विकिस्रोतः sawikisource https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D MediaWiki 1.47.0-wmf.18 first-letter माध्यमम् विशेषः सम्भाषणम् सदस्यः सदस्यसम्भाषणम् विकिस्रोतः विकिस्रोतःसम्भाषणम् सञ्चिका सञ्चिकासम्भाषणम् मीडियाविकि मीडियाविकिसम्भाषणम् फलकम् फलकसम्भाषणम् साहाय्यम् साहाय्यसम्भाषणम् वर्गः वर्गसम्भाषणम् प्रवेशद्वारम् प्रवेशद्वारसम्भाषणम् लेखकः लेखकसम्भाषणम् पृष्ठम् पृष्ठसम्भाषणम् अनुक्रमणिका अनुक्रमणिकासम्भाषणम् श्रव्यम् श्रव्यसम्भाषणम् TimedText TimedText talk पटलम् पटलसम्भाषणम् Event Event talk सदस्यः:V(g) 2 25211 418207 418203 2026-09-04T21:53:42Z EmausBot 3495 स्थानांतरित लक्ष्य [[सदस्यः:G(x)-former]] पृष्ठ पर टूटी हुई रीडायरेक्ट को ठीक करना। 418207 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[सदस्यः:G(x)-former]] 9vhg30k1e6nvvz0wv8aqv2lym7zg53g पृष्ठम्:श्रीपाञ्चरात्ररक्षा.djvu/२४१ 104 49036 418206 249864 2026-09-04T12:35:42Z ~2026-47858-85 10717 . 418206 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Shardashah" />{{rh|left=१७६ |center=श्रीपाञ्चरात्ररक्षा}}</noinclude>इत्यादि तदेतत् सर्वं राज-राष्ट्रादिसमृ<ref>समृद्धयर्थ---क, ख, ग, च, झ</ref>द्धयर्थकाम्याराधनेषु अन्येष्वपि पूर्णानुष्ठानशक्तस्य संपूर्णद्रव्यस्य लोभादिभिस्तत्तद्धानौ मुख्यकल्पसमर्थस्यानुकल्पेन वृत्तौ च<ref>प्रवृत्तौ च क, ख, ग, च, छ</ref> दोषमाह । न तु नित्ये कर्मणि<ref>नित्यकर्मणि-क, च, झ</ref> निष्कामस्य यथाशक्तिकरणे । स्मरन्ति च मन्वादय-- {{Block center|<poem>"वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमा गतिम्" ॥ इत्यादि ।</poem> }} अस्ति चान्यो भगवद्धर्मस्य विशेष , यमधिकृत्याय सात्त्वतसंग्रह - {{Block center|<poem>" सकृत् य त्र्यह च सप्ताहं पक्ष मासमथापि वा । यो यजेद्विधिनानेन भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥ सोऽपि यायात् परं स्थानं किं पुनर्योऽत्र संस्थितः<ref>योगसंस्थित -क, ख, झ</ref>" । यावज्जीवावधि कालं बद्धकक्षो महामतिः" ॥ इति ।</poem> }} एतदेव संक्षिप्तं नारायणमुनिभिः- {{Block center|<poem>" दिनमेकमपि प्रीतो यः कुर्यान्मतिमान्नर । सुकृती किं पुनर्यावज्जीवमेव समाचरेत् " ॥ इति ।</poem> }} उक्तं चाहिर्बुध्न्येन-- {{Block center|<poem>" समाराधयतस्त्वेवमेकाहमपि नारद । मुक्तिः करे स्थिता<ref>करस्थिता-क, ख, ग, च, झ </ref> तस्य सर्वे कामाश्च कि पुनः" ॥ इति ।</poem> }}<noinclude><references/></noinclude> thkrqcc11bsaw56w9g8jwpgbghogdjb पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३१ 104 165618 418208 2026-09-05T08:58:41Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६०९) सं मधुना सर्व गुटिका कृमिनाशिनीम् ॥ २२५ ॥ खादयित्वानुतोयं च मुस्तानां कृमिशांतये ॥ आखुपणकषायं चशर्करां पिब सर्वथा । कृमिज्वरोपांत्यर्थं खण्डामलकमत्ति... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418208 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६०९) सं मधुना सर्व गुटिका कृमिनाशिनीम् ॥ २२५ ॥ खादयित्वानुतोयं च मुस्तानां कृमिशांतये ॥ आखुपणकषायं चशर्करां पिब सर्वथा । कृमिज्वरोपांत्यर्थं खण्डामलकमत्ति वा ॥ २२६॥ स जग्ध्वैवं पर्पटी च स्नुहीरसं पिबेदनु । स्नुहीरसं विना कश्विच्छेत्तुं जंतून शक्नुयात् ॥ २२७॥ उदररोग अफरा और कृमिरोग आदि उदरसम्बन्धी व्यावियों को नष्ट करने के लिये नीचे अग्नितुण्ड रस कहा जाता है। यह रस सम्पूर्ण उदररोगोंका नाश करनेके लिये अत्यन्त प्रसिद्ध है । पारा १ भाग गन्धक २ भाग, अजमोद ३ भाग, वायविडङ्ग ४ भाग, ढाकके बीज ५ भाग और कुचला १५ भाग सबको एकत्र चूर्ण करके शहदके साथ घोंटकर दो २ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । कृमिरोगको शमन करने के लिये इस रसकी प्रतिदिन एक २ गोली खा कर ऊपर से नाग रमोथेका क्वाथ पान करे, अथवा मूषाकानीके क्वाथको खाँड डालकर पान करे। यदि कृमिरोग और ज्वर दोनों उपद्रव एक साथ हों तो उसको दूर करने के लिये इस रसकी गोली खाकर ऊपर से खण्डामलक अवलेह सेवन करे अथवा प्रथम पर्पटी रसको खाकर पीछेसे थूहर के रसका अनुपान करे । थूहर के रसको पान किये विना कोईभी औषध जन्तुओं को नष्ट नहीं करसकती। इसलिये कोई भी कृमिनाशक औषध सेवन करने पर थूहर के रसका अनुपान अवश्य करना चाहिये। यह रस कीडोंको नष्ट करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है । २२२-२२७ ॥ २२ १ हदि ज्वालोपशान्त्यर्थमिति पाठोपि । ..<noinclude></noinclude> f0vldh5izivw37t326pc632o0fy12ss पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३२ 104 165619 418209 2026-09-05T08:58:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१० ) रसरत्नसमुच्चयः । कीटमर्द रस । शुद्धसूतं शुद्धगंधमजमोदा विडंगकम् । विषमुष्टी ब्रह्मबीजं क्रमादुक्तगुणं भवेत् ॥२२८॥ चूर्णयेन्मधुना लेहां निष्केकं कृमि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418209 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६१० ) रसरत्नसमुच्चयः । कीटमर्द रस । शुद्धसूतं शुद्धगंधमजमोदा विडंगकम् । विषमुष्टी ब्रह्मबीजं क्रमादुक्तगुणं भवेत् ॥२२८॥ चूर्णयेन्मधुना लेहां निष्केकं कृमिजिद्भवेत । की मर्दो रसो नाम सुस्ता तोयं पिबेदन ॥२२९॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, अजमोद ३ भाग, वायविडंग माग कुचला ५ भाग और ढकपन्ना ६ भाग लेकर सबको एकत्र चूर्ण कर- लेवे । इस चूर्ण को प्रतिदिन चार २ मासे परिमाण लेकर शहद में मिला- कर सेवन करे और ऊपर से नागरमोथेके क्वाथका अनुपान करे । यह कीटमर्द रस सब प्रकारक कृमियां को नष्ट करनेवाला है ॥२२८-२२९॥ कृमिघ्न रस । रसस्य निष्कमादाय गंधकं तत्समं कुरु । ताम्रं देहि तदर्थं च पंचांगं शाकवारिणा ॥ २३० ॥ मर्यादेकदिनं रात्रौ क्षिपेत्तत्रैव यत्नतः । क्षीरिणीकाथमादाय तथा कुरु दिनांतरे ॥२३१॥ दत्त्वा लघुपुटं पंच जयपालान्विमर्दयेत् । देहि गुंजाइयं चास्य साज्यं शूलच्छिदे तथा॥२३२॥ पारा ४ मासे, गन्धक ४ मासे और ताम्र भस्म २ मासे तीनोंको एकत्र मिलाकर सागौन के पंचांग के काटेमें एक दिन तक खरल करे, फिर रात्रि के समय उसमें थूहर का थोडासा क्वाथ डालकर रखदे और दूसरे दिन अच्छे प्रकार से घोटकर गोला बनालेवे । उसको लघुपुटके द्वारा पकाकर बारीक चूर्ण कर लेवे । फिर उसमें ५ जमालगोटे डालकर । खूब बारीक खरल करलेवे । इस रसको दो दो रत्तीकी मात्रासे घृतमें मिला- -<noinclude></noinclude> aku4rkyvuq9b6jjnh7scmk8lcfc8cno पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३३ 104 165620 418210 2026-09-05T09:15:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६११ ) कर देना चाहिये । यह रस कृमियोंको नष्ट करने और उनके निकलते समय होनेवाले शुलको शमन करने के लिये अत्यन्त उपयोगी है ॥ २३०-२३२ ॥ कृमिहर रस | शुद्धसं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418210 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६११ ) कर देना चाहिये । यह रस कृमियोंको नष्ट करने और उनके निकलते समय होनेवाले शुलको शमन करने के लिये अत्यन्त उपयोगी है ॥ २३०-२३२ ॥ कृमिहर रस | शुद्धसंत चेंद्रयवमजमोदा मनःशिला । पलाशबीजं तुल्यांश देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ २३३ ॥ मर्दयेद्भक्षयेन्नित्यमाकर्णी कषायकम् । सितायुक्तं पिबेच्चानु क्रिमिपातो भवत्यलम् ॥ २३४ ॥ शुद्ध पाग, इन्द्रजौ, अजमोद, मैनसिल और ढाके बीज इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके देवदाली के रसमें एक दिनतक खरल करे । फिर सुखाकर बारीक चूर्ण करके रखलेवे । इस रसको प्रतिदिन उपयुक्त मात्रा से सेवन कर ऊपर से मूषाकानी के का थको मिश्री मिलाकर पान करे । इस रसके सेवन से निस्सन्देहे समस्त कृमि मरकर शरीरसे बाहर निकल पड़ते हैं || २३३॥ २३४ ॥ सामान्य उपचार । अजमोदा फलास्थीनि क्षीरिणीरसगंधकम् । आखुपर्णीरसं खादेत्सताम्रं कृमिशूलनुत् ॥ २३९ ॥ मधु मिश्रनिंब पल्लव सत्त्वयुतो यदा सुतः । कृमिसंघातान्नाशयति त्रिभिरहोभिरसौ ॥ २३६ ॥ अजमोद, त्रिफलेकी मींगी, थूहरका रस, पारा और गन्धक सबको समभाग लेकर बारीक पीसकर कपड़छान कर लेवे । इस रसको और ताम्र भस्मको उपयुक्त परिमाणमें लेकर मूसाकानीके रसके- साथ सेवन करे । इससे कृमिजनित उपद्रव और शूल नष्ट होता है । अथवा पारेकी भस्म दो रत्ती और नीमकी कोमल कोंपलका रस दोनोंको शहद मिलाकर सेवन करे। यह प्रयोग तीन दिनमेंही<noinclude></noinclude> n65f3fi0ikg8z5v6fcokgv5jvx2k3et पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३४ 104 165621 418211 2026-09-05T09:15:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । सम्पूर्ण कृमिसमूह को नाशकर देता है || २३५ ॥ २३६ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषाटीकायां विशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २० ॥ एकवि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418211 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । सम्पूर्ण कृमिसमूह को नाशकर देता है || २३५ ॥ २३६ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषाटीकायां विशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २० ॥ एकविंशोऽध्यायः । आठ महारोग । वातव्याध्यश्मरी कुष्ठमेहोदर भगंदराः । अशसि ग्रहणीत्यष्टौ महारोगाः प्रकीर्तिताः ॥ १ ॥ वातरोग, पथरी, कुष्ठ, प्रमेह, उदररोग, भगन्दर, अर्श और संत्र- ही ये आठों महारोग कहलाते हैं ॥ १ ॥ शतिशत | तत्रानेकेऽनिलगदाः शीतवातादयः स्मृताः । हिमवंति हि गात्राणि रोमाञ्च ज्वरितानि च ॥ शिरोक्षिवेदनाssलस्यं शीतवातस्य लक्षणम् ॥ २ ॥ इनमें वायु अनेक रोग शीतवात आदि कहे जाते हैं शरीर के अवयवोंका शीतल होना, गेमाश्च और ज्वरका होना, सिर और पीडाका होना आलस्यका रहना आदि शीतवात रोगके लक्षण हैं ॥ २ ॥ बातार रस । रसभागो भवेदेको गंधको द्विगुणो मतः । त्रिभागा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागश्च चित्रकः ॥ ३ ॥ गुग्गुलुः पंचभागः स्यादेरण्डस्नेह मर्दितः । क्षिप्त्वात्र पूर्वकं चूर्ण पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ ४ ॥ गुटिका कर्षमात्रां तु भक्षयेत्प्रातरेव हि ।<noinclude></noinclude> ewji2nn714xncddgf3vhrwykz3e63ma पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३५ 104 165622 418212 2026-09-05T09:16:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६१३) नागरैरण्डमूलानां काथं तदनुपाययेत् ॥५॥ अभ्यज्यैरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशकम् । विरेके तेन संजाते स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥६॥ वातारिसं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418212 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६१३) नागरैरण्डमूलानां काथं तदनुपाययेत् ॥५॥ अभ्यज्यैरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशकम् । विरेके तेन संजाते स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥६॥ वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः । मासेन सुखयत्येव ब्रह्मचर्यपुरःसरम् ॥७॥ विजयागुटिकां रात्रौ स्वरूपमात्रां तु भक्षयेत् ॥८॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, त्रिफला ३ भाग, चीता ४ भाग, और शुद्ध गूगल ५ भाग लेवे । पहले गूगलको अण्डीके तेल में खरल करे, फिर उसमेंसे अन्यान्य औषधियोंका चूर्ण डालकर खरल करे । और एक २ तोलेकी गोलियाँ बनाकर सुखालेवे । इनमें से प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली सेवन करके सोंठ और अण्डकी जडका काथ पान करे । पीठके ऊपर अण्डीके तेल की मालिश करके सुहाता २ सेंके। इस उपचार के करने से जब रोगीको दस्त होजाय तब उसको स्निग्ध और उष्ण पदार्थोंका भोजन करावे । इस रसको सेवन करते समय वातरहित स्थानमें रहे और ब्रह्मचर्य का पालन करे तो एक मही- ही रोगी शीतवातादि रोगसे मुक्त होकर सुखको प्राप्त होता है। इसपर रात्रि में पूर्वोक्त विजयावटीको अल्प मात्रामें सेवन करे ॥ ३-८॥ शीतारि रस । रसेन गंधं द्विगुणं प्रगृह्य पुनर्नवावह्नि- रसैर्विमर्द्य । पक्वार्कपत्रोत्थरसेन पश्चाद्विपाचयेदष्टगुणेन यत्त्रात् ॥९॥ रसार्धभागेन विषं च दत्त्वा विपाचये-<noinclude></noinclude> bonb3b83j91894gjrj8t0piith1hgf2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३६ 104 165623 418213 2026-09-05T09:16:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वह्निजलैः क्षणं तव । शीतारिसंज्ञो हि रसोऽ- यमस्य वल्लं तदर्धे यदि वाऽऽर्द्धकेण ॥१०॥ मरीच चूर्णेन घृत प्लुतेन सेवेत मासं सघृतं च पथ्यम्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418213 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वह्निजलैः क्षणं तव । शीतारिसंज्ञो हि रसोऽ- यमस्य वल्लं तदर्धे यदि वाऽऽर्द्धकेण ॥१०॥ मरीच चूर्णेन घृत प्लुतेन सेवेत मासं सघृतं च पथ्यम् ॥ ११॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग लेकर दोनोंकी कज्जली करके उसको पुनर्नवा और चीतेके रसमें अलग २ खरल करके सुखालेवे । फिर उस कज्जलीको पके हुए आक के पत्तोंके अठगुने रस में यत्नपूर्वक पकावे । जब सब रस शुष्क हाजाय तब नीचे उतारकर शीतल होने- पर उसमें पारसे आधा भाग वत्सनाभ डालकर और चीतेके रसमें भावना देकर फिर कुछ देरतक पकावे । और शीतल होजाने पर बारीक चूर्ण कर के रखदेवे । इसको प्रतिदिन एक २ अथवा आधी २ रत्ती परिमाण अदरखके रस, मिरचोंके चूर्ण और घृतमें मिलाकर सेवन करे । इस प्रकार एक महीने तक इस रसको सेवन करने और घृतसहित पथ्य पदार्थों का आहार करनेसे शीतवातादि रोग दूर होटे हैं ॥ ९-११ ॥ स्पर्शवात | अगेषु तोदनं प्रायो दाहं स्पर्श नविंदति । मंडलानि च दृश्यते स्पर्शवातस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥ समस्त शरीर में सुई चुभोने कीसी पीडा और दाहका होना, स्पर्शका ज्ञान न होना, और शरीरपर लाल लाल चकत्तोंका पडना ये सच स्पर्शबात के लक्षण है ॥ १२ ॥ सर्वेश्वर रस | कर्षमात्रं रसस्य स्याल्लोह हिंगुलयोरपि । भास्वद्गगनयोंश्चापि गंधकस्य पलं मतम् ||१३||<noinclude></noinclude> 5br15o6jgj01ku3ciu5m0cbtp9pbtpr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३७ 104 165624 418214 2026-09-05T09:16:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६१५) व्योषगंध कतोराणां प्रत्येकं तु पलं पलम् । निद्रावेण संमर्च भावयेत्सप्तधा पृथक् ॥ १४ ॥ हेमास्तुक्पयो वासाइयारिविषमुष्टिभिः । पिण्डित वाल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418214 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६१५) व्योषगंध कतोराणां प्रत्येकं तु पलं पलम् । निद्रावेण संमर्च भावयेत्सप्तधा पृथक् ॥ १४ ॥ हेमास्तुक्पयो वासाइयारिविषमुष्टिभिः । पिण्डित वालुकायंत्रे स्वेदयेद्दिवलत्रयम् ॥ १५ ॥ कर्षमात्रं तु पिप्पल्या निष्कमात्रं विषस्य च । संचूर्ण्य दापयेदत्र रसे सर्वेश्वराभिधे १६ ॥ गुंजामात्रं ददीतास्य स्पर्शवातापनुत्तये ॥ १७ ॥ पारा, लोहा, सिंगरफ, ताँबा और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक एक २ तोला, गन्धक ८ त्रिकुटा ४ तोले और चाँदी की भस्म ४ तोले सबको एकत्र मिलाकर नींबू के रसमें ७ बार भावना देवे। फिर धतू का रस, आकका दूध, थूहर का दूध, अडूसेका रस, कनेरका रस और कुचलेका रस इन प्रत्येक रसोंमें क्रमसे पृथक पृथकू सात बार भावना देकर गोला बनालेवे । उसको सम्पुटमें बंद करके ३ दिन तक बालुकायंत्र में पकावे । स्वांगशीतल होने पर गोलेको चूर्ण करके उसमें पीपलका चूर्ण १ तोला और शुद्ध वत्सनाभ ४ मासे डालकर खूब बारीक खरल करे और शीशी में भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण सेवन कराना चाहिये । यह रस स्पर्श- वातको शान्त करने के लिये बडा उपयोगी है ॥ १३-१७ ॥ केश्वर रस रसेन गंध द्विगुणं प्रमर्थ ताम्रस्य चक्रेण सुतापितेन । आच्छाद्य भूत्या तु ततः प्रयत्नाच्चक्रीं विलग्नं च रसं प्रगृह्य १८ ॥ १ इदं श्लोकाधकं करलिखित पुस्तके नास्ति । २ पत्रेण !<noinclude></noinclude> bexyyrrjdjyknqyp1itt9oj76iz0b52 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३८ 104 165625 418215 2026-09-05T09:18:10Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१६) रसरत्नसमुच्चयः । विचूर्ण्य तद्वादशधाऽर्कदुग्धैः पुटेत वह्नि त्रिफलाजलैश्व | संभावितोऽर्केश्वर एष सूतो गुंजाद्वयं चास्य फलत्रयेण ॥ ददीत मात्रितयेन सुप... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418215 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६१६) रसरत्नसमुच्चयः । विचूर्ण्य तद्वादशधाऽर्कदुग्धैः पुटेत वह्नि त्रिफलाजलैश्व | संभावितोऽर्केश्वर एष सूतो गुंजाद्वयं चास्य फलत्रयेण ॥ ददीत मात्रितयेन सुप्तवाताद्विमुक्तो हि भवेद्विताशी १९ ॥ पारा १ भाग और गन्धक २ भाग लेकर दोनोंकी कजली कर लेवे । उसको एक हांडीमें रखकर उसके मुँह पर तीन भाग शुद्ध ताँचेकी टिकिया बनाकर ढकदेवे, फिर सन्धियोंको बन्द करके उस हाँडीको उपलोंकी राखमें दाबकर ६ घंटे तक तीक्ष्ण अग्निदेवे । स्वांगशीतल होजानेपर उक्त टिकिया को और उसमें लगे हुए रसको लेकर खूब बारीक खरल कर लेवे | फिर उसको आकके दूधमें घोरकर गजपुटमें पकावे । इस प्रकार प्रत्येक बार आकके दूधमें घोटकर बारह बार गजपुट देवे । फिर चीतेके और त्रिफलेके रसमें क्रमसे एक २ बार भावना देकर सुखालेवे । और खरल करके शीशी में भरकर रखलेने 1- यह अकश्वर रस कहलाता है । इसको प्रतिदिन दो दो रत्ती परिमाण लेकर त्रिफले के चूर्ण के साथ देवे । इस प्रकार इस रसको तीन महीने तक सेवन करनेसे और पथ्य पदार्थों का आहार करनेसे मनुष्य सुप्त- वातरोग से मुक्त होजाता है ॥ १८-१९ ॥ स्पर्शबाचन रस । तालं रसेनाष्टगुणं जयांश विमद्य यत्नाद्गुलि कांगुडेन । निबद्धय तां सेवय मासयुग्मं दिनोदये स्पर्शविकारशांत्यै ॥ २० ॥ १ अपां चेति पाठोऽपि ।<noinclude></noinclude> kmrpn4hw3co5i1393v1ge56be8jg9ys पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३९ 104 165626 418216 2026-09-05T09:20:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भावाटी कोपेतः । ( ६१७) पारा १ भाग, हरताल ८ भाग और अरणीकी जड ८भाग लेकर प्रथम पारे और हरतालकी कज्जली करले, फिर उसमें अरणीकी जडका चूर्ण और समस्त औषधिके बराबर गुड डालकर व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418216 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भावाटी कोपेतः । ( ६१७) पारा १ भाग, हरताल ८ भाग और अरणीकी जड ८भाग लेकर प्रथम पारे और हरतालकी कज्जली करले, फिर उसमें अरणीकी जडका चूर्ण और समस्त औषधिके बराबर गुड डालकर वारीक खरल करे और दो २ मासेकी गोलियाँ बना कर रखलेव । इन गोलियोंको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे । स्पर्शवात (सुन्नी ) को शमन करनेके लिय यह रस विशेष उपयोगी है ॥ २० ॥ गन्धाश्मगर्भ रस | गन्धं रसेनाष्टगुणं विमर्द्य कृशानुतो येन विपाचयेत । वृद्वग्निना लोहमये- ऽथ पात्रे विषेण पश्वादथ सिद्धिमेति ॥२१॥ गाश्मगर्भो हि रसोsस्य सर्वस्पर्शप्रणु- त्य भज वल्युग्मम् । सक्षीरमन्नं सघृतं च भोज्यं वये च सर्वे परिवर्जनीयम् ||२२|| पारा १ भाग और गन्धक ८ भाग दोनोंकी कज्जली करके उसको लोहे की कढाईमें डालकर चातक काढेके साथ मन्द मन्द अग्नि पकावे । जब समस्त काथ शुष्क होजाय तच कज्जलीको नीचे उतारकर उसमें पारके बराबर शुद्ध वत्सनाभ मिलाकर खूब खरल करे । इस प्रकार यह गन्धाश्म गर्भ रस सिद्ध होता है । सब प्रकार के स्पर्शवात रोगोंको शमन करनेके लिये इस रसको सेवन करे । मात्रा - दो दो रती परिमाण । इसपर दूध भात और घृतका सेवन करना चाहिये । और सम्पूर्ण त्याज्य पदार्थोंको त्याग देना चाहिये ॥ २१ ॥ २२ ॥<noinclude></noinclude> au1vneljicomettsqknbvafeclz69ue पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४० 104 165627 418217 2026-09-05T09:21:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वितीय गन्धाश्मगर्भ रस । गंध चूर्णितं कृत्वा सूक्ष्मत्रत्रेण बध्य च । भाण्डे गोदुग्धकं दत्त्वा प्रावृतं खर्परेण च ॥२३॥ अग्नि प्रज्वाल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418217 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६१८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वितीय गन्धाश्मगर्भ रस । गंध चूर्णितं कृत्वा सूक्ष्मत्रत्रेण बध्य च । भाण्डे गोदुग्धकं दत्त्वा प्रावृतं खर्परेण च ॥२३॥ अग्नि प्रज्वालये पश्चाच्छीतं समुद्धरेत् । गंध काष्टक भागेन रसं दत्त्वाऽथ पाचयेत् ॥२४॥ मृद्रग्निना शीतमुभावृत्तार्योत्तार्य यत्नतः ॥ यावद्वेधकरूपस्य पूर्वस्य ह्यन्यथा भवेत् ॥ २५॥ सप्तगुंजं ददीतास्ययावत्स्यादेकविंशतिः प्रत्यहं तु हरीतक्या गुंजा देयैकविंशतिः॥२६॥ सक्षीरं सघृतं चान्नं भोजयीत सशर्करम् । निर्वाते चावतिष्ठेत कम्पस्पर्शापनुत्तये ॥ गंधाश्मगर्भसंज्ञोयं योगिभिः परिकीर्तितः ॥ २७॥ एक हांडी या पतीलीमें दूध भरकर उसके मुँहपर एक सफेद पतला कपडा बांध दे और उसके ऊपर ८ तोले गन्धकको चूर्ण करके रखदेवे, फिर उसके ऊपर एक सकोरा उल्टा करके ढक दे और सकोरे के ऊपर अग्नि जलावे । इस प्रकार से जब समस्त गन्धक पिघ लकर दूधमें जा पडे तव शीतल होनेपर उसको दूधमेंसे निकालकर पीसलेवे । उस गन्धकमें १ तोला पारा मिलाकर लोहे की कढाई में डाल करके मन्द मन्द अभिसे पकावे । जब गन्धक पिघलकर पारा और गन्धक दोनों एकमे एक होजायँ तब उसको नीचे उतारकर शीतल करलेवे । फिर उसको पिघलाकर ठंडा करे। जचतक गन्धकका पूर्व- रूप न बदल जाय तब तक, गन्धकको बारम्बार पिघलाकर शीतल<noinclude></noinclude> namtb824siurqwksb764kkhp1jo13dm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४१ 104 165628 418218 2026-09-05T09:24:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६१९ ) करे । इसके पश्चात् उसको सुखाकर बारीक चूर्ण कर लेवे। इस रसको पहले दिन सात रत्ती परिमाण सेवन करे । फिर दूसरे दिन ८ रती, और तीसरे दिन ९ रत्ती, इस क्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418218 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६१९ ) करे । इसके पश्चात् उसको सुखाकर बारीक चूर्ण कर लेवे। इस रसको पहले दिन सात रत्ती परिमाण सेवन करे । फिर दूसरे दिन ८ रती, और तीसरे दिन ९ रत्ती, इस क्रमले प्रतिदिन एक २ रत्ती मात्रा बढाकर सेवन करे । जब २१ रत्ती तक मात्रा होजाय तब प्रतिदिन इक्कीस २ रत्ती परिमाण लेकर २१-२१ इरडकि चूर्णके साथ रोग आरोग्य होनेतक सेवन करे। और जब इस रसको बन्द करना हो तब प्रतिदिन एक २ रत्ती मात्रा घटाता चलाजाय, जब ७ ती पर आजाय तब छोडदेवे । इसपर घी, दूध और खांडके साथ भातका भोजन करावे । इसको सेवन करते समय वातरहित स्थानमें रहे तो यह रस कम्पवात और स्पर्शवातको नष्ट करता है । इस रसको योगी पुरुषोंने वर्णन किया है ॥ २३-२७ ॥ स्पर्शवातारि रस | पलाशबीजोत्थरसेन सूतं गंधेन युक्तं त्रिदिनं विमर्थ । श्रक्ष्णीकृते तद्विषमुष्टिबीजं संयोजनीयं च कलाप्रमाणम् ॥ २८ ॥ मासत्रयं निष्कमितं प्रयत्नात्स्पर्शप्रणुत्यै " खलु सेवयेत ॥ २९ ॥ पारा और गन्धक दोनोंको एक २ भाग लेकर कज्जली करले, फिर ढाकके बीजों के रस में तीन दिन तक खरल करके चौथे दिन उसमें १६ वाँ भाग कुचलोंका चूर्ण मिलाकर खूब बारीक खरल करे । इस रसको प्रतिदिन चार २ मासेकी मात्रा से सेवन करे । तीन महीने तक बराचर इसको सेवन करनेसे स्पर्शवात रोग नाश होजाता है ॥ २८ ॥ २९ ॥ स्पर्शवातान्वकुटी । अष्टौ भागा रसस्य स्युर्विषर्तिदोर्दशैव तु ।<noinclude></noinclude> doehjtt89pkablrbq0nlqlvafzf8niq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४२ 104 165629 418219 2026-09-05T09:25:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२० ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधकस्य दश द्वौ च कटुत्रिफलयोस्त्रयः ॥ वह्निचित्रकमुस्तानां वचाश्वगंधयोरपि ॥ ३० ॥ रेणुका विषकुष्टानां पिप्पलीमूलनागयोः । एकैकस्तु भव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418219 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६२० ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधकस्य दश द्वौ च कटुत्रिफलयोस्त्रयः ॥ वह्निचित्रकमुस्तानां वचाश्वगंधयोरपि ॥ ३० ॥ रेणुका विषकुष्टानां पिप्पलीमूलनागयोः । एकैकस्तु भवेद्भाग एकः कल्प्योऽयसस्तथा ॥ ३१ ॥ चतुर्विंशगुडस्यात्र वाटिका चणकाकृतिः । मेवा सेवेत स्पर्शवाताऽपनुत्तये ॥ ३२ ॥ पारा ८ भाग, कुचले १० भाग, गन्धक १२ भाग, मिरच ३ भाग, त्रिफला ३ भाग, एवं अरणी, चीता, नागरमोथा, वच, असगन्ध रेणुका वत्सनाभ, कूठ पीपलामूल, सोंठ और लोह भस्म यह प्रत्येक औषधि एक २ भाग लेवे और गुड २४ भाग लेवे । प्रथम सब औषधियोंको एकत्र बारीक चूर्ण करके फिर गुडमें मिलाकर चने के समान गोलियाँ बनालेवे इन गोलियों को प्रकृतिके अनुकूल न्यूनाधिक मात्रामें सेवन करनेसे स्पर्शवात नष्ट होता है ॥ ३०-३२ स्पर्शवत्तारि तैल | त्रिगंधकं तुत्थकमश्वगंधा हयारिनागा शृतिवायसीनाम् । मूलानि संचूर्ण्य सुभाण्डके च तैलं क्षिपेत्तेन चतुर्गुणेन ॥ ३३ ॥ पक्वार्कपत्रोत्थ रसेन पश्चाद्विपाचयेदष्ट- गुणेन यत्नात् । तत्स्पर्शवाताय भवेद्धि तैलं विलेपयेत्तेन च तत्प्रदेशम् ॥ ३४ ॥ गन्धक, इरताल, मैनसिल, तूतिया, असगन्ध, कनेर, नागकेसर और कौआ ठोडीकी जड इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके कल्क बनालेवे फिर कल्क से<noinclude></noinclude> suim7ih7429w6xkokfi9ogudlpvipyp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४३ 104 165630 418220 2026-09-05T09:25:46Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६२१ ) चौगुना तेल और पके हुए आकके पत्तोंको रस अठ गुना लेकर सबको एक बर्तन में भरकर यथाविधि तेलको पकावे । यह तेल स्पर्शवास (सुन्नी) को नष्ट करने के लिये... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418220 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६२१ ) चौगुना तेल और पके हुए आकके पत्तोंको रस अठ गुना लेकर सबको एक बर्तन में भरकर यथाविधि तेलको पकावे । यह तेल स्पर्शवास (सुन्नी) को नष्ट करने के लिये विशेष उपयोगी हैं। इसको शरीरमें जहाँ स्पर्श- वातकी पीडा हो वहाँ खूब अच्छे प्रकारसे मालिश करे ॥ ३३-३४ ॥ सामान्य उपाय | मूलं पिबेद्राजतरोः शरीरं मासद्वयं तेन विलेपयेत ॥ ३५ ॥ यदा सुचूर्णीकृतचक्रमर्दबीजं सुगोमूत्र परिप्लुतं च । अर्कस्नुहीक्षीरनिशा द्वयेन १ पंचाईतैलम् । मूलैः सपुष्पैः फलपत्रसाररर्कस्य निष्पीड्य रसा- ढके तु । भूपीलुका वह्निपुनर्नवानां तुरंगगंधार्तगलस्य मूलं निर्गुण्डि- कायाश्च तथैव शिग्रोर्मूलानि विद्वान्पृथगाददीत । एला लवंग तगरं च कुष्ठं ससैन्धवं कर्षमितं पृथक्स्यात् । स्नुक्क्षीरपिष्टाजपयोद्विभागं प्रस्थेन तैलस्य पचेद्विपक्कं । पंचार्कतैलं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः श्रोणीगतान् संधिगता त्रिति । अभ्यजनैश्च त्रिभिरेवसद्यो वातोत्थरोगांश्विरजातशीतिः ॥ १ ॥ द्वितीयं पंचाईतैलम् । अर्कस्य शुष्कपञ्चाङ्गमाढकं विपचेज्जले | चतुर्गुणे वह्निीशियुनिर्गुड चग्निपीलुकं । वर्षाभूवाजिगन्धार्तगलं तेषां पृथक् पृथक् । मूलानि कुडवांशानि चतुर्भागावशेषितैः । तैलप्रस्थं कषायेऽस्मिन् द्विमस्थं पयसस्तथा । एलात्वक्कुष्ठ सिन्धूत्थतगरं कार्षिकं पृथक् । स्तुकक्षीर- कुडवं दत्त्वा शनैर्मंदाग्निनापचेत् तदस्याभ्यंजनेनैव निहन्यादाशुसंधिगान सर्वान्वा तत्यरोगांश्च कटिपार्श्वगतांस्तथा । ब्रुवान्ति तज्ज्ञाः पञ्चार्कतैलं श्रेष्ठं समीरणुत ॥ २ ॥ इदं तैलद्वयं करलिखितपुस्तकेऽधिकम् ॥<noinclude></noinclude> b9z361ua9bwfzmswdbd329dvysoywoh पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४४ 104 165631 418221 2026-09-05T09:26:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । युक्तं भजेन्मण्डलमामयांतम् ॥ ३६ ॥ हियावलीक्वाथविपाचितं च स्पर्शप्राणाशा- यददोत्रीगंधम् । हियावलीकंद विलेपनाच्च स्पर्शप्रदेशः क्षयम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418221 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । युक्तं भजेन्मण्डलमामयांतम् ॥ ३६ ॥ हियावलीक्वाथविपाचितं च स्पर्शप्राणाशा- यददोत्रीगंधम् । हियावलीकंद विलेपनाच्च स्पर्शप्रदेशः क्षयमेति यत्नात् ॥ ३७ ॥ यवानिका सिद्धघृतेन वापि स्पर्शप्रणाशा- यविलेपयेत । अर्कोत्थदुग्धेन विलेपनाच्च स्फोटी भवेत्तस्य ततः प्रदेशः ॥ ३८ ॥ घृतेन चोक्तेन विलेपनाद्वा स्पर्शो लयं याति च तत्क्षणेन । यद्वाहिनीसूरणकं सिताश्च स्पर्शातकः स्यात्खलु लेपनेन ॥ ३९ ॥ आदौ शिरामोक्षणतो रसेंद्र- विलेपनं चापि नियोजयति ॥ ४० ॥ १ अमलतास की जडका स्वरस अथवा काथ दो महीने तक पान करे और उसीको शरीरपर मालिश करे तो स्पशवीत दूर होता है । २ चकवडके बीजों को गोमूत्रमें पीसकर उसमें आकका दूध, थूहर का दूध, हल्दी और दारूहल्दीका चूर्ण मिलाकर उडदके बराबर गोलियाँ बनालेवे | इन गोलियोंको ४० दिनतक सेवन करनेसे स्पर्शवात रोग नष्ट होता है । ३ अथवा हल्दी, तेजपात, दारचीनी और इलायची इनका क्वाथ बनाकर पान करे और हल्दी के कन्दको पानी में पीसकर शरीरपर मालिश करे । यह प्रयोग स्पर्शवात को नष्ट करनेके लिये बडा उपयोगी है, ४ अजवायन के कल्कके साथ घृतको सिद्ध करके शरीरपर मलनेसे स्पर्शवात रोग शान्त होता है । ५ आक के दूध की मालिश करनेसे स्पर्शवातके स्थान में शरीर पर (अर्थात<noinclude></noinclude> cdy9fos9yzo5ks8x2vbfkwyo0lrgoa2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४५ 104 165632 418222 2026-09-05T09:26:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६२३ ) जहाँ सुन्नी होती है वहाँ ) छाले पडजाते हैं उनपर उक्त अजवायनक घृतका लेप करनेसे छालों सहित स्पर्शनात (सुन्नी) रोग क्षण भरमें नष्ट होजाता है । ६ अ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418222 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६२३ ) जहाँ सुन्नी होती है वहाँ ) छाले पडजाते हैं उनपर उक्त अजवायनक घृतका लेप करनेसे छालों सहित स्पर्शनात (सुन्नी) रोग क्षण भरमें नष्ट होजाता है । ६ अमगन्ध जिमीकन्द और मिश्री तीनोंको एकत्र जल में पीसकर लेप करनेसे स्पर्शनात शमन होता है । ७ अथवा प्रथम खुनीकी जगह फस्त खुलवा कर वहाँका दूषित रक्त निकलवा देवे फिर पारेकी भस्मको धीमें मिलाकर मालिश करे तो स्पर्शवात रोग शीघ्र नाश हो जाता है ॥ ३६-४० ॥ रक्तवात रोग । पादयोश्च भवेत्तापः श्वयथुश्च प्रजायते । रक्तच्छायशरीरे च रक्तवातस्य लक्षणम् ॥४१॥ पैरोंमें दाह होना, सूजनका होना, और समस्त शरीरमें रक्तका वर्ण काला पडजाना इत्यादि वातरक्तके अनेक लक्षण होते हैं ॥ ४१ ॥ सामान्य उपाय । त्रियोनिरस गुंजैकां प्रथमं दापयेद्भिषक्र । हरितक्यामलक्यौ च गुडुचीं कटुकां तथा ॥ पंचांगानि च निंबस्य चूर्णयित्वा च पाययेत् ॥४२॥ कोकिलाक्षस्य मूलानि गुडुचीं नागरं तथा । काथयित्वा रजन्यां तु पाययेदतिशीतलम् ॥४३॥ अग्रे शिरा विमोक्षार्थं यवचिचाविरेचनम् । वांतिमंकोलबीजेन देवदालीजलेन वा ॥ ४४ ॥ सुरणं माषवृंताकं राजिकादि विवर्जयेत् ॥४५॥ वातरक्त रोगमें वैद्य पहले कहे हुए त्रियोनि रसको एक २ रत्ती<noinclude></noinclude> mipazhhwz7gu60smr6rwkh9vrmjftn2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४६ 104 165633 418223 2026-09-05T09:27:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२४ ) रसरत्नसमुच्चयः । परिमाण सेवन कराकर ऊपर से हरड, आमले, गिलोय, कुटकी और नमिका पंचाङ्ग इन सबका काढा बनाकर पान करावे । अथवा ताल- मखानेकी जड, गिलोय, सोंठ और हल्दी इनक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418223 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६२४ ) रसरत्नसमुच्चयः । परिमाण सेवन कराकर ऊपर से हरड, आमले, गिलोय, कुटकी और नमिका पंचाङ्ग इन सबका काढा बनाकर पान करावे । अथवा ताल- मखानेकी जड, गिलोय, सोंठ और हल्दी इनका क्वाथ बनाकर खूब शीतल करके पान करावे । इस रोगमें प्रथम अंकोल के बीजोंका चूर्ण अथवा देवदालीका क्वाथ पान कराकर वमन करावे और भुई आम- लेका क्वाथ पान कराकर विरेचन करावे । इसके पश्चात् फस्त खुलवा कर निकलवावे । वातरक्तके रोगीको जिमीकंद, उडद, बैंगन, राई आदि पदार्थ सर्वथा त्याग देने चाहिये ॥ ४२-४५ आमवात रोग | कट्यां व्यथा भवेन्नित्यं संधिषु श्वयथुर्भवेत् । उत्थाने प्यसमर्थत्वमामवातस्य लक्षणम् ॥४६॥ प्रतिदिन कमर में पीडा होना, सन्धेि स्थानों ( जोडों ) में सूजन होना और उठने बैठने में असमर्थता होना यह सब आम वात रोगके लक्षण हैं ॥ ४६ ॥ सामान्य उपाय | एरण्डतैलसंयुक्तं वातारिरसमेव च । आमवातप्रशांत्यर्थं ददीतोष्णेन वारिणा ॥४७॥ आमानिलस्यास्य रसोनिलारिचैरण्डतैलेन सकौशिकेन । कटुत्रयेणापि सगंधकेन वल्लैकमानं परिषेवयेत ॥ ४८ ॥ आमवातगजेंद्रस्य शरीरवन चारिणः । एक एवाग्रणीर्हता एरण्डस्नेहकेसरी ॥४९॥ आमवात रोगको शान्त करनेके लिये वातारि रसको<noinclude></noinclude> 0c6vdpwnvhb9bx51qcdjsf39c7v7ua5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४७ 104 165634 418224 2026-09-05T09:27:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६२५) अण्डीके तेल में मिलाकर गरम पानी के साथ सेवन करावे । अथवा आमवातके रोगीको अनिलारि रस, गूगल और अण्डीके तेलमें मिलाकर अथवा त्रिकुटा और शुद्ध गन्ध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418224 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६२५) अण्डीके तेल में मिलाकर गरम पानी के साथ सेवन करावे । अथवा आमवातके रोगीको अनिलारि रस, गूगल और अण्डीके तेलमें मिलाकर अथवा त्रिकुटा और शुद्ध गन्धक एक २ रची परिमाण सेवन करे । शरीररूपी जंगलमें विचरनेवाले, आमवात रूपी गजेन्द्र- को नष्ट करनेके लिये केवल अण्डीका तेल रूप सिंहही सर्वश्रेष्ठ है ॥ ४७-४९ ॥ अपस्मार रोग । मूच्र्छा शरीरस्य भवेदकस्माद्वात्रेषु कम्पश्च मुखे च फेनः । एवं त्वपस्मारगदं विदित्वा नियोजयेत्यर्पटिकाख्यसूतम् ॥ ५० ॥ मनुष्यको अकस्मात् मूर्च्छा (बेहोशी) आना, सम्पूर्ण शरीरका काँपना, भुखसे झागोंका निकलना और वायुकी अधिक प्रचलता के कारण शरीरका ऐंठना, संज्ञाशून्य होजाना आदि लक्षणों के द्वारा अपस्मार रोगका निदान करके वैद्य रोगीको उपर्युक्त पर्पटीरस सेवन करावे ॥ ५० ॥ सामान्य उपाय | पर्पटीरसगुंजे द्वे ब्राह्मीरससमन्विते । खादयेद्रोगिणं वैद्योपस्मारानिलशांतये ॥५१॥ ब्राह्मीशुंठी वचा कुठं नीलोत्पलस सैंधवम् । पिप्पलीमपि संचूर्ण्य ब्राह्मीद्वावेण भावयेत ॥५२ सप्तधा नवनीतेन पचेत्क्षिप्त्वा घृतं शुचि । वराहकर्णरक्तेन कर्कोटया नस्यमाचरेत् ॥ ५३ ॥ १ अकस्माज्जायते मूर्च्छा विकम्पश्च शरीरके। मुखान्निर्यातिफेनं च वादापस्मारलक्षणम् २ गुआष्टाविति पाठोपि ।<noinclude></noinclude> h1r3v9v8g0vs0sudpznc4d0zdt43v94 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४८ 104 165635 418225 2026-09-05T09:28:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । शुष्क गवाक्षीमादाय घृष्टं कांस्यं च कंबलम् । गोघृतेनाssयसं पिष्ट्वाऽप्यागते नस्यमाचरेत् ॥५४॥ श्वेतापराजिताबीज विजयाबीजमेव च । नरसूत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418225 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । शुष्क गवाक्षीमादाय घृष्टं कांस्यं च कंबलम् । गोघृतेनाssयसं पिष्ट्वाऽप्यागते नस्यमाचरेत् ॥५४॥ श्वेतापराजिताबीज विजयाबीजमेव च । नरसूत्रेण संपिष्य नस्यं दद्याद्विषम्वरः ॥५५ उन्मत्तकशुनोस्थीनि घृष्ट्वा तेनैव वा कुरु । श्वेता राजितामूलं कर्णे बद्धा सदा बुधः ॥ निगुण्डीमूलकं जग्ध्वा ह्यपस्माराद्विमुच्यते ॥३६ ॥ वैद्य, अपस्मार रोगको शयन करनेके लिये रोगीको, दो दो रत्ती परिमाण पर्पटीरस ब्राह्मीके स्वरस अथवा काथमें मिलाकर सेवन करावे | अथवा ब्राह्मी, सोंठ, वच, कूठ, नीलकमल, सैंधा नमक और पीपल इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके ब्राह्मीके रसमें ७ वार भावना देवे । फिर उस कल्कको ब्राह्मीके रसमें डालकर उसके साथ नैनी वृतको अथवा शुद्ध घृतको पकावे । अथवा सूअर के कानके रक्तमें अथवा वाँझककाडेके रसमें घृतको मिलाकर पकाने । जब घृत उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध हो जाय तब उसके नस्य देवे। अथवा ब्रा- ह्मीके रसमें सिद्ध किये हुए घृतमें सूअर के कानका रक्त अथवा वाँझक- कोडेका रस डालकर नस्य देवे । अथवा जांह्मीके रसमें सिद्ध किये हुए घृतको कुछ गरम करके उसकी २-३ बूँदे नाकमें टपकावे और बाँशक- कोडेके कन्दको सूअर के कानके रक्तमें भावना देकर सुखालेवे फिर बारीक पीसकर नस्य देवे तो अपस्मार रोग नष्ट होता है । अथवा सूखी इन्द्रायनकी जडको काँसीके बर्तनमें घिसकर नस्य देवे । अथवा मुर्दे की सफेद खोपडी छाती आदि अवयवोंपर घिसकर नस्य देवे, इससे १ कांचकम् । २ वलिं गोघृतेनाथेति पाठोपि । ३ बंदकम् ।<noinclude></noinclude> tfuw8me7ioxq1cr2w104p8ny7wmhy6d पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४९ 104 165636 418226 2026-09-05T09:28:27Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६२७) अपस्मार रोग नष्ट होता है । अथवा लोहभस्मको गायके घृतमें खरल करके नस्य देवे इससे अपस्मारका दौरा होनेपरभी लाभ होता है । या सफेद अपराजिता के बीजो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418226 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६२७) अपस्मार रोग नष्ट होता है । अथवा लोहभस्मको गायके घृतमें खरल करके नस्य देवे इससे अपस्मारका दौरा होनेपरभी लाभ होता है । या सफेद अपराजिता के बीजोंको और भाँगके बीजोंको मनुष्य के मूत्रमें पीसकर वैद्य रोगीको नस्य देवे । अथवा पागल कुत्ते की हड्डीको पानी में घिसकर नस्य देवे । किम्बा श्वेत अपराजिताकी जडको सदेव रोगी कानमें बाँधे और निर्गुडी की जडके चूर्णको सेवन करावे तो रोगी अपस्मार रोगसे मुक्त होजाता है ॥ ५१-९६ ॥ उन्माद रोग । बहुकृत्वः प्रलापश्च विस्मृतिः कार्यवस्तुषु । हति धावति सर्वत्रोन्मादवातस्य लक्षणम् ॥५७॥ बहुत वकना, किसी कार्य और किसी वस्तुका स्मरण न रहना, दूसरोंको मारना और जहाँ तहाँ दौडे २ फिरना ये सब उन्मादवान रोग (पागल मनुष्य ) के लक्षण हैं ॥ ५७ ॥ माहेश्वर धूप ! श्रीवेष्ट दारुवालीकं मुस्ता कटुकरोहिणी । सर्षपा नि पत्राणि मदनस्य फलं वचा ॥५८॥ बृहत् सनिर्मोकः कार्पासास्थि यवास्तुषाः । गोशृंगं खररोमाणि बर्हिपिच्छं बिडालविट् ॥ ५९ ॥ छागरोमघृतं चेतिं बस्तमूत्रेण भावयेत् । एष माहेश्वरो धूपः सर्वग्रह निवारणः ॥६०॥ लोबान, देवदारु, हींग, नागरमोथा, कुटकी, सरसों, नीमके पत्ते मैनफल, वच, कटेरी, बडी कटेरी, साँपकी केंचुली, बिनौलाकी गिरी, जौकी भूसी, गायका सींग, गधेके बाल, मोरपंख, विल्लीका विष्ठा,<noinclude></noinclude> lj0j4d77ttf7kveuafi3fyffj1fnoa2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५० 104 165637 418227 2026-09-05T09:28:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । बकरके बाल और बकरीका घी इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करके, फिर बकरके मूत्रमें भावना देवे | यह माहे- श्वर धूप सब प्रकार की ग्रहबा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418227 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । बकरके बाल और बकरीका घी इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करके, फिर बकरके मूत्रमें भावना देवे | यह माहे- श्वर धूप सब प्रकार की ग्रहबाधाओंका दूर करती है ॥ ६८-६० ॥ सामान्य उपाय । पर्पटीरस गुंजाष्टौ धनूराद्वीज पंचकम् । । गोघृतेन च संयोज्य खादेदुन्मादशतिये ॥ ६१॥ सघृतं माषमण्डं वा पाययेद् घृतदुग्धकम् निम्बतैलं समुद्धृत्य स्वभ्यज्यापादमस्तकम् ॥ ६२ ॥ गुर्वनं प्रायशो दद्याच्छुष्कमांसं च वर्जयेत् । बद्धापि रक्षयेत्तावद्यावच्छति स गच्छति । माहेश्वराख्यधूपं च दापयेत्सततं निशि || १३|| पपर्टरिस ८ रत्ती और धतूरेके बीज ५ दोनोंको एकत्र पीसकर गाय के घीमें मिलाकर सेवन करनेसे उन्मादरोग (पागलपन) दूर होता है । अथवा उडदोंके माण्डको या उडदोंकी पिट्ठीके रसको घी मिलाकर पान करावे, या घीको दूधमें मिलाकर पान करावे । नीमकी निबौलियोंका तेल निकालकर उसको सिरसे लेकर पैरोंतक शररिपर मले । और रोगीको प्रायः गुरुपाकी अन्नका भोजन करावे, किन्तु सूखा मांस कदापि न देवे। उन्माद रोगीको तबतक बाँधकर रक्खे. जबतक रोग बिल्कुल आराम न होजाय । उसको उपयुक्त माहेश्वर धूप प्रतिदिन रात्रिमें देनी चाहिये ॥ ६१-६३ ॥ एकाङ्ग वातरोग | एकस्मिन्देहदेशे च तोदः कायै चलात्मता । हिमस्पर्शश्च दृश्येतैकांगवातस्य लक्षणम् ॥६४॥<noinclude></noinclude> 2qqgnqynri008beb2gxke45w9ps3dug पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५१ 104 165638 418228 2026-09-05T09:30:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । ( ६२९) शरीर के किसी एक भागमें सुई चुभोने के समान पीडा होना प्रतिदिन शरीरका दुर्बल होना, अंगका फडकना और वह स्थान स्पर्श करनेसे शीतल मालूम होना ये एका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418228 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भापाटीकोपेतः । ( ६२९) शरीर के किसी एक भागमें सुई चुभोने के समान पीडा होना प्रतिदिन शरीरका दुर्बल होना, अंगका फडकना और वह स्थान स्पर्श करनेसे शीतल मालूम होना ये एकांग वासके लक्षण जानने ॥ ६४ ॥ वडवानल रस । शुल्वं तालकगंधकौ जलनिधेः फेनाग्रिगर्भाशयैः कांतायोलवणानि हेमवचयोनीलांजनं तुत्थकम् । भागो द्वादशको रसस्य तदिदं वांबुघृष्टं शनैः सिद्धोऽयं वडवानलो गजपुटे रोगानशेषाञ्जयेत। ६५/ आर्द्रकस्य द्रवैश्वाएं दशवाराणि भावयेत ॥ ६६ ॥ दिनद्वयं चित्रकस्य द्रावेणैव तु भावयेत । पादशममृतं दत्त्वा चित्रद्वावैः क्षणं पवेत् । मात्रया योजयेचानु दशमूलम्भृतं पयः ॥ ६७ ॥ वातश्लेष्मप्रधाने च दद्यात्रयृपण चित्रकम् । स्वेदं च कटुबिन्या प्रयुंजीतातियत्नतः ॥ ६८ ॥ • दाहं च जयंया कुर्याच्छीतवातं च वर्जयेत् ॥ ६९ ॥ ताम्र भस्म, शुद्ध हरताल, शुद्ध गन्धक, समुद्रफेन, सूर्यकान्तमणिकी अम, लोहभस्म, पाँचों नमक, सुवर्णभस्म, वच, काला सुरमा, तूतिया और पारा इन बारहों औषधियोंको समान भाग लेकर प्रथम पारे गन्धककी कज्जली करले, फिर सब औषधियों को चूर्णकर कज्जलीमें मिलाकरके थूहर के इसकी एक भावना देवे और गजपुटमें रखकर पकावे । स्वांगशीतल होने पर औषधिको निकालकर बारीक पसिलेवे । १ जंघयोरिति पाठः<noinclude></noinclude> 6p35ly3avqv43p541n3cxdnt6t9rd20 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५२ 104 165639 418229 2026-09-05T09:31:02Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३० ) रसरत्नसमुच्चयः । फिर अदरख के रस में १० बार भावना देकर दो दिनतक चीतेके रस में घोटे । इसके पश्चात् उसमें चौथाई भाग शुद्ध मीठा तेलिया मिलाकर कुछ देर चीतेक काथमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418229 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६३० ) रसरत्नसमुच्चयः । फिर अदरख के रस में १० बार भावना देकर दो दिनतक चीतेके रस में घोटे । इसके पश्चात् उसमें चौथाई भाग शुद्ध मीठा तेलिया मिलाकर कुछ देर चीतेक काथमें पकावे । इस प्रकार यह वडवानल रस सिद्ध होता हैं । यह सम्पूर्ण रोगोंको हरनेवाला है। इसको उपयुक्त मात्रा दशमूलके काढमें पकाये हुए दूधके साथ देवे । इससे एकाजबात दूर होता है | एकांगवातमें वायु और कफकी प्रबलता होनेपर इस रसको त्रिकुटा और चर्तिके चूर्णके साथ प्रयोग करे । एकांग वातके रोगीको कडवी तांबीके चूर्ण की पोटलीसे स्वेद देना चाहिये और भाँगकी पोट- लीसे सेंक करना चाहिये रोगीको समस्त शीतल पदार्थ व उपचार और खुली वायुका सेवन त्याग देना चाहिये ॥ ६५-६९ ॥ मार्तण्डेश्वर रस । समताप्ययुतं शुल्ब पलविंशतिमानकम् । प्रध्यातं हि चतुर्वारं खण्डयित्वा ततश्चरेत् ॥ ७० ॥ तत्तुल्यं माक्षिकोपेतं घुटेद्विंशतिवारकम् । गंधकेन पुटेत्तावद्वीयात्तत्पलं ततः ॥ ७१ ॥ क्षिपेत्पलमितं तत्र गंधकेन हृतं रसम् ॥ ७२ ॥ शाणमात्रं मृतं वज्रं सर्वमेकत्र मर्दयेत् । इति सिद्धो रसेंद्रोऽयं मार्तडेश्वरनामवान् ॥ ७३ ॥ कीर्तितो लोकनाथेन लोकानां हितकाम्यया । मरीचघृतसंयुक्तः सेवितो मण्डलाधतः ॥ ७४ ॥ १ यावत्पनमितं भवेत् ।<noinclude></noinclude> 6xlpu8166wyprgq34xmk1a9ya1umgz8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५३ 104 165640 418230 2026-09-05T09:32:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । वाताद्यष्टमहारोगाञ्छ्वासकासयुतं क्षयम् । ( ६३१ ) हलीमकं च पांडुं च ज्वरानपि सुदुस्तरान् ॥७५॥ इत्यादिकगदान्सर्वान्विनाशयति निश्चितम् करोति दी... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418230 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । वाताद्यष्टमहारोगाञ्छ्वासकासयुतं क्षयम् । ( ६३१ ) हलीमकं च पांडुं च ज्वरानपि सुदुस्तरान् ॥७५॥ इत्यादिकगदान्सर्वान्विनाशयति निश्चितम् करोति दीपनं तीव्रं दीपानलशतोपमम् ॥७६॥ संनिपातं जयत्याशु व्योषाईकसमन्वितः । सर्वसौख्यकरो नॄणां स्त्रीणां वंध्यत्वनाशनः ॥७७॥ सुवर्णमाक्षिकका चूर्ण २० पल और शुद्ध ताँवेके कंटकवेधी पत्र २० पल (८० तोले ) लेवे । एक हाँडीमें ऊपर, नीचे सोनामाखीका चूर्ण और बीचमें ताम्रपत्र रखकर उसपर कपरौटी करके ४ महर तक भट्टी में पकावे । शीतल होनेपर पत्रको निकालकर खरल करे । इसप्रकार सोनामाखीके चूर्णके साथ ताम्रपत्रोंको चार बार फूँके । फिर उस ताम्र भस्म के बराबर सोनामाखीका चूर्ण प्रत्येक चार मिलाकर और प्रत्येक बार कॉजी में पीसकर २० बार गजपुट देवे । इसके पश्चात् ताम्र भस्म का जितना वजन हो उतनेही पल गन्धक उसमें मिलाकर और काँजीमें घोटकर पूर्ववत् २० गजपुट देवे । फिर उसको बारीक पीस- कर ४ तोले परिमाण लेकर उसमें गन्धकके द्वारा जारण किया हुआ पारा ४ तोले और हीरेकी भस्म ४ मासे मिलाकर खूब बारीक खरल करे और कपड़छान करके शीशीमें भरकर रखदेवे इस प्रकार यह मार्त्तण्डेश्वर रस सिद्ध होता है। इसको श्रीलोकनाथजीने समस्त लोकोंका कल्याण करने की इच्छासे वर्णन किया है। यह रस प्रतिदिन मिरचोंके चूर्ण और घृतमें मिलाकर २० दिनतक सेवन करनेसे वातव्याधि, कुष्ठ प्रमेह आदि आठों महारोग, श्वास, खाँसी, क्षय, हलीमक, पाण्डुरोग और<noinclude></noinclude> ojahm3i9tb5zzgjbzxugb3yuydl671k पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५४ 104 165641 418231 2026-09-05T09:32:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भयंकर ज्वर इत्यादि सम्पूर्ण व्याधियोंको अवश्य नाश करता है। जठरा- निको सैकडों दीपकों के तेजके समान प्रदीप्त करता है । इस रसको त्रिकुटा और अ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418231 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भयंकर ज्वर इत्यादि सम्पूर्ण व्याधियोंको अवश्य नाश करता है। जठरा- निको सैकडों दीपकों के तेजके समान प्रदीप्त करता है । इस रसको त्रिकुटा और अदरख के रसके साथ सेवन करनेसे सन्निपात शीघ्र दूर होता है | मनुष्यों को सब प्रकारका शारीरिक सुख प्राप्त होता है और स्त्रियोंका वन्ध्यत्व दोष नाश होता है ।। ७०-७७ ॥ चतुः तुषारसः ! समभागे शुभे हेत्रि निर्व्यूढं ताप्यमुत्तमम् । शतधा शतधा रौप्ये शुल्बे च शतवारकम् ॥७८॥ इत्थं सिद्धामंदबीजं पृथगक्षप्रमाणतः । समावर्त्य तदेकत्र रसे पञ्चपलात्मके । वक्ष्यमाणप्रकारेण जारयेदतियत्नतः ॥७९॥ तप्ते खल्वे रसं दत्त्वाबीजं निष्कमितं तथा । मर्दयेदतियत्नेन भवेद्यावदिनत्रयम् ॥८०॥ पूर्वोक्तकच्छपे यंत्रे वक्ष्यमाणबिडान्विते । वक्ष्यमाणप्रकारेण बीजमेवमशेषतः ॥८१॥ बलिकासीसकव्योमकांक्षीसौवर्चलैः समैः । चक्रांगीरससंभिन्नैः शतधा बिडमत्र तत् ॥ ८२॥ एवं जातिसुतेन पलमात्रेण तावता । गंधकेन च कर्त्तव्या सुस्निग्धा वरकजली ॥८३॥ लोहपात्रे घृतोपेतां द्रावयेत्तां तु कन्जलीम् ॥८४॥ तुल्य सत्त्वाभ्रभसितं क्षित्वा संमिश्रय सर्वशः । रंभापत्रे विनिक्षिप्य कुर्यात्पपेटिकां शुभाम् ॥८५॥<noinclude></noinclude> qf5ahz0ub9pufpn4w9m0zodnmjgbjj3 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५५ 104 165642 418232 2026-09-05T09:33:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६३३) विचूर्ण्य पर्पटी सम्यग्वैक्रांतस्त्रिंशदशतः । निक्षिप्य हिंगुतोयेन शतधा परिभाषितम् ॥८६॥ निरुष्य मलमुषायां स्वेदयेदतियत्नतः । पुनः संच... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418232 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६३३) विचूर्ण्य पर्पटी सम्यग्वैक्रांतस्त्रिंशदशतः । निक्षिप्य हिंगुतोयेन शतधा परिभाषितम् ॥८६॥ निरुष्य मलमुषायां स्वेदयेदतियत्नतः । पुनः संचूर्ण्य यत्नेन करण्डे विनिवेशयेत् ॥८७॥ हन्यात्सर्वमरुद्गदान्दायगदं पाण्डं च नष्टानितां निर्वीर्यत्वमरोचकं त्वजरणं शूलं च गुहमादिकम् । अष्टा चैव महागदानतितरां व्याधिं संशोषं क्षणा- डुक्को मुदुभितश्चतुःसुधरसः स्वस्थोचितो भ्रूभ्रूजाम् | ८८ मूलकं वर्जयेदस्मिन् रखे नान्यच किंचन । त्रिवारमेकवारेणं बुभुक्षां जनयेद्र ध्रुवम् ॥८९॥ बढिया सोने को लेकर उसमें समान भाग सोनामाखीका चूर्ण मिला. कर भूषामें बन्द करके फूँके । जब सोनामाखीका समस्त चूर्ण उड- जाय और सुवर्णमात्र शेष रहजाय तब मूबाको ठंडा करके फिर उस सुवर्णमें समान भाग सोनामाखीका चूर्ण मिलाकर सूषामें फूँके । इस प्रकार बारम्बार सोनामाखीका चूर्ण मिला २ कर १०० बार सुवर्ण- को फूँके । फिर उसको सम्हालकर रखदेवे । इसके पश्चात् जिवना सोना लिया हो उतनीही चाँदी लेकर उसमें समभाग सोनामाखीका चूर्ण मिलामिलाकर उसी विधिसे १०० बार चाँदीको फूँके और फिर संभालकर रखदेवे । इसी विधिसे ताँबेमें समान भाग सो- नामाखका चूर्ण मिला मिलाकर १०० बार फूँके और संभालकर रखदेवे । इस प्रकार तैयार की हुई धातुओंको धातुबीज कहते हैं । जिस धातुको १०० बार फूँककर बीज सिद्ध किया जाता है। १ अशेषान् । २ रूपेण ।<noinclude></noinclude> gsbiriuwfm32dqkt419ixk1fuuolq8f पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५६ 104 165643 418233 2026-09-05T09:33:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३४ ) रसरत्नसमुच्चयः । वह बीज उसी धातुके नामसे पुकारा जाता है, जैसे सोने का सुवर्ण- बीज, चाँदीका रौप्यवीज आदि । उपर्युक्त विधिसे तैयार किया हुआ सुवर्ण बीज१तोला, रौ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418233 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६३४ ) रसरत्नसमुच्चयः । वह बीज उसी धातुके नामसे पुकारा जाता है, जैसे सोने का सुवर्ण- बीज, चाँदीका रौप्यवीज आदि । उपर्युक्त विधिसे तैयार किया हुआ सुवर्ण बीज१तोला, रौप्यबीज १ तोला और ताम्रवीज १ तोला लेकर तीनोंको एकत्र करके खूब बारीक खरल करे । फिर एक तप्तखल्वमें २० तोले पारा और ३ मासे यह धातुवीज डालकर ३ दिन तक बडे यत्न के साथ मर्दन करे और खरलके नीचे मन्द मन्द अभि जलाता जाय फिर उसमें २० सोले निम्नलिखित विड डालकर तबतक मर्दन करे जबतक पारा मिलकर एकम एक होजाय । फिर यन्त्राध्यायमें कहे हुए कच्छपयन्त्रमें इस पारेको डालकर बीजको जारण करे । फिर पारेमें ३ मासे बीज और २० ताले बिडको ३ दिनतक मर्दन करके कच्छपयन्त्रमें जारण करे । इस प्रकार प्रत्येक बार बीज और बिड डाल २ कर १२ बार जारण करे। फिर गन्धक, कसीस, अभ्रक, फटकरी और विरिया संचरनमक इनको पारेके समान भाग लेकर कुटकी के रसमें खरल करके पारेमें मिलाकर और तीन मासे चिड डालकर जारण करताजाय । इस प्रकार सौ बार उक्त औषधि और बिड मिलाकर १०० बार जारण करे । इस विधिसे जब ३ तोले बीजका जारण होजाय तो इसको बीजजारित पारा कहते हैं । इस प्रकार जारण किया हुआ पारा : ताले और शुद्ध गन्धक ४ तोले लेकर दोनोंकी एकत्र कन्जली करलेवे । फिर लोहे की कढाई में घी चुपड़कर उसमें कज्जलीको डालकर पिघलावे जब वह अच्छे प्रकार से पिघल जाय तब उसमें ८ तोले सहस्रपुटित अभ्रक डालकर करछी से मिलादेवे और केले के पत्तेपर ढालकर पर्पटी तैयार करलेवे । शीतल होजानेपर उसको बारीक पीसकर उसमें ३० वाँ भाग वैकान्तमणिकी भस्म मिलाकर हींगके इसमें सौ बार भावना देवे और मल्लभूषामें बन्द<noinclude></noinclude> d0og7512k9dk8uq9wshtr1gcodrv8th पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५७ 104 165644 418234 2026-09-05T09:33:59Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६३५) ३ घंटेतक मन्द मन्द अग्निसे पकावे । स्वांगशीतल होनेपर इसको बारीक चूर्ण कर के शीशीमें भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ मूँगके बराबर सेवन करे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418234 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६३५) ३ घंटेतक मन्द मन्द अग्निसे पकावे । स्वांगशीतल होनेपर इसको बारीक चूर्ण कर के शीशीमें भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ मूँगके बराबर सेवन करे यह रस सब प्रकार के वातरोग, क्षय, पाण्डु, मन्दाग्नि, वर्यिकी हीनता, अरुचि, अजीर्ण, शूल, गुल्म, आठों महारोग और धातुशोष आदि अत्यन्त भयंकर व्याधियोंको तत्काल नष्ट करता है और राजाओंके स्वास्थ्यको सुरक्षित रखनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है । यह निवार्य मनुष्यको वीर्यवान् बनाता है। इस रसके सेवन करनेपर केवल मूली नहीं खानी चाहिये और सब चीजें खानी चाहिये। यह रस तीन दिन अथवा १ दिन खानेसे ही अग्निको अत्यन्त दीपन कर खूब भूख लगाता है ॥ ७८-८९ ॥ सर्ववातारि रस । गंधकद्विगुणं तालं तालकाद्दिगुणा शिला । शिलाया द्विगुणं ताप्यं ताप्याच्च द्विगुणं रसम् ॥९०॥ खल्वयेत्सर्वमेकत्र यावत्स्याद्दिनसप्तकम् । सर्वस्याष्टमभागेन दत्त्वा रक्तामृतं शुभम् ॥ ९९ ॥ विषतिंदुक द्रवैः पिट्वा गोलकमाचरेत् । विशोष्य वालुकायंत्रे अंधदिवसद्वयम् ॥ ९२ ॥ स्वांगशीतलमुद्धृत्य तुल्यहिंग्वाष्टकान्वितम् भावयेद्वीजपूरस्य सप्तवारं रसेन हि ॥ ९३ ॥ सप्तवारं रसैः शुंठ्या चित्रमूलस्य वारिणा । इति सिद्धो रसेंद्रोऽयं सर्ववातारिसंज्ञकः ॥ ९४ ॥ घृतेन सहितो लीढो वलयमितों नृभिः ।<noinclude></noinclude> t1ptjsqbasyqk0v2l7vy09j74p70nsu पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५८ 104 165645 418235 2026-09-05T09:34:25Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ -- (६३६) रसरत्नसमुच्चयः । निहत्यशीतिवातार्तीगुल्मानष्टविधानपि ॥ ९५ ॥ चतुर्विधं च मंदाग्रिं शूलानुदरजान् क्रिमीन् । आध्मानं च तथा हिक्कां मूढवातं च विग्रहम् ॥ ९... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418235 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>-- (६३६) रसरत्नसमुच्चयः । निहत्यशीतिवातार्तीगुल्मानष्टविधानपि ॥ ९५ ॥ चतुर्विधं च मंदाग्रिं शूलानुदरजान् क्रिमीन् । आध्मानं च तथा हिक्कां मूढवातं च विग्रहम् ॥ ९६ गन्धक १ भाग, हरताल २ भाग, मैनसिल ४ भाग, सोनामाखी ८ भाग, और पारा १६ भाग लेकर सबको एकत्र करके सात दिन तक खरल करे । फिर सम्पूर्ण रसका आठवाँ भाग लाल वत्सनाभ मिला- कर कुचलेके रस में खरल करके गोला बनालेवे । उसको सुखाकर मूषामें बन्द करके दो दिनतक बालुकायंत्र में पकावे । स्वांगशीतल होनेपर गोलेको निकालकर चूर्ण करलेवे । उसमें हिंग्वाष्टक चूर्ण (सोंठ, मिरच, पीपल, अजमोद, जीरा काला जीरा, सेंधानमक और हींग इन सबको समान भाग चूर्णको हिंग्वाष्टक चूर्ण कहते हैं ) को समान • भाग मिलाकर बिजौरा नींबूके रसमें सात बार भावना देवे, फिर सात भावना सोंठ के रसमें और ७ भावना चीतेके रसमें देकर सुखा- • लेवे । इस प्रकार यह सर्ववातारि रस तैयार होता है । इसको प्रतिदिन दो २ रत्ती परिमाण घृतमें मिलाकर सेवन करना चाहिये यह रस अस्सी प्रकारके वातरोग आठ प्रकारके गुल्मरोग चार प्रकारकी मन्दाभि, सब प्रकारके उदरसम्बन्धी शूल, कृमिरोग, अफरा, हिचकी मूढबात और मलबद्धता इन सब रोगोंको नष्ट करता है ॥९०-९६ ॥ वातविध्वंसन रस । मृतमभ्रकसत्वं च कांस्य शुल्बं हि माक्षिकम् । गंधकं तालकं सूतं भागोत्तरविवर्धितम् ॥ ९७ ॥ तत्सर्वं कज्जलीकृत्य वातारि स्नेहसंयुतम् । मर्दयेत्सप्त दिवसं गोलीकृत्य तु यत्नतः ॥ ९८ ॥<noinclude></noinclude> 3m6yq9dar4l2oqjoxtxgi6egpy3xrh6 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५९ 104 165646 418236 2026-09-05T09:34:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । (६३७) निंबुद्रावेण संपिष्ठातालकल्केन लेपयेत् । अर्धागुलदलं चैव परिशोष्य प्रयत्नतः ॥ ९९॥ प्रपचेद्वालुकायंत्रे यामानां द्वादशावधि । पटचूर्ण व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418236 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटी कोपेतः । (६३७) निंबुद्रावेण संपिष्ठातालकल्केन लेपयेत् । अर्धागुलदलं चैव परिशोष्य प्रयत्नतः ॥ ९९॥ प्रपचेद्वालुकायंत्रे यामानां द्वादशावधि । पटचूर्ण विधायतद्भावयेत्तदनंतरम् ॥१००॥ पंचकोलकचित्रांत्रिवरुणादिकषायतः । दशमूलकषायेण शृंगवेररसेन च ॥ १०१ ॥ रक्तामृतं कलांशेन दत्त्वा निष्पिष्य यत्नतः स्थूलकोलास्थितुलितां छायाशुष्कां वटीं किरेत् १ ० तत्तद्रोगहरैर्दव्यैर्नृणां देया सदा हिता । हन्यादशीतिधा भिन्नान्वातजातान्महागदान ॥ १०३ ॥ गुल्मानष्टविधांश्चापि शूलानष्ट विधानपि । जठरस्य रुजः सर्वास्तथा च मलनिग्रहम् ॥ १०४ ॥ आध्मानकमथानाहं विषूचीं मंदवह्निताम् । आमदोषानशेषांश्च गुल्मं छर्दि च दुर्धराम् ॥ १०५ ॥ ग्रहणीं श्वासकासौ च कृमिरोगमशेषतः । हन्यात्सर्वागसदनं मन्यास्तंभं च वाजिनाम् ॥१०६॥ ज्वर चैवाऽतिसारे च मूलरोगे त्रिदोषजे । पथ्यं रोगानुरूपेण दापनीयं भिषग्वरैः ॥ १०७॥ श्रीमता नंदिना प्रोक्तो वातविध्वंसनोरसः । क्षुधार्थिभिः सदा सेव्यः सर्वाहारपरैर्नरैः ॥१०८॥ अकका सत्त्व १ भाग, कांसेंकी भस्म २ भाग, ताँबेकी भस्म ३<noinclude></noinclude> o6wckk2g1pbcspasa78zrs599zkik2o पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६० 104 165647 418237 2026-09-05T09:35:23Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग, सोनामाखी की भस्म ४ भाग, गन्धक ५ भाग, हरताल ६ भाग, और पारा ७ भाग. इस क्रमसे प्रत्येक औषधिको एक २ भाग बढाकर लेवे। सबको एकत्र खरल करके कज्जली... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418237 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग, सोनामाखी की भस्म ४ भाग, गन्धक ५ भाग, हरताल ६ भाग, और पारा ७ भाग. इस क्रमसे प्रत्येक औषधिको एक २ भाग बढाकर लेवे। सबको एकत्र खरल करके कज्जली करलेवे फिर उसको अण्डीके तेल ७ दिनतक घोट कर गोला बनालेवे । उस गोले के ऊपर नींबूके रसमें घोटकर कल्क की हुई हरतालका आधा अंगुल ऊँचा लेप करके सुखालेवे । फिर गोलेको अण्डके पत्तोंमें लपेटकर शरावसम्पुट बन्द करके १२ प्रहर तक वालुका यंत्र में पकावे । स्वांगशीतल होनेपर गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण करके कपड़छान करलेवे । फिर उसको पंचकोलका काथ, चीतेकी जडका काथ वरुणादि गणकी औषधियों का क्वाथ, दशमूलका काढा और अदरखका रस प्रत्येकमें क्रमसे एक २ बार भावना देकर १६ वाँ भाग लाल वत्सनाभ डाल. = कर खूब बारीक खरल करे और दो २ रत्तीकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे । ये गोलियाँ भिन्न भिन्न रोगनाशक भिन्न भिन्न अनुपानोंके साथ रोगियोंको सेवन करानी चाहिये । अस्सी प्रकार के भिन्न भिन्न वातरोग, आठों महारोग, आठ प्रकारका गुल्म, आठ प्रकारका शूल, सब प्रकारका उदररोग, मलबद्धता, अफरा, आनाह, विषूचिका, मन्दाग्नि, आमदोष, गुल्म, वमन, दुस्तर संग्रहणी, श्वास, खाँसी, सम्पूर्ण कृमिरोग, सर्वाङ्गगत पीडा, नाडीका जकड जाना और मनुष्याक अतिरिक्त घोडोंकी नाडीका जकड जाना इन समस्त व्याधियोंको यह रख शीघ्र नष्ट करता है । ज्वर, अतिसार, अर्शरोग और सन्निपातमें इस रसको रोगानुसार अनुपानकें साथ देना चाहिये और तदनुसार ही पथ्प दिलवाना चाहिये । इस वातविध्वंसन रसको श्रीनन्दि आचार्यने वर्णन किया है। खूब भूख लगने की इच्छा वाले और सब प्रकारके भारी व हल्के पदार्थों का आहार विहार<noinclude></noinclude> ormdfvudkagglb92zll3qyy91kavhj7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६१ 104 165648 418238 2026-09-05T09:35:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६३९) करनेवाले मनुष्यों को यह रस सदैव सेवन करना चाहिये ॥९७-१०८ ॥ वृकोदरी वटी (रस) 1 सूतगंधकतीक्ष्णाः सताप्यैः समभागिकैः । राशमपरं सर्व पोलं जीरकद्व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418238 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६३९) करनेवाले मनुष्यों को यह रस सदैव सेवन करना चाहिये ॥९७-१०८ ॥ वृकोदरी वटी (रस) 1 सूतगंधकतीक्ष्णाः सताप्यैः समभागिकैः । राशमपरं सर्व पोलं जीरकद्वयैम् ॥ १०९ ॥ सौवर्चलं ससिवृत्थं विडंगं च हरीतकी । अम्लवेतसकं सर्व बीजपूरातुमर्दितम् ॥ गुटिकास्तेन कल्केन कार्याः कोलास्थिमात्रका ः ११०॥ योगिन्या बहुघातिनामयुतया त्रैलोक्यविख्यातया निर्दिष्टा हि वृकोदरीति गुटिका सोष्णांबुनासेविता । निःशेषानिलदोषशोषजरुजः श्लेष्मामरोगोद्भवं मंदाग्रिहणी चतुर्विधमहाजीर्ण च तूर्णं जयेत् १११ पारा, गन्धक, लोहा, अभ्रक और सोनामाखी सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करलेवे। फिर उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, पीपला- मूल, चव्य, चीता, जीरा, काला जारा, काला नमक, सैंधा नमक, वायविडङ्ग, हरड और अम्लवेत इन प्रत्येकक चूर्णको पारेके बराबर भाग लेकर समान भागसे मिलादेवे और बिजौरे नींबू के रस में घोटकर छोटे बेरकी गुठलीके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियों को त्रिलोकीमें प्रसिद्ध बहुघाती नामक योगिनीने निर्दिष्ट किया है । यह वृके।- दरी वटी प्रतिदिन गरम जलके साथ सेवन करनेस सब प्रकार के वात- रोग, शोषरोग, कफरोग, आमविकार, मन्दाग्नि, संग्रहणी और चार प्रकारका भयंकर अजीर्ण इन सम्पूर्ण रोगोंको शीघ्र दूर करता है ॥ १०९-१११ ॥<noinclude></noinclude> jl89ishiohdv664ddjobhpck6p5ki4v पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६२ 104 165649 418239 2026-09-05T09:36:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४० ) रसरत्नसमुच्चयः । प्रभावती वटी (रस) । मात्रा कतीक्ष्णता प्यकमलाश्चैषां समं सप्तकं सृतं च द्विगुणं विशोधन वधूसुग्वह्निसौभांजनात् ॥ पाठासूरणसिंदुवार विजय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418239 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६४० ) रसरत्नसमुच्चयः । प्रभावती वटी (रस) । मात्रा कतीक्ष्णता प्यकमलाश्चैषां समं सप्तकं सृतं च द्विगुणं विशोधन वधूसुग्वह्निसौभांजनात् ॥ पाठासूरणसिंदुवार विजयैरण्डद्रवैर्मदितं तैलं कंगुणिगंधकं कटुभवे कल्के वटीं कल्पयेत् ११२ प्रभावतीति कथिताऽऽर्द्रकद्रावैर्निषेविता । ततश्वानुपिवेत्तोयं दशमूलप्रसाधितम् ॥ ११३ ॥ सपिप्पलीकं पिबतो जलं जये-- मरुद्विकारानुदराण्यपस्मृतिम् ॥ ११४ ॥ सुवर्णभस्म, अभ्रकभस्म, हरतालभस्म, लौहभस्प, सोनामाखीकी भस्म और मण्डूर भस्म ये प्रत्येक एक २ भाग और पारा २ भाग इन सबको एकत्र खरल करके असवरग, थूहर चीता, सैंजना, पाठ, जिमीकन्द, सिह्नालु, भाँग और अण्डकी जड इन प्रत्येक औषधिक स्वरस या क्वाथमें क्रमसे पृकुक् पृथक् घोटकर सुखालेवे फिर मालकां- गनीके तेल, गन्धकके तेल और सरसों के तेलमें अलग २ खरल करके दो २ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको प्रभावती वटी कहते हैं । इस रसकी प्रतिदिन एक २ गोली अदरखके रसके साथ खाकर ऊपर से दशमूलका काढा पिये अथवा दशमूलके काढेमें पीपलका चूर्ण डाल- कर पान करे तो वायुके विकार उदररोगे और अपस्मार रोग दूर होते हैं ॥ ११२-११४ ॥ स्वच्छन्दभैरव रस । तीक्ष्णायस्कांत गोदतमाक्षिकैमर्दितो रसः ॥ समांशगंधकः पक्को इंडिकायंत्रमध्यगः ॥ ११५ ॥<noinclude></noinclude> 4youd7oavdjn0xkkgrnz9hqobxyiq7l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६३ 104 165650 418240 2026-09-05T09:36:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । व्योषाग्रिमंथसुरसाकंद श्रृंग्यभयाविषैः । ( ६४१ ) समैः समं त्र्यहं मुंडी निर्गुडीरसपिण्डितः ॥ ११६॥ सेवितः शमयेद्वातान्नाना स्वच्छंदभैरवः । वि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418240 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । व्योषाग्रिमंथसुरसाकंद श्रृंग्यभयाविषैः । ( ६४१ ) समैः समं त्र्यहं मुंडी निर्गुडीरसपिण्डितः ॥ ११६॥ सेवितः शमयेद्वातान्नाना स्वच्छंदभैरवः । विशेषाद्वातरक्तं च द्विवलं चाईकर्ददेत् ॥११७॥ तीक्ष्णलोकी भस्म, कान्तलोहभस्म, गोदन्ती हरताल, सोनामा- खोकी भस्म, पारा और गन्धक सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके कजली करले उसको शरावसम्पुटमें बन्द करके ऊपर से कपरौटी कर भाण्डपुटमें रखकर तीन घंटेतक पकावे । स्वांगशीतल होनेपर औषधिको निकालकर वारीक चूर्ण करलेवे । उसमें त्रिकुटा, अरणीकी जड, तुलसी, सुहागा, काकडासिंगी, हरड और वत्सनाभ इन समस्त औषधियों को समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके रसके बराबर भाग मिलादेवे और गोरखमुंडी तथा निर्गुण्डीके रसमें क्रमसे तीन २ दिन तक भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको प्रतिदिन अदरख के इसके साथ सेवन कराना चाहिये । यह स्वच्छन्द भैरव रस सेवन करतेही वातरोग और विशेषकर वातरक्त रोगको शान्त करता है । ११५-११७ ॥ अन्य स्वच्छन्दभैरव रस । शुद्धं सुतं मृतं लोहं ताप्यगंधकतालकम् । पथ्याग्निमंथनिर्गुडीत्र्यूषणं टंकणं विषम् ॥ ११८ ॥ तुल्यांशं मर्दयेत्खल्वे दिनं निर्गुडिकाद्रवैः । मुण्डीद्रावैदिकं तं द्विगुंजं वटकीकृतम् ॥ ११९॥ भक्षयेत्सर्ववातात नाना स्वच्छंद भैरवम् ॥१२०॥ शुद्ध पारा, लोहभस्म, सुवर्णमाक्षिक की भस्म, गन्धक, हरताल, हरड, अरणी, निर्गुण्डी, त्रिकुटा, सुहागा और वत्सनाभ सबको समान २३<noinclude></noinclude> k6um9iyzeu6sdvx7h9ajftsejgsaobf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६४ 104 165651 418241 2026-09-05T09:37:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके निर्गुण्डी के रसमें एक दिन तक खरल करे । दूसरे दिन गोरखमुंडीके इसमें घोटकर उसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418241 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके निर्गुण्डी के रसमें एक दिन तक खरल करे । दूसरे दिन गोरखमुंडीके इसमें घोटकर उसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । सब प्रकारकी वातव्याधिसे पीडित रोगीको यह स्वच्छन्द भैरव रस सदैव सेवन करना चाहिये ॥ ११८-१२० ॥ वडवानल रस । सुतहारकवार्ककांतभस्म समाक्षिकम् तालं नीलांजनं तुथर्मा धफेन समसिकम् ॥ १२१ ॥ पंचानां लवणानां तु भागेकैकं विमर्दयेत् । वज्रक्षीरैर्दिनैकं तु रुद्धा तं भूधरे घुटेत् ॥ १२२ ॥ माषैकं चाद्रकद्रावैलैहयेद्वडवानलम् । पिप्पलीमूलजं काथं सपिप्पल्यनुपाययैत् । धनुर्वातं दण्डवातं शृंखलाकम्पवातनुत् ॥ १२३॥ पारा, सुवर्ण भस्म, हीरेकीभस्म, ताम्रभस्म, कान्तलोह भस्म, सोना- माखीकी भस्म, हरताल, काला सुरमा, तृतिया, समुद्रफेन, सैंधानमक काला नमक, समुद्रनमक, विरियासंचर नमक, और काचेयानमक इन सबको एक तोला लेकर एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्ण को थूहर के दूधमें एक दिन तक मर्दन करके गोला बनाले और उसको सम्पुटमें बन्द करके भूधरयन्त्रमें रखकर पकावे । स्वांगशीतल होनेपर गोलेको निकालकर बारीक पीस लेवे । इस रसको प्रतिदिन एक२ मासा परिमाण अदरख के साथ सेवन करे और ऊपर से पपिलका चूर्ण मिलाकर पीपल मूलका काय पान करे। इसके सेव- नसे धनुर्वात, दण्डवात, शृंखलावात और कम्पवात नष्ट होता है। ॥ १२१-१२३ ॥<noinclude></noinclude> cwg2ybx2rq0cic69or118lz8g7myykp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६५ 104 165652 418242 2026-09-05T09:37:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६४३ ) त्र्यम्बकेश्वर रस | सूतकस्य पलं पञ्च पलकं ताम्रचूर्णकम् । जंबीराणां द्रवैः पिष्ट सूततुल्यं च गंधकम् ॥ १२४॥ arrange: पिष्टं ताम्रपिष्टं प्रकल्प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418242 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६४३ ) त्र्यम्बकेश्वर रस | सूतकस्य पलं पञ्च पलकं ताम्रचूर्णकम् । जंबीराणां द्रवैः पिष्ट सूततुल्यं च गंधकम् ॥ १२४॥ arrange: पिष्टं ताम्रपिष्टं प्रकल्पयेत् । ह्रद्धा लघुपुटैः पच्याद्भूधरे यामपञ्चकम् ॥ १२५ ॥ आदाय चूर्णयेत्तुल्यैरुयूषणैः सममिश्रितैः । अर्धी कंपवातात भक्षयेच्च द्विगुंजकम् ॥ १२६ ॥ शुद्ध पारा २० तोले, ताम्र भस्म ४ तोले और शुद्ध गन्धक २० तोले लेकर प्रथम पारे गन्धकी कज्जली करले फिर उसमें ताम्र भस्म डालकर जम्बीरी नींबू के रसमें खूब खरल करे फिर सुखाकर पानोंके रसमें घोटकर गोला बना लेवे । उस गोलेको ताँबे के सम्पुट चन्द करके भूवरयंत्र में रखकर पाँच प्रहरतक लघुपुट देवे । स्वांगशील होनेपर गोलेको लेकर चूर्ण करलें और उसमें समान भाग त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर बारीक खरल करलेवे। यह रस प्रतिदिन दो दो रत्ती परिमाण सेवन करनेसे अर्धाङ्गनात और कम्पवातकी पीडाको शमन करता है ।। १२४-१२६ ॥ गगनगर्भा वटी ( रस ) । सूताभ्रं तीक्ष्णताम्रं च मृतं तालकगंधकम् । भाङ्ग शुंठी वचा धान्यकम्पिल्लं चाभया विषम १२७ म पटकद्रवाकैां भक्षयेद्वटीम् । वातश्लेष्महरा ह्या वटी गगनगर्भता ॥ १२८ ॥ पारा, अभ्रक, लोहा, ताँबा, हरताल, गन्धक, भारंगी, सोंठ, वच, धनियाँ, कवीला, हरडा और वत्सनाभ सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके पित्तपापडेके रसमें घोटकर चार २ मासेकी<noinclude></noinclude> npsjrez4dleb3fwnpvu0hnorjzjytbw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६६ 104 165653 418243 2026-09-05T09:38:26Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४४ ) रसरत्नसमुच्चयः । गोलियाँ बनालेवे | यह गोलियाँ वात और कफ के रोगों को तत्काल नाश करनेवाली हैं ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ वातगजांकुश रस । मृतं सूतं मृतं लोहं गंधकं तारमाक्षि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418243 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६४४ ) रसरत्नसमुच्चयः । गोलियाँ बनालेवे | यह गोलियाँ वात और कफ के रोगों को तत्काल नाश करनेवाली हैं ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ वातगजांकुश रस । मृतं सूतं मृतं लोहं गंधकं तारमाक्षिकम् । पथ्याभृंगी विषव्योषमनिमंथं च टंकणम् ॥ तुल्यं खल्वे दिन मर्च मुंडीनिर्गुडिजद्रवैः ॥ १२९ ॥ द्विगुजां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशांतये । साध्यासाध्यं निहत्याशु रसो वातगजांकुशः १३०॥ पारदभस्म, लोहभस्म, गन्धक, रूपामाखीकी भस्म, हरड, भारंगी वत्सनाभ, त्रिकुटा, अरणी और सुहागा सबको सम भाग लेकर खरल करले, । फिर गोरखमुंडी और निर्गुण्डीके रसमें क्रमसे एक २ दिन तक भावना देकर दो २ रत्तीकी बनालेवे फिर प्रतिदिन एक २ गोली सेवन करे । सब प्रकारकी वातव्याधिको शान्त करनेके लिये इस रसका उपयोग करना चाहिये यह वातगजांकुश रस साध्य व असाध्य सर्व प्रकारके वातरोगको शीघ्र नष्ट करता है || १२९|| १३० ॥ शतावरी गुग्गुलु । शतावरी गुडूची च सारणी गोक्षुरः कणा । शताह्वा दीप्यका राना ह्यश्वगंधा च शंखिका । १३१ कर्चुरो नागरश्चैते चूर्णनीयाः समांशकाः । एतैः सर्वैः समो ग्राह्यो गुग्गुलुर्महिषाख्यकः ॥ १३२ ॥ खंडयित्वा घृवेनाऽऽदै पूर्वपूर्ण विनिक्षिपेत् । संमद्ये सर्पिषा गाढं कर्षार्ध मुलिकां किरेत्॥ १३३॥<noinclude></noinclude> 34q2ess5or97tnnk06l0r3ekf7rtlhl पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६७ 104 165654 418244 2026-09-05T09:38:49Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भावाटीकोपेतः । (६४५) शतावर, गूगल, गन्धप्रसारणी, गोखुरू, पीपल, सौंफ, अजवायन, रास्ना, असगन्ध, शंखपुष्पी, कचूर और साठ इन सबको समान भाग, लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस समस्त... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418244 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भावाटीकोपेतः । (६४५) शतावर, गूगल, गन्धप्रसारणी, गोखुरू, पीपल, सौंफ, अजवायन, रास्ना, असगन्ध, शंखपुष्पी, कचूर और साठ इन सबको समान भाग, लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस समस्त चूर्णके बराबर भैंसिया गूगल लेकर प्रथम उसको कूटकर घृतके साथ खरल करे, फिर उसमें उक्त औषधियोंका चूर्ण डालकर घृतके साथ घोटे । जब वह अच्छे प्रकारसे घुटकर मलाईके समान चिकना होजाय तब छः २ मासेकी गोलियाँ बनाले | यह गोलियाँ एकांग आदि वातव्याधिमें विशेष हिसकारी हैं ॥ १३१-१३३ ॥ योगराज गुग्गुलु । पिप्पलीपिप्पलीमूलं चव्य चित्रकनागरैः । पाठा विडंगेन्द्रय वहिंगु भांगवचान्वितैः ॥१३४॥ सर्षपाऽतिविषाजाजी रेणुका कृष्णजीरकैः । गजकृष्णाजमोदाभ्यां कटुकामूर्वमिश्रितैः ॥ १३५ ॥ समभागान्वितैः सर्वैत्रिफला द्विगुणाभवेत् । त्रिफलासहितैरेतैः समभागस्तु गुग्गुलुः ॥ १३६ ॥ एतच्चूर्णीकृतं सर्व मधुना च परिप्लुतम् । योगराज मिमं विद्वान्भक्षयेत्प्रातरुत्थितः ॥ १३७॥ अशसि वातगुल्मं च पाण्डुरोगमरोचकम् । नाभिशूलमुदावर्ते प्रमेहं वातशोणितम् ॥१३८॥ कुष्ठं क्षयमपस्मारं हृद्रोगं ग्रहणीगदम् । महातिमग्निसादं च श्वासकासभगंदरम ॥ १३९॥ रेतोदोषाश्च ये पुंसां योनिदोषाश्च योषिताम् ।<noinclude></noinclude> gigp5n0muflkuraagc2fuv8qslw11as पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६८ 104 165655 418245 2026-09-05T09:39:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । निहन्यादाशु तान्सर्वान्दुर्वारान्न च संशयः॥ १४० ॥ एष निष्परिहरोऽस्ति पानभोजनमैथुने । सतताभ्यासयोगेन वलीपलितनाशनः ॥ सर्वव्याधिविनिम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418245 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । निहन्यादाशु तान्सर्वान्दुर्वारान्न च संशयः॥ १४० ॥ एष निष्परिहरोऽस्ति पानभोजनमैथुने । सतताभ्यासयोगेन वलीपलितनाशनः ॥ सर्वव्याधिविनिमुक्ती जीवेद्वर्षशतत्रयम् ॥ १४१ ॥ क्षीराज्यरसयुक्तानां दोषधातुमलोचितम् । बुभुक्षितो मात्रयाऽन्नमद्याद्गुग्गुलुसेवकः ॥ प्रमेहं योगराजोऽयं दृष्टं दृष्टया जयेदिति ॥ १४२ ॥ पपिल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, पाढ, वायविडंग, इन्द्रजौ, हींग, भारंगी, वच, सरसों, अतीस, जीरा, रेणुका, काला जीरा, गजपीपल, अजमोद, कुटकी और मूर्वा ये सब औषधियाँ समान भाग और सबसे दुगुना । त्रिफला लेकर सबको एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । फिर इस समस्त चूर्णके बराबर शुद्ध भैंसिया गूगल लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके शहदके साथ खूब अच्छे प्रकारसे खरल करे । विद्वान लोग इस योगको योगराजगूगल कहते हैं । इसकी प्रतिदिन प्राप्तःकाल उपयुक्त मात्रा में सेवन करनेसे सम्पूर्ण अर्थरोग, वातजगुल्म, पाण्डुरोग, अरुचि, नाभिशूल उदावर्त, प्रमेह, वातरक्त कुछ क्षय, अपस्मार, हृदयरोग, संग्रहणी, अत्यन्त प्रबल मन्दाग्रि, श्वास, खाँसी, भगन्दर, पुरुषोंके वीर्यसम्बन्धी सम्पूर्ण दोष और स्त्रियोंके योनिसम्बन्धी समस्त विकार शीघ्र नष्ट होते हैं । इसके अतिरिक्त यह गूगल सब प्रकारके दुरसाध्य रोगोंको निस्तदेह नष्ट करता है । इसपर खान पान, मैथुनादिमें किसी प्रकारकाभी परहेज करनेकी आवश्यकता नहीं है । इस गूलको निरन्तर सेवन करनेसे बली और पलितरोग दूर होता है और मनुष्य सम्पूर्ण व्याधियोंसे मुक्त होकर ३०० तीनसौ वर्षतक जीता है।<noinclude></noinclude> 7rdxm8tqenaj3zabgp3ttwsx24r6uhk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६९ 104 165656 418246 2026-09-05T09:39:39Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ : भाषाटी कोपेतः । ( ६४७ ) योगराज गूगलको सेवन करनेवाला मनुष्य दोष, धातु, मल और प्रकृ• तिके अनुकूल भूख लगनेपर दूध, घी, मांसरसादि पदार्थ, भात आदिको यथोचित मात्रा से सेवन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418246 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>: भाषाटी कोपेतः । ( ६४७ ) योगराज गूगलको सेवन करनेवाला मनुष्य दोष, धातु, मल और प्रकृ• तिके अनुकूल भूख लगनेपर दूध, घी, मांसरसादि पदार्थ, भात आदिको यथोचित मात्रा से सेवन करे यह योग राज गूगल प्रमेहरोगको अवश्य दूर करता है । यह प्रत्यक्ष अनुभव है ॥ १३४-१४२ ॥ द्वितीय योगराज गुग्गुलु । चित्रकं पिप्पलीमूलं यवानी कारवी तथा । विडंगान्यजमोदाश्च जीरकं सुरदारु च ॥१४३॥ वचैला सैंधवं कुठं राना गोक्षुरधान्यकम् । त्रिफला मुस्तकग्यो षत्वगुशीरं यवाग्रजम् ॥१४४॥ तालीसपत्रं पत्रं च सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् । एतानि समभागानि तावन्मात्रं च गुग्गुलुम् ॥ १४५ ॥ संम सर्पिषा गाढं स्निग्धे भांडे विनिक्षिपेत् । भक्षयेत्कर्षमात्रं च वातरोगान्विनाशयेत् ॥ १४६॥ ततो मात्रां प्रयुंजीत यथेष्टाहारसेवनात् । योगराज इति ख्यातो योगोऽयममृतोपमः ॥ १४७॥ आमवातान्यवातादीन्कृमिदुष्टव्रणानपि । प्लीहगुल्मोदरानाहदुर्नामानि विनाशयेत् ॥१४८॥ अग्निं च कुरुते दीप्तं तेजोवृद्धिबलं तथा ॥१४९ चीता, पीपलामूल, अजवायन, काला जीरा, वायविडंग, अजमोद, जीरा, देवदारु, वच्च, इलायची, सैंधानमक, कूठ, रास्ना, गोखुरू, धनियाँ, त्रिफला, नागरमोथा, त्रिकुटा, दारचीनी, खस, जवाखार, तालीसपत्र और तेजपात इन सब औषधियोंको समान भाग और इन सबके बराबर शुद्ध गूगल लेवे। सबको एकत्र कूटपीसकर घृतके साथ<noinclude></noinclude> hedxaoyxim9dzpcz25ssqgof1rjuam9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७० 104 165657 418247 2026-09-05T09:40:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (६४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । खूब बारीक खरल करे । फिर घीके चिकने वासनमें भरकर रखदेवे इस गूगलको प्रतिदिन एक २ तोला परिमाण सेवन करे और यथेष्टरू- पसे आहार विहार करे। यह योगर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418247 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(६४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । खूब बारीक खरल करे । फिर घीके चिकने वासनमें भरकर रखदेवे इस गूगलको प्रतिदिन एक २ तोला परिमाण सेवन करे और यथेष्टरू- पसे आहार विहार करे। यह योगराज गूगल अमृतके समान हितकारी है | यह आमवात आदि समस्त वातरोग, कृमिरोग, दुष्टव्रण, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, आनाह, और बवासीर इन सब रोगोंको विनाश करता है तथा जठराग्रिको अत्यन्त दीपन, और तेज व बलकी वृद्धि करता है ॥ १४३-१४९ ॥ पडङगुग्गुलु रात्रामृतादेवदारुशुंठी वातारितुल्यरूप | गुग्गुलुं सर्वतुल्यांश कुट्टयेद् घृतवासितम् ॥ कर्षाशं भक्षयेच्चानु ख्यातः षडग गुग्गुलुः ॥ १५० ॥ रास्ना, गिलोय, देवदारु, सोंठ और अण्डकी जड सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे। उस समस्त चूर्णके बराबर भाग शुद्ध गूगल लेकर सबको एकत्रित करके घृतके साथ खरल करे । इसको षडङ्ग गुग्गुलु कहते हैं । फिर उसमेंसे प्रतिदिन एक तोला परिमाण सेवन करे ॥ १५० ॥ विजयभैरव तैल | धान्याम्लपिष्टसुरभित्र यसूत लिप्त- तैलाक्तदीप्त पटवर्तिमुखात्प्रवृत्तम् । कम्पोत्तराञ्जयति पानविलेपनाभ्यां वातामा वजय भैरवनामतैलम् ॥१३१॥ गन्धक, हरताल, मैनसिल और पारा चारोंको समान भाग लेकर कज्जली करलेवे । फिर उसको कॉजीमें मैदाके समान बारीक पीसकर एक कपडेके ऊपर फैलाकर बत्ती बनालेवें ।<noinclude></noinclude> kycuqnf2tzzsobnyqpgkpjlloy1lwqa पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७१ 104 165658 418248 2026-09-05T09:41:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६४९) डर बत्तीको एक दिनतक तीक्ष्ण धूपमें सुखाकर दूसरे दिन सरसोंके तेलमें भिजोकर जलावे और उसके नीचे एक बर्तन रखदेवे। उस वर्त्त- नमें जो तेल टपके उसक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418248 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६४९) डर बत्तीको एक दिनतक तीक्ष्ण धूपमें सुखाकर दूसरे दिन सरसोंके तेलमें भिजोकर जलावे और उसके नीचे एक बर्तन रखदेवे। उस वर्त्त- नमें जो तेल टपके उसको ग्रहण करलेवे । इसको विजयभैरव तैल कहते हैं । यह तैल पान करने और मर्दन करनेसे कम्प आदि समस्त वातरोगोंको शीघ्र दूर करता है ॥ १५१ ॥ सुत तैल | रखतालशिलागंधं सर्व कुर्यात्समांशकम् । चूर्णयित्वा ततः श्लक्ष्णमारनालेन मर्दयेत् ॥ १५२ ॥ लेपयित्वा तु कल्केन सूक्ष्मवस्त्रं ततः परम् । तैलाक्त कारयेद्वर्तिमूर्द्धभागे प्रदीपयेत् ॥ १५३ ॥ वर्त्यधःस्थापिते पात्रे तैलं पतति शोभनम् । लेपयेत्तेन गात्राणि भक्षयेदातुरस्तथा ॥ १५४ ॥ नाशयेत्सृततैलं तद्वातरोगाननेकधा । बाहुकंपं शिरःकंप जंघाकंपं ततः परम् ॥ १९५ ॥ ऐकांगं च तथा वातं हंति रोगाननेकधा । रोगशांत्य सदा देयं सूततैलैमिदं शुभम् ॥ १५६ ॥ पारा, हरताल, मैनसिल और गन्धक चारोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे, फिर कॉजीमें अथवा नींबूके रसमें घोटकर एक मलमलके कपडे के ऊपर लेप करके बत्ती बनालेवे उसको सुखाकर तैलमें भिजोकर एक सिरसे जलावे और उसके नीचे एक वर्त्तन रख- देवे। उस वर्त्तनमें जो तैलगिरे उसको लेकर शरीरपर मर्दन करे और १ ते सर्वे बिल पांति तत्रले पात्र संशयः । २पेयं । ३ तैलं विजयभैरवम् ।<noinclude></noinclude> jubgdty7cqwptcrh3muqaq4m96oby4i पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७२ 104 165659 418249 2026-09-05T09:41:48Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५० ) रसरत्नसमुच्चयः । भक्षण करे | यह सूततैल अनेक प्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है । जैसे बाहुका काँपना, शिरका काँपना, जंघाकम्प, एकांगवात, इसी पकारके अन्यान्य वात... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418249 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६५० ) रसरत्नसमुच्चयः । भक्षण करे | यह सूततैल अनेक प्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है । जैसे बाहुका काँपना, शिरका काँपना, जंघाकम्प, एकांगवात, इसी पकारके अन्यान्य वातरोगोंको शान्त करनेके लिये इस तेलको सदैव प्रयोग करना चाहिये ॥ १५२ - १५६ ॥ द्वितीय विजयभैरव तैल | रसगंधशिलातालं दिनं संचूर्ण्य कांजिकैः । लिप्त्वा वस्त्रेः कृतां वर्ति तैलाक्तां ज्वालयेत्पुनः १५७ तद्भूतं संग्रहे तैलधःपात्रे धृते सति । तत्तैललेपितं पत्रं नागवल्ल्याश्च भक्षयेत् ॥ १५८ ॥ बाहुकम्पं शिरःकंपमेकांग जानुकम्पनम् । नाशयेद्रक्षणापात्तैलं विजयभैरवम् ॥ १५९ ॥ पारा, गन्धक, मैनसिल और हरताल चारोंको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके कज्जली करलेवे । फिर उसको एक दिनतक काँजीमें घोटकर कपडे के ऊपर लेप करके सुखलिने । फिर बत्ती वटकर उसको तिलके तेलमें भिजोकर जलावे । और उसके नीचे एक बर्त्तन रखकर उसमें टपकते हुए तैलको संग्रह करे । इस तैलको पान के ऊपर लगाकर प्रतिदिन भक्षण करे । इस तैलको नियमानुसार भक्षण करने और मर्दन करने से बाहुकम्प, शिरःकम्प, एकाङ्ग वात, जानु- कम्प आदि सम्पूर्ण वातरोग नाश होते हैं ।। १५७-१९९ ।। आनन्दभैरव घृत । एरण्डतैलं त्रिफला गोसूत्रं चित्रकं विषम् । सर्पिषा सहितं पक्त्वा सर्वांगं तेन मर्दयेत् ॥ १६० ॥ त्वग्वातघ्नं महाश्रेष्ठं घृतमानंदभैरवम् । शुन सैंधवं तैलमनुपानं प्रकल्येत् ॥ १६१ ॥<noinclude></noinclude> hupej3monqs060gk4zhqgplsdkxoqms पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७३ 104 165660 418250 2026-09-05T09:42:23Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६५१ ) अण्डका तेल, त्रिकला, गोमूत्र, चीता और वत्सनाभ सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर कल्क करलेने | उस कल्कके बराबर घी और घीसे चौगुना पानी लेकर सबको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418250 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६५१ ) अण्डका तेल, त्रिकला, गोमूत्र, चीता और वत्सनाभ सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर कल्क करलेने | उस कल्कके बराबर घी और घीसे चौगुना पानी लेकर सबको एकत्रित करके यथाविधि घृतको पकाने । इस घृतको समस्त शरीरपर मर्दन करने से त्वचागतवात रोग नष्ट होता है । इस घृतको यदि भक्षण करना हो तो पानमें लगाकर भक्षण करे अथवा शहद और अदरख के रस में मिलाकर चाटे और ऊपरसे लहसुनको तेलमें भूनकर उसमें सैंधान- मक मिलाकर अनुपान करे | यह आनन्दभैरव घृत त्वचास- म्बन्धी वातरोगोंको शमन करनेके लिये परम उपयोगी है ॥ १६०–१६१ ॥ कर्षा सामान्य उपाय । पर्पटीरसगुंजाष्टौ पूर्वप्रोक्तं च गुग्गुलुम् । की खादयेत्साज्यमेकांगानिलशांतये ॥ १६२ ॥ एरण्ड बह्निशुठीनां गुडूच्याश्च कषायकम् । अनुपानाय दातव्यं चणकक्काथमेव वा ॥ न लिकायंत्रयोगेन सर्जतैलं समुद्धरेव । तदभ्यंगप्रयोगेण वातो दुष्टः प्रशाम्यति ॥ १६४ ॥ अष्टगुंजामित खादेदे कांगे पर्पटीरसम् । १६३ ॥ अर्धकर्ष घृतेनानुयोगराजं च गुग्गुलुम् ॥ १६५ धूमसारं वरा यष्टी टंकणं पत्रकं विषम् । तुल्यं गुंजाइयं खादेदामवातप्रशांतये ॥ १६६ ॥ निर्गुडीमूलचूर्ण तु कर्षे तैलेन लेहयेत् । संधिवातः कटीवातः कंपवातश्च शाम्यति ॥ १६७॥ १ शिरोवस्तश्च ।<noinclude></noinclude> h6a2kao5skcsa6mnz4n9duh7dfjf4o1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७४ 104 165661 418251 2026-09-05T09:42:53Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५२ ) रस रत्न समुच्चयः रक्तस्यैरण्डमूलस्य कर्षे घृष्ट्वा जलः पिबेत् । सर्ववातहरं श्रेष्ठं भगवाते विशेषतः ॥ १६८ ॥ इंद्रवारुणिका मूलं मागधीगुडसंयुतम् । भक्षये... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418251 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६५२ ) रस रत्न समुच्चयः रक्तस्यैरण्डमूलस्य कर्षे घृष्ट्वा जलः पिबेत् । सर्ववातहरं श्रेष्ठं भगवाते विशेषतः ॥ १६८ ॥ इंद्रवारुणिका मूलं मागधीगुडसंयुतम् । भक्षयेत्कर्षमात्रं तत्संधिवातहरं भवेत् ॥ १६९॥ मृतं सुतं मृतं तीक्ष्णं मर्दयेत्कटुकीद्रवैः । चणमात्रां वटीं खादेत्सर्वांगकांगवातनुत् ॥ १७० ॥ एकांग वातको शान्स करने के लिये प्रतिदिन आठ २ रती परिमाण पर्पटीरस और छः २ मासे पूर्वोक्त शतावर गुग्गुलु घृतमें मिलाकर सेवन करावे । और इसके ऊपर अनुपान के लिये अण्डकी जड, चीता, सॉठ और गिलोयका काय अथवा चनोका काथ देवे | अथवा नलीयन्त्रके द्वारा राल का तेल निकालकर उसकी मालिश करनेसे दूषित वात शमन होता है । एकांगवातकी पीडामें रोगीको आठ २ रची परिमाण पर्पटीरस सेवन कर ऊपर से छः मासे योगराज गूगल वृतमें मिलाकर खानी चाहिये, घीके दीपककी लोयसे पारी हुई स्याही, त्रिफला, मुलैठी, सुहागा, तेजपात और शुद्ध वत्सनाभ इन सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करलेवे । फिर उसमेंसे प्रतिदिन दो दो रत्ती परिमाण सेवन करे तो आमवात रोग शान्त होता है । एक २ तोला निर्गुण्डीकी जडके चूर्ण को तेलमें मिलाकर चाटने से सन्धिगत वात, कटिवात और कम्पवात दूर होता है । लाल अण्डका जडको एक तोला लेकर पानीमें घिसकर पान करे । यह प्रयोग सम्पूर्ण बात- रोगोंको हरनेवाला और भग्नवातमें विशेष उपयोगी है । इन्द्रायनकी जडका चूर्ण ३ मासे, पीपलका चूर्ण ३ मासे और गुड ६ मासे सबको एकत्र मिलाकर भक्षण करनेसे सन्धि-<noinclude></noinclude> pzv4paeb5zma2g7rs3b8yzxtuziemjs पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७५ 104 165662 418252 2026-09-05T09:44:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६५३) गत बात दूर होता है । अथवा पारेकी भस्म और तीक्ष्ण लोहकी भस्म दोनोंको समान भाग लेकर कुटकीके रसमें खरल करके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418252 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६५३) गत बात दूर होता है । अथवा पारेकी भस्म और तीक्ष्ण लोहकी भस्म दोनोंको समान भाग लेकर कुटकीके रसमें खरल करके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको हमेशा सेवन करनेसे सर्वाङ्गगत वात अथवा एकांग स्थित बातकी पीडा नष्ट होजाती है ॥ १६२-१७० ॥ वातरक्त ! संधिष्वनिलरक्ताभ्यां शोफोन्तर्बहिराश्रितः । छर्दिज्वराऽरुचिकरो भवेद्वाताखसंज्ञकः ॥ १७१ ॥ वायु और रक्तके दूषित होनेसे जब सन्विस्थानोंके भीतर और बाहर सृजन होजाती है, और वमन, ज्वर, अरुचि आदि उपद्रव होते 'हैं तब उसको वातरक्त रोग कहते हैं ॥ १७१ ॥ चन्द्रावलेह | एलायाश्च तुला ग्राह्या जल द्रोणे विपाचयेत् । अष्टभागावशिष्टं तु शर्करार्धतुलां क्षिपेत् ॥ १७२॥ शतावर्या विदायश्चि गाक्षीरं चाढकं पृथक् । लेहवत्साधिते तस्मिन्द्राक्षामधुकपिप्पलीः ॥१७३॥ विजातकं च खर्जूरं चंदनद्वयसारिवा । मुस्तापद्मकहीबेरघात्री चोत्पलचोरकम् ॥१७४॥ तेर्षा पलमादाय क्षिपेत्क्षीयाश्चतुष्पलम् । क्षौद्रप्रस्थेन संयुक्तं लेहयेत्प्रातरुत्थितः ॥ १७३ ॥ पित्तोन्मादविकारेषु शिरोभ्रमणमूर्छिते । हस्तपादांगदा पित्तरक्तोत्तरावृतौ ॥ छर्दिकासक्षये पांडौ चंद्रव चंद्रभाषितम् ॥ १७६ ॥ चार सौ ४०० तोले इलायचीको एक द्रोण जल में डालकर<noinclude></noinclude> fdyvku5ohsatcw9ykw6ecpj1b54ghwn पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७६ 104 165663 418253 2026-09-05T09:44:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ६५४ ) कावे | अष्टमांशजल शेष रहनेपर उस कायको उतारकर छान लेंवे। फिर उसमें खांड २०० तोले, शतावर का रस १ आढक (२५६ तोले) विदारीकन्दका रस १ आढक और गायका द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418253 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ६५४ ) कावे | अष्टमांशजल शेष रहनेपर उस कायको उतारकर छान लेंवे। फिर उसमें खांड २०० तोले, शतावर का रस १ आढक (२५६ तोले) विदारीकन्दका रस १ आढक और गायका दूध १ आढक डालकर मन्द मन्द अपिकावे । जब समस्त रस पकते २ अवलेह के समान गाढा हो जाय तब नीचे उतारकर उसमें निम्नलिखित औषधियोंका कपडछान किया हुआ बारीक चूर्ण डालकर मिलादेवे । दाख, मुलैठी पीपल, त्रिजातक, खजूर, चन्दन, लाल चन्दन, सारिवा, नागरमोथा, पद्माख, सुगन्धवाला, आमले, कमलकण्ड और भटेउर इन सब औषधियों का चूर्ण चार २ तोले, वंशलोचन १६ तोले और शहद एक प्रस्थ डालकर अच्छे प्रकारसे मिलादेवे फिर घीके चिकने वर्त्त- नमें भरकर रखदेवे । इस अवलेहको प्रतिदिन प्रातःकाल रोगानुसार अनुपान के साथ यथोचित मात्रासे सेवन करे। यह अवलेह - पित्तरोग, उन्माद रोग, शिरकी पीडा, भ्रम, मूर्च्छा हाथ पांव आदि अंगो की दाह, पित्त और रक्तके विकारसे उत्पन्न हुए रोग, वमन, खांसी, क्षय और पाण्डु इन सब रोगों में शीघ्र उपकार करता है । इसके सेवन से मनुष्य चन्द्रमाके समान कान्तिवान् होता है। इस चन्द्रावलेहका चंद्रदेवने वर्णन किया है ॥ १७२-१७६ ॥ अमृतप्राश चूर्ण । ऐलेयकं समूलं हि मुद्रपर्णी तथैव च । शतावरी विदारी च वाराही कंदमेव च ॥ १७७॥ मधुकं चमधूकं च तुगाक्षीरी चगोस्तनी । एतानि द्विपलांशानि चूर्णीकृत्य पृथक पृथकू १७८ सरलं चंदनं चोचमुत्पलं कुमुदं जलम् ।<noinclude></noinclude> f3ddzaosx425c5w3587z757nt4kdcll पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७७ 104 165664 418254 2026-09-05T09:45:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः (६६९) काकोली क्षीरकाकोली द्वे मेदे जीवकर्षभौ ॥ १७९ ॥ एतेषां चापलिकं प्रत्येकं शर्करायुतम् । ऐलेयकं विदारी च वाराही मुद्रपर्णिका ॥१८०॥ एतेषां स्व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418254 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः (६६९) काकोली क्षीरकाकोली द्वे मेदे जीवकर्षभौ ॥ १७९ ॥ एतेषां चापलिकं प्रत्येकं शर्करायुतम् । ऐलेयकं विदारी च वाराही मुद्रपर्णिका ॥१८०॥ एतेषां स्वरसैः शुद्धैः शतावयाश्च भावितम् । एतत्सर्वे समाहृत्य छाया शुष्कं तु सप्तधा ॥ १८१॥ वामलकयोः क्षौद्रैर्भावि सप्तधा पुनः । पयसा तु पिवेत्प्रातर्यथानिबलवान्नरः ॥ १८२॥ अंगदाहं शिरोदाहं रक्तपित्तं सुदारुणम् । शिरोक्षिकम्पभ्रमणमित्यादिकगदाञ्जयेत् ॥ १८३॥ इलायचीका पंचाङ्ग, सुगवन, शतावर, विदारीकन्द, वाराहकिन्द, मुलेठी, महुआ, वंशलोचन, और दाख ये प्रत्येक औषधि आठ २ ताले, धूपसरल, चन्दन, दारचीनी, कमल, कुमोदिनी, सुगन्धवाला. काकोली, क्षीरकाकोली, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक और खाँड ये प्रत्येक दो दो तोले लेव । इन सब औषधियों को एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णकी इलायचीका पंचाङ्ग, विदारी- कन्द, बाराहीकन्द, मुगवन और शतावर इन औषधियोंके स्वरसमें क्रमसे सात सात बार भावना देवे और सात २ बार छायामें सुखावे । इसके पश्चात् ईखका रस, आपलोंका रस और शहद तीनोंको समान भाग लेकर एकत्र मिश्रित करके उसमें सात बार भावना देवे और सातबार छाया में सुखावे । इस चूर्णको मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल _अपनी जठरामिके वला बस के अनुसार दूध के साथ सेवनवरे । यह १ एलवालुक नामगन्धद्रव्य<noinclude></noinclude> 988zx25sno1na39cd9zdlu1o6vsmwih पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७८ 104 165665 418255 2026-09-05T09:45:53Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । चूर्ण शरीरकी दाह, सिरकी दाह, दारुण रक्तपित्त, सिर और नेत्रांका कम्प, भ्रम आदि समस्त वातव्याधियों को दूर करता है ।। १७७-१८३॥ ऐले कतैलम् । ऐले... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418255 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । चूर्ण शरीरकी दाह, सिरकी दाह, दारुण रक्तपित्त, सिर और नेत्रांका कम्प, भ्रम आदि समस्त वातव्याधियों को दूर करता है ।। १७७-१८३॥ ऐले कतैलम् । ऐलेयकस्य स्वरसमाढकं तु भिषग्वरः । कुमार्याःस्वरसं शुद्धं चतुष्प्रस्थं तु कारयेत् ॥ १८४ ॥ आमलक्याः शतावयां रसं प्रस्थद्वयं पृथक् । तैलाढकसमायुक्तं क्षीरद्रोण विमिश्रितम् ॥१८५॥ चोचं मलयजं वारि सरलं कुमुदोत्पलम् । द्वे मेदे मधुकं द्राक्षा तुगाक्षीरी मधूलिका ॥१८६॥ Traोली क्षीरकाकोली जीवकर्षभकावुभौ । मृगनाभ्यजगंधा च शशकिश्व पृथक पृथक् ॥ १८७॥ एतेषां चार्धपलिकं श्लक्ष्णं चूर्ण विनिक्षिपेत् । एतत्सर्वे समालोच्य मंद मंदाग्निना पचेत् ॥ समुहूर्ते सुनक्षत्रे नववस्त्रेण पीडयेत् ॥ १८८॥ शिरोनेत्रविकारेषु नत्यं स्यात्कर्णयोजितम् । अभ्यंगोद्वर्तनालेपैः शिरोभ्रमणकम्पनुत् ॥ १८९ ॥ अंगदाहं शिरोदाहं नेत्रदाहं च दारुणम् । विसर्पक विकारांश्व मूनि जातान्बहून्त्र णान् ॥ १९०॥ आस्यशोषं भ्रमं चैव नाशयेन्नात्र संशयः । ऐलेयकमिदं तैलं प्रशस्तं पित्तरोगिणाम् ॥ १९१ ॥ + इलायचीका स्वरस या काढा १ आढक ( २५६ तोले, ) १ एल वालुक ।<noinclude></noinclude> jpoq25alm4h7npkutf5dcv8x81aex8u पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७९ 104 165666 418256 2026-09-05T09:49:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६५७ ) घीग्वारका स्वरस ४ प्रस्थ; आमलोंका स्वरस २ प्रस्थ, शतावरका रस २ प्रस्थ, तेल १ आढक और दूध १ द्रोण परिमाण लेवे | सबको एकत्र मिलाकर मन्द मन्द अग्नि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418256 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६५७ ) घीग्वारका स्वरस ४ प्रस्थ; आमलोंका स्वरस २ प्रस्थ, शतावरका रस २ प्रस्थ, तेल १ आढक और दूध १ द्रोण परिमाण लेवे | सबको एकत्र मिलाकर मन्द मन्द अग्नि से पकावे और उसी समय उसमें दालचीनी, चन्दन, सुगन्धवाला, धूपसरल, कुमोदिनी, कमल, मेदा, महामेदा, मुलैठी, दाख, वंशलोचन, मूर्वा, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक, कस्तूरी और वनतुलसी, इन औषधियोंके दो २ तोले बारीक चूर्णको डालदेवें । जब पकते २ समस्त रस जलजाय और तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारकर नवीन वस्त्रमें छानलेवे और उसमें दो तोले कपूर डालकर शीशियों में भरकर रखदेवे । इस तेलको उत्तम मुहूर्त्त और शुभ नक्षत्र में व्यवहार करे । शिरके रोग और नेत्रसम्बन्धी रोगों में इस तेलकी नस्य देवे अथवा कानमें डाले । इसको मालिश, उबटन, प्रलेप आदि उपचारोंके द्वारा प्रयोग करनेसे सिर में चक्कर आना, कम्प, शरीरकी दाह, शिरका दाह, दारुण नेत्रोंकी दाह, विसर्परोग, सिरमें होनेवाले अनेक प्रकारके व्रण मुखशोष और भ्रम ये सब रोग निस्सन्देह नाश होते हैं। यह तैल पित्तरोगियों के लिये अत्यन्त हितकारी है ॥ १८४ - १९१ ॥ ऐलेयसपि । ऐलेयकस्य स्वरसे घृतं क्षीरं समं पचेत् । वंदनं मधुकं द्राक्षा मधूकं च तुगा सिता ॥ १९३ ॥ ऐले कमिदं सर्पिः सर्वपित्तविकारजित् । वातपित्तविकारनं शिरोभ्रमणकंपनुत् ॥ १९३ ॥ चन्दन, मुलैठी, दाख, महुआ वंशलोचन और मिश्री ये प्रत्येक औषधि चार २ तोले लेकर सबको २४ तोले इलायची के स्वरसमें पीसकर कल्क बनालेवे, उस कल्कको २४ तोले घी और २४ ताले १ एल वालुक सुगन्धद्रव्यविशेष ।<noinclude></noinclude> s42wr5m20mqfv3rn66r2pnvpclrddjk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८० 104 165667 418257 2026-09-05T09:52:14Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५८ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूधमें मिलाकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । इसको ऐलेयक घृत कहते हैं । यह पित्तके समस्त विकारोंको तथा वातपित्त के रोग, शिरो- रोग, भ्रम और कम्प इन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418257 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६५८ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूधमें मिलाकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । इसको ऐलेयक घृत कहते हैं । यह पित्तके समस्त विकारोंको तथा वातपित्त के रोग, शिरो- रोग, भ्रम और कम्प इन सब रोगोंको नष्ट करता है । १९१-१९३ ॥ सामान्य उपाय | त्रिनेत्राख्यं रसं खादेद्वातशोणितपीडितः । वातास्त्र जिच्छूलगज केसर्युदय भास्करः ॥ १९४ ॥ पूर्वोक्तपर्पटी योज्या सर्वेष्वावरणेषु च । सर्वरोगहिता चैव नाम्ना सर्वेश्वरी शुभा ॥ १९६ ॥ ऐलेयकस्य स्वरसे सक्षीरां शर्करां पिबेत् । कार्थं वा शर्करायुक्तं शिरोभ्रमणकम्पनुत् ॥ १९६ ॥ वातरक्त वाला रोगी त्रिनेत्ररस' शूलगज केसरी रस अथवा उदय- भास्कर रसको सेवन करे तो वातरक्त से शीघ्र मुक्त होजाता है । सब प्रकार के वातरक्तरोग में और एवं पित्तरोग सन्धिगत रोगों में पूर्वोक्त सर्वेश्वर पर्पटी रस प्रयोग करना चाहिये । यह पर्पटी समस्त रोगोंमें हितकारी है। इलायचीक स्वरसमें दूध और खाँड मिलाकर पान करे अथवा इलायची के काढेमें खाँड डालकर पान करे तो शिरका घूमना, कम्प आदि वातरोग नष्ट होते हैं ।। १९४-१९६ ॥ इति श्रीवाग्भट्टाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये आपाटीकाया मेकविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २१ ॥ द्वाविंशोऽध्यायः । वन्ध्याचिकित्सा | भेदा वंध्याsarai हि नवधा परिकीर्तिताः । तत्राऽऽदिवंध्या प्रथमा पापकर्मविनिर्मिता ॥ १ ॥<noinclude></noinclude> nwfj6v6swj4qcl9qlmeekn5ti74nw2o पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८१ 104 165668 418258 2026-09-05T09:53:14Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६५९) रक्तेन च पृथग्दोषैः समस्तैः पंचधा भवेत् । भूतदेवाभिचारैश्च तिस्रो वध्याः प्रकीर्तिताः ॥ २ ॥ पुमानपि भवेद्वंध्यो दोषैरेतैश्च शुक्रतः । गर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418258 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६५९) रक्तेन च पृथग्दोषैः समस्तैः पंचधा भवेत् । भूतदेवाभिचारैश्च तिस्रो वध्याः प्रकीर्तिताः ॥ २ ॥ पुमानपि भवेद्वंध्यो दोषैरेतैश्च शुक्रतः । गर्भस्रावी स्मृता पूर्व मृतवत्सा द्वितीयका ॥ ३ ॥ तृतीया स्त्रीप्रसूतिः स्यात्काकवंध्या सकृत्प्रसुः ॥ ४॥ वन्ध्या (बाँझ) स्त्रियों के नौ भेद कहे गये हैं । उनमें पहिली (१) आदिवन्ध्या है, जो पूर्वसंचित पापकर्मके कारण होती है । दूसरी ( १ ) रक्तवन्ध्या होती है वह स्त्री रक्तके विकृत होने अथवा ऋतु- खावके दूषित होनेसे या गर्भाशय में रक्तके सूखजानेसे वन्ध्या होती है । तीसरी (३) वातबन्ध्या होती है । उसका गर्भाशय वायुके प्रकुपित होनेसे शुष्क रूक्ष और संकुचित हो जाता है (४) वित्तवन्ध्या होती है । उसके गर्भाशय में पित्त (गरमी ) का विशेष उपद्रव होनेसे रज और वीर्यका सम्मिश्रण नहीं होता । यदि कदाचित् होजाय तो तुरन्त अथवा थोडे दिनोंमें ही उसका स्राव हो जाता है। पांचवीं (५) काक वन्ध्या होती है जो स्त्रियां किसी प्रकारका भी परिश्रम नहीं करतों उनके शरीर में भुक्त पदार्थोंकी चर्बी विशेषरूपसे बनती है, इससे उन स्त्रियोंका शरीर देखने में तो पुष्ट मालूम होता है, परन्तु आभ्य- न्तर यन्त्र बहुत निर्बल होते हैं । कारण, चर्बीका दबाव पडने से रक्तका संचार अच्छे प्रकारसे नहीं होता, अतश्व कोई अवयव पुष्ट नहीं हो सकता और प्रतिदिन उदर सम्बन्धी भागों और विशेषकर गर्भाशय के ऊपर चर्बीका बहुत बोझ पडनेसे गर्भको पोषण करनेका प्रत्येक सूक्ष्म मार्ग रुक जाताहै, इस कारण उस स्त्रीके गर्भ नहीं और जो कभी रहजाता है तो शीघ्र गिर जाता है। (६) त्रिदोष-<noinclude></noinclude> 70aujxx28136g1suokx092lxrss4tp1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८२ 104 165669 418259 2026-09-05T09:53:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६० ) रसरत्नसमुच्चयः । बन्ध्या होती है । इस कि उपर्युक्त वात पित्त, कफ इन तीनों दोषोंके थोडे २ उपद्रव होते हैं, इसलिये ऐसी स्त्रीके कभी गर्भ ही नहीं रह सकता । यदि कद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418259 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६६० ) रसरत्नसमुच्चयः । बन्ध्या होती है । इस कि उपर्युक्त वात पित्त, कफ इन तीनों दोषोंके थोडे २ उपद्रव होते हैं, इसलिये ऐसी स्त्रीके कभी गर्भ ही नहीं रह सकता । यदि कदाचित ऐसा हो जाय तो गर्भस्त शिशु मरजाता है । (७) भूतवन्ध्या, (८) देववन्ध्या और नवीं ( ९ ) अभिचा- वन्ध्या कही जाती हैं । ये तीनों प्रकारकी स्त्रियाँ भूतादिका आवेश 'देवताका आवेश होने और शत्रु द्वारा किये गये तन्त्र मन्म के प्रभाव से वन्ध्यत्वको प्राप्त होती है । ऐसी स्त्रियोंके कदाचित् गर्भस्थिति होजाय तो कन्या उत्पन्न होती है। उपर्युक्त दोषांसे पुरुषभी नौ ९ प्रकारके वन्ध्यत्वको प्राप्त होता है । कारण वे नौं दोष उसके वीर्यमें समाजाते हैं । उक्त नौ प्रकारकी वन्ध्या स्त्रियोंमेंसे आदिवन्ध्याके गर्भस्राव होजाता है और दूसरीसे लेकर छठीतक वन्ध्या स्त्रीके बालक जन्मतेही मरजाते हैं । सातवी, आठवीं और नववीं वन्ध्यास्त्रियोंके कन्यायेंही उत्पन्न होती हैं, इसलिये ये भी वन्ध्या कहलाती हैं। जिस स्त्रीके एकबार सन्तान उत्पन्न होकर फिर गर्भ स्थित नहीं होता, वह काक- बन्ध्या कहलाती है ॥ १--४ ॥ जयसुन्दर रस । सुवर्ण रजतं ताम्रं ताप्यसत्त्वं च वैकृतम् । एकैकं निष्कमानेन संशुद्धं परिमारितम् ॥ ५ ॥ एतच्चतुगुणं सूतं सूताद्दिगुणगंधकम् । मर्दक्ष्मणा तो धुजीवर सैरपि ॥ ६ ॥ काचकूप्यां ततः क्षिप्त्वा ताम्रपात्रं मुखे न्यसेत् । विलिपेदभितः कूपीमंगुलोत्सेधया मृदा ॥ ७ ॥ विशोष्य च पुटं दद्याद्भूमौ निक्षिप्य कूपिकाम् ।<noinclude></noinclude> 8y2l6gga7jy5vvxd5spei3pbnrx1f4b पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८३ 104 165670 418260 2026-09-05T09:55:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६६१) गजाख्यपुट पर्याप्तिः शाण कर्षमितोत्पलैः । स्वांगशीतं विचूयीथ भावयेद्धक्ष्मणाद्रवैः ॥ ८ ॥ सप्तवारं विशोष्याऽथ करण्डांतर्विनिक्षिपेत् ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418260 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६६१) गजाख्यपुट पर्याप्तिः शाण कर्षमितोत्पलैः । स्वांगशीतं विचूयीथ भावयेद्धक्ष्मणाद्रवैः ॥ ८ ॥ सप्तवारं विशोष्याऽथ करण्डांतर्विनिक्षिपेत् । अश्वगंधारजोयुक्तस्ताम्रगोक्षीरसंयुतः ॥ ९ ॥ सेवितो गुजया तुल्यः सितया च रसोत्तमः । मासत्रयप्रयोगेण वंध्या भवति पुत्रिणी ॥ १० ॥ पुत्रियै स्नानशुद्धायै जरत्कौशिकचक्षुषी । गण्याज्येनव संसाध्य तत्तदानीं हि भोजयेत् ॥११॥ ऋतावृताविदं देयं यावन्मासत्रयं भवेत् । रसेंद्रः कथितः सोऽयं चंपकारण्यवासिभिः ॥ १२॥ पूर्णामृताख्ययोगींनी मतो जयसुंदरः । सेवितेऽस्मिनूर से खीणां न भवेत्सूतिकागदः ॥ भवेत्पुत्रश्च दीर्घायुः पंडितो भाग्यमण्डितः ॥ १४ ॥ १३ ॥ सुवर्णभस्म, चाँदी की भस्म, ताम्र भस्म, सोनामाखी की भस्म, और वैकान्तमणिकी भस्म ये प्रत्येक चार र मसे, शुद्ध पारा १६ मासे और शुद्ध गन्धक ३२ मासे लेवे । प्रथम पारे, गन्धककी कञ्जली करके उसमें समस्त भस्मोंको मिलालेवे । फिर लक्ष्मणा (सफेद कटेरी) के और दुपहरिया वृक्षके पत्तोंके रसमें क्रमसे एक २ वार खरल करके सुखालेवे । इसके पश्चात् उसका गोला बनाकर काँचकी आतशी शीशीमें रक्खे और उसके मुँहपर ताँबेका पतला पत्र ढकदेवे और शीशीके चारों तरफ एक २ अँगुल ऊँची कपरौटी करके सुखा लेवे। फिर उस शोशीको गजपुटमें रखकर और उसको सेवा सवा तोलेके उपलोंसे ढककर अग्निदेवे । स्वागशीतल होनेपर गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे, फिर लक्ष्मणा के रसमें सात बार<noinclude></noinclude> qiit3tqabyilsqaup6bdapdio0aqk69 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८४ 104 165671 418261 2026-09-05T09:55:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भावना देवे और सातबार सुखावे । फिर बारीक खरल करके शीशी में भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण लेकर असगन्धके चूर्ण, लाल गायके दू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418261 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६६२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भावना देवे और सातबार सुखावे । फिर बारीक खरल करके शीशी में भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण लेकर असगन्धके चूर्ण, लाल गायके दूध और मिश्री के साथ सेवन करे । इस प्रकार इस उत्तम रसको तीन महीनेतक निरन्तर सेवन करनेसे वन्ध्या स्त्री पुत्रवती होती है । पुत्रोत्पत्तिकी इच्छा से जो स्त्री इस रसको सेवन करती हो तो जब जब वह ऋतुमती हो तभी तभी स्नानशुद्धीके पश्चात् उसको वृद्ध उल्लू के दोनों नेत्र गायके घीमें अच्छे प्रकारसे तलकर भोजन करावे । और भूख लगनेपर एकबार सादा और हल्का आहार करे । इस प्रकार पथ्यसहित इस रसको तीन महीने तक सेवन करे । इस रसके सेवन करनेपर स्त्रियोंके कभी प्रसुतरोग नहीं होता और दीर्घायुषी, विद्वान् तथा भाग्यवान् पुत्र उत्पन्न होता है । इस जयसुन्दर रसको चम्पकारण्य निवासी श्रीपूर्णामृत योगीने वर्णन किया है । ९-१४॥ रत्नभागोत्तर रस । वज्रं मरकतं पद्मरागं पुष्पं च नीलकम् । वे चाथ गोमेदं मौक्तिकं विद्रुमं तथा ॥ १५ ॥ पंचगुंजामितं सर्वं रत्नं भागोत्तरं परम् । तत्तंत्रोक्तविधानेन भस्मीकुर्यात्प्रयत्नतः ॥ १६ ॥ सर्वस्मादष्टगुणित भस्म वैक्रांतसंभवम् । तत्तुल्यं ताप्यजं भस्म तद्वद्विमलभस्म च ॥ १७ ॥ सर्वतस्त्रिगुणां तुल्या रसगंधककज्जलीम् । सर्वमेकत्र संमर्ध छागी दुग्धेन तद्दयहम् ॥ १८ ॥ विधाय पर्पटी यत्नात्परिचूर्ण्य प्रयत्नतः ।<noinclude></noinclude> 98ffzqjwzfbnz6iuf5tfwmq9n663b9p पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८५ 104 165672 418262 2026-09-05T09:56:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । (६६३) वंध्याकर्कोटकी चूर्णक्काथेन परिमर्दयेत् ॥१९॥ काननोत्पलविंशत्या पुटेत्षोडशवारकम् । एवं रसो विनिष्पन्नो रत्नभागोत्तराभिधः ॥२०॥ महावंध्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418262 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भापाटीकोपेतः । (६६३) वंध्याकर्कोटकी चूर्णक्काथेन परिमर्दयेत् ॥१९॥ काननोत्पलविंशत्या पुटेत्षोडशवारकम् । एवं रसो विनिष्पन्नो रत्नभागोत्तराभिधः ॥२०॥ महावंध्यादिवध्यानां सर्वासां संततिप्रदः । देवीशास्त्रे विनिर्दिष्टः पुंसां वंध्यत्वरोगनुत् ॥२॥ सोऽयं पाचनदीपनो रुचिकरो वृष्यस्तथा गर्भिणी- सर्वव्याधिविनाशनो रतिकरः पाण्डुप्रचंडार्तिनुत् । धन्यो बुद्धिकरश्च पुत्रजननः सौभाग्यकृद्योषितां निर्दोषः स्मर मंदिरामयहरो योगादशेषार्तिनुत् ॥ २२॥ हीरा ५ रत्ती, पन्ना ६ रत्ती, माणिक ७ रत्ती, पुखराज ८ रसी, नीलम ९ रत्ती, वैदूर्यमाणि १० रत्ती, गोमेदमणि ११ रत्ती, मोती १२ रसी और मुँगा १३ रत्ती इस प्रकार इन सब रनोंको क्रमसे उत्त तर भाग बढाकर लेवे और शास्त्रोक्त विधिसे सबकी भस्म कर लेवे । इन समस्त रत्नोंकी भस्मसे अठगुनी वैक्रान्तमणिकी भस्म, errorist सोनामाखी की भस्म और उसीकी बराबर रूपामाखीकी भस्म तथा सम्पूर्ण भस्मोंसे तिगुनी पारे और गन्धककी कन्जली लेवे ! सबको एकत्र मिलाकर दो दिनतक बकरीके दूधमें खरल करे । फिर उसको कढाई में पिघलाकर पूर्वोक्त विधिसे पर्पटी तैयार करलेवे । जब वह शीतल होकर सूखजाय तथ वारीक चूर्ण करलेवे । पश्चात् उस चूर्णको वाँझककोडेके काढमें घोटकर गोला बनाकर सुखालेवे । उस गोले को शरावसम्पुटमें बन्द करके २० उपलोंकी अग्निमें पुटपाक करे । फिर बाँझककाडेके क्वाथमें घोटकर पुट देवे । इस प्रकार १६ चार पुट देवे और प्रत्येक पुटके अन्तमें बाँझककाडेके रसमें घोटे ।<noinclude></noinclude> f56me6eokyfs0y9ix2c57nbnz8isz5n पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८६ 104 165673 418263 2026-09-05T09:56:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६४) रसरत्नसमुच्चयः । इन समस्त पुटको बारीक खरल करके पश्चात् उस रसको शीशी में भरकर रखदेवे । इस प्रकार यह रत्नभागोत्तर रस सिद्ध होता है । इस इसके सेवन से महावन्ध्य... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418263 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६६४) रसरत्नसमुच्चयः । इन समस्त पुटको बारीक खरल करके पश्चात् उस रसको शीशी में भरकर रखदेवे । इस प्रकार यह रत्नभागोत्तर रस सिद्ध होता है । इस इसके सेवन से महावन्ध्या, आदिवन्ध्या आदि सभी प्रकार की वन्ध्या- ओंका वन्ध्यत्व दूर होकर उनके सन्तान उत्पन्न होती है । और पुरु- षोंके वीर्य विकार के कारण उत्पन्न हुआ वन्ध्यत्व दोषभी नष्ट होजा- ताहै, ऐसा देवीशास्त्र में कहा है । यह रस अत्यन्त पाचक, अशिदीपक, रुचिकारक, वीर्यवर्द्धक, गर्भिणी स्त्रियों की सम्पूर्ण व्याधियोंको नाश करनेवाला, रतिशक्तिको बढानेवाला, और भयंकर पाण्डुरोगको नष्ट करनेवाला है । बुद्धिको बढानेवाला, पुत्रको उत्पन्न करनेवाला और स्त्रियोंके सौभाग्य की वृद्धि करनेवाला यह रस धन्य है । भिन्न भिन्न अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे यह सम्पूर्ण रोगोंको तथा काम- वासना के विकारोंको दूर करता है । यह रस निर्दोष है, इस लिये इनके सेवनसे कोई हानि नहीं होती, लाभही होता है ॥ १५-२२ ॥ चक्रिकाबन्ध रस ! गंधक: पलमात्रश्च पृथगक्षौ शिलालको । त्रिदिनं मर्दयित्वाऽथ विदध्यात्कजली शुभाम्॥२३॥ विषाणाकारमृषायां कज्जलीं निक्षिपेत्ततः । द्विपलस्य च ताम्रस्य तन्मुखे चक्रिकां न्यसेत् |२४| सन्निरुध्यातियत्नेन संधिबंधे विशोषिते । ततः करिपुटार्धेन पाकं सम्यक प्रकल्पयेत् ॥ २५ ॥ स्वतःशीतं समुद्धृत्य चक्रिकां परिचूर्णयेत् । स्थापयेत्कूपिकामध्ये वस्त्रेण परिगालिताम् ॥२६॥<noinclude></noinclude> 4uvr4n2p6imjmz0c055pfxnlms5v54d पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८७ 104 165674 418264 2026-09-05T09:56:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६६५) रसोऽयं चक्रिका बंधस्तत्तद्रो गरौषधैः । दातव्यः शूलरोगेषु मूले गुल्मे भगंदरे ॥ २७ ॥ ग्रहण्यामग्निमांद्ये च विद्रधौ जठरामये । नागोदरे तथैव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६६५) रसोऽयं चक्रिका बंधस्तत्तद्रो गरौषधैः । दातव्यः शूलरोगेषु मूले गुल्मे भगंदरे ॥ २७ ॥ ग्रहण्यामग्निमांद्ये च विद्रधौ जठरामये । नागोदरे तथैवोपविष्टके जलकूर्मके ॥ २८ ॥ स्कंदे नामंदकृपया त्रैलोक्यत्राणहेतवे । चक्रिका बंधनामायं प्रसूत स्त्रीगदापहः॥ २९ ॥ शुद्ध गन्धक ४ तोले, मैनसिल १ तोला और हरवाल १ तोला तीनोंको एकत्र मिलाकर तीन दिन तक खरल करके कज्जली करलेवे | उस कज्जलीको सींग के समान आकारवाली लम्बी भूषामें भरकर उसके मुँहपर ८ तोले शुद्ध ताँबेकी टिकिया बनाकर ढकदेव और सन्धिबन्द करके ऊपरसे कपरौटी कर सुखालेवे । फिर उसको अर्द्ध गजपुटमें रखकर उत्तम प्रकार से पुटपाक करे । स्वांगशीतल होनेपर तांबेकी टिकियाको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे और वस्त्रमें छानकर शशिमें भरकर रखदेवे । यह चक्रिकाबन्ध रस भिन्न भिन्न रोगना- शक अनुपानोंके साथ निम्नलिखित रोगों में प्रयोग करना चाहिये शूलरोग, अर्श, गुल्म,, भगन्दर, संग्रहणी, मंदाग्नि विद्रधि, उदररोग, गर्भपात, मूढगर्भ, जलोदर आदि रोगोंमें इस रस के सेवनसे विशेष उपकार होता है । त्रिलोकीकी रक्षाके निमित्त श्री स्वामीकार्त्तिकेयने बडी कृपा करके यह रस वर्णन किया है । यह प्रस्ता स्त्रियोंके समस्त रोगको दूर करनेवाला है ॥ २३-२९ ॥ वर्द्धमानरस । पलार्धप्रमिते स्वर्ण ताम्रं दत्त्वाऽक्षमात्रकम् । निर्वापयेच्छतं वारं निक्षिप्य शुकपिच्छकम् ॥ ३०॥<noinclude></noinclude> bx7yr7uzecvsyyifv7jl0bztjksv0na पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८८ 104 165675 418265 2026-09-05T09:57:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । ततश्च जारणायंत्रे सूत्रस्थान समीरितें । जारणातलसंयुक्तं जीर्णषड्गुणसंयुतम् ॥ ३१ ॥ रसं हि द्विपलं दत्त्वा जारणा विधियोगतः । जारयित्वा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । ततश्च जारणायंत्रे सूत्रस्थान समीरितें । जारणातलसंयुक्तं जीर्णषड्गुणसंयुतम् ॥ ३१ ॥ रसं हि द्विपलं दत्त्वा जारणा विधियोगतः । जारयित्वा ततः पश्चात्पिष्टं सूतं प्रयत्नतः ॥ ३२ ॥ सूत्रप्रोक्तेष्टिकायंत्रे स्वेद्यावेष्टय च वाससा । मातुलुंगरसैः पिष्टं चतुर्निष्कमितं दनुम् ॥ ३३ ॥ ऊर्ध्वं च विधायाऽथ जारयित्वा चतुर्गुणम् । तमादाय रसं सम्यग्विचूर्ण्य परिगाल्य च ॥ ३४ ॥ षष्ठांशेन मृतं वज्रं समं वैक्रांतकं स्मृतम् । निक्षिप्य लिंगिकापत्ररसैरापूर्य वासरम् ॥ ३५ ॥ पुटेद् द्वादशवाराणि मध्वा द्वादशकोपलैः । बंधुजीवरसेनाऽथ लक्ष्मणास्वरसेन च ॥ ३६ ॥ पुनः संचूर्ण्य सपूज्य योगिनी पितृदेवताः । पुत्रिण्याः पूर्णिमायाश्च पूजिताया विधानतः ॥ ३७ इति कृत्वाssप्नुयान्न षण्मासाऽभ्यंतरे खलु । आदिवंध्यादिका वंध्या याश्चान्या दुष्टयोनयः ॥ ३८॥ प्राप्नुयुर्जीविपुत्रं हि भाग्यसौभाग्यसंयुतम् । पुंसामपिच वंध्यत्वमल्परेतस्त्वमेव च ॥ ३९ ॥ बीजदोषा विचित्राश्व विनश्यंति न संशयः ॥ ४० ॥ ब्रह्मज्योतिर्मुनिवरमतो वर्धमानो रसोऽयं बंध्यारोगं हरति सकलं योनिदोषानशेषान् । १ गंधकम ।<noinclude></noinclude> gm5xoc7sjbema0r9eqs1g1nkut0nyqf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८९ 104 165676 418266 2026-09-05T09:57:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६६७) सुतीरोगानपि बहुविधान्दुःखसाध्यान्समस्ता- न्रोगानन्यानपि रसवरो योगयुक्तो निहन्यात् ॥ ११ ॥ २ दो तोले सुवर्णमें १ तोला शुद्ध तांचा डालकर गल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६६७) सुतीरोगानपि बहुविधान्दुःखसाध्यान्समस्ता- न्रोगानन्यानपि रसवरो योगयुक्तो निहन्यात् ॥ ११ ॥ २ दो तोले सुवर्णमें १ तोला शुद्ध तांचा डालकर गलावे । फिर उसमें ३ तोले शुद्ध नीलाथोथा डालकर चलावे । जब तीनों रस पिघलकर एक रूप होजायँ तब नीचे उतारकर शीतल करलेवे । इस प्रकार तीनों रसोंको १०० वार पिघलाकर १०० बार शीतल करे । फिर वारीक चूर्ण करके लहसुन के रसमें घोटकर गोला बनालेवे । पश्चात् १२ अंगुल ऊँची और इतनीही लम्बी, चौडी लोहेकी दो भूषा तैयार करावे | उनमेंसे एककी तलीमें १ छेद करदेवे और दूसरी विना छेदकी रक्खे फिर सूत्रस्थानमें कहे हुए जारणायन्त्रमें छः गुने गंधक के साथ जारण किये हुए ८ तोले पारेकी क्षार तैल (पाताल यन्त्र के द्वारा खींचा हुआ ) और लहसुनके रसमें घोटकर विना छेद- वाली मूषामें भरदेवे और दूसरी छेदवाली मूषामें उपर्युक्त वर्ण आदिका गोला रक्खे | पारेकी मूषाके ऊपर सुवर्णके गोलेवाली मूषाको अच्छीतरह जमाकर रक्खे। फिर एक चौडे मुँहवाली हांडी में उस मूषा के सम्पुटको रखदेवे और उसमें इतना पानीभर देवे । जिसमें पारेकी मूषा डूबी रहे, फिर उस हांडीके ऊपर दूसरी हांडी औंधा मुँह करके इस प्रकार ढके कि उसका मुँह नीचेकी हांडीके मुँह में घसजाय । फिर दोनों हांडियों के मुँहपर कपरौटी करके सुखालेवे और ऊपरकी हांडी की तलीके ऊपर भैंस के दूधमें चुना और मण्डूर मिलाकर उसकी पाली बनालेवे । फिर उस यन्त्रको चुल्हेपर चढाकर नीचे लकडियोंकी अग्नि जलावे और उसके ऊपर आरने उपलोंकी और अनिकी क्रमसे वृद्धि करता चलाजाय । इसप्रकार १५ घंटे तक अग्निदेवे । स्वांगशीतल होनेपर यन्त्रको खोलकर मूषामेंसे रसको<noinclude></noinclude> heuto4qqkimxj3wcwkaaw7muusfgd4w पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९० 104 165677 418267 2026-09-05T09:58:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । निकाललेवे । इस प्रकार जारण करनेसे पारा, सुवर्ण और ताम्रको ग्रस जाता है । यह सुवर्ण ताम्रजारित पारद तैयार हुआ । इस विधि से जारण किये हुए पारे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418267 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । निकाललेवे । इस प्रकार जारण करनेसे पारा, सुवर्ण और ताम्रको ग्रस जाता है । यह सुवर्ण ताम्रजारित पारद तैयार हुआ । इस विधि से जारण किये हुए पारेको बारीक पीसकर पूर्व नवें अध्यायमें कहे हुए इष्टिकायन्त्रमें चार बार गन्धकके साथ जारण करे अर्थात जमीनमें एक छोटासा गड्ढा खोदकर उसमें ८ अँगुल लम्बी चौडी एक ईट रक्खे और उस ईटमें १ चौकोर गड्ढा करदेवे । फिर सके दूधमें चूना और मण्डूर मिलाकर उसी गड्ढे के चारों ओर एक २ अंगुल ऊँची पाली बनादेवे और उसके ऊपर १ तोला पूर्वोक्त स्वर्णतान जारित पारा रखकर ईंटकीपालकि ऊपर सफेद कपडा बांधदेवे । उसके ऊपर बिजौरे नींबू के रसमें घोटी हुई १६ मासे गन्धक रक्खे और ऊपरसे एक सकोरा ऐसा ढके जा ईंटके ऊपर अच्छीतरहसे जमजवि, फिर मिट्टी से सम्धिलेप करके उसके ऊपर उपलों की मन्द २ अग्निदेवे । इस प्रकार बारंबार पारसे चौगुनी गन्धकको जारण करके उस रसको लेकर बारीक चूर्ण करलेवे और वखमें छान लेवे । इसके पश्चात पारेका जितना वजन हो उसका छठा भाग हीरे की भस्म और उत- नीही वैक्रान्तमणिकी भस्म पारेमें मिलाकर शिवलिंगीके रसमें १ दिन तक घोटकर गोला बनालेवे । उसको सुखाकर शरावसम्पुट बन्द करके १२ उपलोंकी अग्निमें पकावे । इसी प्रकार शिवलिंगीके रस में १२ बार घोटकर १२ बार पुटदेवे । फिर शहद में घोट २ कर १२ बार पुट देवे । १२ बार दुपहरिया के पत्तोंके इसमें घोटकर और १२ बार सफेद कटेरीके रसमें घोटकर पुटदेवे । इस प्रकार कुल ४८ पुट देनेके पश्चात् रसको खूब बारीक पीसकर कपड़छान करके शीशी में भरकर रखदेवे । प्रथम योगिनी, पितृगण, देवता, पुत्र- बती और पतिव्रता स्त्रियों का यथाविधि पूजन करके फिर<noinclude></noinclude> 5t0zequeiz3iaqb0kd4faqev9lu4orw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९१ 104 165678 418268 2026-09-05T09:58:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६६९) इस रसको सेवन करना प्रारम्भ करे । नियमानुसार इस रसका ६ महीने पर्यन्त सेवन करनेसे आदिवन्ध्या आदि सभी प्रकार की वन्ध्या स्त्रियाँ और सभी प्रका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६६९) इस रसको सेवन करना प्रारम्भ करे । नियमानुसार इस रसका ६ महीने पर्यन्त सेवन करनेसे आदिवन्ध्या आदि सभी प्रकार की वन्ध्या स्त्रियाँ और सभी प्रकार की दूषित योनिवाली स्त्रियाँ गर्भवती होजाती हैं और वे दीर्घ जीवी, भाग्यवान् और प्रतापी पुत्रको उत्पन्न करती हैं । इस रसके सेवन से पुरुषोंके वीर्यविकार के कारण उत्पन्न हुआ वन्ध्यत्व दोष, और अल्पवर्यित्व दोषभी दूर होजाता है । इसके अति- रिक्त इस रसके द्वारा, विविध प्रकारके वीर्यविकार निस्सन्देह नाश होजाते हैं । यह वर्धमान रसब्रह्म ज्योति नामक मुनीश्वरका अनुभव किया हुआ है । यह रस सब प्रकार के बन्ध्यत्व रोग, सम्पूर्ण योनिरोग, अनेक प्रकार के प्रसूतरोग और स्त्री पुरुषोंके अन्य सभी कष्टसाध्य रोगोंको भिन्नभिन्न अनुपान के साथ सेवन करने से शीघ्र नष्ट करता है ॥ ३०-४१ ॥ दुतिसार रस । युक्तं हि व्योमत्यां तुल्यांशं स्वर्णयुग्रसम् । पिष्टीकृतं चिरं पिष्ट्वा मल्लसंपुटके क्षिपेत् ॥ ४२ ॥ निष्कमात्रं बलिं दत्त्वा शतवारं पुटेत्ततः सम्यङ् निष्पिष्य संगाल्य करण्डांतर्विनिक्षिपेत् ४३ इत्युक्तो द्रुतिसारनामकरसो वंध्यामयध्वंसनः पुत्रीयः खलु सूतिकामयहरो वृष्यश्विरायुः करः । सम्यक सिद्ध बलिदुतिप्रकलितो गुजामितः सेवितः । कुर्यात्तीव्रतरां क्षुधं त्वथ महारोगादि रोगाञ्जयेत् ४४ मतः सर्वामयध्वंसी रसोयं हरिसूचितः । जीवत्पुत्रप्रदः स्त्रीणां यौवनस्थैर्यदायकः ॥ ४५ ॥<noinclude></noinclude> 82s8hl91u1kcygn4dpz9ezbb6m7ex2k पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९२ 104 165679 418269 2026-09-05T09:58:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७० ) रसरत्नसमुच्चयः । भूतप्रेत पिशाचानां भयेभ्योऽभयदायकः । जडान दोहदार्तानां मंदबुद्धिमतामपि ॥ ४६ ॥ मंडूकीर संयुक्त दातव्यो वचया सह । जन्मवध्याः काकवंध्या... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६७० ) रसरत्नसमुच्चयः । भूतप्रेत पिशाचानां भयेभ्योऽभयदायकः । जडान दोहदार्तानां मंदबुद्धिमतामपि ॥ ४६ ॥ मंडूकीर संयुक्त दातव्यो वचया सह । जन्मवध्याः काकवंध्या मृतवत्साश्च याः स्त्रियः । तासां पुत्रोदयार्थाय शंभुना सूचितः पुरा ॥ ४७ ॥ प्रथम ४ तोल सुवण और ४ तोले पारेको एकत्र एकदिन तक खरल करे, फिर उसको ४ तोले अभ्रककी दुतिमें मिलाकर दूसरे दिन खूब बारीक पीसकर पिठ्ठीसी बनालेवे । उस पिट्टीको लोहेके सम्पुटमें भरकर उसके ऊपर ४ मासे गन्धक रक्खे और सम्पुटके ऊपर कपरौटी करके १२ उपलोंकी अग्नि देवे | इस प्रकार बारम्बार चार २ मासे गन्धह डालकर १०० बार पुटदेवे । फिर बारीक पीसकर और वस्त्रमें छानकर शीशी में भरकर रखदेवे । इस को दुतिसार रस कहते हैं । यह बन्ध्या स्त्रियोंके सम्पूर्ण रोगोंको नाश करनेवाल, पुत्र उत्पन्न करनेवाला और सूतिकारोगको हरनेवाला है । एवं वीर्यवर्द्धक और आयुकी वृद्धि करनेवाला है । विधिपूर्वक सिद्धकी हुई गन्धक की दुतिके साथ इस रसको प्रतिदिन एक १ रत्ती परिमाण सेवन करने से खूब भूख लगती है और महारोग आदि बडे बडे भयकर रोगभी शीघ्र दूर होजाते हैं । यह श्रीहरि नामक आचार्यका कहा हुआ रस सम्पूर्ण रोगोंको विनाश करनेवाला है । स्त्रियों को जीवीत पुत्र प्रदान करनेवाला, यौवन को स्थिर करनेवाला, तथा भूत, प्रेत, पिशाचादिके भयको दूरकर अभयप्रदान करनेवाला है। गर्भकी पीडासे पीडित स्त्रियों को और मन्दबुद्धिवाले जड मनुष्योंको यह रस ब्राह्मार्क स्वरस और वचके चूर्ण के साथ सेवन करावे । जो स्त्रियाँ जन्म से<noinclude></noinclude> cvf5watq81y3am5hrdq3h9ksx0zhw02 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९३ 104 165680 418270 2026-09-05T09:59:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६७१) बाँझ हों अथवा जिनके एकवार सन्तान होकर फिर गर्भ न रहता हो या जिन खियाके मरीहुई सन्तान होती हो अथवा उत्पन्न होते ही मरजाती हो उन स्त्रियों के पु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६७१) बाँझ हों अथवा जिनके एकवार सन्तान होकर फिर गर्भ न रहता हो या जिन खियाके मरीहुई सन्तान होती हो अथवा उत्पन्न होते ही मरजाती हो उन स्त्रियों के पुत्रोत्पत्तिक लिये श्रीशङ्कर भगवानने पूर्व- कालमें इस रसको निर्दिष्ट किया है ।। ४२-४७ ॥ सामान्य उपाय | समूलपत्रां सपाक्षीं रविवारे समुद्धरेत । एकवर्णगवां क्षीरैः कन्याहस्तेन पेषयेत् ॥४८॥ ऋतुकाले पिबेद्वंध्या पलार्धं तद्दिने दिने । क्षीरशाल्यन्नमुद्र व ह्यल्पाहारं प्रकल्पयेत् ॥४९॥ उद्वेगं त्वथशोकं च दिवानिद्रां च वर्जयेत् । न कर्म कारयेत्किंचिद्वर्जयेच्छीतमातपम् ॥५०॥ एवं सप्तदिनं कुर्याद्वन्ध्या भवति गर्भिणी । देवदालीय मूलं तु ग्राहयेत्पुष्य भास्करे ॥५१॥ निष्कत्रयं गवां क्षीरैः पूर्ववत्क्रमयोगतः । वंध्या प्रलभते गर्भदिनं पथ्यं यथा पुरा ॥५२॥ शीततोयेन संपिष्टं शरपुंखीयमूलकम् । कर्ष पीत्वा लभेद्गर्भे पूर्ववत्क्रमयोगतः ॥५३॥ नोवेदपरमासे तु कारयेत्पूर्ववत्फलम् । पतिसंगे लभेद्गर्भे नात्र कार्या विचारणा ॥५४ ॥ एवमेव तु रुद्राक्षं सर्पाक्षी कर्षमात्रकम् । पूर्ववञ्च गवां क्षीरैर्ऋतुकाले प्रदापयेत् ॥५५॥<noinclude></noinclude> bonnwojmysom0os309x9g9dh00xk45l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९४ 104 165681 418271 2026-09-05T09:59:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । महागणेशमंत्रेण रक्षां तस्यास्तु कारयेत् । एवं दिनत्रयं कृत्वा वंध्या भवति पुत्रिणी ॥ १६॥ सुश्वेत कंटकार्याश्च मूलं तद्वच्च गर्भकृत् ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । महागणेशमंत्रेण रक्षां तस्यास्तु कारयेत् । एवं दिनत्रयं कृत्वा वंध्या भवति पुत्रिणी ॥ १६॥ सुश्वेत कंटकार्याश्च मूलं तद्वच्च गर्भकृत् । पूर्वपुत्रवती तासां कर्म तद्वच्च कारयेत् ॥५७॥ पेषयेन्महिषीक्षीरै विष्णुकांतां समूलकाम् । महिषीनवनीतेन ऋतुकाले तु भक्षयेत् ॥ ३८ ॥ एवं दिनेत्रयं कुर्यात्पथ्यं युक्त्या च पूर्ववत् । गर्भ लभते नारी काकवंध्या सुशोभनम् ॥५९॥ अश्वगंधीमूलं तु ग्राहयेत्पुष्यमास्करे । पेषयेन्महिषीक्षीरैः पलार्ध पाययेत्सदा । सप्ताहालभते गर्भ काकवंध्या चिरायुषम् ॥ ६०॥ रविवार के दिन जड और पत्ते आदि पंचाङ्ग सहित सरहटी लताको उखाड़कर लावे और उसको एक रंग की गाय के दूध के साथ कन्या के हायसे पिसवावे | फिर वन्ध्यात्री ऋतुस्नान के पश्चात् उस औषधको प्रतिदिन दो तोले परिमाण सेवन करे। इसके ऊपर दूध शालिबान- लोका भात, मँगका यूष आदि लघुपाकी पदार्थोंका अल्प आहार करे । एवं उद्वेग, शोक, दिनमें सोना आदिको त्यागदेना चाहिये । ऐसी स्त्रीसे कोई भी मेहनतका काम नहीं कराना चाहिये । और अधिक शीत तथा अधिक गरमीसे बचाये रखना चाहिये । इस प्रकार सात दिन तक उपचार करनेसे वन्ध्या स्त्री गर्भवती होती है । अथवा राववार के दिन जव लता की जडको लाकर पुष्य नक्षत्र हो तब देवदाली (बंदाल ) पूर्वोक्त विधिसे अर्थात् एक रंगी गायके १ सप्तदिनं ।<noinclude></noinclude> 7i2xxtr281fp0o0lv6pz5tg8px2plrw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९५ 104 165682 418272 2026-09-05T10:00:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६७३) पश्चात् दूधमें कन्याके हाथसे पिसवाकर ऋतुमती स्त्रीको स्नान के सातदिन तक एक २ तोला परिमाण सेवन कराने और पूर्ववत् पथ्य देवे तो वन्ध्या स्त्री... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६७३) पश्चात् दूधमें कन्याके हाथसे पिसवाकर ऋतुमती स्त्रीको स्नान के सातदिन तक एक २ तोला परिमाण सेवन कराने और पूर्ववत् पथ्य देवे तो वन्ध्या स्त्री गर्भको धारण करती है । या सरफोकेकी जडको प्रतिदिन एक २ तोला लेकर शीतल जल के साथ पीसकर सात दिन तक पान करे और उपर्युक्त पदार्थोंका पथ्य सेवन करे तो वन्ध्या स्त्री गर्भवती होती है । यदि कदाचित् पहले महीने में गर्भ न रहे तो दूसरे महीने में ऋतु स्नान के बाद फिर उक्तविविसे इस औषधको ७ सहवास करे तो रुद्राक्ष और सर दिन तक सेवन करे, पथ्य रक्खे और पतिके साथ अवश्य गर्भ उत्पन्न होता है । इसी प्रकार छः मासे ६ मासे सरकि पंचांगको लेकर दोनोंको एक वर्णवाली गायके दूधमें कन्याके हाथसे पीसवाकर ऋतुस्नान के समय वन्ध्या स्त्रीको सेवन करावे और महागणेश मन्त्रसे उसकी रक्षा करे । इस प्रकार ३ दिन तक इस औषधको व्यवहार करनेसे वन्ध्यास्त्री पुत्रवती होती है । अथवा सफेद कटेरीकी १ तोला जडको इकरंगी गायके दूध में कन्या के हाथसे पिसवाकर ऋतुस्नानके बाद ३ दिन तक पान कराने और पूर्वोक्त पदार्थोंका पथ्य देनेसे वन्ध्यास्त्री पुत्रवती होती है । विष्णुक्रान्ता (सफेद कोयल) के १ तोला पंचागको भैंस के दूधमें परिकर और भैंसके नोनी घीमें मिलाकर ऋतुमती स्त्रीको स्नानके पश्चात् सेवन करावे और युक्तिपूर्वक पूर्वोक्त पदार्थोंका पथ्य देवे । इस प्रकार तीन दिन तक इस औषधका प्रयोग करनेसे काकवन्ध्या स्त्री गर्भवती होकर उत्तम सन्तानको प्राप्त करती है । अथवा रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में असगन्धकी जडको लावे और भैंस के दूधमें पीसकर प्रति दिन दो २ तोले परिमाण ऋतुमती स्त्रीको पान करावे । सात दिन २४<noinclude></noinclude> 2fxgveehio1uqhawpt44do6xno4162g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९६ 104 165683 418273 2026-09-05T10:00:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (६७४) रसरत्नसमुच्चयः । तक इसको सेवन करनेसे काकवन्ध्या स्त्री गर्भ धारण करके दीर्घायु पुत्रको उत्पन्न करती है ॥ ४८-६० ॥ शिवाक्त तान्त्रिक प्रयोग । गर्भः संजातमात... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418273 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(६७४) रसरत्नसमुच्चयः । तक इसको सेवन करनेसे काकवन्ध्या स्त्री गर्भ धारण करके दीर्घायु पुत्रको उत्पन्न करती है ॥ ४८-६० ॥ शिवाक्त तान्त्रिक प्रयोग । गर्भः संजातमात्रस्तु पक्षान्मासाच्च वत्सरात् । म्रियते द्वित्रिवर्षैर्वा यस्याः सा मृतवत्सका ॥ ६१ ॥ तत्र योगं प्रकुर्वीत यथा शंकरभाषितम् ॥ ६२ ॥ मागशीर्षेऽथ वा ज्येष्ठ पूर्णायां लेपिते गृहे । नूतनं कलशं पूर्ण गंधतोयेन कारयेत् ॥ ६३ ॥ शाखा फलसमायुक्तं सर्वरत्नसमन्वितम् । सुवर्णमुद्रिकायुक्त षट्कोणे मण्डले स्थितम् ॥ ६४ ॥ तन्मध्ये पूजयेदेवीमेकांतानामविश्रुताम् । पुष्पाक्ष पदी पैने वेद्यसंयुतैः ॥ अर्चयेद् भक्तिभावेन मधैमीसैः समत्स्यकैः ॥ ६५॥ ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराही च तथा चेंद्री षट्पत्रेषु च मातृकाः ॥ पूजयेन्मंत्रलिंगे हीमोंकारैर्नामसंयुतैः ॥ ६६ ॥ दधिभक्तेन पिण्डानि सप्तसंख्यानि कारयेत षट्संख्या षट्सु पत्रेषु आहृत्य कल्पयेत्पृथक् ॥ ६७॥ उल्लेख्य सप्तकं पिण्डं शुचिस्थाने बहिः क्षिपेत् । तैर्भुक्तैर्गृहमा गच्छेचा योगमाचरेत् ॥ ६८ ॥ कन्यका योगिनी रामा भोजयेत्सकुटुंबकम् । दक्षिणां दापयेत्तासां देवताग्रे निवेद्य च ॥ ६९ ॥<noinclude></noinclude> 4hfqom93sqzeabbaeqz8tccmnbs7cd7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९७ 104 165684 418274 2026-09-05T10:00:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६७५) विसर्ग्य देवतां चाऽथ नद्यां तत्कलशोदकम् । शकुनं वीक्षयेद्धी माशुभेन शुभमादिशेत् ॥७०॥ विपरीते पुनः कुर्याद्योगं तद्वत्सुसिद्धिदम् । प्र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६७५) विसर्ग्य देवतां चाऽथ नद्यां तत्कलशोदकम् । शकुनं वीक्षयेद्धी माशुभेन शुभमादिशेत् ॥७०॥ विपरीते पुनः कुर्याद्योगं तद्वत्सुसिद्धिदम् । प्रतिवर्षमिदं कुर्याद्दीर्घजीवी सुतो भवेत् ॥७३॥ "ॐ ह्रां ह्रीं एकांत देवताय नमः" अनेन मंत्रेण पूजा जपश्च कार्यः । : प्राङ्मुखः कृत्तिकाऋक्षे वंध्याककोटकी हरेत् । तत्कंदं पेषयेत्तोये कर्षमात्रं पिबेत्सदा ॥७२॥ ऋतुकाले तु सप्ताहं दीर्घजीवी सुतो भवेत् ॥७३॥ जिस स्त्रीके बालक जन्मतेही मरजाते हों अथवा १५ दिनमें, मही- नमें वर्ष में, दो वर्ष में या तीन वर्षमें मरजाते हों उसको मृतवत्ला कहते हैं । ऐसी स्त्री पर श्रीशंकर भगवान्का कहा हुआ निम्नलिखित तान्त्रिक प्रयोग करना चाहिये । अगहनके या जेठके महीने में पूर्णि माके दिन घरको लीप पोतकर शुद्ध करे। फिर उसमें नाबा, सोना या चाँदी के नवीन कलशमें सुगन्धियुक्त जल भरकर रक्खे और कलश नवरत्न तथा सुवर्णकी मुद्रिका डालकर उसके ऊपर एक नारियल रक्खे और चारों तरफ बन्दरवाल बाँधकर उस कलशको उत्तर दिशा में ६ कोनेवाले मण्डल ( चौक) के बीच में स्थापन करे | फिर उस मण्डल के बीचमें एकान्ता नामवाली देवीका स्थापन कर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, मद्य, मांस, मत्स्य आदि पदार्थों के द्वारा भक्ति भावना सहित “ ॐ ह्रां ह्रीं एकान्तदेव्यै नमः" इस नाममन्त्रसे षोडशोपचार पूजन करे। इसके पश्चात् षट्कोण ।<noinclude></noinclude> 7n81mgggzonll82lspd9vmnywjowre8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९८ 104 165685 418275 2026-09-05T10:01:06Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७६ ) रसरत्नसमुचयः । 33 मण्डल के प्रत्येक कोणमें क्रमसे ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, और इन्द्राणी इन ६ मातृकाओंका उपवाहन करके प्रत्येक देवकि नामम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418275 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६७६ ) रसरत्नसमुचयः । 33 मण्डल के प्रत्येक कोणमें क्रमसे ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, और इन्द्राणी इन ६ मातृकाओंका उपवाहन करके प्रत्येक देवकि नाममन्त्र के पहले ॐ ह्रीं इस मंत्र को जोडकर पूर्वोक्त पदार्थोंसे षोडशोपचार पूजन करे। फिर दही और भात मिलाकर ७ पिण्ड बनावे | उनमें से ६ पिण्ड छहों मातृकाओंके आगे एक एक करके रख देवें और सातवें पिण्डके ऊपर कुशासे या चाँदी की सलाईसे ५ या ७ लकीरें खींचके उसको घर के बाहर चौराहे के पवित्र स्थान में रखदेवे । जब कौवे कुत्ते आदिउस बलिदानके पिण्डको खाजायें तब घरको आकर उक्त षट्कोण मण्डलके आगे आसन बिछाकर बैठजावे और " ॐ ह्वाँ ह्रीं एकान्तदेव्यै नमः इस मन्त्रका १००८ बार अथवा १०००८ बार जप करे । इसके पश्चात् कन्या, योगिनी और सौभाग्यवती स्त्रियोंको कुटुम्ब सहित भोजन करावे और उनको जो दक्षिणा देवे, उसको पहले देवताके आगे चढाकर देवे । फिर देवी देवताओंका विसर्जन करके उस सब सामग्रीको और कलशके जलको नदीमें डाल देवे । उस समय बुद्धिमान् मनुष्य जलकी तरंगोंको देखकर शकुन विचारे । यदि नदीमें भँवर पडता हो और उसकी लहरें अपनी तरफ आती हुई मालूम हों तो शुभ शकुन जानना चाहिये और जो इसके विपरीत लक्षण हों तो अपशकुन समझना चाहिये | अपशकुन होनेपर फिर इसी प्रकार इस प्रयोगको करे । यह प्रयोग बन्ध्या स्त्रियोंको निस्सन्देह पुत्ररूप सिद्धिप्रदान करता है । इस प्रयोगको प्रतिवर्ष करनेसे दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न होता है । "ॐ ह्रीँ ह्रीं एकान्तदेवतायै नमः " इस मंत्र से पूजा और जप करना चाहिये इस प्रयोग के पश्चात् कृत्तिका नक्षत्रमें पूर्वकी और मुँह करके बाँझककोडेके कन्दको उखाडकर उस कन्दको ऋतुस्नान के पश्चात् प्रतिदिन १ तोला लावे ।<noinclude></noinclude> k7rrpy4k69jvjmtwenmfvfhdp12vwnp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९९ 104 165686 418276 2026-09-05T10:01:28Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६७७) परिमाण लेकर जलमें पीसकर पान करे । इस औषधको एक सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे और उपर्युक्त पदार्थोंका पथ्य करनेसे वन्ध्या are दीर्घायुषी पुत्र उत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418276 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (६७७) परिमाण लेकर जलमें पीसकर पान करे । इस औषधको एक सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे और उपर्युक्त पदार्थोंका पथ्य करनेसे वन्ध्या are दीर्घायुषी पुत्र उत्पन्न होता है ॥ ६१-७३ ॥ गर्भिणके रोग | गर्भिणीके रोग दूर करने और गर्भको पोषण करनेके सामान्य उपाय | अकस्मात्प्रथमे मासि गर्भे भवति वेदना | गोक्षीरैः पेषयेत्तुल्यं पद्मकोशीरचंदनम् ॥ पलमात्रं पिबेनारी त्र्यहाद्दर्भः स्थिरो भवेत् ॥७४॥ नीलोत्पलं मृणालं च खण्डं कर्कट शृंगिकाम् । गोक्षीरद्वितये मासि पीत्वा शाम्यति वेदना ॥७५॥ श्रीखण्डं तगरं कुष्टं मृणालं पद्मकेसरम् । पिबेच्छीतोदकैः पिष्टं तृतीये वेदना नहि ॥ ७६ ॥ नीलोत्पल मृणालानी गोक्षीरैश्च कसेरुकम् ॥ ७७ ॥ पाठामुस्तावयस्थाम्बुसारिवापद्मकैः शृतम् । शीतं तोयं निहत्याशु गर्भिणीज्वरवेदनाम् ॥ ७८ ॥ छिन्नाश्रीपर्णिकाक्वाथः सिताक्षौद्रयुतो हरेत् । गर्भिणीनां ज्वरं घोरं लंकेशमिव राघवः ॥ ७९ ॥ पयस्यासारिवा यष्टीबलालोधमधूद्भवः । दुग्धेन मिश्रितः काथो हरेद्गर्भवतीज्वरम् ॥ ८० ॥ दुर्जयः सर्वरोगेषु गर्भिणीनां ज्वरः खलु । तापो जूर्तिषु सर्वत्र विक्रियां कुरुतेतराम् ॥ ८१ ॥<noinclude></noinclude> s1mot1qv0y9au0i1jtj4onu1jezusn2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०० 104 165687 418277 2026-09-05T10:01:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७८ ) रसरत्नसमुच्चयः । वृक्षकत्वग्घनो देवदारु दारू विभावरी । गर्भिण्या अतिसारघ्नः क्वाथ एषां भवेद् ध्रुवम् ॥ ८२॥ श्रीपर्णीयष्टिगोप्यन्ददा वक्काथोऽतिसारनु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418277 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६७८ ) रसरत्नसमुच्चयः । वृक्षकत्वग्घनो देवदारु दारू विभावरी । गर्भिण्या अतिसारघ्नः क्वाथ एषां भवेद् ध्रुवम् ॥ ८२॥ श्रीपर्णीयष्टिगोप्यन्ददा वक्काथोऽतिसारनुत् । बलादुरालभापाठाशुंठी मुस्ताकषायवत् ॥ ८३ ॥ जातः पुनर्नवार्द्राभ्यां क्वाथः क्षीरयुतो निशि । पीतो हरेदुदावर्ते गुल्मार्शःशोफवेदनाम् ॥ ८४ ॥ घृतक्षीरगुडान्वाऽऽर्द्रक्वाथसिद्धेन चूर्णिताम् । कणां संयोज्य सेवेत शोफपित्तापनुत्तये ॥ ८५ ॥ पुनर्ववाव चाकल्कधान्यैलैपोऽतिशोफनुत् । गुडाज्यसहितं क्वाथं वर्षाभूमूलसाधितम् ॥ ८६ ॥ उदावर्ते च शोफे च गर्भिणी पाययेद्भिषक | पित्तार्ति हंति यष्टीका द्राक्षामलकसाधिता ॥ ८७ ॥ पीता दुग्धयवागूश्च गर्भिणीनामसंशयम् । तिक्ताहरीतकी भाङ्गवचाशुंठी कषायकम् ॥ ८८ ॥ सगुडं पाययेद्वैद्यः श्वासकासापनुत्तये । मरीचचूणै सक्षौद्रसिताज्यं कासनाशनम् ॥ ८९ ॥ लाजलाकोलमज्जांबु निपीतं वांतिनाशनम् । बोला बिल्वोद्भवः क्वाथो हिक्कां हंति समाक्षिकः ९० ॥ अजमोदाश्वगन्धा च द्वे कणे जीरकं तथा । लढा मधुगुडोपेता निहन्युर्मेदवह्निताम् ॥ ९१ ॥ १ बला ।<noinclude></noinclude> 9olwho2tv25z8hm0kbxky3ojj2x0kuq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०१ 104 165688 418278 2026-09-05T10:02:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६७९) Nisaaदारीभिः पृश्निपर्ण्या व साधितम् । क्षीरं क्षीरयवाग्वापि पिबेद्वातकृतामये ॥९२॥ श्रदंष्ट्रबलयोः काथो मृत्ररोगे प्रशस्यते ॥९३॥ सुरदारु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418278 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६७९) Nisaaदारीभिः पृश्निपर्ण्या व साधितम् । क्षीरं क्षीरयवाग्वापि पिबेद्वातकृतामये ॥९२॥ श्रदंष्ट्रबलयोः काथो मृत्ररोगे प्रशस्यते ॥९३॥ सुरदारु वयस्था च शाकबीजं च यष्टिका । बला कृष्ण तिलास्ताम्रवल्ली चाश्मंतकस्तथा ॥ नीलोत्पलं वयंस्था व गुडूची सारिवा तथा ॥९४॥ मधुयष्टी च पद्मं च रात्रा साखिया सह । काश्मयों वृहती क्षीरी शृंगवल्लीत्वचो घृतम् ॥ ९५ ॥ मधुपर्णीबला शिग्रुश्वदंष्ट्रा पृश्रिपार्णिकाः । सितामधुक शृंगा द्राक्षाबिसकसेरुकाः । ९६॥ सप्तश्लोकार्धनिर्दिष्टान्योगान्सप्त पयोऽन्वितान् । पिबेत्क्रमेण मासेषु गर्भस्त्रावादिवारणान् ॥९७॥ उशीरयष्टी संसिद्धं गर्भिणीवातहृत्पयः । द्राक्षायष्टिकसिद्धा च यवागूश्च तथाफला ॥९८॥ बला वासा पृथक्पर्णी निर्यूहश्वापि पित्तनुत् । सपुनछिन्नया युक्तो गर्भिणीकामलापहः ॥९९॥ कासं श्वासं तथा रक्तपित्तं चाशु विनाशयेत् । अघृतः सघृतो वापि सदुग्धो वाप्यदुग्धवान् ॥ १००॥ एक एव बल्लाकाथो गर्भिणी सर्वरोगनुत् ॥१०१॥ गर्भ धारण होनेपर पहले महीने में गर्गमें अकस्मात् पीडा होती है, इससे गर्भस्राव होनेकी सम्भावना होती है । उस समय ११ बला इति पाठोषि हस्त लिखित पुस्तके उपलभ्यते । २ पयस्या ।<noinclude></noinclude> 4wla1igb5ff07vi9j6bky37xa9d5r0i 418279 418278 2026-09-05T10:02:42Z Bnarayanan V 10460 418279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६७९) दारीभिः पृश्निपर्ण्या व साधितम् । क्षीरं क्षीरयवाग्वापि पिबेद्वातकृतामये ॥९२॥ श्रदंष्ट्रबलयोः काथो मृत्ररोगे प्रशस्यते ॥९३॥ सुरदारु वयस्था च शाकबीजं च यष्टिका । बला कृष्ण तिलास्ताम्रवल्ली चाश्मंतकस्तथा ॥ नीलोत्पलं वयंस्था व गुडूची सारिवा तथा ॥९४॥ मधुयष्टी च पद्मं च रात्रा साखिया सह । काश्मयों वृहती क्षीरी शृंगवल्लीत्वचो घृतम् ॥ ९५ ॥ मधुपर्णीबला शिग्रुश्वदंष्ट्रा पृश्रिपार्णिकाः । सितामधुक शृंगा द्राक्षाबिसकसेरुकाः । ९६॥ सप्तश्लोकार्धनिर्दिष्टान्योगान्सप्त पयोऽन्वितान् । पिबेत्क्रमेण मासेषु गर्भस्त्रावादिवारणान् ॥९७॥ उशीरयष्टी संसिद्धं गर्भिणीवातहृत्पयः । द्राक्षायष्टिकसिद्धा च यवागूश्च तथाफला ॥९८॥ बला वासा पृथक्पर्णी निर्यूहश्वापि पित्तनुत् । सपुनछिन्नया युक्तो गर्भिणीकामलापहः ॥९९॥ कासं श्वासं तथा रक्तपित्तं चाशु विनाशयेत् । अघृतः सघृतो वापि सदुग्धो वाप्यदुग्धवान् ॥ १००॥ एक एव बल्लाकाथो गर्भिणी सर्वरोगनुत् ॥१०१॥ गर्भ धारण होनेपर पहले महीने में गर्गमें अकस्मात् पीडा होती है, इससे गर्भस्राव होनेकी सम्भावना होती है । उस समय ११ बला इति पाठोषि हस्त लिखित पुस्तके उपलभ्यते । २ पयस्या ।<noinclude></noinclude> jpqcim29caflvie0m19kt2ye6eltirz पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०२ 104 165689 418280 2026-09-05T10:03:08Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ६८० ) गर्भवती स्त्री पद्माख, खस और चन्दन इन तीनोंको समान भाग लेकर गायके दूधमें पीसकर प्रतिदिन चार २ तोले परिमाण सेवन करे । इस औषधको तीन दिन तक सेव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ६८० ) गर्भवती स्त्री पद्माख, खस और चन्दन इन तीनोंको समान भाग लेकर गायके दूधमें पीसकर प्रतिदिन चार २ तोले परिमाण सेवन करे । इस औषधको तीन दिन तक सेवन करनेसे गर्भ स्थिर होजाता है । दूसरे महीने में गर्भ में वेदना हो तो नीलकमल, कमलतन्तु, चन्दन और काकडासिंगी इन औषधियोंके समान भाग चूर्णको गायके दूधके साथ पान करनेसे उक्त वेदना शान्त होती है । तीसरे महीने में चन्दन, तगर, कूठ, मसोडा और कमलकेसर इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके उसमेंसे प्रतिदिन चार २ तोले चूर्णको शीतल जलके साथ पतिकर पान करे । इस चूर्णको तीन दिन तक पान कर• नेसे गर्भकी पीडा शान्त होती है । नीलकमल, भसौंडा और कमरू इन तीनोंको गायके दूधमें पीसकर पान करे, अथवा पाढ, नागरमोथा, हरड, सुगन्धवाला, सारिखा और पद्माख इनका काढा बनाकर शीतल करके पान करे । यह प्रयोग गर्भिणी स्त्रीके ज्वर और वेदनाको शीघ्र दूर करता है गिलोय और कुम्भेरकी जडके काटेको मिश्री और शहद मिलाकर पान करे तो गर्भिणी स्त्रियोंका घोर ज्वर इस प्रकार शीघ्र नष्ट होजाता है जैसे रामने रावणको तत्काल विनाश करदिया था। क्षीरका- कोली, सारिवा, मुलैठी, खिरैंटी, लोध और महुआ इन सच औषधि- योंको समान भाग लेकर क्वाथ बनालेवे । उस काथको दूधके साथ मिलाकर पान करने से गर्भिणी स्त्रियों का ज्वर दूर होता है । गर्भिणी खि- योंका ज्वर सम्पूर्ण रोगोंमें कष्टसाध्य रोग है । गर्भिणी स्त्रीकी सन्धि- योंमें ज्वर रहने से गर्भ में अनेक विकार उत्पन्न होजाते हैं, इसलिये उसको दूर करनेका सदैव उपाय करना चाहिये । कुडेकी छालका काढा बनाकर उसको वस्त्रमें छानकर फिर पकावे । जब वह पकते २<noinclude></noinclude> cvsincppzk5xdpx3xcc4o7d5pe3egi8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०३ 104 165690 418281 2026-09-05T10:03:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८१ ) गाढा होजाय तब उसको देवदारु और दारूहल्दीके काढमें मिलाकर पान करे | यह क्वाथ गर्भिणी खाके अतिसार (दस्तों ) को अवश्य नष्ट करता है । कायफल, मुलैठी,... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418281 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६८१ ) गाढा होजाय तब उसको देवदारु और दारूहल्दीके काढमें मिलाकर पान करे | यह क्वाथ गर्भिणी खाके अतिसार (दस्तों ) को अवश्य नष्ट करता है । कायफल, मुलैठी, गोरखमुण्डी, नागरमोथा और दारूहल्दीका काय पान करनेसे अतिसार रोग नष्ट होता है | अथवा खिरैटी, धमासा, पाढ, सोंठ और नागरमोथा इनका काय पान कर- नेसे अतिसार रोग दूर होता है । पुनर्नवा और अदरखके काटेको दूधमें मिलाकर रात्रिमें पान करनेसे गर्भवती स्त्रियोंके उदावत, गुल्म, अर्श, शोथ और गर्भकी पीडा ये सब रोग दूर होते हैं | अदरख के काथमें पीपलको पीसकर पान करने और ऊपर से घी दूध और गुड तीनोंको मिलाकर सेवन करनेसे गर्भिणी स्त्रियोंके उत्पन्न हुआ शोय और पित्त के विकार शान्त होते हैं । पुनर्नवा और क्च दोनों को कॉजी में पीसकर कल्क बनाकर लेप करनेसे गर्भिणी स्त्री अत्यन्त बढा हुआ शोथ दूर होता है। पुनर्नवेकी जडका काथ बनाकर उसको गुड और घृतके साथ मिलाकर गर्भिणी स्त्रीको पान करानेसे उदावर्त और शोथरोग में शीघ्र लाभ होता है । मुलैठी, दाख और आमले इनके द्वारा दूधमें सिद्ध की हुई यवागूको अथवा इन औषधियोंके काथको दूधमें मिलाकर पान करनेसे गर्भिणी स्त्रियोंके पित्तजन्य रोग नष्ट होते हैं । कुटकी, हरड, भारंगी, वच और सोंठ इन सबके कायको गुड मिलाकर पान करानेसे गर्भिणीका श्वास और कास रोग दूर होता है । तथा मिरचाके चूर्ण को शहद, मिश्री और घृतमें मिला- कर चाटने से खाँसी नष्ट हो जाती है । खीलें, इलायची और अंको की गिरी को जल में पीसकर पान करनेसे गर्भिणीकी वमन (क) शान्त होती है । कच्चे बेलके काढेको शहद मिलाकर पीने से हिचकी आना बन्द होता है । अजमोद, असगन्ध, पीपल, गजपी- .<noinclude></noinclude> 6gwllu3apxm0wmgwhhsgnr3c3mo9028 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०४ 104 165691 418282 2026-09-05T10:04:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६८२ ) रसरत्नसमुच्चयः । पल और जीरा इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको एक २ तोला परिमाण लेकर शहद और गुड के साथ सेवन करनेसे गर्भिणी स्त्रियोंका मन्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418282 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६८२ ) रसरत्नसमुच्चयः । पल और जीरा इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको एक २ तोला परिमाण लेकर शहद और गुड के साथ सेवन करनेसे गर्भिणी स्त्रियोंका मन्दाग्नि रोग दूर होकर अग्नि दीपन होती है । कच्चा बेल, विदारीकन्द और पृश्निपर्णी इन तीनोंके कल्कके साथ दूधको पकावे । जब दूधका जलीय अंश जलकर वह अच्छे प्रका- रसे पकजाय तब उसको वखमें छानकर पात्र करना. अथवा उक्त औषाध्याके कायमें दूधको खीर बनाकर खाना वातरोग की शान्तिक लिये उपयोगी है । गोखुरू और खिरेंटीका काथ गर्मिणी के मूत्ररा• अत्यन्त श्रेष्ठ है । ( १ ) देवदारु, हरड, सागौनके बीज और मुलैठी । ( २ ) खिरेंटी, काले तिल, मजीठ और पाषाणभेद । ( ३ ) नीलकमल, हरड, गिलोय, और सारिवा । ( ४ ) मुलैठी, कमल, रास्ना और सारिवा । ( ५ ) कुम्भरे, वडी कटेरी, विदारिकन्द, काकडासिंगीकी छाल और घृत । (६) कुम्भेर, खिरैटी, सेंजना, गोखरू और पृश्निपर्णी । ( ७ ) मिश्री, मुलैठी, सिंघाडे, दाख, भसीडा और कसेरू । इन सातों प्रयोगों को, गर्भस्राव आदि उपद्रवों के निवारण करने के लिये क्रम २ से पहले महीने से लेकर सातवें महीने- तक दूधके साथ सेवन करे । अर्थात प्रत्येक प्रयोगकी औषधियों का क्वाथ बनाकर दूधमें मिलाकर एक २ महीने तक सेवन करने से गर्भस्राव आदि किसी उपद्रव होनेका भय नहीं रहता । खस और मुलै ठीके कल्क और क्वाथके द्वारा सिद्ध किया हुआ दूध गर्भिणी के वातरोगको दूर करता है । दाख और मुलैठीके क्वाथकी यवागू बनाकर सेवन कर- नेसे भी वातकी पीडा शान्त होती है । खिरैंटी, अडूसा और पृश्नि- पर्णी इन औषधियोंका क्वाथ गर्भिणीके पित्तरोगको नष्ट करता है । और खिरेंटी, अडूसा, पृश्निपर्णी तथा गिलोयका<noinclude></noinclude> b6mt4sqx7lqbnzqtm38gai46rw9vf9y पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२७ 104 165692 418283 2026-09-05T10:05:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७०५ ) कुर्यात्तेनैव चूर्णेन रात्रावञ्जनमाचरेत् ||२०|| एवं नित्यं कृते याति तृतीयदिवसे ध्रुवम् । अपस्मारस्तथा मासं सेव्यमेतन्महौषधम् ॥२१॥ उद्धम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७०५ ) कुर्यात्तेनैव चूर्णेन रात्रावञ्जनमाचरेत् ||२०|| एवं नित्यं कृते याति तृतीयदिवसे ध्रुवम् । अपस्मारस्तथा मासं सेव्यमेतन्महौषधम् ॥२१॥ उद्धमान वगलव्यतिषक्तमग्नौ रज्जुं विदा निपुणेन कृता मषी या । सा शीतलेन सलिलेन समं निपीता पुंसामपस्मृतिविनाशकरी प्रसिद्धा ||२२|| कृष्णं श्वानं स्थितमनशनं स्थापयित्वा विरेकं पश्चाना सिततिलयुतं भोजनं भोजयित्वा । तद्वीवोत्था सिततिलजदीपाञ्जनं लोचनस्थं चापस्मारं हरति विधृतं नैंबसारे शरावे ||२३|| ना शुद्धेन संपिष्टं दशमांशरसं विषम् । स्त्रोतोज मर्दितं तोयैः शूलिनीदेवदालिजैः ॥ २४ ॥ गंधकस्य पचेत्तैले वटिकोन्मादनाशिनी ॥२५॥ तथैव पर्पटीतं ब्राह्मीरस विमर्दितम् । पर्पटीरसगुंजाष्टौ नाकुली बीजपंचकम् ॥२६॥ गोघृतेन तु संयोज्य खादेदुन्मादशांतये । सघृतं माषमण्डं च पाययेद्दुग्ध संयुतम् ॥२७॥ पर्पटीरसगुंजाष्टौ ब्राह्मीरससमन्वितम् । खादयेद्रोगणं वैद्यो ह्यपस्मारप्रणुत्तये ॥२८॥ काली गायका नैनी घी १ भाग, काले धतुरेका पंचाग ६ भाग और उडदोंका काढा ४ भाग लेकर प्रथम उक्त पंचांगका कल्क बना- कर उसको और नैनीधीको ठडदोंके काढेमें डालकर यथाविधि घृतको २५<noinclude></noinclude> 65ze50ejxqi47pjia1xtldadrq69e4o पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४९ 104 165693 418284 2026-09-05T10:06:05Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७२७) होता है । (५) मुसली और बावचीके चूर्णको समान भाग लेकर सेवन करनेसे बहरापन दूर होता है ( ६ ) निर्मल के बीज, सैंजने के और समुद्र नमक तीनोंको काँजीमें प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418284 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७२७) होता है । (५) मुसली और बावचीके चूर्णको समान भाग लेकर सेवन करनेसे बहरापन दूर होता है ( ६ ) निर्मल के बीज, सैंजने के और समुद्र नमक तीनोंको काँजीमें पीसकर गरम करके सुहाता २ कनपटीपर लेप करनेसे कनपटी की सूजन व फोडा शमन होता है । (७) जियापाता के फलकी गिरीको पानी में पीसकर लेप करनेसे बान, गला और कोखमें तथा जंघाओंकी मूलमें उत्पन्न हुआ फोडा नष्ट होता है । ( ८ ) तगर और ढाककी शाखाओंको दाँतस वषा- चवाककर उनका रस निकाले । उस रसको बढी सावधानीसे कानमें डाले इस रसके डालने से कानमें गिरी हुई मक्खी आदि शीघ्र निकल जाती है । ( ९ ) मुसलीको खूब बारीक पीसकर कपड़छान करके 1 भैंस के नैनी घीमें मिलालेवे । फिर चूने के सम्पुटमें उक्त घृतका लेप ! करके उसको धानाके ढेर में गाडदेवे, सात दिनक बाद उस सम्पुटको ! निकालकर उस औषधको प्रतिदिन उपयुक्त मात्रासे सेवन करे तो कानकी पाली बढजाती है । (१०) चिमगादडके रुधिरका लेप करनेसे कानकी वृद्धि होती है । (११) सूकरकी चर्बीका लेप कर- नेसे भी कानकी वृद्धि होती है ॥ ८-१४ ॥ नासागतरोग | षट् पीनसाश्च मलसंचय रक्तदुष्टेः पूयास्रदीप्तपिटिका- र्बुद पूतिनासाः ॥ आस्रावनाह परिशोषभृशक्षवार्शः- पाकैरपीनसयुतैश्च गदा नसि स्युः ॥ १५ ॥ वात, पित्त, कफ इन तीनोंसे भिन्न भिन्न दोषोंसे और त्रिदोषसे एवं मलके संचित होनेसे और रुधिरके दूषित होनेसे छः प्रकारका पीनस रोग हाता है । पानसरोगमें निम्नलिखित लक्षण होते हैं । नाक मेंसे पी अथवा रुधिरका निकलना, दाह होना नाक में फुन्सियोंका निक-<noinclude></noinclude> fhm3cma1s2qht0x1mfihvu1fiqfrv4c पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७१ 104 165694 418285 2026-09-05T10:06:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । (७४९) शखसे कदापि छेदन न करे, बल्कि औषधियोंके प्रलेप आदिके द्वारा उसको भेदन करे । हल्दी, नीम के पत्ते और सैंधानमक तीनोंको पानीमें पीसकर लेप करनेसे भग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भापाटीकोपेतः । (७४९) शखसे कदापि छेदन न करे, बल्कि औषधियोंके प्रलेप आदिके द्वारा उसको भेदन करे । हल्दी, नीम के पत्ते और सैंधानमक तीनोंको पानीमें पीसकर लेप करनेसे भगन्दर अवश्य फूट जाता है । मनुष्यकी हड्डीको तीन दिनतक मैदाके समान खूब बारीक पीसकर तेलमें मिला. कर लगाने से भगन्दर फटकर शीघ्र सुखजाता है। ताम्र भस्म को मेंहदी, पुनर्नवा और मेढासिंग के इसमें क्रमसे एक २ दिनतक खरल करके लेपकरे | यह लेप भगन्दर के व्रणको शोधन और रोपण करनेवाला है। बिलाव की हड्डीको त्रिफलके काढेके साथ बारीक खरल करके लेप करनेसे और प्रतिदिन त्रिफले काढेसे व्रणको धोनेसे दुष्ट भगन्दर शीघ्र नष्ट होताहै । शुद्ध खपरियाको जलमें पीसकर पानकरे और कुत्तेकी हड्डीको गधे रुधिर में खरल करके लेपकरे तो भगन्दर रोग शीघ्र नाश होता है ॥ ९९-१०६ ॥ ग्रन्थिरोग | सागाः कुर्युर्वृत्तं ग्रंथितमुत्रतम् । दोषाः शोफादिकं तत्र ग्रंथनादू ग्रंथिमाहतम् ॥ १०७॥ वात, पित्त, कफ इनमें से कोईसा दोष अथवा दो दोष या तीनों दोष चर्बी, मांस और रक्तमें मिलाकर शरीरके किसी भागमें गोल और ऊँची गाँठ उत्पन्न करदेते हैं । उसमें दोषानुसार शोथ, दाह, पीडा आदि अनेक उपद्रव होते हैं । और दोषोंके गुथे रहने से वह बहुत सख्त रहती है । इसको ग्रन्थि (गाँठ ) रोग कहते हैं ॥ १०७॥ सामान्य उपाय | अरिमेदपलाशानां ग्रंथिभस्म विमर्दयेत् । भस्मना तेन दत्तः सन्मेदो ग्रंथ विनाशनः ॥ १०८॥ गुडूची सूरणं निष्कत्रयमुष्णांबुमर्दितम् ।<noinclude></noinclude> 6g562ipbv8jlqe8n9cmjziuy5vc9152 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९३ 104 165695 418286 2026-09-05T10:07:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः। (७७१) दाह (जलन) होने लगती है और उससे संपूर्ण शरीर कृश होजाता है । इसको दूर करनेके लिये निम्नलिखित उपाय करे । (५१) प्रथम लिंगके अग्रभागको धीरेसे बाँधकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418286 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः। (७७१) दाह (जलन) होने लगती है और उससे संपूर्ण शरीर कृश होजाता है । इसको दूर करनेके लिये निम्नलिखित उपाय करे । (५१) प्रथम लिंगके अग्रभागको धीरेसे बाँधकर थोडा २ चूसे फिर उसको शीतल जलसे खूब धोवे और बेरोंका काय बनाकर उसमें खाँड डालकर पान करे । अथवा सेमलकी जड और दूलको जडको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके उसकी दूधमें खीर बनाकर खावे तथा पीठके बाँस की फस्त खुलवाकर रक्त विकलवा देवे । लिंगव्याधिको नष्ट करने के लिये ये अत्यन्त उपयोगी उपाय है । अथवा बोलवद्ध नामक रसको सेवन करे और मछेछी घासको पानीमें पीसकर लिंगपर लेप करे । (५२) जानुओं (सॉयल ) में उत्पन्न हुई पीडा और ग्रन्थिको नष्ट करने के लिये कुम्भेरकी जडको पानीमें पीसकर प्रलेप करे । अथवा समुद्रनमक- को काँजीमें पीसकर लेपकरे तो जानुगत ग्रन्थि और पीडा शीघ्र शास्त होती है । ( ५३ ) सर्वप्रकार के रक्तविकारों में बोलबद्ध रसका सेवन करना अत्यन्त उपयोगी है (५४) कडवी तोबीके चूर्ण को भेडके दूव और चूने के पानी में पीसकर निरन्तर लेप करनेसे टूटी हुई हड्डी जुडजाती है । (५५) स्नायुक (नहरुआ ) रोगको नष्ट करने के लिये धमासेको पानोंमें पीसकर लेपकरे । (५६) प्रारब्ध वशसे, अथवा अधिक मैथुन करनेसे, ऊँचे नीचे या कठिन आसनपर बैठनेसे अथवा रज और वीर्यके दूषित होनेसे स्त्रियोंको योनिमें नानाप्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होजाती हैं । (५७) योनिरोगको नष्ट करने के लिये चाँदी और ताँबे की पिट्ठीको समभाग लेकर गन्धकके तेलमें पकावे, फिर उसको शदह और घृतमें मिलाकर सेवन करे । यह प्रयोग स्त्री तथा पुरुषोंके गुह्य- रोगोंको शीघ्र दूर करता है । (५८) नीम की निबौली अण्डके बीज दोनों की गिरीको समान भाग लेकर नींबू के रसमें खरल करके गोलि- याँ बनाकर सुखालेवे | उनमेंसे प्रतिदिन एक २ गोली सेवन करने से और एक २ गोली योनिमें रखनेसे योनिकी पीडा दूर .<noinclude></noinclude> 398owgwykb18wnuv1y9l965rdfzffi8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१६ 104 165696 418287 2026-09-05T10:07:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७९४ ) रसरत्नसमुच्चयः । कल्कको शेष रसमें घोलकर उसमें एक प्रस्थ गौका घी मिश्रित कर के विधिपूर्वक पकावे | जब पककर रस सच जलजाय और घृतमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418287 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७९४ ) रसरत्नसमुच्चयः । कल्कको शेष रसमें घोलकर उसमें एक प्रस्थ गौका घी मिश्रित कर के विधिपूर्वक पकावे | जब पककर रस सच जलजाय और घृतमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । जो वायविडंग, पीपल, सैंधानमक और जटामांसी इनके समान भाग मिश्रित कपडछान किये हुए ३ मासे चूर्ण में ६ मासे यह घृत मिलाकर सात दिनतक सेवन करे तो वह मनुष्य विद्वानों के बीच अत्यन्त निर्मल और सूक्ष्म बुद्धिवाला होता है । १५ दिन अथवा एक महीने तक सेवन करनेसे चतुरता, अपूर्व कवि वशक्ति और सम्पूर्ण श्रेष्ठ कलाओ में निपुणता प्राप्त करता है । (२७) सोनामाखीकी भस्म, अभ्रक भस्म, त्रिकुटा, तृतियाकी भस्म, शिला- जीव, कान्तलोहभस्म अंकोल के बीज, मण्डूर भस्म, सुहागा और सेंधानमक इन सबको समभाग लेकर भाँगरेके रसमें खरल करके मसूरकी बराबर गोलियाँ बनाकर सेवन करे । यह उत्तम रसायन समस्त रोग समूहों को नाश करनेवाली है ॥ १६-४८ ॥ कमलाविलासरस | लोहाम्रो बलिसुतहाटक पविस्तुल्यं कुमारी रसे • पक्वैरण्डद लैर्निबध्य सुदृढं सदान्यराशौ त्र्यहम् । क्षिप्त्वोद्धृत्य विचूर्णितं मधुवेरायुक्तं यथा सात्म्यतः कृष्णात्रेय विनिर्मितंगदजरा विध्वंसिसौख्यप्रदम् ४९ आज्ञा सिद्धमिदं रसायनवरं सर्वप्रमेहप्रणु- कासं पञ्चविध तथैव तनुगं पाण्डु व हिक्कां प्रणम् । श्लेष्माणं पवनं हलीमकगदं हन्याच्च मन्दानलं कण्डूकुष्ठविसर्पविद्रधिमुखापस्मारकाद्या अयेत् ५०॥ गोप्याद्गोप्यतरः सुखेन सुलभः सर्वत्र सिद्धोऽस्त्ययं वैद्यानां कमलाविलासकरसोऽत्यंतं यशस्कारकः ५१<noinclude></noinclude> h8firm8k4akq38jnljwmemecek07d1p पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४० 104 165697 418288 2026-09-05T10:08:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८१८ ) रसरत्नसमुच्चयः । सेमल और मुलैठीके इसके साथ १५ दिन तक खरल करे । फिर नागर पान के रसमें श्घंटे तक घोटकर सुखाले सो पुष्पधन्वा रस तैयार होता है । इस रसको पूर्वोक्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418288 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८१८ ) रसरत्नसमुच्चयः । सेमल और मुलैठीके इसके साथ १५ दिन तक खरल करे । फिर नागर पान के रसमें श्घंटे तक घोटकर सुखाले सो पुष्पधन्वा रस तैयार होता है । इस रसको पूर्वोक्त विधिसे प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण मधु घुत और मिश्री मिलाकर सेवन करना चाहिये । यह रस शरीर की पुष्टि, वाकी वृद्धि और अग्निको दीपन करता है । इसको रोगानुसार अनुपानों के साथ देने से सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं ॥ ८१-८९ ॥ रसेन्द्रचुडामणे । सुनमभुजगाश्रवङ्गकाः कांतताप्यविमलाः समा- क्षिकाः ॥ भागवृद्धिर्मिलिता विमर्दिता धूर्तपत्रवि जयासलिलेन ॥ ८६ ॥ सप्त सप्त चपलामृतवल्ली भाका सुरलताजल- तोयैः । वारिवाहनृतयष्टिकावरी वानरी जगह- ष्टयुदकेन ॥ ८७ ॥ अर्धभागमहिफेनकं न्यसन्मर्दयेत्सुरसपुष्परसेन । नार्ककरहाट पिप्ली श्रावणी कृतरसौ पृथगेव ॥८८॥ कुडुमेन च ततो विभावयेन्ना भिजद्रवयुतं विभा- वयेत् । सिद्धिमेति रसरोडयं शुभः कामिनीमद- विधूननदक्षः ॥ ८९ ॥ शर्करामधुयुतो द्विभाषकः स्तम्भकृन्निधुवने वनितानाम् ॥ ९० ॥ संसेव्य सूतं न च रात्रिभोज्यं कुर्वीत पेयं पय एव केवलम् ॥ ९१ ॥<noinclude></noinclude> 8zj34kqaw6ldn7y1wf7bewbrwk9t4kb पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६३ 104 165698 418289 2026-09-05T10:08:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ८४१ ) तप्तं क्षीरं पिबेद्र्यस्तांबूलं भक्षयेन्मुदुः ॥ ४० ॥ स्नानमर्दन विष्टम्भिविदाहाम्लमजांगलम् । सप्तसप्ताह मथवा त्रिःसप्ताहं परित्यजेत् ॥... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ( ८४१ ) तप्तं क्षीरं पिबेद्र्यस्तांबूलं भक्षयेन्मुदुः ॥ ४० ॥ स्नानमर्दन विष्टम्भिविदाहाम्लमजांगलम् । सप्तसप्ताह मथवा त्रिःसप्ताहं परित्यजेत् ॥ ४१ ॥ शालिमुद्गरसं सर्पिर्वत्रा बृहतीद्वयम् । दीर्घ पटोलं वार्ताकं तालकं मूलकन्दकम् ॥ ४२ ॥ शतावरी सजीवती श्रृंगार्ट सुनिषण्णकम् । तंडुलीयकथान्यार्फ सराजवृक्षवास्तुकम् ॥ ४३ ॥ जांगलं शफराः कृष्णमीना रोहितमुद्गरौ । द्राक्षादाडिमखर्नररम्भाकोलं व शस्यते ॥ ४४ ॥ जीणषधस्तु दतेऽग्नौ प्रातः पित्तागुभुक्षितः । अर्धमात्रं पिबेत्क्षीरं सार्धमात्रं कृशो नरः ॥ ४५ ॥ दिवसाः सप्त सप्ता मद ने द्वित्रिगुणाः क्रमात् । जघन्यमध्यप्रवरः सेवाकालो विधीयते ॥ ४६ ॥ पूर्णक्रियेयं द्विगुणा सोत्तरा नात्र यन्त्रणा । यथाकालं मलोत्सर्गः शरीरोदरलाघवम् ॥ ४७ ॥ हृदयोद्गारशुद्धिश्व जीर्णलोहस्य जायते । लोहाप्रवृत्तौ सामत्वं लोहकिदृप्रशतिये ॥ ४८ ॥ उष्णांबु सयवक्षारं त्रिदिनाचिदिन्गत्पिबेत् । रसेनाऽगस्त्यपत्राणां विडंगं चान्तरान्तरा ॥ ४९ ॥ . काथमश्वत्थपत्राणां प्रसङ्गे छर्दिशूलयोः । सामान्यसिद्धमावाप्य भावनापुटपा चनैः ॥ ५० ॥<noinclude></noinclude> kr1igs8gulxoowm8uz53fir13ttssk7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८५ 104 165699 418290 2026-09-05T10:10:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ 1 भाषाटीकोपेतः । ( ८६३) हाथी और अमृत निकला । हे देवि । फिर अधिकतर प्रथने के कारण मन्दराचल के अत्यन्त आघातके द्वारा शेषनागको उत्पन्न हुआ जो भ्रम उससे अत्यन्त भयङ्कर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418290 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>1 भाषाटीकोपेतः । ( ८६३) हाथी और अमृत निकला । हे देवि । फिर अधिकतर प्रथने के कारण मन्दराचल के अत्यन्त आघातके द्वारा शेषनागको उत्पन्न हुआ जो भ्रम उससे अत्यन्त भयङ्कर विषकी ज्वाला उत्पन्न होकर क्षीरसागरमें निमम होगयी । फिर उस ज्वालाके द्वारा उसमें कालकूट नामक महाविष उत्पन्न हुआ। वह मदशकालमें कुपित हुई भयङ्कर कालाग्निके समान था । उसको देखकर सुरक्षागये हैं सुख जिनके ऐसे सम्पूर्ण देवत और बडे बडे बलवान् दानव तत्कालही मेरे पास आगे और आकर उन्होंने मेरी बहुतसी प्रार्थना की। तब मैं उनकी प्रार्थनाको स्वीकार करके उस उत्तम विषको पान कर गया। उसमेंसे बचा हुआ जो विष इधर उधर गिर गया था, वह कहीं तो भूलरूपसे, कहीं पत्ररूपसे, कही मृत्तिका रूपसे, कहीं जलरूपसे कहीं धातुरूपसे और कहीं कन्द रूपसे इस तरह तेरह प्रकारका विष उत्पन्न होगया । उन सब विषमें कन्द- विष अत्युत्तम होता है वहभी तेरह प्रकारका कहा गया है । कर्कट, कालकूट वत्सनाभ, हलाहल, बालुक, कर्दम, सक्तुक, मूलक, सर्वप, शृङ्गिक, मुस्तक, महाविष और हारिद्रक इन नामभेदोंसे विष तेरह प्रकार का कहा जाता है । कर्कट विष कपिश वर्णका, कालकूट विष कौवे की चोंच के समान, वत्सनाभ विष पीले रंगका, हलाहल विष भाँगरके कन्दके समान नीले रंगका, बालुक विष वालु (रेत) के समान, कर्दम विष कीचके समान, सक्छुक विष इवेतवर्णका, मूलक विष श्वेतवर्णका, सर्प विष पीला, शृङ्गिक विष काला और पीला मिले हुए वर्णका. मुस्तक विष मोथेके समान, महाविष लाल रंगका और हारिद्र विष पीले वर्णका होता है। इस प्रकार विषोंके भेद कहे गये हैं। वर्णोंसे विद्वानोंको विष चार प्रकारका जानना चाहिये । जसे श्वेत वर्णका विष ब्राह्मण, लाल रंगका क्षत्रिय, पीले रंगका वैश्य और काले रंगका विष शुद्र वर्णका होता है। इस क्रमसे चार वर्णोंक अनुसार विष समझना चाहिये । कृष्ण वर्णका विष मारनेंमें लाल<noinclude></noinclude> 4spug55784mthslyrmc6upi2h1j681x पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०८ 104 165700 418291 2026-09-05T10:11:27Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रस रत्नसमुच्चयः । ( ८८६ ) और मिरच ये सब समान भाग और सरसोंका तेल विषसे अठगुना लेवे। फिर उक्त औषधियोंको खटाई में परिकर तेलमें डालकर उत्तम प्रकार से पकावे | यह तेल शिरम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रस रत्नसमुच्चयः । ( ८८६ ) और मिरच ये सब समान भाग और सरसोंका तेल विषसे अठगुना लेवे। फिर उक्त औषधियोंको खटाई में परिकर तेलमें डालकर उत्तम प्रकार से पकावे | यह तेल शिरमें मालिश करने से गंजरोगको दूर करता है । (९९) सैंधानमक और कपास के फल दोनों को घृतके साथ खरल करके गोलियाँ बनालेवे । इनगोलेयोंको बकरीके दूधमें घिसकर लगाने से विषमें बुझाये हुये शस्त्रका घाव शीघ्र नष्ट होता है (६०) विष रसौत, भारंगी, बिछी घास और भषवन इन सबको पानीमें पीसकर पके हुये और वेदनायुक्त दुष्ट व्रण पर प्रलेप करना उपयोगी है। (६१) अमलतास, आक, दुर्गन्ध करञ्ज, कुडेकी छाल, अतीस और विष इनको इंगुदीके क्वाथमें पीसकर उसमें घृत डालकर पकावे | यह घृत प्रलेप करनेसे अपची (रसौली ) रोगको शीघ्र नाश करता है । (६२) कौआठोंडी, मुलैठी, नली, कन्दूर के फल, नागरमोथा,ककोडा, इन्द्रा- नकी जड, अमलतास और पाढ ये प्रत्येक दो दो तोले और विष एक कर्ष सबको पानी में पीसकर कल्क बनालेवे। फिर इस कल्कको और एक प्रस्थ करञ्जके तेलको एक माढक निर्गुण्डीके स्वरसमें डालकर पकावे । जब पककर तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। यह तेल नस्य अभ्यङ्ग और पान द्वारा प्रयोग किये जानेसे भयङ्कर अपची (रसौली ) को शमन करता है (६३) घुघुची, सुहागा, सहिजने की जड, हल्दी, अम- लतास, भिलावे, थूहर का दूध, आक का दूध, चीता, कर जुआ, सैंधानमक बच, कूठ, हरड, कलिहारी, पुनर्नवा, कचूर, लभेडा, वरनाकी छाल, त्रिकुटा, कनेर और विष इन सब औषधियोंको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके गोमूत्र में पीसकर लेप करनेसे अपची, गाँठ, अर्बुद और श्लीपद (पीलपाया ) ये सब रोग नाश होते हैं ( ६४ ) इनके अतिरिक्त अन्यान्य अनेक रोगोंमें यदि सम्पूर्ण उपायोंके करनेपर भी लाभ न होने से प्रतिदिन शुद्ध कन्दविषको एक २ राईकी मात्रा<noinclude></noinclude> l19l8czd4znbtt6clh49fztausyguie पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३२ 104 165701 418292 2026-09-05T10:11:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (९१० ) रसरत्नसमुच्चयः उपयोगी है | परन्तु कामला सहित पाण्डुरोग और शोथरोग (सृजन) में त्रिफलादिके काय के साथ सेवन करना उचित है । ( १८ ) सोंठ और चिरायतेके काथको गोमूत्रमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418292 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९१० ) रसरत्नसमुच्चयः उपयोगी है | परन्तु कामला सहित पाण्डुरोग और शोथरोग (सृजन) में त्रिफलादिके काय के साथ सेवन करना उचित है । ( १८ ) सोंठ और चिरायतेके काथको गोमूत्रमें मिलाकर उसके साथ पारेकी भस्मको सेवन करने से शोथरोग (सृजन) में शीघ्र लाभ होता है । (१९) शोथरोग (सूजन) में नीमकी छाल आँवले और कंकुष्ठ ( मुर्दासंग ) इनके चूर्ण के साथ पारदभस्मको सेवन करना अत्यन्त श्रेष्ठ है । ( २० ) लसुन, राई, चीता, नीलवृक्ष और भांगरे के पत्ते ये सब समान भाग और सबको बराबर मिलावे लेकर सबको एकत्र कूट पीस करके दूधमें कल्क बनाले | फिर उस कल्क के साथ विधि- पूर्वक तेलको पकाकर उसमें पारेकी भस्म को मिलाकर लगानेसे कुछ- रोग नष्ट होता है । (२१) कुष्ठरोगी सिरस और पाताल गरुडीलताक पञ्चाङ्गको बारीक चूर्ण करके शहद, घृत और पारेकी भस्म में मिलाकर सेवन करे और त्रिकुटेके चूर्ण के साथ मिलाकर शरीरपर मालिश करे तो कुष्ठरोग दूर होता है । (२२) पारेकी भस्मके बराबर शुद्ध गन्धक लेकर दोनों की एकत्र पिट्टी पीस करके उसको सरसों के तेल मे मिलाकर योग्य मात्रा से सेवन करनेवाला कुष्ठरोगी आरोग्य लाभ करता है । (२३) कर्पूर नामवाली वेलका रस, नीमका तेल और पाताल गरुडी (छिरहिटा) लताकी जडका रस प्रत्येक में पारेकी भस्मको एक २ बार भावना देकर उसको कुष्ठरोगी शहदके साथ मिलाकर सेवन करे अथवा उक्त तीनों औषधियोंके चूर्णके साथ पारदभस्म को मिलाकर शहद के साथ सेवन करे तो कुठरोग शीघ्र शमन होता है । (२४) रीठोंकी गिरी और नागदौनका कन्द दोनोंके चूर्ण के साथ पारेकी भस्मको मिलाकर प्रतीदिन खानेसे और रीठोंकी जडका १ यह बेल जङ्गलमें होती हैं। इसके पत्ते लम्बे होते हैं और समस्त चामें करके मान सुगन्ध यावी है। यदि यह बेल न मिलसके वो कपूर के वृक्ष के पते देवे। यह वृक्ष हर जगह बगीचोंमें मिल जाता है।<noinclude></noinclude> 1gttr7kg136iih209l9vvnx866lejkr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०५ 104 165702 418293 2026-09-05T10:12:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८३) काय गर्भिणी के कामला रोग, श्वास, खाँसी और रक्तपित्तको शीघ्र विनाश करता है । केवल एक खिरैटीका काथही घी और दूधके साथ अथवा विना घी, दूधके मिलायेही... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६८३) काय गर्भिणी के कामला रोग, श्वास, खाँसी और रक्तपित्तको शीघ्र विनाश करता है । केवल एक खिरैटीका काथही घी और दूधके साथ अथवा विना घी, दूधके मिलायेही सेवन करनेसे गर्भिणी स्त्रियोंक सम्पूर्ण रोगोंको नाश करता है ॥ ७४- १०१ ॥ मूढगर्भरोग | विलोमवायुना गर्भो जीवन्यदि न निःसरेत् । स गर्भसंग इत्युक्तो मूढगभों मृते शिशौ ॥ १०२ ॥ स्तब्धाध्मानं शिशिरजठरं सास्यशोषं समूछें गर्भास्पदः श्वसनकमहापूतिगंधो भ्रमार्तिः । कृच्छयेच्छासोऽसितरुचिरवपुः स्तब्धनेत्रे व्यथोत्रा । विण्मूत्रातिर्भवति हि मृताऽपत्यगर्भागिनायाः॥ १०३ अकालश्वाससंयुक्ता बद्धभ्रष्टभगान्विता । शीतांगी पुतिको द्वारा मूढगर्भा न जीवति ॥ १०४ ॥ वाकी विषम गतिक कारण यदि गर्भ जीवित रहे और बाहर न निकल सके तो उसको गर्भसंग कहते हैं और बालककी पेटमें मृत्यु होजानेपर उसको मूढगर्भ कहते हैं । गर्भिणी स्त्रीके गर्भमें बाल- ah मरजाने पर निम्नलिखित लक्षण होते हैं । पेटमें जडता ( कठि नता ), अफरा, शीतलता, मुखका सूखना, मुर्च्छा आना, गर्भका न फडकना, श्वासका चढजाना, श्वासमें दुर्गन्ध आना, चक्कर आना, श्वासोच्छ्वास की गतिका कठिनता से होना शरीरका वर्ण नीला पडजाना नेत्रोंमें जडता होना, उग्र पीडाका होना, मल मूत्रका अवरोध और पढा होना इत्यादि मृत सन्तानवाली गार्भणकेि लक्षण हैं ।<noinclude></noinclude> 5zymabtwkd6w3zcztrrgpifzefcf9cv पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२८ 104 165703 418294 2026-09-05T10:12:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७०६ ) रसरत्नसमुच्चयः । सिद्ध करे। यह घृत रोगी को शाक, भात आदि पथ्य पदार्थों के साथ सेवन करावे | अपस्मार रोगी के लिये शाकोंमें मकोयका शाक और भोजनमें काली गाय का दूध द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७०६ ) रसरत्नसमुच्चयः । सिद्ध करे। यह घृत रोगी को शाक, भात आदि पथ्य पदार्थों के साथ सेवन करावे | अपस्मार रोगी के लिये शाकोंमें मकोयका शाक और भोजनमें काली गाय का दूध देना सर्वोत्तम है। मिरचोंके चूर्ण को पेठेके फूलों के रसमें १०० बार भावना देकर अंजन तैयार करे । इस अंजनको प्रतिदिन रात्रिके समय नेत्रोंमें लगानेसे तीन दिनमें ही अपस्मारके दौरे पडने कम होजाते हैं । और एक महीने तक इस औषधको खाने तथा नेत्रोंमें लगानेसे अपस्माररोग अवश्य नष्ट होजाता है । छाट २ वाल• कोंके गलेमें जो सुतका काला डोरा बँधा रहता है, वह जब खूब मैला होगया हो तब उसको लेकर अग्निमें जलालेवे । उसकी राख को शीतल जलमें घोलकर पान करनेसे मनुष्योंका अपस्मार रोग नाश होता है। काले कुत्तेको एक दिन तक भूखा रखकर दूसरे दिन उसे जुल्लाव देवे । अच्छे प्रकार से दस्त हो जाने पर उसको दहीमें सफेद तिल मिलाकर खिलावे । उस समय कुत्तेक गलेमेंसे निकली हुई लारको लेकर काले तिलोंके तेल में मिलाकर दीपकमें जलावे और नीम के सकोरे में उसकी स्याही पारे । उस स्याहीको नेत्रोंमें आँजनेसे अपस्मार रोग दूर होता है । सोनेके बर्क १० भाग, शुद्ध पारा १ भाग, वत्सनाभ १ भाग और सफेद सुरमा १ भाग सबको एकत्र मिलाकर चतिके और बंदालके इसमें एक २ बार भावना देकर सुखालेवे। फिर गन्धकक तेल में पका- कर गोलियाँ बनालेवे। ये गोलियाँ उन्माद रोगको विनाश करनेवाली हैं । पूर्वोक्त पर्पटी रसको त्राह्मीके रसम घोटकर सेवन करनेसे सब प्रकारका अपस्मार नाश होता है । पर्पटी रस ८ रती और नकुल- कन्दवे चीज ५ रत्ती दोनों को एकत्र पीसकर गोघृतम मिलाकर सेवन करने से उन्माद रोग शान्त होता है एवं अपस्मार रोगको नष्ट करने के<noinclude></noinclude> nra0lnmnr7zv7ov3oyfbnzkad1ljw2b पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५० 104 165704 418295 2026-09-05T10:13:19Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । लना, अर्बुदका होना, दुर्गन्ध आना, पानीका झडना, नाकका सूचना नाकके शोषित होनेसे अत्यन्त सुखजाना, छींके अधिक आना, नाक अर्श होना और पीनसके विनाभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । लना, अर्बुदका होना, दुर्गन्ध आना, पानीका झडना, नाकका सूचना नाकके शोषित होनेसे अत्यन्त सुखजाना, छींके अधिक आना, नाक अर्श होना और पीनसके विनाभी नाकका पकना इत्यादि रोग ना- सिकामे होते हैं ॥ १५ ॥ मणिपर्पटी रस । वज्रं मरकतं पुष्पमिन्द्रनीलं सुचूर्णितम् । रसहिंगुलगंधं च कष्णली कारयेद्भिनक || द्रावयेत्तां लोहपात्रे पर्पटयाकारतां नयेत् ॥ १६॥ निर्गुडीतुलसी शिशुधतुरर विवह्निजः ॥१७॥ रसैन्यषवरारंभासुरसैरपि भावयेत । आर्द्रकस्य रसेनापि सप्तधा परिभावयेत् ॥ १८॥ एवं सिद्धोरसो नाना विख्याता मणिपर्पटी । सेविता गुंजया तुल्या निहन्यान्नासि कागदान् ॥१९ पथ्योपचारादिवशात्सर्वव्याधीन्विशेषतः ॥२०॥ होरेका चूर्ण, मरकतमणि (पन्ना) पुखराज, नीलम इन सबका वारीक चूर्ण, पारा, सिंगरफ, और गन्धक सबको समानभाग लेकर प्रथम पारे, गन्धककी कव्जली करलेने । फिर लोहे की कढाइमें घी चुपडकर उसमें कज्जलीको डालकर मन्द मन्द अग्निसे पिघलावे । जब वह खूब पतली होजाय तब उसमें उक्त रत्नोंका चूर्ण मिलाकर उसको पूर्वोक्त विधिके अनुसार केलके पत्तेपर ढालकर पर्पटी तैयार करलेवे । उस पर्पटी को पीस कर निर्गुण्डी, तुलसी, सैंजने की, छाल, धतूरा, आक, चीता, त्रिकुटा, त्रिफला और केला इन प्रत्येक के इसमें क्रमसे<noinclude></noinclude> p8sz9wm1wyo2c1njjvtn21870o3qtjg पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७२ 104 165705 418296 2026-09-05T10:13:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५० ) रसरत्नसमुच्चयः । मेदोवृद्धिरसात्तेन हंति रोगं च पूर्वजम् ॥ १०९ ॥ Disi जयत्याशु गुल्मोक्तोदय भास्करः ॥ ११०॥ पुत्रजीवस्य मज्जां तु जलैः पिट्वा प्रलेपनात् का... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७५० ) रसरत्नसमुच्चयः । मेदोवृद्धिरसात्तेन हंति रोगं च पूर्वजम् ॥ १०९ ॥ Disi जयत्याशु गुल्मोक्तोदय भास्करः ॥ ११०॥ पुत्रजीवस्य मज्जां तु जलैः पिट्वा प्रलेपनात् कालस्फोटं विषस्फोटं सद्यो हन्यात्सवेदनम् ॥ ११॥ ग्रंथ्यादिनिखिलान् रोगान्सर्वरोगाश्रयान्हरेत्। ११२ संधिग्रंथिस्तापयुक्तो यदिस्यात्क्षीरं रात्रौ । चोदनं संनिदध्यात्। पादांगुष्ठस्योत्रेदेशेषु रक्तस्रावं कुर्यात्तेन शीघ्रं सुखीस्यात् ॥ ११३ ॥ कक्षाग्रंथि गलग्रंथिं करिग्रंथि व नाशयेत् । अन्यं चस्फोटकं तीव्रं पुत्रजीवो विनाशयेत् ॥ ११४॥ गुंजापत्रं शिलां यष्टों गवां क्षीरेण पाययेत् तलस्फोटं निहत्याशु मजा वा पुत्रजीवजा ॥ ११५ ॥ विष्णुकांता च पेटारी कांजिकेन तु पेषिता । कालस्फोटं हरेल्लेपाद्दुष्टग्रंथिषु का कथा || ११६ ॥ पुनर्नवाकयशिष्टीकरंजसिंधूत्थमहौषधं च । गोमूत्रपिष्टं च सुखोष्णलेपाद्रथ्यर्बुदं हंत्य- पचीं च सद्यः ॥ ११७ ॥ (१) दुर्गन्धित खैर और ढाकके बीजोंकी या गाँठोंकी भस्म करके उसको पानी में पीसकर सेवन करनेसे मेद ( चर्बी ) जन्य ग्रन्थि नष्ट होती है । ( २ ) गिलीयका चूर्ण १ तोला और जिम- कन्दका चूर्ण १ तोला लेकर दोनोंको गरम पानी में पीसकर लेप करे तो मेदकी वृद्धिके कारण उत्पन्न हुई ग्रन्थि और उससे पूर्व उत्पन्न हुए रोग शीघ्र दूर होते हैं । ( ३ ) गुल्मरोगमें कहाहुआ<noinclude></noinclude> c062kwvjxvrybx3qt5xarwmqkbsgvn9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९४ 104 165706 418297 2026-09-05T10:14:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । होती हैं (५९) बावची, देवदारू, नीम के पत्ते, दारूहल्दी और विजय- सार इन सबको ममें पीसकर योनिमें प्रलेप करनेसे योनिके सब रोग नष्ट होते हैं । (६०) ल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । होती हैं (५९) बावची, देवदारू, नीम के पत्ते, दारूहल्दी और विजय- सार इन सबको ममें पीसकर योनिमें प्रलेप करनेसे योनिके सब रोग नष्ट होते हैं । (६०) लहसन, घरका धुआँ, इन्द्रायनकी जड, वायविडंग और कटरीके फल इन औषधियोंको जलमें पीसकर योनिमें लेप करनेसे योनिगत कृमि और उसकी पीडा एक सप्ताहमें अवश्य नाश होती है । (६१) त्रियोनि नामक रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण लेकर १ तोला हरडके चूर्ण और गुडमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे ४ तोले तिल के तेलका अनुपान करे तो नष्ट हुआ आर्त्तव फिर होने लगता है । उक्त औषधको खाकर ऊपरसे शीतल जल पीनेसे बन्द हुआ ऋतुस्राव तत्काल फिर होनेलगता है (६२) कलि- हारीकी जडका चूर्ण अथवा चिरचिटेकी जडका चूर्ण या इन्द्रायनकी जडका चूर्ण इनमें से किसी एकको योनिमें रखनेसे नष्ट हुआ ऋतु धर्म पुनः प्रवर्तित होजाता है । (६३) ब्रह्मदण्डीकी जडके चूर्ण को तिलोंकी जडके काढमें मिलाकर पान करावे, अथवा मुलैठी और त्रिकुटके चूर्णको तिलोंकी जडके काढेके साथ पिलावे तो स्त्रियों के ऋतुस्राव बन्द होनेपर उत्पन्न हुए रक्तगुल्म रोगमें शीघ्र लाभ होता है। और नष्ट आर्त्तवभी फिर जारी होजाता है । ( ६४ ) दूधमें घी डाल- कर अच्छीतरह औटावे। जब वह खूब ठंढा होजाय तब उसमें चनों का स्वरस, शहद और खाँड मिलाकर पान करनेसे रक्तविकार दूर होता है । ( ६५ ) गुड, त्रिकुटा, तिल और भारंगी इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे, फिर उस चूर्णको तिलोंके काढेमें डाल- कर पान करावे । इससे रक्तगुल्ममें और नष्ट आर्तव में विशेष उपकार होता है ( ६६ ) गर्भ न रहने और गर्भस्त्राव करने का उपाय कृष्ण- पक्षकी चतुर्दशीके दिन धतूरे की जडको लाकर उसको कमरमें बाँधकर यथेच्छरूप से रमणकरे तोभी स्त्रीके कभी गर्भ नहीं रहता । और उस जडको खोलकर फिर रमण करनेसे गर्भ<noinclude></noinclude> 6twld9bxlwyh4osu4dwkcyeufjo4obe पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१७ 104 165707 418298 2026-09-05T10:14:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७९५) (२८) लोहभस्म, अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, सुवर्ण- भस्म और हीरेकी भस्म सबको समान भाग लेकर घीग्वारके उसमें खरल करके गोला बनालेवे । उस गोले... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418298 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७९५) (२८) लोहभस्म, अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, सुवर्ण- भस्म और हीरेकी भस्म सबको समान भाग लेकर घीग्वारके उसमें खरल करके गोला बनालेवे । उस गोलेको पके हुए अण्डके पत्तोंस लपेटकर डोरेसे खूब मजबूत करके बाँधदेवे और उत्तम धानोंके ढेर में गाडकर तीन दिनतक रक्खा रहनेदेवे । फिर चौथे दिन उसको निकालकर बारीक पीसलेवे और शीशी में भरकर रखदेवे । इस रसको अपनी जठराग्निके बलाबल के अनुसार और प्रकृतिके अनुकूल उचित मात्रासे त्रिफला के चूर्ण और शहदमें मिलाकर सेवन करे | कृष्णात्रेय मुनिका निर्माण किया हुआ यह रस सर्व प्रकार के रोग और वृद्धा- वस्थाको नष्ट करनेवाला और सुख प्रदान करनेवाला है । यह श्रेष्ठ रसायन इच्छानुसार कार्य करनेवाली पाचों प्रकारकी खाँसी, शरीरकी पाण्डुता, हिचकी, व्रण, कफ, वात, हलीमक, मन्दाग्नि, खुजली, कुष्ठ, विसर्प, विद्रधि, मुखरोग, अपस्मार आदि सम्पूर्ण रोगोंको निर्मूल करनेवाली है। इस रसको गोष्यवस्तुसेभी अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये, क्योंकि यह सर्वत्र सहजमेंही सबको प्राप्त होसकता है और सिद्धि- प्रदान करती है । यह कमलाविलास रस वैद्योंको अत्यन्त यश प्रदान करनेवाला है ॥ ४९-५१॥ लक्ष्मीविलास रस । वेदेन्दुनेत्राङ्गरसाङ्गभागा भूसुतगंधोषणतिंदुकाः । भृंगाईगुंजाजवनीनवाभिर्भाव्यं त्रिशः स्वेद्यमदोऽ- कपत्रे || लक्ष्मीविलासः स विशाललक्ष्मीं तनौ तनोति क्षयिणः प्रयोगैः ॥ ५२ ॥ (१९) लोहभस्म ४ भाग, पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, मिरच आठ भाग, कुचला ६ भाग, सुहागा ८ भाग सबको एकत्र पीसकर<noinclude></noinclude> jy1qq71xky6aa0rjfzm7rfd8tkj2o2a पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४१ 104 165708 418299 2026-09-05T10:14:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१९ ) तृतीययामे रससेवनं तु कृत्वा निशायाः प्रहरे व्यतीते ॥ ९२ ॥ सेवेत कांती कमनीयगात्रां घनस्तनीबुज्ज्वल चारु- वस्त्राम् । रत्युत्सुकां कातरलो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८१९ ) तृतीययामे रससेवनं तु कृत्वा निशायाः प्रहरे व्यतीते ॥ ९२ ॥ सेवेत कांती कमनीयगात्रां घनस्तनीबुज्ज्वल चारु- वस्त्राम् । रत्युत्सुकां कातरलोलनेत्रां विलोलहा- रावलिमादधानाम् ॥ ९३ ॥ किं कामे तनुकामिनां मलयजेनावश्यजेनाशु किं किं चन्द्रेण परोपकारजनिना पुंस्को किलेपना पिकिम् ९४ सहस्रशः संति यदा तरुण्यो मदालसाः पीनपयो- 'धरा ढाः । तदा रसेंद्रः परिषेवणीयो विकारकारी भवतीह नान्यथा ॥ ९५ ॥ पारा १ भाग, सुवर्णभस्म २ भाग सीसेश्रीभस्म ३ भाग, अभ्रक ४ भाग, वङ्गभस्म ५ भाग, कान्त लोहभस्म ६ भाग, चाँदीकी नरम भाग सोनामाखी की भस्मटभाग सबको एकत्र मिलाकर धतूरेके तोंके रस और माँग रसमें खरल करे । फिर पीपल, गिलोय, भारंगी अमरबेल, सुगन्धवाला, नागरमोथा, शुद्ध मीठा तेलिया, मुलैठी, शतावर, कौंच और सरहटी इन प्रत्येकके रसमें सात २भावना देवे । इसके पश्चात् उसमें आधाभाग अफीम डालकर तुलसी के फूलोंके रसमें खरल करे । फिर चन्दन, आक, मैनफल, पीपल, मुंडी, केसर और कमलकन्द प्रत्येकके रस में उत्तगेत्तर क्रमसे एक एक बार भावना देवे तो यह रसराज उत्तम प्रकार से सिद्ध होता है । यह रस कामिनी स्त्रियों के मदको विध्वंस करनेमें अत्यन्त निपुण है । इसको प्रतिदिन २मासे खॉड और शहद में मिलाकर सेवन करना चाहिये । यह वीर्यको अत्यन्त स्तम्भन करनेवाला और स्त्रियोंके गर्वको शमन करने में अतिप्रवल है। इस रसको सेवन करके रात्रिमें भोजन नहीं करना चाहिये, केवल दुग्धपान करना चाहिये । दिनके तीसरे प्रहरमें ( अर्थात् ३ घंटे )<noinclude></noinclude> hlyqv6sd0pdae7du6m81zhf0dpfasci पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६४ 104 165709 418300 2026-09-05T10:15:19Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । यथायोगयुतं पक्कं त्रिफलाक्वाथ सर्पिषा । साधितं भक्षयेत्कांतमेकं वा केवलाभ्रकम् ॥ ५१ ॥ इह चानु पिबेत्क्षीरं न कुर्यात्तेन भोजनम् । मुद्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418300 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । यथायोगयुतं पक्कं त्रिफलाक्वाथ सर्पिषा । साधितं भक्षयेत्कांतमेकं वा केवलाभ्रकम् ॥ ५१ ॥ इह चानु पिबेत्क्षीरं न कुर्यात्तेन भोजनम् । मुद्रयूषं पिबेत्तोये कोष्णं वा नियतो भवेत् ॥ ५२ ॥ एतछोहरसायनाख्यममृतं पक्कं यथोक्तं क्रमा- दुआनः प्रतिवत्सरं नववधुः सार्धं तु वर्णेन्द्रियैः । दीर्घायुर्नवयौवनोन्नतकुचप्रौढांगना वल्लभो माद्यद्दतिबलो जराविरहितः पुत्रावृतः स्यान्नरः ॥५३ । पकी हुई ईटके यन्त्रमें अथवा पकी हुई मूंषामें कान्तलोहको डालकर फूँके । जब वह गलकर पतला हो जाय तब उसको त्रिफलेके काथमें बुझादेवे । जब उसकी पर्पटी होजाय तब उसका बारीक चूर्ण कर त्रिफल के क्वाथमें एक दिनतक खरल करके लोहे की कढाई में पकावे । उसके गल जाने पर फिर त्रिफलेके क्वाथमें डालकर बुझाने और उसी क्वाथमें १ दिन तक घोटकर गोला बनाकर के शराब सम्पुटमें बन्द कर देवे | फिर १६ अँगुल लम्बा चौडा और उतनाही गहरा जमीनमें एक गड्ढा खोदकर उसमें आरने उपलोंको भरकर उनके बीचमें उक्त सम्पुटको रखकर अग्नि जलावे । इस प्रकार पुट देनेसे . जबतक जलमें तैरनेवाली भस्म न हो तबतक बराबर पुटदेने । लगभग ४० पुट देने से जलपर तैरनेवाली भस्म होजाती है । इस विधिसे कान्तलाह की भस्म तैयार करनी चाहिये । इसीके अनुसार नीचे लिखी ताम्रमस्म तैयार करनी चाहिये। अदरख, शतावर, मुसली, विदारीकन्द, भाँगरा और गजपीपल इनको समानभाग लेकर सबका एकत्र क्वाथ बनालेवे। फिर उत्तम नेपाली ताँबेकी मूषामें जलके समान पतला गलाकर उपर्युक्त क्वाथमें बुझावे । फिर उस ताँबेको रेतीले<noinclude></noinclude> aws5uyvo70rhlhae4332d9x6aik8178 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८६ 104 165710 418301 2026-09-05T10:15:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८६४ ) रंगका विष रसक्रिया में, पीले वर्णका विष साधारण कार्योंमें और इतरका विष रसायनकर्ममें लेना चाहिये । हे सुन्दर मुखवाली देवि यद्यपि क्षीरसाग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418301 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ८६४ ) रंगका विष रसक्रिया में, पीले वर्णका विष साधारण कार्योंमें और इतरका विष रसायनकर्ममें लेना चाहिये । हे सुन्दर मुखवाली देवि यद्यपि क्षीरसागर के मथनेपर अमृत और महाविष दोनोंही पदार्थ उत्पन्न हुए हैं तथापि उपयुक्त मात्रा से सेवन किया हुआ विषयी अमृ- तके समान गुण करता है । और हे सुन्दरि ! मात्रासे अधिक सेवन किया हुआ अमृतभी विषके समान हानिकारक होजाता है | रसाय - निक गुणको चाहनेवाले वमन विरेचनादिके द्वारा शारीरिक बुद्धि करके नित्य हितकर पथ्य पदार्थोंका भोजन करनेवाले और शरीरपर घृतकी मालिश करनेवाले सासिक प्रकृतिके मनुष्यको शिशिर और वसन्तऋतु प्रतिदिन सूर्योदयके समय विषका यथोचित मात्रासे युक्तिपूर्वक उपयोग करना चाहिये । परन्तु अत्यन्त शीघ्र विनाश कर- नेवाली व्याधिके होनेपर यदि विषके द्वारा उस रोग के दूर होने की आशा होतो ग्रीष्मऋतु, वर्षाऋतु और दुर्दिनमें कदापि विष सेवन नहीं करना चाहिये । तथा क्रोधी मनुष्य पित्तरोग से पीडित और नपुंसक व्यक्ति के लिये एवं राजमहलमें अथवा भूख, ध्यास, भ्रम, धूप, मार्ग इनसे श्रम या किसी रोगके कारण मनके व्यथित होनेपर मनु- ष्यको विष सेवन नहीं करना चाहिये । एवं गर्भिणी, बालक, वृद्ध, रूक्ष प्रकृतिवाले और मर्मस्थानके रोग से पीडित व्यक्तियोंमें विषका प्रयोग नहीं करना चाहिये । विष सेवन करनेका पूर्णरूपसे अभ्यास होजा- नेपर भी पथ्यपदार्थों का सेवन करना चाहिये और कटु (चरपरे), खट्टे नमकीन, तेल आदि पदार्थ तथा दिनमें सोना, अनि और धूषका सेवन करना इन समस्त त्याज्य विषयोंको यत्न पूर्वक त्याग देवे । विष सेवन करनेवाले मनुष्य के रूक्ष पदार्थों को सेवन करनेसे नेत्रों में विकार, कर्णरोग तथा अन्यान्य वातरोग उत्पन्न होते हैं । अजीर्ण- गवाला मनुष्य यदि विष सेवन करे तो उसकी अवश्य मृत्यु होजाती है ।<noinclude></noinclude> pe1uog4o2bxgen5gpm68v20cv1pqkrx पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०९ 104 165711 418302 2026-09-05T10:16:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८८७) बढ़ाता हुआ एक जौ अथवा तीन जोकी मात्रातक एक वर्ष पर्यन्त सेवन करने से सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं । ( ६५ ) वच, गन्धक, सैंधा, शायमाणलता अम्लचैत, त्रि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418302 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (८८७) बढ़ाता हुआ एक जौ अथवा तीन जोकी मात्रातक एक वर्ष पर्यन्त सेवन करने से सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं । ( ६५ ) वच, गन्धक, सैंधा, शायमाणलता अम्लचैत, त्रिकुटा, चीता, वायविडङ्ग, पाढ, नोनिया, गजपीपल और विष इनके समान भाग पुर्णको शार्ङ्गरी, नागदौनी, कौठाडी और त्रिफला इनके काथमें भावना देकर मधु और घृतके साथ सेवन करनेसे रसायन के समान गुण प्राप्त होता है । (६६) हल्दी, नीम के पत्ते, पीपल, मिरच, नागरमोथा और वायविडङ्ग इनके चूर्णको गोमूत्र में अथवा बकरीके मूत्रमें पीसकर नस्य लेनेसे वा गोमूत्र और asis रुधिर में पीसकर नस्य लेनेसे अथवा रसौत के साथ पीसकर नस्य लेने, नेत्रोंमें आँजने और घीमें पकाकर पान कर. नेसे विषम आदि ज्वर दूर होते हैं । (६७) विष, मधु और त्रिकुटा afaint एकत्र मिलाकर देनेसे सन्निपात ज्वर, तथा गोमूत्र के साथ देनेसे शीतज्वर, चन्दनके काथ अथवा अडूसेके क्वाथके साथ सेवन करानेसे रक्तपित्त रोग दूर होता है । (६८) वत्सनाभ विषको दूध और असगन्धके चूर्ण के साथ सेवन करनेसे क्षय रोग, मधुके साथ मिलाकर सेवन करनेसे खाँसी, श्वास महके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी और चावलों के अलके साथ सेवन करनेसे मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होता है। (६९) विष मधुके साथ प्रयोग करनेसे प्रमेहको, गुडके पानी के साथ सेवन करनेसे गुल्म तथा शूलको, गोदुग्ध अथवा त्रिफले के क्वाथ के साथ सेवन करनेसे पाण्डुरोग और शोथको शमन करता है । (७०) गोमू- के साथ सेवन करनेसे औदुम्बर कुष्ठको और मट्ठेमें पसिकर लेप करनेसे दाद, खुजली, विचर्चिका आदि त्वचाके विकारोंकी दूर करता है। तथा गरम जलके साथ पान करनेसे वायुको और तुलसी के रसमें घोटकर लेप करनेसे ग्रहों की पीडाको हरता है। इसको गोमूत्र में घिसकर नस्य लेनेसे स्मरण शक्ति बढती है और नेत्रोंमें आँजनेसे दृष्टिगत रोग नष्ट होते हैं । (७१) विषको खीके दूधमें पीसकर<noinclude></noinclude> dl46b3b378jzgt3xhwn8ipvyvhud2v1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३३ 104 165712 418303 2026-09-05T10:16:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेनः । ( १११) कल्क शरीरपर मलनेसे कुछ कहाँ ? अर्थात् कुष्ट समूल निर्मूल हो जाता है । (१५) चीता १ तोला, कौंच के बीज २ तोले, मकोयकी जड ४ तोले, कन्हूरीकी जड ८ तोले और... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418303 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेनः । ( १११) कल्क शरीरपर मलनेसे कुछ कहाँ ? अर्थात् कुष्ट समूल निर्मूल हो जाता है । (१५) चीता १ तोला, कौंच के बीज २ तोले, मकोयकी जड ४ तोले, कन्हूरीकी जड ८ तोले और बाबची १६ तोले इन सबको एकत्र चूर्ण करके गोमूत्रमें तीन बार भावना देवे । फिर उसमे पारेकी भस्मको मिलाकर सेवन करे और मट्ठके साथ भोजन करे वो ये औषायाँ श्वेतकुष्ठको शमन करती हैं । ( २६ ) अब्रकभस्म, सूर्यकान्तमणि, बावची मूबाकानी, सलिलरिपु (१), नकुल कन्द, पिपल, सोंठ, भाँगरा, मिरच, धौं वृक्ष, कपुर, चीता, अंकोल के बीज, कालेतिल, बावची, सहोरावृक्षकी छाल, त्रिफला और पारेकी भस्म ये प्रत्येक एक र भाग और बावची दो भाग लेकर सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके यथोचित मात्रा से सेवन करे और प्रतिदिन दूध- भातका भोजन करे । इसके सेवन से श्वेतकुष्ठ शीघ्र नष्ट होता है। (२७) नमिके कोमल पत्तोंको पीसकर उसमें शहद और पारेकी भस्म मिलाकर सेवन करनेसे कृमि रोग नष्ट होता है । (२८) लह- सुनके कल्क और कायके द्वारा सिद्ध किये हुए तेल के साथ पारेकी भस्मको सेवन करने से वातजरोग शमन होते हैं । ( २९ ) सॉठ और rusher जढ़के काथमें दूधको पकावे । जव पककर दूध मात्र शेष रह जाय तब उस दूधके साथ पारेकी भस्मको सेवन करने से गृध्रसी रोग दूर होता है । (३०) गुड, हरड और गिलोयका स्वरम इनके साथ पारदभस्मको मिश्रित करके भक्षण करनेसे वातरक्तरोग शान्त होता है । ( ३१ ) त्रिकुटा, त्रिफला और वायविडङ्ग इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णके बराबर शुद्ध गूगल लेकर सबको अण्डीके तेलमें मिलाकर उसके साथ सेवनकी हुई पारद भस्म स्थूलताको दूर करती है । (३२) शहदको पानी में घोलकर उसमें खांड और पारदभस्म मिलाकर सेवन करनेसे कृशता दूर होती है । ( ३३ ) हींग, कालानमक और त्रिकुटा इनके कल्क और गोमूत्रके साथ सिद्ध किये हुए घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे पारेकी भस्म अप-<noinclude></noinclude> cz55upnxi705vw8acvw8kx770vqf574 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०६ 104 165713 418304 2026-09-05T10:17:01Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ६८४ ) अकस्मात् श्वासोच्छ्वास की गतिमें बाधा उपस्थित होना, योनिका . एकदम संकुचित व भ्रष्ट होना, शरीरका शीतल होना, और डकार में दुर्गन्ध आना इन लक्ष... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ६८४ ) अकस्मात् श्वासोच्छ्वास की गतिमें बाधा उपस्थित होना, योनिका . एकदम संकुचित व भ्रष्ट होना, शरीरका शीतल होना, और डकार में दुर्गन्ध आना इन लक्षणोंके होनेपर मूढ गर्भा स्त्री जीवित नहीं रहती ॥ १०२ - १०४ ॥ गर्भको प्रसव कराने के सामान्य उपाय | बीजं करअ संजातं कपित्थ तुलसीजयाः ॥ दुग्धे पिष्ट्वा विलिप्याऽथ नाभिपत्करलेपतः ॥१०५॥ सुरया वाऽहि निर्मोकैः सम्यग्योनिप्रधूपनात् । सुखं सूते वधूर्मूर्ध्निस्नुक्पयः क्षेपणादपि ॥ १०६ ॥ हलिनीमूलिकानाभिगुहा बस्तिप्रलेपिता । विशल्यां कुरुते नारीं वतपुष्पा च सा क्षणात् १०७ यष्टी लुंगजटा पिष्टा पीता स्रुतिकरी ध्रुवम् । लांगली मधुसिंधूत्थयोनिलेपात्स्रवेद्ववः ॥ १०८ ॥ मातुलुंग्याश्च मूलं हि रंभाया वा कटिस्थितम् । सिद्धार्थमागधीकुष्ठगोलोमीमिशिकल्कितः ॥ निरूहः स्नेहपटुयुग्जरायुं पातयेत्तराम् ॥ १०९ ॥ सिद्धं सिद्धार्थकं तैलं पायौ वा स्मरमंदिरे | अनुवासनतः शीघ्रमपरां पातयेत्तरोम् ॥ ११० ॥ करंजके बीज, कयका गूदा और तुलसीकी जड तीनों को दूधमें पीसकर नाभिपर और हाथों पैरोंमें लेप करनेसे तुरन्त प्रसव होता है । साँपकी कैचलीको मद्य ( आसव ) में पीसकर उसकी योनिमें धूनी देनेसे, अथवा थूहरके दूधका मस्तक पर लेप करनेसे स्त्रीके सुखपूर्वक सन्तान उत्पन्न होता है । कलि-<noinclude></noinclude> sqhx896sb77qtiocbo55i7ykb1f156n पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२९ 104 165714 418305 2026-09-05T10:17:23Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७०७) लिये भी वैद्य रोगीको आठ १ रत्ती पपैटी रस ब्राह्मीक स्वरसमें घोट- कर सेवन करावे और ऊपरसे उडदोंके मांडमें घी और दूध मिलाकर पान करावे । इस उपचारक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७०७) लिये भी वैद्य रोगीको आठ १ रत्ती पपैटी रस ब्राह्मीक स्वरसमें घोट- कर सेवन करावे और ऊपरसे उडदोंके मांडमें घी और दूध मिलाकर पान करावे । इस उपचारके करनेसे अपस्मारमें शीघ्र लाभ होता है ॥ १८-२८ ॥ नेत्रामय । कृष्णे पंच नवैव सधिषु दश त्रीण्येव शुक्रेऽखिले जाताः षोडश वर्त्मजाः खलु चतुर्विंशो दृशेविंशतिः । सप्ततिकता चतुर्नवतिरित्यक्ष्णोरशेषामया- न्योवेत्ति प्रपहर्तुमेष विदुषामग्रे समर्थो भवेत् ॥२९॥ आँखोंकी काली पुतली में १४, सन्धियोंमें १३, सफेद पुतली में १६, पलकों में २४, दृष्टिमें २० और आँखोंके गोलेमें ७ इस प्रकार सब मिलाकर नेत्रोंके ९४ रोग होते हैं । इन सम्पूर्ण रोगोंको जो अच्छे प्रकारसे जानता है और विविध उपायोंके द्वारा उनका प्रति- कार कर सकता है वह वैद्य विद्वानोंमें अग्रगण्य समझा जाता है ॥ २९ ॥ ताम्रति । आर्द्राभृंगाणां रसपिष्टेन कस्यचित् । गंधकेन समासेन प्राग्वत्तानं च मारितम् ॥ ३० ॥ ताम्राभ्रकं च तुत्थं च दशनिष्कं पृथक् पृथक् । कंदुकस्थमिदं त्रिंशत्कर्षचूर्णितगंधकम् ॥ ३१ ॥ दत्त्वात्पशोऽग्निनाल्पेन रुद्धा धूम विसर्जयेत् । प्रस्थांमर्दितस्यास्य प्रासादं निःसृतं युतम् ||३२|| तुत्थनीर शिलाजाभ्यां कर्षाशाभ्यां विशोषयेत् । • ताम्रद्रुतिरियं साज्यमानुषीक्षीरमाक्षिकात् ॥ ३३ ॥<noinclude></noinclude> ni66ax9qtozh4ppprso2ze3so8gitxo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५१ 104 165715 418306 2026-09-05T10:17:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७२९) एक २ बार भावना देकर फिर अदरखके रसमें सात बार भावना देवे और सुखाकर बारीक चूर्ण करलेने | इस प्रकार यह मणिपपेटी नामक रस सिद्ध होता है । इसको प्रति... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७२९) एक २ बार भावना देकर फिर अदरखके रसमें सात बार भावना देवे और सुखाकर बारीक चूर्ण करलेने | इस प्रकार यह मणिपपेटी नामक रस सिद्ध होता है । इसको प्रतिदिन एक एक रत्ती परिमाण उपर्युक्त अनुपान के साथ सेवन करे। यह रस नासिकाके सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करता है - और पथ्य आदि उपचारोंका विशेषरूपसेपालन करने और भिन्नभिन्न अनुपानोंके द्वारा प्रयोग करनेसे सब प्रकारकी व्याधियोंकों दूर करता है ॥ १६-२० ॥ सामान्य उपाय | प्यास्त्रमतिदुर्गंधि नासायामतितापनुत् । कृतं नस्येन हन्यात्तच्छेतजीरं सितायुतम् ॥२१॥ घृताक्तं कुंकुमं घृष्टं नस्यं पीनसजिद्भवेत् । जलेन पेषयेद्विगुह्य अनात्कामलां जयेत् ॥२२॥ तद्वत्तंडुलतोयेन ह्याकुलीमूलमञ्जयेत् । कामला इंति नो चित्रं नासारोगयुतोद्भवाम् ॥२३॥ नाकर्मसे पीब अथवा रुधिर निकलता हो, अत्यन्त दुर्गंध आती हो और अत्यन्त दाह होती हो तो सफेद जीरेको पानी में पीसकर वखमें छान ले, फिर उस रसमें अथवा जीरके काटेमें मिश्री मिलाकर उसकी नस्यदेवे । अथवा उस रसकी दो, चार बूंदे नाकर्मे डाले । अथवा शंख, जीरा और मिश्री इन तीनोंके समान भाग चूर्णको एकत्र मिलाकर उसकी नस्यदेवे। इन प्रयोगोंके करनेसे उपर्युक्त सब विकार नष्ट होते हैं। केसरको घृतमें पीसकर कुछ गरम करके उसकी नस्य देनेसे पीनस रोग दूर होता है । हांगको जलमें बारीक पीसकर नेत्रोंमें आंजने से मासारोगके कारण उत्पन्न हुआ कामला रोग नष्ट होता हैं, इसी प्रकार यदि चावलों के घोवन के पानीमें नकुलकन्दकी जडको पीसकर आँखों में<noinclude></noinclude> 1no0zrh60nf1iqdiz710w2zllndufpo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७३ 104 165716 418307 2026-09-05T10:18:10Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७५१) उदयभास्कर रस सेवन करनेपर गण्डमालाको शीघ्र दूर करता है । ( ४ ) जिया पोताकी गिरीको जलमें पीसकर लेप करनेसे मृत्युकारक फोडा, विषैला फोडा और अन्यान... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418307 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७५१) उदयभास्कर रस सेवन करनेपर गण्डमालाको शीघ्र दूर करता है । ( ४ ) जिया पोताकी गिरीको जलमें पीसकर लेप करनेसे मृत्युकारक फोडा, विषैला फोडा और अन्यान्य पीडाकारक फोडे तत्काल आराम होजाते हैं । यह प्रलेप ग्रन्थि, अर्बुद आदि सब प्रकारकी ग्रन्थियोंको और उनसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य समस्त रोगों को नष्ट करता है । (५) यदि रोगी की बगल, जाँघ आदिके सन्धिस्थानों मर्मस्थानोंमें गाँठ निकल आईहो और दाह होती हो तो रोगीको रात्रिमें दूध भातका भोजन करना चाहिये । और पैर के अँगूठेके अग्रभागमें छेद करके रक्त निकाल देना चाहिये। ऐसा करनेसे शीघ्र आरोग्य लाभ होता है । (६) केवल जियापाताकी गिरीको पानी में पीसकर लेप करे तो कोखकी गाँठ, गलेकी गाँठ, कमरको गाँठ और अन्य अनेक प्रकार के तीव्र फोडे बहुतजल्द आराम होजाते हैं । ( ७ ) चोटलीके पत्ते, मैनसिल और मुलैठी तीनोंको गोदुग्धमें पीसकर पिलानेसे, अथवा जियापोताकी गिरीको दूधमें या पानीमें पीसकर पान करानेसे विषैला और मृत्युकारक फोडाभी शीघ्र आराम होता है । (८) विष्णु- कान्ताकी जड और पेटारी वृक्षकी जडको काँजीमें पीसकर लेप कर- नस कालरूप फोडाभी शान्त होजाता है, फिर और दुष्ट ग्रन्थियोंकी तो बातही क्या है । (९) पुनर्नवा, आक की जड, खस, सेंजने की छाल, कुचला, करंजकी जड, सैंधानमक और सोंठ इन सबको समानभाग लेकर गोमूत्र में पीस लेवे, फिर गरम करके सुहाता २ लेप करे तो ग्रन्थि अर्बुद और अपची ये सब तत्काल नष्ट होती हैं ॥ १०८-११७ ॥ अर्बुद (रसौली) के भेद । मेदो हि दोषमांसोत्थग्रंथिरूपं ततो महत् । अर्बुदं दुष्टरुधिरं स्रवेत्तच्छोणितार्बुदम् ॥ ११८ ॥<noinclude></noinclude> oozs7yynq582l5noiq6id9iu55a82jo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९५ 104 165717 418308 2026-09-05T10:18:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । ( ७७३) स्थित होजाता है, ऐसा श्रीनागार्जुन सुनिने कहा है । ( ६७ ) अथवा कृष्ण चतुर्दशी के दिन धतूरेकी जडको लाकर बारीक पीसकर कपट- छान करलेवे उस चूर्णको यो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटी कोपेतः । ( ७७३) स्थित होजाता है, ऐसा श्रीनागार्जुन सुनिने कहा है । ( ६७ ) अथवा कृष्ण चतुर्दशी के दिन धतूरेकी जडको लाकर बारीक पीसकर कपट- छान करलेवे उस चूर्णको योनिमें रखनेसे भी कभी गर्भ नहीं रहता । (६८) मासिकधर्म होनेके बाद सैंधेनमकको तिल के तेलमें मिलाकर योनिमें रखे तो सम्भोग करनेपर मिले हुए भी रज और वीर्य तत्काल स्खलित होजाते हैं । ( ६९) यदि गर्भवती स्त्री किसी देवालयमें जाकर सैंथनमक के १ तोला चूर्णको जलमें पीसकर और तिल के तेलों मिलाकर पान करे तो तत्काल गर्भस्त्राव होजाता है ॥ ६१-८७ ॥ मंजिष्ठादि घृत | मंजिष्ठा तगरं कुष्ठं त्रिफला शर्करा वचा । मेदा यष्टी हरिद्वे द्वे दीप्यकं कटुरोहिणी ॥ ८८॥ पयस्या हिंगु काकोली बाजिगंधा शतावरी ॥८९॥ प्रत्येकं चूर्णयेत्कर्ष द्वात्रिंशत्पलकं घृतम् । घृताच्चतुर्गुणं क्षीरं घृतशेषं विपाचयेत् ॥ ९० ॥ ॥ योनिशले शुक्रदोषे गर्भिणीनां च पाययेत् ॥ ९१ ॥ ( ७० ) मँजीठ, तगर, कूठ, त्रिफला, खाँड, वच, मेदा, मुलैठी, हल्दी, दारूहल्दी, अजवायन, कुटकी, क्षीरकाकोली, हॉग, काकोली असगन्ध और शतावर इन औषधियोंको एक २ तोला लेकर चूर्ण करके कल्क बनालेवे । उस कल्कको ३२ पल घृत और घृतसे चौगुने दूधमें मिलाकर पकावे । जब पककर घृतमात्र शेष रहजाय तब उता- रकर छान लेवे। इस घृतको योनिशूल और शुक्र सम्बन्धी रोगो में पान करानसे तथा गर्भिणी स्त्रियोंके रोगोंमें प्रयोग करनेसे शीघ्र आरोग्य लाभ होता है | ८८-९१ ॥ क्षुद्ररोगोंके सामान्य उपचार | कांडमेरण्डपत्रस्य योनावष्टांगुलं क्षिपेत् ।<noinclude></noinclude> kd4zpn5n8bgc6kflv62eg2mlo5xgj5h पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१८ 104 165718 418309 2026-09-05T10:19:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७९६ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाँगरा, अदरख, चोंटलीकी जड, तुलसी और शतावर इन औषधि- याके रसमें क्रमते तीन २ दिन तक भावना देकर गोला बनालेवे ! उस गोलेको आक के पत्तोंमें लपेटकर थ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418309 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७९६ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाँगरा, अदरख, चोंटलीकी जड, तुलसी और शतावर इन औषधि- याके रसमें क्रमते तीन २ दिन तक भावना देकर गोला बनालेवे ! उस गोलेको आक के पत्तोंमें लपेटकर थोडी देरतक मन्द मन्द अनिके द्वारा स्वेददेवे । फिर बारीक पीसकर शीशीमें भरकर रखदेवे । यह लक्ष्मीविलासरस नियमपूर्वक सेवन किये जानेसे क्षयरोगी के शरीर में विशाल शोभाको विस्तृत करता है ॥ ५२ ॥ सौश्रुतनारिकेल । वाराहीमुशली कंद फनकाऽहिखरस्तथा । वानरी फलसंयुक्तं चूर्णयित्वा पृथक पृथक ॥ ५३ ॥ कार्पासमज्ज दुग्धेन उकलय्य यथाक्रमम् । भावना सप्तकं दत्त्वा सूर्यतापे विशोषयेत् ॥ ५४ ॥ नारिकेरं च संभृत्य द्वारं रुध्वा यथाविधि । गोदुग्धेन तु तत्कल्पषोडशद्वयमात्रतः ॥ ५५ ॥ द संवर्तितं भाण्डे यथा दाढयै न याति च । शीतं चूर्णीकृतं पक्वमाज्येन प्रपचेन्नरः ॥ ५६ ॥ जातीफलं लवंगं च एलाचूर्ण विनिक्षिपेत् । निष्पन्नं शाणमात्रं तु गृहीत्वा प्रपिबेत्पयः ॥ ५७॥ वातरोगान्प्रमेदांश्च बलक्षयमथोल्बणम् । सप्तरात्रप्रयोगेण प्रशमं याति सर्वतः ॥ ५८ ॥ वृद्धोऽपि तरुणत्वं स प्रहर्षति सदा नरः । सौश्रुताख्यं नारिकेलं गुरुणा परिकीर्तितम् ॥ ५९ ॥<noinclude></noinclude> 316pmv9pbw41o4prjba4fryyss443ln पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४२ 104 165719 418310 2026-09-05T10:19:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८२० ) बीत जानेपर सुन्दर शरीरवाली, कठिन स्तनोंवाली, अत्यन्त उज्वल और मनोहर वस्त्रोंको धारण करनेवाली, रतिक्रीडा करनेमें, उत्सुक, कातर और चपलनेत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ८२० ) बीत जानेपर सुन्दर शरीरवाली, कठिन स्तनोंवाली, अत्यन्त उज्वल और मनोहर वस्त्रोंको धारण करनेवाली, रतिक्रीडा करनेमें, उत्सुक, कातर और चपलनेत्रोंवाली तथा चञ्चल हार और शुभ लक्षणोंको धारण करनेवाली ऐसी स्त्रीके साथ सम्भोग करे | अल्पवीर्यवाले मनु- ष्योंको यथेच्छकाम शक्तिके प्राप्त करनेमें मलयाचलकी सुगन्धित वायुके सेवन से क्या तथा तत्काल कामोत्तेजक पदार्थों के सेवन से क्या? कामीजनों का परोपकार ( अर्थात् चित्तको आह्लादित) करनेवाली चन्द्रमाकी चाँदनीसे क्या? और कोकिलाओं के मधुर स्वरवाले गानों को श्रवण करने से क्या लाभ ? अर्थात् कुछ नहीं । इसलिये अल्पवीर्यवाले मनुष्यों को यह रसेन्द्रचूडामणि रस सेवन करना चाहिये । इसके सेवन करनेपर फिर उनको किसीभी कामोत्तेजक पदार्थको सेवन करनेकी आवश्यकता नहीं, मनोहारी मलयाचलकी वायुकी कुछ जरूरत नहीं, कामजनके चित्तको आह्लादित करना ही है परोपकार जिसका ऐसी चन्द्रमाको चाँदनी और कोकिला मधुर स्वरवाले गानों को सुनने की कामके उत्तेजित करनेमें कुछभी आवश्यकता नहीं । केवल यहीं रस उनकी यथेष्ट कामनाओंको पूर्ण करने में समर्थ हैं। यदि जिस पुरुष के मदोन्मत्त और अत्यन्त कठिन तथा स्थूल स्तनोंवाली हजारों युवति स्त्रियाँ हों तो उस पुरुषको यह रसेन्द्रचूडामणि रस सेवन करना चाहिये। इस रसके समान कोई भी औषध कामको जागृत नहीं कर सकती है । इस रसपर पथ्य पदार्थों का सेवन करना चाहिये, अन्यथा यह विकार उत्पन्न करता है । । ८६-९९ ॥ पूर्णचन्द्र रस । सृतं गधं चाश्वगंधा गुडूचीयष्टीतोय वासरैकं विघृष्य । क्षुद्रं शंखं मौत्तिकं लोह किहूं भस्मीभर मततुल्यं हि दद्यात् ॥ ९६ ॥<noinclude></noinclude> kwmagabxg8lz9r64x23qzd9gosjcrtr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६५ 104 165720 418311 2026-09-05T10:19:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ मापाटीकोपेतः । ( ८४३) रेतकर खूब बारीक चूर्ण करके उसी कायमें एक दिनतक घोटकर कढाई में डालकर पकावे | जब वह गलकर पतला होजाय तब फिर उक्त काथमें बुझाकर उसी कायके साथ एक दि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418311 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>मापाटीकोपेतः । ( ८४३) रेतकर खूब बारीक चूर्ण करके उसी कायमें एक दिनतक घोटकर कढाई में डालकर पकावे | जब वह गलकर पतला होजाय तब फिर उक्त काथमें बुझाकर उसी कायके साथ एक दिनतक खरल करके गोला बनालेवे और उसको शराब सम्पुटमें बन्द करके पूर्ववत् १६ अंगुल लम्बे चौडे गड्ढे में आरने उपलोंके बीच में रखकर पकावे | इस प्रकार उक्त क्वाथमें घोट २ कर ६० पुटदेवे । ताँबेकी वान्तिहर और जलपर तैरनेवाली भस्म होती है । फिर निम्नलिखित विधिसे अभ्रक भस्म तैयार करे । प्रथम काँर्जामें धान्याभ्रकको तैयार करके फिर ताम्र भस्म में • कही हुई अदरख आदि औषा याके क्वाथमें खरल करके गोला बना- कर सुखावे | फिर उसको पूर्वोक्त विधिले गड्ढमें रखकर आरने उपलों की अभि देवे इस प्रकार पुटदेनेसे जबतक निश्चन्द्र भस्म न हो तचतक उक्त क्वाथमें घोट घोटकर बराबर पुटदेवे । लगभग ७० पुर- देने से अभ्रककी निश्चंन्द्रं भस्म होती है । इसके पश्चात् उपर्युक्त विधिसे सिद्ध की हुई कान्तलोहकी भस्मको घी, शहद, मछेछी घास और चौलाईका शाक इन प्रत्येकके रसमें क्रम से एक एक बार खरल करे । उसके बाद उक्त विधिसे तैयार की हुई ताम्रभस्यको अरणी, मोखा वृक्ष, शार्ङ्गरी, मुसली और सैंधानमक इन प्रत्येकके रस में एक २ भावना देवे । फिर उपर्युक्त अभ्रक भस्मको हडसंहारी, विशेष प्रकारका थूहर बाँझकोडा, अथवा बाँदा और पुनर्नवा इन औषधियोंके रस में उत्त- रोत्तर क्रमसे खरल करके फिर दूधमें एक भावना देकर सिद्ध करे । जिस औषधिका स्वरस न निकले, उसका क्वाथ बनालेना चाहिये । इन तीनों भस्मोंको काजल के समान खूब बारीक पीसकर तैयार करे । लोहरसायन बनानेकी क्रिया । यदि वात प्रकृतिवाले रोगके लिये यह रसायन बनानी हो तो कान्तलोहभस्म २० तोले, ताम्रभस्म ५८ तोले और अभ्रक भस्म५८ वाले लेवे और पित्त प्राघनवाले रोगीके लिये यह रसायन बनानी हो । तो कान्तलहिभस्म २० तोले, ताम्रभस्म २१ वोले और अभ्रक भस्म<noinclude></noinclude> 1w6z0r4368rvi9zp9r9qg2nbcnu3fja पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८७ 104 165721 418312 2026-09-05T10:20:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भावाटी कोपेतः । विषविद्रायणघृत । ( ८६५ ) विजया पिप्पलीमूलं पिप्पलीद्वयचित्रः । पुष्कराह्रा सटीद्राक्षा यवानीशारदीप्यकैः ॥ २८ ॥ सितायष्टिद्विवृहती सैंधवैः पा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भावाटी कोपेतः । विषविद्रायणघृत । ( ८६५ ) विजया पिप्पलीमूलं पिप्पलीद्वयचित्रः । पुष्कराह्रा सटीद्राक्षा यवानीशारदीप्यकैः ॥ २८ ॥ सितायष्टिद्विवृहती सैंधवैः पालिकैः पचेत् । सविषार्धपः प्रत्थं घृतात्तज्जीर्णभुक् पिबेत् ॥ २९॥ दुर्नाममेहगुल्मा र्म तिमिर क्रिमिपाण्डुकान् । गलग्रहग्रहोन्मादकुष्टानि च नियच्छति ॥ विषविद्वावणं नाम घृतं विपरुजं हरेत् ॥ १० ॥ भाँग, पीपलामूल, पीपल, गजपीपल, चीता, पोहकर मूल, कचुर, दाख अजवायन, जवाखार, अजमोद, मिश्री, मुलैठी, कटेरी, बडी कटेरी और Auranक ये प्रत्येक औषधि चार २ तोले और शुद्ध विष २ तोले इन सबको एकत्र कूटकर अठगुने जलमें अष्टमांशावशिष्ट क्वाथ बना लेते। उस क्वाथमें एक प्रस्थ घी डालकर उसको उत्तम प्रकारसे पकाकर सिद्ध करलेने और छानकर शीशीमें भरकर रखदेवे। इस घृतको प्रति- दिन खूब भूख लगने पर उचित मात्रा से सेवन करे तो यह विषविद्रावण नामक घृत- बवासीर, प्रमेह, गुल्म, अर्म, तिमिर आदि नेत्ररोग, कृमिरोग, पाण्डुरोग, गलग्रह, ग्रहबाधा, उन्माद और कुष्ठ इन सब रोगोंको तथा विषसे उत्पन्न हुए उपद्रवोंको शीघ्र दूर करता है ॥ २८-३० ॥ श्वित्रारि बैल | लाक्षा पुराह्न मंजिष्ठा कुष्ठपद्मकसारिवाः । गुंजा मही कुरबको लांगली वज्रकंदकः ॥ ३१ ॥ वाराहीकंदकास्फोता सप्ताह्वा गिरिकर्णिका । अर्काश्वमारयोर्मूलं नागपुष्पं नतं निशे ॥ ३२ ॥ ३०<noinclude></noinclude> c34hiz16i8kd70quolocyzbb8f449th पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१० 104 165722 418313 2026-09-05T10:20:31Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (८८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । आँजनेसे स्यन्द और अधिमन्थ नामक नेत्ररोग, रक्तविकार सहित अकोष आदि नेत्ररोग तथा कसौंदीके इसमें घोटकर आँजनेसे मोति- याविन्द और भाँगरके इसमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418313 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । आँजनेसे स्यन्द और अधिमन्थ नामक नेत्ररोग, रक्तविकार सहित अकोष आदि नेत्ररोग तथा कसौंदीके इसमें घोटकर आँजनेसे मोति- याविन्द और भाँगरके इसमें घोटकर नेत्रोंमें लगानेसे रतौंधा याना दूर होता है | केकी फलीके रसमें विषको खरल करके आँजने से फूला, और तांबे के पानमें शहदके साथ घिसकर लगानेसे आँखका बढा हुआ मांसका डेला कम दूर होता है । (७२) विषको कपातकी जडके क्वाथमें खरल करके उसके कुल्ले करने से अथवा लेपकरनेते दाँतोंकी पीडा शमन होती है। गोमू में पीसकर लगाने से शस्त्र के द्वारा उत्पन्न हुए घाव और व्रण शत्रिभर जातेहैं । तथा शहदके साथ मिला- कर लगानेसे विष भगन्दर, रसौली और गाँठको और गुणके साथ मिलाकर लगानेसे सच कारके व्रणों को शमन करता है । (७३) विषके नारियल के जलमें पीसकर सेवन करने से वह लिंगके सब विकारोंकी और भाँगरके रस अथवा नागकेसरके उसके साथ पकाये हुए। घृतके साथ सेवन करनेसे प्रदर रोगको नष्ट करता है। केलके कन्दके रस और घृतमें विषको मिलाकर पीनसे और लेप करनेसे सर्पका विष दूर होता है । गौका महा और मनुष्यका मूत्र इन दोनों के साथ मिलाकर पान किया हुआ विष चूहे और बिच्छू के विषको दूर करता है । और आकके दूधमें पीसकर लेप करने से मकडीका विष अर्थात् मकडीका फलना दूर होता है । कमलके रस और घृतके साथ सेवन किया हुआ विष सब प्रकारके विषको दूर कर देता है । (७४) कान्तलोह भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध मेनसिल, शुद्ध मिठातेलिया, शुद्ध पारेकी भस्म और सोना- माखीकी भस्म इन सब रसको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके मधु और घृतके साथ सेवन करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण रोग, वृद्धावस्था और मृत्युसे विजय प्राप्त करता है । ( ७५) नट<noinclude></noinclude> h82jtwrztud116sn1wiimkk3bvbs1ak पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३४ 104 165723 418314 2026-09-05T10:20:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (९१२) - रसरत्नसमुच्चयः । स्वार रोग और उन्माद रोगको नष्ट करती है । ( ३४ ) महुआ, मैन सिल, नीलाथोथा और पायरा पक्षीकी विष्ठा इनके साथ पारेकी भस्मको खरल करके नेत्रोंमें आँज... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९१२) - रसरत्नसमुच्चयः । स्वार रोग और उन्माद रोगको नष्ट करती है । ( ३४ ) महुआ, मैन सिल, नीलाथोथा और पायरा पक्षीकी विष्ठा इनके साथ पारेकी भस्मको खरल करके नेत्रोंमें आँजनेसे भी उन्माद रोगका शमन होता है । (३५) विनौलौकी गिरी १ भाग और पपिल ८ भाग दोनोंको काँजीमें पीसकर धूपमें रक्खे और हाथसे मसलकर उसका तेल निकाल लेवे उस तेलके साथ पारेकी महमको मिलाकर नेत्रों में लगाने से पलकों के बालों का गिरना दूर होता है और उनमें नवीन बाल उत्पन्न होते हैं । ।। ४०-६७ ॥ पारदस्म के अन्य सामान्य प्रयोग | बर निम्ब किसलाजपुरीषधूमैः कांस्येक्षुराश्मव नितास्तनजेन घृष्टम् । भात धूपित र सजिन मंज- यित्वा साभ्यंजनापनमक्ष्णि रुजं निर्हति ॥ ६८ ॥ महाभेरीमूलं तुरगपृथुकाम्भोधिकुवलं रसो जंबीराम्लं जयति तिमिरं काचमपि च । उपात्तं जीमूताद्रविजघरपणीनुमृदिता- सस्तैलं लेपादिह विविधजाड्यं च गुदजान् ॥ ६९॥ त्रिफलापटोलमूलव्योपगुडूचीविडंगबीजानि । समगुग्गुलूनि मारितरसमिलितानि व्रणघ्नानि॥७०॥ ग्रंथीन्विलेपयेत्तेषां लेपान्मूलरसान्वितम् । नारिकेरोदकं तद्वत्पीतं इंति मसूरिकाः ॥ ७१ ॥ मंजिष्ठाशबरोद्भवं तुवरिका लाक्षा हरिद्वाइयं नेपालीहरितालकुंकुमगदान्गोरोचनागैरिकम् ।<noinclude></noinclude> niy8e765nnzwgv0i46um3y3875v4see पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०७ 104 165724 418315 2026-09-05T10:21:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८५) हारीकी जडको पानीमें खूब बारीक पीसकर नाभि, योनि और पेडूमें. लेप करने से शीघ्र प्रसव होता है । अथवा श्वेतपुष्पकी कलिहारीकी जडको पानी में पीसकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६८५) हारीकी जडको पानीमें खूब बारीक पीसकर नाभि, योनि और पेडूमें. लेप करने से शीघ्र प्रसव होता है । अथवा श्वेतपुष्पकी कलिहारीकी जडको पानी में पीसकर गर्मिणी स्त्रीके उक्त स्थानोंमें प्रलेप करनेसे उसके तरक्षण इस प्रकार प्रसव होजाता है, जैसे कॉटसे कॉटा शीघ्र निकलजाता है । एवं मुलैठी और बिजौरा नींबूको जडको पानीमें पीस- कर पिलानेसे अवश्य प्रसव होता है । कलिहारीकी जड, शहद और सैंधानमक तीनोंको जलमें पीसकर योनिपर लेप करनेसे स्त्रीके सहजमें प्रसव होता है । विजौरा नींबूकी जड अथवा केलेकी जडको कमरमें वाधने से अथवा सरसों, पीपल, कुठ, वाराहीकन्द और अजमोद सबको पानी में पीसकर कल्क करलेवें और उसको पानी में घोलकर वखमें छानलेवे। उस जलमें गरम घी और सेंधानमक मिलाकर उसकी योनिमें पिचकारी लगानेसे बहुत शीघ्र प्रसव होता है । और तुरन्त खारेयारी निकलजाती है । अथवा सरसों, पीपल, कूठ, बाराहीकन्द और अजमोद इन औषधिया के कल्कके साथ सरसोंके तेलको पकाकर वस्त्रमें छानलेवें। इस तेलकी योनिमें और गुदामें पिचकारी लगानेसे एवं पान करनेसे स्त्रकि प्रसव होकर तत्काल खरियारी निकल जाती है ॥ १०५-११० ॥ सूतिका रोगनाशक पर्पटीरस । मंजरीमित वज्रहेमरजतैव्योमार्ककांत मृत- र्भागैस्तत्तरवर्धितैः समर सैग धोर्द्वमा गोन्मितैः । जातः पर्पटिकारसो घृतकणायुक्तो हरेत्सर्वशः सुतीनां हिमहागदान्गदचयं नानानुपानान्वितः १११ हरिकी भस्म ५० मासे, सुवर्ण भस्म २० मासे, चांदीकी भस्म ३० मासे, अभ्रक भस्म ४० मासे, ताम्र भस्म ५० मासे,<noinclude></noinclude> 7jwkd2byc9rm3rfozqr1xeqvfrirk3l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३० 104 165725 418316 2026-09-05T10:21:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७०८) रसरत्नसमुच्चयः । काचार्म पिल्लाभिष्यंद्वण शुक्रप्रणाशिनी । तत्किटं ददुकिटिभं लेपात्पामादिकं जयेत् ॥ ३४ ॥ ताम्र भस्म १० निष्क निष्क लेकर अदरख, बडहल और भाँ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७०८) रसरत्नसमुच्चयः । काचार्म पिल्लाभिष्यंद्वण शुक्रप्रणाशिनी । तत्किटं ददुकिटिभं लेपात्पामादिकं जयेत् ॥ ३४ ॥ ताम्र भस्म १० निष्क निष्क लेकर अदरख, बडहल और भाँगरा इनमेंसे किसी एक औषधिके रस में गन्धकको खूब बारीक खरल करले । फिर गन्धकके बराबर ताँबेके सूक्ष्म पत्र लेकर उनके ऊपर गन्धकके कल्कका लेप करके पूर्ववत् गजपुटमें पकावे । इस प्रकार गन्धकके सात पुट देनेसे तैयार होजाती है । इस प्रकार तैयार की हुई ताम्र भस्म (४० मासे), अभ्रकभस्म १० निष्क, और तृतिया १० तीनोंको एकत्र खरल करलेवे । फिर कढाईमें डालकर पिघलावे और ऊपर से १ तोला गन्धक डालकर उसको किसी वर्त्तनसे ढँक देवे और उसके नीचे मन्द मन्द अग्नि जलावे । जब कढाईमें धुआँ भरजाय तब वर्त्तनको उघाडकर धुआँ निकाल देवे और एक २ तोला गन्धक डालकर फिर ढकदेवे । इस प्रकार तबतक बारम्बार करे जबतक उसमें ३० तोले गन्धक जारण न होजाय । फिर कढाईको नीचे उता- रकर शीतल होनेपर उस रसको ताँबेके वर्त्तनमें भरदे और एक प्रस्थ ( ६४ तोले ) जल डालकर खूब अच्छे प्रकारसे मसलकर कुछ देर बाद उस जलको नितारलेवे । फिर उस बर्त्तन के नीचे जो औषध जमग ईहो उसको लेकर सुखालेवे । इसके पश्चात् उसमें तृतियेका पानी १ तोला और शिलाजीत १ तोला डालकर खूब अच्छे प्रकारसे खरल करके धूपमें रखदेवे । जब वह पिघलकर रसके समान पतली होजाय वच उस दुतिको शीशीमें भरकर रखदेवे । इस ताम्रद्भुतिको धी, स्त्रीके दूध अथवा शहद मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे मोतियाविन्द, अर्म, पिल्ल अभि- ष्यन्द व्रण, और नेत्रगत शुक्ररोग आदि नेत्रोंकी व्याधियाँ नष्ट होती हैं । इस दुतिको बनाते समय उसमे जो मैल निकले उसको<noinclude></noinclude> qzzt4qrkxzxfc28nvro3ytogjozrmvd पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५२ 104 165726 418317 2026-09-05T10:22:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३० ) रसरत्नसमुच्चयः । आँजे तो कामलारोग अवश्य नष्ट होता है और नासिकाकेभी समस्त रोग आरोग्य हो जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ मुखरोग । •एको गण्डभवो गदः षडुदिता जिह्वोद्भवास्ता... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418317 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७३० ) रसरत्नसमुच्चयः । आँजे तो कामलारोग अवश्य नष्ट होता है और नासिकाकेभी समस्त रोग आरोग्य हो जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ मुखरोग । •एको गण्डभवो गदः षडुदिता जिह्वोद्भवास्तालुजा- श्वाष्टावष्ट च मस्तजाश्च दशनोद्भूता दशौष्ठोद्भवाः । संत्येकादश च त्रयोदश गदा दंतस्य मुलोद्भवाः कण्ठेऽष्टादश चोदितावदनजा पंचाधिका सप्ततिः२४ गालोंमें होनेवाला एक १ रोग, जिह्वा के ६ रोग, तालुके ८, मस्तक के ८, दांतोंके १०, ओठोंके ११, दांतों की जडों अर्थात् मसूडोंके १३ और कण्ठके १८, इसप्रकार सब मिलाकर ७५ मुखरोग कहे गए हैं ॥ २४ ॥ मुखरोगारि रस । ताप्या तुत्थकुन टी राजा वर्तशिलाजतु । गुग्गुलुईरवीर्ये च मुखरोगनिबर्हणम् ॥ २५ ॥ सोनामाखीकी भस्म, अभ्रकभस्म, नीलेथोथेकी भस्म, मैनसिलकी भस्म, राजावतकी भस्म, शुद्ध शिलाजीत, गूगल और पारा इन औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र बारीक खरल कर लेवे । यह इस उपर्युक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे मुखके समस्त रोगोंको नष्ट करता है ॥ २५ ॥ रसवटी । रूप्यादिचूर्णमादाय पिष्टीं साधय यत्नतः । निंबुमध्ये विनिक्षिप्य दिनानां पंच धारय ॥२६॥ तालचूर्ण समादाय भानुदुग्धेन भावयेत् । तन्मध्ये गुलीकां क्षित्वा पचस्व तिलतैलके ॥२७॥<noinclude></noinclude> pk82pv94taxr8qand3kxv8a9m9lcjn8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७४ 104 165727 418318 2026-09-05T10:22:46Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५२ ) रसरत्नसमुच्चयः । वात, पित्तादि किसी दोष के अथवा मांस विकृत होनेसे जब शरीर के किसी भागमें मेद (चव ) धातु दूषित होजाती है तब पहले वहां छोटीसी गाँठ निकलती है । वह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418318 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७५२ ) रसरत्नसमुच्चयः । वात, पित्तादि किसी दोष के अथवा मांस विकृत होनेसे जब शरीर के किसी भागमें मेद (चव ) धातु दूषित होजाती है तब पहले वहां छोटीसी गाँठ निकलती है । वह प्रतिदिन बढती २ कुछ दिनही बहुत लम्बी होजाती है । और बहुत दिनोंमें पककर रिसने लगती है । जब वह बिल्कुल साफ होजाती है तब आप शान्त होजाती है । उसको अर्बुद कहते हैं । जो अर्बुद रक्तके दूषित होनेसे उत्पन्न होता है, उसमें से बहुत दिन तक रक्त लवता रहता है। उसको शोणिताईद कहते हैं ॥ ११८ ॥ अर्बुदहर रस । तंडुलीयकवर्षा नागकन्यानलारसे । गोमुत्रे व रसः पिष्टःपुटपकोऽर्बुदादिजित् ॥ ११९ ॥ पारेकी भस्मको चौलाई, विषखपरा, नागरबेल, घीग्वार और खिरैटीके रस में क्रमसे एक २ भावना देकर सुखाले, फिर गोमूत्र में खरल करके गोला बनाकर उसके ऊपर पानोंको लपेट देवे । फिर उसपर दो दो अँगुल ऊँची कपरौटी करके सुखाले और दो उप- लोकी अग्नि में रखकर पकावे । इस रसके सेवन से अर्बुद, रसौली आदि व्याधियाँ नष्ट होती हैं ॥ ११९ ॥ सामान्य उपाय | लिप्तं यवक्षार विडंगबीजं गन्धोपलस्याप्यशनैः कृतैश्व । रक्तेन मिश्रश्व शिरीषनी जैस्तदुर्बुद शाम्यति नान्यथैव ॥ १२० ॥ जवाखार और वायविडङ्गके बीजों को पानीमें पीसकर अर्बुदके ऊपर लेप करे और शुद्ध गन्धकको उपयुक्त मात्रासे भक्षण करे अथवा सिरस के बीजों को किसी जंगली जानवरके रक्तमें पीसकर लेप करे तो सब प्रकारका अर्बुद शमन होजाता है ॥ १२० ॥<noinclude></noinclude> q0fw5bsbwdneoorce6cob1a9f3bgd74 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९६ 104 165728 418319 2026-09-05T10:23:10Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७७४ ) रसरत्नसमुच्चयः । चतुर्मासोद्भवो गर्भः स्रवत्येव हि तत्क्षणाव ॥ ९२ ॥ निर्गुडीद्रवसंपिष्टं चित्रमूलं मधुप्लुतम् । कर्षे भुक्त्वा पतत्याशु गर्भो रंडाकुल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418319 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७७४ ) रसरत्नसमुच्चयः । चतुर्मासोद्भवो गर्भः स्रवत्येव हि तत्क्षणाव ॥ ९२ ॥ निर्गुडीद्रवसंपिष्टं चित्रमूलं मधुप्लुतम् । कर्षे भुक्त्वा पतत्याशु गर्भो रंडाकुलोद्भवः ॥ ९३॥ मूलं तु शरपुंखायास्तंडुलांनुप्रपेषितम् । पाययेत्कर्षमात्रं तदतिरक्तप्रशांतये ॥९४ ॥ स्त्रीणां रक्ते पूयके वा प्रवृत्ते सैसं चूर्ण पेटकारी- भवं वा । दद्यात्प्रातर्मलखण्डेन सार्धं दत्त्वा सुतं स्वर्कमूर्ति घृतेन ॥ ९५ ॥ योनौ शूले निबवातारि पिष्टीं कुर्याद्यद्वा नागकर्णोत्थमूलैः । तैलं काथं व्योषयष्टि- प्रयुक्तं दद्यात्स्त्रीणां रक्तदोषापनुत्यै ॥ ९६ ॥ (७१) अण्डके पत्तोंका ८ अँगुल लम्बा डंठल लेकर उसको योनिमें रखने से ४ महीनेका गर्भ तत्काल गिरजाता है | (७२) चीतेकी जडको निर्गुण्डी रसमें पीसकर उसमें एक तोला शहद डालकर पान करानेसे विधवा स्त्रीके रहा हुआ गर्भ शीघ्र पविव हो जाता है । (७३) सरफोंकाकी जडको चावलों के पानीमें पीसकर एक २ तोला परिमाण सेवन करानेसे स्त्रियोंके अधिक रक्तका स्राव होना बन्द होता है । (७४) स्त्रियोंके रक्तप्रदर या श्वेतप्रदर होनेपर सीसेकी भस्म और पेटकारी- वृक्ष ( अभाव में अरणी ) के चूर्णको उपयुक्त मात्रासे प्रतिदिन प्रातः- काल पानके साथ सेवन करावे, अथवा अर्कमूर्त्ति नामक रसको घृतके साथ सेवन कराकर तथा नीमकी निबौली और अण्डीकी गिरीको पिट्ठीके समान पीसकर योनिमें रखनेसे रक्तस्राव और योनिका शूल नष्ट होता है । अथवा लाल अण्डकी जढके कल्क और क्वाथके साथ<noinclude></noinclude> pakakzln2xbjndtln0wi24x82tnydnm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१९ 104 165729 418320 2026-09-05T10:23:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७९७) (३०) वाराही कन्द, सुमली, धतूरेकी जड, खसखस और कौंच के चीज इन सबको समान भाग लेकर पृथक पृथकू चूर्ण करके प्रत्येक चूर्णको बिनौलोंके दूधमें क्रम क्रम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७९७) (३०) वाराही कन्द, सुमली, धतूरेकी जड, खसखस और कौंच के चीज इन सबको समान भाग लेकर पृथक पृथकू चूर्ण करके प्रत्येक चूर्णको बिनौलोंके दूधमें क्रम क्रमते भिजो देवे। फिर सबको एकत्र मिलाकर बिनोलों के रसमें सात भावना देवे और प्रत्येक भावनाके अन्तमें सूर्यकी तीक्ष्णधूपमें सुखालिया करे। इसके पश्चात् उस चूर्ण को नारियल ( गोलाके) भीतर भरकर उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे वन्द करके उसको कल्कसे ३२ गुने गोदुग्धके साथ कढाईमें डालकर पकावे और करछी से चलाता जाय जिससे कि वह गोला खूब जलकर फट न जाय । जब सब दूध जलजाय तब उस गोलेको निकालकर शीतल करके जलसे धोकर पीसलेवे । फिर धीमें भूनकर उसमें जाप- फल; लौंग और इलायचीका चूर्ण मिलाकर के शीशी में भरकर रख- देवे । इस प्रकार सिद्ध की हुई इस औषधको प्रतिदिन चार २ मासे परिमाण लेकर सेवन करे और ऊपरसे दुग्धपान करे। यह रस सात- दिन तक सेवन करनेसे संपूर्ण वात रोग, प्रमेह, बल क्षय, और सच प्रकारके भयंकर रोगोंको शीघ्र शमन करता है । इसके सेवन करने से वृद्ध मनुष्यमी तरुण होजाता है और वह मनुष्य सदा प्रसन्न रहता है। यह सौश्रुत नारिकेल रसायन परम्परागत गुरुओंके द्वारा वर्णन की गई है ।। ५३–६९ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये पविंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ सप्तविंशोऽध्यायः । वाजीकरणम् । वाजीकरण के गुण | वाजीकरणमन्विच्छेत् सततं विषयी पुमान् । पुष्टिस्तुष्टिरपत्यं च गुणवत्तत्र संस्थितम् ॥१॥ वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतोऽङ्गनाः ।<noinclude></noinclude> l5105j4emt04qfvaeafwoglp25nmp23 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४३ 104 165730 418321 2026-09-05T10:25:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८२१) भूकूष्माण्डैर्वासरैकं विघृष्य गोलं कृत्वा भूधरे तं पुटेत् । चूर्ण कृत्वा नागवल्लीरसेन दद्यादेव मर्दयित्वा दिनैकम् ॥ ९७ ॥ मध्वाज्याभ्यां... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८२१) भूकूष्माण्डैर्वासरैकं विघृष्य गोलं कृत्वा भूधरे तं पुटेत् । चूर्ण कृत्वा नागवल्लीरसेन दद्यादेव मर्दयित्वा दिनैकम् ॥ ९७ ॥ मध्वाज्याभ्यां पूर्णचंद्र रसेंद्रं पुष्टिं वीर्य दीपनंचैव कुर्यात् | योज्यश्वायं पित्तरोगे ग्रहण्या-मर्शो- रोगे पित्तजे बोलयुक्तः ॥ ९८ ॥ स्त्रीणां तापे शाल्मलीनीरयुक्तो देयो मात्रा देशकालं विचिन्त्य ॥ ९९ ॥ पारा और गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली करलेवे। फिर उसको असगन्ध, गिलोय और मुलैठी इन तीनोंका एकत्र काथ बनाकर उसके साथ एक दिनत्तक खरल करके सुखालेवे। फिर छोटे की भस्म मोतीकी भस्म, और मण्डूर भस्म इन सबको पारेके बराबर लेकर उनके साथ उक्त कज्जलीको मिलाकर विदारी कन्दके रस में एक दिनतक खरल करके गोला बनाकर उसको भूधर पुटमें पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय तब उसको निकालकर बारीक चूर्ण करके नागर• के रस में एक दिन मर्दन कर सुखालेवे और शीशी में भरकर रखा देवे। इस पूर्णचन्द्र रसको एक या दो रत्ती परिमाण शहद और घृतक साथ मिलाकर सेवन करे तो यह रस शरीर की पुष्टि, वीर्य की वृद्धि औ- अग्निको अत्यन्त दीपन करता है । इसको पित्तरोग, संग्रहणी और पित्तजनित अर्शरोग में बोलके साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिये। तथा शियोंके प्रदर अथवा दाह होनेपर सेमलके रसके साथ देश, कालकार विचार करके यथोचित मात्रासे देना चाहिये ॥९६-९९ ॥ महाकल्क ( दिव्यामृत रस ) धान्याभ्रकं विनिक्षिप्य मुशलीरसमर्दितम् । स्थाल्यां क्षित्वा निरुध्याऽथपिधान्यामध्यरन्ध्रया १००<noinclude></noinclude> hycxtn73f10bi37ckuphc3wqnmp8vm1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६६ 104 165731 418322 2026-09-05T10:25:38Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४४ ) रसरत्नसमुच्चयः ॥ २१ तोले । तथा कफ प्रकृतिवाले रोगीके लिये यह रसायन बनाया • जाय तो कान्तलोह भस्म २० तोले, ताम्र भस्म २० तोले और अभ्र- कभस्म २० तोले लेवे । इस प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८४४ ) रसरत्नसमुच्चयः ॥ २१ तोले । तथा कफ प्रकृतिवाले रोगीके लिये यह रसायन बनाया • जाय तो कान्तलोह भस्म २० तोले, ताम्र भस्म २० तोले और अभ्र- कभस्म २० तोले लेवे । इस प्रकार लेकर इन भस्मोंको कढाई में डाल- कर उसमें एक आढक परिमाण विफलेके काय और कान्तलोह भस्म ताम्र भस्म तथा अभ्रक भस्म इन तीनोंका जिसना वजन हो उससे अठगुने दूधमें मिलाकर लोहे की कढाई में पकाये । जब पककर पानी का सब भाग जलजाय तब उसको खूब घोटकर फिर उसमें ६४ तोले वी डालकर पहावे । बात प्रकृतिवाले रोगी के लिये वह औषध तैयार करनी हो तो कीचडके समान पाक करना चाहिये । यदि पित्त प्रकृ- तिवाले रोगीको यह औषध सेवन करानी हो तो रचडीके समान चनावे और कफ प्रकृतिवाले रोगीको सेवन करानेके लिये यह औषध गंगाजी बालु (रेत) के समान पकानी चाहिये । जब झागरहित उत्तम वर्ण और सुगम्यसे युक्त घृत के पान करनेपर स्वाद में चरपरापन और उष्णता मालूम हो तब उस पाकको अग्निसे नीचे उतारलेवे। फिर पूर्वोक्त तीनों मोंके परिमाण के बराबर आगे कहा हुआ दन्त्यादि चूर्ण लेकर उसमें उपर्युक्त विधिसे तैयार किया हुआ घृत थोडा २डाळता जावे और दोनों हाथोंसे मर्दन करता जावे । जब वह सब मिलकर एकम एक होजाय तब गोलासा बनाकर घीके द्वारा चिकने किये हुए बर्त्तनमें भरकर रखदेवे । कफ के रोगों को शमन करने के लिये इस लोह• रसायनमें जो विधि विधान की गई है, उसीके अनुसार यदि इसको विशेष रूपसे सिद्ध किया जाय तो यह रसायन सच प्रकार के रो- गोंको नाश करती है और रसायन के समान उत्तम गुण करती है। स्वस्थ मनुष्य शहद अथवा ग्रीष्मऋतु में वमन, विरेचनादिके द्वारा शारीरिक शुद्धि करके इस रसायनको सेवन करना प्रारम्भ करे । पहले दिन एक तोला घी और १॥ तोले मधुके साथ दो रत्ती इस रसायनको<noinclude></noinclude> gtcgervzr555qtep6nvsmjebe281mai पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८८ 104 165732 418323 2026-09-05T10:26:05Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । दंती विष हस्तिविष पिप्पल्यौ मरिचानि च । तैस्तैलं कटुतैलं वा चित्रस्याभ्यञ्जनं पचेत् ॥ सवर्णकरणं श्रेष्ठमास्तिकस्य वचो यथा ॥ ३३ ॥ लाख, दे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । दंती विष हस्तिविष पिप्पल्यौ मरिचानि च । तैस्तैलं कटुतैलं वा चित्रस्याभ्यञ्जनं पचेत् ॥ सवर्णकरणं श्रेष्ठमास्तिकस्य वचो यथा ॥ ३३ ॥ लाख, देवदार, मंजीठ, कूठ, पद्माख, सारिवा, चोंटली, लाल कटसरैया, हुलहुलका शाक, कलिहारी, शकरकन्द, नाराहीकन्द, कोयल, सतौना, जवासा, आककी जड, कनेरेकी जड, नागकेसर . तगर, हल्दी, दारूहल्दी, दन्तोकी जड. वत्सना विष, हस्तिविष, पीपल, गजपीपल और मिरच इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण कर लेवे। फिर गोमूत्रमें कल्क बनाकर उस कल्क और उससे चौगुने गोमूत्र के साथ तिलका तेल अथवा सरसोंका तेल मिलाकर पकावे | यह तेल श्वेतकुष्ठके ऊपर मालिस करने से कुछ को दूर करके त्वचा के वर्णको समान वर्ण करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है, ऐसा श्री आस्तिक मुनिका वचन है ॥ ३१-३३ ॥ सूर्य प्रभावर्त्ती । रक्तचंदनमंजिष्ठा तिंतिणीफल सन्हुकैः । अभया लोध कतक निशाशंख कणोषणैः ॥ ३४ ॥ मनःशिला करंजाक्षबी जोप्राफेन सैं ववैः । अजाक्षीरैः सम विषैर्वर्तयो विहिता हिताः ॥ शुक्कामांसपिलेषु ग्रंथिगंडार्बुदेषु च ॥ ३५ ॥ लाल चन्दन, मँजीठ, इमली पकी हुई, सक्छुक नामक शुद्ध विष, हरड लोध, निर्मली, हल्दी, शंख, पीपल, मिरच, मैनसिल, करंजुयेकी जड, बहेडेकी गिरी, वच, समुद्रफेन, सेंधानमक और शुद्ध वत्सनाभ विष इन सबको समान भाग लेकर वारीक चूर्ण करके कपड़छान करलेवे। फिर उस चूर्ण को बकरी के दूधमें खरल करके बत्तियाँ बनाकर छाया में सुखा लेवे | यह बती पानीमें घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे सफेद फूला,<noinclude></noinclude> 5yt2wbvth7su37ehjttyoxmlx51fltk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९११ 104 165733 418324 2026-09-05T10:26:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । (८८९) होगया है शुक्र जिसका ऐसा मनुष्य दाख, कौंच के बीज, महाविष, खजूर और मुलैठी इन सबके समान भाग चूर्ण को शहद और घृत मिलाकर सेवन करे और ऊपर से दुग्धपान... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटी कोपेतः । (८८९) होगया है शुक्र जिसका ऐसा मनुष्य दाख, कौंच के बीज, महाविष, खजूर और मुलैठी इन सबके समान भाग चूर्ण को शहद और घृत मिलाकर सेवन करे और ऊपर से दुग्धपान करे तो वीर्यकी वृद्धि और पुष्टि होती है । (७६) शदह और घृतमें विषको मिलाकर सेवन करने और दूधका अनुपान करनेसे चूहा, बिच्छू यादि सब जन्तुओं- के विष नष्ट होते हैं । (७७) सिम्हाद, वगर और विष इनको समभाग लेकर मधु और घृतके साथ सेवन करके ऊपरसे दुग्धपान करे तो यह प्रयोग बृतमाय मनुष्यको संजीवनके समान गुण फरसा है । (७८) सिरसके फूल, पसे और वत्सनाभ विथ इनको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे चुहका विष दूर होता है । (७९) देवदाक, नगर, बालछड, फटकरी, बावची, वत्सनाभ और कूठ इन समस्त औषधियोंको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके भक्षण करने और प्रलेप करनेसे सब प्रकार के विव नाश होते हैं । (८०) मैनसिल, सुरमा, हरताळ, इलायची, सिम्हालु, देवदारु, सिन्दूर, केशर और वत्सगाम विष इन समान भाग मिश्रित औषधियोंको बारीक चूर्ण करके कपलछान करलेने | इस चूर्णका नस्य देनेसे संज्ञाहीन मनुष्य चैतन्यलाभ करता है । तथा विषके सेवन करनेसे शरीरमें दाहके उत्पन्न होनेपर इस चूर्णको सत्तू, दूध और घृत के साथ मिलाकर सारे शरीरमें प्रलेप करनेसे दाह शान्त होती है ।। ९३-१३८॥ विषमें पथ्यापथ्य आदि विचारोंका वर्णन । अमृतंसहसा युक्तं शीलितं विषमेव च । सात्म्यासात्म्यं विकाराय मृत्यवे च वरानने ॥ १३९ ॥ वेगान्यष्ट प्रजायंते सहसा विषशीलिनः ॥ १४० ॥ प्रथमे त्वग्विकारः स्याद्वितीये वेपथुर्भवेत् । दाहो वेगे तृतीये स्याच्चतुर्थे विकृतो भवेत् ॥ १४१ ॥<noinclude></noinclude> 3qknetqwg5d8gwc4ggpzm8g730oi8ej पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३५ 104 165734 418325 2026-09-05T10:27:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीको पेसः । ( ९१३) पत्रं पाडुवटस्य चन्दनयुगं कालेयकं पारएं धत्तूरं कनकत्वचं कमलजं बीजं तथा केसरम् ॥७२॥ सिक्थं तुत्थं लोह फिट्टे वसाज्यमाजं क्षीरं क्षीर- वृar... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीको पेसः । ( ९१३) पत्रं पाडुवटस्य चन्दनयुगं कालेयकं पारएं धत्तूरं कनकत्वचं कमलजं बीजं तथा केसरम् ॥७२॥ सिक्थं तुत्थं लोह फिट्टे वसाज्यमाजं क्षीरं क्षीर- वृarम्बु चानौ । सिद्धं सिध्मव्यंगनीत्यादिनाशे वक्रच्छायामैन्दवीमाशु धत्ते ॥ ७३ ॥ कार्पासलवानन्तारस तैलयुतो हितः । अस्थिस्रावे मृतरसो विषे स्थावरजंगमे ॥ ७४ ॥ तन्दुलीयकमूलेन वीराभूलेन वा युतः । तन्दुको दकसंमिश्रः पाननावनलेपने ॥ ७५ ॥ सुरभिशकद्रसभावित कर्पूरसमन्वितो नृतः सूतः । स्थावरजंगम कृत्रिम विषजिजामितो दध्ना ॥ ७६ ॥ यक्षाक्षफेनिलरसोन कटुत्रयोप्राराजीवराङ्घ्रिबकुलं कुचापिष्टम् | छायाविशोषितमिदं नरवारि- घृष्ट सर्पापहं सरसमञ्जनतत्रिवारान् ॥ ७७ ॥ पिशाचपञ्चवर्णस्य बीजं मूलं पुनर्नवात् । देवदाल्याः फलं मूलं मूलं च विषपर्णतः ॥ ७८ ॥ पेषितं नरमूत्रेण सर्वधाऽहिविषापहम् । कपित्थपञ्चकं नीरं रस चाखुविषापहम् ॥ ७९ ॥ कांस्ये तांबुल्या नागरं पिष्टमद्भिः पत्रं शैरीषं पिप्पलीछाग दुग्धैः । पत्रं कार्पासात्सर्पिषा वाऽपि लेपात्सूतेनोपेतं वृश्विकानां विषन्नम् ॥ ८० ॥ भावितश्चणकाम्लेन वस्त्रमम्लेन मर्दयेत ।<noinclude></noinclude> ne6kocfx6q9cw4roujx61whwgc4nnew पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०८ 104 165735 418326 2026-09-05T10:27:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६८६ ) रसरत्नसमुच्चयः । कान्त लोह भस्म ६० मासे, पारा १७ तोले ६ मासे और गन्धक पारेसे दुगुनी लेवे । प्रथम पारे और गन्धक की कज्जली करके उसमें सम्पूर्ण भस्मोंको मिलाकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६८६ ) रसरत्नसमुच्चयः । कान्त लोह भस्म ६० मासे, पारा १७ तोले ६ मासे और गन्धक पारेसे दुगुनी लेवे । प्रथम पारे और गन्धक की कज्जली करके उसमें सम्पूर्ण भस्मोंको मिलाकर एक दिनतक खरल करे. फिर उस कज्जलीको लोहे की कढाई में पिघलाकर पूर्वोक्त विधिके अनुसार ढालकर पर्पटी तैयार करलेवे । शीतल होनेपर उसको बारीक पीसकर रखलेवे। इस पर्पटी रसको प्रतिदिन उपयुक्त मात्रासे वी और पीपलके चूर्ण में मिलाकर सेवन करने से प्रसूतास्त्रियोंके सब प्रकारके भयंकर रोग दूर होते हैं । यह रस भिन्न भिन्न प्रकारके अनुपानों क साथ प्रयोग करने से महारोग आदि समस्त रोगसमूहों को नाश करता है ॥ १११ ॥ सूतिका रोगनाशन रस । स्वर्णतारघनभानुतीक्ष्णकं तेषु चैकम- तिमात्रमारितम् । सूतिका सकलरोग- नाशनं रोगहारि विहितानुपानतः ॥ ११२ ॥ स्वर्ण भस्म, चाँदीकी भस्म, अभ्रक भस्म, ताम्र भस्म और तीक्ष्ण लोहे की भस्म इन सबको समान भाग लेकर एकत्र करके एक दिन तक खरल करे । ये भस्में उत्तम प्रकार से पुट देकर तैयार की हुई होनी चाहिये । इस रसको प्रतिदिन योग्य अनुपान के साथ सेवन करने से प्रसूता स्त्रियों के समस्त रोग नाश होते हैं। विशेष अनुपान के साथ सेवन करने से अन्यान्य रोगभी दूर होते हैं ॥ ११२ ॥ सोभाग्यशुण्ठी ( सूतिकामृत ) । अञ्जलिद्वितये तोये कंसमात्रपयोविते । तुलार्धशर्करां दत्त्वा गुडपाके कृते क्षिपेत् ॥ ११३॥ एरिङ्गणिका वेव्योषजीरकदीप्यकान् ।<noinclude></noinclude> 5pkqbargvd0bbou4h6afv6btvy9y9kb पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३१ 104 165736 418327 2026-09-05T10:28:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ 'भाषाटीकोपेतः । (७०९) शरीर पर लगानेसे दाद, श्वतकुष्ठ, खुजली आदि रोग दूर होते हैं ॥ ३०-३४ ॥ पुनः साम्रद्रुति (अंजन ) । शुल्ब गंधकमभ्रकं च रसकं दिक्संख्यनिष्कं पृथक् स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418327 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>'भाषाटीकोपेतः । (७०९) शरीर पर लगानेसे दाद, श्वतकुष्ठ, खुजली आदि रोग दूर होते हैं ॥ ३०-३४ ॥ पुनः साम्रद्रुति (अंजन ) । शुल्ब गंधकमभ्रकं च रसकं दिक्संख्यनिष्कं पृथक् सर्वे रुद्रजटारसेन बहुशो भृंगस्यसारेण वा । प्रायः श्लक्ष्णतरं सुमर्दितमिदं सम्यक् पुटंकारये- स्थायां तत्पुनरेवशीतलमिदं विन्यस्य तस्यांतरे३५ निष्कं निष्कमनंतरं परिपवेज्जीणे यथा गंधक स्यादेवं शतनिष्कमात्रमसकृत्तद्रस्म शीतं ततः । प्रस्थेनोन्मितवारिणा विलुलितं कल्कं विना गालितं संगृह्य तदंतरेशिखिनि तुत्थं सुचूर्णीकृतम् ॥ ३६॥ कर्षाशांशितमंजनं विनिहितं कांस्ये शोषये- तां ताम्रद्भुतिमामनंति निखिलान्नेत्रामयान्नाशयेत् ३७ ताम्र भस्म, गन्धक, अभ्रक भस्म और खपरियाकी भस्म प्रत्येकको दश २ निष्क लेकर एकत्र खरल करले फिर रुद्रजटा के रसमें अथवा भाँगरेके रसमें ३० भावना देकर मैदाके समान बारीक खरल करके गोला बनालेवे और उसको सुखाकर गजपुटमें पकावे । स्वांगशीतल होनेपर गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण करके ताँबेकी कढाई में डालकर चूल्हेपर चढावे और उसके नीचे मन्द मन्द अग्नि जलावे । फिर कढाई में चार मासे गन्धक डालकर लोहेकी करछीसे चलावे । जब कढाईमेंसे गन्धकका धुआँ निकलना बन्द हो जाय तब उसमें ४ मासे गन्धक और डालकर करछी से चलादेवे । इस प्रकार बारंबार बार २ मासे गन्धक डालकर चलाने हुए उसमें १०१ निष्क परिमाण<noinclude></noinclude> 747h5hgpidga2hmqym3meeekqwz8typ पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५३ 104 165737 418328 2026-09-05T10:28:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७३१) दोलायंत्रे निबध्यैनां यत्नेन दिवसत्रयम् । मलापकर्षणं कृत्वा मधुभाण्डे निधापयेत् ॥ मुखे धारय दंतानां दाढर्याय गुटिकामिमाम्॥२८॥ चांदी आद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७३१) दोलायंत्रे निबध्यैनां यत्नेन दिवसत्रयम् । मलापकर्षणं कृत्वा मधुभाण्डे निधापयेत् ॥ मुखे धारय दंतानां दाढर्याय गुटिकामिमाम्॥२८॥ चांदी आदि किसी धातुका चूर्ण लेकर उसमें समान भाग पारा मिलाकर खूब बारीक पिठ्ठी पीसे। फिर उस पिट्ठीको पके हुए नींबू के भीतर भरकर और अच्छे प्रकारसे बन्द कर के पांच दिन तक रक्खा रहनेदेवे। छठे दिन नींबू से पिडीको निकालकर खूब बारीक खरल करके गोलियां चनालेवे । इसके पश्चात् हरताल के चूर्णको आकके दूधमें घोटकर कल्क करे, उसमें उक्त गोलियोंको अच्छे प्रकारसे लपेटकर तिलके तेलमें पकावे । जब गोलियां पकते २ लाल हो जाय तब उनको निकालकर दोलायन्त्र में यत्नपूर्वक अधर लटकाकर काँजी आदि पदार्थोंके द्वारा तीन दिन तक स्वेद देवे। इस प्रकार दोषों को दूर करके उन गोलियोंको शहदसे भरे हुए बर्तन में डालकर रखदेवे । आवश्यकता होनेपर उस मेंसे एक गोली निकालकर मुँहमें दाढके नीचे दावकर रक्खे । ये गोलियां दांतोंको दृढ बनानेके लिये परम उपयोगी हैं ॥ २६-२८ ॥ महासरस्वती चूर्ण । अश्वगंधाऽजमोदा च वचा कुष्ठं कटुत्रयम् । शतपुष्पं ब्रह्मबीजं सैंधवं च समं समम् ॥ २९॥ एतदर्थं वचार्धं च चूर्णित मधुसर्पिषा । भक्षयेत्कर्षमात्रं तु जीर्णोते क्षीरभोजनः ॥३०॥ सहस्रग्रंथधारी स्यान्मूको वा वाक्पतिर्भरेत् । महासरस्वतीचूर्ण बुद्धिजाड्ये परं हितम् ॥ ३१ ॥<noinclude></noinclude> p21n264uhur9pjccj0su2k1frme7ffm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७५ 104 165738 418329 2026-09-05T10:29:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । गण्डमाला और अपची रोग ! ( ७५३ ) मेदोत्था गलकक्षवंक्षणतले मन्यासु वा कुर्वते वार्ता की फलकोपमान्सकठिनान्गण्डान्सकडून्मला। पच्यं तेऽल्परुजः स्रवं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418329 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषादीकोपेतः । गण्डमाला और अपची रोग ! ( ७५३ ) मेदोत्था गलकक्षवंक्षणतले मन्यासु वा कुर्वते वार्ता की फलकोपमान्सकठिनान्गण्डान्सकडून्मला। पच्यं तेऽल्परुजः स्रवंति नितरां रुांति नश्यंत्यलं दूर्वेव क्षयवृद्धिभाजिनि नृणां सा गंडमालापची ॥१२१॥ मेदके विकृत होनेसे दूषित हुए दोनोंके कारण गला, बगल वंक्षण (हृदय) के नीचे और मन्यानाडीमें कटेरकि फलके समान कठिन गाँठ उत्पन्न होजाती है। उसमें कभी कभी खुजली होती है और जब दोष परिपक्व होजाते हैं तब वह फूटकर निरन्तर लवती है । उसमें थोडी २ पीडा होती है । फिर उसमें मांसके अंकुर उत्पन्न होजाते हैं। और वह सुखजाती है फिर हरी होजाती है । जो ग्रन्थि मनुष्य के शरीरमें दूबके समान क्षय और वृद्धिको प्राप्त होती रहती है, उसको गण्डमाला कहते हैं और जो गाँउ शरीर के किसी भागमें उत्पन्न होकर बढती रहती है और पकती नहीं है, उसको अपची कहते हैं ॥ १२१ ॥ गण्डमाला और अपचकि सामान्य उपाय | सुरवारुण्या मूलं गोमूत्रयुतं महेन्द्रकन्या च । अपकरोति गण्डमालां पित्तं श्लक्ष्णं च परिघृष्टम् १२२ ॥ अर्क क्षीरजपापुष्पतैललाक्षारसैः समैः । गंडमाला शमं याति प्रलिप्ता सप्तभिर्दिनैः ॥ १२३॥ पुष्ये गृहीतं गिरिकर्णिकाया मूलं सिताया गलके निबद्धम् । गव्येन लीढं यदि वा घृतेन निहंति घोरामपचीं तदेव ॥ १२४ ॥<noinclude></noinclude> b2xphnk2b15xqfd0nkoyfj1fv6qj5mm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९७ 104 165739 418330 2026-09-05T10:29:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७७५) तेलको पकाकर उसमें त्रिकुटा और मुलैठीका चूर्ण डालकर पान करावे | यह तैल स्त्रियोंके रक्तस्राव आदि सम्पूर्ण रक्तविकारोंको नष्ट करनेके लिये उप... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७७५) तेलको पकाकर उसमें त्रिकुटा और मुलैठीका चूर्ण डालकर पान करावे | यह तैल स्त्रियोंके रक्तस्राव आदि सम्पूर्ण रक्तविकारोंको नष्ट करनेके लिये उपयोगी है ।। ९२-९६ ॥ पुष्यानुग चूर्ण | पाठा जम्ब्वाम्रयोरस्थि शिलोद्भेदं रसाञ्जनम् । अबष्टां शाल्मली पिट्वा समङ्गां वत्सकत्वचम् ॥ ९७॥ बाह्रीक बिल्वातिविषालोधतोयदगैरिकम् । शुंठी मधुकमा करक्त चंदनकट्फलम् ॥ ९८ ॥ कट्वङ्गवत्सकानं ताघातकी मधुकांजनम् । पुष्ये गृहीत्वा संचूर्ण्य सक्षौद्रं तंडुलांबुना ॥ ९९ ॥ पिबेदशःस्वतीसारे रक्तं यच्चोपवेशयेत् । दोषागंतुकृता ये च बालानां तांश्च नाशयेत् ॥ १०० ॥ योनिदोषं रजोदोषं श्यावं श्वेतारुणं त्विदम् । चूर्ण पुष्यानुगं नाम हितमात्रेयपूजितम् ॥ १०१ ॥ (७५) पाढ,जामुन और आमकी गुठली, शिलाजीत, रसौंत मोइया वृक्षकी जड, सेमलका गोंद, मँजीठ, कुडेकी छाल, केसर, बेलका गूदा, अतीस, लोध, नागरमोथा, गेरू, सोंठ, मुलैठी, मुनक्का, लाल चन्दन कायफल, अरबू, इन्द्रजौ, अनन्तमूल, धायके फूल, महुवा और काला सुरमा इन सब औषधियोंको पुष्यनक्षत्र में समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपड़छान करलेवे। फिर इस चूर्णको अर्शरोग में अथवा रक्ताति- सारमें या रक्तप्रदर में शहद और चावलोंके जलके साथ सेवन करे। यह चूर्ण वात, पित्तादि दोषोंके द्वारा अथवा आगन्तुक कारणोंसे उत्पन्न हुए खियाके सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करता है । एवं योनिसम्बन्धी विकार,<noinclude></noinclude> miao54noqhgpnol4bptbr14pqmlqaa7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२० 104 165740 418331 2026-09-05T10:29:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७९८ ) रसरत्नसमुच्चयः । तद्वाजीकरणं विद्धि देहस्योजस्करं परम् ॥ २॥ शुक्रं तु चिताग्यायामव्याधिभिर्देहकर्षणात् । क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणां चाति निषेवणात... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७९८ ) रसरत्नसमुच्चयः । तद्वाजीकरणं विद्धि देहस्योजस्करं परम् ॥ २॥ शुक्रं तु चिताग्यायामव्याधिभिर्देहकर्षणात् । क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणां चाति निषेवणात् ॥ ३॥ तस्मात्प्रयोगान्वक्ष्यामि दुर्बलानां बलप्रदान् । सुखोपयोगाद्वालानां भूयश्व बलवर्धनान ||४|| -शुद्धकायो यथाशक्ति वृष्ययोगान्प्रयोजयेत् ॥५॥ विषयी मनुष्यको वाजीकरण औषधियोंका निरन्तर सेवन करना चाहिये । शरीर की पुष्टि, मन प्रसन्नता और गुणवान् सन्तानका उत्पन्न होना ये सब गुण वाजीकरणमें रहते हैं । जिसके सेवनसे मनुष्य घोडेकी समान अत्यन्त बलवान् होकर बिना किसी विघ्न बाधा · निरन्तर स्त्रियों के साथ रमण करके उसको वाजीकरण जानना चाहिये। वाजीकरण औषध शरीर की ओजधातुको अत्यन्त वृद्धि करती है । अधिक चिन्ता, अधिक परिश्रम, रोग आदिके कारण शरीर के सुख- नेसे, लंघन करनेसे और स्त्रियोंको अत्यन्त भोगने से वीर्य नाश होता है । इसलिये दुर्बल मनुष्योंको वल प्रदान करनेवाले और सुखपूर्वक बालकोंके बलकी वृद्धि करनेवाले प्रयोगोंको मैं ग्रन्थकार कहता हूँ । वैद्य प्रथम वमन, विरेचनादिके द्वारा यथाशाक्ति शारीरिक शुद्धि करके फिर पौष्टिक प्रयोगोंको प्रयोग करे ॥ १-५ ॥ वाजीकरण शशांक रस । मुशली कदलीकंदवाजिगंधाकसेरुकैः । मर्दित हेमसुताभ्रं मूषास्थं पुटपाचितम् ॥ ६॥ शाल्मलीचूर्णसंयुक्तं वासराण्येकविंशतिः । भक्षयित्वा चतुर्माषं गव्यं क्षीरं पिबेदतु ॥७॥<noinclude></noinclude> tor1dvs5qd6umbcxawzgt8jssdp3p51 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४४ 104 165741 418332 2026-09-05T10:30:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । स्थाल्यो ज्वालयेद्वह्नि यामपर्यंतमुद्धतम् । ततःक्षिपे पधान्यां हि व्योमस्त्वष्टगुणं पयः ॥ १०१ जीर्णे पयसि पिट्वा तत्तालमूलीरसैः पुन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418332 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । स्थाल्यो ज्वालयेद्वह्नि यामपर्यंतमुद्धतम् । ततःक्षिपे पधान्यां हि व्योमस्त्वष्टगुणं पयः ॥ १०१ जीर्णे पयसि पिट्वा तत्तालमूलीरसैः पुनः । इत्थ हि साधयेव्योम त्रिवारमतियत्नतः ॥ १०२ ॥ अजादुग्धैः पुटेत्पश्चाद्वाराणि खलु विंशतिः । efore करसेनापि विष्णुकांतारसेन च ॥ १०३ ॥ कदलीकंदतोयेन तालमूलीरसेन च । शतवारं पुटेदेवं भवेद्वयोम रसायनम् ॥ १०४ ॥ तद्वयोमभसित ताप्यभस्म तारस्य भस्म च । शुल्बभस्म च तत्सर्वे समांशं परिकल्पयेत् ॥ १०५ ॥ भावयेत्सप्तधा निंबर सैलधरसेनच । केतक्या मार्कवस्यापि कदल्यास्त्रिफलस्य च १०६॥ कोरकस्यापि सारेण तावद्वाराणि यत्नतः । इति निष्पन्नकल्केऽस्मिस्तत्समां त्रिफलां क्षिपेत् ॥ भस्मसुतं सितव्योषं चित्रकं च पृथक पृथक्र १०७॥ मधुना गुटिकाः कार्याः शाणेन प्रमिताः खलु । महाकल्क इति ख्यातो दस्राभ्यां परिकीर्तितः १०८॥ एक गोली समारभ्य तथैकैकां विवर्धयेत् । चतुर्गोलकपर्यंत मण्डले मण्डले खलु ॥ १०९ ॥ सेवितो द्वादशाब्दं तु जरामृत्युविवर्जितः । सर्वव्याधिविनिमुक्तो दृढदीपनपाचनः ॥ ११० ॥<noinclude></noinclude> kun7m5ktgd5ts452si58v386t9u1mml पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६७ 104 165742 418333 2026-09-05T10:31:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८४५) लोहे के पात्र में लोहे के मुसलसे घोटकर सेवन करे और दूसरे दिन भी इसी प्रकार सेवन करे। फिर इसको तीसरे दिन रसी, चौथे दिन ४ रत्ती, पाँचवे दिन ६ रत्ती... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८४५) लोहे के पात्र में लोहे के मुसलसे घोटकर सेवन करे और दूसरे दिन भी इसी प्रकार सेवन करे। फिर इसको तीसरे दिन रसी, चौथे दिन ४ रत्ती, पाँचवे दिन ६ रत्ती, छठे दिन ६ रत्ती, सातवें दिन और आठवें दिन आठ १ रत्ती, नववें और दसवें दिन १०-१० रशी, ग्यारहवें दिन और बारहवें दिन १२-१२ रतीतेरहवें और चौदहवें दिन १४- १४ रती, और १५ वें और १६ वे दिन १६-१६ रती १७ वें और १८वें दिन १८-१० रती, और १९वें तथा २० वें दिन २०-२० रती परिमाण उपर्युक्त विधिसे घृत और मधुके साथ लोहेके पात्रमें लोहेके दण्डेसे खरल करके सेवन करे । फिर ११ वें दिनसे आगे जो इसको सेवन करना हो तो प्रतिदिन २० - २० रसीकी मात्रासे सेवन करे । परंतु १० रत्ती प्रातःकाल और १० रत्ती सायङ्कालमें इस प्रकार दो भाग करके सेवन करे । २० रत्तीकी मात्रा एक साथ सेवन नहीं करनी चाहिये | सम्पूर्ण व्याधियोंसे क्षीण हुआ मनुष्य अथवा रसायन के गुणोंको चाहनेवाला मनुष्य इस प्रकार यात्राका विभाग करके इस रसायनको सदैव सेवन करे। और ऊपरसे उक्त दोनों समयोंमें ३२-३२ सोले धारोष्ण दूध अथवा औंटा करके शतिल किया हुआ दूध पानकरे। आयुको स्थिर रखने के लिये और वृद्धावस्याको निवारण करने के लिये औषध सेवन करनेके पश्चात् १९ दिन तक तो एक वक्त २० तोले दूध पीवे और २० वें दिन ४० तोले दूधका दोनों वक्तोंमें अनुपान करे । परन्तु किसी रोग के होनेपर उस रोगको निवारण करनेके लिये जो इस रसा नको सेवन करना हो तो इस पर उस रोगको शमन करनेवाली किसी औवधिके क्वाथका अनुपान करे । इस औषधको सेवन करके पीछेसे नागरमोथेकी जडको दाँतोंसे चचाकर उसका रस चुसलेवे व्यथवा उसको खाले वो मुखकी विरसता दूर होती है । जिसका कोठा बहुत कठिनही और हमेशा यल विबन्ध रहवाही वह मनुष्य इस औषधको खाकर मलको अनुलोमित करनेके लिये ऊपर से खूब गरम<noinclude></noinclude> r0fjnejkx8ry3l2d1994oo6yaycv6tc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८९ 104 165743 418334 2026-09-05T10:31:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८६७) अर्म, भासपिल्ल ( आँख के सारे पर छाया हुआ मांसका जाला अथवा बहुत बाहरको निकला हुआ डेला) आदि नेत्ररोगोंमें और ग्रन्थि ( गाँठ, गण्डमाला, रसौली आदिमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418334 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८६७) अर्म, भासपिल्ल ( आँख के सारे पर छाया हुआ मांसका जाला अथवा बहुत बाहरको निकला हुआ डेला) आदि नेत्ररोगोंमें और ग्रन्थि ( गाँठ, गण्डमाला, रसौली आदिमें लेप करनेसे शीघ्र लाभ करती है ॥ ३४-३५ ॥ विषादि गुटिका ! विषशुल्बरसव्योषगंधकानां पलं पलम् । पद्वयं हरीतक्या चित्रकस्य पलत्रयम् ॥ ३६ ॥ कौती मुस्ता चतुजीत कपशं च विचूर्णितम् । त्रिगुणश्च गुडः कार्या वटिका माषसम्मिता ॥ ३७ ॥ भक्षयेत जराग्रस्तो महारोगैश्व पीडितः ॥ ३८ ॥ शुद्ध मीठा बेलिया, ताम्र भस्म, पारा, गन्धक और त्रिकुटा ये प्रत्येक चार २ तोले, हरड ८ तोले, चीतेकी जड १२ सोले, रेणुका, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपास और नागकेसर ये प्रत्येक एक एक कर्ष लेकर सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके कपड़छान कर लेवे। फिर उस चूर्ण को तिगुने गुडमें मिलाकर एक एक मासेकी गोलियाँ बना लेबे । इन गोलियोंको वृद्धावस्थासे ग्रसित और बढे २ भयङ्कर रोगोंसे पीडित मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करे तो अवश्य आरोग्य लाभ करता है ॥ ३६-३८ ॥ जयाशुटी । भस्मसूतगुडक्षौद्रघृतैः सह निषेवितम् । जरी जयेदतो नाना गुलिकेयं जयोदिता ॥ ३९ ॥ पारेकी भस्म और शुद्ध मीठा तेलिया इन दोनोंको समानभाग गुडमें मिलाकर गोली बना लेवे। फिर उस गोलीको शहद और घृतक साथ मिलाकर नित्य प्रति सेवन करे। यह जयागुटिका जरा (वृद्धावस्था) को जीतती है, इस लिये यह जयागुढी नामसे प्रसिद्ध है ॥ ३९ ॥<noinclude></noinclude> oxc94gc3oqn2nqhpsejqhwbth2ea1bk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१२ 104 165744 418335 2026-09-05T10:32:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८९०) रसरत्नसमुच्चयः । फेनोद्वतिः पञ्चमे स्यात्स्कन्ध यो भगता ततः । जडयता सप्तमे वेगे चाष्टमे मरणं ध्रुवम् ॥ एवं ज्ञात्वा वरारोहे प्रतीकारं समाचरेत् ॥ १४२ ॥ पि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८९०) रसरत्नसमुच्चयः । फेनोद्वतिः पञ्चमे स्यात्स्कन्ध यो भगता ततः । जडयता सप्तमे वेगे चाष्टमे मरणं ध्रुवम् ॥ एवं ज्ञात्वा वरारोहे प्रतीकारं समाचरेत् ॥ १४२ ॥ पित्तान्तं वमनं कुर्यादामान्तं रेचनं चरेत् । जातिनीलीवरीसिंधुकाकमाच्य द्विकर्णिकाः ॥ १४३ ॥ त्रिफला करवीरं च कुष्ठं मधुकजीरकम् । क्षीरवृक्षत्व गेलेति विषघ्नोऽयं गणः स्मृतः ॥ विषघ्नं गोघृतं देवि मांगल्यं जीवनं स्मृतम् ॥ १४४॥ अश्वगंधा सगोजिह्वां त्रिशूलीं त्रिफलामपि । प्रथमं भक्षयित्वा च सेवयेद्गरलं ततः ॥ १४५ ॥ ब्रह्मचर्यं वरारोहे विषकाले समाचरेत् । पथ्यं स्वस्थमना मुक्त्वा तदा सिद्धिर्न संशयः १४६ ॥ गव्ये क्षीरघृते पेये शाल्यन्त्रमिदमेव च । सीतलं च पिबेत्तोयं पित्तलानि च वर्जयेत् ॥ १४७॥ जांगलानि च मांसानि छागलोहं च मद्गरान् । शर्करां माक्षिकं क्षीरं सेवनीयं प्रयत्नतः ॥ सेव्यं देवि सदा पथ्यमपथ्यं दूरतस्त्यजेत् ॥ १४८ ॥ उद्धृतं फलपाकेन नवं स्निग्धं घनं गुरु । अव्यापन्नं विषहरैरखातात पशोषितम् ॥ १४९ ॥ रक्तसर्षपतैलेन लिप्ते वाससि धारितम् । सक्नुकं मुस्तकं शृंगी वालुकं सर्षपाह्वयम् ॥ वत्सनाभं च कर्मण्यं कालकूटादिकं ततः ॥ १५० ॥<noinclude></noinclude> omu8foxakhuu7d7qch0wigvimk7cb5x पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३६ 104 165745 418336 2026-09-05T10:32:26Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ९१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । तेन बाकुचिचक्राकार्पासागस्तिपवान् ॥८१॥ एकस्य लकुचस्याम्ले स्वरसेन रसेन यः । प्रक्षालितः प्रयात्येव विषदिग्धत्रणः शमम् ॥ ८२ ॥ रसायनोक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418336 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । तेन बाकुचिचक्राकार्पासागस्तिपवान् ॥८१॥ एकस्य लकुचस्याम्ले स्वरसेन रसेन यः । प्रक्षालितः प्रयात्येव विषदिग्धत्रणः शमम् ॥ ८२ ॥ रसायनोक्तविधिना शुद्धो लब्धबलः पुनः । प्रातः प्रातः कणापथ्याविश्वसैंधव चित्रकम् ॥ पीत्वा संरक्षणायारीषदुष्णेन वारिणा ॥८३॥ भृंगामल निर्यासे भावितं व्योमकांतयोः । भस्मयःपुटे धान्ये स्थापितं मधुसर्पिषा ॥८४॥ खादेन्निशि कणा पथ्या मासमेकं तथा पुनः ॥ ८६ ॥ यातनाभस्मना युक्तमथ सूतस्य भस्मना । जीर्णाऽल्पदेनः षण्मासाच्छतावर्या रसेन च ॥ ८६॥ त्रिफलां मधुसर्पि खादिरासन भाविताम् । मृत हेमरसोपेतां भक्षयेद्भक्षयेजराम् ॥ ८७ ॥ गंधकेन हतं सुतं कां धात्रीरसेन च । त्रिफलासहितं खदेष्जीवेदा चंद्रतारकम् ॥ ८८ ॥ चित्रकं त्रिफला भृंगो हरिद्राञ्जनपत्रिका । रसत्रिमधुरश्वापि जरावैरूप्यनाशनः ॥ ८९ ॥ रसौषधीनां रसभावितानां सितायुतैः क्षीरमधूद- काज्येः । जरां रसो हंति व कतिपात्रे क्षीरं शृतं काञ्चनपादपिष्टया ॥ ९० ॥ समचीर्णजीर्णहेममाक्षिकयोगेन मारितो वृष्यः । घृतमधुशतावरी र सदुग्धयुतो मदनवर्धनः सूतः ॥९१॥<noinclude></noinclude> trobh5d2j2s15ina45a2r2us9fnnvi0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०९ 104 165746 418337 2026-09-05T10:33:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८७ ) भृगं लवंगं बोलं च प्रत्येकं च पलं पलम् ॥ ११४॥ मिशि: पंचपला धान्यं पलत्रयमितं तथा । audiogurt सम्यस्विचूर्ण्य परिमिश्रयेत् ॥ ११५ ॥ एषा सौभाग्यशुण्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418337 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६८७ ) भृगं लवंगं बोलं च प्रत्येकं च पलं पलम् ॥ ११४॥ मिशि: पंचपला धान्यं पलत्रयमितं तथा । audiogurt सम्यस्विचूर्ण्य परिमिश्रयेत् ॥ ११५ ॥ एषा सौभाग्यशुण्ठीति शंभुदेवेन कीर्तिता । सेविता दंति सुताया ज्वररोगमनेकधा ॥ ११६॥ प्लीहानं मलबंधं च पाण्डुगुरुमारुचीस्तथा । कासश्वासकृमीनग्निमांद्यादिकगदांस्तथा ॥ कायाग्रिजननं ह्येतत्सूतिकामृतमुच्यते ॥११७॥ जल ३२ तोले, दूध १ आढक ( २९६ ताल) और खांड ५० पल लेकर सबको एकत्र करके मन्द मन्द अग्निस पकावे । जब उसकी उत्तम प्रकारकी चासनी तैयार होजाय तव उसमें छोटी इलायची, मुद्र- पर्णी, वायविडंग, सोंठ, मिरच, पीपल, जीरा, अजवायन, भाँगरा, लौंग और बोल ये प्रत्येक औषधि चारर तोले, सॉफ ५ पल, धनिया ३ पल और सोंठ ८ पल लेकर सबको वारीक चूर्ण करके कपडे में छानकर डालदेवे और करछीसे घोटकर सबको एकमएक करलेवे । इस सौभाग्यशुंठी पाकको श्रीशम्भुदेवने वर्णन किया है । इस पाक को नियमपूर्वक सेवन करनेसे प्रसूता स्त्रीका ज्वर शीघ्र दूर होजाता है । इसके अतिरिक्त यह औषध प्रसूता स्त्रियोंके प्लीहा, मलबद्धता, पाण्डु गुल्म, अरुचि, श्वास, खाँसी, कृमिरोग, मन्दामि आदि अनेक रोगोंको नष्ट करती है और शरीरमें तेज उत्पन्न करती है । यह सौभा- ठी प्रसूता स्त्रियाके लिये अमृत के समान हितकारी कही जाती हैं ॥ ११३-११७ ॥ योनिसंकोचन और स्तन दृढीकरण के । सामान्य उपाय | कोरण्टकं कुलत्थं च सर्वैरेभिः शृतं जलम् ॥<noinclude></noinclude> tv9rtgyfl11o65bxzsgcxcwc5pe85oc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३२ 104 165747 418338 2026-09-05T10:33:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१० ) रसरत्नसमुच्चयः । गन्धकको जारण करे । फिर कढाईको नीचे उतारकर शीतल हो जानेपर उस भस्मको १ प्रस्थ पानी डालकर घोललेवे । जब पानी ठहरजाय तब उसको धीरे २ नितार लेवे ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७१० ) रसरत्नसमुच्चयः । गन्धकको जारण करे । फिर कढाईको नीचे उतारकर शीतल हो जानेपर उस भस्मको १ प्रस्थ पानी डालकर घोललेवे । जब पानी ठहरजाय तब उसको धीरे २ नितार लेवे । इसके बाद उस पात्रमें पानीके नीचे जो औषधि जम गईहो उसको लेकर सुखालेवे । फिर उसमें नीलाथोथा १ तोला और काला सुरमा १ तोला डालकर खूब बारीक खरल करके काँसे के बर्तन में भरकर धूपमें रखदेवे । इस प्रकार करनेसे जब ताँबे की दुति होजाय तब उसको शीशी में भरकर रख देवे । यह ताम्रद्भुति नेत्रों में आँजनेसे सम्पूर्ण नेत्ररोगोंको नष्ट करती है ।। ३५-३७ ॥ गन्धति । आर्द्रकस्य रसे पिष्टं गंधकेन विमिश्रितम् । तुत्थं तु निष्कदशकं तन्मान चाभ्रकं भिषक् ॥ ३८ ॥ दश निष्केन तन्मानं ताम्र च शकलीकृतम् । भर्जयेत्खर्परे क्षित्वा दहेत्तदनु चूर्णयेत् ॥ ३९ ॥ तन्मिश्रं कुंदुस्थेन चूर्णमेतेन भर्जयेत् । गंधकं वर्णितं कृत्वा कर्षे तु विधिना शनैः ॥ ४० ॥ मर्दितं तज्जलप्रस्थे नीलं चापि शिलाजतु । कर्षाप्रमाणं निक्षिप्य मर्दयेद्भावयेत्पुनः ॥ ४१ ॥ प्रसादं स्रावयेत्पश्चादातपे परिशोषयेत् । गंधकद्भुतिरित्येषा सर्वनेत्रामयापहा ॥ ४२ ॥ निशेषाद्रणकुष्ठं च पिल्लं काचं कुकूणकम् ॥ जयेत्स्तन्यघृतक्षौद्रैः सर्वे तत्परिकल्पयेत् ॥ ४३ ॥<noinclude></noinclude> spmm5ah18uoq5e16n6pqdsmur4prih4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५४ 104 165748 418339 2026-09-05T10:34:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । असगन्ध, अजमोद, वच, कूठ, त्रिकूटा, सौंफ, ब्राह्मी के बीज और सेंधानमक इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपडछान करलेवे फिर प्रतिदिन प्रातः... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । असगन्ध, अजमोद, वच, कूठ, त्रिकूटा, सौंफ, ब्राह्मी के बीज और सेंधानमक इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपडछान करलेवे फिर प्रतिदिन प्रातः और सायंकालमें इस चूर्णको और बचके चूर्णको छः २ मासे लेकर शहद और घृतमैं मिलाकर सेवन करे और औपाधिके जीर्ण होजानेपर केवल दुग्धपान करे । इस चूर्णके सेवन से गूँगा मनुष्य भी हजारों अन्योंको स्मरण रखनेवाला, बृहस्पति के समान बुद्धिमान होजाता है । यह महासरस्वती चूर्ण मन्द बुद्धिवाले मनुष्यों के लिये अत्यन्त हितकारी है ॥ २९-३१ ॥ सुखरोग और गण्डमाला आदि गलेके रोगोंके सामान्य उपाय | चूर्ण त्वामलकस्यैव गवां क्षीरेण पाययेत् ॥ गलकी लकनुत्यर्थे विपतिंतुं सनागरम् ॥ ३२ ॥ हरीतक्या व संयुक्तं मुखे धारय संततम् । बहुशो भानुदुग्धेन सैंधवेन प्रलेपनम् ॥ भातकरसं दत्त्वा चूर्ण चोपरि बंधयेत् ॥३३॥ यः प्रातरुद्वेजयति द्विजाञ्जयाकाष्ठेन वज्रद्विज एष जायते । तेनैव तैलोपहितेन मार्जना- जिह्वा जहात्युद्धतपूतिगंधताम् ॥३४॥ मुखपाकापनुत्यर्थ मधुनापर्पटीरसम् । खादयेत्कृतगण्डूषो वटिकां चानुचारयेत् ||१६|| महाराष्ट्रिकचूर्ण च चतुष्कृत्वो विभावयेत् । निब्बईकरसाभ्यां च गुटिका मुखशोषनुत ॥३६॥ श्वेतं पुनर्नवामूलं सर्पाक्षीमूलसंयुतम् । उद्वर्तनं हरेत्स्त्रीणां मुखच्छायां सुदुःसहाम् ॥३७॥ महिषीक्षीरसंपिष्टं रजनीरक्तचंदनम् ।<noinclude></noinclude> 31l0f9jex77ifdn42fzy24xd3hbkiqp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७६ 104 165749 418340 2026-09-05T10:34:25Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५४ ) इसरत्नसमुच्चयः । छुछुदरीसाधिततैल लिप्त त्रिभिर्दिनैर्नश्यति गण्डमाला ॥ १२५ ॥ मूलिका सहदेव्युत्था रवौ ब्राह्माऽथ धारिता । गंडमालाहरा कणै महादेवेन भाषि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७५४ ) इसरत्नसमुच्चयः । छुछुदरीसाधिततैल लिप्त त्रिभिर्दिनैर्नश्यति गण्डमाला ॥ १२५ ॥ मूलिका सहदेव्युत्था रवौ ब्राह्माऽथ धारिता । गंडमालाहरा कणै महादेवेन भाषिता ॥ १२६ ॥ इन्द्रायनकी जड, नागरमोथा और घीग्वार तीनोंको गोमूत्रमें पीसकर पान करनेसे गण्डमाला रोग दूर होता है । आकका दूध, गुडहल के फूल, तेल और लाखका रस इन सबको एकत्र खरल करके लेप करनेसे सात दिनमें गण्डमाला शान्त होजाती है । पुष्य नक्षत्रमें विष्णुकान्ता (सफेद कोयल ) की जडको लाकर गलेमें बांधे अथवा उसके चूर्णको गाय के घीमें मिलाकर सेवन करे। इससे भयंकर अपची ( रसोली ) नष्ट होजाती है । छछुन्दरीके पंचांग के कल्कके साथ तेलको पकाकर उस तेलको लगाने से तीन दिनमें ही गण्डमाला आराम होजाती है । अथवा रविवार के दिन सहदेई की जडको उखाड कर लावे और उसको कानमें बांधे तो गण्डमाला दूर होती है, ऐसा श्रीमहादेवजीने कहा है ॥। १२२--१२६ ॥ श्लीपद रोग (पीलपाया ) सामान्य लेप | गुंजा टंकण शिमूलरजनीशम्याक भल्लातकैः स्नुह्यर्काशिकरंज सैंधववचाकुष्ठाऽभयालागली । वर्षाभूशरभूशिरीषलवण ब्योषाश्वमारीविषम् गोमूत्रः शमयेद्विलिप्तमपचीग्रंथ्यर्बुदश्लीपदम् ॥ १२७ चोंटली, सुहागा, सैंजनेकी जड, हल्दी, अमलतास, भिलावे, थूह- रका दूध, आकका दूध, चीता, करंजकी जड, सेंधानमक, वच, हरड कुठ, कलिहारी, विषखपरा, रामसर, सिरसकी छाल, समुद्र- नमक, त्रिकुटा, कनेर, और वत्सनाभ विष इन सब औषधियोंको<noinclude></noinclude> d3559jeaq32oz1fsupf6701tbt4lsv5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९८ 104 165750 418341 2026-09-05T10:34:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७७६) रसरत्नसमुच्चयः । रजोदोष, कालाप्रदर, लाल प्रदर, श्वेतप्रदर आदि व्याधियोंको शीघ्र विनाश करता है । यह पुष्यानुग नामक चूर्ण आत्रेयऋविका बनाया हुआ है। उपर्युक्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७७६) रसरत्नसमुच्चयः । रजोदोष, कालाप्रदर, लाल प्रदर, श्वेतप्रदर आदि व्याधियोंको शीघ्र विनाश करता है । यह पुष्यानुग नामक चूर्ण आत्रेयऋविका बनाया हुआ है। उपर्युक्त रोगोंके लिये यह विशेष हितकारी है ।। ९७-१०१ ॥ स्थावर और जंगम विषका उपाय | यत्कंदमूलादिषु जायते ततो विषाद्विषं स्थावरमुग्रवीर्यम् । सर्पादिकं जंगमधुच्यते तद्रवैरनेकैः कृतकं च यत्तत् ॥ १०२ ॥ घनसारजटा इंति विषं स्थावरजंगमम् । ज्येष्ठाम्बुसुतराजेन पीता भीरुशिफा तथा ॥ १०३॥ सुरभिशकृद्रसभावितशशिराजीचूर्णसंयुतः सुतः । स्थावर जंगम कृत्रिम विषजिह्वंजामितोऽभ्यस्तः 1908 अभ्रकं तालकं ताप्यं शिलाजित्कुनटी रसः । देवदालीरसो व्योषं लेपनाद्विषनाशनम् ॥ १०५ ॥ रसेन चक्रमर्दस्य पुटितः पुटपाचितः । एरण्डस्नेहसंयुक्तः सूतो लूता विकारनुत ॥ १०६ ॥ जलेन नागदमनीमूलनस्यं प्रयोजितम् । महासर्पस्य विषमं विषं नश्यति तत्क्षणात ॥१०७॥ जलपिष्टं शिरीषस्य पञ्चांगं यः पिबेन्नरः । सनागराजदष्टोऽपि मानुषो निर्विषो भवेत् ॥ १०८॥ अश्वगंधाभवं कंं बंध्याया वाथ यः पिबेत् । तस्य देहांतरं याति विषं स्थावरजंगमम् ॥ १०९ ॥<noinclude></noinclude> iyyhjujl4gzgssva5pn9yo60y9dj322 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२१ 104 165751 418342 2026-09-05T10:35:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७९९) सर्वागोद्वर्तनं कुर्यात्सयवैः शाल्मलीरसैः । अन्वहं मधुराहारः सहस्रं रमते स्त्रियः ॥ शशांकोऽयं रसः प्रोक्तो वाजीकरणपूर्वकः ॥ ८ ॥ सुवर्णभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७९९) सर्वागोद्वर्तनं कुर्यात्सयवैः शाल्मलीरसैः । अन्वहं मधुराहारः सहस्रं रमते स्त्रियः ॥ शशांकोऽयं रसः प्रोक्तो वाजीकरणपूर्वकः ॥ ८ ॥ सुवर्णभस्म, पारेकी भस्म ( रससिन्दूर) और अभ्रकभस्म तीनोंको समान भाग लेकर एकत्र मिलालेवे । फिर मुसली, केलका कन्द, असगन्ध और कसरू इन प्रत्येकके रसके साथ क्रमसे खरल करके मृषायें रखकर पुटपाक करे । जब स्वांगशीतल होजाय तब चूर्ण करके उसमें समान भाग सेमलके गोंदका चूर्ण मिलाकर खूब बारीक खरल कर के रखलेवे । जो मनुष्य इस रसको प्रतिदिन चार २ मासे परिमाण भक्षण करके गोदुग्धका अनुपान करता हुआ २१ दिन तक सेवन करे और सेमलके रसमें जौ पीसकर उनसे सारे शरीर में उप- ठन करके स्नान करे । एवं मधुर पदार्थों का आहार करे तो वह हजारों स्त्रियों के साथ रमण कर सकता है। इसको वाजीकरण शशांक रस कहते हैं ॥ ६-८ ॥ कामदेव रस । हेमपादयुतः स्रुतो मर्दितः शाल्मलीरसैः । कदलीकंद निर्यासे क्षीरेक्षुरसगोघृते ॥ ९ ॥ माक्षिके चासकृत्स्विन्नः शाल्मली क्षीरगोक्षुरैः । शर्करामलकद्राक्षामुशलीमाषमाक्षिकैः ॥ १० ॥ युक्तो रंभाफलं दत्त्वा कामदेव इति स्मृतः । सेवनादूर्ध्वलिंगः स्याद्रावयेद्व निताशतम् ॥ ११॥ सोनेकी भस्म अथवा सोनेके बर्क १ भाग और पारेकी भस्म (रस सिन्दूर) ४ भाग दोनोंको सेमलके गोंदके रसमें एक दिनतक घोटा करके गोला बनालेवे । उस गोलेको कपडे में बाँधकर दोला- यन्त्र में अधर लटका करके केलेके कन्दके रसमें तथा दूध, ईखका रस<noinclude></noinclude> g0jwfvqlasxvgrpor36vka9uue31xoc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४५ 104 165752 418343 2026-09-05T10:35:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१३) भीमतुल्यबलः श्रीमान्पुत्रसंततिसंयुतः । सर्वारोग्यमयो भीमसमानभुजविक्रमः ॥ १११ ॥ सर्वायाससहिष्णुश्च शीतातपसहस्तथा । अमन्दसंमदोपेतः प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418343 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८१३) भीमतुल्यबलः श्रीमान्पुत्रसंततिसंयुतः । सर्वारोग्यमयो भीमसमानभुजविक्रमः ॥ १११ ॥ सर्वायाससहिष्णुश्च शीतातपसहस्तथा । अमन्दसंमदोपेतः प्रौढ स्त्रीरतिरञ्जनः ॥ ११२ ॥ द्रिय भूत्वा जीवेद्वर्षशतत्रयम् । श्वासं का क्षयं पाण्डं तथैवाष्टौ महागदान्॥ ११३॥ मण्डलार्धेन शमयेज्वरादीनां तु का कथा । सर्वगोरस संयुक्तं पथ्यं कार्य रसायने ॥ ११४ ॥ रोगोचितमथान्यच्च ददीत खलु रोगिणे । संसारसुखमिच्छद्भिः सुखं जीवितुमिच्छुभिः ॥ नित्यं रसो निषेव्योऽयं दिव्यामृतसमो गुणैः॥११५॥ धान्याकको मुसलीके रस में घोटकर एक मटकेमें भरदेवे और उसके ऊपर जिसके बीचमें एक छेद हो ऐसा ढक्कन ढककर (ढक्कन अककी बराबर वजनमें लेते और अभ्रकले व्यठगुना दूध जिसमें आसके इतना चौडा होना चाहिये ) मटकेके मुँहकी सन्धियोंको मिट्ठसे बन्द करके उसके नीचे ३ घंटेतक तीक्ष्ण अग्नि जलावे । फिर उस ढकनमें अभ्रकसे अठगुना दूध भरदेवे । जब पककर दूध सब जलजाय तब मटकेको नीचे उतारकर शीतल करके उसमेंसे अभ्रकको निकाललेवे और फिर मुसलीके रसमें घोटकर इसी प्रकार मटकेमें चन्द करके और अठगुना दूध डालकर तीनवार यत्न पूर्वक अभ्रकको सिद्ध करे । इसके पश्चात् अभ्रकको बकरीके दूधमें घोट घोटकर बीस बार गजपुट देवे । तदनन्तर कबीला के रस, विष्णुक्रान्ताके रस, केले के रस और मुसलीके रसके साथ क्रम क्रमसे बीस २ चार खरल करके बीस बीस बार गजपुट देवे । इसी प्रकार फिर पाँचों औषधियों के<noinclude></noinclude> ptcyrzc56bro6upcr28e35xh37300l7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६८ 104 165753 418344 2026-09-05T10:36:02Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूध पीवे और बार बार ताम्बूल भक्षण करे । इस प्रकार करने से कोष्ठ सम्बन्धी सब विकार दूर होकर अग्नि अत्यन्त दीपन होती है । इसको सेवन करनेवाले म... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूध पीवे और बार बार ताम्बूल भक्षण करे । इस प्रकार करने से कोष्ठ सम्बन्धी सब विकार दूर होकर अग्नि अत्यन्त दीपन होती है । इसको सेवन करनेवाले मनुष्यको स्नान, तेल मर्दन विष्टम्भजनक दाहकारक और खट्टे पदार्थ तथा ग्राम्यपशुओं का मांस ये सब ४९ दिन अथवा २१ दिनतक सर्वथा त्यागदेने चाहिये । इसपर शालि- धानों के चावल, मूँगका यूष, घी, बेतका अग्रभाग, कटेरी, बडी कटेरी, बडे परवल, बैंगन, ताडके फल, मूली, शतावर, जीवन्ती, सिंघाडे, सिरिआका शाक, चौलाईका शाक, धनियाँ, अमलतास, बथुआ, जंगली पशुओं के मांस, शफरी नामवाली मछली, काली मछली, रोहित और मद्गुर, नामक मच्छ, दाख, दाडिमी, खजूर, केला और वेर ये सब पदार्थ सेवन करने चाहिये । प्रातःकालमें इस औषधको सेवन करनेपर जब वह जीर्ण होजाय और अग्निके दीपन होनेपर भूख लगे तब इतना दूध पीवें, जितनेसे कि आधी भूखनिवृत्त हो जाय। परन्तु दुर्बल मनुष्य क्षुधा के अनुसार दो तीन बार थोडा र दुग्धपान करे इस औषधके ७ दिनतक सेवन करनेको कनिष्ठकाल १४ दिनतक सेवन करनेको मध्यमकाल और २१ दिनतक सेवन करनेको उत्तम सेवन काल कहा गया है। १४ दिन अथवा २१ दिनतक इसको सेवन करने से शरीरमें किसी प्रकारकी व्याधेि नहीं रहती। २१ दिनतक इसको सेवन करके फिर यदि सेवन करने की इच्छा हो तो विशेष पथ्य रखने की आवश्यकता नहीं है यथा समय मलका त्याग, शरीर और उदरमें हल्का पन, हृदयकी शुद्धि और डकारका शुद्ध आना ये सब लक्षण लोहके जीर्ण होनेपर उत्पन्न होते हैं । और औषध के न पचनेपर आमके लक्षण प्रकट होते हैं और औषधका छूटा हुआ मैल पेटमें जम जाता है । ऐसा होनेपर उक्त विकारोंको शमन करनेके लिये गरम जलमें जवाखार डालकर तीसरे तीसरे दिनतक पीवे और बीचमें २ अगस्ति याके पत्तोंके रस में वायविडंग को पीसकर पानकरे । यदि औषध<noinclude></noinclude> kvq53iufyuo2nsrn7n2697tsli8osv9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९० 104 165754 418345 2026-09-05T10:36:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वितीया जयागुटी । वासाऽनृताख दिर निम्ब विडंगपथ्याक्काये विषत्रि- कटुचित्रकलोहतिक्ता: । आवाप्य माषतुलिता afटिका प्रणीता क्षौद्रान्वित... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वितीया जयागुटी । वासाऽनृताख दिर निम्ब विडंगपथ्याक्काये विषत्रि- कटुचित्रकलोहतिक्ता: । आवाप्य माषतुलिता afटिका प्रणीता क्षौद्रान्विता क्षपयति क्षयकुष्ठ- जातम् ॥ ४० ॥ अडूसा, गिलोय, खैरसार, नीम की छाल, वायाविडङ्ग और हरड इनके क्वाथमें शुद्ध मीठा तेलिया, त्रिकुटा, चीता, लोहभस्म और कुटकी इनके समानभाग मिश्रित चूर्णको एक दिनतक भावना देकर एक २ मासेकी गोलियाँ बनालेवे | यह गुटिका शहद में मिलाकर सेवन करने से क्षय और कुष्टरोगमें उत्पन्न हुए विकारोंको नष्ट करती है ॥ ४० ॥ तृतीया जयागुटी । वचाऽश्वगंधामरिचोपकुल्या तालीसमुस्तापिचुमं- दपाठाः । विषं च तेषां वटिका जयन्त्यः फले प्रयोगे च जयासमाना ॥ ४१ ॥ वच, असगन्ध, मिरच, पीपल, तालीसपत्र, नागरमाथा, नीमकी छाल, पाढ और शुद्ध वत्सनाभ विष इन सबको समानभाग लेकर पानीके साथ पीसकरके एक २ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । यह गोलियाँ फलमें और उपयोग में उपर्युक्त गोलियोंके समान हैं ॥ ४१ ॥ विषकल्प । आरोढं भक्षयेद्देवि विषं सर्षपमात्रकम् । प्रथमे दिवसे पश्चाद्दितीयादौ द्विसर्षपम् ॥ ४२ ॥ पञ्चमे दिवसे देवि भक्षयेत्सर्षपत्रयम् ।<noinclude></noinclude> 41kh7yihgttucbn1vwelg5mx9uuq1ee पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१३ 104 165755 418346 2026-09-05T10:36:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । 1 ( ८९१ ) न जात्वन्यत्प्रयोक्तव्यं विषे तोक्षणे च चारिते । अतिमात्रे च कर्मण्ये पेयं घृतमनन्तरम् ॥ सभाङ्गदधिधर्मोत्थं सारिवा तंदुलीयकम् ॥१५१॥ आग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । 1 ( ८९१ ) न जात्वन्यत्प्रयोक्तव्यं विषे तोक्षणे च चारिते । अतिमात्रे च कर्मण्ये पेयं घृतमनन्तरम् ॥ सभाङ्गदधिधर्मोत्थं सारिवा तंदुलीयकम् ॥१५१॥ आगारधूममंजिष्ठाष्ट चावी समन्वितम् । लिह्याद्वा मधुसर्पिर्भ्यां चूर्णितामर्जुनत्वचम् ॥ टंकणं मेघनादेन मधुना वाऽऽलिपडवान् ॥ १५२ ॥ विषे प्रतिविषं युंज्या मंत्रतंत्रैरसिद्धयति अतीते पञ्चमे वेगे सप्तमे चानतिक्रमे ॥ युंज्यान्मूलविषं सर्पदष्टानां पानलेपयोः ॥ १५३ ॥ चतुर्भिः षड्भिरष्टाभिर्हीनमध्योत्तमा यवैः । मात्रां विषस्य मूलस्य प्रयुंजीत च सर्वदा ॥ १५४ ॥ दष्टस्य द्वौ व कीटैस्तिलमात्रं तु बृश्विकैः । नैव त्वसृस्थे पाने तु लूतादष्टस्य नेष्यते ॥ वृश्चया लेपयेद्देशं तस्य ज्ञात्वा सुनिश्वितम् ॥ १५५ ॥ शत्रुप्रयुक्ताद्विषतो गराद्वा लूताभुजंगा खुविषाज्ज- रायाः । अकालमृत्युग्रहपाप्मनोपि विषाशिनो नास्ति भयं नरस्य ॥ १५६ ॥ हे वरानने, सात्म्य ( प्रकृति के अनुकूल ) और असात्म्य प्रकृतिक विरुद्ध ) का विचार किये विना सहसा उपयोग किया हुआ अमृत अथवा विष अनेक प्रकारका विकार और मृत्युको उत्पन्न करते हैं। बिना नियम और मात्राका विचार किये बिना सहसा विषका सेवन करनेवाले मनुष्यके शरीरमें आठ प्रकारके वेग उत्पन्न होते हैं । प्रथम<noinclude></noinclude> syqr1hexz6cc2bhu3v1jnfcv69kjc0q पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३७ 104 165756 418347 2026-09-05T10:37:06Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९१५) लोहितागस्तिसारेण कृष्णारंभाफलं घृतम् । रसं च घनसारं च पीत्वा स्त्रीषु वृषायते ॥ ९२ ॥ घनसारच तुजीतकं कोल्लकटुकी पलम् । पलं ताम्बूलवलीनां र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ९१५) लोहितागस्तिसारेण कृष्णारंभाफलं घृतम् । रसं च घनसारं च पीत्वा स्त्रीषु वृषायते ॥ ९२ ॥ घनसारच तुजीतकं कोल्लकटुकी पलम् । पलं ताम्बूलवलीनां रसस्याक्रमणं परम् ॥ ९३ ॥ सुजीत शालिगोधूमयवषष्टिकजांगलम् । मुद्द्रयूषं गवां क्षीरं मस्तु खायात्सुखांभसा ॥ ९४ ॥ रूपयौवनसंपन्नामनुरूपां प्रियां मजेत् । अभ्यंगं कटुतैलेन कांजीतैलं सुरां दधि ॥ ९५ ॥ कालिंग कारवेल्ला म्ललघु नासुरिमूलकम् । द्विदलं बिल्ववार्ताकं छत्राकं काकमाचिकाम् ॥९६॥ अंगमर्दनं रात्रौ जागरं स्वपनं दिवा । अत्यम्लतिक्कलवणं स्वादूष्णं शिशिरीषधम् ॥९७. शोकवातातपत्रोधचिन्तां च परिवर्जयेत् । साहसं रसलोहानां मारकं च विशेषतः ॥ सेवया परिहार्याणांरसस्याऽजरणा भवेत् ॥ ९८ ॥ शूलो नाभितले जाड्यं निद्रालस्यं ज्वरस्तमः । अङ्गभंगोऽरुचिदीहः पिबेत्तत्र दिनत्रयम् ॥ ९९ ॥ सौवर्चलं सगोमूत्रं कर्कोटी मूलवारिणा । मातुलुंगस्य वाऽम्लेन माणिमंथं सनागरम् ॥ १०० ॥ नागवंगतः सूतः प्रमादाद्भक्षितो यदि ! सैंधवं कारवेल्लस्य कंद मूत्रैः पिबेद्वाम् ॥ १०१ ॥ pattrast पथ्याशरपुंखैर्विपाचितैः ।<noinclude></noinclude> tioglfuz9pyggu0odzmrrkf9xnat44e पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१० 104 165757 418348 2026-09-05T10:37:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । युक्तं शर्करया पीतं सतीशूलज्वरापहम् ॥ ११८ ॥ लोहखंडयुतं पञ्चमूलिकासाधितं जलम् । नाशयेत्सूतिका रोगान् सवातान्विविधान्खलु ॥ ११९ ॥ बिबिभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । युक्तं शर्करया पीतं सतीशूलज्वरापहम् ॥ ११८ ॥ लोहखंडयुतं पञ्चमूलिकासाधितं जलम् । नाशयेत्सूतिका रोगान् सवातान्विविधान्खलु ॥ ११९ ॥ बिबिभद्राश्वगंधसप्तच्छदत्वचा । तैलं पचेत्तदभ्यंगात्सूतिका सर्वरोगनुत् ॥१२०॥ निर्गुडीपत्रनिर्यासो गुडोजीर्णः सुरावितः । सेवितस्तभक्ताभ्यां योनिशूलविनाशनः ॥१२१॥ निर्गताऽपि विशेद्योनिः कारली कंदलेपिता । इंद्रगोपाज्यलेपेन पृथयो निर्दृढा भवेत् ॥१२२॥ माकंद मूलकर्पूरमधुभिश्व जरस्त्रियः । कुरुते संवृतां योनिं कन्यकाया हवध्रुवम् ॥ १२३ ॥ श्रीपर्णीरसकल्काभ्यां तैलं सिद्धं तिलोद्भवम् । तत्तैलं तुलिकेनैव स्तनयोः परिदापयेत् ॥ १२४॥ पतिताडुच्छ्रितौ स्त्रीणां भवेयातां पयोधरौ । गजकुंभसमाकारान्नतौ परिमण्डलौ ॥१२५॥ पीली करसरैया और कुलथी इन दोनोंका काढा बनाकर शीतल करके उसको खाँड मिलाकर पान करे तो प्रसूता स्त्रीका शूलयुक्त ज्वर दूर होता है। एवं लघु पंचमूलके द्वारा सिद्ध किये हुए काथको लोहखण्ड नामक रसायन के साथ प्रतिदिन सेवन करे । यह क्वाथ प्रसूता स्त्रियोंके विविध प्रकारके वातसम्बन्धी विकार और प्रसुतरोगको अवश्य नाश करता है । अथवा चिरायता, नीम की हरी छाल, नाग- रमोथा, असगन्ध और सतौनेकी छाल इन औषधियोंके क्वाथ और<noinclude></noinclude> o5bn6cjavhb7wen5clwqbiii7w2ki2l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३३ 104 165758 418349 2026-09-05T10:37:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७११) व्रणान्कृच्छ्रान्सुसूक्ष्माग्रानपि शीघ्रं निवर्तयेत् । तत्कि दकिटिमपामादील्लेपनाज्जयेत् ॥४४॥ गन्धक १० निष्क और नीलायोया १० निष्क लेकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७११) व्रणान्कृच्छ्रान्सुसूक्ष्माग्रानपि शीघ्रं निवर्तयेत् । तत्कि दकिटिमपामादील्लेपनाज्जयेत् ॥४४॥ गन्धक १० निष्क और नीलायोया १० निष्क लेकर दोनों को अदरख के रस में खरल करले, फिर उसमें अभ्रकभस्म १० निष्क और ताँबेका चूर्ण १० निष्क परिमाण डालकर अदरख के रसमें एक दिन- तक घोटकर उसको मिट्टी के खीपरेमें डालकर के भूने । जब समस्त जल शुष्क होजाय तब फिर उसको अदरखके रसमें खरल करके गोला बनाकर गजपुटमें पकावे । स्वांगशीतल होनेपर गोलेको बारीक चूर्ण करके कढाईमें डालकर चूल्हेपर चढावे और नीचे मन्द मन्द अि जलावे । उसमें एक २ तोला गन्धक डालता हुआ पूर्ववत् धुआँ निका- लकर उसका जारण करे । जब उपर्युक्त प्रमाण के अनुसार गन्धकका जारण होजाय तब कढाईको नीचे उतारकर शीतल होनेपर उसमें ६४ तोले पानी डालकर खूब मर्दन करे । फिर नीलाथोथा १ तोला और शिलाजीत १ तोला डालकर मर्दन करे और जब पानी ठहरजाय तब उसको धीरे धीरे नितारलेवे । इसके पश्चात् उसको तीक्ष्ण धूपमें रखदेवे | जब गन्धक पिघलकर रसके समान पतली होजाय तब उस द्रुतिको शीशी में भरकर रखदेवे । यह गन्धकद्वति समस्त नेत्ररोगों को दूर करती है । इस दुतिको शहद, घी अथवा दूधमें मिलाकर नेत्रों में आँजनेसे विशेष कर नेत्रोंके व्रण कुष्ठविकार, पिल्ल, मोतियाबिन्द, कुकूणक आदि नेत्ररोग नष्ट होते हैं । यह द्रुति कठिन और सुक्ष्म अग्रभागवाले नेत्रव्रणोंकोभी शीघ्र निवारण करती है । इस द्रुतिको बनाते समय उसमें जो मैल निकलता है उसको लेकर प्रलेप करनेसे दाद, श्वेतकुष्ठ, खुजली आदि त्वचाके विकार शान्त होते हैं ॥३८-४४॥<noinclude></noinclude> 9phm0p10e92uafrxterh4peqm3kkbha पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५५ 104 165759 418350 2026-09-05T10:38:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७३३) कृतलेषं निहंत्याशु श्यामिकां गंडयोः स्थिताम्|३८|| मुखच्छायाहरं बंगभस्म स्यान्महिषीजलैः ॥ गोमयस्य रसं सर्पिर्मातुलुंगं मनः शिला ॥ ३९ ॥ मुख... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७३३) कृतलेषं निहंत्याशु श्यामिकां गंडयोः स्थिताम्|३८|| मुखच्छायाहरं बंगभस्म स्यान्महिषीजलैः ॥ गोमयस्य रसं सर्पिर्मातुलुंगं मनः शिला ॥ ३९ ॥ मुखवर्णकरं श्रेष्ठं तिलकानां च नाशनम् ॥ उभे हरिद्रे मंजिष्ठा घृतं गौराश्च सर्षपाः ॥ ४० ॥ पेया गैरिक संयुक्ता हाजाक्षीरेण पाचिताः । एतेनैव भवेद्रक्रमुदयादित्यसंनिभम् ॥ ४१ ॥ आमलोंके चूर्णको गायके दूधमें पीसकर सेवन करानेसे गलेमें उत्पन्न हुए मांस अंकुर (अर्थात् मुँह आने पर उत्पन्न हुए छाले ) और गलेका अर्श रोग दूर होता है । एवं कुचला, सोंठ और हरड तीनोंको समभाग लेकर पानीमें पीसकर गोलियाँ बना लेवे । इनमेंसे एक २ गोली हरसमय मुखमें धारण करनेसे गलेके अंकुर नष्ट होते. हैं। सैंधे नमकको आकके पत्तोंके रसमें साव ७ बार भावना देवे, फिर आकके दूधमें मिलाकर उसका मुँहके ऊपर लेप करे तो गले के अंकुर दूर होते हैं । अथवा भिलावों के रसका गलेके बाहर लेप करके ऊपरसे चूना डरक कर पट्टी बाँध देवे । इससे गलेके भीतर और बाहर दोनों प्रकारके मांसांकुरके ( छाले ) शान्त होजाते हैं । जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल अरणीकी हरी लकडीते दन्तधावन करता है उसके दाँत वज्रके समान मजबूत होजाते हैं । और अरणीकी लकडीकी दत्तौन करके उसमेंसे निकले हुए तैल से जीभको खूब रग- डनेसे जीभकी भयंकर दुर्गन्ध दूर होती है। मुँहके पकजाने (अर्थात् मुँह में छाले पडजाने) पर उसको शान्त करने के लिये पर्पटी रसको शहद में मिलाकर सेवन करे अथवा निम्नलिखित औषधियोंके जल के कुल्ले करे या गोली मुखमें धारण करे । जलपीपल के चूर्णको चौगुने नींबू के रसमें और अदरखके रस में एक २ बार भावना देकर गोलियाँ<noinclude></noinclude> 5w9yynnn9qp1kpky74k6e83e1kkaigq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७७ 104 165760 418351 2026-09-05T10:38:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७५५) समान भाग लेकर गोमूत्रमें खरल करके मरहम बनालेवे । इस मरहमके लगानेसे अपची, ग्रन्थि, अर्बुद और श्लीपद आदि रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ १२७ ॥ इति श्री... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418351 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७५५) समान भाग लेकर गोमूत्रमें खरल करके मरहम बनालेवे । इस मरहमके लगानेसे अपची, ग्रन्थि, अर्बुद और श्लीपद आदि रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ १२७ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषादीकार्या चतुर्विंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २४ ॥ पंचविंशोऽध्यायः । क्षुद्ररोग | व्यंगः कच्छपनीलिका कुन व विद्धोत्कोठको ठालसैः कशारुद्धगुदप्रसुप्तिविवृताविस्फोटवल्मीकरुक् । विस्फः स्यात्कदराऽजगलिजतुमण्यंधालजीराजिकाः क्षुद्रा लांछन शर्करेति च यवप्रख्याऽग्रिरोहिण्यपि॥ जालाश्म गर्दभ विदारिमसूरिकाभिः सत्पद्मकंटक- रुजा सहगर्दभी च । स्याच्छर्करार्बुदमषाननदूषि- कैश्व गंडाह्वया पनसिका त्विरिवेल्लिका च ॥ २ ॥ व्यंग, कच्छप, नीलिका, कुनख, विद्ध, उत्कोठ, कोठ, अलस, कक्षार, रुद्धगुद, प्रसुप्ति, विवृता, विस्फोटक, वल्मीक, विस्फ, कदर अजगल्ली, जतुमणी, अन्नालजी, राजिका, क्षुद्रा, लाञ्छनशर्करा, यवप्रख्या, अग्निरोहिणी जाल, अश्मगर्दभक विदारी मसूरिका, पद्म- कंटक, गर्दभी, शर्करार्बुद, मषक, आननदूषिका, गंडाह्वया, पनसिका और इरिवेल्लिका, ये सब क्षुद्ररोग कहे जाते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ क्षुदरोग सामान्य उपाय । सर्पिषा निंबचूर्णेन प्रयुक्ता पर्पटी हरेत् । मसूरिकां क्षुद्ररोगानन्यानपि च दुस्तरान् ॥ ३ ॥<noinclude></noinclude> ppo9kg6j13cfg0w3vj1nc15w1twn1bw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९९ 104 165761 418352 2026-09-05T10:39:08Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७७७) ( १ ) जो विष कन्दमूल, फल आदिमें होता है तथा जिसमें से सरधके समान विष निकलता है, वह अत्यन्त उग्रवीर्यवाला होता है और स्थावर विष कहलाता है । सर्प, बि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७७७) ( १ ) जो विष कन्दमूल, फल आदिमें होता है तथा जिसमें से सरधके समान विष निकलता है, वह अत्यन्त उग्रवीर्यवाला होता है और स्थावर विष कहलाता है । सर्प, बिच्छू आदि जन्तुओं के विषको जंगम विष कहते हैं । उक्त विषको अनेक प्रकारके द्रवपदार्थोंमें मिलाकर जो विष तैयार किया जाता है वह कृत्रिम विष कहलाता है ॥ १०१ ॥ ( २ ) चौला- ईकी जडको या कपूर की जडको पानीमें पीसकर पिलानेसे स्थावर और जंगम दोनों प्रकारका विष नाश होता है । ( ३ ) शतावरीकी जड और पारेकी मरमको चावलोंके घोवनके पानी में या त्रिफलेके पानी में पीसकर . पान करनेसे अथवा बाबचीके चूर्णको गाय के गोबर के रसमें भावना देकर उसमें समान भाग पारेकी भस्म मिलाकर खरल कर लेवे । उस चूर्णको एक २ रती परिमाण सेवन करनेसे स्थावर जंगम और कृत्रिम तीनों प्रकारका विष नाशको प्राप्त होता है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ (४) अभ्रक, हरताल, सोनामाखी, शिलाजीत, मैनसिल, पारा और त्रिकुटा सबको समान भाग लेकर बंदालके रसमें घोटकर उबटनसा बनालेवे ! इसको शरीरपर मालिश करनेसे सच प्रकारका विविकार दूर होता है ॥ १०४॥ ( ५ ) शुद्ध पारेको चकवडके रसके साथ खरल करके पुढ पाक करे । जब पारा मूच्छित होजाय तब फिर पारेको चकवडके रसमें घोटकर गोलासा बनाकर पुटदैवे । पश्चात् उसको अण्डीके तेलमें मिलाकर योग्य मात्रासे सेवन करे तो मकडीका फलजाना और मक डीका विष दूर होता है ॥१०५॥ ( ६ ) नागदौनकी जडको पानी में पीसकर उसकी नस्य देनेसे महा भयंकर सर्पका विषम विषभी तत्काल उतर जाता है ॥१०६॥ ( ७ ) सिरसके पंचांगको जलमें पीसकर पान करनेसे शेषनागके द्वारा डसाहुआ भी मनुष्य विषके विकारसे मुक्त होजाता है अर्थात् उसका विष तुरन्त उत्तर जाता है ॥ १०७॥ ( ८ ) असगन्धके कन्दको अथवा बाँझककाडेकै कन्दको पानी में पीसकर<noinclude></noinclude> g6brpny8ljfn4coihxxcx377l6ghn79 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२२ 104 165762 418353 2026-09-05T10:39:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८०० ) रसरत्नसमुच्चयः । और गौका घी इन तीनों मिले हुए पदार्थोंमें एवं शहद और समान भाग मिश्रित सेमलकी जडके रस, दूध और गोरूके काथनें क्रमानु- सार एक २ दिन तक स्वेददेवे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418353 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८०० ) रसरत्नसमुच्चयः । और गौका घी इन तीनों मिले हुए पदार्थोंमें एवं शहद और समान भाग मिश्रित सेमलकी जडके रस, दूध और गोरूके काथनें क्रमानु- सार एक २ दिन तक स्वेददेवे । फिर खुच बारीक खरल करके उसको शीशी में भरकर रखदेवे । इसके पश्चात् खाँड, आमलोंका चूर्ण, दाख, मुसली और उडद इनके समान भाग मिश्रित बारीक चूर्णको और उक्त रसको समान भाग लेकर शहद में मिलाकर सेवन करना चाहिये । और ऊपरसे केला भक्षण करना चाहिये इसको कामदेव रस कहते हैं । इस रस के सेवन से ऊर्ध्वलित ( ऊपरको खडा हुआ है लिङ्ग जिसका ऐसा ) पुरुष सैकडों स्त्रियोंको द्रवित कर सकता है ॥९-११॥ मदन सुन्दर रस । गंधकेन रसः पिष्टः कल्हाररसमर्दितः । विपक्को वालुकायंत्रे वृष्यो मदनसुन्दरः ॥ १२ ॥ गन्धकके साथ समान भाग पारेको परिकर दोनोंकी कमली कर लेवे । उसको लाल कमलके रसमें घोटकर विधिपूर्वक बालुकायन्त्र में पकावे | और स्वांग शीतल होजानेपर बारीक चूर्ण करके सेवन करे । यह मदनसुन्दर रस अत्यन्त पौष्टिक है ॥ १२ ॥ पूर्णचन्द्र रस । कामदेव इह सोचटारो रक्तपुष्पमु निसार- भावितः । पूर्णचंद्र इति विश्रुतो रसः प्राणिनां चरमधातुपूरकः ॥ १३ ॥ रहस्यं कुसुमास्त्रस्य शृंगारस्याधिदैवतम् । कार्मणं सुदृशामूचे रसत्रयमिदं हरः ॥ १४ ॥ उपर्युक्त कामदेव रसको चोंटलीकी जड और लाल<noinclude></noinclude> s58m8085yxb8j9lecfw2ji75z8xstkz पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४६ 104 165763 418354 2026-09-05T10:40:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२४) रसरत्नसमुच्चयः । i मिले इसमें सौबार घोटकर १०० बार पुटदेवे तो यह व्योमरसायन : सिद्ध होती है । इस विधि से तैयार की हुई व्योमभस्म, सोनामाखी की भस्म, चादीका भस्म और... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418354 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८२४) रसरत्नसमुच्चयः । i मिले इसमें सौबार घोटकर १०० बार पुटदेवे तो यह व्योमरसायन : सिद्ध होती है । इस विधि से तैयार की हुई व्योमभस्म, सोनामाखी की भस्म, चादीका भस्म और ताँबेकी भस्म इन सबका समान भाग लेकर एकत्र मिलालेवे, फिर नीमके रस, लोधके रस, केवडे के रस, भाँगरके रस, केलके स्वरस, त्रिफलेके काय और भटेडरके रसके साथ क्रमपूर्वक सात २ बार भावना देकर छायामें सुखालेवे । इस प्रकार सिद्ध किये हुए इस कल्कने त्रिफलेका चूर्ण, रससिन्दूर, मिश्री, त्रिकुटेका चूर्ण और चीतेकी जडका चूर्ण ये प्रत्येक करना के समान भाग मिलाकर उत्तम प्रकारसे खरल करके शहद के संयोगसे चार २ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । इस महाकल्क नामसे प्रसिद्ध रसको अश्विनीकुमारोंने किया है । पहले चालीस दिनतक इसकी एक २ गोली सेवन करे । फिर ( ४० दिन के बाद ) ४० दिनतक दो दो गोली सेवन करे । तीसरी बार ४० दिनतक सीन २ गोली और चौथी बार ४० दिनतक चार २ गोली सेवनकरे । इस प्रकार इसकी एक गोली से लेकर ४ गोलीतक मात्रा बढाकर फिर नित्यप्रति १२ वर्ष तक चार गोली सेवन करने से मनुष्य जरा, मरण और सम्पूर्ण व्याधियोंसे निर्मुक्त होकर अत्यन्त दृढ शरीरवाला और प्रदीप्त अग्निवाला होता है । उसके भुक्त पदार्थों का उत्तम प्रकारसे पाचन होता है और वह भीम के समान बलवान्, अत्यन्त शोभायमान तथा पुत्र पौत्रादि सन्त- तिसे युक्त होता है । सब प्रकारसे आरोग्य, भीमके समान भुजाओं में पराक्रमी, सब प्रकार के भ्रमको सहन करनेवाला, शीत और धूपको सहन करने में समर्थ, कामदेव के मदसे उन्मत्त हुई प्रौढा खीके साथ रतिक्रीडामें आनन्द करनेवाला, और सम्पूर्ण दृढ इन्द्रियोंसे युक्त होकर वह मनुष्य ३०० वर्षतक जीवित रहता है। श्वास, खाँसी, क्षय, पाण्डु और आठ प्रकार के महारोगों को यह रस २० दिनमेंही शमन कर देता है, फिर ज्वरादि सामान्य रोगोंकी तो बातही क्या है । इस<noinclude></noinclude> q8iymapl9zd6rkrj4tob1uw98fueg5e पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६९ 104 165764 418355 2026-09-05T10:40:32Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । ( ८४७ ) सेवन करनेपर वमन या शूल हो तो पीपल के पत्तोंका काथ पान करना चाहिये । यदि उपर्युक्त विधिसे लोहरसायन सिद्ध न होसके तो सामा- अन्य विधिसे अर्थात् त... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषादीकोपेतः । ( ८४७ ) सेवन करनेपर वमन या शूल हो तो पीपल के पत्तोंका काथ पान करना चाहिये । यदि उपर्युक्त विधिसे लोहरसायन सिद्ध न होसके तो सामा- अन्य विधिसे अर्थात् त्रिफलेके काय और घृतके साथ भावना देकर और विधिपूर्वक पुटपाक करके सिद्ध करलेवे । इस प्रकार सिद्ध की हुई कान्तलोकी स्म अथवा केवल अभ्रककी भस्मको पूर्वोक्त विधिसे सेवन करनेपर भी वैसाही गुण होता है । इस कान्तलोह अथवा अन्न- कभस्म के सेवन करनेपर पीछेसे दूधका अनुपान करे, किन्तु उसीसे भोजन न करे । भोजन में मूँगका यूग और जलमें जल अथवा औटा करके शीतल किया हुआ जलपान करे। इस लोहरसायन नामक अष्ट- तको यथोक्त विधिसे सिद्ध करके जो मनुष्य प्रत्येक वर्षके प्रारम्भर्मे २१ दिन तक सेवन करे तो वह सुन्दर वर्ण और इन्द्रियोंकी शक्ति से सम्पन्न नव यौवन युक्त शरीरको प्राप्त होकर दीर्घायु प्राप्त करता है। और नव यौवनसे उन्नत स्तनोंवाली प्रौढा स्त्रियों का प्रिय होता है। मदो- न्मत्त हाथी के समान बलवान् और वृद्धावस्यासे रहित होकर वह मनुष्य पुत्र पौत्रादिकोंसे युक्त होता है || २३-५३ ॥ दन्त्यादिगण | दंतीत्रवृच्चित्रकहरितकर्णी व्योषाष्टवर्गत्रिफला विडंगम् | पलाशबीजाम्बुजजीरकेला व्यात्री इत्यादिरिह प्रदिष्टः ॥ ५४ ॥ दन्तीकी जड, निसोत, चीता, हस्तिकर्ण ( पलाशभेद ), त्रिकुटा, अष्टवर्ग (मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि वृद्धि) की औषधियाँ, त्रिफला वायविडंग, ढाकके बीज, कमल, जीरा, इलायची, कटेरी, मूषाकानी ये सब औषधियां दन्त्यादिगणमें कहीं गई हैं ।॥ ५४ ॥ ताम्रद्रुति । आर्द्रालकुचभृंगाणां रसपिष्टेन कस्यचित् ।<noinclude></noinclude> klbsctvetrafz0ftkr1qshlv03iaoqo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९१ 104 165765 418356 2026-09-05T10:40:55Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ } भावाडीकोपेतः । (८६९) षट्सप्ताष्टदिनेप्येवं नवमे वेदसंख्यया ॥ ४३ ॥ भक्षयद्वाजिकावृद्धया यावद्वंजामितं भवेत् । मासत्रयप्रयोगेण कुष्ठान्यष्ट हरेद्विषम् ॥ ४४... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418356 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>} भावाडीकोपेतः । (८६९) षट्सप्ताष्टदिनेप्येवं नवमे वेदसंख्यया ॥ ४३ ॥ भक्षयद्वाजिकावृद्धया यावद्वंजामितं भवेत् । मासत्रयप्रयोगेण कुष्ठान्यष्ट हरेद्विषम् ॥ ४४ ॥ पुण्डरीकं सविस्फोटं श्वेतमौदुंबरं तथा । छिन्नभिन्नं कपालाख्यं छिन्नाहं शवगंधि च ॥ कुष्ठानि गदितान्यष्ट हन्याद्देवि महाविषम् ||१५|| षण्मासस्य प्रयोगेण कामरूपो भवेन्नरः । संवत्सरप्रयोगेण सर्वरोगान्व्यपोहति ॥ द्विवत्सरप्रयोगेण दिष्यदेहो भवेन्नरः ॥ १६ ॥ हे देवि, आरोट नामक विषको अथवा शोषित मोठे तेलियेको कल्प की विधिसे सेवन करे । अर्थात् पहले दिन एक सरसों की बराबर फिर दूसरे दिनसे लेकर चौथे दिनतक दो दो सरसोंकी बराबर, पाँचवें दिन ३ सरसों भर और ६ ठे, ७ वें, ८ वें दिन भी तीन २ सरसाकी बराबर और नवें दिन ४ सरसोंकी बराबर विष सेवन करना चाहिये । इसके पश्चात् प्रतिदिन एक २ राईकी बराबर मात्रा बढाता हुआ सेवन करे। जब एक रत्तीभर की मात्रा होजाय तब फिर मात्रा न बढाकर हमेशा एक २ रत्ती परिमाण सेवन करे । इस प्रकार तीन महीनेतक विषको सेवन करने से आठों प्रकार के कुष्ठ नष्ट होते हैं। पुण्डरीक नामवालाकुष्ठ, फोडा, श्वेतकुष्ठ, औदुम्बर कुष्ठ, छिन्न भिन्न हुआ कुष्ठ, कमल नामक कुष्ठ, गलत्कुष्ठ और शवगन्धि कुष्ठ ये आठ प्रकार के कुष्ठ कहे गये हैं । हे देवि, इन सच कुष्ठों को यह विषका प्रयोग अवश्य नाश करता है । इसको ६ महीने तक सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् होजाता है । एक वर्षतक -प्रयोग करनेसे विष सम्पूर्ण रोगोंको दूर प्रयोगसे वह मनुष्य दिव्यदेहधारी होता है करता है और दो वर्षके ॥ ४२-४६ ॥<noinclude></noinclude> fsnftcof9i80lqfvo1g54p5i4l8nptf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१४ 104 165766 418357 2026-09-05T10:41:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८९१ ) रसरत्नसमुचयः । त्वचा का विकार अर्थात् त्वचाका फटना और तमतमाना, दूसरे शरीर का काँपना, तीसरे वेगमें दाह होना, चौथे वेगमें आँख, कान आदि इन्द्रियों में विकार होन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418357 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८९१ ) रसरत्नसमुचयः । त्वचा का विकार अर्थात् त्वचाका फटना और तमतमाना, दूसरे शरीर का काँपना, तीसरे वेगमें दाह होना, चौथे वेगमें आँख, कान आदि इन्द्रियों में विकार होना, पांचवें वेगमें मुँह मेंसे झागका निकलना, छठे वेगमें कन्धों का टूटना, सातवें वेगमें इन्द्रियोंमें जडता और आठवें वेगमें होनेपर मृत्यु हो जाती है । हे शुभानने, इस प्रकार विषके विकारोंको जानकर तदनुसार उसका प्रतीकार करना चाहिये । प्रथम जबतक पित्त निकले तबतक नमन करावे | फिर सम्पूर्ण आमके निकलने तक विरेचन (दस्त) करावे । एवं विधारिंगणकी औषधियों के कायको पान करावे अथवा उस काथके साथ घृतको सिद्ध करके सेवन करावे । चमेलीकी जड़, नीलष्टक्षकी जड़, शिवलिङ्गी, सेंधानमक मकोय, विष्णुक्रान्ता, त्रिफला, कनेर, कूठ, मुलैठी, जीरा, दूधवाले वृक्षोंकी छाल और इलायची इन औषधियोंके समूहको विचारीगण : कहते हैं । हे देवि ! यह विषारीगण गोघृत के साथ मिलाकर प्रयोग करनेसे विषके सब उपद्रवोंको दूर करके मनुष्य को मांगलिक जीवन प्रदान करता है । विषपरपथ्य | प्रथम असगन्ध, गोजिया, त्रिशूली घास और त्रिफला इनके समानभाग चूर्णको भक्षण करके फिर दिनको सेवन करे । और ठीक है विष सेवन करते समय ब्रह्मचर्यव्रत को अवश्य पालन करे तथा स्वस्थ चित्तसे रहता हुआ पथ्य पदार्थों का सेवन करे तो मनुष्य अवश्य सिद्धिको प्राप्त होता हैं । इस पर गौका घी, दूध शाली धानों के चावल आदि हलके पदार्थों का आहार और शीतल जलका पान करना चाहिये और पित्तकारक पदार्थोंका सर्वथा त्याग देना चाहिये । तथा जंगली पशुओंका मांस, बकरीका रुधिर, मद्गुर नामक मछली, खांड, शहद, दूध ये सब पदार्थ यत्नपूर्वक सेवन करने चाहिये । हे देवि, इसपर सदैव पथ्यपदा-<noinclude></noinclude> cuc9nz001ma5hxhq7u22jh48tdvbb9m पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३८ 104 165767 418358 2026-09-05T10:41:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ९१६ ) रसरत्नसमुच्चयः । अष्टभागावशिष्टं वा गोमूत्रं सैंधवान्वितम् ॥ १०२ ॥ यत्क्षेत्रीकरणं पूर्व वेधकं च रसं ततः ॥ १०३ ॥ सेवेत तस्य सिद्धिः स्यादन्यथा मरणं ध्रु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418358 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९१६ ) रसरत्नसमुच्चयः । अष्टभागावशिष्टं वा गोमूत्रं सैंधवान्वितम् ॥ १०२ ॥ यत्क्षेत्रीकरणं पूर्व वेधकं च रसं ततः ॥ १०३ ॥ सेवेत तस्य सिद्धिः स्यादन्यथा मरणं ध्रुवम् ॥ १०४ ॥ (३६) बकूलके और नीमके कोमलपत्ते, बकरेकी विष्ठा, घरका धुआँ, कासेकी भस्म, ईखका रस, मैनसिल और भिलावोंके सूत्र के द्वारा धूपित की हुई रसीय इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट- पीस करके खीके दूधमें घोटकर अञ्जन बनालेवे इस अञ्जनको नेत्रों में आँजते समय नेत्रोंके लिये हितकारी पदार्थोंका आहार करे और नित्य त्रिफलेके जलसे नेत्रोंको धोवे तो नेत्रसम्बन्धी सब रोग नष्ट होते हैं । (३७) बच, असगन्ध, हिंगुपत्री, समुद्रफेन, कमल और पारा इन सबको नींबू के रस में घोटकर सुखालेवे । फिर बारीक चूर्ण करके नेत्रोंमें आँजे तो नेत्रोंका तिमिररोग और मोतिया बिन्द रोग दूर होता है । (३८) नागरमोथा और तलवन के पत्ते दोनोंको जलमें पीस- कर रस निकाल लेवे | उस रसके साथ तेलको सिद्ध करके उसको नेत्रोंपर लेप करनेसे अनेक प्रकारकी नेत्रोंकी जडता और अर्शरोग दूर होता है । (३९) त्रिफला, पटोल (परवल) की जड, त्रिकुटा, गिलोय वायविडङ्गके बीज और पारेकी भस्म ये प्रत्येक समान भाग और सबकी बराबर शुद्ध गूगल लेकर सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके सेवन करनेसे सब प्रकारके व्रण और रक्त विकार शमन होते हैं तथा इन औषधियोंकी जडके रसमें गूगलको पीसकर लेप करनेसे ग्रन्थियाँ (गांठ) बैठ जाती हैं। (४०) नारियल के जलके साथ उक्त गुगलको सेवन करने से मसूरिकाररोग नष्ट होता है । (४१) मंजीठ सफेद लोध, फटकरी, लाख, हल्दी, दारूहल्दी, मैनसिल, हरताल, केसर, कूठ, गोरो- चन, गेरू, बडके पके हुए पीले पत्ते, चन्दन, लाल चन्दन, काली अगर, पारेकी भस्भ, पतंग, धतूरेकी छाल, कमलकी डंडी, कमलके, बीज कमलकी केसर, मोम, तूतिया, लोहेकी कीट, चर्बी, घी,<noinclude></noinclude> 99hbdcxsyqbh46lx558rv02gja14apm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७११ 104 165768 418359 2026-09-05T10:42:11Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८९ ) कल्कके साथ तेलको पकाकर उसकी मालिश करे । इस तेलसे प्रसूत सम्बन्धी सब रोग दूर होते हैं । निर्गुण्डीके पत्तों का स्वरस और पुराना गुड दोनोंको कु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418359 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ६८९ ) कल्कके साथ तेलको पकाकर उसकी मालिश करे । इस तेलसे प्रसूत सम्बन्धी सब रोग दूर होते हैं । निर्गुण्डीके पत्तों का स्वरस और पुराना गुड दोनोंको कुमार्यासव अथवा द्राक्षासन के साथ सेवन करनेसे और छाछ भातका आहार करनेसे प्रसूता स्त्रीका योनिशूलरोग नष्ट होता है । करेलेको पानीमें पीसकर योनिपर लेप करनेसे योनि कन्द रोग दूर होता है और बाहरको निःसृत योनि पुनः भीतरको प्रविष्ट होजाती है । एवं बीटीको घृतमें पीसकर लेप करनेसे शिथिल हुई योनि फिर हट होजाती है। मार्कन्दकी जड और कपूरको शहद में पीसकर योनिमें लेप करनेसे वृद्धा स्त्री की योनिभी संकुचित होकर कन्या के योनिके समान होजाती है । श्रीपर्णी (कायफल ) के हाथ और कल्कके साथ तिलके तेलको पकाकर वह तेल रुई की फुरैरीसे स्तनोंके ऊपर लगावे | इस तेलसे स्त्रियोंके अत्यन्त शिथिल स्तनभी उत्पन्न होकर हाथीके गण्ड स्थल के समान सुन्दर, ऊंचे, कठिन और गोलाकार होजाते हैं ।। ११८-१२५ ॥ वालरोग | माहेश्वर धूप । श्रीवेष्टदारुवालीकमुस्त कटुकरोहिणी । सर्पपा निंबपत्राणि मदनस्य फलं वचा ॥ १२६॥ वृहत् सर्पनिक कार्पासास्थियवास्तुषाः । hi खररोमाणि बर्हिपिच्छं बिडालविट् ॥ १२७॥ छागरोमघृतं चेति बस्तमूत्रेण भावितम् । एष माहेश्वरो धूपः सर्वग्रहनिवारणः ॥ १२८ ॥ लोवान, देवदारु, हींग, नागरमोथा, कुटकी, सरसों, नमिके पत्ते, मैनफल, वच, कटेरी, बडी कटेरी, साँपकी कैंचली, बिनौले, जौकी भूसी १ अ म्रवृक्ष ।<noinclude></noinclude> a4umuo6gnof9jqcmqljoxlt5cmpuvk5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३४ 104 165769 418360 2026-09-05T10:42:41Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । गरुडाञ्जन । कतक सैंधव तुत्थरसांजनं त्रिकटुकस्फटि- काब्दवराटकम् । त्रिपटुताम्रमयो हिम- रोहिणी जलधिफेनवचानुकरोटिका ॥४५॥ उरगपारदटंकणमञ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418360 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । गरुडाञ्जन । कतक सैंधव तुत्थरसांजनं त्रिकटुकस्फटि- काब्दवराटकम् । त्रिपटुताम्रमयो हिम- रोहिणी जलधिफेनवचानुकरोटिका ॥४५॥ उरगपारदटंकणमञ्जनं त्रिफल्या मधुकेन च संयुतम् । करजवल्करसेन सुपेषितं roseष्टिसमां कुरुते दृशम् ॥४६॥ निर्मली, सैंधानमक, तूतिया, रसौत, त्रिकुटा, फटकरी, नागरमोथा, कौडी, समुद्रनमक, कचियानमक, विरियासंचर नमक, ताँबे की भस्म, लोहभस्म, कपूर, मांसरोहिणी के बीज, समुद्रफेन, वच, मनुष्यकी खोपडीकी हड्डी, सीसेकी भस्म, पारा, सुहागा, सुरमा, त्रिफला और मुलैठी इन सबको समान भाग लेकर एकत्र बारीक चूर्ण करके कप- छान करलेवे । फिर इस चूर्णको करंजकी छालके काढेमें खरल करके सुखालेवे, फिर बारीक पीसकर रखदेवे | इसको गरुडाञ्जन कहते हैं । यह अञ्जन प्रतिदिन नेत्रोंमें आँजनसे नेत्रके सब रोगोंको दूर कर दृष्टिशक्तिको गरुडकी दृष्टिके समान तीव्र करदेता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ तिमिरहराचन । रभुजग तुल्यौ ताभ्यां द्विगुणमंजनम् । ईषत्कर्पूर संयुक्त मंजनं तिमिरापहम् ॥४७॥ पारा १ भाग, सीसा १ भाग और सुरमा २ भाग लेवे प्रथम सीसेको और पारेको एकत्र खरल करे, फिर उसमें सुरमा डालकर तीन दिन तक खुब घोटे । चौथे दिन उसमें थोडा- सा कपूर मिलाकर शीशीमें भरकरके रखदेवे । यह अंजना<noinclude></noinclude> 6uhtqkcp5od4ue2vnzmuulnallo2xqr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५६ 104 165770 418361 2026-09-05T10:43:14Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ७३४) बनालेवे । इन गोलियोंको मुँह में डालकर रस चूसनेसे मुखशोषरोग नष्ट होता है। सफेद पुनर्नवाकी जड और सरहटीकी जडको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418361 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ७३४) बनालेवे । इन गोलियोंको मुँह में डालकर रस चूसनेसे मुखशोषरोग नष्ट होता है। सफेद पुनर्नवाकी जड और सरहटीकी जडको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके उसका उबटन करनेसे स्त्रियों के मुखकी शाई (छीप) दूर होती है । हल्दी और लाल चन्दनको भैंस के दूधमें पीसकर लेप करनेसे गालोंकी कालिमा शीघ्र दूर होती है । बंगम- स्मको भैंस के मूत्रमें पीसकर प्रलेप करनेसे मुँहकी झाई, छीप आदि दूर होती है । गोबरका रस, घी, बिजौरे नींबू का रस और मैनसि- लका चूर्ण सबको समभाग लेकर एकत्र मिश्रित करके मालिश करने से मुखका वर्ण अत्यन्त उज्ज्वल होता है और काले २ दाग तिल आदि सच नष्ट हो जाते हैं। हल्दी, दारूहल्दी, मंजीठ, घृत, सफेद सरसों और गेरू सबको बकरीके दूध में पीसकर गरम करके मुँह पर मालिश करनेसे मुख सूर्योदय के समान कान्तिमान होता है ॥ ३३–४१ ॥ गोमूत्रैःक्काथयेत्कुष्ठं बालकं सहरीतकम् । पिट्वा सर्व वटीं कुर्यान्मुखदौगंध्यनाशिनीम् ॥४२॥ गृहधूमारनालेन काथं समधु सैंधवम् । गोमयैःकाथिता पथ्या मिशी कृष्णा कणान्विता४३ वदनस्य दुरामोदं निहंति परिशीलीता । लाजा जातीफलं पूगं तुल्यं भक्ष्यं पिबेदनु ||१४|| शीततोयं पलार्ध च आस्यवैरस्य शांतये । निर्गुडीमुत्पलं कंदं चर्वयेदुपजिह्वके ॥ ४५ ॥ ताम्रपात्रे क्षणं पाच्यमभयाचूर्णकं मधु । करेण गुटिका कार्यादेतैर्धार्या कृमीन् हरेत् ॥ ४६ ॥ कासीसं हिंगु सौराष्ट्री देवदारु समं जलैः ।<noinclude></noinclude> nx7hkpg3l4gqorn6k9pn49l9vk00gq6 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७८ 104 165771 418362 2026-09-05T10:43:42Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । तत्कालशस्त्र प्रहतः शशो यस्तस्याऽसृजा नश्यति लिप्यमानम् । व्यंगं मुखे जातिफलस्य बाह्यत्वचाऽथवा संततमेव लिप्तम् ॥ ४ ॥ इंगुदी फल समुद्भ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418362 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । तत्कालशस्त्र प्रहतः शशो यस्तस्याऽसृजा नश्यति लिप्यमानम् । व्यंगं मुखे जातिफलस्य बाह्यत्वचाऽथवा संततमेव लिप्तम् ॥ ४ ॥ इंगुदी फल समुद्भवमज्जा पेशिताऽतिशिशिरेण जलेन । एकविंशतिदिनप्रविलिप्ता व्यंगमाननभवं परिमार्ष्टि ॥ ५ ॥ उद्धृत्य कुनखं क्षीरं शुक्पर्णीटंकणं समम् । सम्यङ् निरुद्धदाहं च मूले कृत्वा नखी भवेत् ॥६॥ व्रणपूतिपूयजुष्टं नखविवरं मंक्षु रोपयत्यथया । नानाविधैः किमेतेरास्फोता रविकुण्टकक्षीरैः ॥ ७ ॥ सकुष्ठ जीरकं तोयैः पिट्टा लेपेन नाशयेत् । पुत्रजीवस्य वा मज्जा तोयैः पिट्वा प्रलेपयेत् ॥ ८ ॥ शिशुमूलं निशातोयैः कक्षाग्रंथिहरं लिपेत् । विषं पुनर्नवामूलं जललेपेन तं जयेत् ॥ ९ ॥ सर्वेषां स्तनरोगाणां रक्तमोक्षः प्रशस्यते । पूयपकः स्तनो यः स्याछेपस्तस्थावपाटने ॥ १० ॥ एकवीरस्य मूलं तु अजासूत्रेण लेपयेत् । तत्क्षणात्स्फुटते पक्षं शस्त्रैर्वा स्फोटयेद्भिषक् ॥११॥ यष्टीनिंबहरिद्राश्च निर्गुडी धातकी समम् । चूर्ण स्तनत्रणे देयं रोपणं कुरुते हितम् ॥ १२ ॥ मध्वाज्यैर्देवदारुं च पिष्ट्वा वर्ति प्रकल्पयेत् । पूयपक्व स्तने क्षिप्त्वा रोपणं कुरुते क्षणात् ॥ १३॥<noinclude></noinclude> 9pqk5zw9vdl10yg8tv2bdbuxw4rqmu9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०० 104 165772 418363 2026-09-05T10:44:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७७८) रसरत्नसमुच्चयः । पनिसे स्थावर या जंगम सच प्रकारका विष मनुष्यके शरीरसे बाहर निकल जाता है ॥ १०९ ॥ व्योषैरण्डस्रावपक्वं तु तैलं लेपायोक्तं वृथ्विकानां सदैव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418363 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७७८) रसरत्नसमुच्चयः । पनिसे स्थावर या जंगम सच प्रकारका विष मनुष्यके शरीरसे बाहर निकल जाता है ॥ १०९ ॥ व्योषैरण्डस्रावपक्वं तु तैलं लेपायोक्तं वृथ्विकानां सदैव ॥ ११० ॥ ससिंदुवारतगरं मृतं संजीवनं विषम् । शिरीषकुसुमं पत्रं विषमाखु विषापहम् ॥ १११ ॥ देवदारु नतं मांसी हामिली बाकुची विषम् । कुष्ठं च पानलेपाभ्यां समस्तविषनाशनम् ११२ ॥ सर्पादिविषनाशाय टंकणस्य रजोऽम्भसा । पानाभ्यञ्जननस्याद्यैरतिमुह्योपदंशिना ॥११३॥ मनोहा सैंधवं हिंशुमालतीपल्लवानि च । गोशकृद्रसषिष्टानि गुलिका वृश्विकापहा ॥ ११४॥ अर्कस्नूहीपयसा ब्रह्मतरोर्भावितैर्मुहुर्बीजैः । गुलिकाकृताप्रयत्नादवृश्चिकविषमाशुनाशयति ११५ कनकसारसुतीक्ष्णनिदिग्धिकाह पुष सिद्ध- कलांशनिषेवणात् । जयति साधु युवा धन - कांक्षया गणिकया परिदत्तगरौषधम् ॥ ११६ ॥ पुराणवृक्षाम्लयुतं कटुवयं नरेण युक्तं त्वश- नावसाने । असारवृत्ताबलयाऽर्थक क्षिया सहान्नदत्तं विषमाशु नाशयेत् ॥११७॥ / ( ९ ) त्रिकुटा ( सोंठ, मिरच, पीपल) और अण्डके बीजोंकी गिरी दोनों को समान भाग लेकर एकत्र क्वाथ करलेवे। उस कायमें<noinclude></noinclude> m0q5tgmhuli2enu9f93egnrmfh4l4m3 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२३ 104 165773 418364 2026-09-05T10:44:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ "भाषration: 1 ( ८०१ ) फूलकी अगस्तियाके रसमें एक एक बार भावना देनेसे उसीको पूर्ण चन्द्ररस कहते हैं । यह रस मनुष्योंकी शुक्रधातुको पूर्ण करनेवाला हैं और कामदेवका रहस्य तथ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418364 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>"भाषration: 1 ( ८०१ ) फूलकी अगस्तियाके रसमें एक एक बार भावना देनेसे उसीको पूर्ण चन्द्ररस कहते हैं । यह रस मनुष्योंकी शुक्रधातुको पूर्ण करनेवाला हैं और कामदेवका रहस्य तथा शृङ्गार रसका अधिष्ठातृ देवता कहा जाता' है । सुन्दर नेत्रवाली स्त्रियाँको वशीभूत करनेवाले इन उपर्युक्त तीनों रसोंको श्रीमहादेवजीने वर्णन किया है ॥ १३-१४ ॥ मदन मुन्मद्रस | मासार्धमा हरजं विमर्द्य रसेन मोचस्थ रसेन तेन । त्रिःसप्तसंख्यानि दिनानि गंधं तत्सम्मितं गोघृतमध्यपकम् ॥ १५ ॥ विभाव्य तेनैव विशोष्य युंज्यात्काचस्थयोर्ना - गलतादलेन । तयोर्विमद्यथ निषेव्यदुग्धं पिबे- निशायां कदलीफलं तत् ॥१६॥ मदनं मदयन्मदमुज्ज्वलयन्प्रमदानिवहान तिविह्न- लयन् । सुरतैः सुखदैर्गतविच्यवनैर्भवसारजुषा- मयमेव सुहृत् ॥ १७ ॥ पारेको १५ दिनतक मोचरस (सेमलका गोंद ) के रसमें घोटकर उसमें गोघृतमें शुद्ध की हुई समानभाग गन्धक मिलाकर फिर २१ दिन तक मोचरसके रस में खरल करके सुखालेवें । इसके पश्चात् दोनोंको काँच के बर्त्तनमें भरकर नागरबेलके पान के इसके साथ एक दिनतक घोटकर सुखालेवे । फिर उस रसको रात्रिमें यथोचित मात्रासे सेवन करके ऊपर से दुग्धपान करे और केला भक्षण करे। यह रस कामदेवको उत्तेजित करता है । कामदेवके मदको प्रकाशित करता है और सैकडों खियोंको अत्यन्त विह्वल करता है । अस्खलित वीर्यवाले और सुखोल्पा- दक सम्भोगके द्वारा सांसारिक आनन्दको प्राप्त करने की इच्छावाले मनुष्यों को तो यह रस सन्मित्रके समान है । १५-१७ ॥ २८<noinclude></noinclude> 6ho7fzix671vo4foehao6dnfvw4jd3o 418365 418364 2026-09-05T10:45:17Z Bnarayanan V 10460 418365 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>"भाष ( ८०१ ) फूलकी अगस्तियाके रसमें एक एक बार भावना देनेसे उसीको पूर्ण चन्द्ररस कहते हैं । यह रस मनुष्योंकी शुक्रधातुको पूर्ण करनेवाला हैं और कामदेवका रहस्य तथा शृङ्गार रसका अधिष्ठातृ देवता कहा जाता' है । सुन्दर नेत्रवाली स्त्रियाँको वशीभूत करनेवाले इन उपर्युक्त तीनों रसोंको श्रीमहादेवजीने वर्णन किया है ॥ १३-१४ ॥ मदन मुन्मद्रस | मासार्धमा हरजं विमर्द्य रसेन मोचस्थ रसेन तेन । त्रिःसप्तसंख्यानि दिनानि गंधं तत्सम्मितं गोघृतमध्यपकम् ॥ १५ ॥ विभाव्य तेनैव विशोष्य युंज्यात्काचस्थयोर्ना - गलतादलेन । तयोर्विमद्यथ निषेव्यदुग्धं पिबे- निशायां कदलीफलं तत् ॥१६॥ मदनं मदयन्मदमुज्ज्वलयन्प्रमदानिवहान तिविह्न- लयन् । सुरतैः सुखदैर्गतविच्यवनैर्भवसारजुषा- मयमेव सुहृत् ॥ १७ ॥ पारेको १५ दिनतक मोचरस (सेमलका गोंद ) के रसमें घोटकर उसमें गोघृतमें शुद्ध की हुई समानभाग गन्धक मिलाकर फिर २१ दिन तक मोचरसके रस में खरल करके सुखालेवें । इसके पश्चात् दोनोंको काँच के बर्त्तनमें भरकर नागरबेलके पान के इसके साथ एक दिनतक घोटकर सुखालेवे । फिर उस रसको रात्रिमें यथोचित मात्रासे सेवन करके ऊपर से दुग्धपान करे और केला भक्षण करे। यह रस कामदेवको उत्तेजित करता है । कामदेवके मदको प्रकाशित करता है और सैकडों खियोंको अत्यन्त विह्वल करता है । अस्खलित वीर्यवाले और सुखोल्पा- दक सम्भोगके द्वारा सांसारिक आनन्दको प्राप्त करने की इच्छावाले मनुष्यों को तो यह रस सन्मित्रके समान है । १५-१७ ॥ २८<noinclude></noinclude> iiwqvk6li0c8t4eczdh2qvf5cwvpwc2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४७ 104 165774 418366 2026-09-05T10:45:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८१५) रसायन के सेवन करनेपर समस्त गोरसोंसे युक्त अर्थात् गोदुग्ध, घृत, दही, माखन, छाछ आदि पदार्थोंके साथ पथ्य पदार्थों का आहार करना चाहिये और रोगके अ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418366 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (८१५) रसायन के सेवन करनेपर समस्त गोरसोंसे युक्त अर्थात् गोदुग्ध, घृत, दही, माखन, छाछ आदि पदार्थोंके साथ पथ्य पदार्थों का आहार करना चाहिये और रोगके अनुकूल अन्यान्य पदार्थभी रोगीको सेवन करावे संसार सुखकी इच्छा करनेवाले तथा सुखपूर्वक जीवन व्य- नीत करने की इच्छावाले मनुष्यों को गुणोंमें दिव्य अमृतके समान यह रस नित्य सेवन करना चाहिये ॥ १००-११५ ॥ मदनमोदक | त्रैलोक्यविजया पत्रं घृतेनाभर्जितं कियत् । त्रिकटु त्रिफला मुस्ता कुष्ठसैंधवधान्यकम् ॥ ११६॥ शठी तालीसपत्रं च कट्फलं नागकेशरम् । अजमोदा यवानी च यष्टी मधुकमेत्र च ॥ ११७॥ मेथी जीरकयुग्मं च सबीजं भर्जितं तथा । यावन्त्येतानि चूर्णानि तावदेव तदौषधम् ॥ ११८ ॥ तावत्येव सिता ग्राह्या यावत्या याति बन्धनम् । घृतेन मधुना युक्तं मोदकं परिकल्पयेत् ॥ ११९ ॥ त्रिसुगंधसमायुक्तं कर्पूरेणापि वासयेत् । स्थापयेदधृत भाण्डे च श्रीमन्मदन मोदकान् ॥ १२० ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय वातश्लेष्म विनाशनम् । कासेनं सर्वशूलघ्नं वलीपलितनाशनम् ॥ १२१ ॥ आमवात विकारनं संग्रहग्रहणीहरम् । सदा निषेवयेद्धीमान् रुच्यमग्निविवर्धनम् ॥ १२२ ॥ एतत्कामविवृद्धयर्थं नारदेन प्रकीर्तितम् । तेन स्त्रीणां सहस्राणि रेमे स यदुनंदनः ॥ १२३ ॥<noinclude></noinclude> nf0y855dd4a00fnvs9qhzwr60hog9n7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७० 104 165775 418367 2026-09-05T10:46:29Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधकेन समांशेन प्राग्वत्तानं च मारितम् ॥५५॥ कञ्चुकथमिह त्रिंशत्कर्ष चूर्णितगंधकम् ॥ ५६ ॥ दत्त्वाऽल्पशोऽग्निनाऽल्पेन दत्त्वा धूमं वि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418367 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधकेन समांशेन प्राग्वत्तानं च मारितम् ॥५५॥ कञ्चुकथमिह त्रिंशत्कर्ष चूर्णितगंधकम् ॥ ५६ ॥ दत्त्वाऽल्पशोऽग्निनाऽल्पेन दत्त्वा धूमं विवर्जयेत । प्रस्थाम्बुमर्दितस्यास्य प्रसादानिःसृतं युतम् ॥ ५७॥ तुत्थनीलशिलाज्याभ्यां कर्षाशाभ्यां विशोधयेत् । ताम्रद्रुतिरियं साज्यमानुषीतीरमाक्षिका ॥ ५८ ॥ काचार्म पिल्लाभिष्यंदवणशुक्रगतिप्रणुत । तत्किहं बहु किटिमपामादीलेपनाज्जयेत् ॥ ५९ ॥ अदरख, बडहल और गांगरा इन तीनोंसे किसी एकके रसमें गन्धकको घोटकर समान भाग बाँबेके पन्नोंपर लेप करके पूर्ववत् सान भस्म कर लेवे । इस ताम्र भस्मको ३० कर्प लेकर के एक लोहेकी कड़ा- ईमें डाले उसको मन्द मन्द अभि देवे और उस कढाई बुद्ध गन्ध- का थोडा २ चूर्ण डालकर ढकदेने और बीच १ में उसके घुर्वेको निकालता जाय । इस प्रकार ३० वर्ष गन्धकको जारण करके या उसको मनिले नोचे उतारकर उसमें १ प्रस्थ जल डालकर खूब मर्दन करे । जब वह फूल जाय तब उसके पानीको निवारदेने | फिर उसमें नीलाथोथा और शिलाजीत में प्रत्येक एक. १ तोला बिठाकर सा इके रसमें खरल करके धूपमें सुखालेवे । सब ताँबेकी हुांते होगाय तम उसको शीशीमें भरकर रखदेवे । यह वाचति, घी, सीका दूध और शहदके साथ मिलाकर नेत्रोंमें ऑजनेसे मोतियाविन्द, अर्थ, पिल, अभिष्यन्द, नेत्रव्रण, नेत्रयुक्र, नेप्रगति आदि नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करती है । इस साम्रदुतिको बनाते हुए जो मैल निक लता है, वह मैल लेप करनेसे दाद, फिटिक्कृष्ट और खुजली आदि त्वचा विकारोको दूर करती है ।। ५५-५९ ।।<noinclude></noinclude> 3yd2v0pb5r5zlvojvp3dse29vh3v7pf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९२ 104 165776 418368 2026-09-05T10:46:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८७०) रसरत्नसमुच्चयः । विष के सामान्य प्रयोग । ४९ ॥ अथ गोमूत्रसंयुक्तमातपे शोषयेत्र्यहम् । विषं बृंहणमेतद्धि विषस्यादौ प्रशस्यते ॥ १७ ॥ तत्पिबेन्मस्तुना वातज... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418368 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८७०) रसरत्नसमुच्चयः । विष के सामान्य प्रयोग । ४९ ॥ अथ गोमूत्रसंयुक्तमातपे शोषयेत्र्यहम् । विषं बृंहणमेतद्धि विषस्यादौ प्रशस्यते ॥ १७ ॥ तत्पिबेन्मस्तुना वातज्वरे क्षीरेण पित्तजे । अजामुत्रेण कफजे सर्वजे त्रिफलाम्भसा ॥ ४८ ॥ रोधचंदन षड्यंथा शर्करा घृतमाक्षिकैः । क्षीरेण च विषं युक्तं जीर्णज्वरहरं परम् ॥ निकुंभ कुभत्रिफला सर्पिर्मधु विषैः कृतः । निर्हति मोदको जीर्णज्वरमेहत्वगामयान् ॥ ५० ॥ शिखिकणिरसोपेतं विषमज्वर जिद्विषम् ॥ ५१ ॥ विषं यष्टयाह्वयं रास्ना सेव्यमुत्पलमन्दकम् । तंदुलोदकपीतानि रक्तपित्तस्य भेषजम् ॥ ५२ ॥ रानावि डंगत्रिफला देवदारुकटुत्रयम् । पद्मकं क्षौद्रममृताविषं च श्वासकासजित् ॥ ९३ ॥ सितारस विषाक्षीरप्रवालमधुकान्विता । श्वासहिष्मापहा लीढाश्छर्दिशास्तु विषान्विताः ५४ क्षीरोशीरमधुक्षाररजनी कुटजत्वचः । च्यवनप्राशनोपेत विषं क्षपयति क्षयम् ॥ ५६ ॥ मुस्तावत्सक पाठाग्निव्योषप्रतिविषाविषम् । धातकीमोचनिर्यासं चतास्थि ग्रहणीहरम् ॥ ५६ ॥ कृच्छ्रघ्नं विषपथ्यानिदंती द्राक्षा निशा वृषा । शिलाजतु विषं त्र्यूषमुदावर्ताश्मरीहरम् ॥ ५७ ॥<noinclude></noinclude> ctzh5r76br3hw489nehhwt8xnf009oi पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१५ 104 165777 418369 2026-09-05T10:47:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८९३) थका सेवन और अपथ्य पदार्थोंको दूरसेही त्याग देना चाहिये । सक्तक, मुस्तक, शृगिक, बालुक, सर्वपक और वत्सनाभ इनमेंसे किसी विषको जब वह पूर्णरूपसे प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418369 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८९३) थका सेवन और अपथ्य पदार्थोंको दूरसेही त्याग देना चाहिये । सक्तक, मुस्तक, शृगिक, बालुक, सर्वपक और वत्सनाभ इनमेंसे किसी विषको जब वह पूर्णरूपसे पकजाय तब उस नवीन स्निग्ध गाढे और भारी ( वजनदार ) विषको लाकर सेवन करना चाहिये । तथा जो विषनाशक पदार्थोंके द्वारा गुणहीन न हुआ हो और वायु अथवा धूपके द्वारा सूखकर हीन वीर्य न हुआ हो ऐसे विषको सेवन करना चाहिये । विषको सेवन करने से पहले उसको राईके तेलमें भिजोकर कपडे में बाँधकरके तीन दिनतक रक्खा रहने देवें । फिर गोमूत्रमें शुद्ध करके सेवन करे | सक्नुक, मुस्तक, शृगी, बालक, सर्षपक, वत्सनाभ, काल- कूटादि विषको सेवन करते समय और कोई विषैला पदार्थ कदापि प्रयोग नहीं करना चाहिये । तीक्ष्ण विषका उपयोग करनेपर अथवा विषकी मात्रा अधिक होजानेपर निरन्तर घृतपान करना चाहिये । एवं भारंगी, दही, बडके अङ्कुर, जड, सारिवा, चौलाईका शाक, घरका धुआँ, मंजीठ और मुलैठी इन सबके समान भाग चूर्णको शहद और घृतमें मिलाकर सेवन करे अथवा अर्जुनवृक्षकी छालके चूर्ण को शहद और घृतके साथ मिलाकर भक्षण करे या चौलाईके रसमें सुहागा पीसकर पान करे किंवा अरणीके पत्तोंके चूर्ण को शहदमें मिलाकर सेवन करे । विषके उपद्रव अधिक बढनेपर मूल विषको योग्य मात्रासे व्यवहार करे तो विष विषको उतार देता है । मात्रा बढाकर किसी शत्रुके द्वारा दिया हुआ विष अथवा सर्पके काटनेसे चढा हुआ विष जब मन्त्र तन्त्र आदि उपायोंके द्वारा न उतरे तब पाँचवे वेगळे व्यतीत होजानेपर सातवें बेगका आक्रमण होनेसे पहले मूलविषको पान करावे और उसीका प्रलेप करे तो रोगी आरोग्य होजाता है। चार जोकी मात्रा हीन, ६ जौकी मध्यम और ८ जौकी बराबर मात्रा उत्तम हो. ती है। मूल (कन्द ) विषकी मात्राको सदैव इन्हीं मात्राओंके अनु- सार प्रयोग करना चाहिये । कानखजूरा आदि जन्तुओंसे काटे हुए<noinclude></noinclude> c0awutnscqidsf4km9n4diyp8eg6bev पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३९ 104 165778 418370 2026-09-05T10:47:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९१७) और चकरीका दूध इन सबको समान भाग लेकर बड, गूलर, पीपल आदि दूधवाले वृक्षोंके रसमें पीसकर कल्क बना लेवे । उस कल्कके साथ सिद्ध किये हुए तेलको मालिश क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418370 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ९१७) और चकरीका दूध इन सबको समान भाग लेकर बड, गूलर, पीपल आदि दूधवाले वृक्षोंके रसमें पीसकर कल्क बना लेवे । उस कल्कके साथ सिद्ध किये हुए तेलको मालिश करनेसे सफेद कोट मुखकी झाई, काले दाग आदि विकार शीघ्र नष्ट होकर मुखकी कान्ति चन्द्रमाके समान निर्मल होजाती है । (४२) कपासके पत्ते और अनन्तमूल दोनोंके रस और तेल के साथ पारेकी भस्मको मिलाकर अस्थिवाव नासूर में सेवन करने से लाभ होता है । (४३) स्थावर कन्द, मूल आदिके विषको खालेने पर और जंगम विष अर्थात् सर्पादिके काट लेने पर चौला- की जडके चूर्ण अथवा शतावरका जडके चूर्णको चावलोंके धोये हुए पानी में पीसकर उसके साथ पारेकी भस्मको मिलाकर पीने, नस्य लेने और लेपकरने से दोनों प्रकारके विष उतर जाते हैं और रोगी आरोग्य होजाता है । (४४) गौके गोबरके इसमें कपूरको भावना देकर उसमें एक रत्ती पारेकी भस्म को मिलाकर दहीके साथ खाने से स्थावर जंगम और कृत्रिम तीनों प्रकारके विष नष्ट होते हैं । (४५) विरोजा, बहेडा, समुद्रफेन, लहसुन, त्रिकुटा, वच, राई, शतावरकी जड, मौलसिरीकी जड और पारेकी भस्म इन सबको वडहलके रसमें घोटकर गोली बना- कर छाया में सुखा लेवे | उस गोलीको मनुष्य के मूत्रमें घिसकर तीन बार नेत्रोंमें आँजनेसे सर्पका विष नष्ट होता है । (४६) बहेडेकी गिरी, पुनर्नवकी जड देवदाली बंदाल के फल, तथा जड और विछैडी घासकी जड इनको मनुष्य के मूत्रमें पीस कर लेप करनेसे सर्पका विष बिल्कुल दूर होजाता है । (४७) कैयका गूदा, अण्डीके बीजोंकी गिरी, गोरख- मुण्डी और पारा सत्रको पानी में पीसकर लगाने से चूहेका विष दूर होता है। (४८) कॉसके वर्त्तनमें नागरवेल के रसके साथ पारेकी भस्म और सोंठको पीसकर लेप करनेसे अथवा सिरसके पत्ते और पारेको पानी में पीसकर लगानेसे या पीपल और पारेको बकरकि दूधमें पीस-<noinclude></noinclude> 1qn63u9y5dtv11mmnker5s9dls08ahj पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१२ 104 165779 418371 2026-09-05T10:48:06Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६९० ) रसरत्नसमुच्चयः । गायका सींग, गधे बाल, मोरपंख, बिलाव की विष्ठा, बकरीका रुआ और बकरीका घृत इन सबको समान भाग लेकर बकरेके मूत्रमें भावना देकर धूप तैयार करलेवे । यह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418371 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६९० ) रसरत्नसमुच्चयः । गायका सींग, गधे बाल, मोरपंख, बिलाव की विष्ठा, बकरीका रुआ और बकरीका घृत इन सबको समान भाग लेकर बकरेके मूत्रमें भावना देकर धूप तैयार करलेवे । यह माहेश्वर धूप कहलाती है। इसकी धूनी देनेसे बालकोंकी सम्पूर्ण ग्रहबाधा दूर होती है ॥ १२६-१२८ ॥ विजय धूप । शैलेयगुग्गुलुरसैः सपुर प्रचण्डद्रव्यापहृत्सरल- कुंदुरुभिः सकुष्ठैः । सध्यामकैः सुरभिगंधरसैश्व धूपः सौभाग्यबुद्धिजयकृद्विजयो विवादे ॥ १२९ ॥ देवासुरोरग पिशाच पितृगृहेषु गंधर्वयक्षपिशिता- शिषु च ग्रहेषु । जीर्णज्वरेषु विहितश्व विषातु- रेषु धूपोऽयमाजिविजयादिषु पार्थिवानाम् ॥ १३०॥ भूरिछरीला, शुद्ध गूगल, शिलारस, नागरमोथा, कस्तूरी, तज, असवर्ग, राल, कुन्दरु, कूठ, रोहिष तृण, कपूरकचरी, अगर और बोल इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूटपीसकर धूप तैयार कर लेवे । इस धूपकी धूनी देनेसे बालकोंके सौभाग्य और सद्बुद्धिकी वृद्धि होती है । संग्राममें जय और और वाद विवादमें विजय प्राप्त होती है । एवं देव, असुर, सर्प, पिशाच, पितर, ग्रह, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस आदि समस्त ग्रहबाधाओंके होनेपर तथा जीर्णज्वर और विष- जनित व्यथा के होनेपर इस धूपको देनेसे सम्पूर्ण उपद्रव शान्त होजाते हैं । संग्राममें जाते समय विजय आदिकी प्राप्तिके लिये राजाओंको यह धूप देनी चाहिये ॥ १२९ ॥ १३० ॥ ग्रहनाशिनी गुटिका | राजीकरंज पुन्नाट शिरीषार्क निशाद्वयम् ।<noinclude></noinclude> tij7iilsczkc90x32xjknezxxtyf14l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३५ 104 165780 418372 2026-09-05T10:48:32Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७१३) नेत्रों में लगानेसे नेत्रोंके तिमिर रोग (अंधेरे) को दूर करता है ॥ ४७॥ पटलहराञ्जन । कारवेद्रवैः सार्धं सम्यग्भर्ज्या कपर्दिका । सुतकं टंकणं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418372 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७१३) नेत्रों में लगानेसे नेत्रोंके तिमिर रोग (अंधेरे) को दूर करता है ॥ ४७॥ पटलहराञ्जन । कारवेद्रवैः सार्धं सम्यग्भर्ज्या कपर्दिका । सुतकं टंकणं लाक्षा तुल्यं जंबीरजद्रवैः ||१८|| मर्दयेत्ताम्रपात्रे तु तस्मिन् रुद्धा विनिक्षिपेत् धान्यराशौ स्थित मासमंजनं पटलं हरेत् ॥ ४९ ॥ कौडियोंके बारीक चूर्णको तांबेकी कढाईमें डालकर करेलेके पंचांगके रसके साथ उत्तम प्रकारसे भूने । फिर उसमें पारा, सुहागा और लाख ये प्रत्येक चीज कौडिया के चूर्णके बराबर २ भाग मिला- कर जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करके गोला बनालेवे । उसको तांबे के सम्पुटमें बन्द करके धानोंके ढेरमें गाडकर एक महीने तक रकवे इसके पश्चात् उस गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण करके नेत्रोंमे आंजे । यह अंजन पटलगत ( पलकोंके ) रोगोंको दूर करता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ रक्ताञ्जन । भृंगराजरसैर्दृष्टं पलैकं रक्तचंदनम् । ताम्रपात्रे स्थितं भाग्यं तद्रसेन पुनः पुनः ॥५०॥ शतधा भावयेद्यत्नात्पेष्य पेष्य पुनः पुनः । मधुमाध्यंजन हंति षडूविधं तिमिरामयम् ॥५१॥ लाल चन्दनके कपडछान किये हुए ४ तोले चूर्णको तांबे के बर्तन में भांगरके रसके साथ खरल करे और सुखालेवे । इसप्रकार भांगरेके रसमें १०० बार भावना देकर १०० बार सुखावे फिर पीसकर शीशीमें भरकर रखलेवे । इस अंजनको शहद में मिलाकर नेत्रों में<noinclude></noinclude> ht67bkrsauf9wz474fwufxce8yoyyse पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५७ 104 165781 418373 2026-09-05T10:48:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७३९) गुटिकां धारयेद्दतैः कृमिशूलहरं परम् ॥ ४७ ॥ विशालायाः फलं चूर्ण्य तप्तलोहोपरि क्षिपेत् । तद्धूमाभृष्टदंतानां कीटपातो भवत्यलम् ॥ ४८ ॥ जाती... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७३९) गुटिकां धारयेद्दतैः कृमिशूलहरं परम् ॥ ४७ ॥ विशालायाः फलं चूर्ण्य तप्तलोहोपरि क्षिपेत् । तद्धूमाभृष्टदंतानां कीटपातो भवत्यलम् ॥ ४८ ॥ जाती कोरण्टपत्रं च चर्वयेत्प्रातरुत्थितः । स्थिराः स्युश्चलिता दतास्तत्काष्ठैर्दैतधावनात् ॥४९ मूलीबीजं मुखे धार्ये दंतदाढर्यकरं परम् । किंचिलवणसंयुक्तमारनालं विपाचयेत् ॥ ५० ॥ तेनगंडूषमात्रेण मुखवैरस्यनाशनम् . । तांबूलचूर्णदिग्धस्तु गंडूष तलतैलतः ॥ ५१ ॥ का जिकैर्लवणाक्तैर्वा गण्डूषः सुखदायकः । पारदं विमलं ताप्यं त्रिकटुं ताम्रसैंधवम् ॥ ५२ ॥ तुल्यं गवां जलैः पिष्टं सुखोष्णं लेपयेन्मुहुः । त्र्यहेण कण्ठशालूकं गलग्रंथिं च नाशयेत् ॥ ५३ ॥ कुठ और सुगन्धवाला दोनोंका गोमूत्र काढा बनाकर उसमे हर- डोंका चूर्ण डालकर पकावे । जब वह पककर गोली बनने योग्य गाढा होजाय तब नीचे उतारकर एक २ रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे । ये गोलियाँ मुखमें रखनेसे मुखकी दुर्गन्धको दूर करती हैं । घरका धुआँसा और काँजीका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें शदह और सैंचा - नमक डालकर उसके कुल्ले करने से मुखकी दुर्गन्ध दूर होती है गायके गोबर के रस में इरडों को पकावे, जब वे पक कर खूब सीजजायँ तब नीचे उतार कर उनकी गुठली निकाल डाले । फिर उनमें सौंफ, पपिल और बाबची प्रत्येकका चूर्ण दरडॉक बराबर २ मिलाकर बारीक खरल करके गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ मुँहमें रखते ही मुखका दुर्गन्धको नष्ट करती हैं । खीलें, जायफल और सुपारी तीनोका<noinclude></noinclude> gliauneb3bk0jcpfs4l10y03d6wodgt पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७९ 104 165782 418374 2026-09-05T10:49:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७५७) ( १ ) मसूरिकामें पर्पटी रसको घृत और नीम के पत्तोंके चूर्णको मिलाकर सेवन करने से मसूरिका आदि अनेक दारुण क्षुद्ररोग नाश होते हैं । (२) व्यंग रोगमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (७५७) ( १ ) मसूरिकामें पर्पटी रसको घृत और नीम के पत्तोंके चूर्णको मिलाकर सेवन करने से मसूरिका आदि अनेक दारुण क्षुद्ररोग नाश होते हैं । (२) व्यंग रोगमें जो खरगोश शस्त्रसे माराहो उसके तत्का- लके निकले हुए रक्तको मुखपर मलनेसे अथवा जायफल के बाहरके छिल्केके चूर्णको मलने से व्यंगरोग (मुॅहकी झांई) ओर मुँहके काले दाग दूर होते हैं । ( ३ ) हिंगोटके फलों की गिरीको अत्यन्त शीतल जलके साथ पीसकर २१ दिनतक मुखपर लेपकरे तो मुँहकी शाई, छीष आदि दूर होकर मुख सुन्दर होजाता है । (४) कुमखीरोग में खराब नाखूनको उखाडकर थूहरका दूध, सुहागा और पृश्नि प तीनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर लुगदी बनालेंगे और उसको गरम करके उस नाखून की जडमें भरदेवे । इस प्रकार उस लुगदीके द्वारा बारंबार दग्ध करनेसे नया नाखुन निकल आता है। और कुनखी रोग दूर होजाता है । (५) नाखूनमें यदि व्रण होगया- हो दुर्गन्धित पीब निकलती हो और छेद होगया हो तो हरडोंकों पीसकर लुगदी बनाकर उसपर बाँधे और हरडोंकोही भक्षण करे तो कुनखी रोग आराम होजाता है (६) अथवा सफेद कोयलकी जड, आककी जड और पीली कटसरैया तीनोंको दूधमें पीसकर कल्क करले, उसका रस निचोडकर उस रसको लगानेसे कुनखी रोग दूर होकर नवीन नख निकल आता है । (७) केवल हरडोंका प्रयोग करनेसेही कुनखी रोग नष्ट होजाता है, फिर अन्यान्य औषधियों के प्रयोगसे क्या प्रयोजन । (८)कूठ और जीरेको पानीमें पीसकर लेप करनेसे कक्षाग्रन्थि (बगलकी गाँठ अर्थात कविहारी) नष्ट होती है । (९) अथवा जियापोताकी गिरीको जलमें पीसकर प्रलेपकरे, या सैंजनेकी जडको हल्दी के पानीमें पीसकर लेपकरे तो कक्षाग्रन्थि आ- राम होती है । (१०) मीठा तेलिया और विषखपरे की जडको पानी में पीसकर लगाने से भी कक्षा ग्रन्थि दूर होजाती है । (११) सब प्रका-<noinclude></noinclude> myrmynnq66raka66tf6g2usik2ip8ms पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०१ 104 165783 418375 2026-09-05T10:50:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७७९ ) देवदारु, तगर तिलके तेलको पकाकर लगानेसे बिच्छूका विष शीघ्र उत्तर जाता है । (१०) सिझाल, तगर, मृतसंजीवन रस, वत्सनाभ विप, सिरस के फूल, पत्ते इन सबको ए... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418375 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७७९ ) देवदारु, तगर तिलके तेलको पकाकर लगानेसे बिच्छूका विष शीघ्र उत्तर जाता है । (१०) सिझाल, तगर, मृतसंजीवन रस, वत्सनाभ विप, सिरस के फूल, पत्ते इन सबको एकत्र कूट पीसकर सेवन करनेसे चूहेके विष तथा अन्यान्य जन्तुओं का विष दूर होता है । ( ११ ) जटामांसी, फटकरी, बावची, वत्सभाम और कूठ इन औषधियों को एकत्र कर पीने और लेप करनेसे सब प्रकारका विष नाश होता है । (१२) सुहागेके चूर्ण को पानी में पीसकर पान, अभ्यञ्जन और नस्य द्वारा प्रयोग करनेसे सर्प आदि जन्तुओंका विष दूर होता है और गुह्य- स्थानमें हुई उपदेश आदि व्याधियाँ नाश होती हैं । (१३) मैनसिल सैंधानमक, हींग और चमेलीके पत्ते इनको गाय के गोबर के रस में पीस- कर गोलियां बनालेवे । इन गोलियोंको खानेसे और जलमें घिसकर लगानेसे चिच्छूका विष उतर जाता है । ( १४ ) ढाकके बीजोंको आक के दूधमें और थूहरके दूधमें अनेक बार भावना देकर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको पानीमें घिसकर काटे हुए स्थानपर लगा- नसे और पान करनेसे बिच्छूका विष तत्काल नाश होता है। ( १५ ) धतूरे के पत्तोंका रस, तीक्ष्ण लोहकी भस्म, कटेरीकी जड, हाऊबेर और रससों सबकी समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण करलेवे। इस चूर्ण को एक २ मासा परिमाण सेवन करने से धन प्राप्तिकी इच्छासे वेश्याके द्वारा दिया हुआ विष या विषैली औषधिका असर शीघ्र दूर होजाता है और युवापुरुष वचजाता है । ( १६ ) भोजन करने के बाद पुराना चुकेका शाक और त्रिकुटा दोनोंके चूर्णको सेवन करनेसे -धनकी अभिलाषासे वेश्या स्त्रीके द्वारा अन्नके साथ दिया हुआ विष तत्काल नाश होता है ।। ११०-११७॥ तासूत रस । सूतं गंधं टंकणं हेमयुक्तं घर्षेद्यामं मेघनादी- रसेन । गोलं कृत्वा कतिपाषाणमूषा-<noinclude></noinclude> 4gqug3z1w67kku87193cevld92xkys0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२४ 104 165784 418376 2026-09-05T10:51:01Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (८०२) यसरत्नसमुच्चयः । कुसुमायुध रख । सूतस्य द्विपलं चतुष्पल मितो गंधो मृतं काञ्चनं पादन्यून पलं सुवर्णविमलाताप्यं रसेनोन्मितम् । लोहं कांतमलस्तथा सितघनं कर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418376 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८०२) यसरत्नसमुच्चयः । कुसुमायुध रख । सूतस्य द्विपलं चतुष्पल मितो गंधो मृतं काञ्चनं पादन्यून पलं सुवर्णविमलाताप्यं रसेनोन्मितम् । लोहं कांतमलस्तथा सितघनं कर्षो मतावेकशी हन्तव्यं दरदेन लोहमखिलं चूर्ण ततो मर्दितम् ॥ १८ मूषायां विगतावृतौ सिकतया यन्त्रे कृते स्थापये- ब्राह्मीवारि दिनं निधेहि तदनु प्रत्येकमेकात्र्यहम् । वासाकुअरशुं ठिका त्रिकटुकं मेषी च निर्गुडिका तालीकुञ्जरशुण्डिकाहुतवहस्तोयानि दत्त्वा पचेत् १९ ततस्तं निखिल भोभिावमर्थ पुटयेषु । निर्यासैः शाल्मले ग्राह्यो वल्लत्रयमितो रसः । वली पलितनाशार्थं त्रिमासं मधुराशनः ॥ २० ॥ सुलोचनाशतैर्गतवीर्यच्यवनैर्मनोयदि । सुरतेषु तदमुं रसमाश्रयाश्रयं कुसुमास्त्रस्य चिराय धन्विनः२१ यदि संति सहस्रशः स्त्रियश्वतुराश्लेषमनोहराः प्रसन्नाः । सुकवेरिव गुंफना गिरसोऽनेन युवा रसेन भूयात् ॥ २२ ॥ पारा ८ तोले, गन्धक १६ तोले, हिंगुल में की हुई सुवर्ण भस्म ३ तोले, सोनामाखीकी भस्म ८ तोले, रूपामाखीकी भस्म ८ तोले, सिंग- रफके द्वारा की हुई लोहभस्म १ तोला और कान्तलो हमल (मण्डूर) की भस्म १ तोला इन सबको एकत्र खरल करके खुले हुये मुँहवाली मूषामें भरकर उस मूपाको बालुकायन्त्रमें रख नीचे अग्नि जलावे और<noinclude></noinclude> l5qoq2n8hvqvp60d1cogy0s2sjgv9nh पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४८ 104 165785 418377 2026-09-05T10:51:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, कूठ, सैंधानमक, धनियाँ, कत्तूर, तामें भुनी हुई मेथी, जीरा और काला जीरा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीस... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418377 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, कूठ, सैंधानमक, धनियाँ, कत्तूर, तामें भुनी हुई मेथी, जीरा और काला जीरा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण करके कपडेंमें छान लेवे । फिर जितना इन औषधियों का चूर्ण हो, उसकी बराबर घीमें भुनी हुई भाँगरा चूर्ण लेकर सबको एकत्र मिळालेवे । फिर उसनी मिश्री मिलानी चाहिये, जितनीसे लड्डू अच्छी तरह बँधसके इसके पश्चात् घृत और मधुके साथ मिलाकर तथा दालचीनी, इलायची, तेजपात और कपूर इनके चूर्ण से सुवासित करके लड्डू बनालेवे और घीके चिकने वर्तनमें भरकर रखदेव । बुद्धिमान मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर इन मदन मोदकों को यथोचित मात्रा से सेवन करे । ये मोदकवात और कफ के विकार, खाँसी, सब प्रकार के शूल बलीपलितरोग, आमवातरोग और संग्रहणी इन सब रोगोंको नाश करते हैं । अत्यन्त रुचि कारक और अनिवर्द्धक है। काम की अत्य- न्व वृद्धि होनेके लिये नारदजीने इन मोदकोको वर्णन किया है । इन्हीं के प्रभावसे श्रीकृष्णचन्द्र हजारों स्त्रियों के साथ रमण करते थे । ११६-१२३ ॥ कामेश्वरमोदक | सम्यङ्मारितमभ्रकं कटुफलं कुष्ठाश्वगंधा बच्चा । मेथी मोचरसो विदारिमुसली गोक्षुर केक्षूरकम् । रंभाकंदशतावरी ह्यजमुदा माषास्तिलाधान्यकं यष्टीनागबला कचूरमदनं जातीफलं सैंधत्रम् १२४॥ भाङ्ग कर्कट शृंगिका त्रिकटुकं द्वे जीरके चित्रकं चातुर्जातपुनर्नवा गजकणा द्राक्षा शठी वालकम् । शाल्मल्यं त्रिफल त्रिकंक पिभवंबी जंसमंचूर्णयेच्चूर्ण- शा विजयासिताद्विगुणितामध्वा ज्य मिश्रतुतत्व १२५ ॥<noinclude></noinclude> ozhdwg7ra26gt0dk8ur47f0mgy0xrva पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७१ 104 165786 418378 2026-09-05T10:51:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाडीकोपेतः । ( ८४९) खण्डखाद्य रसायन । वासाभाङ्गर्यमृताभीरुव चाख दिरपुष्करैः । घुसली भिक्षुकोरण्टैः सपै चाप च मुष्टिकैः ॥ ६० ॥ पकेष्टशिष्टे ताम्रस्थे प्रस्थ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418378 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाडीकोपेतः । ( ८४९) खण्डखाद्य रसायन । वासाभाङ्गर्यमृताभीरुव चाख दिरपुष्करैः । घुसली भिक्षुकोरण्टैः सपै चाप च मुष्टिकैः ॥ ६० ॥ पकेष्टशिष्टे ताम्रस्थे प्रस्थाशे खण्डसर्पिषी । ताप्येन रुक्मलोहस्य हतस्याप्यञ्जलित्रयम् ॥ ६१॥ पक्वेस्मितां याते कुस्तुंबुरु शिलाजतु । श्रृंगी विडंगत्रिफलाजातीफलकटुत्रिकम् ॥ ६२ ॥ चातुर्जातं पशुपत्यंशं प्रस्थार्धे व मधु क्षिपेत् । खण्डखाद्यमिदं लीढं कर्षमात्र रसायनम् ॥ ९३ ॥ क्षीरानुपास्य क्षपयेत्क्षय कासारुचिह्नमान् । शीतपित्ताम्लपित्तास्रवातपित्तास्रकामलाः ॥ ६४ ॥ कुष्ठमेहम्लिदानाहकायै शूलं च पक्किजम् ॥ ६५ ॥ अडूसा भारंगी, गिलोय, शतावर, वच, खैरसार, पोहकर मूल, मुसली, बालमखाना और पीली फटसरैया इन सबको पृथक् चार २ तोले लेकर एकत्र कूट करके ६४ शेर जलमें पकावे । जब पककर १६ वाँ भाग जल शेष रहजाय सब उसको उतार कर छान लेवे । फिर उस काथको ताँचेके पात्र में भरकर उसमें एक प्रस्थ खाँड एक प्रस्थ घी, और सोनामाखीकी भस्मके द्वारा मारे हुए कान्त लोहकी भस्मको ९६ तोले डालकर पकावे । पककर जब वह अवलेहके समान गाढा होजाय तब नीचे उतारकर उसमें धनियाँ, शिलाजीत, काकडा - सिंगी, वायविडङ्ग, त्रिफला, जायफल, त्रिकुटा और चातुर्जातक इन प्रत्येक औषधियोंका सुर्ण दो दो तोले और शहद ३२ तोले डालकर अच्छे प्रकार से मिलादेवे । इस खण्डखाद्य रसायनको प्रतिदिन एक २ तोला सेवन करके ऊपर से दुग्धका अनुपान करे। यह रसायन क्षय,<noinclude></noinclude> cbz57k1vsul94pn7xhr5gm1x8c3tynl पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९३ 104 165787 418379 2026-09-05T10:52:05Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८७१ ) गोसूत्रक्षार सिंधूत्थ विषपाषाणभेदकम् । वज्रवद्दारयत्येतदेकतः पीतमश्मरीम् ॥ ५८ ॥ त्रिफलास्वर्जिकाक्षारैर्विषं गुल्मप्रभेदनम् । पिप्प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418379 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (८७१ ) गोसूत्रक्षार सिंधूत्थ विषपाषाणभेदकम् । वज्रवद्दारयत्येतदेकतः पीतमश्मरीम् ॥ ५८ ॥ त्रिफलास्वर्जिकाक्षारैर्विषं गुल्मप्रभेदनम् । पिप्पलीपिप्पलीमूलं विषं शूलहरं तथा ॥ ५९ ॥ विषं द्रवंती मधुकं द्राक्षा राखा शठी कणा । विषा वेल्लं मिशी क्षारं गुल्मप्लीहनिबर्हणम् ॥ ६० ॥ प्लीहोदरनं पयसा शतारुक्रमिजिद्विषम् । वायसीमूल निष्काथपी तं कुछहरं विषम् ॥ ६१ ॥ पयस्या राजवृक्षत्वक त्रायंती बाकुची बला । लीही भकणाभ्यां च विष काथेन कुष्ठजित् ॥ ६२॥ अवल्गुजैडमजयोर्बीजं क्षारद्वयं विषम् । लेपः ससैंधवः पिष्टो वारिणा कुष्ठनाशनः ॥ ६३ ॥ चित्रकार्कजटाहस्तिपिप्पलीबाकुची विषैः । सचन्द्रकैरंडगज करंज फलसैंधवैः ॥ ६४ ॥ सव्योषस्वर्जिकाक्षार यवक्षारनिशाह्वयैः । अगारधूम सहितैर्बस्तसूत्रेण कल्कितेः ॥ ६५ ॥ भल्लातकानिशम्याकविषैवी मूत्रपेषितैः । - लेपो विचर्चिकाददूर सिका किंटिभापहः ॥ ६६ ॥ शम्याकपत्रत्वमूलं विषं तकं च तद्गुणम् ॥ ६७ ॥ । कुष्ठतुंबरुबीजानि वाजिगंधाम्लवेतसम् । हरिद्रा वायसी रास्ना हरितालं मनःशिला ॥ ६८ ॥ पटोल निम्बपत्राणि कणागंधकसैंधवम् ।<noinclude></noinclude> riw0trvs3bfby7aae9a5kymm6v8f503 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१६ 104 165788 418380 2026-09-05T10:52:25Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८९४ ) मनुष्यको दो जौकी बराबर और बिच्छूसे काटे हुए मनुष्यको एक तिलकी बराबर उक्त विष सेवन करना चाहिये । विषको पान करने पर अथवा सर्पादिते काठे हुए... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418380 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः । ( ८९४ ) मनुष्यको दो जौकी बराबर और बिच्छूसे काटे हुए मनुष्यको एक तिलकी बराबर उक्त विष सेवन करना चाहिये । विषको पान करने पर अथवा सर्पादिते काठे हुए विष रुधिरमें मिलजानेपर उसको उतारने के लिये विष सेवन नहीं कराना चाहिये तथा मकडी जौंक आदि विषैलेजन्तु असे काटे हुए मनुष्यकोभी विष सेवन करना नहीं चाहिये । परन्तु बिच्छू के काटने का निश्चय करके उस स्थानपर विषका लेप करे। विष सेवन करनेवाले मनुष्यको शत्रुके द्वारा दिये हुए विषसे तथा कि- सी प्रकार केभी उपावेष से मकडी, सर्प चूहा आदि जंतुओंके विषसे एवं वृद्धावस्था, अकालमृत्यु और पापग्रहों की पीडाकाभी भय नहीं होता ॥ १३९ - १५६ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ त्रिंशोऽध्यायः । ( रसकल्प ) पारदभस्म विधि | गुजा सैंधवयोश्च देवदालीदलद्रवैः । टंकण किंशुकर से जेबी राम्लेन चूलिकाम् ॥ १ ॥ मूलकक्षारगोमूत्रप्रसादेन च गन्धकम् । स्वर्जिकां भूखगं व्योषशिग्रुमूलरसेन च ॥ २ ॥ शतशो भावयेत्सर्व बिडोयं वडवानलः ॥ ३ ॥ एवमग्रिसहो लोहसंयुक्तः केवलोऽथ वा । नियामकौषध सिताऽङ्गोलमूलरसादिभिः ॥ ४ ॥ वैक्रांतप्रमुखैर्वापि रसेन्द्रः सह मर्दितः । यंत्रस्थः क्रमवृद्धेन वह्निनोध्न पाचितः ॥ ५ ॥<noinclude></noinclude> nnorsmqcw4wy4axf2b0foxgay4nouf9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४० 104 165789 418381 2026-09-05T10:52:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (९१८) रसरत्नसमुच्चयः । कर किम्बा कपास के पत्तों और पारदभरमको घीके साथ पीसकर लेप करनेसे बिच्छूका विष नष्ट होता है । (४९) चनोंके खारमें एक कपडे के टुकडेको भिजोकर आठ द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418381 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९१८) रसरत्नसमुच्चयः । कर किम्बा कपास के पत्तों और पारदभरमको घीके साथ पीसकर लेप करनेसे बिच्छूका विष नष्ट होता है । (४९) चनोंके खारमें एक कपडे के टुकडेको भिजोकर आठ दिन तक रक्खा रहने देवे । फिर खारको छानकर उसको बाबची, पमाडके पत्ते, कपास के पत्ते और अगस्ति- याके पत्ते इन सबके स्वरस या रसके साथ खूब बारीक पीसकर उसमें पारेकी भस्म डालकर के उस खारसे उक्त वस्त्र के द्वारा विषसे उत्पन्न हुए व्रणको धोनेसे अथवा केवल बडहलके खार स्वरस अथवा रससे धोनेसे विषका व्रण शीघ्र शमन होता है । विषका विकार दूर होजानेपर जब शरीर में (५०) रसायनोक्त विधिरे शक्ति उत्पन्न हो जावे तथ प्रतिदिन प्रातःकाल पीपल, हरड, सोंठ, सैंधानमक और चीता इनके समानभाग चूर्णको मन्दोष्ण जलके साथ सेवन करे तो जठराग्नि दीपन होती है । (५१) अभ्रक भस्म और कान्तलोहकी भस्म दोनोंको भाँगरके रस और आमलोंके रसमें एक २ बार भावना देकर लोहे के सम्पुटमें बन्द करके धानों के ढेर में गाड देवे । सात दिन तक के पश्चात् उसको निकालकर उसमें पीपल, हरड, पारेकी भस्म अथवा सुवर्णके द्वारा जारण किया हुआ पारा इन सबको समानभाग मिलाकर प्रति- दिन रात्रि के समय मधु और घृतके साथ सेवन करे और ऊपर से शतावरका रस पान करे। इस प्रकार ६ महीनेतक इसको सेवन कर- नेसे वृद्धावस्था पलायन होजाती है । (५२) त्रिफलेके चूर्ण को खैरसार और विजयसार के रसमें भावना देकर उसको सुवर्णभस्म और पारेकी भस्मको समानरूपसे मिलाकर शहद और घृतके साथ भक्षण करनेसे यह प्रयोग वृद्धावस्थाको भक्षण करजाता है। (५३) गन्धक के द्वारा मारा हुआ पारा और आमलोंके रसकेद्वारा माराहुआ कान्तलोह दोनों को स मान भाग से त्रिफले के चूर्ण में मिलाकर सेवन करनेवाला मनुष्य जबतक आकाशमें चंद्रमा और तारे हैं, उतने वर्षोंतक जीवित रहता है । (५४) चीता, त्रिफला, भाँगरा, हल्दी, रसौत, और पारेकी मस्म समभाग मिश्रित .<noinclude></noinclude> 4hcdgzd413tbtmrh0rdv35o8wph2qt4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१३ 104 165790 418382 2026-09-05T10:53:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । प्रियंगु त्रिफलादारुहिंगुव्योषकुचंदनम् ॥१३१॥ मंजिष्टोग्राजमूत्रं च गुटिका ग्रहनाशिनी । पाननस्याञ्जनालेमस्यानोतनधूपनात् ॥ १३२ ॥ (६९१) राई, क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418382 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । प्रियंगु त्रिफलादारुहिंगुव्योषकुचंदनम् ॥१३१॥ मंजिष्टोग्राजमूत्रं च गुटिका ग्रहनाशिनी । पाननस्याञ्जनालेमस्यानोतनधूपनात् ॥ १३२ ॥ (६९१) राई, करंज के बीज, पमार के बीज, सिरस के बीज, आककी जड, हल्दी, दारूहल्दी, फूलप्रियंगु. त्रिफला, देवदारु, हींग, त्रिकुटा, लाल चन्दन, मँजीठ और बच इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपड़छान करव । फिर उस चूर्णको बकरके मूत्रम खरल करके गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियों को पानीमें घिसकर अथवा पीसकर पान, नस्य, अंजन, प्रलेप, पानीमें घोलकर स्नान करना, अथवा गोलीका चूर्ण करके शरीरपर उबटन करना और उसकी धूनी देना इत्यादि उपायों द्वारा प्रयोग करनेसे ये गोलियाँ बालकों की सम्पूर्ण ग्रहबाधाओंको नष्ट करती हैं ॥ १३१ ॥ १३२ ॥ सामान्य उपाय | गर्भनिगतबालस्य कणास्वर्ण प्रदापयेत् । पाषाणद्वितयं युंजयात्कांस्य भाजनमुच्चकैः ॥ १३३ ॥ तेन त्रस्तः ससंज्ञः स्याद्यो निनिर्गमपीडितः । सुखोष्णैः कांजिकेबलं सप्रोक्ष्य द्वित्रिवारतः १३४ देयः शिरसि बालस्य घृतपिण्डो ज्वरापहः । शिरोगत विकारनो मुख्यो रक्षाकरस्तथा ॥ १३५ ॥ भक्षणं रोहिणी के सिद्धं पानानुलेपतः । ज्वरं पित्तोत्तरं इंति मुस्ताकाथ इवध्रुवम् ॥१३६॥ अश्वत्थ पल्लवैश्वः क्षीरं पक्वं निषेवितम् । पित्तजातं ज्वरं तीव्रं बालानां हंति निश्चितम् ॥१३७॥<noinclude></noinclude> tco7g8zl2m6fyj9ykk2ezequpzmszfc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३६ 104 165791 418383 2026-09-05T10:56:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । आंजनेसे छः प्रकारका तिमिररोग नष्ट होता है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ शुक्लाविति । शंबूकं पारदं नागं कांस्यचूर्ण रसाञ्जनम् । समं सर्वमिदं चिचादलद्रावेण... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418383 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । आंजनेसे छः प्रकारका तिमिररोग नष्ट होता है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ शुक्लाविति । शंबूकं पारदं नागं कांस्यचूर्ण रसाञ्जनम् । समं सर्वमिदं चिचादलद्रावेण मदयेत् ॥ ३२ ॥ ताम्रपात्रगत वर्ति छायाशुष्कां तुकारयेत् । शुक्काम तिमिरं पिल्लं इंति सा मधुनाऽजिता ॥ १३ ॥ शंख, पारा, सीसा, कांसा और रसौत इन सबके चूर्णको समान भाग लेकर इमली के पत्तों के रसमें तीन दिन तक खरल करे । फिर छोटी बत्तियां बनाकर उनकी तांचे पात्रमें रखकर छायामें सुखावे । इस बत्तीको शहद में घिसकर नेत्रोंमें आंजनेसे शुरू अर्म, तिमिर, पिल्ल आदि नेत्ररोग नष्ट होते हैं ॥ ५१ ॥ ५३ ॥ नक्तान्ध्यहरी वर्षी | ताम्रायलवणशंखैस्तुल्या मगधोद्भवाऽथ वे धात्री । जलपिष्टा गुलिकेयं सायंसमयांध्यमपहरति ॥५४॥ नेपाली तांबे की भस्म, समुद्रनमक और शंख ये प्रत्येक एक २भाग पीपल ३ भाग और आमले ३ भाग, सबको पानीमें बारीक पीसकर बत्ती बनालेवे और छायामें सुखालेवे। इस बत्तीको पानी में घिसकर सायंकालके समय नेत्रोंमें आंजे तो रतौंधा दूर होता है ॥ ९४ ॥ नवनेत्रदात्रीवर्ति । द्विरष्टौ ताम्ररजसो मधुकस्य चतुर्दश । कुष्ठस्य द्वादशांशाः स्युर्वचायास्तु दशैव हि ॥५५ ॥<noinclude></noinclude> q9sjc9typf1jz91kc0eveeqcr5p2fc5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५८ 104 165792 418384 2026-09-05T10:56:53Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३६) रसरत्नसमुच्चयः । समानभाग लेकर चूर्ण कर लेवे । इस चूर्ण को प्रतिदिन दो दो तोले भक्षण कर ऊपर से शीतल जलका अनुपान करै । यह चूर्ण मुखकी विरसताको शान्त करनेके लिय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418384 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७३६) रसरत्नसमुच्चयः । समानभाग लेकर चूर्ण कर लेवे । इस चूर्ण को प्रतिदिन दो दो तोले भक्षण कर ऊपर से शीतल जलका अनुपान करै । यह चूर्ण मुखकी विरसताको शान्त करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है | निर्गुण्डीकी जड और कमलकन्द दोनों को खूब चबा चचा कर उनके रसको पीनेसे उपजिह्वा (काग) की पीडा शान्त होती है । हरडके चूर्ण और शहदको ताँबे के बर्त्तनमें थोडी देर तक पकाकर गोलियाँ बना लेवे । इन गोलियोंको डाढोंके बीचमें दानकर रखनेसे दाँतों के कीडे नष्ट होजाते हैं । कसीस, हींगु, फटकरी और देवदारु सबको समान- भाग लेकर जलमें पीसकर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक १ गोली दाँतों के बीच में धारण करने से कुमिजनित शूल शीघ्र दूर होता है । इन्द्रायन के सूखे फलको पीसकर लोहेके खून तपे हुए तवे के ऊपर डालकर कीडा लगे हुए दाँतों व डाढोंमें-उसके धुएँका स्नेह देवे तो दाँतोंमेंसे कीडा अवश्य निकलपडता है । चमेलीके अथवा पीली कटसरैया के पत्तोंको प्रति दिन प्रातः कालमें चावनेसे अथवा इन दोनों- मेसे किसी एककी लकडी की दातौन करने से हिलते हुए दाँत जमकर मजबूत होजाते हैं । दाँतों को अत्यन्त दृढ करना हो तो मूली के बीजोंको मुखमें धारण करना चाहिये । थोडासा समुद्रनमक डालकर काँजीको कुछ देर तक पकावे, फिर वस्त्रमें छानकर उसके कुल्ले करे तो मुखकी विरसता दूर होती है । तिलके तेलमें पानोंका चूर्ण मिलाकर उसके कुल्ले करनेसे अथवा काँजीमें सैंधानमक मिलाकर कुल्ले करनेसे मुखकी दुर्गन्ध दूर होकर मुख शुद्ध होजाता है। पारा, रूपामाखी, सोनामाखी त्रिकुटा, ताँबा और सैंधानमक इन सबको समानभाग लेकर गोमूत्र में पीसकर अग्निपर कुछ देर पकाकर मरहमसा वना लेवे । इसका बारंबार सुहाता २ लेप करनेसे कण्ठशालूक रोग और गलेकी ग्रन्थियाँ तीन दिनमें ही शमन हो जाती हैं ॥ ४२-५३ ॥<noinclude></noinclude> 3bfh1qiz3jhqsmycj19dfenhowzlms2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८० 104 165793 418385 2026-09-05T10:57:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७५८) रसरत्नसमुच्चयः । निकालकर साफ मूत्रमें पीसकर लेप • रके स्तनरोगों में शिरावेधकर रक्त मोक्षण कराना सर्वोत्तम उपाय है । जो स्तन पकगया हो और पीच पडगया हो तो प्रल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418385 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७५८) रसरत्नसमुच्चयः । निकालकर साफ मूत्रमें पीसकर लेप • रके स्तनरोगों में शिरावेधकर रक्त मोक्षण कराना सर्वोत्तम उपाय है । जो स्तन पकगया हो और पीच पडगया हो तो प्रलेप करने योग्य औषधियों का लेप करके उसको फोडदे और पीब कर देवे । (१२) एकवीर वृक्षकी जडको बकरीके करनेसे पका हुआ स्तन तत्काल फूटजाता है । यदि इस प्रकारसे कदाचित् न फूटे तो वैद्यको उसे शस्त्रक्रिया (आपरेशन ) द्वारा चीर- दना चाहिये । इसके पश्चात् (१३) मुलैठी, नीम के पत्ते, हल्दी, निर्गुडी और धायके फूल इन सबको समान भाग लेकर, एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण करलेवे, इस चूर्णको जब पका हुआ स्तन फूट जाय और पौष निकल जाय तब उसके व्रण में भरकर पट्टी बाँधदेवे । इससे व्रण भरकर शीघ्र आरोग्य लाभ होता है । ( १४ ) देवदारु के चूर्ण को शहद और घृतके साथ पीसकर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको स्तन के पककर फूट जाने और पीच निकलजाने पर व्रणके भीतर रखने से व्रण तत्काल भरकर सुखजाता है ॥ ३–१३॥ लिंगव्याधा लोहितं स्रावयित्वा पश्चाद्बोलं भक्षयेत्तस्य नुत्यै ॥११॥ उदुंबरवटा श्वत्थसाम्रजंबू त्वचः श्रुतम् । जलैः क्वाथं च तेनैव क्षालयेलिंगपाकनुत् ॥१५॥ कुमारीरससंपिष्टं जीरकं लेपयेद्भिषक् । तेन दाहश्व पाकश्च शममाप्नोति निश्चितम् ॥१६॥ महाशंखं जलैर्दृष्ट्वा तेन लिंगं प्रलेपयेत् । घोंटां पूगं च वा तोयैः सारं वा खदिरोद्भवम् ॥ जलैः पिष्ट्वा प्रलेपोsय लिङ्गरोगहरं परम् ॥१७॥ सुगंधकघृतैर्लेपः पक्कलित सुखावहः ।<noinclude></noinclude> 6ychqymyk5epzqgqar1y4twjw2jdzc4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०२ 104 165794 418386 2026-09-05T10:57:39Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७८० ) रसरत्नसमुच्चयः । मध्ये वि भूतं पुटेत ॥११८॥ पश्चान्मेघनादीरसेन सुतः सिद्धस्त्वेष- ताक्ष्यों विषारिः । तार्क्ष्य वंध्या भक्षयेद्वक्तिमानं सूतं तस्माद्य... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418386 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७८० ) रसरत्नसमुच्चयः । मध्ये वि भूतं पुटेत ॥११८॥ पश्चान्मेघनादीरसेन सुतः सिद्धस्त्वेष- ताक्ष्यों विषारिः । तार्क्ष्य वंध्या भक्षयेद्वक्तिमानं सूतं तस्माद्यति नाशं विषाणि ॥ ११९ ॥ पारा, गन्धक, सुहागा और सोनेके वर्क सबको समान भाग लेकर चौलाईके रममें १ घंटे तक घोटे । फिर गोला बनाकर उसको कान्त- पाषाण (चुम्बक पत्थर) की मूबामें बन्द करके ऊपर से कपरौटीकर भूधर पुटदेवे । स्वाङ्गशीतल होनेपर गोलेको निकालकर फिर चौला- ईके रस में खरल करे तो यह तार्क्ष्य रस सिद्ध होता है । यह रस - सब प्रकारके विषको नाश करनेवाला है । इस उसको एक रत्ती परिमाण लेकर बांझ ककोडेके कन्दके चूर्णके साथ सेवन करे । इसके सेवनसे सम्पूर्ण विष शीघ्र नाश होते हैं ११८ ॥ ११९ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुचये भाषाटीकायां पञ्चविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २५ ॥ षडविंशोऽध्यायः । रसायन और उसके गुण । दीर्घमायुः स्मृति मेधामारोग्यं तरुणं वयः । प्रभावर्णस्वरौदार्य देहेंद्रियबलोदयम् ॥ 1 वाक्सिद्धिं वृषतां कांतिमवाप्नोति रसायनात् ॥१॥ पंथाः शीतं कदन्नानि वयोवृद्धाश्व योषितः । मनसः प्रातिकूल्यं च जरायाः पञ्च हेतवः ॥२॥ हलिनीरससंपिष्टौ तुल्यांशौ रसगंधकौ ।<noinclude></noinclude> 69c9tprmizx5x309p4kedtiymuzcf19 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२५ 104 165795 418387 2026-09-05T10:58:01Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८०३) मूषामें ब्राह्मीका रस डालता जावे । जब रस सुखजाय तब उसमें उत- नाही रस और डाल देवे अर्थात् एक दिनमें २४ घंटे बराबर एक एक घंटेमें रस डालता रहे और ब... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418387 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८०३) मूषामें ब्राह्मीका रस डालता जावे । जब रस सुखजाय तब उसमें उत- नाही रस और डाल देवे अर्थात् एक दिनमें २४ घंटे बराबर एक एक घंटेमें रस डालता रहे और बीच २ में उसको चलाताजाय । फिर बहू- सेके कोमल पत्ते, सोंठ, त्रिकुटा, मेढासिंगी, निर्गुण्डी, ताड गजपीपल और चीता इन प्रत्येकके रसको क्रमसे तीन तीन दिनतक मूषामें डाल- कर पका । इन आठों औषधियोंके रसको मखंड अनि जलाता हुआ २४ दिन और २४ रात तक बराबर डालता रहे । ) जब स्वाङ्गशीतल होजाय तत्र मूषार्मेसे उस रसको निकालकर उपर्युक्त आठों औषधि- योंके रसमें क्रमशः एक २ दिन तक खरल करके रात्रिमें लघु बाराहपुर देवे । फिर बारीक पीसकर शीशी में भरकर रखदेवे । इस रसको प्रति- दिन सेमलके गोंदके चूर्ण में तीन २रती परिमाण मिलाकर सेवन करना चाहिये और मधुर पदार्थों का आहार करना चाहिये । तीन महीने तक इसको सेवन करनेसे वली और पलित रोग नाश होता है । सुन्दर नेत्रोंवाली सैकडों स्त्रियोंक साथ सुरतक्रीडा करनेमें चिरकालतक अस्खलित वीर्य रखनेकी इच्छावाला मनुष्य कामदेव के आश्रय रहनेवाले इस रसको सेवन करे । प्रसन्न मुखवाली, आलिङ्गन करनेमें चतुर और मनको हरनेवाली यदि हजारों स्त्रियां हों तो उनकोभी जैसे महा कविकी वाणीकी रचना क्षणभरके लियेभी क्षीण नही होती, उसी प्रकार इस इसके सेवन से युवा पुरुष सन्तुष्ट करता हुआ अर्थात् सुरतक्रीडाका आनन्द भोगता हुआ क्षीण नहीं होता ॥ १८-२२ ॥ सूतेन्द्र रस । मुक्ताफलं प्रवालं च सुवर्ण रौप्यमेव च । रसो गंधश्च तत्सर्वं तोलैकैकं प्रकल्पयेत् ॥ २३ ॥ रक्तोत्पलैः पत्ररसैर्मर्दयेत्पत्तलीकृते ।<noinclude></noinclude> ci68fuihplqrk1z73d54xccb2g6pbq0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४९ 104 165796 418388 2026-09-05T10:58:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८२७) saraf afaai विलेामथवा कृत्वा च तत्सेवये- त्या क्षीरसिताऽनुवीर्यकरणे स्तंभेऽप्यलं कामिनाम् । रामावश्यकरः सुखातिसुखदः प्रौढांगनाद्रावकः क्षीणे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418388 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८२७) saraf afaai विलेामथवा कृत्वा च तत्सेवये- त्या क्षीरसिताऽनुवीर्यकरणे स्तंभेऽप्यलं कामिनाम् । रामावश्यकरः सुखातिसुखदः प्रौढांगनाद्रावकः क्षीणे पुष्टिकरः क्षयक्षयकरो नानामयध्वंसकः १२६ ।। नित्यानन्दकरो विशेषकविता वाचाविलासोद्भवं धत्ते सर्वगुणं महास्थिरवयो ध्यानावधानेप्यलम् । अभ्यासेन निहंति मृत्युपलितं कामेश्वरो वत्सरा- त्सर्वेषां हितकारको निगदितः श्रिनित्यनाथेन वै१२७ उत्तम प्रकार से भस्म किया हुआ अञ्जक, कायफल, कुठ, असगन्ध, बच्च, मेथी, सेमलकागोंद, विदारीकन्द, मुसली, गोखरू, तालमखाना, केले की फली, शतावर, अजमोद, उडद, तिल, धनियां, मुलैठी, गंगरेन, कचुर, मैनफल, जायफल, सैंधानमक, भारंगी, काकडासिंगी, त्रिकुटा, जीरा, काला जीरा, चीता, दारचीनी इलायची, तेजपात, नागकेसर, पुनर्नवा, गजपीपल, दाख, कचूर, सुगन्धवाला, सेमलकी मुसली, त्रिफला, और कौंच के बीज इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपड- छान करलेवे | उस चूर्ण के बराबर घीमें सुनी हुई भाँगका चूर्ण और सबसे दुगुनी मिश्री लेकर सबका शहद और घृतमें मिश्रित करके ६-६ मासेकी गोलियाँ बनाकर सेवन करे अथवा वैसेही प्रतिदिन छः २ मासे परिमाण चाटे और ऊपर से मिश्री मिलाकर दूध पीव । ये मोदक कामी पुरुषोंके वीर्य स्तम्भन करनेमें पूर्ण तथा समर्थ है । एवं स्त्रियों को वशी- भूत करनेवाले अत्यन्त सुखदायक प्रौढा स्त्रियोंको द्रवित करनेवाले शरीरके क्षीण होजानेपर उसकी पुष्टि करनेवाले, क्षय आदि नाना- प्रकारके रोगोंको विध्वंस करनेवाले और नित्य आनन्द उत्पन्न करने- वाले हैं। विशेषकर वह मनुष्य कवित्वशक्ति और वाचाल शक्तिसे<noinclude></noinclude> jki6sy6z9vcw1gn68cdhsug2pzcxw52 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७२ 104 165797 418389 2026-09-05T10:58:41Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८५० ) रसरत्नसमुच्चयः । खाँसी, अरुचि, क्लान्ति. शीत, पिच, अम्लपित्त, वातरक्त, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, प्रमेह लोहा, आनाह, कृशता, शूल और पक्तिशाल इन सब व्याधियोंको नाश क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418389 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८५० ) रसरत्नसमुच्चयः । खाँसी, अरुचि, क्लान्ति. शीत, पिच, अम्लपित्त, वातरक्त, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, प्रमेह लोहा, आनाह, कृशता, शूल और पक्तिशाल इन सब व्याधियोंको नाश करती है ।। ६०-६६ ॥ प्रत्येक धातुकी भस्मके पृथक् २ सामान्य प्रयोग । हेम्नो रूप्यस्य वा भम्स वरीभृंगाम्बुमा वितम् ॥६६॥ गुंजाप्रमाणं त्रिफलासितामध्वाज्यमिश्रितम् । बृंहणं वृष्यमायुष्यं कामलापाण्डुकुष्ठजित ॥ ६७ ॥ गंधकेन समशिन प्राग्वत्तानं च मारितम् । धान्याभ्रकं च तुत्थं च दशनिष्कं पृथक्पृथक् ॥ ६८॥ भावितं मातुलुंगा लेनाऽऽर्द्रकस्य रसेन च । ताम्रं सोष्णोदकं गुल्मप्लीहशूलामवातजित् ॥६॥ मारितं त्रपुसीस वा हारिणं श्रृंगमाकुली । कार्पासवासित तकं माहिषं च प्रमेहजिव ॥ ७० ॥ नवनवतिस्त्रिफलायामृतस्य नागस्य शततमो भागः । दायकुली फलत्रय कनकजल प्रस्थपेषितं निखिलं७१ शतगुलिकाप्रमितं तत्पीतं तत्रेण मेहहरम् । पिबतः कषायमभयादार्ण्यक्षसमांशपाठायाः॥ ७२ ॥ कृष्णलोहेन योक्तव्यो बालेनोपचितो हि सः । कुमारयूनमध्ये तु वरमध्यावरे क्रमात् ॥ ७३ ॥ एक द्वित्रिगुणात्कालादुपयुक्तं गुणावहम् । एरण्डवह्निशम्बूकवर्षाभ्रव्योषसेंधवम् ॥ ७४ ॥<noinclude></noinclude> ivq8oogkr07giehev8i28ly53fobri5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९४ 104 165798 418390 2026-09-05T10:59:02Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८७३) रसरत्नसमुच्चयः । विषं दारु शिरीषास्थि तक्रं लेपेन कुष्ठजिव ॥ ६९ ॥ करञ्जकरवीरार्क मालती रक्तचंदनैः । आस्फोटा कुष्ठमंजिष्ठा सप्तच्छदनिशानतैः ॥ ७० ॥ सिंदु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418390 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८७३) रसरत्नसमुच्चयः । विषं दारु शिरीषास्थि तक्रं लेपेन कुष्ठजिव ॥ ६९ ॥ करञ्जकरवीरार्क मालती रक्तचंदनैः । आस्फोटा कुष्ठमंजिष्ठा सप्तच्छदनिशानतैः ॥ ७० ॥ सिंदुवार व चाक्ष्वेडेर्गवां मूत्रे चतुर्गुणे । सिद्धं कुष्ठहरं तैलं दुष्टव्रणविशोधनम् ॥ ७१ ॥ कुष्ठाश्वमारभृंगार्क मूलस्नुक्क्षीर सैंधवैः । तैलं सिद्धं विषात्रापमभ्यंगात्कुष्ठ जित्परम् ॥ ७२ ॥ भद्रश्री दारुमरिचद्विहरिद्रात्रिवृद्धनैः । गोमूत्र पिटैः पलिकेविषस्यार्धपलेन च ॥ ७३ ॥ ब्राह्मी रसार्क जक्षी रगोशकृद्रस संयुतम् । प्रस्थं सर्वपतैलस्य सिद्धमाशु व्यपोहति ॥ पानाद्यैः शीलितं कुष्ठदुष्टनाडीव्रणापचीः ॥ ७४ ॥ विषं भल्लातकी द्वीपिगुंजानिब फलैर्जयेत् ॥ ७३ ॥ लेपोऽम्लपिष्टः श्वित्राणि पुण्डरीकं च वारुणम् ॥७६॥ ककुभारुष्करद्वी पिस्पृक्का पत्रैलवालुकम् । पिष्टं खादिरतोयेन त्रिरात्रमुषितं पिबेत् ॥ ७७ ॥ वित्रीविषेण संघृष्टं तत्तत्स्फोटान्किला सजान | कण्टकेन विभिद्याशु लेपैलिपेच्च कौ ककैः ॥७८॥ अथवा करवीरा मूल बाकुचिका विषैः । सद्वीपिद्विपपिप्यल्यरुष्करैः ॥ ७९ ॥ बस्तांबुपिष्टैः एरण्डतैलं त्रिफला गोमूत्रं चित्रकं विषम् । सर्पिषा सहितं पीतं वातार्तत्त्वमपोहति ॥ ८० ॥<noinclude></noinclude> rhlqad4go9ccmlyx489mfhdvm2x4i6g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१७ 104 165799 418391 2026-09-05T10:59:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । (८९५) तोऽधराशिना ततोऽप्यक्षीणो नोर्व्वमाश्रयेत् । अथाऽपामार्गतैलेन तथा पुष्करतंदुलैः ॥ ६ ॥ अथवा मलयूक्षीरभावित श्वेत हिंगुना । मर्दितः पुटपा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418391 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भापाटीकोपेतः । (८९५) तोऽधराशिना ततोऽप्यक्षीणो नोर्व्वमाश्रयेत् । अथाऽपामार्गतैलेन तथा पुष्करतंदुलैः ॥ ६ ॥ अथवा मलयूक्षीरभावित श्वेत हिंगुना । मर्दितः पुटपाकेन भस्मतां प्रतिपद्यते ॥ ७ ॥ गोमूत्रद्रोणपुष्पाभ्यां पाकाद्रा कांतभाजने । कडुणी कृष्णधचरतैलाभ्यां वा विमर्दितः ॥ ८ ॥ मृणालतं तुवर्तिस्थः पीतगंधर्वतैलयुक् । ज्वलितो याममात्रं वा मृतवैक्रांतसंयुतः ॥ ९ ॥ वंध्याऽमृता कंदगतः पचनाद्भूधरेऽथ वा । चपलोपल निर्गुडीर साभ्यां रसकेन वा ॥ १० ॥ वाराहीरसयुक्तेन चक्रमर्दरसेन वा । गंधपाषाणयुक्तेन बद्धं वा वाससा रसम् । पचेद्र्धकतैलेन यावदा खोटबंधनम् ॥ ११ ॥ गंधामपिष्टं द्विगुणगंधं वा कान्तसंपुटे ॥ १२ ॥ गंधकाद्वा तृतीयांश कांतपर्पटमिश्रितम् । मूलिका मर्दितं लोह पर्पटान्तगतं धमेत् ॥ १३ ॥ यद्वा गंधकपादेन मर्दितं मूलिकारसैः । लोहसंपुटमध्यस्थभंगारैर्ध्यातमुत्खनेत् ॥ १४ ॥ चोली और सैंवे नमक के चूर्णको देवदाली (बंदाल) लताके रसमें सौ बार भावना देवे । एवं सुहागेको ढाकके रसमें, नवसादरको जम्बीरी नींबू के रस में, गन्धकको मूली के खार और गोमूत्रमें, सज्जीको, त्रिकुटा और सहिजने की जडके रसमें सौ सौ बार भावना देकर सबकी एकत्र<noinclude></noinclude> rturjocz0rxbmor9psw65qw93glr26g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४१ 104 165800 418392 2026-09-05T10:59:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९१९) इन सबको मधु, घृत और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से वृद्धा- वस्था और विरूपता नष्ट होकर मनुष्य स्वरूपवान होता है । (५५) रसायन के गुणवाली औषधियो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418392 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ९१९) इन सबको मधु, घृत और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से वृद्धा- वस्था और विरूपता नष्ट होकर मनुष्य स्वरूपवान होता है । (५५) रसायन के गुणवाली औषधियोंके चूर्णको उन्हीं औषधियोंके इसमें २१ बार भावना देकर उसमें समान भाग पारेकी भहमको मिलाकरके दूध, शहद का पानी, घी और मिश्री इन सबके साथ सेवन करनेसे वृद्धता दूर होती है । (६६) कान्तलोहकी कढाईमें दूधको औटाकर उसमें चौथाई भाग सुवर्णके द्वारा जारण किये हुए पारेकी भस्मको मिला. कर सेवन करे तो यह रस वृद्धावस्थाको नाश करदेता है । (५७) पारे में समान भाग सोनामाखीको जारण करके फिर पारेको भस्म करे घृत, मधु, शतावर के रस अथवा दूध के साथ सेवन करनेसे पारा अस्थ न्त वृष्य होकर कामको वृद्धि करता है । (५८) पीपल, पारेकी भस्म और कपूर इन तीनोंको समान भाग लेकर पकी हुई केलकी फलीमें घृतके साथ मिलाकर सेवन करे ऊपरसे लाल फूलकी अगस्तियाके रसका अनुपान करे । इस प्रकार इसकी सेवन करने से मनुष्य स्त्रियोंमें वृषभ के समान रमण करता है । अर्थात् अत्यन्त कामकी जागृति प्रबल शक्तिकी उत्पत्ति और वीर्य स्तम्भन होता है । पारेकी भस्म सेवन करनेपर पथ्य । पारेकी भस्मको सेवन करनेपर यदि कोई उपद्रव उत्पन्न हो तो कपूर, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, शीतलचीनी और कुटली इनके समान भाग मिश्रित चार तोले चूर्णको चार तोले नाग- बल्ली के पानके रस में मिलाकर सेवन करना चाहिये । इससे पारके सच उपद्रव शान्त होते हैं । पारा सेवन करनेवाले मनुष्य को विशेषकर शालि- धानोंके चावल गेहूँ, जौ, साठीके चावल, जंगली पशुओंका मांस. मूँगका यूप, गौका दूध, और दहीका पानी ये सच पदार्थ भक्षण करने चाहिये । तथा सुहाते २ गरम जलसे स्नान करना, रूप यौवन से युक्त अपने और मनके अनुकूल स्त्रीको भोगना और सरसों के तेलकी शरी- रपर मालिश करनी चाहिये ।<noinclude></noinclude> 2snkvvzp7buex2l1g30lejglnv5a49j पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१४ 104 165801 418393 2026-09-05T11:00:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६९२ ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधोत्पलजटा पिष्टा कटुकी नाशयेज्वरम् । सहदेवीकणाभृंगक्षौद्रं लीढं हरेच्छिशोः ॥ व मिकासज्वरव्याधीन्क्षौद्रेणातिविषा तथा ॥ १३८ ॥ न्यग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418393 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६९२ ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधोत्पलजटा पिष्टा कटुकी नाशयेज्वरम् । सहदेवीकणाभृंगक्षौद्रं लीढं हरेच्छिशोः ॥ व मिकासज्वरव्याधीन्क्षौद्रेणातिविषा तथा ॥ १३८ ॥ न्यग्रोधजंव्वा म्रशिरीषकाणां क्वाथो रसो वा नवपल्लवानाम् । पित्तातिसारज्वरवांतिमूर्छा- तृष्णानि हन्यान्मधुना शिशूनाम् ॥१३९॥ तत्कालके जन्मे हुए बालकको पीपल के चूर्ण और सोनेके बर्कको एकत्र पीसकर खिलावे और बालकके जन्मते ही कॉसीके वर्तन ( थाली या घडियाल ) को पत्थरोसे खूब जोर जोरेसे बजावे । इस शब्दसे भयभीत होकर यार्निसे निकलने की पीडासे पीडित और बेहोश हुआ बालक चैतन्य लाभ करता है और उस पीडाको भूलजाता है । इसके पश्चात् मन्दोष्ण कॉजीसे बालकके शरीरको दो तीन बार धोकर पोंछे बालकके सिर पर घृतकी मालिश करनेसे बालकका ज्वर दूर हो जाता है । सिर के समस्त विकार नष्ट होते हैं और भूत प्रेतादिकी बाधासे बालककी रक्षा होती है । कुटकीके बीजोंका कल्क चटानेसे अथवा कुटकीका रस पान करनेसे और शरीरपर उसकी मालिश करनेसे अथवा नागरमोथेका बधाथ पान कराने से बालकोंका पित्तज्वर अवश्य दूर होता है । पीपलके कोमल पत्तोंको अठगुने जलमें डाल- कर पकावे | एक भाग जल शेष रहनेपर उसको उतारकर छानलेवे । उस जलको पिलानेसे अथवा उस पानी के साथ दूधको पकाकर दूधमात्र शेष रहनेपरं शतिल करके पान करानेसे बालकों का वित्त- ज्वर शान्त होता है । गन्धप्रसारणी कमलकन्द और कुटकी तीनोंको पीसकर वस्त्रमें उसका रस निचोडलेवे । यह रस V<noinclude></noinclude> 2fgpkpl7dfmdqthmsaxo0sxq1h2dlij पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३७ 104 165802 418394 2026-09-05T11:00:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७१५ ) रजतस्य तु चत्वारो द्वौ भागौ कनकस्य च । Heaterष्टमो भागः पिप्पल्याश्च षडेव तु ॥ ५६ ॥ अजाक्षीरेण संपेष्य ताम्रपात्रे निधापयेत् । अभिष्यंदमधीमथ व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418394 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७१५ ) रजतस्य तु चत्वारो द्वौ भागौ कनकस्य च । Heaterष्टमो भागः पिप्पल्याश्च षडेव तु ॥ ५६ ॥ अजाक्षीरेण संपेष्य ताम्रपात्रे निधापयेत् । अभिष्यंदमधीमथ व्रणशुद्धं कुकूणकम् ॥ तिमिर पटलं काचं कण्डूं हति विशेषतः ॥ ६७ ॥ ताँबे की भस्म १६ भाग, मुलैठीका चूर्ण १४ भाग, कूठका चूर्ण १२ भाग, बचका चूर्ण १० भाग, चाँदी की भस्म४ भाग, सुवर्ण भस्म २ भाग, सैंधानमक ८ भाग और पीपलका चूर्ण ६भाग लेवे । सबको एकत्र बारीक पीसकर बकरीके दूधमें खरल करके बत्तियाँ बना लेवे । फिर छाया में सुखाकर और सुरमेके समान बारीक पीसकर ताँबेके पात्रमें भरकर रख देवे । इसको नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंका दुखना, अधि मन्थ, नेत्रोंके व्रण, फूला, कुळूणक, तिमिर, पटल, मोतियाबिन्द विशे- पकर नेत्रोंकी खुजली आदि सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ६५-५७ ॥ नयनरोगहरी वार्ते । कणलवणवचायुग्यष्टिताम्रैः क्रमेण द्विगुणधरण वृद्धै- श्छादुग्धेन. पिष्टैः । निखिलनयनरोगान् हंति वर्तर्विशिष्ट रजइव निशि सर्पिःक्षौद्रयुक्तं वराया५८ छोटी पपिल १ तोला, समुद्रनमक १॥ तोला, वच २ तोले, मुलैठी २ || तोले और ताम्र भस्म ३ तोले सबको एकत्र पीसकर कपडछान करके बकरी के दूधमें खरल करे । फिर बत्ती बनाकर छाया में सुखा- लेवे। जैसे त्रिफलेके चूर्णको घी और शहदके साथ रात्रि में खानेसे सम्पूर्ण रोग नाश होजाते हैं, उसी प्रकार इस बत्तीको भी और शह• दमें जिसकर रात्रिमें ऑजनेसे नेत्रोंके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥५८॥ .<noinclude></noinclude> dz2z65stsp8n80903g8y5bxfxw80rcw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५९ 104 165803 418395 2026-09-05T11:01:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ७३७) लेपयेद्रानुदुग्धेन सैंधवं गलकीलनुत । महिषीमूत्रसंपिष्टं लोह किंह क्षणं पचेत् ॥ ५४ ॥ तेन लेपो निहत्याशु गलरोगं सुदुःसहम् । जलेन लेपयेत्तुल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418395 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ( ७३७) लेपयेद्रानुदुग्धेन सैंधवं गलकीलनुत । महिषीमूत्रसंपिष्टं लोह किंह क्षणं पचेत् ॥ ५४ ॥ तेन लेपो निहत्याशु गलरोगं सुदुःसहम् । जलेन लेपयेत्तुल्यं काञ्जनीचित्रकं विषम् ॥ ५५ ॥ सप्ताहं लेपयेत्तेन ह्यपच्यो गंडमालिकाः। स्फुटंति नात्र संदेहः स्फोटलेपमिमं शृणु ॥ ६६ ॥ निजद्रवेण संपिष्टं मुण्डीमूलं प्रलेपनात् ॥ ९७ ॥ गंडमालाः क्षयं यांति तद्भवं च पिवेज्जलम् । ब्रह्मखंडीय मूलं तु पिष्टं तंडुलवारिणा ॥ ५८ ॥ स्फुटित हंति लेपेन गंडमाला न संशयः । गंधकं सुतकं तुल्यमकक्षीरेण सैंधवम् ॥ ९९ ॥ पिट्वा च कांचनी मूलं लेपोऽयं गंडमालिकाम् | अदृश्यां स्फोटयत्याशु मुडीद्वावेण पेषितम् ॥ ६० ॥ तन्मूलं लेपयेत्तत्र त्रिःसप्ताहंप्रशांतये । पिष्ट्वा जैपालपत्राणि स्वरसेन ततो वटी ॥ छायाशुष्का प्रलेपेन गंडमालां विनाशयेत् ॥ ६१॥ हेमतारयुत सृतं तालकं क्षीरमर्दितम् । क्षौद्रे तिलानां तैलेन प्रस्विन्नं दंतदाढर्यकृत् ॥ दंतदाढप्रसिद्ध गुटिकां देहि सर्वदा ॥ रसस्य धातुबद्धस्य चालनं वर्षणं तथा ॥ ६२ ॥ कके दूधम सैंधेनमको पसिकर लेप करनेसे गलेमें उत्सन्न हुए कीलके समान नोकीले छाले नष्ट होते हैं । लोहेके मैलका भैंसके २६<noinclude></noinclude> ly5b3u8acmf82dx38863mvgs54hqtvg पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८१ 104 165804 418396 2026-09-05T11:01:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७५९) खादी मंजिष्ठाचूर्ण चापातनं जयेत् ॥१८॥ यवचिचारसैर्दृष्टं सैधवं रोपयेद्वणम् । ग्रंथिः कटयां च जघने शममाप्नोति नान्यथा ॥ १९ ॥ शिग्रुमूलं त्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418396 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ७५९) खादी मंजिष्ठाचूर्ण चापातनं जयेत् ॥१८॥ यवचिचारसैर्दृष्टं सैधवं रोपयेद्वणम् । ग्रंथिः कटयां च जघने शममाप्नोति नान्यथा ॥ १९ ॥ शिग्रुमूलं त्वचस्तोयैः पिट्वा लेपेन तं जयेत् । कुष्ठजीरकयो पस्तो यैर्यथिप्रशांतये ॥२०॥ अश्वत्थस्य त्वचो भस्म चूर्णेन सह मिश्रितम् । नवनीतं द्वयोस्तुल्यं मद्ये तेनविलेपनात् ॥२१॥ आसने गुदपार्श्वे च कटयां च पिटिकां जयेत्॥२शा गोमुत्रे क्षालयेत्तां च लेपो बाकुचिबीजकैः । कृत्वा कंडूं निहंत्याशु चित्रकं वा गवां जलैः ॥ नरमूत्रेण सर्पाक्षी पिट्वा लेपेन तां जयेत् ॥२३॥ लेपयेत्कांचनीमूलं नरमूत्रेण पेषितम् । कंडुपामा शमं याति सर्वांगीणा न संशयः ||२४|| शाखोटस्य स्वचस्तोयैः पक्त्वा काथं समाहरेत | पिबेगोमुत्रसंतुल्यं पामार्तः सुखमाप्नुयात् ॥२५॥ पाद कंडुहरं कुर्यान्नवनीतेन मृक्षणम् । हया रिपत्रधूपेन स्वेदनं तदनंतरम् ॥२६॥ पाददाहहरक्काथे तिलाद्दिगुणबाकुची । चूर्णिता मधुसर्पिर्भ्यां द्विकर्ष तत्प्रशांतये ॥२७॥ पादकंडू विनोदार्थं नवनीतेन मृक्षणम् । पथ्याघृतेन संचूर्ण्य मर्दनं करपादयोः ॥२८॥<noinclude></noinclude> oi3m0rg51p5uawpfzs5s9vno0j9zrp2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०३ 104 165805 418397 2026-09-05T11:01:55Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । (७८१) हस्तिपर्णीलवलिकामत्स्याक्षीकल्कवेष्टितौ ॥ ३॥ त्रिपक्at मूकमूषायां सम्योगौ वार्धकापहौ ॥ ४ ॥ रसायन के सेवन करने से दीर्घ आयु स्मृतिशक्ति, सु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418397 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषादीकोपेतः । (७८१) हस्तिपर्णीलवलिकामत्स्याक्षीकल्कवेष्टितौ ॥ ३॥ त्रिपक्at मूकमूषायां सम्योगौ वार्धकापहौ ॥ ४ ॥ रसायन के सेवन करने से दीर्घ आयु स्मृतिशक्ति, सुबुद्धि, आरोग्य- ता, युवावस्था, प्रभा, सुन्दररूप, स्वर की मधुरता, शरीर और इन्द्रि योंके वलकी वृद्धि, तथा वासिद्धि, पुष्टि और कान्ति ये सम्पूर्ण गुण प्राप्त होते हैं । वृद्धावस्था (बुढापा ) प्राप्त होनेके मुख्य पाँच कारण हैं । १ कुमार्गम चलना, २ शीतलपदार्थोंका अधिक सेवन करना, ३ खराब, गला सडा या बासी अन्न खाना, ४ अपनेसे ज्यादह उम्र- वाली या वृद्ध अवस्थावाली स्त्रकि साथ संसर्ग करना, और ५ किसी कारण से मनमें आघात होना या मनका दूषित रहना । रसवलि प्रयोग ( १ ) शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समानभाग लेकर कलि- हारकि रसम घोटकर गोलाबनालेवे । फिर ककडीके बीज, हरफा रेवडी और मछैछी घास तीनोंको एकत्र पीसकर कल्ककरले और उस कल्क- का उक्त गोले के ऊपर एक २ अंगुल ऊँचा लेप करके सुखालेवे। फिर उसको अन्नमूषामें बन्द करके भूधर पुटमें पकावे । इस प्रकार तीनबार भूधरपुट देवे । प्रत्येक पुटके अन्तमें कलिहारीके रसमे घोटकर गोला बनाकर उसपर उक्त कल्कका लेप करना चाहिये । इसके पश्चात उसमें समानभाग त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर रखदेवे । इस रसको योग्यमात्रासे सेवन करने पर अल्पकालमेंही वृद्धावस्था दूर होती है ॥ १-४ ॥ उदयादित्य रस । आवर्तिते रसपलं क्षिप्त्वा द्विपलगंधकम् । आर्द्रकद्रवमुष्टीनां विंशत्या मर्हितं पचेत् ॥ ५ ॥ मृद्गूढताम्रमूषायां तं गुंजाप्रमितं रसम् । ससर्पिनगरं भुक्त्वा तप्तांबुप्रसृतं पिबेत् ॥ ६ ॥<noinclude></noinclude> i5nor13n3gwj29xf6btlq4m57hhkiva 418398 418397 2026-09-05T11:02:35Z Bnarayanan V 10460 418398 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषादीकोपेतः । (७८१) हस्तिपर्णीलवलिकामत्स्याक्षीकल्कवेष्टितौ ॥ ३॥ त्रिपक् मूकमूषायां सम्योगौ वार्धकापहौ ॥ ४ ॥ रसायन के सेवन करने से दीर्घ आयु स्मृतिशक्ति, सुबुद्धि, आरोग्य- ता, युवावस्था, प्रभा, सुन्दररूप, स्वर की मधुरता, शरीर और इन्द्रि योंके वलकी वृद्धि, तथा वासिद्धि, पुष्टि और कान्ति ये सम्पूर्ण गुण प्राप्त होते हैं । वृद्धावस्था (बुढापा ) प्राप्त होनेके मुख्य पाँच कारण हैं । १ कुमार्गम चलना, २ शीतलपदार्थोंका अधिक सेवन करना, ३ खराब, गला सडा या बासी अन्न खाना, ४ अपनेसे ज्यादह उम्र- वाली या वृद्ध अवस्थावाली स्त्रकि साथ संसर्ग करना, और ५ किसी कारण से मनमें आघात होना या मनका दूषित रहना । रसवलि प्रयोग ( १ ) शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समानभाग लेकर कलि- हारकि रसम घोटकर गोलाबनालेवे । फिर ककडीके बीज, हरफा रेवडी और मछैछी घास तीनोंको एकत्र पीसकर कल्ककरले और उस कल्क- का उक्त गोले के ऊपर एक २ अंगुल ऊँचा लेप करके सुखालेवे। फिर उसको अन्नमूषामें बन्द करके भूधर पुटमें पकावे । इस प्रकार तीनबार भूधरपुट देवे । प्रत्येक पुटके अन्तमें कलिहारीके रसमे घोटकर गोला बनाकर उसपर उक्त कल्कका लेप करना चाहिये । इसके पश्चात उसमें समानभाग त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर रखदेवे । इस रसको योग्यमात्रासे सेवन करने पर अल्पकालमेंही वृद्धावस्था दूर होती है ॥ १-४ ॥ उदयादित्य रस । आवर्तिते रसपलं क्षिप्त्वा द्विपलगंधकम् । आर्द्रकद्रवमुष्टीनां विंशत्या मर्हितं पचेत् ॥ ५ ॥ मृद्गूढताम्रमूषायां तं गुंजाप्रमितं रसम् । ससर्पिनगरं भुक्त्वा तप्तांबुप्रसृतं पिबेत् ॥ ६ ॥<noinclude></noinclude> e8z59jieco6cet2bvdjzk6xfwit4j99 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२६ 104 165806 418399 2026-09-05T11:02:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८०४ ) रसरत्नसमुच्चयः । मर्दयेत्तत्पुनर्दत्त्वा गंधं माषचतुष्टयम् ॥ २४ ॥ तन्मध्ये गंधकं दत्त्वा मर्दयेत्तदनंतरम् । भीक्ष्याका घटीमध्ये सन्निरुध्य प्रयत्नत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418399 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८०४ ) रसरत्नसमुच्चयः । मर्दयेत्तत्पुनर्दत्त्वा गंधं माषचतुष्टयम् ॥ २४ ॥ तन्मध्ये गंधकं दत्त्वा मर्दयेत्तदनंतरम् । भीक्ष्याका घटीमध्ये सन्निरुध्य प्रयत्नतः ॥ २५ ॥ वालुकायंत्र मध्यस्थां कृत्वा काचघटीं ततः । पाकस्तत्र तथा कार्यों भवेद्यामत्रयं यथा ॥ २६ ॥ काचपात्रेसमा सद्धं सृतं ततः परम् । भक्षयेद्वत्तिकाः पञ्च रोगैराक्रांतयुग्गलः ॥ २७ ॥ भोजनं पूर्वरोगोकं यत्नतः कारयेद्भिषक् । दुर्बलं वपुरत्यर्थ बलयुक्तं करोत्यसौ ॥ २८ ॥ शुक्रवृद्धिं करोत्येष ध्वजभगं च नाशयेत् । मासेनैकेन सूतेन्द्रो रोगनाशाय कल्पते ॥ २९ ॥ शालयो मुद्रयुक्ताश्च गोधूमा भोजने हिताः । घृतं गव्यं तथा क्षीरं स्निग्धं पथ्यं प्रयोजयेत् ॥ पारावतस्य मांसं च तित्तिरेर्लावकस्य च ॥ ३० ॥ सच्चे मोती, मूँगेकी पिठी, सुवर्ण भस्म, चाँदी भस्म, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक इन औषधियोंको एक २ तोला लेकर लाल कमलके पत्तोंके इसमें एक दिन तक खरल करे। जब वह खूब पतली हो जायँ तब उसमें चार मासे गन्धक डालकर उक्त रसके साथ घोटकर सुखा- लेवे । पश्चात् उसको आवसी शशीमें भरकर ऊपरसे कपटी करके बालुकायन्त्रमें रखकर तीन प्रहरतक तीक्ष्ण अनिके द्वारा पकावे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तच रसको निकालकर बारीक खरल करके शीशीमें भरकर रखदेवे । वैद्य इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह र प्रत्येक रोगसे आक्रान्त और पीडायुक्त मनुष्यको पाँच २ री परि<noinclude></noinclude> sm9kgunbzeaf0p80bm7f2fsvl0gpyqw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५० 104 165807 418400 2026-09-05T11:03:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । उत्पन्न हुए सब प्रकारके गुणोंको धारण करता है । यह प्रयोग चिर- कालतक अवस्थाको स्थिर करनेवाला और ध्यान, धारणा (समाधि) आदि योगके कार्यों में मन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418400 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । उत्पन्न हुए सब प्रकारके गुणोंको धारण करता है । यह प्रयोग चिर- कालतक अवस्थाको स्थिर करनेवाला और ध्यान, धारणा (समाधि) आदि योगके कार्यों में मनको जीतनेंमेंभी समर्थ है । इन मोदकोंको एक वर्ष तक निरन्तर सेवन करनेसे सफेद बाल काले होते हैं और मृत्युका भय दूर होता है । ये कामेश्वर मोदक सब मनुष्योंके लिये हितकारी हैं, ऐसा श्रीनित्यनाथजीने कहा है ॥ १२४-१२७ ॥ बाजीकरण में सामान्य उपाय । कर्षे मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमन्वितम् । . पयोsनुपानं यो लिह्यान्नित्यवेगः सदा भवेत् ॥ १२८ ॥ कुलीर श्रृंग्या यः कल्कमालोड्य पयसा पिबेत् । सिताघृत पयोनाशी स नारीषु वृषायते ॥ १२९ ॥ स्वयं गुप्तेक्षुरकयोबीज चूर्ण सशर्करम् । धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा रासभायते ॥ १३० ॥ बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् । यः खादेत्ससितान्गच्छेत्स स्त्रीशतमपूर्ववत् ॥ १३१ ॥ गंधकेन समं सूतं श्वेतांकोलजटारसैः । त्रिदिनं मर्दितं तेन रसेन गुटिकीकृतम् ॥ १३२ ॥ रक्तचित्रकवाराही पत्र निर्यास पेषिते । सद्योहताज मांसस्य पिण्डे न्यस्तं विपाचितम् १३३॥ तप्त तैले मज्जयीत यावसिंदूर सत्रिभम् । भक्षयेन्मधुसर्पि गोक्षीरं च पिबेदनु ॥ १३४ ॥ स्त्रियः सेवेत तत्त्यागे यतः स्फुटति लोचनम् ।<noinclude></noinclude> owdpmrkz97cc703yx8ha2kjcfskfz16 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७३ 104 165808 418401 2026-09-05T11:04:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८५१ ) अंत घूमविदग्धायाश्चूर्ण सोष्णांबु शूलजित् ॥७३॥ त्रिफलामृत निर्गुडीमेघनादपुनर्नवा | का समदत्तिधत्तरवत्रिणीनां रसैरिदम् ॥ ७६ ॥ भावितं गु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418401 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८५१ ) अंत घूमविदग्धायाश्चूर्ण सोष्णांबु शूलजित् ॥७३॥ त्रिफलामृत निर्गुडीमेघनादपुनर्नवा | का समदत्तिधत्तरवत्रिणीनां रसैरिदम् ॥ ७६ ॥ भावितं गुडमध्वाज्यैर्जलत कानुपायिनः । स्वल्पक्षीररसांशस्य हन्याजीर्णज्वरं क्षयम् ॥ कुष्ठास्थिस्राव पांडुर्शपक्तिशूल प्लिहामयान् ॥ ७७ ॥ बाकुचीनिवपञ्चांगं वेडचित्रकवरस कम् पथ्या नागरशम्याकगुडूचीकटुकीफलम् ॥ ७८ ॥ खदिरासनसारेण भावितं लोहभस्म च । कर्षमात्रं समध्वाज्यं क्षयकुष्ठनिषूदनम् ॥ ७९ ॥ गुडस्य कुडवे पक्वं लोहभस्म पलोन्मितम् । कोलप्रमागं रोगेषु तैस्तैर्योोंगेः प्रयोजयेत् ॥ ८० ॥ व्योषादिनवकर्यांशस्तथाशां लोह भस्मनः । अंशोऽश्मजतुनः खण्डस्याष्टौ सर्व समाक्षिकम् ॥ कतिपात्रगतं यक्ष्मज्वरापस्मारघस्मरम् ॥ ८१ ॥ बिसार त्रिमधुरत्रिफला लोहगंधकम् । चूर्णमर्जुनपत्राणां सभृंगत्रिफलायुतम् ॥ ८२ ॥ सेवितं मधुसर्पि जरावैरूप्यनाशनम् ॥ ८३ ॥ मधुकं मृत लोहं च धात्री च त्रिगुणोत्तरम् । रसेन भावितं छिन्नरुहायाः साज्यमाक्षिकम् ॥८४॥ सेवितं भोजनस्यादौ वातपित्तामयाञ्जयेत् । मध्ये प्रविष्टमन्तेम्लपित्तं शूलं च पक्तिजम् ॥ ८५ ॥<noinclude></noinclude> hhhbzi7pi3h12vkkbufhugvfdi5dnj0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९५ 104 165809 418402 2026-09-05T11:04:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८७३) 'कोरकं चीरनिष्काये लांगलीविषसर्षपैः । गंधक कोलमरिचैः सस्नुकुक्षीरैर्विपाचितम् ॥ जयेज्ज्योतिष्मतीतैलमन लत्वग्गदानपि ॥ ८१ ॥ स्वरसं वीजपू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418402 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । (८७३) 'कोरकं चीरनिष्काये लांगलीविषसर्षपैः । गंधक कोलमरिचैः सस्नुकुक्षीरैर्विपाचितम् ॥ जयेज्ज्योतिष्मतीतैलमन लत्वग्गदानपि ॥ ८१ ॥ स्वरसं वीजपूरस्य नचाब्राह्मीरसं घृतम् । वन्ध्या पिबेत सविषं सुपुत्रैः परिवार्यते ॥ ८२ ॥ वीरालांगलिकादंती विषपाषाणभेदकैः । प्रयोज्यो मूढगर्भाणां प्रलेपो गर्भमोचनः ॥ ८१ ॥ देवदारुविषं सर्पिगोमूत्रं कण्टकारिका । वचा वाकस्खलनं हंति बुद्धेश्व परिवर्धनम् ॥ ८१ ॥ विषं सर्पिः सिता क्षौद्रं तिमिरापहमञ्जनम् । विषं चैकमजाक्षीरकल्कितं घृतधूषितम् ॥ ८५ ॥ विषं धात्रीफलर सैरसकृत्परिभावितम् । अञ्जनं शंखसहितं प्रगाढं तिमिरं जयेत् ॥ ८६ ॥ विषमिन्द्रायुधं स्तन्यैर्दृष्टं काचजिदञ्जनम् ॥ ८७ ॥ बीजपूररसैर्दृष्टं विषं तद्वत्सितान्वितम् । विषं मागधिका द्वे च निशे काचन्नमंजनम् ॥ ८८ ॥ शुकाजिद्विषं कृष्णायुक्तं गोमूत्रभावितम् ॥ समुद्रफेनं स्फटिका कुरुविन्दं रसांजनम् । कूर्मपृष्ठं च तुल्यानि तेभ्योऽर्घाशा मनःशिला ॥ ९० ॥ अर्धमानानि मरिच सैंधवायोरजांसि च । ८९ ॥ अथो यथोत्तरं दद्यादयसा च समं विषम् ॥ ९१ ॥ आगारधूम सहितैर्वस्तमूत्रेण कल्कितैः ।<noinclude></noinclude> fwzr7orx42w2kqmedqsxekkqtie6c0n पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१८ 104 165810 418403 2026-09-05T11:04:59Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (८९६) रसरत्नसमुचयः । मिला ले | इसको बडवानल विह कहते हैं । इस बडवानल विडमें पारेको पीसकर अग्निदेने से पारा अभिसह (अर्थात् अग्रिको सहने वाला) हो जाता है । यह विड् जारण... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418403 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८९६) रसरत्नसमुचयः । मिला ले | इसको बडवानल विह कहते हैं । इस बडवानल विडमें पारेको पीसकर अग्निदेने से पारा अभिसह (अर्थात् अग्रिको सहने वाला) हो जाता है । यह विड् जारण कर्ममें बहुत उपयोगी है। परिको प करनेसे पहले इस विडले पारेको अग्निसह बना लेना अत्युत्तम है । इस प्रकार पारेको अभिसह बनाकर फिर किसी धातुके साथ मिलाकर, अथवा केवल पारेको नियामक अधिधिया के साथ या मिश्री और अडोलको जडक रसके साथ अथवा वैक्रान्त आदि रखोंके साथ मर्दन करे । फिर यंत्र में रखकर उसके क्रम क्रमसे ऊपर अभिकी वृद्धि करता हुआ पकावे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब पारेकी गरणको निकालकर बारीक पीस लेवे । नीचेकी अग्नेसे तपा हुआ भी पारा न तो कम होता है और न उठ सकता है । चिरचिटेके तेल अथवा पोहकर मूल के इसमें पीसे हुए चावलों के कल्कमें अथवा कठूमर के दूधमें पीसी हुई श्वेतहींगसे कल्क पारेको मर्दन करके पुटपाककी विधिले पकावे तो पारा भस्म होजाता है । द्रोणपुष्पी (पा) के पथा- ङ्गको गोमूत्रमें पीसकर उसमें पारेको खरल करके कान्सलोह के सम्धु- हमें पकाने से पारा भस्म होता है मालकांगनी के तेल और काले धातु- के तेल के साथ घोटकर पकानेसे पारेकी भस्म होजाती है । कमलकी नालके तन्तुओंकी अण्डी के तेलमें बत्ती बनाकर उसमें पारेको खरल करके तीन घंटेतक अग्नि देनेसे कमलकी नालके तन्तुओंका अण्डीके तेलके कल्क बनाकर उसके बचिमें पारेको रखकर तीन घंटेतक कानेसे पारा भस्म होजाता है। वैक्रान्त मणिकी भस्मके साथ पारेको घोटकर बाँझ ककोडे के कन्दमें अथवा गिलोय के कन्दमें रखकर भूधरपु- टमें पकानेसे पारा भस्म होता है। पारेको चपलधातु और निर्गुण्डीके इसमें घोटकर अग्नि देनेसे अथवा खपरिया और वाराही कन्द के रसके साथ किम्वा खपरिया और चकवडक रसमें घोटकर अग्नि देनेते अहम<noinclude></noinclude> 7jr04a6ndv3pifgtqpa0ez6l2fef39j पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४२ 104 165811 418404 2026-09-05T11:05:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ९२० ) रसरत्नसमुच्चयः । पारा सेवन करनेपर अपथ्य । काँजी, तेल, मद्य, दही, तरबूज, करेला, खट्टे पदार्थ, लहसन, फट- करी, मूली, दो दलवाले अन्न (दाल) बेल, बैंगन, साँपकी छतरी और मको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९२० ) रसरत्नसमुच्चयः । पारा सेवन करनेपर अपथ्य । काँजी, तेल, मद्य, दही, तरबूज, करेला, खट्टे पदार्थ, लहसन, फट- करी, मूली, दो दलवाले अन्न (दाल) बेल, बैंगन, साँपकी छतरी और मकोय इन सब पदार्थोंको भक्षण नहीं करना चाहिये । एवं शरी- रको मर्दन करना, रात्रिमें जागना, दिनमें सोना, अत्यन्त खट्टे, कडवे, और अति नमकवाले, पदार्थों का सेवन करना निषिद्ध है । केवल मधुर रसवाले पदार्थोंका भक्षण करना चाहिये । बहुत गरम और बहुत शी- तल औषधियाँ सेवन नहीं करनी चाहिये । तथा शोक, तीक्ष्ण वायु और तीक्ष्ण धूपका सेवन, क्रोध और चिन्ता इन सबको त्याग देना चाहिये | पारेकी भस्म या किसी धातुकी भस्मको सेवन करनेवाले मनुष्यको विशेषकर त्याज्य पदार्थों का सेवन करनेसे पारा जीर्ण न होकर (अर्थात् हज्म न होकर ) उसको एकदम मार देता है । अथवा अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न करदेता है । पारके विकारोंकी शान्ति । पारा सेवन करनेवाले मनुष्यकी नाभिके नीचे शूल हो शरीर जक- डजाय, निद्रा, आलस्य, ज्वर, नेत्रोंका स्तम्भित होना, अङ्गका टूट• ना, अरुचि, और शरीर में दाह आदि उपद्रवोंके होनेपर गोमूत्र के साथ ककोडेकी जडको पीसकर उसका रस निचोड करके उसमें काला नमक डालकर तीन दिन तक पान करे अथवा बिजौरा नींबू के रस में सैंधानमक और सोंठको पीसकर ३ दिन तक पीवे तो उक्त उपद्रव शांत हो जाते हैं। यदि असावधानी से सीसेकी भस्म या बंगभस्म के साथ पारा सेवन किया गया हो तो गोमूत्र के साथ करेले के कन्द और सैंधेन कम को पीसकर पानकरे। अथवा ककोडेकी जड, पातालगरुडी, हरड, और शर- फोकाकी जड इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट करके अठगुने गोमूत्र मिलाकर पकावे। जब वह पककर आठवाँ भाग शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। उस गोमूत्र में सैंधानमक डालकर पान करानेसे उक्त<noinclude></noinclude> 4nm8h2y9q7e79euuj4y0h2blh9lw04r पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१५ 104 165812 418405 2026-09-05T11:07:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ६९३ ) थोडा २ बालकोंको पान करानेसे उनके ज्वरको नाश करता है । सह- देई, पीपल और भाँगरा इन औषधियों के समान भाग चूर्ण को शहदम मिलाकर अथवा शहद और अतीसके चूर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418405 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ( ६९३ ) थोडा २ बालकोंको पान करानेसे उनके ज्वरको नाश करता है । सह- देई, पीपल और भाँगरा इन औषधियों के समान भाग चूर्ण को शहदम मिलाकर अथवा शहद और अतीसके चूर्णमें मिलाकर चटानेसे बालकोंकी वमन, खाँसी, ज्वर आदि व्याधियाँ दूर होती हैं । शहद, अतीसका चूर्ण और चूने का पानी मिलाकर देनेसे भी उक्त राग दूर होते हैं । बड, जासुन, आम और सिरस इनक कोमल पतका स्वरस अथवा क्वाथ लेकर उसको शहदमें मिलाकर थोडा २ पान करानेसे बालकोंका पित्तातिसार, ज्वर, वमन, मूर्च्छा, तृषा आदि सम्पूर्ण उपद्रव नष्ट होते हैं ।। १३३-१३९ ॥ मध्वgशृंगीपाठान्दं रक्तातीसारहच्छिशोः । क्षीरं सबोलं कंठोरः शिरः कफहरं शिशोः ॥ १४० ॥ मधुकं मरिचं पिष्ट गोजलैः परिसेवितम् । विनाशयति वेगेन बालानां मूत्रविग्रहम् ॥ १४१ ॥ यष्टीलोध्रकणागंधबलाशाल्मलिसारिवाः । सुगंधा माक्षिकं वेति सिद्धंसर्पिर्निषेवितम् ॥ शुष्यद्गात्रस्य बालस्य बृंहणं बलकारि तत् १४२॥ शंखनाभिकणापारसांजन विनिर्मिता । वर्तनिर्हति मधुना बालनेत्राखिलामयान् ॥ १४३ ॥ श्रीरेऽश्वगंधया तोम्रपात्रे सूतेन साधितम् । घृतं पुष्टिकरं वर्ण्य बलकृत्सुखकारि च ॥ १४४ ॥ श्लेष्माहत्तालुमांसस्थः करोति कुपितः शिशोः । तालुकण्टकमेतेन तालुदेशे च निम्नता ॥ १४५ ॥ १ ताम्रचूडांडैः परिसाधितम् ।<noinclude></noinclude> jfwwrcps0wjjtsvi803zrj9i6uz8qff पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३८ 104 165813 418406 2026-09-05T11:07:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१६) रसरत्नसमुचयः । शिश्रुतैल । चिचादलस्वरसपेषित शिशुवीजं कांस्ये निघृष्य परिशोष्य खरातपेन तैलं ततः शृतमिदं शशि- पादयुक्तं युंज्याद्रणार्मतिमिरे तिलमात्र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७१६) रसरत्नसमुचयः । शिश्रुतैल । चिचादलस्वरसपेषित शिशुवीजं कांस्ये निघृष्य परिशोष्य खरातपेन तैलं ततः शृतमिदं शशि- पादयुक्तं युंज्याद्रणार्मतिमिरे तिलमात्रमक्ष्णि॥५९ ॥ सैंजनके बीजोंके चूर्णको काँसके बर्त्तनमें, इमली के पत्तोंके स्वर • सके साथ खरल करके तीक्ष्ण धूपमें रख देवे । जब उसमें तेल निक लकर बहने लगे तब उसको शीशीमें भरकर रख देवे । इस तेल में चौथाई भाग कपूरका चूर्ण मिला देवे । इस तेलको तिल मात्र नेत्रोंमें लगाने से नेत्रोंके व्रण, अर्म तिमिर आदि रोगोंमें शीघ्र लाभ होता है ॥ ५९ ॥ नेत्ररोगके सामान्य उपाय । शिलायां निहतं नागं रसराजप्रवेशितम् । द्विगुणं तुत्थमीषच्च कर्पूरं द्रोणपुष्पजैः ॥ ६० ॥ रसैर्विमर्दयेद्वर्तिरेषाऽभिष्यंदनाशिनी । कार्पासरस पिष्टेन्दुमधु शुल्बरसाञ्जनम् ॥ ६१ ॥ वाताभिष्यंदजे तात्रं तिलपण्यैमर्दितम् । शुल्वजीमूतलोहं च सीसं च समभागिकम् ॥ ६२ ॥ द्विगुणं चाञ्जनं जातीतिलपर्णी मयूरजैः । पिष्टं निर्घृष्टदध्न्यकै श्लेष्माभिष्यंदनाशनम् ॥ ६३॥ भुजग तुल्यौ ताभ्यां द्विगुणमञ्जनम् । ईषत्कर्पूरसंयुक्तं दशमांश च सर्जकम् ॥ ६४ ॥ बलानागबलाजाजी रसैस्ता दिनत्रयम् । मर्दितं स्यादभिष्यंदे सन्निपातात्मके हितम् ॥ ६५॥<noinclude></noinclude> 4z0ffe4nsuj6iivb403nhwqkgjo0jpv पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६० 104 165814 418407 2026-09-05T11:55:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । मूत्रमें पीसकर कुछ देर अग्निपर गरम करके लेप करनेसे गले के सम्पूर्ण रोग शीघ्र नाश होते हैं । कचनारकी छाल, चीता और वत्सनाभविष तीनोंको समानभा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418407 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । मूत्रमें पीसकर कुछ देर अग्निपर गरम करके लेप करनेसे गले के सम्पूर्ण रोग शीघ्र नाश होते हैं । कचनारकी छाल, चीता और वत्सनाभविष तीनोंको समानभाग लेकर जलमें खरल करके लेप करे । इस औष- धिको ७ दिनतक प्रलेप करनेसे अपची और गण्डमाला अवश्य फूट- जाती हैं । उनके फुटजाने पर निम्नलिखित औषधियोंका लेपकरे । गोरखमुंडीकी जडको गोरखमुंडीकेही रसमें पीसकर लेप करनेसे अथवा गोरखमुंडीकी जडके क्वाथको पान करनेसे गण्डमाला रोग शीघ्र दूर होता है । ब्रह्मदण्डीकी जडको चावलोंके जलमें पीसकर फूटी हुई गण्डमाला के ऊपर लेप करनेसे निस्सन्देह आरोग्य लाभ होता है । गन्धक, पारा, सैंधा नमक और कचनार की जड सबको समभाग लेकर आक के दूधमें खरल करके लेप करे । यह लेप गलेकेभीतर उत्पन्न हुई। अदृश्य गण्डमालाको शीघ्र फोड देता है । फिर उसको शमन करने के लिये उसपर गोरखमुंडीकी जडको मुंडीकेही रसमें पीसकर लेप करे । इस प्रकार २१ दिन बराबर प्रलेप करनेसे गण्डमाला आरोग्य होजाती है | अथवा जमालगोटके पत्तोंको उनकेही स्वरसमें घोटकर गोलियां बनाकर छायामें सुखालेवे । ये गोलियां जलमें घिसकर लेप करनसे गण्डमालाको विनाश करती हैं। सोने के और चांदी के बर्फ, पारा और हरताल चारोंको दूधमें खरल करके गोलियां बनालेवे । फिर उन गोलियोंको तिल के तेल से भरे हुए दोला यन्त्र में अधर लटकाकर स्वेद देवे | फिर शहद डालकर रखदेवे । ये गोलियाँ मुखमें रखने से दाँतों को अत्यन्त मजबूत कर देती हैं । दाँतोंको दृढ करनेके लिये अत्यन्त प्रसिद्ध उक्त गोलीको अथवा किसा धातुवद्ध पारेकी गोलीको बारंबार मुँहमें इधर उधर चलावे अथवा उस गोलीको दाँतों से घिसे तो दाँत खुब मजबूत होजाते हैं ॥ ५४-६२ ॥ मस्तकरोग । शिरस्तोदाश्च षट् प्रोक्ता दोषैः सर्वास्त्रजंतुभिः । कम्पश्चार्धावभेदश्च सूर्यावर्तोऽपि शंखकः ॥ ६३ ॥<noinclude></noinclude> hft6fhjktbq4bgsitqa4xh1c628kumm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८२ 104 165815 418408 2026-09-05T11:55:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७६० ) रसरत्नसमुच्चयः । ( १९ ) लिंग पकागया हो तो प्रथम शस्त्रक्रियाके द्वारा रक्त निकलवाकर पीछे रोगीको घोलका चूर्ण सेवन करावे । इससे लिंग व्याधि नष्ट होजाती है । (१... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७६० ) रसरत्नसमुच्चयः । ( १९ ) लिंग पकागया हो तो प्रथम शस्त्रक्रियाके द्वारा रक्त निकलवाकर पीछे रोगीको घोलका चूर्ण सेवन करावे । इससे लिंग व्याधि नष्ट होजाती है । (१६) गूलर, वड, पीपल, आम और जामुन इनकी छालको समानभाग लेकर चौगुने जलमें डालकर काथ बनालेवे । उस कापसे प्रतिदिन लिंगको धोनेसे लिंगपाक रोग नष्ट होता है । (१७) जीरको घीग्वारके रसमें पीसकर लेप करे । इससे लिंगरोगकी दाह और पाक अवश्य नष्ट होता है । अथवा (१८) बडे शंखको जलमें घिसकर लिंगपर लेप करे या बेर और सुपारीको अथवा खैरसार (कत्थे) को पानी में पीसकर लेप करे यह लेप लिंगको व्याधिको नाश करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है (१९) लिंग पकगया हो तो उसपर सुगन्धक नामक घृतका लेप करनेसे शीघ्र लाभ होता है । (२०) नीम के पत्ते, खैरसार और मँजीठ इन तीनों औषधियों को समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेगे । इस चूर्ण को व्रणमें भरने से लिंगपाकका व्रण आराम होता है । संधेनमकको खिरनी के रसमें घोटकर लगाने से लिंगका व्रण भरजाता है । एवं कमर और जांवमें उत्पन्न हुई। गांठ शमन होजाती है । (१२) सैंजनेके जड़की छालको दारचीनी के काढेमें पीसकर लेप करे अथवा कुठ और जीरेको पानीमें पीसकर लेप करे तो गांठ बैठजाती है । (२३) पीपल के छालकी भस्म को समानभाग चूने के साथ मिलाकर दोनोंके बराबर नैनीधीमें खरल करके मल्हम बनालेवे। इस मल्हमको बार बार लगानेसे आसन, गुदा के समीप और कमर में निकली हुई ग्रन्थि दूर होती है (२४) उक्त स्थानोंमें निकली हुई गाँठ या फुन्सीको पहले गोमूत्र से धोवे, फिर उसपर बाबचीके वीजों को पानी में पीसकर उसकी पुल्टिस बनाकर बांधे, अथवा चीतेकी जड चतिके पंचांगको गोमूत्र में पीसकर पुल्टिस बनाकर बाँधे तो खुजली और गांठ आदि शान्त हो जाती है । (२५) सरहटी घासको मनुष्य के मूत्र में पीसकर लेप करनेमे फुन्सी या<noinclude></noinclude> etmbbfjihelypkb1d63rj87nt7ah1qj