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Geeta g hegde
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५६४
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । युतः किंचिद्धृतक्षौद्रगुड तित्तिरिगुग्गुलैः । त्रिनेत्राख्यो रसो योज्यःशोषे तोयानुपानतः ॥ ८२॥ पारा, गन्धक, लोहा, अभ्रक, गिलोयका सव, वार... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५६५
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५४३ ) चार मासे परिमाण दूधके साथ या पानी के साथ नित्य सेवन करे तो एक महीने में पाण्डुरोग दूर होजाता है । ८३-८९ ॥ पाण्डुहारी हरीतकी | कोरंटो भृंगराजश्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५६६
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५४४ ) रसरत्नसमुच्चयः । पर्पटी ढालकर पीस लेवे । उसमें ७ पल गिलोय का शुष्क सत्त्व डाल- कर मधुके साथ खरल करके ३६० गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसें एक २ गोली एक २ हरडके भीतर र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५६७
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५४५) रेणुका २ तोले, नागकेसर १ तोला, तथा त्रिकुटा, पीपलामूल, शुद्ध वत्सनाभ, पारा और गन्धक ये प्रत्येक चार २ तोले लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कजली करलेव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५६८
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । णीदलम् । साधिताम्बुसकलं विनाशयेत् स्थौल्यपांडुगदशो फकापहम् ॥ इत्यधिक पाठोऽन्यत्र पुस्तके ॥ ) कामला प्रशुस । तीक्ष्णमाक्षिक कांता शुल्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418127
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५६९
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/* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः ! (५४७) गुंजामात्रं ददीतास्य साभयं गुडसंयुतम् । त्रियोन्याख्यो रसोष शोफपाण्डवपनोदनः ॥ १०१ ॥ ताँचेके कंटकवेधी पत्र ४ तोले ओर पारा १ तोला दोनोंको खर-... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७०
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/* अपरिष्कृतम् */ (५४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । पुरातनगुडेनैव तुलार्धेन विपाचयेव । मर्दयेत्कन्यकाद्वावैर्यामकांतं घृतेन च ॥ १०४ ॥ गुटिकां बदराभां तु कारयेद्भक्षयेन्निशि । शोफपांडु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७१
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५४९) वातपाण्डुहरः सिद्धो रसः सिंदूरभूषणः ॥ १०९ ॥ पिबेच्चानु ह्यपामार्गस्यैरंडस्य च मूलिकाम् । तत्रैः पिष्ट्वाऽथ कषैकं हंति पाण्डु सकामलम् ॥ १... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७२
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५५० ) रसरत्नसमुच्चयः । मुस्तादि चूर्ण | सुस्ताऽमृता चित्रकयष्टिपिप्पलीविडंग शुंठी त्रिफलैर्य- थोत्तरम् । चूर्ण सहायोरजसा च सयुतं समाक्षिकं पाण्डुगदापहं परम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७३
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५५१) समान भाग लेकर एकत्र खरल कर लेवे। फिर उस कज्जलीको बाँझकोडे कन्दमें छिद्र करके भरदेवे और उसको बन्द करके ऊपरसे कपरौटी कर कुक्कुटपुट में पकावे ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७४
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५५२ ) रसरत्नसमुच्चयः । अण्डीके बीज, कडवी तोंबीके बीज, कुटकी, वायविडङ्ग, नीमकी, निबौली, चकवडके बीज, बाबची और अंकोल के बीज, सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे उस चू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७५
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५५३) वातकुष्ठहर रस | विपचेधकमध्ये घनपिष्टीं शुल्बपिष्टों वा । संकोच्य गोलकोऽयं शमयति वातोत्थकुष्ठानि ॥७॥ पारा १ तोला और अभ्रकभस्म १ लीला दोनाको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७६
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५५४ ) रसरत्नसमुच्चयः । इन सब औषधियोंका समानभाग मिश्रित चूर्ण पर्पटी के बराबर भाग पारद भस्म पर्पटीसे तिगुना भाग और सुवर्ण भस्म ५० रेणु लेकर मिलादेवे और बकरीके मू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५७७
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (९५९) रसेन शृंगवेरस्य बद्धो बदरसंनिभः । छायाविशोषितः कुष्ठं निहन्यात्सन्निपातजम् १४॥ लोहभस्म, अभ्रक भस्म, सुवर्ण भस्म और पारा चारोंको एक २ तोला... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । पारेकी भस्म, गन्धक, इन्द्रायनकी जड, कूठ, वत्सनाम, रेणुका, पीपलामूल, बावची, कुचला, असगन्ध, ढकपन्ना, सोंठ, मिरच, पीपल, गजपीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता,... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ भावाटीकोपेतः । ( ५५७ ) यन्त्रमें रखकर ३ दिन तक पकावे । स्वांगशीतल होनेपर गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । उस चूर्णमें पीपल १ तोला और वत्सनाभ ४ मासे परिमाण डालकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ (५५८ ) रसरत्नसमुच्चयः । इसको प्रतापलंकेश्वर रस कहते हैं । इस रसकी एक २ गोली मधुमें मिलाकर सेवन करनेसे विपादिका नामक कुष्ठ नष्ट होता है ॥ २२ ॥ कुष्ठनाशन रस । रसगंधक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५५९) कृष्णमाणिक्य रसके समान गुणकारी है इसलिये, इसको कृष्णमा- णिक्य कहते हैं । इस प्रकार तैयार की हुई यह एक प्रकार की पारद भस्म है । इसको सेवन करनेसे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५६० ) रसरत्नसमुच्चयः । व्याधिवाले रोगीको यह रस हॉंगके चूर्ण, नींबू के रस और अण्डीके तेलमें मिलाकर सेवन करना चाहिये और रोगी की ओजधातुका हास होगया हो तो मुलैठीका स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५६१ ) शुद्ध हरताल, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध मैनसिल, सुहागा, पारा और समुद्रनमक ये प्रत्येक एक २ भाग, ताम्रस्म २ भाग और गन्धक २ भाग, सबको एकत्र मिलाकर जम्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५६२) रसरत्नसमुच्चयः । समनवशृंगीदारुयुक्तैः समस्तैः ॥ ३७ ॥ अजसलिलविदिष्टै गुजया तुल्यगोलः कुपितकफसमुत्थं हंति कुष्ठं गरिष्ठम् । तदपरमथ वातश्लेष्मजत्व विका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५६३) समतुलकृतमेभिष्टकणं ताप्यचूर्ण हरिदलमथ बोलं खण्डसंज्ञ मनोज्ञम् ॥४० ॥ अभ्रककी भस्मका सत्त्व, कान्तलोहमरूम और ताम्र भस्म तीनों को समान भाग ल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५६४ ) रसरत्नसमुच्चयः । बारीक चूर्ण करलेवे । फिर बकरीके मूत्रमें खरल करके छोटे बेर की गुठली के बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको नित्य सेवन करनेसे मनुष्यों के... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५६५) है इसको प्रतिदिन दो २ रत्तीकी मात्रा मिरचोंके चूर्ण और घृत में मिलाकर सेवन करना चाहिये इससे सब कुष्ठ दूर होते हैं ४४॥४५ दशसारसूत रस | पालिकं व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । उसको लाल चन्दन, अरणी और गोरखमुण्डी इन प्रत्येकके स्वरसमें क्रमसे एक २ बार भावना देवे । फिर वच, आमले, पीपल तीक्ष्णलोह भस्म और वायविडङ्ग ये प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ (५६७) स्निग्धभांडतं कुष्ठी क्षयी च कृतशोधनः मंजिष्ठादिकषायस्य कृत्वा मांसं निषेवणम् ॥ माषप्रमाणं सेवेत रसोऽयं वज्रेशेखरः ॥५७॥ शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्ध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । मासेकी गोलियाँ बनाकर छाया में सुखालेवे । फिर उनको घोके चिकने वर्त्तनमें भरकर रखदेवे । प्रथम वमन, विरेचनादिके द्वारा शारीरिक शुद्धि करके... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (९६९) भगवान्का पूजन करके सेवन करें । इस ददुकुटविद्रावण रसको अथवा पंचांगकृत नामक वढीको श्रीनागार्जुनाचार्यने वर्णन किया है। ये गोलियां सब प्रका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ (५७०) रसरत्नसमुच्चयः । परहितरस | श्वेतपाठा जटा श्वेता श्वेता चैव पुनर्नवा । पिष्ट्वा जलेन तत्कल्कैः प्रकुर्यान्नालमूषिकाम् ||६६॥ स्थालीमध्ये च तां क्षिप्त्वा क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५७१) सुखालेबे । पश्चात् उसको चूल्हेपर चढाकर नीचे अग्नि जलाने और उस ढके हुए कटोरे में जल भरदेवे । इस प्रकार तीन प्रहर तक पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग्यं कुमार्याः सलिलेन भृंगवजाह्नकं• देन च वारयुग्मम् । कुष्ठे ददीतास्य रसस्य वछत्रयं रसैराईकजैविजेतुम् ॥७५॥ शाखासु पक्कत्वमथो सुषु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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/* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ५७४ ) गुड तथा अदरखके साथ प्रयोग करनेसे गजचर्म, श्वेतकुष्ठ, विचर्चिका विस्फोटक, विसर्प और दह इन सब प्रकार के कुष्ठ रोगोंको नष्ट कर- ताहै । एवं कुटक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५९५
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (९७३) रसप्रयोगावसितौ प्रयुंज्यादगानि पच स्रवनिः सृतानि । पादी मतानीह च मासयुग्मं पथ्याय दुग्धोदनमाददीत ॥ ८२ ॥ स्यात्ताल केशाख्यर सप्रयोगे तक्र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५९७
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५७५) गोलीकृत्य विशोष्याथ गोलं कूप्यां निरुध्य च।८५ ॥ ततस्तां सुदृढे भाण्डे मूषां क्षिप्त्वा निरुध्य च । पचेत्सार्धदिनं पश्चात्स्वांगशीतं विच... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५९८
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५७६ ) रसरत्नसमुच्चयः । सर्वमेकत्र संयोज्य निष्कद्वितयसंमितम् ॥८९॥ मधुना लेहयेत्प्रातः सर्वकुष्ठ विनाशनः ॥ ९० ॥ पारेकी भस्म ८ मासे, गन्धक १६ तोले, चीते की जड १८... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५९९
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५७७) एक २ तोला पारा और गन्धककी कजली, लोहा, अभ्रक आर तांबे की भस्म ये प्रत्येक एक २ तोला, त्रिफला सबसे दुगुना, शिला- जीत तिगुना, शुद्धगूगल चागुना और चीत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६००
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/* अपरिष्कृतम् */ (५७८) रसरत्नसमुच्चयः । ग्रहणीं च महाघोरां मंदाग्निमपि दुस्तरम् ॥ १००॥ एवं विधान्महारोगान्विनिर्हति न संशयः । श्लेष्मरोगान्हरेत्सर्वान् रसोनारायणाभिधः ॥१०१... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०१
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । सेवितो मानेन घृतत्रिकटुकान्वितः । ( ५७९) हंति कुष्ठानि सर्वाणि श्वित्राणि विविधानि च १०६ गुल्म प्लीहामयं हिक्कां शूलं कुक्ष्यामयं तथा । उदावर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०२
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५८० ) रसरत्नसमुच्चयः । व्रण, मकडीका विष, भगन्दर विद्रधि, अन्त्रवृद्धि और शिरकी पीडा इन सब व्याधियों को नाश करता है ॥ १०२-१०८ ॥ जन्तुघ्नीगुटिका रस । सूतगंधौ समौ ताभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०३
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५८१ ) पश्चात् ढाकके बीज, समुद्रफल, जायफल, कुचला, स्वर्णमाक्षिक भस्म और वायविडङ्ग इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण कर लेवे यह चूर्ण उक्त रसके साथ बराबर भाग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०४
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५८२ ) रसरत्नसमुच्चयः । सम्पूर्ण व्याधियाँके भयको दूर करनेवाले इस रसको श्रीशंकर भगवान्ने निर्दिष्ट किया है। इसको वायुके विकारमें अथवा वातज कुष्ठमें हरड और घृत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०५
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । पुटे पुढे द्रवैर्म सर्वमेततु षट्पलम् । ( ५८३ ) द्विपलं मारितं ताम्रं लोहभस्म चतुष्पलम् ॥ १२४ ॥ जंबीरालेन तत्सर्वं दिनं मद्ये पुटेषु । त्रिंशदंश प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०६
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५८४ ) रसरत्नसमुच्चयः । इत्येवं चूर्णितं कुर्यात्प्रत्येकं निष्कषोडश । चतुःषष्टिकरंजस्य बीजचूर्ण प्रकल्पयेत् ॥ १२९ ॥ चतुःषष्टिं मृतं ताम्रं मध्वाज्याभ्यां... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०७
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९८५) स्वर्णक्षीररस । माह्वां पंचपलिकां क्षिप्त्वा तक्रघंटे पचेत् । तके जीर्णे समुद्धृत्य पुनः क्षीरघंटे पचेत् ॥१३३ ॥ क्षीरे जीर्णे समुद्धृत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०८
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५८६ ) रसरत्नसमुच्चयः । पारेकी भस्म, गन्धक, लोहभस्म, ताम्रभस्म गूगल, त्रिफला, कुचला, चीता और शिलाजीत, प्रत्येक औषधिको आठ २ मासे परिमाण लेकर वरुण नामक कॉजीके साथ खरल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६०९
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५८७) तोला, और शुद्ध वत्सनाभ ४ तोले लेकर सबको एकत्र खरल कर- लेवे । फिर समस्त इसके बराबर गन्धक मिलाकर खरल करे । इसके पश्चात् लोहे की कढाई में घृत चुपडक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१०
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/* अपरिष्कृतम् */ (१८८) रसरत्नसमुच्चयः । सर्वेश्वर रस । शुद्धसृतं चतुर्गंधं खल्वे यामं विमदैयेत् । मृतताम्रा लोहानि हिंगुलं च पलं पलम् ॥१४५॥ सुवर्ण रजतं चैव प्रत्येकं दशनिष्ककम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६११
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५८९) उस गोलेको वखमे लपेटकर सम्पुट बन्द करे कपरौटी करें और बालुकायन्त्रमें रखकर मन्द मन्द अधिके द्वारा ३ दिनतक पकाने । स्वांग तिल होनेपर गोलेको नि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१२
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५९० ) रसरत्नसमुच्चयः । स्वांगशीतल होजाने पर उस गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इस रसको प्रथम दिन ७ चावलकी मात्रा से सेवन करना शुरू करे फिर प्रति दिन क्रमसे ए... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१३
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५९१) . के साथ खरल करके चनेके समान गोलियां बनालेवे । इस रसको चन्द्रप्रभा वटिका कहते हैं । ये गोलियां सेवन करते समय छाछ और भातका भोजन करे और क्षारवाले... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१४
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५९२ ) रसरत्नसमुच्चयः । सुतका त्रिगुणेनैव शद्धेनाधोमुखेन वै । पार्श्व भस्म निधायाऽथ पात्रेऽर्धे गोमयं जलम | १५९१ किंचित्किञ्चित्प्रदातव्यं चुल्ल्यां यामद्वय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१५
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ५९३ ) गोबर का रस भरदेवे | फिर हाँडीके ऊपर ढक्कन ढककर उसमें एक छेद करदेवे और उसको चूल्हेपर चढाकर दो प्रहरतक तीक्ष्णअनिके द्वारा पकावे । और हाँडीपर ढ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१६
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५९४ ) रसरत्नसमुच्चयः । स्वर्णाह्निकाबाकुचिकाभिभृंगकोरंटनी रे परिमर्दयेत । दिनेकमेकं कटुटुंब- नीजलैर्मद्य ततः काजकूपिकांतः ॥ १६७॥ निक्षिप्य भाण्डे सिकतोदर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१७
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (५९५) एक मूषामें चार तोले पारा भरकर उसके ऊपर एक दूसरी भूपा ऐसी रक्खे जो पहली पाके भीतर घुसजाय और ऊपरवाली सुपाकी वलीमें छिन्तु करके उसमें चार ४ सोले... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418176
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१८
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ९५९६ ) रसरत्नसमुचयः । करावे । इससे उक्त फोडे या छाले अल्पकालमें ही नष्ट होकर श्वेत- कुष्ठ दूर होता है । यदि वित्रान्तक रसका सेवन न होसके तो केवल इस श्वेतारियोगका स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६१९
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/* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । ( ९९७) कज्जली करक उसमें १ तोला वत्सनाभ मिलाकर उस कज्जलीको १६ तोले थूहर के दूध और १ प्रत्य नारियल के जलके साथ पत्थरके खरलमें खूब अच्छे प्रकारसे घोटे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२०
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ५९८ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग लेकर प्रथम पारा और गन्धककी कज्जली करले, फिर उसमें अभ्रक की भस्म मिलाकर बावचीक रसमें एक दिनतक खरल करे । इसके पश्चात् उसमें चौगुना बावची... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२२
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ६०० ) रसरत्नसमुच्चयः । क्षिप्त्वा पच्याच्छनैर्वह्नौ तैले द्वादशपालिके ॥१८६॥ यावत्तरंति ते पक्त्वा तत्तैलं पाचयेत्पुनः । पातु संप्राप्तार्य तु तत्क्षणात् १... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२१
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/* अपरिष्कृतम् */ भावाटी कोपेतः । ( ५९९) करनेसे एवं दूध, भातका भोजन करनेसे समस्त कुछ समूल नष्ट होजाते हैं। विशेषकर श्वेतकुष्ठ, दाहजनित मण्डलकुष्ठ, काला कुष्ठ ये सब दूर होजाते हैं ॥ १... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२३
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६०१ ) नारियल, शुद्ध खाँड, चिरौंजी, अण्डीके बीज, पंकवडके बीज और बावची के बीज, इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कुट पीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२४
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ६०२ ) रसरत्नसमुच्चयः । सूखा नारियल, हल्ही, दारूहल्दी, बावची, बच, बहेडा, भोंगरा, मिलावे, सागौन की छाल और धतूरके बीज इनको समान भाग लेकर चूर्ण करके चौगुने तेलमें मिलाकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२५
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६०३) इन चारों औषधियोंके दो २ तोले चूर्णको डालकर खूब बारीक खरल करे । फिर सुखाकर लोहे के बर्त्तनमें भरकर रख देव। इस चूर्ण को प्रतिदिन एक तोला परिमाण... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२६
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/* अपरिष्कृतम् */ (६०४ ) रसरत्नसमुच्चयः । उष्णेन वारिणाऽक्षांशं सेवितं क्षीरभोजिना । कृमिजालं श्वेतकुष्ठ सहसा तद्विनिर्हरेत् ॥ २०२॥ गूलरकी जड, चीतेकी जड, नीमकी जडकी छाल, और बावची... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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text/x-wiki
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२७
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६०५) चतुर्थांशेन ताम्रस्य भस्मना सकुकेन च । कृतावापो हरेत्कुष्ठं चर्माख्यं पर्पटीरसः ॥ २०७ ॥ मेघनादामृतानीलीगदाः कृष्णतिला मधु । अश्वगंधाऽमृ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२८
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/* अपरिष्कृतम् */ ( १०६) रसरत्नसमुचयः । • गुंजा चित्रकशंखचूर्णरजनी भहातकं लांगली- स्नुकुक्षीरोत्तम कन्यकाचनरवा धूमोद्गमः सुतकः । गोमुत्र गजं विडंगमरिचं सक्षौद्रखारीजलं पामाद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६२९
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/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६०७ ) लेवे फिर घृतमें मिलाकर शनैश्वर के दिन शरीरपर मर्दन करे । यह प्रयोग सूखी खुजुली, व्रण, फोडे, गूमडे आदि सम्पूर्ण विकारोंको दूर करता है ।। २११-२१... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३०
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/* अपरिष्कृतम् */ ( ६०८ ) रसरत्नसमुच्चयः । प्रतिदिन एक एक तोला परिमाण लेकर शहद में मिलाकर सेवन करे और शरीरपर तेलको मालिश करके एक प्रहरतक तीक्ष्ण धूप बैठा रहे । इस प्रकार इस औषधको ३-४... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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