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<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>*
5
चरित्र
भाषा-ठीक ओौर
रचित
प्रथमाकृति
*
**
**
सन् १९१९ इं०
मैनेजर के प्रबन्ध से छपवाया ।
*
बाग्बे मशीन प्रेस लाहौर म पै० हर भगवान
*
s
52
:<noinclude><references/></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{c|'''भूमिका'''}}
षड्दर्शन- आर्य वृद्धों के रचे हुए छः तर्कशास्त्र जगत्प्रसिद्ध हैं, जिन को षड्शास्त्र वा षड्-दर्शन कहते हैं। इनके नाम ये हैं-वैशेषिक, न्याय, साङ्ख्य, योग, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा। इन में से पूर्वमीमांसा मीमांसा नाम से, और उत्तरमीमांसा वेदान्त नाम से प्रसिद्ध है।{{nop}}
दर्शनों के रचने का उद्देश्य- दर्शनों के रचने का उद्देश्य यह था, कि लोगों को विचार-स्वातन्त्र्य की शिक्षा दी जाए, और उन की बुद्धियों को सीधे मार्ग पर डाल कर उन्नत किया जाय। क्योकि बुद्धि की वृद्धि और विचार स्वातन्त्र्य में ही मनुष्यों का कल्याण है, इसी में मनुष्य के इस लोक और परलोक का सुधार है। हां यह नि:संदेह है, कि विचार-स्वातन्त्र्य में भी इन सूक्ष्मदर्शी दर्शनकारों ने वैदिक मार्ग को सर्वथा सरल और सीधा देखा,अतएव विचार स्वातन्त्र्य की शिक्षा देते हुए भी वैदिक धर्म की पूर्णतया रक्षा की, इसी लिए ये दर्शन वेदों के उपांग कहलाये ।{{nop}}
दैर्शनकार मुनि - दर्शनों के बनाने वाले मुनि कहलाते हैं । जिन के नाम ये हैं-कणाद, गोतम, कपिल, पतञ्जलि, जैमिनि और व्यास। मुनि का अर्थ है मनन करने वाला, तर्क से निश्चय करने वाला, वह पुरुष, जो सत्तर्क से सचाई का ठीक पता लगा लेता है, और युक्ति द्वारा औरों का निश्चय बिठां देता है, उस को मुनि कहते हैं । आर्यजाति में ऋषि
<br/><noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''२'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
और मुनि दोनों बड़े आदर के शब्द हैं । जो मन्त्रद्रष्टा हुए, जिन्हों ने धर्म को साक्षात् किया, वे ऋषि कहलाए, और जिन्हों ने उन सचाइयों का मनन किया और कराया, वे मुनि कहलाए।{{nop}}
वैशेषिक सूत्रकार कणाद मुनि- वैशेषिक सूत्रों के कर्ता कणाद मुनि हुए हैं। इन का कोई जीवन-चरित्र नहीं मिलता, इसलिए इनके देश काल और जीवन वृत्तान्त के विषय में निश्चित रूप से इतना ही कह सकते हैं, कि ये कश्यप ऋषि की सन्तान परम्परा में उलूक मुनि के पुत्र हुए हैं। वायु पुराण पूर्व खण्ड अध्याय २३ में लिखा है, कि २७ वें परिवर्त में जब जातूकर्ण्य व्यास हुए, उस समय प्रभासक्षेत्र में सोमशर्मा ब्राह्मण रहते थे, जो बडे तपस्वी और योगी थे, कणाद मुनि इस महात्मा के शिष्य थे। कणाद स्वय भी योगी थे, इन की बुद्धि बडी शुद्ध और चरित्र बड़ा पावित्र था । वैशेषिक सम्प्रदाय के आचार्य यह मानते और लिखते आरहे हैं, कि इस मुनि ने समाधि द्वारा महेश्वर को प्रसन्न करके वैशेषिक शास्त्र रचा था ।{{nop}}
कणाद रचित दर्शन के नाम- कणाद मुनि ने इस दर्शन को वैशेषिक नाम इस कारण दिया, कि इस मे मूल पदार्थो का जो परस्पर विशेष (भेद) है, उस का निरूपण किया है। विशेष शब्द सें वैशेषिक शब्द {{bold|'अधिकृत्य कृतेग्रन्थे'}} (अष्टा ४ । ३ । ७) सूत्र से 'विशेष के बोधक शास्त्र' के अर्थ में बना है 'विशेषं पदार्थभेदं अधिकृत्य कृतं शास्त्रं वैशेषिकम्' विशेष अर्थात् पदार्थों के भेद का बोधक वैशेषिक है। इस दर्शन के रचने में कणादमुनि का यह उद्देश था, कि इस विश्व में<br/><noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''३'''}}
जितने मूल पदार्थ हैं, उन में एक से दूसरे की जो विशेषता है, उस की शिक्षा दी जाय, क्योंकि ऐसा ज्ञानव्यवहार और परमार्थ दोनों का उपयोगी है। मनुष्य का हरएक काम इष्ट की प्राप्ति वा अनिष्ट के परिहार के लिए होता है। पर इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट का परिहार होता तब है, जब उस को उपाय का यथार्थ ज्ञान हो, और उपाय का यथार्थ ज्ञान तभी होता है, जब पदार्थो के परस्पर विशेष ज्ञात हों । जिस अंश में विशेष का यथार्थ ज्ञान नहीं होता, वहीं उपाय में भूल होती है, तब मनुष्य का किया कराया काम निष्फल चला जाता है, और कभी २ उलटा फल भी दे जाता है, सुख के लिए किया काम दुःख उत्पन्न कर देता है, संपत्ति के लिए किया काम विपद् में डाल देता है । इस कारण तो पदार्थो का यथार्थ ज्ञान व्यवहार का उपयोगी है। और परमार्थ का उपयोगी इस प्रकार है, कि आत्मा का दूसरे पदार्थों से भेद तभी जाना जा सकता है, जब यह ज्ञात हो, कि वे गुण जो आत्मा के माने गये हैं, वे उन तत्वों में से किसी में भी नहीं पाये जाते, जिन से शरीर बना है, और न ही ये उन तत्वों के संयोग से उत्पन्न हो सकते हैं। इस प्रकार आत्मा के जानने के लिए सारे ही पदार्थों के जानने की आवश्यकता आपड़ती है। सो व्यवहार और परमार्थ दोनों के उपयोगी विशेष प्रदर्शक दर्शन का नाम मुनिने वैशेषिक यह अन्वर्थ नाम रक्खा । यही इस का मुख्य नाम है। जो कि मुनि का अपना रक्खा हुआ है। पीछे मुनि के नाम पर {{bold|काणाद दर्शन}} और {{bold|औलूक्य दर्शन}} ये दो नाम दूसरों ने इस दर्शन को दिये हैं।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन के मूलसूत्र और उन पर व्याख्यान- वैशेषिक के मूलसूत्र भगवान् कणाद
ने रचे हैं। उन पर जो भाष्य इस समय मिलता है, वह प्रशस्त पाद मुनि का रचा हुआ भशस्त पाद भाष्य* नाम से प्रसिद्ध है। इस भाष्य पर (३)(क) श्री उदयनाचार्य विराचित ‘किरणावली' नामी एक टीका है, और (ख) भट्ट श्री श्रीधराचार्य विरचित ‘न्याय कन्दली' नामी दूसरी टीका है, और जगदीश भट्टाचार्य कृत ‘भाष्यसूक्ति' तीसरी टीका है, और ‘भिक्षुवार्तिक' चौथी टीका है। और शंकरमिश्र कृत ‘कणादरहस्य’ पांचवीं है। उदयनाचार्य
और श्रीधराचार्य दोनों एक ही शताब्दी में हुए हैं। उदयनाचार्य ने एक 'लक्षणावली' नामी ग्रन्थ भी रचा है, उस के अन्त मे उन्होंने उस के रचन का समय यह दिया है-'तर्काम्बराङ्क प्रमितेष्वतीतेषु शकान्ततः । वर्षेषूदयनश्चक्रे सुबोधां लक्षणावलीम्' अर्थात् शकसंवत् के ९०६वर्ष(वि० सं० १०४१) बीतने पर उदयन ने लक्षणावली बनाई। और श्रीधरने न्याय कन्दली के अन्त में इस की रचना का काल यह दिया है- ‘त्र्याधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता । श्रीपाण्डुदासयाचित भट्ट श्री श्रीधरेणेयम्' अर्थात् शक संवत् ९१३(=विक्रम् स० १०४८) में श्री पाण्डुदास की प्रार्थना से भट्ट श्री श्रीधर ने यह न्यायकन्दली रची । (४) इस के आगे किरणावली<br/>
{{rule}}
*‘प्रशस्तपादभाष्य' से पहले एक और भाष्य के होने का 'किरणावली' और 'कन्दली' दोनों से पता चलता है, और 'किरणावली' भास्कर, में पद्मनाभ ने उस भाष्य को रावण प्रणीत लिखा है ।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''५'''}}
(क)एक तो वर्धमानोपाध्यायनामी विरचित ‘किरणावली प्रकाश' नामी व्याख्यान है, (ख) और दूसरा पद्मनाभ विरचित 'किरणावली भास्कर’ नामी व्याख्यान है। (५)
'किरणावली प्रकाश' पर भगीरथ ठक्कर विरचित 'द्रव्य प्रकाशिका' और श्रीरघुनाथ भट्टाचार्य कृत 'गुण प्रकाश विवृति' टीका है, जो ‘गुणदीधिति' नाम से प्रसिद्ध है। (६) 'गुणप्रकाश विवृति' पर (क) एक तो मथुरानाथ तर्कवागीशा विरचित 'गुणप्रकाश विवृति रहस्य' नामी टीका है, जो ‘गुणदीधिति माथुरी' नाम से प्रसिद्ध हैं। मथुरानाथ ने गुण प्रकाश विवृति के मूल ग्रन्थ 'गुणप्रकाश' की भी व्याख्या की है,
वो 'गुणप्रकाशरहस्य' नाम से प्रसिद्ध है। और 'गुणप्रकाश' के
मूल ग्रन्थ 'गुण किरणावली' की भी व्याख्या की है, जो
'गुण किरणावली रहस्य' नाम से प्रसिद्ध है। (ख) दूसरी
द्ध भट्टाचार्य कृत 'गुणप्रकाश विवृति भावभकाशिका' नामी
टीका है, जो ‘गुणप्रकाशविवृतिपरीक्षा' नाम से प्रसिद्ध है, (ग)
और तीसरी रामकृष्ण कृत (घ) और चौथी जयराम भट्टा
चार्य कृत व्याख्या है॥ भाष्यादि सारे ग्रन्थ दो भागों में
ग्रन्थकारों ने बांटे हैं। आरम्भ मे आत्मा के निरूपण पर्यन्त
द्रव्यग्रन्थ, उस से अगला सारा ग्रन्थ गुणग्रन्थ कहा जाता है।
नमें से प्रशास्तपाद् भाष्य और उस पर 'न्यायकन्दली' तो
छप चुके हैं, 'किरणावली' और उस पर किरणावली' प्रकाश
एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता की ओर से छप रहे हैं।<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''६'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
जो १९११ ई० से आरम्भ हो कर अभी तक थोड़े ही छपे
हैं शेष अभी अमुद्रित हैं ।<br/>
{{gap}}अन्य भाष्यकार तो मूलसूत्रों की व्याख्या भी करते हैं, और सूत्रोक्त विषयों का स्पष्टीकरण भी करते हैं । पर वैशेषिक भाष्यकार (प्रशस्तमुनि ) सूत्रों की व्याख्या नही करते, किन्तु एक विषयके समस्त सूत्रों को मन में रखकर सूत्रों का अवतरण प्रतीकादि दिये बिना ही विषय का स्पष्टीकरण कर देते हैं । इस कारण सूत्रों के पठनपाठन के लिए सीधा सूत्रों पर अन्य टीकाएँ रची गई। शंकरमिश्र विरचित 'तन्त्रोपकार ' नामी पुरानी टीका से पूर्व भारद्वाज वृत्ति थी,जिस का पता शङ्करमिश्र ने 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः' सूत्र की व्याख्या में दिया है । पर यह टीका अभी तक मिली नहीं । इस समय कुछ नई टीकाएँ संस्कृत और भाषा में हो रही है, जिन में से श्री जयनारायण तर्क पञ्चानन कृत टीका बहुत ही उत्तम है ।{{nop}}
वैशेषिक सूत्रों के प्रतिपाद्य विषय- वैशेषिक सूत्र १० अध्यायों में विभक्त हैं। अध्याय क्रम से सूत्रों के प्रतिपाद्य विषय ये है । प्रथम अध्याय में समवाय सम्बन्ध रखने वाले सारे पदार्थो का कथन है । द्वितीय में द्रव्यों का निरूपण है। तृतीय में आत्मा और अन्तःकरण का लक्षण है । चतुर्थ में शरीर और तदुपयोगी पदार्थो का विवेचन है। पञ्चम में कर्म
का प्रतिपादन है। षष्ठ में श्रौत धर्म का विवचन है। सप्तम में
गुणों का और समवाय का प्रतिपादन है। अष्टम में ज्ञान की<br/><noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''७'''}}
उत्पत्ति और उस के साधनादि का निरूपण है। नवम में बुद्धि के भेदों का प्रतिपादन है । दशम में आत्मा के गुणों के भेद का प्रातिपादन है । प्रत्येक अध्याय में दो दो आन्हिक हैं। आन्हिक का अर्थ है, एक दिन का काम । अर्थात् इस दशाध्यायी को कणाद मुनि ने २० दिनों में रचा था।{{nop}}
सूत्रों का निर्णय- कणाद मुनि ने जो सूत्र रचे थे, उन में कुछ न्यूनाधिक वा पाठान्तर हुए हैं वा नहीं, और यादि हुए हैं, तो किस प्रकार अब फिर मूल सूत्रों को उसी रूप में ला सकते हैं, जिस रूप में कि मुनि ने रचे थे, इस बात का निर्णय करना अतीव आवश्यक है। {{nop}}
{{gap}}पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद शर्म्मा ने जो सूत्रपाठ छपवाया है, उस की पादटीका में पाठभेद दिये हैं, जो उन को हस्त लिखित पुस्तकों में मिले हैं। उन से यह भी स्पष्ट हो जाता है, कि न केवल पदभेद ही हुए हैं, किन्तु सूत्रभेद भी हुए हैं। अब इनको कणादोक्त रुप में लाने के लिए क्या प्रयत्न होना चाहिये, पाणिनि विरचित व्याकरण सूत्रों में भी काशिकाकार ने कुछ भेद किया है, वह महाभाष्य के अनुसार ठीक हो सकता है। इसीं प्रकार यदि प्रशस्तपाद भाष्य भी सूत्रों का व्याख्यान होता,तो भाष्य के अनुसार सूत्रों को कणादोक्त रूप में लाना सरल होता, पर भाष्य तो जैसा पूर्व कहा है, सूत्रों का व्याख्यान नहीं। अब सूत्रों पर साक्षात् कोई प्राचीन व्याख्या मिलती नहीं । शंकरमिश्र तो मथुरानाथ तर्क वागीश के शिष्य कणाद का भी शिष्य था। अतएवं बहुत प्राचीन नहीं किञ्च प्रशस्तपाद भाष्य की<br/><noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''८'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
व्याख्यामें उदयनाचार्य और श्रीधराचार्य दोनोंने 'अस्मद् बुद्धिभ्योलिङ्गभूषेः' इस को सूत्रत्वेन उद्धत किया हैं । शंकरमिश्र को इस का पता ही नहीं। और पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद शर्म्मा को जो एक बहुत पुराना (उनके अनुमानासार ४०० वर्ष से पहले का) लिखा हुआ सूत्रपाठ मिला है, उसमें यह सूत्र है। और उक्त शर्मा जी के अनुसार 'सूत्रमात्रावलम्बेन निरालम्बोपि गच्छतः' सूत्र मात्र का सहारा पकड़ कर बिना सहारें चलने लगा हूँ, कहने वाले शंकरमिश्र ने सूत्र छोड़े भी हैं, कहीं एक ही सूत्र के दो सूत्र भी बना डाले हैं, कहीं दो को एक किया है, कही पाठ की कल्पना भी की है । यह सत्य है, कि सर्वथा शंकरमिश्र विरचित उपस्कार सूत्रनिर्णय में प्रमाण नहीं हो सकता।{{nop}}
{{gap}}पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद को जो पुराना लिखा हुआ सूत्रपाठ मिला है, उस के अनुसार दसों अध्यायों मे सूत्र संख्या क्रमशः यह है ५०+६४+३७+२५+४३+३०+४९+१७+२८+१५=३५९ और उपस्कार के अनुसार ४८+६८+४०+२४+४४+३२+५३+१७+२८+१६=३७० इस प्रकार अध्याय २ मे भेद है ।{{nop}}
{{gap}}तो क्या फिर अब सूत्रो को अपने मूलरूप में लाना असम्भव तो नहीं होगया? नहीं,तथापि इस के लिए प्रयत्नसविशेषे होना चाहिये । एक तो प्राचीन हस्तलिखित सूत्रपाठों का संग्रह करना चाहिये, दूसरा भारद्वाज वृत्ति और रावण भाष्य को उपलब्ध करना चाहियें, तीसरा किरणावली आदि प्राचीन व्याख्याओं में उद्धृत सूत्रों का संग्रह करना चाहिये, तथा शङ्करा-{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''९'''}}
चार्य आदि प्राचीन आचार्यो के ग्रन्थों में उद्धत सूत्रों का संग्रह करना चाहिये, तब बड़ी प्रबल सम्भावना है, कि सारे सूत्र अपने मूलरूप में लाए जा सकेंगे। इस समय इस काम को हाथ में लेने की हमारे पास पूरी सामग्री नहीं, तथापि यथाशक्य इस काम को प्रवृत्त रखते हुए सम्प्रति मुद्रित सूत्रों के आधार पर व्याख्यान आरम्भ करते हैं॥{{nop}}
व्याख्यान का ढंग- वैशेषिक सूत्रों की शैली हमने यह रक्खी है, कि जहां अर्थ देने से ही पद पदार्थ भी स्पष्ट हो जाते हैं, वहां तो सूत्रार्थ ऐसा स्पष्ट करके लिख दिया है, कि उसी से पद पदार्थ का भी यथार्थ बोध हो जाता है, और जहां पदच्छेद और पदार्थोक्ति की आवश्यकता जान पड़ी है, वहां पदच्छेद और पदार्थ भी दे दिया है। सूत्रार्थ के अनन्तर, व्याख्यान रक्खा है, उस में बड़ी सरल और सुबोध भाषा में वैशेषिक के गूढ़ विषयों के मर्म खोल २ कर समझा दिये हैं।{{nop}}
{{center|{{bold|सम्पादक}}}}<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वासन्तिकास्वप्नम्.djvu/११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shardashah" /></noinclude>{{rh|left='''८'''|center='''वासन्तिकस्वप्ने'''}}
सासूयं वसन्तं प्रति ।)
{{center|'''अन्याय्यस्तव रागस्तातनिदेशो हि बहुमान्यः ॥ १४ ।।'''}}
'''वसन्तः'''– (मकरन्दं प्रति ।) त्वं तावत्प्रियोऽस्याः पितुः । अहन्त्वस्या एव । अपि नामेहसे तस्योपयमम् ।
'''इन्दुशर्मा'''– (सभ्रूभङ्गम् ।) किमात्थ रे जाल्म वसन्तहतक,
सत्यमेव मत्प्रेमाधिक्यं वहति मकरन्दः यद्यन्मदीयं तत्तदस्मै
प्रेम्णा दातुं सज्ज एवाहम् । इयं तु मदीयैव नान्या । यप्रभुत्वममुष्यां मे वर्तते तत्सर्वमद्य दीयते मकरन्दाय ।
'''वसन्तः'''-- (राजानं प्रति ।)
'''विशिष्यते न मत्तोऽयं जातिरूपवयोधनैः ।'''<br>
'''सोशील्येनापि भो राजन् स्त्रीमनोहरणेन वा ।। १५ ।।'''
महीपाल, वराीयानत्रानुराग एव कन्यकायाः । अन्यदप्यत्र
द्रष्टव्यम् । सत्यमेव यथेयं कौमुदी मय्यनुरागिणी तथैवास्मिन्नपि प्रणयवती काचिदुत्पलाक्षी वर्तते। सैषा सौदामिनी नाम ।
तां खल्वेष मकरन्दः प्रथमं प्रणयेन वशीकृत्य साम्प्रतं कौमुदीमपि कामयते । नैषा सज्जनाचरिता सरणिः । किं बहुना ।
{{block center|{{Bold|एनं विचिन्त्य मदनज्वरतापतप्ता<br>
सौदामिनीह परिखिद्यति निर्दयोऽयम् ।<br>
एनां प्रमोह्य पुनरप्युपयन्तुमन्यां<br>
धूर्तोयमिच्छति वरं न हि तस्य वृत्तम् ।। १६ ।। }}}}<noinclude><references/></noinclude>
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Meera kale
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''८'''|center='''वासन्तिकस्वप्ने'''}}
सासूयं वसन्तं प्रति ।)
{{center|'''अन्याय्यस्तव रागस्तातनिदेशो हि बहुमान्यः ॥ १४ ।।'''}}
'''वसन्तः'''– (मकरन्दं प्रति ।) त्वं तावत्प्रियोऽस्याः पितुः । अहन्त्वस्या एव । अपि नामेहसे तस्योपयमम् ।
'''इन्दुशर्मा'''– (सभ्रूभङ्गम् ।) किमात्थ रे जाल्म वसन्तहतक,
सत्यमेव मत्प्रेमाधिक्यं वहति मकरन्दः यद्यन्मदीयं तत्तदस्मै
प्रेम्णा दातुं सज्ज एवाहम् । इयं तु मदीयैव नान्या । यप्रभुत्वममुष्यां मे वर्तते तत्सर्वमद्य दीयते मकरन्दाय ।
'''वसन्तः'''-- (राजानं प्रति ।)
'''विशिष्यते न मत्तोऽयं जातिरूपवयोधनैः ।'''<br>
'''सोशील्येनापि भो राजन् स्त्रीमनोहरणेन वा ।। १५ ।।'''
{{gap}}महीपाल, वराीयानत्रानुराग एव कन्यकायाः । अन्यदप्यत्र
द्रष्टव्यम् । सत्यमेव यथेयं कौमुदी मय्यनुरागिणी तथैवास्मिन्नपि प्रणयवती काचिदुत्पलाक्षी वर्तते। सैषा सौदामिनी नाम ।
तां खल्वेष मकरन्दः प्रथमं प्रणयेन वशीकृत्य साम्प्रतं कौमुदीमपि कामयते । नैषा सज्जनाचरिता सरणिः । किं बहुना ।
{{block center|{{Bold|एनं विचिन्त्य मदनज्वरतापतप्ता<br>
सौदामिनीह परिखिद्यति निर्दयोऽयम् ।<br>
एनां प्रमोह्य पुनरप्युपयन्तुमन्यां<br>
धूर्तोयमिच्छति वरं न हि तस्य वृत्तम् ।। १६ ।। }}}}<noinclude><references/></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shardashah" /></noinclude>{{rh|center='''प्रथमोङ्कः ।'''|right='''७'''}}
'''राजा'''-
{{block center|{{bold|श्रुतपूर्वं मयाप्येतत्कर्णाकर्णिकया भृशम् ।<br>
मकरन्दमिहादेष्टुं सदयोऽहं व्यचिन्तयम् ॥ १७ ॥}}}}
{{c|(नेपथ्ये मृदङ्गध्वनिः ।)}}
'''कनकलेखा-'''- कथमस्मदगमनं प्रतीक्षन्ते बहव सङ्गीतशालाभ्यन्तरे ।
'''राजा''' -- परं कार्यपरतया विस्मृतमेतत्सर्वमपि । तत्वरितं गम्यते । इन्दुशर्मन् , मामनुयाहि मकरन्देन । युवभ्यां किञ्चिद्गूढं
वक्तुकामोऽस्मि । अयि बाले कौमुदि, सम्यगालोच्य तातमेवानुसर नोचेद्भज मरणमुत त्यज परिणयमेषाऽस्मद्दण्डनीतिरित्यवधार्यताम् । प्रिये कनकलेखे, सम्प्रति साधयामः। (मकरेन्दुन्दुशर्माणौ दृष्ट्वा) अग्रतो गम्यताम् ।
'''इन्दुशर्मा'''-- यथाऽऽज्ञापयति देवः ।
{{c|( इति कौमुदीवसन्तवर्जमन्ये निष्क्रान्ताः । )}}
'''वसन्तः'''-- (कौमुदीचिबुकमुन्नमय्य ।)
{{block center|{{bold|सखि प्राणाधिकस्नेहे, कथं ते गण्डपाण्डिमा। ।<br>
म्लानतां किं प्रयातीदं सुन्दरि, त्वन्मिखाम्बुजम् ।}}}}
'''कौमुदी-'''
{{block center|{{bold|वर्षाभावादिदं नाथ, कुसुमं तव ताम्यति ।<br>
अभिषिञ्चामि तत्कान्त, पुष्कलेनाश्रुवारिणा ।। १९ ।।}}}}
'''वसन्तः'''-
{{block center|{{bold|श्रेयांसि बहुविघ्नानि किं भद्रे न श्रुतं त्वया ।<br>
तस्मादत्र प्रलापेन न किंचित्कार्यमस्ति नः ।। २० ।।}}}}
V. 2<noinclude><references/></noinclude>
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'''राजा'''-
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मकरन्दमिहादेष्टुं सदयोऽहं व्यचिन्तयम् ॥ १७ ॥}}}}
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'''कनकलेखा-'''- कथमस्मदगमनं प्रतीक्षन्ते बहव सङ्गीतशालाभ्यन्तरे ।
'''राजा''' -- परं कार्यपरतया विस्मृतमेतत्सर्वमपि । तत्वरितं गम्यते । इन्दुशर्मन् , मामनुयाहि मकरन्देन । युवभ्यां किञ्चिद्गूढं
वक्तुकामोऽस्मि । अयि बाले कौमुदि, सम्यगालोच्य तातमेवानुसर नोचेद्भज मरणमुत त्यज परिणयमेषाऽस्मद्दण्डनीतिरित्यवधार्यताम् । प्रिये कनकलेखे, सम्प्रति साधयामः। (मकरेन्दुन्दुशर्माणौ दृष्ट्वा) अग्रतो गम्यताम् ।
'''इन्दुशर्मा'''-- यथाऽऽज्ञापयति देवः ।
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'''वसन्तः'''-- (कौमुदीचिबुकमुन्नमय्य ।)
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म्लानतां किं प्रयातीदं सुन्दरि, त्वन्मुखाम्बुजम् ।}}}}
'''कौमुदी-'''
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अभिषिञ्चामि तत्कान्त, पुष्कलेनाश्रुवारिणा ।। १९ ।।}}}}
'''वसन्तः'''-
{{block center|{{bold|श्रेयांसि बहुनिघ्नानि किं भद्रे न श्रुतं त्वया ।<br>
तस्मादत्र प्रलापेन न किंचित्कार्यमस्ति नः ।। २० ।।}}}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''१०'''|center='''वासान्तिकस्वप्ने'''}}
अयि प्रिये, न किं ते कर्णपथमागतं यज्जनकेन सञ्जयाय
दत्तमात्मानमनुरागसाक्षिकमुदयनाय प्रयच्छन्त्या वासवदत्तयाऽन्वभाविमहान्क्लेश इति । तथैव सर्वत्राप्यनुरागानुगुणं वलभमक्लेशेनैवाप्नुवत्यो नार्यः प्रायो विरला एव । इह खलु दाम्पत्यं
नाम क्वचिज्जात्या भिद्यते-
'''कौमुदी'''— हन्त ! उत्तमनीचयोः परिणयो मामयं महानभाग्यपरिणाम: ।
'''वसन्तः''' --- उत क्वचिद्ववयसा विसंवदति -
'''कौमुदी'''— तरुण्या जरठभर्तुलाभ इति विधिविहितो महानयं
दण्डपातः ।
'''वसन्तः'''– आहोस्विन्मित्रवर्गविनिर्दिष्टं भवति ।
'''कौमुदी'''~ यदन्यदीयचक्षुषा वरणं वल्लभस्येति नातःपरं कष्टतरमस्ति युवतीनाम् ।
'''वसन्तः'''– यदि कदाचित्सर्वथाऽनवद्य दाम्पत्यं तत्तु आयोधनेन
निधनेन व्याधिना व विहन्यमानं शब्दवत्क्षणभंगुरं प्रतिबिम्बवदनियतं स्वप्नवदनायातं कृष्णनिशानिशीथनिरूढान्धतमसपरिस्फुरच्चञ्चलाचञ्चलतरञ्च भवति । सुखं हि नाम क्षणभंगुरम् ।
कष्ट खलु लोकयात्रा ।
'''कौमुदी'''-- सर्वत्रानुरागः क्लेशपुरस्सर इति चेत् सहिष्णुभ्यामेवावाभ्यां प्रतीक्षणीयः कश्चित्कालः ।
{{block center|{{Bold|विधिरेव विशेषगर्हणीयो<br>
यदि रागः सफलो न चास्ति लोके ।}}}}<noinclude><references/></noinclude>
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{{gap}}अयि प्रिये, न किं ते कर्णपथमागतं यज्जनकेन सञ्जयाय
दत्तमात्मानमनुरागसाक्षिकमुदयनाय प्रयच्छन्त्या वासवदत्तयाऽन्वभाविमहान्क्लेश इति । तथैव सर्वत्राप्यनुरागानुगुणं वलभमक्लेशेनैवाप्नुवत्यो नार्यः प्रायो विरला एव । इह खलु दाम्पत्यं
नाम क्वचिज्जात्या भिद्यते-
'''कौमुदी'''— हन्त ! उत्तमनीचयोः परिणयो मामयं महानभाग्यपरिणाम: ।
'''वसन्तः''' --- उत क्वचिद्ववयसा विसंवदति -
'''कौमुदी'''— तरुण्या जरठभर्तुलाभ इति विधिविहितो महानयं
दण्डपातः ।
'''वसन्तः'''– आहोस्विन्मित्रवर्गविनिर्दिष्टं भवति ।
'''कौमुदी'''~ यदन्यदीयचक्षुषा वरणं वल्लभस्येति नातःपरं कष्टतरमस्ति युवतीनाम् ।
'''वसन्तः'''– यदि कदाचित्सर्वथाऽनवद्य दाम्पत्यं तत्तु आयोधनेन
निधनेन व्याधिना व विहन्यमानं शब्दवत्क्षणभंगुरं प्रतिबिम्बवदनियतं स्वप्नवदनायातं कृष्णनिशानिशीथनिरूढान्धतमसपरिस्फुरच्चञ्चलाचञ्चलतरञ्च भवति । सुखं हि नाम क्षणभंगुरम् ।
कष्ट खलु लोकयात्रा ।
'''कौमुदी'''-- सर्वत्रानुरागः क्लेशपुरस्सर इति चेत् सहिष्णुभ्यामेवावाभ्यां प्रतीक्षणीयः कश्चित्कालः ।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shardashah" /></noinclude>{{rh|center='''प्रथमोङ्कः ।'''|right='''११'''}}
{{block center|{{bold|अनुरागवशंवदा हि नालं<br>
तरुणी प्रेमवशीकृतं विहातुम् ।। २१ ।।}}}}
यथैव सन्ततचिन्तास्वप्ननिश्वासप्रत्याशाश्रूणि प्रणयाभिभूत
मनस्काया: सहजानि तथैव तीव्रवेदना च ! किं करोमि मन्दभागधेया । ( इत्यश्रूणि मुञ्चति ।)
'''वसन्तः'''-- समाश्वसिहि भद्रे, समाश्वसिहि । शृणु मे वचनम् ।
एषैवात्र प्रतिपत्तिः । काचिन्मे पितृष्वसा मृतभर्तृका वर्तते ।
तस्या द्रविणमस्त भूरि । अनपत्य च सा । अवन्त्या क्रोशद्वयमात्रमेव तस्याः सदनम् । पुत्रमिवाभिमन्यते मामेषा । तत्र
भवत्वावयोः परिणयो गान्धर्वेण विधिना । नास्त्ययं कठोरः
समयाचारस्तत्र । यदि ते सत्यमेव मय्यनुरागस्तर्हेि श्वो रात्रौ
वञ्चितस्वजना पितृगृहाद्गूढं निर्गत्य नगरस्य नातिदूरे बाह्योद्याने
यत्र कदाचिदद्राक्षम् त्वां सौदामिन्या सह तत्र वकुलवीथ्यां
त्वदगमनदत्तचक्षुषा मया संगच्छस्व ।
'''कौमुदी''' - (हर्षमभिनीय ।)
{{block center|{{bold|सम्यग्विचिन्त्य मदनानलदाहशान्ति-<br>
सञ्जीवनौषधमिव प्रियवल्लभेन ।<br>
मत्स्नेहपूर्णमनसा सदयेन मह्यं<br>
दत्तं वचोऽमृतमिदं शिरसा धृतं मे ॥ २२ ॥}}}}
प्राणेश, शपे मदनस्य दृढतमेन धनुष, सुवर्णभासिनाऽसदृशेन सायकेन, अजातशात्रवभावैः कोकिलैः, युवजनानुरागसंवर्धिन्याऽप्रतिहतया शक्त्या, विरहिजनदाहकेन कामानलेन च ।<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
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तरुणी प्रेमवशीकृतं विहातुम् ।। २१ ।।}}}}
यथैव सन्ततचिन्तास्वप्ननिश्वासप्रत्याशाश्रूणि प्रणयाभिभूत
मनस्काया: सहजानि तथैव तीव्रवेदना च ! किं करोमि मन्दभागधेया । ( इत्यश्रूणि मुञ्चति ।)
'''वसन्तः'''-- समाश्वसिहि भद्रे, समाश्वसिहि । शृणु मे वचनम् ।
एषैवात्र प्रतिपत्तिः । काचिन्मे पितृष्वसा मृतभर्तृका वर्तते ।
तस्या द्रविणमस्त भूरि । अनपत्य च सा । अवन्त्या क्रोशद्वयमात्रमेव तस्याः सदनम् । पुत्रमिवाभिमन्यते मामेषा । तत्र
भवत्वावयोः परिणयो गान्धर्वेण विधिना । नास्त्ययं कठोरः
समयाचारस्तत्र । यदि ते सत्यमेव मय्यनुरागस्तर्हेि श्वो रात्रौ
वञ्चितस्वजना पितृगृहाद्गूढं निर्गत्य नगरस्य नातिदूरे बाह्योद्याने
यत्र कदाचिदद्राक्षम् त्वां सौदामिन्या सह तत्र वकुलवीथ्यां
त्वदगमनदत्तचक्षुषा मया संगच्छस्व ।
'''कौमुदी''' - (हर्षमभिनीय ।)
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सञ्जीवनौषधमिव प्रियवल्लभेन ।<br>
मत्स्नेहपूर्णमनसा सदयेन मह्यं<br>
दत्तं वचोऽमृतमिदं शिरसा धृतं मे ॥ २२ ॥}}}}
प्राणेश, शपे मदनस्य दृढतमेन धनुष, सुवर्णभासिनाऽसदृशेन सायकेन, अजातशात्रवभावैः कोकिलैः, युवजनानुरागसंवर्धिन्याऽप्रतिहतया शक्त्या, विरहिजनदाहकेन कामानलेन च ।<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''१२'''|center='''वासान्तिकस्वप्ने'''}}
{{gap}}सत्यमेव भवता तस्यामेव बकुलवाटिकायां संगच्छेय ।
'''वसन्तः''' प्रिये, प्रतिश्रुतमप्रमत्तैव निर्वहस्व । सम्प्रति पश्य
सौदामिनीमितएवागच्छन्तीम् ।
{{c|(ततः प्रविशति सौदामिनी ।)}}
'''कौमुदी'''-- जयजय चिरमत्र रमणीये सौदामिनी, कुत्र गम्यते
भवत्या ।
'''सौदामिनी'''- अयि परिहासशीले, किं मामुपहससि लावण्यवार्तया यदितेऽस्ति त्रैलोक्यसम्मोहनं सौन्दर्यं येनासौ मकरन्दो
लोहधातुरिवायस्कान्तेनाकृष्टस्सन्ततं त्वामेव निद्धयायति ।
अहो हृद्या हि ते लावण्यमञ्जरी । त्वदपाङ्गभुजङ्गदष्टश्शश्वन्मुह्यति महाभागो मकरन्दः । त्वद्वचनामृतास्वादनेन वीणावेणु
निनादमपि नाद्रियते। वसन्तोदयवसरेषु पाककपिशकलममञ्जरीरमणीयनवनवमालिकाकुसुमसुरभिदक्षिणानिलवीज्यमानगृहारामरसालकिस-लयरसास्वादमत्तकलकोकलमनोहररुतमपि न श्रृणोति । रन्ध्रान्वेषी कुसुमधन्वाप्यमुमेव समयमधिकृत्याधिकं दुनोति महानुभावम् । यदि त्वदुक्तं किञ्चिद्रामणीयकं मयि वर्तते तत्प्रतियच्छेयं तावकाय । मदलकस्ते चूर्णकुन्तलशोभामिच्छति । त्वदीक्षणप्रभां लिप्सेते मे लोचने। त्वद्वाणीविलासञ्जिघृक्षति मे रसना । किं बहुना प्रलपितेन । यदि भवामीश्वरी सर्वलोकानां मकरन्दवर्जं तत्सर्वमपि त्वद्रामणीयकविलासविभ्रमेभ्यः प्रतियच्छेयम् । यदि सकरुणा त्वं प्रियसखीविषये तर्हि शिक्षय मां कथं त्वमीक्षसे । केनवोपायेन महानुभावमकरन्दमनोऽप्यावर्जितवती येनायमद्य शून्यवत् भ्राम्यति ।<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वासन्तिकास्वप्नम्.djvu/१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''प्रथमोङ्कः ।'''|right='''१३'''}}
'''कौमुदी'''- अहो कोपविवर्तमानविषण्णवदनामपि मां कामयतेऽयं
वराकः ।
'''सौदामिनी'''-- सखि, तव क्रोधवैवर्ण्यरामणीयकं धारयतु मे
स्मितम् ।
'''कौमुदी'''-= हन्त ! शपथशतेन निवारयन्तीमपि मां मानमुत्सृज्यानुसरत्ययं मकरन्दहतकः ।
'''सौदामिनी'''-- आयि ते शपथशोभां भजतु मेऽनुरागनुतिसहस्रम् ।
'''कौमुदी'''-- यावदहं कुप्यामि तावदयं स्निह्यति ।
{{bold|सौदामिनी}}- यावदहं स्निह्यामि तावदयं कुप्यति ।
'''कौमुदी'''– सौदामिनि, तदबोधो न मेऽपराधः ।
'''सौदामिनी'''– न तेऽयमपराधः, अपि तु ते लावण्यस्य । तादृशमपराधं लिप्सतेऽस्या मनो मन्दभागिन्याः ।
'''कौमुदी'''-- समाश्वसिहि प्रियसखि, नेतः पर द्रक्ष्यति मन्मुखं ते
मकरन्दः । जिहासामि नगरमेनं प्रियवसन्तेन। यावदयं वसन्तो
नावातरन्मे लोचनपथं तावदेव मामवर्तत रम्येयमवन्ती स्वर्ग इव ।
अहो ! गरीयाननुरागः यदुपघातात् त्रिदिवोपि निरयायते ।
'''वसन्तः'''-- ( सकरुणम् )
{{block center|{{bold|अयि सौदामिनि प्रेमबाहुल्यादनुतप्यसे ।<br>
नेतः परं भवेद्दःखं स्थास्यत्यत्र न कौमुदी ।। २३ ।।}}}}
{{gap}}सखि, नास्ति किञ्चिदपि गोप्यं तव । श्व निशीथिन्यां नगरीमिमां त्यक्त्वा गमिष्यामि यत्र कुत्र वा कौमुद्या सह । शशाङ्कोदय एव कौमुदीनिर्गमः।<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वासन्तिकास्वप्नम्.djvu/१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''१४'''|center='''वासान्तिकस्वप्ने'''}}
'''कौमुदी'''-- प्रियसखि, रजन्यामागामिन्यमेतस्य नगरस्य बाह्योद्याने अस्मत्केलिगृहायमाणबकुलवीथ्यां मदागमनदत्तचक्षुषा वल्लभवसन्तेनार्धरात्रे सङ्गम्य अवन्तीं हित्वान्यदेशं गमिष्यामि । कथं त्वां पांसुक्रीडनात् प्रभृति प्रणयवतीं मुक्त्वापसृता भवेयम् ।
तथापि कार्यवशेनैतत्करणीयं भवति त्वां पुनरपि | कालेन प्रेक्षिष्ये यदि दैवमनुकूलम् । मकरन्दमुपयम्य सुखमत्रैव वस । न भूयात्ते प्रत्यूहो मङ्गलपरंपरायाः । सखि विस्रब्धं परिष्वजस्व मां त्वद्वियोगदुःखदुःखिताम् । ( इति परिष्वज्य ) नाथ वसन्त,
अप्रमादेनाचर स्वप्रतिश्रुतम्। कथं वा त्वद्वियोगं सहिष्ये तावन्तं कालम् ।
'''वसन्तः'''- अयि महिले, न मया कदाचिदप्यसत्यमाचरितम् ।
::::::::::::(निष्क्रान्ता कौमुदी)
{{gap}}सौदामिनि, अनुरागाभिनिविष्टां त्वामेवोपयम्य कुशलीभवतु
मकरन्दः । साधयामि। (इति निष्क्रान्तः )
'''सौदामिनी'''-- अहो ! केचन सुखिनः, केचन दुःखभागिनश्च
भवन्ति नियत्या ! कौमुदीवाहमपि युवतिललामभूतैवास्मिन्नगरे ।
किमनया चिन्तय । मकरन्दस्तथा न मन्यते। यत्सर्वेपि मां
शंसन्तीति न किञ्चिदेतत् प्रियमकरन्दस्य । यथेैवायमद्य कौमुदीमेव
कामयते तथैवाहमपि तम् । नीचमपि वस्त्वनुरागरञ्जितञ्चेद्भवति
रमणीयम् । मनोरथ एव कारणमनुरागस्य न चक्षुषी । उक्तञ्च ।
{{block center|{{bold|‘‘व्यतिषजति पदाराथीनान्तरः कोऽपि हेतु-
र्न खलु बहिरुपाधीन् प्रीतयः संश्रयन्ते ।}}}}<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''१४'''|center='''वासान्तिकस्वप्ने'''}}
'''कौमुदी'''-- प्रियसखि, रजन्यामागामिन्यमेतस्य नगरस्य बाह्योद्याने अस्मत्केलिगृहायमाणबकुलवीथ्यां मदागमनदत्तचक्षुषा वल्लभवसन्तेनार्धरात्रे सङ्गम्य अवन्तीं हित्वान्यदेशं गमिष्यामि । कथं त्वां पांसुक्रीडनात् प्रभृति प्रणयवतीं मुक्त्वापसृता भवेयम् ।
तथापि कार्यवशेनैतत्करणीयं भवति त्वां पुनरपि | कालेन प्रेक्षिष्ये यदि दैवमनुकूलम् । मकरन्दमुपयम्य सुखमत्रैव वस । न भूयात्ते प्रत्यूहो मङ्गलपरंपरायाः । सखि विस्रब्धं परिष्वजस्व मां त्वद्वियोगदुःखदुःखिताम् । ( इति परिष्वज्य ) नाथ वसन्त,
अप्रमादेनाचर स्वप्रतिश्रुतम्। कथं वा त्वद्वियोगं सहिष्ये तावन्तं कालम् ।
'''वसन्तः'''- अयि महिले, न मया कदाचिदप्यसत्यमाचरितम् ।
::::::::::::(निष्क्रान्ता कौमुदी)
{{gap}}सौदामिनि, अनुरागाभिनिविष्टां त्वामेवोपयम्य कुशलीभवतु
मकरन्दः । साधयामि। (इति निष्क्रान्तः )
'''सौदामिनी'''-- अहो ! केचन सुखिनः, केचन दुःखभागिनश्च
भवन्ति नियत्या ! कौमुदीवाहमपि युवतिललामभूतैवास्मिन्नगरे ।
किमनया चिन्तय । मकरन्दस्तथा न मन्यते। यत्सर्वेपि मां
शंसन्तीति न किञ्चिदेतत् प्रियमकरन्दस्य । यथेैवायमद्य कौमुदीमेव
कामयते तथैवाहमपि तम् । नीचमपि वस्त्वनुरागरञ्जितञ्चेद्भवति
रमणीयम् । मनोरथ एव कारणमनुरागस्य न चक्षुषी । उक्तञ्च ।
{{block center|{{bold|{{center|<poem>‘‘व्यतिषजति पदाराथीनान्तरः कोऽपि हेतु-
र्न खलु बहिरुपाधीन् प्रीतयः संश्रयन्ते ।</poem>}}}}}}<noinclude><references/></noinclude>
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कल्पः/श्रौतसूत्राणि/कात्यायन-श्रौतसूत्रम्
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Reference:
Ranade, H.G., tr., Kaatyayana Shrauta Sutra, Rules for the Vedic Sacrifices, Translated into English, (Pune: Ranade & Ranade, 1978).
अस्याः टंकितसामग्र्याः स्रोतं –
[http://peterffreund.com/Vedic_Literature/Vedic%20Literature%20Unicode/Vedangas/Kalpa/Shrauta%20Sutra/ Peter Freund]
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Reference:
Ranade, H.G., tr., Kaatyayana Shrauta Sutra, Rules for the Vedic Sacrifices, Translated into English, (Pune: Ranade & Ranade, 1978).
अस्याः टंकितसामग्र्याः स्रोतं –
[http://peterffreund.com/Vedic_Literature/Vedic%20Literature%20Unicode/Vedangas/Kalpa/Shrauta%20Sutra/ Peter Freund]
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Reference:
Ranade, H.G., tr., Kaatyayana Shrauta Sutra, Rules for the Vedic Sacrifices, Translated into English, (Pune: Ranade & Ranade, 1978).
अस्याः टंकितसामग्र्याः स्रोतं –
[http://peterffreund.com/Vedic_Literature/Vedic%20Literature%20Unicode/Vedangas/Kalpa/Shrauta%20Sutra/ Peter Freund]
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[[/अध्यायः २६|अध्यायः २६ - प्रवर्ग्यः]]
Reference:
Ranade, H.G., tr., Kaatyayana Shrauta Sutra, Rules for the Vedic Sacrifices, Translated into English, (Pune: Ranade & Ranade, 1978).
अस्याः टंकितसामग्र्याः स्रोतं –
[http://peterffreund.com/Vedic_Literature/Vedic%20Literature%20Unicode/Vedangas/Kalpa/Shrauta%20Sutra/ Peter Freund]
[[वर्गः:श्रौतसूत्राणि]]
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Reference:
Ranade, H.G., tr., Kaatyayana Shrauta Sutra, Rules for the Vedic Sacrifices, Translated into English, (Pune: Ranade & Ranade, 1978).
अस्याः टंकितसामग्र्याः स्रोतं –
[http://peterffreund.com/Vedic_Literature/Vedic%20Literature%20Unicode/Vedangas/Kalpa/Shrauta%20Sutra/ Peter Freund]
[[वर्गः:श्रौतसूत्राणि]]
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{{center|( {{bold|न्यायलीलावती प्रकाशनोपक्रमः ।}})}}
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{{gap}}'प्रतिसंक्षिप्त चिरन्तनोक्तिभिः' इति सिद्धान्तमुक्तावली हारिकास्थस्य
अतिसंक्षिप्तपदस्य व्यावृत्तिमभिदवता महादेवभट्टेन दिनकर्या' 'ननु लीलावत्यादिप्राचीन निबन्धाध्ययनेनैव कारिकावलीप्रतिपादितोऽर्थो बोद्धव्य
इति किमनेन भवत्कृतविशद निबन्धनेनेत्यत श्राह अतिसंक्षिप्तेति' इत्युकम् । अध्ययनकाल एव तदवलोक्य कोऽसौ लीलावतीग्रन्थः कश्च लीलावतीकार ? इत्युत्कलिकाकुलेन मया कालान्तरे मोहमयी स्थनिर्णयसागरयन्त्रालशत्प्रकाशितं श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं न्यायलीलावती निबन्धं दृष्ट्वा सैवेयं लीलावतीति गुरु
मुखादवधारितम्, किन्तु प्रशस्तपादभाष्यस्य निखिलटीका निबन्धेभ्योऽस्या दुरूहरचनावस्वान्मुद्रितस्य पुस्तकस्य निष्टीकत्वात्प्रायशोऽशुद्धतया च पदार्थोद्देशवि
भागपरीक्षाप्रकरण एव कुंठितमतिना मया प्रातःस्मरणीयास्तातकल्पा गुरुवयं म०
म० पं० अम्बादासशास्त्रिणो भूयो भूयस्तदध्यापनार्थं प्रार्थिता अपि नायं ग्रन्थो
टीकासाहाय्यं विना यथावदध्यापयितुमर्ह इति श्रुत्वा निर्विणेन तृष्णबभूवे ।
अनन्तरमत्स्मत्सौभाग्येन काशीस्थराजकीय संस्कृत पाठशालीय मुख्याध्यक्षैः दार्शनिक,
प्रवरैः पण्डित गोपीनाथ कविराज एम, ए महोदयैः प्रोत्साहिता हिन्दूविश्वविद्यालये
उपदेशक पदमलं कुर्वन्तस्तत्रभवन्तो हरिहरगास्त्रिणो वाराणसेयचौखम्बासंस्कृतलीरीजपुस्तकमालाध्यक्ष श्रीजयकृष्णदासगुप्त महोदयाना मादेशेने<ref>टीकाकर्तृ समयपरिचयादिकमन्यत्र किरणावली भूमिका दाव ने कैरितिहासमर्मक्षैर्निरूपितमित्युपेक्षितमस्माभिः ।</ref>मां श्रीशङ्करमिश्रकृतलीलावतीकण्ठाभरणेन, भगीरथठक्कुरविरचित विवृतिसमुद्रासित - वर्धमानोपाध्यायविनिर्मित - ग्यायलीलावतीप्रकाशेन च समेतां न्यायलीलवतीं संस्कृत्य
प्रकाशयितुमारेभिरे । व्याप्तिपरीक्षाप्रकरणपर्यन्तं प्रहाशितायामस्यामस्माकं
विद्वज्जनसमाजस्य च दुर्दैववशतोऽकाण्ड एवोक्त विद्वद्वयें दिवं गते तत्कृत्ये प्रकाशकमहोदयैरहं नियोजितोऽभूवम् । एतत्संशोधनसाहाय्यकारिणा मादर्श मुलपुस्तकादीनामुपलब्ध्यादिविषयः प्रथमखण्डीयनिवेदन एव प्रथमसंशोधक्रमहोदयैन्यैवेद्यतस्तत्पिष्टपेषणमयुक्तं मत्वा तत्प्रतिज्ञातं टीकाप्रणेत्तृवृन्दसहितानां मूलकृतां कालादिनिरूपणमधिकृत्य यथोपलब्धमधुना विचारयामः ।
{{center|(वल्लभाचार्य समय संस्तवादिनिरूपणम् )}}
{{gap}}तत्र तावद्वैशेषिकराद्धान्तोक्कपदार्थ परीक्षणमूलनिबम्धरूपोऽयं वल्लभाचार्यनिबद्धो न्यायलीलावतीग्रन्थः प्रशस्तदेवाचार्यकृतभाष्यवृत्यष्टकेष्वन्यतमो तद्-
{{rule}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''भूमिका । '''|right=}}</noinclude>
न्यो वेत्यनिवर्यैवास्माभिर्व्योमवतीसुक्तिसेतुव्याख्यानत्रयसमलङ्कृतस्य काशीस्थ
चौखम्बा संस्कृत पुस्तकमालायां प्रकाशितस्य प्रशस्तपादभाष्यस्य भूमिकायां लीलादत्यपि मुद्वितेति अतथ्यमेव प्रलपितम् यतो कन्दलीव्याख्यातृभी राजशेखरजैनाचार्यैः पञ्जिकाख्यायां न्यायकन्दलाव्याख्यायां वक्ष्यमाणप्रकारेण भाष्यटीकाकाराणां क्रमोऽवधारितः-
{{gap}}'इह किल पूर्वमजिह्मब्रह्माभ्यासदूरीकृतप्रमादाय मुनये कणादाय
स्वयमीश्वर उलकरूपधारी प्रत्यक्षीभूय द्रव्यगुणकर्म सामान्य विशेषसमवायलक्षणं पदार्थषटकमुपादिदेश, तदनु स महर्षिर्लोकानुकम्पया
षट्पदार्थ रहस्यप्रपञ्चनपराणि सूत्राणि रचयाञ्चकार । तेषु सूत्रेषु
प्रशस्तदेवकरो भाष्यं सकृद्गुणनमात्रेण महोग्रदष्ट कविषापहारद्वष्टलोकोत्तरवैभवं चकार । तत्र चतस्त्रो वृत्तयो निर्वृत्ताः । एकां व्योमचतीनाम्नीं वृत्ति व्योमशिवाचार्यो जुगुम्फ, द्वितीयां तु न्यायकन्दल्यभिधानां श्रीधराचार्यः सन्ददर्भ, तृतीयां किरणावलीनाम्नीमुदयनाचार्यस्ततान, चतुर्थी तु लीलावतीतिख्यातां श्रीवत्साचार्यो बबन्ध ।
चतस्त्रोऽपि गम्भीरार्थास्तत्रेमां न्यायकन्दलीं प्रारभमाणः श्रीधरदेव'
इत्यादिना । एतेन श्रीवत्सकृता लीलावती वल्लभाचार्य विरचितम्यायलीलावतीतो
मिन्नाऽद्ययावत् केनाप्यनुपलब्धापि अवश्यं दार्शनिकसृष्टौ वर्तत इत्यवधार्यते ।
एवञ्चार्य प्रकृतनिबन्धो न भाष्यव्याख्यारूपः कित्वाचार्य वल्लभैः स्वप्रतिभया
स्वातन्त्र्येण वैशेषिकराद्धान्त सिद्धपदार्थ परीक्षणार्थं स्वमताविष्करणार्थज्ञान्यदेशेविकनिबन्धेभ्यो विलक्षणो नूतनशैल्या निबद्ध इति विद्वांसस्तत्पठनेन स्वयं निर्धारयिष्यन्ति । वयमपि यथामति तद्विषयमवलम्ब्यानुपदमेव विवेचयिष्यामः ।
{{gap}}एष च मिथिलादेशजातो विद्वद्वरेण्यः लीलावस्यां किरणावलीकर्तुर्महानैयायिकस्य श्रीमदुदयनाचार्यस्य नामोल्लेखात दशमशताब्यां वर्तमानात ततोऽर्वाचीनः, द्वादशशताब्द्यारम्भे कृतस्थितिना वर्धमानोपाध्यायेन व्याख्यातत्वाच ततः
प्राचीनो सोष्टीय ९८४ तथा ११७८ वर्षयोर्मध्य आसीत् । उदयनाचार्यादीनां
मैथिलेयानां नैयायिकानां मिथिलोद्भवत्वेन तन्त्र न्यायशास्त्रस्य बाहुल्येन प्रचाराव कदाचिठ्ठलभाचार्यस्यापि मैथिलत्वं सम्भाव्येत । वर्धमानोपाध्यायकृतो न्याली० प्रकाशः (१) रघुनाथ शिरोमणिप्रणीतो न्या० ली० दीधिति: (२) शंकरमिश्रविरचितं कण्ठाभरण (३) चेति टीकात्रयमेवास्या न्यायलीलावत्या इति मोहमच्यां सुद्रिते. मूळमात्र न्यायलीलावतीनिबन्धप्रस्तावे मङ्गेशरामकृष्ण तैलङ्गप्रवरा आहुः ।
तन्मन्दम् । हृदयनाचार्यादर्वाचीनत्वस्य वर्धमानोपाध्यायात्प्राचीनत्वस्य चापाततोऽवधारयितुं शक्यत्वेऽपि निर्दिष्ट एव समये प्रबालप्रमाणाभावात मैथिखेयत्वे
प्रमाणसनावात्र टीकाससकसखेन वायुतत्वादिति ब्रूमः ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''भूमिका ।'''|right=३}}</noinclude>
{{gap}}केचित्तु गङ्गेशोपाध्यायकृतात् तत्त्वचिन्तामणेः परं विश्वनाथकृत सिद्धान्तमुक्तावल्याः पूर्वं चाध्ययनाध्यापनादौ न्यायलीलावतीनिबन्ध एवं न्यायवैशेषिकप्रकरणग्रन्थेषु प्रचलित आसीदिति पूर्वप्रदर्शितदिन टु केश्चित्सुखीकारकृतवल्लभमतख'ण्ड नदर्शनाकावगम्यतेऽतस्त्रयोदशशताब्दी चतुर्दशशताब्दी वा न्यायलोलावतीकर्तुः
समय इति वदन्ति ।
{{gap}}तदतीवान्याय्यम्, यतः सप्तपदार्थी निबन्धप्रणेतुः शिवादित्यस्योल्लेखात् वैशेषिकदर्शनावलम्बिनो रत्नको शाख्य महा निबन्धकृत प्रतस्योट्टङ्कनास्वीयपञ्चशताधिकैकादशशतसंवत्सरादूर्ध्वं श्रीहर्षसमकालिकतया वा द्वादशशताब्धा अन्तिमे
भागे वर्तमानस्य गङ्गशेोपाध्यायस्य तनूजन्मना (1250 A. D. ) त्रयोदशशताब्द्यां वसता वर्धमानोपाध्यायेन प्रकाशाख्यव्याख्यया समलंकृतेयं न्यायलीलावतीत्यत्र न केषाञ्चिदपि वैमत्यम् ।
{{gap}}वस्तुतस्तुक्तरीत्योदयनवर्धमानयोर्मध्यकाल एव सम्भवत्स्थितिकस्य वल्लभाचार्यस्यान्तरालिक निर्देशार्हसमयावधारणहेतोरभावेऽपि
{{Block center|<poem>उदयनबलभद्राभ्यां सप्तशनीशिष्यसोदराभ्यां मे ।
द्यौरिव रविचन्द्राभ्यां प्रकाशिता निर्मलीकृत्य ॥</poem>}}
{{gap}}इति शृङ्गारसप्तशत्यां गोवर्धनाचार्योक्त्या बलभद्राख्यस्तच्छिष्य एव वल्लभाचार्य इति नाम्ना विख्यातोऽभूदित्यनुमीयते । गोवर्धनाचार्याश्च
{{Block center|<poem>ख्यातो गोवर्धनाचार्यो उमापतिधरस्तथा ।
शरणो जयदेवश्च धोयो कविनृपः क्रमात् ।
राज्ञा लक्ष्मणसेनस्य पञ्चरत्नानि संसदि ।</poem>}}
{{gap}}इति पञ्चरत्नोक्तया लक्ष्मणसेनस्य राज्ञः सभापण्डिता आसन्निति निष्पद्यते ।
लक्ष्मण सेनसमयस्तु न्यायवार्तिकभूमिकायां म० म० विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदिभिः
१०२९ शाकाब्दोऽत्रधारितः, तथाच तत्समकालस्य बलभद्रापरनाम्नो वल्लभाचार्यस्यापि एकादशशताब्द्येव काल इति सङ्गच्छते । एवं चाचार्य वल्लभाः मंगेशोपाध्यायसमकालीनास्तत्पूर्वकालीना एव वेति वक्ष्यामः । अत्र च गोवर्धनाचार्यख्य
भ्रातोदयनाचार्य एव लक्षणावल्यादिनिबन्धप्रणेता इति न भ्रमितव्यम्, 'तर्काम्बराङ्कप्रमितेष्वि'त्यादिलक्षणावली निर्दिष्टसमरस्यास्य च समयस्य महदन्तरस
त्वात् । यतश्च न्यायलीलावतीकर्तुर्वल्लभस्य केवलमाचार्य इति गुरुसम्प्रदायाधिगता
बिरुदावली सर्व पुस्तके लभ्यते नैयायिकतया कुशाग्रबुद्धित्वात् रविणोपमितश्च श्री
मता गोवर्धनाचार्येणाsतोऽपि न वलभद्रस्य वल्लभत्वसम्भावनायां काचित्क्षतिरिति ।
पूर्वसति न्यायलीलावतीग्रन्थकर्ता वल्लभाचार्य एकादशशताब्यामेव मिथिलादेशे
बभूवेति आधुनिकानां मैथिलविदुषां राद्धान्त एव निरवद्यः प्रतिभाति ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=४|center='''भूमिका।'''|right=}}</noinclude>
{{center|{{bold|(ग्रन्थरचनाशैली विषयसमालोचनाच)}}}}
{{gap}}’त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य वृत्तिः" इति समानतन्त्राचार्यप्रवरवात्स्यायनमहर्ष्युक्तिं प्रमाणयता वल्लभाचार्येण वैशेषिकसिद्धान्तसिद्धपदार्थानामुद्देशाख्यां लक्षणाख्यां च प्रवृत्तिं प्रशस्तपादभाष्यलक्षणावल्यादिनिबन्धैर्गतार्थां
मन्यमानेन परीक्षाख्यैव तार्तीया प्रवृत्तिः प्राधान्येनावलम्बिताऽत्र न्यायलीलावतीनिबन्धे । तत्र च प्रथमे विभागपरिच्छेदे 'षडेय पदार्थाः' (पृ० १० १० १)
इत्याधुपक्रमेण पदार्थोद्देशविभागपरीक्षां विधताऽऽचार्येणा(१)भाव(२)तमः-
(३)क्षणिक(४)शक्ति(५)ज्ञातता(६)ऽऽधाराधेयभाव(7)सादृश्याख्यानां सप्तपदार्थानामतिरिक्तत्वमाशंक्य यथा पदार्थान्तरत्वखण्डनं प्राचीनशैल्या विहितन्तया
नान्यत्र मूलनिबन्धग्रंथेषूपलभ्यत इति स्वयमेव ज्ञास्यन्ति पाठकाः । एवमेवाग्रे
'पृथिव्यादीनां द्रव्यत्वाद् गुणवत्त्वाद्वा भेद' (पृ० ८८ पं०१) इत्याद्युक्त्या
पदार्थानां न्यूनत्वमपि संभवतीत्यभिप्रायेण पदार्थोदेशविभागाक्षेपतत्समाधानपरिपाट्यपि वल्लभाचार्याणामेव नान्येषामद्ययावदुपलब्धानां वैशेषिकदर्शननिबन्धकाराणामित्यपि सुव्यक्तम् ।
द्रव्यविभागपरीक्षायामपि
केवलं पृथिव्यादिपरीक्षाक्रम एवं न्यायलीलावतीकारेणावलम्बितो न लक्षणोदेशवर्णनक्रम इत्यपि नूतनमेवान्यनिबन्धेभ्यः । तत्राप्यवयविपरीक्षायां परमाणुपुञ्जवादिबौद्धमतखण्डनप्रकारो व्यासत इहैव यादृगुपलभ्यते नान्यत्र तथा ।
बहिरिन्द्रियशरीरविषयाणां द्रव्यान्तरत्वाक्षेपाभिप्रायेण द्रव्यविभागपरीक्षा सृष्टिसंहारविधिस्थप्रलयपरीक्षा परमाणूनां द्रव्यान्तरत्वाक्षेपसमाधानपरलीलावतीस्थपरीक्षाप्रकरणं चातीवहृदयङ्गमं नैयायिकसचेतसाम् । एवं भूषणमतखण्डनपूर्वकं
प्राचीनार्वाचीनप्रणाल्या कालदिशोः परीक्षायां क्षणिकविज्ञानसन्ततिपक्षनिरासद्वारात्मन इतरभेदसाधने, मनस इतरभेदसाधने च वल्लभाचार्यपरिगृहीता शैली नवीनैव ।
{{gap}}गुणविभागपरीक्षायामपि द्विवादिसंख्यास्थापने भासर्वज्ञमतखण्डनं दीर्घत्वपरिमाणविशेषस्यास्वीकारो द्विपरत्वप्रतिबन्दीनिरासद्वारा द्विपृथक्त्वव्यवस्थापनमवयववतिना संयोगाभावेनावयविनि संयोगस्य सादेश्यव्यपदेशविषयत्वमानस्यैवाज्याप्यवृत्तित्वव्यवहारनिबन्धनत्वात्संयोगस्यापि वस्तुतो व्याप्यवृत्तित्वमिति च सर्वतन्त्रस्वतन्त्राणां वल्लभाचार्याणां स्वतंत्रं स्वमतमेव । एवं
परत्वापरत्वयोः परीक्षायां किरणावलीकारमतनिर्भत्सनं भू
षणकारमतस्य कणमक्षपक्षाक्षमामात्रविजृभितत्वप्रदर्शनं चातीव चमत्कारकारि । प्रत्ययमानेषु
यथार्थत्वं मन्यमानानां गुरुमततत्ववेदिनां मतस्य निरासोऽन्यथाख्यातिस्थापनं च
विपर्ययपरीक्षायां, भूषणमतखण्डनपूर्वकमनध्यवसायस्थापना, स्वप्नाख्याविद्यास्थापनपूर्वक बाह्यार्थभावादिमतखण्डनं, प्रत्यक्षपरोक्षायां सर्वज्ञप्रत्यक्षावधारणप्रक्रिया<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''भूमिका।'''|right=}}</noinclude>
चान्यन्त्रादृष्टचरी विशेषतो विदुषां रुचिकराति वदामः । तथा चार्वाकमतखण्डनद्वाराऽनुमानप्रामाण्यव्यवस्थापने संक्षेपत उदनाचार्योक्तानुपाधित्वरूपव्याप्तेः पूर्वपक्षीयैकमात्रव्याप्तेश्च निरासपूर्वकं कार्त्स्न्येन साधनस्य साध्यसंबंधरूपव्याप्तिस्वरूपस्य
निरूपणे तज्ज्ञापकानुपाधिकत्वकथनेऽप्यतिप्राचीना प्रौढयाच्याच निबन्धनशैली गंगेशोपाध्यायकृतामतिविस्तृतां व्याप्तिनिरूपणरीतिमप्यतिशेतेऽतो गङ्गेशोपाध्यायावल्लभाचार्याः पूर्वकालीना इत्युक्तौ न किञ्चिदप्यसमञ्जसं स्यात् । तत्र तावल्लालावतीनिबद्धस्य 'नापि साध्याभावविरोध' (पृ० ५०० ५०१) इत्येकपूर्वपक्षिव्याप्तिनिरूपणस्यैव कृत्स्नः पूर्वपक्षिव्याप्तिसमुदायो गंगेशोपाध्यायेन स्वमतिवैभवेन प्रसारितोऽन्ते चानौपाधिकत्वरूपव्याप्तिस्थापनं टीकाकूदभिमतोक्तविधव्याप्तिनिरासश्चोभयत्रापि समान इति च न्यायलीलावतीं निभृतमवलंब्यैवांशोऽयमेतावतीं
दुरूहतां नव्यशैल्या प्रापित इति प्रतिभाति । यतस्तत्पुत्रेण वर्धमानोपाध्यायेन
न्यायलीलावतीकारप्रदर्शितस्य का पुनर्व्याप्तिः ? साधनस्य साहित्यं कार्त्स्न्येना ( पृ० ४९६ पं० १) इति ग्रन्थस्य व्याख्यानं विदधता 'नन्वेकव्यक्तिकव्याप्तौ न कार्त्स्यार्थः, अनेकव्यक्तिकेऽपि सक लधूमसम्बन्धस्य
प्रत्येकं वह्नावभावः, अत एव न कृत्स्नेन साध्येन साधनस्य सम्बन्धो
व्याप्तिः, विषमव्याप्ते तदसम्भवाच्चे (पृ० ४६६ २०१७) त्याद्यारभ्य सिद्धान्त्यभिमततदर्थप्रदर्शनपर्यन्तं, तत्त्वचिन्तामणौ तस्य 'नापि कार्त्स्न्येन सम्बन्धो
व्याप्तिः एकव्यक्तिके तदभावात्, नानाव्यक्तिकेऽपि सकलधूमसम्बन्धस्य प्रत्येकवह्नावभावात, अत एव न कार्त्स्न्येन साध्येन सम्बन्धो
व्याप्तिः विषमव्याप्ते तदभावाच्चे (क० मु० पु० पृ० ३ पं० २३ )त्यादिपाठस्यैव 'अत्रोच्यते' इत्यादिग्रन्थपर्यन्तं प्रायश आनुपूर्व्यैवोल्लेखः कृतः ।
एवं सिद्धान्तलक्षणीये-'यत्संबंधितावच्छे करूपवत्वं यस्य तस्य सा
व्यातिः, तथाहि धूमस्य वह्निसम्बन्धित्वे धूमत्वमवच्छेदकं धूममात्रस्य वह्निसम्बन्धित्वात् , वस्तु धूमसम्बन्धे न वह्नित्वमवच्छेदकं
धूमासम्बन्धिनि गतत्वात्, न ह्यतिप्रसक्तमवच्छेदकं संयोगादौ तथात्वादर्शनात्, किंत्वाद्रंन्धनप्रभववह्नित्वं धूमसंबन्धितावच्छेदकं, तादृशं च व्याप्यमेव । यद्वा यत्समानाधिकरणान्योन्याभावप्रतियोगि
यद्वन्न भवति तेने समं तस्य सामानाधिकरण्यम्' (पृ० ४९८ ८)
इत्यादिग्रन्थेन न्यायलीलावतीप्रकाशे प्रदर्शिते व्याप्ती अपि तत्वचिन्तामणिस्थ
(क. मु० पु० पृ. ५-६ )सिद्धान्तव्याप्तिलक्षणद्वयादानुपूर्व्याऽक्रम समुद्धृते ।
व्याप्तिवत्तर्कविषयः सिद्धान्तोऽपि न्यायलीलावतीनिबद्धो चिन्तामणिसम्वादीति
सूक्ष्मदृष्ट्या विचार्यमाणेऽवश्यं बुद्धिमारोहोतीति कृतमप्रासंगिकविचारेण ।
{{gap}}एवमग्रेडपि वैशेषिकमतसिद्धप्रमाणद्वयस्थापनाय शब्दादिमानान्तरभङ्गनिरूपणे<noinclude></noinclude>
j8zn19ubnc6zzpweaj5yyxo1ruob6u8
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=६ |center='''भूमिका ।'''|right=}}</noinclude>
किरणीवलीकारमतखण्डनम् , अनुपलब्धिनिरासे मीमांसकमतखण्डनप्रौढोप्रदर्शनपूर्वकमभावतद्विभागपरीक्षाक्रमश्च वल्लभाचार्याणामाचार्यत्वमन्वर्थयतीत्यत्र
न कश्चित्सन्देहः । अपवर्गपरीक्षायामप्यभावप्रसङ्गसङ्गतायां वेदान्तित्रिदण्डिभट्टाद्यभिमतमुक्तिपदार्थनिरसनपूर्वकं दुःखप्रागभावरूपापवर्गस्य पुरुषार्थत्वसाधर्म,
द्वयवयववादिजैनमतखण्डनपूर्वक पंचावयवस्थापनं, हेत्वाभासपरीक्षणान्ते स्मृतेर्मानान्तरत्वनिरासपूर्वकं युक्त्याऽतीन्द्रियस्यापि गुरुत्वस्येन्द्रियप्रवृत्तिविषयत्वसाधनं चाचार्यवल्लभस्यालौकिकमेवान्यन्त्रानुपलंभात् । तथाऽग्रे प्रोक्षणादिजन्यसंस्कारखण्डनपूर् कन्तत्रैविध्यस्थापनं शब्दे द्रव्यत्वसाधकानुमाननिरासपूर्वकं गुणत्वस्थापनं, स्फोटवादिवैयाकरणमतखण्डनं च यद्यप्यन्यत्रोपलभ्यते, तथापि रुच्यादिचतुर्विशत्यतिरिक्तगुणाक्षेपसमाधानपूर्विका गुणनियमनशैली नान्यत्र कुत्रचिदीदृशी भाष्यादिप्राचीननिबन्धेषूपलभ्यत इत्ययमपि विशेषो गुणपरीक्षायामतीव हृदयङ्गमः ।
{{gap}}कर्मविभागपरीक्षान्तेऽतद्वयावृत्तिरेव जातिर्नान्या वस्तुभूतेति बौद्धमतखण्डनरीतिः, परापरातिरिक्तसामान्याक्षेपसमाधानप्रकारश्च, प्राचीनवैशेषिकरहस्योद्घाटनपरोऽतीवप्रौढपाण्डित्यप्रकाशको न्यायलीलावतीकाराणाम् । एवमेव समवायपरीक्षायां
विशेषणताविशेष्यतयोः स्थलविशेषान्तर्भावेण स्वरूपभेदकथनपूर्वकं समवायस्थ
वैशेषिकमतेऽप्रत्यक्षत्वेऽपि समानतन्त्रशोडषपदार्थ मतमाश्रित्य महताऽऽडम्बरेण प्रत्यक्षत्वव्यवस्थापनं च विभागपरिच्छेदेऽत्यन्तमुपादेयो न्यायलीलावत्याः वैदग्ध्यविधायको भागविशेषः । व्यतिरेकिरूपवैधर्म्यज्ञानाधीनस्य व्यावृत्तत्वेन पदार्थज्ञानस्यैव तत्वज्ञानत्वात् व्यतिरेक्यनुमानपरीक्षापूर्वक 'व्यावृत्तिर्व्यवहारो वा लक्षणस्य प्रयोजनम्' इत्याभियुक्तोक्तेर्विवेचनद्वारा सकलपदार्थानां प्रातिस्विकलक्षगवर्णनस्यान्ते संशयस्य महर्षिवात्स्यायनोद्योतकराभिमतपंचविधत्ववैविध्यखण्डनपूर्वकं
परमन्यायाचार्यवाचस्पतिमिश्रमतखण्डनं भूषणमतनिरासपूर्वक प्रमाणसामान्यलक्षणं च वैधर्म्यपरिच्छेदे वल्लभाचार्येण स्वमतिप्रागल्भ्यादेवोड्कितम् ।
{{gap}}साधर्म्यस्यान्वयिहेतुत्वेनात्मतत्त्वावबोधकत्वात्तत्परिच्छेदेऽस्तित्वादिसाधर्म्यपरीक्षणान्ते हेतुफलभावानङ्गीकारे आत्मादितत्त्वाव्यवस्थितौ न निःश्रेयसप्राप्तिरिति सङ्गत्या द्रव्यादिप्रक्रियापरिच्छेदे सिंहावलोकनन्यायेन द्वय णुकमिद्वयाक्षेपसमाधानयुक्तीनां पिठरपाकमापक्षितां पीलुपाकयुक्तीनां च प्रदर्शनद्वारा पाकजप्रक्रियावर्णनम्, अन्ते द्वित्वाग्रुत्पचिप्रक्रियाक्षेपसमाधानाय संख्याप्रक्रियाप्रदर्शनम् ,
बाधकाभावात् द्वयणुकपरिमाणमेव त्रसरेणुपरिमाणजनकमस्त्विात्याक्षेपस्य 'चातुर्विधमपि जन्यपरिमाणं संख्यापरिमाणप्रचयजन्यमिति भाष्याक्षेपस्य' च समाधानार्थ परिमाणप्रक्रियाप्रदर्शनम् , द्विपृथक्त्वसाधनाय पुनः पृथक्त्वप्रक्रियाया
संयोगविभागादिपरीक्षणाय च संयोगादिसंस्कारान्तप्रक्रियायाश्चान्ते प्रदर्शनमित्येव-<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''भूभिका।'''|right=७}}</noinclude>
मेकविधस्यापि पदार्थस्य स्थलान्तरे वर्णनात्मिका सूत्रकारौली वल्लभाचायेण
किमिति समवलम्बितेति स एव जानात्यस्य प्रयोजनम् ।
{{center|(न्यायकीलावत्या भाष्यातिशायिविपयस्वम् )।}}
{{gap}}एवञ्चोकरीत्याऽभावादिनिरूपणं प्रगाढपाण्डित्येन विवेचयता वल्लभाचार्येण
न्यायलीलावतीनिबन्धः प्रशस्तपादीयधर्मसंग्रहापरपर्यायभाष्यनिबन्धविषयातिशायित्वाहार्शनिकसृष्टौ प्रख्याति नीतस्तत्त्वचिन्तामण्यादिमहानिबन्धाध्ययनाध्यापनात्पूर्वकालमारभ्य मिथिलायां वङ्गदेशे च पठनपाठनादावत्यन्तप्रचलितो बभूवेति
श्रूयतेऽवधार्यते च तदुपरिलिखिताभिस्तद्देशीयप्रसिद्धनैयायिकैर्व्यानपरम्परामिर्यतोत्राऽद्ययावत्
(१) न्यायलीलावतीविवेकः ( पक्षधरमिश्रकृतः ) (1275) A. D
(२) न्या० ली० रहस्यम् (मथुरानाथतर्क० कृतम् ) (1570) A.D.
(३) न्या० ली. विभूतिः (रघुनाथशि० कृता)(1477-1547) A. D\
(४) न्या. ली. प्रकाशः (रामकृष्णभट्टाचार्यकृतः)
(५) न्या०ी० वर्धमानेन्दुः (वाचस्पतिमिश्र ) (1450) A. D
(६) न्या० ली० कएण्ठाभरराम् (शङ्करमिश्रकृतम् ) (1450) A. D
(७) न्या. ली. प्रकाशः (वर्धमानोपाध्याय कृतः ) (1250)
{{gap}}इति सप्तटीकाः पुरातन्य उपलभ्यन्ते । प्रकाशव्याख्यानस्यापि मथुरानाथवागीशकृतं रहरूट (१) रघुनाथशिरमणिकृता दीधितिः (२)
भगीरथठक्कुरकृता विवृति( ३ )क्ष्चेति तिस्रो व्याख्या विहिताः ।
{{center|({{bold|उपसंहारः।}})}}
{{gap}}एवमुक्तविशेषैरत्युत्कृष्टस्याऽस्य न्यायलीलावतीनिबन्धस्य दुर्घटे संशोधनका
यन्मदीयमित्रवरैः व्याकरणाचार्यै: प्रण्डितप्रवरहारानचन्द्रशास्विमिश्रिमस्थलाक्षरसंयोजनव्याख्यादिना सम्यगनुगृहीतोऽस्मि, तथा काशीस्थराजकीयसंस्कृतपाठशालाध्यक्षपण्डितगोपीनाथकविराजमहोदश्च वल्लभाचार्याणामतिविषये यत्प्रबोधितोऽभूवन्तेनैतयोरुपकृतिं शिरसा वहन् यदन्न प्रमादादिजन्म दोषजातं दृश्येत तदनैः
सद्धिः क्षन्तव्यम् इति प्रार्थवते---
वसन्तोत्सवः।{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}विदुषाममनुःच्र:।
१९९०{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}ढुण्डिराजशास्त्री।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{center|{{bold|श्रीमद्वल्लभाचार्यकृतन्यायलीलावतीनिबध्दप्रकरणानां सूचीपत्रम् ।}}
}}
{{center|(१)विभागपरिच्छेदे -}}
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}} पृष्ठात् पृष्ठान्तम्
१ पदार्थोद्देशपरीक्षाप्रकरणम् । १० १०३
२ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) पृथिवीपरीक्षाप्रकरणम् । १०७ १२०
३ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) अवयविपरीक्षाप्रकरणम् (प्राखिगकम् )
४ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) जलपरीक्षाप्रकरणम् । १३१ १४८
५ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) तेजःपरीक्षाप्रकरणम् । १४९ १५७
६ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) वायुपरीक्षाप्रकरम् । १६६ १७९
७ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् । १८१ २०२
८ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) शरीरपरीक्षाप्रकरणम् । २०२ २१५
९ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) विषयपरीक्षाप्रकरणम् । २१६ २१९
१० (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) सृष्टिसंहारविधौ (ग्रलयपरीक्षाप्रकरणम् )। २२० २३८
११ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) ईश्वरपरीक्षाप्रकरणम् । २३९ २६२
१२ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) परमाणुपरीक्षाप्रकरणम् । २६२ २७३
१३ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) आकाशपरीक्षाप्रकरणम् । २७४ २७९
१४ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) कालपरीक्षाप्रकरणम् । २७९ २९३
१५ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) दिग्परीक्षाप्रकरणम् । २९४ ३१३
१६ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) जीवात्मपरीक्षाप्रकरणम् । ३१४ ३२३
१७ (द्रव्यविभागपरीक्षायां ) मनःपरीक्षाप्रकरणम् । ३२३ ३४२
१८ (गुणविभागपरीक्षायां ) संख्यापरीक्षाप्रकरणम् । ३४३ ३५८
१९ (गुणविभागपरीक्षायां ) परिमाणपरीक्षाप्रकरणम् । ३५८ ३६८
२० (गुणविभागपरीक्षायां ) पृथक्त्वपरीक्षाप्रकरणम् । ३६८ ३७२
२१ (गुणविभागपरीक्षायां ) द्विपृथक्त्वपरीक्षाप्रकरणम् (प्रासनिकम् ) ३७२ ३७४
२२ (गुणविभागपरीक्षायां ) संयोगपरक्षिाप्रकरणम्। ३७५ २८०
२३ (गुणविभागपरीक्षायां ) संयोगाव्याप्यवृत्तित्वपरीक्षाप्रकरणम् (प्रासङ्गिकम् ) ३८० ३९४
२४ (गुणविभागपरीक्षायां ) विभागपरीक्षाप्रकरणम् । ३९४ ३९६
२५ (गुणविभागपरीक्षायां ) परत्वापरत्वपरीक्षाप्रकरणम् ।३९७ ४०६
२६ (गुणविभागपरीक्षायां ) बुद्धिप्रकरणे संशयपरीक्षाप्रकरणम् । ४०८ ४१६<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=२|center='''प्रकरणासूचीपत्रम् ।'''|right=}}</noinclude>
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}पृष्ठात्{{gap}} पृष्ठान्तम्
२७ ( गुणविभागपरीक्षयां ) पिपर्यपरीक्षाप्रकरणम् । ४१७ ४५०
२८ ( गुणविभागपरीक्षयां ) अनध्यवसायपरीक्षाप्रकरणम् । ४५१ ४५३
२९ ( गुणविभागपरीक्षयां ) स्वप्गपरीक्षाप्रकरणम्। ४५४ ४७०
३० ( गुणविभागपरीक्षयां )प्रत्यक्षे योगिप्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ४७० ४८०
३१ ( गुणविभागपरीक्षयां )प्रत्यक्षे निर्विकल्पकपरीक्षाप्रकरणम् । ४८१ ४७५
३२ ( गुणविभागपरीक्षयां ) प्रत्यक्षे सावकल्पकारीक्षाप्रकरणम्। ४८५ ४८८
३३ ( गुणविभागपरीक्षयां ) अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् । ४८९ ४९५
३४ ( गुणविभागपरीक्षयां ) व्याप्तिपरीक्षाप्रकरणम् । ४९६ ५१३
३५ ( गुणविभागपरीक्षयां ) तर्कपरीक्षाप्रकरणम्। ४९४ ५२२
३६ ( गुणविभागपरीक्षयां ) परामर्शपरीक्षाप्रकरणम् । ५२३ ५२५
३७ ( गुणविभागपरीक्षयां ) शब्दभङ्गप्रकरणम् । ५२६ ५३०
३८ ( गुणविभागपरीक्षयां ) उपमानभङ्गप्रकरणम् । ५३१ ५३८
३९ ( गुणविभागपरीक्षयां ) अर्थापत्तिभङ्गप्रकरणम् । ५३९ ५४२
४० ( गुणविभागपरीक्षयां ) संभवभङ्गप्रकरणम् । ५४२ ५४३
४१ ( गुणविभागपरीक्षयां ) ऐतित्यभङ्गप्रकरणम् । ५४३ ५४४
४२( गुणविभागपरीक्षयां ) अभावपरीक्षाप्रकरणम् । ५४४ ५७९
४३ ( गुणविभागपरीक्षयां )अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् । ५८० ५९७
४४ ( गुणविभागपरीक्षयां )न्यायपरीक्षाप्रकरणम् । ५९९ ६०५
४५( गुणविभागपरीक्षयां ) हेत्वाभासपरीक्षाप्रकरणम् । ६०६ ६२०
४६ ( गुणविभागपरीक्षयां ) रमृतिविद्यापरीक्षाप्रकरणम् । ६२० ६२८
४७ ( गुणविभागपरीक्षयां ) आर्षविद्यापरीक्षाप्रकरणम् । ६२८ ६३९
४८ ( गुणविभागपरीक्षयां )गुरुत्वपरीक्षाप्रकरणम् । ६३१ ३३९
४९ ( गुणविभागपरीक्षयां )द्रवन्धपरीक्षाप्रकरणम् । ६४० ६४३
५० ( गुणविभागपरीक्षयां ) स्नंद्रपरीक्ष्गारप्ररणम् । ६४४ ६४५
५१ ( गुणविभागपरीक्षयां ) संकरपरीप्रकाणम् । ६४६ ६५८
५२ ( गुणविभागपरीक्षयां ) धर्माधर्मपरीकाकरणम् । ६५९ ६६४
५३ ( गुणविभागपरीक्षयां ) शब्पीपरीक्षाप्रकरणम् । ६६५ ६७३
५४ ( गुणविभागपरीक्षयां ) गुणविभागनियमपरीक्षाप्रकरणम् । ६७३ ६७७
५५ कर्मविभागपरीक्षाप्रकरणम् । ६७८ ६७४
५६ सामान्यतद्विभागपरीक्षाप्रकरणम् । ६८५ ६९८
५७ विशेषपरीक्षाप्रकरणम्। ६९८ ७०३
५८ समवायपरीक्षाप्रकरणम् । ७०४ ७१३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''प्रकरणासूचीपत्रम् ।'''|right=३}}</noinclude>
{{gap}}{{gap}}पृष्ठात् पृष्ठान्तम्
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(२) वैधर्म्यपरिच्छेदे-
५९ व्यतिरेकिपरक्षिाप्रकरणम् । ७३२ {{gap}}७४५
६० व्यतिरेकिविशेषपरीक्षाप्रकरणम् । ७४६ {{gap}}७५२
६१ पदार्यलक्षणप्रकरणम् । ७५२{{gap}} ७५६
६२ द्रव्यलक्षणप्रकरणम् । ७५७{{gap}} ७५८
६३ गुणलक्षणप्रकरणम्। ७५९{{gap}} ७७७
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(३) साधर्म्यपरिच्छेदे-
६४ घड्पदार्थसाधर्म्याक्षेपप्रकरणम् । ७९४
६५ पदार्थसाधर्म्यसमाधानप्रकरणम् । ८२१
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(४) प्रक्रियापरिच्छेदे-
६६ द्रव्यप्रक्रियायां द्ददणुकसिद्धिप्रकरणम् । ८२२ {{gap}} ८३९
६७ पाकजप्रक्रियाप्रकरणम् । ८३६
६८ द्वित्वादिसंख्योत्पत्तिप्रक्रियाप्रकरणम् । ८३७ {{gap}}८४२
६९ परिमाणप्रक्रियाप्रकरणम् । ८४२{{gap}} ८४७
७० द्विपृथक्त्वप्रक्रियाप्रकरणम् । ८४७ {{gap}}८४८
७१ संयोगप्रक्रियाप्रकरणम् । ८४८ {{gap}}८४९
७२ विभा प्रक्रियाप्रकरणम् । ८४९ {{gap}}८५७
७३ परत्वापरत्वप्रक्रियाप्रकरणम् । ८५८ {{gap}}८५९
७४ (प्रासङ्गिक) ज्ञातताप्रक्रियाप्रकरणम् । ८६०{{gap}} ८६१
७५ संस्कारप्रक्रियाप्रकरणम्। ८६२ {{gap}}८६३
७५ प्रकरणानि ।
{{rule|5em}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''॥ श्रीः॥'''|right=}}
{{rh|left=|center='''सटीकन्यायलीलावत्या विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}
{{rh|left=|center=(१) पदार्थोद्देशपरीक्षाप्रकरणे-|right=}}</noinclude>
विषयः। {{gap}}पृ० {{gap}} पं०
मूलकतुर्मङ्गलम् । १ {{gap}} १
टीकाकृतां समङ्गलाचरणं मूलस्थमङ्गलाचरणव्याख्यानम्। " ३
पुरुषोत्तमपदे समासविवेचनम् । (टी.) २ ५
प्रेक्षावत्प्रवृत्यङ्गाभिधायक श्लोकः । ५१
उक्तश्लोकस्य ग्रन्थकर्तृस्त्रीप्रन्थोमयपक्षेण व्याख्यानम् । टी०,, ६
षडेव पदार्था इति पदार्थ नियमाक्षेपपरमूले एवकारार्थ
विवेचनम् । टी० ७ १०
अस्माच्छदादयमर्थों बोद्धव्य इतीश्वरज्ञानस्यापीच्छाव
त्सङ्केतत्वाभिधानम् । (टी.) ९ १
अवधारणफलकपदार्थविभागाक्षेपः । १० १
व्यवच्छेदमात्रे एवकारस्य शक्तिरिति रुव्मिश्राशयव
र्णनम् । टी. ११ १२
अभावस्य षट्पदार्थातिरिक्तत्वव्यवस्थापने युक्तिः । १६ ३
भावरूपतमसोऽतिरिक्तपदार्थस्याङ्गीकारे युक्तिः । १८१
क्षणिकस्यातिरिक्तपदार्थत्वस्थापनम् । २१ {{gap}} १
मीमांसकाभिमतशक्त्ते पदार्थान्तरस्वाभिप्रायेणाक्षेपः। " ३
भाट्वाभिमतज्ञाततायाः समवायवद्वैशिष्ट्यास्पसम्बन्धस्य च
पदार्थान्तरवस्थापने युक्तिः । २२{{gap}} ३
आधाराधेयभावस्प मेयान्तरत्वव्यवस्थापनम् । २६ १
सादृक्ष्यस्य पदार्थान्तरत्वे युक्त्यभिधानम् । २७ ३
उक्तपदार्थार्वभागाक्षेपसमाधानस्यारम्भः । २९ ४
अयोगान्ययोगव्यवच्छेदयोर्विभागार्थत्वम् । ३४{{gap}} १
तमसो भावान्तरस्वस्त्रण्डनम् । ३६ ३
क्षणावच्छेदकोपाधेरन्त्यशब्दत्वान्न क्षणिकस्य पदार्थान्तरत्वमिति एकदेशिमतेन निरासः। ३७ ३
अन्त्यशब्दाप्रतिसन्धानेऽपि क्षणव्यवहारादेकदेशिमतं न
युक्तमिति खण्डनम् । ३८ ४<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका।'''|right=५}}</noinclude>
विषयः।{{gap}}{{gap}}पृ०{{gap}} प०
सूर्यपरिस्पन्दस्य क्षणावच्छेदकोपाधित्वप्रदर्शकं मतान्तरम्। ३९ ३
विभागाभावादिरूपोपाधिचतुष्कान्यतमस्य क्षणोपाधिस्वमिति
मतान्तरप्रदर्शनम् । ३९ ४
तत्र किरणावलीकारसम्मतिः । ३९ ६
उक्तमतद्वयखण्डनम् । ४० १
सूर्यसंयोगविभागयोः क्षणोपाधित्वमिति मतान्तरवर्णनम्। ४१ २
तखण्डमम् । ४१ ३
सिद्धान्तिमतेन क्षणखण्डनम् । ४२ १
क्षणिकत्वपरिष्कारस्तऋविवृतौरु०मिश्रमतखण्डनम् । टी० ४३ १३
क्षणसाधकप्रत्यक्षानुमानयोः खण्डनम् । ४४ १
स्वमतेन क्षणव्यपदेशवाजतद्विषयोपाधिवर्णनम् ४५ ३
विजातीयमानस्य सावलौकिकक्षणव्यवहारहेतुत्वम् टी०४६ २५
सूर्यस्पन्दे क्षणव्यवहारस्यौपचारिकत्वकथनम् । टी० ४९ १४
क्षणक्षानस्य विशिष्टव्यवहारसमर्पकत्वम् । ५० १
विवृतौ परिष्कृतक्षणलक्षनम् । र्ट ० ५३ २१
शक्त्ते: पदर्थान्तरत्वनिरसः । ५४ १
शक्त्तिसाधकानुमानं तत्खण्डनं च । ५८ २
शक्त्तिबाधकानुमानवर्णनम् । ६२ १
विवृतौ मुरारिमिश्रमतानुसारिणो वल्लभस्य मण्यादिप्रयोगजन्यमहष्टं प्रतिबन्धकमिति
मतस्य खण्डनम् । टी० ६२ १३
दाहं प्रति प्रतिबन्धकामावस्य कारणत्वे पूर्वपक्षस्तरसमाघानं च। ६४ ३
ज्ञाततायाः पदार्थान्तरस्वनिरासः। ६५ १
वैशिष्टयस्यातिरिक्त्तपदार्थान्तरत्वस्त्रण्डनम् । ६७ १
वैशिष्टयस्य ज्ञानरूपस्वव्यवस्थापनम् । ७१ १
वैशिष्ट्यस्यातिरिक्तत्वे घ्वंसनाशापतिरिति मिश्रमतस्वण्डनम् । वि. ७२ २०
नब्बाभिमतस्थामावाधिकरणताप्रयोजनस्य निरासाः वि० ७३ २२
गुरुत्वप्रतिबन्धकत्वादिरूपत्वेनैव निर्वाह नाधारत्वस्य पदार्थान्तरत्बमिति
व्यवस्थापनम् । ७३ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=६ |center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>विषयः। {{gap}}{{gap}}पृ०{{gap}} प ०
सादृश्यस्य सामान्येऽन्तर्भावानातिरिक्तपदार्थान्तरस्यामिति वल्लभमतम् । ७६ १
स्वत्वस्य पदार्थान्तरमाक्षेपः। (कं.) ७२ ७
स्वस्वस्य पदार्थान्तरत्वसाधकानुमानम् । कं० ७२ १७
उक्त्तक्षेपसमाधानम् । कं० ८१ ८४
स्वत्त्वसाधकशब्दप्रमाणकथनम् । प्र०
मुरारिमिश्राघुक्तं परिष्कृतस्ववलक्षणम् । (वि०) ८५ ५
द्रव्यादिनिके मिथोण्यावर्तकधर्माभावात षडेव पदार्था इति
विभागस्य न्यूनत्वाक्षेपः। ८८ १
द्रव्यत्वजातामाक्षेपः। ७९ १
गुणत्वजातावाक्षेपः । ९३ ४
नवदम्यावच्छेदकद्रव्यत्वजातिसाधनम् । ९४ ४
द्रव्यत्वजातिसाधकानुमाने विभुत्वोपाधिस्त्रण्डनम्। टी०९५ १२
कर्मत्वासिद्धिनिराकरणम् । ९७ ३
अनुगतबुद्ध्वैष द्रव्यत्वजातिसिद्धिरिति मुरारिमिश्र
मतलण्डनम्। ९८ २२
द्रव्यत्वसाधकानुमाने विपक्षबाधककथनम् । ९९ ३
गुणत्वजातिसाधकानुमानवर्णनम् । १०० ४
द्रव्यत्वादिजातीनामुपदेशव्यंग्यत्वकथनम् । (प्र.) १०० ७
द्रव्यादित्रिके अर्थत्वजातिनिरासः। १०२ १
न्यूनस्वाक्षेपोपसंहारेणोद्देशप्रकरणसमाप्तिः। १०३ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(२) पृथिवीपरीक्षाप्रकरणे ----
नवैव द्रव्याणीतिविभागाक्षेपाभिप्रायेण पृथिवीवजातावा क्षेपः। १०७ १
अवैलक्षण्यात पृथिव्यां पाकजस्पर्शे आक्षेपः। १०९ ३
पृथिव्यामितरभेदलाधकपृथिवीत्वजातिसाधनमा ११३ ४
सुस्त्रसमवाधिकारणत्वेन संसार्यात्मनिष्ठात्मस्वजातिस्वीकारा। (प्र०) ११५ ५
पृथिवीस्पर्शस्थ पाकजस्वार्थे वैलक्षण्यसाधनम् ११७
पृथिवीस्पर्शे पाकजत्वसाधकामनुमानम् । (टी.) ११८ ११
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(३) अवयविपरीक्षाप्रकरणे--
उपोध्दातसमत्या सङ्बातातिरिक्तावयविसाधनम् । १२० ३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका।'''|right=७}}</noinclude>
विषयः। {{gap}}{{gap}}पृ०.{{gap}} प०
अणुसमुवायेऽपरोक्षत्वाभावसाधकमनुमानम् । १२१ २
स्थूलशब्दार्थः। (प्र.) १२१ २
उक्त्तानुमाने विशिष्टोत्पादरूपोपाधिखण्डनम् । १२२ १
परआणुरस्यातीन्द्रियत्वे स्वरूपविशेषस्यानुपाधिस्वक थनम्। १२३ ४
अषयविनि विरुद्धधर्माध्याखाद्याशङ्कासमाधानानि। १२५ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(४) जलपरीक्षाप्रकरणे--
अपां शुक्लमेव रूपं लक्षणमिति भाष्याक्षेपः। १३१ २
नियामकामावादपा मधुर एव रस इति भाज्यस्थाक्षेपः।१३२ २
शीत एवापां स्पर्श इत्यस्याक्षेपः । १३४ ५
अपां स्वाभाविकद्रव्यत्ववत्वे आक्षेपः । १३५ ५
घृतेऽतिव्याप्स्या स्नेहवत्त्वरूपजललक्षणाक्षेपः। १३६ ६
जलत्वजातिसाधकानुमानखण्डनम् । (टी.) १३७ १२
शुक्लरूपादिरूपजललक्षणसाधनपूर्वकं जलत्वजातिस्थाप नम्। १३८ २
जले माधुर्यस्य स्वाभाविकत्वेऽनुभवप्रमाणकथनम् । १४४ १
जल माधुर्यस्य वैलक्षण्यसाधनम् । १४४ ३
घृतस्नेहे पार्थिवत्वसाधकानुमानखण्डनम् । १४७ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(५) तेजःपरक्षिाप्रकरणे--
तेजस्व जात्याक्षेपाभिप्रायेण भास्वरशुक्लमेव रूपं तेजल इत्यस्याक्षेपः। १४९ १
उष्ण एव तेजसः स्पर्श इत्यस्याक्षेपः। १५० ३
उकाक्षेपसमाधानपूर्वकं तेजस्वसाधनम्। १५१ १
सुवणस्य तैजसत्वसाधागुभानुभानदुषपूवकं सुषर्णस्य तेज-
सत्वं आक्षेपः। १५३ ३
उक्त्ताज्ञपसमाधानपूर्वकमनुच्छिन्नद्रवमांशस्य सुवर्णस्य तेजसत्वसाधनम् । १५४ १
पीतिमशुरुत्वाश्रये पार्थिवत्ववर्णनम् । (टी०) १५४ २३
सकृदुञ्चरितात्सुवर्णपदादुभयबोधः। १५४ १
सुवर्णपदं पार्थिवे शकं तेजसे लाक्षणिकमिति विवृतिकारमतम्। १५४ २५<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=७|center='''विषयानुक्रमणिका। '''|right=}}</noinclude>
विषयः। {{gap}}{{gap}}पृ०{{gap}} पं०.
अभौमगुरुत्वाक्षेपस्तरसमाधानं च। १५६ १
सुवर्णस्य तेजसत्वसाधकानुमाने उद्भावितदूषणोद्वारपूर्वकं
तत्साधकीनकृष्टानुमानद्वयम् । (क०) १५७ ९
अत्यन्ताग्निसंयोगानुच्छेधद्रवत्वासिद्ध्याक्षेपपूर्वकन्तैजसत्वसाधकानुमानाक्षेपाणां
प्रदर्शनम् । प्र० " २०
उक्ताक्षेपसमाधानपूवैर्कं सुवर्णे तैजसवसाधकनिकृष्टा
नुमानप्रदर्शनम् (प्र०) १६४ १
उदयनाचार्योकं प्रतिबन्धकविधया सुवर्णस्य तैजसत्वसाधकानुमानम् ।
नीरूपस्पर्शाअयवायुसद्भावाक्षेपः। " १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(६) वायुपरीक्षाप्रकरणे--
वायुसद्भावसाधकप्रत्यक्षादिमानखण्डनम् । (प्र०) १६७ ७
वायुसाधकस्पर्शादिचतुष्कलिङ्गस्यान्यथसिदत्वप्रदर्श नम्। १७० १
त्वगिन्द्रियप्रकृतित्वेनेतरवाधास्परिशेषानुमानतो वायुसिध्दिकथनम्। १७३ १
वायावुदूभूतस्पर्शसाधकानुमानप्रयोगः । १७४ २
न्यजनस्पर्शे वायवीयवसाधकानुमानम् । १७६ ३
वायौ स्पर्शादिचतुष्कवत्त्वसाधकानुमानानि । (प्र.) १७९ २१
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(७) इन्द्रियपरीक्षाप्रकणे ----
वायोः प्रत्यक्षत्वाभावे युक्तिः।(क) " ८
नवैव द्रव्याणीति विभागव्याघातार्थमिन्द्रियेवितरमेदसा
धकानुमानप्रदर्शनम्। १८२ १
घ्राणस्यापार्थिवत्वे युक्तिः। १८५ १
घ्राणस्य पार्थिवत्वसाधकानुमाने व्याभिचारप्रदर्शनम् । १८३ ३
चक्षुषस्तैजसत्याभावे युकिर। १८५ १
त्वचो वायवीयत्वे आक्षेपः " ४
रसनस्यानाप्यत्वसाधकानुमानम् । १८३ १
ओत्रस्य नमोभिन्नत्ववर्णनम् " १
इन्द्रियरवावच्छेदेनाभौतिकस्वसाधकानुमान सांस्यमातेन। १८७ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=९}}</noinclude>
विषयः।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
चक्षुरादिभिन्नतामसेन्द्रियसाधकानुमानम्। १८८ २
तामसेन्द्रियाभावे इन्द्रियनानात्वापलापकथनम्। १८९ १
इन्द्रियेवितरमेदसाधकानुभाने दोषप्रदर्शनपूर्वकन्तेषां भूतत्वसाधनम् । १९० १
इन्द्रियेषु द्रव्यत्वसाधनम् । (प्र.) १९१ १
घ्राणे पार्थिवत्वयुक्तिखण्डनम् । १९२ २
अतैजसत्वसाधकयुक्तिखण्डनपूर्वकं चक्षुषम्तैजसत्वसाध
कानुमानप्रदर्शनम् । १९३ २
उक्तानुमाने प्रदीपे दृष्टान्तासिद्धिवारणम् । (वि०) १९४ १९
रसनेन्द्रियस्याप्यत्वसाधनातिदेशः । १९५ १
श्रोत्रस्य परिशेषादाकाशत्वसाधनम् । ११५ २
तामसेन्द्रियनिराकरणम् । १९६ १
बौद्धमतेन गोलकस्येन्द्रियत्वसाधकपूर्वपक्षः । १९७ २
त्वचोऽपि देहव्याप्युभूतस्पर्शपवनरूपत्वमित्याक्षेपः। १९८ ४
नम्। १९८ ५
त्वचोऽपि प्रसिद्धपवनातिरिक्तपवनीयवसाधनम्। २०० ३
इन्द्रियसामान्यलक्षणम् । " १०
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(८) शरीरपरीक्षाप्रकरणे -----
द्रव्याणि नवैवेति विभागाक्षेपायानुमानेन शरीरस्य द्रव्या
न्तरत्वसाधकपूर्वपक्षः। २०२ ३
उक्ताक्षेपसमाधानाय शरीरे भूतचतुष्कप्रकृतिकत्वम्वण्डनम् । २०५ ५
चित्ररूपकार्यवैलक्षणसम्भवेऽपि भूतचतुष्कारब्धकार्यस्य
वैलक्षण्यानुपपत्तिः। २०७ ४
मानुषशरीरे पृथिवीसमवायिकारणकत्वसिद्धिः। (प्र०) २०८ १२
शरीरत्वजातिनिरासः । २०८ १३
मानुषयोनिजशरीराक्षेपस्तत्समाधानं च । २०८ २
नृसिंहशरीरे वाल्यादिभिश्नदेहवृत्तिजातिमादाय लक्षणसङ्गमनम् । (वि०) २०९ १५
जलीयशरीरसाधनम् । २१० १
आयशरीरस्य भूमण्डलस्थत्वे बाधककथनम्। २१२ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=१० |center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} प०
मानुषशरीस्य भूतान्तरप्रकृतित्वे बाधकवर्णनम् । २१३ १
अयोनिजशरीरसाधकमतान्तरप्रदर्शनम् ।
स्वर्गिशरीरे योनिजत्वनिरासः ।
भाष्योक्तभुजगादिशरशिक्षेपस्तरसमाधानं च । २१५ २
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ९ ) विषयपरीक्षाप्रकरणे--
विषये द्रव्यान्तरत्वसाधकानुमानप्रदर्शनम् । २१६ १
उक्तानुमाने व्यभिचारप्रदर्शनपूर्वकं विषयाणां नवद्रव्यब
हिर्भावाभावसाधनम् । २१६ ३
हरिकादीनां पृथिव्यादिभेदाक्षेपसमाधिः । २१८ २
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(१०) (सृष्ठि०) प्रलयपरीक्षामकरणे--
भाष्योक्तसंहारविघेराक्षेपः । २२० १
संहारसाधकानुमानेषु आश्रयासिद्ध्यादिदूषणोद्भावनम् । २२१ २
उक्तानुमानीयसन्तानशब्दार्थः । ( प्र० ) २२१ ६
निर्दुष्टानुमानद्वारा प्रलयसाधनम् । २२८ ३
अवान्तरप्रलये महाप्रलये च पूर्वपक्ष्यनुमानयोर्दूषणोद्भाव--
नपूर्वकं सिद्धान्त्यनुमानप्रदर्शनम् । ( प्र० )
तत्र मुरारिमिक्षमतविवरणम् | (वि०)
उपाधिलक्षणमुपाधिगवेषणाविचारश्च । (वि०) २२९
अनुमानान्तराभ्यां प्रलयसाधनम् । २३३ १
सत्प्रतिपक्षानुमानखण्डनम् । २३७ १
सम्प्रदायिकमतेन प्रलयसाधकानुमानम् । (प्र०) २३६ १९
साम्प्रदायिक मतेऽस्वरसप्रदर्शनम् । (वि०) २३६ २१
प्रमलयसाधकानुमानद्वयं, तदनन्तरं सर्गसिध्घर्थमनुमानं च । कं०२३८ ८
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ११ ) ईश्वरपरीक्षाप्रकरणे -
प्रमाणाभावादीश्वरो न द्रव्यान्तरमिति मतविशेषखण्डन-
पूर्वकमनुमानेन तत्साधनम् । २३९ १
उक्तानुमाने पक्षपक्षतावच्छेदकयोर्विचारः । (प्र०वि०) १५
सकर्तृकत्व रूप साध्य शब्दार्थविवेकः । २४१ १
अस्मदादिना सिद्धसाधनवारणायोपादानगोचरशब्दा.
{{gap}}र्घनिरूपणम् । ( प्र० ) २४१ १४<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left= ११|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>
विषयः । {{gap}}{{gap}} पृ० {{gap}}पं०
ज्ञानेच्छाकृतिषु प्रत्येकं साध्यताऽऽर्थस्तु समाज इति प्रका
शकारमतखण्डनम् ( वि० ) २४५ २३
शरीरान्तर्भावेण कर्तृत्वखण्डनम् । २४५ ७
ईश्वरानुमाने बाघदोषोद्भावनम् तत्खडनं च । २४५ १
ईश्वरानुमाने विरोधोद्भावननिरासः । २४६ २
ईश्वरानुमाने विशेषविरोधखण्डनम् । २४८ ५
ईश्वरानुमाने हेतुसाध्यव्याप्तिग्रहाक्षेपस्तत्समाधानं च । २४९ ५
ईश्वरसाधकानुमाने उपाधिनिरासः । २५३ ८
तत्र शरीरजन्यत्वे सकर्तृकत्वव्यापकत्वनिरासः । ( प्र० ) २५६ ३
दृश्याहश्यलाघारणव्याप्तिस्वीकारे दोषः । २५७ २
अदृष्टाधीनजगद्वैचित्र्यस्वीकारे दोषप्रदर्शनम् । "
ईश्वरानुमाने सत्प्रतिपक्षदोषोद्भावनं तन्निरासश्च । २५७ १
सकर्तृकत्वस्य शरीरेण सह व्याप्तौ दोषप्रदर्शनम् । २५९ ५
तर्काशुद्धिशब्दार्थविकल्पद्वारा तत्त्खण्डनम् । २६० ४
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( १२ ) परमाणुपरीक्षाप्रकरणे -
पुनर्विभागाक्षेपाभिप्रायेणाऽणोर्द्रष्यान्तरत्व पूर्वपक्षः । २६२ १
परिमाणतारतम्यानुमाने आश्रयालिद्धिकथनम् । २६३ १
उक्तानुमाने पक्षलाध्यहेतुपदार्थविचार: । २६३ ८
प्रकारान्तरेणोक्तानुमाने पक्षकथनम् । २६७ १
अणुद्रव्यसाधकानुमानान्तराणि तत्खण्डनं च । २६६ २
पूर्वपक्षिमतेन त्रसरेणोर्नित्यत्वलाधनम् । २६७ ३
परमाणुसाधकानुमानान्तरेषु दोषोद्भावनम् । ( टी० ) २६८ १९
अवयवो दृक्ष्य एवेतिव्याप्तिखण्डनाभिप्रायेण पूर्वपक्षखण्डनम् २६९ १
त्रसरेणोस्तन्महस्वस्य चानुमानेन नित्यत्वनिरासः । २६९ २
अनुमानेन परमाणुसाधनोपसंहारः । २७० २
परमाणुद्यणुकखण्डनप्रकार: । ( टि० ) २७१ १७
परमाणुसद्भावेऽपि तेषां पृथिव्याद्यनात्मकत्वेन
पुनर्विभागाक्षेपः । २७१ २
यद्यज्जातीय कार्यजनकं तवज्जातीयमिति व्यातिभङ्गदर्शनम् २७१ ३
पृथिवीस्वादेर्द्दश्यसन्तानव्यङ्गयस्वासिद्धिप्रदर्शनपूवकमुक्ता
क्षेपसमाधानम् । २७२ ३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=१२|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>{{center|( १३ ) आकाशपरीक्षामकरणे --}}
बिषयः ।{{gap}}{{gap}}पृ०{{gap}} पं०
आकाशसाधनाय शब्दे गुणत्वसाधकानुमानम् । २७४ १
शब्दद्रव्यत्ववादिशङ्का समाधानम् । २७५ १
शब्दे स्पर्शवद्विशेषगुणत्वासावासाधकानुमानम् । २७७ १
अत्र स्वरूपासिद्ध्यादिशङ्का तत्समाधानं च २७७ २
शब्दे दिक्कालात्ममनोगुणत्वनिरासानुमानम् । २७८ ४
आकाशगुणत्वसाधकपरिशेषानुमानम् । १७९ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(१४) कालपरीक्षाप्रकरणे--
कालसद्भावे प्रमाणाक्षपः । १७९ ३
परीपरादिषट्कलिङ्गखण्डनम् । २८० १
परत्वापरत्वयोरप्यसिद्धिरिति भूषणपूर्वपक्षः । २८३ १
विशिष्टबुद्धिघटक सम्बन्धघटक त्वेनानुमानद्वारा कालसा
धनम् । २८३ ७
तंत्र च स्वरूप सम्बन्धखण्डनम् । २७४ २
विशेषणतासम्बन्धेन सिद्धसाधनाशङ्कानिरास: । (प्र०) २८७ ७
आकाशहयोक्तसम्बन्धघटकत्वनिषेधः । २८९ ४
दिशोऽप्युक्त सम्बन्धघटकत्वाभावकथनम् । २९३ १
कालस्य नित्यसम्बन्धत्वेनैव निर्वाहे किमतिरिक्तकालकल्पनयेति
शङ्कासमाधिः (क०) २६४ ६
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( १५ ) दिग्परीक्षाप्रकरणे-
दिग्सिद्धौ प्रमाणसद्भावाक्षेपः । २९४ १
पूर्वापरादिदशप्रत्यय लिङ्गानां निरासः २९४ २
कालस्यैव सूर्योदयापाध्यवच्छेदक सम्बन्धघटकत्वन
निर्वाहे दिशोऽनावश्यकत्वमिति पूर्वपक्षोपसंहारः । २९५ ४
कालस्य क्रियामात्रोपनायकत्वात्संयोगोपनायकत्वेन दिशः
सिद्धिरित समाधानम् । २९६ १
क्रियामात्रोपनायकत्वशब्दार्थ । ( प्र ० ) २९६ ३
संयोगोपनायकत्वशब्दार्थः काले उभयोपनायकत्वखण्डनं
च । प्र० । २९६ ५
कालदिशोरुपाधिभेदकथनम् । २९७ १
दिगङ्गीकारेऽपि कालस्यावश्यकत्वप्रदर्शनम् । २९८ २<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center=विषयानुक्रमणिका ।|right=१३}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ० {{gap}} पं०
दिशीतरभेदसाधकानुमानकथनम् । २९९ १
संयोगोपनायकत्वे दिश एकत्वापत्तिनिराकरणम् । ३०१ १
आत्मादिवृत्तिपरममहत्परिमाण साधकानुमानम् । ३०२ १
दिगनेकत्वे मानान्तरशङ्का । ३०३ १
उक्तशङ्का निरासार्थमनुमानान्तरेण दिग्साधनम् । ३०६ ७
उक्तानुमाने व्यभिचारादिदोषनिरासः । ३०७ ३
पूर्वानुमानेन दिगनेकत्व साधनात्तत्रापरितोषप्रदर्शनम् (वि०) ३०७ १९
इहेदानीं घट इति प्रत्यक्षविषयतया दिशः
प्रत्यक्षत्वाक्षेपसमाधानम् । ३०९ १
हहेति प्रतीतिकारणतया दिशः साधनम् । ( प्र० ) ३०९ ११
प्रमाणान्तरेणान्यथासिद्धिनिरासपूर्वकं कालसाधनम् । ३१० ४
अनुमानोपनीतः काल प्रत्यक्षे भासत इत्यभिप्रायेण काल-
साधकानुमानप्रदर्शनम् ।
डक्त्तनुमाने सिद्ध साधना त्तदाकारान्तरकथनम् । ( प्र०) ३१४ १०
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( १६ ) जीवात्मपरीक्षाप्रकरणे -
सुखादिसमवायितयाऽऽत्मसिद्धिः । ३१४ १
भूतचैतन्यवादे देहप्रवाहो बुद्धिचैतन्यवादे वुद्धिप्रवाह
एवात्मेत्यभिप्रायेणाक्षेपः । ३१६ ४
बुद्धिचैतनिकं प्रत्युत्तरम् । ३१६५
प्रासङ्गिक क्षणभङ्गावतारणम् । ३१७ २
क्षणभङ्गे विप्रतिपत्तिप्रदर्शनम् | ( टी० )
क्षणभङ्गसाधकानुमान वर्णनम् । ३१८ १
प्रसङ्गविपर्ययाभ्यां दृष्टान्तप्रदर्शनद्वारा मिथो
विरुद्धधर्मसंसर्गित्वसाधनम् । ३१९ १
स्यैर्यपक्षे सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरोधरूपबाधककथनम ३२० १
विरोधोद्भावनद्वारा क्षणभङ्गखण्डनम् । ३२२ २
क्षणभङ्गे सत्त्वासत्वस्वरूपविरोधान्तरोद्भावनम् । ३२२ ६
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( १७ ) मनःपरीक्षाप्रकरणे-
अनुमानद्वारा द्रव्यत्वसिर्घ्घे मनस इन्द्रियरवेन साधनम् ३२३ ३
उक्तानुमाने स्वचो ज्ञानमात्रहेतुतया सिद्धसाधनवाणाय
प्रकारान्तरेणानुमानम्। ( टी० ) ३२४ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=१४|center= विषयानुक्रमणिका ।|right=}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
त्वचो ज्ञानसामान्यहेतुत्वसाधनम् । (वि० ) ३२४ २२
सुखस्य ज्ञानाद्भेदसाधनम् । ३२६ १
मनःसाधकानुमाने सन्दिग्धव्यभिचारखण्डनम् । ३२८ १
मनस्त्वजातौ प्रमाणाभावान्मनस इतरभेदसत्त्वाक्षेपः । ३२८ ३
घ्राणवन्मनसः पार्थिवत्वसाधनम् । ३२८ ६
मनसो मूर्तस्वनिरासः । ३३० ६
मूर्तत्वसाधकानुमाने दोषप्रदर्शनम् । ( प्र०) ३३१ १२
मनसो मूर्तचतुष्टयव्यावृत्तिपूर्वक मुक्ताक्षेपसाधानम् ।
मनसोऽमूर्ताकाशादिभेदसाधनम् । ३३३ २
भट्टमतेन मनसोऽणुत्वे आपत्तिप्रदर्शनम् । ३३३ २
विभुत्वपक्षे ज्ञानायौगपद्योपपादनम् । ३३४ १
मनसो विभुत्वे सुखादीनां नियतदेशत्वोपपत्तिः । ३३५ १
मनसो विभुत्वे युत्तयन्तरम् । ३३५ २
सुषुप्तिव्यासङ्गानुपपश्या मनसो विभुत्वासम्भवाभिप्रायेणोक्त्तक्षिपखण्डनम् । ३३६ १
प्रत्यक्षस्य सुषुप्तिसाधकत्वा सम्भवेन सुषुप्तिसाधकानुमानप्रदर्शनम् । ( टी० ) ३३६ ५
व्यासङ्गानुपपत्त्या मनःपञ्चकत्वतत्सङ्कोचविकाशिस्वयोर्निरासः । ( प्र ० ) ३३७ ३
बुभुत्साविशेषेण मनसो विभुत्वेऽपि व्यासङ्गसम्भवाद्दोषान्तरप्रदर्शनम् । ( वि० ) ३३९ २४
व्यालङ्गसुष्वापोपपादकदेशकालाधुपाधीनां खण्डनम् । ३४० १
अजसंयोगखण्डनम् । ३४१ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( १८ ) संख्या परीक्षाप्रकरणे--
एकादिव्यवहारहेतुत्वेन संख्याया इतरभेदसाधने आक्षेपः । ३४३ १
मनोनिरूपणान्ते संख्या निरूपणे सङ्गतिप्रदर्शनम् । ३४३ ६
संख्यायाः पदार्थान्तरत्ववादिनां मतस्य निरालः । (प्र०) ३४३ १३
गणनालाधारणकारणत्वेनापतिरभेद साधननिरासः । ३४५ २
संख्यात्वजातिसाधकानुमानेषु दोषोद्भावनम् । ३४७ १
द्वित्वादीनां जातिरूपत्वसाधनम् । ३४७ २
द्वित्वादीनां जातिरूपत्वनिरास पूर्वकमुक्ताक्षेपसमानम् । ३४८ ५<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=२५}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ० {{gap}}पं०
द्वित्वादीनां जातित्वनिराससाधकमनुमानप्रदर्शनम् । क०३४९ १
वल्लभोक्तानुमाने विशेष प्रदर्शनम् । ३४९ १२
अतिदेशेनैकत्व जातिनिरासपूर्वकं गुणत्वस्थापनम् । ३५१ १
सत्तायां गुणत्वनिरासः । ३५१ ३
संख्यात्वजातिसाधनम् । ३५२ १
एकत्वस्य स्वरूपाभेदरूपत्वनिरासः । ३५२ २
द्वित्वादिव्यवहानामेकत्व समुच्चयादिरूपत्वखण्डनम् । ३५३ ३
द्वित्वादिव्यवहारस्य अपेक्षा बुद्धिस्वभावनिबन्धनत्ववादि -
भासर्वज्ञभूषणकारमतयोर्निरासः । ३५६ १
निमित्तमेदाद्वित्वादेर्भेद इति प्रभाकरोपाध्यायमतम् । प्र ३५५ ११
तत्रास्वरसप्रदर्शनम् । ( वि० )
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( १९ ) परिमाणापरीक्षाप्रकरणे--
परिमाणसाधकमानव्यवहारानुपपत्त्याऽऽक्षेपः । ३५८ ४
महयवहारे एव परिमितव्यवहारत्वकथनम् । ३५६ १
अणुत्वसाधकानुमानायोः खण्डनम् । ३६० १
उक्ताक्षेपसमाधानपूर्वकमनुमानेन परिमाणस्य गुणत्वसाधनम् । : ३६० ९
साम्प्रदायिकमतेन तत्रानुमानान्तरम् । ( प्र० ) ३६१ १९
परिमितव्यवहारस्य गुरुत्वेनार्थान्तरत्वपरिहारः । ३६२ २
परिमाणस्य गुरुत्ववृत्तिगुणत्वव्याप्यजातिमत्वे बाधकम् ।
( प्र० ) ३६३ १७
महत्पीरमाणे आक्षिपः । ३६३ २
विकल्पानुपपत्योक्ताक्षेपसमाधानम् ।
महत्वसाधकानुमानप्रदर्शनम् । ३६५ ३
वल्लभमते दीर्घत्वस्य परिमाणत्वनिरासः । १६७ १
अन्योन्याभावेनैव निर्वाहे पृथक्त्वस्य गुणान्तरत्वे किं मा-
नमित्याक्षेपः । ३६८ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २० ) पृथकत्वपरीक्षाप्रकरणे --
ग्रवधिनिरूप्यत्वस्य पृथक्त्वाङ्गीकारे साधकत्वमित्यभिप्रायेणोक्ताक्षपसमाधिः ।
अवधित्वस्य पृथक्त्वनिरूपकरवेऽन्योन्याश्रयदोषस्तद्वारणं
च । ( प्र० ) ३७० १३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=१६|center= '''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
पृथक्त्वस्य द्वित्वावधित्वेनाभेदातिरिक्तत्व सिद्धिरिति मुरारिमिक्ष्रमतम् । ( वि० ) ३७० २२
पृथक्त्वस्य भावरूपत्वे प्रमाणकथनम् । ३७२ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २१ ) (प्रासं० ) द्विपृथ्वपरीक्षामकरणे-
द्विपृथक्त्वसस्त्रे प्रमाणाक्षेपः ।
प्रमाणसद्भावकथनद्वारा उक्ताक्षेपसमाधिः । ३७२ ५
द्विपृथक्त्वसाधकानुमानम् । ( प्र० ) ३७४ ४
द्विपरत्वप्रतिबन्दीनिरासः । ३७४ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २२ ) संयोगपरीक्षाप्रकरणे--
विभागाभावविषयतयाऽन्यथासिद्धत्वात्संयोगो न गुण
इत्याक्षेपः । ३७५ १
उक्तक्षिपसमाधिः । ३७५ २
विभागध्वंसस्य संयोगत्वनिरालः । ३७६ २
संयोगस्य भावरूपत्वे प्रमाणम् । ३७६ ३
संयोगव्याप्यवृत्तिवादिबौद्धमतखण्डनम् । ३७८ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(२३) ( प्रासं० ) संयोगाव्याप्यवृत्तित्वपरीक्षाप्रकरणे--
बौद्धमतेन संयोगस्याव्याप्यवृत्तित्वे आपत्तिः । ३८० २
उक्तापत्तिसमाधानम् । ३८१ २
संयोगस्याव्याप्यवृत्तित्वे पटस्य रक्तारक्तस्वभावता
स्याहित्याद्यभिप्रायेण पुनबौद्धाक्षेपः । ३८४ २
अवयवावच्छेदकोपाधिवशाघटे उभयस्वभावतेति
उक्ताक्षेपसमाधानम् । ३८४ ३
संयोगभावाभावयोः समानदेशकालत्वे
भावाभावव्यवहारविषयत्वानुपपत्तिरिति शङ्का । ३८५ ६
उक्तव्यवहारस्य निमित्तान्त र निबन्धानस्वारसंयोगस्यस्वभाववैचिद्त्र्येण
स्वाभावाविरुद्ध त्वमित्यभिप्रायणाशङ्कामाधिः । ३८६
समानदेशकालत्वे संयोगस्य भेदत्वापत्तिवारणम् । ३८७
देशादिभेदेनोपलम्भानुपलम्भयोर सम्भवात्तद्रूपाव्याष्यवृचित्वं
संयोगे न सम्भवति इति पूर्वपक्षः ३८८ १<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका । '''|right=१७}}</noinclude>
विषयः । {{gap}}{{gap}}पृ०{{gap}} पं०
अवच्छेदक भेदेनोपलंभानुपलंमयोरेकत्र सम्भवादित्यभिप्रायेण
समाधानम् । ३८९ ३
अवयववर्तिसंयोगाभावेनावयविनि संयोगस्य
सादृश्यव्यपदेशविषयत्वमेवाव्याप्यवृत्तित्वमित्युपसंहारव्याजेनाव्याप्यवृत्तित्वस्य
परिभाषान्तरप्रदर्शनम् । ३९२ १
उक्ताव्याप्यवृत्तित्व परिभाषया संयोगस्य
व्याप्यवृत्तित्वाद्देशान्तरीयशब्दाग्रहणापत्तिबारणम् । ३९२ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २४ ) विभागपरीक्षाप्रकरणे -
संयोगध्वंस एव विभाग इत्याक्षेपस्तत्समाधानं च । ३९४ ३
विभागलक्षणन्तत्र प्रमाणं च । ( क० ) ३९४ ७
विभागाङ्गीकारे हेतुकथनम् । ( क० ) ३९५ २
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २५ ) परत्वापरत्वपरीक्षाप्रकरणे--
संयुक्त संयोगालपीयस्त्वादिनैव निर्वाह कि परत्वापरत्वाभ्यामित्यभिप्रायेण
दिक्कृतपरत्वापरत्वयोराक्षेपः । ३९७ १
कालिकपरत्वापरत्वादिदृष्टान्तेन दिक्कृतयोस्साधकानुमानस्य खण्डनम् । ३९७ २
संयुक्त संयोगाल्पीयस्त्वादिनैव दिक्कृतपरत्वादिव्यवहारा
ङ्गीकारे भिन्नदिगवस्थितयोरपि स स्यादित्याशङ्का सिद्धान्तमतेन । ३९८ ३
आर्जवावस्थानस्याव्यपेक्षणान्नोक्तदोष इत्यभिप्रायेण पूर्वपक्षिसमाधानम् । ३९९ ३
परत्वापरत्वसाधककिरणावलीकारमतप्रदर्शनम् । ३९९ ४
किरणावलीकारमतखण्डनम् । ४०० २
स्वमतेन संयोगभूयस्त्वाल्पत्वनिराकरणपूर्वकं परत्वापरत्वयोर्गुणयोर्व्यवस्थापनम् । ४०१ १
संख्यया परापरव्यवहार इति शङ्का तत्समाधानं च । ४०१ ३
पराचीनापराचीनापेक्षा बुद्धिजन्ये परत्वापरत्वे इति मतस्य
निरासः । ४०३ १
पूर्वोत्पन्नत्वं परत्वं पश्चादुत्पन्नत्वमपरत्वमिति भासर्वज्ञमतस्य खण्डनम् । ४०६ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=१८ |center='''विषयानुक्रमणिका '''|right=}}</noinclude>
विषयः । पृ०{{gap}}{{gap}} पं०
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २६ ) संशयपरीक्षाप्रकरणे
विशेषाग्रहविशिष्ट समानधर्मदर्शनस्य संशयहेतुत्वव्यव
स्थापनम् । ४२४ १
संशयविरोधस्य वाकारार्थत्वम् । ४१६ १
संशयलक्षणकथनम् ।
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(२७) विपर्ययपरीक्षामकरणे -
सोदाहरणं विपर्यंलक्षणम् । ४१७ १
भ्रमस्थलेऽपि असंसर्गाग्रहस्येष्टभेदाग्रहस्य च प्रवृत्तिहेतुत्वेनैव
प्रवृत्ति सम्भवात्सर्वे ज्ञानं यथार्थमिति मन्वानानांं
गुरूणां मतनाक्षेपः । ४१७ २
सकलप्रत्ययानां यथार्थत्व साधकानुमानप्रप्रदर्शनम् । ४२१ १
सर्वव्यवहाराणामुपलंभाधीनत्वात् रजतसंसर्गाहेग्रहे च शुक्त्तौ
निवृत्तिव्यवहारः स्यादतोऽन्यथाख्यातिरवश्यं स्वीकार्येश्यभिप्रायेणोक्ताक्षेपसमाधानम् । ४२१ ३
प्रवृत्तिमात्रे भेदाग्रहो न कारणमिति गंगेशोपाध्यायमतस्य प्रदर्शनम् । ४२२ १३
व्यवहारमात्रस्योपलम्भाधीनत्व साधकमनुमानम् । ४२३ २
प्रत्यक्षप्रमावदनुमितिममाया अन्यथाख्यातित्वोपपादनम् ४२३ ३
भेदाग्रहस्य प्रवृत्तिजनकत्वे युगत्प्रवृत्तिनिवृत्याद्यापत्तिप्रदर्शनम् ( प्र० ) । ४२३ १९
असंसर्गाग्रहमात्रात्प्रवृत्तिस्वीकारे शब्दानुमानयोरप्रामाण्यापत्तिदानम् । ४२४ ३
लिङ्गादीनां संसर्गव्यवहारजनकत्वात्प्रामाण्यमित्याशङ्का तत्समाधानं च । ४२५ १
संसर्गग्रहस्य विसम्वादिप्रवृत्तिहेतुत्वे दोषप्रदर्शनम् । ४२७ १
असंसर्गाग्रहपक्षे शब्दानुमान साधकानुमानप्रदर्शनम् । ४२७ ४
उक्तानुमानखण्डनन्तदामास शब्दार्थविकल्पद्वारा । ४२७ ७
शब्दप्रामाण्यसिद्धौ तहाभासस्यान्यथाख्याति स्वभावसिद्धिप्रदर्शनम् । ४२९ १
भ्रमस्यास्यथा ख्यातिरूपत्वानङ्गीकारे आपत्तिः । ४२९ ३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका । '''|right=१९}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ० {{gap}}पं०
सन्निकर्षा भावाद्विशिष्टज्ञानरूपान्यथाख्यातिरनुपपन्नेत्याभिप्रायेणाशङ्का
तत्वमाधानं च । ४३१ १
दोषाणामयथार्थजनकत्वे दृष्टान्तप्रदर्शनम् । ४३२ २
प्रासङ्गिकं मीमांसकाभिमतशक्तिखण्डनम् । ४३२ ४
अन्यथाख्यातौ निष्कम्पप्रवृस्यनुपपत्तिरुपदोषान्तरप्रदर्शनम् । ४३३ २
ज्ञानस्य स्वाभाविक सम्वादिव्यवहारजनकत्वे लौकिकवाक्यानामप्रामाण्यानुपपत्तिदोषः । ४३४ १
पुरोवर्तिरजततादात्म्यख्य विषयत्वसम्वादन्यथाख्यात्यनुपपत्तिरित्याशङ्का । ४३४ २
इच्छाप्रयत्नजनकत्वाद्जनस्यैव तः त्र विषयतेति लमाधानम् । ४३५ ४
भ्रमस्थलेऽसतो रजतस्याप्रकाशत्व साधकानुमानस्य दृष्टान्ते साध्यविकलतया
पक्षताव्याघातेज व निरालः! । ४३७ १
प्रत्ययमात्रे यथार्थत्वलाधकहेतोरुपाधिदानेन दूयणम् । ४३९ ३
सर्वत्रारोपे सारूप्यग्रहः कारणांमति मतस्य खण्डनम् । ४४१ १
साद्दश्यानपेक्ष एब शार्वर नील तम इत्यादिभ्रम इति वर्णनम् । ४४२ १
तमसो भावत्वात्सारूव्यहेतुको भ्रम इति मलेन तमसो
भावत्वसाधकानुमानप्रदर्शनम् । ४४३ १
उक्तानुमाननिरासपूर्वकन्समसोऽभावत्वस्थापनम् । ४४२ २
तमसो भावत्वाभावे उदयनसम्मतिस्तस्य विधिमुखत्वाभिमाने प्रयोजककथनं च । ४४५ ३
नीलारोपात्तमः प्रत्यये दोषाणामालोकानपेक्षत्ये दृष्टान्तः । ४४७ १
थनम् । ४४७ ५
आरोपितं नीलं रूप तम इति कन्दलीकारमत निरासः । ४५० १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २८ ) अनध्यवसायपरीक्षाप्रकरणे ---
वैशेषिका भिमतानध्यवसायाख्याविद्याविषयस्याभावात्तदसत्वाक्षेपः । ४५१ १
अनध्यवसायविषयप्रदर्शन पूर्वक मुक्तक्षेपखण्डनम् । ४५२ ४<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=२०|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} प०
संशयस्यानध्यवसायहेतुत्वनिरासोऽविघात्वस्थापन चानध्यवसाये । ४५३ २
संशयानध्यवसाययोर्विशेषः । ( प्र० ) ४५४ १४
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २९) स्वप्नपरीक्षाप्रकरणे -
स्वप्नज्ञानस्य विद्यात्वात्कथमविद्या चातुर्विध्यमित्याक्षेपः । ४५४ १
जाग्रद्वत् स्वप्नज्ञानतद्विषययोर्बाधाभावान्न मिथ्यात्वमिति
वर्णनम् । ४५४ ३
सम्वाद भूयस्त्वाल्पीयस्त्वाभ्यां जाग्रत्स्वप्नज्ञानयोर्विशेषाशङ्कासमाधानम् । ४५५ ३
अर्थक्रियासम्बादविसंवादाभ्यामप्युक्तविशेषानुपपत्तिस्तयोरिति वर्णनम् । ४५६ २
बहिरिन्द्रियानवच्छिन्नमनोजन्यत्वतदजन्यत्वाभ्या द्वयोर्विशेष इत्यस्य सिद्धान्तमतस्य
खण्डनम् । ४५७ १
सजातीयाबस्थाप्रबन्ध सम्वादविसम्वादयोर्जागरस्वप्नभेदकत्वस्य खण्डनम् । ४५७ ६
भेदकाभावान्तयोर्न भेद इति पूर्वपक्षिमतोपसंहार । ४५८ ५
प्रमाणत्वेनाप्रमाणत्वेनोत स्वप्नजागरत्वाभ्यां द्वयोरविशेष
इति विकल्पनिरासपूर्वकमुक्ताक्षेपसमाधानम् । ४५८ ६
लक्षणं विनापि सुखदुःखवत अनुभवसिद्धत्वात्स्वप्नजाग्रद्वोधयोर्भेदव्यवहतिरिति
वर्णनम् । ४५९ ७
जल्पवितण्डाभ्यां बादिनिरासे सिद्धोपलुतान्तःकरणजप्रत्ययप्रवाह एवं
स्वप्न इति तल्लक्षणव्यवस्थापनम् । ४६० ३
स्वप्न प्रत्यवज्जाग्रत्प्रत्ययस्यापि निरालम्बनत्वाद्विद्याविद्याविभागानुपपत्तिरिति
पूर्वपक्षः । ४६१ १
विकल्पद्वारोक्त पूर्वपक्षसमाधानम् । ४६१ ३
ज्ञानस्य बाह्यालम्बनत्व मनङ्गीकुर्वतां योगाचारबौद्धानां
मतेन बाह्यविषयेष्वाक्षेपप्रदर्शनम् । ४६१ ८
ज्ञानाद्विषयभेदे प्रकाशमानत्वस्यासम्भव इति कथनम्। ४६२ १
अनीलव्यावृत्तिर्नोलतद्धियोः साहश्यामति नैयायिकाशङ्काया
विकल्पद्वारा खण्डनम् । ४२३ ८
संशयानध्यवसाययोर्विशेषः । निरासोऽविद्यात्वस्थापनं
चानव्यवसाये । ४५३ २<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका । '''|right=२१}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
विषयस्य प्रकाशेन सार्धे विषयविषयिभावसम्बन्धस्य खण्डनम् । ४६४ ३
असम्बद्धस्य सम्बद्धव्यवहारजनकत्वनिरासः । ४६४ ७
तन्निरूपणाधीननिरूपणत्वतह्मपदिक्ष्यमानत्वादिरूपविषयत्वपदार्थखण्डनम् । ४६४ ९
विषयित्वं ज्ञानस्वरूपं विषयत्वं च नीलादिरिति नैयायिकमतनिरासः । ४६५ ९
यस्प्रकाशते तद्विज्ञानमिति बौद्धानुमाने साध्याविशिष्टत्वशङ्का
तन्निरासश्च । ४५६" १४
ज्ञानस्य बाह्याभेदपक्षे प्रकाशस्य नीलगोचरत्वं किमिति
विकल्पद्वारा बौद्धमतखण्डनम् । ४६६ ७
प्रकाशविशेषरूपत्वं प्रकाशे नीलगोचरत्वमिति बौद्धाक्षेपस्य
विकल्पपूर्वकं समाधिः । ४६७ ४
नीलरूपासम्बन्धे तस्य प्रकाश इति व्यवहारः कथमिति
बौद्धाक्षेपखण्डनम् । ४६८ १
ज्ञानरूपं नीलविषयत्वं चेज्ज्ञानस्यापि नलिवत्सर्वसाधारण्यापत्तिरिति
साधारण्यशब्दार्थाविवेकपूर्वकं वर्णनम् । ४६८ ६
प्रकाशमानत्वहेतोर्व्याप्यत्वासिद्धत्वादिदोषापादनम् । ४६९ ३
सहोपलम्भनियमाज्ज्ञानविषययोरभेद इति आक्षेपस्य
खण्डनम् । ४७० ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३० ) योगिप्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणे -
अध्यक्षादिभेदेन विद्याविभागः ।
सर्वज्ञेश्वरयोग्यादिसिद्धावाक्षेपः । ४७१ १
सर्वज्ञसाधकस्य परमाणवः कस्यचित्प्रत्यक्षा इत्यनुमानस्य
प्रतिक्षेपः । ४७१ १
वेदनतारतम्यं क्वचिद्विश्रान्तमित्यनुमाने दूषणप्रदर्शनम्। ४७३ २
उक्ताक्षेपलमाधानार्थ परमाणुनां प्रत्यक्षत्वसाधनम् । ४७५ ३
परमाणवः कस्यचित्प्रत्यक्षा इत्यनुमाने रूपवत्वमहत्वादेरुपाधित्वखण्डनम । ४७६ १
परमाणुप्रत्यक्षनायां प्रत्यक्षलामग्भ्यधीनत्वस्योपाधित्वनिरालः । ४७८ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=२२|center='''विषयानुक्रणिका ।'''|right=}}</noinclude>
विषयः । {{gap}}{{gap}}पृ०{{gap}} पं०
परमाणुचाक्षुषत्वे रसे चाक्षुषत्वप्रसङ्गनिवारणम् । ४७९ १
करितुरगादावापादित सार्वज्न्यापत्तिनिरासः । ४७९ ४
योगी न सर्वज्ञः प्राणित्वादहमिवेत्यनुमानस्थ कीर्तिबौद्धो न
बौद्धमतज्ञः प्राणित्वादिति द्दष्टान्तपराहतत्ववर्णनम् । ४८० २
योगिसिद्ध्युपसंहारः । ४८० ६
लौकिकाध्यक्षविभागः । ४८१ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( २१ ) निर्विकल्पकपरीक्षाप्रकरणे -
निर्विकल्पकाध्यक्षलक्षणम् । ४८१ १
वाच्यवाचकतादात्म्यान्निर्विकल्प कसिद्धावाक्षेपः । ४८१ २
अयं पुरोवर्ती घटशब्द इत्यननुभवादुक्तांक्षेपसमाधानपूर्वकं
निर्विकल्पकसाधनम् । ४८२ ७
उपनीतः शब्दोऽध्यक्षे भासत इत्याचार्यबौद्धमतखण्डनम् । ४८३ १
शब्दसंसर्गस्य प्रत्यक्षगोचरत्वनिरासपूर्वकं तत्र शब्दस्मरणमात्रमिति कथनम् । ४५४ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३२ ) सविकल्पकपरीक्षाप्रकरणे -
सविकल्पकाध्यक्षलक्षणकथनम् । ४८५ ५
सविकल्पकस्याध्यक्षत्वे बौद्धविप्रतिपत्तिनिरासः ! ४८६ १
सविकल्पकस्याध्यक्षत्वेऽभिलापसंसर्गयोग्यताया बाधकत्वमिति तन्मतखण्डनम् । ४८६ ३
विरुद्ध धर्माध्यासात्प्रत्यभिज्ञानस्यैवास्यासिद्धिरिति सौगतोक्त्ते: खण्डनम् । ४८७ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३३ ) अनुमानपरीक्षाप्रकरणे-
अध्यक्षभिज्ञानुमानस्यासिद्धेर्नानुमानं विद्येत्याक्षेपश्चार्वाकाणाम् । ४८६ १
जातिव्यक्त्यन्तर्भावेण प्रतिबन्चासिद्धेरनुमानासिद्धौ
हेतुत्वकथनम् । ४८६ २
सहचरितधूमसम्वेदनादग्निस्मरणमात्रेण तत्र वन्ह्यार्थि
प्रवृत्तिरिति चार्वाक मतोपसंहारः । ४९१ १
चार्वा कोक्तार्थस्या प्रत्यक्षत्वात्सांशयिकत्वाभावाच्चानुमानं विना
सिद्ध्यसम्भवादनुमानसिद्धिरिति अभिप्रा येण पूर्वपक्षखण्डनम् । ४९१ ५<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=२३}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
वादिप्रतिवादिसाधनयोश्च प्रत्यक्षेण सम्वादानुपलब्ध्या
तत्वनिर्णयविजयव्यवस्थापकत्वादनुमानार्साद्धः । ४९२ १
व्यक्तिसहितजातिनिर्भासात्प्रतिबन्धवेदनसाधनम् । ४९२ ६
व्याप्तधूमादिग्रहणे चक्षुषः सामर्थ्यप्रदर्शनम् । ४९५ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(३४) व्याप्तिपरीक्षाप्रकरणे -
साधनस्य कार्त्स्न्येन साध्यसाहित्यरूपव्याप्तिपदायें
आक्षेपः । ४९६ १
सम्बन्धमात्ररूपव्याप्तिनिरास: । ( प्र० ) ४९७ ८
केवलान्वयिनि केवलान्वयसम्बन्धो व्यतिरेकिणि च
साध्यवदन्यावृत्तित्वं व्याप्तिरित्यक्ष्य खण्डनम् । (ग) ४९७ १२
साध्या सामानाधिकरण्यानधिकरणत्वसाध्यवैयधिकरण्यानधिकरणत्वादिरूपयाप्तिनिरासपूर्वकं
स्वमतेन सिद्धान्तव्याप्तिम्वरूपवर्णनम् । (प्र०) ४९८ ५
अनैकान्तिके सोपाधित्वोद्भावनापत्तिरूपस्यानौपाधिकसम्बन्धरूपव्याप्तौ
बल्लमाचार्यदत्तदोषस्य समालोचना ( प्र०) ४९९ ७
अन्वयिनि प्रतिबन्धासिद्धिप्रसङ्गापादनेन साध्याभावविरोधरूपव्याप्तिखण्डनम् । ५०० १
कार्त्स्न्येन सम्बन्धादिरूपव्याप्तिपदार्थखण्डनपूर्वकं
साधनसमानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिरण्यादिरूपसिद्धान्त
व्याप्तेः स्थापनम् । (क०) ५०१ ३
व्याप्तिज्ञापक प्रश्नपूर्वकमनुपाधित्वस्य तज्ज्ञापकत्व
कथनम् । ५०१ १
अनुपाधिशब्दस्य परिष्कृतोऽर्थः । (हो०) ५०१ २१
उपाधिलक्षणम् । ५०२ १
साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वरूपोपाधिलक्षणेऽव्यापयतिव्याप्तिनिराकरणम् ।
( प्र० ) ५०२ ८
उपाधेर्दूषकताविचारः । ( प्र०) ५०३ ११
उपाधेर्व्यभिचारोन्नायकत्वेनैव दूषकतेति सिद्धान्तः ( प्र . ) ५०५ ६
विषमव्याप्ततया पक्षेतरत्वस्योपाधित्वहानिशङ्का तत्समाधानं च । ( प्र०) ५०५ १५<noinclude></noinclude>
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विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ० {{gap}}पं०
पक्षधर्मसाधनावच्छिन्नसाध्य व्यापकोपाधिसाधारणोपाधिपदार्थ
खण्डनम् । ( प्र०) ५०६ १२
प्रवृत्तिनिमित्ताभावात् विषमव्याप्तस्योपाधित्वव्यवहारो
गौण इति वर्णनम् । (प्र०) ५०७ ४
गङ्गेशोपाध्यायमतेनोपाधिस्वरूपकथनम् । (प्र०) ५०७ ४
सत्प्रतिपक्षोत्थापकतयैवोपाघद्वेषकत्वमित्यभिप्रायेण सास्प्रदायिकमते
उपाधिस्वरूपकथनम्। ( प्र०) ५०९ ९
सामान्योपाधिलक्षणे दोषप्रदर्शनपूर्वकम् परिष्कृतनि
र्दुष्टोपाधिलक्षण प्रतिपादनम् । (क०) ५१० ५
सोदाहरणं निश्चितोभयादिरूपेण उपाधिविभागकथनम् ५११ १
अनिश्चितोभय रूपस्यानिरूपितरूपस्य
देशकालसाध्येतरवृत्तित्वमनुमानमात्रविच्छेदकत्वान्नोपाधिः । ५१२ २
सोदाहरणोपाध्युन्नायकवर्णनम् । ५१३ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३४ ) तर्क परीक्षाप्रकणे -
प्रसङ्गसङ्गत्या तर्कस्वरूपकथनम् । ५१४ १
एकधर्माभ्युपगमे द्वितीयस्य नियत प्राप्ति रूपतर्कलक्षणस्यासदर्थानुमितावतिव्याप्त्या
निष्कृष्टतल्लक्षणम् । (प्र०) ५१४ १२
विपक्षजिज्ञासानिवृत्यादिफलासम्भवात्किं तर्केणेत्यभिप्रायेणाक्षेपः । ५१५ १
अनुमानस्य करणत्वेन व्यापारतयापि तर्कापेक्षा न सम्मवतीति
पूर्वपक्षिमतम् । ५१७ ४
व्यभिचारशङ्काविरह सहकृतसहचारदर्शनस्य व्याप्तिग्राहकत्वात् शङ्कानिवृस्पर्थमनुमाने
तर्कापेक्षेत्याशयेनाक्षेपसमाधानम् । ५१८ २
असदर्थानुमितावतिव्याप्तिपरिहारपूर्वकम्त र्कस्थाविद्यात्वब्युत्पादनम् । ५१८ ३
तर्कमूलव्याप्तिज्ञाने सर्कापेक्षाऽस्ति नवेत्याद्याक्षेपसमा धिः । ( प्र० ) ५१८ ६
सकृद्वर्शनेनैव व्याप्ति इसम्भवे किं भूयोदर्शनेनेति शङ्का। ५२० १
व्याप्तिसंशयानुपपत्त्या भूयोदर्शनस्योपयोग इत्याशयेन
शङ्कासमाधानम् । ५२१ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center=विषयानुक्रमणिका|right=२५}}</noinclude>
बिषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३६ ) परामर्शपरीक्षाप्रकरणे--
व्याप्तिपक्षधर्मताज्ञानाभ्यामेवानुमितिनिष्पत्ति सम्भवे
किं तृतीयलिङ्गपरामर्शेनेति मीमांसकाशङ्का । ५२३ १
व्यभिचारशङ्काया अनुमितिप्रतिबन्धकत्वात्तन्निरासाय
तृतीयलिङ्गपरामर्शावश्यकतेत्याशयेन समाधानम्। ५२५ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३७ ) शब्दभङ्गमकरणे--
स्मारितार्थसंसर्गविज्ञप्तिपूर्वकाणि पदानीत्यनुमनिनैव
शब्दसाध्यपदार्थ संसर्गसिद्धि सम्भवाच्छद्वस्य न मानान्तरत्वमिति प्रतिपादनम् । ५२६ १
निराकाङ्क्षवाक्ये व्यभिचारनिरासः । ५२८ १
संसृष्टार्थपरत्वज्ञानस्य ज्ञाततात्पर्यस्यार्थप्रतीतिकारणत्वाङ्गीकारः । ५३० १
संसृष्टार्थपरत्वावधारणहेतुकथनम् । ५३० २
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३८ ) उपमानभङ्गप्रकरणे-
यो यत्रासति वृत्यन्तरे प्रयुज्यत इति व्याप्याऽनुमानेनैव पराभिमतस्य
गवयत्वेन प्रवृत्तिनिमित्तेन गवयपदवाच्योऽयमिति उपमानफलस्य सम्भवान्नोपमानं
प्रमाणान्तरमिति व्यवस्थापनम् । ५३२ १
अनुमान प्रयोगः । ५३२ ८
उक्तानुमानेऽसिद्धिनिरासः । ५३२ २
उपमानप्रतिक्षेपे वाचस्पतिमिश्र मतसम्वाद कथनम् । ५३३ २
अतिदेशवाक्यस्याप्तत्वेन सादृश्याप्रवृत्तिनिमित्तकत्वे निश्चिते गवयपदस्य
च सप्रवृत्तिनिमित्तकत्वे स्थिते लक्षणया गोसहरापदेन गवयत्वोपस्थितिरिति
शब्दादेव गवय शब्दवाच्यत्वज्ञान सम्भव किमुपमा
नेनेत्युदयनाचार्यमतप्रदर्शनम् । ५३३ ३
अन्वयानुपपत्तिरूपलक्षणाबीजासम्भवान्न लक्षणेत्याशयेन उदयनाचार्यमतखण्डनम् । ५३४ ८
तात्पर्यानुपपत्तिरूपलक्षणाबीजाभावादपि न लक्षणेति
कथनम् । ( प्र०) ५३७ १
तत्पिर्यानुपपर्लक्षणाबीजत्वखण्डनम् । ( प्र० ) ५३७ १८<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=२६ |center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=}}</noinclude>
विषयः । {{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} पं०
शाब्द ( शाबर ) उपमान स्थानुमानेऽन्तर्भाववर्णनम् । ५३७ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ३९ ) अर्थापत्तिभङ्गमकरणे --
मीमांसकाभिमतार्थापत्तिप्रमाणस्यानुमानेऽन्तर्भावः । ५३९ १
गृहासत्त्वं बहिःसत्त्वमन्तरेण विरुद्धमिति विरोधेऽर्थापत्तिरनुमाने तु न
तथेत्याशङ्का, तत्समाधानं च । ५४१ १
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}(४०) संभवभङ्गमकरणे-
प्रचुर साहचर्य सम्वेदनाद बाधित बुद्धिरूप सम्भवस्यानुमानेऽन्तर्भाववर्णनम् । ५४२ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ४१ ) ऐतिहाभङ्गप्रकरणे ---
सन्दिग्धाप्तोक्तत्वप्रवादपरम्परारूपस्यैतिह्यस्य शब्देऽन्तर्भावप्रतिपादनम् । ५४३ ३
{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}{{gap}}( ४२ ) अभावपरीक्षामकरणे ---
अनुपलम्मानपेक्षस्य नयनस्याभावाग्राहकत्वात् भट्ट
मतेनाभावस्य मानान्तरत्ववर्णनम् । ५४४ ३
एकत्रोभयनिषेधान्नयनस्य तत्राकरणत्वकथनम् । ५४६ १
शुक्त्तो रजतभ्रमानुरोधादनुपलम्भस्य कारणत्वं भट्टै
र्वाच्यम्, रजतत्वाभावानुपलम्भश्च शुक्तित्वानुपलम्भवद्दोषमहिम्नैवेति नाभावोपलब्धावनुपलब्धिः
कारणमतो न प्रमाणमित्याशयेन भट्टमतखण्डनम् । ५४७ १
अनुपलब्धेर्मानान्तरत्वानङ्गीकारेऽव्य भावभ्रमोपपत्तिः । (प्र०) ५४८ ३
अभावग्रहेऽपि भावग्रहवदिन्द्रियस्य सामर्थ्यादिद्रिपेणैव
तज्ञ्चानसम्भवान्नोपलब्धेः प्रमाणानान्तरत्वमित्युक्तिः । ५४६ १
नास्तीतिबुद्धेराश्रयस्वरूपभेद लम्बनत्वादभावः प्रमेयएव नेति प्राभाकराक्षेपः । ५५० २
उक्ताक्षेपपरिहारपूर्वकमभावस्य प्रमेयान्तरत्वव्यवस्था । ५५२ ६
अभावानङ्गीकारे कीदृक्ष्यभावः समवैतीति प्रश्नासङ्गत्यापि तरसाधनम् । ५५३ ४
उक्तप्रश्नस्यान्तरालकालालम्बनत्वे सत्कार्थवादापत्तिः । ५५५ १
सघटभूतलाम्यबुद्धेरभावव्यवहार हेतुत्वामित्याक्षेपस्तसमाधानञ्च । ५५७ ३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" />{{rh|left=|center='''विषयानुक्रमणिका ।'''|right=२७}}</noinclude>
विषयः ।{{gap}}{{gap}} पृ०{{gap}} प्ं०
स्वरूपभेदस्यापि व्यावर्तकधर्माधीनत्वादभावासीद्धे । ५५८ ३
व्यवहारवैलक्षण्यादण्यभावसिद्धावनुमानप्रयोगः । ५५९ १
सघटभूतलविलक्षण प्रमेयानङ्गीकारेऽनुपपत्तिः । ५५९ ३
घटे रूपसमवाय इत्यत्र स्वरूपमिव प्रागभावध्वंसयो
रन्योन्य ललर्गितानिषेधेपीत्यस्य समाधानम् । ५५९ ६
नञर्थविचारः । ५६१ २
भावविरोधित्वादेरन्योन्याभावेऽसवात्तस्य नअर्थत्वासम्भवाक्षेपः । ५६२ १
सत्तासम्बन्धबोधविधुरसत्ताविरहस्याभावप्रत्ययहेतुत्वात्तस्यैव
नञर्थत्वमित्याशयेनाक्षेपसमाधिः । ५६३ १
सामग्रीविरहस्यातीन्द्रियतयाऽभावत्वस्या प्रत्यक्षत्वं
स्यादित्यापत्तिस्तत्समाधानं च । ( प्र० ) ५३४ १०
आत्माश्रयदोषग्रस्तत्वादुक्त्ताभावस्य भावबुद्ध्यविषयत्वमभावत्वमिति
न्तरानुसरणम् । ५६४ १
उसयविधाभावस्वलङ्ग्राहकपद्यप्रदंर्शनम् । ५६४ २
अभावविभागप्रदर्शनम् । ५६७ २
प्रागभावलक्षणम् । ५६७ ३
ध्वंसलक्षणम् । ५६७ ५६७
उत्तरत्वघटितप्रागभावलक्षणे दोषाद्धोटनपूर्वकं तन्नि
ष्कृष्टलक्षणकशनम् । ( टी० ) ५६७ ९
प्रागेकाबाधिरभावो ध्वंस इति लक्षणे घटोन्मज्जनापत्तिः,
ध्वंसस्यापि प्रागभावविरोधित्वात्तद्वारणं च । ५६८ १
एवंसति भावाभावनिवृत्योभयात्मकत्वं प्रागभावस्य
स्यादित्यापत्तेर्वारणम् । ५६८ २
घटतदभावयोरिव तद्ध्वंसप्रागभावयोर्मिंथोविरहरूपत्वाभावेऽपि
परस्पराभावात्मकताव्यवहारनिबन्धनोक्तिः । ५७२ १
ध्वंसस्योत्पत्तिमत्वे प्रागभावस्य नाशित्वे च तयोर्नाशोत्पादौ
स्यातामित्यापत्तिस्तन्निरासश्च । ५७२ ५
अत्यन्ताभावलक्षणकथनम् । ५७३ १
गवात्मनाऽश्वाभावस्याप्यत्यन्ताभावत्वात्तल्लक्षणे
संसर्गप्रतियोगित्वं व्यर्थमित्याशङ्कासमाघानम् । ५७४ १
संयोगस्याव्याप्यवृत्तित्वात्तदभाव: पंचमः स्वीकार्य
इत्याशङ्का, तस्लमाधानं च । ५०५ १<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{center|{{larger|'''॥ श्रीः ॥'''}}}}
{{center|'''श्रीपरमेश्वरप्रणीता'''}}
{{center|{{larger|'''गोलदीपिका'''}}}}
{{rule|5em}}
{{center|<poem>विघ्नेशं वाग्देवी गुरून् दिनेशादिकान् ग्रहान् नत्वा ।
वक्ष्ये भगोलमस्मै क्षोणीमानादिकं च लघुमतये ॥ १ ॥
अधऊर्ध्वयाम्यसौम्यगमिह वृत्तं दक्षिणोत्तराख्यं स्यात् ।
अधऊर्ध्वाभ्यां घाटिकमक्षाग्रे याम्यसौम्ययोर्लग्नम् ॥ २ ॥
तस्याप्यधऊर्ध्वाभ्यां तद्वत् परमा<sup>१</sup>पमेऽपमं लग्नम् ।
घाटिकमध्ये तिर्यग्रशनावृत्तस्य वृत्तमपरं स्यात् ॥ ३ ॥
एतद् विषुवत्सज्ञं घाटिकमपि दक्षिणोत्तरं च तथा ।
अपमण्डलाख्यवृत्ते पूर्वाभिमुखो रविः सदा चरति ॥ ४ ॥
घाटिकमध्यगविषुवद्याम्योत्तरवृत्तयोर्मिथोयोगात् ।
स्वस्तिकयुग्मं यत् स्यात् तत्प्रोतो गोलमध्यगतदण्डः ॥
समवृत्तामपि भूमिं भंगोलदण्डस्य मध्यगां कुर्यात् ।
काष्ठेन वा मृदा वा प्राणिनिवासादि कल्पयेत् तस्याम् ॥
प्रवहमरुत्प्रक्षिप्तो<sup>२</sup> भगोल उर्वी प्रदक्षिणीकृत्य ।
अपराभिमुखं षष्टधा घटिकाभिर्भ्रमति भूयोऽपि ॥ ७ ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|१. 'मपमण्डलं ल' ग. पाठः. २. 'तं भगोलमु' क. पाठः.<br>}}
{{left|{{smaller|G. P. T. 1024, 500, 11-7-1916. B}}}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|२|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>भूपृष्ठादुपरि मरुद रवियोजनसंमितान्तरे प्रवहः ।
नियतगतिरपरगः स्याद् भूवायुरधश्च तस्य भिन्नगतिः ॥
घाटिकषष्टयंशस्य भ्रमणे कालोऽत्र नाडिकेत्युदिता ।
न तु दिवसषष्टिभागो गोलभ्रमणाद् यतोऽधिको दिवसः॥
घा<sup>१</sup>टिकमण्डलपार्श्वे घाटिकवृत्तानुसारि यद् वृत्तम् ।
सूर्यस्य भ्रमणस्थं स्वाहोरात्रार्धवृत्तमुदितं तत् ॥ १० ॥
तानि बहूनि भवन्ति च दिवसे दिवसे यतोऽर्कगतिभेदः ।
नक्षत्रगोल<sup>२</sup> एष हि बाह्येऽस्य च निश्चलः<sup>३</sup> खगोलः<sup>४</sup> स्यात् ॥
पूर्वापराधऊर्ध्वगमुदितं सममण्डलं खगोलस्थम् ।
याम्योत्तराधऊर्ध्वगम<sup>५</sup>पि तस्मिन् दक्षिणोत्तराख्यं स्यात् ॥
पूर्वापरयाभ्योदग्गतमिह भूपार्श्वसंस्थितं क्षितिजम् ।
तस्मिन्नुदयास्तमयौ सर्वेषां हि ग्रहाणां स्तः ॥ १३ ॥
याम्येऽधश्चोर्ध्वमुदक् क्षितिजादक्षांशकान्तरे लग्नम् ।
प्रागपरयोश्च<sup>६</sup> लग्नं विद्यादुन्मण्डलं खगोलस्थम् ॥ १४ ॥
उन्मण्डलयाम्योदकस्वस्तिकयातश्च गोलदण्डोऽयम् ।
उन्मण्डलोर्ध्वभागे भ्रमणं गोलस्य खाग्निनाडीभिः ॥
उन्मण्डलादधःस्थं सौम्ये याम्ये तदूर्ध्वगं क्षितिजम् ।
तस्मात् सौम्यगतेऽर्के दिनमधिकं याम्यगे निशाप्यधिका ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|{{gap}}१. 'घटिकाम' क. ख. पाठः. २. 'लमेतदू बा', ३., ४. 'लं' क. पाठ:. ५. 'मस्मिन्नपि द', ६. 'स्तु' ग. पाठ:.}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|३}}
{{center|<poem>कृत्वा वा प्रागपरं घाटिकमन्यच्च तद्वशात् कृत्वा ।
उन्मण्डलयाम्योदक्स्वस्तिकनिष्प्रोतदण्डकं कुर्यात् ॥
अचलानि भानि तेषामधः क्रमान्मन्दजीवकुजदिनपाः ।
भृगुबुधशशिनश्चैते प्राग्गतयो गोलवेगतोऽपरगाः ॥१८॥
योजनसंख्या तुल्या तेषां दिवसे गतौ कला भिन्नाः ।
कक्ष्या महत्युपरिगा यस्मालिप्ताः समाश्च सर्वासु ॥ १९ ॥
मन्दगतिरिन्दुरार्किः शीघ्रगतिस्तारकास्तु शीघ्रतराः ।
गच्छन्त्यपराभिमुखं सर्वेऽप्येवं वदन्ति किल केचित् ॥
एतन्न युक्तमिति हि ब्रुवन्ति गोले कृतश्रमा गणकाः ।
वक्रगविहगस्य यतः स्वपश्चिमाशागतर्क्षसंयोगः ॥ २१ ॥
मण्डलमर्कादीनां गोलाकारं स्मृतं गणकवर्यैः ।
तैजसमर्कस्य तु तच्चन्द्रस्याप्यं स्वतः प्रकाशोनम् ॥ २२ ॥
दर्पणवृत्ताकारं मण्डलमिच्छन्ति ये तु ते मुग्धाः ।
शौक्लयस्य क्रमवृद्धिर्घटते यस्माद् विधोर्न तत्पक्षे ॥ २३ ॥
सलिलमये शशिनि खेदीधितयो मूर्छितास्तमो नैशम् ।
क्षपयन्ति दर्पणगता मन्दिरगमिवेति चार्यजनवाक्यम् ॥
गोलाकारा पृथिवी खे तिष्ठति सर्वदा स्वशक्त्यैव ।
स्थलबहुलमूर्ध्वगार्धं जलबहुलमधोऽब्धयोऽत्र च द्वीपाः ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|१. 'ख्या तेषां दिवसे तुल्या ग' क. पाठः,}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|४|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>भूमिरनन्तेन धृतेत्येकेऽन्ये दिग्गजैरिति ब्रुवते ।
आधारस्य च कल्प्योऽत्राधारोऽतोऽनवस्थितिस्तेषाम् ॥
पूर्वाभिमुखं भ्रमति क्षोणी नास्ति भ्रमः खगक्षणाम् ।
इति किल वदन्ति केचिन्नाभिमतं तदपि चार्य भटबुधस्य ॥
अधउपरिपार्श्वभागेष्वस्या नियतं वसन्ति वसुधायाः ।
दितिसुतदेवनराद्याः प्राणिविशेषास्तथा सरिदगाद्याः ॥
भूमध्यगतं चक्रं सर्वेषां प्राणिनामधःस्थानम् ।
भूपृष्ठे सर्वत्र प्राणिजलादेः स्थितिस्ततो घटते ॥ २९ ॥
योजनसङ्ख्या गदिता भूवृत्तस्याङ्करन्ध्रयमलगुणाः ।
आर्यभटेन तथोक्तं योजनमात्रो भवेच्च मेरुरिति ॥
भूमेर्योजनमानं बहुकोटिमितं वदन्ति सुधियोऽन्ये ।
नैतद गणकाभिमतं यतोऽन्यथा मानसिद्धिरक्षवशात् ॥
समयाम्योदग्देशद्रयपलभागान्तरोद्धृता तु तयोः ।
विवरगभूमिश्चक्रांशताडिता स्याद् भुवः परिधिमानम् ॥
योजनमितपलसङ्ख्या भूपृष्ठे चेदनेकलक्षमिता ।
भूगोलान्तयोजनपलसङ्ख्या चेदनेककोटिमिता ॥ ३३॥
प्राणिनिवासो ह्यन्तः पातालेष्वपि च भवति मेदिन्याः ।
वाक्याविरोध एवं विचिन्त्य सुधिया सुधीभिरिह नेयः ॥</poem>}}
{{rule}}
* 'भट्टस्य ।' इति वृत्तानुगुणं 'भटकस्य' इति वा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/१९
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|५}}
{{center|<poem>अत्युन्नतिश्व मेरोर्न चिन्त्यते गोलविद्भिरिह गणकैः ।
यस्माद् ध्रुवस्य सौम्ये प्राग्गामिन्यो भवन्ति खे ताराः ॥
केचिद् वदन्ति भूमेरूर्ध्वं चाधः प्रविष्ट इति मेरुः ।
आर्यभटेनात्रोक्तं भूगोलात् तस्य मानमूर्ध्वगतम् ॥
लङ्कायामुपरि गतो गोलान्ते<sup>१</sup>ऽर्को ध्रुवः सदा क्षितिजे ।
मेरौ सोऽर्कः क्षितिजे ध्रुव उपरि यतोऽनयोः स्वभूमिरधः ॥
स्थलजलमध्य लङ्का भूकक्ष्याया भवेच्चतुर्भागे ।
उज्जयिनी लङ्कायाः पञ्चदशांशे समोत्तरतः ॥ ३८ ॥
स्वर्मेरू स्थलमध्ये नरको वडवामुखश्च जलमध्ये ।
एषा सार्धा त्वार्या भटेन गदितात्र लिख्यतेऽस्माभिः ॥
स्थलमध्यगमेरुस्था देवास्तदधोजलस्थगा दनुजाः ।
शशिमण्डलमध्यस्थाः पितरो मनुजाः कुगोलपार्श्वगताः ॥
उत्तरगोलगमकं पश्यन्त्यमराः सदान्यगं दितिजाः ।
मेषादिराशिषट्कं दिनममराणां निशा तदसुराणाम् ॥
प्रोक्तं दिनं पितॄणां कृष्णाष्टम्यर्धकालमारभ्य ।
शुक्लाष्टम्यर्धान्तं पश्यन्ति यतः सदैव ते दिनपम् ॥ ४२ ॥
लङ्कायनक्षदेशे त्रिंशद्धटिका दिनं तथैव निशा ।
अक्षाभावात् स्थलजलसन्धौ स्थानानि चाह भटः ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|१. ' तेऽर्काद् धु', २. 'ध्यालङ्का' क. पाठः,}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२०
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|६|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>उदयो यो लङ्कायां सोऽस्तमयः सवितुरेव सिद्धपुरे ।
मध्याह्नो यवकोट्या रोमकविषयेऽर्धरात्रमिति ॥ ४४ ॥
दिनरात्रिकालयोगे षष्टिर्घटिकाः स्युरक्षयुतदेशे ।
तत्रोदग्गोलेऽर्के दिनस्य वृद्धिर्निशाधिका याम्ये ॥ ४५ ॥
परमापमेन तुल्या यस्मिन् देशेऽवलम्बकज्या स्यात् ।
तत्र यमान्तगतेऽर्के नाडीषष्ट्या दिनं तदुक्तं च ॥ ४६ ॥
यत्र तोयनिधिमेखलातले नास्तमेति मिथुनान्तसंस्थितः।
तप्तहाटकनिभो दिवाकरस्तत्र भोऽ<sup>*</sup>क्षपरिमाणमुच्यताम्
इति तत्र पलज्या स्यात् परमापमकोटिसंमिता तस्मात् ।
पञ्चदश स्युश्चरदलघटिकाः षष्टिर्दिनेऽप्यतो घटिकाः ॥
तत्पूर्वापरदिवसास्तस्मान्म्यूनाः क्रमेण तदेशे ।
चापान्तेऽर्के तु निशा तद्वत् तत्पार्श्वगा निशाश्च तथा ॥
राशिद्वयापमसमा लम्बज्या यत्र तत्र चापमृगौ ।
यातो नोदयमस्तं कर्कियमौ यान्ति हरिजमन्येऽष्टौ ॥
वृषभानन्तरलग्नं सिंहः कोयूर्ध्वलग्नमपि कुम्भः ।
वीणैणकर्किधनुषां लग्नत्वं तत्र विद्यते नैव ॥ ५१ ॥
एकक्षपमतुल्या लम्बज्या चेन्न यान्ति वृषभाद्याः ।
चत्वारोऽस्तं वृश्चिकधनुरेणघटास्तथा न यान्त्युदयम् ॥
मीनो मेषः कन्या तुलाधरश्चेति तत्र लग्नानि ।
चत्वार्येवं क्रमशो नान्येषां हरिजसङ्गतिर्यस्मात् ॥ ५३ ॥</poem>}}
{{rule}}
* अक्षाकारस्य पूर्वरूपं चिन्त्यम् ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|७}}
{{center|<poem>मेषाद्याः पण्नास्तं मेरौ यान्त्युदयमपि च जूकायाः ।
दृश्यादृश्यविभागौ कल्प्यौ व्यत्यासतोऽसुरसुराणाम् ॥
द्वादशराशिषु भानोश्वारादिह मानुषं भवेद् वर्षम् ।
दिव्यं तदहोरात्रं दिव्याब्दः खरसवह्निभिः स्वदिनैः ॥
दिव्यैर्वर्षसहस्रैर्द्वादशभिः स्याच्चतुर्युगं त्वेकम् ।
दिव्यं युगमिति कथितं चतुर्युगं चैकमाचार्यैः ॥ ५६ ॥
अहिवेदा रसरामाः कृतदस्रा द्वीन्दवश्च शतनिहताः ।
दिव्याब्दाः सन्ति कृते त्रेतायां द्वापरे कलौ क्रमशः ॥
दिवसे चतुर्युगानां विधेः सहस्रं भवेत् तथा रात्रौ ।
सृष्टिः स्थितिश्च दिवसे लोकस्य विनाश एव चास्य निशि ॥
दिनमिदमुदितं कल्पश्चतुर्दश स्युर्दिने विधेर्मनवः ।
मन्वन्तरे युगानां सैका स्यात् सप्ततिः परं सन्ध्या ॥
कल्पस्यादावन्ते मनुविवरेष्वपि च पञ्चदश सन्ध्याः ।
षण्णां चतुर्युगानां पञ्चदशांशः स्मृतोऽत्र सन्ध्येति ॥
मनुविवरे सन्ध्यायाः पूर्वापरकालयोः क्रमात् संज्ञा ।
सन्ध्यांशेः सन्ध्येति च कालविभागः कृतो बुधैः कैश्चित् ॥
पञ्चाशत् स्वा अब्दा विधेर्गता आद्य एव शेषस्य ।
कल्पेऽस्मिन् मनवः षड् गताः परस्यापि भैर्मितयुगानि ॥
अष्टाविंशेऽपि युगे कृतादयोऽस्मिन् गतास्त्रयः पादाः ।
शेषोऽयं कलिपादः प्रवर्तते पूर्वसूरिवचनमिति ॥ ६३ ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|१. 'शस्तुल्येति' ख. ग. पाठः,}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|८|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>अतिदूरगं दिनेशं पश्यति कल्पे सदा कमलयोनिः ।
प्रलये खेरभावाद् ब्रह्मापि रविं निरीक्षते नैव ॥ ६४ ॥
एकेनैव हि रविणा दैवं पित्र्यं च मानुषं ब्राह्मम् ।
दिनमिति चतुर्विधं स्याद् गोलविदां तानि गोलगम्यानि ॥
सूर्योपरीन्दुरिति यैरुक्तं तेषां हि संस्थितिमैरौ ।
भानामूर्ध्वं मुनयः सर्वेषां च ध्रुवो यतस्तेषाम् ॥ ६६ ॥
तत्रोदग्विक्षिप्तः शश्युपरि च दृश्यते यमान्तेऽर्कात् ।
तस्मात् तथोक्तिरेषां तत्रान्यद्वास्ति दैवतं सौम्यम् ॥
परमादिनोक्तमेवं संक्षेपादीश्वरेण गोलस्य ।
संस्थानं लघुमतये वक्तव्यं चान्यदस्ति गोलगतम् ॥
युक्तिः प्रदर्शिता प्राङ् मया महाभास्करीयभाष्यस्य ।
सिद्धान्तदीपिकायां विवृतौ वक्ष्ये तथापि शक्ङ्कादेः ॥
घटिकापममण्डलयोर्योगस्थार्कस्य या महाच्छाया ।
दिनमध्ये साक्षज्या लम्बकजीवाथ तस्य शङ्कुः स्यात् ॥
याम्योत्तराख्यवृत्ते घटिकासममण्डलान्तरं ह्यक्षः ।
अवलम्बकस्तु तस्मिन् घटिकाक्षितिजाख्यवृत्तयोर्विवरम्॥
क्षितिजध्रुवयोर्विवरे जाता जीवाथवाक्षजीवा स्यात् ।
व्योम्नो मध्यध्रुवये विवरभवा ज्या तु लम्वकज्या स्यात् ॥
स्फुटदोर्ज्या सप्तनवध्येकैर्निहता त्रिराशिगुणविहृता ।
क्रान्तिः स्यात् तत्रिज्याकृतिविवरपदं भवेद् द्युदलजीवा ॥
अक्षज्यान्ना क्रान्तिर्लम्बकजीवोद्धृता क्षितिज्या स्यात् ।
भूज्या त्रिज्यानिघ्ना द्युदलज्याभाजिता चरज्या स्यात् ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२३
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|९}}
{{center|<poem>उन्मण्डलेऽर्कयोगाज्जीवा, याम्योत्तरापमज्या स्यात् ।
स्वाहोरात्रार्थज्या द्यज्यावृत्तस्य
योऽर्धविष्कम्भः ॥ ७५ ॥
क्षितिजोन्मण्डलविवरे घुमण्डलज्या स्मृता क्षितिज्येति ।
त्रिज्याकर्णस्य भुजा क्रान्तिः कोटिद्युमण्डलार्धज्या ॥
भ्रमणं द्यमण्डलानां घटिकावृत्तस्य चापि कालसमम् ।
घटिकावृत्तज्योक्ता भ्रमितांशे तस्य हीष्टकाले ज्या !
भूज्या भ्रमणे या ज्या घटिकावृत्ते भवेच्चरज्या सा ।
चापीकृता चरज्या प्राणात्मकमुच्यते चरार्धमिति ॥
यस्मात् प्राणादीनां लिप्तादीनां च संस्थितिर्वृत्ते ।
वापस्यैव ततः स्यात् प्राणादित्वं च लिप्तिकादित्वम् ॥
चापीकरणं युक्तं त्रिज्यावृत्ते द्यमण्डलेषु न तु ।
पठिताः सर्वा जीवास्त्रिज्यावृत्तोद्भवा भवन्ति यतः ॥ ८० ॥
परमापमो यदि स्यात् त्रिराशिदोर्जीवया तदा तु कियान् ।
भवतीष्टदोर्ण्ययेति त्रैराशिकमपमसिद्धये भवति ॥ ८१ ॥
यदि लम्बकाख्यकोट्या पलजीवा जायते तदा कियती ।
इष्टापमकोट्येति ज्ञेयं त्रैराशिकं क्षितिज्यायाम् ॥ ८२ ॥
भूज्या द्युमण्डले यदि भवति व्यासार्धमण्डले तु तदा।
कियती जीवा स्यादिति वेद्यं त्रैराशिकं चरज्यायाम् ॥
त्रिज्याहतापमज्या लम्बकजीवा भवेदिहाकया ।
सा क्षितिजभानुयोगात् क्षितिजे याम्योत्तरा हि ज्या ॥
क्रान्तिज्योन्मण्डलगा कोटिर्भुज्या भुजा द्युमण्डलजा ।
क्षितिजस्थार्काया स्यात् कर्णस्त्र्यनं भवेत् त्रिभिश्चैवम् ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२४
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|१०|गोलदीपिका ।}}
{{center|<poem>कोटिभुजाकर्णेषु द्वाभ्यां द्वाभ्यां हि सिद्धिरन्यस्य ।
वर्गैक्यपदं भृज्याकान्त्योस्तस्माद् भवेदिनामा वा ॥
त्रिज्यालम्बककोट्याः कर्णश्चेत् को भवेदपमकोट्याः ।
कर्णस्त्रैराशिकमिति सूर्याग्राया अवाप्तये वेद्यम् ॥ ८७ ॥
कृत्वाक्षव्यासार्धं द्युमण्डलं दण्डनाभिहरिजान्ते ।
तन्मध्यगपललम्बौ तथास्य परिधिस्थतच्छ्रुतिश्चोद्या ॥
गोलान्तात् खेटान्तं खेटस्य भुजा धनुर्भुजा तज्ज्या ।
अयनान्ताद् विहगान्तं कोटिधनुः कोटिरचिततज्जीवाः ॥
बाहुः कान्तिरभीष्टाभीष्टभुजज्या श्रुतिश्च कोटिस्तु ।
स्वाहोरात्रेऽभीष्टा जीवा त्र्येनं भवेदमीभिश्च ॥ ९० ॥
परमद्युज्या शशिकृतविधुरामास्तद्धता भुजज्येष्टा ।
त्रिज्या भ(क्तो?क्ते) स्वाहोरात्रे जीवा भवेदभीष्टाख्या ||
कोटिः परमद्युज्या त्रिज्यायाश्वेदभीष्टदोर्ज्यायाः ।
केतिद्युमण्डलेष्टज्याया स्त्रैराशिकं विचिन्त्यं स्यात् ॥ १२ ॥
इष्टापमदोर्जीवाकृत्योर्विवरस्य मूलमथवा स्यात् ।
स्वाहोरात्रेष्ठज्या राशीनां मानसिद्धये कथिताः ॥ ९३ ॥
स्वाहोरात्रेष्ठज्या त्रिज्याना स्वद्युशिञ्जिनीभक्ता ।
चापीकृतास्युरसवस्तद्दोर्भागोदये हि लङ्कायाम् ॥ ९४ ॥
इयती धुज्यावृत्ते ज्या चेद् व्यासार्धमण्डले कियती ।
इति घटिकावृत्ते ज्या स्याद् दोर्भागोदये हि लङ्कायाम् ॥</poem>}}
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{{smaller|१. 'त्र्यंशं भ' ख. ग. पाठः.}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|११}}
{{center|<poem>एकभमानेनोनं भद्वयमानं द्वितीयभमितिः स्यात् ॥
भद्वयमानेनोनं भत्रयमानं तृतीयराशिमितिः ॥ ९६ ॥
स्वचरदलेनैणादौ हीनाः कर्त्यादि (गे?के) युता एते ।
तत्तदोर्भागोदयकालप्राणा भवन्ति देशे स्वे ॥ ९७ ॥
एणाद्या उद्यन्ति क्षिप्रं कर्यादिकाः शनैरेव ।
उदगुन्नतं भगोलं यस्माच्चरसंस्कृतावियं युक्तिः ॥ ९८ ॥
शशिकृतविधुरामन्ना वेष्टभुजा स्वयुशिञ्जिनीभक्ता ।
चापीकृताः स्युरसवो लङ्कायामिष्टबाहुधनुरुदये ॥ ९९ ॥
त्रैराशिकयुगसिद्धा भमितिरिहाये हरस्त्रिराशिज्या ।
अन्यत्र सा गुणोऽतस्तद् द्वयहीनं च कर्मयुक्तमिदम् ॥
सत्ययने सायनयोरिष्टस्याद्यन्तयोः पृथङ्मानम् ।
कुर्यात् तयोस्तु विवरं स्यादिष्टमितिश्चरार्धमिह तद्वत् ॥
इष्टं द्विपदगतं चेत् तस्य तु तत्तत्पदस्य भागमितिम् ।
कुर्यात् पृथक् तदैक्यं स्यादिष्टमितिश्वरं स्वपदविहितम् ॥
अस्तोदयाख्यसूत्रं पूर्वापरगं भवेदिनाग्रान्तात् ।
क्षितिजात् स्वाहोरात्रे चरतोऽर्कस्योन्नतिर्हि शङ्कः स्यात् ॥
शङ्कोर्मूलास्तोदयसूत्रान्तरमुच्यतेऽत्र शङ्कग्रम् ।
स्वाहोरात्रेष्टज्या शङ्कुशिरोस्तोदयाख्यविवरगता ॥
कर्णोऽष्टद्युज्या शङ्कुः कोटिर्भुजा तु शङ्कग्रम् ।
एवमिहाक्षनिमित्तं क्षेत्रं प्रोक्तं बहूनि तानि स्युः ॥ १०५ ॥
बाह्राद्यैरेकस्मिन् क्षेत्रे जातैरिहानुपातेन ।
क्षेत्रान्तरसिद्धिः स्यात् सर्वेषामाश्रयोऽक्षमेव यतः ॥ १०६॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|१२|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>स्वाहोरात्रेष्टज्या घटिकावृत्तोत्थजीवया साध्या ।
गतगन्तव्यासुज्या घटिकावृत्तोद्भवा हि जीवा स्यात् ॥
जीवाग्रहणमयुक्तं क्षितिजादुन्मण्डलाद्धि युक्तं तत् ।
उन्मण्डलमेव स्याद् भगोलमध्यस्थितं यतो नान्यत् ॥
सौम्ये चरहीनानां गोले याम्ये चरार्धयुक्तानाम् ।
गतगन्तव्यासूनां जीवा ह्युन्मण्डलोर्ध्वगा भवति ॥ १०९ ॥
इष्टयुवृत्तवाह्ये घटिकावृत्ते प्रकल्पिते ज्ञेया ।
युक्तिश्चरसंस्कारे गते चरभूज्ययोः संरूपं वा ॥ ११० ॥
सोन्मण्डलोर्ध्वगा ज्या स्वाहोरात्राहता त्रिगुणभक्ता ।
उन्मण्डलोर्ध्वभागे स्वाहोरात्रेष्टजीवका भवति ॥ १११ ॥
इयती घटिकावृत्ते ज्या चेत् कियती तदा द्युमण्डलजा ।
त्रैराशिकमिति वेद्यं स्वाहोरात्रेष्ट जीवकानयने ॥ ११२ ॥
भूज्यारहिता याम्ये सौम्ये भूज्यान्विता च सा युज्या ।
क्षितिजोर्ध्वभागजाता स्वाहोरात्रेष्टजीवका भवति ॥
सा ज्या लम्बकनिहता त्रिज्याभक्ता भवेन्महाशङ्कुः ।
तत्रिज्याकृतिभेदान्मूलं छाया च तस्य शङ्कोः स्यात् ॥
यदि लम्बककोटिः स्यात् त्रिज्याकर्णेन का तदा कोटिः ।
इष्टधुजीवया स्याच्छङ्कौ त्रैराशिकं भवेदेवम् ॥ ११५ ॥
रविनिहता सा महती छाया भक्ता च शङ्कना महता ।
अर्काङ्गुलशङ्कोः स्याच्छाया त्रैराशिकादियं चाप्ता ॥ ११६ ॥</poem>}}
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१ 'स्व' ख. ग. पाठः.
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$ 'जीविका' इति स्यात् ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|१३}}
{{center|<poem>युज्यार्कघ्नात् क्षितिजाच्चलकर्णहृताथवा महाशङ्कुः ।
द्युज्या सा क्रान्तिमा सूर्याग्रहृताथवा महाशङ्कुः ॥ ११७॥
सौम्यायतकर्णवशाञ्चोर्ध्वायतकोटिसाधनमिहोक्तम्
तद्युक्तमेव यस्माज्जातं तद् द्वन्द्वमक्षतो भवति ॥ ११८ ॥
अक्षज्यान्नः शङ्कुर्लम्बकभजिते भवेच्च शङ्कग्रम् |
यस्मालम्बकशङ्कोः शकयं पलगु<sup>१</sup>णोऽत्र युक्तिरिति ॥
अथवा शङ्कग्रं स्यात् पलाङ्गुलघ्नोऽर्कभाजितः शङ्कुः ।
भूज्याघ्नो वा शङ्कुः क्रान्तिज्याभाजितश्च शङ्कग्रम् ॥
अक्षज्याल्पाक्रान्तिः सौम्या त्रिज्याहता पलज्याप्ता ।
सममण्डलस्थशङ्कुः पूर्वापरसूत्रगे रखौ भवति ॥१२१॥
सममण्डलगे भानौ शङ्कग्रमिनाप्रया समं हि भवेत् ।
स्यात् क्रान्तेश्चार्काया तस्माच्छङ्कथमिह भवेत् क्रान्तेः ॥
क्रान्तेः शङ्कथं स्यादनुपाताच्छङ्कुरपि च शङ्कयात् ।
त्रैराशिकयुग्मं स्यात् सममण्डलशङ्कुसिद्धयेऽत्रेति ॥
हर इह लम्बक आधे स तूपरिगुणोऽथ नष्टयोस्तु तयोः ।
त्रिज्या तु गुणोऽक्षज्या हारः कान्तेः फलं तु समशङ्कुः ॥
चारश्चन्द्रादीनां स्वे स्वे विक्षेपमण्डले कथितः ।
अपमण्डले तु तेषां चरन्ति पाता विलोमगास्ते स्युः ॥
अपमण्डले स्वपाते तस्य च केतमे विमण्डलं लग्नम् ।
परमक्षेपान्तरितं पादान्तं तस्य सौम्ययाम्यदिशोः ॥</poem>}}
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{{smaller|१. 'ग' क. पाठ:. २. 'कामे' ख. ग. पाठः,}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|१४|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>मन्दस्फुटात् स्वपाताः शोध्याः शीघ्रोच्चतस्तु बुधसितयोः।
पातो न भुजा परमक्षेपना त्रिज्ययोद्धृता क्षेपः ॥ १२७ ॥
स पुनर्व्यासार्थहतो मन्दस्फुटभाजितः स्फुटः कथितः ।
सोऽपि व्यासार्धहतो भौमादेः स्यात् स्वशत्रिकर्णहृतः ॥
वेदा द्वावष्टरसा दिश इति भागा दशाहतास्ते स्युः ।
भौमादेः पातांशा बहुतरकालेन भुक्तिरल्यैषाम् ॥
नवतिर्व्यामदिनेशाः षड्भिः खार्काः खनेत्रशिशिरकराः ।
परमा विक्षेपकला भूमिजबुधगुरुसितार्कतनयानाम् ॥
परमक्षेपो यदि चेत् त्रिराशिदोर्जीवया तदा तु कियान् ।
भवतीष्टदोज्ययेति क्षेपे त्रैराशिकं भवेदिष्टे ॥ १३१ ॥
कर्णे स्वल्पे वृद्धिस्तासां ह्रासो भवेत् तथा महती ।
दूरादूरविशेषैः क्षेत्रस्य हि लिप्तिकाभेदः ॥ १३२ ॥
शैघान्मन्दाच्चोच्चाद् भौमादेः स्यादधोगतिश्चोर्ध्वम् ।
कर्णद्वयेन तस्माद् ग्रहभूम्योरन्तरालमितिसिद्धिः ॥
भौमेज्यमन्दपाताः शोध्याः स्वात्स्वात्स्फुटादितिब्रुवताम् ।
शीघ्रज्यासंस्कारो ग्रहवत् पाते निजे भवेत् पक्षे ॥ १३४ ॥
कर्णस्थितिसिद्ध्यर्थं स्फुटसिद्ध्यर्थं च लिख्यतेऽत्रापि ।
कक्ष्यात्रयं झषान्ते प्राची दिग्भवति सर्ववृत्तेषु ॥ १३५॥
भूमध्यकेन्द्रमाद्यं भाख्यं वृत्तं तु भवति सर्वेषाम् ।
तन्मध्याच्छीघ्रदिशि स्वान्त्यफलान्ते कुजार्यमन्दानाम् ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|१५}}
{{center|<poem>शैघ्रस्य केन्द्रमुदितं बुधभृग्वोर्मन्ददिशि तु मान्दस्य ।
स्वान्त्यफलान्ते केन्द्रद्वितीयमध्यात् कुजादीनाम् ॥
मन्ददिशि मान्दकेन्द्रं द्वितीयपरिधिस्थभानुकेन्द्रमथ ।
शैत्रं ज्ञशुक्रयोः स्यादन्त्ये वृत्ते चरन्ति सर्वेऽपि ॥ १३८ ॥
अन्त्ये वृत्ते तेषां चारो मध्याख्यया सदा गत्या ।
खगचारजा भचक्रे या गतिरनुमीयते स्फुटाख्या सा ॥
अन्त्यं शैघ्रान्त्यफलं व्यासार्धं स्याज्ज्ञशुक्रयोर्वृत्तम् ।
त्रिगुणकृतान्यन्यानि क्षेपो वृत्तत्रयस्य युगपत् स्यात् ॥
अन्त्यपरिधिस्थखेटात् सूत्रं कुर्यादुपान्तकेन्द्रान्तम् ।
तत्कर्णो भौमादेमन्दो भवति ज्ञशुक्रयोः शैघ्रः ॥ १४१ ॥
श्रुतिमार्गगेष्टसूत्रं द्वितीयपरिधौ तु यत्र तत्र भवेत् ।
मन्दस्फुटः कुजादेस्तत्र तु शीघ्रस्फुटो ज्ञभृगुसून्वोः ॥
मन्दस्फुटात् कुजादेर्बुध भृग्वोः शीघ्रजात् स्फुटात् सूत्रम् ।
कुर्याद् भचक्र केन्द्रान्तमेतदुक्ता श्रुतिः कुजादीनाम् ॥
शैत्रान्ययोस्तु मान्दा(?)श्रुतिमार्गगसूत्र भाख्यपरिधियुतौ
शैघ्रस्फुट: कुजादेस्तत्र तु मन्दस्फुटो ज्ञभृगुसून्वोः ॥
यच्चानां स्फुटयुगलं भवति भपरिधौ गतः स्फुटो हि खगः
भेदस्तस्य कदाचित् साक्षात् स्फुटखेचराट् भवेदल्पः ॥
मन्दश्रुतिश्च शैघ्रं फलं कुजादेस्तु भेदहेतुः स्यात् ।
शीघ्रश्रुतिश्च मान्दं फलं विभेदे सितज्ञयोर्हेतुः ॥ १४६॥
जीवाफलार्ध संस्कृतमध्यान्मान्दं फलं ततः क्रियते ।
सर्वेषां बुधसितयोः क्रमभेदोऽप्यत्र कल्पितस्तस्मात् ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|१६|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>अन्त्यपरिधिस्थखेटादिहान्त्यकेन्द्रान्तमपि कृते सूत्रे ।
तत्सूत्राद्यपरिध्योयोंगे साक्षात् स्फुटग्रहो भवति ॥
मध्यान्तगते कर्णे क्षेपो मध्यान्तवृत्तयोरिष्टः ।
यदि चेत् त्रिज्याकर्णे कः स्यादिति मध्यपरिधिगः क्षेपः ॥
प्रथमद्वितीययोश्चेत् कर्णे मध्यान्तगे त्वयं क्षेपः ।
त्रिज्याकर्णे कः स्यादिति विक्षेपः स्फुटो भचक्रे स्यात् ॥
स्फुटयुगसिद्धस्य यथा दृग्भेदोऽल्पो ग्रहस्य भवति तथा।
कर्णद्वयसिद्धस्य क्षेपस्यापीति कस्यचिञ्चिन्ता ॥ १५१ ॥
अर्केन्द्रो वृत्ते भवृत्तकेन्द्रान्निजोच्चदिशि मान्दम् |
वृत्तं स्वान्त्यफलान्ते स्फुटकमैकं भवेद् यथा स्वोच्चम् ॥
विक्षेपापमधनुषोस्तुल्यदिशोर्भिन्नयोर्युतिर्वियुतिः ।
प्रोक्तं स्वक्रान्तिधनुस्तस्य ज्या स्वस्फुटापमज्या स्यात् ॥
याम्योत्तरवृत्तेऽपमयोगाद् राशित्रयान्तरे वेधौ ।
कार्यो सर्वक्षणां संपाताद् राशिकूटसंज्ञौ तौ ॥ १५४ ॥
गोलस्य दक्षिणोदकस्वस्तिकयुग्माद् यथा घटीवलयम् ।
चक्रतुरीयांशे स्याद् भकूटयुग्मात् तथापमाख्यं च ॥
याम्योदगायता स्यात् खेटस्थकला भकूटयुग्मान्ता ।
खेटस्थलिप्तिकायां क्षेपस्तस्यापमात् सदा याति ॥
क्षेपस्थोर्ध्वाधोगतिरुन्मण्डलतोऽस्त्यतो भकूटवशात् ।
क्षेपापक्रमधनुषोरतोऽत्र योगाययुक्तमिति केचित् ॥
लग्नेऽयनान्तगे स्यादुन्मण्डलगं भकूटयुगलमथ ।
गोलान्तेऽधश्चोर्ध्व कोटिवशात् स्यात् तदुन्नतिरतोऽत्र ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|१७}}
{{center|<poem>अयनान्तस्फुटखेचरविवरजलङ्कोदयासुगुणनिहता।
परमक्रान्तिस्त्रिज्याविहृता स्यादुन्नतिर्भकूटस्य ॥ १५९ ॥
सौम्योन्नतिरेणादौ विहगे याम्योन्नतिः कुलीरादौ ।
विहगस्योदय एवं व्यस्तं स्यादुन्नतिस्तदस्तमये ॥
लङ्कोदयकालसमं गोलभ्रमणं ततो भकूटस्य ।
गोलभ्रमजोन्नतिरपि लङ्कोदयकालजीवया साध्या ॥
खगकोटिर्वान्त्यापमनिहता स्थूलोन्नतिस्त्रिगुणभक्ता ।
स्थूलापि नाप्रदर्श्या लघुता यदि कर्मणो भवेत् तत्र ॥
विक्षेपना त्रिज्याभक्ता या चोन्नतिर्भकूटस्य ।
तत्क्षेपवर्गविवरात् पदं स्फुटक्षेप ईरितः क्रान्त्याम् ॥
तत्क्रान्त्योश्चापैक्यं तुल्यदिशोर्भिन्नयोर्धनुर्भेदः ।
अपमधनुः स्यात् स्पष्टं स्पष्टा भूज्यादयोऽपि तज्ज्यातः ॥
ऊर्ध्वाधोगमनात् स्यात् क्षेपस्योन्मण्डलादुदयभेदः ।
अपमादपि याम्योदकस्थित्या दृक्कर्मणि <sup>१</sup>ग्रहेतस्तत् ॥
विक्षेपेणाभिहता त्रिगुणेन हृतोन्नतिर्भकूटस्य ।
क्षेपस्योन्नतिरथवा तस्यैवोन्मण्डलादवनतिः स्यात् ॥
क्षेपो यदि राशीनां कूटोन्नतिभागगस्तदा तस्य ।
क्षेपस्योन्नतिरुदिता विपरीतदिगाश्रितस्य चावनतिः ॥
क्षेपोन्नतिर्भुजा स्यात् कर्णक्षेपोऽस्य भवति या कोटिः ।
सोन्मण्डलगः क्षेपः क्रियते क्रान्तेस्तु धनुषि यच्चापम् ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|'ग्रहे तन्तः' क. ग. पाठः.}}
{{center|{{smaller|D}}}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|१८|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>क्षेपोन्नतिस्त्रिजीवागुणिता दलोद्धृता च या तस्याः ।
चाप भलिप्तिकानं खेटगत सुभाजितं स्वर्णम् ॥
ऋणमुन्नताववनतौ धनमुदये तद्वदेव वास्तमये ।
उन्नतिरुदयभवा यदि सास्तभवा चेद् धनादि विपरीतम् ॥
खेटास्तर्क्षप्राणा हरस्य (चे) दस्तदृकूफलावाप्तौ ।
राशेः कालोऽस्तमये स्वसप्तमर्शोदयासुतुलित इति ॥
खावाहीन्दुकला यदि लभ्यन्ते स्वासुभिर्विलग्नस्य ।
स्युर्हक्फलासुभिः का भवति त्रैराशिकमितीह ॥ १७२ ॥
लङ्कोदयासुहरणं ये त्वत्रेच्छन्ति दृक्फलावाप्त्यै ।
सुधियस्ते गणकाः स्युः किन्त्विह गोलैकदेशवेत्तारः ॥
स्वास्तमये कालस्य स्वसप्तमर्शोदयासुतुल्यत्वम् ।
भानां भवति चरस्य व्यस्तत्वादुदयकालतोऽस्तमये ॥
विक्षेपसंस्कृता या क्रान्तिज्या केवला च यात्र तयोः ।
विवरं विक्षेपभवा क्रान्तिः स्यादक्षदृक् फलं तु ततः ॥
अपमो विक्षेपभवस्त्वक्षहतो लम्बकज्यया विहृतः ।
त्रिज्यानो धुंदलाप्तस्तस्य धनुःक्षेपकृतचरांशः स्यात् ॥
क्षेपचरं भकलाघ्नं<sup>१</sup> खेटस्थसुभाजितं शोध्यम् ।
उदये क्षेपे सौम्ये देयं याम्येऽन्यथा खगस्यास्ते ॥ १७७॥
दृक्कर्मद्वयमेतत् प्रोक्तं खेटोदयास्तलग्नाप्त्यै ।
न तु तत्स्फुटाङ्गमेतद् द्वितयं वैकेन कर्मणा सिध्येत् ॥</poem>}}
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{{smaller|१. 'र्घं' क. ग. पाठः.}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|१९}}
{{center|<poem>अपमस्यार्धं ह्युदितं सर्वत्राधं तथा सदास्तगतम् ।
उदितांशस्य तु मध्ये दृक्क्षेपाख्यं सदा स्थितं लग्नम् ॥
उदितांशस्य च मध्यं लग्नास्तविलमयोर्हि मध्ये स्यात् ।
दृक्क्षेपलग्नमुदितं प्राग्लग्नं भत्रयेण हीनमतः ॥ १८० ॥
याम्योत्तरवृत्तेऽपमभागो मध्याख्यलग्नमिति कथितम् ।
तद्धयर्को मध्याह्ने नतिलङ्कामितिवशाच्च साध्यं तत् ॥
दृक्क्षेपज्या चोक्ता खमध्यदृक्क्षेपलग्नविवरज्या ।
दृक्क्षेपलग्नगेऽर्के दृक्क्षेपज्या स्मृता महाच्छाया ॥ १८२ ॥
उदयविपरीतमस्ते राशेश्वर संस्कृतिर्यतस्तस्मात् ।
न स्यात् खमध्यगे सा लङ्कामितिरेव मध्यमानमतः ॥
मध्यविलग्नक्रान्त्याः परजीवायाश्च चापयोः समयोः ।
योगाद विदिशोर्विवराज्जाता जीवा च मध्यजीवोक्ता ॥
घाटिकखमध्यघटिका वृत्तविवरे पलापमौ हि स्तः ।
ताभ्यां द्युमण्डलनभोमध्यान्तरजीवका ततः साध्या ॥
त्रिज्यामध्यज्याकृतिविवरपदं मध्यशङ्कुरिति कथितः ।
मध्यविलग्नोनोदयलग्नभुजज्या तु मध्यशङ्कुभुजा ॥
मध्याख्यशङ्कुनिहतं व्यासार्धं मध्यशङ्कुभुजयाप्तम् ।
दृक्क्षेपशङ्कुरुक्तो दृक्क्षेपज्या स्फुटा च तच्छाया ॥
मध्यविलग्नक्षितिजान्तरज्यया मध्यशङ्करिह चेत् स्यात् ।
दृक्क्षेपहरिजविवरे त्रिजीवया कोऽत्र शङ्कुरिति युक्तिः ॥
दृक्क्षेपज्या तुलिता भानां कूटोन्नतिस्तदन्यदिशि ।
क्षितिजाचु गोलपादे खमध्यमपमाद्यतो भकूटमपि ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:Goladipika.pdf/३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|२०|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>क्षितिजस्थे विष्टखगे दृकक्षेपज्याहतस्त्रिगुणभक्तः ।
विक्षेपः क्षितिजात् स्यात् क्षेपस्य प्रोन्नतिस्त्ववनतिर्वा ॥
हेक्क्षेपेतरदिकस्थे विक्षेपे प्रोन्नतिर्भवेत् तस्य ।
<sup>१</sup>दृक्क्षेपज्यादिकस्थे विक्षेपे त्ववनतिर्भवेत् तस्य ॥१९१॥
क्षेपस्योन्नतिरथवावनतिस्त्रिज्याहतावलम्बहृता ।
त्रिज्यान्ना घुदलाता या तच्चापं हि दृकूफलप्राणाः ॥
खखधृतिनिहता लग्नप्राणाप्ता दृक्फलादिहोन्नतिजात् ।
लिप्ताः शोध्या उदये क्षेप्याश्चास्तेऽन्यथावनतिजाश्चेत् ॥
पलगुणमध्यविलग्नकान्त्योरक्ष<sup>२</sup>स्य या तु दिक् सैव ।
मध्यज्यादृकक्षेपज्ययोर्भवेत् सकलदृक् फलमिहोक्तम् ॥
समरेखायां मध्यमभानोरुन्मण्डलोदये हि बुधैः ।
उदिता विहगास्तस्मात् संस्कारास्तेषु देशजाद्याः स्युः ॥
समरेखानिज भूम्योरन्तरजैर्योजनेर्हता भुक्तिः ।
निजभूवृत्तहृता स्वं रेखायाः पश्चिमे वृणं प्राच्याम् ॥
समरेखायाः प्राच्यां प्रागुदयः पश्चिमे रवेः पश्चात् ।
देशगतिरतः प्राच्यां विशोध्यते दीयते तथा पश्चात् ॥
निजभूवृत्तभ्रमणे दिनभुक्तिर्यदि भवेत् तदा कियती ।
समरेखानिज भूम्योर्विवरभ्रमणेऽत्र युक्तिरिति चिन्त्या ॥
पूर्वाभिमुखं गच्छन् निजभूवृत्ते सदा नरो गच्छेत् ।
दर्शनमर्कस्य यतो निजभूवृत्तानुसारि दिक् चार्कात् ॥</poem>}}
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{{smaller|१. 'विक्षे' क. ग. पाठ. २. 'धिकस्य' ख. पाठः,}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|२१}}
{{center|<poem>पलयोः साम्यं च ययोः पूर्वापरसंज्ञितौ हि देशौ तौ ।
निजभूवृत्ते ह्येव च तत् साम्यं हारकोऽत इह तत् स्यात् ॥
त्रिज्यालम्बोन भूवृत्तं रन्ध्रगोश्विगुणतुलितम् ।
स्याच्चेदभीष्टलम्बे किं स्यान्निजभूमिवृत्तलब्धिरिति ॥
रविदोः फलं हि भानोः स्फुटमध्यमयोः कलात्मकं
विवरम्|
तन्निहता ग्रहभुक्तिश्चक्रकलाप्तं ग्रहे धनर्णं स्यात् ॥
रविदोः फलवत तस्मिन्नृणे यतो मध्यमोदयात् प्राक्
स्यात् ।
स्फुटतीक्ष्णांशोरुदयो धनेऽन्यथास्फुटरविर्व्रजेद्धयुदयम् ॥
गोलभ्रमणे स्याच्चेद् दिनभुक्तिः का भुजापलभ्रमणे ।
इति युक्तिं ब्रुवतेऽन्ये दो: फलकालो भवेदिहेच्छेति ॥
रविचरदलासुनिहता दिनासुभक्ता गतिस्त्वृणं सौम्ये ।
गोले भानोरुदये याम्ये देया खगेऽन्यथास्तमये ॥२०५॥
उन्मण्डलोदयात् प्राक् सौम्ये गोले यतो रवेरुदयः ।
पश्चाद् यांम्येऽस्तमयो व्यस्तं तस्मादृणादिविधिरेवम् ॥
यदि भवति दिवसभुक्तिर्दिनासुभिः का तदा चरार्धभवैः ।
प्राणैस्त्रैराशिकमिति खेटे च चरार्धसंस्कृतौ वेद्यम् ॥
हारोऽत्र चरदलादौ रविगतिलिप्ताधिका दिनप्राणाः ।
इत्यन्ये सार्कगतेर्भ्रमणाद् गोलस्य भवति दिवस इति ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|२२|गोलदीपिका ।|}}
{{center|{{gap}}<poem>अथ समच्छायया दिग्दलच्छायया च स्फुटार्का-
नयनमुच्यते । तत्र समच्छायायामुद्देशकः -
छाया रवौ नरसमा सममण्डलस्थे
{{gap}}हीना ततोऽपरदिने यदि तत्र कोऽर्कः ।
यद्वाधिकापरदिने यदि तत्र को वा
इति ॥
{{gap}}विद्वन् ! वद स्वरकृताङ्गमिता पलज्या ॥ २०९ ॥
{{gap}}अत्र करणसूत्रमार्याद्वयं -
छायासाध्यः शङ्कः शङ्कोः शङ्कप्रमिह हि तदिनाया।
अर्काप्रातः क्रान्तिः कान्तेर्दोर्ज्या च तद्धनुरिनः स्यात् ॥
यद्यधिकापरदिनजाच्छाया दोचापहीनमत्र भवेत् ।
चक्रस्यार्थ सायनभानुर्यस्मादिहायनं याम्यम् ॥ २१९ ॥
{{gap}}अर्थच्छायायामुद्देशकः -
शङ्कोरर्धमिता प्रभा दिनकरे याम्यां शलाकां गते
तत्राष्टांशमिताथवाथ दिनपे सौम्यां शलाकां गते ।
सप्तांशेन मिता च सापरदिने सर्वा महत्योऽथवा
! हीना ब्रूहि कवे! रवीनग (?) चतुष्षभिः पलज्या समा ॥
इति ॥
{{gap}}अत्र करणसूत्रमार्यापञ्चकं
दिवसदले महती याच्छाया सा प्रोच्यते नतज्येति ।
नतपलधनुषोर्विवरं क्रान्तिधनुर्याम्यगे रवौ मध्यात् ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|१. 'थ समच्छा' क. ग. पाठः}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh||गोलदीपिका ।|२३}}
{{center|<poem>सौम्येऽर्के नतपलयोरैक्यं क्रान्तिस्तदा तु गोलमुदक् ।
पूर्वत्र नते त्वधिके याम्यं गोलं पलेऽधिके सौम्यम् ॥
याम्ये खमध्यतोऽर्के छायावृद्धौ तु याम्यमयनं स्यात् ।
तान्यामुदगयनं व्यस्तं सौम्ये खमध्यतोऽर्के स्यात् ॥
कान्तेर्दोर्ज्या साध्या चापं तस्या रविर्भवेद् गोले ।
सौम्येऽयने च सौम्ये याम्ये त्वयने तदूनचक्रदलम् ॥
भानुः सषड्भचापं याम्ये गोलेऽयनं च यदि याम्यम् ।
................चापोनं सायनो रविर्भवति ॥ २१७ ॥
क्रान्तिनतचापयोः स्याद् विवरं समयोर्युतिस्तु भिन्नदिशो ।
पलधनुरन्तरमयनं छायागणिताप्तयोस्तु व्योः स्यात् ॥
एकस्मिन् स्थिरशङ्कच्छायायं कालयोर्ययोर्विन्दौ ।
पतति तयोर्मध्यस्थे कालेऽर्कः सायनोऽयनान्ते स्यात् ॥
इष्टाशास्थे भानौ छाया साध्या विशेषविधिनात्र ।
आशावृत्ते कल्प्या छाया सूत्रेण वृत्तमिह कार्यम् ॥ २२० ॥
समयोः शङ्कग्रार्काग्रयोर्युतिर्भिन्नयोस्तयोर्विवरम् ।
छायाकर्णक्षेत्रे दिग्बाहुर्भवति याम्यसौम्यशिराः ॥ २२१ ॥
सार्धर्क्षस्य हि जीवा दिग्जीवा कोणगे रवौ भवति ।
तद्दलजीवामध्ये सुरपाग्न्योरुह्यमेवमपरमपि ॥ २२२ ॥
दिग्ज्येष्ठा छायाघ्ना त्रिज्याप्ता साध्यबाहुरिति कथितः ।
दिग्बाहुसाध्यबाहू तुल्यौ चेदिष्टदिशि गतोऽर्कः स्यात् ॥
दिग्बाहुसाध्यबाह्वोः समयोर्विवराद् विदिक्कयोरैक्यात् ।
गुणनिहताद्धारातं छायायामृणमतः स्वमिष्टायाम् ॥ २२४ ॥</poem>}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|२४|गोलदीपिका ।|}}
{{center|<poem>दिग्बाहौ साध्याख्याद्याम्यगते स्वं विशोध्यमथ सौम्ये ।
व्यस्तं सौम्यनतौ स्याच्छायाद्वन्द्वे कृतं तथा कार्यम् ॥
महति पले सौम्यनते यद्यधिका दिग्गुणादिनाग्रा स्यात् ।
एकस्यामेव दिशिच्छाये द्वे स्तो यतो गतिर्वृत्ते ॥ २२६॥
दिग्बाहावल्पे स्वच्छायायां फलमिहाधिके शोध्यम् ।
प्रथमप्रभार्थमेवं कार्य व्यस्तं द्वितीयभावाप्त्यै ॥ २२७ ॥
नतदिश्युदये हारस्त्रिज्यासूर्याप्रयोर्भवेद् विवरम् ।
योगोऽन्यथा विशेषे त्रिज्या मध्याह्नभा<sup>१</sup>न्तरन्तु गुणः ॥
अत्रोक्तौ गुणहारौ दिग्भिर्भक्तौ शतेन वेष्टेन ।
तौ वा गुणहारौ स्तो न ह्यविशेषेऽल्पभेदतो दोषः ॥ २२९ ॥
छायातः शङ्कः स्याच्छङ्कग्रमतो भुजाद्वयं च तयोः ।
विवरात् प्रभा च भूयोऽप्येवं वाह्वोस्तु साम्यमिह यावत् ॥
अत्रोदाहरणं-
कोयन्तगेऽर्के दहनस्य दिस्थिते
वृषान्तगेने शिवदिस्थिते प्रभे |
के ब्रूहि शङ्कास्तुलितस्य भास्करै-
विद्वन् ! पलज्या नगवेदषमिता ॥ २३१ ॥
वह्नेराशां मेषमध्यस्थितेऽर्के
याते वीणामध्यगे चेन्द्रशम्भ्वोः ।
आशामध्यं नः पृथग् ब्रूहि विद्व-
ञ्छायां प्राग्वच्छङ्करक्षोऽपि चात्र ॥ २३२ ॥</poem>}}
{{rule}}
{{smaller|१. 'भन्तु' ख. पाठः.}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/२२
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/* अपरिष्कृतम् */ १४ विषय. पृष्ठ. विषय. सौश्रुत्तनारिकेल सप्तविंशोऽध्यायः । ... ७९६ विपकल्प बाजीकरणम् बाजीकरणके गुण --- विप विद्रावण घृत रसरत्नसमुच्चयस्थ - विष० । एकोनत्रिंशोऽध्याय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>१४
विषय.
पृष्ठ.
विषय.
सौश्रुत्तनारिकेल
सप्तविंशोऽध्यायः ।
... ७९६
विपकल्प
बाजीकरणम्
बाजीकरणके गुण
---
विप विद्रावण घृत
रसरत्नसमुच्चयस्थ - विष० ।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।
... ७९७ विपोत्पत्तिस्तद्भेदव
"
पृष्ठ.
८६०
... "
बाजीकरण शशांकरस
८६५
... ७९८
श्वित्रारि तेल
कामदेव रस
... ७९९
सूर्यप्रभा वत्तिं
...
[...]] "
...
८६६
मदन सुन्दर रस
पूर्णचन्द्र रस
... ८००
विषादि गुटिका जया गुटी
...
८६७
"
द्वितीया जया गुढी
...
८६८
... ८०१
... ८०२
कामधेनु रस
...८०९
मदन मुन्मद्रस
कुसुमायुध रस
सूतेन्द्र रस
मदनकामदेव रस
उमापति रस
महाकनकसुन्दर रस
अमृताशीव रस
मदन संजीवन रस
पुपधन्वा रस
... ८०३ विपके अन्यसामान्य
...८०५
... ८०७ विषमें पथ्यापथ्य आदि
... ८११
... ८१३
...
८१५
...८१७
...८१८
... ८२०
... ८२१
....
८२५
रस कल्प
त्रिंशोऽध्यायः ।
पारेका आरण
पारेको जारण करनेकी
दूसरी विधि
वज्र पार रस
... ८९४
... "
... ८९७
... ९००
तृतीया जया गुटी
विपकल्प
...
८६८
प्रयोग
विधाका वर्णन
विपपर पथ्य
पारद मस्य विधि
...
८७९
८८९
... ८९२
अष्टाविंशोऽध्यायः ।
पारेकी भस्मके सामान्य
प्रयोग
रसेन्द्र चूडामणि
पूर्णचन्द्र रस
महाकल्क (दिव्यागृत रस )
मदन मोदक
कामेश्वर मोदक
वाजीकरणमें सामान्य उपाय
... ८२६
लिंग लेप द्रावण
... ८२८
८३१
पथामृत रस
मृतसंजीवनी वटी
महानील तेल
लोह कहप
सप्तधातु शोधन भस्म
... "
मृत्यु हारीस
कान्तलोह रसायन
लोह रसायन बनानेकी क्रिया
...
८४३
दन्त्यादिगण ताम्र हृति
खण्डखाद्य रसायन
प्रत्येक धातु की भस्मके
.
पृथक् २ सामान्य प्रयोग
... ८३२
७३७
... ८३९
...
...
...
| पारेकी भस्मके अन्य
सामान्य प्रयोग
पारेकी भस्म सेवन करनेपर
पथ्य
पारा सेवन करनेपर अपथ्य
८४७ पारेके विकारोंकी शान्ति
८४९ ग्रन्थका उपसंहार
| विद्वान वैद्यका कर्तव्य
८५० प्रन्थकत्तीकी विज्ञप्ति
इति रसरत्नसमुच्चयस्थ विषयानुक्रमणिका समाप्ता ।
20033
... ९०२
... "
... ९०४
...
... "
९१२
... ९१९
... ९२०
... "
...
९२१
... ९२६
... ९२८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/२३
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/* अपरिष्कृतम् */ ॥ श्रीः ॥ श्रीवाग्भटाचार्यकृत- रसरत्नसमुच्चयः । भाषाटीकोपेतः । पूर्वखण्डस्य प्रथमोऽध्यायः । ग्रन्थकारकृत मङ्गलाचरण | यस्यानन्दभवेन मङ्गलकलासम्भावितेन स्फ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>॥ श्रीः ॥
श्रीवाग्भटाचार्यकृत-
रसरत्नसमुच्चयः ।
भाषाटीकोपेतः ।
पूर्वखण्डस्य प्रथमोऽध्यायः ।
ग्रन्थकारकृत मङ्गलाचरण |
यस्यानन्दभवेन मङ्गलकलासम्भावितेन स्फुर-
दाम्ना सिद्धरसामृतेन करुणावीक्षासुधासिन्धुना ।
भक्तानां प्रभवप्रसंहतिजरारागादिरोगाः क्षणा-
च्छति यांति जगत्प्रधानभिषजे तस्मै परस्मै नमः ॥
भाषाटीकाकारकृत मंगलाचरण ।
ध्यात्वा जिनेश्वरं देवं भवरोगनिषूदनम् ।
भाषाटीकान्वितं कुर्वे रसरत्नसमुच्चयम् ॥ १ ॥
सच्चिन्तोषचयं जितेन्द्रियचयं सँस्तौति लोकश्च यं
यो लोकेऽसहयोग योगलतयाऽरीणां मनोऽचालयत् ॥
योऽयं विश्वजनीनवृत्तिरनघोऽहिंसावते तत्परः
सोऽयंगान्धिरुदारधीर्विजयतांमान्यो महात्माकलौ२ ॥
शिव और पार्वतीके सम्भोगरूपी आनन्दसे उत्पन्न हुआ
मङ्गलमय ( कल्याणकारिणी ) कलाओंसे युक्त, जिसका तेज अत्यन्त
देदीप्यमान है, एवं सिद्ध रसेन्द्ररूपी अमृतसे परिपूर्ण, कृपादृष्टिरूप
३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/२४
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/* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । (२) सुधाके समुद्रके समान, समस्त जगतको प्रकाशित करनेवाला ऐसा जो शिवका तेज है, उसको यथाविधि सेवन करनेवाले भक्तजनों के जन्म, मृत्यु, जरा और राग द्वेष... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः ।
(२)
सुधाके समुद्रके समान, समस्त जगतको प्रकाशित करनेवाला ऐसा
जो शिवका तेज है, उसको यथाविधि सेवन करनेवाले भक्तजनों के
जन्म, मृत्यु, जरा और राग द्वेषादि समस्त भवरोग क्षणभर में नाशको
प्राप्त होते हैं ऐसे जगत् के प्रधान वैद्यस्वरूप पारदको नमस्कार है ॥१॥
अत्र गृहीतसाहायग्रन्थकृन्नामादि ।
आदिमश्चंद्रसेनश्च लंकेशश्च विशारदः ।
कपाली मत्तमाण्डव्यौ भांस्करः शूरसेनकः ॥ २ ॥
रत्नको पश्च: शंभुश्च सात्विको नरवाहनः ।
इन्द्रदो गोमुखश्चैव कलैम्बिर्व्याडिरेव च ॥ ३ ॥
नागार्जुनः सुरानन्दो नागबोधी यशोधनः ।
खण्डः कापालिको ब्रह्मा गोविन्दो लम्पको हरिः
सप्तविंशतिसंख्याका रससिद्धिप्रदायकाः ॥ ४ ॥
इस ग्रन्थमें ग्रन्थकारने जिन प्राचीन ग्रन्थकारोंसे सहायता ली है,
उनके नामादिका वर्णन इस प्रकार है, आदिम ( इस शब्दका कोई
'शङ्कर, कोई आद्य ग्रन्थकार और कोई इसी नामके आचार्यविशेष
ऐसा अर्थ करते हैं ), चन्द्रसेन, लङ्केश (रावण), विशारद, कपाली,
मत्त, साण्डव्य, भास्कर, शूरसेन, ग्नकोष, शम्भु सात्त्विक, नरवाहनः
इन्द्रद, गोमुख, कलम्चि, व्याडि, नागार्जुन, सुरानन्द, नागबोधी,
यशोधन, खण्ड, कापालिक, ब्रह्मा, गोविन्द, लम्पक और हरि ये
सत्ताईस आचार्य रससिद्धि प्रदान करनेवाले हैं ॥ २-४ ॥
रसांकुशो भैरवश्च नन्दी स्वच्छन्दभैरवः ॥ ५ ॥
मन्थान भैरवश्चैव काकचण्डीश्वरस्तथा ।
वासुदेव ऋषिःशृङ्गः क्रियातन्त्रसमुच्चयी ॥
६ ॥
१ मासुर इति । २ रत्नघोष इति । ३ काम्बलिः तथा कपिल इति ।
४ लम्बकः तथा लाम्पट इति । ५ ऋष्यश्रृंग इति सर्वत्र पाठभेदः ।<noinclude></noinclude>
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