विकिस्रोतः sawikisource https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D MediaWiki 1.47.0-wmf.7 first-letter माध्यमम् विशेषः सम्भाषणम् सदस्यः सदस्यसम्भाषणम् विकिस्रोतः विकिस्रोतःसम्भाषणम् सञ्चिका सञ्चिकासम्भाषणम् मीडियाविकि मीडियाविकिसम्भाषणम् फलकम् फलकसम्भाषणम् साहाय्यम् साहाय्यसम्भाषणम् वर्गः वर्गसम्भाषणम् प्रवेशद्वारम् प्रवेशद्वारसम्भाषणम् लेखकः लेखकसम्भाषणम् पृष्ठम् पृष्ठसम्भाषणम् अनुक्रमणिका अनुक्रमणिकासम्भाषणम् श्रव्यम् श्रव्यसम्भाषणम् TimedText TimedText talk पटलम् पटलसम्भाषणम् Event Event talk पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१२ 104 36988 416942 416707 2026-06-20T13:55:41Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{center|{{bold|वैशेषिक दर्शन}}}} {{center|{{bold|प्रथम अध्याय,प्रथमआह्निक}}}} संगप्ति-शास्त्रारम्भ की प्रतिज्ञा-<br/> {{gap}}{{bold|अथातो धर्म व्याख्यास्यामः।१।}}<br/> अर्थ-अब,यहां से, हम धर्म का व्याख्यान करेंगे।<br/> {{bold|व्याख्यान}}-‘अथ’ आरम्भ का द्योतक होता है, जैसा कि ‘इति' समाप्ति का, इसलिए ग्रन्थारम्भ में 'अथ' देते हैं।<br/> {{gap}}‘अतः’ यहाँ से। इस से आगे, अर्थात् अगले ग्रन्थ में। यद्यपि, इस शास्त्र में निरूपण तो बाहुल्य से पदार्थों का ही है, तथापि पदार्थों का तत्त्वज्ञान धर्म से ही उत्पन्न होता है,(देखों सूत्र ४) इस लिए धर्म की ही प्रधानता से, उसी के निरूपण की प्रतिज्ञा की है?{{nop}} {{gap}}सङ्गति-धर्म कहते किसको है, और उससे फल क्या मिलता है?<br/> {{gap}}{{bold|यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः । २ ।}}<br/> {{gap}}अर्थ-जिस से यथार्थ उन्नति और परम कल्याण की सिद्धि होती है, वह धर्म है* {{rule}} *अभ्युदय=तत्त्वज्ञान, उस के द्वारा मोक्ष की सिद्धि जिस से होती है, वह धर्म है (उदयनाचार्य)<noinclude><references/></noinclude> 40ljwfocd74fspa3q2kdl15o52s6bds पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१३ 104 36989 416943 416510 2026-06-20T13:56:14Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416943 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ३''' ।|right='''११'''}} {{gap}}'व्या०-आत्मबल यथार्थ उन्नाति है, और मोक्ष परम कल्याण है। धर्म के ये दोनों फल होते हैं, धर्म से आत्मबल बढ़ता है । आत्मबल से लोक परलोक दोनों सुखदायी बन जाते हैं। आत्मबल के साथ सम्पदाएं भागी चली आती हैं, और यदि कोई विपद् भी आ जाती है, तो आत्मबल उस को भी सम्पद् ही बनालेता है, क्योंकि आत्मबल वाला विपद् में भी सम्पद् के समान ही सन्तुष्ट रहता है,प्रत्युत विपद् उस के आत्मबल को और बढ़ादेती है। अतएव आत्मबल ही मनुष्य की यथार्थ उन्नति है। और यही परलोक में साथ जाकर उच्च जन्म और स्वर्ग का हेतु होता है। और फिर यह धर्म ही है, जो हृदय को शुद्ध बनाता है, जिससे आत्म का तत्त्वज्ञान हो कर मोक्ष मिलता है।{{nop}} {{gap}}इस प्रकार धर्म अभ्युदय का तो साक्षात् कारण है, और मोक्ष का तत्त्वज्ञान द्वारा कारण है।<br/> {{gap}}सङ्गति-ऐसे धर्म का प्रतिपादक शास्त्र और उस की प्रमाणता<br/> {{gap}}{{bold|तद्वचनादाम्नायस्य प्रामण्यम् । ३ ।}}<br/> {{gap}}अर्थ- उस के प्रतिपादन से वेद की प्रमाणता (है)* {{rule}} *'तत्' शब्दपूर्व का परामर्शक होता है,पर प्रसिद्ध (=प्रसिद्धि सिद्ध) अपूर्वोक्त का भी परामर्शक होता है, जैसे ‘तदप्रामाण्यमनृतव्याघात पुनरुक्तदोपम्यः' (न्या) में 'तत्' शब्द पूर्व न कहे भी वेद का परामर्शक है। इसी प्रकार यहां 'तत्' शब्द अपूर्वोक्त भी ईश्वर का परामर्शक है। तब अर्थ यह होगा-उस जगत्प्रसिद्ध ईश्वर ने प्रतिपादन किया है, इस लिए वेद का प्रामाण्य है। सो ईश्वर का वचन होने से वेद का प्रामाण्य निर्बाध सिद्ध होते हुए वेदप्रमाणक धर्म व्याख्यान के योग्य है, यह भाव है (उदनाचार्य, और कई अन्य व्याख्याकार)<noinclude><references/></noinclude> dou2bg3bf97vb67x85ddnvac0m221e0 पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१४ 104 36990 416944 416743 2026-06-20T13:56:47Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|{{bold|१२}}|{{bold|वैशेषिक-दर्शन ।}}|}} {{gap}}व्या०-धर्म का जो लक्षण पूर्व किया है, कि ‘याथर्थ उन्नति और मोक्ष की सिद्धि जिस से हो वह धर्म है' वैसे धर्म के प्रतिपादन करने से धर्म के विषय में वेद को प्रमाण माना जाता है, क्योंकि जो जिस विषय में प्रामाणिक अर्थ का प्रतिपादन करता है, वही उस विषय में प्रमाण होता है।{{nop}} {{gap}}संगति-लक्षण और प्रमाण से धर्म की सिद्धि करके, धर्मे से मोक्ष की सिद्धि में वैशेषिक शास्त्र की उपयोगिता दिखलाते हैं-<br/> {{gap}}{{bold|धर्म विशेषप्रसूताद् द्रव्यगुण गुणकर्म सामान्य विशेष समवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निः श्रेयसम् । ४ ।}}<br/> {{gap}}अर्थ-धर्म विशेष से उत्पन्न हुआ जो, द्रव्य, गुण, कर्म,सामान्य, विशेष और समवाय (इतने) पदार्थो का साधर्म्य और वैधर्म्य सें तत्त्वज्ञान,* उस से मोक्ष होता है ।{{nop}} {{gap}}व्या०-इस जन्म वा पूर्व जन्म में किये पुण्य कर्म से द्रव्यादि पदार्थों का तत्त्वज्ञान होता है, तब मनुष्य अपने स्वरूप को शरीर से अलग साक्षात् करके बन्धन से मुक्त हो जाता है ।{{nop}} {{gap}}धर्म, धर्मी, साधर्म्य, वैधर्म्य-जिस का स्वरूप किसी दूसरे<br/> {{rule}} *साधर्म्य=समान धर्म=सांझा धर्म, और वैधर्म्य=विरुद्ध धर्म अर्थात् इस पदार्थ का यह २धर्म तो उस २ पदार्थ के साथ मिलता है, और यह इस का अपना अलग धर्म है, दूसरे किसी के साथ नहीं मिलता, इस प्रकार हरएक पदार्थ का जब पूरा ज्ञान हो जाय तब मोक्ष होता है।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude> mix4p571kvdf8lq3f0qidiu3oepqhg7 पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१५ 104 36991 416945 416744 2026-06-20T13:57:32Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416945 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ३''' ।|right='''१३'''}} के आश्रित प्रतीत हो, उसको धर्म कहते हैं, और जो उसका आश्रय है, उसको धर्म कहते हैं। गन्ध-धर्म है, क्योंकि वह पुष्पके आश्रित प्रतीत होता है, पुष्पधर्मी है, क्योंकि गन्ध उस के आश्रय है। दौड़ना धर्म है, क्योंकि वह घोड़े के आश्रित प्रतीत होता है, घोड़ा धर्मी है, क्योंकि वह दौड़ का आश्रय है। गन्ध में भी-गन्धपना धर्म है, क्योंकि वह गन्ध मे प्रतीत होता है, गन्ध धर्मी है, क्योंकि उसमें गन्धपन प्रतीत होता है । सो गन्ध पुष्प का धर्म है, पर गन्धपन को धर्मी भी है। इसी प्रकार सर्वत्र धर्मधर्मिभाव जानना । जो अनेकों का सांझा धर्म हो; उस को साधर्म्य वा समान धर्म कहते हैं, जैसें गन्ध पुष्प और इतर का साधर्म्य=समान धर्म है। और जो अपना विषेश धर्म हो, उस को वैधर्म्य वा विशेष धर्म वा विरुद्ध धर्म कहते है, जैसे पंखड़ियां पुष्प का इतर से वैधर्म्य है, और द्रवत्व इतरं का पुष्प से वैधर्म्य है। इस प्रकार साधर्म्य और वैधर्म्य द्वारा जब समस्त पदार्थो का तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब पुरुष मुक्त होता है। इसलिए इस शास्त्र में समस्तपदार्थो और उनके धर्मो का निरूपण आरम्भ करत हैं ।{{nop}} {{gap}}यहां छः पदार्थो का कथन भाव पदार्थो कें आभिप्रायसे है, वस्तुतः अभाव भी एक अलग पदार्थ के रूप में मुनि को अभिप्रेत हैं, अतएव 'कारणाभावात् कार्याभावः' (१। २ । १ ।) और 'क्रियागुणव्यपदेशाभावात्” प्रागसत्' (९ । १ । १ ) इत्यादि सूत्रों की असङ्गति नहीं । किन्तु अभाव का निरुपण<br/><noinclude><references/></noinclude> rrsnr6isfqtvzwecuau8jv3rcymaxvm पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१६ 104 36992 416946 416745 2026-06-20T13:57:47Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|left='''१४'''|center='''वैशेषिक-दर्शन ।'''}} प्रतियोगि* निरूपण के अधीन होता है, इस लिए उस का अलग उद्देश नहीं किया ।<br/> {{gap}}पदार्थों की शिक्षा देने के तीन क्रम हैं-उद्देश, लक्षण और परीक्षा । बतलाने योग्य पदार्थ का निरा नाम लेना उद्देश है, जैसे यहां द्रव्य, गुण इत्यादि नाम लिए हैं, यह पदार्थों का उद्देश है । जिस का नाम लिया गया है, उस को उद्दिष्ट कहते हैं, जैसे यहां द्रव्य, गुण । असाधारण धर्म लक्षण होता है, जैसे उष्ण स्पर्श तेज का, क्योंकि उष्ण स्पर्श तेज का असाधारण धर्म है, बिना तेज के कहीं नहीं पाया जाता, पत्थर और पानी आदि जब गर्म होते हैं, तो वे तेज के संयोग से ही होते हैं, स्वत:उन में गर्मी नहीं। वहगर्मी तेज की ही होती है, इसलिए उष्ण स्पर्श तेज का असाधारण धर्म है, अतएव यह तेज का लक्षण है। जिस का लक्षण हो उस को लक्ष्य कहते हैं, और जब यह जितलाना हो, कि इस का लक्षण हो चुका है, तो उस को लक्षित कहते हैं। लक्षित का यह लक्षण बन सकता है वा नहीं, इस विचार का नाम परीक्षा है, परीक्षा के योग्य को<br/> {{rule}} * ‘यस्याभाव. स प्रतियोगी' जिस का अभाव हो, वही अभाव का प्रतियोगी होता है। जैसे नीलाभाव का प्रतियोगी नील है, नील और नीलाभाव में से नील के ही जानने की आवश्यकता है, जो नील को जानता है, वह, 'यहां नील नहीं, वा यह नील नहीं।' इस बात को अपने आप जान लेता है। और जो नील को नहीं जानता, उस को 'यहाँ नील नहीं, वा यह नील नहीं' ज्ञान भी नहीं हो सकता, अतएव अभाव का निरूपण प्रतियोगिनिरूपण के अधीन है।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude> tf33c0rkxpx64dvmx73g17rd6x8p1au पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१७ 104 36993 416947 416709 2026-06-20T13:58:32Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ३''' ।|right='''१५'''}} परीक्ष्य कहते हैं, और जब परीक्षा में पूरा उतर जाय, तो उस को परीक्षित कहते हैं।<br/> {{gap}}उद्देश के क्रम में शिक्षा का सरल मार्ग अवलम्बन किया जाता है, आगे लक्षण का क्रम उद्देश के क्रम से होता है, और परीक्षा का क्रम लक्षण के क्रम से होता है। कभी २ शिक्षा की सरलता के लिए आगा पीछा भी कर दिया जाता है।{{nop}} {{gap}}यहां पदार्थो के उद्देशक्रम में सब से पहले द्रव्य इसलिए कहे, कि वे ही मुख्य धर्मी हैं। उन से पीछे गुण, क्योंकि गुण सब द्रव्यों में पाए जाते हैं। उन से पीछे कर्म, क्योंकि कर्म भी द्रव्यों में ही रहते हैं।पीछे उन में समान विशेष प्रतीति के नियामक सामान्य विशेष । पीछे समवाय, अर्थात् धर्म धर्मी का सम्बन्ध, क्योंकि यह सब का धर्म है।{{nop}} {{gap}}‘पदार्थ’ यह यौगिक नाम है,'पदस्य अर्थः,पदार्थः', पद का अर्थ पदार्थ, अर्थात् जिस का कोई नाम है, सो 'अभिधेयत्व' किसी पदका वाच्य होना यही पदार्थ का सामान्य लक्षण हुआ।{{nop}} {{gap}}सङ्गति-उद्देश क्रम के अनुसार क्रमशः द्रव्य गुण कर्म का विभाग* कहते हैं-<br/> {{gap}}{{bold|पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि । ५ ।}}<br/> {{rule}} * विभाग भी उद्देश ही है। क्योंकि विभाग में भी नाम ही गिनाए जाते हैं। पहले पदार्थों का उद्देश था, अब ये पदार्थों में आए द्रव्य का विशेष उद्देश है। इसी प्रकार आगे गुण कर्म का।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude> dxj06q6gqpyloi0h6zklba0hg8w0858 पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१८ 104 36994 416948 416710 2026-06-20T13:58:54Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|left='''१६'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}} {{gap}}अर्थ-पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, मन, ये (९) द्रव्य हैं।<br/> {{gap}}क्रमशः-सूक्ष्म होने से पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश क्रमशः कहे । पीछे लोकप्रसिद्ध काल और दिशा । अनन्तर चेतन आत्मा, और आत्मा के साथ नियत रहने से पीछे मन ।{{nop}} {{gap}}प्रश्न-तम (अन्धकार) भी तो एक द्रव्य है, क्योंकि-गुण क्रिया-वाला द्रव्य होता है। और तम-काला होता है, यह तम में गुण है, और चलता है, यह उस में क्रिया है। और जो ९ द्रव्य ऊपर कहे हैं, उन के अन्दर यह आ सकता नहीं, क्योकि वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, मन, तो रूपवाले नहीं, और तम रूपवाला होता है, इसलिए इन के अन्तर्गत नहीं, रहे पृथिवी, जल, तेज, उन को हम आंखों से तब देखते हैं। जब वे प्रकाश से युक्त हों। और तम उलटा तब दीखता है, जब प्रकाश न हो, इसलिए यह पृथिवी जल तेज के अन्तर्गत भी नहीं, अतएव यह एक अलग ही दसवां द्रव्य सिद्ध होता है।{{nop}} {{gap}}उत्तर-प्रकाश का अभाव ही तम है, और कुछ नहीं। उस में क्रिया की प्रतीति भ्रान्ति है। जब प्रदीप लेकर चलते हैं, तो ज्यों २ प्रकाश आगे २ बढ़ता जाता और पीछे २ से हटता आता है, त्यों २ तम आगे २ भागता जाता और पीछे २ दौड़ता आता प्रतीत होता है। वस्तुतः वह दौड़ प्रकाश की ही है, प्रकाश के होते तम मिट जाता है, और प्रकाश के हटते तम होता-आता है। इस प्रकार क्रिया उस में भूल से प्रतीत होती है । रूप की प्रतीति भी भ्रान्ति है, रूप को नेत्र तभी देखते हैं,<br/><noinclude><references/></noinclude> ri0wccvv0jhikq9szwrbc5984tha22x पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२० 104 36996 416951 416712 2026-06-20T14:04:03Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|left='''१८'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}} {{gap}}बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, और प्रयत्न ये आत्मा के गुण हैं। गुरुत्व (भार) भारी वस्तुओं का। द्रवत्व (बहने का गुण) बहती हुई वस्तुओं का । संस्कार-तीन प्रकार का है-भावना-स्मृति कराने वाला संस्कार, आत्मा का। वेग, चलने वाले द्रव्यों का। और स्थिति स्थापक (पहली अवस्था में लाने वाला) पृथिवी आदि का । धर्म अधर्म आत्मा के और शब्द आकाश का गुण है।{{nop}} {{gap}}{{bold|उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि । ७ ।}} {{gap}}उत्क्षेपण (ऊपर फैंकना) अवक्षेपण (नीचे फैकना) आकुञ्नचन (सकोड़ना) प्रसारण (फैलाना) और गमन ये(५) कर्म हैं।{{nop}} {{gap}}व्या-कर्म, क्रिया ( Action) को कहते हैं । यह प्रत्यक्ष सिद्ध है। कर्म द्रव्य में ही रहता है, गुण में नही। जब घोड़ा दौड़ता है, तो वह कर्म घोड़े में हुआ है, उस के रंग में कोई कर्म नहीं हुआ । यदि रंग में भी अलग कर्म होता, तो रंग घोड़े से अलग भी हो जाता, वा वेग की दौड़ में कभी न कभी कुछ आगे पीछे होता। ये कर्म पांच ही प्रकार के हैं, उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण और गमन ।{{nop}} {{gap}}प्रश्न-कर्म तो और भी बहुत हैं, जैसे हिलना, डोलना, घूमना, फिरना, बहना, जलना, उड़ना, इत्यादि ।{{nop}} {{gap}}उत्तर-ये सब कर्म गतिविशेष है, इस लिए गमन के ही अन्तर्गत हैं, अलग नहीं।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude> hhwmk5lcj1g1oayl77oyp3if9m8omo5 पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२१ 104 36997 416952 416714 2026-06-20T14:05:08Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416952 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''१९'''}} प्रश्न-इस प्रकार तो उत्क्षेपण आदि भी गतिविशेष होने से गमन के अन्तर्गत हो सकते हैं, फिर ये भी अलग क्यों कहे ।{{nop}} {{gap}}उत्तर-हो तो सकते हैं, किन्तु लोक में गमन का प्रयोग वहीं होता है, जहां वस्तु में अपनी गति प्रतीत हो । उत्क्षेपण, अवक्षेपण,आकुञ्चन और प्रसारण बलात् कराए गए प्रतीत होते हैं, इसलिए ये गमन से भिन्न प्रकार के कर्म प्रतीत होते हैं। इसी दृष्टि मे ये अलग कहे हैं अतएव बलात् चालन की दृष्टि को छोड कर जब केवल उन के चलन पर दृष्टि होगी, तो उन का चलन गतिरूप में प्रतीत होता हुआ गमन के ही अन्तर्गत होगा।{{nop}} {{gap}}संगति-द्रव्य गुण कर्म का विभाग दिखला कर, उन के सांझे धर्म दिखलाते है ।<br/> {{gap}}{{bold|सदनित्यं द्रव्यवत् कार्यं कारणं सामान्यविशेषवदिति द्रव्यगुणकर्मणा मविशेषः । ८ ।}}<br/> {{gap}}सत्, अनित्य, द्रव्य वाला, कार्य, कारण, सामान्यविशेष वाला, यह (बात) द्रव्य गुण और कर्म में एक जैसी है।<br/> व्या-द्रव्य गुण कर्म तीनो सत् हैं, अपनी २ सत्ता, कार्य करने का सामर्थ्य, रखते हैं। अनित्य भी हैं, अर्थात् नाशवान् हैं, जो उत्पन्न हुआ है, वह अवश्य एक दिन नाश होगा, लोक लोकान्तर और उन में उत्पन्न द्रव्यों (वस्तुओं ) का नाश होता रहता है, जब द्रव्य नाश होते हैं, नो उन के गुण भी नाश होते हैं, और कर्म तो हरएक द्रव्य के स्थिति काल में ही कई उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं ।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude> sk04ii158a90rx00d87khydu4f5ifmv पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२२ 104 36998 416957 416715 2026-06-20T14:23:34Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416957 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{rh|left='''२०'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}} वैशेषिक दर्शन । प्रश्न-परमाणु आदि तो नित्य हैं, नाशवान् नहीं, और जल आदि के परमाणुओं में जो रूप रस आदि गुण हैं, वे भी नाशवान् नही, नित्य हैं, तप नाशावान् यह सारे द्रव्यों और गुणो का सांझा धर्म कैसे हुआ । उत्तर-यहां यह आभिमाय नहीं, कि हरएक द्रव्य और हर एक गुण का यह धर्म है। अभिप्राय यह है, कि यह धर्म नाश) द्रव्यों में भी पाया जाता है,गुणों मे भी पाया जाता है।द्रव्य,गुण, कर्म में से किसी एक का विशेष धर्म नहीं,किन्तु तनों का आविशेष धर्म है। साधम्र्य निरूपण में सर्वत्र यही अभिप्राय है। यह दूसरी वात है, कि वह सव में पाया जाए, वा कुछ में पाया जाए। जैसे पूर्वोक्त सत्ता घर्म तो सारे द्रव्यों सारे गुणों और सारे ही कमों में पाया जाता है। पर यह नाश (धर्म) उन्हीं द्रव्यों और उन्हीं गुणों में पाया जाता है, जो उत्पत्ति वाले हैं, पर पाया तो जाता है, द्रव्यों में भी और गुणों में भी, हां कर्म सब के सव उत्पत्ति वाले ही होते हैं, इस लिए कम में-सभी में-पाया जाता है । इसी तरह आगे भी जानना । द्रव्यव-द्रव्यं विद्यते आधारतया यस्य, तत् द्रव्यवव । द्रव्य वाला, अर्थात द्रव्य के सहारे पर स्थित । परमाणु आदि नित्य द्रव्यों से अतिरिक्त शेष सभी द्रव्य अपने कारण द्रव्य के सहारे पर रहते हैं, गुण सारे और कर्म भी सारे द्रव्य के सहारें रहते हैं। कार्य, उत्पत्ति वाले ।'अनित्य द्रव्य सभी उत्पत्ति वाले हैं, उन के गुण भी उत्पत्ति वाले हैं, और कर्म सभी उत्पत्ति वाले हैं। २०<noinclude><references/></noinclude> ef7gcv5xaafk4zy868f76jczmnua278 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५० 104 95918 416931 368787 2026-06-20T13:34:35Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्द्योतः|right=१५}} {{bold|{{rule}}}}</noinclude>{{center|'''लोचनम्'''}} र्थशोभाकारित्वालोकशास्त्रातिरिक्तसुन्दरशब्दार्थमयस्य काव्यस्य न शोभाहेतुः कश्चिदन्योऽस्ति योऽस्माभिर्न गणित इत्येकः प्रकारः, यो वा न गणितः स शोभाकार्येव न भवतीति द्वितीयः, अथ शोभाकारी भवति तर्ह्यस्मदुक्त एव गुणे वालङ्कारे वान्तर्भवति, नामान्तरकरणे तु कियदिदं पाण्डित्यम् । अथाप्युक्तेषु गुणेष्वलङ्कारेषु वा नान्तर्भावः, तथापि किंचिद्विशेषलेशमाश्रित्य नामान्तरकरणमुपमाविच्छित्तिप्रकाराणामसंख्यत्वात् । तथापि गुणा- लङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाव एव । तावन्मात्रेण च किं कृतम् ? अन्यस्यापि वैचित्र्यस्य शक्योत्प्रेक्षत्वात् । चिरन्तनैर्हि भरतमुनिप्रभृतिभिर्यमकोपमे एव शब्दार्थालङ्कारत्वेनेष्टे, तत्प्रपञ्चदिकप्रदर्शनं त्वन्यैरलङ्कारकारैः कृतम् । तद्यथा-'कर्मण्यण्' इत्यत्र कुम्भकारायुदाहरणं श्रुत्वा स्वयं नगरकारादिशब्दा उत्प्रेक्ष्यन्ते, तावता क आत्मनि बहुमानः । एवं- {{center|'''बालप्रिया'''}} ब्दार्थगुणाद्यन्यतमत्वमिति व्याप्तिरनेन दर्शिता। '''लोके'''ति । लोकशास्त्रशब्दौ लौकिकवैदिकशब्दपरौ । '''अन्यः''' गुणालङ्कारेभ्योऽन्यः, कश्चिन्नास्तीति सम्बन्धः। गुणाद्यतिरिक्तः काव्यशोभाहेतुः कश्चिन्नास्तीति प्रतिज्ञा, प्रमाणाभावादिति हेतुरत्र बोध्यः। नन्वियं प्रतिज्ञा न युक्ता, गुणाद्यतिरिक्तस्य शोभाहेतोस्सिद्धौ तन्निषेधायोगादसिद्धौ निषेधस्याशक्यत्वाच्चेत्यत आह-'''योऽस्माभिरि'''त्यादि । भवतामभिमत इति चार्थात्सिद्धयति, तथा च परमते प्रतियोगिप्रसिद्ध्या तन्निषेध इति भावः । ननु लब्धरूपे क्व चिदित्यायुक्तनीत्या धर्मिस्वरूपसिद्धयुपजीवनेन धर्मविशेषविषयतयैव निषेधस्यानुज्ञेयत्वाद्वयङ्गयस्वरूपसत्तानिषेधो न सम्भवतीत्यतो द्वितीयं प्रकारमाह ह-'''यो वे'''त्यादि । '''न गणित''' इति । गुणालकारव्यतिरिक्तत्वेनेत्यर्थात् । स इति अस्माभिरगणितो व्यङ्गयत्वेन भवदभिमतश्चेत्यर्थः । ननु व्यङ्गयस्य शोभाकारित्वं स्वसंवेदसाक्षिकं कथमपह्रूयत इत्यतः प्रकारान्तरमाह-'''अथे''' त्यादि । '''स''' इत्यनुषज्यते। '''अथ''' यदि । '''अन्तर्भवती'''ति । व्यङ्ग्यत्वेनाभिमतं गुणालङ्कारान्यतरदेव भवितुमर्हति काव्यशोभकारित्वादित्यर्थः । {{gap}}ननु ध्वन्यादिसमाख्यावशात्तद्भेदसिद्धिरित्यत आह-'''नामान्तरे'''ति । ननु न केवलं नामान्तरकरणमेव, तन्निमित्तञ्चास्त्यतो न गुणाद्यन्तर्भाव इत्याशङ्कामभ्युपगच्छति-'''अथापी'''त्यादि। '''नान्तर्भाव''' इति । काव्यजीवितत्वादिविशेषादिति भावः । परिहरति-'''तथापीत्या'''दि । '''नामान्तरकरणमि'''ति। अस्मदुक्तानां गुणादीनां काव्यजीवितत्वादिविशेष- माश्रित्य ध्वन्यादिनामान्तरं भवद्भिः क्रियत इत्यर्थः। अत्र हेतुमाह-'''उपमे'''ति। '''विच्छित्तिः''' वैचित्र्यम् । '''उपमे'''त्यलङ्कारान्तराणां गुणानाञ्चोपलक्षणम् । फलितमाह-'''तथापी-''' त्यादि । '''तथापि''' तथा च । ततः किमिति तदाह-'''तावदि'''ति। '''तावन्मात्रेण''' किञ्चिद्विशेषलेशमाश्रित्य नामान्तरकरणमात्रेण । '''किं कृतमि'''ति । न किञ्चिदपि पाण्डित्य सम्पादितमित्यर्थः। अत्र हेतु'''रन्यस्ये'''ति । तदेवोपपादयति-'''चिरन्तनैरि'''त्यादि। उक्तमर्थं सोपहासदृष्टान्तं निगमयति-'''तदि'''त्यादि । '''तत्''' तस्मात् । तत्रेति वा पाठः । तथा सती- - -<noinclude></noinclude> b2vd1ik6140u7tkfieny59gj31hitr5 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/३८ 104 95960 416918 321002 2026-06-20T13:30:53Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=३}} {{rule}}</noinclude>{{center|{{bold|लोचनम्}}}} स्वयमव्युच्छिन्नपरमेश्वरनमस्कारसम्पत्तिचरितार्थोऽपि व्याख्यातृश्रोतॄणामविघ्नेना- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} {{gap}}अनुरणन् ब्रुवन् घण्टाऽऽदिनादस्थानीयस्य मूलकृद्वचनस्यानुरणनस्थानीयं व्याख्यानरूपं स्ववचनमित्यनेन प्रकाश्यते, स्वेति । लोच्यते दृश्यतेऽनेनेति लोचनं स्वस्य लोचनंमनः तस्य नितरां योजनया मनःप्रणिधानेनेत्यर्थः , काव्यालोकं जनस्य स्फुटयामि= विशदीकरोमि , यद्वा स्वस्य लोचनं ज्ञानं तस्य नियोजनया व्याख्यानरूपानुरणनद्वारा समर्पणेन स्फुटयामि-प्रकाशयामि , यथा नेत्रयोजनेन तथेत्युपमाध्वनिरत्रापि बोध्यः । {{gap}}वृत्तिकारकृतस्य स्वेच्छेत्यादिपद्यस्य तात्पर्यार्थमवतारिकया दर्शयति-स्वयमित्यादि । स्वयमिति वृत्तिकारस्य निर्देशः , अव्युच्छिन्नः मध्ये विच्छेदेन रहितः परमेश्वरस्य-तत्तल्लीलाविग्रहमवलम्बमानस्य परमात्मनः; नमस्कारः तस्य सम्पत्तिः प्रकर्षः तया चरितः लब्धः अर्थः विघ्ननिवृत्त्यादिरूपसाक्षात्प्रयोजनं यस्य सः , तथाभूतस्य मङ्गलाचरणआपाततो विरोधमपिशब्दो द्योतयति , व्याख्यातृश्रोतृणामिति फलसम्पत्तय इत्यादिना सम्बन्धः , अविनेन=विन्नध्वंसेन, अभीष्टेति । व्याख्यातॄणां व्याख्यानं श्रोतृणां श्र{{center|{{bold|दिव्याञ्जनाख्या टिप्पनी}}<br/> श्रीश्रीगौर कृष्णः शरणम् ।}} {{Block center|<poem>गौरकृष्णगुरून्नत्वा ध्वन्यालोकस्य लोचनम् । अनज्मि दिव्याञ्जनतो दुर्दर्शार्थमवेक्षितुम् ॥</poem>}} {{gap}}अथ ध्वनिप्रस्थापकाचार्यश्रीमदानन्दवर्धनविरचितं ध्वन्यालोकनिबन्धनं. व्याख्यातवतो भरतदर्शनसूत्रभाष्यकारप्रधानस्याचार्यश्रीमदभिनवगुप्तस्य लोचनाख्ये व्याख्याने विषमस्थलानि मुख्यत्वेन विशदयितुकामस्य दिव्याञ्जननामिकेयं टिप्पनी ; प्रासङ्गिकी त्वपरत्रापीति न प्रतिश्रुतिविरोध उद्भावनीयः । यत्त्वत्रोत्तरपदाव्यवहितपूर्वत्वविशिष्टविद्यायोन्यन्यतरसम्बन्धवाचकर्दन्तपदोद्देश्यकानङ्विधायकानङ्तो द्वन्द्व इति शास्त्रेण विद्याद्वारकैकयज्ञार्विज्यसम्बन्धेन विद्यासम्बन्धिवाचकहोतापोतृवदिहापि विद्याद्वारकैकप्रतिपाद्यविषयकज्ञानानुकूलव्यापारवत्त्वसम्बन्धेन सम्बन्धिवाचकयोर्ख्यातृपदश्रोतृपदयोर्द्वन्द्वेऽपि व्याख्याताश्रोतृणामित्युचितमिति कश्चिदाक्षिपति तन्मन्दम्- {{gap}}"ऋतो विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यः पूर्णतत्सूत्रानुवृत्तित ऋत्पदानुवृत्त्यैव निर्वाहे प्रकृतसूत्रे पुना ऋद्ग्रहणमानविध्यु द्देश्यताऽवच्छेदककोटिप्रविष्टसमस्यमानयावत्पदानामृदन्तत्वस्यापेक्षां दर्शयद् विद्यायोन्यन्यतरवाचिंत्वमपि तदवच्छेदककुक्षौ समाविवेशयि- षतीति व्याख्यातृशब्दस्य कथं चित्तदन्यतरवाचित्वेऽपि श्रीतृशब्दे तद्वाचित्वनियमादर्शनाद विशेषणाभावप्रयुक्तविशिष्टाभावमुद्रयोद्देश्यताऽवच्छेदकत्वानाक्रान्तत्वादानडोऽप्रवृत्तेः साध्वेव व्याख्यातृश्रोतृणामिति ।<noinclude></noinclude> rwoh6ydroxeeepfn3mzggatl8diedi3 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/३९ 104 95983 416919 369713 2026-06-20T13:31:05Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=४|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|श्रीनृहरये नमः}}}} {{Block center|<poem>स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्दवः । त्रायन्तो वो मधुरिपोः प्रपन्नार्तिच्छिदो नखाः ॥</poem>}} {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} भीष्टव्याख्याश्रवणलक्षणफलसम्पत्तये समुचिताशी:प्रकटनद्वारेण परमेश्वरसांमुख्यं करोति वृत्तिकारः-स्वेच्छेति । {{gap}}मधुरिपोर्नखाः वो युष्मान्व्याख्यातृश्रोतिृस्त्रायन्ताम् , तेषामेव सम्बोधनयोग्य- त्वात् ; सम्बोधनसारो हि युष्मदर्थः , त्राणं चाभीष्टलाभं प्रति साहायकाचरणं, सच्च तत्प्रतिद्वन्द्विविघ्नापसारणादिना भवतीति , इयदत्र त्राणं विवक्षितम् , नित्योद्योगिनश्च भ- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} वणञ्चाभीष्टं फलं तस्य सम्पत्तये-निष्पत्तये , तदुभयसम्पत्तौ तदुभयहेतुकग्रन्थप्रतिष्ठा- रूपं फलं ग्रन्थकारस्य च सिद्धयतीति भावः , समुचितं-ग्रन्थारम्भे योग्यं यदाशिषः प्रकटनं वचनन्तद्वारेण , परमेश्वरस्य साम्मुख्यं व्याख्यातृश्रोतॄन् प्रत्याभिमुख्यं त्राणे- च्छारूपम् , करोति-सम्पादयति , तत्त्राणस्य परमेश्वरसाम्मुख्यायत्तत्वात्राणाङ्गभूतं त- त्साम्मुख्यमाशीर्वादेन सम्पादयतीत्यर्थः , यद्वा समुचिताया आशिषः प्रकटनं ग्रन्थ- तो निबन्धनं तद्द्वारेण , परमेश्वरे विषये साम्मुख्यं व्याख्यातृश्रोतॄणामाभिमुख्यमनुस- न्धानात्मकम् करोति-उत्पादयति , वृत्तिकार इत्यनेन स्वेच्छेत्यादिकं न कारिकारूप- सूत्राद्यपद्यमिति दर्शितम् , व इत्यस्य व्याख्यातृश्रोतृनिति व्याख्याने हेतुमाह-तेषामिति । कुतोऽत्र सम्बोधनप्रसङ्ग इत्यत आह-सम्बोधनेति । सम्बोधनं सारः प्राणो युष्मदर्थत्व- प्रयोजकोंऽशो यस्य सः, न ह्यसम्बोध्यो युष्मदा व्यपदिश्यते, त्रायन्तामित्यनेनात्र विवक्षि- तं व्याचष्टे-त्राणञ्चेति । अभीष्टेति व्याख्यानश्रवणरूपेत्यर्थः , सहायस्य कर्म साहाय- कं तत्प्रतिद्वन्द्वीति; अभीष्टलाभप्रतिबन्धकेत्यर्थः , अपसरणं निवर्तनम् , नार्थतत्त्वमनीषासमुन्मेषादेः परिग्रहः , इथदिति । उक्तरूपमित्यर्थः , अथ ध्वनि का- {{center|{{bold|टिप्पनी}}}} {{gap}}वृत्तिकार इति । स्वकृतानामेव मूलरूपाणां कारिकाणां व्याख्याऽऽत्मकवृत्तेः कर्ते- त्यर्थः, अत एव विशिष्टस्यैवारिप्सितत्वेन मूले मङ्गलाकरणेऽपि नाचारविरोधः । {{gap}}के चित्तु मूलेऽपि “काव्यस्यात्मे तिप्रथमकारिकायामाद्यपदस्य काव्येत्यस्यान्यप- रत्वेऽपि परार्थोपनीतोदकुम्भदर्शनवत् श्रवणमात्रेणापि ; "काव्यालापाश्च ये के चिद् गीतकान्यखिलानि च । शब्दमूर्तिधरस्यैते विष्णोरंशा महात्मन- {{gap}}इत्यादिप्रमाणतो भगवत्स्फोरकत्वेन वस्तुनि र्द्देशरूपमङ्गलं जातमेवेत्यपि वदन्ति, कारिकाकृवृत्तिकृतोरभेदस्त्वग्रे दर्शयिष्यते । {{gap}}सम्बोधनसारो हीति । स्वजन्यबोधाश्रयत्वेन वक्रभिप्रायविषयत्वावच्छिन्नस्य आदिपदे-<noinclude></noinclude> a5jgrfl1952r2o5xy9zr1xj57bdafas पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४० 104 95987 416920 368611 2026-06-20T13:31:17Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=५}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} गवतोऽसम्मोहाध्यवसाययोगित्वेनोत्साहप्रतीतेवाररसो ध्वन्यते, नखानां प्रहरणत्वेन प्रह- रणेन च रक्षणे कर्तव्ये नखानामव्यतिरिक्तत्वेन करणत्वात्सातिशयशक्तिता कर्तृत्वेन सू- चिता, ध्वनितश्च परमेश्वरस्य व्यतिरिक्तकरणापेक्षाविरहः, मधुरिपोरित्यनेन तस्य सदैव जगत्रासापसारणोद्यम उक्तः, कीदशस्य मधुरिपोः ? स्वेच्छया केसरिणः, न तु कर्मपारत- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} व्यात्मानं प्रतिपादयिष्यता ग्रन्थकृता कृतस्यास्य प्रथमपद्यस्य काव्यरूपत्वादस्मिन्नपि ध्व- निर्योजनीय इति मन्वानो रसादिभेदेन त्रिविधेषु ध्वनिषु प्रधानभूतं रसध्वनिमादौ यो- जयति-नित्येत्यादि । चशब्दः समुच्चये ध्वन्यते चेति सम्बन्धः; न वाच्यार्थमात्रमनेनो- च्यते किन्तु रसो ध्वन्यते चेत्यर्थः, नित्योद्योगिन इति । उद्योगो नामबाह्यसंनाहात्म- कोद्यमनक्रियारूप उत्साहानुभावः, भगवत इत्यनेनासम्मोहाध्यवसाययोगित्वेनोत्साहो- पपत्तेरौचित्यं दर्शितम् , यथोक्तं भरतेन "उत्तमप्रकृतिरुत्साहात्मको वीर इति" असं- मोहेन-सम्मोहराहित्येन योऽध्यवसायः एतदेवं कर्तुं शक्यमिति वस्तुतत्त्वनिश्चयः लद्योगित्वेनेति उत्साहहेतुकथनम् , असंमोहश्चाध्यवसायश्च तद्योगित्वेनेति के चित् , उत्साहप्रतीतेरिति । स्वेच्छाकेसरिणो मधुरिपोः प्रसन्नार्तिच्छिद इति पदेहिरण्यकशिपु- प्रभृतिनिबर्हणादिविषयकोत्साहस्य व्यञ्जनया सहृदयानां प्रतीतेरित्यर्थः, मत्यादिव्य- भिचारिप्रतीतेरुपलक्षणमिदम् , वस्तुध्वनिं दर्शयति-नखानामित्यादि । प्रहरणत्वेनेति करणत्वे हेतुः सिंहादीनामायुवत्वेनेत्यर्थः , प्रहरणत्व इति पाठे निमित्ते सप्तमी, ननु नखानां प्रहरणत्वेऽपि कथं त्राणक्रियां प्रति करणत्वमित्यतस्तत्सम्भावनान्द- र्शयति-प्रहरणेनेति । प्रहरणं हि स्वस्यान्यस्य वा रक्षां कर्तुमुपादीयत इति भावः, अ- व्यतिरिक्तत्वेन करणत्वादिति, अव्यतिरिक्तत्वमपृथग्भूतत्वमाभ्यन्तरत्वमिति यावत् त- द्विशिष्टकरणत्वादित्यर्थः, करणं द्विविधं बाह्यमाभ्यन्तरञ्च बाह्यं खड्गादि; आभ्यन्तरं- हस्तादि, करणत्वात् कर्तृत्वेनेति सम्बन्धः, करणत्वमनुक्त्वा कर्तृत्वोक्त्येत्यर्थः, मधुरि- पुर्नखैस्त्रायतामिति वक्तव्यमनुक्त्वा मधुरिपोर्नखास्त्रायन्तामित्युक्त्येति यावत् , सातिश- {{center|{{bold|टिप्पनी}}}} स्वसम्बोध्यस्य युष्मत्पदार्थतयाऽन्यत्र व्यवस्थापितत्वादित्याशयः । {{gap}}उत्साहप्रतोतेरिति । विभावादीनां मिथो नान्तरीयकत्वेन {{Block center|<poem>"सद्भावश्चेद् विभावादेयोरेकस्य वा भवेद् । ऊटित्यन्यसमाक्षेपे तदा दोषो न विद्यते" ॥</poem>}} {{gap}}इत्युक्तदिशा प्रकृते सपत्नमध्वाद्यसुरालम्बनेन योग्यतयाऽऽक्षिप्तानां तदीयनिर्भी- कत्वादिज्ञानाादीपनतद्विषयावहेलाऽऽद्यनुभावगर्वादिसंचारिणां पानकरसन्यायेन योगाद् उत्साहइय प्रतीतेरित्यर्थः ।<noinclude></noinclude> 7mdbacdymr3a3axqkshdl4rki7xopb3 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४१ 104 95988 416921 321006 2026-06-20T13:31:28Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=६|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} त्र्येण, नाप्यन्यदीयेच्छया, अपि तु विशिष्टदानवहननोचिततथाविधेच्छापरिग्रहौचित्या- देव स्वीकृतसिंहरूपस्येत्यर्थः; कीदृशा नखाः ? प्रपन्नानामार्ति ये छिन्दन्ति; नखानां हि छेदकत्वमुचितम् ; आर्तेः पुनश्छेद्यत्वं नखान्प्रत्यसम्भावनीयमपि तदीयानां नखानां- स्वेच्छानिर्माणौचित्यात्सम्भाव्यत एवेति भावः , अथ वा त्रिजगत्कण्टको हिरण्यकशिपु- र्विश्वस्योत्क्लेशकर इति स एव वस्तुतः प्रपन्नानां भगवदेकशरणानां जनानामार्तिकारि- त्वान्मूर्तैवार्तिस्तं विनाशयद्भिरार्तिरेवोच्छिन्ना भवतीति परमेश्वरस्य तस्यामप्यवस्थायां- परमकारुणिकत्वमुक्तं , किं च ते नखाः स्वच्छेन स्वच्छतागुणेन नेमल्येन; स्वच्छमृदुप्र- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} या शक्तिः सामर्थ्यं येषां तेषां भावस्तत्ता , शक्ततेति च पाठः, व्यङ्गयान्तरमप्याह- ध्वनितश्चेति, उक्तव्यङ्गयेनेति शेषः, व्यतिरिक्तकरणेति । बाह्यखड्गादीत्यर्थः, जगत्रासे- ति। तत्तद्दुर्जनेभ्यो जगतो यस्त्रासः तदपसारणे य उद्यमः स इत्यर्थः , उक्त इति । व्यञ्जित इत्यर्थः, इममर्थं मनसिकृत्य पूर्व नित्योद्योगिन इत्युक्तमिति बोध्यम् , न तु क- र्मपारतन्त्र्येणेत्यादेः स्वीकृतेत्यत्र सम्बन्धः, आद्यमिच्छापदेन द्वितीयं स्वपदेन च गम्य- मिति बोध्यम् , विशिष्टेति विशिष्टं-दानवान्तरहननापेक्षया विशेषवत् , दानवस्य=हिर- ण्यकशिपोर्हननं यद्वा विशिष्टः सुरनरतिर्यगाद्यवध्यत्वरूपविशेषवान् यो दानवस्तस्य हननं तस्मिन्नुचितो यस्तथाविधायाः नरहरिविग्रहावलम्बनविषयिकाया इच्छायाः परि- ग्रहः, उचितेतीच्छाविशेषणं वा तस्मिन् यदौचित्यमर्थात् स्वस्य तस्माद्धेतोरित्यर्थः, स्वीकृ- तसिंहरूपस्येति । सिंहरूपस्य नररूपमिश्रत्वं प्रसिद्धमतो नोक्तम् , ये च्छिन्दन्तीति । त- इति शेषः छेदकत्वमिति । छेदनक्रियाकर्तृत्वमित्यर्थः, छेद्यत्वं छेदनकर्मत्वमस्य सम्भाव्यत इत्यनेन सम्बन्धः, असम्भावनीयमिति । आर्तेरमूर्तत्वादिति भावः , तदी- यानां नरहरिसम्बन्धिनाम् , स्वेच्छेति । स्वेच्छया भगवत इच्छया यन्निर्माणं नखानां- नर्माणं तेन हेतुना; औचित्यादमूर्तस्यापि वस्तुनश्छेदने सामर्थ्यात् , यद्वा स्वेच्छया- स्वातन्त्र्येण निर्माणे अमूर्तच्छेदनादेः करणे नखानामौचित्यादित्यर्थः , सम्भाव्यत एव= निश्चीयत एव, लोकदृष्ट्यनुरोधेनाह-अथ वेति । अस्मिन् पक्षे आर्तिशब्द आर्तिकारणं- लक्षयति तस्याव्यभिचारेण निखिलार्तिकारित्वञ्च ध्वनीति बोध्यम् , विनाशयद्भिरिति । नखेरिति शेषः, आतिरेवोच्छिन्ना भवतीति । तथाविधस्य हिरण्यकशिपोः हननमार्ते- रेवोच्छेदनं न तु कस्य चित्प्राणिन इति भगवबुद्धिरिति भावः, तस्यामप्यवस्थायां हन- नावस्थायामपि, उक्तमिति । व्यञ्जितमित्यर्थः, आर्तिमेव छिनत्ति न तु कञ्चित्प्राणिनमित्य- र्थग्रतीत्येति भावः, अत्र प्रपन्नेत्यादिविशेषणं त्राणाशीर्वादहेतुगर्भस्वच्छेत्यादिप्रशंसापरं- प्रशस्यमाना हि देवता प्रसेदुषी प्रेप्सितं प्रयच्छति , तत्र स्वच्छस्वच्छायेत्यत्र कर्मधारय- भ्रमं वारयन्व्याचष्टे-स्वच्छेनेत्यादि । स्वच्छतागुणेनेत्यस्यैव विवरणं नैर्मल्येनेति, भाव- वृत्तयः स्वच्छताऽऽदिधर्मवाचकाः, छाययेत्यस्य व्याख्यानं वक्रेत्यादि, अत्र वस्तुध्व- .<noinclude></noinclude> h7vloxwsi5tttwal8dx01uyx7dvazmk पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४२ 104 95989 416922 321008 2026-06-20T13:31:40Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416922 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=७}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} भृतयो हि मुख्यतया भाववृत्तय एव; स्वच्छायया च वक्रहृद्यरूपयाऽऽकृत्याऽऽयासितः- खेदित इन्दुयः, अत्रार्थशक्तिमूलेन ध्वनिना बालचन्द्रत्वं ध्वन्यते, आयासनेन तत्सन्निधौ चन्द्रस्य विच्छायत्वप्रतीतिरहृद्यत्वप्रतीतिश्च ध्वन्यते, आयासकारित्वं च नखानां सुप्रसि- द्धम् ; नरहरिनखानां तच्च लोकोत्तरेण रूपेण प्रतिपादितम् , किं च तदीयां स्वच्छतां कु- टिलिमानं चावलोक्य बालचन्द्रः स्वात्मनि खेदमनुभवति; तुल्येऽपि स्वच्छकुटिलाकार- योगेऽमी प्रपन्नार्तिनिवारणकुशलाः; न त्वमिति व्यतिरेकालङ्कारोऽपि ध्वनितः, किंचाहं- पूर्वमेक एवासाधारणवेशद्यहृद्याकारयोगात्समस्तजनाभिलषणीयताभाजनमभवम् ,अद्य {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} निमाहार्थेति । वक्रहृद्यरूपाकृत्यायासितत्वस्य बालचन्द्र एव सम्भवात्तदर्थसामर्थ्यमूले- नेत्यर्थः , बालचन्द्रत्वं ध्वन्यत इति । इन्दुपदार्थस्य चन्द्रस्य बालत्वं ध्वन्यत इत्यर्थः , आयासित इत्यस्य खेदित इत्यर्थो लक्षणया; तत्फलमाहायासनेनेत्यादि । तत्सन्निधौ= नखसन्निधौ , विच्छायत्वेति=निश्शोभत्वेत्यर्थः, ध्वन्यत इति । ध्वनिव्यापारेण जायत- इत्यर्थः , सुप्रसिद्धमिति । प्रहरणरूपत्वादिति भावः, तच्च आयासकारित्वञ्च, लोकोत्तरे- णेति-स्वच्छत्वादिपूर्वोत्तरूपेणेत्यर्थः, प्रतिपादितमिति । तथा च विदारणादिनाऽऽया- सकारिभ्यो लौकिकनखेभ्यो नरहरिनखानां व्यतिरेको व्यज्यत इति भावः, प्रपन्नार्ति- च्छिद इति विशेषणसहकारेण व्यतिरेकान्तरस्यालङ्कारान्तरस्य च ध्वनिन्दर्शयति कि- ञ्चेत्यादि । तदीयां नखसम्बन्धिनीम् , कुटिलिमानमित्यत्र तदीयमिति विपरिणामेन सम्बन्धः , स्वात्मनीति । परेषामविदितमित्यर्थः , अनुभवप्रकारमाह-तुल्येऽपीत्यादि । नत्वहमितीति । इतिशब्दस्यानुभवतीत्यनेन व्यतिरेकालङ्कार इत्यनेन च सम्बन्धो बो- ध्यः, ध्वनित इति उक्तार्थप्रतीत्या सहृदयानां व्यतिरेकव्यक्तिरित्यर्थः, इति व्यतिरे- कालङ्कारोऽपि ध्वनित इति पाठः, अपिशब्देन पूर्वोत्तव्यतिरेकस्य समुच्चयः, एवं- विधा इति । वैशद्यहृद्याकारयुक्ता इत्यर्थः, सन्तापार्तिच्छेदकुशलाश्चेति । आत्मनो हि स- न्तापस्यैव च्छेदने कुशलत्वं न सर्वासामार्तीनामिति भावः, बालेन्दुबहुमानेनेति । एते नखाः न किन्तु बालेन्दव इति बहुमत्येत्यर्थः, आयासमिति । अयशोहेतुकं दुःखमित्य- र्थः , अनुभवतीवेति । इवशब्दरहितश्च पाठः, उत्प्रेक्षापहृतिध्वनिरिति-उत्प्रेक्षार्थाऽप- ह्रुतिरुत्प्रेक्षाऽपहृतिः तस्याः ध्वनिः अपहृत्युत्प्रेक्षयोरङ्गाङ्गितया स्थितत्वात्तत्सङ्करध्वनि- {{center|{{bold|टिप्पनी}}}} {{gap}}अत्रार्थशक्तीति । प्रकारताऽवच्छेदकताऽवच्छेदकताऽऽपन्नस्य शक्यस्य स्वपदार्थ- स्य मधुरिपुनखस्य शक्तिः पदपरिवृत्तिसहत्वरूपसामर्थ्यं मूलं प्रयोजकं यस्य तादृशेन स्वतःसम्भविना. व्यञ्जनाव्यापारेण । बालचन्द्रत्वमिति । वक्रिमहृद्यत्वनिबन्धनकमनी- यत्वकरणकमधुरिपुनखकर्तृकायासकर्मत्वं योग्यतावशात्तादृशचन्द्र एव पर्यवस्यतीति भावः । आयासनेनेति । अत्राप्यायासपदार्थीयतादृशशक्तिप्रयुक्तव्यञ्जनेन विच्छायत्वा- दिकं वस्तु बालचन्द्रगतं व्यज्यते । -<noinclude></noinclude> mzzcegioolfwksb6yfloedvb12kf2x9 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४३ 104 95990 416923 321009 2026-06-20T13:32:39Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=८|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} पुनरेवंविधा नखा दश बालचन्द्राकाराः सन्तापार्तिच्छेदकुशलाश्चेति तानेव लोको बालेन्दु- बहुमानेन पश्यति, न तु मामित्याकलयन्वालेन्दुरविरतमायासमनुभवतीवेत्युत्प्रेक्षापहृति- ध्वनिरपि, एवं वस्त्वलकाररसभेदेन त्रिधा ध्वनिरत्र श्लोकेऽस्मद्गुरुभिर्व्याख्यातः । {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} रिति यावत् , बालेन्दुरविरतमायासमनुभवतीवेत्युत्प्रेक्षायां हि पूर्वोक्तं तानेव लोको- बालेन्दुं बहुमानेन पश्यति न तु मामित्याकलनं निमित्तं तत्र च स्पष्टापह्नुतिः; न नखा- एते किन्तु बालेन्दव इति लोकस्य प्रतीतेः; तथा चात्रोत्प्रेक्षा नखविषयकनखत्वनिषेधपू- र्वकबालेन्दुत्वारोपरूपलोकप्रतीतिविषयकबालचन्द्रगतप्रतीतिनिबन्धनेत्यतोऽपह्रुतिबलादा- त्मानं लभत इत्यङ्गाङ्गिभावो बोध्यः, निगमयत्येवमित्यादि । अत्र वीररसध्वनिर- ङ्गी; उत्साहस्य प्राधान्येन प्रतीयमानत्वादिति ध्येयम् , {{gap}}नन्वत्र ग्रन्थकारगतभगवद्विषयकरतेर्व्यङ्गयत्वस्य वक्तव्यतया भावध्वनिरेवाङ्गित्वेन वाच्यः, रसस्तु तदङ्गतयेति चेदत्राहुः-प्रतिपन्नभगवत्तन्मयीभावस्य ग्रन्थकर्तुराशीः- कर्तृतया वाक्यमिदं न भावपरं भक्तस्य भेदेन भजनीयदेवताविषयकरतेर्व्यङ्गयायाः खलु ग्रन्थकर्तुर्भगवत्तन्मयीभावश्च स्वयं सूत्रकृदवस्थायां मङ्गलाकरणादपूर्वप्रस्था- नकर्तृत्वाच्च सिद्धः {{center|{{bold|टिप्पनी}}}} {{gap}}उत्प्रेक्षाऽपह्रुतिध्वनिरपीति। बालचन्द्रकर्तृकायासानुभवस्योत्प्रेक्षा हि नखत्वप्रति- षेधपुरस्सरबालचन्द्रत्वविधानप्रत्ययलक्षणविषयापह्रवमात्मनीनमवलम्बतेऽतोऽङ्गाङ्गिभा- वः सङ्करोऽनयोरिति भावः । {{gap}}यत्त्वायासितरूपैकपदव्यञ्जकानुप्रविष्टयोरेनयोरेकव्यञ्जकानुप्रवेशात्मा सोऽत्रेति क- श्चित् , तन्मन्दम्-मिथोऽनपेक्षत्वरूपपृथग्व्यवस्थितत्व एव ध्वनिगते योग्यताऽस्त्येक- व्यञ्जकानुप्रवेशात्मनः सङ्करस्य, प्रकृते चोक्तदिशोत्प्रेक्षाऽपन्हुत्योः सापेक्षतैव मिथोऽस्ति, {{gap}}न च नैरपेक्ष्ये संसृष्टेः प्रसङ्ग इति शङ्क्यम् ? पदरूपविषयभेदविशिष्टानपेक्षत्वस्य संसृष्टौ विवक्षितत्वाद् , {{gap}}एकव्यञ्जकानुप्रवेशे च विशेष्यसत्त्वेऽपि विशेषणाभावान्न संसृष्टिलक्षणातिव्याप्ति- रित्याकृतम् । {{gap}}एवं वस्त्वलंकाररसेति । यद्यपि सर्वमेव वस्तु तथाऽपीह रसालंकारभिन्नं वस्तुपदेन विवक्षितम्, अलंकारत्वं च रसादिप्रतियोगिकभेदवद्व्यङ्ग्यप्रतियोगिकभेदविशिष्टशब्दा- र्थान्यतरनिष्ठविषयितासम्बन्धावच्छिन्नचमत्कृतिजनकताऽवच्छेदकताऽवच्छेदकत्वम् रसश्च भग्नावरणचिद्विशिष्टः स्थायी । त्रिधा ध्वनिरत्रेति । यद्यपि प्रकारान्तरेण ध्वनीनां- बाहुविध्येऽपि ध्वन्यमानविषयभेदनिबन्धनध्वनिविभागजनकत्वप्रकारकाचार्य्यतात्पर्य- विषयीभूतधर्माणां वैविध्येन ध्वनित्रिधात्वमप्यविरुद्धमिति भावः ।<noinclude></noinclude> d4v9k97xaix540mr524mccd5i2csw7z पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४४ 104 95991 416924 368740 2026-06-20T13:32:54Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=९}} {{rule}}</noinclude> {{Block center|<poem>काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्व- स्तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये । के चिद्वाचां स्थितमविषये तत्त्वमूचुस्तदीयं तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम् ॥१॥</poem>}} {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} {{gap}}अथ प्राधान्येनाभिधेयस्वरूपमभिदधदप्रधानतया प्रयोजनप्रयोजनं तत्सम्बद्धं प्र- योजनं च सामर्थ्यात्प्रकटयन्नादिवाक्यमाह-काव्यस्यात्मेति । {{gap}}काव्यात्मशब्दसंनिधानाबुधशब्दोऽत्र काव्यात्मावबोधनिमित्तक इत्यभिप्रायेण वि- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} {{gap}}अथेत्यारम्भार्थः। अभिधेयस्वरूपमिति । ध्वनिस्वरूपमित्यर्थः । प्रयोजनेति । प्रयोजनस्य ध्वनिरूपाभिधेयज्ञानस्य प्रयोजनं प्रीतिरूपम् , अभिदधदित्यस्यात्रानुषङ्गः। । अभिधेयस्वरूपस्य तत्स्वरूपं ब्रूम इति वाक्यार्थत्वं; प्रयोजनप्रयोजनस्य प्रीतय इति पदार्थ- त्वमतस्तदभिधानयोः प्राधान्याप्राधान्ये । तत्सम्बद्ध मिति। तेन प्रयोजनप्रयोजनेन स- म्बद्धमित्यर्थः । प्रयोजनमभिधेयज्ञानरूपम् । सामर्थ्यात् अर्थसामर्थ्यादाक्षेपत इति यावत् । प्रकटयन बोधयन् । ध्वनिस्वरूपवचनस्य हि प्रयोजनं ध्वनिस्वरूपज्ञानं सहृद- यानाम् । तस्य हि प्रयोजनं मनःप्रीतिः । एवञ्च तयोर्हेतुहेतुमद्भावेन प्रयोजनप्रयोजनरू- पायाः प्रीतेरभिधानात्तद्धेतुभूतस्य ध्वनिस्वरूपज्ञानस्य प्रकटनं सिद्धयतीति भावः । {{gap}}ननु बुधशब्दस्य सामान्यतो ज्ञातृवाचित्वात् वृत्तौ 'काव्यतत्त्वविद्भिरि ति कुतो व्याख्या- तमित्यतस्तदवतारयति-काव्येति। काव्यात्मबोधः निमित्तं प्रयोगनिमित्तं यस्य सः। यद्वा निमित्तं प्रवृत्तिनिमित्तम् । तच्च तत्पदजन्यवोधे प्रकारतया भासमानो धर्मः । ननु {{center|{{bold|टिप्पनी}}}} {{gap}}प्राधान्येनेति । प्रतिपिपादयिषितत्वान्मुख्यत्वेन। अभिधेयेति। "तेन ब्रूम” इति प्रतिज्ञातत्वाद्ध्वन्यात्मकविषयम् । प्रयोजनप्रयोजनमिति। ध्वनिस्वरूपाभिधानस्य ध्वनिस्वरूपज्ञानं प्रयोजनम् , अस्य च सहृदयमनःप्रीतिस्तदिति भवति तदभिधा- नस्य तादृशप्रीतिस्तथा प्रयोजनम् । {{gap}}प्रयोजनप्रयोजनतावच्छेदककुक्षौ मनःपदोपादानं च भरतदर्शनाध्वनीनानां प्रक्रि- यांशे भूम्ना व्याकरणदर्शनानुसारित्वस्फोरणाय, इदमीये हि दर्शने सुखादिविशेषगु- णानां मनोनिष्ठत्वमेवाभिमतं नात्मनिष्ठत्वम् । {{gap}}बुधशब्दोऽत्रेति । सामान्यपरशब्दानां विशेषपरत्वे लक्षणैवाश्रयणीयाऽन्यथा शाब्दविषयत्वानुपपत्तिरेव स्यात् । २<noinclude></noinclude> gn0kyuokqaid23wy2eucb1lgvvggahg पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४५ 104 95992 416925 321011 2026-06-20T13:33:05Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=१०|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{gap}}बुधैः काव्यतत्त्वविद्भिः, काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति संज्ञितः, परम्परया यः समाम्नातपूर्वः सम्यक् आसमन्ताद् म्नातः प्रकटितः, तस्य सहृद- {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} वृणोति-काव्यतत्वविद्भिरिति । आत्मशब्दस्य तत्त्वशब्देनार्थ विवृण्वानः सारत्वम- परशाब्दवेलक्षण्यकारित्वं च दर्शयति । इतिशब्दः स्वरूपपरत्वं ध्वनिशब्दस्याचष्टे, तदर्थ- स्य विवादास्पदीभूततया निश्चयाभावेनार्थत्त्वायोगात् । एतद्विवृणोति-संज्ञित इति । वस्तुतस्तु न तत्संज्ञामात्रेणोक्तम् , अपि त्वस्त्येव ध्वनिशब्दवाच्यं प्रत्युत समस्तसार- भूतम् । न ह्यन्यथा बुधास्तादृशमामनेयुरित्यभिप्रायेण विवृणोति-तस्य सहृदयेत्यादि- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} काव्यात्मविद्भिरित्येव कुतो नोक्तमित्यत आह-आत्मेति। तत्त्वशब्देन अबाधितस्वरूपवा. चिना तत्त्वशब्देन।अपरेति। अपरेभ्यः शाब्देभ्यः लौकिकवैदिकशब्दप्रतिपाद्येभ्यः स्वस्य यद्वैलक्षण्यं सहृदयश्लाध्यत्वादिना तत्कारित्वम् , दर्शयति व्यञ्जयति, तदर्थस्येति शेषः। आत्मेवात्मेत्यात्मशब्दोऽत्र गौणः; तेन चाबाधितस्वरूपत्वरूपात्मसाम्येन ध्वनिरूपार्थों लक्ष्यत इति ज्ञापनाय तत्त्वशब्देन तदर्थविवरणं, तेन तस्य सारत्वादिकं व्यङ्गयमिति भावः । इतिशब्द इति। ध्वनिरितीत्यत्रेतिशब्द इत्यर्थः । आचष्टे ग्राहयति, सर्वशब्दानां शब्दस्वरूपपरत्वं तत्तत्सङ्केतितार्थपरत्वञ्चास्ति। तत्रेतिशब्दप्रयोगे शब्दखरूपपरत्वं, प्रकृते ध्वनिपदोत्तरमितिशब्दकरणाद्ध्वनिशब्दोऽयं संज्ञारूपध्वनिशब्दस्य प्रतिपादक इत्यर्थः । तत्संज्ञाप्रकारेण संज्ञिनो भानञ्चाक्षेपादिना भवति यथा जातिशक्तिपक्षे व्यक्तेर्भानम् । यद्वा ध्वनिपदस्य लक्षणया ध्वनिसंज्ञित इत्यर्थ इति भावः । उक्तार्थे हेतुमाह-तदर्थस्येत्यादि । तदर्थस्य ध्वनिशब्दाभिधेयस्य ध्वन्यमानत्वविशिष्टस्य, विवादास्पदीभूततया ध्वनि- रस्ति नास्तीति विप्रतिपत्तिविषयतया। निश्चयाभावेनेति। निश्चयाभाव इति पाठे निमित्ते सप्तमी। ध्वन्यमानत्वप्रकारेण तद्धर्मिणो मध्यस्थानां निश्चयाभावादित्यर्थः।अर्थत्वायोगा- दिति। ध्वनिपदनिरूपितवृत्तिग्रहाधीनज्ञानविषयत्वासम्भवादित्यर्थः। यद्वा तदर्थस्येत्यस्य निश्चयाभावेनेत्यनेन सम्बन्धः । अर्थत्वायोगादिति ध्वन्यमानत्वविशिष्टरूपार्थवत्त्वा- सम्भवादित्यर्थः । ध्वनिशब्दस्येत्यस्यानुषङ्गः । एतदिति ध्वनिशब्दस्य स्वरूपपरत्वमि- त्यर्थः। नन्वेवं ध्वनिशब्दस्य ध्वनिसंज्ञित इत्यर्थकथने सति तस्य 'सहृदयमनःप्रकाश- मानस्यापी'ति समनन्तरग्रन्थविरोधः, सहृदयमनःप्रकाशमानस्येत्यनेन ध्वन्यमानत्ववि- शिष्टार्थस्य सहृदयप्रतीतिविषयत्वाभिधानादित्याशङ्कां परिहर्तुं तद्गन्थाभिप्रायमाह-वस्तु- तस्त्वित्यादि । तदिति । ध्वनिपदमित्यर्थः । यद्वा ध्वनिरूपं वस्त्वित्यर्थः। संज्ञामा- त्रेणेति । मात्रपदेन ध्वन्यमानत्वरूपप्रवृत्तिनिमित्तस्य व्यवच्छेदः । ध्वनिशब्दवाच्यं ध्वन्यमानत्वविशिष्टम् । अस्त्येवेत्यत्र हेतुमाह-न ह्यन्यथेत्यादि । विवृणोतीति-का- रिकास्थं तस्येति पदं व्याचष्ट इत्यर्थः । सहृयेत्यादिनेति । सहृदयमनःप्रकाशमानस्ये- 1<noinclude></noinclude> 8m17202voyebc3t1nhezab758rxqk8j पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४६ 104 95993 416926 368784 2026-06-20T13:33:17Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=११}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} ना। एवं तु युक्ततरम्-इतिशब्दो भिन्नक्रमो वाक्यार्थपरामर्शकः, ध्वनिलक्षणोऽर्थः काव्यस्यात्मेति यः समाम्नात इति । शब्दपदार्थकत्वे हि ध्वनिसंज्ञितोऽर्थ इति का सङ्ग- तिः? एवं हि ध्वनिशब्दः काव्यस्यात्मेत्युक्तं भवेद् , गवित्ययमाहेति यथा । न च विप्र- तिपत्तिस्थानमसदेव, प्रत्युत सत्येव धर्मिणि धर्ममात्रकृता विप्रतिपत्तिरित्यलमप्रस्तुतेन भूयसा सहृदयजनोद्वेजनेन। बुधस्यैकस्य प्रामादिकमपि तथाभिधानं स्यात् , न तु भूय- सां तद्युक्तम् । तेन बुधैरिति बहुवचनम् । तदेव व्याचष्टे-परम्परयेति। अविच्छिन्नेन प्रवाहेण तैरेतदुक्तं विनाऽपि विशिष्टपुस्तकेषु विनिवेशनादित्यभिप्रायः। न च बुधा भूयां- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} त्यनेनेत्यर्थः । यदिदं संज्ञाप्रकारेण ध्वनिलक्षणं वस्तु काव्यात्मत्वेनाभिहितं तदश्रद्धोपहन्य- मानमानसजनबुद्धयनुरोधेनैव । ध्वन्यमानत्वविशिष्टार्थस्य सहृदयप्रतीतिसिद्धतया तद्बु- द्धयनुरोधेन च समनन्तरग्रन्थ इति भावः। यद्वा नन्वेवं ध्वनिपदस्य ध्वनिसंज्ञित इत्यर्थक- त्वे कथमभावादिवादिप्रत्युत्थानम्, तेषां ध्वन्यमानत्व एव विवादेन ध्वनिसंज्ञायां विवादाभा- वादित्यत आह-वस्तुतस्त्वित्यादि । विवृणोतीति । विविच्य वदतीत्यर्थः । सहृदये- त्यादिनेति।आदिपदेन सहृदयमनःप्रकाशमानस्याप्यभावमन्ये जगदुरित्यादेस्सङ्ग्रहः। ध्व- निरितीति योजनेन वृत्तिकृद्विवरणमुपलक्षणमित्यभिप्रायेणाह-एवं त्वित्यादि। एवं वक्ष्य- माणं योजनं व्याख्यानं वेति शेषः। युक्ततरमिति। तरपा पूर्वव्याख्यानस्य युक्तत्वमस्ती- ति ज्ञाप्यते। भिन्नक्रम इति। यस्मादनन्तरं श्रूयते ततोऽन्यत्र योजनीय इत्यर्थः। काव्य- स्यात्मेति समानातपूर्व इति योजनेति भावः । वाक्यार्थपरामर्शक इति । समाम्नाने का- व्यस्यात्मेति वाक्यार्थप्रतिपादकत्वं बोधयतीत्यर्थः, न तु तद्वाक्याभेदमिति भावः। वाक्य- मत्र पदसमुदायः। योजनां दर्शयति-ध्वनीत्यादि । ध्वनिरित्यस्य विवरणं-ध्वनित्लक्ष. णोऽर्थ इति। ध्वन्यमानत्वविशिष्ट इत्यर्थः। एवञ्चास्यैवार्थस्य तस्येति तत्पदेन परामर्शः। ध्वनिरितीति योजनापक्षे ध्वनिपदस्य केवलसंज्ञापरत्वे दोषमाह-शब्देत्यादि । शब्दप- दार्थकत्वे ध्वनिपदस्य ध्वनिरिति संज्ञामानार्थकत्वे सति । कासङ्गतिरिति । असङ्गतं स्यादित्यर्थः। अत्र हेतुमाह-एवं हीत्यादि। ध्वनिपदस्य प्रागुक्तरीत्याऽर्थपरत्वासङ्गतिशङ्कां परिहरति-न चेत्यादि । विप्रतिपत्तिस्थानं विप्रतिपत्तिविषयो धर्मी । धर्ममात्रकृते- त्यादि । यथा शब्दादौ सत्येव धर्मिणि नित्यत्वानित्यत्वादिधर्मकृता विप्रतिपत्तिः, प्रकृते च ध्वनिसंज्ञिते धर्मिणि गुणालङ्कारान्तर्भूतत्वभाक्तत्वादिधर्मकृता विप्रतिपत्तिरिति भावः। बुधैरिति बहुवचनार्थं व्याचष्टे-बुधस्येत्यादि । तथाभिधानं काव्यात्मत्वेनाभिधानम्। तत्प्रामादिकाभिधानम्। तेनेति। तदभिधानस्य प्रामाणिकत्वेनोपादेयत्वद्योतनार्थमित्यर्थः। तदेवेति।उक्तप्रयोजनकं बहुवचनमेवेत्यर्थः। परम्परयेत्यस्य विवरणमविच्छिन्नेनेत्या- दि। एतदिति । ध्वनेः काव्यात्मत्वमित्यर्थः। विशिष्टेति। विशिष्टपुस्तकेषु विनिवेशनं लेखनेन स्थापनं, तस्माद्विनाऽप्युक्तमिति सम्बन्धः। साक्षादुपदेशसिद्धोऽयमर्थ इति भावः। । T<noinclude></noinclude> 638wum434zm575sb9ap29x9dyz2dzac पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४७ 104 95994 416928 321020 2026-06-20T13:33:35Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" /> १२</noinclude>{{center|{{bold|सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}}}} {{rule}} यजनमनःप्रकाशमानस्याप्यभावमन्ये जगदुः। तदभावादिनां चामी {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} सोऽनादरणीयं वस्त्वादरेणोपदिशेयुः; एतत्त्वादरेणोपदिष्टम् । तदाह-सम्यगाम्नातपूर्व इति। पूर्वग्रहणेनेदम्प्रथमता नात्र सम्भाव्यत इत्याह, व्याचष्टे च-सम्यगासमन्ताद् म्नातः प्रकटित इत्यनेन । तस्येति । यस्याधिगमाय प्रत्युत यतनीयं, का तत्राभावसम्भा- वना। अतः किं कुर्मः, अपारं मौर्ख्यमभाववादिनामिति भावः। न चास्माभिरभाववादिनां विकल्पाः श्रुताः, किं तु सम्भाव्य दूषयिष्यन्ते, अतः परोक्षत्वम् । न च भविष्यद्वस्तु दूषयितुं युक्तम् , अनुत्पन्नत्वादेव । तदपि बुद्धयारोपितं दूष्यत इति चेत् ; बुद्धयारोपित- त्वादेव भविष्यत्त्वहानिः । अतो भूतकालोन्मेषात् पारोक्ष्याद्विशिष्टाद्यतनत्वप्रतिभानाभा- वाच्च लिटा प्रयोगः कृतः- :-जगदुरिति । तद्व्याख्यानायैव सम्भाव्य दूषणं प्रकटयिष्यति । सम्भावनाऽपि नेयमसम्भवतो युक्ता, अपि तु सम्भवत एव, अन्यथा सम्भावनानामपर्य- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} इत्यभिप्राय इति । परम्परयेति वचने वृत्तिकाराभिप्राय इत्यर्थः। समाम्नातपूर्व इत्यत्र संशब्दार्थं दर्शयितुमाह-न चेत्यादि । पूर्वग्रहणस्य फलमाह-पूर्वेति । अत्र आख्याने। इत्याह इति व्यञ्जयति । व्याचष्टे चेति । उक्तमर्थं व्याचष्टे चेत्यर्थः। सम्यगित्यादिना पूर्वशब्दार्थोऽपि व्याख्यात इति भावः। बुधसमाम्नातत्वोक्त्या लब्धस्य विवरणं सहृदय- मनःप्रकाशमानस्यापीति । तेन गम्यमर्थन्दर्शयति-यस्येत्यादिना । जगदुरिति लिटः प्रयोगस्योपपत्तिं वृत्तौ व्याचक्षीरन्नित्यादेस्तविवरणरूपत्वादिकञ्च दर्शयितुमाह-न चे- त्यादि । अस्माभिः ध्वनिवादिभिः, विरुद्धाः कल्पा विकल्पा विकल्पितार्थाः। यदि न श्रुताः कथन्तर्हि दूषयिष्यन्त इत्यत आह-सम्भाव्येति। के चिदाचक्षीरन्नित्यादिना सम्भा- वना। यत्रार्थशब्दो वेत्यत्र व्याख्याने 'यदप्युक्त'मित्यनुवादपूर्वकं तदप्ययुक्त'मित्यादिना दूषणञ्चेति बोध्यम् । अत इति। अश्रुतत्वादित्यर्थः। भूतत्वं साधयितुमाह-न चेति। अनु- त्पन्नत्वादेवेति। एवकारः पौनर्वचनिकः, पूर्वोक्ताद्भविष्यत्वादेवेत्यर्थः । शङ्कते-तदपी- ति । तत् भविष्यद्वस्तु, बुद्धावारोपितं बुद्ध्यारोपितं बुद्धिविषयीकृतम् । समाधत्ते- बुद्धीति । आरोपणं करणम् । उपसंहरति-अत इति । वास्तवभूतत्वस्यासम्भवमभिप्रेत्य उन्मेषादित्युक्तम्। प्रातिभासिकं भूतकालावच्छिन्नत्वं लिट्प्रयोगावलम्बनमिति भावः । विशिष्टेति। कालविशेषरूपेत्यर्थः। एवं लिटः प्रयोगं प्रसाध्याचक्षीरन्नित्यादिलिङ्गप्रयोगान् प्रकृतसङ्गतान् दर्शयति- -तद्व्याख्यानायैवेति। लिटो व्याख्यानायैवेत्यर्थः, न तु स्वतन्त्रत- येत्येवकारार्थः। व्याख्यानायेत्यस्य सम्भाव्यत्यनेन सम्बन्धः। नन्वाचक्षीरन्नित्यादिभिरेव जगदुरित्यस्य व्याख्याने सम्भवति किं मध्ये तदभाववादिनाञ्चामी इत्यादिग्रन्थेनेत्यशा- ङ्कावारणायावतारयति-सम्भावनाऽपीति। इयं लिट्समर्थकत्वेनोपात्ता। असम्भवतः कथञ्चिदप्यप्रतीतस्य । अपर्यवसानं स्यादिति । पर्यवसानस्थानालाभादिति भावः ।<noinclude></noinclude> or4ce6xacpp5afmq3gb23nzb27vh6q7 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४८ 104 95995 416929 368785 2026-06-20T13:33:47Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=१३}} {{rule}}</noinclude> विकल्पाः संभवन्ति । {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} वसानं स्यात् दूषणानां च। अतः सम्भावनामभिधायिष्यमाणां समर्थयितुं पूर्व सम्भव- न्तीत्याह । सम्भाव्यन्त इति तूच्यमानं पुनरुक्तार्थमेव स्यात् । न च सम्भवस्यापि स- म्भावना, अपि तु वर्तमानतैव स्फुटेति वर्तमानेनैव निर्देशः । ननु चासम्भवद्वस्तुमूल- या सम्भावनया यत्सम्भावितं तद्दूषयितुमशक्यमित्याशङ्कयाह-विकल्पा इति । न तु वस्तु सम्भवति तादृक् यत इयं सम्भावना, अपि तु विकल्पा एव । ते च तत्त्वा- ववोधवन्ध्यतया स्फुरेयुरपि, अत एव 'आचक्षीरन्' इत्यादयोऽत्र सम्भावनाविषया लिङ्गप्रयोगा अतीतपरमार्थे पर्यवस्यन्ति । यथा- {{Block center|<poem>यदि नामास्य कायस्य यदन्तस्तद्वहिर्भवेत् । दण्डमादाय लोकोऽयं शुनः काकांश्च वारयेत् ॥॥</poem>}} {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} अभिधायिष्यमाणाम् आचक्षीरन्नित्यादिना वक्ष्यमाणाम् । समर्थयितुमिति। यत्स- म्भवति तत्सम्भाव्यत इति व्याप्त्या साधयितुमित्यर्थः।सम्भवन्तीत्याहेति। तदभाववादि. नामित्यादि सम्भवन्ती'त्यन्तमाहेत्यर्थः। ननु सम्भवन्तीत्यस्य स्थाने सम्भाव्यन्त इत्युच्यतां तदा प्रतिज्ञा चादौ कृता स्यादित्यत्राह-सम्भाव्यन्त इतीति। पुनरुक्तार्थमिति। लिङ्गभि- रित्यर्थः। ननु सम्भावनामूलभूतस्सम्भवोऽपि किं सम्भावनीयः ? नेत्याह-न चेति।वर्त- मानेनेति । लटेत्यर्थः । विकल्पा इत्युक्तमवतारयति-ननु चेति। सम्भवद्वस्तुमूलमाश्रयो यस्यास्तया, सम्भावितं विषयीकृतमुत्पादितं वा। विकल्पा इत्युक्तया कथं परिहार इत्य- तस्तत्प्रकारं व्याचष्टे-न त्वित्यादि । तादृक्सम्भावनया सम्भावितं वस्तु परमा न सम्भवति। अत्र हेतुर्यत इति। इयमिति । कारणभूतेत्यर्थः। तर्हि किमालम्बना सम्भावनेत्यत आह-अपि वित्यादि । प्रमाणयुक्त्याभासाभ्यामधिष्ठानभूते काव्यात्मनि ध्वनिस्वरूपे विरुद्धतया कल्प्यन्त इति विकल्पाः पक्षाः। ननु भावे कथमभावकल्पनेत्यत- आह-ते चेति। तत्वेति। ध्वनिस्वरूपकाव्यात्मसंवित्तिविरहेणेत्यर्थः। स्फुरेयुरपि स्फुर- न्त्येव। अत एवेति। यत इमे पक्षा भ्रान्तिकल्पिताः, तत एवेत्यर्थः । अतीतेति। अतीतो भूतः परमार्थस्तात्पर्यार्थो येषां ते। परमार्थत्व इति च पाठः । पर्यवस्यन्तीति मूले जग- दुरिति लिट्योग इव वृत्तावाचक्षीरन्नित्यादिसम्भावनार्थकलिङ्प्रयोगोऽपि क्रियायाः स- म्भावनारूपबुद्ध्यारोपितत्वनिमित्तकभूतत्वे पर्यनस्यतीर्त्थः । उक्तार्थे दृष्टान्तमाह-यथेति । यदि नामेति । वस्तुतत्त्वनिवेदनमुखेन वैराग्यजननार्थमिदं वचनम् । कायस्य शरी- रस्य । यदिति । मांसादीत्यर्थः। शुनः काकांश्चेति भक्षणाय प्रवृत्तानित्यर्थात् सिद्धयति। इत्यत्रेति । भूतप्राणतैवेति सम्बन्धः । एवमिति । बहिर्भूतान्तर्गतमांसादिकत्वेनेत्यर्थः । - 1<noinclude></noinclude> cn1lmrwni2h24k0yfpzyypozz9gngjk पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/४९ 104 95996 416930 368786 2026-06-20T13:34:01Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=१४|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} {{gap}}इत्यत्र । यद्येवं कायस्य दृष्टता स्यात्तदैवमवलोक्येतेति भूतप्राणतैव । यदि न स्यात्ततः किं स्यादित्यत्रापि, किं वृत्तं यदि पूर्ववन्न भवनस्य सम्भावनेत्ययमेवा. र्थ इत्यलमप्रकृतेन बहुना । तत्र समयापेक्षणेन शब्दोऽर्थप्रतिपादक इति कृत्वा वाच्यव्य- तिरिक्तं नास्ति व्यङ्ग्यम् , सदपि वा तदभिधावृत्त्याक्षिप्तं शब्दावगतार्थवलाकृष्टत्वाद्भाक्तम् , तदनाक्षिप्तमपि वा न वक्तुं शक्यं कुमारीष्विव भर्तृसुखमतद्वित्सु इति त्रय एवैते प्रधा- नविप्रतिपत्तिप्रकाराः। तत्राभावविकल्पस्य त्रयः प्रकाराः-शब्दार्थगुणालङ्काराणामेव शब्दा- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} कायस्य शरीरस्य । एवमिति । निवार्यमाणश्वकाकत्वेन लोक इत्यर्थः । वाक्याभ्यां श्लोकस्य सारार्थो दर्शितः। भूतप्राणतैवेति । अतीतपरमार्थतैवेत्यर्थः। सम्भावनाविष- यतद्बहिर्भवनादिक्रियायाः भूतकालावच्छिन्नत्वमेव प्रतीयत इति यावत् । विधाविव निषेधस्थलेऽप्येवमेवेति दर्शयितुमाह-यदीत्यादि । यदि नामेत्यादिपद्यस्य शेषभूतमिद- मेकपादात्मकं वाक्यम्-यदि न स्यादिति । कायस्यान्तर्यत्तद्वहिर्न स्याद्यदीत्यर्थः । किन्तु यथायथमेव व्यवस्थितान्तर्बहिर्भाग एवायं कायस्स्यादिति भावः । ततः किं स्यादिति । तदाऽपि किं फलं स्यादित्यर्थः। तदाऽप्यतिजुगुप्सितोऽयं कायो निष्फल एव फल्गुतरविषयोपभोगमात्रोपयोगित्वादिति भावः । इत्यत्रापीत्यस्य अयमेवार्थ इत्यनेन सम्बन्धः। उक्तं वाक्यं स्वयं व्याचष्टे-किं वृत्तमित्यादि । यदि न भवनस्य सम्भावना किं वृत्तमिति योजना। ततः किं स्यादि त्यस्य विवरणं-किं वृत्तमिति । तदापि किं फलं जातं न किञ्चिदित्यर्थः । यदि न स्यादित्यस्य विवरणं यदि न भवनस्य स- म्भावनेति। पूर्ववदिति वैधर्म्येण दृष्टान्तकथनं, यदि नामेत्यादौ यथा भवनस्य सम्भा- वनेति । अयमेवार्थ इति निषेधस्थलेऽपि लिङस्सम्भावनैवार्थ इति भावः । अथादौ प्रतिपत्तिसौकर्याय तात्पर्य दर्शयति-तत्रेत्यादिना । तत्र ध्वनिविषये । समयापेक्षणेन सङ्केतसहकारेण । इति कृत्वा इत्यतो हेतोः, शब्दस्य सङ्केतितार्थबोधकत्वादिति यावत् । वाच्यव्यतिरिक्त सङ्केतितार्थव्यतिरिक्तम् । व्यङ्गयं तत्त्वेनाभिमतम् , नास्ति काव्ये नास्ति, व्यङ्गयत्वेनाभिमतं. काव्यप्रतिपाद्यं न भवति काव्यशब्दासङ्केतितत्वादि- त्यर्थः । सदपीति । तद्वाच्यव्यतिरिक्तं व्यङ्गयं सदपि भाक्तमिति सम्बन्धः । अत्र हेतु:- अभिधावृत्त्याक्षिप्तमिति। अभिधावृत्त्या अभिधापुच्छभूतया वृत्त्या लक्षणया, आ- क्षिप्तं बोधितम्। अत्र हेतुः-शब्देति। बलं सहकारि। तदनाक्षिप्तं अभिधावृत्त्यनाक्षिप्तम्। तत्सदित्यनयोरनुषङ्गः, सदपीति योजना। वक्तुम् असाधारणधर्मप्रकारेण प्रतिपादयि- तुम् । न शक्यं शक्तिर्नास्ति बुधेष्विति शेषः । अत्र दृष्टान्तः-कुमारीष्विवेति।वचन- शक्त्यधिकरणत्वविवक्षया सप्तमी। अतद्वित्सु भर्तृसुखमजानतीषुप्रधानविप्रतिपत्ती- ति । कारिकोक्तत्वादेषां प्राधान्यम् । तानेव प्रकारानाह-शब्देत्यादि। शब्दार्थयोर्ये गुणाः, अलङ्काराश्चतेषामेव । ते ह्युभयवादिसिद्धशोभाहेतुभावाः। शब्देति । काव्यशोभाकारित्वा- दित्यर्थः । हेतुरयं वक्ष्यमाणे सर्वत्र बोध्यः-यत्र यत्र काव्य शोभाकारित्वं तत्र तत्र श- ।<noinclude></noinclude> cy447h8t6470hfhjlieszvpv0sl6idh पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५१ 104 95997 416932 368788 2026-06-20T13:34:45Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=१६|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{gap}}तत्र केचिदाचक्षीरन् – शब्दार्थशरीरन्तावत्काव्यम् । तत्र च शब्दग. {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} प्रकृतेऽपीति तृतीयः प्रकारः । एवमेकस्त्रिधा विकल्पः, अन्यौ च द्वौविति पञ्च विकल्पा इति तात्पर्यार्थः । तानेव क्रमेणाह-शब्दार्थशरीरं तावदित्यादिना । तावद्ग्रहणेन कस्याप्यत्र न विप्रतिपत्तिरिति दर्शयति। तत्र शब्दार्थो न तावद्ध्वनिः, यतः संज्ञामात्रे- ण हि को गुणः ? अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः । तथापि द्विविधं चारुत्वम्- स्वरूपमात्रनिष्ठं संघटनाश्रितं च । तत्र शब्दानां स्वरूपमात्रकृतं चारुत्वं शब्दाल- ङ्कारेभ्यः, संघटनाश्रितं तु शब्दगुणेभ्यः । एवमर्थानां चारुत्वं स्वरूपमात्रनिष्टमुप- मादिभ्यः । संघटनापर्यवसितं त्वर्थगुणेभ्य इति न गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो ध्वनिः कश्चित्। संघटनाधर्मा इति। शब्दार्थयोरिति शेषः । यद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तं तच्चा- रुत्वकारि न भवति, नित्यानित्यदोषा असाधुदुःश्रवादय इव । चारुत्वहेतुश्च ध्वनिः, तन्न तद्व्यतिरिक्त इति व्यतिरेकी हेतुः। ननु वृत्तयो रीतयश्च यथा गुणालङ्कारव्यतिरिक्ता- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} त्यर्थः । इति तात्पर्यार्थ इति । वृत्तिग्रन्थस्येति शेषः । 'शब्दार्थशरीरं तावदित्यत्र ताव- च्छब्दस्सम्प्रतिपत्त्यर्थ इत्याह-तावद्ग्रहणेनेति । कस्याप्यत्र न विप्रतिपत्तिरिति ध्वनि- वादिनोऽप्यभिमतमेतदित्यर्थः। शब्दार्थयोर्ध्वनित्वमनिराकृत्य तदाश्रितगुणादीनां ध्वनि- त्वनिराकरणमसंगतं स्यादतस्तेषां क्रमेण ध्वनित्वं निराकरोति-तत्रेत्यादिना । तावत् प्रथमम् । न ध्वनिरिति। तयोः शरीरत्वेन जीवितरूपव्यङ्गयत्वाभ्युपगमस्य स्व सिद्धान्त- विरुद्धत्वादिति भावः। यदि च तयोरेव ध्वनिसंज्ञा, तदा व्यर्थः प्रयास इत्याह-संज्ञेति । गुणः उपकारः । अथेत्यादि । अथ यदि, यतश्चारुत्वम् । स इति । चारुत्वहेतुरित्यर्थः। तथापीत्यस्य न गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो ध्वनिः कश्चिदित्यनेन सम्वन्धः। अत्र हेतुं चारुत्व- स्य गुणालङ्कारमात्रकार्यत्वप्रदर्शनेनाह-द्विविधमित्यादिना। स्वरूपमात्रकृतं स्वरूप. मात्रनिष्ठम् । संघटनेति। रचनेत्यर्थः। गुणानां संघटनाश्रितत्वं वक्ष्यते। इतीति-हेतौ । यतो गुणालङ्कारजन्यचारुत्वविधाद्वयानन्तर्भूतचारुत्वविधान्तरविरहस्तत इत्यर्थः । नेत्या- दि । चारुत्वहेतोर्ध्वनेर्न गुणालङ्कारातिरिक्ततया सद्भावः सेद्धुमर्हतीत्यर्थः । संघटनाधर्मा इत्यत्र स्वोक्तार्थानुरोधेन पूरयति-शब्दार्थयोरिति शेष इति । स्वोक्तार्थेऽनुमानं प्रमाण- माह-यदित्यादि। अत्रोदाहरणाद्यवयवत्रयप्रदर्शनं मीमांसकमतानुरोधेनाध्वनित्वेनाभिम- तो न गुणालङ्कारव्यतिरिक्तः, चारुत्वहेतुत्वादिति प्रतिज्ञाहेतू द्रष्टव्यौ।असाधु दुःश्रवादय इति भावप्रधानो निर्देशः। असाधुत्वं व्याकरणलक्षणरहितत्वं स नित्यो दोषः, सर्वत्र वर्जनी- यत्वात् । दुःश्रवत्वं श्रुतिदुष्टत्वं, स ह्यनित्यो दोषः, शृङ्गारादावेव वर्जनीयत्वाद् । व्यति- रेकीति । केवलव्यतिरेकीत्यर्थः । गुणालङ्कार विशेषयोरत्र दृष्टान्तत्वसम्भवादन्वयव्यति- {{rule}} {{gap}}१. इत आरभ्य साहित्यव्याकरणाचार्यैः पं० महादेवशास्त्रिपाण्डेयविरचिता टिप्पणी पं० पट्टाभिरामशास्त्रिणा विरचितं विवरणं च । प्रकाश्यते । अत्राऽयमनुमानप्रयोगः-<noinclude></noinclude> 1xugsexm3br5c74zcs27fvh900zw8i1 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५२ 104 95998 416933 368841 2026-06-20T13:34:57Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=१७}} {{rule}}</noinclude> ताश्चारुत्वहेतवोऽनुप्रासादयः प्रसिद्धा एव । अर्थगताश्चोपमादयः । वर्णसं. घटनाधर्माश्च ये माधुर्यादयस्तेऽपि प्रतीयन्ते । तदनतिरिक्तवृत्तयो वृत्तयोऽपि {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} चारुत्वहेतवश्व, तथा ध्वनिरपि तद्व्यतिरिक्तश्च चारुत्वहेतुश्च भविष्यतीत्यसिद्धो व्यतिरेक इत्यनेनाभिप्रायेणाह-तदनतिरिक्तवृत्तय इति । नैव वृत्तिरीतीनां तव्द्यतिरिक्तत्वं सिद्धम् । तथा ह्यनुप्रासानामेव दीप्तमसृणमध्यमवर्णनीयोपयोगितया परुषत्वललितत्व- मध्यमत्वस्वरूपविवेचनाय वर्गत्रयसम्पादनार्थ तिस्रोऽनुप्रासजातयो वृत्तय इत्युक्ताः, वर्तन्तेऽनुप्रासभेदा आस्विति । यदाह- {{center|{{bold|सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृष्वेतासु वृत्तिषु ।}}}} {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} रेकीत्यर्थ इति केचित् । 'शब्दार्थशरीरमित्यादेः 'प्रतीयन्त' इत्यन्तस्य वृत्तिग्रन्थस्य सारा- र्थं व्याख्यायोत्तरग्रन्थं प्रकृतोपयोगं दर्शयन्नवतारयति-नन्वित्यादि। असिद्धोव्यति- रेक इति । यत् गुणालङ्कारव्यतिरिक्तं, तच्चारुत्वकारि नेति व्यतिरेकव्याप्तेर्गुणालङ्कारव्य- तिरिक्तासु चारुत्वहेतुतया सम्प्रतिपन्नासु वृत्तिरीतिषु व्यभिचारादसिद्धिरित्यर्थः । इत्य- भिप्रायेणेति । इतिशङ्कायामुत्तराभिप्रायेणेत्यर्थः । तदभिप्रायं विशदयति-नैवेत्यादि । तव्द्यतिरिक्तत्वं गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वम् । वृत्तीनान्तावदनुप्रासालङ्कारान्तर्भावं दर्शयितुमाह-तथा ह्यनुप्रासानामेवेत्यादि । अनुप्रासानामेवेत्यस्य वर्गत्रयस म्पादनार्थमित्यनेन सम्बन्धः । तदपि किमर्थमित्यत्राह-परुषत्वेत्यादि । परुषत्वा- दिस्वरूपाणां विशिष्य प्रदर्शनार्थमित्यर्थः । तस्यापि फलमाह-दीप्तेति । दीप्तं रौद्रादौ रसे, मसृणं मधुरं शृङ्गारादौ, मध्यमं हास्यादौ, तथाविधं यद्वर्णनीयं विभा- वादि, तदुपयोगितया वर्णनीयविशेषोपयोगित्वेनानुप्रासविशेषोपादेयतासिद्धयर्थमि- त्यर्थः । अनुप्रासजातय इति । अनुप्रासानामाश्रयभूता जातय इत्यर्थः । विवरिष्यते चेदमुपरि । वृत्तय इत्युक्ताः वृत्तय इति व्यवहृताः । तत्र व्युत्पत्तिमाह-वर्तन्त इति । अनुप्रासभेदाः अनुप्रासविशेषाः । आस्विति। वृत्तिरित्यत्र वृतिधातोरधि- करणे क्तिन्निति भावः । यदाहेति । भट्टोद्भट इति शेषः । सरूपेति । एतासु {{rule}} ध्वनिः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाववान् , चारुत्वहेतुत्वात् , यो हि गुणालङ्कारव्यति- रित्तो भवति स चारुत्वहेतुर्न भवति । यथा-असाधुत्वदुःश्रवत्वादिको दोष इति । केवलव्यतिरेकी नाम-'असत्सपक्षो यत्र व्यतिरेकसहचारेण व्याप्तिंग्रहः । {{gap}}१. उद्भटकाव्या., १. ८. {{gap}}२. 'अकर्तरि च कारके संज्ञायां (पा. सू., ३. ३. १९) इत्यधिकारस्थेन स्त्रियां क्तिन' ( पा. सू., ३. ३. ९४.) इत्यनेनेत्यर्थः । ३<noinclude></noinclude> dnh3guim3esrxe5h5svpiu0woy8w1r5 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५३ 104 95999 416934 368842 2026-06-20T13:35:08Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=१८|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} {{Block center|<poem>पृथक्पृथगनुप्रासमुशन्ति कवयः सदा ॥ इति ॥</poem>}} {{gap}}पृथक्पृथगिति । परुषानुप्रासा नागरिका । मसृणानुप्रासा उपनागरिका, ललिता । नागरिकया विदग्धया उपमितेति कृत्वा । मध्यममकोमलपरुषमित्यर्थः । अत एव वैदग्ध्यविहीनस्वभावासुकुमारापरुषग्राम्यवनितासादृश्यादियं वृत्तिर्ग्राम्येति । तत्र तृतीयः कोमलानुप्रास इति वृत्तयोऽनुप्रासजातय एव । न चेह वैशेषिकवद्वृत्तिर्विवक्षिता, येन {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} उक्तासु। तिसृषु वृत्तिषु परुषादिषु । पृथक्पृथक सरूपाणां सजातीयानां व्यञ्जनानां न्यासः उपनिबन्धः तम्। अनुप्रासमुशन्ति इच्छन्ति । “शषाम्यामि”. त्यादिकारिकात्रयेण परुषदिवृत्तीनां स्वरूपमुक्तान्तद्वन्थे द्रष्टव्यम् । {{gap}}पृथक् पृथगित्यंशं व्याचष्टे-परुषेत्यादि । परुषवर्णारब्धत्वात्परुषोऽनुप्रासो यस्यां वृत्तौ सा । परुषाया एव नागरिकेति संज्ञा । मसृणेति । मधुरवर्णारब्धत्वान्मसृणोऽनु- प्रासो यस्यां सा । अस्या नामद्वयमाह-उपनागरिका ललितेति । उपमिता नागरिकया उपनागरिकेत्यन्वर्था संज्ञेत्याह-नागरिकयेति । परुषानुप्रासः मसृणानु- प्रास इति पाठस्तु अनुप्रासवृत्योरैक्याभिप्रायेण योज्यः । वक्ष्यमाणग्राम्यवृत्तावनुप्रासस्य मध्यमत्वं दर्शयितुम्मध्यमशब्दार्थमाह-मध्यममकोमलपरुषमिति । मधुरवर्णभिन्नं परुषवर्णभिन्नञ्चेत्यर्थः । तदारब्धोऽनुप्रासो मध्यमानुप्रास इत्यर्थः । तदनुप्रासाया वृत्तेः ग्राम्यसंज्ञामुपादनपूर्वकमाह -अत एवेत्यादि । अत एव माधुर्यपारुष्यराहित्यादेव । वैदग्ध्येत्यादि । वैदग्ध्यविहीना स्वभावतः असुकुमारा अमधुरा, अपरुषा अनुद्वणस्वभावा च या ग्राम्यवनिता, तत्सादृश्यादित्यर्थः । तत्र तृतीयः कोम- लानुप्रास इति । उक्तेष्वनुप्रासेषु मध्यमानुप्रासः कोमलानुप्राससंज्ञकश्चेत्यर्थः । अनेन ग्राम्याया वृत्तेः रूढा कोमलसंज्ञा च भट्टोद्भटोक्ता दर्शिता । उपसंहरति-वृत्तय इत्यादि । {{rule}} {{Block center|<poem>१. शषाभ्यां रेफसंयोगैष्टवर्गेण च योजिता । परुषा नाम वृत्तिस्स्यात् ह्रबह्याद्यैश्च संयुता ॥ सरूपसंयोगयुतां मूर्ध्निवर्गान्त्ययोगिभिः । स्पशैर्युतां च मन्यन्ते उपनागरिकां बुधाः ॥ शेषैर्वणैर्यथायोगं कथितां कोमलाख्यया । ग्राभ्यां वृत्तिं प्रशंसन्ति काव्येष्वाहतबुद्धयः ॥</poem>}} उद्भटका,, १.५-७. २. 'अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया' (वार्ति., १८७. चौ. सं. ) इति वार्तिकेन समास इत्यर्थः। ३. कोमलवर्णानुप्रासाभावेन योगार्थाभावादित्यर्थः ।<noinclude></noinclude> huyag01sml9lo8zh8uwrr6cziosa4kl पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५४ 104 96000 416935 321041 2026-06-20T13:35:21Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=१९}} {{rule}}</noinclude> याः कैश्चिदुपनागरिकाद्याः प्रकाशिताः, ता अपि गताः श्रवणगो- {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} जातौ जातिमतो वर्तमानत्वं न स्यात् , तदनुग्रह एव हि तत्र वर्तमानत्वम् । यथाह कश्चित्- {{gap}}लोकोत्तरे हि गाम्भीर्ये वर्तन्ते पृथिवीभुजः । इति । {{gap}}तस्माद्वृत्तयोऽनुप्रासादिभ्योऽनतिरिक्तवृत्तयो नाभ्यधिकव्यापाराः । अत एव व्यापारभेदाभावान्न पृथगनुमेयस्वरूपा अपीति वृत्तिशब्दस्य व्यापारवाचिनोऽभिप्रायः । अनतिरिक्तत्वादेव वृत्तिव्यवहारो भामहादिभिर्न कृतः । उद्भटादिभिः प्रयुक्तऽपि तस्मि- न्नार्थः कश्चिदद्धिको हृदयपथमवतीर्ण इत्यभिप्रायेणाह-गताः श्रवणगोचरमिति । {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} शषादितत्तद्वर्णरचनारूपाः परुषाद्या वृत्तयो वस्तुतोऽनुप्रासेषु वर्तन्ते । यथा-पृथिवी- भुजि गाम्भीर्यं, ताः परुषत्वादिविशिष्टानुप्रासादिभिरभिव्यज्यन्ते च । यथा-गोत्वा- दिजातयो गवादिभिः । अतश्च स्वाश्रयाभिव्यङ्गयत्वसाम्यावृत्तीनां जातित्वोपचार इति भावः । ननु वृत्तिरूपजातौ तज्जातिमतोऽनुप्रासस्य वर्तनमुक्तमयुक्तं, वैशेषिकमतविरुद्ध- त्वादित्यत आह-न चेत्यादि । इह अस्मन्मते । वैशेषिकवत् वैशेषिकमत इव । वृत्ति विवक्षितेति । वर्तनमाधेयत्वरूपन्न विवक्षितमित्यर्थः । तर्हि तत्र वर्तनं कि- न्नामेत्यत आह-तदनुग्रह एवेति । वृत्तिरूपजातिकर्तृकानुग्रह एवेत्यर्थः । स च तत्कर्तृकं भेदकधर्मसमर्पणं रसाभिव्यञ्जनसामाधानं वा । {{gap}}उक्तार्थे दृष्टान्तमाह-लोकोत्तर इति । गम्भीर्ये वर्तन्त इति । गाम्भीर्यानुगृ- हीता भवन्तीत्यर्थः । गाम्भीर्यकर्तृकानुग्रहश्च सकलकार्यनिर्वहणसामर्थ्याधानादिरूपः । वृत्तौ 'तदनतिरिक्तवृत्तय' इत्यत्र तत्पदार्थन्दर्शयन्नुपसंहरति-तस्मादनुप्रासादिभ्य इत्यादि । नास्त्यतिरिक्ता वृत्तिर्व्यापारो यासां ता इत्यर्थकतया व्याचष्टे-नाभ्यधिके- ति। अनुप्रासानां यो व्यापारो रसव्यञ्जनविषयः, स एव वृत्तीनामपीति भावः। तदन- तिरिक्ता इत्यनुक्त्वा एवमुक्तः फलन्दशयनि-अत एवेत्यादि। अतः उक्तात् व्या- पारभेदाभावादेवेति योजना । न पृथगनुमेयस्वरूपा इति। पृथगनुप्रासावगमं विना नानुमेयस्वरूपाः, किन्तु वृत्तिव्यञ्जकवर्णविशेषरूपानुप्रासलिङ्ग गम्या इति भावः । न पृथगभिधेयस्वरूपा इति च पाठः । अनुप्रासाभ्यधिकव्यापारसत्त्वे तु वृत्तीनां स्वरूपं पृथगभिधेयं स्यादिति तद्भावः । उक्तार्थे वृद्धसम्मतिमाह-अनतीति । अनुप्रासान- तिरिक्तव्यापारत्वोक्त्या तदनतिरिक्तत्वं सिद्धमित्याशयेन अनतिरिक्तत्वादेवेत्युक्तम् । ननूद्बटादिभिः कृत एवेत्यत्राह-उद्भटादिभिरिति । प्रयुक्ते कृते । तस्मिन् वृत्ति. व्यवहारे । नार्थ इति । अर्थः वृत्तिशब्दार्थः । अधिकः अनुप्रासरूपार्थादधिकः । {{rule}} १. 'गाम्भीर्य यत्प्रभावेण विकारो नोपलभ्यत' (दशरू., ४.६.) इति लक्षण- लक्षितं गाम्भीर्यम् ।<noinclude></noinclude> m4voqa8h4tlv9edsmptlw3cchz1jxbd पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५५ 104 96001 416936 368879 2026-06-20T13:35:35Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416936 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=२०|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> चरम् । रीतयश्च वैदर्भीप्रभृतयः । तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिर्नामेति । {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} रीतयश्चेति । तदनतिरिक्तवृत्तयोऽपि गताः श्रवणगोचरमिति सम्बन्धः । तच्छब्दे- नात्र माधुर्यादयो गुणाः, तेषां च समुचितवृत्त्यर्पणे यदन्योन्यमेलनक्षमत्वेन पानक इव गुडमरिचादिरसानां सङ्घातरूपतागमनं दीप्तललितमध्यमवर्णनीयविषयं गौडीयवैदर्भ- पाञ्चालदेशहेवाकप्राचुर्यदृशा तदेव त्रिविध रीतिरित्युक्तम् । जातिर्जातिमतो नान्या, समु- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} इत्यभिप्रायेणति । 'गता' इत्यादिग्रन्थ उक्तार्थपर इत्यर्थः । रीतयश्चे त्यत्र समुचि. तपदानुपानेन पूरयन्नाह-तदित्यादि । तच्छब्दोऽत्र गुणपरामर्शक इत्याह-तच्छ- ब्देनेति । प्रत्यवमृश्यन्त इति शेषः । तथा पाठश्च । कथन्नाम रीतीनां गुणानतिरिक्तत्व- मिति तदुपपादयति-तेषाञ्चेत्यादि । तेषां समुचितवृत्त्यर्पणे यत्सङ्धातरूपतागमनं त्रिविधं तदेव रीतिरिति सम्बन्धः । तेषां गुणानाम् । समुचितेति । समुचिता दीप्तादिवर्णनीयौचित्यवती या वृत्तिः विशिष्टा वर्णरचना, तस्यां यद्गुणानामर्पणं तस्मि- नित्यर्थः। समुचिता तत्तद्रसव्यञ्जनोचिता या वृत्तिः व्यापारः, तदर्पणे निमित्ते इति केचित् । अन्योन्येति । परस्परसंश्लेषयोग्यत्वेन हेतुनेत्यर्थः । त्रैविध्योपपादक-दीप्ते- त्यादि । द्वन्द्वगर्भकर्मधारयस्य विषयपदेन बहुव्रीहिः । सङ्घातेति । समूहताप्राप्तिरि- त्यर्थः । असंहततया पृथक् पृथक् प्रातिस्विकरूपेणावस्थितानामेकत्र समूहीभावेन रूपा. न्तरप्राप्तिरिति यावत् । सङ्घातरूपत्वेन हृद्यत्वे दृष्टान्तः-पानक इवेति। तथा च माधु- र्यादिगुणानां प्रत्येक प्रातिस्विकरूपेण रीतिशब्दवाच्यत्वं नास्ति, परन्तु विशिष्टसङ्घात- धर्मवत्तयेति भावः । ननु केनैतदुक्तमिति शङ्कायां वैदर्भ्यादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तन्दर्शयन्नु- त्तरमाह-गौडीयेत्यादि । गौडविदर्भपाञ्चालसम्बन्धिनो गौडीयादयो ये देशास्तेषां तत्र. त्यकवीनामिति यावत् । विशिष्ट वर्णनविषये यो हेवाकः स्वभावः स्वाच्छन्धं वा, तं प्रा- चुर्येण पश्यतीति तेन । वामनेनेति भावः । हेवाकप्राचुर्यस्य दृशा दर्शनेन हेतुनेत्यर्थो वा । विदर्भादिषु दृष्टत्वात्तत्समाख्येति भावः । त्रिविधमित्यनेन रीतिगतमपि गौडीया वैदी पाञ्चालीति त्रैविध्यं सूचितम् । यथोक्तं वामनेन-"रीतिरात्मा काव्यस्य । विशिष्टा पादरचना रीतिः । विशेषो गुणात्मा । सा त्रेधा-वैदर्भी गौडीया पाञ्चाली च । वैद- र्भादिषु दृष्टत्वात्तत्समाख्या । समग्रगुणा वैदर्भी । ओजःकान्तिमती गौडीया। माधुर्यसौ. कुमार्योपपन्ना पाञ्चाली" इति । {{gap}}ननूक्तरीत्या युत्यनुप्रासयोर्जातिजातिमद्भावाद्रीतिगुणयोस्समुदायसमुदायिभावाच्च कथमैक्यमत आह-जातिरित्यादि । समुदायः अवयवी। समुदायिनः अव- {{rule}} १. वा. सू., १.२.६-१३.<noinclude></noinclude> 7hq5kfplsqembd1i1goiirae55oce5x पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५६ 104 96002 416937 368880 2026-06-20T13:35:53Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=२१}} {{rule}}</noinclude> अन्ये ब्रूयुः--नास्त्येव ध्वनिः । प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकिणः काव्य. {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} दायश्च समुदायिनो नान्य इति वृत्तिरीतयो न गुणालङ्कारव्यतिरिक्ता इति स्थित एवासौ व्यतिरेकी हेतुः । तदाह-तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति । नैष चारुत्वस्थानं शब्दार्थरूपत्वाभावात् । नापि चारुत्वहेतुः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वादिति । तेनाखण्ड- बुद्धिसमास्वाद्यमपि काव्यमपोद्धारबुद्धया यदि विभज्यते, तथाप्यत्र ध्वनिशब्दवाच्यो न कश्चिदतिरिक्तोऽथों लभ्यत इति नामशब्देनाह । {{gap}}ननु मा भूदसौ शब्दार्थस्वभावः, मा च भूत्तचारुत्वहेतुः, तेन गुणालङ्कारव्यति- रक्तोऽसौ स्यादित्याशङ्कय द्वितीयमभाववादप्रकारमाह-अन्य इति । भवत्वेवम् ; तथापि नास्त्येव ध्वनिर्यादृशस्तव लिलक्षयिषितः । काव्यस्य ह्यसौ कश्चिद्वक्तव्यः । न {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} स्वात् । नान्य इति । तयोस्तादात्म्यस्यैवाजीकारादिति भावः । प्रकृतमुपसंहरति- इतीति । स्थित एव उपपन्न एव । 'तद्वयतिरिक्त' इत्यादिग्रन्थः उक्तानुमानस्य निगमनरूप इत्यभिप्रायेणावतारयति-तदित्यादि । तदाह तस्मादाह । 'तद्वयतिरि- क' इति हेतुगर्भतच्छब्देन शब्दार्थौ तद्गुणालङ्काराश्च परामृश्यन्ते। 'कोऽयमि' न्यन्न किंशब्दः किमेष चारुत्वस्थान मुत चारुत्वहेतुरिति विकल्पनिषेधपरश्चेत्याशयेन ववृणोति-नैष इत्यादिना। शब्दार्थतद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तः काव्य चारुताहेतुत्वविशि. जो ध्वनिर्नास्तीति विशिष्टध्वनिसत्तानिषेधश्चानेनार्थासिद्धयतीति बोध्यम् । एष इति । वनित्वेनाभिमत इत्यर्थः । इतीत्यस्यानन्तरं किंशब्देनाहेति शेषो बोध्यः। किंशब्दे. वोक्तार्थे लब्धे कि नामशब्देनेत्यत आह-तेनेत्यादि। अपोद्धारवुद्धयेति । विभा- बुद्धयेत्यर्थः । नामशब्देनाहेति । नामशब्दोऽत्यन्तासत्वद्योतक इति भावः । एतावता शब्दार्थतद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तस्य काव्यशोभाहेतुत्वविशिष्टस्य ध्वनेर- भाव एव सिद्धः, न तु स्वरूपेण धनेरभाव इति तत्सिद्धये पक्षान्तरोपक्षेप इत्याशये- वितारयति-नन्वित्यादि । असौ ध्वनिः । तेनेति तथापीत्यर्थः । यद्वा चारुत्वहेतु- भावेनेत्यर्थः । चारुत्वहेतुत्वाद्धि गुणाद्यन्तर्भाव आपादितः, तदङ्गीकारे तु तद्वयति- क्तध्वनिसद्भावस्सम्भावनारह्ह एवेत्यर्थः । गुणालङ्कारेति शब्दार्थयोरुपलक्षणम् । इ. त्याशङ्कयेति। इति ध्वनिवादिशङ्काम्मनसिकृत्येत्यर्थः । भवत्वेवमित्यभ्युपगमे । तर्हि तमस्माभिरित्यत्राह-तथापीत्यादि । ननूक्तमेव तदस्तित्वमित्यत आह-यादृश न्यादि । तादृश इति पूर्वेण सम्बन्धः । यादृशो लिलक्षयिषितः काव्यसम्बन्धितया क्षणयुक्तं कर्तुमभिलषितः । इममर्थन्दर्शयन्नाह-काव्यस्य हीत्यादि । समुदितस्य {{rule}} १. निगमनं नाम-'अनुमितिहेतुलिङ्गपरामर्शप्रयोजकशाब्दज्ञान कारणब्याप्तिपक्ष- आधीप्रयुक्तसाध्यधीजनकं वाक्यम् । २. तथाप्यर्थकत्वाप्रसिद्धराह यद्वेत<noinclude></noinclude> srsf091yr3e36sinznzblmzbctd1pzy पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५७ 104 96007 416938 321105 2026-06-20T13:36:04Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416938 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=२२|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> प्रकारस्य काव्यत्वहानेः सहृदयहृदयाहादिशब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्ष. णम् । न चोक्तप्रस्थानातिरेकिणो मार्गस्य तत्सम्भवति । न च तत्सम- {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} चासौ नृत्तगीतवाद्यादिस्थानीयः काव्यस्य कश्चित् । कवनीयं काव्यं, तस्य भावश्च काव्य- त्वम् । न च नृत्तगीतादि कवनीयमित्युच्यते । {{gap}}प्रसिद्धेति । प्रसिद्धं प्रस्थानं शब्दार्थों तद्गुणाल ङ्काराश्चेति, प्रतिष्ठन्ते परम्परया व्यवहरन्ति येन मार्गेण तत्प्रस्थानम् । काव्यप्रकारस्येति । काव्यप्रकारत्वेन तव स मार्गोऽभिप्रेतः, 'काव्यस्यात्मा' इत्युक्तत्वात् । ननु कस्मात्तत्काव्यं न भवतीत्याह-सहृदयेति । मार्गस्येति । नृत्तगीताक्षिनिकोचनादिप्रायस्येत्यर्थः । तदिति । सहृदयेत्यादिकाव्यलक्षणमित्यर्थः । ननु ये तादृशमपूर्वं काव्यरूपतया जान- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} काव्यस्य समुदायितया सम्बन्धित्वेन ह्यसौ वक्तव्यः । न च गुणादिभ्यो व्यतिरेके सति काव्यसम्बन्धित्वमस्य शक्योपपादं, नृत्तगीतादिवत् । तदयं प्रयोग:-विवादाध्यासितो ध्वनिः, न काव्यं, शब्दार्थातिरिक्तत्वात् ; न च काव्यसम्बन्धी, तद्गुणालङ्कारातिरिक्त- त्वात् , नृत्तगीतादिवदिति । न च साध्यविकलो दृष्टान्तः, तेषामकवनोयत्वेन काव्यत्वा- भावस्य तत्सम्बन्धित्वाभावस्य च प्रसिद्धत्वादित्यर्थः । नृत्तगीतादेर्नाट्यस्थले शोभाका- रित्वरूपविशेष मनसि कृत्य दृष्टान्ततया कथनम् । {{gap}}स्वोक्तार्थपरतया प्रसिद्धेत्यादिग्रन्थं व्याचष्टे-प्रसिद्धमित्यादि । प्रतिष्ठन्त इत्यस्य व्याख्या–परम्परयेत्यादि । परम्परया अविच्छिन्नप्रवाहेण । व्यवहर- न्ति काव्यव्यवहारं कुर्वन्ति । येन मार्गेण मार्गतुल्येन येन । ध्वनेः काव्यप्रका- रत्वोक्तिर्ध्वन्यभाववादिनो व्याहतेत्याशङ्कय परप्रसिद्धद्युपजीविनी तदुक्तिरित्याह- काव्येत्यादि । काव्यप्रकारत्वेन काव्यभेदत्वेन । तत्वेनाभिमत इति तदर्थ इति भावः । वृत्तौ 'प्रसिद्धेत्यादिना पूर्वोक्त्तो हेतुर्दर्शितः । काव्यत्वहानेरित्यनेन साध्यश्चेति बोध्यम् । इत्याहेति । इत्याशङ्कायामाहेत्यर्थः । मार्गपदेन प्रकृते विवक्षितं व्याचष्टे- नृत्तेति । अक्षिनिकोचनादीत्यादिपदेनाक्षिसम्भविनां विकारान्तराणां परिग्रहः । प्रायशब्दस्तुल्यार्थकः । सहृदयेत्यादीति । सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमित्यर्थः । 'सहृदयहृदयाहादी'त्यनेन गुणालङ्कारसुन्दरत्वमुक्तम् । 'न च तत्समयेत्यादिवृत्तिग्रन्थ एक एव शङ्कोत्तरात्मकः । तत्र शङ्काभागं विवृणोति-नन्वित्यादि । तादृशमिति । यत्तत्र भवद्भिर्नृत्तगीतादिप्रायमिति सोपहासमुक्तं ध्वनिस्वरूपन्तदित्यर्थः । अपूर्व पूर्वमनुन्मीलितम् । जानन्तीत्यनेन 'तत्समयान्तः पातिनः सहृदयान् कांश्चिदिति {{rule}} १. ध्वनित्वस्याऽप्रसिध्या तद्रूपेण पक्षताया निर्वस्तुमशक्यत्वाद्विवादाध्यासितत्वेन तां समर्थयितुमाह-विवादाध्यासित इति ।<noinclude></noinclude> cyy1bogv0lboabmlw1wzawd9qceqkn9 पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५८ 104 96008 416939 321106 2026-06-20T13:37:56Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416939 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=२३}} {{rule}}</noinclude> यान्तःपातिनः सहृदयान् कांश्चित्परिकल्प्य तत्प्रसिद्ध्या ध्वनौ काव्यव्यपदेशः प्रवर्तितोऽपि सकलविद्वन्मनोग्राहितामवलम्बते । {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} न्ति, त एव सहृदयाः । तदभिमतत्वं च नाम काव्यलक्षणमुक्तप्रस्थानातिरेकिण एव भवि- ष्यतीत्याशङ्कयाह-न चेति । यथा हि खङ्गलक्षणं करोमीत्युक्त्वा आतानवितानात्मा प्राब्रियमाणः सकलदेहाच्छादकः सुकुमारश्चित्रतन्तुविरचितः संवर्तनविवर्तनसहिष्णुर- च्छेदकः सुच्छेद्य उत्कृष्टः खड्ग इति ब्रुवाणः, परैः पटः खल्वेवंविधो भवति न खड्ग इत्ययुक्ततया पर्यनुयुज्यमान एवं ब्रूयात्-ईदृश एव खड्गो ममाभिमत इति तादृगेवै- तत् । प्रसिद्धं हि लक्ष्यं भवति न कल्पितमिति भावः । तदाह-सकलविद्वदिति । विद्वांसोऽपि हि तत्समयज्ञा एव भविष्यन्तीति शङ्कां सकलशब्देन निराकरोति । {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} वृत्यर्थो विवृतः। तत्समयः ध्वनिपदसङ्केतः । 'तत्प्रसिद्धयेत्याद्यशं व्याचष्टे-तदभीति । नामशब्देन तदभिमतत्वस्यैव काव्यलक्षणत्वमिति सूचयति-इत्याशङ्कयाहेति । इत्ये- कांशेन ध्वनिवादिशङ्कामनूद्य परिहारमाहेत्यर्थः । 'सकले'त्यादि परिहारग्रन्थस्याभिप्राय सदृष्टान्तं स्पष्टयन्नाह-यथाहीत्यादि। खङ्गलक्षणं खड्गस्वरूपम् । करोमीति । करोतिरत्र वचनक्रियावाची । अत एव इति ब्रुवाण इति वक्ष्यते । आतानेति । आतानः आयामो विस्तारः । वितानः तिर्यग्विस्तारः । आत्मा स्वभावो यस्य सः । प्राव्रीयमाणः प्रावरणीक्रियमाणः । प्रावरणस्वरूप इति च पाठः । संवर्त- नेति । संवर्तनं सङ्कोचनम् । विवर्तनं विकासनम् । ते सहिष्णुः तद्योग्यः । इति ब्रुवाण इति । आतानादिविशिष्टः पदार्थः उत्कृष्टखड्ग इति वदन्नित्यर्थः । पर्यनुयु- ज्यमानः आक्षिप्यमाणः सन् । कथं बूयादित्यत्राह-ईदृश इत्यादि । ईदृशः पदार्थ एव मम खड्गत्वेनाभिप्रेत इत्यर्थः । एतदिति । सहृदयान्तरकल्पनयोक्तं काव्यल- क्षणमित्यर्थः । {{gap}}नन्वमुया सोपहासोक्तया किं जातम् ? न नः किञ्चिच्छिन्नमित्यत आह–प्रसिद्ध- मिति । लक्ष्यं लक्षणेन निरूपणीयम् । न कल्पितमिति । लक्ष्यं भवतीत्यनुष- ज्यते । तदाह उक्ताद्भावादाह । उक्ताभिप्रायं वचनमाहेत्यर्थः । विद्वन्मनसामुचित- विषय एव प्रवृत्तिसम्भवाद्विद्वत्पदेन उक्ताभिप्रायस्सूचित इति भावः । 'सकले'त्युक्तः फलमाह--विद्वांसोऽपीति। तत्समयज्ञाः ध्वनिसमयज्ञाः । ननु माभूत्सकलवि- {{rule}} १. यद्वा लक्षणमित्यस्य लक्षणकथनमित्यर्थः । तथा च कृतिविषयस्य तादृशकथ- नस्य सम्पाद्यमानतया 'ब्रुवाण' इत्यस्य सुस्पष्टा सङ्गतिः । अत एव 'युद्ध करोमीत्यु- क्त्वा युध्यमानः परान् विजयते' इत्यादिप्रयोगाणां समौचित्यं सिद्धं भवति ।<noinclude></noinclude> qmefl9uap2z36crumdo0l5b49ykpu4b पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/५९ 104 96009 416940 368881 2026-06-20T13:38:05Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=२०|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> चरम् । रीतयश्च वैदर्भीप्रभृतयः । तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिर्नामेति । {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} रीतयश्चेति । तदनतिरिक्तवृत्तयोऽपि गताः श्रवणगोचरमिति सम्बन्धः। तच्छब्दे- नात्र माधुर्यादयो गुणाः, तेषां च समुचितवृत्त्यर्पणे यदन्योन्यमेलनक्षमत्वेन पानक इव गुडमरिचादिरसानां सङ्घातरूपतागमनं दीप्तललितमध्यमवर्णनीयविषयं गौडीयवैदर्भ- पाञ्चालदेशहेवाकप्राचुर्यदृशा तदेव त्रिविध रीतिरित्युक्तम् । जातिर्जातिमतो नान्या, समु- {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} इत्यभिप्रायेणेति । 'गता' इत्यादिग्रन्थ उक्तार्थपर इत्यर्थः । रीतयश्चे त्यत्र समुचि- तपदानुषञ्जनेन पूरयन्नाह-तदित्यादि । तच्छब्दोऽत्र गुणपरामर्शक इत्याह-तच्छ- ब्देनेति । प्रत्यवमृश्यन्त इति शेषः । तथा पाठश्च । कथन्नाम रीतीनां गुणानतिरिक्तत्व- मिति तदुपपादयति-तेषाञ्चेत्यादि । तेषां समुचितवृत्त्यर्पणे यत्सङ्घातरूपतागमनं त्रिविधं तदेव रीतिरिति सम्बन्धः । तेषां गुणानाम् । समुचितेति । समुचिता दीप्तादिवर्णनीयौचित्यवती या वृत्तिः विशिष्टा वर्णरचना, तस्यां यद्गुणानामर्पणं तस्मि- न्नित्यर्थः। समुचिता तत्तद्रसव्यञ्जनोचिता या वृत्तिः व्यापारः, तदर्पणे निमित्ते इति केचित् । अन्योन्येति । परस्परसंश्लेषयोग्यत्वेन हेतुनेत्यर्थः । वैविध्योपपादक-दीप्ते- त्यादि । द्वन्दूगर्भकर्मधारयस्य विषयपदेन बहुव्रीहिः । सङ्घातेति । समूहताप्राप्तिरि- त्वर्थः । असंहततया पृथक् पृथक् प्रातिस्विकरूपेणावस्थितानामेकत्र समूहीभावेन रूपा. न्तरप्राप्तिरिति यावत् । सङ्घातरूपत्वेन हृद्यत्वे दृष्टान्तः-पानक इवेति । तथा च माधु- र्यादिगुणानां प्रत्येक प्रातिस्विकरूपेण रीतिशब्दवाच्यत्वं नास्ति, परन्तु विशिष्टसङ्घात- धर्मवत्तयेति भावः । ननु केनैतदुक्तमिति शङ्कायां वैदर्भ्यादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तन्दर्शयन्नु- त्तरमाह-गौडीयेत्यादि । गौडविदर्भपाञ्चालसम्बन्धिनो गौडीयादयो ये देशास्तेषां तत्र- त्यकवीनामिति यावत् । विशिष्टवर्णनविषये यो हेवाकः स्वभावः स्वाच्छन्धं वा, तं प्रा- चुर्येण पश्यतीति तेन । वामनेनेति भावः । हेवाकप्राचुर्यस्य दृशा दर्शनेन हेतुनेत्यर्थों वा । विदर्भादिषु दृष्टत्वात्तत्समाख्येति भावः । त्रिविधमित्यनेन रीतिगतमपि गौडीया वैदर्भी पाञ्चालीति त्रैविध्यं सूचितम् । यथोक्तं वामनेन-"रीतिरात्मा काव्यस्य । विशिष्टा पादरचना रीतिः । विशेषो गुणात्मा । सा त्रेधा-वैदर्भी गौडीया पाञ्चाली च । वैद- र्भादिषु दृष्टत्वात्तत्समाख्या । समग्रगुणा वैदर्भी । ओजःकान्तिमती गौडीया । माधुर्यसौ. कुमार्योपपन्ना पाञ्चाली" इति । {{gap}}ननूक्तरोत्या वृत्यनुप्रासयोर्जातिजातिमद्भायाद्रीतिगुणयोस्समुदायसमुदायिभावाच्च कथमैक्यमत आह-जातिरित्यादि। समुदायः अवयवी। समुदायिनः अव- {{rule}} {{gap}}१. वा. सू, १. २.६-१३.<noinclude></noinclude> kop19x8dc3fvbr0u8hvxad2dhsizb1w पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/६० 104 96010 416941 321109 2026-06-20T13:38:17Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|center=प्रथमोद्योतः|right=२१}} {{rule}}</noinclude> अन्ये ब्रूयुः-- नास्त्येव ध्वनिः । प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकिणः काव्य. {{rule}} {{center|{{bold|लोचनम्}}}} दायश्च समुदायिनो नान्य इति वृत्तिरीतयो न गुणाल ङ्कारव्यतिरिक्ता इति स्थित एवासौ व्यतिरेकी हेतुः । तदाह-तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति । नैष चारुत्वस्थानं शब्दार्थरूपत्वाभावात् । नापि चारुत्वहेतुः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वादिति । तेनाखण्ड- बुद्धिसमास्वाद्यमपि काव्यमपोद्धारबुद्धया यदि विभज्यते, तथाप्यत्र ध्वनिशब्दवाच्यो न कश्चिदतिरित्तोऽर्थो लभ्यत इति नामशब्देनाह । {{gap}}ननु मा भूदसौ शब्दार्थस्वभावः, मा च भूत्तचारुत्वहेतुः, तेन गुणालङ्कारव्यति- रिक्तोऽसौ स्यादित्याशङ्कय द्वितीयमभाववादप्रकारमाह-अन्य इति । भवत्वेवम् ; तथापि नास्त्येव ध्वनिर्यादृशस्तव लिलक्षयिषितः । काव्यस्य ह्यसौ कश्चिद्वक्तव्यः । न {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} यवात् । नान्य इति । तयोस्तादात्म्यस्यैवाङ्गीकारादिति भावः । प्रकृतमुपसंहरति- रतीति । स्थित एव उपपन्न एव । 'तद्वयतिरिक्त' इत्यादिग्रन्थः उक्तानुमानस्य निगमनरूप इत्यभिप्रायेणावतारयति-तदित्यादि । तदाह तस्मादाह । 'तद्व्यतिरिक्त ' इति हेतुगर्भतच्छब्देन शब्दार्थौ तद्गुणालङ्काराश्च परामृश्यन्ते । “कोऽयमि' यत्र किंशब्दः किमेष चारुत्वस्थानमुत चारुत्वहेतुरिति विकल्पनिषेधपरश्चेत्याशयेन वृणोति-नैष इत्यादिना। शब्दार्थतद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तः काव्यचारताहेतुत्वविशि. ष्टो ध्वनिर्नास्तीति विशिष्टध्वनिसत्तानिषेधश्चानेनार्थात्सिद्धयतीति बोध्यम् । एष इति । ध्वनित्वेनाभिमत इत्यर्थः । इतीत्यस्यानन्तरं किंशब्देनाहेति शेषो बोध्यः । किंशब्दे- नवोक्तार्थे लब्धे किं नामशब्देनेत्यत आह-तेनेत्यादि । अपोद्धारबुद्धयेति । विभा- बुद्धयेत्यर्थः । नामशब्देनार्हति । नामशब्दोऽत्यन्तासत्वद्योतक इति भावः । {{gap}}एतावता शब्दार्थतद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तस्य काव्यशोभाहेतुत्वविशिष्टस्य ध्वनेर- नाव एव सिद्धः, न तु स्वरूपेण धनेरभाव इति तत्सिद्धये पक्षान्तरोपक्षेप इत्याशये- वितारयति-नन्वित्यादि । असौ ध्वनिः । तेनेति तथापीत्यर्थः । यद्वा चारुत्वहेतु- नाभावेनेत्यर्थः । चारुत्वहेतुत्वाद्धि गुणाद्यन्तर्भाव आपादितः, तदनङ्गीकारे तु तद्वयति- क्तध्वनिसद्भावस्सम्भावनार्ह एवेत्यर्थः । गुणालङ्कारेति शब्दार्थयोरुपलक्षणम् । इ. त्याशङ्कयेति। इति ध्वनिवादिशङ्काम्मनसिकृत्येत्यर्थः । भवत्वेवमित्यभ्युपगमे। तर्हि नतमस्माभिरित्यत्राह-तथापीत्यादि । ननूक्तमेव तदस्तित्वमित्यत आह-यादृश त्यादि । तादृश इति पूर्वेण सम्बन्धः । यादृशो लिलक्षयिषितः काव्यसम्बन्धितया क्षणयुक्तं कर्तुमभिलषितः । इममर्थन्दर्शयन्नाह-काव्यस्य हीत्यादि । समुदितस्य {{rule}} १. निगमनं नाम-'अनुमितिहेतुलिङ्गपरामर्शप्रयोजकशाब्दज्ञान कारणव्याप्तिपक्ष- धीप्रयुक्तसाभ्यधीजनक वाक्यम् । २. तेनेत्यस्य तथाप्यर्थकत्वाप्रसिद्धेराह यद्वेति ।<noinclude></noinclude> 9gd55a63lui9roaqymi57lsegran3mv पृष्ठम्:ध्वन्यालोकः - लोचनबालप्रियोपेतः.pdf/२६१ 104 116502 416917 370048 2026-06-20T13:30:30Z VaradaWiki 10464 /* प्रमाणितम् */ 416917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="VaradaWiki" />{{rh|left=१९२|center=सटीकलोचनोपेतध्वन्यालोके}} {{rule}}</noinclude> {{center|{{bold|लोचनम्}}}} तिवर्णनं प्रेयोलङ्कार इत्युक्तम् । तत्र प्रेयानलङ्कारो यत्र स प्रेयोलङ्कारोऽलङ्करणीय इहो. क्तः । न त्वलकारस्य वाक्यार्थत्वं युक्तम् । यदिवा वाक्यार्थत्वं प्रधानत्वम् । चम- त्कारकारितेति यावत् । उद्भटमतानुसारिणस्तु भङ्क्यत्वा व्याचक्षते-वाटुषु चाटुविषये वाक्यर्थत्वे चाटूनां वाक्यार्थत्वे प्रेयोलङ्कारस्यापि विषय इति पूर्वेण सम्बन्धः । उद्भ टमते हि भावालङ्कार एव प्रेय इत्युक्तः, प्रेम्णा भावानामुपलक्षणात् ।न केवलं रस- वदलङ्कारस्य विषयः यावत्प्रेयःप्रभृतेरपीत्यपिशब्दार्थः । रसवच्छब्देन प्रेयःशब्देन च सर्व एव रसवदाद्यलङ्कार। उपलक्षिताः, तदेवाह-रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इति उक्तविषय इति शेषः । {{center|{{bold|बालप्रिया}}}} इत्युक्तमिति । {{Block center|<poem>"प्रेयोगृहागतं कृष्णमवादीद्विदुरो यथा । अद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि गृहागते ॥ कालेनैषा भवेत् प्रीतिः तवैवागमनात्पुनः" ॥</poem>}} {{gap}}इति ग्रन्थेन दर्शितमित्यर्थः । तत्र तद्वचने सती । चाटुस्थले 'किं हास्येनेत्यादौ वर्ण्यमाननरपतिप्रभावादेरेव वाक्यार्थता न तु प्रेयोरूपालङ्कारस्येत्यतः तत्पदं बहुव्री हित्वाश्रयेण व्याचष्टे-प्रेयानित्यादि । इहेति । चाटुष्वित्यादिवाक्य इत्यर्थः । वाक्यार्थत्वं मुख्यतया वाक्यप्रतिपाद्यत्वम् । प्रेयानलङ्कारः प्रेयोलङ्कार इति यथाश्रु तार्थाभिप्रायेणाह-यदि वेति । प्रधानत्वमेव विवृणोति-चमदिति । अहो नरपतेः प्रभावो येनैवं दुर्दशा रिपुस्त्रीजनोऽनुभवतीति प्रभावालम्बितायाः प्रीतः रिपुस्त्रीजन: त्तान्तविषयकत्वाचमत्कारित्वं बोध्यम् । भङ्क्त्वेति । वाक्यं भित्वेत्यर्थः । व्याख्यानं दर्शयति-चाटुष्वित्यादि । वाक्यार्थत्वे वाक्यप्रतिपाद्यत्ये । फलितमाह-चाटूनां वाक्यार्थत्व इति । चाटुर्नाम श्लाघ्यमानोऽर्थो वर्ण्यमाननरपतिप्रभावादिः । शब्दो भिन्नक्रम इत्याह-प्रेयोलङ्कारस्थापीति । प्रेयोरूपालङ्कारस्यापीत्यर्थः । कुत्रास्य सम्बन्ध इत्यत आह-विषय इत्यादि । एकवचनान्ततयानुषक्तविषयपदेन सम्बन्ध इत्यर्थः । चाटुरिति शेषः, चाटुकाव्यमित्यर्थः । प्रेय इत्युक्त इति । प्रेयोल- ङ्कारत्वेनोक्त इत्यर्थः । प्रेयस्वीत्युक्त इति च पाठः । अत्र हेतुमाह-प्रेम्णेत्यादि । प्रेम्णा प्रेयश्शब्दार्थघटकरतिरूपप्रेम्णा । उपलक्षणादिति । यथोक्तमुद्भटेन- {{Block center|<poem>"रत्यादिकानां भावानामनुभावादिसूचनैः । यत्काव्यं बध्यते सद्भिः तत्प्रेयस्वदुदाहृत"मिति ॥</poem>}} {{gap}}रत्यादिकानामित्यादिशब्देनान्येषां स्थायिनां व्यभिचारिणां सात्विकानां च, अनु- भावादीत्यादिशब्देन विभावव्यभिचारिस्वशब्दानां च ग्रहणमत्र भावानामलङ्कारतेति च तद्व्याख्याता प्रतीहारेन्दुराजः । प्रेयोलङ्कारस्यापीत्यपिशब्दार्थमाह-न केवलमि- त्यादि । रसवच्छब्देनेति । यद्यपि रसवदलङ्कारस्येति पूर्ववृत्तिग्रन्थस्थरसवच्छब्देने- अपि<noinclude></noinclude> 41zlh7g8fvmzknfujejy9y0zer4svj7 पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२ 104 164863 416961 416845 2026-06-20T14:49:02Z Meera kale 10510 /* प्रमाणितम् */ 416961 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>Digitized by the Internet Archive in 2019 with funding from Wellcome Library {{Block center|https://archive.org/details/o31362540}}<noinclude></noinclude> k5owp70179pk78eyi99cwxhm2gx9tm4 416963 416961 2026-06-20T14:51:50Z Meera kale 10510 416963 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude> {{Block center|{{gap}}<poem>Digitized by the Internet Archive {{gap}}in 2019 with funding from {{gap}}Wellcome Library</poem>}} {{Block center|https://archive.org/details/o31362540}}<noinclude></noinclude> ejfsp85iua3cbua6fqxy2gdydfixstq पृष्ठम्:Goladipika.pdf/३ 104 164864 416964 416846 2026-06-20T14:53:01Z Meera kale 10510 /* प्रमाणितम् */ 416964 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude> 22500267270<noinclude></noinclude> 2wy2ug4k3z39gxz25wv8kcayfwtww6x पृष्ठम्:Goladipika.pdf/५ 104 164866 416958 416848 2026-06-20T14:44:43Z VaradaWiki 10464 416958 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{center|{{larger|TRIVANDRUM SANSKRIT SERIES.}}}} {{center|{{larger|No. XLIX.}}}} {{center|'''श्रीपरमेश्वरप्रणीता'''}} {{center|{{larger|'''गोलदीपिका ।'''}}}} {{rule|5em}} {{center|THE}} {{center|{{larger|'''GOLADIPIKÂ'''}}}} {{center|{{smaller|BY}}}} {{center|{{larger|'''SRI PARAMESWARA.'''}}}} {{center|{{smaller|EDITED BY}}}} {{center|T. GANAPATI SASTRI}} {{center|Curator of the Department for the publication of Sanskrit Manuscripts, Trivandrum.}} {{center|'''PUBLISHED UNDER THE AUTHORITY OF THE GOVERNMENT OF<br> HIS HIGHNESS THE MAHARAJAH OF TRAVANCORE'''}} {{rule|5em}} {{center|TRIVANDRUM:}} {{center|PRINTED BY THE SUPERINTENDENT, GOVERNMENT PRESS.}} {{center|1916.}} {{left|(All Rights Reserved)}}<noinclude></noinclude> 3pev0jhb9vvca37l74xgl977947xy1w 416966 416958 2026-06-20T14:58:18Z Meera kale 10510 /* प्रमाणितम् */ 416966 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{center|{{larger|TRIVANDRUM SANSKRIT SERIES.}}}} {{center|{{larger|No. XLIX.}}}} {{center|'''श्रीपरमेश्वरप्रणीता'''}} {{center|{{larger|'''''गोलदीपिका''''' ।'''}}}} {{rule|5em}} {{center|THE}} {{center|{{larger|'''GOLADIPIKA'''}}}} {{center|{{smaller|BY}}}} {{center|{{larger|'''SRI PARAMESWARA.'''}}}} {{center|{{smaller|EDITED BY}}}} {{center|T. 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The manuscript marked . in the foot- notes, contains fewer mistakes than the other two manu- scripts. Though the work has neither commentary nor illustrations, it is published in the hope that it might be of some use to students of Hindu Astronomy.}} {{center|{{gap}}The author of this work is Paramesvara. He says in the 69th Sloka of this work that he has written a commentary called Siddhântadipikâ on the Mahabhaskariya Bhashya. In his Bhashya on Aryabhatiya, Nilakantha observes “अश्वत्थग्रामजो भार्गवः परमेश्वरः सिद्धान्तदीपिकायां प्राह" [ie, "Paramesvara of the Bhargava Gotra, born in the Asvat- thagrâma, says in his Siddhantadîpika". This Asvatthagrâ- ma is the same as the present "Alattur" in the Kerala coun- try. Again the words अत्र निलातटे in the line 'गोकर्णे ग्रहणं भानोर्नात्र दृष्टं नीलातटे" quoted by Nilakantha as taken from the Sid- dhantadipika of Paramesvara, make it evident that Parames- vara must have also been an inhabitant of some place on the banks of the river Nila. Nilakantha observes in another place in his Bhashya that Paramesvara has written a work called a from which he (Nilakantha) quotes the follow- ing verse,}} {{center|<poem>'''एवं दृग्गणितं शाके त्रीषुविश्वमिते कृतम् । परमादीश्वरेणैतत् प्रायो भवति दृक्समम्''' ॥</poem>}} {{center|{{gap}}It is clear from this verse that the Drigganita was written in Saka 1353 and that the author must have lived about 1430 A.0.}} {{center|{{gap}}A commentary called Bhatadipika written by Paramesvara on Aryabhatiya has been published in Leiden. The author is also known to have written commentaries on the Lílávatì, the Laghumânasa and the Laghubhaskariya.}} {{left|Trivandrum,<br> 11th August 1916. T. GANAPATI SÂSTRÎ}}<noinclude></noinclude> f8782euhqqnxo2a0rrw6by1vv16n5ud 416960 416959 2026-06-20T14:47:52Z VaradaWiki 10464 416960 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{center|{{larger|PREFACE.}}}} {{center|{{gap}}The edition of the Goladîpikâ is based on three palm-leaf manuscripts in Malayalam characters obtained from the Raja of Idappalli. The manuscript marked . in the foot- notes, contains fewer mistakes than the other two manu- scripts. Though the work has neither commentary nor illustrations, it is published in the hope that it might be of some use to students of Hindu Astronomy.}} {{center|{{gap}}The author of this work is Paramesvara. He says in the 69th Sloka of this work that he has written a commentary called Siddhântadipikâ on the Mahabhaskariya Bhashya. 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Nilakantha observes in another place in his Bhashya that Paramesvara has written a work called a from which he (Nilakantha) quotes the follow- ing verse,}} {{center|<poem>'''एवं दृग्गणितं शाके त्रीषुविश्वमिते कृतम् । परमादीश्वरेणैतत् प्रायो भवति दृक्समम्''' ॥</poem>}} {{center|{{gap}}It is clear from this verse that the Drigganita was written in Saka 1353 and that the author must have lived about 1430 A.0.}} {{center|{{gap}}A commentary called Bhatadipika written by Paramesvara on Aryabhatiya has been published in Leiden. The author is also known to have written commentaries on the Lílávatì, the Laghumânasa and the Laghubhaskariya.}} {{left|Trivandrum,<br> 11th August 1916. T. 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In his Bhashya on Aryabhatiya, Nilakantha observes '''“अश्वत्थग्रामजो भार्गवः परमेश्वरः सिद्धान्तदीपिकायां प्राह"''' [ie, "Paramesvara of the Bhargava Gotra, born in the Asvat- thagrâma, says in his Siddhantadîpika". This Asvatthagrâ- ma is the same as the present "Alattur" in the Kerala coun- try. Again the words अत्र निलातटे in the line ''''गोकर्णे ग्रहणं भानोर्नात्र दृष्टं नीलातटे"''' quoted by Nilakantha as taken from the Sid- dhantadipika of Paramesvara, make it evident that Parames- vara must have also been an inhabitant of some place on the banks of the river Nila. Nilakantha observes in another place in his Bhashya that Paramesvara has written a work called a from which he (Nilakantha) quotes the follow- ing verse,}} {{center|<poem>'''एवं दृग्गणितं शाके त्रीषुविश्वमिते कृतम् ।''' '''परमादीश्वरेणैतत् प्रायो भवति दृक्समम् ॥'''</poem>}} {{center|{{gap}}It is clear from this verse that the Drigganita was written in Saka 1353 and that the author must have lived about 1430 A.0.}} {{center|{{gap}}A commentary called Bhatadipika written by Paramesvara on Aryabhatiya has been published in Leiden. The author is also known to have written commentaries on the Lílávatì, the Laghumânasa and the Laghubhaskariya.}} {{left|Trivandrum,<br> 11th August 1916. T. GANAPATI SÂSTRÎ}}<noinclude></noinclude> mn221r4kqvcvg5zbq3hwgth8s3w0z8u पृष्ठम्:Goladipika.pdf/१३ 104 164874 416965 416856 2026-06-20T14:53:32Z VaradaWiki 10464 416965 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{center|{{larger|'''निवेदना ।'''}}}} {{center|{{gap}}केरलीयलिपयस्तालपत्रात्मका इटप्पल्लिराजदत्तात्रय आदर्शग्रन्था अस्या गोलदीपिकाया मुद्रणाधाराः । तत्र क. संज्ञ इतरावपेक्ष्य शुद्धः । व्याख्यानादिविकलापीयं गोलव्युत्पित्सूनां कमप्युपकारमादधीतेति सम्प्रति यथामातृकं शोधयित्वा प्रकाशिता ।}} {{center|{{gap}}अस्याः प्रणेता '''परमेश्वरः''' । एष इहैव ऊनसप्ततितमे लोके '''महाभास्करीय'''भाष्यव्याख्यां '''सिद्धान्तदीपिकां''' नाम स्वेन प्रणीतामाह । आर्यभटीयभाष्ये गोलपादान्ते '''परमेश्वर'''पुत्र'''दामोदर'''शिष्यो '''नीलकण्ठ''' आह- "अश्वत्थ ग्रामजो भार्गवः परमेश्वरः सिद्धान्तदीपिकायां .... प्राह" इति । तत्र '''अश्वत्थग्राम''' इति '''आलतूरग्राम''' उच्यते । स च केरलीयः प्रसिद्धः । नीलकण्ठेन सिद्धान्तदीपिकाया'''बोल्ड''' उद्धृत्योदाहृते}} {{center|"गोकर्णे ग्रहणं भानोनत्र दृष्ट निलातटे"}} {{center|इति '''परमेश्वरीय'''श्लोके 'अत्र '''निलातटे'''' इति '''निलातट'''सन्निकृष्टत्वोक्त्या '''परमेश्वरो निलानदीत'''टवासीत्यपि प्रतीयते । अपि च आर्यभटीयभाष्ये, '''नीलकण्ठः परमेश्वरेण''' दृग्गणितं कृतमित्युक्त्वा|}} {{center|<poem>“एवं दृग्गणितं शाके त्रीषुविश्वमिते कृतम् । परमादीश्वरेणैतत् प्रायो भवति दृक्समम् ॥”</poem>}} {{center|इति दृग्गणितग्रन्थान्तस्थं श्लोकमुदाहृतवान् । तत्र 'त्री विश्वमिते शाके' इति कालनिर्देशात् १३५३तमे शालिवाहनशकाब्दे अस्मग्रन्थकार'''परमेश्वरस्य''' स्थितिरासीदिति स्पष्टमेव ।}} {{center|{{gap}}परमेश्वरेण प्रणीता '''भटदीपिका''' नासार्यभटीयव्याख्या लीडन्नगरे मुद्रितास्ति । लीलावती - लघुमानस-लघुभास्करीयाणामपि व्याख्यानानि अनेन निर्मितानि ।}} {{left|अनन्तशयनम् <br> ११-८-१९१६ । त. गणपतिशास्त्री.}}<noinclude></noinclude> ht8ny2jdahql4e8af2oh1ioch69v8d4 अनुक्रमणिका:शिल्परत्न 106 164919 416927 416914 2026-06-20T13:33:23Z Bnarayanan V 10460 416927 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=शिल्परत्न |Language=sa |Volume= |Author=श्री कुमारभट्ट |Co-author1= |Co-author2= |Translator=के.साम्बशिव शास्त्री |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor=के.साम्बशिव शास्त्री |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher=तस्याः उच्चतायाः सर्वकारस्य अधिकारेण महारानी-राज्यपालः |Address=त्रिवेन्द्रम् |Year=1929 |Key= |ISBN= |DLI= |IA=https://dn790002.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.326653/2015.326653.The-Silparatna.pdf |NLI= |Source=pdf |Image=1 |Progress=C |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 0iwkeb799ryf60c6487mi1ymnkw7qf8 अनुक्रमणिका:शिल्परत्न.pdf 106 164921 416949 2026-06-20T13:59:44Z Bnarayanan V 10460 नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416949 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=sa |Volume= |Author= |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor= |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= 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|Editor=के.साम्बशिव शास्त्री |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher= |Address=त्रिवेन्द्रम् |Year= |Key= |ISBN= |DLI= |IA= |NLI= |Source=pdf |Image=2 |Progress=OCR |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} a3dcw4gs6jdt72b5l8wqcwsbnlhlpba अनुक्रमणिका:2015.242032.Bijaganita-elements.pdf 106 164922 416950 2026-06-20T14:03:08Z Bnarayanan V 10460 नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416950 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=sa |Volume= |Author= |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor= |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= |Key= |ISBN= |DLI= |IA= |NLI= |Source=pdf |Image=1 |Progress=OCR |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 9mgptjfexl78ocwnbkd2o3u3tfd8fz1 416953 416950 2026-06-20T14:10:48Z Bnarayanan V 10460 416953 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=sa |Volume= |Author= |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor= |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= |Key= |ISBN= |DLI= |IA= |NLI= |Source=pdf |Image=2 |Progress=OCR |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} kc39ahv7t1tqy0scz98w5all6ir6rp7 पृष्ठम्:काव्यालङ्कारसूत्राणि.pdf/१ 104 164923 416956 2026-06-20T14:19:01Z VaradaWiki 10464 /* शोधितम् */ 416956 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VaradaWiki" /></noinclude>{{center|KAVYAMÂLÂ. 15.}} {{rule|5em}} {{center|{{larger|'''THE'''}}}} {{center|{{larger|'''KÂVYÂLANKÂRA-SÛTRAS'''}}}} {{center|{{larger|'''OF'''}}}} {{center|{{larger|'''VÂMANA'''}}}} {{center|{{larger|'''with his own Vṛitti.'''}}}} {{rule|5em}} {{center|EDITED}} {{center|{{smaller|BY}}}} {{center|{{larger|'''MAHAMAHOPADHYAYA PANDIT DURGAPRASADA'''}}}} {{center|{{smaller|AND}}}} {{center|{{larger|'''KAS'INATH PANDURANG PARAB.'''}}}} {{center|{{smaller|REVISED BY}}}} {{center|{{larger|'''WASUDEV LAXMAN SHASTRI PANS'ÎKAR'''}}}}. {{rule|5em}} {{center|Third Revised Edition.}} {{rule|5em}} {{center|PUBLISHED}} {{center|{{smaller|BY}}}} {{center|{{larger|PANDURANG JAWAJI,}}}} {{center|PROPRIETOR OF THE "NIRNAYA-SAGAR" PRESS,}} {{center|'''BOMBAY,'''}} {{rule|5em}} {{center|1926.}} {{rule|5em}} {{center|Price 12 Annas.}}<noinclude></noinclude> 1s61r8tewcnnh83yfq2y7mz7w0wwape अनुक्रमणिका:रसरत्नसमुच्चयः 106 164924 416971 2026-06-20T15:34:05Z Bnarayanan V 10460 नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416971 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=रसरत्नसमुच्चयः |Language=sa |Volume= |Author=श्रीवाग्भटाचार्यः |Co-author1= |Co-author2= |Translator=शंकर लाल हरि शंकर |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor=शंकर लाल हरि शंकर |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher=खेमराज श्री कृष्णदास |Address=मुम्बई 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पण्डितब्रजलालसूनुना महामहोपाध्याय-<br> पण्डित दुर्गाप्रसादेन, मुम्बापुरवासिना परवोपाह-<br> पाण्डुरङ्गात्मज काशिनाथशर्मणा च संशोधितानि,<br> तानि च पणशीकरोपाहृलक्ष्मणशर्मात्मज-<br> वासुदेवशर्मणा संस्कृतानि ।}}<br> {{rule|5em}} {{center|तृतीयं संस्करणम् ।}} {{rule|5em}} {{center|तच्च<br> '''मुम्बय्यां'''<br> पाण्डुरङ्ग जावजी<br> इत्येतैः खीये निर्णयसागराख्ययन्त्रालये मुद्रयित्वा प्राकाश्यं नीतम् ।}} {{rule|5em}} {{center|१९२६.}} {{rule|5em}} {{center|मूल्यं १२ आणका: ।}}<noinclude></noinclude> iaj84orimg8ogmkig39brr7w8kxznbg अनुक्रमणिका:रसरत्नसमुच्च" 106 164930 416977 2026-06-21T09:27:16Z Bnarayanan V 10460 नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416977 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=sa |Volume= |Author= |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor= |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= |Key= |ISBN= |DLI= |IA= |NLI= |Source=pdf |Image=2 |Progress=OCR |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} kc39ahv7t1tqy0scz98w5all6ir6rp7 अनुक्रमणिका:रसरत्नसमुच्चयः.pdf 106 164931 416978 2026-06-21T09:49:16Z Bnarayanan V 10460 ताम्रस्य, जस्तास्य, लोहस्य च कैल्सिनेशनस्य कृते धातुविज्ञानस्य पाठस्य अनुसरणं प्रसंस्करणरेखाः । 416978 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=रसरत्नसमुच्चयः |Language=sa |Volume= |Author=श्रीवाग्भटाचार्यः |Co-author1= |Co-author2= |Translator=शंकर लाल हरि शंकर |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor=शंकर लाल हरि शंकर |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher=खेमराज श्री कृष्णदास |Address=मुम्बई |Year=1910 |Key= |ISBN= |DLI= |IA=https://ia600708.us.archive.org/28/items/rasa-ratna-samucchaya-of-vagbhatacharya-shankar-lal-hari-shankar/Rasa%20Ratna%20Samucchaya%20of%20Vagbhatacharya%20-%20Shankar%20Lal%20Hari%20Shankar.pdf |NLI= |Source=pdf |Image=1 |Progress=OCR |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} ppjbla0ejzgva4ndactz5oi7uu3syq9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१ 104 164932 416979 2026-06-21T09:50:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चय (हिन्दी टीका सहित) खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई. नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416979 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चय (हिन्दी टीका सहित) खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.<noinclude></noinclude> otxn9ilmud1l0n557dnvlgelnuetis5 417003 416979 2026-06-21T10:37:43Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417003 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चय (हिन्दी टीका सहित) खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.<noinclude></noinclude> i920glothtf37wbjchvba3ylynhpp59 ग्रहलाघवम् 0 164933 416980 2026-06-21T09:54:52Z Bnarayanan V 10460 {{अनुक्रमणिका:रसरत्नसमुच्चयः.pdf | शीर्षिका = | ग्रन्थकर्ता = | अनुवादकः = | सम्पादकः = | वर्षम् = | प्रकाशकः = | पत्रसंज्ञा = | स्रोतः = ग्रहलाघवम्.pdf | प्रवर्धमानम् = | दलानि = |... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416980 wikitext text/x-wiki {{अनुक्रमणिका:रसरत्नसमुच्चयः.pdf | शीर्षिका = | ग्रन्थकर्ता = | अनुवादकः = | सम्पादकः = | वर्षम् = | प्रकाशकः = | पत्रसंज्ञा = | स्रोतः = ग्रहलाघवम्.pdf | प्रवर्धमानम् = | दलानि = | पुटानि = }} e1dgrrakq6z33xigeqwsozvr94dw7fb अनुक्रमणिका:ग्रहलाघवम्.pdf 106 164934 416981 2026-06-21T10:02:30Z Bnarayanan V 10460 नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416981 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=ग्रहलाघवम् |Language=sa |Volume= |Author=गणेश दैवज्ञः |Co-author1= |Co-author2= |Translator=पण्डित सुधाकर द्विवेदिन् |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor=पण्डित सुधाकर द्विवेदिन् |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher=खेमराज श्री कृष्णदास |Address=Bombay |Year=1925 |Key= |ISBN= |DLI= 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पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416983 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=योगरत्नसमुच्चयः |Language=sa |Volume= |Author=वैद्यचन्द्रता |Co-author1= |Co-author2= |Translator=अनन्तकुमार |Co-translator1= |Co-translator2= |Editor=अनन्तकुमार |Co-editor1= |Co-editor2= |Illustrator= |Publisher=वि.आ रामस्वामी शास्त्री |Address=त्रिवेन्द्रम् |Year=1917 |Key= |ISBN= |DLI= |IA=https://dn710305.ca.archive.org/0/items/yogaratnasamuccayaanantakumarramaswamisastriv.a.part3universityoftravancore152_546_e/Yoga%20Ratna%20Samuccaya%20Anantakumar%20Ramaswami%20Sastri%20V.A.%20Part%203%20University%20of%20Travancore%20152.pdf |NLI= |Source=pdf |Image=2 |Progress=OCR |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Notes= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 0h69748z0flx9ci1ifrpe0mpfh2qwdn पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/२ 104 164937 416984 2026-06-21T10:14:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रिक्तं पृष्ठं निर्मितम् 416984 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude><noinclude></noinclude> kfhgf5stgabjcpwl1a1r6jnv0g0wo08 417004 416984 2026-06-21T10:38:07Z Bnarayanan V 10460 /* Problematic */ 417004 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="2" user="Bnarayanan V" /></noinclude><noinclude></noinclude> qdu7o4z2rnpstubrv27b5r2mtq4flnm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/३ 104 164938 416985 2026-06-21T10:14:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ॥ श्रीः ॥ ॐ रससिद्धेश्वराय नमः श्रीसिंहगुप्तसून्वष्टाङ्गहृदयकर्तृ- श्रीवाग्भटाचार्यकृतः रसरत्नसमुच्चयः 00000 00000 “ आयुर्वेदोद्धारक” औषधालयाध्यक्ष वैद्यराज - श... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416985 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ ॐ रससिद्धेश्वराय नमः श्रीसिंहगुप्तसून्वष्टाङ्गहृदयकर्तृ- श्रीवाग्भटाचार्यकृतः रसरत्नसमुच्चयः 00000 00000 “ आयुर्वेदोद्धारक” औषधालयाध्यक्ष वैद्यराज - शंकरलाल हरिशंकर कृत हिन्दीभाषाटीकासहितः खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई<noinclude></noinclude> t7be9h1vrui2mlk8u8ng843t7rdjns9 417006 416985 2026-06-21T10:39:25Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ ॐ रससिद्धेश्वराय नमः श्रीसिंहगुप्तसून्वष्टाङ्गहृदयकर्तृ- श्रीवाग्भटाचार्यकृतः रसरत्नसमुच्चयः “ आयुर्वेदोद्धारक” औषधालयाध्यक्ष वैद्यराज - शंकरलाल हरिशंकर कृत हिन्दीभाषाटीकासहितः खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई<noinclude></noinclude> focpbz5e8fn0swmabh0sdjrqojg1zew पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/४ 104 164939 416986 2026-06-21T10:14:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ संस्करण: मार्च २०१९, संवत् २०७५ मूल्य : ६५० रुपये मात्र । सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा सुरक्षित । Printers & Publishers: Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004. Web Site: http://www.Khe-shri.com Emai... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416986 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>संस्करण: मार्च २०१९, संवत् २०७५ मूल्य : ६५० रुपये मात्र । सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा सुरक्षित । Printers & Publishers: Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004. Web Site: http://www.Khe-shri.com Email : khemraj@vsnl.com Printed by Sanjay Bajaj For M/s.Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai-400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate, Pune 411 013<noinclude></noinclude> bjdap35a5mgxz7hii016tq30c1w0xe2 417007 416986 2026-06-21T10:40:42Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>संस्करण: मार्च २०१९, संवत् २०७५ मूल्य : ६५० रुपये मात्र । सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा सुरक्षित । Printers & Publishers: Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004. 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भारतवर्ष परतन्त्र होने और राजकीय प्रोत्साहन न मिलनेके कारण अपने प्राचीन गौरवको खोकर पश्चात्पद होरहा है यह बात प्रत्येक सहृदय भारतीयके लिये मर्माविष्ट शल्यके समान है। यद्यपि राष्ट्रीय विद्या और कलाकौशलकी उन्नविके लिय राजाश्रय मुख्य है तथापि जब आजतक के अनुभवसे यह भली भांति सिद्ध हो चुका है कि विदेशी शासकोंसे उसकी आशा करना व्यर्थ है तब केवल स्वावलम्बनही भारतके उत्थानके लिये अमोघ उपाय है । विचार करनेसे प्रतीत होता है कि हमारे प्राचीन भव्य भारतके ध्वंसाव- शेष नव्य भारतमें जिस विविध ज्ञान - कलाकौशलके जीर्णोद्वार पूर्वक विका सकी अत्यधिक आवश्यकता है उसमेंसे आयुर्वेद एक परमावश्यक विषय है । हमारे प्राचीन आयुर्वेदकी उत्तमताके विषयमें किसीको कोई संदेह हो ही नहीं सकता, क्योंकि पाश्चात्य विद्वानोंने भी समय समय पर उसकी शतमुखसे प्रशंसा की है। हमें इसी पर फूल कर कुप्पा हो जाना भी उचित नहीं क्योंकि वर्तमान समयमें डाक्टरीके समान आयुर्वेद विषयक विकास करते हुए उसे सर्वाधिक सर्वोपयोगी बनानेकी अत्यधिक आवश्यकता है। यह भी निर्विवाद ही है कि हिन्दी जनताको जब तक आयुर्वेदकी उत्तमताका परिचय न दिलाया जायगा तब तक वह उसके प्रति अपनी सहानुभूति अथवा कर्तव्य प्रकट ही नहीं कर सकती। ऐसा होते हुए भी महान शोकके साथ कहना पड़ता है कि इस समय आयुर्वेदोद्धारके संबन्धमें जैसा निस्सार प्रयत्न हो रहा है उससे उसकी उपयोगिताका लेश भी लोगों के ध्यानमें नहीं आ सकता, अतः सुचारुरूपसे सुदृढ़ प्रयत्न होनेकी अति शीघ्र आवश्यकता है । सर्व साधारणको स्वशरीररक्षोपयोगी वैद्यक संबन्धी ज्ञान प्राप्त करनेके साधन और स्त्रियों को अपने गर्भ व बालकका पालन पोषण एवं गार्हस्थ्य जीवनको उत्तम दशामें लानेके लिय आवश्यक ज्ञान प्राप्त करनेकी सुविधाओंका प्रबन्ध सबसे प्रथम होना चाहिये। अथवा वैद्यकसंस्था - आयुर्वेदिक पाठशालाओंको स्थापित कर उनमें विद्यार्थियों को अनुभवके साथ पूर्ण शिक्षा देनेका नियम- वद्ध प्रबन्ध हो, आयुर्वेदीय सब प्रकारकी औषधोंका देशमें सर्वत्र प्रचुर प्रचार व्होकर, राजा रंक सबको समान रूपसे सुलभ इसके लिए एक विशाल कार्या-<noinclude></noinclude> qcq8wukf0yt1qsnjfmjzm3943fifhy9 417008 416987 2026-06-21T10:45:01Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417008 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>प्रस्तावना | संप्रति संसार में विद्या और कला संबन्धी अनेक आविष्कारोंकी धूम मच रही है । पाश्चात्य तथा पौरस्त्य (चीन, जापान आदि) सभी स्वतन्त्र राष्ट्र अपने अपने ज्ञान और धनका सदुपयोग इस विषय में अशान्त परिश्रम और आत्मोत्सर्गके साथ कर रहे हैं। परन्तु विद्या और कलामोंका आय प्रवर्तक, सारे संसारका आदिगुरु भारतवर्ष परतन्त्र होने और राजकीय प्रोत्साहन न मिलनेके कारण अपने प्राचीन गौरवको खोकर पश्चात्पद होरहा है यह बात प्रत्येक सहृदय भारतीयके लिये मर्माविष्ट शल्यके समान है। यद्यपि राष्ट्रीय विद्या और कलाकौशलकी उन्नविके लिय राजाश्रय मुख्य है तथापि जब आजतक के अनुभवसे यह भली भांति सिद्ध हो चुका है कि विदेशी शासकोंसे उसकी आशा करना व्यर्थ है तब केवल स्वावलम्बनही भारतके उत्थानके लिये अमोघ उपाय है । विचार करनेसे प्रतीत होता है कि हमारे प्राचीन भव्य भारतके ध्वंसाव- शेष नव्य भारतमें जिस विविध ज्ञान - कलाकौशलके जीर्णोद्वार पूर्वक विका सकी अत्यधिक आवश्यकता है उसमेंसे आयुर्वेद एक परमावश्यक विषय है । हमारे प्राचीन आयुर्वेदकी उत्तमताके विषयमें किसीको कोई सन्देह हो ही नहीं सकता, क्योंकि पाश्चात्य विद्वानोंने भी समय समय पर उसकी शतमुखसे प्रशंसा की है। हमें इसी पर फूल कर कुप्पा हो जाना भी उचित नहीं क्योंकि वर्तमान समयमें डाक्टरीके समान आयुर्वेद विषयक विकास करते हुए उसे सर्वाधिक सर्वोपयोगी बनानेकी अत्यधिक आवश्यकता है। यह भी निर्विवाद ही है कि हिन्दी जनताको जब तक आयुर्वेदकी उत्तमताका परिचय न दिलाया जायगा तब तक वह उसके प्रति अपनी सहानुभूति अथवा कर्तव्य प्रकट ही नहीं कर सकती। ऐसा होते हुए भी महान शोकके साथ कहना पड़ता है कि इस समय आयुर्वेदोद्धारके सम्बन्धमें जैसा निस्सार प्रयत्न हो रहा है उससे उसकी उपयोगिताका लेश भी लोगों के ध्यानमें नहीं आ सकता, अतः सुचारुरूपसे सुदृढ़ प्रयत्न होनेकी अति शीघ्र आवश्यकता है । सर्व साधारणको स्वशरीररक्षोपयोगी वैद्यक सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करनेके साधन और स्त्रियों को अपने गर्भ व बालकका पालन पोषण एवं गार्हस्थ्य जीवनको उत्तम दशामें लानेके लिय आवश्यक ज्ञान प्राप्त करनेकी सुविधा ओंका प्रबन्ध सबसे प्रथम होना चाहिये। अथवा वैद्यकसंस्था - आयुर्वेदिक पाठशालाओंको स्थापित कर उनमें विद्यार्थियों को अनुभवके साथ पूर्ण शिक्षा देनेका नियम- वद्ध प्रबन्ध हो, आयुर्वेदीय सब 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धर्मविरुद्ध अभक्ष्य भक्षण और अपेयपानरूप तामसी विदेशी चिकित्सा के क्षणिक और कृत्रिम स्वास्थ्यक दुष्परिणामसे देशी जनता सदाके लिय रोगी अंग्रेजी औषधोंका दास न वनकर सात्विक धर्मानुकूल देशी चिकित्सासे यथार्थ लाभ उठाते हुए सदा के लिये स्वस्थ बनें और साथही देशका धार्मिक और आर्थिक लाभ भी हो। जैन धर्म कि जिसकी मूल भित्ति " अहिंसा परमो धर्मः " इस वचन पर ही है उसके अनेक अनुयायी और शौच, आचार तथा अहिंसाको प्रधान माननेवाले वैदिक धर्मानुयायी अनेक वैष्णवादिभी मद्यमांसादिनिर्मित अंग्रेजी औषधोका स्वयं निःसंकोच व्यवहार करते हुए अन्य दीन अनाथोंके लिये भी डाक्टरोंकी निरीक्षकतामें अंग्रेजी औषधोंके दातव्य औषधालय खोलकर धर्मके बदले अपरिमित अधर्मका संग्रह कर रहे हैं यह कितने शोक और लज्जाकी बात है यह कहनेकी आवश्यकता नहीं । ऐसी अवस्थामें आयुर्वेद की उन्नति आवश्यक है इसे कौन न मानेगा; क्योंकि सारी देशोन्नतिका मूलाधार यही है इस लेख से भली भांति प्रमाणित हो चुका। परमावश्यक आयुर्वेदका विकास होनेके लिये सर्वप्रथम सबसे अधिक आवश्यकता तत्सम्बन्धी ग्रंथोंके प्रचुर परिमाणमे प्रकाशित होनेकी है। उनमें से बहुतसे ग्रन्थों के प्रकाशित होजानेपर भी अभी अनेक महत्त्वपूर्ण मन्थरत्न अप्रकाशित ही हैं । नवीन शोध, कलाकौशल, वाणिज्य, व्यवसाय और विद्यामें सभी यूरोपीय राज्यों की अपेक्षा जो अमेरिका आगे बढ़ा हुआ है और जहां विद्वानों का मत आज सारे संसार में सर्वमान्य हो रहा है, वहांके अग्रगण्य विद्वान् कहते हैं कि “भारतीय प्राचीन वैद्यक शास्त्रानुसार रोगियों का उप- चार किया जाय तो आधुनिक मरणसंख्यामें बहुत बड़ी घटती हो" इसी प्रकार इंग्लैंड और जर्मनीके विद्वान् भी भारतीय वैद्यकको वडे आदरकी से देखते हैं। जब कि हमारे देशबन्धु विदेशी टिंक्चर, वाइन आदि औषधोंकी चमक दमकपर मुग्ध होकर भारतीय प्राचीन वैद्यक शासकी<noinclude></noinclude> e7vakyf4prvywg4irisk1zu62ua2alf 417009 416988 2026-06-21T10:50:21Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417009 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(B) लय खोलकर उसमें उनके निर्माणका विराट् आयोजन करते हुए स्थान स्थान पर उक्त कायालयकी शाखायें इस ढङ्गसे खोली जायँ कि जिससे यत्र- तत्र धार्मिक धनिकों, सभा ओं और संयुक्त वाणिज्य समितियों (कम्पनियों) की ओर से जो अंग्रेजी डाक्टरोंकी अध्यक्षतामें औषधोंके दातव्य औषधालय खोले जाते हैं वे विद्वान् वैद्योङ्के तत्त्वावधान में देशी औषधोङ्के खोले जायें कि जिनसे " यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् " इस सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति विरुद्ध और धर्मविरुद्ध अभक्ष्य भक्षण और अपेयपानरूप तामसी विदेशी चिकित्सा के क्षणिक और कृत्रिम स्वास्थ्यक दुष्परिणामसे देशी जनता सदाके लिय रोगी अङ्ग्रेजी औषधोङ्का दास न वनकर सात्विक धर्मानुकूल देशी चिकित्सासे यथार्थ लाभ उठाते हुए सदा के लिये स्वस्थ बनें और साथही देशका धार्मिक और आर्थिक लाभ भी हो। जैन धर्म कि जिसकी मूल भित्ति " अहिंसा परमो धर्मः " इस वचन पर ही है उसके अनेक अनुयायी और शौच, आचार तथा अहिंसाको प्रधान माननेवाले वैदिक धर्मानुयायी अनेक वैष्णवादिभी मद्यमांसादिनिर्मित अंग्रेजी औषधोका स्वयं निःसङ्कोच व्यवहार करते हुए अन्य दीन अनाथोङ्के लिये भी डाक्टरोङ्की निरीक्षकतामें अङ्ग्रेजी औषधोंके दातव्य औषधालय खोलकर धर्मके बदले अपरिमित अधर्मका सङ्ग्रह कर रहे हैं यह कितने शोक और लज्जाकी बात है यह कहनेकी आवश्यकता नहीं । ऐसी अवस्थामें आयुर्वेद की उन्नति आवश्यक है इसे कौन न मानेगा; क्योङ्कि सारी देशोन्नतिका मूलाधार यही है इस लेख से भली भान्ति प्रमाणित हो चुका। परमावश्यक आयुर्वेदका विकास होनेके लिये सर्वप्रथम सबसे अधिक आवश्यकता तत्सम्बन्धी ग्रन्थोङ्के प्रचुर परिमाणमे प्रकाशित होनेकी है। उनमें से बहुतसे ग्रन्थों के प्रकाशित होजानेपर भी अभी अनेक महत्त्वपूर्ण मन्थरत्न अप्रकाशित ही हैं । नवीन शोध, कलाकौशल, वाणिज्य, व्यवसाय और विद्यामें सभी यूरोपीय राज्यों की अपेक्षा जो अमेरिका आगे बढ़ा हुआ है और जहां विद्वानों का मत आज सारे संसार में सर्वमान्य हो रहा है, वहांके अग्रगण्य विद्वान् कहते हैं कि “भारतीय प्राचीन वैद्यक शास्त्रानुसार रोगियों का उप- चार किया जाय तो आधुनिक मरणसंख्यामें बहुत बड़ी घटती हो" इसी प्रकार इंग्लैंड और जर्मनीके विद्वान् भी भारतीय वैद्यकको वडे आदरकी से देखते हैं। जब कि हमारे देशबन्धु विदेशी टिंक्चर, वाइन आदि औषधोंकी चमक दमकपर मुग्ध होकर भारतीय प्राचीन वैद्यक शासकी<noinclude></noinclude> 4vf59h2g0qg9yg0kgyvykv27wgkzoir 417010 417009 2026-06-21T10:51:22Z Bnarayanan V 10460 417010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(B) लय खोलकर उसमें उनके निर्माणका विराट् आयोजन करते हुए स्थान स्थान पर उक्त कायालयकी शाखायें इस ढङ्गसे खोली जायँ कि जिससे यत्र- तत्र धार्मिक धनिकों, सभा ओं और संयुक्त वाणिज्य समितियों (कम्पनियों) की ओर से जो अंग्रेजी डाक्टरोंकी अध्यक्षतामें औषधोंके दातव्य औषधालय खोले जाते हैं वे विद्वान् वैद्योङ्के तत्त्वावधान में देशी औषधोङ्के खोले जायें कि जिनसे " यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् " इस सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति विरुद्ध और धर्मविरुद्ध अभक्ष्य भक्षण और अपेयपानरूप तामसी विदेशी चिकित्सा के क्षणिक और कृत्रिम स्वास्थ्यक दुष्परिणामसे देशी जनता सदाके लिय रोगी अङ्ग्रेजी औषधोङ्का दास न वनकर सात्विक धर्मानुकूल देशी चिकित्सासे यथार्थ लाभ उठाते हुए सदा के लिये स्वस्थ बनें और साथही देशका धार्मिक और आर्थिक लाभ भी हो। जैन धर्म कि जिसकी मूल भित्ति " अहिंसा परमो धर्मः " इस वचन पर ही है उसके अनेक अनुयायी और शौच, आचार तथा अहिंसाको प्रधान माननेवाले वैदिक धर्मानुयायी अनेक वैष्णवादिभी मद्यमांसादिनिर्मित अंग्रेजी औषधोका स्वयं निःसङ्कोच व्यवहार करते हुए अन्य दीन अनाथोङ्के लिये भी डाक्टरोङ्की निरीक्षकतामें अङ्ग्रेजी औषधोंके दातव्य औषधालय खोलकर धर्मके बदले अपरिमित अधर्मका सङ्ग्रह कर रहे हैं यह कितने शोक और लज्जाकी बात है यह कहनेकी आवश्यकता नहीं । ऐसी अवस्थामें आयुर्वेद की उन्नति आवश्यक है इसे कौन न मानेगा; क्योङ्कि सारी देशोन्नतिका मूलाधार यही है इस लेख से भली भान्ति प्रमाणित हो चुका। परमावश्यक आयुर्वेदका विकास होनेके लिये सर्वप्रथम सबसे अधिक आवश्यकता तत्सम्बन्धी ग्रन्थोङ्के प्रचुर परिमाणमे प्रकाशित होनेकी है। उनमें से बहुतसे ग्रन्थों के प्रकाशित होजानेपर भी अभी अनेक महत्त्वपूर्ण मन्थरत्न अप्रकाशित ही हैं । नवीन शोध, कलाकौशल, वाणिज्य, व्यवसाय और विद्यामें सभी यूरोपीय राज्यों की अपेक्षा जो अमेरिका आगे बढ़ा हुआ है और जहां विद्वानों का मत आज सारे संसार में सर्वमान्य हो रहा है, वहांके अग्रगण्य विद्वान् कहते हैं कि “भारतीय प्राचीन वैद्यक शास्त्रानुसार रोगियों का उप- चार किया जाय तो आधुनिक मरणसंख्यामें बहुत बड़ी घटती हो" इसी प्रकार इंग्लैंड और जर्मनीके विद्वान् भी भारतीय वैद्यकको वडे आदरकी से देखते हैं। जब कि हमारे देशबन्धु विदेशी टिंक्चर, वाइन आदि औषधोंकी चमक दमकपर मुग्ध होकर भारतीय प्राचीन वैद्यक शासकी<noinclude></noinclude> p1nycvg14w6u2ir177igkptql6d2q1p 417011 417010 2026-06-21T10:51:59Z Bnarayanan V 10460 417011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(B) लय खोलकर उसमें उनके निर्माणका विराट् आयोजन करते हुए स्थान स्थान पर उक्त कायालयकी शाखायें इस ढङ्गसे खोली जायँ कि जिससे यत्र- तत्र धार्मिक धनिकों, सभा ओं और संयुक्त वाणिज्य समितियों (कम्पनियों) की ओर से जो अंग्रेजी डाक्टरोंकी अध्यक्षतामें औषधोंके दातव्य औषधालय खोले जाते हैं वे विद्वान् वैद्योङ्के तत्त्वावधान में देशी औषधोङ्के खोले जायें कि जिनसे " यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् " इस सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति विरुद्ध और धर्मविरुद्ध अभक्ष्य भक्षण और अपेयपानरूप तामसी विदेशी चिकित्सा के क्षणिक और कृत्रिम स्वास्थ्यक दुष्परिणामसे देशी जनता सदाके लिय रोगी अङ्ग्रेजी औषधोङ्का दास न वनकर सात्विक धर्मानुकूल देशी चिकित्सासे यथार्थ लाभ उठाते हुए सदा के लिये स्वस्थ बनें और साथही देशका धार्मिक और आर्थिक लाभ भी हो। जैन धर्म कि जिसकी मूल भित्ति " अहिंसा परमो धर्मः " इस वचन पर ही है उसके अनेक अनुयायी और शौच, आचार तथा अहिंसाको प्रधान माननेवाले वैदिक धर्मानुयायी अनेक वैष्णवादिभी मद्यमांसादिनिर्मित अंग्रेजी औषधोका स्वयं निःसङ्कोच व्यवहार करते हुए अन्य दीन अनाथोङ्के लिये भी डाक्टरोङ्की निरीक्षकतामें अङ्ग्रेजी औषधोंके दातव्य औषधालय खोलकर धर्मके बदले अपरिमित अधर्मका सङ्ग्रह कर रहे हैं यह कितने शोक और लज्जाकी बात है यह कहनेकी आवश्यकता नहीं । ऐसी अवस्थामें आयुर्वेद की उन्नति आवश्यक है इसे कौन न मानेगा; क्योङ्कि सारी देशोन्नतिका मूलाधार यही है इस लेख से भली भान्ति प्रमाणित हो चुका। परमावश्यक आयुर्वेदका विकास होनेके लिये सर्वप्रथम सबसे अधिक आवश्यकता तत्सम्बन्धी ग्रन्थोङ्के प्रचुर परिमाणमे प्रकाशित होनेकी है। उनमें से बहुतसे ग्रन्थों के प्रकाशित होजानेपर भी अभी अनेक महत्त्वपूर्ण मन्थरत्न अप्रकाशित ही हैं । नवीन शोध, कलाकौशल, वाणिज्य, व्यवसाय और विद्यामें सभी यूरोपीय राज्यों की अपेक्षा जो अमेरिका आगे बढ़ा हुआ है और जहां विद्वानों का मत आज सारे संसार में सर्वमान्य हो रहा है, वहांके अग्रगण्य विद्वान् कहते हैं कि “भारतीय प्राचीन वैद्यक शास्त्रानुसार रोगियों का उप- चार किया जाय तो आधुनिक मरणसंख्यामें बहुत बड़ी घटती हो" इसी प्रकार इंग्लैंड और जर्मनीके विद्वान् भी भारतीय वैद्यकको वडे आदरकी से देखते हैं। जब कि हमारे देशबन्धु विदेशी टिंक्चर, वाइन आदि औषधोंकी चमक दमकपर मुग्ध होकर भारतीय प्राचीन वैद्यक शासकी<noinclude></noinclude> 9im9u1fp4mvhqyib6c0gt664889hpos पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७ 104 164942 416989 2026-06-21T10:24:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (५) हँसी उडाते हुए अपनी अल्पबुद्धिका परिचय दे रहे हैं तब पाश्चात्य विद्वान् हमारे शास्त्रों के अनुसार नवीन शोध और अनुभव प्राप्त करनेमें तल्लीन हो रहे हैं यह कैसे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416989 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(५) हँसी उडाते हुए अपनी अल्पबुद्धिका परिचय दे रहे हैं तब पाश्चात्य विद्वान् हमारे शास्त्रों के अनुसार नवीन शोध और अनुभव प्राप्त करनेमें तल्लीन हो रहे हैं यह कैसे शोककी बात है पर ध्यान रहे कि वर्तमान समय में जो विना पढे लिख मूर्खव्यक्ति बैद्य वननेका ढोंग रचते हैं और जो ज्ञानलवदुर्विदग्ध पंण्डितंमन्य प्राचीन वैद्यक ग्रन्थोंके अस्त व्यस्त भावान्तर कर उन्हें प्रकाशित करते हुए ग्रन्थकार तथा प्रकाशकका नाटथ दिखाते हैं वह वैद्यक नहीं किंतु वैद्यकाभास है। जिसकी विदेशी विद्वान् मुक्तकण्ठसे भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं वह भारतीय पुरातन वैद्यक उन्हीं ऋषि, महर्षियों व आचायोंके बनाये हुए महानिबन्ध हैं कि जिन विख्यातनामा श्रीवाग्भट्टाचार्य भी हैं। सुनाजाता है कि इन्होंने वैद्यकसम्बन्धी चार पांच ग्रंथ रचे हैं किन्तु उनमें से संगति "अष्टांगहृदय" और "रसरत्नसमुच्चय" ये दो ही उपलब्ध हैं। शोक है कि सामग्री न मिलनेके कारण इनके जीवन वृत्तान्तके सम्बन्धमें हम कुछ भी नहीं लिख सकते । हमारे कतिपय अदूरदर्शी भाई यह आशंका करते हैं कि “अष्टाङ्गहृदय" की कृतिके साथ "रसरत्नसमुच्चय" कृति मिलती नहीं और चरक, सुश्रुत, वाग्भटके समय रसविद्याका प्रचार ही न था इससे "रसरत्न- समुच्चय” श्रीवाग्भटाचार्यका बनाया नहीं है । उन्हें यह सोचना चाहिये कि जब स्वयं वाग्भटाचार्य ही आरम्भमें "एतेषां क्रियतेऽन्येषां तन्त्राण्यालोक्य संग्रहः" इत्यादि वाक्यके द्वारा अपनेको रचयिता न कहकर संग्रहकर्ता लिख रहे हैं तब उनकी संग्रह की हुई अन्य आचायोंकी कृतिके साथ उनकी कृतिका मिलान कैसे मिल सकता है। और जब कि चरकादिकोंने रसायन प्रकर- णोंमें कहीं कहीं धातु भस्म और रसोंका उपयोग किया तथा “शिवसंहिता” के, कुछ स्फुट भाग व "नागार्जुनसेहिता" के कुछ स्फुट अध्याय इस समय भी मिलते हैं एवं सिंहलद्वीपस्थ एक संन्यासीको ताडपत्र लिखित "रावणसंहिता” भी मिली है तब यह कैसे कहा जा सकता है कि रसविद्या चरकादिकों के समयमे न थी । क्योंकि “शिवसहितादि" रसग्रन्थ चरकादिकोंसे भी अति- प्राचीन हैं। एसी अवस्थामें पूर्वापर अनुसन्धान न कर कूपमण्डूक- न्यायसे निर्मूल आक्षेप करना कदापि उचित नहीं । अस्तु । इस " रसरत्नसमुच्चय " ग्रन्थकी हस्तलिखित प्रतियां तो यत्र तत्र उपलब्ध थीं किन्तु यह अमूल्य प्रन्थरत्न सुचारुरूपसे अद्यावधि कहीं भी छपा न था । हां, कुछ दिन पहले पूनेमें 'आनन्दाश्रम की ओरसे इसका एक संस्करण ऐसा प्रकाशित हुआ था जो बहुत ही अस्तव्यस्त और अनेक विचित्र टिप्पणियों द्वारा विद्वानोंको भी भ्रमजनक हो रहा था। इससे इसकी शुद्धप्रति प्राप्त कर इसे सर्वोपयोगी शुद्ध रूपमें प्रकाशित करनकी चिरकालसे उत्कट उत्कण्ठा लग रही थी। क्योंकि हम अपने सदाके नियमानुसार अप्राप्य मन्थरत्नों को .<noinclude></noinclude> 6s0bmb5icg2cdhh3b6pftjs6otpy7sx 417012 416989 2026-06-21T10:54:20Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(५) हँसी उडाते हुए अपनी अल्पबुद्धिका परिचय दे रहे हैं तब पाश्चात्य विद्वान् हमारे शास्त्रों के अनुसार नवीन शोध और अनुभव प्राप्त करनेमें तल्लीन हो रहे हैं यह कैसे शोककी बात है पर ध्यान रहे कि वर्तमान समय में जो विना पढे लिख मूर्खव्यक्ति बैद्य वननेका ढोंग रचते हैं और जो ज्ञानलवदुर्विदग्ध पंण्डितंमन्य प्राचीन वैद्यक ग्रन्थोंके अस्त व्यस्त भावान्तर कर उन्हें प्रकाशित करते हुए ग्रन्थकार तथा प्रकाशकका नाटथ दिखाते हैं वह वैद्यक नहीं किंतु वैद्यकाभास है। जिसकी विदेशी विद्वान् मुक्तकण्ठसे भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं वह भारतीय पुरातन वैद्यक उन्हीं ऋषि, महर्षियों व आचायोंके बनाये हुए महानिबन्ध हैं कि जिन विख्यातनामा श्रीवाग्भट्टाचार्य भी हैं। सुनाजाता है कि इन्होंने वैद्यकसम्बन्धी चार पांच ग्रंथ रचे हैं किन्तु उनमें से संगति "अष्टांगहृदय" और "रसरत्नसमुच्चय" ये दो ही उपलब्ध हैं। शोक है कि सामग्री न मिलनेके कारण इनके जीवन वृत्तान्तके सम्बन्धमें हम कुछ भी नहीं लिख सकते । हमारे कतिपय अदूरदर्शी भाई यह आशंका करते हैं कि “अष्टाङ्गहृदय" की कृतिके साथ "रसरत्नसमुच्चय" कृति मिलती नहीं और चरक, सुश्रुत, वाग्भटके समय रसविद्याका प्रचार ही न था इससे "रसरत्न- समुच्चय” श्रीवाग्भटाचार्यका बनाया नहीं है । उन्हें यह सोचना चाहिये कि जब स्वयं वाग्भटाचार्य ही आरम्भमें "एतेषां क्रियतेऽन्येषां तन्त्राण्यालोक्य संग्रहः" इत्यादि वाक्यके द्वारा अपनेको रचयिता न कहकर संग्रहकर्ता लिख रहे हैं तब उनकी संग्रह की हुई अन्य आचायोंकी कृतिके साथ उनकी कृतिका मिलान कैसे मिल सकता है। और जब कि चरकादिकोंने रसायन प्रकर- णोंमें कहीं कहीं धातु भस्म और रसोंका उपयोग किया तथा “शिवसंहिता” के, कुछ स्फुट भाग व "नागार्जुनसेहिता" के कुछ स्फुट अध्याय इस समय भी मिलते हैं एवं सिंहलद्वीपस्थ एक संन्यासीको ताडपत्र लिखित "रावणसंहिता” भी मिली है तब यह कैसे कहा जा सकता है कि रसविद्या चरकादिकों के समयमे न थी । क्योंकि “शिवसहितादि" रसग्रन्थ चरकादिकोंसे भी अति- प्राचीन हैं। एसी अवस्थामें पूर्वापर अनुसन्धान न कर कूपमण्डूक- न्यायसे निर्मूल आक्षेप करना कदापि उचित नहीं । अस्तु । इस " रसरत्नसमुच्चय " ग्रन्थकी हस्तलिखित प्रतियां तो यत्र तत्र उपलब्ध थीं किन्तु यह अमूल्य प्रन्थरत्न सुचारुरूपसे अद्यावधि कहीं भी छपा न था । हां, कुछ दिन पहले पूनेमें 'आनन्दाश्रम की ओरसे इसका एक संस्करण ऐसा प्रकाशित हुआ था जो बहुत ही अस्तव्यस्त और अनेक विचित्र टिप्पणियों द्वारा विद्वानोंको भी भ्रमजनक हो रहा था। इससे इसकी शुद्धप्रति प्राप्त कर इसे सर्वोपयोगी शुद्ध रूपमें प्रकाशित करनकी चिरकालसे उत्कट उत्कण्ठा लग रही थी। क्योंकि हम अपने सदाके नियमानुसार अप्राप्य मन्थरत्नों को .<noinclude></noinclude> eue4j5spzrkinbglou0bh18mucn0hss पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८ 104 164943 416990 2026-06-21T10:28:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८ ) और उचित योजनामात्र की है। आरम्भ में पृष्ठांक सहित विषय सूची लगी रहनेके कारण इच्छित विषय तत्काल ढूंढा जा सकता है । उपसंहारमें विद्वान् वैद्य महोदय तथा सहृदय स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416990 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८ ) और उचित योजनामात्र की है। आरम्भ में पृष्ठांक सहित विषय सूची लगी रहनेके कारण इच्छित विषय तत्काल ढूंढा जा सकता है । उपसंहारमें विद्वान् वैद्य महोदय तथा सहृदय सद्गृहस्थोंसे सविनय निवेदन यह है कि वे इस अनुभवसिद्ध ग्रंथका संग्रह कर इसके द्वारा इच्छित लाभ उठाकर प्राचीन ऋषि, मुनि और श्रीवाग्भटाचार्यजीको धन्यवाद दें जिससे हम भी अपना श्रम सफल समझें । 66 निवेदयिता-- खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर " छापाखाना बम्बई.<noinclude></noinclude> nmr1daby2bdgpedsyf2nhdj70qu1avn 417013 416990 2026-06-21T10:55:22Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८ ) और उचित योजनामात्र की है। आरम्भ में पृष्ठांक सहित विषय सूची लगी रहनेके कारण इच्छित विषय तत्काल ढूंढा जा सकता है । उपसंहारमें विद्वान् वैद्य महोदय तथा सहृदय सद्गृहस्थोंसे सविनय निवेदन यह है कि वे इस अनुभवसिद्ध ग्रंथका संग्रह कर इसके द्वारा इच्छित लाभ उठाकर प्राचीन ऋषि, मुनि और श्रीवाग्भटाचार्यजीको धन्यवाद दें जिससे हम भी अपना श्रम सफल समझें । निवेदयिता-- खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर " छापाखाना बम्बई.<noinclude></noinclude> 4b96m83tup9u0akqktgpsfbkrsygel3 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९ 104 164944 416991 2026-06-21T10:29:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ अथ । रसरत्नसमुच्चयस्थ-विषयानुक्रमणिका । पूर्वखण्डः । १०: विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. प्रथमोऽध्यायः । अभ्रक के भेद २१ ग्रन्थकारकृत मङ्गलाचरण भाषाटीकाकारकत मङ्गलाच... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416991 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>अथ । रसरत्नसमुच्चयस्थ-विषयानुक्रमणिका । पूर्वखण्डः । १०: विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. प्रथमोऽध्यायः । अभ्रक के भेद २१ ग्रन्थकारकृत मङ्गलाचरण भाषाटीकाकारकत मङ्गलाचरण अथ गृहीतसाहाय्यप्रन्धकन्नामादि १ चारों अभ्रको का उपयोग १२ " अभ्रकके गुण दोष 930 २३ ... २ अभ्रककी शुद्धि तथा भस्म ... २४ हिमालयका वर्णन महादेवकी स्तुति ३ धान्याभ्रक विधि ... २५ ... ५ अन्य विधि ... २६ ६ अभ्रकका सत्यपातन "" ... ८ अभ्रककी बुति २८ सत्त्वाभ्ररसायन २९ ... आवश्यकता ३० पारदकी महिमा मूच्छितादि पारदके गुण देहको अजर अमर करनेकी- सम्पूर्ण औषधियों का पारेमें समावेश पारेसे ब्रह्मकी प्राप्ति ब्रह्मप्राप्तिका आनंद रसकी उत्पत्ति रस के भेद पांचों पारदोकी पृथक् २ निरुकि पारेमें स्थित कंचुकादि दोष द्वितीय अध्यायः । ९ श्रभ्रक भस्मकी अन्य विधि दिव्याभ्ररसायन ... C " ... १० बेकान्त परीक्षा .... ३३ ११ वैकान्तके गुण " ... १२ वैकान्तकी उत्पत्तिभेद " ... १४ वैकान्तका शोधन ... १६ ... ३४ ३५ : : : ... ... अष्टौ महारसा: गन्धक पार्वतीका रज है और अभ्रक पार्वतीदेवीका वीर्थ है (क्षेपक) अभ्रक के सामान्य गुण वैकान्तकी भस्मविधि | वैकान्तका सस्वपातन १७ वैकान्त रसायन १८ सुवर्णमाक्षिककी उत्पत्ति, लक्षण और गुण माक्षिक शोधन २० माक्षिक भस्मविधि | सुवर्णमाक्षिकका सत्त्वपातन सत्त्वकी दूसरी विधि सोनामाखीके सत्त्वकी परीक्षा २१ सोनामाखीके सत्त्वकी परीक्षा B " ३६ ३७ ... ३८ " ... ३९ ... ४० " ... 23 ...<noinclude></noinclude> 4lgz3fmr63n2j3vo3hlw72jfe0r09m0 417014 416991 2026-06-21T11:00:21Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>अथ । रसरत्नसमुच्चयस्थ-विषयानुक्रमणिका । पूर्वखण्डः । १०: विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. प्रथमोऽध्यायः । अभ्रक के भेद २१ ग्रन्थकारकृत मङ्गलाचरण भाषाटीकाकारकत मङ्गलाचरण अथ गृहीतसाहाय्यप्रन्धकन्नामादि १ चारों अभ्रको का उपयोग १२ अभ्रकके गुण दोष 930 २३ २ अभ्रककी शुद्धि तथा भस्म २४ हिमालयका वर्णन महादेवकी स्तुति ३ धान्याभ्रक विधि २५ ५ अन्य विधि २६ ६ अभ्रकका सत्यपातन ८ अभ्रककी बुति २८ सत्त्वाभ्ररसायन २९ आवश्यकता ३० पारदकी महिमा मूच्छितादि पारदके गुण देहको अजर अमर करनेकी- सम्पूर्ण औषधियों का पारेमें समावेश पारेसे ब्रह्मकी प्राप्ति ब्रह्मप्राप्तिका आनंद रसकी उत्पत्ति रस के भेद पांचों पारदोकी पृथक् २ निरुकि पारेमें स्थित कंचुकादि दोष द्वितीय अध्यायः । ९ श्रभ्रक भस्मकी अन्य विधि दिव्याभ्ररसायन १० बेकान्त परीक्षा ३३ ११ वैकान्तके गुण १२ वैकान्तकी उत्पत्तिभेद १४ वैकान्तका शोधन १६ ३४ ३५ अष्टौ महारसा: गन्धक पार्वतीका रज है और अभ्रक पार्वतीदेवीका वीर्थ है (क्षेपक) अभ्रक के सामान्य गुण वैकान्तकी भस्मविधि | वैकान्तका सस्वपातन १७ वैकान्त रसायन १८ सुवर्णमाक्षिककी उत्पत्ति, लक्षण और गुण माक्षिक शोधन २० माक्षिक भस्मविधि | सुवर्णमाक्षिकका सत्त्वपातन सत्त्वकी दूसरी विधि सोनामाखीके सत्त्वकी परीक्षा २१ सोनामाखीके सत्त्वकी परीक्षा ३६ ३७ ३८ ३९ ४० 23<noinclude></noinclude> 2bur2kihhur8bvo827otje1e294zrzy पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१० 104 164945 416992 2026-06-21T10:29:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रिक्तं पृष्ठं निर्मितम् 416992 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude><noinclude></noinclude> kfhgf5stgabjcpwl1a1r6jnv0g0wo08 417015 416992 2026-06-21T11:08:22Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयस्थ- विषय. पृष्ठ. विषय. पुष्ठ. सुवर्णमाक्षिक रसायन ४० गन्धक शुद्धि माक्षिक द्रावण ४१ | गन्धकतुति विमलाभेद गन्धकप्रयोग ६४ ६५ विमलाशुद्धि ४२ गंधकका कण्डूनाशक विमलामांरण और सत्वपातन ४३ प्रयोग विमला रसायन ४४ गन्धकतेल शिलाजीतका वर्णन ४५ गैरिक ६६ ६७ शिलाजीतके गुण शिलाजीत की शुद्धि ४६ | कासीस रसायन फटकरी ६८ ६९ ७० शिलाजीतकी मारण विधि ४७ हरताल ७२ शिलाजीत रसायन 27 हरतालशुद्धि शिलाजीत का सत्त्वपातन ४८ हरतालभस्म विधि ७३ कर्पूरगंधि शिलाजीत 37 100 हरितालस स्वपातन ७४ सस्यक (नीला थोथा) की - मनःशिला ७६ उत्पत्ति ४९ शान ७८ नीलेोका शोधन ५० ककुष्ठम् ८० रसकखपरिया नीलेथोकी भस्म तुत्थसत्त्वपातन तुत्थमुद्रिका (नीले थोथेकी अँगूठी ) चपला धातुप्रकार और लक्षण सर्पर शोधन रसकस स्वपातन 37 अष्ट साधारण रस ८३ कबीला गौरीपाषाण 77 अन्य प्रकार ५१ नवसादर ८४ ५२ बराटिका ५४ अमिजार ( अम्बर ) सिन्दुर ५५ हिंगुल ५६ ५८ मुद्दारश्वर राजावर्त ८६ ८७ ८९ ९० सर्पर रसायन तृतीयोऽध्यायः । रत्न ५९ माणिक्य अट उपरस गन्धकोत्पत्ति गन्धकभेद गन्धकगुणा ६१ गन्धकका माहात्म्य चतुर्थोध्यायः ६० विद्रुम तार्क्ष्य (पन्ना) ६२ पुष्पराज ९१ ९३ ९५ ९६.<noinclude></noinclude> ni0d7rsqr5wdr671o1v75h83vk8v99y पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/११ 104 164946 416993 2026-06-21T10:30:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ विषय. वज्र हीरा वज्रशोधन विषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. विषय. ९७ मुण्डलीह ३ पृष्ठ. वज्रभस्म वज्ररसायन नीलमणि (नीलम ) ... ९९ तीक्ष्णलौह 22 कान्तलोहके भेद BOD ... १०१ कान्तलोहके ल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416993 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय. वज्र हीरा वज्रशोधन विषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. विषय. ९७ मुण्डलीह ३ पृष्ठ. वज्रभस्म वज्ररसायन नीलमणि (नीलम ) ... ९९ तीक्ष्णलौह 22 कान्तलोहके भेद BOD ... १०१ कान्तलोहके लक्षण ... १०२ कान्तलोहके गुण ... " १२५ ... १२७ ... १२९ 22 गोभेदमणि ... १०३ सर्वलो बुद्धि वैर्यमणि CON १०४ सर्वलोह भस्म विधि ... १३० १२७ सर्वरत्नशुद्धि 33 ... लोह भस्म के गुण ... १३१ सर्वरत्नों की भस्म करने की विधि ... १०५ लोहद्रावण १३७ " ... शुद्ध लोहके दोष ... १४० रङ्गु रत्नधारण करने के गुण पंचमोध्यायः धातु (लोह आदि ) १०८] लोहोंकी परस्परमें गुणाधिकता मण्डर १४१ वंगका शोधन, भेद व लक्षण १३ वंगभस्म 13 " ... १४३ ... नगरसायन सुवर्ण (सोना) सुवर्णशोधन सुवर्णभस्म ... १४४ १०९ ... नाग (सीसा ) ... १४५ ११० सीसेकी शुद्धि " 440 सुवर्णहुति नागभस्म ११३ नागरसायन रूपा ... ११४ रौप्यशोधन रौप्य भस्म रौप्य रसायन रौप्य श्रुति ताम्र (तांबा) पीतल के भेद लक्षण, गुण ११५ पीतलकी मस्मविधि ... " ... १४८ ... ... १४६ १४६ १५० ... ११६ पित्तलरसायन ... १५० ११८ पीतलकी हुति ... १५१ ११८ कांस्यवर्णन ... १५२ " कांसेका शोधन मारण ... १५३ ताम्रकी शुद्धि ताम्र भस्म ... १२० वत्तलोह (भरत) ... १५४ ... १२१ सोमनाथी ताम्र भस्म ... १९३ आवश्यकता लौहम् ( लोहा ) रसोपरस और लोहोंके संस्कारकी विशेष ... ११४] भूनागसरवपातन विधि ... १५५ ... १५६<noinclude></noinclude> q4i24q7r1o7ygncyisu0a3ebchw0j87 417016 416993 2026-06-21T11:26:29Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय. वज्र हीरा वज्रशोधन विषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. विषय. ९७ मुण्डलीह ३ पृष्ठ. वज्रभस्म वज्ररसायन नीलमणि (नीलम ) ९९ तीक्ष्णलौह 22 कान्तलोहके भेद BOD १०१ कान्तलोहके लक्षण १०२ कान्तलोहके गुण १२५ १२७ १२९ 22 गोभेदमणि १०३ सर्वलो बुद्धि वैर्यमणि CON १०४ सर्वलोह भस्म विधि १३० १२७ सर्वरत्नशुद्धि 33 लोह भस्म के गुण १३१ सर्वरत्नों की भस्म करने की विधि १०५ लोहद्रावण १३७ शुद्ध लोहके दोष १४० रङ्गु रत्नधारण करने के गुण पंचमोध्यायः धातु (लोह आदि ) १०८] लोहोंकी परस्परमें गुणाधिकता मण्डर १४१ वंगका शोधन, भेद व लक्षण १३ वंगभस्म 13 १४३ नगरसायन सुवर्ण (सोना) सुवर्णशोधन सुवर्णभस्म १४४ १०९ नाग (सीसा ) १४५ ११० सीसेकी शुद्धि 440 सुवर्णहुति नागभस्म ११३ नागरसायन रूपा ११४ रौप्यशोधन रौप्य भस्म रौप्य रसायन रौप्य श्रुति ताम्र (तांबा) पीतल के भेद लक्षण, गुण ११५ पीतलकी मस्मविधि १४८ १४६ १४६ १५० ११६ पित्तलरसायन १५० ११८ पीतलकी हुति १५१ ११८ कांस्यवर्णन कांसेका शोधन मारण १५३ ताम्रकी शुद्धि ताम्र भस्म १२० वत्तलोह (भरत) १५४ १२१ सोमनाथी ताम्र भस्म १९३ आवश्यकता लौहम् ( लोहा ) रसोपरस और लोहोंके संस्कारकी विशेष ११४] भूनागसरवपातन विधि १५५ १५६<noinclude></noinclude> mfn69dirhuvo0g84zmzqp4i4jw5qr20 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१२ 104 164947 416994 2026-06-21T10:30:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ४ विषय. भूनागसत्त्व भुनागसत्य मुद्रिसा १५८ यन्त्र तैलपातनविधि 77 रसरत्नसमुच्चयस्थ | ... पृष्ठ. " विषय. नवमोऽध्यायः । पृष्ट ... २०४ ... १ दोलायन्त्र " षष्ठोऽध्यायः । ... २ स्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416994 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>४ विषय. भूनागसत्त्व भुनागसत्य मुद्रिसा १५८ यन्त्र तैलपातनविधि 77 रसरत्नसमुच्चयस्थ | ... पृष्ठ. " विषय. नवमोऽध्यायः । पृष्ट ... २०४ ... १ दोलायन्त्र " षष्ठोऽध्यायः । ... २ स्वेदनी यन्त्र शिष्य का वर्णन ... २०५ ... १६१ ३ पातन यन्त्र 000 रसायनाचार्य " ... ४ अधःपातन यन्त्र ... २०६ रसविधाका अधिकारी शिष्य 400 १६२ ५ कच्छप यन्त्र ... २०७ सेवक - ( सहायक ) अयोग्य शिष्य " ६ दीपिकायन्त्र ... २०८ " ... ७ डेकीयन्त्र " ... ... रससाधनके स्थान, रसशाला और रस मण्डप रसलिंग की स्थापना आदि शिष्यको दीक्षाविधि देवतादिकी पूजनविधि रससिद्धाचार्यो का पूजन पारद (रस) की कैसे मनुष्य को सिद्धि होती है सप्तमोऽध्यायः । ... १६७ ११ गर्भयन्त्र १६९ १२ हंसपाकयन्त्र ... १७२ १३ बालुकायन्त्र ... १४] लवगणयन्त्र १७४१५ नालिकायन्त्र १६ भूधर यन्त्र ... ... २१२ २१३ ... २१४ " ८ जारणायन्त्र ... २०९ १६३ ९ विद्यावर यन्त्र ... २१० १६४ १० सोमानल यन्त्र ... २११ " २१५ १७ पुढे यन्त्र रसशाला ... १७५ रसमें साधने योग्य पदार्थ १८ कोष्ठीयन्त्र ... १७६ रतसाधक वैद्योंके लक्षण परिचारक कैसे होने चाहिये रसवैद्योंके विशेष गुण रससाधकों की विशेष योजना अष्टमोऽध्यायः । ... १८० ... १९ बलमीयन्त्र २० तिर्यकूपातन यन्त्र २१ पालिका यन्त्र " " ... २२ घटयन्त्र ... १८२ २३ यष्टिकायन्त्र | २४ सिंगर फसे पारा निकाल- ... " "" " ... २१६ ... ६१७ ... " " ... परिभाषा पारद संस्कार ... १८३ नेके लिये विद्याधरयन्त्र ... १९५ २५ डमरुयन्त्र ... २१८ ... २१९<noinclude></noinclude> 9bhdyjw3txo5boa0py7wbibzbc3tsdk 417017 416994 2026-06-21T11:32:50Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>४ विषय. भूनागसत्त्व भुनागसत्य मुद्रिसा १५८ यन्त्र तैलपातनविधि 77 रसरत्नसमुच्चयस्थ | पृष्ठ. विषय. नवमोऽध्यायः । पृष्ट २०४ १ दोलायन्त्र षष्ठोऽध्यायः । २ स्वेदनी यन्त्र शिष्य का वर्णन २०५ १६१ ३ पातन यन्त्र रसायनाचार्य ४ अधःपातन यन्त्र २०६ रसविधाका अधिकारी शिष्य 400 १६२ ५ कच्छप यन्त्र २०७ सेवक - ( सहायक ) अयोग्य शिष्य ६ दीपिकायन्त्र ७ डेकीयन्त्र रससाधनके स्थान, रसशाला और रस मण्डप रसलिंग की स्थापना आदि शिष्यको दीक्षाविधि देवतादिकी पूजनविधि रससिद्धाचार्यो का पूजन पारद (रस) की कैसे मनुष्य को सिद्धि होती है सप्तमोऽध्यायः । १६७ ११ गर्भयन्त्र १६९ १२ हंसपाकयन्त्र १७२ १३ बालुकायन्त्र १४ लवगणयन्त्र १७४१५ नालिकायन्त्र १६ भूधर यन्त्र २१२ २१३ २१४ ८ जारणायन्त्र २०९ १६३ ९ विद्यावर यन्त्र २१० १६४ १० सोमानल यन्त्र २११ २१५ १७ पुढे यन्त्र रसशाला १७५ रसमें साधने योग्य पदार्थ १८ कोष्ठीयन्त्र १७६ रतसाधक वैद्योंके लक्षण परिचारक कैसे होने चाहिये रसवैद्योंके विशेष गुण रससाधकों की विशेष योजना अष्टमोऽध्यायः । १८० १९ बलमीयन्त्र २० तिर्यकूपातन यन्त्र २१ पालिका यन्त्र २२ घटयन्त्र १८२ २३ यष्टिकायन्त्र | २४ सिंगर फसे पारा निकाल- २१६ ६१७ परिभाषा पारद संस्कार १८३ नेके लिये विद्याधरयन्त् १९५ २५ डमरुयन्त्र २१८ २१९<noinclude></noinclude> t9makk44waems06r6bysq1y98gbuin2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१३ 104 164948 416995 2026-06-21T10:31:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ विषय, २६ नाभियन्त्र २७ प्रस्तयन्त्र २८ स्थालीयन्त्र २९ धूपयन्त्र २०] कन्दुक यन्त्र ३१ खल्वयन्त्र अर्द्धचन्द्राकार सरत चतुल खरल तप्तखल्व मूषा दशमोऽध्यायः । मू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416995 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय, २६ नाभियन्त्र २७ प्रस्तयन्त्र २८ स्थालीयन्त्र २९ धूपयन्त्र २०] कन्दुक यन्त्र ३१ खल्वयन्त्र अर्द्धचन्द्राकार सरत चतुल खरल तप्तखल्व मूषा दशमोऽध्यायः । मूषाको तैयार करने के व्य मूषा बनानेके लिये कैसी मिट्टी लेनी चाहिये । विषयानुक्रमणिका । पुछ. 27 ... १९११ विषय गारोष्ठी पृष्ठ. 22 " ५. कोष्टी " 300 २ पातालकोष्ठी २३७ ... १३८ ... २३९ २४० ... 32. ... २२२ ३ गारकोष्टी ... २२३ ४ भूषाकोठी ... २२४५ पुट ३०० ... २२५ पुटकी आवश्यकता " ... पुटखे होनेवाले लाभ ... २२६ १ महापुर ... ... २२९ 27 ... २४१ ... " " २ गजपुट २२७ ३ बाराह पुट ... २४३ " " कुक्कुट पुट ५ कपोतपुट २२८ ६ गोवर पुढ ... २४३ १ वज्रमूषा ७ भाण्डपुट " २ योगमूषा " ... ८ बालकापुढ ३ वज्रद्रावणी भूषा ... २३० ९ भूधरपुट ४ गारमूषा " ५ वरमूषा " ६ वर्णमूषा ... २३१ १० ला वकपुट औषधि प्रहण करनेकी परि- भाषा " २४४ ... २४५ ७ रौप्यमूषा " अष्टधातु ८ बिडमूपा ९ दूसरी वज्रद्रावणी मूषा १० वृन्ताकमूषा ११ गोस्तनी भूषा १२ मलमूषा १३ पद्मभूषा १४ गोलमूषा १५ महामूषा १६ मंडूक मूषा १७ मुसलाख्या मूषा मूषा-आप्यायन ... २३२ षट्लवण ... २३२ चारत्रय ... २३३ क्षारपचक ... ... " मधुरत्रय २३४ तैलवर्ग " " बसावर्ग मूत्रवर्ग ... २३५ माहिव पचक " अम्लवर्ग " अम्ल पंचक २३६/ पचमृत्तिका 17 " ... २४६ " " २४७ " " ... २४८ "<noinclude></noinclude> 9ye8vx44owo2jwf98blqte1nssjlspj 417018 416995 2026-06-21T11:36:40Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय, २६ नाभियन्त्र २७ प्रस्तयन्त्र २८ स्थालीयन्त्र २९ धूपयन्त्र २० कन्दुक यन्त्र ३१ खल्वयन्त्र अर्द्धचन्द्राकार सरत चतुल खरल तप्तखल्व मूषा दशमोऽध्यायः । मूषाको तैयार करने के व्य मूषा बनानेके लिये कैसी मिट्टी लेनी चाहिये । विषयानुक्रमणिका । पुछ. 27 १९११ विषय गारोष्ठी पृष्ठ 22 ५. कोष्टी 300 २ पातालकोष्ठी २३७ १३८ २३९ २४० 32. २२२ ३ गारकोष्टी २२३ ४ भूषाकोठी २२४५ पुट ३०० २२५ पुटकी आवश्यकता पुटखे होनेवाले लाभ २२६ १ महापुर २२९ 27 २४१ २ गजपुट २२७ ३ बाराह पुट २४३ कुक्कुट पुट ५ कपोतपुट २२८ ६ गोवर पुढ २४३ १ वज्रमूषा ७ भाण्डपुट २ योगमूषा ८ बालकापुढ ३ वज्रद्रावणी भूषा २३० ९ भूधरपुट ४ गारमूषा ५ वरमूषा ६ वर्णमूषा २३१ १० ला वकपुट औषधि प्रहण करनेकी परि- भाषा २४४ २४५ ७ रौप्यमूषा अष्टधातु ८ बिडमूपा ९ दूसरी वज्रद्रावणी मूषा १० वृन्ताकमूषा ११ गोस्तनी भूषा १२ मलमूषा १३ पद्मभूषा १४ गोलमूषा १५ महामूषा १६ मण्डूक मूषा १७ मुसलाख्या मूषा मूषा-आप्यायन २३२ षट्लवण २३२ चारत्रय २३३ क्षारपचक मधुरत्रय २३४ तैलवर्ग मूत्रवर्ग २३५ माहिव पचक अम्लवर्ग अम्ल पञ्चक २३६/ पचमृत्तिका 17 २४६ २४७ २४८<noinclude></noinclude> cbheht2c88hqqv2b32gqua2nfmd75o4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१४ 104 164949 416996 2026-06-21T10:32:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ६ विषय. विषवर्ग उविषवर्ग रसरत्नसमुच्चयस्थ- पृष्ठ, विषय. पृष्ठ. 22 ... २४९ पथ्य दुग्धवर्ण विश्वर्ग रक्तवर्ग " पारदका सेवन करने पर पारदसेवन करनेपर अपथ्य ... २८४ " ... 27 ... ... २५०... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416996 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>६ विषय. विषवर्ग उविषवर्ग रसरत्नसमुच्चयस्थ- पृष्ठ, विषय. पृष्ठ. 22 ... २४९ पथ्य दुग्धवर्ण विश्वर्ग रक्तवर्ग " पारदका सेवन करने पर पारदसेवन करनेपर अपथ्य ... २८४ " ... 27 ... ... २५० पीतवर्ग पारद जन्य विकारोंको शमन- करनेके उपाय ... २८६ " श्वेतवर्ग " ... कृष्णवर्ग 22 ... शोधनीय गण अथ उत्तर खण्डः । द्वादशोऽध्यायः । २५२ ज्वर चिकित्सा, रोग गणना, मृदुकरवर्ग " ... | बातज्वरके लक्षण द्रावणवर्ग ... २५२ पित्त ज्वर के लक्षण परिमाण " कफज्वरके लक्षण एकादशोऽध्यायः । मिश्रित दोषोंके लक्षण २८८ ... २८९ " ... २९० " ... त्रैलोक्य सुन्दररस अथवा पर्पटीरस,, रसके शोधन, मारण आदि त्रैलोक्य डम्बर रस १८ संस्कारोंका वर्णन प्रथम मेघनाद रस मान परिभाषा ... २५३ पारेके अष्टादश संस्कार ... २५५ ज्वरगजहरि रस अथवा ज्वरगजकेसरी पारेके दोष ... २५६ दीपिका रस १ स्वेदन संस्कार ... २५८ शीतभजी रस २ मर्दन संस्कार ... ३ मूर्छन संस्कार ... २९२ " ... " ... ... २९३ ... २९४ ४ उत्थापन सेस्कार " दूसरा शीतभंजी रस ... २५९ मृत जीवन रस ... " ... ५ पातन संस्कार ... २६० ऊर्ध्वपातन " ... अवपातन " तिर्यक् पातन ६ निरोध संस्कार ... २६२ --- .२६३ नियामन संस्कार " ... दीपन संस्कार रसबंधन ... जलूका बंध ( खीद्रावण ) पारेके भस्म करनेके विधि --- २६४ २६६ ... २९५ 200 ... २९६ शुद्ध ज्वरांकुश रस अथवा हिंगुलेश्वर महाज्वरांकुश रस मृत्युजयरस सर्वज्वरारि अथवा सर्व ... २९७ ... " ... २९८ ज्वरान्तक रस ... चन्द्र सूर्य अथवा चन्द्र सूर्योदय ... २७५ उमाप्रसादन रस ... २८१ शंकुश रस ... ... २०१ " ... • ३०२<noinclude></noinclude> lwi4f297gcm84dw3v7rf29h3chwbsyy 417019 416996 2026-06-21T11:40:54Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>६ विषय. विषवर्ग उविषवर्ग रसरत्नसमुच्चयस्थ- पृष्ठ, विषय. पृष्ठ. 22 २४९ पथ्य दुग्धवर्ण विश्वर्ग रक्तवर्ग पारदका सेवन करने पर पारदसेवन करनेपर अपथ्य २८४ 27 २५० पीतवर्ग पारद जन्य विकारोंको शमन- करनेके उपाय २८६ श्वेतवर्ग कृष्णवर्ग 22 शोधनीय गण अथ उत्तर खण्डः । द्वादशोऽध्यायः । २५२ ज्वर चिकित्सा, रोग गणना, मृदुकरवर्ग | बातज्वरके लक्षण द्रावणवर्ग २५२ पित्त ज्वर के लक्षण परिमाण कफज्वरके लक्षण एकादशोऽध्यायः । मिश्रित दोषोंके लक्षण २८८ २८९ २९० त्रैलोक्य सुन्दररस अथवा पर्पटीरस,, रसके शोधन, मारण आदि त्रैलोक्य डम्बर रस १८ संस्कारोङ्का वर्णन प्रथम मेघनाद रस मान परिभाषा २५३ पारेके अष्टादश संस्कार २५५ ज्वरगजहरि रस अथवा ज्वरगजकेसरी पारेके दोष २५६ दीपिका रस १ स्वेदन संस्कार २५८ शीतभजी रस २ मर्दन संस्कार ३ मूर्छन संस्कार २९२ २९३ २९४ ४ उत्थापन सेस्कार दूसरा शीतभंजी रस २५९ मृत जीवन रस ५ पातन संस्कार २६० ऊर्ध्वपातन अवपातन तिर्यक् पातन ६ निरोध संस्कार २६२ २६३ नियामन संस्कार दीपन संस्कार रसबन्धन जलूका बन्ध ( खीद्रावण ) पारेके भस्म करनेके विधि २६४ २६६ २९५ 200 २९६ शुद्ध ज्वराङ्कुश रस अथवा हिङ्गुलेश्वर महाज्वराङ्कुश रस मृत्युजयरस सर्वज्वरारि अथवा सर्व २९७ २९८ ज्वरान्तक रस चन्द्र सूर्य अथवा चन्द्र सूर्योदय २७५ उमाप्रसादन रस २८१ शङ्कुश रस २०१ ३०२<noinclude></noinclude> n1bvpsltcxazz6axoo2hvfbpbixevqu पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१५ 104 164950 416997 2026-06-21T10:32:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ विषयानुक्रमणिका । विषय 9 विषय. सर्वांगसुन्दर चिन्तामणिरस लोकनाथ गुटिका सूचिकाभरण अथवा मृत- संजीवनाख्य रस शार्ङ्गष्टादिक वर्ग सूचीमुख सन्निपात गजांकुश रस ... चत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416997 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषयानुक्रमणिका । विषय 9 विषय. सर्वांगसुन्दर चिन्तामणिरस लोकनाथ गुटिका सूचिकाभरण अथवा मृत- संजीवनाख्य रस शार्ङ्गष्टादिक वर्ग सूचीमुख सन्निपात गजांकुश रस ... चतुर्थिकहर रस चातुर्थिक गजांकुश रस मृत्युजय अथवा महारस पञ्चवक्त्र रस उन्मत्त रस सन्निपाताअन रस प्रताप लंकेश्वर रस प्राणेश्वर रस मृतसंजीवन रस पृष्ट. पृष्ठ. ३०४ कासनाशन रस ... ३०५ कासहर रस ... " ... ३३१ रत्नकरण्ड रस 12 000 ... ३०६ भूतांकुश रस 604 ३३३ ... ३१० बोलबद्ध रस 22 ... ३३४ ... ... ... ३१० अनि रस ३११ स्वयममि रस ३१२ साधारण उपाय " (श्वास रोग (दमा) ... ३१३ सूर्यावर्त र " ... ... ... ... श्वासान्तक रस ३१४ श्वासहर बटक " सप्तामृता वटी ... ३१५ नीलकण्ठ रस ... ... ... द्वितीय मृतसञ्जीवन रस सन्निपात कुठार रस नवज्वरारि रस वा पपेटिका ... ... ... ३१७ श्वासकासकरिकेशरिरस ३१८ सूर्यरस ३१८ सामान्य उपचार adv ००० ३३५ ... 900 22 ११६ 22 ३३७ "> १३० ३३९ 29 ३४० ३४१ ३२० ... ३२० हिकारोग (हिचकी ) हिकानाशक रस " ३४२ रस " ... जलमंजरी रस ... ... ३२१ ताम्रभस्मका उपयोग शिलापूर रस " ... " कान्त रस ... ३२२ मधान भैरव रस 100 ३४३ चन्द्रोदय रस ... ३२३ श्वासकासनी वटी www ३४४ जीर्णज्वरादि रस अथवा ज्वर सामान्य उपचार विद्रावण रस नवज्वर मुरारि रस रकपित्त रोग रक्तपितांकुश रस चन्द्रकला रस ... ३२४ स्वर भंग रोग --- २४५ " ... पर्पटी रस ३४५ ३२५ त्रयोदशोऽध्यायः । सामान्य उपचार कास रोग ( खांसी ) चतुदशोऽध्यायः । ... ३२६ राजयक्ष्मा (क्षय) रोग " कनकसुन्दर रस ... ३२८ राजसृका रस २३० शंखेश्वर रस ... ३४९ ... ३५० ३५३ " पथ्यापथ्य ३४७<noinclude></noinclude> sgq27f98mlm5s1gpv5suzbs1sz6oi4f 417020 416997 2026-06-21T11:45:11Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषयानुक्रमणिका । विषय 9 विषय. सर्वाड्गसुन्दर चिन्तामणिरस लोकनाथ गुटिका सूचिकाभरण अथवा मृत- सञ्जीवनाख्य रस शार्ङ्गष्टादिक वर्ग सूचीमुख सन्निपात गजाङ्कुश रस चतुर्थिकहर रस चातुर्थिक गजाङ्कुश रस मृत्युजय अथवा महारस पञ्चवक्त्र रस उन्मत्त रस सन्निपाता अन रस प्रताप लङ्केश्वर रस प्राणेश्वर रस मृतसञ्जीवन रस पृष्ट पृष्ठ ३०४ कासनाशन रस ३०५ कासहर रस ३३१ रत्नकरण्ड रस 12 ३०६ भूतांकुश रस 604 ३३३ ३१० बोलबद्ध रस 22 ३३४ ३१० अनि रस ३११ स्वयममि रस ३१२ साधारण उपाय (श्वास रोग (दमा) ३१३ सूर्यावर्त रॊग श्वासान्तक रस ३१४ श्वासहर बटक सप्तामृता वटी ३१५ नीलकण्ठ रस द्वितीय मृतसञ्जीवन रस सन्निपात कुठार रस नवज्वरारि रस वा पपेटिका ३१७ श्वासकासकरिकेशरिरस ३१८ सूर्यरस ३१८ सामान्य उपचार ३३५ 900 22 ११६ 22 ३३७ १३० ३३९ 29 ३४० ३४१ ३२० ३२० हिकारोग (हिचकी ) हिकानाशक रस ३४२ रस जलमंजरी रस ३२१ ताम्रभस्मका उपयोग शिलापूर रस कान्त रस ३२२ मधान भैरव रस 100 ३४३ चन्द्रोदय रस ३२३ श्वासकासनी वटी ३४४ जीर्णज्वरादि रस अथवा ज्वर सामान्य उपचार विद्रावण रस नवज्वर मुरारि रस रकपित्त रोग रक्तपितांकुश रस चन्द्रकला रस ३२४ स्वर भंग रोग २४५ पर्पटी रस ३४५ ३२५ त्रयोदशोऽध्यायः । सामान्य उपचार कास रोग ( खांसी ) चतुदशोऽध्यायः । ३२६ राजयक्ष्मा (क्षय) रोग कनकसुन्दर रस ३२८ राजसृका रस २३० शंखेश्वर रस ३४९ ३५० ३५३ पथ्यापथ्य ३४७<noinclude></noinclude> r3mqrwaqh6o8nrjw57u1rmprxen2wa6 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१६ 104 164951 416998 2026-06-21T10:34:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ८ रसरत्नसमुच्चयस्थ- विषय. पृष्ठ विषय. पृष्ठ मृगांक पोटली रस ... ३५४ त्रलोक्यतिलकरस ३९२ रमगर्भ पोटली रस ... ३५५ सामान्यउपाय ३९५ पञ्चामृत रस -" सामान्य प्रलेप ३९६ क्षय म... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416998 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>८ रसरत्नसमुच्चयस्थ- विषय. पृष्ठ विषय. पृष्ठ मृगांक पोटली रस ... ३५४ त्रलोक्यतिलकरस ३९२ रमगर्भ पोटली रस ... ३५५ सामान्यउपाय ३९५ पञ्चामृत रस -" सामान्य प्रलेप ३९६ क्षय माम्यक रस ... ३५६ पोडशोऽध्यायः । लोकनाथ रस ... ३५७ उदावर्त रोग ... ३९८ बैद्यनाथ रस ३६० उदावर्त हर धृत " ... द्वितीय लोकनाथ रस ३६१ अतिसार (दस्तोका हो- प्राणनाथ रस ना ) रोग ३६२ GOO ३९९ वज्र रस ... ३६३ दर्दुर रख " महावीर रस श्रानन्दभैरव र ... ३६५ रुचि रोग छर्दि (वमन) रोग साधारण उपाय ... ३६७ सुधासार रस ... ४०० ... ४०१ " लोकेश्वर रस लोकनाथ रस ... ४०४ ४०५ ... ३६८ हृदय रोग ३६९ नागसुन्दर रस " ... ... तृष्णारोग पनिक तैल 23 ... ४०६ तृष्णाहर रस संग्रहणी रोग ४०७ ... ३७० ... मदात्ययरोग वज्रकपाट रस " ... राजावर्तर ... भैरवनाथी पंचामृतपर्पटी पञ्चदशोऽध्यायः रोग यशःकुठार र ... ३७८ " पित्तार्शोहर रस ... सर्वलोकाश्रय रम ३८० ... अर्शोप्रवक ... "3 ३७२ अनि कुमार रस कनक सुन्दर रस ३७६ ग्रहणी हर रस चण्ड संग्रह गदैक कपाट रस लघु सिद्धाभ्रक रस ३७९ सर्वारोग्य रस अथवा सर्वा- रोग्यावटी ३८१ प्रहणी गज केसरीरस ४०८ ... " ... ... ... ४०९ " ... गुदज हर रस ... ३८२ शीघ्र प्रभावरस कनकसुन्दररस मूलकुठार रस महोदय प्रत्ययसार रस तीक्ष्णमुख रस ३८३ पोटली रस ३८६ वहिज्वाला बढी रस ... ३८८ वज्रधर रस ... ३९० द्वितीय तीक्ष्णमुख रस अर्शकुठाररस --- प्रइणी कपाट रस ३९१ सौवर्चलादि चूर्ण " ग्रहणीहर-मुस्तादि चूर्ण ... ४१० ... ... ४११ ... ४१३ ... ... ४१६ ... ४१७ : : ... " ... ४१८ ४१९ ... ४२० 27<noinclude></noinclude> rknbsda433b81k2k9mdco4kn6dd0bal 417021 416998 2026-06-21T11:49:25Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417021 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>८ रसरत्नसमुच्चयस्थ- विषय. पृष्ठ विषय. पृष्ठ मृगाङ्क पोटली रस ३५४ त्रलोक्यतिलकरस ३९२ रमगर्भ पोटली रस ३५५ सामान्यउपाय ३९५ पञ्चामृत रस सामान्य प्रलेप ३९६ क्षय माम्यक रस ३५६ पोडशोऽध्यायः । लोकनाथ रस ३५७ उदावर्त रोग ३९८ बैद्यनाथ रस ३६० उदावर्त हर धृत द्वितीय लोकनाथ रस ३६१ अतिसार (दस्तोका हो- प्राणनाथ रस ना ) रोग ३६२ ३९९ वज्र रस ३६३ दर्दुर रख महावीर रस श्रानन्दभैरव र ३६५ रुचि रोग छर्दि (वमन) रोग साधारण उपाय ३६७ सुधासार रस ४०० ४०१ " लोकेश्वर रस लोकनाथ रस ४०४ ४०५ ३६८ हृदय रोग ३६९ नागसुन्दर रस तृष्णारोग पनिक तैल 23 ४०६ तृष्णाहर रस सङ्ग्रहणी रोग ४०७ ३७० मदात्ययरोग वज्रकपाट रस राजावर्तर भैरवनाथी पञ्चामृतपर्पटी पञ्चदशोऽध्यायः रोग यशःकुठार र ३७८ पित्तार्शोहर रस सर्वलोकाश्रय रम ३८० अर्शोप्रवक 3 ३७२ अनि कुमार रस कनक सुन्दर रस ३७६ ग्रहणी हर रस चण्ड संग्रह गदैक कपाट रस लघु सिद्धाभ्रक रस ३७९ सर्वारोग्य रस अथवा सर्वा- रोग्यावटी ३८१ प्रहणी गज केसरीरस ४०८ ४०९ गुदज हर रस ३८२ शीघ्र प्रभावरस कनकसुन्दररस मूलकुठार रस महोदय प्रत्ययसार रस तीक्ष्णमुख रस ३८३ पोटली रस ३८६ वहिज्वाला बढी रस ३८८ वज्रधर रस ३९० द्वितीय तीक्ष्णमुख रस अर्शकुठाररस --- प्रइणी कपाट रस ३९१ सौवर्चलादि चूर्ण ग्रहणीहर-मुस्तादि चूर्ण ४१० ४११ ४१३ ४१६ ४१७ ४१८ ४१९ ४२० 27<noinclude></noinclude> i8uaymgbomfrphou5au6txmulix3no8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१७ 104 164952 416999 2026-06-21T10:35:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ विषय. सामान्य उपाय अजीर्ण रोग अजीर्ण कंटक रस विध्वंस रस विषूचिका विजय रस ... विषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. ९ ... ... विषय. ४२१ महाविया गुठी ... " ४२२ मेहण्यास वीस्थान रस उमाराम्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 416999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय. सामान्य उपाय अजीर्ण रोग अजीर्ण कंटक रस विध्वंस रस विषूचिका विजय रस ... विषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. ९ ... ... विषय. ४२१ महाविया गुठी ... " ४२२ मेहण्यास वीस्थान रस उमाराम्भु रख ... ४४७ ... " ... ४२३ रसेन्द्र नाग रस ... " मेह शत्रु रस ... ४२४ कासीस बद्ध रस रसअनि कुमार वडवामि रस ... " वैश्वानर पोटली रस वडवामुखी गुढी ... ४१५ ... राज शेखर बढी क्रव्याद रस अभि कुमार रस अमृत वटी ... ४२८ " भीम पराक्रम रस संजीवन स मेह नर्दन रस राम बाण रस ... ४३१ राजमृगक रस मेहहर रस ... ४५० ४५० 23 ४५२ ४५४ ४५५ ... ४५६ >> ... ४३२ राक्षस नामा रस ... ४३३ उदय भास्कर रस हिमांशु रस जीवन नामा रस ४३४ वडवानल रस ... ४३५ वसन्त कुसुमाकर रस सर्वमेहान्तक रस अभिजननी वटी सर्व रोगान्तक वटी सामान्य उपाय सप्तदशोऽध्यायः ... ... " मेहारि रस ४३५ मेह बद्ध रस ... ४३६ हरि शंकर रस सामान्य उपचार मूत्रकृच्छ्र रोग लघुलोकेश्वर रस ४३७ सामान्य उपचार अश्मरी (पथरी) ... ४४० पाषाणभेदी रस ... ... " ... ४३८ शंख मण्डूर रस सामान्य उपचार विद्रधिरोग सर्वेश्वर पपटी रस अष्टादशोऽध्यायः । ... ४५७ ४५९ ... ... ४६१ ... ४६२ ... ४६४ ४६५ ... " ४६७ .०० ११ ... ४६८ ... ४७१ " ... ४७४ द्वितीय पाषाणभेदी रस ... ४४१ वृद्धि अथवा अन्त्ररोग ... ४७६ ...४७७ त्रिविक्रमरस ... ४४२ वातारि रस आनन्द भरवी वटी ... " सामान्य उपाय प्रमेह रोग चन्द्रप्रभा वटी गजसिंह रस सामान्य उपचार ... ४४३ गुल्मरोग ... " गन्धकादिपोटली रस ... ४४४ बंगेश्वर रस ... ४४५ | शिखिवाडव रस ... " .... ४८० ... ४८२ ४८२ ... ४७८<noinclude></noinclude> 2edka323o6skz8s0fqefhgwravdzumb 417022 416999 2026-06-21T11:56:27Z Bnarayanan V 10460 /* Proofread */ 417022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय. सामान्य उपाय अजीर्ण रोग अजीर्ण कण्टक रस विध्वंस रस विषूचिका विजय रस विषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. ९ विषय. ४२१ महाविया गुठी ४२२ मेहण्यास वीस्थान रस उमाराम्भु रख ४४७ ४२३ रसेन्द्र नाग रस मेह शत्रु रस ४२४ कासीस बद्ध रस रसअनि कुमार वडवामि रस वैश्वानर पोटली रस वडवामुखी गुढी ४१५ राज शेखर बढी क्रव्याद रस अभि कुमार रस अमृत वटी ४२८ भीम पराक्रम रस सञ्जीवन स मेह नर्दन रस राम बाण रस ४३१ राजमृगक रस मेहहर रस ४५० ४५० 23 ४५२ ४५४ ४५५ ४५६ ४३२ राक्षस नामा रस ४३३ उदय भास्कर रस हिमांशु रस जीवन नामा रस ४३४ वडवानल रस ४३५ वसन्त कुसुमाकर रस सर्वमेहान्तक रस अभिजननी वटी सर्व रोगान्तक वटी सामान्य उपाय सप्तदशोऽध्यायः मेहारि रस ४३५ मेह बद्ध रस ४३६ हरि शंकर रस सामान्य उपचार मूत्रकृच्छ्र रोग लघुलोकेश्वर रस ४३७ सामान्य उपचार अश्मरी (पथरी) ४४० पाषाणभेदी रस ४३८ शंख मण्डूर रस सामान्य उपचार विद्रधिरोग सर्वेश्वर पपटी रस अष्टादशोऽध्यायः । ४५७ ४५९ ४६२ ४६४ ४६५ ४६७ ११ ४६८ ४७१ ४७४ द्वितीय पाषाणभेदी रस ४४१ वृद्धि अथवा अन्त्ररोग ४७६ ४७७ त्रिविक्रमरस ४४२ वातारि रस आनन्द भरवी वटी सामान्य उपाय प्रमेह रोग चन्द्रप्रभा वटी गजसिंह रस सामान्य उपचार ४४३ गुल्मरोग गन्धकादिपोटली रस ४४४ बङ्गेश्वर रस ४४५ | शिखिवाडव रस ४८० ४८२ ४८२ ४७८<noinclude></noinclude> 0gajnr1hyerbha3y5o9s069ktup834g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१८ 104 164953 417000 2026-06-21T10:35:54Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ १० विषय. दीप्तामर रस रसरत्नसमुच्चयस्थ- पृष्ठ. विषय. ... ४८३ अलपित्त रस छ. ५१७ विद्याधर रस ४८४ लीलाविलास रस " ... रकोदर कुठार रस ... ४८५ ताम्रयुति रस ... ५१८ वैश्वानर रस श्रमि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 417000 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>१० विषय. दीप्तामर रस रसरत्नसमुच्चयस्थ- पृष्ठ. विषय. ... ४८३ अलपित्त रस छ. ५१७ विद्याधर रस ४८४ लीलाविलास रस " ... रकोदर कुठार रस ... ४८५ ताम्रयुति रस ... ५१८ वैश्वानर रस श्रमिकुमार रस सर्वासुन्दर रस ... " कूष्माण्ड खण्ड लेह ... ५२० ... ४८६ सामान्य उपाय " --- ४८७ पित्तरोग २२१ गुल्मनाशन रस ... ४९० पित्तान्तकरस 22 सामान्यउपचार ४९१ शूलरोग श्रमिमुखरस ... ... ४९ दश सार चूरा एकोनविंशोऽध्यायः । ५२१ " उदर रोग उदरन रस त्रिनेत्र रस ... ४९४ विनोद विद्याधर रस चिन्तामणी रस ... ४९५ सुरेचनक रस ... ... -- ५२३ ५१४ " शूलकेशरी रस मृतोत्थापन रस क्षार ताम्र रस शूलान्तक रस अभिमुख रस ... ४९६ मृत्युजय रस ००० ५२५ ... ४९७ त्रलोक्य सुन्दर रस ... ५२७ ... ४९८ महा वहि रस ५२८ ... ४९९ वैश्वानर रस ... ५२९ ... ५०० उदय मार्तण्ड रस " त्रिनेत्र रस ... ५०१ सूर्यप्रभा गुटिका उदयभास्कार रस ... ५०२ बज्रचार शूल गज केशरी रस ... ५०४ सामान्य उपाय चार ताम्र ... ताम्राष्टक " ... काल विध्वंस रस वडवानल गुटिका " ... अमिकुमार रस ... ५०८ पाण्डुप शोषण रस ... ५३६ शूल हर चार चार वटी ५०९ पित्त पाण्डरि रस ... सामान्य उपाय ... ५१० त्रैलोक्य सुन्दर रस ... ५३८ ५४० ... ५४१ " ... कार्श्यरोग (दुर्बलता) " जयपाल रस ... ५४२ अमृतावस " ... पूर्णचन्द्ररस ५११ पाण्डुहारी हरीतकी विजयावटिका स्पौल्यरोग ( मेदका बढ़ना) ... ... ५१२ कामला रोग ... ५४३ ... ५४४ ५४५ ... वडवामुख र " कामला प्रणुदस । त्रियोनि रस *** ५४६ अमिकुमार रस ५१३ कामेश्वर रस ... ५४७ पश्चानन रस ५०७ आरोग्य सागर रस ५०५ पाण्डुरोग हंसमण्डूर ... ... ५३१ .. ५३२ ... ... ५३३ ... ५२४ ... ५३०<noinclude></noinclude> 9w93fiq3a4v8gd5b31jf4cywx3tx4j6 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/१९ 104 164954 417001 2026-06-21T10:36:31Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ... ५४९ ५५० विपस रोग बिसर्वजिद्रस विसर्पनाशक तेल विसपेहर तेल कुष्ठरोग (कोढ) विषय. सिन्दूर भूषण रस सुधा पश्चक रस विषयानुक्रमणिका । ... मुस्तादि चूरा । सामान्य उपाय ... व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 417001 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>... ५४९ ५५० विपस रोग बिसर्वजिद्रस विसर्पनाशक तेल विसपेहर तेल कुष्ठरोग (कोढ) विषय. सिन्दूर भूषण रस सुधा पश्चक रस विषयानुक्रमणिका । ... मुस्तादि चूरा । सामान्य उपाय ... विंशोऽध्यायः । पृष्ट. विषय. ५४८ जन्तुनी गुटिका रख धन्वन्तरि रस ११ पृष्ठ. ... ५८० ५८९ ... वज्रधार रस 200 ५८२ महातालेश्वर रस 2: ... ... ५५० कुठकुठार रस ५८३ ... ५५१ स्वर्णक्षीर रस 77 त्रैलोक्य विजय रस ... ५८५ " ... ... ५५२ द्वितीय त्रैलोक्य विजय रस बातकुष्ठहर रस पित्तकुछहर रस ••• ५५३ कुान्त पर्पटी रख ... ५८६ " ... " ... कासीस बद्ध रस कफकुष्टहर रस सन्निपात कुठहर रस विजय रस (गुटिका ) सर्वेश्वर रस सप्तकुष्ठारिरस प्रतापलंकेश्वर कुष्ठ नाशन रस कुष्ठजित् व कृष्णमाणिक्य रस ... ... ... ... ... ५५४ सर्वेश्वर रस ... ५८७ " वित्रारि रस ... ५८८ ... ५८९ ५५५ चन्द्रप्रभावटिका रंघ ... ५९० ५५६ किलास नाशन रस ... ... ५९१ ... ५५७ उदयादित्य रस " ५५८ वित्रान्तक रस " ... ५५९ त्रिकुष्ठारि रस स्नुयादि तैल ... ५९३ ५९६ " तालेश्वर रस महातालेश्वर रस कनक सुन्दर रस हरिबोलांकुश रस त्रिपुरान्तक रस विश्व हित रस दश सार सूत रस कुष्ट कुठार रस बज्रशेखर रस कुष्ठ विदावण रस माणिक्य तिलक रस परहित रस तालकेश्वर रस खगेश्वर रम कुष्ठनाशन रस ... ... ५६० | आरग्वधादि तैल गन्ध पिष्टी तेल ५१ सर्वकुष्ठान्त कत्तल ... ५६२ कुष्ठ विद्रावण तेल ... ... N.. ५६३ वज्र तैल, महाभतात तैल ५६४ महा मार्त्तण्ड तेल ५६५ चित्रारि तैल " ५६६ कुष्ठारितेल कुष्ठामयन्न गण ५६८ महानिम्बादिचूर्ण सर्व कुष्टांकुश चूर्ण श्वित्र नाशन चूर्ण ... ५६९ ५७० ... ... ५७१ श्वेत कुष्ठ हर चूर्ण ... ५७४ कुष्ठमें सामान्य उपाय ... ५७५ प्रलेपादि आरोग्य वर्द्धिनी गुटिका ... नारायण रस मेदिनीसार रस ५७६ कृमिरोग, अमितुण्ड रस ... ५७७ कीटमद रस, कृमिन रस ... ५७८ कृमिहर रस ... ५९७ " 33. ... ... ५९८ ... ५९९ ६०० ... ६०१ ... " ६०२ ... ..." ... ६०३ ..." ... ६०४ ... " ... ६०८ ... ६१० ६११<noinclude></noinclude> 40lae8dxjbt2gou9o09nk1kwz7839hg पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/२० 104 164955 417002 2026-06-21T10:37:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ... ६२१ ... ६२३ १२ विषय. पृष्ठ. विषय. सामान्य उपचार OGG ६११ वातगजांकुश रस •०० ६४४ एकविंशोऽध्यायः । शतावरी गुग्गुल माठ महारोग, शीतवात योगराज गुग्गुल ... २४५ 400 वातारि रस ६१२ द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 417002 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>... ६२१ ... ६२३ १२ विषय. पृष्ठ. विषय. सामान्य उपचार OGG ६११ वातगजांकुश रस •०० ६४४ एकविंशोऽध्यायः । शतावरी गुग्गुल माठ महारोग, शीतवात योगराज गुग्गुल ... २४५ 400 वातारि रस ६१२ द्वितीय योगराज गुग्गुल ... ६४७ " शीतारि रस ६१३ षडङ्गो गुग्गुल ६४८ स्पर्श बात, सर्वेश्वर रस विजय भैरव तैल ... ६१४ अर्केश्वर रस सूततैल ६४९ 400 ६१५ स्पर्श वातघ्र रस ... ६१६ गन्धाश्म गर्भ रस ६१७ ... द्वितीय गन्धाश्मगर्भ रस ... ६१८ स्पर्श वातारि रस --- ६१९ स्पर्श वातान्तकट्टी स्पर्श वातारि तेल सामान्य उपाय रकवात रोग सामान्य उपाय ... 29 ... वातरफ, चन्द्रावलेह अमृत प्राश चूर्ण ६२० ऐलेय सर्पि ... ६२२ द्वाविंशोऽध्यायः । ... " ... ६५१ द्वितीय विजय भैरव तेल श्रानन्दभैरव धृत ... ६५० सामान्य उपाय ऐलेयक तैल रसरत्नसमुच्चयस्थ- ६५३ Go ६५४ ६५६ .०० ६५७ सामान्य उपाय ... ६५८ आमवात रोग ... ६६४ बन्ध्या चिकित्सा ६५८ सामान्य उपाय जयसुन्दर रस ... ६६० अपस्माररोग रत्न भागोत्तर रस ६२५ सामान्य उपाय उन्माद रोग, माहेश्वर धूप सामान्य उपाय ... " ... चक्रिका बन्ध रस ... ६६२ ६६४ बर्द्धमान रस ... ६६५ ६२७ बुतिसार रस ६६९ ... ६२८ एकांग वातरोग सामान्य उपाय ६७१ चतुःसुधा रस --- ... वादविष्वंसनरस ... " बडवानल रस मार्तण्डेश्वर रस सर्व वातारि रस वृकोदरी वटी (रस) प्रभावती वटी (रस) स्वच्छन्दभैरव र अन्य स्वच्छन्द भैरव रस डवानल रस त्र्यम्बकेश्वर रस गगन गर्भावटी (रस) नेके सामान्य उपाय ६३६ मूढ गम रोग ... ६३९ ... ६४० ... " गर्भको प्रसव करानेके सामान्य उपाय सूतिका रोग नाशक पपेटी रस सूतिकारोग नाशन रस सौभाग्य सुण्ठी (सूतिकामृत ) शिवोक तान्त्रिक प्रयोग ६२९ गर्भिणीके रोग ६३० गर्भिणीके रोग दूर करने ६७४ ... ६७५ ६३२ और गर्भको पोषण कर ६३५ ...६७७ ... ६८३ ... ६८४ ... .. ६८५ ... ६४१ ... ६४२ .. ६८६ ६४३ योनि संकोचन और स्तन दृढी करके सामान्य उपाय ...६८७<noinclude></noinclude> ckmwil63zrzmq6niv97qfq7efyv537v पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/२१ 104 164956 417005 2026-06-21T10:38:29Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ विषय. विषयानुक्रमणिका पृष्ट. विषय. ग्रह नाशिनी गुटिका बालरोग माहेश्वर धूप विजय धूप ६८९ शिरोरोगारि रस ... १३ पृष्ठ. ... ७३९ ... ६९० ६९० शिरो रोगके सामान्य उपाय व्रण रोग, ज... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 417005 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>विषय. विषयानुक्रमणिका पृष्ट. विषय. ग्रह नाशिनी गुटिका बालरोग माहेश्वर धूप विजय धूप ६८९ शिरोरोगारि रस ... १३ पृष्ठ. ... ७३९ ... ६९० ६९० शिरो रोगके सामान्य उपाय व्रण रोग, जात्यादि धृत " ... सामान्य उपाय ... ६९१ उन्माद रोग त्रयोविंशोऽध्यायः अहमधूप, सामान्य उपाय अपस्मार (मृगी) अपस्मार नाशन रस प्रत्ययसूत रस, सर्वेश्वर रस नेत्रामय, ताम्रति ... ७०० ... ७०१ ... ७०२ ... ७०३ ... सामान्य उपाय ... ७४३ । भन गोर | सामान्य उपाय 27 ७०४ ... ७०७ भगन्दररोग, रविताण्डव रस | सामान्य उपाय ग्रन्थिरोग, सामान्य उपाय अर्बुद ( रसौली ) के भेद अर्बुद हर रस सामान्य उपाय पुनः तामति (अंजन) गण्ड० सामान्य उपाय ... ७०९ गंधक हुति ७१० गरुडांजन ७१२ सामान्य उपाय तिमिर हराअन पटल हराजन, रक्ताजन शुकारि वार्त नकान्ध्य हरी वार्त नवनेत्रदात्री वार्त नयन रोगही बा शिशु तैल ... ... " [...] ७१३ ...७१४ " *** 93 ... गण्डमाला और अपची रोग ... ७४४ ... ७४५ ... ७४६ ... ७५७ ... ७४९ ... ७५१ ... ७५२ " ... ७५३ ..." ... ७५४ ... ७५५ श्रीपद रोग ( पीलपाया) का सामान्य क्षुद्ररोग लेप पंचविंशोऽध्यायः । | क्षुद्ररोगों के सामान्य उपाय ७१५ उपदंश नाशक धूप ...७१६ क्षुद्ररोगोंके सामान्य उपाय ... " नेत्र रोगके सामान्य उपाय चतुर्विंशोऽध्यायः । कर्ण रोग कर्ण रोगहर रस कमयन तैल **33 श्रीपद हर रस ... ७६२ - ७६६ श्रीपद हर लेप " ... ७२३ वाल्मीक रोग प्रति मेष रस ... ७२४ क्षुद्ररोगो के सामान्य उपाय मजिष्ठादि घृत ... ७६७ ... ७६८ ... ७७३ कृमि कर्णारि तैल सामान्य उपाय नासागत रोग मणि पर्पटी रस सामान्य उपाय ... ७२५ क्षुद्ररोगोके सामान्य उपचार " पुष्यानुग चूर्ण *** " ...७७५ ... ७२७ स्थावर और जंगम विषका उपाय ...८७६ ... ... ७२८ तार्क्ष्य सूत रस ७२९ ...७७९ विंशोऽध्यायः । मुखरोग भुखरोनारि रस, रस बटी ... ७३० ... " महासरस्वती चूर्ण रसायन और उसके गुण उदयादित्य रस ...७८० ७३१ मस्तक रोग ... कमला विलास रस ... ७३८ लक्ष्मी विलास रस ...७९४ ... ७९५ ... ७८१<noinclude></noinclude> o51uihb2yonvg9g9cav708y9n4ehb67