विकिस्रोत mrwikisource https://mr.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.21 first-letter मिडिया विशेष चर्चा सदस्य सदस्य चर्चा विकिस्रोत विकिस्रोत चर्चा चित्र चित्र चर्चा मिडियाविकी मिडियाविकी चर्चा साचा साचा चर्चा सहाय्य सहाय्य चर्चा वर्ग वर्ग चर्चा दालन दालन चर्चा साहित्यिक साहित्यिक चर्चा पान पान चर्चा अनुक्रमणिका अनुक्रमणिका चर्चा TimedText TimedText talk विभाग विभाग चर्चा Event Event talk अनुक्रमणिका:छन्दोरचना.djvu 106 2141 237421 237193 2026-09-25T02:37:57Z कल्पनाशक्ती 3813 237421 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=[[छन्दोरचना]] |Language=mr |Volume= |Author=डॉ. [[साहित्यिक:माधव त्रिंबक पटवर्धन|माधव त्रिंबक पटवर्धन]] ऊर्फ माधव जूलियन (२१ जानेवारी, इ.स. १८९४; बडोदा - २९ नोव्हेंबर, इ.स. १९३९) |Translator= |Editor= |Illustrator= |School= |Publisher=M. N. Kulkarni , कर्नाटक पब्लिशिंग हाउस |Address=(चीरा बाजार) मुम्बअी २ |Year=1937 |Key= |ISBN= |OCLC= |LCCN= |BNF_ARK= |ARC= |Source=djvu |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist 4="INTRODUCTION" 6 ="सिंहावलोकन" 10 ="अनुक्रमणिका" 14="सङ्क्षेपांचें स्पष्टीकरण" 28="अध्याय १ ला काही छन्दोविषयक प्रश्न"/> |Volumes= |Remarks=<inputbox> type=fulltext prefix= पान:छन्दोरचना break=no width=10 searchbuttonlabel=छन्दोरचनातील माहिती शोधा </inputbox> |Width= |Css= |Header= |Footer= }} e8aih8bty237m1bryfk1bfw0i5yq3m8 पान:छन्दोरचना.djvu/२ 104 2173 237423 237175 2026-09-25T06:45:10Z कल्पनाशक्ती 3813 237423 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="कल्पनाशक्ती" /></noinclude><br>{{center|{{x-larger|'''माधव-जूलियन् यांचे काव्यग्रन्थ'''}}}} {{Block center|<poem>'''१ विरहतरङ्ग''' '''२ सुधारक''' '''३ द्राक्षकन्या''' '''४ गज्जलाञ्जलि''' '''५ स्वप्नरञ्जन'''</poem>}} {{center|{{x-larger|'''प्रकाशित व्हावयाचे'''}}}} {{Block center|<poem>'''१ नकुलालङ्कार''' '''२ सुनीताञ्जलि'''</poem>}} {{center|{{x-larger|'''प्रा. माधव त्रिं पटवर्धन यांचे ग्रन्थ'''}}}} <center> {{Block center|<poem>'''१ फार्सी-मराठी कोश''' '''२ छन्दोरचना (२ री आवृत्ती)''' '''३ अुमरखय्यामकृत रुबाया'''</poem>}} <br><br><br> {{center|Printed by M. N. Kulkarni at the Karnatak Primtikg Press, Chira Bazar,<br>Bombay, and published by him at the Karnatak Publishing House,<br>Chira Bazar, Bombay 2.}} {{nop}}<noinclude></noinclude> c97s2th4jghagay2x57eiasxevj2p01 पान:छन्दोरचना.djvu/३ 104 5181 237424 237176 2026-09-25T06:47:24Z कल्पनाशक्ती 3813 237424 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने}}</noinclude><br><br><br><br><br><br> {{center|थोरले मामा}}<br><Br> {{center|{{x-larger|'''श्रीयुत महादेव विश्वनाथ सहस्रबुद्धे, बडोदें'''}}}}<br><Br> {{center|यांस}}<br><br> {{center|{{x-larger|'''सादर समर्पण'''}}}}}} <br><br><br><br><br><br>{{nop}}<noinclude></noinclude> ea81dibk9c8mgmoxs54l3d3q4qrymxo 237425 237424 2026-09-25T06:47:46Z कल्पनाशक्ती 3813 237425 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने}}</noinclude><br><br><br><br><br><br> {{center|थोरले मामा}}<br> {{center|{{x-larger|'''श्रीयुत महादेव विश्वनाथ सहस्रबुद्धे, बडोदें'''}}}}<br> {{center|यांस}}<br> {{center|{{x-larger|'''सादर समर्पण'''}}}}}} <br><br><br><br><br><br>{{nop}}<noinclude></noinclude> fcemf7gi5tkdffml1pdj8mzq8v2m6mr 237426 237425 2026-09-25T06:48:12Z कल्पनाशक्ती 3813 237426 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने}}</noinclude><br><br><br><br><br><br> {{center|थोरले मामा}}<br> {{center|{{x-larger|'''श्रीयुत महादेव विश्वनाथ सहस्रबुद्धे, बडोदें'''}}}}<br> {{center|यांस}}<br> {{center|{{x-larger|'''सादर समर्पण'''}}}} <br><br><br><br><br><br>{{nop}}<noinclude></noinclude> 2mqlf24j2hprs0gtd6kd1r82trcx5f8 पान:छन्दोरचना.djvu/३६ 104 5315 237438 15063 2026-09-25T11:38:26Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237438 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''९'''|<u>'''काही छन्दोविषयक प्रश्न'''</u>}} {{block center/s}}</noinclude>रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम् रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर" {{block center/e}} या रामनामाचीं विभक्तिरूपें साङ्गणाऱ्या सुप्रसिद्ध श्लोकापेक्षा निराळ्या चालीवर म्हणण्यांत येतो, पण वस्तुतः दोन्ही श्लोक शार्दूलविक्रीडित नावाच्या अेकाच वृत्तांतील आहेत. फार कशाला, ज्या श्लोकाचे चारी चरण अगदी सारखे असतात त्या श्लोकांतहि दुसरा चरण पहिल्या चरणाहून किञ्चित् निराळ्या रीतीने म्हटला जातो.<ref>पहिल्या व तिसऱ्या चरणांचा न्यास बहुतेक वृत्तांत ऋषभ स्वरावर होतो तर दुसऱ्या व चौथ्या चरणांचा न्यास षड्जावर होतो. अदाहरणार्थ, अिन्द्रवज्रा म्हणतांना पहिल्या चरणांत सा सा रे ग म प म ग रे सा रे असा स्वरक्रम असतो तर दुसऱ्या चरणांत ग ग रे सा नि नि रे ग रे सा सा असा स्वरक्रम होतो; पण छन्दोदृष्टया दोन्ही चरण अभिन्नच असतात. अुलटपक्षी स्वागता आणि रथोद्धता ही वृत्तें भिन्न भिन्न आहेत तथापि त्यांचें स्वरलेखन अेकच आहे. प्रो. ग. ह. रानडे यांचा लेख पहा. (भारतीय सङ्गीत ३/२)</ref> भूपाळी, लावणी या चाली आहेत, या भिन्न- भिन्न जाती नव्हत. 'घनश्याम सुन्दरा श्रीधरा अरुणोदय झाला' ही होनाजी बाळाची सुप्रसिद्ध भूपाळी लावणीसारखी म्हणतां येअील, तर अुलटपक्षी प्रभाकराची 'कधि ग भेटशिल अता जिवाचे जिवलग मैतरणी' ही लावणी थेट भूपाळीसारखी म्हणतां येअील. आंतील विषयाला अनुकूल अशी चाल पद्याला लाविल्याने पद्याच्या सरसतेंत भर पडते. वैचित्र्याच्या रसपरिपोषक सूक्ष्म छटा या श्रुतिसिद्ध कवीच्या रचनेत जशा येअू शकतात तशा त्या धोपटमार्गी कवीच्या रचनेंत येअू शकत नाहीत. {{center|'''८ काव्यपठन आणि गायन'''}} {{gap}}छन्दाला चाल लागत असली तरी छन्द वा काव्य म्हणजे सङ्गीत नव्हे. छन्द म्हणजे लयबद्ध अक्षररचना होय. ही अक्षरशः पहातां अष्टमात्रक, सप्तमात्रक, षण्मात्रक, पञ्चमात्रक आणि चतुर्मात्रक अशा आवर्तनाची असते. परन्तु गायकी तालांची सङ्ख्या पाचच आहे असें नाही. अक्षरशः पहातां भिन्न तालांत बसणारें पद्य गवअी मात्रा जुळवून घेऊन निराळ्याच तालांत<noinclude><Hr>{{reflist}}</noinclude> bvtm50t7hm9cr987n8496ahc9uoidza पान:छन्दोरचना.djvu/22 104 5738 237415 237202 2026-09-25T01:35:14Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237415 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''२३'''|<u>'''सङ्क्षेप'''</u>}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | महानुभावीयकाव्यांतील काही नवीन छन्द. || मका |- | मधुमाधव || मधुमा |- | मनोहर मासिक. || मनोमा |- | महाभारत || मभा |- | महाभाष्य || मभाष्य |- | श्रीकृष्णकविविरचित मन्दारमरन्दाचम्पू. || ममच |- | मध्वमुनीश्वराची कविता. || ममुक |- | महाराष्ट्रशारदा || मशा |- | मङ्खककृत श्रीकण्ठचरित. || मश्री |- | मराठे कु. सञ्जीवनी. || मस |- | मायदेवकृत अभिनयगीत. || माअ |- | माळव्यांतील अर्वाचीन कवि || माअक |- | माधव (के. मा. काटदरे ) कवीची कविता. || माक |- | माडखोलकर रा. त्र्यं. || मागत्र्यं |- | माधव जूलियनूकृत गज्जलाञ्जलि. || माजूग |- | माधवजूलियनूकृत द्राक्षकन्या. || माजूद्रा |- | माधवजूलियनूकृत स्वप्नरञ्जन. || माजूस्व |- | माधवी || माध |- | माधवानुजांची कविता. || मानुक |- | मायदेवकृत भावतरङ्ग. || माभा |- | मायामच्छिन्द्र बोलपट. || मामबो |- | माढेकर, मा. ह. || मामाह |- | मालविका || माल |- | मायदेवकृत शिशुगीत. || माशि |- | मुक्तेश्वरकृत रामायण अुत्तरकाण्ड. || मुराअु |- | मोरोपन्तकृत अहल्योद्धार. || मोअ |- | {{gap}}"{{gap}} कुशलवाख्यान || मोकुल |- | {{gap}}"{{gap}} कृष्णविजय || मोकृवि |- | {{gap}}"{{gap}} दोहा रामायण. || मोदारो<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> hbgaukcrgd5dwp9bvls1l45rhuqna34 पान:छन्दोरचना.djvu/23 104 5739 237416 237203 2026-09-25T01:50:36Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237416 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''२४'''|}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | मोरोपन्ती प्रकरणें || मोप्र |- | {{gap}}"{{gap}} भीष्मभक्तिभाग्य || मोभीभ |- | {{gap}}"{{gap}} मञ्जुरामायण || मोमञ्जु |- | शङ्कराचार्यकृत मोहमुद्गर. || मोमु |- | मोरोपन्त कृत विराटपर्व. || मोविप |- | {{gap}}"{{gap}}विठ्ठलप्रणधि || मोविप्र |- | {{gap}}"{{gap}}विबुधप्रिय रामायण. || मोविबु |- | {{gap}}"{{gap}}विचित्र रामायण. || मोविरा |- | {{gap}}"{{gap}}विठ्ठलस्तुति || मोविस्तु |- | {{gap}}"{{gap}}समग्र ग्रन्थ. || मोसग्र |- | {{gap}}"{{gap}}सवया रामायण अुत्तरकाण्ड. || मोसराअु |- | {{gap}}"{{gap}}सार रामायण. || मोसारा |- | {{gap}}"{{gap}}सीता रामायण. || मोसीरा |- | {{gap}}"{{gap}}स्फुटकाव्यें || मोस्फुका |- | यशवन्तकृत्त यशोगन्ध. || यम |- | {{gap}}"{{gap}}जयमङ्गला || यज |- | {{gap}}"{{gap}}यशोधन || यध |- | {{gap}}"{{gap}}बन्दिशाळा || यब |- | {{gap}}"{{gap}}भावमन्थन || यभा |- | यशवन्त मासिक. || यमा |- | युवराजप्रणीत रससदन भाण. || युर |- | रघुवंश || रघु |- | न. शं. रहाळकरकृत पुष्पाञ्जलि. || रपु |- | कु. रणदिवे मालती. || रमा |- | रत्नाकरमासिक || रमा |- | रत्नाकरकृत हरविजय. || रह |- | राजशेखरकृत कर्पूरमञ्जरी. || राक |- | रामदासकृत करुणाष्टकें, धाट्या, सवाया. || राकधास |- | राघवकवि || राघव<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> jn9kig6nybqkwbeq3cghjuvsko7w50e पान:छन्दोरचना.djvu/24 104 5740 237417 237204 2026-09-25T02:05:50Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237417 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''२५'''|<u>'''सङ्क्षेप'''</u>}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | राजकवि चन्द्रशेखर. || राच |- | (भिरा) राघवीय परीवाह. || राप |- | राजाराम प्रासादी. || राप्रा |- | रामदासकृत भीमरूपी स्तोत्रे. || राभास्तो |- | कु. मनोरमाबाअी रानडे. || राम |- | रामजोशीकृत लावण्या || राला |- | प्रो. श्रीधर बाळकृष्ण रानडे. || राश्री |- | रूपदेवकृत स्तवमाला. || रूस्तमा |- | रेन्दाळकरांची कविता. || रेक |- | लघुकाव्यमाला || लकामा |- | ललितविस्तर || लवि |- | ओलस्व पहा || लस्व |- | लक्ष्मण गणेश लेलेकृत तिलकनिधन || लेति |- | || |- | || |- | वकील व्यङ्कटेश शङ्कर. || वव्यश |- | वराहमिहिरकृत बृहत्संहिता || वबृ |- | वराहमिहिरकृत बृहज्जातक || वबृजा |- | वाग्भटकृत अष्टांगहृदय अुत्तरस्थान. || वाअअु |- | {{gap}}"{{gap}}"{{gap}}चिकित्सास्थान || वाअचि |- | वामनी ग्रन्थ. || वाग्र |- | वामनकृत द्वारकाविजय || वाद्वा |- | वामनकृत भागवत रामायण. || वाभारा |- | दामोदरमिश्रविरचित वाणीभूषण || वाभू |- | वागीश्वरी मासिक || वामा |- | वामन विराटपर्व || वावि |- | वाङ्मयश्रीखण्ड—पद्यविभाग || वाश्रीपवि |- | वामनकृत हरिविजय || वाहवि |- | विनायकाची कविता || विक<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> c0jvqzgp2qf8tuyizxj5wb1656ox3v5 237418 237417 2026-09-25T02:06:55Z कल्पनाशक्ती 3813 237418 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''२५'''|<u>'''सङ्क्षेप'''</u>}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | राजकवि चन्द्रशेखर. || राच |- | (भिरा) राघवीय परीवाह. || राप |- | राजाराम प्रासादी. || राप्रा |- | रामदासकृत भीमरूपी स्तोत्रे. || राभास्तो |- | कु. मनोरमाबाअी रानडे. || राम |- | रामजोशीकृत लावण्या || राला |- | प्रो. श्रीधर बाळकृष्ण रानडे. || राश्री |- | रूपदेवकृत स्तवमाला. || रूस्तमा |- | रेन्दाळकरांची कविता. || रेक |- | लघुकाव्यमाला || लकामा |- | ललितविस्तर || लवि |- | ओलस्व पहा || लस्व |- | लक्ष्मण गणेश लेलेकृत तिलकनिधन || लेति |- | xxxx || xxxxx |- | || |- | वकील व्यङ्कटेश शङ्कर. || वव्यश |- | वराहमिहिरकृत बृहत्संहिता || वबृ |- | वराहमिहिरकृत बृहज्जातक || वबृजा |- | वाग्भटकृत अष्टांगहृदय अुत्तरस्थान. || वाअअु |- | {{gap}}"{{gap}}"{{gap}}चिकित्सास्थान || वाअचि |- | वामनी ग्रन्थ. || वाग्र |- | वामनकृत द्वारकाविजय || वाद्वा |- | वामनकृत भागवत रामायण. || वाभारा |- | दामोदरमिश्रविरचित वाणीभूषण || वाभू |- | वागीश्वरी मासिक || वामा |- | वामन विराटपर्व || वावि |- | वाङ्मयश्रीखण्ड—पद्यविभाग || वाश्रीपवि |- | वामनकृत हरिविजय || वाहवि |- | विनायकाची कविता || विक<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> mjaizsh7tddodqlhwyv6oir2kgsyy4p पान:छन्दोरचना.djvu/25 104 5741 237419 237205 2026-09-25T02:22:51Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237419 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''२६'''|}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | विठोबाअण्णा दप्तरदारकृत पदसङ्ग्रह || विदप |- | विठ्ठलकृत पदसङ्ग्रह || विप |- | विरागीकृत मधुसम्भार || विम |- | विहङ्गम मासिक || विमा |- | विश्ववाणी मासिक || विमा |- | विठ्ठलकृत रसमञ्जरी || विरस |- | विठ्ठलकृत रुक्मिणी स्वयंवर || विरुस्व |- | विविधज्ञानविस्तार मासिक. || विविमा |- | विदर्भवीणा || विवी |- | विरहाङ्ककृत वृत्तजातिसमुच्चय. || विवृ |- | वीरेश्वरकृत गजमुखचरित. || वीगच |- | परशुराम तात्या गोडबोलेकृत वृत्तदर्पण. || वृद |- | वेङ्कटाध्वरिकृत लक्ष्मीसहस्र || वेलस |- | {{gap}}"{{gap}} विश्वगुणादर्शचम्पू || वेविच |- | शङ्कराचार्यप्रणीत गोविन्दाष्टक || शगो |- | शशाङ्क ( बा. मा. दाभाडेकृत ) मालती. || शमा |- | शाङ्कर ग्रन्थावलि || शांग्र |- | शार्ङ्गधरपद्धति || शाप |- | शिशुपालवध || शिशु |- | श्रीधरस्वामी || श्रीस्वा |- | सहविचार द्वैमासिक. || सद्वै |- | सरपटवार, नारायण माधव. || सनामा |- | सञ्जीवनी पाक्षिक || सपा |- | सबनीस पाण्डुरङ्ग जिवाजी || सपांजि |- | सरन्जामे रघुनाथ दत्तात्रय || सरद |- | वि. ज. सहस्रबुद्धेकृत हुरूप || सहु |- | साधुदास || सा |- | सुहृत्चम्पाकृत साधना आणि अितर कविता. || साआअिक |- | साधुदासकृत गृहविहार || सागृ<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> e379v8mov8nezxds6xc9h4da4v9uk6t पान:छन्दोरचना.djvu/26 104 5742 237420 237206 2026-09-25T02:36:26Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237420 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''२७'''|<u>'''सङ्क्षेप'''</u>}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | साहित्यदर्पण || साद |- | साधुदासकृत निर्माल्यसङ्ग्रह || सानि |- | साधुदासकृत रणविहार || सार |- | सावरकरकृत रानफुलें || सारा |- | साधुदासकृत वनविहार || साव |- | सुगी || सुगी |- | सुमन्तकृत भावलहरी || सुभा |- | सुभाषितावलि || सुभाषि |- | सुमन्तकृत माझे दुर्दिन. || सुमादु |- | सुमन्तकृत मौक्तिकमाला || सुमौ |- | सुमनहार || सुहा |- | सूत्रकृताङ्ग || सूकृ |- | सोहिरोबा अम्बिये यांचा पद्यसङ्ग्रह. || सोआप |- | के. म. सोनाळकरकृत कमलपराग || सोक |- | सोपानदेव चौधरीकृत काव्यकेतकीनक || सोका |- | सोपानदेव चौधरी || सोचौ |- | सोमदेवकृत यशस्तिलकचम्पू || सोय |- | स्नेहप्रभा || स्नेप्र |- | स्फूर्ति मासिक || स्फूमा |- | स्वयम्भूच्छन्द || स्व |- | माजूस्व पहा. || स्वर |- | वि. प. पण्डितसम्पादित. स्त्रीगायनसङ्ग्रह. || स्त्रीगास |- | हरिचन्द्रकृत धर्मशर्माभ्युदयकाव्य || हधश |- | हेमचन्द्रकृत छन्दोनुशासन || हे |- | ज्ञानेश्वर || ज्ञा |- | ज्ञानप्रकाश दैनिक || ज्ञाप्र |} </center> {{rule|5em}}{{nop}}<noinclude></noinclude> o0xbqs1bh3r8kof9hjgcu9tvuxdt3k3 पान:छन्दोरचना.djvu/28 104 5744 237427 15531 2026-09-25T06:57:22Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237427 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}}</noinclude><br> {{xx-larger|{{center|'''छन्दोरचना'''}}}} {{rule|3em}}{{rule|5em}}{{rule|3em}} {{x-larger|{{center|'''अध्याय १ ला'''}}}} {{x-larger|{{center|'''काही छन्दोविषयक प्रश्न'''}}}} <Br> {{Block center|<poem>"अये कविमनोभवे, सहजसम्भवे स्वामिनी, सु-वर्णमयदेहिनी, नवरसात्मके, भामिनी, प्रसाद-मयजीविते, अनुविचारसञ्चारिणी, चमत्कृतिविलासिनी, रसिकसन्मनोहारिणी !" {{right|(च ११५)}}</poem>}} {{gap}}अशा यथार्थ शब्दांनी ज्या 'कविता-रती'चें आवाहन राजकवि चन्द्रशेखर यांनी केलें आहे तिचा सहवास जितका हृदयङ्गम नि सरस असणार तितकाच तिच्या अवयव-रचनेचा म्हणजे छन्दःशास्त्राचा अभ्यास हा केवळ बुद्धिगम्य आणि रुक्ष वाटणार हे अुघड आहे. काव्यानुभूतीच्या पुढे जर काव्यमीमांसा ही नीरस आणि अनावश्यक वाटते तर पद्याच्या म्हणजे काव्याच्या शरीराच्याच रचनेचा विचार करणारी छन्दो-विचिति ही किती शुष्क आणि व्यर्थ वाटेल! परन्तु छन्दःशास्त्राचें ज्ञान हे जितपत कवीला अवश्य आहे तितपत रसिक वाचकालाहि आहे. रसिक हा जाणता नि चिकित्सक होण्याला या शास्त्राच्या अभ्यासाचें साह्य होतें. मनुष्यप्राणी हा जसा सहृदय तसाच बुद्धिमानहि आहे. केवळ अनुभव घेअून तो स्वस्थ रहात नाही. अनुभवांचा तुलनात्मक अभ्यास करून मूलभूत नियम शोधून काढण्यांत मनुष्याला पराकाष्ठेचा आनन्द वाटूं शकतो. काही मनुष्यांच्या या शोधक प्रवृत्तीमुळेच विविध शास्त्रे निर्माण झालीं आहेत. छन्दःशास्त्राचीहि अुत्पति अशीच असली पाहिजे.{{nop}}<noinclude></noinclude> h2pjd6c1gpe5i2rj87ahn94bd47uuyn पान:छन्दोरचना.djvu/29 104 5745 237428 15532 2026-09-25T07:14:49Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237428 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''२'''|}}</noinclude>{{center|'''१ गद्य आणि पद्य'''}} {{gap}}बहिरड्गाकडे पाहिल्यास वाङ्मयाचे गद्य<ref>"गद्यं पद्यमिति प्राहुर्वाङ्मयं द्विविधं बुधाः” (गछ ६/१)</ref> आणि पद्य असे दोन प्रकार आढळतात. जें आपल्या नेहमीच्या बोलण्यासारखे (- गद्) तें गद्य होय. गद्याचे अर्थपूर्तीच्या अनुरोधाने जे तुकडे पडतात त्यांना वाक्यें म्हणतात. गद्यांत या वाक्यांची लाम्बी किती असावी, आणि त्यांची अक्षररचना कशी असावी याविषयी, म्हणजे वाक्यांत अक्षरांची सङ्ख्या, लघुगुरुक्रम आणि विरामस्थान यांविषयी काही नियम नसतो. अर्थाकडेच लक्ष्य देअून ठिकठिकाणीं न्यूनाधिक विश्राम घेत जें आपण नेहमीच्या बोलण्याप्रमाणे, आणि केलाच तर स्वरांत किञ्चित् चढअुतार करून अुच्चारितों ते '''गद्य'''<ref>{{Block center|<poem>"अनिबद्ध पदवृन्दं तथा चानियताक्षरम् । अथोपेक्षाक्षरयुतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुधैः" (भ १५/३५)</poem>}} </ref> होय. ज्याचे तुकडे म्हणजे पाद<ref>"पादेन संयोगात् पद्यम्" (हपि ५२).</ref> वा चरण हे गद्यांतील वाक्यांप्रमाणे अर्थपूर्तीच्या अनुरोधाने पडत नाहीत तर मुख्यत्वें नियमित अन्तराने येणाऱ्या विरामांच्या ठिकाणीं पडतात, आणि ज्याच्या चरणांतील अक्षररचनेला अक्षरसङ्ख्या आणि लगक्रम या गोष्टींत काहीतरी नियम असल्यामुळे जें स्वाभाविकपणेंच अर्थापेक्षा लयीकडे अधिक लक्ष्य देअुन अेकन्दरीने सलगपणें, गळ्यावर, काही ठराविकच ठिकाणीं ठराविकच वेळ थाम्बत, म्हटलें जातें तें '''पद्य''' होय.<br>{{gap}}पद्य म्हणजे लयबद्ध अक्षररचना होय. पद्याची काही चाल असावी म्हणून पद्यांत ठराविक लाम्बीचे पाद वा चरण म्हणजे अक्षरावली असतात. गद्याचें सारख्या लाम्बीचे तुकडे पाडून ते अेकाखाली अेक असे माण्डून त्याचें पद्य करितां येअील. पण हें दिखाअू पद्य होअील, त्याला छन्द-पण येणार नाही. लिहिल्यासारखा अुच्चार करीत थोडेसें गळ्यावर म्हणायला लागतांच जें गोड लागतें, आणि जें अन्तर्गत लयबद्धतेमुळे सहज अवगत होतें तेंच खरें पद्य होय. छन्दपण<ref>{{Block center|<poem>"नियताक्षरसम्बन्धं छन्दोयतिसमन्वितम् निबद्धन्तु पदं ज्ञेयं सतालपतनात्मकम्" (भ ३२/२९)</poem>}}</ref> हे या सहज लयबद्धतेंतच असतें.{{nop}}<noinclude><hr>{{reflist}}</noinclude> 8hd9etns7ilzj4sx4cc029kv6bvix6l पान:छन्दोरचना.djvu/30 104 5746 237431 15533 2026-09-25T07:29:44Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237431 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''३'''|<u>'''काही छन्दोविषयक प्रश्न'''</u>}}</noinclude>{{center|'''२ पद्यरचनेचे व्याकरण'''}} {{gap}}छन्दःशास्त्र हें पद्यरचनेचें व्याकरणच होय. हें शास्त्र पद्याच्या घटनेचा म्हणजे लयबद्ध अक्षररचनेचा विचार करितें. व्याकरण हें अर्थपूर्ण शब्द जोडून होणाऱ्या वाक्यांचा आणि त्या वाक्यांच्या घटकांचा विचार करितें तर छन्दःशास्त्र हे लघुगुरु अक्षरांच्या जोडणीने होणाऱ्या चरणांचा आणि ते चरण मिळून होणाऱ्या पद्याचा विचार करितें. व्याकरणाची घटना ही ज्याप्रमाणे वाङमयामागून होते त्याचप्रमाणे छन्दःशास्त्राची रचना काव्यनिर्मितीच्या नन्तर होते. वैय्याकरण हा दैनिक बोलींतील आणि लेखी वाङमयांतील वाक्प्रयोगांचें समालोचन करून शिष्टजनमान्य अतअेव रूढ अशा मनोगत नियमांना स्पष्ट करून माण्डतो तर छन्दःशास्त्रकार हा पूर्वकालीन कवींच्या कृतींचें पृथक्करण-वर्गीकरण करून कवींनी नकळत अनुसरलेल्या मनोगत छन्दांना स्पष्ट करितो. कवीच्या विविध मनोगत स्वरान्दोलनाला अनुकूल अशी रचना तो अक्षरसङ्खया, लगक्रम आणि यति अित्यादिकांनी नियमबद्ध करून ठेवितो. व्याकरणाच्या घटनेनन्तर ज्याप्रमाणे व्याकरणबाह्य प्राचीन प्रयोग हे व्याकरणाच्या पूर्वीचे म्हणून क्षम्य तथापि अननुकरणीय मानण्यांत येतात त्याचप्रमाणे प्राचीन कवींचे छन्दोदोष हे क्षम्य पण अननुकरणीय गणायचे असतात. भाषा ही जिवन्त आहे तोंपर्यंत ती अेखाद्या व्याकरणाने नि कोशाने सर्वथैव बद्ध होअू शकत नाही, आणि तिच्यांत नवनव्या वाक्प्रयोगांची भर पडत राहते; त्याचप्रमाणे काव्य हें जिवन्त आहे तोंपर्यन्त तें ठराविक छन्दःप्रकारांत पूर्णपणें अडकून रहात नाही, तें नवनवे छन्दःप्रयोग करून पाहतें. प्रभावी लेखकांचे नवनवे वाक्प्रयोग परिणामकारक वठल्यास रूढ होतात त्याप्रमाणे कवींचे नवनवे छन्द, कविता सरस आणि चटकदार अुतरल्यास अनुसरिले जाअून रूढ होतात. सुशिक्षितमान्य अतअेव शुद्ध अशा भाषेत रचना करावयाची असल्यास ज्याप्रमाणे व्याकरणाकडे अवश्यमेव लक्ष्य द्यावें लागतें, त्याचप्रमाणे रूढ नि सहजगम्य अशा छन्दांत सुद्धा शुद्ध रेखीव रचना करावयाची असल्यास त्या छन्दांच्या घटनेचें ज्ञान अवश्य पाहिजे. बोलायला आपण केवळ अनुकरणाने, व्याकरण न शिकतांच, लागतों; पण शुद्धच बोलतों असें नाही. पद्यरचनाहि सहजच मनोगत आन्दोलनानुसार होअू लागते, पण ती रेखीव<noinclude></noinclude> 1ptldm1248uh721rt1oqt542hy273s8 पान:छन्दोरचना.djvu/31 104 5747 237432 15534 2026-09-25T07:39:59Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237432 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''४'''|}}</noinclude>नि शुद्ध होतेच असें नाही. व्याकरणाने ज्याप्रमाणे भाषेतील अमुक शुद्ध नि तमुक अशुद्ध कां हें समजतें नि दुसऱ्याला समजावून देतां येतें त्याप्रमाणे अमुक पद्य शुद्ध कां नि तमुक अशुद्ध कां हें छन्दःशास्त्राने समजतें आणि दुसऱ्याला स्पष्ट दाखवितां येतें. व्याकरण शिकल्याने ज्याप्रमाणे फार तर चार वाक्यें शुद्धपणें बोलतां लिहितां येतील, पण आदर्शभूत जिवन्त गद्य लिहितां येअीलच असें नाही, त्याप्रमाणे छन्दःशास्त्राच्या अभ्यासाने अेक दोन शुद्ध पद्ये अतिक्लिष्ट वृत्तांतहि रचितां येतील, पण सरस प्रवाही काव्य हें निसर्गदत्त प्रतिभेविना, केवळ छन्दःशास्त्राच्या बळाने निर्माण करणें अशक्य आहे. अुत्कृष्ट काव्यरसाला छन्दःशुद्ध पद्याचें घाटदार पात्र अिष्ट आहे, परन्तु रसाची तहान घाटदार सुवर्णपात्राच्या दर्शनाने भागणार नाही. केवळ छन्दःशुद्ध पद्य म्हणजे काव्य नव्हे. पद्य हें काव्याचें केवळ शरीर<ref>'अिति वृत्त तु काव्यस्य शरीरं परिकीर्तितम्' (भ २१/१)</ref> होय. तें सप्रमाण आणि सुरेख पाहिजेच. पण हें कलेने नटवायचें शरीर रमणीय भावार्थाने सचेतन हवे; शृंगारलेलें कलेवर काय कामाचें?<br> {{center|'''३ पद्यक्षेत्राचा सङ्कोच'''}} {{gap}}सारस्वताचा म्हणजे संस्मरणीय वाङ्मयाचा आरम्भ पद्यांत होतो आणि काही कालपर्यन्त त्याची वाढहि पद्यांतच होते. मनुष्य हा गायनप्रिय असल्यामुळे काही पद्यरचना म्हणजे गेय शब्दरचना ही आपोआप सम्भवते; अथवा ओढून ताणून काही शब्दरचना गेय होअू शकते<ref>अेका चुरमुरे-विक्याने आपलें नेहमीचेंच वाक्य पण मारून-मुटकून 'सुकुमार असुनि तू फार' या पद्याच्या चालीवर बसविल्याने मोठं कुतूहल अुत्पन्न करून आत्मप्रसिद्धि मिळविलेली माझ्या पहाण्यांत आहे. त्याचें वाक्य असें, {{Block center|<poem>"शेङ्गदाणे, गरम चिरमुरे, खारे फुट्टाणे{{bar|1}} फुट्टाणे खारे, चिरमुरे, गरम शेङ्गदाणे !"</poem>}}</ref>. तिच्याविषयी चमत्कार वाटतो. ती ध्यानांत ठेवावीशी वाटते आणि सहज ध्यानांत रहातेहि. तिचें अनुकरणहि करावेसें वाटते. पद्य हें सहज तोण्डपाठ होअू शकतें आणि दीर्घकाळपर्यन्त ध्यानांत राहतें हें पद्याच्या यशाचें अेक मुख्य<noinclude><hr>{{reflist}}</noinclude> 26v1vvkfdx4b1g9gjlsm2dmuq6q6da7 पान:छन्दोरचना.djvu/32 104 5748 237433 15535 2026-09-25T07:49:51Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237433 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''५'''|<u>'''काही छन्दोविषयक प्रश्न'''</u>}}</noinclude>कारण आहे. मुद्रणकलेच्या शोधापूर्वी आणि विशेषतः लेखनकलेच्या शोधापूर्वी, जेव्हा ज्ञानसंरक्षणाचा सारा भार स्मरणशक्तीवर पडे तेव्हा गद्यरचना क्वचितच होअी. संस्कृतांत वेद, पुराणें, स्मृति अित्यादि ग्रन्थ पद्यांत आहेत आणि आज सुद्धा मराठींत भूगोलव्याकरणाच्या कारिका आढळतात याचें कारण पद्य हें स्मरणसुलभ असतें हेच होय.<br>{{gap}}सुधारणेच्या प्रगतीसङ्गे गद्याचें क्षेत्र वाढतें; पण पद्याचा प्रपञ्च अगदीच सम्पुष्टांत येत नाही. पद्याचा अुपयोग काव्यापुरता मर्यादित होतो. याचा अर्थ असा नाही की काव्य गद्यांत असू शकतच नाही. काव्य रसात्मक, रमणीयार्थ-प्रतिपादक पाहिजे अेवढेच साहित्याचार्य म्हणतात. गद्यांतहि रमणीय आन्दोलन असतें. अेखाद्या गद्यगङ्गाधराच्या भाषेत, जेव्हा लेखन अेक प्रकारच्या केवळ समाधींतच झालें असावें असें वाटतें आणि भाषा ही कल्लोलिनीप्रमाणे भरपूर, ओढाळ आणि नादवती होते तेव्हा तींत अेक प्रकारचें श्रेष्ठ गूढ आन्दोलन प्रत्ययास येतें. परन्तु हें आन्दोलन अनियमित असतें. तेंच नियमित, आवर्तनात्मक आणि अनुकरणीय होअू लागलें की त्याला पद्याचें व्यवस्थित स्वरूप आलें म्हणून समजावें.<br> {{center|'''४ पद्याची काव्यानुकूलता'''}} {{gap}}काव्य जर गद्यांतूनहि प्रगट होअू शकतें, आणि गद्य हें जर निवेदनाचें स्वाभाविक साधन आहे तर काव्याला तरी पद्याची आवश्यकता कां असावी? वाङ्मयांत जें हृदयङ्गम असते त्याचा मनावर खोल ठसा अुमटतो. तें वाचतांना आनन्द होतोच परन्तु तेवढ्याने त्याचा सम्बन्ध सुटत नाही. मनुष्याला तें पुनःपुन्हा मनांत घोळून त्या आनन्दाची पुनरावृत्ति करावीशी वाटते. तो भावार्थ जर थोडक्यांत आणि पद्यबद्ध असेल तर तो आठवून मनांत घोळणें सोपें जातें. गद्य हे द्रव मानिलें तर पद्य हे केलासासारखें आहे. केलासाच्या आकृतिसौन्दर्याप्रमाणे पद्याचें बाह्यसौन्दर्य आल्हादकारक वाटते यांत शङ्का नाही, तरी रसास्वादांत मूलतः काही भेद पडत नाही; पद्य हें गद्याहून अधिक सोयीचें आहे अितकेच. गायनाप्रमाणेच, स्वरांच्या आरोहावरोहाप्रमाणेच लयबद्धता ही भावना अुत्तेजित करण्यास फार अुपयोगी पडते; आणि ती पुन्हा<noinclude></noinclude> l7113xc26kvatrb43h50cg36l7btw19 पान:छन्दोरचना.djvu/33 104 5749 237434 15536 2026-09-25T08:03:59Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237434 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''६'''|}}</noinclude>आकृतिसौन्दर्याप्रमाणेच आनन्ददायक आहे. काव्य ही अेक आनन्द देणारी कला असल्याकारणाने भावार्थाचें मनांत संरक्षण करणारी<ref>छन्द या शब्दाची सुचविण्यांत आलेली व्युत्पति मोठी बोधप्रद आहे. "छन्दयति आह्लादयति अिति छन्दः" असे कोणी म्हणतो, तर यास्क "मन्त्रा मननात् छन्दांसि छादनात्" या सूत्राने आच्छादन करणारे, रक्षण करणारे ते छन्द, असें म्हणतो.</ref> आणि भावना अुत्तेजित करण्यास साह्य करणारी अेक आनन्ददायक गोष्ट म्हणून पद्य हे काव्याशी संलग्न व्हावें; तें काव्याचें शरीर व्हावें हें योग्यच होय.<br> {{center|'''५ पद्यरचनेची कृत्रिमता'''}} {{gap}}पद्यरचना ही मुळीच कृत्रिम नाही असें मात्र नाही. "तुजविण गमे वृथा संसार" वा "लोळत कच मुखविधुवरि । त्यांसि तोंचि कर निवारि" अशा सारख्या पद्यांचे आरम्भ सहजस्फुरित असू शकतात. तथापि या अुदाहरणांमध्ये सुद्धा तुजविण, गमे, मुखविधु, कर हे दैनिकबोलीच्या बाहेरील शब्द आहेत आणि वरि, तोचि आणि निवारि हीं दैनिकबोलीबाहेरील रूपें आहेत. या गोष्टी कृत्रिमतेचीच छटा दाखवितात. मग अेकाच ठराविक आन्दोलनाच्या साच्याची सारी दीर्घ कविता प्रतिज्ञापूर्वक रचण्यांत किती कृत्रिमता येत असेल! पद्यरचना अगदी स्वाभाविक आणि सुकर नाही म्हणूनच कवीला अपरिचित शब्द वा रूपें योजण्याची नि प्रसङ्गविशेषीं व्याकरणाच्या नियमांचें अुल्लङ्घन करण्याची मोकळीक असते. ही मोकळीक अल्पतम घेण्यांत आणि कृत्रिमता दिसू न देण्यांतच कवीचें कौशल्य प्रगट होतें. अभ्यासाने ज्याप्रमाणे व्याकरणशुद्ध रचना करणें स्वाभाविक होतें त्याचप्रमाणे छन्दोबन्धन हें कवीच्या मनवळणीं पडून गेलें की त्याची भाषा आपोआप छन्दोबद्ध नि छन्दःशुद्ध अशी येते. तिच्यांतील कृत्रिमता पार दृष्टी आड होते. निसर्गाचा आभास म्हणजेच कलेचा विलास होय.<br>{{gap}}पद्याच्या ज्या नियमित आन्दोलनामुळे वाचकाला अेक प्रकारची जागृत तन्द्रा लागून त्या तन्द्रेत त्याला कवीची यक्षनगरी पहायला मिळते, आणि कवीचा भावनाप्रवाह नियन्त्रित होअून, सारखा चालत राहून त्यांत त्याच्या कल्पनाचक्राला सतत गति मिळते ते पद्याचे नियमित आन्दोलन सर्वच<noinclude><hr>{{reflist}}</noinclude> 9j4152vwlw3uc1ziic4xq10414zljf3 पान:छन्दोरचना.djvu/34 104 5750 237435 15537 2026-09-25T11:19:55Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237435 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''७'''|<u>'''काही छन्दोविषयक प्रश्न'''</u>}}</noinclude>ललितलेखनकारांच्या प्रकृतीला मानवतें असें नाही. पद्यामुळे कित्येकांची कुचम्बणा होते. पद्य हे लीलेने रचितां येत असले तरी त्यामुळे कित्येकांची कल्पना कुण्ठित होते. अुदाहरणार्थ, श्री. वि. स. खाण्डेकर हे गद्य नि पद्य सारख्याच लीलेने रचूं शकतात; पण त्यांच्या गद्यांत जसा भावनेचा विकास आणि कल्पनेचा विलास आढळतो तसा तो त्यांच्या पद्यांत दिसत नाही.<br> {{center|'''६ छन्दोज्ञान काव्यप्रेरक नाही, पण काव्यशोधक आहे.'''}} {{gap}}केवळ लगक्रमनिदर्शक चित्र डोळ्यांपुढे ठेऊन सरस पद्यरचना करिता येअील काय? नाही. रचनाचित्राच्या साहाय्याने अेखाद्या अपरिचित वृत्तांत कविता लिहावय चें कवीच्या मनांत आलें तर प्रथम त्याला त्या चित्राप्रमाणे निरर्थक का होअीना पण लघुगुरु ध्वनि गुणगुणून त्या पद्याला काहीतरी चाल लाविली पाहिजे. चाल अमुकच असली पाहिजे असें नाही; परन्तु कोणती तरी चाल मनांत बाणल्यावाचून सुसम्बद्ध पद्यरचना होऊंच शकत नाही असा अनुभव आहे. अुलटपक्षी स्थूलमानाने अेखादी चाल मनांत बाणली असूनहि पद्यरचनेकडे मूळचीच थोडीफार प्रवृत्ति असल्याविना पद्यनिर्मिति होअू शकत नाही. चाल प्रत्यक्ष अैकायला मिळून अवगत झाली आणि स्वाभाविक प्रवृत्तीहि पद्यरचनेकडे असली तरी तेवढ्याने कार्यसिद्धि होत नाही. पद्यरचना होअील; पण अक्षरांचे मात्रामापन जर रेखीवपणाने ध्यानांत राहिलें नसेल आणि ताडून पहायला लगक्रमाचें चित्र जर डोळ्यापुढे नसेल तर झालेली पद्यरचना छन्दःशुद्ध असेलच असें निश्चयाने सागतां येणार नाही.<br>{{gap}}अेखादी कविता कवीला आपल्या मधुरस्वरांत म्हणून दाखवितां येते आणि ती अैकून श्रोते प्रमुदित होतात अेवढ्याने त्या कवितेची छन्दःशुद्धता सिद्ध होत नाही. गोड स्वराने आपली कविता म्हणून दाखविणाऱ्या कवीची रचना शिथिलच असण्याचा सम्भव असतो हें आश्चर्यकारक वाटलें तरी दुर्दैवाने अनुभवसिद्ध आहे. गायक कवि हा कोठे दीर्घस्वर ऱ्हस्वच अुच्चारील तर कोठे ऱ्हस्व स्वर लाम्बवून दीर्घ करील; प्रसङ्गविशेषीं दोन तीन अक्षरें न्यूनकालांत द्रुत अुच्चारील तर केव्हा अक्षरांची अुणीव तो निरर्थक स्वर लाम्बवून<noinclude></noinclude> qma3arrmo48czj3qhe1i8q30seqg1vh पान:छन्दोरचना.djvu/35 104 5751 237437 15538 2026-09-25T11:38:20Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237437 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''८'''|}}</noinclude>भरून काढील; आणि पुन्हा अितकें करून आपण काय करीत आहों याची त्याला जाणीव होणार नाही. अैकणाऱ्यांपैकीहि सर्वांनाच ही जाणीव होते असें नाही. ज्याची श्रवणतुला सूक्ष्मवेदी झाली आहे, त्याला मात्र हे दोष जाणवून अुद्वेग वाटल्यावाचून रहात नाही. {{Block center|<poem>"जेम ण सहअि कणअतुला {{gap}}तिल तुलिअं अद्ध अद्वेण । तेम ण सहअ सवणतुला {{gap}}अवछन्दं छन्दभङ्गेण" ( प्रापै १।१० )</poem>}} {{gap}}अशावेळी त्या गायक कवीला त्याच्या पद्याचें रचनाचित्र काढून दाखविल्याविना त्याचे दोष त्याला स्पष्टपणे दृग्गोचर होअू शकत नाहीत. म्हणून छन्दःशास्त्राचें कामापुरतें ज्ञान कवीस अवश्य आहे.<br> {{center|'''७ छन्द आणि चाल'''}} {{gap}}चाल म्हणजे छन्द नव्हे; चाल म्हणजे अेखादा छन्द गळ्यावर म्हणण्याची धाटणी होय. अेका छन्दाला अनेक चाली लावितां येतात; ज्याला चाल स्वाभाविकपणे लागत नाही तो छन्दच होत नाही. छन्द म्हणजे अक्षरांची तालबद्ध जुळणी होय. ही जुळणी तालबद्ध असली की चाल सहज लागते. चालीने विशिष्ट स्वररचनेचा बोध होतो. चाल बदलली की छन्द बदलला असें वाटते, पण हा निवळ आभास होय. मङ्गलाष्टकांतील {{Block center|<poem>"लक्ष्मीःकौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमा गावःकामदुघाः सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवाङ्गना अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शङ्खोऽमृतं चाम्बुधे रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्युः सदामङ्गलम्"</poem>}} हा श्लोक रामरक्षास्तोत्रांतील {{block center/s}} "रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः"<noinclude>{{block center/e}}</noinclude> kfkkwdgbo6vtw7qi7wjz00drsmf8ful 237439 237437 2026-09-25T11:41:57Z कल्पनाशक्ती 3813 237439 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''८'''|}}</noinclude>भरून काढील; आणि पुन्हा अितकें करून आपण काय करीत आहों याची त्याला जाणीव होणार नाही. अैकणाऱ्यांपैकीहि सर्वांनाच ही जाणीव होते असें नाही. ज्याची श्रवणतुला सूक्ष्मवेदी झाली आहे, त्याला मात्र हे दोष जाणवून अुद्वेग वाटल्यावाचून रहात नाही. {{Block center|<poem>"जेम ण सहअि कणअतुला {{gap}}तिल तुलिअं अद्ध अद्वेण । तेम ण सहअ सवणतुला {{gap}}अवछन्दं छन्दभङ्गेण" ( प्रापै १।१० )</poem>}} {{gap}}अशावेळी त्या गायक कवीला त्याच्या पद्याचें रचनाचित्र काढून दाखविल्याविना त्याचे दोष त्याला स्पष्टपणे दृग्गोचर होअू शकत नाहीत. म्हणून छन्दःशास्त्राचें कामापुरतें ज्ञान कवीस अवश्य आहे.<br> {{center|'''७ छन्द आणि चाल'''}} {{gap}}चाल म्हणजे छन्द नव्हे; चाल म्हणजे अेखादा छन्द गळ्यावर म्हणण्याची धाटणी होय. अेका छन्दाला अनेक चाली लावितां येतात; ज्याला चाल स्वाभाविकपणे लागत नाही तो छन्दच होत नाही. छन्द म्हणजे अक्षरांची तालबद्ध जुळणी होय. ही जुळणी तालबद्ध असली की चाल सहज लागते. चालीने विशिष्ट स्वररचनेचा बोध होतो. चाल बदलली की छन्द बदलला असें वाटते, पण हा निवळ आभास होय. मङ्गलाष्टकांतील {{Block center|<poem>"लक्ष्मीःकौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमा गावःकामदुघाः सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवाङ्गना अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शङ्खोऽमृतं चाम्बुधे रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्युः सदामङ्गलम्"</poem>}} हा श्लोक रामरक्षास्तोत्रांतील {{block center/s}} "रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः<noinclude>{{block center/e}}</noinclude> hwogqd2a526mijna2xcpjxgkv2jdduo पान:छन्दोरचना.djvu/37 104 5753 237442 15540 2026-09-25T11:50:35Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 237442 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''१०'''|}}</noinclude>म्हणू शकतो. गायनांत<ref>"प्रार्थना, वेदपठन, धार्मिक मन्त्र, पोथीवाचन, वृत्तरचना, दिण्डी, साकी, दोहा, पोवाडा, गळ्यावरचीं गाणीं, अभङ्ग, ठुमरी, टप्पा, धृपद, धमार, ख्याल अशा चढत्या क्रमाने लोकगानांतून शास्त्रीय गायनामध्ये सङ्गीताचें परिवर्तन झाल्याचें दिसून येतें. लोकगानाची सर्वांत अखेरची पायरी म्हणजे गणवृत्त अथवा मात्रावृत्त याचें गायन होय. अशा गानांत जास्तीत जास्ती नअू स्वर येतात. अशा गानांत बरेंचसें गेयत्व दिसतें. पण शास्त्रीय सङ्गीताप्रमाणे रागत्व किंवा ठराविक असा अेखादा राग निर्माण होत नाही. लोकगान व शास्त्रीय गायन यांमध्ये पहिल्यांत तालाचा अभाव असतो. पोवाडा हा लोकगान व भावनाप्रधान जोरदार भाषण यांमधील दुवा आहे." प्रो. ग. ह. रानडे (पहा भारतीय सङ्गीत ३/२).</ref> त्याला तालाची चमत्कृति करूनहि विस्ताराने विविधता साधीत अेक विशिष्ट स्वरांचा थाट प्रतीत करून द्यावयाचा असतो. गायनाचें स्वारस्य अर्थापेक्षा सुरावटीवर, आलापावर आणि विस्तारावर अधिक अवलम्बून असतें. अर्थबोध मुळीच झाला नाही तरी रस अुत्पन्न होअू शकतो. मनाला मोहनी पडते. असें नसतें तर अर्थशून्य तराणे कोणी गाअिलेहि नसते आणि कोणी औकिलेहि नसते.<br>{{gap}}गीत म्हणून जो लघुकाव्यप्रकार कल्पिला आहे त्यांत अर्थस्वारस्य नि स्वरलालित्य हे गुण तुल्यबल असावे लागतात. रचना साधी, सोपी आणि सरळ असून घोळून घोळून म्हणायला आणि विस्तार करायला अनुकूल अशी असावी लागते. मराठी सङ्गीतनाटकांत मंजुळ चालींवर लिहिलेलीं लघु-पद्ये अगणित असली तरी 'तुजविण गमे वृथा संसार' सारखी गीत या नावाला शोभतील अशीं फारच थोडीं आहेत. आणि हें गीत सुद्धा घोळून घोळून घटिका दोन घटिका म्हणायला जमणार नाही. यावरून अर्थस्वारस्य आणि गेयता हे दोन्ही गुण तुल्यबल ठेअून रचना करणे किती कठिण आहे हें स्पष्टपणे दिसून येतें. ज्या गीतांत सुरावट अधिक मोहक का अर्थ अधिक हृदयङ्गम हे साङ्गणें कठिण जातें अशीं गीतें रचून तीं योग्य पद्धतीने गाऊन दाखवितां यायला, म्हणजे वाग्गेयकार व्हायला सङगीताचें ज्ञान अपरिहार्य आहे. परन्तु कवीला वा रसिक वाचकाला या ज्ञानाची मुळीच<noinclude><hr>{{reflist}}</noinclude> 3eswk0iysjgpclsrniv0hd1mbnmegls पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/20 104 29129 237403 136440 2026-09-24T12:05:50Z JayashreeVI 4058 237403 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Komal Sambhudas" /></noinclude>देशमुख यांच्या एकूण लेखनविषयात चंदेरी दुनियेतले विषय ब-याच वेळा आवृत्त झाले आहेत.हिंदी चित्रपटसृष्टीतील गुरूदत्तच्या जीवनाधारित हे नाटक बेतलेले आहे.गुरू आणि प्रतिभेच्या असफल प्रेमाची ही शोकात्म कथा आहे.गुरू,प्रेरणा,प्रतिभा व अब्बास यांच्या जगण्यातून नाटकाचे आशयसूत्र उलगडते.गुरू या दिग्दर्शकाच्या आयुष्यातील चढउतार तीमध्ये आहेत.वैयक्तिक आयुष्य आणि कला यांच्या द्वंद्वात अडकलेल्या कलावंताची ही कैफियत आहे.पत्नी आणि ती यांच्या परस्परसंबंधातून दुभंग झालेल्या व्यक्तीची ही कैफियत आहे.सामाजिक नियमनांमुळे व्यक्तिमनातील उत्कट प्रेमापासून रहाव्या लागणा-या अलिप्ततेतून येणारी परात्मता तीमध्ये आहे.क्रमशः गुरू या गर्तेत कोसळत जातो व अखेरीस मद्याच्या धुंदीत कांपोजच्या गोळ्या खाऊन मरणाला सामोरा जातो.देशमुखांनी या नाटकास ‘अखेरची रात्र' असे अर्थपूर्ण नाव दिले आहे.एका कलावंताची प्रेमाअभावीची तीव्र,खोलवरची घुसमट, आंतरिक वेदना प्रभावीरीत्या आविष्कृत केली आहे.चित्रपटाच्या मायानगरीतील कलावंताच्या परस्परसंबंधाच्या माहोलाचे चांगले चित्र या नाटकात उभे केले आहे.चंदेरी दुनियेतील हिंदी गाण्यांचा, संवादांचा व काव्यात्मतेचा प्रभावी वापर या नाटकात आहे.<br> {{center|'''६.'''}}<br> {{gap}}या संग्रहात देशमुख यांनी लिहिलेल्या काही प्रवासवर्णनपर चार लेखांचा समावेश केला आहे.मेघालयातील चेरापुंजी या जगातल्या सर्वात जास्त पाऊस पडणा-या ठिकाणी भेट दिल्याचे कथन ‘चिंब चिंब चेरापुंजी' या लेखात आहे.देशमुख यांच्या प्रवासकथनातील हा एक आगळा वेगळा असा ललित अनुभव आहे.भारतीय प्रशासन सेवेत प्रशिक्षण कालावधीत त्यांनी या स्थळाला भेट दिली त्याचा अनुभव या लेखात आहे.एका बाजूला चेरापुंजीबद्दल मनात वसत असलेल्या रोमँटिक भावना आणि प्रत्यक्षातले चेरापुंजी याचे विहंग दर्शन या लेखात आहे.या प्रदेशातील समूह,प्रदेश,भाषा व जीवनशैलीबद्दलची निरीक्षणे आहेत.तिथल्या सामाजिक स्थितीबद्दलची वर्णने आहेत.मातृसत्ताक कुटुंबव्यवस्थेची माहिती आहे.त्याचबरोबर निसर्ग,विविध मनोहरी रमणीय स्थळे यांचे वर्णन आहे. निसर्गनिर्मित लेणी,धबधबे,गुहांच्या सुदरतेची वर्णने आहेत.शुभ्र नितळ पाण्याचा नोहकली-काई नावाच्या धबधब्याचे वर्णन आहे.या धबधब्याला नोहकली-काई हे नाव को पडले याची माहिती देणारी करुण भयकारक अशी मेघालयी दंतकथा दिली आहे.मराठीतल्या चांगुणेच्या कथेशी नाते सांगणारी ही कथा आहे.कांचनगंगेचे अपूर्व दर्शन मात्र घेता आले नाही याची खंतही त्यांच्या प्रवासी मनाला आहे.<br> {{gap}}श्रीलंकेतील-रामबुख्ख्याना रेल्वे स्टेशनजवळील माओया नदीकिना-यावरील पिनावाल एलफंट ऑर्फनेज या हत्तीच्या अनाथ आश्रमास दिलेल्या भेटीचे कथन एका<noinclude>{{right|'''लक्षदीप । १९'''}}</noinclude> 7eq7hkwhxmk4uxuq3cd857k7kkx3m16 237404 237403 2026-09-24T12:06:57Z JayashreeVI 4058 237404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Komal Sambhudas" /></noinclude>देशमुख यांच्या एकूण लेखनविषयात चंदेरी दुनियेतले विषय ब-याच वेळा आवृत्त झाले आहेत.हिंदी चित्रपटसृष्टीतील गुरूदत्तच्या जीवनाधारित हे नाटक बेतलेले आहे.गुरू आणि प्रतिभेच्या असफल प्रेमाची ही शोकात्म कथा आहे.गुरू,प्रेरणा,प्रतिभा व अब्बास यांच्या जगण्यातून नाटकाचे आशयसूत्र उलगडते.गुरू या दिग्दर्शकाच्या आयुष्यातील चढउतार तीमध्ये आहेत.वैयक्तिक आयुष्य आणि कला यांच्या द्वंद्वात अडकलेल्या कलावंताची ही कैफियत आहे.पत्नी आणि ती यांच्या परस्परसंबंधातून दुभंग झालेल्या व्यक्तीची ही कैफियत आहे.सामाजिक नियमनांमुळे व्यक्तिमनातील उत्कट प्रेमापासून रहाव्या लागणा-या अलिप्ततेतून येणारी परात्मता तीमध्ये आहे.क्रमशः गुरू या गर्तेत कोसळत जातो व अखेरीस मद्याच्या धुंदीत कांपोजच्या गोळ्या खाऊन मरणाला सामोरा जातो.देशमुखांनी या नाटकास ‘अखेरची रात्र' असे अर्थपूर्ण नाव दिले आहे.एका कलावंताची प्रेमाअभावीची तीव्र,खोलवरची घुसमट, आंतरिक वेदना प्रभावीरीत्या आविष्कृत केली आहे.चित्रपटाच्या मायानगरीतील कलावंताच्या परस्परसंबंधाच्या माहोलाचे चांगले चित्र या नाटकात उभे केले आहे.चंदेरी दुनियेतील हिंदी गाण्यांचा, संवादांचा व काव्यात्मतेचा प्रभावी वापर या नाटकात आहे.<br> {{center|'''६.'''}} <br>{{gap}}या संग्रहात देशमुख यांनी लिहिलेल्या काही प्रवासवर्णनपर चार लेखांचा समावेश केला आहे.मेघालयातील चेरापुंजी या जगातल्या सर्वात जास्त पाऊस पडणा-या ठिकाणी भेट दिल्याचे कथन ‘चिंब चिंब चेरापुंजी' या लेखात आहे.देशमुख यांच्या प्रवासकथनातील हा एक आगळा वेगळा असा ललित अनुभव आहे.भारतीय प्रशासन सेवेत प्रशिक्षण कालावधीत त्यांनी या स्थळाला भेट दिली त्याचा अनुभव या लेखात आहे.एका बाजूला चेरापुंजीबद्दल मनात वसत असलेल्या रोमँटिक भावना आणि प्रत्यक्षातले चेरापुंजी याचे विहंग दर्शन या लेखात आहे.या प्रदेशातील समूह,प्रदेश,भाषा व जीवनशैलीबद्दलची निरीक्षणे आहेत.तिथल्या सामाजिक स्थितीबद्दलची वर्णने आहेत.मातृसत्ताक कुटुंबव्यवस्थेची माहिती आहे.त्याचबरोबर निसर्ग,विविध मनोहरी रमणीय स्थळे यांचे वर्णन आहे. निसर्गनिर्मित लेणी,धबधबे,गुहांच्या सुदरतेची वर्णने आहेत.शुभ्र नितळ पाण्याचा नोहकली-काई नावाच्या धबधब्याचे वर्णन आहे.या धबधब्याला नोहकली-काई हे नाव को पडले याची माहिती देणारी करुण भयकारक अशी मेघालयी दंतकथा दिली आहे.मराठीतल्या चांगुणेच्या कथेशी नाते सांगणारी ही कथा आहे.कांचनगंगेचे अपूर्व दर्शन मात्र घेता आले नाही याची खंतही त्यांच्या प्रवासी मनाला आहे.<br> {{gap}}श्रीलंकेतील-रामबुख्ख्याना रेल्वे स्टेशनजवळील माओया नदीकिना-यावरील पिनावाल एलफंट ऑर्फनेज या हत्तीच्या अनाथ आश्रमास दिलेल्या भेटीचे कथन एका<noinclude>{{right|'''लक्षदीप । १९'''}}</noinclude> 8e3wyq0oczhl061cz20xjsl9yz1c3zk 237405 237404 2026-09-24T12:07:20Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237405 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>देशमुख यांच्या एकूण लेखनविषयात चंदेरी दुनियेतले विषय ब-याच वेळा आवृत्त झाले आहेत.हिंदी चित्रपटसृष्टीतील गुरूदत्तच्या जीवनाधारित हे नाटक बेतलेले आहे.गुरू आणि प्रतिभेच्या असफल प्रेमाची ही शोकात्म कथा आहे.गुरू,प्रेरणा,प्रतिभा व अब्बास यांच्या जगण्यातून नाटकाचे आशयसूत्र उलगडते.गुरू या दिग्दर्शकाच्या आयुष्यातील चढउतार तीमध्ये आहेत.वैयक्तिक आयुष्य आणि कला यांच्या द्वंद्वात अडकलेल्या कलावंताची ही कैफियत आहे.पत्नी आणि ती यांच्या परस्परसंबंधातून दुभंग झालेल्या व्यक्तीची ही कैफियत आहे.सामाजिक नियमनांमुळे व्यक्तिमनातील उत्कट प्रेमापासून रहाव्या लागणा-या अलिप्ततेतून येणारी परात्मता तीमध्ये आहे.क्रमशः गुरू या गर्तेत कोसळत जातो व अखेरीस मद्याच्या धुंदीत कांपोजच्या गोळ्या खाऊन मरणाला सामोरा जातो.देशमुखांनी या नाटकास ‘अखेरची रात्र' असे अर्थपूर्ण नाव दिले आहे.एका कलावंताची प्रेमाअभावीची तीव्र,खोलवरची घुसमट, आंतरिक वेदना प्रभावीरीत्या आविष्कृत केली आहे.चित्रपटाच्या मायानगरीतील कलावंताच्या परस्परसंबंधाच्या माहोलाचे चांगले चित्र या नाटकात उभे केले आहे.चंदेरी दुनियेतील हिंदी गाण्यांचा, संवादांचा व काव्यात्मतेचा प्रभावी वापर या नाटकात आहे.<br> {{center|'''६.'''}} <br>{{gap}}या संग्रहात देशमुख यांनी लिहिलेल्या काही प्रवासवर्णनपर चार लेखांचा समावेश केला आहे.मेघालयातील चेरापुंजी या जगातल्या सर्वात जास्त पाऊस पडणा-या ठिकाणी भेट दिल्याचे कथन ‘चिंब चिंब चेरापुंजी' या लेखात आहे.देशमुख यांच्या प्रवासकथनातील हा एक आगळा वेगळा असा ललित अनुभव आहे.भारतीय प्रशासन सेवेत प्रशिक्षण कालावधीत त्यांनी या स्थळाला भेट दिली त्याचा अनुभव या लेखात आहे.एका बाजूला चेरापुंजीबद्दल मनात वसत असलेल्या रोमँटिक भावना आणि प्रत्यक्षातले चेरापुंजी याचे विहंग दर्शन या लेखात आहे.या प्रदेशातील समूह,प्रदेश,भाषा व जीवनशैलीबद्दलची निरीक्षणे आहेत.तिथल्या सामाजिक स्थितीबद्दलची वर्णने आहेत.मातृसत्ताक कुटुंबव्यवस्थेची माहिती आहे.त्याचबरोबर निसर्ग,विविध मनोहरी रमणीय स्थळे यांचे वर्णन आहे. निसर्गनिर्मित लेणी,धबधबे,गुहांच्या सुदरतेची वर्णने आहेत.शुभ्र नितळ पाण्याचा नोहकली-काई नावाच्या धबधब्याचे वर्णन आहे.या धबधब्याला नोहकली-काई हे नाव को पडले याची माहिती देणारी करुण भयकारक अशी मेघालयी दंतकथा दिली आहे.मराठीतल्या चांगुणेच्या कथेशी नाते सांगणारी ही कथा आहे.कांचनगंगेचे अपूर्व दर्शन मात्र घेता आले नाही याची खंतही त्यांच्या प्रवासी मनाला आहे.<br> {{gap}}श्रीलंकेतील-रामबुख्ख्याना रेल्वे स्टेशनजवळील माओया नदीकिना-यावरील पिनावाल एलफंट ऑर्फनेज या हत्तीच्या अनाथ आश्रमास दिलेल्या भेटीचे कथन एका<noinclude>{{right|'''लक्षदीप । १९'''}}</noinclude> 75da5ayf8a3ygivrpbhznt0ww9cpyo2 पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/21 104 29130 237406 136451 2026-09-24T12:11:44Z JayashreeVI 4058 237406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Komal Sambhudas" /></noinclude>लेखात आहे. मानवी सेवाभावीवृत्तीला कृतज्ञतापूर्वक दिलेली भावांजली या ललित लेखात आहे.पर्यटक म्हणून या आश्रमाला दिलेल्या भेटीचा वृत्तांत आहे.तो कोरडा,रूक्ष स्वरूपाचा नाही.प्राण्यांविषयीच्या सहानुभावाने लिहिला गेलेला आहे.त्या आश्रमातील शिस्त,देखभाल पाहून लेखकाचे मन भरून येते.तो त्यांचा होऊन जातो.सोंडेतून लहान हत्तींना दूध पाजताना पाहून,त्यांच्या डोळ्यातील तृप्ती पाहून मातृत्वाची वात्सल्यमूर्ती लेखकाच्या डोळ्यासमोर झळकते.हिरव्याकंच वृक्षराजीच्या पार्श्वभूमीवरील चमकत्या सूर्यप्रकाशात खळाळणाच्या लाटेत एका वेळी साठ सत्तर हत्ती जलक्रीडा करताना पाहून निवेदकाच्या डोळ्यांचं पारणं फिटतं.अशी अनुभूती तीमध्ये आहे.आश्रमातील दिवसभराची अनाथ हत्तीची देखभाल पाहून निवेदकाला मानवी भूतदयेबद्दल व करुणेबद्दल कृतज्ञता वाटते.प्रवासातील एका अनोख्या ठिकाणाबद्दलची भावस्थिती व त्यावरचे भाष्य या लेखात आहे.<br> {{gap}}‘नायगारा-दि व्हाईस ऑफ गॉड' या लेखात अमेरिकेतील नायगारा या ठिकाणास भेट दिल्याचा वृत्तांत आहे.निसर्गाच्या अपूर्व आणि अद्भूत किमयेचे वर्णन आहे.या परिसराचा निवेदकाच्या मनावर जो ठसा उमटतो त्याचे हे निवेदन आहे.धबधबा,नदी व भवतालाचे काव्यात्म निवेदन आहे. जोडीने निवेदकाच्या मनातील कुतूहल,तौलनिक विचार यांचे प्रकटीकरण आहे.नायगाव्याच्या भव्यतेच्या व त्याच्या सौंदर्याच्या सूक्ष्म अशा नोंदी आहेत.गाईडने पुरविलेली माहिती आहे.तो परिसर पाहून निवेदकाला सर्वांगाला डोळे फुटल्याचा प्रत्यय येतो.संपृक्त भरलेपणाची प्रचिती येते.'मेड ऑफ दि मिस्ट' नावाच्या बोटीत बसल्यानंतर गाईडने सांगितलेल्या थंडर जमातीची चित्तवेधक मिथककथाही सांगितली आहे. सामूहिक श्रद्धामनाने जोपासलेल्या या कथेने या प्रवासकथनाला एक वेगळे रूप प्राप्त करून दिले आहे. देशमुख यांच्या ललितलेखनाचा एक वेगळा आविष्कार म्हणून या ललितलेखनाकडे पाहता येते. वेगवेगळ्या निमित्ताने त्यांचा जो प्रवास घडला त्याची स्मरणचित्रे या लेखनात आहेत.स्थलवैशिष्ट्ये व त्यांचा मनावर जो ठसा उमटला त्याचे प्रत्ययकारी वर्णन या लेखनात आहे.<br> {{gap}}न्यूयॉर्क शहरातील हडसन नदीकाठी असणा-या स्वातंत्र्य देवतेचे तेजस्वी शिल्प पाहिल्यानंतर निवेदकाच्या मनात जे विचार येतात ते 'स्वतंत्रते भगवती' या लेखात प्रकटले आहेत.एका अर्थाने या स्वातंत्र्य देवतेच्या शिल्पाशी केलेला हा संवाद आहे.स्वतंत्रता देवतेला उद्देशून व्यक्त केलेले हे मनोगत आहे.या तेजस्वी,पवित्र शिल्पासमोर नतमस्तक होताना निवेदकाच्या मनात तिचे काजळलेपणही लक्षात येते.जगातील वर्ण आणि रंगभेदाच्या भावनेने निवेदक चिंतेत आहे.मात्र २००४ साली बराक ओबामांच्या निवडीने हे काजळलेपण नाहीसे झाल्याची भावना आहे.तसेच अमेरिकेची विश्वात्मकता आणि समकाळातील तिचे दुटप्पी वागणे याबद्दलची खंतही व्यक्त केली आहे.<noinclude>{{left|'''२० । लक्षदीप'''}}</noinclude> 0jzkmlo1ndmma6g2hw4yzasdpovk3ij 237407 237406 2026-09-24T12:11:58Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237407 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>लेखात आहे. मानवी सेवाभावीवृत्तीला कृतज्ञतापूर्वक दिलेली भावांजली या ललित लेखात आहे.पर्यटक म्हणून या आश्रमाला दिलेल्या भेटीचा वृत्तांत आहे.तो कोरडा,रूक्ष स्वरूपाचा नाही.प्राण्यांविषयीच्या सहानुभावाने लिहिला गेलेला आहे.त्या आश्रमातील शिस्त,देखभाल पाहून लेखकाचे मन भरून येते.तो त्यांचा होऊन जातो.सोंडेतून लहान हत्तींना दूध पाजताना पाहून,त्यांच्या डोळ्यातील तृप्ती पाहून मातृत्वाची वात्सल्यमूर्ती लेखकाच्या डोळ्यासमोर झळकते.हिरव्याकंच वृक्षराजीच्या पार्श्वभूमीवरील चमकत्या सूर्यप्रकाशात खळाळणाच्या लाटेत एका वेळी साठ सत्तर हत्ती जलक्रीडा करताना पाहून निवेदकाच्या डोळ्यांचं पारणं फिटतं.अशी अनुभूती तीमध्ये आहे.आश्रमातील दिवसभराची अनाथ हत्तीची देखभाल पाहून निवेदकाला मानवी भूतदयेबद्दल व करुणेबद्दल कृतज्ञता वाटते.प्रवासातील एका अनोख्या ठिकाणाबद्दलची भावस्थिती व त्यावरचे भाष्य या लेखात आहे.<br> {{gap}}‘नायगारा-दि व्हाईस ऑफ गॉड' या लेखात अमेरिकेतील नायगारा या ठिकाणास भेट दिल्याचा वृत्तांत आहे.निसर्गाच्या अपूर्व आणि अद्भूत किमयेचे वर्णन आहे.या परिसराचा निवेदकाच्या मनावर जो ठसा उमटतो त्याचे हे निवेदन आहे.धबधबा,नदी व भवतालाचे काव्यात्म निवेदन आहे. जोडीने निवेदकाच्या मनातील कुतूहल,तौलनिक विचार यांचे प्रकटीकरण आहे.नायगाव्याच्या भव्यतेच्या व त्याच्या सौंदर्याच्या सूक्ष्म अशा नोंदी आहेत.गाईडने पुरविलेली माहिती आहे.तो परिसर पाहून निवेदकाला सर्वांगाला डोळे फुटल्याचा प्रत्यय येतो.संपृक्त भरलेपणाची प्रचिती येते.'मेड ऑफ दि मिस्ट' नावाच्या बोटीत बसल्यानंतर गाईडने सांगितलेल्या थंडर जमातीची चित्तवेधक मिथककथाही सांगितली आहे. सामूहिक श्रद्धामनाने जोपासलेल्या या कथेने या प्रवासकथनाला एक वेगळे रूप प्राप्त करून दिले आहे. देशमुख यांच्या ललितलेखनाचा एक वेगळा आविष्कार म्हणून या ललितलेखनाकडे पाहता येते. वेगवेगळ्या निमित्ताने त्यांचा जो प्रवास घडला त्याची स्मरणचित्रे या लेखनात आहेत.स्थलवैशिष्ट्ये व त्यांचा मनावर जो ठसा उमटला त्याचे प्रत्ययकारी वर्णन या लेखनात आहे.<br> {{gap}}न्यूयॉर्क शहरातील हडसन नदीकाठी असणा-या स्वातंत्र्य देवतेचे तेजस्वी शिल्प पाहिल्यानंतर निवेदकाच्या मनात जे विचार येतात ते 'स्वतंत्रते भगवती' या लेखात प्रकटले आहेत.एका अर्थाने या स्वातंत्र्य देवतेच्या शिल्पाशी केलेला हा संवाद आहे.स्वतंत्रता देवतेला उद्देशून व्यक्त केलेले हे मनोगत आहे.या तेजस्वी,पवित्र शिल्पासमोर नतमस्तक होताना निवेदकाच्या मनात तिचे काजळलेपणही लक्षात येते.जगातील वर्ण आणि रंगभेदाच्या भावनेने निवेदक चिंतेत आहे.मात्र २००४ साली बराक ओबामांच्या निवडीने हे काजळलेपण नाहीसे झाल्याची भावना आहे.तसेच अमेरिकेची विश्वात्मकता आणि समकाळातील तिचे दुटप्पी वागणे याबद्दलची खंतही व्यक्त केली आहे.<noinclude>{{left|'''२० । लक्षदीप'''}}</noinclude> b9afiyst8o4hq0xy2drov1xx9gxxk9u पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/22 104 29131 237408 136452 2026-09-24T12:18:49Z JayashreeVI 4058 237408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Komal Sambhudas" /></noinclude>{{center|'''७.'''}} {{gap}}देशमुख यांनी काही ललितगद्य लेखनही केले आहे.'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया' या ललितलेखनात देशमुख यांनी जीवनातील आनंदमयता व जगण्यावरचे प्रेम व्यक्त केले आहे.स्वत:च्या आयुष्यातील सुख-दु:खाचे प्रसंग सांगून अंतिमतː जीवनावरचे प्रेम व्यक्त केले आहे. पुस्तके,गाणी,कविता,साहित्य, निसर्ग आणि माणसे हा माझ्या लेखनाचा केंद्रबिंदू राहिला असे या लेखात त्यांनी म्हटले आहे.हिंदी चित्रपटातील काही गाण्यांचे मुखडे घेऊन त्यांनी जीवनातली आनंदमयता व्यक्त केली आहे.'कलरफुल' या ललितलेखात निवेदकाच्या मनात जी रंगांची दुनिया वसलेली आहे त्याचे निवेदन आहे.विशेषतː रूपेरी पडद्यावरील रंगप्रतिमांनी लेखकमनाचा पाठलाग केला आहे.या रंगप्रतिमांनी त्याला खिळवून ठेवले आहे.या मनातील रंगीबेरंगी दुनियेची ही सफर आहे.मनात दाटून आलेल्या रंगायन उत्सवाची शब्दरूपी उधळण या ललितलेखात आहे. {{center|'''८.'''}} {{gap}}या संपादनात देशमुख यांच्या 'झपाटलेपण ते जाणतेपण' व 'परभणी-कोल्हापूरचे दिवस' या दोन आत्मपर लेखांचा समावेश केला आहे.परभणी-कोल्हापूरचे दिवस या लेखात प्रशासकीय अधिकारी म्हणून या शहराची स्मरणचित्रे रेखाटली आहेत.त्यांच्यातील सर्जनशील आविष्काराला व समृद्ध व्यक्तित्वघडणीला परभणी महत्त्वाचे ठरले.प्रौढ साक्षरता अभियानाचा समन्वय प्रमुख म्हणून त्यांना आलेले विविध अनुभव कथन केले आहेत.यामागे आपण काही एक प्रमाणात देशऋण फेडल्याची भावना आहे.तसेच कोल्हापूरला कलेक्टर असताना केलेल्या विविध कामांचे निवेदन केले आहे.या दोन शहरांचे त्यांच्यातील रुजलेपण व गुंतलेपण त्यामधून व्यक्त झाले आहे.देशमुख यांचे भावविश्व समृद्ध करणाच्या या दोन शहरांविषयीची कृतज्ञता व्यक्त केली आहे तर 'झपाटलेपण ते जाणतेपण' या आत्मपर लेखात स्वत:च्या जडणघडणीवर झालेले संस्कार आपल्या वाङ्मयनिर्मितीचे प्रेरणास्रोत व जीवनाकडे बघण्याचा दृष्टिकोन प्रांजळपणे सांगितला आहे.<br> {{center|'''९.'''}} {{gap}}देशमुख यांनी काही वेगळ्या विषयावरील लेखन केले आहे.प्रशासन अधिकारी म्हणून वावरत असताना भोवतालच्या सामाजिक क्षेत्रांसंबंधीचे हे रिपोर्टाज शैलीतले लेखन आहे.निवडलेल्या विषयाचा सर्वांगाने वेध घेणे हा त्याचा हेतू आहे.२००० च्या 'साधना' दिवाळी अंकात त्यांनी 'देवबंदचं दारूल उलुम' हा लेख लिहिला.२००४ साली उत्तर प्रदेशातील विधानसभा निवडणुकीवेळी सहाराणपूर जिल्ह्यातील<noinclude>{{right|'''लक्षदीप ॥ २१'''}}</noinclude> 6h5s4zttmx5hhtjnq9q03s8z9gzmqfz 237409 237408 2026-09-24T12:19:11Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237409 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>{{center|'''७.'''}} {{gap}}देशमुख यांनी काही ललितगद्य लेखनही केले आहे.'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया' या ललितलेखनात देशमुख यांनी जीवनातील आनंदमयता व जगण्यावरचे प्रेम व्यक्त केले आहे.स्वत:च्या आयुष्यातील सुख-दु:खाचे प्रसंग सांगून अंतिमतː जीवनावरचे प्रेम व्यक्त केले आहे. पुस्तके,गाणी,कविता,साहित्य, निसर्ग आणि माणसे हा माझ्या लेखनाचा केंद्रबिंदू राहिला असे या लेखात त्यांनी म्हटले आहे.हिंदी चित्रपटातील काही गाण्यांचे मुखडे घेऊन त्यांनी जीवनातली आनंदमयता व्यक्त केली आहे.'कलरफुल' या ललितलेखात निवेदकाच्या मनात जी रंगांची दुनिया वसलेली आहे त्याचे निवेदन आहे.विशेषतː रूपेरी पडद्यावरील रंगप्रतिमांनी लेखकमनाचा पाठलाग केला आहे.या रंगप्रतिमांनी त्याला खिळवून ठेवले आहे.या मनातील रंगीबेरंगी दुनियेची ही सफर आहे.मनात दाटून आलेल्या रंगायन उत्सवाची शब्दरूपी उधळण या ललितलेखात आहे. {{center|'''८.'''}} {{gap}}या संपादनात देशमुख यांच्या 'झपाटलेपण ते जाणतेपण' व 'परभणी-कोल्हापूरचे दिवस' या दोन आत्मपर लेखांचा समावेश केला आहे.परभणी-कोल्हापूरचे दिवस या लेखात प्रशासकीय अधिकारी म्हणून या शहराची स्मरणचित्रे रेखाटली आहेत.त्यांच्यातील सर्जनशील आविष्काराला व समृद्ध व्यक्तित्वघडणीला परभणी महत्त्वाचे ठरले.प्रौढ साक्षरता अभियानाचा समन्वय प्रमुख म्हणून त्यांना आलेले विविध अनुभव कथन केले आहेत.यामागे आपण काही एक प्रमाणात देशऋण फेडल्याची भावना आहे.तसेच कोल्हापूरला कलेक्टर असताना केलेल्या विविध कामांचे निवेदन केले आहे.या दोन शहरांचे त्यांच्यातील रुजलेपण व गुंतलेपण त्यामधून व्यक्त झाले आहे.देशमुख यांचे भावविश्व समृद्ध करणाच्या या दोन शहरांविषयीची कृतज्ञता व्यक्त केली आहे तर 'झपाटलेपण ते जाणतेपण' या आत्मपर लेखात स्वत:च्या जडणघडणीवर झालेले संस्कार आपल्या वाङ्मयनिर्मितीचे प्रेरणास्रोत व जीवनाकडे बघण्याचा दृष्टिकोन प्रांजळपणे सांगितला आहे.<br> {{center|'''९.'''}} {{gap}}देशमुख यांनी काही वेगळ्या विषयावरील लेखन केले आहे.प्रशासन अधिकारी म्हणून वावरत असताना भोवतालच्या सामाजिक क्षेत्रांसंबंधीचे हे रिपोर्टाज शैलीतले लेखन आहे.निवडलेल्या विषयाचा सर्वांगाने वेध घेणे हा त्याचा हेतू आहे.२००० च्या 'साधना' दिवाळी अंकात त्यांनी 'देवबंदचं दारूल उलुम' हा लेख लिहिला.२००४ साली उत्तर प्रदेशातील विधानसभा निवडणुकीवेळी सहाराणपूर जिल्ह्यातील<noinclude>{{right|'''लक्षदीप ॥ २१'''}}</noinclude> 4x5jnwa68uzcmxz8coewjt1zh2puza1 पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/23 104 29132 237410 136453 2026-09-24T13:34:23Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237410 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>देवबंद येथे तीनेक दिवस त्यांचे वास्तव्य घडले.या काळात त्यांनी देवबंद येथील पूर्व आशियातील सर्वात मोठ्या मदरशाला भेट दिली.त्या भेटीचा वृत्तांत या लेखात आहे.दरवर्षी ७००० पेक्षा जास्त विद्यार्थी इस्लाम धर्मशास्त्र शिक्षणासाठी या मदरशात येतात.पारंपरिक धर्माचे शिक्षण या मदरशात दिले जाते.भारत व भारताबाहेरील अनेक मशिदीमधील अनेक मौलवी व उलेमा या मदरशातून प्रशिक्षित झालेले आहेत.या मदरशाची कार्यपद्धती व व्यवस्थापन त्यांनी समजून घेण्याचा प्रयत्न केला आहे व त्या निमित्ताने आपल्या मनातले विचार सांगितले आहेत.या मशिदीतील दिनक्रम व पारंपरिक शिक्षणाबद्दल लेखकाच्या मनात उद्भवलेले प्रश्नही त्यांनी मांडले आहेत.काही प्रमाणात नवे होत असलेले बदलही नोंदविले आहेत.मदरशातील पारंपरिक शिक्षण व आधुनिकीकरणाने जे पेच निर्माण झाले आहेत तो दृष्टिकोणही त्यांनी नोंदविला आहे.भारतातील एका मुस्लीम धर्मशिक्षणाचा,चळवळीचा ओघवता वेध या लेखात आहे.एका समाजाच्या धर्मशिक्षणाच्या स्थिती,कार्यपद्धती व त्यावरचे लेखकाचे चिंतन या लेखात आहे.<br> {{gap}}काश्मीरियत : एक तत्त्वज्ञान,एक जीवनशैली या लेखात देशमुख यांनी एका राजकीय व सामाजिकदृष्ट्या संवेदनशील विषयाची मांडणी केली आहे.काश्मीरमधील एका प्रवासाच्या निमित्ताने या प्रदेशाविषयी त्यांच्या मनात जे विचार आले ते या लेखात मांडले आहेत.काश्मीरियतची संकल्पना इतिहास,संस्कृती व तत्त्वज्ञानाच्या आधारे त्यांनी मांडली आहे.काश्मीर लोकांची एतद्देशीय राष्ट्रवादी जाणीव सामाईक स्वरूपाचं भान आणि सांस्कृतिक मूल्यांची प्रखर जाणीव असलेली सहअस्तित्वाची जीवनशैली यात ते काश्मीरियतची संकल्पना पाहतात.काश्मीरियतच्या विकासक्रमात ज्या ऐतिहासिक घडामोडी घडल्या त्याचाही विचार ते करतात.ती सोळाव्या शतकापासून निर्माण झाली.त्याची पायाभरणी प्राचीन काळापासून होत आलेली आहे.देशभक्ती,बंधुभाव,देशीय संस्कृतीचा अभिमान व धार्मिक सहिष्णूता यातून काश्मीरी तत्त्वज्ञान व जीवनशैली निष्पन्न झाली.मुस्लिम राज्यकर्त्यांचा उदारमतवादी दृष्टिकोण आणि काश्मीरी भाषेतील तत्त्वज्ञान यातून ही संस्कृती आकाराला आली असे ते मानतात.काश्मीरमधील राजकीय,सामाजिक स्थित्यंतरे व सुफी परंपरेचा विस्ताराने निर्देश त्यांनी केला आहे.बाराव्या शतकातील संतकवयित्री लाल देड व नंद ऋषी यांच्या भक्तितत्त्वकवितेने काश्मीर जनभावनेचे भरणपोषण केल्याचे ते नोंदवतात.त्यांच्या वाङ्मयाचा परिचय करून देतात.मुस्लिम व पंडित यांच्यात असलेल्या कमालीच्या साम्यस्थळांचा ते निर्देश करतात.काश्मीरमधील भक्तिपरंपरा व जैनुद्दिन अनिदेन व सम्राट अकबराच्या सहिष्णू राजवटीने या संस्कृतीचा विकास केला.एकूणच आजच्या संवेदनशील प्रदेशाचा संस्कृतीचा विकास होऊन ती कशी आकाराला आली ते या लेखात त्यांनी मांडले आहे.काश्मीरी भाषा व वाङ्मय याविषयीची सूक्ष्म निरीक्षणे<noinclude>{{left|'''२२ । लक्षदीप'''}}</noinclude> 3ssv3sye04x1z2d9p3lb1qgve11oml7 पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/24 104 29133 237411 136454 2026-09-24T13:38:44Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237411 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>तीमध्ये आहेत. काश्मीरियत संकल्पनेचा काहीसा ललित अंगाने वेध घेतला आहे. यासाठी नामवंत संस्कृती अभ्यासकांची मतेही नोंदविली आहेत.<br> {{gap}}या संग्रहात देशमुख यांनी शासकीय कर्मचारी साहित्यसंमेलनाचे अध्यक्षणीय भाषण दिले आहे. मध्यमवर्गीय मराठी साहित्याच्या मर्यादा सांगून प्रशासकीय कर्मचा-याच्या लेखनाचे वेगळेपण सांगितले आहे. मराठीतील प्रशासकीय अनुभवाधारित लेखनपरंपरा सांगून स्वत:च्या निर्मितीचा धांडोळा घेतला आहे. तसेच वाचनसंस्कृतीबद्दलचा विचार मांडला आहे. {{center|'''१०.'''}} {{gap}}प्रशासनविषयक लेखन हा देशमुख यांच्या एकूण लेखनाचा एक महत्त्वाचा आविष्कार आहे. ललित साहित्यातून तर त्यांनी याप्रकारचे चित्रणक्षेत्र मोठ्या प्रमाणात आणले.शिवाय इतरही प्रशासनविषयक वैचारिक स्वरूपाचेही लेखन त्यांनी केले आहे.याविषयावरची त्यांची ‘प्रशासननामा' व 'बखर प्रशासनाची' ही दोन पुस्तके प्रसिद्ध आहेत.२००० साली दै. लोकमतमधून त्यांनी रविवार आवृत्तीसाठी ‘इनसायडर' नावाने एक सदर लिहिले होते.तो पुढे ‘प्रशासननामा' या नावाने प्रकाशित झाला. निबंध व कथा असा संमिश्र प्रकार असणा-या लेखनातून देशमुखांनी प्रशासनातले विविध अनुभव सांगितले आहेत.चांगला लेखक प्रशासनातले अनुभवप्रदेश किती बारकाईने मांडू शकतो ते वैशिष्ट्य या लेखनात आढळते.जिल्हाप्रशासन हा या लेखनाचा केंद्रवर्ती विषय आहे.गावपातळी ते जिल्हा पातळीवरील प्रशासनाचे संदर्भक्षेत्र या लेखनात आहे.वास्तवदृश्य हे लेखन असल्यामुळे राजकारणातील, प्रशासनातील अनोळखी चेहरा वाचकांबरोबर आणण्यासाठी चंद्रकांत या कल्पित पात्राची निर्मिती केली आहे.चंद्रकांत हा संवेदनशील अधिकारी आहे.त्याच्या नजरेतून प्रशासनाचे जग न्याहाळले आहे.हे लेखकाचे मानसपात्र आहे.तत्त्वनिष्ठ,प्रामाणिक समाजशील तो इनसायडरशी सतत संवाद साधतो.लेखकाने यात प्रशासकांना पगारी समाजसेवक (Paid Social Worker) म्हटले आहे. कल्याणकारी राज्यासाठी प्रशासक सकारात्मक दृष्टिकोनातून कसे काम करू शकतो याचे एक चित्र या लेखनात आहे.भारतीय प्रशासनाची ब्लू प्रिंट या लेखनात आहे.राज्यकर्ते व प्रशासन यातील गुंतागुंतीचे ताण या लेखनातं आहेत,भ्रष्टता आहे,प्रशासनातील विविध गुंत्यांचे खोलवरचे दर्शन तीमध्ये आहे.<br> {{gap}}तसेच चांगले अधिकारी राज्यसंस्था व जनता यातील दुवे कसे होऊ शकतात,चांगले निर्णय घेऊन समाजशील कामे कसे करू शकतात याचे कथन आहे.संवेदनशील प्रसंगी जनमानस व समुहमानसशास्त्र माहीत असल्यामुळे निर्णय घेण्यातील तत्परता ते कसे दाखवतात,तसेच भारतीय जनमानसाचा प्रशासनाकडे बघण्याचा<noinclude>{{right|'''लक्षदीप ॥ २३'''}}</noinclude> f1uk094i6pgsvtvi93ynd9i9dl1ifrs पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/25 104 29134 237412 136455 2026-09-24T13:44:15Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237412 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>दृष्टिकोण हा एकरंगी स्वरूपाचा आहे.त्या प्रशासनाचा सकारात्मक चेहराही या लेखनातून प्रकट झालेला आहे.प्रशिक्षण कालावधीतील राजांसारखे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी व वारकरी सहकारी अधिकारी यांच्या नैतिकतेच्या धाकाचे विवरण त्यामध्ये आहे.देशमुख यांच्या या ललित लेखनातून आणखी एका अंगाकडे लक्ष वेधले आहे,ते म्हणजे प्रशासनातील विषम उतरंडीकडे.प्रशासनातील भेदाची बाजूही त्यांनी सांगितली आहे.वरिष्ठ अधिकारी आणि कनिष्ठ अधिकारी यांच्यातले संबंध हे श्रेष्ठ कनिष्ठत्वाचे असतात.विशेषत: प्रशासनातही स्त्री कर्मचा-यांकडे दुय्यमत्त्वाने,कनिष्ठत्त्वाने पाहिले जाते.<br > {{gap}}‘बखर भारतीय प्रशासनाची' या ग्रंथात देशमुख यांचे भारतीयल प्रशासनावर आधारलेले लेखन आहे.भारतीय प्रशासनाचा पूर्वोत्तर वारसा ते समकालीन भारतीय प्रशासनव्यवस्था यावरचे विवरण आहे. क्रमशː प्रशासनव्यवस्थेत होत आलेले स्थित्यंतर,त्यातील गुंते,सामर्थ्य व तिसरा स्तंभ म्हणून तिने बजावलेली भूमिका यांचे दर्शन आहे.एका सनदी अधिका-याने प्रशासन व्यवस्थेकडे आतून पाहिलेले हे चित्र आहे.त्यामुळे त्याची विश्वासार्हता वाढली आहे.<br> {{gap}}एका ठिकाणी इनसायडर चंद्रकांतला म्हणतो, विवेकाची सुरी धारदार बनविली पाहिजे.आपण आपल्यापुरतं विकारी न होता विवेकी रहावं,वागावं या हेतूने प्रशासननामामधील लेखन घडलेलं आहे.<br> {{center|'''११.'''}} {{gap}}वैचारिक गद्य लेखनाबरोबरच देशमुखांच्या मन:पिंडात नाटक व चित्रपट या कलांविषयीची एक स्वतंत्र जागा आहे.या कलांचा ते सातत्याने विचार करीत आले आहेत.देशमुख यांनी नाटक व चित्रपट यांच्याविषयी काही लेखन केले आहे.त्यापैकी काही लेखांचा समावेश या ग्रंथात आहे.त्यांनी काही चित्रपटाच्या पटकथाही लिहिल्या आहेत.त्यांच्या काही कथांवर आधारित चित्रपटनिर्मिती होते आहे.नाटक व चित्रपट हे देशमुख यांच्या विचारविश्वाचा,आस्थेचा भाग आहे.वेळोवेळी त्यांनी या विषयावर लेखन केले आहे.त्यांच्या ललितलेखनातून या क्षेत्राशी विषय ध्वनित झाले.<br> {{gap}}गिरीश कर्नाडांच्या भारतीय रंगभूमीवरील कामगिरीचा परामर्श घेणारा,गिरीश कर्नाड : भारतीय रंगभूचा एक जायंट' नावाचा दीर्घ लेख या संग्रहात आहे.जवळपास अर्धशतकभर भारतीय रंगभूमीवर वैशिष्ट्यपूर्ण नाटके लिहिणाच्या नाटककाराच्या सामर्थ्यस्थानाचा व वेगळेपणाचा विचार या लेखात आहे. गिरीश कार्नाडांवरील पुण्यातील तीन दिवसाच्या महोत्सवावरून त्यांना उपरोक्त विचार सुचले.कार्नाडांनी एकूण तेरा नाटके लिहिली.ती भारतभर प्रसारित झाली.देशमुख यांनी कार्नाड यांच्या नाटकाच्या वाङ्मयीन गुणवत्ता व प्रयोगरूपाबद्दलचे काही विचार मांडले आहेत.<noinclude>{{left|'''२४ । लक्षदीप'''}}</noinclude> cisvuxpl3i61r3pda9vza469ojj8hma पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/26 104 29135 237413 136456 2026-09-24T13:47:58Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237413 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>कार्नाड यांच्या एकूण नाट्यक्षेत्रातील कामगिरीचे त्यांनी तीन सूत्रांमध्ये दिग्दर्शन केले आहे.त्यांच्या नाटकातील आशयसूत्रे व विकासक्रम यांचा तीन टप्प्यांमध्ये विचार केला आहे.पुराणकथांचा नवा अन्वयार्थ मांडणारी नाटके,ऐतिहासिक नाटकातून उलगडणारे आजचे वास्तव आणि एकविसाव्या शतकातील आजच्या काळाची नाटके- या तीन परिप्रेक्ष्यातून कार्नाडांच्या नाटकांचे आकलन मांडले आहे.'ययाति'पासून ते ‘उणे पुरे एक शहर' या नाटकांबद्दलचे हे विवेचन आहे.नाट्यवाचनाची सूक्ष्म स्वरूपाची रीत त्यांनी इथे अवलंबिली आहे.या नाटकांबद्दलच्या काही नवे अन्वयार्थाचेही त्यांनी सूचन केले आहे.कर्नाडांच्या नाटकातील विविधस्वरूपी आशयसूत्रे,नाटककार म्हणून कर्नाडांनी पुराणकथांचा, इतिहासाचा व समकालीन वास्तवाचा लावलेला अन्वयार्थ देशमुखांनी नोंदविला आहे.<br> {{gap}}'परफेक्ट शॉट विरुद्ध इनपरफेक्ट लाईफ' या लेखात त्यांनी गुरुदत्तचा जीवनालेख मांडला आहे.गुरुदत्तच्या जीवनाविषयी व अखेरच्या काळाविषयी लोकांना एकप्रकारचे कुतूहल आहे.या कुतूहलापोटी अनेकांनी या विषयावर लिहिले आहे.देशमुख त्यांनी या लेखात गुरुदत्तच्या असफल शोकान्त जीवनाचा वेध घेतला आहे.द्वंद्वात कातरत गेलेला कलावंत असे त्यांनी त्याचे वर्णन केले आहे.गुरुदत्तच्या चित्रपट कारकीर्दीतील व खाजगी आयुष्यातील घटना समोर ठेवून त्याचा अन्वयार्थ लावला आहे. कलावंताच्या प्रेमाचा पेच तो सोडवू शकला नाही.अखेरीस तो मद्य व झोपेच्या गोळ्यांनी मरणाला सामोरा गेला.या त्याच्या शोकात्म आयुष्याचा पट उलगडण्याचा प्रयत्न देशमुखाना केला आहे.<br> {{gap}}‘मला प्रभावित करून गेलेला सिनेमा' या साधना साप्ताहिकाच्या विशेषांकात देशमुख यांनी 'धग' या चित्रपटाचा सामाजिक समस्याप्रधान चित्रपट म्हणून त्याच्या मनावर जो ठसा उमटला तो या लेखात नोंदविला आहे.स्मशानात काम करणाच्या एका कुटुंबाची कथा 'धग'मध्ये आहे.उपजातीतल्या विषम भेदांची तीव्रतर जाणीव त्यामध्ये आहे.राष्ट्रपती पारितोषिकाने हा चित्रपट गौरविण्यात आला आहे. 'धग ने का प्रभावित केले याची ते तीन कारणे सांगतात.अस्सल देशी सकस पटकथा,दिग्दर्शकानंन मांडलेला जळजळता अनुभव आणि कलावंतांचा प्रभावी अभिनय.यात त्यांनी या चित्रपटाच्या प्रभावाच्या खुणा शोधल्या आहेत.भारतातल्या एका गंभीर सामाजिक प्रश्नाच्या मांडणीमुळे तो त्यांना भावला.मानवी जगणं व दु:ख याचे अनेक पैलू तीमधून चित्रित झाले आहेत.मनोरंजनप्रधान भारतीय चित्रपटापेक्षा सामाजिक व विचारप्रधान चित्रपटाचे महत्त्व त्यांनी अधोरेखित केले आहे. {{center|'''१२.'''}} {{gap}}एकंदरीत देशमुख यांच्या वाङ्मयीन कामगिरीचे स्वरूप वरीलप्रमाणे आहे.<noinclude>{{right|'''लक्षदीप ॥ २५'''}}</noinclude> i0kpldsapni7h7jfvvex4nmwhj4dhpp पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/27 104 29136 237436 136457 2026-09-25T11:37:09Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237436 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude> कथात्म साहित्य,नाट्यलेखन,वैचारिक व ललित स्वरूपाचे लेखन त्यांनी केले आहे.त्यांच्या एकूण साहित्याचे प्रातिनिधिक स्वरूपाचे हे संकलन आहे.त्यांचा लेखक म्हणून असणारा संवेदनस्वभाव व या काळाचा जवळचा संबंध आहे.<br> {{gap}}त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वात उत्तम असा प्रशासक आणि संवेदनशील असा लेखक अशी दुहेरी भूमिका आहे.संस्कारशील व्यक्तिमनाचा उभयान्वय त्यांच्या ठायी आहे.तळागाळातल्या शेवटच्या माणसाच्या विकासासाठी ध्येयधोरणे राबविणे या रचनात्मक कार्यासाठी जास्तीतजास्त उपयोग करून घेणाच्या अधिका-यांपैकी ते आहेत.प्रशासकीय सेवेत असताना तिथल्या विविधस्वरूपी अनुभवांचा अतिशय चांगला उपयोग देशमुख यांनी करून घेतला आहे.मराठीत इतक्या विपुलपणाने प्रशासकीय जीवनातले विषय क्वचितच आले असतील.त्यांच्या लेखनाची अनेक कथाबीजे त्यांच्या अनुभवसृष्टीत आहेत.या कथाबीजांचा विस्तार वेळोवेळी एक लेखक म्हणून देशमुख यांनी केला आहे.जिल्हा प्रशासन, न्यायपालिका ते प्रशासनयंत्रणेतील अनेक अनुभव त्यांच्या लेखनाचे विषय झालेले आहेत.पाणी टंचाई,महापूर,रोजगार हमी योजना,नागरी प्रशासन,ग्रामीण विकास,स्त्रीभ्रूणहत्या असे प्रश्न त्यांच्या कथात्म साहित्यात आहेत.या यंत्रणेतील बारकावे त्यामध्ये आहेत.'लेखकाला हे अनुभव टिपकागदाप्रमाणे टिपून घेता आले पाहिजेत' असे त्यांनी म्हटले आहे.<br> {{gap}}जिल्हाधिकारी म्हणून जिल्हा प्रशासनातील विविध क्षेत्रांशी त्यांचा जवळून संबंध येतो.या पाहणीतून देशमुख अनेक विषय त्यांच्या कथा-कादंब-याचे झाले आहेत.पृष्ठस्तरावरून सर्व काही आबादीआबाद असणा-या या व्यवस्थेच्या तळाशी अनेकविध प्रकारचे गुंते असतात.समाजपयोगी अशा सेवाक्षेत्रातील अनेक गुंते देशमुख यांचे लेखनविषय झाले आहेत.सामाजिक दस्ताऐवजाचे स्वरूप या लेखनास आहे.तसेच रिपोर्ताज पद्धतीची प्रचिती या लेखनास आहे.<br> {{gap}}मुस्लीम जीवनसंस्कृतीचे चित्रण हा देशमुख यांच्या एकूण लेखनाचा आस्थेचा विषय आहे.त्यांच्या कथात्म व वैचारिक लेखनातून मुस्लीम जीवनासंबंधीचे विषय पुन्हा-पुन्हा आवृत्त झाले आहेत.भारतीय लोकजीवनाचा अविभाज्य भाग असणा-या या संस्कृतीबद्दलचे कुतूहल त्यांना आहे.ते जीवन समजून घ्यावे अशी भावना तीमध्ये आहे.आधुनिक काळात भारतीय समाजाचा एकजीव भाग असणाच्या समूहाकडे काहीसे विपरीतपणे पाहिले जाते.ते टाळून वस्तुनिष्ठपणे व सहिष्णुतादृष्टीने या जगाकडे त्यांनी पाहिले आहे.सलोमी,इन्किलाब विरुद्ध जिहाद या कादंब-यात व अनेक कथांमध्ये या जीवनाचे चित्रण आले आहे.देशमुखांच्या या संस्कृतिप्रेमामागे मराठवाड्यातील निजाम राजवटीतील लोकजीवनाचा भाग असावा. बालपणीच्या घडणकाळातील व पुढेही सेवाकाळात निजाम राजवटीतील मुस्लीम संस्कृतीच्या खाणाखुणा, त्यांच्यावरील उर्दू वाङ्मयाची सावली,भाषेची जानपेहचान त्यामुळे<noinclude>{{left|'''२६ ॥ लक्षदीप'''}}</noinclude> qjlc584f890r90tytym4y1zmn3g1szc पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/28 104 29137 237440 136458 2026-09-25T11:45:12Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237440 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude> त्यांना समूहजीवनाच्या अंतरंगात डोकावता आले.त्याविषयीच्या आकर्षणामुळे ते सतत त्याकडे वळले असावेत,मुरूड,हैद्राबाद,सहारणपूर (उ. प्र.) व्हाया कारगिल,श्रीनगर,काबूल,कंदहार अशी भौगोलिक प्रदेशातील लेखन परिक्रमा आहे.स्थानिक मुस्लीम संस्कृतीपासून ते अफगाणमधील मुस्लीम जगाचा नकाशा तीमध्ये आहे.<br> {{gap}}सामाजिक जीवनाची समस्याचित्रणे हा एक त्यांच्या लेखनाचा विशेष आहे.पाणी टंचाई, स्त्रीभ्रूणहत्या,बालमजुरी ते मुस्लीम स्त्रियांची दु:खे अशा समस्यांना तीमध्ये स्थान आहे.या प्रश्नांचा विविधांगी शोध त्यांनी ललित साहित्यातून घेतला आहे.एक जागृत लेखक म्हणून त्यांच्यात आजच्या काळाचा,समाजजीवनाचा निरीक्षक दडलेला आहे.स्वत: त्यांनी ‘बखर लिहिणा-या बखरकाराचा वारसा' आपल्यात असल्याचे म्हटले आहे.देशमुख यांच्या साहित्यातील विविध अनोख्या समाजजीवनाची समस्यांची ही दर्शने आहेत.अर्धशतकातील महाराष्ट्रातील काही जीवनक्षेत्राची ही समाजवृत्ते आहेत.वार्तांकने आहेत.प्रशासनातील काही सामाजिक अहवाल आहेत,ते कथात्मसाहित्यातून मांडले आहेत.ही समाजचित्रे त्यांनी रिपोर्टाज लेखनशैलीत मांडली आहेत.त्यामुळे समाजचित्रणाच्या दृष्टीने त्यास महत्त्व आहे.<br> {{gap}}‘थीमबेस्ड कथा' हा देशमुख यांच्या कथासाहित्याचा एक वेगळा, अभिनव असा महत्त्वाचा पैलू आहे. एखादे मुख्य सूत्र घेऊन त्यासंबंधीच्या सलग कथामाला लिहिल्या आहेत. पाणी, स्त्रीभ्रूणहत्या व खेळाडूंच्या कथा या विषयावर त्यांच्या कथा प्रसिद्ध आहेत. एका विषयाची अनेक परिमाणे, कंगोरे शोधण्याचा हा प्रयत्न आहे. समकालीन समस्याचित्रणाच्या या विविधस्वरूपी कथामाला आहेत. या समस्यावरील उपायही लोकशिक्षकाच्या भूमिकेतून त्यांनी या लेखनातून मांडला आहे.<br> {{gap}}लक्ष्मीकांत देशमुख यांचे कांदबरीविश्वही विविध स्वरूपी आहे. विविध समाजसमस्येचे चित्रण ते राजकारण व आंतरराष्ट्रीय दहशतवादाचे विषय तीमधून अभिव्यक्त झाले आहेत, मुस्लीम जगाची संवेदना, बालमजुरांचा प्रश्न, वर्णभेद ते देहनिष्ठ जाणिवांचे सूचन त्यांच्या कादंब-यात आहे. जिल्हा प्रशासन ते नगरपालिका यांच्यातील सत्तासंघर्षाचा वेध त्यांच्या कादंब-यात आहे. तर 'इन्किलाब विरुद्ध जिहाद' या बृहद परिसंस्कृतीतील जीवनानुभवाला साद घालण्याची रीत आहे.<br> {{gap}}प्रवासवर्णनपर व ललितगद्य या प्रकारातही त्यांनी लेखन केले. चेरापुंजी ते नायगारा अशा विविध प्रदेशांतील त्यांच्या मनावर उमटवलेला ठसा, तेथील समाजनिरीक्षणांच्या नोंदी तीमध्ये आहेत. नाटक, चित्रपट व कलाक्षेत्र ही काही त्यांच्या आवडीची क्षेत्रे. या विषयावरही त्यांनी सतत लिहिले आहे. प्रशासनविषयक लेखन हा देशमुख यांच्या लेखनाचा एक महत्त्वाचा अविष्कार आहे. ललितेतर स्वरूपाच्या या लेखनातून त्यांना जे विविध स्वरूपाचे अनुभव आले ते या लेखनातून मांडले आहेत. स्थानिक स्वराज्य संस्थेपासून प्रशासनातील विविध अनुभवप्रदेशांचे हे चित्रण आहे.<noinclude>{{right|'''लक्षदीप । २७'''}}</noinclude> tazq7lauxreb23jk6dbeheg6oukorts पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/29 104 29138 237441 136459 2026-09-25T11:49:45Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237441 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude>भारतीय प्रशासनाची,इतिहासाची,तिच्या स्थित्यंतरासह त्यांनी मांडणी केली आहे.<br> {{gap}}देशमुख यांच्या साहित्यभाषेचे स्वरूपही वैविध्यपूर्ण आहे.मात्र जीवनानुभवाच्या आशयसूत्राच्या प्रभावी ठशामुळे काही प्रमाणात साहित्यकृतीच्या रूपाकडे दुर्लक्ष झालेले दिसते.अभिनव अशा प्रकारची भाषारूपे आहेत.'थीमबेस्ड'सारख्या कथारूपाचा प्रयोग आहे.कथा-कादंबरीत पत्रात्मक लेखनतंत्र आहे. बृहद कादंबरीचा आकृतिबंध ‘इन्किलाब विरुद्ध जिहाद'मध्ये वैशिष्ट्यपूर्ण आहे.काव्यात्मता व यथोजित भाषेचा रूपबंध तीमध्ये आहे.देशमुख यांच्या कथात्मक सृष्टीत व ललित लेखनातील पात्ररचना ही दुहेरी स्वरूपाची आहे.समस्याकेंद्री अनुभवविश्वाचे चित्रण करताना त्यांच्या साहित्यात बरीचशी पात्रे खलप्रवृत्तीची असतात.मात्र त्याचवेळी त्या संहितेत सत्शील,आदर्शवादी किंवा सकारात्मतेचा ध्यास असणारी पात्रे वा निवेदक सुप्तपणे नांदत असतो.समांतरपणाने या दुहेरी स्वरूपाच्या पात्ररचनेतील आशावादाचे व आदर्शाचे सूचन केलेले आहे.मानवी वर्तनाचे अतर्क्स रूपही आहे.चित्रदर्शी आणि नाट्यात्मक अभिव्यक्ती आहे.<br> {{center|'''१३.'''}} {{gap}}१९८० नंतरच्या मराठी साहित्याचे स्वरूप हे विविधस्वरूपी आहे.साठच्या दशकातील चैतन्यशील अशा साहित्याचे अविष्कार ऐंशीच्या दशकात स्थिरावले होते.भालचंद्र नेमाडे,भाऊ पाध्ये,नारायण सुर्वे व नामदेव ढसाळ यांच्या खुल्या शक्यतांचा शोध घेणारी नवनैतिकतावादी साहित्याची उपस्थिती या काळात होती.मराठी मध्यमवर्गीयांच्या दृष्टीपल्याडच्या नव्या साहित्याचा हा आविष्कार होता.लघुनियतकालिकाच्या चळवळीचे व दलित साहित्याचे जोरकस आविष्कार या काळात प्रकट होत होते.तसेच ऐंशीच्या दशकातही इतरही अस्मिताकेंद्री साहित्यप्रवाह मराठी लेखन परंपरेत निर्माण झाले.मराठी सांस्कृतिक जगताच्या व अभिरुचीच्या कक्षा विस्तारणारे हे साहित्य होते.एक लेखक म्हणून देशमुखांची जडणघडण या सांस्कृतिक पर्यावरणात झाली.स्वत:च्या साहित्याचे आस्थाकेंद्र व विषयकेंद्र निवडण्याचे दोन पर्याय समकाळात त्यांच्या समोर होते.एक आधुनिकतावादी दृष्टीचा प्रभाव असणारा साहित्यप्रवाह आणि दुसरा मानवकेंद्री जीवनदृष्टी प्रभावित साहित्यप्रवाह.स्वाभाविक देशमुख यांचा लेखन संवेदनस्वभाव हा मानवकेंद्री विचार विश्वाकडे झुकणारा होता.या प्रभावी घटकांमुळे त्यांचा कल स्वाभाविकपणे समाजशील विषयाकडे झुकला,तसे विषय त्यांच्या लेखनातून मोठ्या प्रमाणात आविष्कृत झाले.अवतीभवतीच्या वेगवान उलाढालीला मराठी साहित्याने दिलेल्या प्रतिसादाच्या पाश्र्वभूमीवर देशमुख यांनी आपल्या अनुभव प्रदेशातील विषयांना केंद्र बनविले आणि त्या अनुभवांचा,सामाजिक वास्तवाचा प्रामाणिकपणे शोध घेतला. प्रशासनिक अनुभवाचे क्षेत्र व त्याच्या विविध परी लेखनातून मांडल्या.एकेक प्रश्न,<noinclude>{{left|'''२८ ॥ लक्षदीप'''}}</noinclude> t924jtm67t3kco51rs6p6abio2vz5z6 पान:लक्षदीप (Lakshadip).pdf/30 104 29139 237443 136460 2026-09-25T11:53:53Z JayashreeVI 4058 /* प्रमाणित */ 237443 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="JayashreeVI" /></noinclude> समस्या घेऊन त्या वास्तवाचे विविध लक्ष्यी अक्ष शोधले.<br> {{gap}}गेल्या स्वातंत्र्योत्तर काळात ज्या महाराष्ट्रीय मध्यमवर्गीय समाजाची वाटचाल झाली त्या वाटचालीच्या समाजशास्त्राचा आणि देशमुख यांच्या जीवनदृष्टीचा जवळचा संबंध आहे.या काळातील सुशिक्षित मध्यमवर्गीयांचे आदर्श,स्वप्नांकाक्षा,तीमधून प्रत्यक्ष अप्रत्यक्षपणे ध्वनित झाली आहे.देशमुख स्वत:ला स्वातंत्र्यानंतरच्या व नव्वदीआधीच्या मधल्या काळातले प्रतिनिधी मानतात.या काळातील सामाजिक व वाङ्मयीन वातावरणाचा त्यांचा व्यक्ती व लेखक म्हणून असण्यावर परिणाम झालेला आहे. जीवनविषयीच्या या मध्यमवर्गीयांच्या कल्पना,व्यक्तिमत्त्व रचण्यातली कल्पना व स्वत:ला घडविण्यात ज्या गोष्टींचा सहभाग होता,त्याबद्दलचा आदर्शवत दृष्टिकोन तीमध्ये आहे.तसेच या काळातील शिक्षितवर्गाच्या आवडी-निवडी त्यांच्या खास अशा कल्पनांमधून साकार होत होत्या.ज्या भावगीतांनी व भावसंगीताने व हिंदी चित्रसृष्टीने या काळातील शिक्षित मनाचे पोषण केले त्याचा आविष्कार लेखनभाषेतून झाला आहे. हिंदी गाण्यांचे,चित्रपटाचे व मराठी भावगीतांचे अनेक तपशील देशमुखांच्या लेखनात आहेत.तसेच या काळातील या समाजाची घडण ज्या माध्यमांनी,साहित्यांनी केली त्याचाच हा आविष्कार आहे.<br> {{gap}}सामाजिक प्रश्नांची मांडणी करण्यासाठी देशमुख यांच्या साहित्यदृष्टीमध्ये नेहमी एका लोकशिक्षकाची आदर्शवादी भूमिका वसत आलेली आहे.समस्यामुक्त समाज निर्माण व्हावा या आदर्शवादी भूमिकेतून त्यांच्या साहित्याचे कथन नियंत्रित झाले आहे.या भूमिकेचा पगडा त्यांच्या जीवनचित्रणावर, पात्रसृष्टीवर व भाषेवर आहे.आदर्शवादी नायकाच्या निर्मितीतून या समाजव्यवस्थेचे निरीक्षण केलेले आहे. अंतिमत: ज्या प्रश्नांचे सूतोवाच प्रारंभिच केले आहे.त्याची दाहक वास्तवता,विविध कंगोरे प्रत्ययास आणून देऊन शेवट सकारात्मक असा केलेला असतो.तो ब-याच वेळेला सुखान्त स्वरूपाचा असतो.‘आदर्शाची व मांगल्याची आस असलेली नजर मला प्राप्त झाली आहे' असे स्वतः त्यांनी म्हटले आहे.या आदर्शवादी मूल्यविवेकाची जागती नजर त्यांच्या एकूण लेखनावर आहे.म्हणून त्यांच्या साहित्यदृष्टीत आदर्शवादी युटोपियाला महत्त्वाचे स्थान आहे.त्यांचे लेखनाचे अनेक विषय या जाणीवकेंद्राने नियंत्रित झाले आहेत. निराशावादी सिनिकल वृत्ती अव्हेरून मानवी जीवनातील साफल्याचे व आशावादीपणाचे सूचन त्यांच्या वाङ्मयात आहे.मराठी वाचक त्यांच्या नव्या अनुभवक्षेत्राच्या साहित्यकृतीच्या प्रतीक्षेत असेल. {{right|'''डॉ. रणधीर शिंदे'''}}<noinclude>{{right|'''लक्षदीप २९'''}}</noinclude> asqng9308q6ikrfaefn7h9hvuto61o4 सदस्य चर्चा:Vkale555 3 112353 237414 2026-09-24T19:12:23Z स्वागत आणि साहाय्य चमू 815 नवीन सदस्याच्या चर्चापानावर [[Template:Welcome|स्वागत संदेश]] टाकला 237414 wikitext text/x-wiki {{Template:Welcome|name=Vkale555}} -- [[सदस्य:स्वागत आणि साहाय्य चमू|स्वागत आणि साहाय्य चमू]] ([[सदस्य चर्चा:स्वागत आणि साहाय्य चमू|चर्चा]]) ००:४२, २५ सप्टेंबर २०२६ (IST) ezlekndeqvxg2oyn5rt1vh14rwurz54 छन्दोरचना 0 112354 237422 2026-09-25T02:42:20Z कल्पनाशक्ती 3813 नवीन पान "<pages index="छन्दोरचना.djvu" from=1 to=30/>" 237422 wikitext text/x-wiki <pages index="छन्दोरचना.djvu" from=1 to=30/> fi6gl604odxb59cblp2x3ic0a4abhnj 237429 237422 2026-09-25T07:15:40Z कल्पनाशक्ती 3813 237429 wikitext text/x-wiki <pages index="छन्दोरचना.djvu" from=1 to=40/> 9dkkycvr2ni6ze2ysvhjceu44cq8amd 237430 237429 2026-09-25T07:19:37Z कल्पनाशक्ती 3813 237430 wikitext text/x-wiki {{शीर्ष | शीर्षक = छन्दोरचना | साहित्यिक = डॉ. माधव त्रिंबक पटवर्धन | अनुवादक = | विभाग = | मागील = | पुढील = | वर्ष = 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