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तैत्तिरीयोपनिषदत्/ब्रह्मानन्दवल्ली
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अवधूतोपनिषत् (सव्याख्या)
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Shubha
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४१
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । सेव्यमानं निइत्येतदम्लपित्त सुदारुणम् । (५१९) कासं क्षयं तथा शोषमशीसि ग्रहणीं तथा ॥ २१५ ॥ कामलां पाण्डुरोगं च कुष्ठान्येकादशैव च रक्तपित्तं सख... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४२
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५२० ) रसरत्नसमुच्चयः । संग्रहणी, कामला, पाण्डुरोग, ११ प्रकारके कुष्ठ, रक्तपित्त, खालित्य, शूल, उदररोग, वातरोग, प्रतिश्याय, विद्रधि, विषमज्वर आदि समस्त व्याधियोंको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४३
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५२१) तिक्तभूयिष्ठमाहारं पानं चापि प्रकल्पयेत् । अम्लपित्ते च वमनं पटोलारिष्टवारिभिः ॥ विरेचनं त्रिवृच्चूर्ण मधुधात्रीफलैर्भवेत् ॥ २२१ ॥ अम्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४४
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । समान भाग लेकर एकत्र खरल करले । फिर मुलैठी, दाख, गिलोय, जलकुम्भी, अडूसा और क्षीरविदारीकन्द इन औषधियों के रसमें उस चूर्णको क्रमसे एक २ दिन तक घ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४५
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । एकोनविंशोऽध्यायः । उदाररोग ( ५२३/ उदरं सजलं यस्य सदोषं वलिवर्जितम् । श्वयथुः पादयोः शोफः स्याज्जलोदरलक्षणम् ॥ १ ॥ उदरं वातसंपूर्ण सव्यथं च कृशां... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४६
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५२४ ) रसरत्नसमुच्चयः । विनोदविद्याधर रस | रसेंद्रबलिटंकणैः सजयपालबीजैः समैः । रसः समृदितो भवेत्खलु विनोद विद्याधरः ||४|| पयोगुडयुतो हरेत्सकलरेचनीयामयाञ् ज्वर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४७
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५२५) छल्के रहित । और शोधित जमालगोटे ८ तोले, सोंठ ३ तोले, शुद्ध गन्धक २ तोले, मिरच २ तोले, सुहागा १ तोला और शुद्ध पारा १ तोला लेकर सब औषधियोंको एकत्र चू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४८
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । आदौ सर्वोदराणां च देयमुक्त विरेचनम् । गोमूत्रैर्वाऽथ गोक्षीरे योज्यमेरण्डतैलकम् ॥ १४ ॥ कर्षमात्रं प्रयत्नेन शुद्धे देयो रसः पुनः ॥ १५... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५४९
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५२७) चाहिये कोठेके शुद्ध होजानेपर फिर इस रसको सेवन करावे ॥ ८-१५ ॥ त्रैलोक्यसुन्दर रस | शुद्धं सृतं तथा गंधं मृताभ्रं सैंधवं विषम् । कृष्णजीरं विडं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५५०
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । प्रकारसे घृतको सिद्ध करे । इस वृतको एक २ तोला परिमाण लेकर अनुपान रूपसे सेवन करे और स्निग्ध तथा उष्ण पदार्थों का आहार करे ॥ १६-२० ॥ महावरिस | च... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५५१
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५२९ ) नाभीके नीचे के भागमें आपरेशन करवाकर जल निकलवावे | इस प्रकार उपचार करनेसे अल्पकालमें ही जलोदर रोग दूर होजाता है। इस रसको सेवन करनेके पश्चात्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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सनत्कुमारतन्त्रम्
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Shubha
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<poem>{{header | title = सनत्कुमारतन्त्रम् | author = | translator = | section = | previous = | next = | year = | notes = }} #################################################### MUKTABODHA INDOLOGICAL RESEARCH INSTITUTE Use of this material (e-texts) is covered by Creative Commons license BY-NC 4.0 Catalog number: M00530 Uniform title: sanatk... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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Shubha
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५५२
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५३० ) रसरत्नसमुच्चयः । जंबीररस संयुक्तं दिन घर्मे निधापयेत् । ततः शुल्वे द्रवीभूते रसकर्ष नियोजयेत् ॥ ३१ ॥ तत्सिद्धमुदरे योज्यं शोफे चैव भगंदरे । नाम्मा तूदरम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५५३
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५३१) शुद्ध वत्सनाभ, सर्पाविष, लौंग, पीपल, कूड, ताडके फल, त्रिफला, समुद्रफेन, ढकपन्ना, लताकस्तूरी, कन्चाबेल, गिलोय, पाँचों नमक, जुही, चमेली. मोगरा, मौलसि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । समुद्र नमक, सैंधानमक. कचियानमक, जवाखार, कालानमक, सुहागा और सज्जी इन सबको समान भागलेकर बारीक चूर्ण कर लेवे। फिर उस चूर्णको आकके दूधमें और थूह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५३३) चूर्णको थूहर के दूधमें एक दिनतक खरल करके चार २ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको भैसके दूध के साथ सेवन करनेसे जलोदररोग अवश्य दूर होता ॥ ४२... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५३४ ) रसरत्नसमुच्चयः । रूपसे भक्षण करे और औषधिके जीर्ण होजानेपर तॠके साथ भातका भोजन करे । यह हंसमण्डूर अल्पकालमेंही पाण्डुरोग, हलीमक, ऊरुस्तम्भ, कामला और अर्श इन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । ( ५३५) काल विध्वंसनो नाम रसः पाण्ड्वामयापहः । अभयाऽथ गवां मूत्रैः पिट्वा चानुप्रदापयेत् ॥९६ ॥ शुद्ध पारा, सुवर्णभस्म, रौप्यभस्म और ताम्रस्म इन चा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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Bnarayanan V
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५३६) रसरत्नसमुच्चयः । इसमें दो बार दिनमें घोटकर रात्रिमें दो बार पुट देवे इसी प्रकार अन्य औषधियोंमें पुटदेवें । इसके अनन्तर उस रसमें १० दशभाग शुद्ध वत्सनाभ मिल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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