्तराट्रांच्या सन्यानळोप्’हें विरोध केला न[हा. यामुळे
विल्सन व दोस्तराछू याच्यामय्या’द्दे बेबनाव होण्याचा प्रसग
डे’[
ट्रॅ[वक
यान
स्वत; च
इटाप्लयन
पण प[[’सैकल[ तें
मान्य न झाल्यामुळे ज[व्हप्नगैहैइक याला राजीनामा
लागला.
पण त्याचा फारसा उपयोंग आला नाही फ्यूम बॅंद्र वअ[[डू‘…
स्थिति
प्रघानार्शी या प्रश्नातं’वघानं स्वल करण्यावै टरावल. या व|ट[‘
द्यावा ` पाठीत क[ह“[ तरी निष्पन्न हळोहैल अशीं चिन्र्डे [देंवृं लागलो
शांततापरि’
होतो. पण डॉ. अनंझियळो यार्ने ड[लमेटियावर खारी केल्या-
प् मुळे या व[ट[थ[ट“[ला व[ट[ण्याच्या अक्षता मिळण्याना रंग<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "वबुत्स महाराट्रीयनांनकळोश. (ज)२९६ दिट्रे लागला. पण अमेरिकन सैन्य व आरमार ड[लमेटि' लुंजुत्सु चालल गेला असतां त्याला चीनमवळोल ‘ व[विंत्सग ’चा खेंळ पहावयास मिंलाला. या खेळाचे तान त..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>वबुत्स
महाराट्रीयनांनकळोश. (ज)२९६
दिट्रे लागला. पण अमेरिकन सैन्य व आरमार ड[लमेटि'
लुंजुत्सु
चालल
गेला असतां त्याला चीनमवळोल ‘ व[विंत्सग ’चा खेंळ पहावयास मिंलाला. या खेळाचे तान त्यार्ने सपांद्न केर्के चजप[न॰
न[हो. इकडे खुद्द इटलळोर्तांह नवीन प्रथानमंङळ अधिकारासढ झाल्यामुळे, व[तावरण निंवळत चालल होते. विल्सनच्या
मध्ये त्यार्ने तो खेळ प्रचारात आणला पण ह[ रॅवळ बिशष
लोकप्रिय न झाल्यामुळे त्यात चऱ्याच सुधारणा केल्या व
सत्तेला ग्रहण लागत चालल होते. त्यम्युळें इटप्लळोला पुन्हां
आशा उत्पन्न होऊन त्यार्ने डुगोस्लाव्हच्या प्रातेंप्’नेघांशळी
पुन्हां व[लणें सुङ केर्ले व शैवर्दी या भांडणाचा कनावता
निकाल रॅपॅलोच्या तहान लागला. या तहप्न्वर्ये इटलीला
बुगळोस्लाव्ह राट्रांचील वराच माय मिळाला. ड[लमेटिया’
वरील आपला हक्क इटलीने सोडून दिला. पण या तहप्न्वथे
त्याला जुजुत्पु हें न[व [`द्`ल.
जुजुत्पु ॰खलाचै मुख्य तत्व म्हणने आपल्यापैक्षां आ’घेक
भारळो अशा गडयाशीं नमते घेतल्यासाररर्ते दाखवून नंतर
"ना’घे साधून त्याला चीत करणें है होय. या खेळांत शजीचा
बुगोंस्लाव्हच्या व इटलीच्या राज्याच्या हट्ळो ठरविण्याच्या-
यळोग करावयाचा नसतळो. त[त्पयै ह[ खेळ केवळ यु’क्तींच्या
याच्या भागांत असल्यामुळें डॉ. अनंझियाचँ क[ह“[
वेळीं पुन्हां चित्रे ये'ऊ लागलो पण शवटों त[ळिह कशोयर्शी
मिंटविण्यात आला.
अशा रातज्नें नुगोस्लाव्इ राज्याची स्थापना झालो. पण
अतस्थ घटनेचे मोंठें काथे जुगौस्लछिहयापुर्डे होते. खुद्द या
राष्टांतच, रा‘डेकल च डेमोक्रॅटिक असे दोन पक्ष होते; व
त्याची एकपेर्फाविपया द्वेपबुद्धि होतो, त्यामुळें बुगळोस्ला’
विहयाची नचीन घटना करण्याचे काम द्रुष्कर होऊन
विद्देळाषना उपयोग करावयाचा नसतो व एवढ्यळामुळें ह[ खेळ
कुंस्तळीपेंक्षां निराळा आहे. या खेळांत हत्यारांचा क[ह”[हि उप’
जोरावर खेलावयाचा असझ्ळो. आपल्या प्रतिस्पघ्याँल.’ हुलका’
वण्या देऊन, त्याच्यार्शी नमतें वैतल्यासारखे
दाखवून
तो
गाफळोल झाला अह्ळा पह[त[च त्याच्या मर्मंस्यानों अचूक व[व
पाळून त्याला चींत करावयाचा ह[ या खेळांत मुख्य उद्देश
असतो. प्रतिस्पघ्यन्ची कळोणफॉंणर्ती ममैस्थानॅ आहेत यार्वे
पूर्ण ज्ञान क्रुनुत्तू `खळण[ऱ्या माणसाला असावे लागतें.
वसत्ऱ्ञ्.
प्रत्तिस्फ्च्यार्चे ह’ड मेंग्र्डण, त्याच्या शरळीरातळोल शार दाबून
तात्पुरती राज्यघटना
द्ळोन्हळो पक्षांचे सार'
त्याला निकेप्प्ट करणें, व तो चीत आल्यावर नंतर त्याला
न्ह[ क्षुडूंइवर आणर्णे इत्यादि प्रकार या खेळांत ङमेशा
खेंच प्रातैनिघळी होते, त्यामुळे प्रत्येक प्रश्नावर द्रुफळी माने.
चढून येतात. अलीकडे तर या खेळाचे शास्रोय पद्वतळीर्ने
शेवटी मासिक यार्ते तटस्थ पक्षांशॉ एफाँ करुन, नवीन
राज्यघटनेंर्वे विल मजूर करून घेतले, सविंहयाच्या राजार्वे
या वाद्याचा निकाल लागे तों वी
आखण्यात आलाहोतां त[त वरळोल
या वटतेंप्रमाणें घालण्याची शपथ घेतला; व विरोघी वड-
अध्ययन करण्यात येऊं लागले आहे व मनुष्याची ममँस्थांळेने ’
किर्ती व कोणती आहेत याचे ज्ञान ड्रुसुंत्पु शिकणाऱ्या विद्या…
थ्र्योस देण्यात येऊं लागले आहे. या खँलाचे शिक्षण देणाऱ्या
खळोर पक्षाला यिरडून टाकण्याचा बेत केला. पण अशा
शाळा जपानमध्ये पुष्कळ आहेत. पण त्यामध्ये सव’रँत प्रमुख
तऱ्हेंर्वे पक्षभेद् व कलहांचा सुकाळ, मुगोंस्लाठिहयाच्या राजकारणांत मानला असतांना, इतर दृष्टळोनों मात्र बुगोंस्लाविहयाची अ[स्`ऱ्[ पुथारणा होत चालला होती. पुदैशर्ते परराट्रोय
तंल्था म्हणजे प्रो. कनो याची होय. हळो सेस्या टोंकिओमध्ये
सकाशितयाचळी या भागांत आह. याच शहृरॉ, झिमोंटोंमीशक येथे या खेळांची मला मोंठो व्यायाम शाळा आहे. या
थॉरणावर मान्न सर्व पक्षांचे पूर्ण ऐक्य होते. १९२१
दोन्हळी ठिकाणी या खेळाचे शिक्षण दिल जातें.
प्रचीण आल्यास त्यास पदची दिला जाते.
दुप्गोस्लाळाठहयाडे प्रयत्न रक्कांतळोल
त[ला
निरक्षरता न[हॉशॉ कर'
ण्याकडे, व खाणी व शतकळो या प्रश्नांकडे लागत्ऱ्ऽ होतें.
[ सद्मैंप्रथ.-अ[र,
चव्ल्यू तेटननॅटसन-दि
या खेळांत
॰
या स्वलार्वे तात्पुरते जरी ज्ञान आले तरी त्याच्या योगनि
सहन
स्लाठाह कँश्वन( १९११ ); टेलर-दि फ्ग्रूचर अळीफ ,दि
स्लाव्हज( १९१६ ); क्रकआँडूस अँड स्लोव्द्देनव्ज र्फेड्स
आप) दि एंळिटर्ट[( १९१९ ); [दे सदर्न स्लाव्ह लायवरा;
छुजळो व्हळाज्नोढिहक-डालमेटिंया ( १९२० ); [सेसिलळिहस्टरी आँफ फ्यूम ( १९१९ )]
तुबुव्ठु-जपळानमथांल एका प्रसिद्ध खलाला जुजुत्पु
हें नाव आहे. ह[ खेळ नपानमघ्र्मे फारच लोकप्रिय आहे.
या खेळाच्या उत्त्पत्तांविपर्यो निरा’तेंराळी मते प्रसिद्ध आहेत.
आपल्यापेक्षा सलमान गङयाला सहज
चकविता
येतें. या
खेंळापातून अनेक फायदे होतात. आत्मसरक्षण कर्ते करावें,
शरीराचा तळोल सभाळून, पद्वतशळोर रीतीने शत्रूला कर्ते
चळीत करावें, या गोष्ठी या खेंळ[प[घून शिकता येतात. पूर्वी हा
रँवळ
सरदार
घराण्यातील
खालच्या वर्नोतळोल लोकांना
हे सरदार
नये यासठीं
लोफांतच
प्रचलित
असे
व
या रँवलाचें ज्ञान होऊ
लोक फार खबरदारी घेत
असत. पण सरदारशाहोचे युग संपल्यानंतर हा खेळ सर्वे
प्रकारचे लोक
खैकु" लागले. जपग्नांतोंल स्नियापघ्र्येद्दि ह[
हा खेळ देवट्वदिर्फामघ्में प्रचा’लत असून तेव्ह[प[घून जपान-
रॅवळ प्रचलित आहे. परकळो लोकांची विद्देप्पस: इंग्लिश व अने’
मध्ये आजतागायत तो चालत
[ऐकत लोकनिव् या खेळाचे अध्ययन चालविर्ले आहे पण
आला आहे
असे
काहींचे
म्हणणे आहे. पुमारॅ तीन शतफांपूवरँमाड्रुन हो खँळ फार
त्यात त्यांना यश यार्वे ळिततंक आर्ले न[हळो.
लोकप्रिय झाला असे म्हणण्यात हरकत न[हरै.
[ सद्र्भ प्रथ‘टेरां-णींप्इड टु दि बॅंपचीज एम्पायर;
वैवर्केन’थिग्स बँपनळोज; प्र`[. हॅरिसन-महिने जपान; अळोहर्ता-
द्दिरटों येथे
राहणारा अकळीयाया शिरौची हा विद्वान वैद्य चीनमध्ये<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "डुझोग्तेया ब्राह्मण महाराषीयष्ठानकॉँश ( अ) २९७ जें‘पनींन [’फेजिंकल कल्चर ( १९०४); के. लेंटहू’जुजुत्त ट्रिक्स (१९०५) ; आयाव्हग हॅनळोक-दि कॅप्लाट केना जुबुत्पु ( १९॰५ ).] बुक्कोवैया ब्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>डुझोग्तेया ब्राह्मण
महाराषीयष्ठानकॉँश ( अ) २९७
जें‘पनींन [’फेजिंकल कल्चर ( १९०४); के. लेंटहू’जुजुत्त
ट्रिक्स (१९०५) ; आयाव्हग हॅनळोक-दि कॅप्लाट केना जुबुत्पु
( १९॰५ ).]
बुक्कोवैया ब्रप्ह्मण-सेयुक्तप्रछ्येतोल
एक
लहान
ड्रनागड
२०° ४४’ ते २१ ° ९३’ व पूवे रेखांश …. ° ॰’ ते
७२ " ’याच्या दरम्यान असन याच क्षेत्रफळ ३३३६हें
चरिस'र्थंमल व उत्त्पन्न ५० लाख आहे. याच्या उत्तरेस हलार
सस्यान व पश्विम असणं दक्षिणेस अरया समुद्र आहे. या सस्था-
जात. पुंदेलखङ व त्या नजळोकचा भाग याला युघवतळो असे
न[त गिरनार, दातार, लासरैपावडों वगैरे पवैत असून त्यांसग्ल
न[व असल्यार्वे समजते. विष्णुथर्मंपुराणांत ( १ ) र्विप्यादि
गरिखनाथ न[वप्र्वे शिखर पुमारॅ ३६६६ फूट ( समुद्रसपाटी-
व यमुना आणि (२) नमैदा यामधील प्रांतात “मुघदेश” हे
प[सन) उंच आहे. सादर, द्दिरान, मच्द्येद्र्ळो, वेराचळ आणि
नाव दिलेले आहे.
सरस्वता या नद्या यातून वहात आहेत. या सस्थाना'त ५००
ह्या प्रांतात “ जुशळोनिया ” हो जात
आढळत बुशल्लारींग नावाच्या एका डुन्या पुंदेलखङच्या [ वी. म. क्षत्रफलाच गळोर ज[व[र्वे
दाट बेगल असून या
राजनि यमुनेच्या उत्तर प्रांतातून ( कनोजिआ) हें लोक जेगलातोल काहा भाग ड[गराळ आहे. तथापि र्फाहृळो भाग
बोलावून त्यांना हें न[व दिल अहैंप् श्रांनगर येथें जातां… फारच सखल आहे. साऱ्या
दिंद्रुस्थागांत याच जेगलात
सवंची भरलेल्या समेवै मत आहे. तथापि कनोजिया ब्राह्मण लिंह अच्चापळोळिह आढळतात. हवा साधारण वरळी आहे; तथापि,
याच्या ह[तची पक्की रस॰इ खात न[होत [ क्रुक;सते [रे …]
बुडा-जुडा ह[ प्राचीन पँलैस्टप्हैनवा जिल्हा, इस्रायल
राज्याच्या दक्षिणेस मृतसमुद्र् व फिळिरटाइन मैदान पांमच्र्धे आहे. याचे त[न स्वाभाविक भाग हळोतात. डोंगराळ
’ गिरनार फ्वेतस्किऱळीज इतरत्र एप्रिलपांहूंन हूंऱनप’यैत कडक
उन्हाळी असतो. पावसाची
दरवषोची सरासरी ४० इंचा.
पासुन ४५ इंचांफ्र्मेंत आहे' लैत्थांनचौ लौ- से॰ ( १९२१ )
४६५४९३ आहे, लॉकसँग्ठुर्वेत व्ग्कडा ८२ हिंदू व बाफॉंने
प्रदेश, निम्न प्रदेश व निबेन प्रदेश. हेयानच्या मौवतालचा
मुपुलमान आहेत. येथे तलाव वरेंच
भाग अत्यंत सुपकुक आहे. हुंडा देशाचा प्राचीन इतिहास
जुनागढ येथे बांधलेला मोंहो तलाव सव॰[त मोठा आहे. गळोर
उपलब्ध वाहू”:
बेगलाताल
प्नप्नॉन द्दिवु राक्सतैच्या
वेळी
जुडा
व
असून
सरदारखानार्ते
गवतामुळें गुरांच्या चाऱ्याची सोय वत्ळीच होते.
इस्रायल यांमहैंय वैर होते. इ. स. पूर्वी ५ व्या शतका-
चित्ते, इरळोण, त[बर, लाडगें, नळोलयाय, व[नर व सिइ या
पासून यहुदळी च सँमारिंटन लोफांमघ्याहे विरळोघ होता. सुमें’
जंगलात आहेत; नाव व
ळिरयाचा ऱ्ह[स (इ. स. पू. ७२२)वजेस्सलेमन[ न[श ( इ. स.
पूर्वी ५८६ ) यांमधील
काळ
अस्वल आढळत
न[हाँत , सिहोस
तिकडे सावज असे म्हणतात्ना इ॰ स, १४०२ फ्यैत वुनागड
शांततेचा व निकट` स्नहाचा
सस्यानावर चुडम्’सम न[वप्चें रजपुत राजें राज्य करळीत होते.
मला असावा असा तर्क चालतो. पथिंमकडचे फिळिस्टाइन,
त्यापूर्वी अहमदाजादचा पुलतान महमुद वेगडा यार्ने तें राज्य
पूर्वेवे म[अ[व,॰एडम व उत्तर अरवस्तानापातून न[हैंल
नदळोच्या मुखाप'यत राहणाऱ्या लोर्फामु'व्‘व् पुलाच्या इतिहोसा'
जिंकले. अकबराच्या कारकळीर्दा’त तें राज्य दिळळीपातशादीच्या
अमलाखालॉ आर्ले. त्यावेळी गुचराथच्या सुभेदार’चा प्रत्यक्ष
[॥ पुष्फळसा परिणाम झाला.
स्मिस्तोंममेस्थापनैच्या वेळेला
अंमल त्यावर चालत असे. इ. स.
१७३५ च्या मुमारात
येंर्थे वरळोच थामहूंम सुरु होती. ३. स. ७० ’त जैसृसळेमनरोवरच जुडावा त्रास झाला.
मोंगलाचो गुजरायवरळील सत्ता न[हग्शळी झाली व त्याचवेळी
शरखान व[ची नावाच्या साहसी पुरुषाने मोगल सुभेदारास
हद्दपारळोवतर यहुदळो लोक येथे इराणी, ग्रीक व रोमन सत्ते,
व[बो घराण्याची मुळपुरन्प वहादुरखान हळोता. शहाज्ञद्दानच्या
खालो
रहात असत. कथॉ कघी सवन्व पश्विम पँलैस्टाईंनला
कारकीर्दीत तों पुढें आला. पुढे १७०५ मध्यै' द्क्षि’मफांठें-
हा शब्द लार्वात असत. हेराङच्या मृत्यून'तर आक‘लास हा
हुमेरियप्इडुमिंया व जुडिया याचा पुभेदार वनला. ह[
व[र्डात मराठ्यांची धुमाकूळ घातला तेव्हां सफदरवावो यास
र्दिक्कीढून वदळोवस्तास पाव्निलैं. पण धनाजी जाथवानें त्याचा
पदच्युत झाल्यानंतर डुर्डि'या ह[ प्रांत सिरियाला जोडला
धुव्वा उडविज्या सफद्त्-न्व् पुढें पाटणवो सुभेदारी मिळविला
गेला. यावर एका प्रत्तिनिघीचळो सत्ता असून तों घिहेगेंरयप्ति
रहात अर्ते.
जुतौघ-पेजाव इलाखा. सिमश निल्द्यांतोल हळो एक
डोंगरी लावणी निमल्याच्या पश्चिमटळोकापप्सव सुमारे १
( १७०६ ). त्यानें निझामुल्मुळुकास साहाय्य केल्यामें त्याची
सत्ता जास्त वाटला. यानतर ( १७२२ ) निजाम व हमळोढ्.
खान याच्या झगक्का'प्त व[चीर्ते आपला सत्ता वळकम्’: केली,
स. १७२८…२९ त ड्रुनागडवा असद्अल्लळो ह[ मला. व्यानॅ
मैलावर आहे… उत्तर अक्षांश ३१’७’ व पूर्व रेखांश ७७" ७’.
विरमगांवचा तलावतमहेमदनावळो यास आपलो इस्टॅट दिला.
१८८३ साला हा जपान पतिआळच्या
राजापालून घेतला.
सलाक्तवा मुलगा शैरखान
उन्हाळ्यात
येते.
असे. गप्यकनाडानें त्याची गौघा जहागीर
नुडोंश्रा-दश्चिण पॅठेस्ठाद्देनच्या भागाला हे नाव होते.
कांहीं
न्य येथें ठेवण्यात
लोकसंख्या
व[कॄन लावून, गुजरथिव
आपला अंमळ सुख केला. या
बाबी होय, हा मराठ्यांविल्द्ध
यावेळी
काचीन
( १९०१ ) ३७५.
केलो व त्याचा पराभव केला. त्याची राजथाची नालस्निनळोर
जुनागढ, ते त्या न…हें ॰मुवईं इलास्व्र्योमघोल कठि- [ होतळो. गेरखानाना पुत्र सलावतखान याने आपल्या वडील
वाड
पोर्लिंढिफल
एजन्तोंर्वांल एक
सस्यान उत्तर अक्षांश [ पुत्रास ड्रुनागङचा राजा
चनवित्ऱ्ऽ व धाकट्या मुलास द्तऱ<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "क्रुनागड महाराट्रीयशांनकोंश॰(ज)२९८ जमोनळो दिल्या. इ. स. १८०७ मध्ये प्रथमत: जुनागडच्या राजाचा व ल्फिच्चि सवय झाला. येर्थाल सस्थातिकास नवाव हा किताब असून ११ तोफांच्या सलामळोचा म..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>क्रुनागड
महाराट्रीयशांनकोंश॰(ज)२९८
जमोनळो दिल्या. इ. स. १८०७ मध्ये प्रथमत: जुनागडच्या
राजाचा व ल्फिच्चि सवय झाला. येर्थाल सस्थातिकास
नवाव हा किताब असून ११ तोफांच्या
सलामळोचा
मान
[ पैकळो जुनागचची म्युनिसव्पाळिटी सर्वात मोठी असून तिचें
[ उत्पन्न सुमॉर १८॰॰॰ रुपये आहे. सन्प’नात शभराची
[ इंपांरियल सा’र्हेहस भालाइताचीं एक तुकडी स् .‘हे.
आहे. यास मुसलमानी कायद्याप्रमाणें दत्तक वगैरे येण्याची ऱ्
सनद मिळालेला आहे, हृक्कीचा नवाव
… `!
श इ र"…इळी जुनागढ सस्थानची राजधानी असून उ.
हा येथील राजघरा- हेंअ, २१ ॰ द्गें’व पूर्वे रॅ. ७० ° ३६’
ण्यातील ( सूळमुरुपापालून ) नववा पुरुष अघून त्यार्वे नांव
याच्या दरम्यान
व
` राजकळोटच्या नैवईंत्यैस ६" मैलावर आहे. याची लोकसरह्या
द्दिञ हायन`स महवतखान असें’ आहे. याचा जन्म १९०० , ३५ हजारापयेंत आहे. शहरात उपरकीट नावाचा एक भाग
मध्ये होऊन १९११ मध्ये ह[ग[द"[वर आला. गिरनार ` आहे, त्यामध्ये, त्याच्या खदफांत व त्याच्या आसपास सर्वत्र
पर्वतावर जैन देंवळें आहेत. याशिवाय वेरावळ बंदर व ‘ डुची बुद्धाच्या वेळची लेणी आहेत. सुलतान महंमद बेगडा
सौमनाथावै पडके देवालय याच सस्यान[त आहे.
यार्ते व[घलेलो एक मशीद येथे असुन जवळच एक १७
सस्थानात निराहैत जमव्चीच्या …टु जमीन व[याइतौ फूट लांब व ७ हेंऱ् फूट परियाची मोठी तोफ पडलेला आहे.
आहे. एकदरळोत जमोव डोंगराळ अळिहसमुदापावून अगदळी उपरकळोट (जुना किल्ला ) हें प्राचीन डुनागउ होय, पूर्वी यास
पुष्कळ वेळी वेढा पडलेला आहे. अशा वेळी ड्रुना'ग'डवै राबे
मिरनारच्या किळयात आश्रय घेत असत. हळोच्या नवीन
पयत पसरठेलो वराल प्रकारचा जमोन सवात [पकाऊ ' जुनागडास मुस्तफावाद हे नांव आहे. हे गांव गिंरना’र व
आहे; तिला न[घरे म्हणतात; तोंत ऊस बांगला पिकता. हुं दातार टेकड्यांच्या पायथ्याशी आहे. हे शहर पद्द्यण्यासारम्टुंव
चौरवच, जुनागङ व माळिलया येथळोल अ'ळाबै उत्तम आहेत
अड्रुन ऐतिहासिक व प्रळाचीनावसेंप'ळिच्या दृष्टीने त्यास वरेंच
कापूस,
ज्वारी, गहूं. तांदूळ, गळिताची धान्य, ऊस,
महत्त्व आहे. इला येथे पुष्कळ ‘मुदर इमारतळो व[[घंल्या
तंवाखु, कडधान्य वगैरे [पकँ येथे होतात वराचसा कापूस आहेत. अशीकावा ( थमोज्ञांचा ) प्रख्यात शिलालेख
बॅरावळढून पुंवईंस रवाना होता. सागवान, शिसव, अबु
र्थंथेंच निरनार टेकडीच्या पायथ्याशी पुरळिक्षत ज[गॉ आहे.
नचीकच्या सखल भागांत घेर नावाची एक प्रकाराची जर्मांन
अतनद्दि त[त हलके र्षांक काढतात माघवपूरते
ऊना-
गिरनार र्टेकदृळो हो जैन, वैष्णव, रेळाव, वगैरे सत्रे पयांच्या
द्दिदूंस पूज्य आहे.[ झी. गेंट्टेर. पु. १४;चबॅंस-…अँटिक्विटोज
व[भुळ वगैरे आड येथे होतात इमारतीच्या लाकबांचा पुर…
वठा फार नसल्यामुळे ते मलवाराबून बरेच
इकडे येउ.
किनाऱ्यावर लहप्न मोर्दो गलवतें लागण्यानोगॉ पुष्कळ
[ अप्फ
कच्छ अड
कप्ठेंपींड;
टाईम्स…झेडयन
इयट्वुक,
१९२२.]
जुनापप्ण्ग्’रे-मध्यप्रांतजागपूर ळिजल्हाव तहशील. न[गधाराय. साल वगरे केंद्रे आहेत. त्यात बेरावळ मुख्य असन , पूरच्या पश्चिमेस ७ मैलावर हे लहळानर्ते रेवर्डेगांव अलून या
येथूनच सारट व काठेंवाउन् या दाट्रेय् पकडोंल भागात धान्य, गांवाच्या आसपास दगडी वर्तुळ पुष्कळ आहेत. दगड फार
बंदरे आहेत.
भेरायखाडी व सळील
या
ठिकाणी
मौतों
र्पोवळी सापडतात. वेरावळ, म[गरे[ळ, भेराय, नर्वे बेट्ऱ
इमारतळो लाकूड वगैरे माल ज[तळो. मो‘टखात्याची सळोय सत्या०
मावनगर-गोंडळ-
की आपली स्वत:ची केलेला आहे
जुनागद्द-पोरव'दर हो रेल्वे या सस्यानांलून गेली आहे.
जुनागढ संस्थान काठेंवार्डातोल सस्थानाव पहिल्या प्रतव्र्वे
मानल आहे;ग[यकव[ड व ब्रिटिश सरकारास मिळुन सालाना
(अनुक्रम ३७२१ +२८३९४=रु॰)६प्‘ ६०४ रुपये खङणा `
मोठमोठे नसतात. पूर्वी गुरे राखणाऱ्या जातो
[’ठेंकार्णी भटकत
रहइण्याच्या जागा असाव्या असा किंऱ्येकांचा समज आहे.
कर्यां कघी या दगद्वाखखी लौखची खिळे व फांहो हत्यारे
सापडतात.
जुनापप्ट्र-पुंवद्दे इलाखा.
या सस्थानास द्यावा लागते. तथा[प काठेंवाडांतील निरनि’ . छोटे सस्'यान. हा
षे
.
राळ्या छोठ्या सस्थानिकाकढून ज[रतलची (खउणळी ) या . णेस त[न मलावर
न[वाखखी जुनागउच्या नवावास ९२४२१ रुपये सालाना
आहे. त[ळुकदार
मिळतात ही रक्कम काठेंवाउ पोळि’ळिटकल एनन्स्रोतळोल [प्रे’ग्टश
डुरनप्-एक
फांमगाऱ वसूल करुन
निरनिराळ्या
असत. त्यावेळच्या त्या लोकाच्या या
काठियावाडांर्ताल एक
तालुका चळोक ठाण्यात, वोकच्या द्राक्ष.
॰ळं
,
आहे यात जुनापादर ह एकच गाव
खगसयाकाळी आहेत.
प्रमुख रामन व
लाटन देवता.
हो
देची
[रवयाच प्रधान उपांत्य दैवत समजला जाते. ह[ सॅटनळीची
मुसुलमाना आघराज्याची हा एक दूवण [शल्लक राहिला ऽ मुलगी, जोव्होची भगिनी व माया हळोय. प्ळूटळो, नेपचुन इ.
आहे. सल्थानची स्वतम्ची टांकसाळ अटून त[त पाउललैं तिची मावर्दे होत. ज[व्ह हा तिच्या रुपार्ने मोळिहत होऊन
नवावास
पावती
करतात
न[ण सस्यानांत चालत. कोरा व अथकारा ही गाणी
असन त्यांना दिवाणशाहँ म्हणतात
पूवान्या
चालू
एक काराच वजन १२
एके दिवशी
त्याने मोठे” वादळ
उत्त्पन्न केले. थंडी पडल्या’
मुळे ’प्’जकडे तिकडे गम्रठा पडला. अशा प्रसगॉ कोंफिलम्ग्ऱ्प्
बाल ( ७॥ व[ल बांदा व व[का त[दें ) असतें. त[व्याच्या
चाल गाण्याला दळोउका प्इणतात; चाळीस दे[उक्याचीं एक
रुप घेऊन जूनोंजवळ जळोठह कुङक्रुङत गेला. तिला
त्याची
वरिल.
त्यास॰
कोरा होय. या सस्यानांत अठरावर म्युनतिपाप्ळेंटपा आहेत;
ररँन त्याने मूळ खप धारण करून हिच्याशी लग्न लावण्याचे
दया आला व तिने त्यास उचलून उराशी<noinclude></noinclude>
3dqcmy0vc3sa9bavx5f3lrdka853qdu
पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१२६
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "वचन देऊन आपला ळुन्नर महाराष्ट्रळीयज्ञानकोश॰(ज्ञ)२९९ बुनरेवा समागमेच्छा पूण्ळी केलळो. लप्रसमार’ शहर.-जुन्नर न्. ताछुफ्यार्वे ठाणे. हे गांव कुकडी भास पुर, नर, पगु. पक्षी इत्याद..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>वचन देऊन आपला
ळुन्नर
महाराष्ट्रळीयज्ञानकोश॰(ज्ञ)२९९
बुनरेवा
समागमेच्छा पूण्ळी केलळो. लप्रसमार’
शहर.-जुन्नर
न्.
ताछुफ्यार्वे ठाणे.
हे गांव
कुकडी
भास पुर, नर, पगु. पक्षी इत्यादि सवे हजर होते. याप्रमाणे . नदीच्या दक्षिण थडॉवर वसलेले असून पूणें गिल्ह्यांत पुण्याचे
हुनळो हो देवांची राणी झालो. परंतु न[व्होवे चाके तिला ’ उत्तरेस ५६ `मैलावर एका सपाट खोऱ्यात वसलेले आहे.
आवडत नसत. त्याला दुसऱ्या स्नियाच्याठिकार्णी सतनि ग[व[च्य[ आसपास व[गवगव्चे बरेच आहेत. ग[व[त्[[ल फांहो
होई, यावा तिला राग येत असे व तो तां त्या सततौवर
जुनाट थङगों व मशीबळी पुराणवस्तुखात्याच्या देखरेखीखालो
काढीत असे. हक्ट्रेलास ट्रायमयून परत येतांना जळोव्होला
आहेत. हें गाव लोलिवराज कबांच्या जन्माचे ठिकाण आहे.
ग[व[च्या दक्षिगैस च नैवहँत्येस मानमोड डोंगर, पश्विमेंस
निप्द्रेत कलन जुनोंतें मोठें वादळ उत्पन्न करुन त्याच्या
मागोंत विघ्न उत्पन्न केले होते. हे जळोव्होला कळताच त्याने शिवनेराचा डोंगर आणि उत्तरेस होटकेश्वर व गणेश हे
मानमळोउ डोंगरात आच्बका, भीमाशंकर
तिचे पाय ऎरर्णांर्शी व[घुन ठावल.
"" व्हल्कनार्ने तिला साहाय्य ` डोंगर आहेत.
व हूंतळिग अशी त’ग्न वळीद्ध लेणी अळिहत. शिवनेराच्या
वायव्येस तुळजा दुंकडंया व तुळजा नावाची लेणां‘ आहेत.
त्याच्या उत्तरेत क्रुकडोंचे खोरे असुन त्याच्याळिह पलीकडे
केले म्हणुन त्यामें त्यालाद्दि स्वगोंतून खालो डोंके वर पाय
करून फॅकून दिले. यामुळे ड्रुरनळो जास्त चिङलळो व जोव्होस
पदच्युत करण्याचा [”त’ऱ्र कट केला.
तिला माहँ, हिची,
वगैरे अपत्ये आला. मिंनव्हो ह…”[स वोव्होनें आपल्या मस्त’ वायव्येस महारखोर आहे.
महोरखोऱ्याच्या
पूर्वेस ह[ट`कश्वरा=॰,[ उंच डोंगर व
क[त^[ल मगबांलून बेव्हां उत्पन्न केले तेव्हां या चमत्काराच्या श्
ज[डॉला तिने ठइल्कन यास एक वनस्पति दुंगून निमोण केले. त्याच्या पुर्वेस अगदी लगतच नवरा-चक्राची टेकडी आहे.
आग्रॅर्यांकउळोल डोंगरात मुलेमान किंवा गणेश डोंगर म्हणतात.
हवर्मुछिसला ज[व्इनि तिच्या
ड्रुमों निद्रित असता
स्तवाशी लाविले. त्यावेळेस तिच्या स्तनांवूव स्वर्मोत दुव्याचा येथें एक गणपतळोचे देऊळ आहे. दक्षिणेस मुळवऱ्पासारखा
उन पवेत अतूट तेथे पव्रशाहृदावल याची कबर
स्राव आलाद्रुग्वाच्या रंगाचा जो तारकापय आकाशी दिसतो
व ज्यास आपण आकाशगंगा म्हणतों व इतर द्रुग्वमय पथ
जुन्नर येथे प्रवाइयास उतरण्याची सोय व सुची ज[ग[
म्हणते व[रायावडों होय. येथील लौ ते, दहा दृजांरांक्रॅ
अड्रुन त्यापेंकळो आठ हजार लोक [हेंढू अछ्हतद्दिहूंच्या खालो-
य्हणतात तो या स्तन्यापासन उत्पन्न झाला अशी समनृत
आहे. डुनोंचे वगैन रे[मन लोकांना केलेले आहे तेंफार
सत्य आहे. तो पुवर्णसिहोसनावर वसलेला आहे, हाची सुवण्ळी
राजद'ङ मरलेला आहे, त्यावर कळोफिल वसलेला आहे,
मार्गे इळिरस आपल्या इइघ्रतुव्याचे रंग पाङळीत आहे, पळार्धी
खाल मुसलमानाची लोकसरव्या आहे.
आहे. ड्रुन्नर हा गांव न[णेंघांटणिवळ
व ड्रुमोला
[देंलॅ
न[हो.
होता. निदान [देव, पू. पाहेंल्या शतकापावून ह्या गांवास हें
व्यापारळो महत्त्व आले असावे अहे वाटते.
याच
न[र्णेवाटप्च्या मागरँनें कन्कणांतूव त[ढूळ, व[जरळो, नारळ,
गोष्टीत ट्रांजनयुद्वार्वे मुळ आहे. [ लेप्रिरे-क्कासिकल [उवशा
बरा; हवालदार…इळियङ. ]
चीव् वगैरे माल येथे येतो. तसच पितळी भांडी, धान्य,
तेल, वगैरे माल येथें आयात होती.
येथे कागद, पामोथ्ळो, ळुगडॉ, कांबळी तयार करिंतात.
शूव’क्रुपालून डुन्नरळोकागद प्रख्यात आहे. येर्यांल कागद
पुण्यास, सळोलापुरास व 'सस्यानातून (सावकारळो द्रुकानातून)
वापरला जातो. गांवास म्युनिळिसपाप्‘लेटों आहे. गांवांत
हुनोंन[…-॰मघ्वप्र[त. बांदा जिल्हा. व[वध्च्या पूर्वेस ,
मैलावर हें एक रमतवारळो रेवरंइ अड्रुन या ठिकाणी
एक
हुदर तळ आहे. त्या तळाच्या काठावर एका
प्राचीन राजवाढ्याचे अवशेष अहूंन _ह[ राजवाडा हुंरा‘डेया
र[मशहृ[`न( इ. स. १५९७-१६२२ ) यायला अतें म्हण-
त[त.राजव[डयाच्या पिछाडॉस
पाण्याचा
एक बार मैल लाचीच्या
असून
एकंदर
वलूल २
ह्या कोरडी निरळोगॉ आहे. दरसाल पावसाचे“
आहे.
श्री. सवाईंमाघवरावाच्या
लाख १५
मान ३० इंच
काहोसा कुकडी
नदळीपाहूंन व का'ह’न्सा
असलेल्या दोन
विंळा’हेरॉपांवून होतो.
हा त[छुका मिना च कुकडी खोऱ्यात हें
वसलेला असून तो पश्चिमेकडे डोंगराळ होत गेला आहे.
पूवे’कडळोल जमीन सुपीक असुन मुख्य पाक व[जरळोइर आहे.
पुरवठा
व[रावावडीपावून व शिवचेरच्या पायथ्याशी
[भेतोंच्या क[ह॰[ खुणा दिसतात. अलोकडे वरळोल तळ्याच!
उपयोग पाटऱ्वधाऱ्याकडे करतात.
जुन्नर, सा ळु का.…जुन्नर तालुक्याचे क्षेत्रफळ ५९१
चौ. ये. असून तो. ते. १ लक्ष २ ० हजारापर्येत आहे.त्यात २
गार्वे व १५८ रेवडॉ
हजारापयेत आहे.
ग[व[भ॰[वत॰[ कोट
वसलेला असल्या॰
कारणार्ने व्यापारऱ्’दृष्टांर्ने हा गांव पूर्वी मोठया भरभरादीवा
मयूर वसला आहे. इत्यादि. डोंदयहुंवद्दल लावलेले बक्षीस
पारिसार्ने व्हृळोनरप्ला दिले
आहे.
[
कारकळीर्दीत
रावबाजोस
येथे
अटर्केत ठेवले होत. पुढें येथूनच त्याची माचीवर
वस[‘वेण्य[॰
स[त्,’॰[ मेण्यांत आले. न[मलतदार
एक मराठी
कचेराजवळ
शिलालेख आहे.
येथें तान हेमाउपेतो देवालये अलून दुसरा षंचळिग,
गणपती, पाताळेश्वर. उत्तरेश्वर व ठाकॄरद्वार वगैरे इतर देवा-
लये आहेत. जेन लोकांचीप्हे' दोन देवालये आहेत. मुमुलमार्न [
अमदानातोंल अवशेष म्हणजे कांहीं थउगॉ, मशीदळो,
अफौशबागेंतळील तुंदरवाडा वगैरे बरेच आहेत. ‘ मौदाग~<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रीय शानकरैश. (ज) ३०० जन्नर .. जुपिय्र रचौ छत्रो’ हें डुन्नरमवोल मुड्रुलमानांवै अत्युत्तम प्रेक्षर्णांय तट चढून मराठयांनीं ११ इजग्र होन, २०० घोडे वगैरे छुघ्‘: काम आहे. याच..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रीय शानकरैश. (ज) ३००
जन्नर
..
जुपिय्र
रचौ छत्रो’ हें डुन्नरमवोल मुड्रुलमानांवै अत्युत्तम प्रेक्षर्णांय
तट चढून मराठयांनीं ११ इजग्र होन, २०० घोडे वगैरे छुघ्‘:
काम आहे. याच्या पूर्वेस एक मैलावर
नेला. त्यानंतर पुन्हां दुसऱ्यार्ने १६५" च्या मेमऱ्-यै श्विवानींर्ते
अफॉंझवाग आहे.
द स्ऱ्धळ अनेक द्दष्टळोमुळें अत्'वत प्रेक्षणीय आहे.हा
निर्माण करणाऱ्या हृवशग्र्वे थडगे तेथुन
जुन्नरच्या पश्चिमेस सरासरळो अघ्र्यां मैलावर
डोंगर आहे. ह्या डोंगरात क'ळाहो वळीद्धांचीं
इसवी सनाच्या पहिल्या व दुसऱ्या
नींद्व लोक रहात असत. पळा‘हेंत्या शतकांत
बाग
जवळच आहे.
शिवनेरचा उंच
लेणळो आहेत.
शतकांत येथे
क्षप्रप लळोकचिं
राज्य या प्रांत? असतां जुन्नर हो त्याची राजधानी होती.
त्यांना राया नइपाव हा प्रख्यात होऊन गेला. देवगिरळोच्या
यादवाकद्वे शिवनेर होतळी अर्ते अनुमान काढतां येते. मार्गेघांटाज्ञवळ्च्या एका मोठ्या खडफांस ‘नानावा आगठा’ म्हण-
तात. एकंदर तिन्हो टॅकड्यांत मिळुन १२५ है’णळोवजग् गुहा
अद्दितवीडांवै वेळीं ह्या गांवाच्या मडोंच, गुजराथ, ठाणे वगैरॅशो व्यापार चालत असे. १ १७० ते १३१८ मथळोल काळांत
देवगिरब्च्या यादवांच्या ताब्यात हें गांव होते. १४४३ मध्ये
मलिक तुवार यानॅ शिंववैर किल्ला घेतला. त्यावेंळीं जुन्नर हें
एका प्रांतार्चे मुख्य ठाव्ळा होतें. सन १४७० मध्ये येथे रयि.
यन प्रवासी मिंप्केळितन हा आला होता. सन १४८५ मध्थें
निआमशाहो घराण्याचा सर’यापक मलिक अहमद हा पूर्वी
सुभेदार असतांना ड्रु'नर येथेच रहात असे. इ. स. १४८६
मध्ये त्यार्ते निझामउळुमुसवग् वा’हेंरळी हो किताब धारण
कलन स्वतंत्र राज्य त्थापिंहेंऽ. तेव्हां दुसऱ्या मइमद्शांहृ
रातोरात ड्रुन्नर गांव …बूञ्ठन अंदाजे तळीन लाख होन मिळ॰
पिके.
सन १६७०
मध्ये ळिशवाजोऱ्’ळा
शिवनेरळोचा किल्ला
घेण्याचा पहिला प्रयत्न केला पण तो निष्फळ झाला,
ड्रुन्नर परगणा सर्वे लुटून करत केला.
ब्यान दुसरा प्रयत्न कला
येथील
मोगल
वणेन
लिहून
होता.
हुमैंदाराच्या
मात्र
न्हो पाच वर्षांनी
फायर ह्यांन पुंप्न्नर
वेकवै
मोठें
ठेंविंहेंऽर्ले आहे ( तर १६७३
मजेदार
).
पुढे
( सन १६८४ ) औंरंगझेवार्ने ड्रुन्नर व सिंहगड येथील ठाणी
मजबूत करण्याचा प्रयत्न केला होता. सन १७१६ मध्ये
शांहूंर्ने शिवनेर किक्कयाकरितां मोंगलरॅजवल मागणी केली.
नानासाहेब पेशव्यांच्या वेळीं य्’शवतैर मरप्ठस्गंतां क्लिर्ले.
१७९० नालॉ ड्रुन्नर हें एका जिंह्यार्वे मुख्य ठाव्ळा असून
ह्यांत २३ परगण्यांचा समावेश होत असे: त्यावेळी यावे
एकंदर उत्त्पन्न १४६४३३८ स. होते असा उत्ट्टेख आढळ्तौ.
सन १८४५ मध्ये राघोजी मांगरे यानै केलेल्या वडप्व्यळि
मुळे जुन्नर येथें एक कळीतैचीं तुकडी ट्टेवण्यांत्ऱ आला होती.
इत्तिहोतांत ड्रुन्नरच्या
क्रिल्लयाचीं शिवतेंर )नांव नेहेमी
येते [ पुणे…ग्याझे. पु. ';; ऎत्ति. लेख सभंहृ', पु. १०; डफ,
पु. १, २3 बिल्क--सम्ऊथ इंडिया, पु. १3 क्रिज-फेरिरतां,
पु’ ३॰]
जुपिय्र जोव्इ )… रोमन राट्राचळो प्रमुख देवता.
ब्राह्मणो'नै वुमुफ अळिदलखानास त्यावर पाठविले. पण त्यार्ते
त्यावा पराभव केला. सन १४९४ व ह्यार्ने अहृमद्नगर
योस्पितर या इडोंहूंरँम्पिय देवतानामावा हा अपन्नैश अब्द्रुन
शइराचळो स्थापना केला. तत्पूर्वी जुन्नर होय त्याचळो राज-
पंडित मग्ळिनतात. हा सेंटींनवा पुत्र होता. सॅथ्नौला एक टिं’य्न
म्हृपूप्न बंधु होता. तुला मुलगे होतां कामा नये या अटीवर
धानी होतो. सन १५६२ मध्ये हुसैन निझामशहा द्यावा
विजयनगरवा रामरप्जप् व विनापृरचा अलाअदिलशहा
ह्यांनों पिंच्छापुरत्रिल्यामुळें तों जुनरच्यापहोडांत पळून गेला.
दुसऱ्या बहादूर निझामानें मालोजी र्मोसळे ह्याला पुणे व
मुपें इकडे ज्या जहागिरी
दिल्या त्यांत
ळिशव`नर^प्सह्र ड्रुचर
ग्रीक ड्म्युसच! हो रोमन अवतार आहे अहें बहुतेक पाश्चात्य
टिटनापाखून सॅढमाँनें राज्य मरेतौ वतल‘ होते. म्हणून
त्याला जें मुलगे होत ते तों खाऊन टाकळी हें व्याच्या भायेला
आवडत नखे. तिला बेव्हो बोव्इ झाला तेव्हां तिनै जळोव्होलप्
ढूर नेऊन ठेंविलैं व पत’प्पुर्डे एक दगडाचप् गळोला आयूर्षि
होता. जिजावाद्वै हो सुद्धा क'प्हो दिवस डुन्नरास ( शिवनेरो॰
वर)राहृत होती. त्यावेळी जुन्नर हें शहोजींच्या ताब्यात होते.
ठेंपिला. तो त्याने लागलाच भक्षण केला. यात मुलाग
आत्यावें ।…व्नास कळले तेब्दां त्यार्ने यास कैदेत टाकिंयू‘ऽ.
जोव्इ वषीवा होतांक्षर्णीच टिटनार्चे पारिपत्य करण्यास समयै '
झाला व टिटनाचा पराभव करून त्याहुंर्दे पित्यास बँघमु‘क
सन १६३६ मध्ये शहोच्चीर्ने विजापूर सरकारच्या नोकरीत
केल".
जाण्यार्चे नाकारल व जुन्नर'व इतर क्रिळेंद्दि परत करण्यार्वे
नाकारहँ होतें. एवर्ढेच नव्हे तर १६४९ मध्ये शिवण्त्तळोर्ते
डलैं नाहो. तोंद्दि कपटोंपाय योंहूंप् लागलध्हें बोंव्हाला समज…
प्रांताचा र्फाहो भाग येत असे
दुसऱ्या मुतेंझात्तिक्षामशहोवा फांहो दिवस येथें तळ
बुन्नद्च्या
देशमुरवाचो ’मागणो
द्ख्खनचा हुमा मुराद
परंतु मुलगा इतका प्रवळ
झाला हें सँटमँला
तांच पिंत्याला त्यार्वे हांक्रून द्दिल्ऱ्ऱ्. नोव्हाला, प्लूटो व
तेंप्चून असे दोघे बै'हूळा होते, त्यांनीं सव्डू पृथ्वीचे राज्य वाटून
याच्याकडे केळी होतों०
सन १६५० मघ्र्ये ( मुड्रुलमानो अमलात ) पुण्याच्या
घेतले.
वायव्य प्रदेशांतील कोळी ळोकरंनों बंड केलैं होर्हे,
पृथ्वीवरील कांहीं राक्षसी प्रजेंस टिदनावा पराभव
परॅतु तें
मोंडण्गांत आळे. कैंद्यांस जेथे शिक्षा करण्यात आली त्या
स्थळास ‘कप्ळा नौथरा’ असें गांव आहे. ळिशवाजोर्ते जुन्नर हें
प्रथम १६५६चे जानेवारीत छुटर्लेत्गांत दोरोच्या शिङथॉवखन
आर….
स्वगें जोव्इनें
दिला; प्लूटोला नरकप्रांत
घेतला.
वैपृचुनाला सप्गरप्रदें‘ऱ्प्त
।‘देला व पुंथ्वळो समाइकच राहिली.
झालेला
आवडला नाहीं. कारण त्यांचें व टिठ्यार्वे नातें होते. त्यां'ग्प्ळो
पर्वतावर पबँत रहूंन रवगळोस चढत ’जम्ऊन जोव्इशळी वुभ्ढू
करण्याचा निश्चय कैलात्तेव्हां सर्वे देव ईंबिप्तदेशांत पळून गेले<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१२८
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान ".’ ,रॅ व पशुसप धारण करून वनांत लपून वसले. नोव्इनॅ इवर्भू‘ लग्नाच्या सप्हा‘ऱ्यार्ने या राक्षतांवा नाश केला. अशा र्रातांनें निष्कंउक राज्य झाले असतां चौव्इनॅ विषयसुस्यावा उपभोग..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>.’
,रॅ
व पशुसप धारण करून वनांत लपून वसले. नोव्इनॅ इवर्भू‘
लग्नाच्या सप्हा‘ऱ्यार्ने या राक्षतांवा नाश केला.
अशा
र्रातांनें निष्कंउक राज्य झाले असतां चौव्इनॅ
विषयसुस्यावा उपभोग ॰घण्यास प्रारंभ केला. त्यानॅ वुनॅप्सकट
तात बायका केल्या. त्यातच लाटोंना होती. त्याने ड[यनाला
सुवर्णच्या वर्षावांत गांठिहेंठे, आन्टिओपळीला वनचर देवाचॅ‘ सप
घेऊन गां’ठेंर्ले; लॉडेला, हैंक्षाचें; युरॉपेंला, वृपभाचें; र्दुजितेंला
आमेज्वात्’गंचें इत्यादि वेगळी ङन्ग् घेऊन या वायकांशळो तमा…
गम
केला. त्याला
अपत्योहे
पुष्कळ _ आलों. गरुड
त्यावेळी तो सर्वीस आवडू‘न त्याची प्रण्सौरॅद्धे झाली.
ईंजिप्तमघ्ये पाडिहैञ्. यावेळी त्याचें ८० वर्षांचे वय होते.
तेंर्थेत्यात
)
संस्थान. उतर अक्षांश ३०० ४६’
ते ३१"
रॅखांऍळा ७3"
क्षेत्रफळ
२७’
ते ७७॰ ५०’.
लव्कत्तेख्या (इ.स. १९२१
सस्यान सिरमुर
सस्थानवे
अकुंत्प्द्यय
वुऱ्ख
व
त्रास
होऊन
तो
मरण
रॉममघोल
गुन्हे,
पावला. त्याच्या
सर्व उपहासप्त्मक काव्याचे सोळा
भाग
पडतात व ते
पाच
पुस्तकांत
प्रसिद्ध
केले आहेत. पहिला ९ काव्ये वाफॉंच्या काव्यांडून भिम
स्वङपाबाँ
हा
पण
त्यानें पारिसवर लिहिलेल्या लेखप्मुळें त्याजवर राजाची
अवक्रुपा झाली. लवकरच ड्रुव्हेनल यास लष्करी कायाकळिरतां
याचा आवडता पक्षळो होय. ड्रुपिठर सर्वं वुरनर'प्वा शप्स्ता ` द्रुर्दुळाण
होय. क्रीऱन लौक यावे ब्यान काडॉत तेव्हां त्याला कान ` टोंका
दाखवात नसत. कारण यार्ते र्कोणचिं कमीअघिक ऎकून घङप
पक्षपात पडे नये अशी त्याची भावना असे.
त्मक
तुबल-पजाव, विमला, डोंगरी सस्यातांवेंकनू एक मात्र
मैल.
जूळ, जेम्स र्घस्फॉं’घ्
महारग्ष्ट्रळीय शघ्नफॉंश- (ज्ञ ) ३०१
जुयळ्
आहेत.
पहिल्या
नवामध्र्मे
व मूरवेपणी यांवर अत्यन्त कडक व येद्क शब्दांत
केला असून दुसरी ७ हो निंरा’तैराळ्या विषयावर निवआहेत असें ह्मणण्यास
हरकत
नाही. हे उपहास:
लेख त्यार्ने राजकीय हेतूनॅ लिहिलेले नांहॉत. एवढे
ख`र` फॉं लळोफांतांल दुगुंण दाखविण्याकळिरतां राजा व
८" व पूर्वे . राणी गांचीं उदाइरव्ग् त्यार्ने दिलॉ. लाँकसत्ताक राज्यपद्वा
२८८ चौरस ` तौचळी त्याला कांहीच कल्पना नव्हती.
स्वातंत्र्यनाश किंवा
)२४८५६. पूर्वी हे `सीमेटप~द्वात^|चें राज्य याबद्दल त्याला वाईंट वाटत नव्हृतै,
तर राष्ट्रळोय पाँरुषत्व व स्वाभिमान याचा नाश झाल्याबद्दल
येथील राण्यन्ति सस्या` ` मात्र त्याला अत्यन्त खेद होत होता. परकीय चालोरळोतळो
मांडलिक होते,: परंतु पहिल्या
गुरखा ब्श्र्ढम्ट्रे'नतर तें स्वड्प्त्र झाहँ.
नवा कार'मार योग्य रक्ततांमें न पहिल्यामुळें ब्रिटिश
सरका-
रास तस्यानचें सर्वं अधिकार इ. स. १८३२ मध्ये दैष्यात
आलें. परंतु १८४॰ सखी राण्यास क्रुतकमौचप् पश्चा-
व देवभौळेपणा त्याला खपत नवे. अशक्तपणा किंवा परि’
स्थिति यामुळे दुसऱ्यावर अवलंबून राहणाऱ्या लरेंकांचौ
त्याला फॉंव येत असे. पात्राचे स्वभाव, देखावे, कया’
तप्प झाला तेव्हां त्याचे अधिकार त्यास परत देण्यात आले.
हृलॉ राणा भगतसिंग हे गऱ्दळिवर आहेत. संस्थानात एवदर
फ्रांस व क्रुतळो यांचे वणेंन करण्यात तो अत्य'त वाकवगार होता.
जुव्ट्रेनल हा सप्द्दित्यशप्स्त्रज्ञ होता की स्वतंत्र कवि होतां
८४ रँवडॉ असून सम्लाँना उत्पन्न सुमारे ६८८६४॰ रुपये
आहे… खंडणी २५२० रुपये द्यावळो लागते.
तुयों--…'मुवहैं इलाखा, सिंघ प्रांत. रँवरपुर सस्यान'प्तील
हेंतांगर्णे जरक्रुस कठिण आहे. पण एकदर'प्तत्यास प्रसिद्ध कवि
मानण्यापेक्षां प्रसिद्ध सप्प्‘हेत्यशप्खज्ञ मानणें अधिक वरॅलिखक
व व्यक्ति या दोन्हो नात्यांनों जुव्हेनलच्या
लेखांपाखून
एक गांव. उत्तर अ. २६" २२’व पूर्वे रॅ. ६९" ३४’. लाँक‘ स्पष्ट कऎहोच बोंथ होत नाहीं. प्रांक कला व विचार यांचा
तेख्या( १९०१ ) ६९२४. येथील लोक मेढरें पाळतात व ; रोममध्ये शिरकाव होण्याच्या पूर्वीची विचारसरणी याच्या
लऱ्कर’. यार्पोगडया
करत’त. येथें एक पद्दका किल्ला आहे.
लुंभखा-शृंवहै इलाखा.
रँवाकांठाच्या
पुस्तकांत आढळते. त्याची कविता जोरदार आहे पण बेचि-
पांड्रु येइवा र्दु त्र्यामावामुळें तळी कॅटाळवाणी वाढते.
समूहांतोंल छोटे हेंऱ्स्थान- क्षेत्रफळ एक चौ. मैल असून यांत ,
दोन रॅवडों आहेत सस्थानि'क गायकवाडाना मांडलिक आहे.
जु’ग्हेनळां इ. स. ६०-१४० )…हा रामन कवि व
औंपरळोघिक लेखक
बॅंकिनम येथे जन्मला;
डूळाच-मघ्यप्रांत. वुरगुजा सस्थानांतळील एक अळोसप्उ
प्‘केलाउत्तर अक्षांश २३॰ ४३’ व पूवै रेखांश ८३" २६’.येव्र
झाडोंत फांहृळी कोरीव लेणी आहेत.
मूल, जेम्स
याने स्वत;
प्रेल्कॉट
( १८१८…१८८९ )…या
लिहून ठेंविलैल्या मळाद्दित’ळावसन
याच्या चरिंत्राचा कांहो इप्रज पदार्थबितानशय्स्त्रज्ञावा जन्म म’चेंस्टरजवळील सप्लर्फडि
र्भाग लागतो. हुव्हेनल हा एका श्रीमत गृहृस्थावा मुलगा गांपाँ आला. गोंन डय्ल्टन या शप्स्त्रज्ञाकढून त्याला रसायन,
अगर आश्रित होता… जुव्हेनल पूर्वी गुलाम अड्रुन ` शण्न्नावे थोडेसे शिक्षण
मिळप्ळें.
वाकळीर्चे
शिक्षण
त्याची गुलामाँगरँग्लून सुटका झाली होतां. मध्यमवयावा `त्य|र्ने
आपर्के
आपणच
संपादन
केले. शप्त्नी-प
होईंपयैत त्यामें घेदा म्हणून नव्हे तर होर्सेऱ्त्र वड्रुवत्वाच’ `प्रयोगांत अगदी बरोबर व शक्य तितक्या सुक्ष्म
अथव’ वड्रुगत्गर्चा भापणें करण्याचा अभ्यास केला. डळोमिंटिं प्रमाणांत मोंजमापें घेतला पाहिजेत, हे“ त्यार्ने प्रथमपासूनन
अनवा आवडता नट पारिंस याजवर त्यार्ने पार्हेळें ओळस्किश्ल. व हे तत्त्व त्यानें आपल्यासव आयुष्यभर पाम्‘ळेर्के.
उपहासप्त्मक काव्य त्मिहेलै. या काव्यात त्याला यश
त्यार्ने आपल्या वयाच्या १९ व्या वर्षी एकचुंवकजन्य विद्यु-
भिंळळिल्यामुळें त्यानॅ हाच व्यवसाय पुढें सतत चालू ठेवला. यु द्येत्र तयार के'ल व या यत्रापासुन कितळो विद्युद् उत्पन्न
ज्यावेळी त्यानें उघडपर्णे आपला प्रयत्न लोंकांपुर्ढे मांडला
‘
)
होते
याविंषपां मोजमापें घेण्यास पूर्वीच्या पद्वतमिं सुरवात केला;<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मयारप्ट्यि ज्ञानकोश. (ज ) ३०२ जेऊर परंतु या पूर्वीच्या पद्वतांत दिसुन आत्यावरूंभ्न त्याते एक विरालेच माप यरैजिहेंञ्. नऊ प्रेन पाण्याचे पृथक्करण वराच विसगतपणा आहे ठरते विछुक्रु..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मयारप्ट्यि ज्ञानकोश. (ज ) ३०२
जेऊर
परंतु या पूर्वीच्या पद्वतांत
दिसुन आत्यावरूंभ्न त्याते
एक विरालेच माप यरैजिहेंञ्.
नऊ प्रेन पाण्याचे पृथक्करण
वराच विसगतपणा आहे ठरते
विछुक्रुतेच्या एकत्व परिमाणाचै
ज्या विद्युलतेर्ते एका तासांत
होते त्या विं`जस एकत्व परिमा-
णाची चीज समजप्ची अते त्याते ठरविले; यामुळे त्याला सन
जेजुरी
त्याच्या सप्सऱ्याला त्यांच्याविषयी
झाला. म्हणून बेकन हा
अतकुंनात द्वेष उत्पन्न
आपल्या व[यफांसह
पळून गेला.
लावानते-त्याच्या सप्सऱ्यानै त्याचा पाठलाग कलन त्याला
गिलाड येथे गाठले. पण येकवते त्यास खरळी हकीकत सांगितल्यामुळे लावानने त्याला क्षमा केला. येथ असतांना एस[व
१८४॰ च्या सुमारास विझुंत्प्रवाह् आणि उष्णता यांच्यातील
हा तेन्याळिनशळी येत आहे असें त्याला
परस्परतुलनात्मक सव'घ सिद्ध करतां आला. पुढें त्यानें
यावे आणि उष्णता यांच्यर्तिप्ल नित्य-सवय प्रर्योगार्ने सिद्ध
एसविचँ सख्वत्व सपादन करण्याका’रॅतां आपले दूत पाठविले
ण्याची एक उपयुक्त योजना त्यऱ्र्ने तयार केली व या योजनेचा वाफेच्या येत्रांत फार उपयोग झाला आहे. विशपत:
समुद्र्प्वरळील वाफेच्या येत्रांत या वुकांवप् अत्य'त उपयांग
झाला व
ट्यु-ग्र्थं‘ढि|
५४३ ). निरनिराळ्या वव्यावर दाव आणला असतां कितळी
उष्णता उत्पन्न होते याविषर्यो प्रयोग कलन नवीन माहिती
त्याते उपलब्ध केली. वाफेच्या येत्रांतळील वन्फ थंड कर-
टु,॰य्य
होता हे
‘ विज्ञातेविहासां ’ त सविस्तर सांगितलेत आहे( पृ. ५३९…
येथें असतांना त्याची एका देवदूताशळो साँवाझीवळो
त्यांत त्या देंवदूताचा बेकवते पराभव केला. या स्यानाला
यान पेंमुएल हें नाव ठेवले नंतर बेकन हुक्कोय येथ गेला
तेये त्यानं आपणानाठा घर व कलपाताठो वाडे व[थले.
तो शरत्रैम येथें गेला. तेथे त्पार्ने हमोंर ज[तांपासन
[जामनावा माग विकत यऊन एक वेदा बांधला व
म्हँ’र्प
त्याच्या सिवांताच्या शोघांत जूंलचा कितपत हात
व त्यामुळे या दोघा भावाभप्यांर्चे पुन्हा सख्य जमले. जर्बोक
ऱठीं
करून दाखविला. शक्तित्तित्यत्त्वाचा विद्वान वसविण्यास
त्याच्या या शोथावा अत्यंत उपयोग झाला. शार्कि’त्तित्य-
कळल्यामुर्के त्याने
[तव नाव एल अलळोहे इस्रायल अते ठेंवले. नंतर जेकब हा
वेयेल यथ आला व तेयैत्यालाताक्षात्कार झाला. यामुळें बेकन
यास इस्रायल हें नाव पडले. वेयेल येथें त्याची वायकळो,
त्याची दासळी इत्यादि माणसे मरण पावला. त्यामुळे वेतापून
आला आहे.
तो द्देब्रन येथें आला. येथे त्याच्या मानाचा व त्याचा पुन्हा
वैऊर-मुवहँ. अहमदनगर ळिजल्द्यांतळील व तालुक्यांतौल एक व्यापारी गाव. उ. अ. १९ ० १८’ व पू. रे.
७४
’ ४८’. अहमदनगरच्या ईशान्येस "1३ मैलावर पाच
खव्का उडाला व वैवयूव हा इजिप्तकहे
हजार लोकवस्तळोवप् हा गांव आहे. जवळच एका टेकडीवर
तळोन देवळे अवून एकावर इ.स. १७८१ मध्ये खोदलेला
एक शिलालेख५ आहे. बेऊरच्या उत्तरेस दळोन मैलावर इमामपुर नावाचा रहृदारा बंगला आहे.
जेकब-नाववलमघ्में " उत्पत्ति ’ या प्रकरणांत याची
गकुरोन येथें वस्ती केला. या ठिकाणी तो
१४७ व्या वर्षी मरण पावला.
जाण्यास निघाला.
वऱटॅव त्याला देवदशन होऊन तुझ्यापाक्षुन मकुठें राष्ट्र निमौण
होईल असा अशळोवन्द मिळाला, ईंबिप्तमध्र्ये आल्यावर त्याने
जेजाकभुक्ति
बुंदेलखड
येथे
उर्फ
च्दिल्ल
आपल्या वयाच्या
जिइरळोटी- जिझेंप्टी
उर्फ
घराणे’
होते
राज्य करीत
( च्विल पहा ). या प्रांताचे" दुसरँ नाव बेजाकभुम्ल्ग्च् होते.
व त्याची
खजुराहो ( छवपुर सस्थान ), महोबा ( इमाँद्पूर जिल्हा )
पत्नी रॅबेंका यांचा हा मुलगा. रॅवेकाला बेकन व एसण्व
अशी दोन जुळी मुले झाली. त्यांत एमाव हा वास्तविक
व कालेजर (बांदा जिल्हा )हे भाग या राज्यांत प्रमुख होते.
आया, अयेग्घ्या या प्रांतांतौलाहे काही भाग या मयेंक्रुदत
मोडत अते. तसॅव मघ्यप्रांतांताल थोडा माग मोडला ज[है.
शिलालेखढेवून बेजाक अथवा बेजा हें नां’भ्' येतें’ ह्युएप्’ळि
हकीकत आली आहे. अन्नाहामवप् मुलगा
इशाक
मोठा पण त्याने बेकवला आपला मोटेपणग्वा इक त्द्देऊन
टाकला अशी कथा आहे. रॅवेंकार्वे बेकववर एसग्वपेंक्षां
आ’यैक प्रेम होते. इलाक हा म्हातांरा झाला होता. एक
त्तेगार्ते या
राज्याचा व
तेर्थाल व[म्हेणराजावा
उल्लेख
दिवस त्याते एस[वला उत्तम प्रकारची शिकार मिळवून मला ` केला आहे. हे राज्य पूल गुप्तनान्नाज्यांत मोडत होते.
मुमास अन्न जेवायला नाल अते सांगितले. हो गनृष्ट रॅवेकाते
जेकवला स'प्पून त्याच्याकडून इझ्गकला सुप्रास
अन्न यातले
त्यामुळे इआकर्ने त्याला उत्तम अशळोवट्टेद दिला. यामुळे एस[॰
वात कार राग आला
वत्यानॅ
बेकवला ठार
मारण्याचा
त्यांना नाश झाल्यावर कोणी ब्राम्हण वराणें राज्य
करळोत असेल. हपाँच्या निधनानंतर हे घराणें स्वत’न्न झाले
असावे व पुन्हा कनोंजच्यप्यशरैवम्र्यानें ते जिंकले असवि.
पुढें ९ व्या शतकापासून पँदक्रांवा उदय
लाला.
येथील
[स्मिथ केला. त्यामुळें आट्टेच्या सांगण्यावख्न बेकन हृरन
व[ग्ऱ्हूंणांनां
येथे आपल्या आजरैळीं गेला. इरन येथे असतांना राहेल
इच्यावर त्यार्वे प्रेम जद्दले, व त्यानॅ तिची सप्त वर्षे सेवा
प्रांफिआ इंडिका, पु. १ पृ.
झे’डेंया; तेन…मध्ययुगॅवि मारत, पु. १ व २.]
केली पण त्याले फसवणुकळोते राहेलची र्थारलळो वहळोण लव्आ
हिच्याशी लग्न करण्यात आले.पण त्यानें पुन्हां राहेलची सेवा
जेजुरी-……पुर्णे [”जल्त्ष्ठांत नासवउच्या आमेंयांस १०
मैलावर पुर्णे-सप्तांऱ्याच्या डुन्या रसयावर हे गांव आहे.
कलन त्तिचें प्रेम सपादन केले. बेकववर परयेश्वरळो क्रुपाअसल्यानें त्याची सपात्ते दररोज वाढत चालला होतां. त्यामुळे
हे एक मोंठें यात्रैर्चे ठिकाण आहे. येथील लो. सख्या तांन
अद्यापि
जझेस्टिया अते
१२१.
म्हणतात.
[ एपि‘
स्मिथ…आळू’ द्दित्उ,
हजारांवर आहे. येथें व्युग्मेसिपाप्लर्टाद्दि असून तिची सन
^<noinclude></noinclude>
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महाराट्रोयशांक्यतेशर्नजंक्किर्णी जेतुरी १८६८ व यात्रैवत्र्स्न्ष्च्या सोयाकरिंतां स्थापना करण्यात आला. तिचे उत्पन्न सहा हजारापर्यंत आहे. येथे खहोया हे मुख्य दैवत आहे. त्या..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महाराट्रोयशांक्यतेशर्नजंक्किर्णी
जेतुरी
१८६८
व यात्रैवत्र्स्न्ष्च्या सोयाकरिंतां
स्थापना
करण्यात
आला. तिचे उत्पन्न सहा हजारापर्यंत आहे. येथे खहोया
हे मुख्य दैवत आहे. त्याची मुख्य जत्रा 'चपापष्टीत भरते
त्या देवास नाहेरॉवा, मल्हारी, मातेड हाँप्हे नाते आहेत.
येयळोल ख‘डकुवाची दळोन देवालये उच र्टेकङयावर आहे. त्यास
कर्डेपठार म्हणतात. गांवाच्या दक्षिरैगस राववाजीं पेशवे :
यानी बांधलेला एक
मोठा तलाव आहे.
त्यालाच
जोडून
द्यळोत अततेव्हो शिवाते खंडोंवाच्या सपानॅ अवतार घेऊन
त्यांना नाश केला. मुत्युकाल समौप आला असतां मलाते शैव
धर्माची दळोक्षा घेऊन तो व खंडोंवा दोघोहे शिवस्वर्पो विलळोन
झलि. येथें मायेशींपे दुळाद्ध चतुर्थी ते युद्ध सप्तमी, पौष शुद्ध
द्वादशी ते वद्य प्रतिपदा, माघ शुद्ध द्वादशळो ते वद्य प्रतिपदा,
व चत्र बुद्ध द्वादशप् त वद्य प्रतिपदा अस बार सण पाळण्यात
येतात; त्यावेळी येथें मोठया जया भरतात. त्याचप्रमाणें तळोम‘
वता अमावस्या व आश्विन शुद्ध दशमी हेळिह सण गोडवा लहान
फे
,
,.
`
'.
.
लहान लहान होद आहेत. जवळच्या एका विहिरीत
मल्हारतांथें म्हणतात. तुकळोबी होळकरानो‘हे येथे एक तलाव . प्रमाणावर सणाप्रमाणें पाळतात. सोमवती आमावारयेच्या
दिवशी खडक्रूवास समारंभप्नें पौडेंळा थालेवार्डात स्रानास नेतात.
र्षांयला आहे.
ला तलावाच्या व गांवाच्या मघ्र्मे एक महादेवार्चे‘ (मल्हार‘ विजयादशमाँच्या दिवशी वळोन्हृळी देवालयांतून स’ग्मोंक्केघनाराव होलकतच्या त्मरणाथे बांधलेले ) देवालय
असून
तेथे ` करितां मरैठया मानाने पालख्या निघतात, तेव्हा मार्गामध्ये
दोन पालख्यांचो येउ होते. तदनंतर दोन्होद्दि देव आप;
र्देवामार्मे मल्हारराव व त्याच्या तळीन वायका वनावाट्टे,
द्वारकापाईं व गौतमावाहै यांच्या मूर्ती आहेत. खडों० आपल्या त्याची परत ज[ताताखं’डोंवास अपेंण केलेल्या मुलाव[च्या देवळात जाण्यास पुष्कळ पायऱ्या चढून जवि लागते. ड् मुलास अबुकव्र वाघ्या व मुरळी म्हणतात. मराठें लोक
चढून ज[तां ज[तां मध्ये हेगडळो या यननर ( देवाच्या) प्रमा’ ख’डॉवाचे मोठे मक्त आहेत. मुख्यत्वेकरून खानदेशांतील
न[ची समाधी लागते. जवळच ख'डों'वाची माया वनाहै हिची हु व वऱ्हाडा'ताल मराठे लळोक ह्या देवास भजतात. कोळी
समाम्ये आहेरवद्रोवाच्या पस्किया वायकळोवै नाव म्हाळसप्श्या लोक'प्त `ज `मगत’ म्ष्ट्रपूळान असतात त्यांच्या जवळ खंडोबाची
दरेंची परत्पराचा मत्सर करळोत असल्यामुळे खहोवाते एकळीस पालखळो असते. हे भगत लाक शुभाघुभ वतेवितात. प्रत्येक
शिखरावर नेऊन वसविले व एकळोस पायथ्याशी ठेंविले. देव’ यान्नैकस्’ऱ्स अर्धा आणा म्युवितव्पालॉटॉस करादाखल द्यावा
मोठें मगद्ऽड ' लागतो. देवास नैवेद्य दाखवून प्रसाद येण्याच्या वेळी षंजीत
अ1ट्रॅ.
ओंर'गझेवन्न बेव्हो भुलेश्वराच्या देवळाची नाश : व|घ्यास व मुरळोस घेण्याची चप्ल आहे.
येथें गुरव हेच
केला, तेव्हां खडोंवार्ते पुढीलप्रमाणे त्या देवळाची नवाव `; देवाचे उपाघ्ये आहेत. यान्नैकरऱ्द्द् दिवटॉ पाजवृठुन व तो वरळो‘
व्याच्या मुख्य दरवाज्याजवळ
५
ळिमतोस
एक
केला म्हणून सांगतात. ज्या वेळी औंरॅगद्देळाव विप्व'त कर’
वर घेऊन देवळाच्या पायऱ्या चडतळो व देवाचे दशैन घेतो.
ण्यास आला त्यावेळी
गांधिल
देवठांत कांतवाच्या पाठीवर उमे राहून चिबा व रवळोवरै उथ-
माशांची (हे भुये होते अस कोणी म्हणतात ) घोळ्का बाहेर
आला व त्याते मुघुलमानावर हल्ला केला. त्यामुळे ओंर'गझेवाला देवळाची उच्द्येद करतां आला न[हो व या प्रसगाते
औंरगझेवाच्या मनांत त्या देवाविपयॉ भक्ति उत्पन्न झाला.
ळण्याची च[ल आहे. राप्र'प् व[घ्यांर्वे व मुरळ्यांर्चे गाणें करावे
लागते. रमा गोष्ठी खालच्या ( गांवाजवळच्या ) खंडोबाच्या
देवळाच्या तमौरलि आवारात एक मोठी कासवाची आकृति
व एका खांवाशौ भव्य( ९ फूट उंचीची ) मताची एक माते
करून मग करावा लागते. पठारावर चउण्वाये मागें भिन्न…
भिन्न आहेत. एक'दर यात्रेस तांन दिवस लागतात. जत्रांच्या
दिवसांत येयळील वाजार’ळात वरॉव कावळी विकावयास
र्यंतात.
त्या भगदाउघेनून
एकदम
आहे. देवळांतांल एका मोठ्या घेद्देवर प`।र्तुमीज भार्षेत
व दुसऱ्या वटेवर मराठींत कोरलेले लेख आहेत. वार फूट
लावावे पाते असलेला एक तरवार येथे असून तो मत राक्षमाची आहे अते सांगतात. देवळात एक शके १'१९७सग्लवा
शिलालेख आहे. गामाऱ्यांत शिवलिगाच्या मागच्या व[दूऱस
मातेण्ड, खंडेराव व म्हाळ्तळा त्यांच्या सोन्याचीदव्च्या
( चीन ) मुर्ती आहेत; त्याशिवाय आणखी दोन दगडी
देवबांत होतात. याग्लिवाय ’कडेपठारावरत्ल खंडोबाची पूजा-
अची
निराळी
असते. तो प्रथम
मल्हारचीर्थीत स्नान
स. १६६२ मध्ये शहाजळो व शिवाजी यांची भेट जेंमृरळी
येये(भेटं[त वारा वर्षे होऊन गेल्यामुळें)देवळांत झाला होती.
शाहू हा अळीरंगझेबाकडून सुटून त[ताऱ्यास जप्त असतां
वाटेत येथे राहिला होतायेये त्यावेळी त्याते वराव दानथमैदि
र्डेवरठ्यांवर कोरलेले आहेत. या देवळामार्गे विठ्ठलराव देव
केला ( १७०७ ). १७९५ साली तुकोंजळो होळकरहायेंर्थे
छावणी करून राहिला होता. रघेग्ज्ञी थांगऱ्याप्न १८४५
साली येथील देचीची मुप्’ते पळविलीं होतां, तां पुन्हां परत
विचवउकरठेंची बांधलेले षंचलिगप्हेंरँ देवालय आहे व त्याच्या
आणुन ठेवण्यात आला. मद्रास व सदव्व्ळा मराठा रॅल्वर्वे हे
मागें ‘मेडग्रा’ वाटण्याची खोली आहे. कडेपठारावर खडी…
गांव एक स्न्नैशन आहे. [ पु‘र्गे ग्याट्वेंळा. पु. ३; डफ-पु.१. ]
मुर्ती आहेत. शके १३०३ व
१५९७
सालचे
लेख येर्थांल
बाचँ जुर्ने देवालय आद्दे. ह्या दोन द्देक्कांच्या मध्ये खँटो.
याच्या घोड्याचे खुर उमटल्याची एक जागा दाखवितात. तां
आख्यायिका अशी आहे फाँ मक्कातर राक्षस मादाणास फार
३९
जेंझील-हे अहावच्या अमलऱखप्लच् इस्रायल राज्याची
राजधानी होते. हेच नाव जवळच्या मोंव्या मेद[न[ला( एस,
ट्रळोलानला )लावतात. सध्याच्या खडयार्वे नाव शरसळोन आहे.<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१३१
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "फेव्पुंल् मद्दाराट्रीयमा’नकॉँश- (ज्ञ)रै०४ बेनप् हँ एफंग् रुक्ष टेकडीवरआहे. उड्रुरेसऎन एलमैंचीता नावाची हें आहेत. झरा आहे. हँ घराव्प् त्या ठिकाणी विण्वाजप्च्यापूवापासन रळोद्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>फेव्पुंल्
मद्दाराट्रीयमा’नकॉँश- (ज्ञ)रै०४
बेनप्
हँ एफंग् रुक्ष टेकडीवरआहे. उड्रुरेसऎन एलमैंचीता नावाची हें आहेत.
झरा आहे.
हँ घराव्प् त्या ठिकाणी विण्वाजप्च्यापूवापासन
रळोद्दिडखेंऱऱ्याची व भोरखोऱ्याची देशमुखी करीत होते
द्रुसरॅ जेंझील न'ण्वाच शहर द्देयानच्या जवळपास
प्हेहेंच हें
या घरळाण्यांतप्ल कान्होजी व याची या दोन पुरुषांची
बेतपुंर ( देवकी-मुंबई, ड्लाख्यामघ्ये काठेवाड पाँळि-
शहाजी व शिवाची
यांनां स्वराज्यस्थापॅनच्या कामी
थोडीशी मदत केली. त्याकाळी प्रत्येक देशमुखापार्शी थळोटा
बुवा देशांत होते. डेंव्हींडची पत्नॉ अविनोंआम
गांव होते.
।टेकल एजन्स्रोतळोल हें एक सत्थान
वहुत ळिशपाहैस्वार'प्ची जमाव असे. या जमावा‘च्या बळावर
अबून, ते न अ. २२°
३६’ते २२' ४९’ व पू. रे. ण्०° ३५' ते ७०" ५१’ यांच्या
हे देशमुख आसपासच्या मळुखांत पडाईं करोत. शहाजींनै
दरम्यान आहे. याचे क्षेत्रफळ ९४ चौरस मेल असुन लो. स. कान्हळोजळो जेध्यास आपल्याकडे वळवून घेतले होते. जावळी
अकरा हजारांवर आहे.यात एकंदर २१ खेड”! अतून सस्था- ; प्रकरण, अफजलवघ नगरे प्रसगळो या बेध्यानों आपल्या
नचॅ उत्पन्न सवालाख आहे. काठेंवाडांतळील चवय्या दर्जाचे हें जमावाण्‘नेशप् ळिशवप्जव्स मदत केली. त्याबद्दल ।शवाजीर्ते
सस्थान आहे. बेतपुर या सांवाची एक ताड्रुभ्’काच असून कण्न्र्देप्जळोला तरवार वक्षोस दिला होता. सॅभाचीच्यावैळं‘! हे
जेथे औंरगझेवास प्मळाळें, तेव्हा हूयानॅ सबाँराऊ यास जर
त्यांत एर्फदर २.० ताछुकदप्ऱ्या आहेत.
बैचेपत्र ळिलाहेंले होते. “ रचीमॉच अन्न बहुत… .भ'क्षिल,
त्याचे सांथेंक क`लत..॰मळोगल त्याकडे जाउनु राळिहठेव....तुमची
द्दिसांव
।य....एक्षणीं
स्वार्मंग्...’
जेतपु'र सेस्थातासवघळो दोन प्रकारच्या हफौकतों आढळतात. एक अशी आहे र्को,जुन।गङची पा’हेला नवाव वहाद्रु-
रखान यान चीला चीर यास जतपुर गांव इनाम दिले. दुसरा
अशी आहे कीं, चीरळो चीज यार्ने वागेसराच्या सामंत
वालांनां, त्यांच्या येतो खम’तेंयार्शी
गविमा देखील तुम्हास कापून काढवितांल.” सारांश ट्रेदेंश’
चाललेल्या मांडर्णात
मदत केली. त्यांत सामंत घाला हा लढाईत मारला गेला.
बांसैनै दि`लल्या मदतांदप्खल वागेंसराच्या वालठेंनळो त्यांस
जेंतपुर इनाम दिल. पुढें शम्सरवान गांवाच्या मुसुलमान सर…
दप्रार्ने, न[जच’ नातु चेपाराज यापाछून जेंतपुर जिंकून
घेतलॅं. परंतु पुढें चपाराजप्च्या वशवार्ते पुन्हां तें आपणाकृडे
घेतर्ले.
वर ज्या वळोस ताळुकदप्ऱ्या
मुख जिकडे आपला फायदा असेल तिकडे
जप्त. म्इणुनच
शिवाडीर्ने यांचे प्रस्थ मळोडर्ले होते. या ॰जघ्याकडें एक शका'
वलळो सांपदृलों आहे. शिवाजी, तेमाजो व राजप्राम यांच्या
करकळीर्दीतळोल बहुतेक सर्वे प्रमुख गोष्ठी द्दिच्यांत नमूद
कै`लल्या आहेत; ही बहुतेक विश्वसनीय आहे. तो कै ला.
टिळकांची प्रसिद्ध केली आहे.
[राजवाडे खंड.
१": या.
हू इ. म. चतुर्थ सेयैलन. ]
जैसा…जमँनळो, खे‘क्स-मर सत्यासांतौल विश्वविद्यालय
सांगितल्या, त्यांपेंफाँ चार .
मुख्य आहेत: त्यांची नांव वेतपुर
देवळीं; वेतपुर हें असलेले शहर. हें ग्रँप्सवेरिजैनसांलफेल्ड रेल्वेने लायपँझिगवाडिया; जेंतपुर मुछुढुरग व बेतपुंर न[ज काल हां होत. पावून नैक्केत्त्र्यस ५६ मैलावर व चीमर-जेरा रँल्वेर्ने चीमर॰
या निरनिराळ्या ताछुकवाऱ्या मिळून बेतपुर या नांवाची ’ पावून आप्रे`यस १२ मैलावर आहे. लोकसंख्या ( १९१० )
जळो ताछुफा आदें त्यांत १४३ `खडॉ आहेत.
जेंतपुर देवळी
३८४८". हे शहर चुनस्वडीच्या र्टेकडर्यानों बेतलेल्या एका
रूंद खिंडीत वसलेले असल्यामुळे
ह्यांची देखावा फांहाँता
हें मादर नदळोच्या कठिळो असून व्यापाराचे व भरमरार्टळावै
शहर आहे. हें भावनगर…र्योद्दळ-बुवागड-पोरवदर
या. भयानक दिसतो. उत्तरेस जेथे बेताची लढाई झालो तें पठार
रॅल्वेंवै एक त्टॅशन आहे, गांव त्नठषं‘द्ळी आहे
आहे. विचुंविमालयाशिवाय ह्या ठिकाणची पाहण्यासारखी
वा डि या.…हळो तालकदण्रीं ७२ चौ. मे. क्षेत्रफळाची जो काही रथळें आहेत त्यांतळील मुख्य म्हटला म्हणजे सेट
असुन तव्त एकंदर १७ रँवडीआहेत. एकंदर लो. स. दहा , मायकैलच्या देवळातील कूथरची बों’न्झ धातूची पुतळा,
हजार असून, जहप्गिरचिं उत्पन्न १ लक्ष ३० हजार आहे. विश्वविद्यालयांतौल ग्रेथसप्रहालयांत
ठेवलेली एक सपक्ष
इ सत्यान काठवडांतळोल तिसऱ्या दजनृ’चे आहे.
सपाँची विचित्र आकृति आणि विजेंल गांवाच्या ज्योतिषपु ल गु र ग.…या जहळागिंरचिं क्षेत्रफळ २५ चौरस शप्स्त्रज्ञार्चे भरवरतौत असरेळंउर्ले वर र्वी होत. त्या घराल
मल व लो. स. सप्त हजार असून तोंत एवहैंदर सोळा एक उंच घुरार्डे आहे, त्यांतून दिवसांदेखाँल तारे दिहूं शक॰
गांर्वे व एकंदर उत्पन्न ताठ हगारांर्चे आहे. हे तेत्यान काटे- हें तात. हक्कळो जथॅ विश्वविद्यालयाचे देऊळ आहे, त्या ठिकाणी
वाडांतळोल चवथ्या दजन्र्चे आहे.
पूर्वी एक महाल होता त्यांत गळोएटे कवीने हमेंन आणि
वा न का ल अथवा
वि ल्ला’ …या वाळू- डोंरळोथो प्रेथछिंव्हल. येथल्या विश्वविद्यालयाची स. १५५८ त
कद्प्रांर्चे क्षन्नफळ् ७२ ची. मै. व ला. ते. तार्डेदहऱ हजळार
स्थापना झाला. वयाच्या द्रवारॉ गळोएटे कवि होता त्या
आहे, होत चौवळोस गांर्वे अतून उत्पन्न पावयेर्देण्न लाखा'च
चीलैस आँगत्टतुं उयूंकच्या कऽरकार्दीत ह्या विश्वविद्यालयात
आहे. [ इंपे. ग्याझें. पु. १४ ]
प् फार विद्वानू अध्यापक लामठे होते. करेंणतळोळिह नवान
जेथे…भौर सस्थानांत मोंजें कारा म्हणुन एक इनाम म्
बुं
गांव आहे. तेर्थांल जहागळोरदार जेथे या आउनठेंवाचें
कल्पना निघाली
वऱ्ग् तिची स्वीकार कर॰य'घ्त त्या विश्वविद्या-
मराठे ,` लयाचँ पाऊल पुढें अतसें. १८
व्या शतकाच्या येवटॉ व<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१३२
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "१९ व्या शतकाच्या आ'रमों केहो नवव्न विश्वविद्यांलथें जमेंनद्भत उघडण्यांत आला तेव्हां हें मार्गे पडळें. तरीदेखील १९१४…१५ साला येथे १६६६ विद्यार्थी व १२१ अध्यापक होते. विश्वविद्..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>१९ व्या शतकाच्या आ'रमों केहो नवव्न विश्वविद्यांलथें
जमेंनद्भत उघडण्यांत आला तेव्हां हें मार्गे पडळें. तरीदेखील
१९१४…१५ साला येथे १६६६ विद्यार्थी व १२१ अध्यापक
होते.
विश्वविद्यालयाला जोडून
प्रेथसेप्रहण्लय, पेंवशप्ळा,
धमेशळान्नाच्या व भायाशप्स्नाच्या सत्धा, बागा वगैरे आहेत.
अलाँकदे येथील पुत्तफांची व्यापार वराच वाढला आहे
व कित्येक छापखत्ते निघाले आहेत.
१३ व्या शकाल बेनाला म्युनिंळिसपल हक्क होते अस
दिसते… हें ल॰ १४३३ त सें’वसचीच्या इठेंवन्य्रकडे आल.
स. १६६२त चीमरच्यप् विल्यम ङयुकच्या वर्म हार्ड गांवाच्या
धाकव्या
ब्रेफर्सन, थे‘ग्मस
महाराद्वैहुंप्प मप्नफरेश. ( ज ) ३॰'९
जेपाळ
मुलाकडे
आहे; तेव्हां हे एका
सेत्थाताची राजधानी
अलग
लहान
आते. वत्ट्रे'होर्डेची वश १६९० साल?
नामशेष आल्यावर हें इसनॅक सत्थानास जरेंउते येरेंश्र्; परंतु
स्नेह व पत्रव्यवहार कायम होता' तों मदीनों खेळांत प्रवीण
अछून पाँङयांच्या शर्यंतव्चीब्द्दे त्याला शोक होता.
कळोलेज सोडल्यावर यत्न वकळोलाँची सनद
मिळ,
विली. तथापि त्या कामांत तळो विरेंप्प चमकला ताहो. यावेळी
त्यार्ने व्हर्किंनियांतौल जुन्या उपयुक्त काययांची
सप्रह केला. न्यायपद्वर्तोतळोल
दोष दूर
करण्यासाठी
राजकारणाकडे लक्ष वळबिंर्के. याच सुमारास
निवडक
त्याने
त्याची वाप
वारला व त्यामुळे सुमारे सालाना ४०० पौर्डावै उत्पन्न
त्याला मिंळालमुर्ढे त्यार्ने देळातळोत लक्ष घालून उत्पन्न वावा’वेंर्ले.
त्याच स‘व’प्'त ( १७७२ ) त्यांचा
विवाह
होऊन
वरेचते
उत्पन्न त्याला मिळाले. त्याची चीयकळो पुनर्विवाप्‘द्देत असुन
चांगला होता. लयानंतर तेहतीस वर्षांची तळी वारलळो. त्यावर
त्यानै पुन्हा लमकेल
नाहीं.
तिच्यापासून त्याला
एकंदर
स. १७४१ व त्या सत्यानासह ते पुन्हो चीमरक‘डॅ आते. ता.
सहा अपत्में इराकी.
१४ श्नाक्टोवर स १८०६ रॉजीं या शहराजवळ नेपोकिथ्ळानंवै
प्रशियन सैन्याचा पराभव केला.
कामास ड्रुरवात केल]. . १७६९ व तो व्हर्जिनियाच्या ठोक-
बेपाळ्-श्चा वनस्पतींत लॅ’प्र्टेनम'क्ष्र्धे इषोपोका षुगॉ,
इंप्रगोंत ज[लप, सत्कृसांत नेपाल, न्नहइंतळो, मराठीत नेपाळ,
हिदव्त जमालमोंटा वगैरे नाव आहेत. येकिझकन, हुत्र्डाज,
होट्ट बॅट्टप् ( निलगिरी
टॅकउयविरळोल
प्रदेश ), मसूर"!
( वायव्यद्दिमालयाकडोंल प्रदेश ) या ठिकाणी व कॉँकर्णांतद्दि
हो झाडे होतात. ह्याची पांनॅ मोगली एरंडळिच्या पाना-
त्वानॅ जस्टिस ऑफ दि पाँसच्या जप्गेपालून सार्वजनिक
समेंची सभासद ह्यमूळान निवडून आला; व नतर वाढत वाढत
१ ७०४ सार्ली र्कोटिर्तेटल कॉँप्रेसची सभासद झाला. तों बोरदऱर व सकाईंदळार लेखक असल्यामुळे त्याचे प्रथमपासुनच
लोकांवर चीगर्के वजन बसत चीलर्के. व[दप्र्वेवाद् माजविव्प्
त्याला पसंत नखे; आणि तों त्वतऱ्द्दि मोठासा
वक्त!
नव्हता.
या सुमारास इंग्लड व वसाहती
याचे
सारखाँ असतात व ची ए'रउथाप्रमा'फुंळा असते. पूर्वी हो तेल
राजकीय
र्सिकळोना झाडांच्यामन्ये लार्वांत, परंतु याहुय्ळें, सिकळोना
झाडांना नुकसान पोहोचते अते आढळून आल्यापासुन, ह“!
नैरनॅ दोनतौनदठें लोकसभा मोंडून टाकळी. प्रत्येक सभे’त
रात
बंद करण्यात
आलेली
आहे.
ओलसर,
रेताङ
व
ज्या ठिकाणी तावलळो असेल अशा जमिनळीत कलमे लावून
हो देल वप्उवितात. परंतु मोठया प्रमाणांत जर लागवड
करावयाची असेल
योग कर’णच
तर लहान लहान गांठाळ मुळया’ची उप-
चीगर्ले. या मुळ्या खट्टे रवमूळान,त्गांत एक…
फुटाच्या अतरानें आणि सुमारे ६ इंच खोल लावतात.
येलळोला वर चढता यार्वे म्हणून तिच्यामौवतों काळया
उभारतात.
उ प यरे गऱ्-…ह्य[ वेलच्च्या विया उर्फ जमालगोटा हे
फार तव्व जुलाचीर्वे
भौपघ म्हणून याची ख्याती
आहे. विचवाच्या विपावर ब्रेपाळ पाण्यांत उगाळून लाप्घेतात.
[ वाट; पदे. ]
जेफसैन’ थॅप्मस(
१७४३…
१८२६ )…हा ग्रु'रैटॅउ
त्टॅटुसर्नो ३ रा अध्यक्ष १ "८३ सावॉ जन्मला. त्याचीबाप
हा जुन्या सरदार घराण्यांपँकॉ अलूनद्दि तो र्डेमोंक्रॅ‘ट होता
त्यामुळे त्याची मुलगाद्दि
त्याच
वळणावर
गेला. गेफतेन
यास ल’ळा’टँन, भीक, फ्रेंच हॅपे’ळिनश, इटालियन व अग्लळोसॅ’वसन
इतक्या भाषा येत असत. शिवाय त्याचे विद्यार्नन आजन्म
चीर्दुट्रे’ होळो व त्यामुळे अखेरपर्येत अनेक विद्रानाशीं त्याची
भांडण
सुरू झाल;
व्हण्विमेयाच्या
लळोक॰
समेते आयातबँदळो वगैरे ठराव केले म्हणून तेथोल गव्हृ॰
जेंकतेन प्रमुख असे. ‘ वसाहतसव’
स्थापण्याकरितां फॉंटि’
मेटल कांग्रेस मरविण्याच्या पूर्वी इंग्लंड व वसाइतों यांच्या
राजकीय सवयाविपयळी एक पत्रक त्यार्ते प्रसिद्ध केल; त्यांत
› पूर्वी सेक्सन
डेन्स लेग्ष् इंग्लर्डात येऊन राहिले, ततेच
अमेरि'फैत इंग्लिश वसाहतवाले आल; तेव्हा हलळो डेंत्माकँची
ळिजतपत इ'ग्लङवर हक्क आहे दितपतच इंग्र्लडची वसाहर्तांवर
असावा; ’ अश’ तऱ्ट्टेर्ते विमिडपव्प् प्रतिपादन कैठें होते. या
पचीच्याच आधारावर इंग्लिश पालॅंर्षेटमघ्यें चकैर्ने आपल
वक्तृत्व लढविर्के. पुढें ‘ त्वातत्र्याची नाहोरनापा ’ तयार
करण्याची माना‘द्दे बेफसनलाव मिळाला. लार्डे नोंर्थच्या सभेयाच्या ड्रुचसांनर्ते उत्तरे त्यार्तेच दिल]. त्यामुळे र्वेजग्मिन
फेकळिलनयरळोवर शिष्टाईंला ज|ण्यार्वे काम त्यांच्यावर आलें,
पण ते नाकारून व्हर्जिनयाच्या लळोकसमैतच सभासद होऊन
अनेक उपयुक्त कायदे करण्याचे काम त्यानें कैह्ऽ त्याचवेळी
स्नार्वेन्निक्र शिक्षणपढत्ति त्यार्ते बुल कत्विलळो. शिक्षण-तान हें
घुरुफांरुचें कतेंव्म आहे, अर्ते प्रतिपादन करणारा पाहेला
अमेरिकन ळोकवायक जैफर्तेनच होय.
अमेरिकेतील सह्थासांत स्वतंत्र राज्यकारभार सुरू झाला
तेव्हां व्र्दा'टुंळानियाच्या गव्हनैरच्या ज[गॉ जफसैनची नेमणूक
झाला. तों गव्हनैर
असतां
१७८॰…८१
साला ब्रिटिश<noinclude></noinclude>
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Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "महोरप्ट्रीय न[नकळोस ( ज ) ३०६ जेमतेम, थें’ळामस जेषीळ सैन्यात त्वाऱ् या कलन व्’दांजेंनियाची ॰घुळधाण उडवून दिला, सरकारी खात्याची खचँ वराव कमी करून कित्येक ज[या पुढें फांयेसर्ने इं..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>महोरप्ट्रीय न[नकळोस ( ज ) ३०६
जेमतेम, थें’ळामस
जेषीळ
सैन्यात त्वाऱ् या कलन व्’दांजेंनियाची ॰घुळधाण उडवून दिला, सरकारी खात्याची खचँ वराव कमी करून कित्येक ज[या
पुढें फांयेसर्ने इंग्प्ठेउवरोंवर तहार्वे बाँलर्णे करणाऱ्या वकील- , कमी केल्या; सरकारदरवाराठया’तळिरक्त इतर ठिकाणी समामेङळांत त्याची दोनदा नेमणुक केली; पण ते सर्व न[कासन जहैंत तों उच्चची'व भाव विसरून सव’हेंवरौवर वरळोवरळोच्या
शैवर्टी काँग्रेसमध्ये त`[ काम करूं लागला. तेथें राज्यकारभार नात्याते वागत अस.
मिंळिश्मिम सैन्याची पुनयेटना, वदराची तटर्बंदौट्युरकारळो
प्रकर न[त व गुलामपद्वतोंच्या बँदज्स मतावुकूल्य तयार कर॰ हें
ण्यांत त्यार्ने वन्8मोंल मदत कळी. १७८४ते १७८९ याहुं कजहैंची फ्रेड, कर कमी करणें व युद्धांत न पडणाऱ्या
तटस्थ र[ष्ट्र[च्या समळुवावर’प्ल हकांर्वे जनन करण, हळो काम
सालात ता फ्रेंच दरवारा अमेरिकन वकील म्हणून राहिला.
फ्रान्समध्ये असताना त्यार्वे नैतिक आवरण दिल ॰होते अस
त्याते कळी. त्याने
ध्हृणतात. र्फेचीन! नशनल असव्ळीऱ् या कमेर्टामाप’च्त राज्य॰
घटना तयार करण्याच्या कामांत त्याला मदतफुंस बोंलाविल.
ण्यासांठो आरमाराची वाढ करणें, क[रख[`न व शहराची
व[ङ करते या कामी त्याची सहानुमति नव्हता; उलट
देशांत शांतता राखली;
व्यापार
वाढ-
तथापि रप्जकॉँय कारणासाठो त्याने त्या वहुयानाची ड्नकार
ड्प्तकररेंवगव्वर
केला.
त्टँटतेफ्रेंटत्ळोच्या ज[गॉ
सुमार ४० वर्ष सावैजगिक व्यवसायात धालार्वेला व १८॰९
साली प्रेसि’ङटचीं ज[ग[ सोडुन तो घर’॰[ वसला; तिसऱ्या वेळीं
नेमणुक झाला. त्यावेळी हॅमिल्टन हा खगिनदार होता. या
लौकानळो वितेति केळी असततेहे टुळिसडेंट होण्याचे त्यानॅ साफ
फ्रान्समघुन परत येताच त्याची
मात्र त्यांना
पूण
मर'वसा
दोघांची राज्ञकळोय मते परस्पर विरुद्ध होतां, त्यांच्या नेतृत्वा-
न[कारिंल्ऱ्ऽ व व[र्शिगटननॅ व[छुन [’दलैलहे
खालळीव अमेरिकन काँग्रेसमध्ये प्रथम ‘ र्डेमोंर्केट्स ’ व
‘ फेङरेळित्दृस ’ असे दोन पक्ष निर्माण झाले; त्यावेळी
फ्रान्सवरळोवर तटत्थबुर्तार्चे धोरण अमेरिकेने ठेंविलैं. जेफ’ट्वेंन
साचे उदाहरण गिरवित्ऱ्ऱ्.
त्याच मताचा होता व पुढें याच धोरणात
परिंणत
रव'तप
होता
त्यान
अ["॰ळोक[र=या॰
डेंन्फतेन वरळी वसला तरळो मॅडिसन, व मनव्रासारखे त्याचे
मोठे अनुयार्याद्दि हरएक प्रसगळी त्याची सल्लाघेण्यास येत. तो
प्रेमळडुंग्लउमयाल विहगमताची, चाणाक्ष, माणसांची पारखळी,
येऊन, हूंरोपळोय राजकारणापालून सर्वंत्वळी अलिप्त राहप्’याचें
धूते, घोरणळो, मिटते येणारा, मनळिमळाऊ
व ‘ अमेरिकनाकरता अमेरिका,’ यूतेपळोयसांन‘व् विकडॉल
कारभारात पडता कामा नये, अस॰ मनरो ड[यिऱ्टुन’ म्हृणन
यासद्व असलल
तत्त्व निघाल.
बेफसनन
तटस्थ-
तत्त्`व पराकोटग्तळील असत व त्यास प्रतिपध्'दना’हे तळो वित’
वयाच नित्सीम आत्मविश्वासार्ने व व[णेतारपणनि करळो.
पुलाच्या तत्त्वानुसार इतकँ उत्कृष्ट काम केल कळी खुद्द होम-
असे.
त्याची
त्याची राजफॉंय मते तत्वज्ञान व बुतदयाप्रेरित असत.
मतदारांच्या बुद्वळीस पटॅल अश[ तऱ्हेते गोष्ठी त्याच्यापुढे
ल्टनन् या फेउतेलत्टपक्षानाहे त्याची पात्र् थोपटलळी. तथापि
दोन पक्षांचील मतभेद वाढतच गेला, हॅमिल्टनची कल
मांडप्व्यात व त्यार्वे अज्ञान दूर कराव, अशा तुंवुद्व मतदार
इंम्लङ व विप्टशराज्यपद्वत्ति
न्यायार्चे राज्य होय, असें त्याबें ठाम मत होते. या त्य["""
लागला. उलट जफसनचा
इकर्डच
अघिकाणिक
लोकमतानुवता
श्रद्धा रँसमराद्दे ढळली न[हळो,
त्यत्युळे
अमेरिकन लोकशाहोचा मूमर्लमत पुतळा
लागले.
प्रे. व[ळिशगूटनला हे दोन विरोघी
व[हूं
राज्यप’द्वातीवरौल
अ हेंर
अस
सयाच्या मताघिवथानॅ चालविलेला राज्यकारभार हेच
प्रतिपादितैल्या
तत्वांवरच
हक्कीची
अमेरिकन
लोकशाही
एकटयाच्या
प्रयत्नाने
जफतेनलाच
उभारलेली आहे.
लाक
मान
अमेरिकेतील त्वराज्याची प्रयोग यशत्ची कलन दाखविला.
जेंफतेनर्ने देंळावटवै आयुष्य व्हजिंनियाची युनिव्हर्सिटी
व[ट्रॅ
त्थापण्यांत खवै केल. त्यार्ते दाखविलेल्या घोरणानॅच पुढे
१९ व्या शतकाच्या अखेंरव्स अमेरिकेतील युनिव्इर्सिटर्याचे
उद्देश, व्यवस्था व अभ्यास-कम ठरविण्यात आले आहेत.
अरवेर अखेर तेफतेनची पैशाच्या व[वतव्न वरव्चशळी ओढा०
ताण होऊं लागलळो. त्याची जमीन पुष्कळ अतृनद्दि उत्पन्न
थोडे येदे. त्यामुळे त्याला आपलळी १०००० निवडक ग्रंथांची
लायब्ररी कमी किमतळोस [’वकप्वळी लागला; तेव्हां अखेर राट्रोय
वगेणी गोळा करून त्याला १६५॰॰ पौड देण्यांत आल.
अखेर तो ४ जुलै १८२६ रोजी मरण पावला. [ विटा. पु.
१५ र’न्डॉल्फ-र्थामस बेफत्’देन; [दे जेफसन सायफो].
मुत्सद्दी असह्य
लागते ते ज[णन खासगी
व
परस्थिर्तीमुर्के त्रावून बेफतेनर्ने
राचीनामा दिला. स. १७९६ च्या निवडणुकींत जैफस॰
मला दुसऱ्या नवरची मते [मछून तत्काळोन नियमानुसार सळो
व्हाइस प्रे[सर्डेट आला. व पुढें १८०० मधाल निवडणुकात
(हँमिल्टनर्ते बेफतेनला मदत केल्यामुळ) यासहुन्ट झाला.
त्यावेळी फेडरलफ्क्षाशॉ त्यातें समेंटाच धारण टॅवल. त्यामुळे
सन १८०४ मध्ये झालेल्या निववणुकोंता‘हे तो प्रेनिहू‘ट निव’
मून आला.
खाजगी वतनाप्रमार्णे सरकात्ळी कामांताहे त्यार्ने सायेपणा
राखला. त्यानॅ थ[टम[ट[चे समार‘म बंद केल, रक्त: प्रेसिडेटची चप्बँ घेण्यास तळो अगदळो साध्या पोशाखांत व ठराविक
सहा घोड्यांच्या मासात न वसतां पप्यॉच गेला. प्रेळिसडें’टची
व[ढळिदवस सरकप्रा खचीनॅ साजरा करण्यात त्यानॅ वेद केल.
त्याने आपल्या
खरॅ
बेबोंळ (प्राचीन जेंवल×यिव्च्स )…हें सिरिंपांतोल
शहर वैत्नच्या उत्तरेस ॰॰ मैलावर आहे.
१॥ मैल पारघाची कोट असन आमेय टोंग्कास
आहे. जेंचलची र[ज[ ज[हावमतेक याची एक
याच्याभौवतौ
एक किल्ला
न[[तत्तेम<noinclude></noinclude>
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पान:महाराष्ट्रीय ज्ञानकोश शरीरखंड विभाग चवदावा जलपैगुरी-तपून.pdf/१३४
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2026-09-23T07:27:16Z
Priyanka Choudhari
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/* तपासणी करायचे साहित्य */ नवीन पान "मदप्राट्रीप न[नकरेंरा [ज ) ३०७ जेरुसय्ऊन ड्रुव्यवस्थित राज्यकारभार सुरू केला. येथें सांपउला आहे. येथील लोकसख्या सुमारे ३० ॰० आहे. पड्रेग्निशियन बेघल व प्रळोक विव्लस येथळोल रहिव..."
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<noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka Choudhari" /></noinclude>मदप्राट्रीप न[नकरेंरा [ज ) ३०७
जेरुसय्ऊन
ड्रुव्यवस्थित राज्यकारभार सुरू केला.
येथें सांपउला आहे. येथील लोकसख्या सुमारे ३० ॰०
आहे. पड्रेग्निशियन बेघल व प्रळोक विव्लस येथळोल रहिवाशी
न[गले पाथरवट
व जहार्ते बांधण्यात निपुण गणले
मुसलमानी अमलाखालळो या शहराची ऱ्हास झाला.
दुरम्प्तटाऊन-हें
सयुक्त
अमेरिंर्केतोंल
वेल्स राजे
उत्तेजन [दे'ल व घमेसत्तेला
त्यामें उच्चळोगघंद्यास
राजसतेच्या
वचँत्वाखालाँ
आण`ल. येवढ्यावह्मवच तळो द्रुवळा राया नव्हता किंवा
. पवतपृखैद्दि नव्हता अस सिद्ध होते. त्याची राजकारर्णाऱ
प्रांतांताल , ध्येय ग'ळाठण्याची सप्घनें
अयोग्य असल्यामुळे त्याचे
जात.
शिटाका काटंटळार्चे' मुख्य स्थान. हे शिटाका सरोवराच्या [ खरे गुण पुर्टाल पिउयांस विद्रुप भासतात. वकराज’
दक्षिणेस आहे. ला. स. ( १९॰॰ ) २२८९२. येथे रेल्ड्रेवै नळोतळो( [कम …कँ’फ्ट )चें शिक्षण त्याला मूळपासून
दोन काटे असून शिवाय आगवोट'ळोची सरळोवरातून रहदारी मिळाले होते. वचन देणे व ते मोवणें हा त्याची
गेंस व
नैहमीची कम होता. शिवाय क्रुरवप शरीर, वङवडया स्वभाव,
ज्ञलशप्’क्त यामुळे उद्योगधंयांनां वि`शप तेजळो आळी आहे.ह्या
शहरास १८८६ मध्ये शहराचे हक्क प्रथमत; मिळाले. गेम्स
प्रेन्उरगात्ट या कुन्या वसाहतवऱ्ल्याचँ नाव या शहरास
देण्यात आल आहे.
त्कॉंच त्तेह्यांवरळील देणग्यांची वर्षाव वयेरे गोष्टांमुर्के तो
ईंग्लङवि अप्रिय वनून अनियंत्रित राज्यकारभाराच्या प्रयत्नामुळें राजपक्ष व पालवृग्टपक्ष यांच्यांमघांल यादवा
युद्धा ची त्याहै; पाया घातला. त्पेंन या कँणो’लक देशावरोवर
चालते. हें उन्हाळ्यात हवा खप्ण्यावें ठिकाण आहे.
जेम्स-सेरी सौद्स-ज्या
दामोदरवसपनारायण
व[ळच्या
या
ठिकाणी हुगळी नद’.श॰[
नद्यांची संगम होतो
सख्य जव्ङण्याची प्रयत्न फसल्यामुळें
कारच’हात्यात्पद ठरली.
प्रसिद्ध होण्याची मौठळो
तेथळोल
पुळर्णांस हे नाव आहे. हळोपुळण ३ मैल लांब
त्याच“! कल्लानि
जेम्सला प्रथकर्तां म्हणून
इच्छा होतळो व[मूळान त्याने
जेम्स आणि
बरेच लिखाण लिहिते. ते वाङ्मय या दृष्टीने अगदॉ सामान्य
मेरा या न[वार्वे गलवत या ठिकाणी फुटले होते म्हणून
दनीये’ असते तरी इंग्लंडच्या रानावलौत विद्वात्तेच्या बाबतीत
हांस हे नाव मिळाले आहे.
त्याची नवर वराच वर लागतो.
दुसराबेम्स (१ ६ ३ ३” १ ७० १):'ह[ या’द्देल्या चीतेस र[ज[च[
व व मैल
रुंद्र् आहे’
इ, स. १६६४ मध्ये
हो पुळण
नद॰[च्या मध्यभागों
अ’टून दोन्ही व[बूस नदळीये पात्र आहे. ही जागा
अतिशय घोवयाची असल्याते तो सुधारण्याचे प्रयत्न काय
करावयाचे या
विषयीच्या
योजनांचा
विचार
जेंल्ष्ठ राहुन-…या नावाचे र[`च्[ ‘इग्लव व
दोन देश, अरेगान प्रांत ( फ्रान्स ) आणि
इतक्या
ठिकाणी होऊन गेले. त्यांवेंकळो हंग्लउ
लङ येथळोल
राबेच
विशप
बेम्स नावाची एक तोंतया
मइत्वावे
(ओल्ड
मुलगा दुसऱ्या चालत र[ज[न॰त॰र१६८५साल“[ यादव्वर आला.
तो युद्धकलाक्रुशल होता. उन युद्धांत" जय मिळवून त्याने
होत आहे.
त्काटलेङ हे आरमारी लढाईंतल करैशल्य व्यक्त र्केळेंपण त्यार्वे खासगळो नतेंन
भाजळोकळी बेट 3 व[गले नव्हतें. शिवाय तळो उघडपणे रामन कँथव्ळिकपथी
व स्कॉट- बनला. राज्यावर आल्यावर त्यानें कँ’र्योळिकावरळोल नियंत्रण
अद्दित.
शिवाय
दूर कर॰याची व त्यांना अधिकाराच्या ज[गा
श्रिर्टेङर ) इंग्लट्व'प्त
'
होऊन गेला.
इं ग्ल ड हेंच जें म्स रा जें.--य[ नावाचे एकंदर दोनच '
रातै आल. ते इंग्लंडच्या ल्टुअटे घराण्यातील अहूंन तोतया
वेम्साहे त्याच घराण्यात आला.
त्यांना रानकॉय इतिहास `
‘ ड्रेग्लड ’ या लेखांत दिला आहे.
'
देण्याची कम
सुरू केल्यामुळे रऱ्जकव्य जुळून व धार्मिक ट्टराप्रह यांनी
सर्वे देशांत फार असंतोष माजला. त्याबें‘ पयववान स.१ ६ ८८
च्या राजफांतोंत आते. नंतर पवूऱ्न ज[ऊन तो फ्रान्समध्ये
रानाध्रयाखालळो राहिला. आयर्केउमघ्ये वड उभालन
गेललेराजपद पुन्हां मिळविण्याची त्याने प्रयत्न केला पण तो
फसला. नंतर मरेपर्मेत तो मोठा स|घुपुव्ष वतून रे[ग वरे
पहिला जेम्स (१५६६…१६२५):॰॰ह[व मूळ खाँद्लह्र-
करण्याचे अद्रुत चमत्कार कर॰[त कन्समथ्यें राहिला. त्याला
अन हाड्ङ न[वाच्यावायकोंपाहूंन आठ मुल, मॉउनाची मेरा
मधील सहावा जेम्स र[ज[ अतुंन इंग्लंडच्या एळिआदेय
राणीन'तर औंरस वारस नसल्यामुळे नन्रीकची व[रस बेम्स हा या व[यकळोयासुन सात मुल आणि दुसऱ्या दोन उफ्स्निपां.
ट्रॅग्लइ व ल्काटलड या दोन देशांची सयुक्त राजा झाला. हा वाहुन क[हृ’॰[ मुलगे व मुली मिळून वर‘टॅच अपत्ये होर्तो.
जम्स, थोरला तळोतया (१६८८-१७६६):…ह[ दुसऱ्या
त्कॉँटलउची राणी मेर’[(फांन आप; त्र्कोटुस ) व [’तेची दुसरा
नवरा ड[र्मंले यांची मुलगा होय. नेरळोच्या सशयित दुवर्वेना- जेम्सचग् मुलग व[पानें राज्य "पावल्यावर फ्रान्सच्या राजघ्च्या
मुळे तळी पदम्रष्ट होऊन जेम्स हा एक वर्षांची असतांना ` आश्रयास राहिला होता, व फ्रान्स ची र[ज[ चवदावा लई
याच्या मदतोंनें त्यार्ने १७१५ साली राज्य परत
त्कॉँटलउवा राबा झाला. तो लहानपणाद्रुनृन अगदळी अशक्त
मिळविण्याका‘रेसां त्चॅटलडमघ्ये बँड वेट्रॅल पण ते कसले.
होता. तथापि घोड्यावरून रपेट करण्याची त्याला फार नाद
होता. त्याला ले’टिंन व फ्रेंच भाषांवै चीगले व[त॰व प्रव्टेत्र्टट १७१८ सालळो जेम्सर्ने पोलेडच्या राजघराण्यांतव्ल मेरिआ
घमँपेथावै उत्तम
शिक्षण देण्यात आल होते. त्यामुळे
क्केमॅटिनाशॉ लय करण्याचे ठरविले. पण फ्रेंच र।ज[ ठुईं
तो विदैग्ची व[हता पण घमेङखोर वनला. वयांत आल्यायार्ने त्यास विरळोघ केल्यावर दोघांची ऽटलॉत पवूऱ्न विवाद
वर त्यानें लौटलडांतव्ल सरदाराची अरेरावळोबेद कलन [ लावला. पळोपनॅ त्यांनांइंग्लॅडवैराना राणी म्हणून नाव<noinclude></noinclude>
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