विकिस्रोत mrwikisource https://mr.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.24 first-letter मिडिया विशेष चर्चा सदस्य सदस्य चर्चा विकिस्रोत विकिस्रोत चर्चा चित्र चित्र चर्चा मिडियाविकी मिडियाविकी चर्चा साचा साचा चर्चा सहाय्य सहाय्य चर्चा वर्ग वर्ग चर्चा दालन दालन चर्चा साहित्यिक साहित्यिक चर्चा पान पान चर्चा अनुक्रमणिका अनुक्रमणिका चर्चा TimedText TimedText talk विभाग विभाग चर्चा Event Event talk पान:छन्दोरचना.djvu/143 104 5859 238090 15646 2026-10-22T09:39:52Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''११६'''|}}</noinclude>{{gap}}५१ "रः सो गो मणिरंगः" (हे २/११६), (ना १११). हेमचन्द्राच्या अुदाहरणांत मणिराग आहे. हें वृत्त [_ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ ‿ _। _] याप्रमाणे पद्मावर्तनी मोडणीचें असेल तेव्हा त्याला मणिराग म्हणावें. ५२ न्भौ भ्गौ ग् 'लङ्का'. रोधक (गापि ५८१) हें नाव आहे; पण आधार नाही. मणिरागाप्रमाणे लङ्कावृत्तहि [‿ ‿ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ ‿ _। _] पद्यावर्तनी होअू शकते. ५३ कुटजा (मल्लिनाथ शिशु० ६/७३), "स्जौ सौ गः कुटजं" (हे २।२१३); भ्रमर (हे), कलहंस (गछ २/१०१), नवनन्दिनी (मोसग्र ८/५१३ पहा). ५४ प्रमिताक्षरा (पि ६/३९) चित्रा (हे), प्रवराक्षरा (ना १३५). "प्रमिताक्षरा सजयुतावथ सौ" (अुवबृ १०३/३७). नागवर्मा ६ व्या अक्षरानन्तर यति साङ्गतो तेव्हा [।‿ ‿ _ ‿ _ ‿ !‿ ‿ _ ‿ ‿ _] या मोडणीच्या पद्मावर्तनी वृत्ताला प्रवराक्षरा म्हणावें. याव्यतिरिक्त पद्मावर्तनी मोडणींतच [‿ ‿ _।‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _] आणि [‿ ‿ । _ ‿ _ ‿ ‿ ‿|_ ‿ ‿ _] असे दोन प्रकार सम्भवतात. ५५ स्जस्गाः प्रमिता (भ ३२/१४४हे), माला (हे २/१२६). या वृत्ताची मोडणी जेव्हा [‿ ‿ _।‿ _ ‿ ‿ ‿ _। _] अशी पद्मावर्तनी असेल तेव्हा त्याला "शशि"माला आणि [‿ ‿ ।_ ‿ _ ‿ ‿ ‿ । _ _] अशी पद्मावर्तनी असेल तेव्हा त्याला "विधु"माला म्हणावें.<br>{{gap}}५६ "तभजल्गा अुत्थापनी" (हे २/१४८), धारावलिका (पि ९८ टीप). प्रमिताक्षरावृत्ताप्रमाणेच अुत्थापनीचेहि [_ _।‿ _ ‿ ‿ _।‿ ‿ _] आणि [_।_ ‿ _ ‿ ‿ ‿ ।_ ‿ ‿ _] असे दोन प्रकार सम्भवतात. ५७ मणिकटक (हे), "न्जभ्जल्गा धृतिः" (हे २/२३६), प्रमदा (गछ २/१२४), कुररीरुता (मल्लिनाथ शिशु० ४/४१). या वृत्ताची मोडणी जेव्हा [।‿ ‿ ‿ ‿ _ ऽऽ।‿ _ ‿ ‿ ‿ _।‿ ‿ _] अशी असेल तेव्हा त्याला प्रमदा म्हणावें. ५८ नों भ्रौ यूथिका (रपि ८७१), पण या नावाचा अुगम सापडत नाही. ५९ "रः सौ ल्गौ अच्युतं" (हे २/१२८); या वृत्ताची मोडणी [_ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ _) अशी पद्मावर्तनीहि होअू शकेल. ६० 'जनकात्मजा' न्भौ जौ ग्. या वृत्ताला वृत्तदर्पणकार विभावरी म्हणतो; पण हेमचन्द्र विभावरी नावाचें निराळेच वृत्त साङ्गतो. सारसनावलि (रपि ८७१) या नावाला तसा आधार गवसत नाही.{{nop}}<noinclude></noinclude> smw8bvv1my8wqb8fxq4iyr3jvwavf1z पान:छन्दोरचना.djvu/144 104 5860 238091 15647 2026-10-22T10:25:37Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''११७'''|<u>'''वृत्तविस्तार'''</u>}}</noinclude>{{gap}}६१ द्रुतविलम्बित (पि ६/३०), हरिणप्लुता (भ १६/४८) सुन्दरी (प्रापै २/१३९), "द्रुतविलम्बितमाह नभो भरौ" (के ३/४९) द्रुतविलम्बिताची मोडणी [‿ ‿ ‿ _!‿ ‿ _ ‿ ‿ _।‿ _] अशी घेतल्यास तें अच्युताप्रमाणे पद्मावर्तनी होअील. ६२ "त्भौ जौ गो अभ्रकं" (हे २।२१६); या वृत्ताच्या अन्तीं अेक गुरु वाढविल्याने वसन्ततिलकावृत्त होतें. ६३ स्जौं सौ ल्गौ कमलिनी. हें वृत्त विद्याधर वा. भिडे यांनी सिद्ध केलें असून नामकरणहि त्यांनीच केलें आहे. ६४ "रान्नभभ्राः सुन्दरं" (हे २।२५७), माणिविभूषण (ना १५५), मणिभूषण, रमणीय (हे). हें वृत्त [_ ।‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ‿ ‿ _। ‿ _] आणि [।_ ‿ _ ‿ ‿ ‿। _ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ।_ऽ ‿ _] अशा दोन प्रकारांनी पद्मावर्तनी होअू शकतें, यांना अनुक्रमें मणिभूषण आणि रमणीय म्हणावें. ६५ मङ्गला (ना १५९), "न्भौ जिगौ मङ्गलमङ्गना घैः" (हे २।२७१). सुन्दर वृत्ताप्रमाणेच हें वृत्तहि [‿ ‿। ‿ _ ‿ ‿ ‿ _। ‿ ‿ _ ‿ ‿ _ ।‿ _] आणि [।‿ ‿ ‿ _ ‿ ‿ ‿। _ ‿ ‿ _ ‿ ‿। _ऽ ‿ _] अशा दोन प्रकारांनी पद्मावर्तनी होअू शकतें.<br>{{gap}}६६ नभिराः "प्रगुणीकृता." हें समवृत्त आढळांत नाही; पण मकरावली नामक अर्धसमवृतांतील समचरण या लगावलीचे असतात. प्रगुणीकृता हे नाव हेमचन्द्राच्या मकरावलीच्या अुदाहरणांतील दुसऱ्या चरणावरून घेतलें आहे. ६७ न्भौं सौं ल्गी कुसुमाङि्घ्रप (ना १४८).<br> {{center|'''६ शालिनी-वर्ग<br>वातोर्मि-वैश्वदेवी-अनङ्गलेखा'''}} <center> {| |+ |- | ६८ || शालिनी || [_ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ६९ || वातोर्मि || [_ _ _ _!‿ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७० || वैश्वदेवी || [_ _ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७१ || कोडुम्भो || [_ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७२ || चन्द्रिणी || [‿ _ _ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७३ || "राज"-लक्ष्मी || [_ _ _ _ ‿ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७४ || चित्रा || [_ _ _ _!_ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _]<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> iorpy0pqce490bwihiqxscmvd8olceg पान:छन्दोरचना.djvu/145 104 5861 238092 15648 2026-10-22T10:53:11Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''११८'''|}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | ७५ || पद्म || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७६ || चन्द्रमाला || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७७ || अनङ्गलेखा || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ _ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} ६८ शालिनी (पि ६/१९), 'मात्तौ गौ चेत् शालिनी वेदलोकैः" (अुवबृ १०३/३०). ६९ वातोर्मि (पि ६/२०), अूर्मिमाला (वबृ १०३/४५) "वातोर्मीयं कथिता म्भौ तगौ गः" (के ३/३५). ७० वैश्वदेवी (पि ६/४१), चन्द्रलेखा (भ १६/४२), चन्द्रकान्ता(हे). "मौ यौ पञ्चाश्वैवैश्वदेवीति नाम्ना" (अुवबृ १०३/४४).<br>{{gap}}७१ "म्तौ स्रौ गः कोड्डम्भो ङैः" (हे २/२१७). ७२ "य्मौ रौ गः चन्द्रिणी चैः" (हे २/२०५), चञ्चरीकावली (गछ २/१०४, ममच १७). ७३ "राज"लक्ष्मी; "म्रौ तौ गौ लक्ष्मीः" (हे २/२२६). ७४ "मिर्यौ चित्रा जैः" (हे २/२५०), मण्डूकी, चञ्चला (हे). ७५ "नः स्मौ तौ गौ पद्मं चघैः" (हे २/२९५). ७६ "नौ मौ यौ चन्द्रमाला छघैः" (२/३०८). ७७ "न्सौ मौ यौ अनङ्गलेखा चङैः" (हे २/३१३).<br> {{center|'''७ मन्दाक्रान्ता-वर्ग<br>कुसुमितलता-स्त्रग्धरा-मालिनी'''}} {| |+ |- | ७८ || चन्द्रलेखा || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७९ || मन्दाक्रान्ता || [_ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८० || कुसुमितलता || [_ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८१ || विस्मिता || [‿ _ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८२ || चित्रमाला || [_ _ _ _ ‿ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८३ || नन्दीमुखी || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८४ || चित्रलेखा || [_ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८५ || पुष्पदाम || [_ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८६ || शोभा || [‿ _ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८७ || मुग्धक || [‿ _ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!‿ _ _ ‿ _ _]<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> fzngv9ctpmgf5y1xbtopgnw0fvnw1g0 238093 238092 2026-10-22T10:53:38Z कल्पनाशक्ती 3813 238093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh|<u>'''छन्दोरचना'''</u>|'''११८'''|}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | ७५ || पद्म || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७६ || चन्द्रमाला || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७७ || अनङ्गलेखा || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ _ _ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} ६८ शालिनी (पि ६/१९), 'मात्तौ गौ चेत् शालिनी वेदलोकैः" (अुवबृ १०३/३०). ६९ वातोर्मि (पि ६/२०), अूर्मिमाला (वबृ १०३/४५) "वातोर्मीयं कथिता म्भौ तगौ गः" (के ३/३५). ७० वैश्वदेवी (पि ६/४१), चन्द्रलेखा (भ १६/४२), चन्द्रकान्ता(हे). "मौ यौ पञ्चाश्वैवैश्वदेवीति नाम्ना" (अुवबृ १०३/४४).<br>{{gap}}७१ "म्तौ स्रौ गः कोड्डम्भो ङैः" (हे २/२१७). ७२ "य्मौ रौ गः चन्द्रिणी चैः" (हे २/२०५), चञ्चरीकावली (गछ २/१०४, ममच १७). ७३ "राज"लक्ष्मी; "म्रौ तौ गौ लक्ष्मीः" (हे २/२२६). ७४ "मिर्यौ चित्रा जैः" (हे २/२५०), मण्डूकी, चञ्चला (हे). ७५ "नः स्मौ तौ गौ पद्मं चघैः" (हे २/२९५). ७६ "नौ मौ यौ चन्द्रमाला छघैः" (२/३०८). ७७ "न्सौ मौ यौ अनङ्गलेखा चङैः" (हे २/३१३).<br> {{center|'''७ मन्दाक्रान्ता-वर्ग<br>कुसुमितलता-स्त्रग्धरा-मालिनी'''}} <center> {| |+ |- | ७८ || चन्द्रलेखा || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ७९ || मन्दाक्रान्ता || [_ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८० || कुसुमितलता || [_ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८१ || विस्मिता || [‿ _ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८२ || चित्रमाला || [_ _ _ _ ‿ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८३ || नन्दीमुखी || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८४ || चित्रलेखा || [_ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८५ || पुष्पदाम || [_ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८६ || शोभा || [‿ _ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८७ || मुग्धक || [‿ _ _ _ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!‿ _ _ ‿ _ _]<noinclude>{{nopt}} |}</noinclude> hl9l0k4ic4s9qsafa70xh4yb83xu0rn पान:छन्दोरचना.djvu/146 104 5862 238094 15649 2026-10-22T11:32:44Z कल्पनाशक्ती 3813 /* मुद्रितशोधन */ 238094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="कल्पनाशक्ती" />{{right|<small>पीडीएफ सुरेशभट इन च्या सौजन्याने</small>}} {{rh||'''१११'''|<u>'''वृत्तविस्तार'''</u>}} {| |-</noinclude>{{nopt}} |- | ८८ || स्त्रग्धरा || [_ _ _ _ ‿ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ८९ || महास्त्रग्धरा || [‿ ‿ _ _ _ ‿ _ _!‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ९० || मालिनी || [‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ९१ || मालाचित्र || [शालिनी !‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ९२ || सिंहविस्फूर्जित || [_ _ _ _ _!_ _ ‿ ‿ _ _!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |- | ९३ || चूतकूञ्ज || [‿ ‿ _ _ _ _ _ ‿ _ ‿ ‿ _!_ ‿ ‿!_ ‿ _ _ ‿ _ _] |} </center> {{center|'''टीपा'''}} ७८ चन्द्रलेखा (हे २/२०८), "नसरयुगगैश्चन्द्रलेखर्तुलोकैः" (गछ २/१०५). ७९ मन्दाक्रान्ता (पि ७/१९), श्रीधरा (भ १६/८०); "मन्दाक्रान्ता मभनततगा गः समुद्रर्तुलोकैः" (अुवबृ १०३/९). ८० कुसुमितलता (ममच १८), कुसुमितलतावेल्लिता (पि ७/२०), चित्रलेखा (भ १६/८६), "घछैश्चित्रलेखा" (हे २/३०४), चन्द्रलेखा (विवृ ५/३९), कन्दर्पजात (ना १६९); "स्याद्भूतर्त्वश्वैःकुसुमितलतावेल्लिता म्तौ नयौ यौ" (के ३/१००)<br>{{gap}}८१ "विस्मिता य्मौ न्सौ रौ ग् रसर्तुस्वराः" (पि ८/१८), सुवृत्ता (वबृ १०३/७), चन्द्रकान्ता (विवृ ५/४१), रम्भा (स्वछ १०२), मेघविस्फूर्जिता (हे २/३२४). ८२ चित्रमाला (स्वछ ११०), सुप्रभा (विवृ ५/४२), सुवंशा (गछ २/२१०), "म्रौ भ्नौ तौ गौ चित्रमाला छचैः" (हे २/३४०). ८३ नन्दीमुखी (स्वछ ११), वसन्त (हे २/२२५, ना १५१), "स्वरभिदि यदि नौ तौच नान्दीमुखी गौ" (गछ २/११७). ८४ चित्रलेखा (स्वछ ७३), चन्द्रलेखा (हे २/३०५); "मन्दाक्रान्ता नपरलघुयुता कीर्तिता चित्रलेखा" (गछः २/१७९). ८५ पुष्पदाम (स्वछ ९८, हे २/३२८); "मो गौ नौ तौ गौ शरहयतुरगैः फुल्लदाम प्रसिद्धम्" (गछ २/२००).<br>{{gap}}८६ शोभा (स्वछ १०८), "य्मौ नौ तौ गौ शोभा चछैः" (ह २/३३९). ८७ "य्मौ नौ रौ गो मुग्धकं चछैः" (हे २/३३०). ८८ स्त्रग्धरा (पि ७/२४), "म्रौ भ्नौ याश्च त्रयः स्युः स्वरमुनितुरगैः स्त्रग्धरा स्याद्विरामैः" (अुवबृ १०३/५). ८९ महास्त्रग्धरा, "स्तौ त्नौ स्रौ गौ महास्त्रग्धरा जछैः"<noinclude></noinclude> 5xxyex06q3j1gzom5hd3buqqgsnwkf5 पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/७० 104 112500 238085 238035 2026-10-22T04:20:29Z JayashreeVI 4058 /* मुद्रितशोधन */ 238085 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>गौरवान्वित विशेषणांनी तिचे मन आणि विचार बंदिस्त केले की शरीरही आपोआप ताब्यात राहते, अशी ही व्यवस्था आहे. स्त्रीही त्यात अडकते. <br>{{gap}}पुन्हा वैवाहिक जीवनातील सर्व बंधने केवळ स्त्रीला असतात. पुरुष त्यातून मुक्त असतो. स्त्रीवर निसर्गाने अपत्य जन्माची जबाबदारी टाकलेली असल्यानेही तिला बंदिस्त ठेवणे व्यवस्थेला सोपे गेले. त्यासाठी मातृत्व गौरवाचे देव्हारे उभे केले. पण अविवाहिता वा विधवा स्त्री माता झाली म्हणून तिचा गौरव होत नाही. उलट अवहेलना होते. उलट समाजमान्य पद्धतीने विवाहोत्तर मातृत्व प्राप्त झाले तरच गौरव होतो. हा गौरव खरे तर पितृत्वाचा गौरव असतो; पण शब्दांच्या भ्रमजालाच्या मोहिनीत हे लक्षात येत नाही. <br>{{gap}}या सर्वांमुळे स्त्रीला आत्मसन्मानार्थ संघर्ष करणे म्हणजे काय? हे समजतच नाही. उलट परंपरेच्या बंदिस्त व्यवस्थेतच आत्मसन्मान आहे, अशी मानसिक घडण झालेली आहे. त्यामुळे शब्दातून गौरव व प्रत्यक्षात उपेक्षा ही स्त्रीबाबत सार्वत्रिक बाब आहे. आणखी एक बाब म्हणजे भारतीय समाज एकजिनसी नाही. स्वाभाविकच सर्व समाजाचे हित अनहिताचे घटकही समान नाहीत. त्यातल्या त्यात आर्थिक प्रश्नावर संघटना लवकर होऊ शकते. <br>{{gap}}स्त्रियाही अनेक स्तरात विभागलेल्या आहेत. सर्व जातीतील स्त्रियांचे प्रश्न समान नाहीत, सर्व व्यावसायिक स्त्रियांचे प्रश्न समान नाहीत. ग्रामीण व शहरी स्त्रियांचे प्रश्न भिन्न आहेत. तर महानगरी आणि अर्धशहरी स्त्रियांचे प्रश्नही भिन्न आहेत. सर्व स्त्रियांना एकत्र आणण्यासाठी निकडीचा एकच एक बिंदू सापडणे कठीण. म्हणूनही संघटना कठीण! <br>{{gap}}स्त्रीविषयक प्रश्नांबाबत प्रथम उच्चजातीय पुरुष जागृत झाले. हा समाजस्तर आर्थिकदृष्ट्या संपन्न नसला तरी भुकेकंगालही नव्हता. एकोणिसाव्या शतकात स्त्रियांच्या दुरवस्थेबाबतचे या स्तरातले प्रश्न आणि समाजातील अन्य स्तरातील स्त्रियांचे प्रश्न यांचा एकत्र विचार करावा असे सुद्धा या प्रारंभपर्वात वाटल्याचे दिसत नाही. (अपवाद म. फुले) त्यामुळे या एका उच्चवर्णीय लहान स्तरातील बालविवाह, विधवाविवाह, स्त्रीशिक्षण अशा सारख्या प्रश्नांवरच कृतिशील चळवळी झाल्या. <br>{{gap}}मात्र क्रमाने याच उच्चवर्णीय, मध्यमवर्गीय, पांढरपेशा स्त्रियांनीही स्त्री प्रश्नांविषयी पुढाकार घ्यायला आपल्या कुवतीनुसार सुरुवात केली. चळवळींच्या रेट्याने स्त्रीविषयक कायदे वेळोवेळी झाले हे महत्त्वाचे आहे. {{gap}}पहिल्या महायुद्धानंतर महागाईमुळे आणि जुनी अर्थोत्पादन व्यवस्था विस्कळीत झाल्याने या उच्चवर्णीय पुरुषाला शिक्षण नोकरी इ. त. स्थिरस्थावर झाल्याखेरीज -<noinclude>{{left|निरगाठ सुरगाठ / ६९}}</noinclude> nmwjyp585t3cse08iwm7zc2h2n7kfc0 पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/७१ 104 112501 238086 238036 2026-10-22T04:30:13Z JayashreeVI 4058 /* मुद्रितशोधन */ 238086 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="JayashreeVI" /></noinclude>लग्न करणे शक्य नसल्याने पुरुषाचे लग्नाचे वय वाढले, म्हणून मुलींचे लग्नाचे वय वाढले. शिक्षित मुलाला शिक्षित बायको हवी म्हणून मुली शिकू लागल्या आणि वाढत्या महागाईत पुरुषाच्या एकट्याच्या उत्पन्नात भागेना म्हणून स्त्रिया नोकरी करू लागल्या, पण या सर्व सुधारणा (?) पुरुषाच्या दोन पावले मागे राहूनच करणे 'मर्यादेचे' मानले गेले. तात्पर्य पुरुषाला 'पूरक' ही स्त्रीची भूमिका बदलली नाहीच. पण हीच सुधारणा मानली गेली. या फसव्या भ्रमात अजूनही हा स्तर आहे. स्त्रीला तिचा स्वतंत्र 'अवकाश' (space) मिळावा असा प्रयत्न या स्तरातही फार अपवादानेच घडला. <br>{{gap}}स्वाभाविकच विसाव्या शतकाच्या अखेरच्या पर्वापर्यंत आंतरराष्ट्रीय स्त्रीमुक्तीवर्षापर्यंत येथील स्त्रीविषयक प्रश्न, चळवळी प्रामुख्याने सुस्थिर मध्यमवर्गापुरत्याच राहिल्या. त्यामुळे एक खूप मोठी वैचारिक मर्यादाही पडली. या चौकटीबाहेरचा स्त्रियांचा खूप मोठा वर्ग विचारव्यूहाच्याही बाहेर राहिला. मग कृती कशी होणार? त्यामुळे स्त्रीला मोकळीक देणारे कायदे झाले तरी त्यांचे लाभ घेण्याची कुवत सार्वत्रिकपणे आली नाही. तरी व्यवस्थेवर काही अंशी वचक बसला. <br>{{gap}}१९७५ पूर्वी काही तुरळक प्रयत्न झाले असले तरी प्रामुख्याने १९७५ नंतर चळवळीचा परीघ अधिक विस्तृत झाला. शेतकरी, शेतमजूर स्त्रियांच्या संघटनांचे प्रयत्न झाले. स्वातंत्र्यपूर्व काळात महानगरात गिरणी कामगारांच्या संघटना आणि चळवळी झाल्या; पण त्यांनीही खूप मोठ्या संख्येने गिरणी कामगार असलेल्या स्त्रियांच्या प्रश्नांकडे लक्षच दिले नाही, मग त्या संघटनात स्वतंत्र स्त्री मजूर संघटना करणे दूरच राहिले. म्हणजे महानगरीय व्यवस्थेत अर्थोत्पादन करणारी मजूर स्त्रीही दुर्लक्षितच राहिली. तिचा रोजगाराचा दरसुद्धा पुरुषापेक्षा कमी राहिला. याची कामगार संघटनांनी फार गांभीर्याने कधी दखल घेतली नाही. स्त्रियांना कामाच्या ठिकाणी अग्रक्रमाने स्वच्छतागृहांच्या सोयी, पाळणाघरे अशा किमान गोष्टींसाठीही स्त्रियांनाच झगडावे लागले. मध्यमवर्गीय डाव्या विचाराच्या स्त्री संघटनांनीच त्याचा पाठपुरावा केला. {{gap}}शेतमजूर स्त्रिया तर अजूनही उपेक्षितच आहेत. शहरी घरकामवाल्या मोलकरणींच्या संघटना अलीकडे तुरळक झाल्या आहेत; पण त्यांच्या मागण्यांची हुकमी अंमलबजावणी होईल, अशी परिस्थिती कोणत्याच आघाड्यांवर नाही; कारण त्यांचे मालक आणि कामे विखुरलेली आहेत. त्यामुळे कामाच्या वेळा, कामाचे स्वरूप, सुट्या इत्यादी कोण आणि कसे ठरवणार? तरी बहुतेक शहरी मोलकरणींनी अलीकडे वर्षातून एका महिन्याचा जादा पगाराचा (बोनसचा )<noinclude>{{right|मध्यमवर्गीय स्त्री सिंहावलोकन / ७०}}</noinclude> hzkjgxq8c28duhtkwz85lxxgc6qouek पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/७३ 104 112530 238087 2026-10-22T04:34:35Z JayashreeVI 4058 /* तपासणी करायचे साहित्य */ रिकामे पान बनविले 238087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="JayashreeVI" /></noinclude><noinclude></noinclude> allt1j815h6mc51ho610y6c0yrwu6dp पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/९५ 104 112531 238088 2026-10-22T04:36:14Z JayashreeVI 4058 /* तपासणी करायचे साहित्य */ रिकामे पान बनविले 238088 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="JayashreeVI" /></noinclude><noinclude></noinclude> allt1j815h6mc51ho610y6c0yrwu6dp पान:निरगाठ सुरगाठ.pdf/१०७ 104 112532 238089 2026-10-22T04:37:50Z JayashreeVI 4058 /* तपासणी करायचे साहित्य */ रिकामे पान बनविले 238089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="JayashreeVI" /></noinclude><noinclude></noinclude> allt1j815h6mc51ho610y6c0yrwu6dp