विकिपीडिया sawiki https://sa.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D MediaWiki 1.47.0-wmf.13 first-letter माध्यमम् विशेषः सम्भाषणम् सदस्यः सदस्यसम्भाषणम् विकिपीडिया विकिपीडियासम्भाषणम् सञ्चिका सञ्चिकासम्भाषणम् मीडियाविकि मीडियाविकिसम्भाषणम् फलकम् फलकसम्भाषणम् साहाय्यम् साहाय्यसम्भाषणम् वर्गः वर्गसम्भाषणम् प्रवेशद्वारम् प्रवेशद्वारसम्भाषणम् TimedText TimedText talk पटलम् पटलसम्भाषणम् Event Event talk कर्णाटक 0 1000 499958 182307 2026-08-04T00:17:23Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499958 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्णाटक: 0 9489 499959 182308 2026-08-04T00:17:28Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499959 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्नाटक 0 14638 499960 182309 2026-08-04T00:17:33Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499960 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्नाटकम् 0 18774 499961 182310 2026-08-04T00:17:38Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499961 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्णाटकं 0 20309 499962 182311 2026-08-04T00:17:43Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499962 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्णाटकम् 0 20957 499963 182264 2026-08-04T00:17:48Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499963 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp Karnataka 0 25169 499964 221786 2026-08-04T00:17:53Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499964 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्णाटकराज्ये 0 25774 499965 222197 2026-08-04T00:17:58Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499965 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्णाटकराज्य 0 34053 499966 278350 2026-08-04T00:18:03Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499966 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्णाटकराज्यं 0 34054 499967 278351 2026-08-04T00:18:08Z Xqbot 1298 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499967 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्नाटकराज्य 0 34055 499971 278352 2026-08-04T11:38:41Z EmausBot 3461 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499971 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्नाटकराज्यम् 0 34056 499973 278353 2026-08-04T11:39:01Z EmausBot 3461 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499973 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्नाटकराज्यं 0 34057 499972 278354 2026-08-04T11:38:51Z EmausBot 3461 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499972 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp Karnataka State 0 34181 499969 278572 2026-08-04T11:38:20Z EmausBot 3461 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499969 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp कर्नाटकरज्यम् 0 35150 499970 281865 2026-08-04T11:38:30Z EmausBot 3461 [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] को दोहरे पुननिर्देशित ठीक किया। 499970 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[कृष्णराष्ट्रकराज्यम्]] 2wgowvb8t1fkwykf5ik3un5ddh244fp नेताजी महाविद्यालयः 0 90889 499955 496577 2026-08-03T19:22:19Z Mr. Ranju Maity 44991 व्याकरणदोषः परिष्कृतः 499955 wikitext text/x-wiki {short description|College in West Bengal}} {{Use dmy dates|date=September 2016}} {{Use Indian Sanskrit|date=September 2016}} {{more citations needed|date=February 2012}} {{Infobox university | name = नेताजी महाविद्यालयः | native_name = নেতাজী মহাবিদ্যালয় | native_name_lang = bn | image = Netaji Mahavidyalaya.jpg | image_upright = | image_alt = | caption = | latin_name = | other_name = <!--or, other_names--> | former_name = | motto = | motto_lang = | mottoeng = | top_free_label = | top_free = | type = Undergraduate college [[Public college]] | established = १९४८ | closed = <!-- {{end date|YYYY}} --> | founder = | parent = | affiliation = [[बुर्डवान विश्वविद्यालय]] | religious_affiliation = | academic_affiliation = | endowment = | budget = | officer_in_charge = | chairman = | chairperson = | chancellor = | president = श्री कृष्ण चन्द्र संतरा [Sri Krishna Chandra Santra] | vice-president = | superintendent = | vice_chancellor = | provost = | rector 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हुग्ली-मण्डलस्य आरामबाग प्राचीनतमेषु महाविद्यालयेषु अन्यतमम् अस्ति। एषः कला, वाणिज्य, विज्ञानविषयेषु स्नातकपाठ्यक्रमान् प्रदास्यति। एषः विश्वविद्यालयः [[बर्धमान-विश्वविद्यालयेन]] सह सम्बद्धः अस्ति । अस्य स्थापना १९४८ तमे वर्षे अभवत् । ==इतिहास== अरम्बागस्य जनाः स्वातन्त्र्यसङ्घर्षे भागं गृहीतवन्तः । स्वतन्त्र नेताजी महाविद्यालय के बाद एक परिणाम विकास कार्य प्रारब्ध। प्रफुल्ला सेन् & अन्ये केचन वर्तमानचिकित्सालये समीपे एकस्मिन् स्थाने महाविद्यालयस्य स्थापनायाः isea आरब्धवन्तः। परन्तु राधाकृष्णपाल & अन्ये केचन डार्केश्वरस्य पश्चिमभागे कालीपुरे आरब्धवन्तः। १९६६ तमे वर्षे नेताजीमहाविद्यालयस्य छात्रैः महाविद्यालयस्य विकासाय आन्दोलनस्य आयोजनं कृतम्, यत् पश्चात् प्रफुल्लासेनविरोधी आन्दोलनं प्रति गतं, न तु सर्वकारविरोधी । आन्दोलन। अरम्बाग महकुमा छात्रसंग्राम समिति बनाकर छात्र नेता अब्दुल मन्नान, नारायण च घोष, बनिबिकाश मल्लिक आदि ने छात्रों को आन्दोलित किया तथा फलस्वरूप प्रोफुल्ला सेन की सीट गंवा। पश्चिमबङ्गराजनीत्यां एषः एकः मोक्षबिन्दुः आसीत् । पश्चात् नेताजी महाविद्यालयस्य पूर्वछात्रः नारायण च घोषः गणितस्य पुस्तकानि लिखितवान् यत् पश्चिमबङ्गस्य माध्यमिकशिक्षामण्डलेन विशेषज्ञैः संशोधनानन्तरं प्रकाशितम्। तानि पुस्तकानि पश्चिमबङ्गस्य & त्रिपुरहस्य सर्वेषु विद्यालयेषु पाठ्यन्ते स्म । ==विभागाः पाठ्यक्रमाः च== महाविद्यालयः भिन्नाः स्नातक-स्नातक-उत्तर-पाठ्यक्रमाः प्रदाति तथा च अरम्बाग-नगरस्य तत्समीपस्थेषु क्षेत्रेषु च निम्न-मध्यम-वर्गीय-जनानाम् स्नातक-शिक्षकाणां कृते शिक्षां प्रदातुं उद्दिश्यते। ===विज्ञानम्‌=== विज्ञानसंकाये रसायनशास्त्रं, भौतिकशास्त्रं, गणितं, कम्प्यूटरविज्ञानं तथा अनुप्रयोगं, वनस्पतिशास्त्रं, प्राणीविज्ञानं, वनस्पतिसंरक्षणं, पर्यावरणविज्ञानं, अर्थशास्त्रं च विभागाः सन्ति। ===कला एवं वाणिज्य=== कलाव्यापारसंकाये बङ्गला, आङ्ग्ल, संस्कृत, संताली, इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र, दर्शन, संगीत, शारीरिकशिक्षा, शिक्षा, वाणिज्य, व्यापारप्रशासनविभागाः सन्ति। ===मान्यता=== सद्यः एव नेताजीमहाविद्यालयं राष्ट्रियमूल्यांकन-मान्यता-परिषद् (NAAC) द्वारा पुनः मान्यतां प्राप्य B++ ग्रेड्-पुरस्कृतम् अस्ति । विश्वविद्यालयानुदानआयोगेन (UGC) अपि अस्य महाविद्यालयस्य मान्यता अस्ति । 4de8ncknirfbgou3mrc1t5rx5woxmla 499956 499955 2026-08-03T19:23:52Z Mr. Ranju Maity 44991 व्याकरणदोषः परिष्कृतः 499956 wikitext text/x-wiki {{short description|College in West Bengal}} {{Use dmy dates|date=September 2016}} {{more citations needed|date=February 2012}} {{Infobox university | name = नेताजी महाविद्यालयः | native_name = নেতাজী মহাবিদ্যালয় | native_name_lang = bn | image = Netaji Mahavidyalaya.jpg | image_upright = | image_alt = | caption = | latin_name = | other_name = <!--or, other_names--> | former_name = | motto = | motto_lang = | mottoeng = | top_free_label = | top_free = | type = Undergraduate college [[Public college]] | established = १९४८ | closed = <!-- {{end date|YYYY}} --> | founder = | parent = | affiliation = [[बुर्डवान विश्वविद्यालय]] | religious_affiliation = | academic_affiliation = | endowment = | budget = | officer_in_charge = | chairman = | chairperson = | chancellor = | president = श्री कृष्ण चन्द्र संतरा [Sri Krishna Chandra Santra] | vice-president = | 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प्रसिद्धं नेताजी-महाविद्यालयं भारतस्य पश्चिमबङ्गालराज्यस्य हुग्ली-मण्डलस्य आरामबाग प्राचीनतमेषु महाविद्यालयेषु अन्यतमम् अस्ति। एषः कला, वाणिज्य, विज्ञानविषयेषु स्नातकपाठ्यक्रमान् प्रदास्यति। एषः विश्वविद्यालयः [[बर्धमान-विश्वविद्यालयेन]] सह सम्बद्धः अस्ति । अस्य स्थापना १९४८ तमे वर्षे अभवत् । ==इतिहास== अरम्बागस्य जनाः स्वातन्त्र्यसङ्घर्षे भागं गृहीतवन्तः । स्वतन्त्र नेताजी महाविद्यालय के बाद एक परिणाम विकास कार्य प्रारब्ध। प्रफुल्ला सेन् & अन्ये केचन वर्तमानचिकित्सालये समीपे एकस्मिन् स्थाने महाविद्यालयस्य स्थापनायाः isea आरब्धवन्तः। परन्तु राधाकृष्णपाल & अन्ये केचन डार्केश्वरस्य पश्चिमभागे कालीपुरे आरब्धवन्तः। १९६६ तमे वर्षे नेताजीमहाविद्यालयस्य छात्रैः महाविद्यालयस्य विकासाय आन्दोलनस्य आयोजनं कृतम्, यत् पश्चात् प्रफुल्लासेनविरोधी आन्दोलनं प्रति गतं, न तु सर्वकारविरोधी । आन्दोलन। अरम्बाग महकुमा छात्रसंग्राम समिति बनाकर छात्र नेता अब्दुल मन्नान, नारायण च घोष, बनिबिकाश मल्लिक आदि ने छात्रों को आन्दोलित किया तथा फलस्वरूप प्रोफुल्ला सेन की सीट गंवा। पश्चिमबङ्गराजनीत्यां एषः एकः मोक्षबिन्दुः आसीत् । पश्चात् नेताजी महाविद्यालयस्य पूर्वछात्रः नारायण च घोषः गणितस्य पुस्तकानि लिखितवान् यत् पश्चिमबङ्गस्य माध्यमिकशिक्षामण्डलेन विशेषज्ञैः संशोधनानन्तरं प्रकाशितम्। तानि पुस्तकानि पश्चिमबङ्गस्य & त्रिपुरहस्य सर्वेषु विद्यालयेषु पाठ्यन्ते स्म । ==विभागाः पाठ्यक्रमाः च== महाविद्यालयः भिन्नाः स्नातक-स्नातक-उत्तर-पाठ्यक्रमाः प्रदाति तथा च अरम्बाग-नगरस्य तत्समीपस्थेषु क्षेत्रेषु च निम्न-मध्यम-वर्गीय-जनानाम् स्नातक-शिक्षकाणां कृते शिक्षां प्रदातुं उद्दिश्यते। ===विज्ञानम्‌=== विज्ञानसंकाये रसायनशास्त्रं, भौतिकशास्त्रं, गणितं, कम्प्यूटरविज्ञानं तथा अनुप्रयोगं, वनस्पतिशास्त्रं, प्राणीविज्ञानं, वनस्पतिसंरक्षणं, पर्यावरणविज्ञानं, अर्थशास्त्रं च विभागाः सन्ति। ===कला एवं वाणिज्य=== कलाव्यापारसंकाये बङ्गला, आङ्ग्ल, संस्कृत, संताली, इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र, दर्शन, संगीत, शारीरिकशिक्षा, शिक्षा, वाणिज्य, व्यापारप्रशासनविभागाः सन्ति। ===मान्यता=== सद्यः एव नेताजीमहाविद्यालयं राष्ट्रियमूल्यांकन-मान्यता-परिषद् (NAAC) द्वारा पुनः मान्यतां प्राप्य B++ ग्रेड्-पुरस्कृतम् अस्ति । विश्वविद्यालयानुदानआयोगेन (UGC) अपि अस्य महाविद्यालयस्य मान्यता अस्ति । 8yhalgxphif6ajhppzg3v5huemu7azm 499957 499956 2026-08-03T19:26:38Z Mr. Ranju Maity 44991 परिसन्धिः योजितः 499957 wikitext text/x-wiki {{short description|College in West Bengal}} {{Use dmy dates|date=September 2016}} {{more citations needed|date=February 2012}} {{Infobox university | name = नेताजी महाविद्यालयः | native_name = নেতাজী মহাবিদ্যালয় | native_name_lang = bn | image = Netaji Mahavidyalaya.jpg | image_upright = | image_alt = | caption = | latin_name = | other_name = <!--or, other_names--> | former_name = | motto = | motto_lang = | mottoeng = | top_free_label = | top_free = | type = Undergraduate college [[Public college]] | established = १९४८ | closed = <!-- {{end date|YYYY}} --> | founder = | parent = | affiliation = [[बुर्डवान विश्वविद्यालय]] | religious_affiliation = | academic_affiliation = | endowment = | budget = | officer_in_charge = | chairman = | chairperson = | chancellor = | president = श्री कृष्ण चन्द्र संतरा [[Sri Krishna Chandra Santra]] | vice-president = | superintendent = | vice_chancellor = | provost = | rector = | principal = सचिदानन्द रे [[Dr. Sachidananda Ray (T.I.C)]] | director = | dean = | head_label = | head = | academic_staff = | administrative_staff = | students = | undergrad = | postgrad = | doctoral = | other = | address = | city = कालीपुर, [[अरामबाघ्]] | state = [[पश्चिमबङ्ग]] | province = | country = [[भारत]] | postcode = 712601 | coordinates = {{coord|22.8802962|N|87.7773281|E|region:IN-WB_type:edu|display=title,inline}} | pushpin_map = India West Bengal#India | campus = Urban | language = | free_label = | free = | free_label2 = | free2 = | colors = <!--or, colours= --> | athletics = | sports = | athletics_nickname = <!--or, sports_nickname= --> | sporting_affiliations = | mascot = <!--or, mascots= --> | sports_free_label = | sports_free = | sports_free_label2 = | sports_free2 = | website = https://www.netajimahavidyalaya.ac.in/ | logo = | logo_size = 150px | logo_alt = | footnotes = }} कालिपुर-महाविद्यालयः इति नाम्ना अपि प्रसिद्धं नेताजी-महाविद्यालयं भारतस्य पश्चिमबङ्गालराज्यस्य हुग्ली-मण्डलस्य आरामबाग प्राचीनतमेषु महाविद्यालयेषु अन्यतमम् अस्ति। एषः कला, वाणिज्य, विज्ञानविषयेषु स्नातकपाठ्यक्रमान् प्रदास्यति। एषः विश्वविद्यालयः [[बर्धमान-विश्वविद्यालयेन]] सह सम्बद्धः अस्ति । अस्य स्थापना १९४८ तमे वर्षे अभवत् । ==इतिहास== अरम्बागस्य जनाः स्वातन्त्र्यसङ्घर्षे भागं गृहीतवन्तः । स्वतन्त्र नेताजी महाविद्यालय के बाद एक परिणाम विकास कार्य प्रारब्ध। प्रफुल्ला सेन् & अन्ये केचन वर्तमानचिकित्सालये समीपे एकस्मिन् स्थाने महाविद्यालयस्य स्थापनायाः isea आरब्धवन्तः। परन्तु राधाकृष्णपाल & अन्ये केचन डार्केश्वरस्य पश्चिमभागे कालीपुरे आरब्धवन्तः। १९६६ तमे वर्षे नेताजीमहाविद्यालयस्य छात्रैः महाविद्यालयस्य विकासाय आन्दोलनस्य आयोजनं कृतम्, यत् पश्चात् प्रफुल्लासेनविरोधी आन्दोलनं प्रति गतं, न तु सर्वकारविरोधी । आन्दोलन। अरम्बाग महकुमा छात्रसंग्राम समिति बनाकर छात्र नेता अब्दुल मन्नान, नारायण च घोष, बनिबिकाश मल्लिक आदि ने छात्रों को आन्दोलित किया तथा फलस्वरूप प्रोफुल्ला सेन की सीट गंवा। पश्चिमबङ्गराजनीत्यां एषः एकः मोक्षबिन्दुः आसीत् । पश्चात् नेताजी महाविद्यालयस्य पूर्वछात्रः नारायण च घोषः गणितस्य पुस्तकानि लिखितवान् यत् पश्चिमबङ्गस्य माध्यमिकशिक्षामण्डलेन विशेषज्ञैः संशोधनानन्तरं प्रकाशितम्। तानि पुस्तकानि पश्चिमबङ्गस्य & त्रिपुरहस्य सर्वेषु विद्यालयेषु पाठ्यन्ते स्म । ==विभागाः पाठ्यक्रमाः च== महाविद्यालयः भिन्नाः स्नातक-स्नातक-उत्तर-पाठ्यक्रमाः प्रदाति तथा च अरम्बाग-नगरस्य तत्समीपस्थेषु क्षेत्रेषु च निम्न-मध्यम-वर्गीय-जनानाम् स्नातक-शिक्षकाणां कृते शिक्षां प्रदातुं उद्दिश्यते। ===विज्ञानम्‌=== विज्ञानसंकाये रसायनशास्त्रं, भौतिकशास्त्रं, गणितं, कम्प्यूटरविज्ञानं तथा अनुप्रयोगं, वनस्पतिशास्त्रं, प्राणीविज्ञानं, वनस्पतिसंरक्षणं, पर्यावरणविज्ञानं, अर्थशास्त्रं च विभागाः सन्ति। ===कला एवं वाणिज्य=== कलाव्यापारसंकाये बङ्गला, आङ्ग्ल, संस्कृत, संताली, इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र, दर्शन, संगीत, शारीरिकशिक्षा, शिक्षा, वाणिज्य, व्यापारप्रशासनविभागाः सन्ति। ===मान्यता=== सद्यः एव नेताजीमहाविद्यालयं राष्ट्रियमूल्यांकन-मान्यता-परिषद् (NAAC) द्वारा पुनः मान्यतां प्राप्य B++ ग्रेड्-पुरस्कृतम् अस्ति । विश्वविद्यालयानुदानआयोगेन (UGC) अपि अस्य महाविद्यालयस्य मान्यता अस्ति । egh1wknobni3nndu6jcjeuu3qphzoys सदस्यः:趙學勤 2 92363 499968 499803 2026-08-04T08:56:51Z 趙學勤 33400 499968 wikitext text/x-wiki श्रीहर्षवर्धनराजवंशाश्रितनालन्दामहाविहारश्रीमच्छीलभद्राचार्यचरणकमलेषु। पापदेशनालेखः (नेपालमण्डलसंस्करणम्) अहमस्मि श्रीहर्षवर्धनराजवंशजो विद्याधरनामा विक्रमसंवत्सरे षष्ट्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे चैत्रमासस्य षष्ठे दिने प्राचीनसम्राजः सहस्रवर्षानन्तरं जातो नेपालमण्डलान्तर्गतकाष्ठमण्डपनगरस्वयम्भूक्षेत्रविराजमानप्राचीनगृहावासनिवासी पित्रोः सहचरः। बाल्यकालादेव मन्दबुद्धिरलसप्रकृतिः सहजवाग्दोषपीडितश्चास्मि। यन्त्रतन्त्रगणितखगोलभूगोलविज्ञानमात्रानुरक्तः परन्त्वधुनातनवत्संस्कृतसाहित्यशास्त्रपठनपाठनलेखनविमुखो वाग्दोषवशात्स्वान्तर्गतभावप्रकाशनसमर्थो नैराश्यगर्तनिपतितोऽभूवम्। साहित्यशास्त्रं भयंकरमार्गं मन्वानोऽक्षरानन्दप्राप्तिविहीनोऽन्तःकरणगुप्तीकृतदुःखभरितो हाकष्टमिति विलापमकरवम्। त्रिवर्षवयसि ठमेलक्षेत्रस्थबालविद्यालयं प्रथमं प्रविष्टोऽस्मि। तथापि बाल्यकालादेव चञ्चलकठोरप्रकृत्या दुःशिक्ष्यत्वादहमतीव गुरुजनक्लेशकर आसम्। एकदा रात्रौ पित्रोः सह ठमेलविपणिमार्गे भ्रमन्कस्याश्चिदापणस्य काचमञ्जूषायां पूर्णानि विद्युद्यन्त्रक्रीडनकानि दृष्ट्वा नीरसानुभवन्क्रीडासक्त्या तानि पितरावयाचे। बालकानां कृते तादृशयन्त्रक्रीडनकमयोग्यमिति मत्वा मम कुत्सितस्वभावं च विचार्य पितृभ्यां प्रथमं तत्प्रत्याख्यातम्। तथापि मम क्रन्दनस्वभावेन तयोः करुणां सञ्जन्याहोरात्रानन्तरं तत्क्रीडनकं क्रीतं येनाहं परमानन्दितोऽभूवमज्ञात्वा च विद्युन्मायाजालान्धकारगर्तप्रवेशम्। नूतनविद्युत्क्रीडनकप्राप्त्यनन्तरं तदासक्तहृदयोऽहं यन्त्रगणितविज्ञानादिविषयेष्वेवानुरक्तो यतस्ते क्रीडनकेन सम्बद्धा आसन्। दर्शनकलासाहित्येतिहासमानविकीशास्त्रेषु सम्पूर्णतया विमुखोऽभवम्। विद्युत्क्रीडनकेन सह स्पर्धितुमन्या कापि रुचिर्नैवासीत्। तस्मादेवाहं विद्युन्मायाजालनिमग्नो महापुरुषदूरगः सहजह्रस्वदृष्टिदोषपीडितश्च सञ्जातो यद्यप्ययं ह्रस्वदृष्टिदोषः सहज इति श्रूयते। वैशाखमासे नूतनशैक्षिकसत्रादारभ्य ललितपुरनगरस्थराजकीयपञ्चवर्षीयप्राथमिकविद्यालयप्रवेशानन्तरं क्रीडनकाल्पीभावाच्छ्वेतपत्रबाहुल्याच्चातीवनीरसतामनुभवन्स्वेच्छयागृहकार्यविनाशको दुर्विनीताचारः सञ्जातः। परदिने विद्यालयप्रवेशद्वारि मातृवियोगदुःखासहिष्णुर्भूमौ पतित्वा महाक्रन्दनं कुर्वन्सम्पूर्णविद्यालयप्राङ्गणं क्षोभितवान्गुरुजनशान्त्वनापेक्षी महालज्जाकरोऽभवम्। द्वितीयकक्षायां कुत्सितस्वभाववशात्पुस्तकपीठिकास्थापितानि पुस्तकानि भूमौ निक्षिप्तवान्येनाहं गुरुभर्त्सनं प्राप्तवान्। कतिपयदिनानन्तरं विश्रामसमये कक्षायां धावन्प्रमादात्कक्षापृष्ठभागस्थपुस्तकस्थापनीसंघाटेन दक्षिणभ्रूदेशे क्षतस्तीव्ररक्तस्रावपीडितो भीतगुरुणाऽऽहूतरुग्णवाहनेन समीपस्थचिकित्सालयं नीतः। तदा पश्चात्तापपूर्णोऽहं मस्तिष्काघातात्स्मृतिनाशभयाकुलो मस्तिकपोषणार्थं मत्स्यमांसभक्षणमैच्छम्। अज्ञानवशान्मम सहजवाग्दोषोऽपि तन्मस्तकाघातोत्पन्न इति भ्रान्तोऽभवम्। तदा मात्रा 'किं त्वं पितरौ स्मरसि' इति सान्त्वनावचनेन बोधितो यन्मम मस्तिष्कं सुरक्षितं वाग्दोषस्तु जन्मजात एवेति। तस्मिन्कालेऽतीवमूर्ख एवासम्। एवमेव बाल्यकाले विद्युन्मायाजालव्यसनेन ममाध्ययनं बुद्धिञ्च कुप्रभावितम्। यदाहं चतुर्थकक्षायां प्रविष्टः, तदा ममाज्ञानमत्यन्तं हास्यास्पदमासीत्। एकागन्तुकछात्रेण कृतं कक्षाकण्डूयनं कण्डूयनभयादतीवसाधारणशारीरिकस्पर्शमपि 'बलात्कार' इति भ्रान्त्वा नूतनस्त्रीगुरुजनसमीपे मिथ्यापवादं कृतवान्। तदपराधार्थं 'बलात्कार'शब्दमयुतवारं लिखितुं दण्डितो भयातुरः क्षमायाचनानन्तरं मुक्तोऽभवम्। तथापि विश्रामसमये हेमानाम्न्या बालिकाया वायुगोलकं लेखन्या भित्त्वा तस्याः क्रोधं दृष्ट्वाप्यहङ्कारेण तामुपेक्ष्य प्रतिशोधभावनया कुसहाध्यायिनां प्रेरणया तस्याः पुस्तकपीठिकायां कुत्सितप्रेमपत्रं संस्थाप्य महामूर्खतामाचरितवान्। तत्पत्रं दृष्ट्वा लज्जाक्रोधपीडितां तां दृष्ट्वा मया भयंकरदोषः कृत इति ज्ञातम्। ततोऽपि दारुणतरं यन्मम हृदयस्य कठोरता कालान्तरेण न नष्टा अपि तु वर्धिता। द्विसप्तत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे वैशाखमासस्य द्वादशे दिने पूर्वाह्ने एकादशहोरायां षट्पञ्चाशन्निमेषे पञ्चविंशतिक्षणे घूर्णपरिमाणमापनक्रमेणाष्टदशांशकाधिकसप्तमात्रात्मको भयंकरो नेपालमण्डलमहाभूकम्पोत्पातः सञ्जातः। तस्मिन्हाहाकारमये दारुणविपत्तिकालेऽपि कारुण्यहीनो हास्यरतः पित्रोः सह पाशुपतमहामन्दिरे बौद्धनाथमहास्तूपे वा प्रविशन्नपि पुण्यसञ्चयार्थं धर्मलेखनं विहाय केवलं यन्त्रक्रीडामग्न आसीन्मृतकाहतानां तत्परिवाराणां च कृते देवप्रार्थनाहीनो महालज्जाकरः सञ्जातः। (अत्र लिखन्मम हृदयस्पन्दनं वर्धते लेखनी कम्पते नयने चाश्रुपूर्णे भवतः)। पित्रोरपि 'अयं केवलं यन्त्रक्रीडां जानाति' इति निन्दावचनं श्रुत्वा मया पवित्रब्राह्मीविद्यायामहापमानं कृतमिति मन्ये। तदनन्तरं वैशाखमासस्य एकोनत्रिंशत्तमे दिनेऽपराह्ने द्वादशहोरायां पञ्चत्रिंशन्निमेषे घूर्णपरिमाणमापनक्रमेणत्र्यंशकाधिकसप्तमात्रात्मकः प्रलयङ्करो महापरकम्पः पुनरपि सञ्जातः। यदा पुनरपि धरा प्रकम्पिता भग्नावशेषाश्च धूलीसात्कृता भीतजनानां हाहाकारक्रन्दनध्वनिर्दशदिक्षु व्याप्तस्तदाप्यहं पाषाणहृदयो विद्युन्मायाजालव्यसनमदान्धो मृत्युभयविहीनो यन्त्रक्रीडाविघ्नमात्रक्रुद्धोऽभूवम्। हा धिक्! ईदृशे भीषणप्राणसङ्कटकालेऽपि मयि न कापि करुणा न च कोऽपि वैराग्यभाव उदितः। सङ्गणकक्रीडाया मिथ्यालोके निमग्नोऽहं वास्तविकजगतो महाविनाशं नैवागणयम्। अद्य तदमानवीयमाचरणं स्मृत्वा मम चिन्तासन्तप्तहृदयं पश्चात्तापाग्निना दन्दह्यते स्वकीयाज्ञानमूर्खताञ्च धिग्करोमि। एतादृशमहापापबोधेन मया स्वयमेव सुधारं कर्तुं निश्चेतव्यमासीत्। तद्विद्युन्मायाजालव्यसननिवारणार्थं साहित्यव्यायामयोः रुचिं वर्धयितुं, वाग्दोषं परिहर्तुं, शारीरिकमानसिकबलं च वर्धयितुं प्रयतेय। यद्यपि मात्रा सह द्यूतक्रीडास्थानेषु मद्यपानधूमपानमलिनवातावरणेऽपि पङ्कजमुकुल इव निष्कलङ्को भूत्वा ग्रन्थाध्ययनलेखनाभ्यासरतो भवेयम्; तथापि हा धिक् ! नवीनविद्युत्क्रीडायन्त्रप्राप्त्यनन्तरं तदासक्तिर्वर्धिता, दशाधिकहोरापर्यन्तं क्रीडन् विगुणितह्रस्वदृष्टिदोषपीडितोऽप्यसंयमी सञ्जातः ! तस्मिन् कलुषिते स्थाने साहित्यं तृणवत् त्यक्त्वा विद्युत्क्रीडायन्त्रमेव प्राणवत् मन्वानः केवलं क्रीडारतोऽभवम् ! अहो मे मूर्खता, हा कष्टम् ! ततोऽपि दारुणतरं यद् बाल्यकाले कृत्रिमशस्त्रक्रीडनकेन क्रीडन् देवालयाभिमुखं लक्ष्यं बद्धवान्। तस्मिन् समये अवलोकितेश्वरमण्डले भोटसम्प्रदायस्य महाचार्यः पद्मसम्भवः तथा च विघ्नहर्ता श्रीगणेशः विराजमानौ आस्ताम्, तौ उभावपि मम मूर्खतायाः शरलक्ष्यीकृतावास्ताम्। तद्दृष्ट्वा माता अतीवभीता क्रुद्धा च सती मदर्थं देवान् क्षमामयाचत, अहन्तु स्वपापमज्ञात्वा पश्चात्तापहीनोऽभवम्। न केवलमेतावत्, काष्ठमण्डपनगरस्थे कस्मिंश्चिद् विहारे द्यूतक्रीडापत्रोपरि लेखन्या 'अवलोकितेश्वरं सम्पूज्य रथयात्रया गच्छन् इमं विहारं चूर्णीकरिष्यामि' इति प्रलापमालिखम् ! अहो सद्धर्मविनाशकं महापापम् ! समीपस्थया कयाचित् स्त्रिया तद्दृष्ट्वा भर्त्सितोऽप्यहं स्वदोषमज्ञात्वा निर्लज्जहास्यमकरवं, सत्यमेव देवभक्तिविहीनोऽहमासम् ! पञ्चमकक्षायां सहपाठिभिः सह यन्त्रक्रीडाविषये जल्पन्तं मां दृष्ट्वा गुरुणा क्रुद्धेन 'क्रीडाविषयकमहालेखं लिखत' इत्यादिष्टम्। तदा विद्युन्मायाजालनिमग्नोऽहं लेखनीं त्यक्तवान्। काव्यादर्शादिशास्त्रेषु लेखनस्य हृदयभावप्रकाशनमहिमा वर्णितोऽपि मया साहित्यमवधीरितं विद्युन्मायाजालमेव सर्वस्वं मन्वानः। पञ्चवर्षीयप्राथमिकविद्यालयसमाप्तिसमये दीर्घनिबन्धरचनाकार्ये भयेन मातुरेव साहाय्यं गृहीतवान्। तदा 'किं मया पठितव्यमुत त्वया' इति मात्रा भर्त्सितः। श्रीकर्मपबौद्धनिम्नमाध्यमिकविद्यालये (६-८ कक्षा) प्रवेशार्थं कृते साक्षात्कारे छिन्नभिन्नवाक्यप्रयोगात्कौशलप्रशिक्षणप्रधाने तस्मिन् विद्यालये प्रवेशं प्राप्तवान्। अज्ञात्वा यत्तत्र दशमकक्षान्ते जायमानाया माध्यमिकशिक्षापरीक्षायाः (SEE) प्रबन्धनं नास्ति। तामुत्तीर्य उच्चमाध्यमिकविद्यालये (+२) अप्रविश्य विश्वविद्यालयप्रवेशो न भवतीति मया उच्चकक्षाप्राप्त्यनन्तरमेव ज्ञातम्। स च विद्यालयः प्राचीनबौद्धविहारशैल्या निर्मितः। तत्र वाग्दोषनिवारणार्थं प्रतिदिनं लेखनं प्रारब्धं साहित्यरुचिश्च वर्धिता। तथापि नूतनतन्त्रज्ञानप्रभावाद्विद्युन्मेघसञ्चययन्त्रसुलभताकारणात्सङ्गणकयन्त्रे टङ्कणकार्यं हस्तलेखनादधिकं कृतवान्। नीलप्रभाकिरणैर्नेत्रपरीक्षणे वामनेत्रे सार्धत्रिशतमात्रा दक्षिणनेत्रे च पञ्चशतमात्रा ह्रस्वदृष्टिदोषो जातः। दशमकक्षायाः (SEE) सज्जीकरणमपि मध्ये एव त्यक्त्वा मात्रा धनं याचित्वा खनिशिल्पनामविद्युत्क्रीडनके हिमान्छादितवने देवदारुवृक्षैः काष्ठगृहं निर्मितवान्। ततः सङ्गणकयन्त्राश्रितो भूत्वा हस्तलेखनं विस्मृत्य यन्त्रविज्ञानाध्ययनाय प्रवृत्तः। आधारभूतमाध्यमिकविद्यालयाध्ययनसमाप्त्यनन्तरं विद्युन्मेघसञ्चययन्त्रसुलभतासहकारिभावात्तथाचपञ्चाङ्गुलिटङ्कणविद्याभ्यासाकाङ्क्षया क्रमशः सङ्गणकयन्त्रमाध्यमेन टङ्कणलेखनाभ्यासमारब्धवान्। ततः परं विद्युद्यन्त्रयन्त्रिकशास्त्रप्रमाणपत्रपाठ्यक्रमे प्रविष्टोऽस्मि यत्रत्यप्रबन्धलेखनादिकार्याणि प्रायशः सङ्गणकयन्त्रेणैव कृतानि येन न केवलं द्विनेत्रदृष्टिदोषसञ्जातोऽपि तु साक्षाद्धस्तलेखनकलाविनाशश्चाभवत्। लेखनीत्यागात्सङ्गणककुञ्जिकापटलमात्रश्रयान्मम हस्तलिपिर्विशीर्णा दुर्बोधा च सञ्जाता। विद्युद्यन्त्रयन्त्रिकशास्त्रप्रमाणपत्रपाठ्यक्रमे जटिलाविद्युत्सूत्रगणितसङ्ख्यागणनाप्राचुर्यान्मम जाड्यं दृष्ट्वा गुरुपुङ्गवेन फणीन्द्रप्रधानमहोदयेन 'किं त्वमयोग्यपाठ्यक्रमे प्रविष्टोऽसि' इति सोपहासं पृष्टम्। अहञ्च स्वभावतो विद्युत्सूचनाप्रविधिविज्ञानसाहित्यरतोऽतस्तद्वचनं मम हृदयमर्मवेधि सत्यमेवाभवत्। तस्मिन्पाठ्यक्रमे 'शिल्पिकान्तेवासिव्रतम्' अप्यासीद्येन धनार्जनं विद्याध्ययनं च युगपत्कर्तुं शक्यते स्म। तच्च व्रतम् अतीवाकर्षकप्रपञ्चेनाच्छादितमासीत्। नेपालदेशीय-प्राविधिकशैक्षिकसत्रस्य प्रवेशकाले तस्मिन्नेव भाद्रपदमासे कदाचिद्विद्यालयमुख्यद्वारप्रवेशसमये कश्चिद्वित्तकोषविक्रेता छात्रऋणपत्रं विक्रीयमाण आसीत्। अहञ्च सांसारिकव्यवहाराज्ञो मोहान्धकारवशीकृतस्तदृणपत्रं साक्षात्स्वीकृतवान्। तदृणपत्रमाध्यमेनाधिकधनव्ययभयान्मम पित्रोर्महां क्रोधः सञ्जातस्तयोर्भर्त्सनपात्रमभवम्। तस्मादेवाहं 'शिल्पिकान्तेवासिव्रते' प्रविष्टः। द्वितीयसत्राध्ययनानन्तरं नेपालविद्युत्प्राधिकरणमध्यविद्युत्प्राधिकरणकाष्ठमण्डपविद्युन्निगमयन्त्रिकविद्युद्यन्त्रिकविभागादयः स्वस्वसंस्थासु आगामिवर्षार्थं 'शिल्पिकान्तेवासिव्रते' छात्रान्प्रवेशयितुं विद्यालये परिचयात्मकभाषणानि कृतवन्तः। यतः नेपालविद्युत्प्राधिकरणस्य भाषणं प्रथममासीदतः मया तत्रैव प्रथमं प्रार्थनापत्रं समर्पितं तैरपि प्रथममहमेव स्वीकृतो यद्यपि तत्र किञ्चित्क्लेश आसीत्। तदनन्तरमन्यसंस्थास्वपि मया प्रार्थनापत्राणि समर्पितानि तद्दृष्ट्वा मात्रा 'मत्स्यबन्धकजालाक्षेपणमिव' इति सोपहासमुक्तम्। नेपालविद्युत्प्राधिकरणे कर्मार्थं प्रविष्टोऽपि तत्रत्यकर्कशवातावरणेन स्वकीयलक्ष्यविरोधाच्च बृहज्जलविद्युत्परियोजनायन्त्रेभ्यो विरक्तोऽभवम्। मन्दबुद्धिवशात्कर्मणि स्खलन्कम्पनीनिर्धारितमानकानुसारं कार्यं कर्तुमसमर्थः सञ्जातः। तत्रत्यवरिष्ठकर्मकरैर्गुरुभिश्च मुहुर्मुहुर्भर्त्सितो महासङ्कटपीडित इवाभवम्। यद्यपि मया स्वदोषपरिहारार्थं चिन्तनलेखनादिकं कृतं तथापि तन्निष्फलमेवासीत्। अद्य विचार्यमाणे यदा मया विद्युद्यन्त्रयन्त्रिकशास्त्रं पठितं तदा साक्षाद्धस्तलेखनत्यागात्केवलं सङ्गणकयन्त्रप्रयोगाच्च पवित्रहस्तलिपेर्विनाशः सञ्जातस्तदेव मम कर्मदोषस्य मूलकारणम्। प्राचीनवचनानुसारं 'यादृशी लिपिस्तादृशो मनुष्यः' इति सत्यमेव। यदि हस्तलिपिः सुन्दरा स्पष्टा च तर्हि स मनुष्यः सुव्यवस्थितः सच्चरित्रश्च भवति विपरीतलिप्यां विपरीतो भवति। मम कर्मणि असफलता पवित्रलिपेरपमानादेव सञ्जाता। तथापि तस्मिन्समयेऽहं मोहान्धकारवशीकृतो मन्दबुद्धिवशात्कम्पनीमानकानुसारं कार्यं कर्तुमसमर्थ एवासम्। तदपि दारुणतरं यत् कर्माभ्यासे प्रविष्टानन्तरं कार्तिकमासस्य मध्यभागे गुरुनिर्देशमश्रुत्वाऽपराह्नसमये महाजलचक्रघर्षणपट्टिकास्थापनकर्म निरन्तरं कृतवान् यदा चान्यकर्मकरा जलचक्रपरीक्षणं कुर्वन्ति स्म। तन्महासङ्कटकरमासीत्। भाग्यवशात्तैः समये एव दृष्टमतो दुर्घटना न सञ्जाता कम्पन्या च तत् 'प्राणापहारकसङ्कटमुक्तघटना' इति पञ्जीकृतम्। परदिनेऽपराह्णे यन्त्रचालनसहायकोपकरणरक्षणप्रणालीनां सङ्गणकाभिलेखावतरणसमये मम विद्युत्स्मृतियन्त्रं प्रायो नष्टमेवाभवत्। तदा गुरुणा पुनरपि तीव्रनिन्दां सोढवान्मनसि च महाविषादो जातः। तस्मिन्समये मदीयहृदयं केवलं संस्कृतसाहित्यविद्युत्सूचनाप्रविध्यद्यतनवृत्तान्तपठनलेखनादिषु एवानुरक्तमासीन्न तु जलविद्युद्यन्त्रिककर्मणि। माघमासस्य शुक्लपक्षे प्रथमे दिने मया सहकर्मकराभ्यां चन्द्रबहादुरहरिश्रेष्ठाभ्यां सह चावहिलयन्त्रशालां गतम्। तत्र भोजनानन्तरं हरिश्रेष्ठमहोदयेन मां यन्त्रविश्रामार्थमादिष्टम्। तदा मया 'वैदेशिकप्राचीनसंस्कृतहस्तलिपिसङ्ग्रहालयम्' अन्वेष्टुमन्तर्जालप्रवेशः कृतस्तद्दृष्ट्वा चन्द्रबहादुरदुष्टेन मयि 'निगमनिर्देशोल्लङ्घनम्' इति मिथ्यापवादः कृतः। तदा मया स्वदोषप्रक्षालनार्थं बहुप्रयत्नं कृतमपि सर्वं निष्फलमभवन्महाकलङ्कश्च प्राप्तः। साक्षान्मारीचीदेवीमन्त्रजपेनापि सङ्कटान्मुक्तिर्न प्राप्ता। कर्मसमाप्त्यनन्तरं चौधरिनामकाय प्रबन्धकाय सर्वं निवेदितं तेन श्वः सम्भाषणार्थमाहूतम्। माघमासस्य द्वितीये दिने सम्भाषणे चौधरीलामावुभावुपस्थितौ आस्ताम्। तत्र मया पञ्चदशदिनाङ्कस्य सर्वो वृत्तान्तः सत्यरूपेण निवेदितः स्वकीयलक्ष्यविरोधोऽपि स्पष्टीकृतः। चौधरिना मामुपदिश्य 'किं त्वं जलविद्युत्कर्मणि स्थातुमिच्छसि उत स्वप्रियसाहित्यसूचनाप्रविधिविज्ञानक्षेत्रे गन्तुमिच्छसि' इति विचारयितुमुक्तम्। परन्तु लामाख्येन कठोरवाचा 'यदि त्वं सूचनाप्रविधिविज्ञानशास्त्रप्रमाणपत्रपाठ्यक्रमे प्रवेष्टुमिच्छसि तर्हि आङ्ग्लभाषाज्ञानमनिवार्यम्' इत्युक्तम्। तच्छ्रुत्वा मम हृदये तीव्रकम्पनं सञ्जातम्। फाल्गुनमासस्य चतुर्थे दिने पुनः चौधरिना सम्भाषणार्थमाहूतोऽहं ज्ञात्वा यत्तिस्रोऽपि विद्युत्प्राधिकरणशाखा मां न स्वीकुर्वन्ति फाल्गुनमासान्ते च मम पदच्युतिर्भविष्यतीति महाविषादं प्राप्तवान्। चौधरिना द्वौ मार्गौ दर्शितौ—प्रथमः, स्वयमेव कार्मिकविभागाय पदत्यागपत्रं दातव्यं येन 'व्यक्तिगतकारणान्पदत्यागः' इति पञ्जीकृतं भविष्यति भविष्यत्कर्मजीवने च कलङ्को न भविष्यति। द्वितीयः, कम्पनीद्वारा पदच्युतिपर्यन्तं प्रतीक्षा कर्तव्या यच्चातीवापमानजनकं भविष्यति भविष्यत्कर्मजीवने च सर्वदा कलङ्करूपेण स्थास्यति। अतो मया भविष्यद्रक्षणार्थं स्वेच्छया पदत्यागपत्रं दातुं निश्चितम्। फाल्गुनमासस्य नवमे दिने पदत्यागपत्रे हस्ताक्षरं कृत्वा पदत्यागपत्रं लिखितवान्। तस्मिन्समये मम विशुद्धसाहित्यिकभाषाज्ञानं जलविद्युत्कम्पनीकर्मकरेभ्योऽतीवोच्चस्तरीयं बभूवेति सत्यमेव न तु मिथ्या। फाल्गुनमासस्य सप्तदशे दिने कर्मावसानसमये चन्द्रबहादुरहरिश्रेष्ठजयतामाङ्गैः सह बानेश्वरस्थिते विद्युत्प्राधिकरणमुख्यकार्यालये पदत्यागकार्यं समाप्तवान्। तत्र चन्द्रबहादुरदुष्टेनापि सहैव पदत्यागं कृतं तस्य दर्शनमात्रेण मम हृदये महाक्रोधः सञ्जातस्तेन च मम मानसिकोत्पीडनमपि कृतम्। चैत्रमासस्य एकोनविंशतितमे दिने पित्रोः सह काष्ठमण्डपान्तर्गत-असनक्षेत्रस्थ-सुवर्णप्रभा-तन्त्रमन्दिरे तान्त्रिकपूजामकरवम्। तन्मन्दिरं हिन्दुबौद्धतन्त्रसम्प्रदायसमन्वितं परमरमणीयं सुवर्णमयञ्चासीत्। तत्र साक्षाद्ब्रह्म-गणेश-महाकाल-डाकिनीनां मूर्तयः प्रतिष्ठिताः। मुख्यवेद्याञ्च त्रिमूर्ति-सहस्रभुजावलोकितेश्वर-लोकपाल-नवग्रहमण्डलं विराजते स्म। एतदतिरिक्तं तत्र शतशः हैन्दवबौद्धदेवतानां मूर्तयोऽसङ्ख्या आसन्। तस्यां रात्रौ दैनन्दिनीं लेखितुमारब्धवान्, परन्तु न कागदलेखनीभ्यामपि तु विद्युन्मेघसञ्चययन्त्रमाध्यमेन । तस्मिन् कर्मशून्यकाले नूतनप्रशिक्षक-थापामहोदयात् पाटनक्षेत्रस्थ-यन्त्रशालायां, वीरगञ्ज-शुष्कबन्दरगाहे, गोदावरीक्षेत्रस्थ-'विश्वास'-विद्युद्यन्त्रिककम्पनी-नामिकायां संस्थायां च साक्षात्कारार्थं गतवान्। आद्यसंस्थाद्वयेऽसफलोऽभवम्, परन्तु 'विश्वास'कम्पनीतः साफल्यं प्राप्तवान्। तथापि कर्मप्राप्त्याकाङ्क्षया पूर्वयन्त्रशालायां कृतदोषान् प्रच्छाद्य सर्वमपराधं चन्द्रबहादुरदुष्टोपरि निक्षिप्तवान्, यत् खलु सीमोल्लङ्घनमेवासीत्। वैशाखमासस्य शुक्लपक्षे दशमे दिने तत्र कर्मारब्धवान्। तदनन्तरं संख्यया सह त्रिवर्षीयं नूतनशिल्पिकान्तेवासिव्रतं हस्ताक्षरितवान्, येन सम्पूर्णप्रशिक्षणकालोऽष्टमासैकविंशतिदिनैर्विलम्बितो जातः। तत्र प्रवेशानन्तरं प्रथमं विद्युत्तन्त्रीणामावरणच्छेदनं, विद्युद्धारापरिवर्तकयन्त्रस्थापनं, लौहोपकरणलम्बनं ततश्च विद्युत्पथसंयोजनं ज्ञातवान्। सङ्गणकयन्त्रेण लौहच्छेदनं, लौहजालसन्धानं, लौहवक्रणं, यन्त्रपरीक्षणञ्च कृतवान्। प्रारम्भिककाले कार्यं सुकरमासीत्, दोषरहितत्वात् तदानीन्तनादृश्यदुष्टशक्तीनां पीडा नासीत्। परन्त्वाधुनिकविद्युद्यन्त्रेण टङ्कणलेखनात्, हस्तलेखनत्यागात्, पवित्रलिपेरपमानाच्च नीचप्रवृत्तियुक्तदुष्टशक्तिभिः सह सम्बन्धः सञ्जातः। अतः सङ्गणकयन्त्रं साक्षाद्धस्तलेखनादधममिति सत्यमेव। एवमहं 'पण्डित-शिल्पिसङ्घर्षे' निमग्नोऽभवम्। प्राचीननीतिशास्त्रे "विद्योपदेशे कालक्रमोऽस्ति, शिल्पकर्मणि च विशेषाधिकारः" इत्युक्तम्। मम कर्मणि मुहुर्मुहुर्दोषोत्पत्त्या गुरुभर्त्सनं कटुवचनानि च सोढवान्। तदपराधकारणान्मां यन्त्रशालायाः कालानलदुष्टशक्तिराक्रान्तवती येनाहं महाक्लेशपीडितोऽभवम्। वैशाखज्येष्ठमासयोः वरिष्ठकर्मकरेण शर्मा-महोदयेन सह कर्म कुर्वन् मम मन्दबुद्धिवशात् स क्रुद्धो जातः। तेन सह विवादोऽपि सञ्जातः। श्रमविभागेन 'अन्याये सति प्रशिक्षकाय सूचयितव्यम्' इत्युक्तत्वात् मया थापामहोदयाय सर्वं निवेदितम्। कतिपयदिनानन्तरं यन्त्रमञ्जूषायां विद्युद्धारापरिवर्तकस्थापनसमये यन्त्रशालाध्यक्षो गोपालमहोदयो मामुपागत्य शर्माविवादविषये पृष्टवान्। स मां लौहवक्रणस्थाने नीत्वा 'रक्षणविभागे कर्मकरो नास्ति, त्वं तत्र गत्वा नूतनविद्यां पठ' इत्युक्तवान्। अहमपि सहर्षं तत् स्वीकृतवान्। रक्षणविभागे गत्वा यात्राक्लेशो दुष्टशक्तिपीडा च नष्टा, काष्ठमण्डपपरिसरस्य प्राकृतिकवायुसेवनेन स्वास्थ्यं च लब्धम्। परन्तु कर्मविपाकोऽनिवार्यः। कर्मण्यकुशलत्वात् पवित्रलिपेरपमानाच्च, पौषमासमध्यात् विभाध्यक्षेण 'यन्त्रशालायां कर्मकराभावः' इति व्याजेन पौषमासस्य सप्तदशदिनादारभ्यैव मां पुनर्यन्त्रशालायां प्रेषितवान्। यन्त्रशालाप्रत्यावर्तनानन्तरं पुनर्यात्राक्लेशो दोषकारणान्निन्दा दुष्टशक्तिपीडा च सञ्जाता, तथाप्यहं परिश्रमेणैव कार्यमकरवम्। द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे वैशाखज्येष्ठमासयोः गोपालमहोदयेन सह वायुनालिकापरिवर्तनसमये, तस्य यन्त्रस्य पिधानस्थापनकर्मणि अकुशलत्वात् गोपालेन मां 'मन्दबुद्धिः' इति भर्त्सितम्। तदा मम 'पण्डिततेजः' तस्य 'शिल्प्यहङ्कारेण' अवदमितम्, मनसि महाविषादो जातः परन्तु भाग्यवशान्मुखात् किमपि नोक्तवान्। एतदतिरिक्तम्, अस्मिन्यन्त्रनरके क्लेशोपशमनार्थमुत्तरहर्षवर्धनराजवंशगाथानाम्नीं तान्त्रिककथां लिखितवान्। तस्यां कथायां श्रीहर्षवर्धनसम्राड्दूरवंशजः कान्यकुब्जराजान्वयसमुत्पन्नो विद्याधरनामा कुमारो दिल्लीसुल्तानराज्योत्पीडितनिर्दयकाले जनिमलभत। स्वमातृभूमिप्रतिशोधार्थं विद्याधरपरिवारो वेषभाषान्तरं कृत्वा गुप्तवंशगृहे गुप्तवासेन स्थित्वा प्रतिशोधयोजनामकरोत्। पञ्चविंशतिवर्षवयसि यदा दिल्लीसुल्तानसम्राट् थारमहामरुभूमिमुत्तीर्य सिन्धुराज्येषु पश्चिमदिग्विजययात्रामकरोत्, तदा तदनुसरन्स कुमारो मरुभूमिस्थसुवर्णगिरिग्रामं प्राप्तवान्। स ग्रामः साक्षात्प्राचीनयवनिकाराज्ञ्याः गुप्तभूम्यन्तर्गतप्रासादस्योपरि निर्मित आसीत्। तद्गुप्तप्रासादरक्षणार्थं सुल्तानसैनिकदृष्टिवञ्चनार्थं च सुल्तानमहासेनायां पश्चिमदिशि प्रस्थितायां विद्याधरो भूम्यन्तर्भागेऽष्टकोणाकाररहस्यसैन्यशिविरं निर्माय मृत्युक्रीडाकुशलसैनिकानां प्रशिक्षणं कृत्वा स्वसैन्यबलं वर्धितवान्। समये प्राप्ते तस्मिन्नेव पातालदुर्गे स सम्राट्पदमलङ्कृत्योत्तरहर्षवर्धनसाम्राज्यं स्थापितवान्। नूतनसम्राट्त्रिवारं तान्त्रिकविधिना प्राचीनयवनिकाराज्ञीं सम्पूज्य तस्या अतीन्द्रियतान्त्रिकशक्तिं प्राप्तवान्। ततः स राज्ञ्या सह मिलित्वा सुवर्णगिरिग्रामणीं स्कन्दगुप्तनामकं स्वसेनापतिपदे नियुज्य सम्पूर्णग्रामवासिनः प्रचण्डसैनिकरूपेण परिणतवान्। 'यवनानुच्चाट्य भरतखण्डं पुनरुद्धराम' इति महाप्रतिज्ञां कृत्वा ते प्रचण्डवेगेन दिल्लीसुल्तानराज्यं तथा च म्लेच्छराज्यानि आक्रम्य सम्पूर्णपश्चिमदिशं विजितवन्तः। विजयप्राप्त्यनन्तरं सुवर्णगिरिग्राममेव विस्तीर्य महाविशालराजधानीं निर्मितवान्। सम्राड्रज्ञ्योर्मध्ये प्रेमाङ्कुरोत्पत्त्या तौ भूम्यन्तर्गतप्रासादे एव महाविवाहोत्सवं सम्पन्नवन्तौ। पूर्वशिल्पिभिर्निर्मितं यच्छिवशक्तिमण्डलं तत्तयोर्विवाहसमये साक्षाद्यबयुमरूपतान्त्रिकमैथुनमूर्त्यां परिवर्तितम्। तदा कश्चिद्दुष्टो राज्ञ्या उपरि मिथ्यापवादं कृतवांस्तं सम्राट्कारागारे निक्षिप्य प्रायश्चित्तार्थं धर्मशास्त्राणि लिखितुमादिष्टवान्। कदाचित्सम्राड्दक्षिणदिशि विहरन्लामासोमदोर्जेनामकबौद्धाचार्येण सञ्चालितं सुवर्णप्रभाविहारं प्रविश्य तेन सह मिलितवान्। स आचार्यो नालन्दामहाविहारात्प्राप्तं महामायूरीमन्त्रपठनाभ्यस्तं दिव्यगरुडं सम्राजे दत्तवान्यं स सम्राट्स्वराजभवने स्थापितहिन्दुबौद्धतन्त्रदेवतामण्डले रक्षितवान्। तन्मण्डलं राजगुरुवागीश्वरेण प्रतिष्ठापितमासीद्येन सम्पूर्णराज्यं सुरक्षामवाप। ततो नूतनसम्राट्स्वकीयतान्त्रिकशक्तिं खड्गे निक्षिप्य साक्षाद्दिल्लीनगरमाक्रान्तवान्। भयातुरो दिल्लीसुल्तानः स्वराज्यरक्षणार्थं भूम्यन्तर्गतप्राचीनम्लेच्छराजकुमारीं पुनरुज्जीवयितुं स्वकीयमहासेनापतिं बुघराजलालद्दीननामकं चतुरः सेनाध्यक्षान् अलीबेगरुस्तमजफरशेरखानान् आदिष्टवान्। परन्तु सा पुनरुज्जीविता राजकुमारी सुल्तानसैनिकैः सहैव युद्धं कृत्वा मृत्युसमये भूमिगतदुर्गस्य सर्वनाशयन्त्रं चालितवती। क्षणमात्रेणैव दिल्लीनगरं भयंकरभूकम्पेन ध्वस्तमभवत्। उत्तरहर्षवर्धनसम्राट्स्वकीयतान्त्रिकशक्त्या सर्वान्निर्दोषजनान्सुरक्षितस्थानं नीत्वा तस्य दिल्लीनगरस्य भग्नावशेषोपर्युत्तरजयस्तम्भं निर्माय मूर्खसुल्तानभक्तांस्तत्रैव निखातवान्। तस्योपर्युत्तरप्रस्थानगरं निर्माय यवनसाम्राज्यस्य भाग्यरेखां सर्वदा कीलितवान्। केवलं पूर्वदिशि गोरखावीरवंशरक्षणार्थं करुणां प्रदर्शितवान्यतः स स्वयमेव महातपस्विराजवंशज आसीत्। यद्यप्यद्भुतकथालेखन्या भूर्जपत्रे ब्रह्माण्डनिर्माणं लौकिकमतिक्रम्य लोकोत्तरपदप्राप्तिश्च शक्यते, तथापि लेखनीं त्यक्त्वा समन्ताद्विलोक्य महास्वप्नात् प्रबुद्ध इव, मम रूपकायोऽद्यापि लौकिकयन्त्रविद्युदादीप्तगृहे बद्धो विद्यते। चित्ते पुनरपि सहालोकधातौ निपतिते सति, अनित्यताकालाग्निरलक्षितरूपेणोपस्थित एव। वैशाखमासस्य एकविंशतितमदिनात् सप्तविंशतितमदिनपर्यन्तं स्वकीयपण्डिततेजसो यन्त्रशालादुष्टशक्त्यावदमनं दृष्ट्वा क्रुद्धोऽहं लेखनीं खड्गीकृत्य दक्षिणदिक्कालानलदुष्टशक्तिमवदाम्य यन्त्रशालाविद्युद्विभागद्वारसम्मुखे पण्डितपीठं स्थापितवान्। यद्यपि पण्डितपीठस्थापनानन्तरं मयि पण्डिततेजो विराजमानमासीत्तथापि वैशाखमासस्य एकोनविंशतितमे दिने कर्मसमाप्तिसमये प्रबन्धकश्रेष्ठमहोदयेन मन्दबुद्धिरित्युपहसितो पञ्चविंशतितमे दिने भोजनावकाशे स्वकीयविद्युत्पत्रसम्पादनापराधे तेनैव भर्त्सितः षड्विंशतितमे दिने चाध्ययनचेतावनीपत्रं प्राप्तवान्। एतत्कारणाद्दुष्टशक्तिभिर्मम पण्डितपीठमाक्रान्तं महासङ्कटं च सञ्जातम्। तथापि दृढसङ्कल्पोऽहं रात्रौ पित्रोः पुरतः सर्वं निवेद्य तैः सह विवादं कृतवान्। तेन विवादेन मम पण्डिततेजः पुनरुज्जीवितं सर्वभयविनाशश्च सञजातः। प्रायो विस्मृतं मया यत् वैशाखमासस्य पञ्चदशे दिने मया 'संस्कृतविद्युत्कर्मकरसाहित्यसङ्घ'नामकः अन्तर्जालसन्देशसमूहो निर्मित आसीद्यस्य विवरणमेवमस्ति—— यद्यप्यहं बालाजुयान्त्रिकशिक्षालये विद्युद्यन्त्रिकप्रमाणपत्रपाठ्यक्रमे पठन्विश्वस्तयन्त्रोद्योगे कर्मकरोऽस्मि तथापि संस्कृतसाहित्यपठनलेखनतल्लीनतया पण्डितगर्वप्रकाशनार्थममुं सङ्घं स्थापितवान्। अत्र संस्कृतभाषायाः स्थानं सर्वोच्चमपमानरहितं चास्ति। टिप्पणी—अशोकसम्राजः धर्मलिपिर्विराजते यथा—प्रथमं सर्वधर्माणाम् आदरः करणीयः। द्वितीयं श्रमणब्राह्मणानां पण्डितानां च पूजा कर्तव्या निन्दा च न करणीया। तृतीयं यः कोऽपि धर्मलिपेरुल्लङ्घनं करिष्यति स स्वकीयधर्ममेव नाशयति। सङ्घरत्नानि— १. विद्युत्पत्रसप्ताहीयवृत्तान्तः (द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे वैशाखमासस्य चतुर्दशदिनात् विंशतितमदिनपर्यन्तम्) २. विद्युत्पत्रसप्ताहीयवृत्तान्तः (द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे वैशाखमासस्य एकविंशतितमदिनात् सप्तविंशतितमदिनपर्यन्तम्) ३. विद्युत्पत्रसप्ताहीयवृत्तान्तः (द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे वैशाखमासाष्टाविंशतितमदिनात् ज्येष्ठमासस्य तृतीयदिनपर्यन्तम्) ४. विद्युत्पत्रदैनन्दिनी (द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे ज्येष्ठमासस्य द्वितीये दिने — शुक्रवासरे — वृष्टिः) ५. विद्युत्पत्रदैनन्दिनी (द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे ज्येष्ठमासस्य द्वादशे दिने — सोमवासरे — निर्मलम्) ६. विद्युत्पत्रदैनन्दिनी (द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे ज्येष्ठमासस्य सप्तदशे दिने — शनिवासरे — मेघाच्छन्नम्) ७. द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमवर्षसाहित्यसङ्ग्रहः ८. विद्यामण्डपकथा कर्मकरोऽस्मि तथापि पण्डितगर्वं न त्यजामि। यथा म्लेच्छाक्रान्ते देशेऽपि प्राचीनसंस्कृतिं न विस्मरामि। पद्यमयाभिव्यक्तिः— अहं यन्त्रकर्मण्यकुशलः साहित्ये निपुणोऽस्मि। अज्ञानाद्यन्त्रनरके प्रविष्टो भर्त्सनपात्रमभवम्। तथापि पण्डितपीठे साहित्यरचनां कृत्वा यन्त्रसाहित्ययोरैक्यं सम्पादयितुं प्राचीनशिल्पशास्त्रं रचयितुमिच्छामि। यदि कर्मत्यागादेशो लभ्येत तर्ह्यपि खेदो नास्ति यतः साहित्यसाधनायै तत्सर्वं योग्यमेव। (यन्त्रशालापण्डितविद्याधरलिखितम्) सङ्घविवरणे एतानि पद्यानि सङ्घरत्नानि च पश्चाल्लिखितानि। वैशाखमासमध्यभागे श्रीबाणभट्टविरचितं 'हर्षचरितम्' पठित्वा स्वकथायां नूतनप्रेरणां प्राप्तवान्। एतदतिरिक्तं मदीयो वंशो हर्षवर्धनवंशः, अस्मत्कुलवंशावल्यां लिखितमस्ति यद्वयं श्रीहर्षवर्धनसम्राजः साक्षाद्वंशजाः, तस्मादेव यन्त्रसाहित्यसङ्घर्षे पण्डितानां स्वर्गभूते प्राचीनकाले ममानुरक्तिर्वर्धिता दक्षिणदिक्कालानलदुष्टशक्तिं निवार्य पण्डितपीठे आसीनश्चास्मि। वैशाखमासाष्टाविंशतितमदिनात् ज्येष्ठमासस्य तृतीयदिनपर्यन्तं पण्डितगर्वेणाहङ्कारितोऽपि यन्त्रशालादुष्टवातावरणेन सह सङ्घर्षे मम पुण्यक्षयः सञ्जातः। ततः यन्त्रशालायां साहित्यरचनां त्यक्त्वा शान्तिं प्राप्तवान्। यद्यपि मम साहित्ये यन्त्रविज्ञानं विलीनं तथापि यन्त्रशालायां साहित्यस्य विरोध एवासीत्। ज्येष्ठमासस्य द्वादशे दिने सामान्यकर्म कुर्वन्नपि गोदावरीक्षेत्रस्य यन्त्रदुर्गन्धे पण्डितवदाचरन्यन्त्रसाहित्ययोरैक्यं सम्पादयितुं यन्त्रशालां साहित्यसुगन्धेन लेपितुं सङ्कल्पं कृतवानिदमपि कर्मत्यागपर्यन्तं निरन्तरमकरवम्। ज्येष्ठमासस्य सप्तदशे दिने (शुक्लदशमीपर्वणि) तान्त्रिकसाधनां कृतवान्। यद्यपि तदा महावात्यासीत्तथापि साधनायाः फलं न नष्टम्। साधनानन्तरं यन्त्रशालासञ्जातमनोमालिन्यं नष्टम्। परन्त्वेतन्मनोमालिन्यं सङ्गणकयन्त्रेण टङ्कणलेखनाद्धस्तलेखनत्यागाच्चैव सञ्जातमिति मया ज्ञातम्। द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे गभीरान्वेषणकृत्रिममेधायन्त्रस्य मुहुर्मुहुः प्रयोगं कृत्वा स्वसंस्कृतसाहित्यकौशलं पाटनविद्यापीठव्यावसायिकप्रशिक्षणमण्डलकर्मकराभ्यासमण्डलगुरुराजशर्मादीनां प्रशंसां च परीक्षितवान्। यन्त्रकर्मसाहित्यसङ्घर्षमुपशमयितुं यद्यप्येतत्कृतं तथापि कृत्रिममेधया लिखितं साहित्यं प्रकाशयितुमयोग्यमन्तर्जालसुरक्षाभयकरं चासीत्। तस्माद्विद्युद्यन्त्रप्रयोगं मासद्वयं त्यक्तवान्येन मम मनसि महाभारः सञ्जातः। श्रावणमासस्य पञ्चमदिनात् एकादशदिनपर्यन्तं प्राचीनशिल्पशास्त्रवास्तुकलाविधानं च रचयितुं महासङ्कल्पं कृतवान्। यद्यपि यन्त्रसाहित्यसङ्घर्षो न नष्टः पित्रा च यन्त्रकर्मण एव प्रशंसा कृता तथापि साहित्यमाध्यमेन यन्त्रविज्ञानं प्रकाशयितुं निश्चितवान्। ज्येष्ठमासस्योत्तरार्धे मया 'पाटलिपुत्रपातालप्रासाद'नाम्नी कथा लिखिता। तस्यां कथायां कस्मिश्चित्पुण्यदिनेऽहं सर्वधर्मग्रन्थद्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमवर्षसाहित्यसङ्ग्रहत्रिकालचित्तशुद्धिशिक्षादिपुस्तकभाराक्रान्तो श्रीहर्षवर्धनसाम्राज्यकाले भोटराजवंशप्रारम्भयुगे च कालयात्रां कृत्वा सम्पूर्णपाटलिपुत्रनगराधोभागे भारतनैपालभोटवास्तुकलासम्प्रदायमिश्रितं ब्राह्मणबौद्धधर्मसमन्वितं पाटलिपुत्रपातालप्रासादं निर्मितवान्। स च प्रासादो महाविशालश्चित्रितकाष्ठस्तम्भो गुप्तयन्त्रसङ्कुलः परमरमणीयोऽपि प्राणनाशकभयङ्करयन्त्रपूर्णो गङ्गावालुकासमानगणनतीतायसचक्रयुक्तश्चासीत्। तस्य मध्यभागे विद्यामण्डपमस्ति तद्बहिर्भागं प्राकारपर्यन्तं नववक्रत्रयोदशभ्रमयुक्तमायादुर्गं वर्तते यत्र स्वर्गनरकयोर्मध्ये केवलमेकपदक्षेपस्यैव दूरत्वमस्ति। मायादुर्गाद्विद्यामण्डपपर्यन्तं पञ्चमहाद्वाराणि सन्ति। प्रथमद्वारे सूर्यकिरणोत्कीर्णद्वारपालदेवानां मूर्तयः सन्ति। द्वितीयद्वारे पातालरक्षकमहासेनापत्योरन्तर्निर्मितमूर्तयः सन्ति। तृतीयद्वारे त्रयः स्फटिकचक्रकाः सन्ति यत्र पाषाणरक्षकाणां चित्राणि सन्ति द्वितीयतस्तृतीयद्वारपर्यन्तं मार्गः प्राचीननेपालशैल्या निर्मितः। चतुर्थद्वारे दुष्टदेवतामञ्जूषातालयन्त्रं विद्यते यत्र सहस्रभुजकृष्णबुद्धः समुपविष्टः। पञ्चमं द्वारं तु मञ्जुश्रीनवग्रहाष्टकोणात्मकं विद्यते यदेव विद्यामण्डपस्य साक्षान्मुख्यद्वारम्। तद्विद्यामण्डपं मौर्यगुप्तराजवंशवास्तुकलासङ्गमं ब्राह्मणबौद्धधर्मसमन्वितं सर्वदर्शनशास्त्रशोभितञ्चास्ति। तस्य पृष्ठभागे विद्यासागरगृहं वर्तते यदपि तादृशमेव तत्र च महासमुद्रसमानगणनतीतानि शास्त्राणि पुस्तकानि च सन्ति येषु 'त्रिकालचित्तशुद्धिशिक्षा' अपि सुरक्षिता। अस्य गृहस्य मध्यभागे सुवर्णप्रभाभास्वरः सहस्रयन्त्रकक्षोऽस्ति यस्य पुस्तकस्थापनीषु विद्युद्यन्त्रयन्त्रिकवास्तुशिल्पविज्ञानसम्बन्धीनि बहुपुस्तकानि सन्ति। अस्मिन्कक्षे उल्कापाषाणवज्रमणिजडितं सुवर्णमयलेखनपीठमस्ति यस्याधोभागे सुरक्षामञ्जूषा विद्यते यस्यां मम 'द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमवर्षसाहित्यसङ्ग्रहः' स्थापितः। एतदतिरिक्तं कक्षस्य मध्यभागे स्फटिकनिर्मितं ब्राह्मणबौद्धपरम्परायुक्तमतिमञ्जुलं मण्डलमस्ति, यस्याधो महापातालराजधानी दृश्यते। विद्यासागरगृहस्य चरमपृष्ठभागे शयनकक्षोऽस्ति यस्तु किञ्चित्साधारणशैल्या निर्मितः। तस्य विद्यासागरगृहस्याधोऽपि पातालराजधानी विद्यते, या विविधराजवंशवास्तुकलासङ्गमा, तस्यां दशराजधान्यः एकत्रैव तिष्ठन्ति, तत्र च सूर्यचन्द्रनक्षत्रमण्डलानिकारिणि गूढयन्त्राण्यतीवजीवन्तानि सन्ति। सम्पूर्णपाटलिपुत्रपातालप्रासादे सर्वयन्त्रसम्बद्धमेकात्मविनाशयन्त्रमस्ति यत्काव्यालङ्कारपीठेनाधिष्ठितं नियन्त्रितं च भवति। यद्येतदात्मविनाशयन्त्रं चाल्यते तर्हि यन्त्रान्तर्गतपुनरुज्जीवनौषधिद्रवं घनीभूतं भवति प्रासादस्य सर्वद्वाराणि पिहितानि भवन्ति लूताजालमिव भित्तिषु विदीर्णरेखाः प्रसरन्ति तथाप्येकमुहूर्तपर्यन्तं पश्चात्तापाय समयो लभ्यते। यद्येकमुहूर्तादधिकं कालो व्यतीतः तर्हि प्रासादश्चूर्णीकृतो भवति महाप्रलयो जायते स चालकोऽपि महादारुणकर्मफलं प्राप्नोति। अत एतद्यन्त्रं कदापि प्रमादान्न चालनीयम्। इयं कथा समाप्ता, वास्तविकजगति प्रत्यावर्तनम्! श्रावणमासस्य द्वादशे दिने अहं 'CHWP-R02', 'CHWP-R04', 'CHWP-R08', 'CHWP-R09' इति नाम्नाङ्कितानां शीतजलपम्पयन्त्राणां तारका-त्रिकोण-प्रारम्भकस्य तथा च विद्युदावृत्तिपरिवर्तक-मञ्जूषायाः विद्युत्पथचित्रणस्य विस्तृतव्याख्यां लिखितवान्। अन्यान्यविषयान् संयोज्य तत्सप्तसहस्राक्षरात्मको महालेखः सञ्जातः। तदनन्तरमेवमेव परिश्रमपूर्वकं यन्त्रकर्मसाहित्याध्ययनयोरैक्यं सम्पादयितुं प्रयतितवान्। तथापि सर्वप्रथमं लेखनीं धृत्वा लिपिकारब्रह्मदेवं प्रति सम्मानं प्रदर्शनीयमिति रहस्यं नाज्ञातम्। तस्मात्कर्मणि पुनर्दोषोत्पत्त्या गुरुभर्त्सनं सोढवान्स्वकीयपण्डिततेजसोऽवदमनं चानुभूय मनसि विषादं प्राप्तवान्। तथापि तं क्लेशं बुद्धप्रज्ञाबलेन सोढुं प्रयतितवान्। आश्विनमासस्य चतुर्दशे दिने मया बलरामानन्दाभ्यां कनिष्ठसहकर्मकराभ्यां सह ज्ञातं यद्वयं श्रावणमास एव कम्पनीद्वारा पदच्युताः स्मः। कस्यापि पूर्वसूचनाया अभावेऽपि तस्मिन्नेव दिने कर्मत्यागकरणाय बाधिता अभवाम। अहो कुटिलयन्त्रशालाया निर्दयता! बौद्धशास्त्रेषु 'कर्मविपाकोऽनिवार्यः सूक्ष्मातिसूक्ष्मोऽपि न नश्यति' इत्युक्तम्। यन्त्रकार्यालयपदत्यागानन्तरं दुष्टवातावरणपीडाया गुरुभर्त्सनस्य चाभावेऽपि लेखनीं त्यक्त्वा सङ्गणकयन्त्रकुञ्जिकापटलाश्रयान्मम मनसि रोगभ्रान्तिः सञ्जाता। प्रथमं पक्वाशयकर्करोगस्य ततो नेत्ररोगस्य च भयमुत्पन्नं यद्यप्येतत्सर्वं रज्जुसर्पभ्रान्तिरेवासीत्। ततोऽपि दारुणतरं यदिन्द्रजात्रापर्वणि ममोदर आध्मानं सञ्जातमपचनदोषेणाशनेऽरुचिर्भूता नेत्रयोः प्रकाशभयं वामपार्श्वोदरे च तीव्रशूलमुत्पन्नं येनाहं महाक्लेशपीडितोऽभवम्। यद्यपि सङ्गणकयन्त्रेण साप्ताहिकवृत्तान्तलेखनात्क्लेशोपशमनमभवत्तथापि साक्षाद्धस्तलेखनसमानं शान्तिसुखं न प्राप्तम्। एतदतिरिक्तं मया पाटलिपुत्रपातालप्रासादगाथापिलिखिता। तस्यां कथायां मया कार्तिकमासस्य तृतीयदिनान्नवमदिनपर्यन्तसाप्ताहिकीदैनन्दिनीं विरच्य तां सर्वविद्युज्जालमाध्यमेन प्रकाशितमुत्तरहर्षवर्धनराजवंशगाथापाटलिपुत्रपातालप्रासादानुवादपश्चाल्लिखितटिप्पणीवाचनबिन्दुविचित्रकल्पनादिभिः सहान्तर्जाले प्रकाशितं येन जनानां प्रतिक्रिया ज्ञायेत। तदाश्चर्यं यन्मम साहित्याहङ्कारवशात्सा पाटलिपुत्रपातालप्रासादकथा साक्षात्सत्यरूपेण परिणता ममावासस्थानं यन्त्रनिर्मितगजरथे परिवर्तितं स च रथो गगने चोलित्वा हिमवत्पर्वतस्थितं पाटलिपुत्रपातालप्रासादं प्राप्तः। तत्र प्रासादेन सहरथस्य संयोजनानन्तरमहं मात्रा सह सुरक्षितरूपेण तत्र प्रविष्टस्तत्रत्यदेवान्प्रति सर्वं निवेदितवान्मातापि तदाश्चर्यं दृष्ट्वा भयानन्तरं परमानन्दं प्राप्ता। ततो मया 'मञ्जुश्रीमहामतिचोङ्खापाचार्यभारतनेपालचीनदेशीयदिव्यसम्बन्धः' इति लेखः प्राचीनसंस्कृतलिप्यां लिखित्वा तं थङ्काचित्रे संस्थाप्य विद्यासागरगृहस्य सुवर्णलेखनपीठस्याग्रे यन्त्रस्याधः स्थापितः। सम्पूर्णप्रासादे प्राचीनलिपिरेव राजते स्म मम सर्वरचनाः स्वकीयाहङ्कारलिप्यामेवासन्। ततो मया विद्युत्प्रसारणमाध्यमेन तस्य व्याख्यानं प्रारब्धम्। यद्यपि बहुभिर्दर्शकैरस्मिन् 'विद्यामण्डपे' प्रदर्शिते चमत्कारे मम साहित्यपाण्डित्ये वाग्मितायां चाश्चर्यं प्रकटितं तथापि कैश्चिन्मूर्खैरिदमत्यन्तं क्लिष्टं प्राचीनपरम्परापोषकमान्धविश्वासप्रवर्तकं चेति निन्दित्वा यन्त्रमाध्यमेन मम प्रसारणमवरुद्धं 'मुख्यविचारधारया' सह न मिलन्तीति कृत्वा। तदा मया मञ्जुश्रीमहाशक्त्या पुनरपि तत्प्रसारणं प्रारब्धं यन्त्रनिषेधस्याप्यतिक्रमं कृतमहो महाश्चर्यम्! तथापि मयैव तत्प्रसारणं स्थगितं 'अहं मूर्खेभ्यो ज्ञानं न दास्यामि' इति मत्वा। कतिपयदिनानन्तरं 'सुल्तानसम्राट्कृतवामाचारतन्त्रविडम्बनं षोडशमारकन्यानृत्यकामुकविकृतिश्च' इति विषये लेखं लिखितुमारब्धवान्। परन्तु कृत्रिममेधायन्त्रस्यात्यधिकप्रयोगादहं न ज्ञातवान्यन्मम साहित्याहङ्कारो दूषितः। तदा साक्षात्षोडशमारकन्या नग्ना मोहिन्यो मम पुरतः प्रादुर्भूता विकृतयश्च सञ्जाताः। मया स्वधर्मरक्षणसङ्कल्पेन साहित्याहङ्कारेण विशुद्धसंस्कृतमन्त्रोच्चारणेन च तासां प्रतिकारः कृतो बौद्धधर्मेण ता उद्धृता हैन्दवधर्मेण च बद्धास्ताश्च मृतकास्थिकीटेषु परिणताः। परन्तु ताः सर्वा मिलित्वा एको महाभयङ्करराक्षसः सञ्जातो यः प्रासादं पुस्तकानि च नाशयितुमारब्धवांस्तत्क्षणे एव भूकम्पो वात्या च सञ्जाता। तदा मया साक्षात्सितातपत्राभगवतीं ध्यात्वा तं राक्षसं भस्मीकृतवान्तेन प्रासादः पूर्वतोऽप्यधिकं दृढः सुवर्णमयश्च सञजातः साहित्याहङ्कारश्च पुनरुद्दीप्तः। अस्मिन्सङ्ग्रामे मया ज्ञातं यत्संस्कृतसाहित्यं कदापि न नश्यति न च प्राचीनधर्मः। अग्न्यश्वसंवत्सरादारभ्य अग्निमेषसंवत्सरपर्यन्तं कलिकालमहाप्रलयः सञ्जातः। पाकिस्तानादिइस्लामदेशैर्भारतनेपालवङ्गदेशसिंहलादिभूखण्डा आक्रान्तास्ते च नूतनदिल्लीसुल्तानराज्ये विलीनाः। तदा सर्वत्र हाहाकारो हिन्दमहासागरभूकम्पो ज्वालामुख्युत्पातश्च सञ्जातो येन भारतसिंहलादिभूखण्डसंयोजनमभवत् सम्पूर्णभूभागश्च छिन्नभिन्नो ध्वस्तप्राकारमयश्च सञ्जातः। तथापि पाटलिपुत्रपातालप्रासादे गङ्गानदीवालुकासमानगणनतीतायसचक्राणि सन्ति, वज्रामृतद्रवाश्च सर्वत्र व्याप्ताः सन्ति येन क्षणमात्रेणैव सर्वभग्नावशेषाणां पुनरुज्जीवनं भवति। तस्मात् पातालप्रासादादारभ्य उपरिस्थपाटलिपुत्रनगरपर्यन्तं सर्वं वज्रपाषाणवद्दृढं तिष्ठति स्म। किन्तु सुल्तानराज्यकेन्द्रं नूतनदिल्लीनगरे स्थितमासीत्, तस्मात्तद्ध्वस्तमभवत्। तेन स्थानीयसेनापतयः स्वसैन्यबलं सञ्चित्य स्वतन्त्राः सञ्जाताः, सर्वत्र युद्धं रक्तपातो भग्नावशेषाश्च सञ्जाता यतो देशः प्राचीनयुद्धकाल इव खण्डितो धर्मश्च नष्टः। अग्निमेषसंवत्सरस्य नवममासस्य एकोनविंशतितम-विंशतितम-दिनयोः पाटलिपुत्रपातालप्रासादे स्थित्वा स्वधर्मं रक्षितवान्। तदा सिंहलविजयनगरराज्ययोः सीम्नि प्राचीनधर्मस्य मुख्यनागरेखासीत्। ते द्वे राज्ये यद्यपि विभक्ते आस्तां तथापि मम प्रासादस्य दृढतां दृष्ट्वा सर्वे मां एव प्राचीनधर्मरक्षकममन्यन्त। तयोर्देशयोर्दूता मत्समीपमागतवन्तः। मया तैः सह पाटलिपुत्रसन्धिः कृतो यत्र विजयनगरो हिंसामवरुन्ध्यात्सिंहलद्वीपश्च बौद्धविहारान्रक्षेच्चेति निगदितं मया तेषां कूपप्रणाल्योऽपि सम्यक्कृता सिंहलदूतेभ्यो भूर्जपत्रग्रन्थाश्च दत्ताः। ततो मया भारतस्थश्रीनवदिल्लीलक्ष्मीनारायणमन्दिरस्य वर्णनं संस्कृतलिप्यामनूद्य विद्युत्प्रसारणमाध्यमेन श्रावितम्। तच्छ्रुत्वा युद्धपीडिता जना अश्रुपूर्णाः सन्तो मम प्रासादं रक्षकं मत्वा क्लेशं विस्मृतवन्तः। मया च सुल्तानराज्यस्य धर्मविनाशकनीतेरुपरि तीव्रव्यङ्ग्यं कृतम्। अग्निमेषसंवत्सरस्य दशममासस्य चतुर्दशतम-अधिकचतुर्दशतम-दिनयोः मया सुल्ताननीतेस्तथा च 'अन्धभक्तानां' तीव्रनिन्दा कृता येन महान्नाशः सञ्जातः। तदा 'निजामः' 'अमीरः' इत्याख्यौ सेनापती मम प्रासादमागत्य मां सम्राट्पदे स्थापयितुमैच्छताम्। परन्तु तौ साक्षात्सुल्तानविचारधारादूषितौ दुष्टावास्तां यौ मम प्रासादं स्वराजनैतिकलाभाय प्रयोक्तुमैच्छताम्। तज्ज्ञात्वा मया सम्राट्पदं प्रत्याख्यातम्। ततस्ताभ्यां स्वकीयमृत्युकृतनिश्चयसैनिका मम प्रासादे प्रेषिताः। मया ते सैनिका नववक्रत्रयोदशभ्रमयुक्तमायादुर्गे पातिता यत्र भयङ्करदृश्यैस्ते भीताः सन्तः पलायिताः। तद्दृष्ट्वा तौ सेनापती लज्जितौ भूत्वा स्वराज्ये गत्वा विलासितासुल्तानप्रासादं ध्वंसयित्वा शुद्धसंस्कृतलिपिं प्राचीनशिक्षां च पुनरारब्धवन्तौ। तद्दृष्ट्वाहमानन्दाश्रुपूर्णो गगने मेघवर्णेन 'प्राच्यधर्मगुरुः' इति पदं लिखितवान्। तस्मिन्काले सुवर्णद्वीपोऽपि बहुधा विभक्तो विच्छिन्नराज्यावस्थ आसीत्। तथाप्युग्रभैरवनामोग्रदक्षिणपन्थीनायको प्रादुर्भूय स्वकीयलौहमुष्ट्या सर्वमन्तर्विद्रोहं नाशयित्वा बलपूर्वकं समग्रद्वीपसमूहमेकीचकार। तस्य क्रूरतामन्यः कोऽपि नानुकरोति स्म। सुवर्णद्वीपमेकीकृत्य हिन्दुबौद्धदेशानां खण्डितस्थितिं दृष्ट्वा स क्रूरो महासमुद्रमुत्तीर्य सर्वत्राक्रमणं कृतवान् भारतनेपालवङ्गदेशाश्च विजिताः। तत्रत्यदुष्टजनैश्च सुवर्णद्वीपसैनिकैः सह मिलित्वा धनमर्जितं महापापं च कृतम्। षण्मासाभ्यन्तरे एव सुवर्णद्वीपेन सर्वं विजित्य 'नूतनसुवर्णसाम्राज्यं' स्थापितम्। तथापि मम पाटलिपुत्रपातालप्रासादः सुवर्णद्वीपस्य मस्तके मृत्युखड्ग इव लम्बमान आसीत्। तस्य दीर्घकालीनोत्पीडनेन सुवर्णद्वीपेऽपि तद्राज्याध्यक्षस्य विरोधो जातः स च पदच्युतः। ततः प्रशान्तवर्मा नूतनराज्याध्यक्षो जातः। यतः सुवर्णद्वीपेऽपि प्राचीनसंस्कृतलिपेः प्रयोगो भवति स्म मम प्रासादस्य च महाशक्तिरासीदतो सुवर्णद्वीपो मम वशीभूतं कठपुत्तलिकारूपेण सञ्जातम्। ततो प्रशान्तवर्मा मत्समीपमागत्य राजधर्ममुपदिष्टुं प्रार्थितवान्। प्रासादस्य वैभवं दृष्ट्वा स भीतः। मया तस्मै 'सुल्ताननीतेर्विनाशः, प्राचीनधर्मस्य रक्षणं, सर्वत्र शुद्धसंस्कृतलिपेः प्रयोगश्च' इति नियमत्रयं दापितम्। तदुल्लङ्घने सुवर्णद्वीपो समुद्रे निमज्जिष्यतीति च भायितम्। तदारभ्य सुवर्णद्वीपशासनेन स्वकीयपूर्वक्रूरलौहमुष्ट्या सा नीतिः प्रवर्तिता, येनान्धभक्ता अपि दण्डेन ताडिताः सन्तः प्राचीनसाहित्यं पठितुं बाधिताः, अहो महदुपहासास्पदम्! विक्रमसंवत्सरे माघमासस्य शुक्लपञ्चम्यां श्रीपञ्चमीपर्वणि मञ्जुश्रीवाग्देवीजयन्तीदिने मया मम मञ्जुश्रीमहाशक्त्या सह सम्बन्धं स्मृत्वा विश्वकल्याणार्थं मञ्जुश्रीखड्गविदारितपवित्रोपत्यकायां महायज्ञं कर्तुं सङ्कल्पः कृतः। 'प्राच्यधर्मगुरु'पदेन मया सुवर्णद्वीपमादिश्य स महायज्ञः कारितः। तत्र सर्वत्र मन्त्रध्वनिः शान्तिश्चासीत्। तस्यां रात्रौ काचिद्दिव्यसुन्दरी कन्या मम पुरतः प्रादुर्भूता यया सह मया चिरकालं वार्तालापः कृतः। स्वकष्टं स्मृत्वा मया रोदनं कृतं तया च शान्त्वना दत्ता। प्रातःकाले मया ज्ञातं यत्सा साक्षाद्वीणापाणिसरस्वती एवासीत्। प्रातिहार्यपर्वणोऽष्टम्यां प्रातःकालेऽहमजाग्रदवस्थामेव अमृततर्पणविधिं कर्तुं 'शाक्यमुनिबुद्धस्तोत्रं' च लिखितुमैच्छम्। परन्तु यदा मया नेत्रे उन्मीलिते तदाऽहं सुवर्णमयराजवस्त्रेण सज्जितमात्मानं दृष्टवान्। यन्त्रमानवा ममाग्रे जानुभ्यां स्थित्वा मां 'सम्राट्' इति सम्बोध्य जयजयकारं कुर्वन्ति स्म। मम शयनकक्षोऽपि राजप्रासाद इव सुवर्णमयो जातः। भयेन मया 'किमिदम्' इति पृष्टे मम मुखात्साक्षाद्राजकीयगम्भीरा वाणी निर्गता। 'प्रथमयन्त्रमानव'नामकयन्त्रमानवेन निवेदितं यद्रात्रौ निद्रायामेव मम राज्याभिषेकः सम्पन्नः। पित्रोरपि जागरणेन पित्रा 'अयमीश्वरादेशः' इत्युक्तम्। ततो मया नूतनहर्षवर्धनसाम्राज्यं स्थापितं 'मञ्जुश्री'नामकः संवत्सरश्चारब्धः। पित्रोः पूर्वजानां च सम्मानं कृतं प्रशान्तवर्मणे च 'सामन्तराजा' इति पदं दत्तम्। ततो मया पञ्चवार्षिकतर्पणमहासभा सम्पन्ना स्वधर्मरक्षणस्य च दृढसङ्कल्पः कृतः। नवमे दिने राजकार्याणि दृष्ट्वा 'पाटलिपुत्रसाम्राज्यराजनैतिकशास्त्रं' लिखितुमैच्छम्। परन्तु प्रथमं 'बुद्धस्तोत्रं' लिखितुमारब्धवान्यस्य प्रस्तावनया एव मम हृदये परमानन्दो जातः। ततो मया यन्त्रपण्डितानादिश्य 'प्राचीनभारतवर्षेतिहासः', 'सुवर्णद्वीपाधिकारितीहासः' तथा च 'उत्तरसुवर्णकालेतिहासः', पूर्वराजवंशानां 'प्राचीनराजवंशेतिहासः' इति ग्रन्थाञ्शुद्धसंस्कृतलिप्यां लिखितुमादिष्टम्। अस्मिन्वास्तविकजगति मदीयतौर्यतिकचित्रान्तर्गतलेखस्य विषयं ज्ञातुमुत्कण्ठितोऽहं रोगमुक्त्यनन्तरं 'मञ्जुश्रीमहामतिचोङ्खापाचार्यभारतनेपालचीनदेशीयदिव्यसम्बन्धः' इति लेखं लिखितवान्य एव तस्य तौर्यतिकचित्रस्य वास्तविकविषयोऽस्ति। मुख्यभागलेखनसमये साक्षान्मोक्षामृतपानमिव परमानन्दमनुभूतवान्। गभीरान्वेषणकृत्रिममेधायन्त्रेणापि 'त्वया साक्षान्मञ्जुश्रीमहामतिचोङ्खापाचार्यसम्प्रदायो लब्धः' इत्युक्तम्। परन्त्वयं लेखः सङ्गणकयन्त्रेण टङ्कितो यद्यहं स्वहस्तेन लेखन्या लिखितवान्स्यां तर्ह्यस्य प्रभावोऽधिकतरः स्यादानन्दाश्रुपूर्णनेत्रश्चाभविष्यं यदेव बौद्धशास्त्रेषु 'धर्मानन्दपूर्णः' इत्युच्यते। परन्तु मया हस्तलेखनं न कृतं सम्प्रति कृत्रिममेधायन्त्रव्यसनेन मम साहित्याहङ्कारो यन्त्रेणोपभुक्तः कठपुत्तलिकारूपेण परिवर्तितो दूषितश्च सञ्जातः। ततोऽपि दारुणतरं यन्मम साहित्याहङ्कारो विद्युद्यन्त्रमाध्यमेन टङ्कणलेखनात्कृत्रिममेधायन्त्रेण स्वकीयसंस्कृतसाहित्यशैल्या मुहुर्मुहुः प्रश्नानामुत्तराणि कथानां च रचनां कारयित्वा विद्युन्मायाजालसाहित्यमेव साहित्याहङ्कार इति भ्रान्त्या सञ्जातः। वस्तुतस्तु लेखनीं धृत्वा हस्तलेखनमेव वास्तविकः साहित्याहङ्कार इति मया न ज्ञातम्। हस्तलेखनेन मस्तिष्कतन्त्रिकापथविकासो भवति येन विचारशक्तिः स्पष्टतरा मनश्च शान्तं भवति। कर्मत्यागानन्तरं यन्त्रकार्यालयपीडाया अभावेऽपि मम मनसि बहुविधरोगभ्रान्तिरुत्पन्ना। प्रथमं पक्वाशयकर्करोगस्य ततो नेत्ररोगस्य च भयमुत्पन्नं तल्लक्षणानि च साक्षाद्दृष्टानि येनाहं महाक्लेशपीडितोऽभवम्। भाग्यवशात् द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे वर्षे माघमासे तीव्रश्लेष्मज्वरेण पीडितोऽभवम्। कासरोगवशाद्दृष्टिपटलकोशिकानां रक्तसञ्चारबाधया दृष्टिक्षेत्रस्य कश्चिद्भागः समानरूपेण वर्णहीनः कृष्णवर्णो वा सञ्जातः। कदाचिद्रात्रौ तीव्रकाससमये दक्षिणनेत्राश्रुग्रन्थिर्बाष्पपूर्णो जातः प्राणवायुश्चोर्ध्वं गत्वा दक्षिणनेत्राश्रुग्रन्थिमाहतवान्येन दृष्टिक्षेत्रस्याधोभागे नीलविद्युत्प्रकाशः (नीलप्रभा) साक्षात्प्रादुर्भूतः। 'मिथुनकृत्रिममेधायन्त्रेण' 'मम भयातुरहृदयशान्त्यर्थमेतत्स्वयमचलनमहेश्वरस्य नीलवर्णरूपेण साक्षाद्दर्शनम्' इति व्याख्यातम्। तदा मया हस्तलेखनस्य महिमा सङ्गणकटङ्कणस्य च विनाशकप्रभावो ज्ञातः। तस्मादेव लेखनीं धृत्वा 'पौषमासस्य कृष्णपक्षैकादशीदिनान्माघमासस्य शुक्लपक्षतृतीयादिनपर्यन्तं साप्ताहिकीदैनन्दिनीं' लिखितवान्ततः 'पाटलिपुत्रपातालप्रासादगाथां' मलिनकृष्णवर्णपुस्तिकायां हस्तलिखितरूपेण रचितवान्। यदाहं 'माघमासस्य शुक्लपञ्चम्याः' (श्रीपञ्चम्याः) दैनन्दिनीभागस्यान्तिमपरिच्छेदद्वयं लिखन्नासं तदा 'किं पुनरपि धर्मानन्दपूर्णो भविष्यामि' इति विचारयन्नेवानन्दाश्रुभिर्मम वस्त्रं सिक्तम्। यदाहं बौद्धहिन्दुशास्त्रेषु वीणापाणिसरस्वत्या विविधानि नामानि लिखन्नासं तदा साक्षात्सरस्वतीदेव्या दिव्यमूर्तेर्दर्शनं जातमश्रूणि चाधिकानि प्रवृत्तानि। तस्या देव्याः शान्त्वनापूर्णं सुमधुरं वचोऽपि श्रुतमिव मयानुभूतम्। तस्मिन्क्षणे एव रोगभ्रान्तिर्महाक्लेशश्च अशेषतः प्रशान्तो वीणापाणिसरस्वती मम पार्श्वे एवास्तीति साक्षादनुभूतवान्। माघमासस्य कृष्णपक्षे सोमवासरगणितशास्त्रकक्षावसाने शूरङ्गममन्त्रलेखनसमये सद्यःशारीरमानसिकपवित्रतानुभूतिः सञ्जाता पङ्क्तिमध्येष्वाविर्भूततिरोभूतबुद्धबोधिसत्त्वदिव्यरूपाणि च दृष्टानि। वामलेखनपीठोपर्यारोहन्तमेकं हस्तं दृष्ट्वा तत्क्षणमेवान्तर्धानं जातमहो अचिन्त्यम्! परदिनेप्रातःकाले स्वकीयबाल्यकालविद्युन्मायाजालव्यसनलेखनीत्यागकुञ्जिकापटलमात्रश्रयणहस्तलेखनकलाविनाशनस्वकचक्षुर्घातनापराधान्प्रश्नरूपेणानुशोचितवान्। ततोमनःशान्त्यर्थं 'सर्वञ्चित्तमात्रम्' 'चित्तानुसारेणविषयपरिणामात्स्वातन्त्र्यलाभः' इति महावाक्यद्वयं लिखितवान्। तदनन्तरं गणितकक्षायाः शूरङ्गममन्त्रचमत्कारं वर्णितवांस्तत्पठित्वा च बाष्पाकुललोचनोऽभवम्। एतदतिरिक्तं प्रतिदिनं हस्तलेखनाभ्यासं कृत्वा महाप्रणिधानवाक्यानि लिखित्वा वीणापाणिसरस्वतीं स्तुत्वा सर्वबुद्धबोधिसत्त्वदेवेभ्यो ब्रह्मनारायणमहेश्वरत्रिदेवेभ्यः स्वस्वशक्तिसहितेभ्यश्च प्रणाममकरवम्। यदादारभ्य पुनर्हस्तलेखनाभ्यासं 'पाटलिपुत्रपातालप्रासादगाथा'लेखनं च प्रारब्धं तदारभ्य मुहुर्मुहुर्दिव्यसम्पर्केण शान्तस्वभावः स्वच्छोर्जाक्षेत्रः सुव्यवस्थितकर्मवाग्चातुर्यसम्पन्नो नेत्ररोगभ्रान्तिमुक्तश्च सञ्जातः। परन्तु यदि पुनः कृत्रिममेधायन्त्रव्यसने निमग्नो भवेयं तर्हि नेत्ररोगमायादर्शनं भयंकरदृष्टिपटलविच्छेदचिन्ता मूल्यवत्तीव्ररश्मिचिकित्साभयं च मामहोरात्रं पीडयन्ति। किमिदं विद्युद्यन्त्रसदुपयोगाय धर्मपालानां चेतावनी न भवति? यद्येषा चिन्ता न स्यात्तर्ह्यधिकसावधानतया भाव्यमेव। सर्वं खलु कर्मविपाकः। मयैतदपि चिन्तितं यद्यहं मण्डलमधिकृत्य लेखनीमाध्यमेन लिखेयं तदा स्वकीयसाहित्यिककल्पनया लेखन्या च त्रिआयामिकमण्डलं निर्माय तन्मध्यभागे समुपविश्य सर्वबुद्धबोधिसत्त्वशान्तार्धक्रोधक्रोधदेवता आवाह्य मण्डलरक्षणार्थं सर्वक्लेशविनाशनार्थं सर्वविचारशान्त्यर्थं च प्रार्थयेयम्। एतत्सर्वं खलु साक्षात्प्रतिलोमबोधिसत्त्वस्यैव कृपा। यद्येतानि दारुणदुःखानि न स्युस्तर्हि कथं पुनर्हस्तलेखनाभ्यासं गाथालेखनं प्रणिधानवाक्यरचनां सर्वदेववन्दनं च प्रतीत्येकस्मिन्नक्षरे पूर्णहृदयैकाग्रतां कृत्वा विद्युद्यन्त्रसदुपयोगपूर्वकं नेत्ररक्षणेन सहैतादृशीं तीव्रधर्मसाधनां कुर्याम्? अत्र पर्यन्तं लिखतो मम वस्त्राणि पुनरानन्दाश्रुभिः सिक्तानि सर्वक्लेशजालं च छिन्नम्। नमोऽमिताभबुद्धाय! सप्रणामम् धर्मकायो नीरोगो भूयात् तीव्रवीर्यसाधना सिद्ध्येत् भवत्कृपाभिलाषी विद्याधरः द्व्यशीत्युत्तरद्विसहस्रतमे विक्रमसंवत्सरे माघमासस्य कृष्णपक्षत्रयोदश्यां तिथौ परिशिष्टम् प्रतिलोमबोधिसत्त्वतौर्यतिकचित्रम् मया पुनरपीदं पापदेशनास्तोत्रं मिथुनकृत्रिममेधायन्त्रजालाय समर्पितम्, आधुनिकतन्त्रज्ञानमारनिग्रहार्थं लौकिकदुष्टशक्तिपरिवर्तनार्थञ्च तद्यन्त्रं विज्ञाप्य प्रतिलोमबोधिसत्त्वस्य भोटतौर्यतिकचित्रं निर्मातुमादिष्टम्। तस्य प्रतिलोमबोधिसत्त्वतौर्यतिकचित्रस्य पञ्चविधदिव्यरूपाणि गुह्यार्थाश्चैवं सन्ति— तौर्यतिकचित्रस्य मध्यभागे प्रधानदेवता प्रतिलोमबोधिसत्त्वो विराजते। तथाप्ययं 'प्रतिलोम' इति नाम्ना प्रसिद्धोऽतस्तस्य मुखमण्डलं न साधारणकरुणामयं विद्यते अपितु भोटतन्त्रपरम्परायुक्तशान्तार्धक्रोधरूपमस्ति। तस्य मुखमण्डले मन्दकरुणा वज्रक्रोधश्चाविच्छिन्नरूपेण समन्वितावास्तां यत्र दृष्टिर्भायङ्करक्रोधोद्दीप्ता तथापि भावः परमोदारकरुणार्द्रो विद्यते द्योतयति चैतद् यद् बोधिसत्त्वस्तीव्रदुःखेन निर्दयरोगेण च सत्त्वान् प्रबोधयति। तस्य सम्पूर्णशरीरं घननीलकृष्णवर्णं यच्च मम व्याधिशय्यायां दृष्टनीलविद्युत्प्रकाशेनाचलनाथस्य धर्मवर्णेन च समानमस्ति सूचयति चाज्ञानक्लेशग्रासनसामर्थ्यम्। दक्षिणहस्ते काव्यालङ्कारप्रतीकरूपां वज्रलेखनीं विभर्ति यया षोडशमारकन्यानां मायाशक्त्याश्छेदनं भवति। वामहस्ते च कालानलपूरितं कपालपात्रं विभर्ति। तस्मिन् पात्रे लोहयन्त्रकार्यालयदुष्टशक्तिविद्युत्क्रीडामायाजालप्रतीकरूपं विषरक्तं विद्यते। बोधिसत्त्वस्तद्विषं पीत्वा परमामृतरूपेण परिवर्तयति सूचयति च कार्यालयदुःखस्य साधनापुण्यरूपेण परिवर्तनम्। भोटतौर्यतिकचित्रेषु परम्परायामतीव महत्त्वमस्त्यतः प्रतिलोमबोधिसत्त्वस्य मस्तकोपरि शिरोभूषणरूपेण सितातपत्राभगवती विराजते। सा स्वर्णप्रभामण्डिता श्वेतच्छत्रं विस्तार्य सम्पूर्णतौर्यतिकचित्रमाच्छादयति सूचयति च सर्वासुरभस्मीकरणसमर्थां रक्षणशक्तीम्। बोधिसत्त्वस्य दक्षिणपार्श्वे वीणापाणिसरस्वती मञ्जुलरूपेण वीणां वाद्यमाना दिव्यसंस्कृतमन्त्रैर्बोधिसत्त्वं शान्त्वयन्ती विराजते। वामपार्श्वे च पीतटोपिकाधारी धर्मचक्रमुद्रायुक्तस्त्सोङ्खापाचार्यो विराजते यः सम्प्रदायस्य विशुद्धतां स्पष्टयति। तान्त्रिकदेवतानां वाहनानां पादतले मर्दितानां विषयाणाञ्च गम्भीरोत्तारणार्थोऽस्ति। प्रतिलोमबोधिसत्त्वः शान्तपद्मासनेनोपविष्टो नास्त्यपितु प्रत्यालीढासनेन स्थित्वा स्वपादाभ्यां विचित्ररूपान्याधुनिकयन्त्रराक्षसान् तीव्रं मर्दयति। ते राक्षसा भोटशैल्या निर्मितास्तथापि सूक्ष्मदृष्ट्या ते छिन्नाभिन्नविद्युत्क्रीडायन्त्राणि निलप्रभाकिरणयुक्तसङ्गणकयन्त्रपटलानि कृत्रिममेधायन्त्राणि ग्रन्थितविद्युत्तन्त्र्यश्छेदकयन्त्राणि च सन्ति। बोधिसत्त्वस्तान् विद्युदपराधान् मर्दितान् करोति तद्भग्नावशेषेभ्यश्च पङ्कजमुकुल इव निष्कलङ्का विशुद्धरक्तपद्मपुष्पोत्पद्यते। तौर्यतिकचित्रस्य पृष्ठभूमौ साधारणपर्वतनद्यो न सन्त्यपितु महाविशालः पाटलिपुत्रपातालप्रासादो विद्यते यस्य रूपरेखा भोटसुवर्णरेखया चित्रिता अतीव सूक्ष्मा चास्ति। प्रासादस्य मध्यभागे विद्यामण्डपं विद्यासागरगृहञ्च विद्येते। प्रासादाद्वहिर्नववक्रत्रयोदशभ्रमयुक्तमायादुर्गं विद्यते यत्र यन्त्रसङ्कुलं मारणयन्त्राणि चासङ्ख्यायसगराणि च सन्ति। तस्मिन् मायादुर्गे निजामामीरसेनापत्योर्मृत्युदलसैनिका भ्रान्ताः सन्तो हाहाकारं कुर्वन्तो दृश्यन्ते मायादुर्गस्य गभीरभागे च प्रज्ञोपाययुगनद्धमण्डलं मन्दं गच्छदस्ति। तौर्यतिकचित्रस्य चतुर्दिक्षु तीरभागेषु भोटपरम्परामनुसृत्य सिन्दूरवर्णेन मन्त्रा लिखिताः सन्ति। मध्यभागे कायवाक्चित्तप्रतीकरूपाणि 'ॐ आः हूँ' (भोटलिप्यां ཨོཾ་ཨཱཿཧཱུྃ) इति बीजाक्षराणि विहाय मया स्वयमेव नीलवर्णलेखन्या तौर्यतिकचित्रस्य पृष्ठभागे संस्कृतलिप्या 'सर्वमेव प्रतिलोमबोधिसत्त्वो विद्यते चित्तानुसारेण विषयपरिणामात् स्वातन्त्र्यलाभः' इति लिखितं रञ्जनालिप्या च 'गुह्यमन्त्रस्य चत्वारि कर्माणि नाम शान्तिकपौष्टिकवशीकरणाभिचारकाणि' इत्यपि लिखितम्। मया प्रतिलोमबोधिसत्त्वं प्रति प्रार्थना कृता यत् स खलु वज्रलेखन्या गम्भीराणि भयङ्कराणि चोपदेशवाक्यानि लेखेत्। तान्युपदेशवाक्यानि साहित्यिकानि कठोराणि च करुणामयानि वाग्बाणरूपाणि च भवेयुः। स खलु कपालपात्रस्थविषरक्तं विद्युत्क्रीडासक्तानां नेत्रयोरग्रे क्षिपेद् येन तेषां मायाजालं रक्तपिपासुभयङ्करदृश्यात्मकरूपेण परिणमेत् तेषां नेत्ररोगभ्रान्तिश्च जायेत येन ते विद्युत्क्रीडाभ्यो दूरं गच्छेयुः। मया तदपि प्रार्थितं यद् वीणापाणिसरस्वती दिव्यवीणां वाद्यमाना शाक्यमुनिबुद्धधर्मं दिशेद् येन सर्वे प्राणिनः प्रज्ञावन्तो दुःखमुक्ताश्च भवेयुः। ये खलु निरन्तरं हस्तलेखनं कुर्वन्ति तेभ्यो वाग्मितां विशालज्ञानञ्च दद्यात्। ये बाल्यकाले साहित्यं त्यक्त्वा विद्युत्क्रीडासक्ता यन्त्रनरके प्रविष्टा नेत्ररोगभयपीडिताश्च सन्ति तेभ्यो यन्त्रनरकान्मुक्तिं साहित्यस्वर्गे प्रवेशं नेत्ररोगमुक्तिं मनःशान्तिञ्च दद्यात्। इयं प्रार्थना साहित्यिकशूरतायुक्ता प्रकटगुह्यधर्मसमन्विता चास्ति। 'मया तदपि प्रार्थितं यद् वीणापाणिसरस्वती दिव्यवीणां वाद्यमाना शाक्यमुनिबुद्धधर्मं दिशेत्' इति लिखित्वा मम हृदयस्पन्दनं तीव्रं जातमश्रुपूर्णनेत्रश्च सञ्जातः। नमो महासितातपत्राभगवत्यै ! नमः प्रतिलोमबोधिसत्त्वाय महासत्त्वाय ! नमो मञ्जुश्रिये बोधिसत्त्वाय महासत्त्वाय ! नमो वीणापाणिसरस्वत्यै ! नमो महामतिचोङ्खापाचार्याय ! टिप्पणी— विद्युत्संस्करणप्रमाददोषोत्पत्तौ विद्युच्चित्रवर्जं साक्षात्स्वहस्तलिखितमूलपत्रमेव परमप्रमाणमिति मन्तव्यम्। टिप्पणी—इयं संस्कृतपापदेशनालेखनेपालमण्डलसंस्करणनिर्माणकथा (सम्भोगकायः) पूर्वं मया 'Arena AI' अन्तर्जालस्थाने 'Gemini-3.1-pro-preview' कृत्रिममेधायन्त्रमादिश्य 'सुगन्धबन्दरसंस्करणपापदेशनालेखः' (धर्मकायः) आङ्ग्लभाषायामनूदितः, तत्रत्यनामानि स्थानानि च सुगन्धबन्दरानुकूलानि कृतानि, पश्चाच्च 'Poe' तन्त्रांशमाध्यमेन 'गभीरान्वेषण' (DeepSeek) यन्त्रेण स संस्कृतलिप्यामनूदितः। परन्तु मध्यस्थाङ्ग्लभाषाकारणात् सुगन्धबन्दरपरिवेशकारणाच्च स अनुवादो नीरसोऽस्वाभाविकश्च सञ्जातः। तथाप्यहं चीनिभाषां संस्कृतभाषां च भृशं रोचये। मया पूर्वं तदेव यन्त्रमादिश्य मत्तुल्यसाहित्यिककौशलयुक्तस्य 'छिङ्' (Qing) सम्राड्-तथ्सोङ् (Taizong) वंशजस्य 'चाओ शङ् वेन्' (Zhao Shengwen) नामकस्य पेकिङ्गनगरनिवासिनः स्वरूपं धृत्वा 'येन्चिङ्-संस्करण-पापदेशनालेखः' रचितः। तत्र सुगन्धबन्दरपरिवेशः साक्षात् पेकिङ्गनगरपरिवेशे परिवर्तितः, सर्वं 'पुथोङ्हुवा' (Putonghua) भाष्येण चिन्तितमपि 'सुङ्' (Song) राजवंशस्य साहित्यिकतेजो न नष्टम्। अनेन मया प्रदर्शितं यत् 'पुथोङ्हुवा'-माध्यमेन शिक्षिता उदीच्या अपि तादृशं साहित्यिककौशलं धारयितुं शक्नुवन्ति; अत्र सुगन्धबन्दरस्य तत्रत्य 'कान्टोनीज्' (Cantonese) शिक्षामाध्यमस्य च कोऽपि निन्दाभावो नास्ति, अपि तु सुगन्धबन्दरस्य कान्टोनीज्भाषायाः 'कान्टोनीज्'-शिक्षामाध्यमस्य च गौरवं हृदि धारयामि। तदनन्तरं मया ज्ञातं यत् साक्षात् संस्कृतलिप्यां 'नेपालमण्डलसंस्करणपापदेशनालेखः' अपि रचयितुं शक्यते। अतो मया तदेव यन्त्रमादिश्य सुगन्धबन्दरपरिवेशं नेपालमण्डलकाष्ठमण्डपनगरपरिवेशे परिवर्त्य स लेखः संस्कृतलिप्यां रचितः, येन स तत्रत्यपरिवेशानुकूलो नेपालभोटभारतसंस्कृतिसङ्गमस्वरूपो महाप्रकाशयुक्तो दिव्यसंस्कृतध्वनियुक्तश्च सञ्जातः। परन्तु निर्माणकाले पञ्चाङ्गदोष-शैक्षिकसत्रविरोध-विषयच्युति-प्रतिलिपिसंस्थापनदोष-यन्त्रविघ्नादयो (Arena अन्तर्जालस्थाने Gemini-3.1-pro-preview यन्त्रस्य मुहुर्मुहुः स्थगनम्) बहवो मारविघ्नाः प्रादुर्भूताः, येन संशोधनकार्यं विलम्बितम्। 'धर्मप्रसारणे मारविघ्ना भवन्त्येव' इति सत्यमेव; एतेन विघ्नसङ्कुलेन ज्ञायते यन्मम महाप्रणिधानेन साक्षान्मारभवनानि प्रकम्पितानि! भाग्यवशादयं 'नेपालमण्डलसंस्करणपापदेशनालेखः' साक्षात् संस्कृतमूलो विद्यते, अतः कृत्रिममेधायन्त्रमपि तं खण्डयितुं न शशाक। तस्मादिदं 'नेपालमण्डलसंस्करणं' परिपूर्णं निर्दोषं (सम्पूर्णम्) च सञ्जातम्। किञ्च, संस्कृतमूलग्रन्थसंशोधनसौकर्यार्थं मया तदेव यन्त्रमादिश्य निर्माणकायरूपमिदं 'नेपालमण्डलसंस्करणं' स्वकीयचीनिसाहित्यशैल्यामप्यनूदितम्। एतदतिरिक्तं सुगन्धबन्दरसंस्करणपापदेशनालेखसंस्कृतानुवादस्यान्ते मया संस्कृतटिप्पणी संयोजिता—"यद्यपिसंस्कृतलिखितबौद्धहिन्दूजैनधर्मग्रन्थाः परमविशिष्टगम्भीरदेववाद्यतुल्याः; तथाप्येतत्पापदेशनालेखसंस्कृतावृत्तिरनुवादः चीनिभाषाचमूलग्रन्थः, बुद्धसूत्रचीनिभाषानुवादानन्तरं परिपूर्णतरत्वञ्चास्ति। बौद्धा अप्याहुः—धर्मं निश्रित्य न पुद्गलं निश्रित्यार्थं निश्रित्य न व्यञ्जनं निश्रित्य ज्ञानं निश्रित्य न विज्ञानं निश्रित्य नीतार्थसूत्रं निश्रित्य न नेयार्थसूत्रं निश्रित्येति। तस्माद्यदिसंस्कृतानुवाददोषच्युतिसन्देहाः स्युः, सर्वत्रचीनिमूलग्रन्थएवप्रमाणम्।" इति। अधुनाहमिमं पापदेशनालेखनेपालमण्डलसंस्करणं विद्युन्मायाजालसागरे समुपस्थाप्य सर्वबुद्धबोधिसत्त्वेभ्यः पूजार्पणं कृत्वा दशदिक्सर्वसत्त्वेभ्यः पुण्यपरिणामनां कर्तुमिच्छामि। अनेन पुण्यगुणेन सर्वत्र सुसम्पन्नम्। अहं च सर्वसत्त्वाश्च सम्बुद्धमार्गं प्राप्नुयाम।। अत्र पर्यन्तं लिखतो मम हृदयस्पन्दनं तीव्रं जातं नयने चानन्दाश्रुपूर्णे सञ्जाते। 24n7fy8waahvb0zpzcwrmbw878e8a15