विकिस्रोतः sawikisource https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D MediaWiki 1.47.0-wmf.18 first-letter माध्यमम् विशेषः सम्भाषणम् सदस्यः सदस्यसम्भाषणम् विकिस्रोतः विकिस्रोतःसम्भाषणम् सञ्चिका सञ्चिकासम्भाषणम् मीडियाविकि मीडियाविकिसम्भाषणम् फलकम् फलकसम्भाषणम् साहाय्यम् साहाय्यसम्भाषणम् वर्गः वर्गसम्भाषणम् प्रवेशद्वारम् प्रवेशद्वारसम्भाषणम् लेखकः लेखकसम्भाषणम् पृष्ठम् पृष्ठसम्भाषणम् अनुक्रमणिका अनुक्रमणिकासम्भाषणम् श्रव्यम् श्रव्यसम्भाषणम् TimedText TimedText talk पटलम् पटलसम्भाषणम् Event Event talk सदस्यः:V(g) 2 25211 418207 418203 2026-09-04T21:53:42Z EmausBot 3495 स्थानांतरित लक्ष्य [[सदस्यः:G(x)-former]] पृष्ठ पर टूटी हुई रीडायरेक्ट को ठीक करना। 418207 wikitext text/x-wiki 9vhg30k1e6nvvz0wv8aqv2lym7zg53g पृष्ठम्:श्रीपाञ्चरात्ररक्षा.djvu/२४१ 104 49036 418206 249864 2026-09-04T12:35:42Z ~2026-47858-85 10717 . 418206 proofread-page text/x-wiki thkrqcc11bsaw56w9g8jwpgbghogdjb पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३१ 104 165618 418208 2026-09-05T08:58:41Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६०९) सं मधुना सर्व गुटिका कृमिनाशिनीम् ॥ २२५ ॥ खादयित्वानुतोयं च मुस्तानां कृमिशांतये ॥ आखुपणकषायं चशर्करां पिब सर्वथा । कृमिज्वरोपांत्यर्थं खण्डामलकमत्ति... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418208 proofread-page text/x-wiki f0vldh5izivw37t326pc632o0fy12ss पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३२ 104 165619 418209 2026-09-05T08:58:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१० ) रसरत्नसमुच्चयः । कीटमर्द रस । शुद्धसूतं शुद्धगंधमजमोदा विडंगकम् । विषमुष्टी ब्रह्मबीजं क्रमादुक्तगुणं भवेत् ॥२२८॥ चूर्णयेन्मधुना लेहां निष्केकं कृमि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418209 proofread-page text/x-wiki aku4rkyvuq9b6jjnh7scmk8lcfc8cno पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३३ 104 165620 418210 2026-09-05T09:15:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६११ ) कर देना चाहिये । यह रस कृमियोंको नष्ट करने और उनके निकलते समय होनेवाले शुलको शमन करने के लिये अत्यन्त उपयोगी है ॥ २३०-२३२ ॥ कृमिहर रस | शुद्धसं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418210 proofread-page text/x-wiki n65f3fi0ikg8z5v6fcokgv5jvx2k3et पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३४ 104 165621 418211 2026-09-05T09:15:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । सम्पूर्ण कृमिसमूह को नाशकर देता है || २३५ ॥ २३६ ॥ इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषाटीकायां विशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २० ॥ एकवि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418211 proofread-page text/x-wiki ewji2nn714xncddgf3vhrwykz3e63ma पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३५ 104 165622 418212 2026-09-05T09:16:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६१३) नागरैरण्डमूलानां काथं तदनुपाययेत् ॥५॥ अभ्यज्यैरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशकम् । विरेके तेन संजाते स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥६॥ वातारिसं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418212 proofread-page text/x-wiki bonb3b83j91894gjrj8t0piith1hgf2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३६ 104 165623 418213 2026-09-05T09:16:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वह्निजलैः क्षणं तव । शीतारिसंज्ञो हि रसोऽ- यमस्य वल्लं तदर्धे यदि वाऽऽर्द्धकेण ॥१०॥ मरीच चूर्णेन घृत प्लुतेन सेवेत मासं सघृतं च पथ्यम्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418213 proofread-page text/x-wiki 5br15o6jgj01ku3ciu5m0cbtp9pbtpr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३७ 104 165624 418214 2026-09-05T09:16:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६१५) व्योषगंध कतोराणां प्रत्येकं तु पलं पलम् । निद्रावेण संमर्च भावयेत्सप्तधा पृथक् ॥ १४ ॥ हेमास्तुक्पयो वासाइयारिविषमुष्टिभिः । पिण्डित वाल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418214 proofread-page text/x-wiki bexyyrrjdjyknqyp1itt9oj76iz0b52 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३८ 104 165625 418215 2026-09-05T09:18:10Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१६) रसरत्नसमुच्चयः । विचूर्ण्य तद्वादशधाऽर्कदुग्धैः पुटेत वह्नि त्रिफलाजलैश्व | संभावितोऽर्केश्वर एष सूतो गुंजाद्वयं चास्य फलत्रयेण ॥ ददीत मात्रितयेन सुप... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418215 proofread-page text/x-wiki kmrpn4hw3co5i1393v1ge56be8jg9ys पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६३९ 104 165626 418216 2026-09-05T09:20:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भावाटी कोपेतः । ( ६१७) पारा १ भाग, हरताल ८ भाग और अरणीकी जड ८भाग लेकर प्रथम पारे और हरतालकी कज्जली करले, फिर उसमें अरणीकी जडका चूर्ण और समस्त औषधिके बराबर गुड डालकर व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418216 proofread-page text/x-wiki au1vneljicomettsqknbvafeclz69ue पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४० 104 165627 418217 2026-09-05T09:21:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६१८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वितीय गन्धाश्मगर्भ रस । गंध चूर्णितं कृत्वा सूक्ष्मत्रत्रेण बध्य च । भाण्डे गोदुग्धकं दत्त्वा प्रावृतं खर्परेण च ॥२३॥ अग्नि प्रज्वाल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418217 proofread-page text/x-wiki namtb824siurqwksb764kkhp1jo13dm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४१ 104 165628 418218 2026-09-05T09:24:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६१९ ) करे । इसके पश्चात् उसको सुखाकर बारीक चूर्ण कर लेवे। इस रसको पहले दिन सात रत्ती परिमाण सेवन करे । फिर दूसरे दिन ८ रती, और तीसरे दिन ९ रत्ती, इस क्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418218 proofread-page text/x-wiki doehjtt89pkablrbq0nlqlvafzf8niq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४२ 104 165629 418219 2026-09-05T09:25:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२० ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधकस्य दश द्वौ च कटुत्रिफलयोस्त्रयः ॥ वह्निचित्रकमुस्तानां वचाश्वगंधयोरपि ॥ ३० ॥ रेणुका विषकुष्टानां पिप्पलीमूलनागयोः । एकैकस्तु भव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418219 proofread-page text/x-wiki suim7ih7429w6xkokfi9ogudlpvipyp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४३ 104 165630 418220 2026-09-05T09:25:46Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६२१ ) चौगुना तेल और पके हुए आकके पत्तोंको रस अठ गुना लेकर सबको एक बर्तन में भरकर यथाविधि तेलको पकावे । यह तेल स्पर्शवास (सुन्नी) को नष्ट करने के लिये... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418220 proofread-page text/x-wiki b9z361ua9bwfzmswdbd329dvysoywoh पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४४ 104 165631 418221 2026-09-05T09:26:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । युक्तं भजेन्मण्डलमामयांतम् ॥ ३६ ॥ हियावलीक्वाथविपाचितं च स्पर्शप्राणाशा- यददोत्रीगंधम् । हियावलीकंद विलेपनाच्च स्पर्शप्रदेशः क्षयम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418221 proofread-page text/x-wiki cdy9fos9yzo5ks8x2vbfkwyo0lrgoa2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४५ 104 165632 418222 2026-09-05T09:26:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६२३ ) जहाँ सुन्नी होती है वहाँ ) छाले पडजाते हैं उनपर उक्त अजवायनक घृतका लेप करनेसे छालों सहित स्पर्शनात (सुन्नी) रोग क्षण भरमें नष्ट होजाता है । ६ अ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418222 proofread-page text/x-wiki mipazhhwz7gu60smr6rwkh9vrmjftn2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४६ 104 165633 418223 2026-09-05T09:27:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२४ ) रसरत्नसमुच्चयः । परिमाण सेवन कराकर ऊपर से हरड, आमले, गिलोय, कुटकी और नमिका पंचाङ्ग इन सबका काढा बनाकर पान करावे । अथवा ताल- मखानेकी जड, गिलोय, सोंठ और हल्दी इनक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418223 proofread-page text/x-wiki 0c6vdpwnvhb9bx51qcdjsf39c7v7ua5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४७ 104 165634 418224 2026-09-05T09:27:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६२५) अण्डीके तेल में मिलाकर गरम पानी के साथ सेवन करावे । अथवा आमवातके रोगीको अनिलारि रस, गूगल और अण्डीके तेलमें मिलाकर अथवा त्रिकुटा और शुद्ध गन्ध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418224 proofread-page text/x-wiki h1r3v9v8g0vs0sudpznc4d0zdt43v94 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४८ 104 165635 418225 2026-09-05T09:28:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । शुष्क गवाक्षीमादाय घृष्टं कांस्यं च कंबलम् । गोघृतेनाssयसं पिष्ट्वाऽप्यागते नस्यमाचरेत् ॥५४॥ श्वेतापराजिताबीज विजयाबीजमेव च । नरसूत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418225 proofread-page text/x-wiki tfuw8me7ioxq1cr2w104p8ny7wmhy6d पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६४९ 104 165636 418226 2026-09-05T09:28:27Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६२७) अपस्मार रोग नष्ट होता है । अथवा लोहभस्मको गायके घृतमें खरल करके नस्य देवे इससे अपस्मारका दौरा होनेपरभी लाभ होता है । या सफेद अपराजिता के बीजो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418226 proofread-page text/x-wiki lj0j4d77ttf7kveuafi3fyffj1fnoa2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५० 104 165637 418227 2026-09-05T09:28:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । बकरके बाल और बकरीका घी इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करके, फिर बकरके मूत्रमें भावना देवे | यह माहे- श्वर धूप सब प्रकार की ग्रहबा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418227 proofread-page text/x-wiki 2qqgnqynri008beb2gxke45w9ps3dug पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५१ 104 165638 418228 2026-09-05T09:30:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । ( ६२९) शरीर के किसी एक भागमें सुई चुभोने के समान पीडा होना प्रतिदिन शरीरका दुर्बल होना, अंगका फडकना और वह स्थान स्पर्श करनेसे शीतल मालूम होना ये एका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418228 proofread-page text/x-wiki 6p35ly3avqv43p541n3cxdnt6t9rd20 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५२ 104 165639 418229 2026-09-05T09:31:02Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३० ) रसरत्नसमुच्चयः । फिर अदरख के रस में १० बार भावना देकर दो दिनतक चीतेके रस में घोटे । इसके पश्चात् उसमें चौथाई भाग शुद्ध मीठा तेलिया मिलाकर कुछ देर चीतेक काथमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418229 proofread-page text/x-wiki 6xlpu8166wyprgq34xmk1a9ya1umgz8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५३ 104 165640 418230 2026-09-05T09:32:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । वाताद्यष्टमहारोगाञ्छ्वासकासयुतं क्षयम् । ( ६३१ ) हलीमकं च पांडुं च ज्वरानपि सुदुस्तरान् ॥७५॥ इत्यादिकगदान्सर्वान्विनाशयति निश्चितम् करोति दी... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418230 proofread-page text/x-wiki ojahm3i9tb5zzgjbzxugb3yuydl671k पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५४ 104 165641 418231 2026-09-05T09:32:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भयंकर ज्वर इत्यादि सम्पूर्ण व्याधियोंको अवश्य नाश करता है। जठरा- निको सैकडों दीपकों के तेजके समान प्रदीप्त करता है । इस रसको त्रिकुटा और अ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418231 proofread-page text/x-wiki qf5ahz0ub9pufpn4w9m0zodnmjgbjj3 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५५ 104 165642 418232 2026-09-05T09:33:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६३३) विचूर्ण्य पर्पटी सम्यग्वैक्रांतस्त्रिंशदशतः । निक्षिप्य हिंगुतोयेन शतधा परिभाषितम् ॥८६॥ निरुष्य मलमुषायां स्वेदयेदतियत्नतः । पुनः संच... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418232 proofread-page text/x-wiki gsbiriuwfm32dqkt419ixk1fuuolq8f पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५६ 104 165643 418233 2026-09-05T09:33:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३४ ) रसरत्नसमुच्चयः । वह बीज उसी धातुके नामसे पुकारा जाता है, जैसे सोने का सुवर्ण- बीज, चाँदीका रौप्यवीज आदि । उपर्युक्त विधिसे तैयार किया हुआ सुवर्ण बीज१तोला, रौ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418233 proofread-page text/x-wiki d0og7512k9dk8uq9wshtr1gcodrv8th पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५७ 104 165644 418234 2026-09-05T09:33:59Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६३५) ३ घंटेतक मन्द मन्द अग्निसे पकावे । स्वांगशीतल होनेपर इसको बारीक चूर्ण कर के शीशीमें भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ मूँगके बराबर सेवन करे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418234 proofread-page text/x-wiki t1ptjsqbasyqk0v2l7vy09j74p70nsu पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५८ 104 165645 418235 2026-09-05T09:34:25Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ -- (६३६) रसरत्नसमुच्चयः । निहत्यशीतिवातार्तीगुल्मानष्टविधानपि ॥ ९५ ॥ चतुर्विधं च मंदाग्रिं शूलानुदरजान् क्रिमीन् । आध्मानं च तथा हिक्कां मूढवातं च विग्रहम् ॥ ९... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418235 proofread-page text/x-wiki 3m6yq9dar4l2oqjoxtxgi6egpy3xrh6 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६५९ 104 165646 418236 2026-09-05T09:34:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । (६३७) निंबुद्रावेण संपिष्ठातालकल्केन लेपयेत् । अर्धागुलदलं चैव परिशोष्य प्रयत्नतः ॥ ९९॥ प्रपचेद्वालुकायंत्रे यामानां द्वादशावधि । पटचूर्ण व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418236 proofread-page text/x-wiki o6wckk2g1pbcspasa78zrs599zkik2o पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६० 104 165647 418237 2026-09-05T09:35:23Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग, सोनामाखी की भस्म ४ भाग, गन्धक ५ भाग, हरताल ६ भाग, और पारा ७ भाग. इस क्रमसे प्रत्येक औषधिको एक २ भाग बढाकर लेवे। सबको एकत्र खरल करके कज्जली... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418237 proofread-page text/x-wiki ormdfvudkagglb92zll3qyy91kavhj7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६१ 104 165648 418238 2026-09-05T09:35:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६३९) करनेवाले मनुष्यों को यह रस सदैव सेवन करना चाहिये ॥९७-१०८ ॥ वृकोदरी वटी (रस) 1 सूतगंधकतीक्ष्णाः सताप्यैः समभागिकैः । राशमपरं सर्व पोलं जीरकद्व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418238 proofread-page text/x-wiki jl89ishiohdv664ddjobhpck6p5ki4v पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६२ 104 165649 418239 2026-09-05T09:36:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४० ) रसरत्नसमुच्चयः । प्रभावती वटी (रस) । मात्रा कतीक्ष्णता प्यकमलाश्चैषां समं सप्तकं सृतं च द्विगुणं विशोधन वधूसुग्वह्निसौभांजनात् ॥ पाठासूरणसिंदुवार विजय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418239 proofread-page text/x-wiki 4youd7oavdjn0xkkgrnz9hqobxyiq7l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६३ 104 165650 418240 2026-09-05T09:36:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । व्योषाग्रिमंथसुरसाकंद श्रृंग्यभयाविषैः । ( ६४१ ) समैः समं त्र्यहं मुंडी निर्गुडीरसपिण्डितः ॥ ११६॥ सेवितः शमयेद्वातान्नाना स्वच्छंदभैरवः । वि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418240 proofread-page text/x-wiki k6um9iyzeu6sdvx7h9ajftsejgsaobf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६४ 104 165651 418241 2026-09-05T09:37:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके निर्गुण्डी के रसमें एक दिन तक खरल करे । दूसरे दिन गोरखमुंडीके इसमें घोटकर उसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418241 proofread-page text/x-wiki cwg2ybx2rq0cic69or118lz8g7myykp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६५ 104 165652 418242 2026-09-05T09:37:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६४३ ) त्र्यम्बकेश्वर रस | सूतकस्य पलं पञ्च पलकं ताम्रचूर्णकम् । जंबीराणां द्रवैः पिष्ट सूततुल्यं च गंधकम् ॥ १२४॥ arrange: पिष्टं ताम्रपिष्टं प्रकल्प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418242 proofread-page text/x-wiki npsjrez4dleb3fwnpvu0hnorjzjytbw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६६ 104 165653 418243 2026-09-05T09:38:26Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४४ ) रसरत्नसमुच्चयः । गोलियाँ बनालेवे | यह गोलियाँ वात और कफ के रोगों को तत्काल नाश करनेवाली हैं ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ वातगजांकुश रस । मृतं सूतं मृतं लोहं गंधकं तारमाक्षि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418243 proofread-page text/x-wiki 34q2ess5or97tnnk06l0r3ekf7rtlhl पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६७ 104 165654 418244 2026-09-05T09:38:49Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भावाटीकोपेतः । (६४५) शतावर, गूगल, गन्धप्रसारणी, गोखुरू, पीपल, सौंफ, अजवायन, रास्ना, असगन्ध, शंखपुष्पी, कचूर और साठ इन सबको समान भाग, लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस समस्त... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418244 proofread-page text/x-wiki gigp5n0muflkuraagc2fuv8qslw11as पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६८ 104 165655 418245 2026-09-05T09:39:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । निहन्यादाशु तान्सर्वान्दुर्वारान्न च संशयः॥ १४० ॥ एष निष्परिहरोऽस्ति पानभोजनमैथुने । सतताभ्यासयोगेन वलीपलितनाशनः ॥ सर्वव्याधिविनिम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418245 proofread-page text/x-wiki 7rdxm8tqenaj3zabgp3ttwsx24r6uhk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६६९ 104 165656 418246 2026-09-05T09:39:39Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ : भाषाटी कोपेतः । ( ६४७ ) योगराज गूगलको सेवन करनेवाला मनुष्य दोष, धातु, मल और प्रकृ• तिके अनुकूल भूख लगनेपर दूध, घी, मांसरसादि पदार्थ, भात आदिको यथोचित मात्रा से सेवन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418246 proofread-page text/x-wiki hedxaoyxim9dzpcz25ssqgof1rjuam9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७० 104 165657 418247 2026-09-05T09:40:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (६४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । खूब बारीक खरल करे । फिर घीके चिकने वासनमें भरकर रखदेवे इस गूगलको प्रतिदिन एक २ तोला परिमाण सेवन करे और यथेष्टरू- पसे आहार विहार करे। यह योगर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418247 proofread-page text/x-wiki kycuqnf2tzzsobnyqpgkpjlloy1lwqa पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७१ 104 165658 418248 2026-09-05T09:41:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६४९) डर बत्तीको एक दिनतक तीक्ष्ण धूपमें सुखाकर दूसरे दिन सरसोंके तेलमें भिजोकर जलावे और उसके नीचे एक बर्तन रखदेवे। उस वर्त्त- नमें जो तेल टपके उसक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418248 proofread-page text/x-wiki jubgdty7cqwptcrh3muqaq4m96oby4i पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७२ 104 165659 418249 2026-09-05T09:41:48Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५० ) रसरत्नसमुच्चयः । भक्षण करे | यह सूततैल अनेक प्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है । जैसे बाहुका काँपना, शिरका काँपना, जंघाकम्प, एकांगवात, इसी पकारके अन्यान्य वात... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418249 proofread-page text/x-wiki hupej3monqs060gk4zhqgplsdkxoqms पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७३ 104 165660 418250 2026-09-05T09:42:23Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६५१ ) अण्डका तेल, त्रिकला, गोमूत्र, चीता और वत्सनाभ सबको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर कल्क करलेने | उस कल्कके बराबर घी और घीसे चौगुना पानी लेकर सबको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418250 proofread-page text/x-wiki h6a2kao5skcsa6mnz4n9duh7dfjf4o1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७४ 104 165661 418251 2026-09-05T09:42:53Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५२ ) रस रत्न समुच्चयः रक्तस्यैरण्डमूलस्य कर्षे घृष्ट्वा जलः पिबेत् । सर्ववातहरं श्रेष्ठं भगवाते विशेषतः ॥ १६८ ॥ इंद्रवारुणिका मूलं मागधीगुडसंयुतम् । भक्षये... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418251 proofread-page text/x-wiki pzv4paeb5zma2g7rs3b8yzxtuziemjs पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७५ 104 165662 418252 2026-09-05T09:44:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६५३) गत बात दूर होता है । अथवा पारेकी भस्म और तीक्ष्ण लोहकी भस्म दोनोंको समान भाग लेकर कुटकीके रसमें खरल करके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418252 proofread-page text/x-wiki fdyvku5ohsatcw9ykw6ecpj1b54ghwn पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७६ 104 165663 418253 2026-09-05T09:44:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ६५४ ) कावे | अष्टमांशजल शेष रहनेपर उस कायको उतारकर छान लेंवे। फिर उसमें खांड २०० तोले, शतावर का रस १ आढक (२५६ तोले) विदारीकन्दका रस १ आढक और गायका द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418253 proofread-page text/x-wiki f3ddzaosx425c5w3587z757nt4kdcll पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७७ 104 165664 418254 2026-09-05T09:45:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः (६६९) काकोली क्षीरकाकोली द्वे मेदे जीवकर्षभौ ॥ १७९ ॥ एतेषां चापलिकं प्रत्येकं शर्करायुतम् । ऐलेयकं विदारी च वाराही मुद्रपर्णिका ॥१८०॥ एतेषां स्व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418254 proofread-page text/x-wiki 988zx25sno1na39cd9zdlu1o6vsmwih पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७८ 104 165665 418255 2026-09-05T09:45:53Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । चूर्ण शरीरकी दाह, सिरकी दाह, दारुण रक्तपित्त, सिर और नेत्रांका कम्प, भ्रम आदि समस्त वातव्याधियों को दूर करता है ।। १७७-१८३॥ ऐले कतैलम् । ऐले... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418255 proofread-page text/x-wiki jpoq25alm4h7npkutf5dcv8x81aex8u पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६७९ 104 165666 418256 2026-09-05T09:49:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६५७ ) घीग्वारका स्वरस ४ प्रस्थ; आमलोंका स्वरस २ प्रस्थ, शतावरका रस २ प्रस्थ, तेल १ आढक और दूध १ द्रोण परिमाण लेवे | सबको एकत्र मिलाकर मन्द मन्द अग्नि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418256 proofread-page text/x-wiki s42wr5m20mqfv3rn66r2pnvpclrddjk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८० 104 165667 418257 2026-09-05T09:52:14Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६५८ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूधमें मिलाकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । इसको ऐलेयक घृत कहते हैं । यह पित्तके समस्त विकारोंको तथा वातपित्त के रोग, शिरो- रोग, भ्रम और कम्प इन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418257 proofread-page text/x-wiki nwfj6v6swj4qcl9qlmeekn5ti74nw2o पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८१ 104 165668 418258 2026-09-05T09:53:14Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६५९) रक्तेन च पृथग्दोषैः समस्तैः पंचधा भवेत् । भूतदेवाभिचारैश्च तिस्रो वध्याः प्रकीर्तिताः ॥ २ ॥ पुमानपि भवेद्वंध्यो दोषैरेतैश्च शुक्रतः । गर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418258 proofread-page text/x-wiki 70aujxx28136g1suokx092lxrss4tp1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८२ 104 165669 418259 2026-09-05T09:53:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६० ) रसरत्नसमुच्चयः । बन्ध्या होती है । इस कि उपर्युक्त वात पित्त, कफ इन तीनों दोषोंके थोडे २ उपद्रव होते हैं, इसलिये ऐसी स्त्रीके कभी गर्भ ही नहीं रह सकता । यदि कद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418259 proofread-page text/x-wiki 8y2l6gga7jy5vvxd5spei3pbnrx1f4b पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८३ 104 165670 418260 2026-09-05T09:55:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६६१) गजाख्यपुट पर्याप्तिः शाण कर्षमितोत्पलैः । स्वांगशीतं विचूयीथ भावयेद्धक्ष्मणाद्रवैः ॥ ८ ॥ सप्तवारं विशोष्याऽथ करण्डांतर्विनिक्षिपेत् ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418260 proofread-page text/x-wiki qiit3tqabyilsqaup6bdapdio0aqk69 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८४ 104 165671 418261 2026-09-05T09:55:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६२ ) रसरत्नसमुच्चयः । भावना देवे और सातबार सुखावे । फिर बारीक खरल करके शीशी में भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण लेकर असगन्धके चूर्ण, लाल गायके दू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418261 proofread-page text/x-wiki 98ffzqjwzfbnz6iuf5tfwmq9n663b9p पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८५ 104 165672 418262 2026-09-05T09:56:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । (६६३) वंध्याकर्कोटकी चूर्णक्काथेन परिमर्दयेत् ॥१९॥ काननोत्पलविंशत्या पुटेत्षोडशवारकम् । एवं रसो विनिष्पन्नो रत्नभागोत्तराभिधः ॥२०॥ महावंध्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418262 proofread-page text/x-wiki f56me6eokyfs0y9ix2c57nbnz8isz5n पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८६ 104 165673 418263 2026-09-05T09:56:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६४) रसरत्नसमुच्चयः । इन समस्त पुटको बारीक खरल करके पश्चात् उस रसको शीशी में भरकर रखदेवे । इस प्रकार यह रत्नभागोत्तर रस सिद्ध होता है । इस इसके सेवन से महावन्ध्य... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418263 proofread-page text/x-wiki 4uvr4n2p6imjmz0c055pfxnlms5v54d पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८७ 104 165674 418264 2026-09-05T09:56:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६६५) रसोऽयं चक्रिका बंधस्तत्तद्रो गरौषधैः । दातव्यः शूलरोगेषु मूले गुल्मे भगंदरे ॥ २७ ॥ ग्रहण्यामग्निमांद्ये च विद्रधौ जठरामये । नागोदरे तथैव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418264 proofread-page text/x-wiki bx7yr7uzecvsyyifv7jl0bztjksv0na पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८८ 104 165675 418265 2026-09-05T09:57:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । ततश्च जारणायंत्रे सूत्रस्थान समीरितें । जारणातलसंयुक्तं जीर्णषड्गुणसंयुतम् ॥ ३१ ॥ रसं हि द्विपलं दत्त्वा जारणा विधियोगतः । जारयित्वा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418265 proofread-page text/x-wiki gm5xoc7sjbema0r9eqs1g1nkut0nyqf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६८९ 104 165676 418266 2026-09-05T09:57:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६६७) सुतीरोगानपि बहुविधान्दुःखसाध्यान्समस्ता- न्रोगानन्यानपि रसवरो योगयुक्तो निहन्यात् ॥ ११ ॥ २ दो तोले सुवर्णमें १ तोला शुद्ध तांचा डालकर गल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418266 proofread-page text/x-wiki heuto4qqkimxj3wcwkaaw7muusfgd4w पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९० 104 165677 418267 2026-09-05T09:58:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । निकाललेवे । इस प्रकार जारण करनेसे पारा, सुवर्ण और ताम्रको ग्रस जाता है । यह सुवर्ण ताम्रजारित पारद तैयार हुआ । इस विधि से जारण किये हुए पारे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418267 proofread-page text/x-wiki 5t0zequeiz3iaqb0kd4faqev9lu4orw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९१ 104 165678 418268 2026-09-05T09:58:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६६९) इस रसको सेवन करना प्रारम्भ करे । नियमानुसार इस रसका ६ महीने पर्यन्त सेवन करनेसे आदिवन्ध्या आदि सभी प्रकार की वन्ध्या स्त्रियाँ और सभी प्रका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418268 proofread-page text/x-wiki 82s8hl91u1kcygn4dpz9ezbb6m7ex2k पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९२ 104 165679 418269 2026-09-05T09:58:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७० ) रसरत्नसमुच्चयः । भूतप्रेत पिशाचानां भयेभ्योऽभयदायकः । जडान दोहदार्तानां मंदबुद्धिमतामपि ॥ ४६ ॥ मंडूकीर संयुक्त दातव्यो वचया सह । जन्मवध्याः काकवंध्या... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418269 proofread-page text/x-wiki cvf5watq81y3am5hrdq3h9ksx0zhw02 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९३ 104 165680 418270 2026-09-05T09:59:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६७१) बाँझ हों अथवा जिनके एकवार सन्तान होकर फिर गर्भ न रहता हो या जिन खियाके मरीहुई सन्तान होती हो अथवा उत्पन्न होते ही मरजाती हो उन स्त्रियों के पु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418270 proofread-page text/x-wiki bonnwojmysom0os309x9g9dh00xk45l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९४ 104 165681 418271 2026-09-05T09:59:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । महागणेशमंत्रेण रक्षां तस्यास्तु कारयेत् । एवं दिनत्रयं कृत्वा वंध्या भवति पुत्रिणी ॥ १६॥ सुश्वेत कंटकार्याश्च मूलं तद्वच्च गर्भकृत् ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418271 proofread-page text/x-wiki 7i2xxtr281fp0o0lv6pz5tg8px2plrw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९५ 104 165682 418272 2026-09-05T10:00:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६७३) पश्चात् दूधमें कन्याके हाथसे पिसवाकर ऋतुमती स्त्रीको स्नान के सातदिन तक एक २ तोला परिमाण सेवन कराने और पूर्ववत् पथ्य देवे तो वन्ध्या स्त्री... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418272 proofread-page text/x-wiki 2fxgveehio1uqhawpt44do6xno4162g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९६ 104 165683 418273 2026-09-05T10:00:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (६७४) रसरत्नसमुच्चयः । तक इसको सेवन करनेसे काकवन्ध्या स्त्री गर्भ धारण करके दीर्घायु पुत्रको उत्पन्न करती है ॥ ४८-६० ॥ शिवाक्त तान्त्रिक प्रयोग । गर्भः संजातमात... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418273 proofread-page text/x-wiki 4hfqom93sqzeabbaeqz8tccmnbs7cd7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९७ 104 165684 418274 2026-09-05T10:00:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६७५) विसर्ग्य देवतां चाऽथ नद्यां तत्कलशोदकम् । शकुनं वीक्षयेद्धी माशुभेन शुभमादिशेत् ॥७०॥ विपरीते पुनः कुर्याद्योगं तद्वत्सुसिद्धिदम् । प्र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418274 proofread-page text/x-wiki 7n81mgggzonll82lspd9vmnywjowre8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९८ 104 165685 418275 2026-09-05T10:01:06Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७६ ) रसरत्नसमुचयः । 33 मण्डल के प्रत्येक कोणमें क्रमसे ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, और इन्द्राणी इन ६ मातृकाओंका उपवाहन करके प्रत्येक देवकि नामम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418275 proofread-page text/x-wiki k7rrpy4k69jvjmtwenmfvfhdp12vwnp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६९९ 104 165686 418276 2026-09-05T10:01:28Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (६७७) परिमाण लेकर जलमें पीसकर पान करे । इस औषधको एक सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे और उपर्युक्त पदार्थोंका पथ्य करनेसे वन्ध्या are दीर्घायुषी पुत्र उत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418276 proofread-page text/x-wiki s1mot1qv0y9au0i1jtj4onu1jezusn2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०० 104 165687 418277 2026-09-05T10:01:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६७८ ) रसरत्नसमुच्चयः । वृक्षकत्वग्घनो देवदारु दारू विभावरी । गर्भिण्या अतिसारघ्नः क्वाथ एषां भवेद् ध्रुवम् ॥ ८२॥ श्रीपर्णीयष्टिगोप्यन्ददा वक्काथोऽतिसारनु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418277 proofread-page text/x-wiki 9olwho2tv25z8hm0kbxky3ojj2x0kuq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०१ 104 165688 418278 2026-09-05T10:02:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६७९) Nisaaदारीभिः पृश्निपर्ण्या व साधितम् । क्षीरं क्षीरयवाग्वापि पिबेद्वातकृतामये ॥९२॥ श्रदंष्ट्रबलयोः काथो मृत्ररोगे प्रशस्यते ॥९३॥ सुरदारु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418278 proofread-page text/x-wiki 4wla1igb5ff07vi9j6bky37xa9d5r0i 418279 418278 2026-09-05T10:02:42Z Bnarayanan V 10460 418279 proofread-page text/x-wiki jpqcim29caflvie0m19kt2ye6eltirz पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०२ 104 165689 418280 2026-09-05T10:03:08Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ६८० ) गर्भवती स्त्री पद्माख, खस और चन्दन इन तीनोंको समान भाग लेकर गायके दूधमें पीसकर प्रतिदिन चार २ तोले परिमाण सेवन करे । इस औषधको तीन दिन तक सेव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418280 proofread-page text/x-wiki cvsincppzk5xdpx3xcc4o7d5pe3egi8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०३ 104 165690 418281 2026-09-05T10:03:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८१ ) गाढा होजाय तब उसको देवदारु और दारूहल्दीके काढमें मिलाकर पान करे | यह क्वाथ गर्भिणी खाके अतिसार (दस्तों ) को अवश्य नष्ट करता है । कायफल, मुलैठी,... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418281 proofread-page text/x-wiki 6gwllu3apxm0wmgwhhsgnr3c3mo9028 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०४ 104 165691 418282 2026-09-05T10:04:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६८२ ) रसरत्नसमुच्चयः । पल और जीरा इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको एक २ तोला परिमाण लेकर शहद और गुड के साथ सेवन करनेसे गर्भिणी स्त्रियोंका मन्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418282 proofread-page text/x-wiki b6mt4sqx7lqbnzqtm38gai46rw9vf9y पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२७ 104 165692 418283 2026-09-05T10:05:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७०५ ) कुर्यात्तेनैव चूर्णेन रात्रावञ्जनमाचरेत् ||२०|| एवं नित्यं कृते याति तृतीयदिवसे ध्रुवम् । अपस्मारस्तथा मासं सेव्यमेतन्महौषधम् ॥२१॥ उद्धम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418283 proofread-page text/x-wiki 65ze50ejxqi47pjia1xtldadrq69e4o पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४९ 104 165693 418284 2026-09-05T10:06:05Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७२७) होता है । (५) मुसली और बावचीके चूर्णको समान भाग लेकर सेवन करनेसे बहरापन दूर होता है ( ६ ) निर्मल के बीज, सैंजने के और समुद्र नमक तीनोंको काँजीमें प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418284 proofread-page text/x-wiki fhm3cma1s2qht0x1mfihvu1fiqfrv4c पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७१ 104 165694 418285 2026-09-05T10:06:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । (७४९) शखसे कदापि छेदन न करे, बल्कि औषधियोंके प्रलेप आदिके द्वारा उसको भेदन करे । हल्दी, नीम के पत्ते और सैंधानमक तीनोंको पानीमें पीसकर लेप करनेसे भग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418285 proofread-page text/x-wiki 6g562ipbv8jlqe8n9cmjziuy5vc9152 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९३ 104 165695 418286 2026-09-05T10:07:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः। (७७१) दाह (जलन) होने लगती है और उससे संपूर्ण शरीर कृश होजाता है । इसको दूर करनेके लिये निम्नलिखित उपाय करे । (५१) प्रथम लिंगके अग्रभागको धीरेसे बाँधकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418286 proofread-page text/x-wiki 398owgwykb18wnuv1y9l965rdfzffi8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१६ 104 165696 418287 2026-09-05T10:07:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७९४ ) रसरत्नसमुच्चयः । कल्कको शेष रसमें घोलकर उसमें एक प्रस्थ गौका घी मिश्रित कर के विधिपूर्वक पकावे | जब पककर रस सच जलजाय और घृतमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418287 proofread-page text/x-wiki h8firm8k4akq38jnljwmemecek07d1p पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४० 104 165697 418288 2026-09-05T10:08:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८१८ ) रसरत्नसमुच्चयः । सेमल और मुलैठीके इसके साथ १५ दिन तक खरल करे । फिर नागर पान के रसमें श्घंटे तक घोटकर सुखाले सो पुष्पधन्वा रस तैयार होता है । इस रसको पूर्वोक्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418288 proofread-page text/x-wiki 8zj34kqaw6ldn7y1wf7bewbrwk9t4kb पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६३ 104 165698 418289 2026-09-05T10:08:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ८४१ ) तप्तं क्षीरं पिबेद्र्यस्तांबूलं भक्षयेन्मुदुः ॥ ४० ॥ स्नानमर्दन विष्टम्भिविदाहाम्लमजांगलम् । सप्तसप्ताह मथवा त्रिःसप्ताहं परित्यजेत् ॥... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418289 proofread-page text/x-wiki kr1igs8gulxoowm8uz53fir13ttssk7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८५ 104 165699 418290 2026-09-05T10:10:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ 1 भाषाटीकोपेतः । ( ८६३) हाथी और अमृत निकला । हे देवि । फिर अधिकतर प्रथने के कारण मन्दराचल के अत्यन्त आघातके द्वारा शेषनागको उत्पन्न हुआ जो भ्रम उससे अत्यन्त भयङ्कर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418290 proofread-page text/x-wiki 4spug55784mthslyrmc6upi2h1j681x पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०८ 104 165700 418291 2026-09-05T10:11:27Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रस रत्नसमुच्चयः । ( ८८६ ) और मिरच ये सब समान भाग और सरसोंका तेल विषसे अठगुना लेवे। फिर उक्त औषधियोंको खटाई में परिकर तेलमें डालकर उत्तम प्रकार से पकावे | यह तेल शिरम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418291 proofread-page text/x-wiki l19l8czd4znbtt6clh49fztausyguie पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३२ 104 165701 418292 2026-09-05T10:11:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (९१० ) रसरत्नसमुच्चयः उपयोगी है | परन्तु कामला सहित पाण्डुरोग और शोथरोग (सृजन) में त्रिफलादिके काय के साथ सेवन करना उचित है । ( १८ ) सोंठ और चिरायतेके काथको गोमूत्रमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418292 proofread-page text/x-wiki 1gttr7kg136iih209l9vvnx866lejkr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०५ 104 165702 418293 2026-09-05T10:12:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८३) काय गर्भिणी के कामला रोग, श्वास, खाँसी और रक्तपित्तको शीघ्र विनाश करता है । केवल एक खिरैटीका काथही घी और दूधके साथ अथवा विना घी, दूधके मिलायेही... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418293 proofread-page text/x-wiki 5zymabtwkd6w3zcztrrgpifzefcf9cv पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२८ 104 165703 418294 2026-09-05T10:12:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७०६ ) रसरत्नसमुच्चयः । सिद्ध करे। यह घृत रोगी को शाक, भात आदि पथ्य पदार्थों के साथ सेवन करावे | अपस्मार रोगी के लिये शाकोंमें मकोयका शाक और भोजनमें काली गाय का दूध द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418294 proofread-page text/x-wiki nra0lnmnr7zv7ov3oyfbnzkad1ljw2b पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५० 104 165704 418295 2026-09-05T10:13:19Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । लना, अर्बुदका होना, दुर्गन्ध आना, पानीका झडना, नाकका सूचना नाकके शोषित होनेसे अत्यन्त सुखजाना, छींके अधिक आना, नाक अर्श होना और पीनसके विनाभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418295 proofread-page text/x-wiki p8sz9wm1wyo2c1njjvtn21870o3qtjg पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७२ 104 165705 418296 2026-09-05T10:13:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५० ) रसरत्नसमुच्चयः । मेदोवृद्धिरसात्तेन हंति रोगं च पूर्वजम् ॥ १०९ ॥ Disi जयत्याशु गुल्मोक्तोदय भास्करः ॥ ११०॥ पुत्रजीवस्य मज्जां तु जलैः पिट्वा प्रलेपनात् का... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418296 proofread-page text/x-wiki c062kwvjxvrybx3qt5xarwmqkbsgvn9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९४ 104 165706 418297 2026-09-05T10:14:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७७२ ) रसरत्नसमुच्चयः । होती हैं (५९) बावची, देवदारू, नीम के पत्ते, दारूहल्दी और विजय- सार इन सबको ममें पीसकर योनिमें प्रलेप करनेसे योनिके सब रोग नष्ट होते हैं । (६०) ल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418297 proofread-page text/x-wiki 6twld9bxlwyh4osu4dwkcyeufjo4obe पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१७ 104 165707 418298 2026-09-05T10:14:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७९५) (२८) लोहभस्म, अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, सुवर्ण- भस्म और हीरेकी भस्म सबको समान भाग लेकर घीग्वारके उसमें खरल करके गोला बनालेवे । उस गोले... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418298 proofread-page text/x-wiki jy1qq71xky6aa0rjfzm7rfd8tkj2o2a पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४१ 104 165708 418299 2026-09-05T10:14:56Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१९ ) तृतीययामे रससेवनं तु कृत्वा निशायाः प्रहरे व्यतीते ॥ ९२ ॥ सेवेत कांती कमनीयगात्रां घनस्तनीबुज्ज्वल चारु- वस्त्राम् । रत्युत्सुकां कातरलो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418299 proofread-page text/x-wiki hlyqv6sd0pdae7du6m81zhf0dpfasci पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६४ 104 165709 418300 2026-09-05T10:15:19Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । यथायोगयुतं पक्कं त्रिफलाक्वाथ सर्पिषा । साधितं भक्षयेत्कांतमेकं वा केवलाभ्रकम् ॥ ५१ ॥ इह चानु पिबेत्क्षीरं न कुर्यात्तेन भोजनम् । मुद्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418300 proofread-page text/x-wiki aws5uyvo70rhlhae4332d9x6aik8178 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८६ 104 165710 418301 2026-09-05T10:15:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८६४ ) रंगका विष रसक्रिया में, पीले वर्णका विष साधारण कार्योंमें और इतरका विष रसायनकर्ममें लेना चाहिये । हे सुन्दर मुखवाली देवि यद्यपि क्षीरसाग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418301 proofread-page text/x-wiki pe1uog4o2bxgen5gpm68v20cv1pqkrx पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०९ 104 165711 418302 2026-09-05T10:16:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८८७) बढ़ाता हुआ एक जौ अथवा तीन जोकी मात्रातक एक वर्ष पर्यन्त सेवन करने से सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं । ( ६५ ) वच, गन्धक, सैंधा, शायमाणलता अम्लचैत, त्रि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418302 proofread-page text/x-wiki dl46b3b378jzgt3xhwn8ipvyvhud2v1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३३ 104 165712 418303 2026-09-05T10:16:35Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेनः । ( १११) कल्क शरीरपर मलनेसे कुछ कहाँ ? अर्थात् कुष्ट समूल निर्मूल हो जाता है । (१५) चीता १ तोला, कौंच के बीज २ तोले, मकोयकी जड ४ तोले, कन्हूरीकी जड ८ तोले और... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418303 proofread-page text/x-wiki cz55upnxi705vw8acvw8kx770vqf574 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०६ 104 165713 418304 2026-09-05T10:17:01Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ६८४ ) अकस्मात् श्वासोच्छ्वास की गतिमें बाधा उपस्थित होना, योनिका . एकदम संकुचित व भ्रष्ट होना, शरीरका शीतल होना, और डकार में दुर्गन्ध आना इन लक्ष... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418304 proofread-page text/x-wiki sqhx896sb77qtiocbo55i7ykb1f156n पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२९ 104 165714 418305 2026-09-05T10:17:23Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७०७) लिये भी वैद्य रोगीको आठ १ रत्ती पपैटी रस ब्राह्मीक स्वरसमें घोट- कर सेवन करावे और ऊपरसे उडदोंके मांडमें घी और दूध मिलाकर पान करावे । इस उपचारक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418305 proofread-page text/x-wiki ni66ax9qtozh4ppprso2ze3so8gitxo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५१ 104 165715 418306 2026-09-05T10:17:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७२९) एक २ बार भावना देकर फिर अदरखके रसमें सात बार भावना देवे और सुखाकर बारीक चूर्ण करलेने | इस प्रकार यह मणिपपेटी नामक रस सिद्ध होता है । इसको प्रति... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418306 proofread-page text/x-wiki 1no0zrh60nf1iqdiz710w2zllndufpo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७३ 104 165716 418307 2026-09-05T10:18:10Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७५१) उदयभास्कर रस सेवन करनेपर गण्डमालाको शीघ्र दूर करता है । ( ४ ) जिया पोताकी गिरीको जलमें पीसकर लेप करनेसे मृत्युकारक फोडा, विषैला फोडा और अन्यान... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418307 proofread-page text/x-wiki oozs7yynq582l5noiq6id9iu55a82jo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९५ 104 165717 418308 2026-09-05T10:18:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । ( ७७३) स्थित होजाता है, ऐसा श्रीनागार्जुन सुनिने कहा है । ( ६७ ) अथवा कृष्ण चतुर्दशी के दिन धतूरेकी जडको लाकर बारीक पीसकर कपट- छान करलेवे उस चूर्णको यो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418308 proofread-page text/x-wiki kd4zpn5n8bgc6kflv62eg2mlo5xgj5h पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१८ 104 165718 418309 2026-09-05T10:19:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७९६ ) रसरत्नसमुच्चयः । भाँगरा, अदरख, चोंटलीकी जड, तुलसी और शतावर इन औषधि- याके रसमें क्रमते तीन २ दिन तक भावना देकर गोला बनालेवे ! उस गोलेको आक के पत्तोंमें लपेटकर थ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418309 proofread-page text/x-wiki 316pmv9pbw41o4prjba4fryyss443ln पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४२ 104 165719 418310 2026-09-05T10:19:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८२० ) बीत जानेपर सुन्दर शरीरवाली, कठिन स्तनोंवाली, अत्यन्त उज्वल और मनोहर वस्त्रोंको धारण करनेवाली, रतिक्रीडा करनेमें, उत्सुक, कातर और चपलनेत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418310 proofread-page text/x-wiki kwmagabxg8lz9r64x23qzd9gosjcrtr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६५ 104 165720 418311 2026-09-05T10:19:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ मापाटीकोपेतः । ( ८४३) रेतकर खूब बारीक चूर्ण करके उसी कायमें एक दिनतक घोटकर कढाई में डालकर पकावे | जब वह गलकर पतला होजाय तब फिर उक्त काथमें बुझाकर उसी कायके साथ एक दि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418311 proofread-page text/x-wiki 1w6z0r4368rvi9zp9r9qg2nbcnu3fja पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८७ 104 165721 418312 2026-09-05T10:20:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भावाटी कोपेतः । विषविद्रायणघृत । ( ८६५ ) विजया पिप्पलीमूलं पिप्पलीद्वयचित्रः । पुष्कराह्रा सटीद्राक्षा यवानीशारदीप्यकैः ॥ २८ ॥ सितायष्टिद्विवृहती सैंधवैः पा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418312 proofread-page text/x-wiki c34hiz16i8kd70quolocyzbb8f449th पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१० 104 165722 418313 2026-09-05T10:20:31Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (८८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । आँजनेसे स्यन्द और अधिमन्थ नामक नेत्ररोग, रक्तविकार सहित अकोष आदि नेत्ररोग तथा कसौंदीके इसमें घोटकर आँजनेसे मोति- याविन्द और भाँगरके इसमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418313 proofread-page text/x-wiki h82jtwrztud116sn1wiimkk3bvbs1ak पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३४ 104 165723 418314 2026-09-05T10:20:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (९१२) - रसरत्नसमुच्चयः । स्वार रोग और उन्माद रोगको नष्ट करती है । ( ३४ ) महुआ, मैन सिल, नीलाथोथा और पायरा पक्षीकी विष्ठा इनके साथ पारेकी भस्मको खरल करके नेत्रोंमें आँज... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418314 proofread-page text/x-wiki niy8e765nnzwgv0i46um3y3875v4see पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०७ 104 165724 418315 2026-09-05T10:21:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८५) हारीकी जडको पानीमें खूब बारीक पीसकर नाभि, योनि और पेडूमें. लेप करने से शीघ्र प्रसव होता है । अथवा श्वेतपुष्पकी कलिहारीकी जडको पानी में पीसकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418315 proofread-page text/x-wiki 7jwkd2byc9rm3rfozqr1xeqvfrirk3l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३० 104 165725 418316 2026-09-05T10:21:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७०८) रसरत्नसमुच्चयः । काचार्म पिल्लाभिष्यंद्वण शुक्रप्रणाशिनी । तत्किटं ददुकिटिभं लेपात्पामादिकं जयेत् ॥ ३४ ॥ ताम्र भस्म १० निष्क निष्क लेकर अदरख, बडहल और भाँ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418316 proofread-page text/x-wiki qzzt4qrkxzxfc28nvro3ytogjozrmvd पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५२ 104 165726 418317 2026-09-05T10:22:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३० ) रसरत्नसमुच्चयः । आँजे तो कामलारोग अवश्य नष्ट होता है और नासिकाकेभी समस्त रोग आरोग्य हो जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ मुखरोग । •एको गण्डभवो गदः षडुदिता जिह्वोद्भवास्ता... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418317 proofread-page text/x-wiki pk82pv94taxr8qand3kxv8a9m9lcjn8 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७४ 104 165727 418318 2026-09-05T10:22:46Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५२ ) रसरत्नसमुच्चयः । वात, पित्तादि किसी दोष के अथवा मांस विकृत होनेसे जब शरीर के किसी भागमें मेद (चव ) धातु दूषित होजाती है तब पहले वहां छोटीसी गाँठ निकलती है । वह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418318 proofread-page text/x-wiki q0fw5bsbwdneoorce6cob1a9f3bgd74 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९६ 104 165728 418319 2026-09-05T10:23:10Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७७४ ) रसरत्नसमुच्चयः । चतुर्मासोद्भवो गर्भः स्रवत्येव हि तत्क्षणाव ॥ ९२ ॥ निर्गुडीद्रवसंपिष्टं चित्रमूलं मधुप्लुतम् । कर्षे भुक्त्वा पतत्याशु गर्भो रंडाकुल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418319 proofread-page text/x-wiki pakakzln2xbjndtln0wi24x82tnydnm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१९ 104 165729 418320 2026-09-05T10:23:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७९७) (३०) वाराही कन्द, सुमली, धतूरेकी जड, खसखस और कौंच के चीज इन सबको समान भाग लेकर पृथक पृथकू चूर्ण करके प्रत्येक चूर्णको बिनौलोंके दूधमें क्रम क्रम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418320 proofread-page text/x-wiki l5105j4emt04qfvaeafwoglp25nmp23 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४३ 104 165730 418321 2026-09-05T10:25:09Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८२१) भूकूष्माण्डैर्वासरैकं विघृष्य गोलं कृत्वा भूधरे तं पुटेत् । चूर्ण कृत्वा नागवल्लीरसेन दद्यादेव मर्दयित्वा दिनैकम् ॥ ९७ ॥ मध्वाज्याभ्यां... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418321 proofread-page text/x-wiki hycxtn73f10bi37ckuphc3wqnmp8vm1 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६६ 104 165731 418322 2026-09-05T10:25:38Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४४ ) रसरत्नसमुच्चयः ॥ २१ तोले । तथा कफ प्रकृतिवाले रोगीके लिये यह रसायन बनाया • जाय तो कान्तलोह भस्म २० तोले, ताम्र भस्म २० तोले और अभ्र- कभस्म २० तोले लेवे । इस प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418322 proofread-page text/x-wiki gtcgervzr555qtep6nvsmjebe281mai पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८८ 104 165732 418323 2026-09-05T10:26:05Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । दंती विष हस्तिविष पिप्पल्यौ मरिचानि च । तैस्तैलं कटुतैलं वा चित्रस्याभ्यञ्जनं पचेत् ॥ सवर्णकरणं श्रेष्ठमास्तिकस्य वचो यथा ॥ ३३ ॥ लाख, दे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418323 proofread-page text/x-wiki 5yt2wbvth7su37ehjttyoxmlx51fltk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९११ 104 165733 418324 2026-09-05T10:26:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । (८८९) होगया है शुक्र जिसका ऐसा मनुष्य दाख, कौंच के बीज, महाविष, खजूर और मुलैठी इन सबके समान भाग चूर्ण को शहद और घृत मिलाकर सेवन करे और ऊपर से दुग्धपान... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418324 proofread-page text/x-wiki 3qknetqwg5d8gwc4ggpzm8g730oi8ej पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३५ 104 165734 418325 2026-09-05T10:27:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीको पेसः । ( ९१३) पत्रं पाडुवटस्य चन्दनयुगं कालेयकं पारएं धत्तूरं कनकत्वचं कमलजं बीजं तथा केसरम् ॥७२॥ सिक्थं तुत्थं लोह फिट्टे वसाज्यमाजं क्षीरं क्षीर- वृar... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418325 proofread-page text/x-wiki ne6kocfx6q9cw4roujx61whwgc4nnew पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०८ 104 165735 418326 2026-09-05T10:27:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६८६ ) रसरत्नसमुच्चयः । कान्त लोह भस्म ६० मासे, पारा १७ तोले ६ मासे और गन्धक पारेसे दुगुनी लेवे । प्रथम पारे और गन्धक की कज्जली करके उसमें सम्पूर्ण भस्मोंको मिलाकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418326 proofread-page text/x-wiki 5pkqbargvd0bbou4h6afv6btvy9y9kb पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३१ 104 165736 418327 2026-09-05T10:28:07Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ 'भाषाटीकोपेतः । (७०९) शरीर पर लगानेसे दाद, श्वतकुष्ठ, खुजली आदि रोग दूर होते हैं ॥ ३०-३४ ॥ पुनः साम्रद्रुति (अंजन ) । शुल्ब गंधकमभ्रकं च रसकं दिक्संख्यनिष्कं पृथक् स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418327 proofread-page text/x-wiki 747h5hgpidga2hmqym3meeekqwz8typ पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५३ 104 165737 418328 2026-09-05T10:28:43Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७३१) दोलायंत्रे निबध्यैनां यत्नेन दिवसत्रयम् । मलापकर्षणं कृत्वा मधुभाण्डे निधापयेत् ॥ मुखे धारय दंतानां दाढर्याय गुटिकामिमाम्॥२८॥ चांदी आद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418328 proofread-page text/x-wiki p21n264uhur9pjccj0su2k1frme7ffm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७५ 104 165738 418329 2026-09-05T10:29:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । गण्डमाला और अपची रोग ! ( ७५३ ) मेदोत्था गलकक्षवंक्षणतले मन्यासु वा कुर्वते वार्ता की फलकोपमान्सकठिनान्गण्डान्सकडून्मला। पच्यं तेऽल्परुजः स्रवं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418329 proofread-page text/x-wiki b2xphnk2b15xqfd0nkoyfj1fv6qj5mm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९७ 104 165739 418330 2026-09-05T10:29:37Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७७५) तेलको पकाकर उसमें त्रिकुटा और मुलैठीका चूर्ण डालकर पान करावे | यह तैल स्त्रियोंके रक्तस्राव आदि सम्पूर्ण रक्तविकारोंको नष्ट करनेके लिये उप... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418330 proofread-page text/x-wiki miao54noqhgpnol4bptbr14pqmlqaa7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२० 104 165740 418331 2026-09-05T10:29:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७९८ ) रसरत्नसमुच्चयः । तद्वाजीकरणं विद्धि देहस्योजस्करं परम् ॥ २॥ शुक्रं तु चिताग्यायामव्याधिभिर्देहकर्षणात् । क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणां चाति निषेवणात... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418331 proofread-page text/x-wiki tor1dvs5qd6umbcxawzgt8jssdp3p51 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४४ 104 165741 418332 2026-09-05T10:30:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२२ ) रसरत्नसमुच्चयः । स्थाल्यो ज्वालयेद्वह्नि यामपर्यंतमुद्धतम् । ततःक्षिपे पधान्यां हि व्योमस्त्वष्टगुणं पयः ॥ १०१ जीर्णे पयसि पिट्वा तत्तालमूलीरसैः पुन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418332 proofread-page text/x-wiki kun7m5ktgd5ts452si58v386t9u1mml पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६७ 104 165742 418333 2026-09-05T10:31:03Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८४५) लोहे के पात्र में लोहे के मुसलसे घोटकर सेवन करे और दूसरे दिन भी इसी प्रकार सेवन करे। फिर इसको तीसरे दिन रसी, चौथे दिन ४ रत्ती, पाँचवे दिन ६ रत्ती... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418333 proofread-page text/x-wiki r0fjnejkx8ry3l2d1994oo6yaycv6tc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८९ 104 165743 418334 2026-09-05T10:31:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८६७) अर्म, भासपिल्ल ( आँख के सारे पर छाया हुआ मांसका जाला अथवा बहुत बाहरको निकला हुआ डेला) आदि नेत्ररोगोंमें और ग्रन्थि ( गाँठ, गण्डमाला, रसौली आदिमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418334 proofread-page text/x-wiki oxc94gc3oqn2nqhpsejqhwbth2ea1bk पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१२ 104 165744 418335 2026-09-05T10:32:00Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८९०) रसरत्नसमुच्चयः । फेनोद्वतिः पञ्चमे स्यात्स्कन्ध यो भगता ततः । जडयता सप्तमे वेगे चाष्टमे मरणं ध्रुवम् ॥ एवं ज्ञात्वा वरारोहे प्रतीकारं समाचरेत् ॥ १४२ ॥ पि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418335 proofread-page text/x-wiki omu8foxakhuu7d7qch0wigvimk7cb5x पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३६ 104 165745 418336 2026-09-05T10:32:26Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ९१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । तेन बाकुचिचक्राकार्पासागस्तिपवान् ॥८१॥ एकस्य लकुचस्याम्ले स्वरसेन रसेन यः । प्रक्षालितः प्रयात्येव विषदिग्धत्रणः शमम् ॥ ८२ ॥ रसायनोक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418336 proofread-page text/x-wiki trobh5d2j2s15ina45a2r2us9fnnvi0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७०९ 104 165746 418337 2026-09-05T10:33:18Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८७ ) भृगं लवंगं बोलं च प्रत्येकं च पलं पलम् ॥ ११४॥ मिशि: पंचपला धान्यं पलत्रयमितं तथा । audiogurt सम्यस्विचूर्ण्य परिमिश्रयेत् ॥ ११५ ॥ एषा सौभाग्यशुण्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418337 proofread-page text/x-wiki tv9rtgyfl11o65bxzsgcxcwc5pe85oc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३२ 104 165747 418338 2026-09-05T10:33:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१० ) रसरत्नसमुच्चयः । गन्धकको जारण करे । फिर कढाईको नीचे उतारकर शीतल हो जानेपर उस भस्मको १ प्रस्थ पानी डालकर घोललेवे । जब पानी ठहरजाय तब उसको धीरे २ नितार लेवे ।... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418338 proofread-page text/x-wiki spmm5ah18uoq5e16n6pqdsmur4prih4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५४ 104 165748 418339 2026-09-05T10:34:04Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३२ ) रसरत्नसमुच्चयः । असगन्ध, अजमोद, वच, कूठ, त्रिकूटा, सौंफ, ब्राह्मी के बीज और सेंधानमक इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपडछान करलेवे फिर प्रतिदिन प्रातः... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418339 proofread-page text/x-wiki 31l0f9jex77ifdn42fzy24xd3hbkiqp पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७६ 104 165749 418340 2026-09-05T10:34:25Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५४ ) इसरत्नसमुच्चयः । छुछुदरीसाधिततैल लिप्त त्रिभिर्दिनैर्नश्यति गण्डमाला ॥ १२५ ॥ मूलिका सहदेव्युत्था रवौ ब्राह्माऽथ धारिता । गंडमालाहरा कणै महादेवेन भाषि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418340 proofread-page text/x-wiki d3559jeaq32oz1fsupf6701tbt4lsv5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९८ 104 165750 418341 2026-09-05T10:34:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७७६) रसरत्नसमुच्चयः । रजोदोष, कालाप्रदर, लाल प्रदर, श्वेतप्रदर आदि व्याधियोंको शीघ्र विनाश करता है । यह पुष्यानुग नामक चूर्ण आत्रेयऋविका बनाया हुआ है। उपर्युक्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418341 proofread-page text/x-wiki iyyhjujl4gzgssva5pn9yo60y9dj322 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२१ 104 165751 418342 2026-09-05T10:35:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७९९) सर्वागोद्वर्तनं कुर्यात्सयवैः शाल्मलीरसैः । अन्वहं मधुराहारः सहस्रं रमते स्त्रियः ॥ शशांकोऽयं रसः प्रोक्तो वाजीकरणपूर्वकः ॥ ८ ॥ सुवर्णभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418342 proofread-page text/x-wiki g0jwfvqlasxvgrpor36vka9uue31xoc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४५ 104 165752 418343 2026-09-05T10:35:36Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१३) भीमतुल्यबलः श्रीमान्पुत्रसंततिसंयुतः । सर्वारोग्यमयो भीमसमानभुजविक्रमः ॥ १११ ॥ सर्वायाससहिष्णुश्च शीतातपसहस्तथा । अमन्दसंमदोपेतः प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418343 proofread-page text/x-wiki ptcyrzc56bro6upcr28e35xh37300l7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६८ 104 165753 418344 2026-09-05T10:36:02Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूध पीवे और बार बार ताम्बूल भक्षण करे । इस प्रकार करने से कोष्ठ सम्बन्धी सब विकार दूर होकर अग्नि अत्यन्त दीपन होती है । इसको सेवन करनेवाले म... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418344 proofread-page text/x-wiki kvq53iufyuo2nsrn7n2697tsli8osv9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९० 104 165754 418345 2026-09-05T10:36:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८६८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्वितीया जयागुटी । वासाऽनृताख दिर निम्ब विडंगपथ्याक्काये विषत्रि- कटुचित्रकलोहतिक्ता: । आवाप्य माषतुलिता afटिका प्रणीता क्षौद्रान्वित... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418345 proofread-page text/x-wiki 41kh7yihgttucbn1vwelg5mx9uuq1ee पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१३ 104 165755 418346 2026-09-05T10:36:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । 1 ( ८९१ ) न जात्वन्यत्प्रयोक्तव्यं विषे तोक्षणे च चारिते । अतिमात्रे च कर्मण्ये पेयं घृतमनन्तरम् ॥ सभाङ्गदधिधर्मोत्थं सारिवा तंदुलीयकम् ॥१५१॥ आग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418346 proofread-page text/x-wiki syqr1hexz6cc2bhu3v1jnfcv69kjc0q पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३७ 104 165756 418347 2026-09-05T10:37:06Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९१५) लोहितागस्तिसारेण कृष्णारंभाफलं घृतम् । रसं च घनसारं च पीत्वा स्त्रीषु वृषायते ॥ ९२ ॥ घनसारच तुजीतकं कोल्लकटुकी पलम् । पलं ताम्बूलवलीनां र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418347 proofread-page text/x-wiki tioglfuz9pyggu0odzmrrkf9xnat44e पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१० 104 165757 418348 2026-09-05T10:37:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । युक्तं शर्करया पीतं सतीशूलज्वरापहम् ॥ ११८ ॥ लोहखंडयुतं पञ्चमूलिकासाधितं जलम् । नाशयेत्सूतिका रोगान् सवातान्विविधान्खलु ॥ ११९ ॥ बिबिभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418348 proofread-page text/x-wiki o5bn6cjavhb7wen5clwqbiii7w2ki2l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३३ 104 165758 418349 2026-09-05T10:37:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७११) व्रणान्कृच्छ्रान्सुसूक्ष्माग्रानपि शीघ्रं निवर्तयेत् । तत्कि दकिटिमपामादील्लेपनाज्जयेत् ॥४४॥ गन्धक १० निष्क और नीलायोया १० निष्क लेकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418349 proofread-page text/x-wiki 9phm0p10e92uafrxterh4peqm3kkbha पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५५ 104 165759 418350 2026-09-05T10:38:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७३३) कृतलेषं निहंत्याशु श्यामिकां गंडयोः स्थिताम्|३८|| मुखच्छायाहरं बंगभस्म स्यान्महिषीजलैः ॥ गोमयस्य रसं सर्पिर्मातुलुंगं मनः शिला ॥ ३९ ॥ मुख... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418350 proofread-page text/x-wiki 5w9yynnn9qp1kpky74k6e83e1kkaigq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७७ 104 165760 418351 2026-09-05T10:38:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७५५) समान भाग लेकर गोमूत्रमें खरल करके मरहम बनालेवे । इस मरहमके लगानेसे अपची, ग्रन्थि, अर्बुद और श्लीपद आदि रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ १२७ ॥ इति श्री... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418351 proofread-page text/x-wiki ppo9kg6j13cfg0w3vj1nc15w1twn1bw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९९ 104 165761 418352 2026-09-05T10:39:08Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७७७) ( १ ) जो विष कन्दमूल, फल आदिमें होता है तथा जिसमें से सरधके समान विष निकलता है, वह अत्यन्त उग्रवीर्यवाला होता है और स्थावर विष कहलाता है । सर्प, बि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418352 proofread-page text/x-wiki g6brpny8ljfn4coihxxcx377l6ghn79 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२२ 104 165762 418353 2026-09-05T10:39:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८०० ) रसरत्नसमुच्चयः । और गौका घी इन तीनों मिले हुए पदार्थोंमें एवं शहद और समान भाग मिश्रित सेमलकी जडके रस, दूध और गोरूके काथनें क्रमानु- सार एक २ दिन तक स्वेददेवे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418353 proofread-page text/x-wiki s58m8085yxb8j9lecfw2ji75z8xstkz पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४६ 104 165763 418354 2026-09-05T10:40:12Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२४) रसरत्नसमुच्चयः । i मिले इसमें सौबार घोटकर १०० बार पुटदेवे तो यह व्योमरसायन : सिद्ध होती है । इस विधि से तैयार की हुई व्योमभस्म, सोनामाखी की भस्म, चादीका भस्म और... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418354 proofread-page text/x-wiki q8iymapl9zd6rkrj4tob1uw98fueg5e पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६९ 104 165764 418355 2026-09-05T10:40:32Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । ( ८४७ ) सेवन करनेपर वमन या शूल हो तो पीपल के पत्तोंका काथ पान करना चाहिये । यदि उपर्युक्त विधिसे लोहरसायन सिद्ध न होसके तो सामा- अन्य विधिसे अर्थात् त... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418355 proofread-page text/x-wiki klbsctvetrafz0ftkr1qshlv03iaoqo पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९१ 104 165765 418356 2026-09-05T10:40:55Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ } भावाडीकोपेतः । (८६९) षट्सप्ताष्टदिनेप्येवं नवमे वेदसंख्यया ॥ ४३ ॥ भक्षयद्वाजिकावृद्धया यावद्वंजामितं भवेत् । मासत्रयप्रयोगेण कुष्ठान्यष्ट हरेद्विषम् ॥ ४४... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418356 proofread-page text/x-wiki fsnftcof9i80lqfvo1g54p5i4l8nptf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१४ 104 165766 418357 2026-09-05T10:41:15Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८९१ ) रसरत्नसमुचयः । त्वचा का विकार अर्थात् त्वचाका फटना और तमतमाना, दूसरे शरीर का काँपना, तीसरे वेगमें दाह होना, चौथे वेगमें आँख, कान आदि इन्द्रियों में विकार होन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418357 proofread-page text/x-wiki cuc9nz001ma5hxhq7u22jh48tdvbb9m पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३८ 104 165767 418358 2026-09-05T10:41:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ९१६ ) रसरत्नसमुच्चयः । अष्टभागावशिष्टं वा गोमूत्रं सैंधवान्वितम् ॥ १०२ ॥ यत्क्षेत्रीकरणं पूर्व वेधकं च रसं ततः ॥ १०३ ॥ सेवेत तस्य सिद्धिः स्यादन्यथा मरणं ध्रु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418358 proofread-page text/x-wiki 99hbdcxsyqbh46lx558rv02gja14apm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७११ 104 165768 418359 2026-09-05T10:42:11Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६८९ ) कल्कके साथ तेलको पकाकर उसकी मालिश करे । इस तेलसे प्रसूत सम्बन्धी सब रोग दूर होते हैं । निर्गुण्डीके पत्तों का स्वरस और पुराना गुड दोनोंको कु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418359 proofread-page text/x-wiki a4umuo6gnof9jqcmqljoxlt5cmpuvk5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३४ 104 165769 418360 2026-09-05T10:42:41Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । गरुडाञ्जन । कतक सैंधव तुत्थरसांजनं त्रिकटुकस्फटि- काब्दवराटकम् । त्रिपटुताम्रमयो हिम- रोहिणी जलधिफेनवचानुकरोटिका ॥४५॥ उरगपारदटंकणमञ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418360 proofread-page text/x-wiki 6uhtqkcp5od4ue2vnzmuulnallo2xqr पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५६ 104 165770 418361 2026-09-05T10:43:14Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ७३४) बनालेवे । इन गोलियोंको मुँह में डालकर रस चूसनेसे मुखशोषरोग नष्ट होता है। सफेद पुनर्नवाकी जड और सरहटीकी जडको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418361 proofread-page text/x-wiki nx7hkpg3l4gqorn6k9pn49l9vk00gq6 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७८ 104 165771 418362 2026-09-05T10:43:42Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७५६ ) रसरत्नसमुच्चयः । तत्कालशस्त्र प्रहतः शशो यस्तस्याऽसृजा नश्यति लिप्यमानम् । व्यंगं मुखे जातिफलस्य बाह्यत्वचाऽथवा संततमेव लिप्तम् ॥ ४ ॥ इंगुदी फल समुद्भ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418362 proofread-page text/x-wiki 9pqk5zw9vdl10yg8tv2bdbuxw4rqmu9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०० 104 165772 418363 2026-09-05T10:44:16Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७७८) रसरत्नसमुच्चयः । पनिसे स्थावर या जंगम सच प्रकारका विष मनुष्यके शरीरसे बाहर निकल जाता है ॥ १०९ ॥ व्योषैरण्डस्रावपक्वं तु तैलं लेपायोक्तं वृथ्विकानां सदैव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418363 proofread-page text/x-wiki m0q5tgmhuli2enu9f93egnrmfh4l4m3 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२३ 104 165773 418364 2026-09-05T10:44:51Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ "भाषration: 1 ( ८०१ ) फूलकी अगस्तियाके रसमें एक एक बार भावना देनेसे उसीको पूर्ण चन्द्ररस कहते हैं । यह रस मनुष्योंकी शुक्रधातुको पूर्ण करनेवाला हैं और कामदेवका रहस्य तथ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418364 proofread-page text/x-wiki 6ho7fzix671vo4foehao6dnfvw4jd3o 418365 418364 2026-09-05T10:45:17Z Bnarayanan V 10460 418365 proofread-page text/x-wiki iiwqvk6li0c8t4eczdh2qvf5cwvpwc2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४७ 104 165774 418366 2026-09-05T10:45:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८१५) रसायन के सेवन करनेपर समस्त गोरसोंसे युक्त अर्थात् गोदुग्ध, घृत, दही, माखन, छाछ आदि पदार्थोंके साथ पथ्य पदार्थों का आहार करना चाहिये और रोगके अ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418366 proofread-page text/x-wiki nf0y855dd4a00fnvs9qhzwr60hog9n7 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७० 104 165775 418367 2026-09-05T10:46:29Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधकेन समांशेन प्राग्वत्तानं च मारितम् ॥५५॥ कञ्चुकथमिह त्रिंशत्कर्ष चूर्णितगंधकम् ॥ ५६ ॥ दत्त्वाऽल्पशोऽग्निनाऽल्पेन दत्त्वा धूमं वि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418367 proofread-page text/x-wiki 3yd2v0pb5r5zlvojvp3dse29vh3v7pf पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९२ 104 165776 418368 2026-09-05T10:46:50Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८७०) रसरत्नसमुच्चयः । विष के सामान्य प्रयोग । ४९ ॥ अथ गोमूत्रसंयुक्तमातपे शोषयेत्र्यहम् । विषं बृंहणमेतद्धि विषस्यादौ प्रशस्यते ॥ १७ ॥ तत्पिबेन्मस्तुना वातज... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418368 proofread-page text/x-wiki ctzh5r76br3hw489nehhwt8xnf009oi पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१५ 104 165777 418369 2026-09-05T10:47:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८९३) थका सेवन और अपथ्य पदार्थोंको दूरसेही त्याग देना चाहिये । सक्तक, मुस्तक, शृगिक, बालुक, सर्वपक और वत्सनाभ इनमेंसे किसी विषको जब वह पूर्णरूपसे प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418369 proofread-page text/x-wiki c0awutnscqidsf4km9n4diyp8eg6bev पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३९ 104 165778 418370 2026-09-05T10:47:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९१७) और चकरीका दूध इन सबको समान भाग लेकर बड, गूलर, पीपल आदि दूधवाले वृक्षोंके रसमें पीसकर कल्क बना लेवे । उस कल्कके साथ सिद्ध किये हुए तेलको मालिश क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418370 proofread-page text/x-wiki 1qn63u9y5dtv11mmnker5s9dls08ahj पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१२ 104 165779 418371 2026-09-05T10:48:06Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६९० ) रसरत्नसमुच्चयः । गायका सींग, गधे बाल, मोरपंख, बिलाव की विष्ठा, बकरीका रुआ और बकरीका घृत इन सबको समान भाग लेकर बकरेके मूत्रमें भावना देकर धूप तैयार करलेवे । यह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418371 proofread-page text/x-wiki tij7iilsczkc90x32xjknezxxtyf14l पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३५ 104 165780 418372 2026-09-05T10:48:32Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७१३) नेत्रों में लगानेसे नेत्रोंके तिमिर रोग (अंधेरे) को दूर करता है ॥ ४७॥ पटलहराञ्जन । कारवेद्रवैः सार्धं सम्यग्भर्ज्या कपर्दिका । सुतकं टंकणं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418372 proofread-page text/x-wiki ht67bkrsauf9wz474fwufxce8yoyyse पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५७ 104 165781 418373 2026-09-05T10:48:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७३९) गुटिकां धारयेद्दतैः कृमिशूलहरं परम् ॥ ४७ ॥ विशालायाः फलं चूर्ण्य तप्तलोहोपरि क्षिपेत् । तद्धूमाभृष्टदंतानां कीटपातो भवत्यलम् ॥ ४८ ॥ जाती... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418373 proofread-page text/x-wiki gliauneb3bk0jcpfs4l10y03d6wodgt पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७९ 104 165782 418374 2026-09-05T10:49:20Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७५७) ( १ ) मसूरिकामें पर्पटी रसको घृत और नीम के पत्तोंके चूर्णको मिलाकर सेवन करने से मसूरिका आदि अनेक दारुण क्षुद्ररोग नाश होते हैं । (२) व्यंग रोगमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418374 proofread-page text/x-wiki myrmynnq66raka66tf6g2usik2ip8ms पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०१ 104 165783 418375 2026-09-05T10:50:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७७९ ) देवदारु, तगर तिलके तेलको पकाकर लगानेसे बिच्छूका विष शीघ्र उत्तर जाता है । (१०) सिझाल, तगर, मृतसंजीवन रस, वत्सनाभ विप, सिरस के फूल, पत्ते इन सबको ए... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418375 proofread-page text/x-wiki 4gqug3z1w67kku87193cevld92xkys0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२४ 104 165784 418376 2026-09-05T10:51:01Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (८०२) यसरत्नसमुच्चयः । कुसुमायुध रख । सूतस्य द्विपलं चतुष्पल मितो गंधो मृतं काञ्चनं पादन्यून पलं सुवर्णविमलाताप्यं रसेनोन्मितम् । लोहं कांतमलस्तथा सितघनं कर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418376 proofread-page text/x-wiki l5qoq2n8hvqvp60d1cogy0s2sjgv9nh पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४८ 104 165785 418377 2026-09-05T10:51:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, कूठ, सैंधानमक, धनियाँ, कत्तूर, तामें भुनी हुई मेथी, जीरा और काला जीरा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीस... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418377 proofread-page text/x-wiki ozhdwg7ra26gt0dk8ur47f0mgy0xrva पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७१ 104 165786 418378 2026-09-05T10:51:44Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाडीकोपेतः । ( ८४९) खण्डखाद्य रसायन । वासाभाङ्गर्यमृताभीरुव चाख दिरपुष्करैः । घुसली भिक्षुकोरण्टैः सपै चाप च मुष्टिकैः ॥ ६० ॥ पकेष्टशिष्टे ताम्रस्थे प्रस्थ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418378 proofread-page text/x-wiki cbz57k1vsul94pn7xhr5gm1x8c3tynl पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९३ 104 165787 418379 2026-09-05T10:52:05Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८७१ ) गोसूत्रक्षार सिंधूत्थ विषपाषाणभेदकम् । वज्रवद्दारयत्येतदेकतः पीतमश्मरीम् ॥ ५८ ॥ त्रिफलास्वर्जिकाक्षारैर्विषं गुल्मप्रभेदनम् । पिप्प... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418379 proofread-page text/x-wiki riw0trvs3bfby7aae9a5kymm6v8f503 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१६ 104 165788 418380 2026-09-05T10:52:25Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८९४ ) मनुष्यको दो जौकी बराबर और बिच्छूसे काटे हुए मनुष्यको एक तिलकी बराबर उक्त विष सेवन करना चाहिये । विषको पान करने पर अथवा सर्पादिते काठे हुए... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418380 proofread-page text/x-wiki nnorsmqcw4wy4axf2b0foxgay4nouf9 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४० 104 165789 418381 2026-09-05T10:52:47Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (९१८) रसरत्नसमुच्चयः । कर किम्बा कपास के पत्तों और पारदभरमको घीके साथ पीसकर लेप करनेसे बिच्छूका विष नष्ट होता है । (४९) चनोंके खारमें एक कपडे के टुकडेको भिजोकर आठ द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418381 proofread-page text/x-wiki 4hcdgzd413tbtmrh0rdv35o8wph2qt4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१३ 104 165790 418382 2026-09-05T10:53:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । प्रियंगु त्रिफलादारुहिंगुव्योषकुचंदनम् ॥१३१॥ मंजिष्टोग्राजमूत्रं च गुटिका ग्रहनाशिनी । पाननस्याञ्जनालेमस्यानोतनधूपनात् ॥ १३२ ॥ (६९१) राई, क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418382 proofread-page text/x-wiki tco7g8zl2m6fyj9ykk2ezequpzmszfc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३६ 104 165791 418383 2026-09-05T10:56:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । आंजनेसे छः प्रकारका तिमिररोग नष्ट होता है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ शुक्लाविति । शंबूकं पारदं नागं कांस्यचूर्ण रसाञ्जनम् । समं सर्वमिदं चिचादलद्रावेण... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418383 proofread-page text/x-wiki q9sjc9typf1jz91kc0eveeqcr5p2fc5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५८ 104 165792 418384 2026-09-05T10:56:53Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३६) रसरत्नसमुच्चयः । समानभाग लेकर चूर्ण कर लेवे । इस चूर्ण को प्रतिदिन दो दो तोले भक्षण कर ऊपर से शीतल जलका अनुपान करै । यह चूर्ण मुखकी विरसताको शान्त करनेके लिय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418384 proofread-page text/x-wiki 3bfh1qiz3jhqsmycj19dfenhowzlms2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८० 104 165793 418385 2026-09-05T10:57:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७५८) रसरत्नसमुच्चयः । निकालकर साफ मूत्रमें पीसकर लेप • रके स्तनरोगों में शिरावेधकर रक्त मोक्षण कराना सर्वोत्तम उपाय है । जो स्तन पकगया हो और पीच पडगया हो तो प्रल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418385 proofread-page text/x-wiki 6ychqymyk5epzqgqar1y4twjw2jdzc4 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०२ 104 165794 418386 2026-09-05T10:57:39Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (७८० ) रसरत्नसमुच्चयः । मध्ये वि भूतं पुटेत ॥११८॥ पश्चान्मेघनादीरसेन सुतः सिद्धस्त्वेष- ताक्ष्यों विषारिः । तार्क्ष्य वंध्या भक्षयेद्वक्तिमानं सूतं तस्माद्य... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418386 proofread-page text/x-wiki 69c9tprmizx5x309p4kedtiymuzcf19 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२५ 104 165795 418387 2026-09-05T10:58:01Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८०३) मूषामें ब्राह्मीका रस डालता जावे । जब रस सुखजाय तब उसमें उत- नाही रस और डाल देवे अर्थात् एक दिनमें २४ घंटे बराबर एक एक घंटेमें रस डालता रहे और ब... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418387 proofread-page text/x-wiki ci68fuihplqrk1z73d54xccb2g6pbq0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८४९ 104 165796 418388 2026-09-05T10:58:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८२७) saraf afaai विलेामथवा कृत्वा च तत्सेवये- त्या क्षीरसिताऽनुवीर्यकरणे स्तंभेऽप्यलं कामिनाम् । रामावश्यकरः सुखातिसुखदः प्रौढांगनाद्रावकः क्षीणे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418388 proofread-page text/x-wiki jki6sy6z9vcw1gn68cdhsug2pzcxw52 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७२ 104 165797 418389 2026-09-05T10:58:41Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८५० ) रसरत्नसमुच्चयः । खाँसी, अरुचि, क्लान्ति. शीत, पिच, अम्लपित्त, वातरक्त, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, प्रमेह लोहा, आनाह, कृशता, शूल और पक्तिशाल इन सब व्याधियोंको नाश क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418389 proofread-page text/x-wiki ivq8oogkr07giehev8i28ly53fobri5 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९४ 104 165798 418390 2026-09-05T10:59:02Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८७३) रसरत्नसमुच्चयः । विषं दारु शिरीषास्थि तक्रं लेपेन कुष्ठजिव ॥ ६९ ॥ करञ्जकरवीरार्क मालती रक्तचंदनैः । आस्फोटा कुष्ठमंजिष्ठा सप्तच्छदनिशानतैः ॥ ७० ॥ सिंदु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418390 proofread-page text/x-wiki rhlqad4go9ccmlyx489mfhdvm2x4i6g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१७ 104 165799 418391 2026-09-05T10:59:22Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । (८९५) तोऽधराशिना ततोऽप्यक्षीणो नोर्व्वमाश्रयेत् । अथाऽपामार्गतैलेन तथा पुष्करतंदुलैः ॥ ६ ॥ अथवा मलयूक्षीरभावित श्वेत हिंगुना । मर्दितः पुटपा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418391 proofread-page text/x-wiki rturjocz0rxbmor9psw65qw93glr26g पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४१ 104 165800 418392 2026-09-05T10:59:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९१९) इन सबको मधु, घृत और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से वृद्धा- वस्था और विरूपता नष्ट होकर मनुष्य स्वरूपवान होता है । (५५) रसायन के गुणवाली औषधियो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418392 proofread-page text/x-wiki 2snkvvzp7buex2l1g30lejglnv5a49j पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१४ 104 165801 418393 2026-09-05T11:00:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ६९२ ) रसरत्नसमुच्चयः । गंधोत्पलजटा पिष्टा कटुकी नाशयेज्वरम् । सहदेवीकणाभृंगक्षौद्रं लीढं हरेच्छिशोः ॥ व मिकासज्वरव्याधीन्क्षौद्रेणातिविषा तथा ॥ १३८ ॥ न्यग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418393 proofread-page text/x-wiki 2fgpkpl7dfmdqthmsaxo0sxq1h2dlij पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३७ 104 165802 418394 2026-09-05T11:00:52Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७१५ ) रजतस्य तु चत्वारो द्वौ भागौ कनकस्य च । Heaterष्टमो भागः पिप्पल्याश्च षडेव तु ॥ ५६ ॥ अजाक्षीरेण संपेष्य ताम्रपात्रे निधापयेत् । अभिष्यंदमधीमथ व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418394 proofread-page text/x-wiki dz2z65stsp8n80903g8y5bxfxw80rcw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७५९ 104 165803 418395 2026-09-05T11:01:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ७३७) लेपयेद्रानुदुग्धेन सैंधवं गलकीलनुत । महिषीमूत्रसंपिष्टं लोह किंह क्षणं पचेत् ॥ ५४ ॥ तेन लेपो निहत्याशु गलरोगं सुदुःसहम् । जलेन लेपयेत्तुल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418395 proofread-page text/x-wiki ly5b3u8acmf82dx38863mvgs54hqtvg पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८१ 104 165804 418396 2026-09-05T11:01:34Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७५९) खादी मंजिष्ठाचूर्ण चापातनं जयेत् ॥१८॥ यवचिचारसैर्दृष्टं सैधवं रोपयेद्वणम् । ग्रंथिः कटयां च जघने शममाप्नोति नान्यथा ॥ १९ ॥ शिग्रुमूलं त्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418396 proofread-page text/x-wiki oi3m0rg51p5uawpfzs5s9vno0j9zrp2 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०३ 104 165805 418397 2026-09-05T11:01:55Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । (७८१) हस्तिपर्णीलवलिकामत्स्याक्षीकल्कवेष्टितौ ॥ ३॥ त्रिपक्at मूकमूषायां सम्योगौ वार्धकापहौ ॥ ४ ॥ रसायन के सेवन करने से दीर्घ आयु स्मृतिशक्ति, सु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418397 proofread-page text/x-wiki i5nor13n3gwj29xf6btlq4m57hhkiva 418398 418397 2026-09-05T11:02:35Z Bnarayanan V 10460 418398 proofread-page text/x-wiki e8z59jieco6cet2bvdjzk6xfwit4j99 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२६ 104 165806 418399 2026-09-05T11:02:58Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८०४ ) रसरत्नसमुच्चयः । मर्दयेत्तत्पुनर्दत्त्वा गंधं माषचतुष्टयम् ॥ २४ ॥ तन्मध्ये गंधकं दत्त्वा मर्दयेत्तदनंतरम् । भीक्ष्याका घटीमध्ये सन्निरुध्य प्रयत्नत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418399 proofread-page text/x-wiki sm9kgunbzeaf0p80bm7f2fsvl0gpyqw पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५० 104 165807 418400 2026-09-05T11:03:30Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ८२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । उत्पन्न हुए सब प्रकारके गुणोंको धारण करता है । यह प्रयोग चिर- कालतक अवस्थाको स्थिर करनेवाला और ध्यान, धारणा (समाधि) आदि योगके कार्यों में मन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418400 proofread-page text/x-wiki owdpmrkz97cc703yx8ha2kjcfskfz16 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७३ 104 165808 418401 2026-09-05T11:04:17Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८५१ ) अंत घूमविदग्धायाश्चूर्ण सोष्णांबु शूलजित् ॥७३॥ त्रिफलामृत निर्गुडीमेघनादपुनर्नवा | का समदत्तिधत्तरवत्रिणीनां रसैरिदम् ॥ ७६ ॥ भावितं गु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418401 proofread-page text/x-wiki hhhbzi7pi3h12vkkbufhugvfdi5dnj0 पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९५ 104 165809 418402 2026-09-05T11:04:40Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८७३) 'कोरकं चीरनिष्काये लांगलीविषसर्षपैः । गंधक कोलमरिचैः सस्नुकुक्षीरैर्विपाचितम् ॥ जयेज्ज्योतिष्मतीतैलमन लत्वग्गदानपि ॥ ८१ ॥ स्वरसं वीजपू... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418402 proofread-page text/x-wiki fwzr7orx42w2kqmedqsxekkqtie6c0n पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१८ 104 165810 418403 2026-09-05T11:04:59Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ (८९६) रसरत्नसमुचयः । मिला ले | इसको बडवानल विह कहते हैं । इस बडवानल विडमें पारेको पीसकर अग्निदेने से पारा अभिसह (अर्थात् अग्रिको सहने वाला) हो जाता है । यह विड् जारण... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418403 proofread-page text/x-wiki 7jr04a6ndv3pifgtqpa0ez6l2fef39j पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४२ 104 165811 418404 2026-09-05T11:05:21Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ९२० ) रसरत्नसमुच्चयः । पारा सेवन करनेपर अपथ्य । काँजी, तेल, मद्य, दही, तरबूज, करेला, खट्टे पदार्थ, लहसन, फट- करी, मूली, दो दलवाले अन्न (दाल) बेल, बैंगन, साँपकी छतरी और मको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418404 proofread-page text/x-wiki 4nm8h2y9q7e79euuj4y0h2blh9lw04r पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१५ 104 165812 418405 2026-09-05T11:07:13Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ६९३ ) थोडा २ बालकोंको पान करानेसे उनके ज्वरको नाश करता है । सह- देई, पीपल और भाँगरा इन औषधियों के समान भाग चूर्ण को शहदम मिलाकर अथवा शहद और अतीसके चूर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418405 proofread-page text/x-wiki jfwwrcps0wjjtsvi803zrj9i6uz8qff पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३८ 104 165813 418406 2026-09-05T11:07:33Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७१६) रसरत्नसमुचयः । शिश्रुतैल । चिचादलस्वरसपेषित शिशुवीजं कांस्ये निघृष्य परिशोष्य खरातपेन तैलं ततः शृतमिदं शशि- पादयुक्तं युंज्याद्रणार्मतिमिरे तिलमात्र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418406 proofread-page text/x-wiki 4z0ffe4nsuj6iivb403nhwqkgjo0jpv पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६० 104 165814 418407 2026-09-05T11:55:24Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । मूत्रमें पीसकर कुछ देर अग्निपर गरम करके लेप करनेसे गले के सम्पूर्ण रोग शीघ्र नाश होते हैं । कचनारकी छाल, चीता और वत्सनाभविष तीनोंको समानभा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418407 proofread-page text/x-wiki hft6fhjktbq4bgsitqa4xh1c628kumm पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८२ 104 165815 418408 2026-09-05T11:55:45Z Bnarayanan V 10460 /* अपरिष्कृतम् */ ( ७६० ) रसरत्नसमुच्चयः । ( १९ ) लिंग पकागया हो तो प्रथम शस्त्रक्रियाके द्वारा रक्त निकलवाकर पीछे रोगीको घोलका चूर्ण सेवन करावे । इससे लिंग व्याधि नष्ट होजाती है । (१... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती 418408 proofread-page text/x-wiki etmbbfjihelypkb1d63rj87nt7ah1qj