विकिस्रोत mrwikisource https://mr.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.24 first-letter मिडिया विशेष चर्चा सदस्य सदस्य चर्चा विकिस्रोत विकिस्रोत चर्चा चित्र चित्र चर्चा मिडियाविकी मिडियाविकी चर्चा साचा साचा चर्चा सहाय्य सहाय्य चर्चा वर्ग वर्ग चर्चा दालन दालन चर्चा साहित्यिक साहित्यिक चर्चा पान पान चर्चा अनुक्रमणिका अनुक्रमणिका चर्चा TimedText TimedText talk विभाग विभाग चर्चा Event Event talk पान:छन्दोरचना.djvu/138 104 5854 238077 15641 2026-10-21T08:04:06Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''१११'''|<u>'''वृत्तविचार'''</u>}}</noinclude>{{center|'''१ अिन्द्रवज्रा-वर्ग<br>'''}} <center> {| |+ अिन्द्रवज्रा-अुपेन्द्रवज्रा-वसन्ततिलका |- | ११ || अिन्द्रवज्रा|| [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १२ || आन्दोलिका|| [_ _ ‿ _ _।‿ _ ‿ _ _] |- | १३ || 'आनन्दशब्द' || [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १४ || केकिरव || [‿ ‿ _ ‿ _ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १५ || अुपेन्द्रवज्रा|| [‿ _ ‿ _ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १६ || कोल || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १७ || "प्रतिष्ठित" || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ _ _] |- | १८ || "व्यवस्थित" || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ ‿ ‿ _ _] |- | १९ || "समुपस्थिता" || [_ _ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २० || वसन्ततिलका || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २१ || ऋषभ || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २२ || शिशु || [_ _ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २३ || स्वर्णाक्षी || [_ _ _!‿ _ ‿ ‿ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २४ || केतन || [_ ‿ ‿ ‿ _ _ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २५ || विमला || [‿ ‿ _ ‿ _ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} १{{gap}}११ अिन्द्रवज्रा (पि ६/१५), "तौ जो गुरू चेन्द्रवतीन्द्रवज्रा" (अुवबृ १०३/३४). १२ "आन्दोलिका ततरगाः सायकैः सायकैर्यतिः" (ममच १६). १४ "स्यौ स्यौ केकिरवम्" (हे २/१९२). १५ अुपेन्द्रवज्रा (पि ६/१६), "अुपेन्द्रवज्रा तु जतौ जगौ गः" (अुवबृ १०३/११) १६ "ज्सौ स्यौ कोलः" (हे २/१९४). १७ "प्रतिष्ठित"; अुपस्थित (हे २/१३४), शिखण्डित (गछ २/५७), "अुपस्थितमिदं ज्सौ ताद्रकारौ" (के ३/४४). प्रतिष्ठितवृत्ताची मोडणी [|‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ _ ऽ।_] अशी केल्यास तें पद्मावर्तनी होअील. १८ "व्यवस्थित", "अुपस्थितमिदं ज्सौ त्सौ यदि गुरुः स्यात्" (गछ २/१०६). १९ "समुपस्थिता," "तो जौ<noinclude></noinclude> sjeef3ja1zqy1fjnuwd9hnpq9vfz82u 238078 238077 2026-10-21T08:04:43Z कल्पनाशक्ती 3813 238078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''१११'''|<u>'''वृत्तविचार'''</u>}}</noinclude>{{center|'''१ अिन्द्रवज्रा-वर्ग<br>'''}} <center> {| |+ अिन्द्रवज्रा-अुपेन्द्रवज्रा-वसन्ततिलका |- | ११ || अिन्द्रवज्रा|| [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १२ || आन्दोलिका|| [_ _ ‿ _ _।‿ _ ‿ _ _] |- | १३ || 'आनन्दशब्द' || [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १४ || केकिरव || [‿ ‿ _ ‿ _ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १५ || अुपेन्द्रवज्रा|| [‿ _ ‿ _ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १६ || कोल || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १७ || "प्रतिष्ठित" || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ _ _] |- | १८ || "व्यवस्थित" || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ ‿ ‿ _ _] |- | १९ || "समुपस्थिता" || [_ _ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २० || वसन्ततिलका || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २१ || ऋषभ || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २२ || शिशु || [_ _ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २३ || स्वर्णाक्षी || [_ _ _!‿ _ ‿ ‿ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २४ || केतन || [_ ‿ ‿ ‿ _ _ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २५ || विमला || [‿ ‿ _ ‿ _ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} {{gap}}११ अिन्द्रवज्रा (पि ६/१५), "तौ जो गुरू चेन्द्रवतीन्द्रवज्रा" (अुवबृ १०३/३४). १२ "आन्दोलिका ततरगाः सायकैः सायकैर्यतिः" (ममच १६). १४ "स्यौ स्यौ केकिरवम्" (हे २/१९२). १५ अुपेन्द्रवज्रा (पि ६/१६), "अुपेन्द्रवज्रा तु जतौ जगौ गः" (अुवबृ १०३/११) १६ "ज्सौ स्यौ कोलः" (हे २/१९४). १७ "प्रतिष्ठित"; अुपस्थित (हे २/१३४), शिखण्डित (गछ २/५७), "अुपस्थितमिदं ज्सौ ताद्रकारौ" (के ३/४४). प्रतिष्ठितवृत्ताची मोडणी [|‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ _ ऽ।_] अशी केल्यास तें पद्मावर्तनी होअील. १८ "व्यवस्थित", "अुपस्थितमिदं ज्सौ त्सौ यदि गुरुः स्यात्" (गछ २/१०६). १९ "समुपस्थिता," "तो जौ<noinclude></noinclude> 3q0h4912vawiuak1jugk0yjhypn3tcw 238079 238078 2026-10-21T08:15:45Z कल्पनाशक्ती 3813 238079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''१११'''|<u>'''वृत्तविचार'''</u>}}</noinclude>{{center|'''१ अिन्द्रवज्रा-वर्ग<br>अिन्द्रवज्रा-अुपेन्द्रवज्रा-वसन्ततिलका'''}} <center> {| |+ |- | ११ || अिन्द्रवज्रा|| [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १२ || आन्दोलिका|| [_ _ ‿ _ _।‿ _ ‿ _ _] |- | १३ || 'आनन्दशब्द' || [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १४ || केकिरव || [‿ ‿ _ ‿ _ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १५ || अुपेन्द्रवज्रा|| [‿ _ ‿ _ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १६ || कोल || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | १७ || "प्रतिष्ठित" || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ _ _] |- | १८ || "व्यवस्थित" || [‿ _ ‿ ‿ ‿ _|_ _ ‿ ‿ ‿ _ _] |- | १९ || "समुपस्थिता" || [_ _ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २० || वसन्ततिलका || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २१ || ऋषभ || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २२ || शिशु || [_ _ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २३ || स्वर्णाक्षी || [_ _ _!‿ _ ‿ ‿ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २४ || केतन || [_ ‿ ‿ ‿ _ _ ‿ ‿ _|‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | २५ || विमला || [‿ ‿ _ ‿ _ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} {{gap}}११ अिन्द्रवज्रा (पि ६/१५), "तौ जो गुरू चेन्द्रवतीन्द्रवज्रा" (अुवबृ १०३/३४). १२ "आन्दोलिका ततरगाः सायकैः सायकैर्यतिः" (ममच १६). १४ "स्यौ स्यौ केकिरवम्" (हे २/१९२). १५ अुपेन्द्रवज्रा (पि ६/१६), "अुपेन्द्रवज्रा तु जतौ जगौ गः" (अुवबृ १०३/११) १६ "ज्सौ स्यौ कोलः" (हे २/१९४). १७ "प्रतिष्ठित"; 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(गछ २/१४४). २२ "त्जसस्याः शिशुः" (हे २/२६०). २३ मो ज्सौ स्यौ स्वर्णाक्षी. हें नाव विद्याधर वा. भिडे यांनी भिजी १८४ व्या कवितेवर दिलें आहे. या वृत्ताची मोडणी [।_ _ _ ऽ ऽ।‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ ‿ _ऽ। _] अशी धरिल्यास तें पद्मावर्तनीहि होअील. २४ "भ्यसस्याः केतनं" (हे २/२६१). २५ "स्यौ विमला" (हे २/४१); याच्याच द्विरावृत्तीने केकिरव वृत्त सिद्ध होतें. या वृत्ताची मोडणी [।‿ ‿ _।_ _] अशी धरल्यास तें हरावर्तनी होते.<br> {{center|'''३ अिन्द्रवंशा-वर्ग'''}} {{center|'''वंशस्थ-रुचिरा—प्रहर्षिणी'''}} <center> {| |+ |- | २६ || अिन्द्रवंशा || [_ _ ‿ _ _।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _] |- | २७ || सुदन्त || [‿ ‿ _ ‿ _ _।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _] |- | २८ || वंशस्थ || [‿ _ ‿ _ _।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _] |- | २९ || मञ्जुभाषिणी{{gap}} || [‿ _ ‿ _ _।‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _] |- | ३० || मृदङ्ग || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ ‿ _ _] |- | ३१ || लक्ष्मी || [_ _ ‿ _ !‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _] |- | ३२ || रुचिरा || [‿ _ ‿ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _] |- | ३३ || रुक्मिणी || [‿ _ ‿ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ _] |- | ३४ || "सु" रुचिरा || [‿ _ ‿ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ३५ || प्रहर्षिणी || [ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ _] |- | ३६ || 'म्लेञ्छ'|| [ _ _ _ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ ‿ _ _] |- | ३७ || घनमाला || [ ‿ ‿ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ _] |- | ३८ || 'मधुमक्षिका' || [ _ ‿ ‿ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ _] |- | ३९ || रमा || [ ‿ ‿ ‿ ‿ _!‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ _] |- | ४० || "निर्मला" || [ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ _ ] |} </center> {{nop}}<noinclude></noinclude> gasqfyfy3cwboiffpjitp7vl9h515dx पान:छन्दोरचना.djvu/140 104 5856 238082 15643 2026-10-21T10:30:23Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238082 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''११३'''|<u>'''वृत्तविचार'''</u>}}</noinclude>{{center|'''टीपा'''}} {{gap}}२६ अिन्द्रवंशा (पि ६/२९). "ताविन्द्रवंशा जरसंहितौ मता" (अुवबृ १०३/१८). २७ "स्यौ स्जौ गः सुदन्तं" (हे २/२१८). २८ वंशस्थ (पि ६/२८), वंशस्थविल (श्रुबो ३२, गच्छ २/६६), वसन्तमञ्जरी (विवृ ५/२६), अभ्रवंशा (हे); "जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ" (के ३/४६). २९ "ज्तौ स्जौ गो मञ्जुभाषिणी" (हे २/२०७), मञ्ज्जुहासिनी (गछ २/१०७), मत्तहासिनी (निस ९१). हे वृत्त जेव्हा [। ‿ _ ‿ _ _ । ‿ ‿ ‿ _ ‿ _। ‿ _] असें पद्मावर्तनी मोडणीचें असेल तेव्हा त्याला मञ्जुहासिनी म्हणावें. ३० "त्भौ जौ रो मृदङ्गः" (हे २/२६२).<br>{{gap}}३१ "लक्ष्मीरियं तभसजगैरुदाहृता" (अुवबृ १०३/३६), (ह २/२१५), प्रभावती (श्रुबो ३४). 'युगग्रहैः" म्हणून श्रुतबोधकारच तेवढा यति साङ्गतो. ३२ रुचिरा (पि ७/२), प्रभावती (भ १६/५८), सदागति (विवृ ५/३०). "जभौ सजौ गिति रुचिरा चतुग्रहैः" (अुवबृ १०३/२१). ३३ ज्भौ स्जौ गौ रुक्मिणी घैः हें नाव मराठींत रूढ आहे पण याचा अुगम गावत नाही. कुसुम्भिनी (रपि ९३६) या नावालाहि आधार दिलेला नाही. ३४ "सु"-रुचिरा, "ज्भौ सरौ गोऽतिरुचिरा चतुर्भिर्नवभिर्यतिः" (ममच १७), रुचिरा (निस ८७). ३५ प्रहर्षिणी (पि ७/१), प्रहर्षणीय (वबृ १०३/२२), मयूरपिच्छ (विवृ ५/२९), "म्नौ ज्रौ गस्त्रिकदशकैः प्रहर्षणीयं" (अुवबृ १०३/२२).<br>{{gap}}३६ म्सौ ज्रौ ग् 'म्लेञ्छ'. ३७ स्भौ स्जो गै, घनमाला घैः हे नाव विद्याधर वा. भिडे यांनी भिजी १४९व्या कवितेवर दिलें आहे; पण आधार दिला नाही. वंशमूल (रपि ९३४) यालाहि आधार दिलेला नाही. ३८ भौ स्जौ गौ 'मधुमक्षिका'. ३९ न्जौ न्रौ य् रमा डैः हें नाव मराठींत रूढ आहे; पण अुगम गावत नाही. ४० "निर्मला" "स्जौ गो विमला" (हे २/६२) आणि (भ ३२/१०३). या वृत्ताची मोडणी [।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ । _] अशी घेतल्यास तें पद्मावर्तनी आणि [‿ ‿ । _ ‿ _ ‿ । _] अशी घेतल्यास तें भ्रङ्गावर्तनी होते.{{nop}}<noinclude><br>{{gap}}छ. ८</noinclude> nj717pnmxy756c72d5jgl0tlc73yl5a पान:छन्दोरचना.djvu/141 104 5857 238083 15644 2026-10-21T11:06:59Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''११४'''|}}</noinclude>{{center|'''४ रथोद्धता-वर्ग<br>प्रियंवदा-कनकप्रभा'''}} <center> {| |+ |- | ४१ || रथोद्धता || [_ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ _ ‿ _ ] |- | ४२ || प्रियंवदा || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ _ ‿ _ ] |- | ४३ || 'अभीष्ट'|| [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ _ ‿ _ ] |- | ४४ || ललिता || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _ । ‿ _ ‿ _ ] |- | ४५ || कनकप्रभा || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ _ ‿ _ ] |- | ४६ || बुद्बुद|| [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ _ ‿ _ । _ ‿ _ ‿ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} {{gap}}४१ रथोद्धता (पि ६/२२), अपरान्तिका (हे). "रौ नरौ लगुयुता रथोद्धता" (अुवबृ १०३/३१). नागवर्मा सहाव्या अक्षरानन्तर यति साङ्गतो; तसा घेतल्यास वृत्त पद्मावर्तनी होअील. ४२ प्रियंवदा (हे २/१७५, कद ४/४८), मत्तकोकिल (हे), निरुपमा (ना १३१) "भुवि भवेन्नभजरैः प्रियंवदा" (के ३/५७).४३ न्भौ लौ ग् अभीष्ट. ४४ ललिता (हे २/१७६); "धीरैरभाणि ललिता तभौ जरौ" (के ३/५९). ४५ कनकप्रभा स्जौ स्जौ ग् (पि ८/७), जया, सुमङ्गली (हे), मनोवती (भ, हे), नन्दिनी (स्वछ ३, हे २/२११), [अर्थात् 'सुनन्दिनीति शम्भौ' (गछ) हे चूक असावें], मञ्जुभाषिणी (के ३/७४), प्रबोधिता (गछ २/१०२), ४६ "स्जौ स्जौ त्रौ बुद्बुदं" (हे २/३२१). [।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ।_ _ ‿ _ ‿।_ ] अशी मोडणी घेतल्यास हें वृत्त पद्मावर्तनी होतें.<br> {{center|'''५ स्वागता-वर्ग<Br>लङ्का-कुटजा-प्रमिताक्षरा-यूथिका-द्रुतविलम्बित'''}} <center> {| |+ |- | ४७ || स्वागता || [_ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ _] |- | ४८ || द्रुतपदा || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ _] |- | ४९ || अम्बुज || [_ ‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ _] |- | ५० || चन्द्रवर्त्म || [_ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ ‿ ‿ _]<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> cx5ctqq0a55tsxtvkilzh4r19if5eur पान:छन्दोरचना.djvu/142 104 5858 238084 15645 2026-10-21T11:42:50Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''१११'''|<u>'''वृत्तविस्तार'''</u>}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | ५१ || मणिरङ्ग || [_ ‿ _ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ _] |- | ५२ || 'लङ्का' || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ _] |- | ५३ || कुटजा || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ _] |- | ५४ || प्रमिताक्षरा || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ _।‿ ‿ _] |- | ५५ || प्रमिता || [‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ _। _] |- | ५६ || अुत्थापनी || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _] |- | ५७ || मणिकटक || [‿ ‿ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _] |- | ५८ || यूथिका || [ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ ‿ _] |- | ५९ || अच्युत || [ _ ‿ _ ‿ ‿ _।‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६० || 'जनकात्मजा' || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६१ || द्रुतविलम्बित || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६२ || अभ्रक || [_ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६३ || कमलिनी || [ ‿ ‿ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६४ || सुन्दर || [_ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ।‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६५ || मङ्गला || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ।‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६६ || "प्रगुणीकृता" || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ।‿ ‿ _ ‿ _] |- | ६७ || कुसुमाङ्घ्रिप || [‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ _ ।‿ ‿ _ ‿ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} {{gap}}४७ स्वागता (पि ६/२३), "स्वागता रनभगैर्गुरुतोऽन्ते" (अुवबृ १०३/१९). या वृत्ताची मोडणी [। _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ । _ ‿ ‿ _ _] अशी घेतल्यास तें पद्मावर्तनी होअील. ४८ द्रुतपदा (हे), "द्रुतपदं नभजयैः कथितं तत्" (अुवबृ १०३/२०), कलहंसा (हे २/१६१), मुखर (हे). "दुतपदं भवति नभनयाश्रेत्" (गछ २/८८) असेंहि लक्षण आढळतें. ४९ म्जौ सौ ग् अम्बुज (ना १४५) हें वृत्त दुतपदाच्या आरम्भीं अेक गुरु अधिक घातल्याने होतॆ, ५० चन्द्रवर्त्म (हे २/१६२), "चन्द्रवर्त्म निगदन्ति रनभसैः" (के ३/४५). हें वृत्त [[ _ ‿ _ ‿ ‿ ‿ । _ ‿ ‿ ‿ ‿ _]] अशी मोडणी घेतल्यास पद्मावर्तनी होअील.{{nop}}<noinclude></noinclude> 9bmoo2c1juok2kujow3yklu63qjb7dn पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/६७ 104 112497 238072 238032 2026-10-21T06:32:23Z JayashreeVI 4058 /* मुद्रितशोधन */ 238072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>{{gap}}सामाजिक पातळीवर जातिव्यवस्थेतील विषमतेची उतरंड, कौटुंबिक पातळीवर स्त्री-पुरुष लिंगभेदारित विषमतेतील तरतमभाव आणि याला तात्त्विक आधार म्हणून कर्मविपाकवादाचा पिढ्यान्पिढ्या रुजलेला भक्कम आधार यातून वाट काढण्यासाठीच आजवरच्या सर्व परिवर्तनवाद्यांची धडपड आहे. <br>{{gap}}जातिव्यवस्थेत आर्थिक, शैक्षणिक (ज्ञानविषयक) सांस्कृतिक विषमतेचे प्रश्न सामावलेले आहेत. जाती या वर्णाधिष्ठित आहेत की नाहीत हा वाद तूर्तास बाजूला ठेवला तरी व्यवसायाशी पर्यायाने अर्थोत्पादन व्यवस्थेशी जातींची वांधिलकी असल्याने आणि जाती व्यक्तीला जन्मजात लाभत असल्याने काही जाती आर्थिकदृष्ट्या नेहमीच शीर्षस्थानी राहिल्या तर काही नेहमीच 'पददलित' राहिल्या. त्यांचे व्यवसाय उच्चस्तरीयांच्या अमंगळ सेवांशी बांधलेले राहिले. धर्माने त्यावर 'अपवित्र' म्हणून शिक्कामोर्तब केले. उलट आर्थिक लाभांचे व्यवसाय 'पवित्र' म्हणून धर्माने प्रतिष्ठित केले. शिवाय श्रमाशीही त्यांचे विषम नाते राहिले आहे. अधिक श्रम करणाऱ्या जाती कमी प्रतिष्ठित आणि कमी श्रम करणाऱ्या तसेच केवळ बौद्धिक काम करणाऱ्या जाती अधिक प्रतिष्ठित. या जातींच्या पातळीवरही प्रत्येक जाती जमातीतील स्त्री त्या त्या स्तरात कमी दर्जाची अवहेलितच राहिली. <br>{{gap}}कौटुंबिक जीवनातच सर्व स्त्रिया बंदिस्त राहिल्या आणि स्त्री जन्म हेच मागील जन्माच्या पापाचे फळ ही धर्ममान्यता असल्याने उच्च जातीतल्या स्त्रियाही सतत दुय्यम स्थानावरच राहिल्या. धर्माने कर्मविपाकवादानुसार पुनर्जन्म हे मागील जन्माचे फळ सांगितल्याने चालू जन्मात मागच्या जन्माचे 'भोग'- बरे-वाईट निमूटपणे भोगणे हीच पुढच्या जन्माच्या पुण्याची बेगमी ठरली. <br>{{gap}}या सगळ्याचा परिणाम म्हणून गतानुगतिकतेचे चक्र वर्षानुवर्षे एकाच चाकोरीत फिरण्याची मानसिकता घडत गेली. चालू जन्मात आपली परिस्थिती बदलण्याचे प्रयत्न आपण करावेत हा विचारसुद्धा मनात येणे 'पाप' मानले गेले. उलट 'भोग' मुकाट्याने भोगणे हेच 'सत्व' मानले गेले. त्यातून सर्व निम्नश्रेणीय जाती आणि स्त्रिया यांची "निमूट सोशिकता" हे गौरवमूल्य म्हणून जे प्रतिष्ठित झाले ते आजतागायत मुळातून बदलले आहे, असे दिसत नाही. {{gap}}एका उतरंडीच्या व्यवस्थेत येथील जाती, व्यवसाय, आर्थिक स्थिती, कुटुंबघटक अगदी बिनबोभाट रहावेत असे येथील धर्माचे तत्त्वज्ञान फार घट्टपणे रुजले आहे. {{gap}}इंग्रजोत्तर समता, स्वातंत्र्य, बंधुभाव ही मूल्ये या घट्ट मानसिक व्यवस्थेला मुळापासून हादरवून टाकणारी होती. या पारंपरिक व्यवस्थेमुळे ज्या घटकांना<noinclude>{{right|मध्यमवर्गीय स्त्री : सिंहावलोकन / ६६}}</noinclude> 0n4faxqifywgk1pk0gekez9canvt6q2 238073 238072 2026-10-21T06:33:21Z JayashreeVI 4058 238073 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>{{gap}}सामाजिक पातळीवर जातिव्यवस्थेतील विषमतेची उतरंड, कौटुंबिक पातळीवर स्त्री-पुरुष लिंगभेदारित विषमतेतील तरतमभाव आणि याला तात्त्विक आधार म्हणून कर्मविपाकवादाचा पिढ्यान्पिढ्या रुजलेला भक्कम आधार यातून वाट काढण्यासाठीच आजवरच्या सर्व परिवर्तनवाद्यांची धडपड आहे. <br>{{gap}}जातिव्यवस्थेत आर्थिक, शैक्षणिक (ज्ञानविषयक) सांस्कृतिक विषमतेचे प्रश्न सामावलेले आहेत. जाती या वर्णाधिष्ठित आहेत की नाहीत हा वाद तूर्तास बाजूला ठेवला तरी व्यवसायाशी पर्यायाने अर्थोत्पादन व्यवस्थेशी जातींची वांधिलकी असल्याने आणि जाती व्यक्तीला जन्मजात लाभत असल्याने काही जाती आर्थिकदृष्ट्या नेहमीच शीर्षस्थानी राहिल्या तर काही नेहमीच 'पददलित' राहिल्या. त्यांचे व्यवसाय उच्चस्तरीयांच्या अमंगळ सेवांशी बांधलेले राहिले. धर्माने त्यावर 'अपवित्र' म्हणून शिक्कामोर्तब केले. उलट आर्थिक लाभांचे व्यवसाय 'पवित्र' म्हणून धर्माने प्रतिष्ठित केले. शिवाय श्रमाशीही त्यांचे विषम नाते राहिले आहे. अधिक श्रम करणाऱ्या जाती कमी प्रतिष्ठित आणि कमी श्रम करणाऱ्या तसेच केवळ बौद्धिक काम करणाऱ्या जाती अधिक प्रतिष्ठित. या जातींच्या पातळीवरही प्रत्येक जाती जमातीतील स्त्री त्या त्या स्तरात कमी दर्जाची अवहेलितच राहिली. <br>{{gap}}कौटुंबिक जीवनातच सर्व स्त्रिया बंदिस्त राहिल्या आणि स्त्री जन्म हेच मागील जन्माच्या पापाचे फळ ही धर्ममान्यता असल्याने उच्च जातीतल्या स्त्रियाही सतत दुय्यम स्थानावरच राहिल्या. धर्माने कर्मविपाकवादानुसार पुनर्जन्म हे मागील जन्माचे फळ सांगितल्याने चालू जन्मात मागच्या जन्माचे 'भोग'- बरे-वाईट निमूटपणे भोगणे हीच पुढच्या जन्माच्या पुण्याची बेगमी ठरली. <br>{{gap}}या सगळ्याचा परिणाम म्हणून गतानुगतिकतेचे चक्र वर्षानुवर्षे एकाच चाकोरीत फिरण्याची मानसिकता घडत गेली. चालू जन्मात आपली परिस्थिती बदलण्याचे प्रयत्न आपण करावेत हा विचारसुद्धा मनात येणे 'पाप' मानले गेले. उलट 'भोग' मुकाट्याने भोगणे हेच 'सत्व' मानले गेले. त्यातून सर्व निम्नश्रेणीय जाती आणि स्त्रिया यांची "निमूट सोशिकता" हे गौरवमूल्य म्हणून जे प्रतिष्ठित झाले ते आजतागायत मुळातून बदलले आहे, असे दिसत नाही. <br>{{gap}}एका उतरंडीच्या व्यवस्थेत येथील जाती, व्यवसाय, आर्थिक स्थिती, कुटुंबघटक अगदी बिनबोभाट रहावेत असे येथील धर्माचे तत्त्वज्ञान फार घट्टपणे रुजले आहे. {{gap}}इंग्रजोत्तर समता, स्वातंत्र्य, बंधुभाव ही मूल्ये या घट्ट मानसिक व्यवस्थेला मुळापासून हादरवून टाकणारी होती. या पारंपरिक व्यवस्थेमुळे ज्या घटकांना<noinclude>{{right|मध्यमवर्गीय स्त्री : सिंहावलोकन / ६६}}</noinclude> ba33r3mjuaa7p8dho05jd32u5iwom29 पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/६८ 104 112498 238074 238033 2026-10-21T06:39:23Z JayashreeVI 4058 /* मुद्रितशोधन */ 238074 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>अनायासे लाभ मिळत होते असे घटक अनेक कारणांनी अस्वस्थ झाले आणि विविध प्रकारच्या प्रतिक्रिया सुरू झाल्या. त्यांनाही नवा विचार मूल्ये एकदम पचवणे कठीण गेले. यापैकी स्त्रियांना ते अजूनही कठीण जात आहे. पिढ्यान्पिढ्यांच्या स्थितिशील मानसिकतेशीच प्रामुख्याने इंग्रजोत्तर पुरोगामी व्यक्ती स्वातंत्र्यवादी विचारवंतांचा आणि चळवळींचा संघर्ष आहे. धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, कौटुंबिक असे अनेक प्रश्न एकमेकांत अडकलेले आहेत. म्हणून पुरोगामी विचारांची लढाई नेहमीच गुंतागुंतीची राहिली आहे. <br>{{gap}}या पार्श्वभूमीवर स्त्रीमुक्ती लढ्याचे आयुष्य तसे फार कमी आहे. इंग्रजोत्तर प्रारंभीच्या एकोणिसाव्या शतकात स्त्रियांच्या प्रश्नांवर प्रामुख्याने पुरोगामी पुरुषांनीच प्रयत्न केले आणि त्यांना स्थितिशील पुरुषप्रधान व्यवस्थेतील पुरुषांच्याच कडव्या विरोधाला तोंड द्यावे लागले. <br>{{gap}}स्त्रियांना येथील धर्माने आणि समाजाने जे दुय्यम गौण स्थान दिले आहे, तेच कसे योग्य आहे, हे आग्रहाने सांगणारा स्थितिशीलांचा एक विचारप्रवाह प्रारंभी फार प्रबळ होता. विरोधी असला तरी एकपरीने तो प्रामाणिक होता; पण दुसरा प्रवाह त्याच गौणत्वाचे गोडवे गाताना मात्र हे गौणत्व नसून स्त्रीगौरव असल्याचा चतुर आणि मतलबी बुरखा पांघरणारा आहे. खरे तर हा प्रवाहही जुनाच आहे; पण दर टप्प्यातल्या पुरुषप्रधान व्यवस्थेने तपशील बदलून परंपरेचे गौरवगान चालू ठेवले आहे आणि विशेष म्हणजे स्त्रीवर्ग या चतुराईचा बळी ठरत आला आहे. पतीव्रता, पुत्रवती, सती, गृहलक्ष्मी आदिशक्ती अशा विविध विशेषणांतून स्त्रीची सर्व पातळ्यांवरची बंदिस्ती केली आहे. तिच्याही लक्षात येऊ नये अशी गौरवगाथा या विशेषणांच्या आशयाभोवती गुंफली गेली आहे. एकेकाळी या विशेषणांनी युक्त "आर्य स्त्री" चा मानदंड सांगितला जात असे तर आज "थोर भारतीय संस्कृती"तील स्त्रीची सन्माननीय बिरूदे म्हणून त्यांचा गौरव होतो.<br> {{gap}}जातीभेदाच्या किंवा आर्थिक विषमतेच्या संघर्षासाठी पीडितांच्या संघटना बांधणे तुलनेने सोपे असते, कारण प्रतिस्पर्धी आपल्या जातीबाहेर, घराबाहेर असतो. एका अर्थी तो 'पर' का असतो. परक्यांशी संघटितपणे लढणे तुलनेने सोपे असते. त्यापासून होणारे लाभ आर्थिक भौतिक असतात. {{gap}}स्त्रियांना आपल्यावरील अन्यायाच्या विरोधात विषम वागणुकीच्या विरोधात संघर्ष करायचा झाला तर प्रतिस्पर्धी कोठे बाहेर नसतो. घरातच असतो. 'पाण्यात राहून माशाशी वैर' अनेकदा विकत घ्यावे तसा घरातील, निकटच्या नात्यातील पुरुष घटकांशीच संघर्ष करावा लागतो. अनेकदा कुटुंबातील स्त्री घटकांशी<noinclude>{{left|निरगाठ-सुरगाठ / ६७}}</noinclude> aqizsuxo0yh87h5qcslah86xixweazw पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/६९ 104 112499 238075 238034 2026-10-21T06:44:25Z JayashreeVI 4058 /* मुद्रितशोधन */ 238075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>करावा लागतो; कारण त्या स्त्रिया पारंपरिक पुरुषसत्ताक मूल्यांच्याच पुरस्कर्त्या असतात. त्या मुद्दाम अशा होतात असे नव्हे, तर नकळत येथील धार्मिक, सामाजिक, कौटुंबिक जीवनातील पुरुषसत्ताक व्यवस्था हीच गौरवास्पद असण्याची मानसिकता सर्वांचीच असते. ही व्यवस्था मोडली तर विद्यमान व्यवस्थेतील घटकांना नेहमीच भय वाटत आले आहे. <br>{{gap}}उच्च जातीयांना निन्मजातीय आपल्या लाभस्थानांवर आक्रमण करून आपले उच्चाटन करतील हे जसे भय असते तसेच स्त्रियांना अधिक सोयी, सवलती, स्वातंत्र्य मिळाले तर पुरुषसत्ताक व्यवस्थेतील लाभार्थीनाही असुरक्षिततेचे भय वाटते. त्यातून स्त्रियांच्या चळवळींना टोकाचा विरोध होत आला आहे. <br>{{gap}}खुद्द स्त्रियाच कुटुंबाच्या चौकटीत इतक्या बंदिस्त आहेत की, येथेच आपण सर्वाधिक सुरक्षित आहोत अशी त्यांची मानसिकता आहे. विद्यमान चौकटीबाहेर जाणे म्हणजे असुरक्षित होणे, असे भय स्त्रीमनाच्या गाभ्यात फार घट्ट रुजले आहे. <br>{{gap}}अर्थार्जन करणाऱ्या स्त्रीमनालाही या भयातून सहजासहजी मुक्तता मिळत नाही; कारण अर्थार्जन करून फार तर उपजीविकेचा प्रश्न सुटेल; पण स्त्रीची समस्या त्यापलीकडची स्पष्टच सांगायचे तर कुटुंबाबाहेर पुरुषछत्राशिवाय स्त्रीला लैंगिक सुरक्षितता मिळू शकत नाही. ही धारणा (भ्रामक असली तरी) स्त्री-पुरुष सर्वांच्याच मनात ठामपणे आहे. <br>{{gap}}शिवाय चारित्र्य, शील या शब्दांनी व्यक्त होणाऱ्या अर्थसंकेतांची वेटोळी स्त्रियांसाठी तुरुंग बनलेली आहेत. कुटुंबाबाहेर राहणारी स्त्री ही चारित्र्यहीनच असणार आणि चारित्र्यहीनता म्हणजे लैंगिक स्वैरपणा हा समज पक्का आहे. या सर्वांची इतकी दडपणे स्त्रीमनावर असतात की स्त्री स्वातंत्र्य किंवा स्त्री मुक्ती म्हणजे कुटुंबाशी विद्रोह करणे, विशेषतः वैवाहिक जीवन उध्वस्त करणे अशी टोकाची मानसिकता असते. अशी मानसिकता तयार करण्यात येथील पुरुषप्रधान व्यवस्थेच्या अपप्रचाराचा फार मोठा सहभाग आहे. कारण स्त्रीला जर एक स्वतंत्र व्यक्ती म्हणून सर्व स्तरांवर स्थान मिळाले तर स्त्रीला दुय्यम स्थान दिल्याने होणाऱ्या लाभांपासून आपण वंचित होऊ ही भीती पुरुषसत्तेला सतत वाटते. कारण विवाह करून एक स्त्री घरात आणली की ती दैनंदिन सर्व स्तरांवरचे कष्ट उपसण्यासाठी, हुकमी लैंगिक गरजा भागविण्यासाठी आणि वंशसातत्यासाठी हक्काची सोय असते. वंशसातत्यामुळे म्हातारपणाचीही सोय होते. म्हणून जिच्यामुळे इतके लाभ होतात, ती स्त्री आपल्या 'ताब्यात' असणे गरजेचे असते; पण स्त्री म्हणजे जनावर वा वस्तू नाही. तिलाही मन विचार आहे. म्हणूनच विविध<noinclude>{{right| मध्यमवर्गीय स्त्री : सिंहावलोकन / ६८}}</noinclude> 3iy38rmgqjnr402y00o9ucua22nyxgo 238076 238075 2026-10-21T06:44:59Z JayashreeVI 4058 238076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>करावा लागतो; कारण त्या स्त्रिया पारंपरिक पुरुषसत्ताक मूल्यांच्याच पुरस्कर्त्या असतात. त्या मुद्दाम अशा होतात असे नव्हे, तर नकळत येथील धार्मिक, सामाजिक, कौटुंबिक जीवनातील पुरुषसत्ताक व्यवस्था हीच गौरवास्पद असण्याची मानसिकता सर्वांचीच असते. ही व्यवस्था मोडली तर विद्यमान व्यवस्थेतील घटकांना नेहमीच भय वाटत आले आहे. <br>{{gap}}उच्च जातीयांना निन्मजातीय आपल्या लाभस्थानांवर आक्रमण करून आपले उच्चाटन करतील हे जसे भय असते तसेच स्त्रियांना अधिक सोयी, सवलती, स्वातंत्र्य मिळाले तर पुरुषसत्ताक व्यवस्थेतील लाभार्थीनाही असुरक्षिततेचे भय वाटते. त्यातून स्त्रियांच्या चळवळींना टोकाचा विरोध होत आला आहे. <br>{{gap}}खुद्द स्त्रियाच कुटुंबाच्या चौकटीत इतक्या बंदिस्त आहेत की, येथेच आपण सर्वाधिक सुरक्षित आहोत अशी त्यांची मानसिकता आहे. विद्यमान चौकटीबाहेर जाणे म्हणजे असुरक्षित होणे, असे भय स्त्रीमनाच्या गाभ्यात फार घट्ट रुजले आहे. <br>{{gap}}अर्थार्जन करणाऱ्या स्त्रीमनालाही या भयातून सहजासहजी मुक्तता मिळत नाही; कारण अर्थार्जन करून फार तर उपजीविकेचा प्रश्न सुटेल; पण स्त्रीची समस्या त्यापलीकडची स्पष्टच सांगायचे तर कुटुंबाबाहेर पुरुषछत्राशिवाय स्त्रीला लैंगिक सुरक्षितता मिळू शकत नाही. ही धारणा (भ्रामक असली तरी) स्त्री-पुरुष सर्वांच्याच मनात ठामपणे आहे. {{gap}}शिवाय चारित्र्य, शील या शब्दांनी व्यक्त होणाऱ्या अर्थसंकेतांची वेटोळी स्त्रियांसाठी तुरुंग बनलेली आहेत. कुटुंबाबाहेर राहणारी स्त्री ही चारित्र्यहीनच असणार आणि चारित्र्यहीनता म्हणजे लैंगिक स्वैरपणा हा समज पक्का आहे. या सर्वांची इतकी दडपणे स्त्रीमनावर असतात की स्त्री स्वातंत्र्य किंवा स्त्री मुक्ती म्हणजे कुटुंबाशी विद्रोह करणे, विशेषतः वैवाहिक जीवन उध्वस्त करणे अशी टोकाची मानसिकता असते. अशी मानसिकता तयार करण्यात येथील पुरुषप्रधान व्यवस्थेच्या अपप्रचाराचा फार मोठा सहभाग आहे. कारण स्त्रीला जर एक स्वतंत्र व्यक्ती म्हणून सर्व स्तरांवर स्थान मिळाले तर स्त्रीला दुय्यम स्थान दिल्याने होणाऱ्या लाभांपासून आपण वंचित होऊ ही भीती पुरुषसत्तेला सतत वाटते. कारण विवाह करून एक स्त्री घरात आणली की ती दैनंदिन सर्व स्तरांवरचे कष्ट उपसण्यासाठी, हुकमी लैंगिक गरजा भागविण्यासाठी आणि वंशसातत्यासाठी हक्काची सोय असते. वंशसातत्यामुळे म्हातारपणाचीही सोय होते. म्हणून जिच्यामुळे इतके लाभ होतात, ती स्त्री आपल्या 'ताब्यात' असणे गरजेचे असते; पण स्त्री म्हणजे जनावर वा वस्तू नाही. तिलाही मन विचार आहे. म्हणूनच विविध<noinclude>{{right| मध्यमवर्गीय स्त्री : सिंहावलोकन / ६८}}</noinclude> s6bfc5345afw6j0faegpxxw5chy6v3u