विकिस्रोतः
sawikisource
https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D
MediaWiki 1.47.0-wmf.18
first-letter
माध्यमम्
विशेषः
सम्भाषणम्
सदस्यः
सदस्यसम्भाषणम्
विकिस्रोतः
विकिस्रोतःसम्भाषणम्
सञ्चिका
सञ्चिकासम्भाषणम्
मीडियाविकि
मीडियाविकिसम्भाषणम्
फलकम्
फलकसम्भाषणम्
साहाय्यम्
साहाय्यसम्भाषणम्
वर्गः
वर्गसम्भाषणम्
प्रवेशद्वारम्
प्रवेशद्वारसम्भाषणम्
लेखकः
लेखकसम्भाषणम्
पृष्ठम्
पृष्ठसम्भाषणम्
अनुक्रमणिका
अनुक्रमणिकासम्भाषणम्
श्रव्यम्
श्रव्यसम्भाषणम्
TimedText
TimedText talk
पटलम्
पटलसम्भाषणम्
Event
Event talk
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१६
104
165816
418409
2026-09-06T08:02:42Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ 1 ( ६९४ ) रसरत्नसमुच्चयः । तृष्णा तालुविपाकश्व स्तन्यद्वेषश्च विग्रहः । भ्रमास्य शोषकण्डूतिवामूर्धगता वमिः ॥ १४६ ॥ अक्षिरोगादिकं चापि तत्र चोन्नीय तालुकम् । प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418409
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>1
( ६९४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
तृष्णा तालुविपाकश्व स्तन्यद्वेषश्च विग्रहः ।
भ्रमास्य शोषकण्डूतिवामूर्धगता वमिः ॥ १४६ ॥
अक्षिरोगादिकं चापि तत्र चोन्नीय तालुकम् ।
प्रतिसार्य यवक्षारक्षौद्राभ्यामतियत्नतः ॥ १४७ ॥
यद्वा विश्वा कणा सिंधुगोमयोत्थर सैस्तथा ।
पथ्याकुष्ठव चाकल्कं स्तन्येन मधुना श्रुतम् ॥
पीतं निहंति वेगेन बालानां तालुकंटकम्॥ १४८ ॥
प्रस्वेदान्मललेपाद्वा रक्तश्लेष्मभवो गुदे ।
गुदको भवेद्रोगस्तीव्रव्रणसमन्वितः ॥ १४९ ॥
तशी शैलेयेलूकचूर्ण मधूत्थकम् ।
तेनापानत्रणं सम्यग्पयेद्विषत्तमः ॥ १५० ॥
सुगन्धवाला, काकडासिंगी, पाढ और नागरमोथा इन औषधि-
योंका क्वाथ शहद डालकर पिलानेसे बालकोंके खूनी दस्त बन्द होते
हैं । बोलके एक रत्ती चूर्णको दूधमें मिलाकर पिलानेसे बालक के
कण्ठ में, छाती और शिर में संचित हुआ कफ शीघ्र दूर होता है ।
महुआ और काली मिरचोंको गोमूत्रमें पीसकर सेवन करानेसे बाल-
कोमल मूत्रका अवरोध होना शीघ्र नष्ट होता है । मुलैठी, लोध,
पीपल, गन्धमसारणी, खिरैटी, सेमलकी छाल, सारिवा, रायसन
और शहद इन सबको समान भाग लेकर कल्क करलेवे, इस कल्कके
साथ यथाविधि घृतको पकाकर बालकको सेवन करावे यह
घृत शुष्क और दुर्बल शरीरवाले बालकके लिये अत्यन्त
पुष्टिकारक और बलवर्द्धक है । शंखकी नाभि, पीपल, हरड
१ दुगः चूर्णमिति पाठोपि ।<noinclude></noinclude>
blpmbdm98l23o9srn0vcan5gkkzcfzg
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७३९
104
165817
418410
2026-09-06T08:03:44Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७१७ ) चूर्ण तीक्ष्णस्य ताम्रस्य रसेंद्रसमचारितम् । रसांजनं च द्विगुणं वर्षाभूरसमर्दितम् ॥६६॥ शर्करामाशिकोपेतं पित्ताभिष्यंदसूदनम् । नागपार... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418410
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ७१७ )
चूर्ण तीक्ष्णस्य ताम्रस्य रसेंद्रसमचारितम् ।
रसांजनं च द्विगुणं वर्षाभूरसमर्दितम् ॥६६॥
शर्करामाशिकोपेतं पित्ताभिष्यंदसूदनम् ।
नागपारदधात्रीं दुरत्नाकरससैंधवम् ॥६७॥
रसांजनं कणा क्षौद्रं तांबूलीपत्रवारिणा ॥
ताम्रेण मर्दित कांस्ये पित्ताभिष्यंदमंथनुत् ॥६८॥
ताम्राऽहिताररसपीतकरोहिणीन्दु-
शौण्डीरसांजन नदीज पुराणकांस्यैः ।
पर्तिः कृता सकलसंमितहंसपदी-
मूलौर्निहति नयनामयजालमाशु ॥ ६९ ॥
मैनसिलके द्वारा भस्म किया हुआ सीसा और शुद्ध पारा ये प्रत्येक
एक २ भाग और नीलाथोथा २ भाग लेकर तीनोंको एकत्र खरल
करे । फिर उसमें थोडासा कपूर डालकर द्रोणपुष्पी के रसमें घोटे
और बत्ती बनाकर छायामें सुखा लेवे | यह बत्ती पानीमें
घिसकर नेत्रों में लगानेसे नेत्राभिष्यन्द ( आँखोंका दुखना )
रोग दूर होता है । बिनालोंके रसमें कपूरको घोटकर उसमें
समान भाग ताँकी भस्म, रसौत और शहद मिलाकर सबको
ताम्रपात्रमें करके लाल चन्दनके काढेके साथ खरल करलेवे |
वातजनित अभिष्यन्द रोगमें इस औषधके लगानेसे विशेष उपकार
होता है । ताँबा, अभ्रक, लोहा और सीसा ये सब समान भाग -
और काला सुरमा सबसे दुगुना लेवे । इन सबको एकत्र
करके चमेल पत्ता रस, तिलोंकी खलके रस औ चिरचिटेके
रसमें क्रमसे एक २ बार घोटकर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको<noinclude></noinclude>
nocruwaetdpal2dleb2packnq5gccqy
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६१
104
165818
418411
2026-09-06T08:06:21Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७३९) वातज, पित्तज, कफज, रक्तविकारजन्य और कृमिदोषजन्य इस तरह छः प्रकारकी शिर पीडा होती है। इसके अतिरिक्त शिर कम्प अवभेदक, सूर्यावर्त और शंखके ये चार... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418411
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७३९)
वातज, पित्तज, कफज, रक्तविकारजन्य और कृमिदोषजन्य इस
तरह छः प्रकारकी शिर पीडा होती है। इसके अतिरिक्त शिर कम्प
अवभेदक, सूर्यावर्त और शंखके ये चार रोग और होते हैं । इस
प्रकार सबको मिलाकर मस्तक के मुख्य १० रोग होते हैं ॥ ६३ ॥
शिरोरोगारि रस ।
मृतसूताम्रकं तीक्ष्णं कांतं ताम्रं मृतं समम् ।
स्वीक्षीरैदिन म पिण्डं तन्माषमात्रकम् ॥
सप्ताहात्सूर्यवर्तादीन् शिरोरोगान्विनाशयेत् ॥६४॥
पारेकी भस्म, अभ्रक भस्म, तीक्ष्णलोहभस्म, कान्त लोहमस्म, और
ताम्रस्म सबको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक
खरल करे और एक २ मासेकी गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाने ।
फिर उसमेंसे प्रतिदिन एक २ गोली सेवन करे । यह रस १
सप्ताह तक सेवन करने से सूर्यवतीदि सम्पूर्ण शिरोरोगोंको नष्ट
करता है ॥ ६४ ॥
शिरोरोग के सामान्य उपाय ।
६६ ॥
गिरिकर्णी फलं मूलं सदलं नस्यमाचरेत्
मूलं वा बंधयेत्कर्णे निहत्यर्धशिरोव्यथाम् ॥ ६५ ॥
गुडकर अबीजं च स्यमुष्णजलैर्हितम् ।
मरिचं भृंगजेद्रीवैर्लेपोऽयं हंति तां रुजम् ॥
कुंकुमं मधुयष्टी च सिताघृतगुणोत्तरम् ।
सप्ताहेन कृते नस्ये दाहं हंति शिरोरुचाम् ॥ ६७ ॥
शिग्रुपवर सैर्मद्ये मरिचं चार्धशूलनुत् ।
कुंकुमं घृतसंयुक्तं नस्याद्धंति शिरोरुजम् ॥६८॥<noinclude></noinclude>
4dr1zv3q774xjf1eidj2ud9kyw15nmg
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८३
104
165819
418412
2026-09-06T08:06:48Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७६१) गाँठ आराम होती है । (२६) कचनारकी जडको मनुष्य के मूत्रमें पीसकर लेप करनेसे समस्त शरीरगत सुखी व तर दोनों प्रकारकी खुजली अवश्य नष्ट होती है । (२७) स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418412
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७६१)
गाँठ आराम होती है । (२६) कचनारकी जडको मनुष्य के मूत्रमें पीसकर
लेप करनेसे समस्त शरीरगत सुखी व तर दोनों प्रकारकी खुजली
अवश्य नष्ट होती है । (२७) सहोरावृक्षकी छालको जलमें पकाकर
काथ बनालेवे | इस क्वाथको गोमूत्रमें मिलाकर पान करनेसे पामा-
रोगी आरोग्य लाभ करता है । ( २८ ) पहले पैरोंमें मक्खन मले, फिर
कनेर के पत्तोंकी धूप देकर स्वेद देवे और कनेर केही कापसे पैरोंको नोवे
वो पैरों की खुजली दूर होती है । (२९) विल १ भाग और बाव-
चीका चूर्ण २ भाग दोनोंको दो तोले शहद और घृतमें मिलाकर सेवन
करनेसे पैरों की जलन शान्त होती है । (३०) हाय पैरोंकी दाह और
खुजलीको शान्त करनेके लिये केवल हाथों पैरोंमें मक्खनकी मालिश
करे अथवा हरड के बारीक चूर्णको घृतमें मिलाकर मालिश करे तो
हाथों पैरोंकी दाह और खुजली दूर होती है ॥। १४-२८ ॥
उपदंशनाशक धूप |
लवंगजानां नवकं कर्पूरं चणसंमितम् ।
दरदं तोलमानं च सर्वे खल्वे विमर्दयेत् ॥ २९ ॥
ब्रह्मवृक्षं कोकिलाक्षैः सर्वे यत्नेनमर्दयेत् ।
यावत्कज्जलसंकाशं श्यामतां च तथैव हि ॥३०॥
चतुर्दशसमा काया पुडिका बंधयेद्भिषक् ।
रविवारे समादेया ह्यंगारे छगणोद्भवे ॥ ३१ ॥
तां निक्षिप्याऽथ संगोप्य नासिकां विवृतां नयेत्
मुखमाच्छाद्य श्वासेन यातयातेन ग्राहयेत् ॥ ३२॥
वीटिकापूर्णवदनो द्विवारं कारयेत्सदा ।
एवं सप्तदिनं कृत्वा पश्चात्खानादिकं चरेत् ॥ ३३॥<noinclude></noinclude>
jrljp8r26olyhzr9evqhbcq68kpt8n1
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०४
104
165820
418413
2026-09-06T08:07:28Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७८२ ) रसरत्नसमुच्चयः । रसोऽयमुदयादित्यः स्याज्जरारजनीहरः । मूषां तिंदुक विस्तारामायामे षोडशांगुलाम ॥ ७ ॥ भाण्डबाह्यस्थपादांशी वालुकाभिः प्रपूरयेत् । तस्य... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418413
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७८२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
रसोऽयमुदयादित्यः स्याज्जरारजनीहरः ।
मूषां तिंदुक विस्तारामायामे षोडशांगुलाम ॥ ७ ॥
भाण्डबाह्यस्थपादांशी वालुकाभिः प्रपूरयेत् ।
तस्यां निवेश्य द्विगुणगंधगर्भगतं रसम् ॥ ८ ॥
याममात्रं पचेच्चुल्ल्यां क्षिपेधस्य तृगमे ।
वायसीनागिनीमत्तमेघनादरसं क्रमात् ॥
सरसः सर्वरोगघ्नो वलीपलित जिद्भवेत् ॥ ९ ॥
( २ ) पारा ४ तोळे और गन्धक ८ तोले दोनोंकी एकत्र कजली
करके उसको अदरख के रसमें खरल करे । घोटते २ जब उसमें अद-
रखका २० तोले रस शुष्क होजाय तब उसका गोला बनाकर सुखा-
लेवे और उसको शुद्ध ताँबे की मूबामें बन्द करके ऊपरसे कपरौटी कर
गजपुटमें पकावे । स्वांगशीतल होजानेपर गोलेको निकाल कर सम्पुट
सहित खरल करलेवे | इस रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण
सेवन करे और ऊपरसे सोंठके चूर्गको घृतमें मिलाकर चाटे तथा १६
तोले उष्ण जलका अनुपान करे। यह उदयादित्य रस- जरा (बुढापा)
रूप रात्रिको विनाश करने के लिये बाल सूर्य के समान है । ( ३ ) तेंदू के
फलके समान चौडी और १६ अंगुललम्बी मिट्टीकी, लोहेकी अथवा
काँचकी शीशी के समान आकार वाली मजबूत भूषा बनाकर उसको
बालुकायन्त्रमें तीन हिस्से गाड देवे और ऊपरका १ भाग बाहरको
निकला रहने देवे | फिर उस मृषामें दो भाग गन्धक और १ भाग
पारेकी कज्जली भरकर मूषाक मुँहको बन्द करदेवे । फिर उस यन्त्रको
चूल्हे पर चढा कर एक प्रहरतक पकावे । जब गन्धक उडजाय तब उसमें
कौआठोडी, नागदौन, धतुरा और चौलाई इन प्रत्येकके रसको क्रमसे
आठ २ तोले परिमाण डाले । जब एक औषधिका रस शुष्क हो त
दूसरा रस डाले । इसप्रकार समस्त औषधियों का रस डालने के बाद<noinclude></noinclude>
g2krlg9frdyj32cxd129vlpb8lenqbt
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२७
104
165821
418414
2026-09-06T08:07:48Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८०५) माण सेवन करावे और पूर्वरोगाम कहे हुये मधुर पदार्थों (अर्थात् दूध, घी खाँड आदि ) का भोजन करावे । यह सृतेन्द्र रस अत्यन्त दुर्बल शरीरको बलवान् और... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418414
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(८०५)
माण सेवन करावे और पूर्वरोगाम कहे हुये मधुर पदार्थों (अर्थात्
दूध, घी खाँड आदि ) का भोजन करावे । यह सृतेन्द्र रस अत्यन्त
दुर्बल शरीरको बलवान् और वीर्यकी वृद्धि करता तथा ध्वजभङ्ग
रोगको नष्ट करता है । एक महीने तक सेवन करनेसे सब प्रकार के
रोगोंको नाश कर सकता है । इसपर भोजनमें शालिधानोंके चावल,
मूँग, गेहूँ आदि अन्न हितकारी हैं । एवं गोघृत, गोदुग्ध, स्निग्ध पदार्थ
पायरेका मांस, तीतरका मांस और लवापक्षीका मांस ये सब पथ्य-
रूपसे प्रयोग करने चाहिये ॥ २३-३० ॥
मदनकामदेव रस |
गोलं गंधकसूत योस्त्रिकटुकक्काथेन बध्वाऽथ भू-
कुष्माण्डान्तरवस्थित विपिहितं तेनैव लिश्वोपरि ।
माद्वगुलमाज्यपक्कमथ तत्कूष्माण्डमध्यादरे-
तच्चूर्णेन च सम्मिते सुरकृताचूर्णस्य मुष्टिद्वयम् । ३१
जयाशतावरी कृष्णा कपिकच्छू फलं तिलाः ।
प्रत्येकं पलसंमाना यवाः पञ्चपलोन्मिताः ॥ ३२ ॥
तावन्मोचफलं द्वौ च यष्टी मुष्टिद्वयं शुभा ।
निक्षिप्य सप्त सप्ताऽत्र भावनाः क्रमशश्वरेत् ॥ ३३ ॥
महाबलाबलानागबलाभिर्दाक्षयाऽपि च ।
कृष्णाघात्री क्षुभिश्चापि दन्तपात्रे निवेश्य च ॥ ३४ ॥
मत्स्यण्डिकायुतं वचद्वयमानं भजेन्निशि ।
अनुपानमिह प्रोक्तं धारोष्णं सुरभेः पयः ॥ ३५ ॥
दोषमार्तवजं हत्वा कुर्याद्वीर्यप्रवर्धनम् ।
ध्वजोत्साहं तथा स्त्रिषु वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ३६ ॥<noinclude></noinclude>
5ldixoimua2zzffgmpcc95cuplcz8yu
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५१
104
165822
418415
2026-09-06T08:08:10Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ८२९ न क्रामति रसः पुंसि क्रांते स खलु मन्मथः॥१३५॥ सिद्धं सुतं वाजिगंधां च यष्टीं पक्त्वा दुग्धं तच काश्यै ददीत । एवं वाप्यं वापयित्वा च दद्याद्य... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418415
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
८२९
न क्रामति रसः पुंसि क्रांते स खलु मन्मथः॥१३५॥
सिद्धं सुतं वाजिगंधां च यष्टीं पक्त्वा दुग्धं
तच काश्यै ददीत । एवं वाप्यं वापयित्वा
च दद्याद्यद्वा यष्टीं मागधीं वाजिगंधाम् ॥ १३६ ॥
मध्वाज्याभ्यां शाल्मली सत्त्वयुक्तां
शम्बूकै भर्जितैर्वाप्यमिश्रैः ॥ १३७ ॥
शुद्धं गंध वाजिगंधां च यष्टी शैलेयं वा सूत-
भस्माऽजगंधाम् ॥ मध्वाज्याभ्यां शाल्मली
सत्त्वयुक्तां शम्बूकैर्वा भुज्यते वाज्यमित्रैः ॥ १३८॥
एक तोला मुलैठी के चूर्णको घी और शहद में मिलाकर जो मनुष्य
प्रतिदिन सेवन करे और दुग्धका अनुपान करे तो वीर्य की वृद्धि होती
है और कामोत्तेजना होती है । जो मनुष्य ३ मासे काकडासिंगीको
दूधमें पीसकर फिर दूधमें मिलाकर पान करे और मिश्री, घृत, दूध,
भात आदिका भोजन करे तो वह मनुष्य स्त्रियोंमें वृषभके समान
शक्तिशाली होता है । कौंचके बीज और तालमखाना दोनोंको समा-
नभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपड़छान करलेवे। फिर उसमें समा-
नभाग खाँड मिलाकर प्रतिदिन धारोष्ण दुग्धके साथ पान करने से
मनुष्य गदहे के समान बलवान् होता है। बकरेके अण्डकोष को पानी में
पीसकर १६ गुने दूधमें पकावे । जब पककर अष्टमांश दूध शेष रह-
जाय तब उसमें रात्रिमें काले तिलोंको भिजोकर सवेरे सुखालेवे। इस
प्रकार २५ बार भावना देकर जो मनुष्य उन तिलोंको मिश्री मिलाकर
अक्षण करे तो वह सैकडों स्त्रियोंको भोगनेकी अपूर्व शक्तिको प्राप्त
होता है । गन्धक और पारेको समान भाग लेकर सफेद अङ्गलकी
जडके रसमें तीन दिनतक खरल करके गोला बनाकर सुखालेवे। फिर<noinclude></noinclude>
tiy2axgrjng971nbi1v7jil8e84q8at
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७४
104
165823
418416
2026-09-06T08:08:36Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८५२) रसरत्नसमुच्चयः । भल्लातक सहस्राभ्यां त्रिफला मुस्त चित्रकैः । हस्ति पिप्पल्यपामार्ग सहदेवीकुठेरकैः ॥ ८६ ॥ कणासूलाऽमृताचम्यैर्द्रोणेऽपां कुडवोन्मिते... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418416
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८५२)
रसरत्नसमुच्चयः ।
भल्लातक सहस्राभ्यां त्रिफला मुस्त चित्रकैः ।
हस्ति पिप्पल्यपामार्ग सहदेवीकुठेरकैः ॥ ८६ ॥
कणासूलाऽमृताचम्यैर्द्रोणेऽपां कुडवोन्मितेः ॥
पक्वे पदस्थे लोहस्थे तुलार्ध तीक्ष्णलोहतः ॥ ८७ ॥
मानिकां च घृतात्पक्त्वा विडंगं चित्रकं त्वचम् |
त्रिफला पंचलवणं त्र्यूषणं च पृथक पलम् ॥ ८८ ॥
पलानि सुरणस्याष्टी वाराह्या वृद्धदारकात ।
चतुष्पलं पुष्परसस्यार्धप्रस्थं च निक्षिपेत् ॥ ८९ ॥
प्रातर्भोजनकाले वा लीढमेतद्रसायनम् ।
निर्हति च ग्रहण्यर्शःशूलगुल्मकृमिक्षयान् ॥ ९० ॥
अंकोललोहमणिटंकणमाणिमन्यताप्यार्द्रकत्रि-
कटतुत्थशिलाजतूनाम् । भृंगोदकेन नटिक च
मसूर मात्रां खोदज्जयाय जरसः सकलामयानाथ ९१
अंकोल वेाभ्रककांतताप्यशिलाजतुव्योषफल-
त्रयाणाम् । चूर्ण मुशल्याः समभागमेतत
- कुष्ठानि लीढं मधुना धुनोति ॥ ९२ ॥
कांता त्रिफला विडंगरजनीताप्यान्यदेवतुम-
व्योषैलानिपुनर्नवत्रि गिरिजाकोल' समं गुग्गुलुम् ।
पिष्ट्वा भृंगजलेन सुक्ष्म टिकां खादेद्यथा सात्मतो
मेदःश्लेष्मसमीरणोल्बणगदेष्वन्येषु वा पुरुषः ॥९३॥
व्योप कृष्ण तिलासनस्य कुसुमं मण्डूरसैरेयकं
दोषासितात्रिवृत्कृमिहरं भृंगानि भल्लातक ।<noinclude></noinclude>
gi8akj2jeafbzn1xy39nf50xpa0uyx0
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९६
104
165824
418417
2026-09-06T08:08:54Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८७४) रसरत्नसमुच्चयः । सक्रियेयं मधुना शुकपिल्लार्मिकाचनुत् ॥ अभीक्ष्णं शीततोयेन सिचेनेत्र विषाजितम् ॥ ९२ ॥ एक घडेमें गोमूत्र भरकर उसमें वत्सनाभ विष अथवा जिस... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418417
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८७४)
रसरत्नसमुच्चयः ।
सक्रियेयं मधुना शुकपिल्लार्मिकाचनुत् ॥
अभीक्ष्णं शीततोयेन सिचेनेत्र विषाजितम् ॥ ९२ ॥
एक घडेमें गोमूत्र भरकर उसमें वत्सनाभ विष अथवा जिस विषसे
सेवन करना हो उसको डालकर तीन दिनतक धूपमें रखा रहनेदेवे ।
फिर उसको निकालकर अच्छे प्रकारसे सुखालेवे और बारीक चूर्ण
सेवन करे । इस प्रकार गोमूत्रमें शुरू किया हुआ विष पौष्टिक गुण-
वाला होजाता है । किसीभी प्रकारका विष क्यों न सेवन करना हो,
उसको पहले गोमूत्रमें अवश्य शुद्ध करलेना चाहिये । प्रयोग ( १ )
वातज्जर में दहीके पानी के साथ, पित्तज्वरमें दूध के साथ, कफ ज्वर
बकरी के मूत्र के साथ और सन्निपातज्वर में त्रिफलेके काय के साथ विष
सेवन करना चाहिये । (२) लोध, चन्दन, पीपलामूल इन तीनोंका
क्वाथ बनाकर उसमें खाँड, घी और शहद डालकर उसके साथ विषको
सेवन करनेसे अथवा केवल दूधके साथ सेवन करनेसे जीर्णज्वर (पुराना
बुखार) दूर होता है । ( ३ ) दन्तीकी जड, निसोत की जड, त्रिफला
और शुद्ध मीठा तेलिया इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण
करलेवे | फिर घृत और मधुके संयोग से इस चूर्णके मोदक बनाकर
यथोचित मात्रा से सेवन करे । यह मोदक जीर्णज्वर, प्रमेह और त्वचा के
समस्त रोगोंको नष्ट करते हैं । ( ४ ) अरणीकी जडके रस के साथ
सेवन किया हुआ विष विषमज्वरको दूर करता है । ( ५ ) शुद्ध मीठा
तेलिया, मुलैठी, रास्ना और कमलकन्द इनके समान भाग मिश्रित
चूर्णको चावलों के धोये हुए जलके साथ सेवन करना रक्त पित्त रोग की
उत्तम औषध है । ( ६ ) रास्ता, वायविडंग, त्रिफला, देवदारु, त्रिकुटा,
पद्माख, गिलोय और शुद्ध वत्सनाभ विष सबको समान भाग लेकर
बारीक चूर्ण करके शहदमें मिलाकर सेवन करे । यह प्रयोग श्वास
और खाँसीको जीतनेवाला है । (७) पारा, अतीसकी, कली, प्रवा-
लभस्म और शुद्ध मीठातेलिया इन सबको समान भाग लेकर एकत्र<noinclude></noinclude>
6161rqr5p2qwhwh051fisg85tg0dqco
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९१९
104
165825
418418
2026-09-06T08:09:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोवेसः । (८९७) ऊपर नीचे गन्धकका चूर्ण और चीचमें पारा रखकर कपडेकी पोटली बनावे | उस पोटलीको गन्धकके तेल से भरे हुए दोलायन्त्रमें अधर लटका कर उसके नीचे अग्नि जल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418418
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषादीकोवेसः ।
(८९७)
ऊपर नीचे गन्धकका चूर्ण और चीचमें पारा रखकर कपडेकी
पोटली बनावे | उस पोटलीको गन्धकके तेल से भरे हुए दोलायन्त्रमें
अधर लटका कर उसके नीचे अग्नि जलाने । जब गन्धकके साथ
मिलकर एक रूप होजाय राथ भस्म तैयार हुई समझनी चाहिये । परि
को समान भाग गन्धक के साथ पीसकर कजली करलेवे । फिर पारेसे
दुगुनी गन्धक लेकर उसको पीसकरके कान्तलोह के सम्पुट में नीचे
ऊपर बिछाकर उसके बीचमें उक्त कज्जलीको रक्खें फिर सम्पुटपर
कपरौटी करके अग्निदेवे तो पारेकी भस्म होती है । गन्धक तीन भाग
और पारा १ भाग दोनों को मूलीके रसमें घोटकर कान्तलोहके सम्पु-
eमें बन्द करके अग्नि देनेसे पारा भस्म होता है । केवल मूली के रसमें
घोटकर अग्नि देनेसेभी पारा भस्म होजाता है । पारेमें चौथाई भाग
गन्धक मिलाकर मूली के रसमें खरल करके लोहेके सम्पुट बन्दकर
अगारोंकी ने फूंकनेसे पारा भस्म होजाता है ॥ १-१४ ॥
पारेका जारण ।
पीतासवाम्लं खात्त्वं कांतं वा तीक्ष्णमेव वा ।
चतुःषष्टितमांशेन प्रमितं क्षिप्तमल्पशः ॥ १५ ॥
तप्तखल्वेऽम्लयोगेन श्लक्ष्णवत्तं विमर्दयेत् ।
भूर्जे क्षाम्ललवणनुह्यकक्षीरलेपिते ॥ १६ ॥
बद्धं वस्त्रावृते स्विन्नमम्ले समर से रसम् ।
धौतमुष्णारनालेन शुष्कमंगुलिमर्दितम् ॥ १७ ॥
पचेत्कच्छप यंत्रस्थमष्टमांशबिडान्वितम् ।
स्वप्रमाणरसस्तिष्ठजीर्णे ग्रासे त्वजीर्यति ॥ १८ ॥
पातयेदा सवाम्लेन मर्दयेत्स्वेदयेच्च तम् ।
जारणे जारणे वह्नि ग्रासं च परिवर्धयेत् ॥ १९ ॥
३१<noinclude></noinclude>
kxtzboo1rr2p8t8yoptle1k35ryhtf9
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४३
104
165826
418419
2026-09-06T08:09:50Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (९२१) विकार शीघ्र शमन होते हैं । इन पारेके प्रयोगों में अष्टसंस्कार किये हुए पारेकी भस्मको अथवा पहले जो क्षेत्रीकरण क्रिया कही है, उसके अनुसार पार... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418419
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(९२१)
विकार शीघ्र शमन होते हैं । इन पारेके प्रयोगों में अष्टसंस्कार किये
हुए पारेकी भस्मको अथवा पहले जो क्षेत्रीकरण क्रिया कही है, उसके
अनुसार पारेकी भस्म करके या वेषे हुए पारेका सेवन करे अथना
पूर्ण चन्द्रोदय, रस सिन्दूर या हर गौरी की क्रियाके अनुसार तैयारकी
हुई पारेकी भस्मको सेवन करनेसे मनुष्यको पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती
है । और अपक्व या दूषित पारदभस्मको सेवन करनेसे उसकी
अवश्य मृत्यु होजाती है | ॥ ६८-१०४ ॥
ग्रन्थका उपसंहार |
(१) युगस्वभावाद्यदि चौषधीनां क्रियासु शक्तिःपरि-
कल्प्यतेऽल्पा | आयुर्बलादिष्वपि सा तथेति-
तस्मान्निषेव्यानि रसायनानि ॥ १०५ ॥
(२) न चौषधीनामपि सर्वथैव प्रभावहानिः पारकल्प-
नीया । फलं प्रयात्यूर्ध्वमघ त्रिवृच्च प्रत्यक्षतः
कस्य न सिद्धमेतत् ॥ १०६ ॥
(३) अदेशका लोपहितान्यसात्म्यान्यत्युष्णतीक्ष्णा-
नि यथौषधानि । नाशं नयंते सहसैव देहं सम्यक-
प्रवृत्तानि तथैव वृद्धिम् ॥ १०७ ॥
जित्वा तस्मादिन्द्रियादिप्रदुष्टान् कालोपेतः श्रह-
धानोयथावत् । आयुः प्रज्ञातेजसां यद्विवृद्धये
वीर्योपेतं शीलयेदौषधं सत् ॥ १०८ ॥
(४) शास्त्रानुसारिणी चर्या चित्तज्ञाः पार्श्ववर्तिनः ।
बुद्धिरस्खलितार्थेषु परिपूर्णरसायनम् ॥ १०९ ॥
दानं शीलं दया सत्यं ब्रह्मचर्ये कृतज्ञता ।
रसायनानि मैत्री च पुण्यायुवृद्धिकृद्गुणः ॥ ११० ॥<noinclude></noinclude>
8y6c72negh6tk625yrt3rxz5mk02906
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०५
104
165827
418420
2026-09-06T08:10:24Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७८३) स्वांगशीतल होने पर ग्रूषाको निकालकर उसमेसे रस निकाललेवे और खरल करके रख लेवे यह रस-सब प्रकार के रोगोंको विनाश करनेवाला तथा वली (असमय शरीर में झ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418420
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७८३)
स्वांगशीतल होने पर ग्रूषाको निकालकर उसमेसे रस निकाललेवे और
खरल करके रख लेवे यह रस-सब प्रकार के रोगोंको विनाश करनेवाला
तथा वली (असमय शरीर में झुरियें पडना) और पालेत (विना समय
बालका पकना) रोगको नष्ट करनेवाला है ॥ ६-९ ॥
रसगंधकमध्वाज्यशिलाजत्वम्लवेतसम् ।
द्विमाशमितं वेगान्मासमात्राज्जरां जयेत् ॥ १० ॥
विष्णुकांताऽरुणाऽगस्तिक्षीरिणीतंडुलीयकैः ।
रसगंधकयोः पिष्टी त्रीस्तन्येन च मर्दिता ॥ ११ ॥
यवास्तिला घृतक्षौद्रमेषामुद्वर्तनं जयेत् ।
का जरां च षण्मासाद्विधत्ते वृद्धिमायुषः ॥ १२ ॥
शिलाजतुक्षौद्र विडंग सर्पिर्लोहाऽभयापार-
दताप्यभक्षः । आपूर्यते दुर्बलदेहधातुस्त्रि-
पञ्चरात्रेण यथा शशांकः ॥ १३ ॥
हेम धात्रीफलं क्षौद्रं गायत्रीरसमादतम् ।
लिन्ननु पिबन्क्षीरं दृष्टरिष्टोऽपि जीवति ॥१४॥
मधुमागधिका विडंगसार त्रिफला हेमघृतं
सितां च खादन् । जरयानवलीढदेहकांतिः
समधातुश्च समाः शतं स जीवेत् ॥ १५ ॥
(४) पारा, गन्धक, शिलाजीत और अम्लवते सबको समानभाग
लेकर एकत्र खरल करके रखलेवे । फिर प्रतिदिन दो दो मासे परिमाण
लेकर शहद और घृतमें मिलाकर सेवन करे । इस रसको एक महीन<noinclude></noinclude>
7aahjzwvxm4tp8u141n7f0du28r84hu
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२८
104
165828
418421
2026-09-06T08:10:51Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८०६ ) इसरत्नसमुच्चयः । अलं मलयवायुना कुमुदबांधवेनाप्यलं मधुव्रतसखायिनः कलितपञ्चमाः के पिकाः । अतो भज विशंकितं रतिसरोजिनी भास्करं मनोजरिंदैवतं मदनकामदेवं र... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418421
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८०६ )
इसरत्नसमुच्चयः ।
अलं मलयवायुना कुमुदबांधवेनाप्यलं
मधुव्रतसखायिनः कलितपञ्चमाः के पिकाः ।
अतो भज विशंकितं रतिसरोजिनी भास्करं
मनोजरिंदैवतं मदनकामदेवं रसम् ॥ ३७ ॥
पारे और गन्धकको समान भाग लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली
करके त्रिकुटेके काथमें घोटकर गोला बनालेवे । और सुखाने । फिर
एक विदारीकन्दको थोडा सा तराशकर भीतर से खाली करके उसमें
उस गोलेको रखदेवे और उसके काटे हुए टुकडेसे उस छिद्रको टक-
कर उसके ऊपर उडदोंकी पिठीका दो अंगुल ऊँचा लेप करके सुखा-
लेवे । फिर एक कढाईमें घी भरकर उसको चूल्हेपर चढा करके नीचे
अग्नि जलावे । जब घी खूब गरम होजाय तब उसमें उक्त गोलेको
डालकर पकावे । पकते २ जब वह खुब लाल हो जाय तब उसको
पका हुआ जानकर नीचे उतार लेवे और विदारीकन्दमेंसे उस रसको
निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर आठ तोले उस चूर्ण में तुल-
सीके पत्तोंका चूर्ण ८ तोले, भाँग, शतावर, पीपल, कौंच के बीज
और तिल ये प्रत्येक चार २ तोले जौका चूर्ण २० तोले, सेमलके
फलोंका चूर्ण ८ तोले और मुलैठीका चूर्ण ८ तोले मिलाकर सबको
एकत्र खरल करलेवे फिर सहदेई, खिरेंटी, गंगेरण, दाख, पीपल,
आमले और ईख इन प्रत्येक औषधियोंके रसके क्रमसे सात साव
भावना देकर सुखालेवे और बारीक पीसकर हाथीदाँत के बने हुए बर्च
नमें भरकर रखदेवे । इस रसको प्रतिदिन रात्रिमें दो दो रती की मात्रा से
खाँडमें मिलाकर सेवन करे और इसके ऊपर धारोष्ण गोदुग्धका अनु-
पान करे । यह रस स्त्रियोंके ऋतुसम्बन्धी समस्त दोषों को नष्ट करके
ऋतुको सुधारता है । वीर्यकी अत्यन्त वृद्धि करता है । ध्वजभङ्गरोगको
शमन करके स्त्रियोंमें रमण करनेके समय इन्द्रियको जागृत करता है।<noinclude></noinclude>
ljbbt98k2stkj5wlk0kqwt69ka5ggf8
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५२
104
165829
418422
2026-09-06T08:11:24Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८३०) रसरत्नसमुच्चयः । तत्काल वध किये हुए बकरके मांसको लालचीता और वाराही कन्दके पत्तोंके रस में बहुत बारीक पीसकर उपयुक्त पारे गन्धकके गोलेपर दो अंगुल ऊँचा लेप क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418422
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८३०)
रसरत्नसमुच्चयः ।
तत्काल वध किये हुए बकरके मांसको लालचीता और वाराही कन्दके
पत्तोंके रस में बहुत बारीक पीसकर उपयुक्त पारे गन्धकके गोलेपर दो
अंगुल ऊँचा लेप करके खुब तपाये हुए तेलमें डालकर पकावे । जब
वह पककर सिन्दूरके समान लाल होजाय तब उसको निकालकर
बारीक चूर्ण करके शीशी में भरकर रखदेवे । इस औषधको प्रतिदिन
योग्यमात्रासे शदह और घृतमें मिलाकर भक्षण करे फिर गौके दूधका
अनुपान करे वह मनुष्य तत्काल सैकडों स्त्रियों को सेवन करे। यदि
मनुष्य इस रसको सेवन कर खीसेवन न करे तो उसके नेत्र फूट जाते
हैं; और शरीरकी अत्यन्त हानि होती है कामोतेजना होनेपर वीर्य
मनुष्य के नेत्रमार्गसे बाहर निकलता है। इसको सेवन करनेवाला मनुष्य
जाग्रत रहता हुआ कामको दबाकर कदापि इन्द्रिय दमन नहीं करस-
कता । और जो मनुष्य इस रसको सेवन करके जितेन्द्रिय होकर ग्रहा.
सूर्यका पालन करसके तो वह मनुष्य निश्चय कामदेव के समान रूप-
वान होता है। पूर्वोक्त सूतेन्द्र नामक रस १रसी असगन्ध १ ॥ मासा और
मुलैठीका चूर्ण ३मासे इनको दूधमें पकाकर शरीरकी कृशतामें रोगीको
सेवन करानेसे शरीर पुष्ट होता है । अथवा कुठको उक्त रसमें मिलाकर
सेवन करावे । मुलैठी, पीपल, असगन्ध और सेमलका सत्व सबको
समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे वह चूर्ण ६मासे और सतेन्द्र रस
११त्ती दोनों को मधु और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे शरीर पुष्ट
होता है । अथवा घोंघेकी भस्म, कूठ, असगन्ध और मुलैठीक चूर्णके
साथ सुतेन्द्र रसको यथोचित मात्रा से दूधमें पकाकर पीनेसे दुर्बल
मनुष्य पुष्ट होता है । शुद्ध गन्धक, असगन्ध, मुलैठी, शिलाजीत,
रससिन्दूर, बनतुलसीकी मझरी और सेमलका सत्व इन सबको
समान भाग लेकर शहद और घृतमें मिश्रित करके योग्यमात्रास
सेवन करे । अथवा उक्त चूर्णमें घोंघेकी भस्म और घृत मिलाकर<noinclude></noinclude>
behnwxy571tzo0zbuu89oah5gxxmkk5
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७५
104
165830
418423
2026-09-06T08:12:06Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८५३) • श्रेष्ठाबा कुचिकांत लोहरजसस्तत्कांतयात्रे स्थितं खादेत्कुष्ठहरं रसायनवरं मध्वाज्यसंयोजितम् ॥९४॥ मंडूर त्रिफला सितेतर तिलाजाती विडं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418423
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८५३)
• श्रेष्ठाबा कुचिकांत लोहरजसस्तत्कांतयात्रे स्थितं
खादेत्कुष्ठहरं रसायनवरं मध्वाज्यसंयोजितम् ॥९४॥
मंडूर त्रिफला सितेतर तिलाजाती विडंगाकुली-
बाकुच्यभ्रककांत गंधकनिशामाधूकसारं रजः ।
पिष्ट्वा भृंगरखेन तस्य वटकान्खादेत्पयः पाचितान्
सर्वव्याधिहरात्र सायन वरान्मृत्योश्च मृत्युप्रदान ९५ ॥
वध्वान्यस्तमहत्रयं कमलिनीपत्रे सधात्रीरसे
धtतं भृंगरसेन चुंबकरजोयुक्तं द्विभागोत्तरम् ।
: स्थाल्यां षड्गुणरक्तमारिषरसे यहारुहय धृतौ
संचाल्यांभसि कल्कशेषितमिदंशितेक्षणाद्वालयेत् ९६
तस्मादादाय भूषायां स्वरूपायां द्रावयेद्धनम् ।
कांत नागोऽयमुदकेनाञ्जनं नयनामृतम् ॥
कांत पात्रे भृतं क्षीरं रसायनमनुत्तमम् ॥ ९७ ॥
अथोष्ण वारिपिष्टेन कांत लोहं ससिंधुना ।
कफे कुठारच्छिन्नेन पित्ते वाते बलाम्बुना ॥
उभयेन वयः स्तंभे ताप्येन गलरुक्षु च ॥ ९८ ॥
कण्वां मनोह्वया स्रोतो विबन्धे मरिचांत्रिणा ।
मधात्रीफलं क्षौद्रं गायत्रीरसभावितम् ॥
लिहन्ननुपिबन्क्षीरं दृष्टरिष्टोऽपि जीवति ॥ ९९ ॥
मधुमागधिका विडंगसार त्रिफला हेमघृतं सितां च
खादन् । जरयान वलीढदेह कांतिः समधातुश्च
समाः शतं स जीवेत् ॥ १०० ॥<noinclude></noinclude>
eit7g7slzqunj01gi1lzzfn9mw3vsli
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९७
104
165831
418424
2026-09-06T08:12:47Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपतेः । (८७५) खरल करके मिश्री और शहद में मिलाकर सेनग करे और ऊपरसे दुग्ध- पान करे तो श्वासरोग, हिचकी और यमन होना दूर होता है । (८) खस, मुलैठी, जवाखार, हल्दी, कुडेक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418424
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपतेः ।
(८७५)
खरल करके मिश्री और शहद में मिलाकर सेनग करे और ऊपरसे दुग्ध-
पान करे तो श्वासरोग, हिचकी और यमन होना दूर होता है । (८)
खस, मुलैठी, जवाखार, हल्दी, कुडेकी छाल और शुद्ध मीठा लिया
इनके समान भाग चूर्णको च्यवनप्राश अवलेह में मिलाकर सेवन करे
और ऊपर से दुग्धपान करे तो क्षयरोग शीघ्र शमन होता है । (९ )
नागरमोथा, कुडेकी छाल, पाढ, चीता, त्रिकुटा, अतीस, शुद्ध वत्स-
नाभ, धायके फूल, मोचरस और आम की गुठली की गिरी इनका समान
भाग चूर्ण जल के साथ सेवन करनेसे संग्रहणीको दूर करता है । (१०)
वत्सनाभ विष, हरड, चीता, दन्तीकी जड, दाख, हल्दी और अडूसा
इनका चूर्ण मूत्रकृच्छ्र नाशक है । (११) शिलाजीव, बरसनाथ और
त्रिकुटाइनका प्रयोग करनेसे आवर्त और पथर रोिग नष्ट होता है ।
(१२) जवाखार, सैंधा नमक, मीठा तेलिया, और पाषाणभेद इन
सबके चूर्णको समान भाग लेकर गोमूत्र के साथ सेवन करे तो केवल
यह चूर्णही वज्र के समान पथरीको तोडकर निकाल देता है । (१३)
त्रिफला, सज्जी और वत्सनाभ इनका समानांश चूर्ण गुल्मरोगनाशक
है । (१४) पीपल, पोपलामूल और विष इन तीनों को सेवन कर-
नसे शूलरोग दूर होता है। (१५) वत्सनाभ विष, मुसाकानी, मुलैठी,
दाख, राना, कचूर, पीपल, अतीस, वायविडंग, सोंफ और जवाखार
इन सबके समानभाग चूर्णको दूधके साथ सेवन करनेसे गुल्मरोग और
सिल्ली दूर होती है । (१६) शतावर, वायविडंग और विष इनके चूर्ण को
दूधके साथ सेवन करे तो तिल्ली और उदररोग नष्ट होते हैं । (१७)
मालकांगनी की जडके काथके साथ सेवन किया हुआ विष कुष्ठको दूर
करता है । (१८) क्षीरकाकोली, अमलतास, तज, त्रायमाण, बावची,
खिरैटी, रोहेडावृक्षकी छाल, गजपपिल इन सबको समान भाग लेकर
विधिपूर्वक क्वाथ बनालेवें । उस क्वाथ के साथ विषको सेवन करने से<noinclude></noinclude>
sk57z7jgvzo6qrh85fqiojq8uf08vmn
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२०
104
165832
418425
2026-09-06T08:13:17Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८९८ ) रसरत्नसमुच्चयः । द्विगुणं योजयेदेवं सत्वमभ्रक संभवम् ॥ पूतिलोहं विष सूत्रं रसकं गंधकत्रयम् न युंज्याजारणे सुतस्तष्णीणैः स्फोटकुष्ठकृत् ॥२०॥ कुर्याोह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418425
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८९८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
द्विगुणं योजयेदेवं सत्वमभ्रक संभवम् ॥
पूतिलोहं विष सूत्रं रसकं गंधकत्रयम्
न युंज्याजारणे सुतस्तष्णीणैः स्फोटकुष्ठकृत् ॥२०॥
कुर्याोहमयी मृषामायामे द्वादशांगुलाम ।
मर्दितं हेमवाराही गृहन्यासरसे रसम् ॥ २१ ॥
रसोनपिण्डे दधती लोहमय्या सुरन्धया ।
निर्गुडीपत्र निर्यास पीत पादांशगंधया ॥ २२ ॥
गर्भमूषिका युक्तां चक्रां सपिधानकाम् ।
लम्बितां जलपात्रस्थखर्परद्वारि पाचयेत् ॥ २३ ॥
ऊध्व वनोत्पलैश्वित्रैरङ्गारैः खादिरैरधः ।
एवमष्टगुणे जीर्णे गंधके क्षयकुष्ठजित् ॥ २१ ॥
दारूहल्दी, आसवकी खटाई, अभ्रकका सत्व, कान्तलोह भस्म
अथवा तीक्ष्णलोहकी भहम इन सबको समानाभाग लेकर एकत्र
खरल कर लेवे । फिर इस चूर्ण में चौंसठ गुना पारा मिलाकर सबको
तप्त खरलमें डाल करके थोडी थोडी खट्टो कॉजी डालता हुआ
उसके साथ खूब बारीक खरल कर गोला बना लेवे । फिर जवाखार
काँजी, नमक, थूहरका दूध और आकका दूध इन सबको एकत्र
पीसकर भोजपत्रके ऊपर लेप करे और उसके ऊपर उपर्युक्त
गालेको रखकर उसको कपडमें बाँध कर पोटली बना लेवे । फिर
दोलायन्त्रमें उस पोटलीका अधर लटका देवे और उसमें उक्त
औषधियोंसे दुगुनी कॉजी भरकर उस यन्त्रके नीचे अग्नि जलावे ।
जब कॉजी सब जलजाय तब उसमेंसे पोटलीको निकालकर
उसमेंसे पारेको निकाल लेवे और गरम कॉजीसे घोकर सुखा-
लेवे । फिर उसको अङ्कोलके तेल में घोटकर गोला बनालेवे और
एक सम्पुटमें नीचे ऊपर अष्टमांश पूर्वोक्त वडवानल विडको विछाकर<noinclude></noinclude>
n91v9g461ocufhsd1h3nhjm880gb6ov
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१७
104
165833
418426
2026-09-06T08:53:48Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६९५ ) और रसौत सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके पानी में पीस कर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको शहद में घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे बालकोंके सब नेत्ररोग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418426
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ६९५ )
और रसौत सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके पानी में पीस
कर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको शहद में घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे
बालकोंके सब नेत्ररोग नष्ट होते हैं । असगन्ध और मूच्छित परिको
दूधमें पीसकर उसके साथ घृतको मिलाकर ताँबे के पात्रमें घृतको
पकाकर सिद्ध करे | यह घृत बालकों को पुष्ट करनेवाला, चल वर्णको
बढानेवाला और सुखप्रदान करनेवाला है । बालकके हृदय और
तालुके मांसमें स्थित कफके प्रकुपित होनेसे तालुमें गढा पडजाता है,
अर्थात् तालु बैठजाता है इसको तालुकण्टक रोग कहते हैं । त्रियाँ
इसको गला पडगया ऐसा कहते हैं। इस रोग में तृषा, तालुका पकना,
दूधका न पीना, दस्तका न होना, भ्रम, मुखशोष, खुजली, गर्दन और
. •
सिरमें पीडा, वमन, नेत्ररोग आदि अनेक उपद्रव उत्पन्न होजाते हैं ।
ऐसी अवस्था में तालुकों उठाकर (अर्थात् बालककी गर्दनको दोनों
हाथोंसे सहज में पकडकर धीरे धीरे उसको ऊपरको उठावे ) जवा-
खारको शहद में मिलाकर बहुत धीरे धीरे तालुपर घिसे । अथवा सोंठ
पीपल, सैंधानमक. गोवरका रस, हरड, कूठ और वच इन सबको
बारीक चूर्ण करके पानी में पीसकर कल्क बनालेवे, फिर वस्त्रमें छानकर
रस निचोड लेवे। उस रसको स्त्रीके दूधमें और शहदमें मिलाकर पिला-
नेसे बालकोंका तालुकण्टक रोग शीघ्र दूर होता है । गुदामें अधिक
पसीना भरनेसे अथवा मलके लगे रहनेसे रक्त और कफके कुपित
होनेके कारण गुदकीट (गुदामें कीडोंका होना ) अर्थात् पच्छैरु रोग
होजाता है उसमें कीडों के काटनेसे बालकोंकी गुदामें पीडा, खुजली
और तीव्र व्रण होजाते हैं । इस रोग में भूरिछरीला, और एलुआ
दोनोंको एकत्र चूर्ण कर क्वाथ चनावे और शीतल करके उससे
गुदाको बारंबार धोवे और मोमको गरम करके गुदाके व्रणोंपर
लगावे ।। १४० - १५० ॥<noinclude></noinclude>
rlmz6jli4wtzsg0fjzpmxbseblf6wbp
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४०
104
165834
418427
2026-09-06T08:56:04Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (७१८) रसरत्नसमुच्चयः । ताँबे के बर्तन में दहीके पानी के साथ घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे कफ जनित नेत्राभिष्यन्दरोग नष्ट होता है । पारा १ भाग, सीसा १ भाग, काला सुरमा २ भ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418427
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७१८)
रसरत्नसमुच्चयः ।
ताँबे के बर्तन में दहीके पानी के साथ घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे कफ
जनित नेत्राभिष्यन्दरोग नष्ट होता है । पारा १ भाग, सीसा १ भाग,
काला सुरमा २ भाग, जरासा कपूर और सबका दशमांश राल लेकर
सचको एकत्र खरल करे ।फिर खिरेंटी, गंगेरन और जीरा इन प्रत्येक के
रसमें ताँबे के बर्तन में करके एक २ दिन तक घोटे और बत्ती बनाकर
छायामें सुखालेवे। यह बत्ती सन्निपातजन्य नेत्राभिष्यन्दमें लगानेसे शीघ्र
लाभ करती है। तीक्ष्णलोह १ भाग, ताँबेकी भस्म १ भाग, पारा २
भाग और रसौत २ भाग सबको एकत्र खरल करके पुनर्नवाक रसमें
घोटे, फिर बत्ती बनाकर छाया में सुखालेवे । इस वत्तीको खाँड और
शहदके साथ घिसकर नेत्रोंमें ऑजनेसे पिराज अभिष्यन्दरोग नाश
होता है एवं सीसा, पारा, आमले, कपूर, समुद्रफेन, सेंधानमक, रसीय
पीपल और शहद सबको समभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे, फिर
उसको काँसे के वर्त्तनमें पानोंके रसके साथ ताँबेकी मुसलीसे घोटकर
बत्ती बनालेवे | इस बत्तीको पानीमें घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे विस-
जनित अभिष्यन्द और पित्तज अधिमन्थरोग नष्ट होता है । ताँबा,
सीसा, चाँदी, पारा, पीली कटेरी, कपूर, पीपल, रसोत, समुद्रफल
और पुराने काँसेका सूक्ष्म चूर्ण सबको समान भाग लेकर एकत्र
चूर्ण करके लाल लज्जालुकी जडके रस में घोटे और बत्ती बनाकर
छाया में सुखालेवे। यह बत्ती जलमें घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंके
सम्पूर्ण रोगों को शीघ्र नाश करती है । ६०-६९ ॥
पारदनागर सांजन समानदृढशिबिमूलकं सरजम् ।
सप्तदिनं चिचादलरसपिष्टं ताम्रपात्रपर्युषितम् ॥ ७० ॥
वर्तिरनात पशुष्काऽधिमंथतिमिरामपिलशुकनी ॥<noinclude></noinclude>
ix8mzd7k3at3iw67h6qd08e2vsejxgq
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६२
104
165835
418428
2026-09-06T08:57:15Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७४० ) रसरत्नसमुच्चयः । : पारदं मर्दयेन्निष्कं कृष्णधत्तुरजद्रवैः ॥६९॥ नागवल्लीदलैर्वाऽथ वस्त्रखण्डं प्रलेपयेत् । तद्वस्त्रं मस्तके वेष्टयं धार्य यामत्रयं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418428
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७४० )
रसरत्नसमुच्चयः ।
:
पारदं मर्दयेन्निष्कं कृष्णधत्तुरजद्रवैः ॥६९॥
नागवल्लीदलैर्वाऽथ वस्त्रखण्डं प्रलेपयेत् ।
तद्वस्त्रं मस्तके वेष्टयं धार्य यामत्रयं बुधैः ॥७०॥
यूकाः पतंति निःशेषाः सलिक्षा नात्र संशयः॥७१॥
कण्टकारीफलर सैस्तैलं तुल्यं विपाचयेत् ।
जपापुष्पद्रवैर्वाऽथ तपो दारुणप्रणुत् ॥७२॥
द्विनिशा नवनीतेन लेपाद्वा खण्डकेशनुत् ॥ ७३ ॥
जातीपुष्पं दलं मूलं कृष्णगोमूत्र पेशितम् ।
लेपोऽयं सप्तरात्रेण दृढकेशकरः परम् ॥७४॥
शृंगार त्रिफला भृंगी नीलोत्पलमयोरजः ।
सूक्ष्मचूर्णं समं कृत्वा पचेतैले चतुर्गुणे ॥
तल्लेपेन दृढाः केशाः कुटिलाः सरला अपि ॥७६॥
कीट भक्षितकेशांतःस्थानं स्वर्णेन घर्षयेत् ।
यावत्सुतप्तां याति ततो लेपमिमं कुरु ॥७६॥
भल्लातकं च वृहती गुंजामूलं फलं तथा ।
मधुना सह लेपेन चाम्परोगचयप्रणुत् ॥७७॥
गुंजामूलं फलं चूर्ण कण्टकार्या फलद्रकैः ।
तेन लेपेन इंत्याशु चांपरोगं सुदुःसहम् ॥७८॥
अभ्रजीर्णरसस्तीक्ष्णं स्नुही क्षीरं सुरायसम् ।
शुल्वं च सूर्यावर्तादीच्छिरोरोगान्विनाशयेत् ॥
कटुतेकृतं नस्यं पलितरुं षिकापहम् ॥ ७९ ॥
स्नुह्यर्क क्षीरभ्रं गाम्बुगोमूत्रहलिनीविषैः ।<noinclude></noinclude>
knm0f3zyjswoe33rit8af752oem2pgi
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८४
104
165836
418429
2026-09-06T08:58:45Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७६२ ) रसरत्नसमुच्चयः । पथ्यं निलवणं देयं जलं शीतं निषेवयेत् । अनेन योगराजेन लिंगव्याधिः प्रशाम्यति ॥ ३४ ॥ (३१) लौंगें ९, रसकपूर १ चनेकी बराबर, सिंगरफ १ तोला, ढाके ब... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418429
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७६२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
पथ्यं निलवणं देयं जलं शीतं निषेवयेत् ।
अनेन योगराजेन लिंगव्याधिः प्रशाम्यति ॥ ३४ ॥
(३१) लौंगें ९, रसकपूर १ चनेकी बराबर, सिंगरफ १ तोला,
ढाके बीज १ तोला और तालमखाना १ तोला लेकर प्रथम सिंगरफ
और रसकपूरको एकत्र खरल करलेवे, फिर अन्यान्य औषधियोंको
बारीक पीसकर कपड़छान करलेवे । पश्चात् सबको एकत्र मिलाकर
अच्छे प्रकारसे खरल करे । जब औषधि छुटते २ कज्जल के समान
काली और खूब बारीक होजाय तब वैद्य उसको समान भाग लेकर
१४ पुडियें बनालेवे । फिर रविवार के दिनसे उनका धूम्रपान करना
शुरू करे । पहले निर्धूम उपलेकी आग के अँगारे पर एक पुडिया
डालकर उसके ऊपर एक छेदवाला ढक्कन ढक देवे और उसमें नली
लगाकर मुँइसे धूम्रपान करके नासिका के द्वारा छोडदेवे। अथवा मुँह के
ऊपर कोई कपडा ओढकर उस पुडियाको अग्निपर डालकर श्वास
द्वारा उसका धूम्रपान करे और उच्छास द्वारा छोडलेवें । अथवा १४
एडियोंकी १४ गोलियाँ बनाकर सुखालेने । उनमेंसे प्रतिदिन
प्रातःसायंकाल में एक २ गोली चिलममें रखकर हुछेके द्वारा उसका
धूम्रपान करे और नासिका द्वारा त्रिकालदेवे । इनसे किसी विधि-
सेभी धूम्रपान करने के पश्चात् कुल्ला करके ताम्बूल भक्षण करे । इस
प्रकार सात दिनतक इस औषधिका धूम्रपान करके ८ वें दिन स्नान
आदि करे । इसपर बिना नमकका पथ्यदेवे और शीतल जलको सेवन
करावे । इस प्रयोगके यथाविधि व्यवहार करनेसे लिंगव्याधि (उपदंश -
रोग) शीघ्र नष्ट होती है ॥ २९-३४ ॥
क्षुद्ररोगों के सामान्य उपाय ।
स्फुटितत्व निवृत्त्यर्थं यवचिचाऽर्ध पक्कया ।
शिलादिना कृते भेदे षड्गुणं च द्रवं क्षिपेत् ॥ ३५ ॥<noinclude></noinclude>
syks5496wgojthzbsy0p05fk6fdu1hw
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०६
104
165837
418430
2026-09-06T09:00:17Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७८४) रसरत्नसमुच्चयः । तक सेवन करने से वृद्धावस्था दूर होती है । (५) विष्णुक्रान्ता, मंजीठ अगस्तके फुल, क्षीरकाकोली और चौलाईकी जड इन औषधियोंका अलग २ वाथ बनाकर उस प्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418430
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७८४)
रसरत्नसमुच्चयः ।
तक सेवन करने से वृद्धावस्था दूर होती है । (५) विष्णुक्रान्ता, मंजीठ
अगस्तके फुल, क्षीरकाकोली और चौलाईकी जड इन औषधियोंका
अलग २ वाथ बनाकर उस प्रत्येक काथमें पारे और गन्धककी कज•
लीको क्रमसे मर्दन करे । फिर खीके दूधमें खरल करके सुखालेवे ।
और बारीक पीसकर रखलेवे । इस रसको प्रतिदिन उपयुक्त मात्रासे
सेवनकरे और जौका आटा, तिल, घृत, शहद इन सबको एकत्र मिला
कर शरीरपर उबटनकरे, फिर साबुन मलकर गरम जलसे स्नान करे ।
इस प्रकार इस प्रयोगको ६ महीनेतक सेवन करनेसे दुर्बलता और
बुढापा दूर होकर आयुकी वृद्धि होती है। (६) शिलाजीत, वायविंडग
लोहभस्म, हरड, पारेकी भस्म और सोनामाखीकी भस्म इन सबको
समानभाग लेकर एकत्र खरल करलेवे फिर प्रतिदिन उचित मात्रा से
शहद और घृतमें मिलाकर सेवन करे। इस औषध के सेवन से दुर्बल
शरीर और शुष्क धातुवाला मनुष्य पन्द्रह दिनमें पूर्ण चन्द्रमाके
समान धातुओं से पूर्ण और पुष्ट होता है । ( ७ ) सोनेके वर्क और
आमलों का चूर्ण दोनोंको समानभाग लेकर खैरसार ( कत्थे ) के रस में
खरल करके और शहद में मिलाकर सेवन करे और दूध खावें । अथवा
सोनेके वर्क, आमलोंका चूर्ण और शुद्ध खैरसार ( कथा ) तीनों को
समभाग लेकर एकत्र मिलालेवे, फिर तीन २ रती परिमाण शहदमें
मिलाकर चाटे और ऊपर से गरम दूध पीने तो कृश शरीरखाला
और धातुओंके क्षीण होजानेसे मरणप्राय मनुष्यधी जीवित होता है और
दो महीने तक निरन्तर सेवन करनेसे शरीर पुष्ट होता है । ( ८ ) पीपल,
बायविडङ्गके बीजोंकी गिरी त्रिफला और सोनेके वर्क चारोंको समान
भाग लेकर एकत्र खरल करके प्रतिदिन योग्य मात्रा से शहद घृत और
श्री मिलाकर सेवन करनेवाला मनुष्य वृद्धावस्थासे मुक्त होकर
शररिकी नवीन कान्तिले युक्त होता है । उसकी सावों धातुयें समान
रूपसे पुष्ट होती हैं और वह सौ वर्षतक जीता है ॥ १०-१५ ॥<noinclude></noinclude>
k8sotzss2rwm9w0pwx7qn2rp6ki49t2
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८२९
104
165838
418431
2026-09-06T09:04:27Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (८०७) और अत्युत्तम वाजीकरण है । कामदेवके जागृत करनेकी इच्छावाले मनुष्यको कमलोंके स्पर्शसे सुगन्धित मलयाचलकी वायुके सेवन से, चन्द्रमाकी निर्मल च... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418431
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(८०७)
और अत्युत्तम वाजीकरण है । कामदेवके जागृत करनेकी इच्छावाले
मनुष्यको कमलोंके स्पर्शसे सुगन्धित मलयाचलकी वायुके सेवन से,
चन्द्रमाकी निर्मल चाँदनी और भौरेकि मित्र कोकिलाओंके पश्चम
स्वरवाले मधुर गायनोंको श्रवण करनेसे भी क्या लाभ अर्थात् इनकी
कुछ आवश्यकता नहीं । इस लिये निश्शंक होकर केवल रतिरूपी
कमलिनीको प्रकाशित करनेवाले और कामदेव के अधिष्ठातृदेव इस मदन-
कामदेव रसको सेवन करना चाहिये || ३१-३७ ॥
कामधेनु रस |
हेमा सत्त्वकताsर्काः प्रत्येकं पलमात्रकाः ।
एकत्र द्राविताः सर्वं कर्षभूनागसत्त्वकाः ॥ ३८ ॥
पलविंशतिसुतेन तैश्च पिष्टीं प्रकल्पयेत् ।
शतधा पातयेत्सुतं पिष्टी कृत्वा पुनःश्च तैः ॥ ३९ ॥
शिष्टं द्विपलिकं सूतं संन्यासाद्धस्मतां नयेत् ।
भस्मीभूते रसे तस्मिञ्च्छिष्टे चैकपले ततः ॥ ४० ॥
वज्रं निष्कमितं चाभ्रसत्वं षट्पलिकं क्षिपेत् ।
द्विपलं गंधकं शुद्धं द्विदिनं मर्दयेत्ततः ॥ ४१ ॥
तत्सर्वे लोहजे पात्रे क्षिप्त्वा च मृदुवह्निना ।
शाल्मलीमूलजं क्वाथं चत्वारिंशत्पलोन्मितम् ४२ ॥
जारयेद्रसराजस्य दत्त्वा दत्त्वाऽल्पमल्पकम् ।
स्वांगशीतं रसं हृत्वा सुगाढं परिमर्दयेत् ॥ ४३ ॥
नालीपातेन तत्क्वाथरजो दग्धं प्रदापयेत् ।
ततः करण्डके क्षिप्त्वा यत्नेन स्थापयेत्खलु ॥ ४४ ॥
गुंजामात्रः स च घृतयुतः सेवितो हन्ति रोगां-<noinclude></noinclude>
3cw4qm0wz0qp8vmt5i232k664zjqx5j
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५३
104
165839
418432
2026-09-06T09:06:48Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ आपाटीकोपेतः । (८३१) सेवन करे तो वीर्यस्तम्भन होता है और शरीरकी पुष्टि होती है ।। १२८-१३८ । लिङ्गलेप द्रावण | शशिसुतक टंकण मागधिकं घृतसुरणमा- क्षिक हेमरसम् । मुनिपत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418432
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>आपाटीकोपेतः ।
(८३१)
सेवन करे तो वीर्यस्तम्भन होता है और शरीरकी पुष्टि होती
है ।। १२८-१३८ ।
लिङ्गलेप द्रावण |
शशिसुतक टंकण मागधिकं
घृतसुरणमा-
क्षिक हेमरसम् । मुनिपत्ररस प्लुतलेपवरं
युवतीमदपातनवश्यकरम् ॥ १३९ ॥
योषागर्भरजः सूतं मधुना सह लेपयेत् ।
अवश्यं द्रावयेनारी शुष्ककाष्ठोपमामपि ॥ १४० ॥
सिंदूरमधुनो लेपं लिंगस्य कुरुते यदि ।
अत्यर्थे रमते नारीं द्वावयेद्वशमानयेत् ॥ १४१ ॥
कृकवाकूप्रपिच्छं तु मुद्रिकाकारकं कृतम् ।
ऊर्णनाभेः सुजालेन वेष्टयित्वाऽथ धारयेत् ॥
वामहस्तकनिष्ठायां नरो वीर्य न मुञ्चति ॥ १४२ ॥
कर्पूरं टंकणं सूतं मुनिपुष्परसं मधु ।
मर्दयित्वा लिपेत्तेन लेपो यावत्तु तिष्ठति ॥ ११३ ॥
लिंग तु पुण्डरीकस्य चूर्णीकृत्य प्रयोजयेत् ।
अधुना तिलकं कृत्वा रेतःस्तंभं करोत्यलम् ॥ १४४॥
कर्पूरं रससंयुक्तं सौभाग्यं रससंयुतम् ।
लेपाय क्रियते नित्यं नाना मदनजीवनः ॥१४५ ॥
कपूर, पारदभस्म, सुहागा, पीपल, जिमीकन्द, धतुरेके पचका रस
और अगस्तिया के पत्तों का रस इन सबको समान भाग लेकर एकत्र
खरल करके सुखालेवे | फिर उसको घृत और मधुमें मिलाकर लिंग-
पर लेप करके स्त्री प्रसंग करे । यह प्रयोग युवतेि स्त्रियोंके मदको<noinclude></noinclude>
q6rpxtgdm97y5s6ebgajtkqb2uiu396
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७६
104
165840
418433
2026-09-06T09:12:04Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ 1 ( ८५४) रसरत्नसमुच्चयः । आयुःकामः शंखपुष्प्या समेतं मेधाकामः कांचनं सोग्रगंधम् । लक्ष्मीकामः पद्मकिंजल्कयुक्तं खादे- कामं कामकानो विदायी ॥ १०१ ॥ सपद्मबीजा मलक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418433
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>1
( ८५४)
रसरत्नसमुच्चयः ।
आयुःकामः शंखपुष्प्या समेतं मेधाकामः कांचनं
सोग्रगंधम् । लक्ष्मीकामः पद्मकिंजल्कयुक्तं खादे-
कामं कामकानो विदायी ॥ १०१ ॥
सपद्मबीजा मलकाभयाक्षं सर्पिर्मधुभ्यां कनकं
लिहतः । दीर्घायुषो मंदजरोपतापाः सरीसृपाणां
-च भवन्त्यगम्याः ॥ १०२ ॥
मृतानि लोहानि रसी भवंति निघ्नंति रोगान्परि-
शीलितानि । किंचोपचारस्य समप्रयोगात्पुष्यंति
धातूनतिदीर्घमायुः ॥ १०३ ॥
(१) सुवर्ण अथथा चाँदी की भस्मको शतावर और भाँगरके रसम
भावना देकर प्रतिदिन एक २ रत्ती प्रमाण त्रिफलेके चूर्ण, मिश्री, मधु
और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे सातों धातुओं की पुष्टेि वीर्य की वृद्धि
और आयुकी वृद्धि होती है। तथा कामला, पाण्डु और कुष्ठ रोग दूर
होता है । (२) समान भाग गन्धकके द्वारा पूर्ववत् माराहुआ ताँबा,
धान्याभ्रक की भस्म, और शुद्ध नीलाथोथा इन तीनोंको १०-१० निष्क
लेकर एकत्र मिश्रित करके विजौरा नींबू के रस और अदरखके रसमें
एक एक बार भावना देवे । इस ताम्रप्रयोगको मन्दोष्ण जलके
साथ सवेन करना चाहिये । इसके सेवनसे गुल्म, प्लीहा, शूल और
आमवात ये सब रोग नष्ट होते हैं । (३) जस्त अथवा सीसेकी भस्म,
हिरनके सींगकी भस्म, नाकुली कन्दके बीज इन तीनोंको समान भाग
लेकर बिनौलोंके इसमें खरल करके सुखाले । फिर प्रतिदिन यथोचित
मात्रासे भैंसके महमें मिलाकर सेवन करनेसे प्रमेहरोग नष्ट होता है । (४)
निन्न्यानव भाग त्रिफलेका चूर्ण और १०० भाग सीसेकी भस्म दोनोंको
एकत्र मिलाकर दारूहल्दी, नाकुलकिन्द, त्रिफला, और धतुरेकी<noinclude></noinclude>
3i2c4tgtvn5sbdocqnkrv50e9mdfntd
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९८
104
165841
418434
2026-09-06T09:13:04Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८७६ ) रसरत्नसमुच्चयः । कुष्ठ दूर होता हैं । (१९) बावची, भण्डके बीजोको गिरी, जवाखार, सज्जी, विन और सैंधानमक इनको पानी में पीसकर लेप करने से कुछ नाश होता है । (१०) चीता, आ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418434
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८७६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
कुष्ठ दूर होता हैं । (१९) बावची, भण्डके बीजोको गिरी, जवाखार,
सज्जी, विन और सैंधानमक इनको पानी में पीसकर लेप करने से कुछ
नाश होता है । (१०) चीता, आककी जड, गजपीपल, बावची, विष,
कपूर, अण्डके बीजोंकी गिरी, करञ्जकी गिरी, सैंधान पक, त्रिकुटा,
सज्जी, जवाखार, हल्दी, दारूहल्दी, और घर का धुआँ इन सबको समान
भाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपड़छान करलेवे । फिर उस चूर्णको
बकरके मूत्रमें पीसकर लेप करनेसे सब प्रकार के कुष्ठ नष्ट होते हैं ।
(२१) भिलावे, चीता, अमलतास और विष इनके समान भाग चूर्णको
करके मूत्र पीसकर लेप करने से विचर्चिका, दाह, खुजली, किटिम
कुष्ठ आदि विकार दूर होते हैं । (२२) अमलतास के पत्ते, छाल, जड
और विष इनको हमें पलकर किया हुआ प्रलेपभी उसीकी समान
गुण करता है । (२३) कुकूर, तुम्बरू के बीज, असगन्ध, अमलबेंत,
हल्दी, कठूमर, रास्ना, हरवाल, मैनसिल, पटोलपात, नीम के पते,
पीपल, गन्धक, सैंधानमक, विष, देवदारु ओर सिरसकी जड इन
औषधियोंके समानभाग चूर्णको महेमें पीसकर लेप करनेसे कुष्ठरोग
शमन होता है । (२४) करञ्जकी जड, कनेरकी जड, आककी जड,
चमेलीकी जड, लाल चन्दन, नेवारीकी जड, कुष्ठ, मंजीठ, सतवन,
हल्दी, तगर, सिह्नाळूके पत्ते, वच, और विष इनके चूर्णको समानभाग
• लेकर चौगुने गोमूत्र में पीसलेवे । फिर उसको गोमूत्र से चौथाई भाग
तिलके तेल में डालकर यथाविधि तेलको सिद्ध करे यह तेल प्रलेप कर-
नेसे कुष्ठको हरता और दुष्टव्रण (नासूर ) का शोधन करता है। (२५)
कुठ, कनेर, भाँगरा, आक की जड़, थूहरका दूध, सैंधानमक और
विष इनको समानभाग लेकर चौगुने गोमूत्रमें पीस लेवे । फिर उस
' कल्कके साथ गोमूत्रसे आधा तिलका तेल मिलाकर उसको विधि-
पूर्वक सिद्ध करे । उस तेलमें विष डालकर मालिश करनेसे सम्पूर्ण
कुष्ठ नष्ट होते हैं । (२६) चन्दन, देवदारु, मिरव, हल्दी, दारु-
+<noinclude></noinclude>
qmpr46l3eil69z8vjes1lftyr677jcn
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२१
104
165842
418435
2026-09-06T09:13:53Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८९९) उसके बीच में उक्त गोलेको रखकर बन्द करदेवे, फिर उस सम्पुटको कच्छपथन्त्रमें रखकर पकवि | इस प्रकार पुढदेने से पार घटता नहीं है और ग्रास दी हुई वस्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418435
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८९९)
उसके बीच में उक्त गोलेको रखकर बन्द करदेवे, फिर उस सम्पुटको
कच्छपथन्त्रमें रखकर पकवि | इस प्रकार पुढदेने से पार घटता नहीं
है और ग्रास दी हुई वस्तुओं के जारण होजानेपर भी पारा उतना ही
रहता है । इस तरह पारेको एक बार जारण करने के बाद तिर्यक्
पातनयन्त्र के द्वारा उडावे और फिर निम्नलिखित विधिसे जारण
करे । दारु हल्दी, आसवकी खटाई, अभ्रकस्म, कान्तलोहकी मम
अथवा तीक्ष्णलाही हम इन सबको पहलेसे दुगुने वजनमें लेकर
एकत्र मिश्रित करके उसमें तिर्यकृपासनयन्त्रके द्वारा उडाये हुए पारेको
डालकर खूब बारीक खरल करके गोला बना । फिर उपर्युक्त
जवाखार आदि औषधियोंके द्वारा लेप किये हुए भोजपत्रपर उस
गोले को रखकर वस्त्रमें बाँध करके उसकी पोटली बनालेवे । फिर
दोoresमें उक्त औषधिसे दुगुनी काँजी भरकर उसमें पारेकी पोट.
लीको अधर लटका देवे । और उसके नीचे अग्नि जलाने । जब काँजी
सब जलजाय तब पोटलीमेंसे पारेको निकालकर गरम कॉज से धोक
रके सुखालेवे | फिर पारेको अङ्गोलके तेलों घोटकर गोला बनालेवे
और उस गोलेको सम्पुटमें अष्टमांश विछाये हुए बडवानल बिडके
बीच रखकरक कच्छपयन्त्रमें पकावे । इस प्रकार दूसरी बार जारण
करनेपर पारेको विर्यपातनयन्त्र के द्वारा उडा करके फिर जारण
करे । इस विविसे पारेको ७ बार जारण करे। परन्तु प्रत्येक बारके
जारणमें उपर्युक्त दारूहल्दी आदि जारण करनेवाली औषधियोंका
वजन बढाता जाय, उसी प्रमाणके अनुसार दोलायन्त्र में कॉजोको भी
चढाकर डाले । अग्निभी अधिक देवे और बडवानल विकीमी मात्रा
बढाकर डाले । एवं प्रत्येक वार में अोलके तेलमें घोट २ कर कच्छ-
अग्निदेवे | इस प्रकार प्रत्येक वारके जारणमें सब वस्तुओंकों
दुगुना करता जावे। पारेको जारण करनेमें सीसा, बंग, विष, मूत्र, खपरि
या, गन्धक, हरताल और मैनसिल इन चीजोंको न डाले । कारण,<noinclude></noinclude>
8vs3bmikg9atel6z6g1rd68j31oi8gu
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४४
104
165843
418436
2026-09-06T09:14:25Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ९२२) रसरत्नसमुच्चयः । एतदागमसिद्धत्वात्प्रत्यक्षफलदर्शनात् । मंत्रवत्संप्रयोक्तव्यं न मीमांस्यं कदाचन ॥ १११ ॥ (५) लोभयंत्यातुरं मूर्खा विचित्रः कर्मकौशलः... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418436
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९२२)
रसरत्नसमुच्चयः ।
एतदागमसिद्धत्वात्प्रत्यक्षफलदर्शनात् ।
मंत्रवत्संप्रयोक्तव्यं न मीमांस्यं कदाचन ॥ १११ ॥
(५) लोभयंत्यातुरं मूर्खा विचित्रः कर्मकौशलः ।
तेभ्यो रक्षेत्सदात्मानमात्मा यस्मात्सुदुर्लभः ॥ ११२ ॥
ते घुणाक्षरवत्कंचिदुत्थाप्य नियतायुषम् ।
नंति वैद्याभिमानेन शतान्यनियतायुषाम् ॥ ११३ ॥
अज्ञातशास्त्र सद्भावाञ्छास्त्रमात्रपरायणान् ।
तान्वर्जयेद्भिषक् पाशान्पाशान्वैवस्वतानिव ॥ ११४ ॥
(६) प्रदीपभूतं शास्त्रं हि दर्शितं विपुला मतिः ।
ताभ्यां भिषकयुक्ताभ्यां चिकित्सन्नापराध्यति ११३
कचिदर्थः क्वचिन्मैत्री क्वचिद्धर्मः क्वचिद्यशः ।
क्वचिदभ्यासयोगश्च चिकित्सा नास्ति निष्फला ११६
ये क्रियां विक्रियां कुर्वेत्युपेक्षंते स्खलंति वा ।
खादति ते परप्राणानिजानि सुकृतानि च ॥११७॥
यावदुवसिति प्राणी यावद्वेषजमत्ति च ।
ताव चिकित्सा कर्तव्या देवस्य कुटिला गतिः ११८ ॥
अनाथान् रोगिणो वैद्यः पुत्रवत्समुपाचरेत् ।
प्राणाचार्यश्च पितृवत्संपूज्यः शक्तिभक्तितः ॥ ११९ ॥
न प्राणिरहितो देशो न च प्राणी निरामयः ।
तस्मात्सर्वत्र भिषजां कल्पिता एव वृत्तयः ॥१२०
(७) यज्ञस्य च शिरश्छिन्नमश्विभ्यां संधितं पुरा ।
पातिता दशनाः पूष्णो भगस्य च विलोचने॥ १२१ ॥<noinclude></noinclude>
03za2c3ulqb5tavosldy4l9tyiiuxu0
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१८
104
165844
418437
2026-09-06T09:15:04Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ६९६ ) रसरत्नसमुच्चयः । त्रिफलाबदरी पत्रक्वाथेन परिषेचयेत् । रागकण्डूमतो रक्तं जलौकाभिः समन्वितम् ॥ १५१ पित्तत्रणचिकित्सा च सकलात्र प्रशस्यते । गुदपाके तु क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418437
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६९६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
त्रिफलाबदरी पत्रक्वाथेन परिषेचयेत् ।
रागकण्डूमतो रक्तं जलौकाभिः समन्वितम् ॥ १५१
पित्तत्रणचिकित्सा च सकलात्र प्रशस्यते ।
गुदपाके तु कर्तव्या पित्तत्रणहरा क्रिया ॥१५२॥
पानप्रलेपयोः शस्तं विशेषेण रसांजनम् ।
अजादुग्धेन संमिथ्य जीरकांजनचूर्णकैः ॥ १५३ ॥
जातीपत्ररसोपेतैः पूर्वप्रोक्तरसैरपि ।
मुखपाके मुखं लिपेद्बोधित्वग्घृतसारयैः ॥१५४॥
जातीपत्रामयायष्टीमधुदाय च लेपयेत् ।
नाभिपाके प्रलेतव्यं सिक्तं तैलेन भूरिशः ॥१५५॥
रजनीयष्टिकालोध्र प्रियंगुणों व कल्कनः ।
चूर्णेनैषां सतैलेन नाभिपाकं शमं नयेत् ॥ १५६ ॥
अपुष्पाश्वत्थ पंचांगक्काथेनापि च कल्कतः ।
सिद्धतैलप्रलेपेन कुंडलण्याविनाशनम् ॥१५७॥
हिंगुठी कणापथ्यामिशीपंचामृतं मतम् ॥ १५८ ॥
सर्वबालामयान्हंति पाचनं दीपनं परम् ॥ १५९ ॥
तिक्ताग्निव्योषमालुरपथ्यारुचक हिंगुकम् ।
तुल्यदुग्धं घृतं पक्वं गुल्मानाह विलंबिकाः ॥ १६० ॥
कासं श्वासं गुदभ्रंशं विनिर्हति न संशयः ॥ १६१॥
राजीकुष्ठ निशा गेहधूमवत्सकतक्रतः ।
लेपो विचर्चिकां सिम इंति पामा च वेगतः ॥ १६२
१ निशा ।<noinclude></noinclude>
7qrafbyxkupidr2m5awzp0027hlqd1i
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४१
104
165845
418438
2026-09-06T09:17:15Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकांपेतः । (७१९) पारदनागरसांजन विद्रुमका सीस लोधताम्राणि ॥७१॥ वृत्तत्रिकटुकमैरिकसिंधूवतुत्थफेनवराः । मौक्तिकगंधिन्याभागिरिकर्णी पुत्रजीवकनक शिफाः॥... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418438
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकांपेतः ।
(७१९)
पारदनागरसांजन विद्रुमका सीस लोधताम्राणि ॥७१॥
वृत्तत्रिकटुकमैरिकसिंधूवतुत्थफेनवराः ।
मौक्तिकगंधिन्याभागिरिकर्णी पुत्रजीवकनक शिफाः॥७॥
चिचाषड्विधमौर्वलवणं पिचुमंदपत्ररसैः ।
पिष्ट्वा ताम्रे लिप्ता वर्तिः स्यादधिमंथपिनी ॥७३॥
कर्पूरांजनसीसपारदकणातीक्ष्णानि पिड्वा सकृ-
द्यावर्त सार्वशोग्य मधुना पिट्वा पुनर्भाजने ।
शॉन स्फाटिक एव वा विनिहितः शुकार्मकाचापहं
तैमिर्य व निराकरोति सहसा नेत्रेऽञ्जनं सर्वदा ॥७४॥
ने पालतुत्थ टंकणतारवरात्रिकटु फेनजलजं च ।
जंबीरनीर पिष्टं काचार्मावतिमिरशुकपिलघ्नम् ॥७९॥
रुद्धः कपर्दटंकणलाक्षाजंबीर योद्रवैः ।
मासं धान्ये क्षिप्तः सुतः पटलादिरोगहरः ॥७६॥
स्वर्ण वराटिकासूतः सारः पूतिकपत्रजः ।
नवनीतेन संयुक्ता वर्तिः पुष्पं चिरंतनम् ॥७७॥
विषं धात्रीफलरसैर्दिनैकं परिभावितम् ।
अंजनं शंखसहितं प्रगाढ तिमिरप्रणुत् ॥७८॥
शंबूकं वा वराट वा दग्ध सूक्ष्मं विचूर्णयेत् ।
अंजनं नवनीतेन हंति पुष्पचिरंतनम् ॥७९॥
पारा, ससा, रसौत, मोथातृणकी मूल और राल सबको समान
भाग लेकर इमलक पत्ताके रसमें ७ दिन तक खरल करके कल्क
करले वे । इस कल्कको ताँबेके बर्त्तनमें ल्हेसकर रातभर आसमें रक्खा<noinclude></noinclude>
3rvp2nniimt14ug7aaqsdvvyobnhc8v
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६३
104
165846
418439
2026-09-06T09:20:08Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७४१) गुंजाविषाला मरिचैः कटुतैलं विपाचितम् ॥ खलतिं शमत्यग्लपिष्टमष्टगुणं विषात् ॥८०॥ (१) सफेद कोयल लता के फल, मूल, पत्र आदि पंचांगको पानीमें पीसकर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418439
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७४१)
गुंजाविषाला मरिचैः कटुतैलं विपाचितम् ॥
खलतिं शमत्यग्लपिष्टमष्टगुणं विषात् ॥८०॥
(१) सफेद कोयल लता के फल, मूल, पत्र आदि पंचांगको
पानीमें पीसकर उसका रस निचोड लेवे। उस रसका नस्य देनेसे
अथवा कोयलकी जडको कानमें बाँधनेसे आधाशीशीका दर्द और
अन्यान्य सिरके दर्द दूर होते हैं (२) गुड और करंजके बीजोंको
एकत्र पीसकर सुहाते र जलमें घोलकर नस्य लेना अथवा मिरचोंके
चूर्णको भाँगरेके रस में पीसकर सिरपर लेप करना आधा शीशीकी
पीडाको शान्त करनेके लिये उपयोगी है । (३) केसर १ भाग, मुलैठी
२ भाग, मिश्री ३ भाग और घी ४ भाग लेकर सबको कूटपीसकर एका
मिश्रित करके कुछेक गरमकर नस्य देवे, इसप्रकार सात दिनतक नस्थ
देनेसे सिरकी दाह और पीडा शान्त होती है । ( ४ ) सैंजने के पतों के
इसमें मिरचोंको पीसकर सुखालेवे । उस चूर्णका नस्य देनेसे आधा-
शीशीका दर्द दूर होता है। एवं केसरको वृतमें पीसकर गरम करके
नस्य देनेसे भी आधा शीशीकी पीडा शमन होती है । (५) चार मासे
पारेको काले धतूरेके अथवा नागरपान के इसमें खरल करके उसका एक
सफेद कपडे पर लेप करके सिरपर बाँधे । इसप्रकार उस वस्त्रको तीन
प्रहर तक बाँधे रक्खे | इससे सिरकी समस्त जुयें और लीखें निकल
पडती हैं । (६) कटेरीके फलोंके रसको और तिलके तेलको समानमाग
लेकर पकावे। उस तेलको सिरपर मलनेसे जुयें और लीखे नष्ट हो जाती
हैं । ( ७ ) गुडहलके फूलोंके इसकी सिरपर मालिश करनेसे पीडा
सहित बालका उखड़ना बन्द होता है । (८) हल्दी और दारूहल्दी को
समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके नैनी धीमें मिलाकर लेप करनेसे
वालोंका उखडना दूर होता है । (९) चमेली के फूल, पत्ते और जडको
काली गाय के मूत्रमें पीसकर सात दिन तक लेप करनेसे बाल अत्यन्त
दृढ होजाते हैं । (१०) सिंघाडे, त्रिफला भारंगी, नीलकमल और<noinclude></noinclude>
ha5fqez43ay0z583po8aal2bqbxajua
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८५
104
165847
418440
2026-09-06T09:22:29Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७६३) गुडगुग्गुलु सिंदूरमुशीरं गैरिकं मधु । मदनं घृतसंयुक्तं पादस्फोटे प्रलेपयेत् ॥ सप्ताहात्स्फुटितौ पादौ स्यातां पंकजसन्निधौ ॥३६॥ मदनं सिक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418440
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ७६३)
गुडगुग्गुलु सिंदूरमुशीरं गैरिकं मधु ।
मदनं घृतसंयुक्तं पादस्फोटे प्रलेपयेत् ॥
सप्ताहात्स्फुटितौ पादौ स्यातां पंकजसन्निधौ ॥३६॥
मदनं सिक्थकं तुल्यं सामुद्रं लवणं तथा ।
महिषीनवनीतेन सुतप्तं लेपनं भवेत् ॥ ३७ ॥
सप्ताहात्स्फुटितौ पादौ जायेते कमलोपमौ ॥ ३८॥
रसं गंधं समं मर्च द्वाभ्यां तुल्यं च कांचनम् ।
दिनैकं चित्रकद्वावैः पिट्वा लेपं प्रकल्पयेत् ॥ ३९ ॥
कण्डुगंडं खुडं इंति गुरुफयोरन्तरुत्थितम् ।
धात्रीफलर सक्षीरैः पानं स्यात्स्वरभंगनुत् ॥ ४० ॥
देवदारुकणान्योषशताह्वापत्रकं शिला ।
वचासैंधवशिग्रूत्थमूलं पेष्यं समं समम् ॥ ४१ ॥
कर्वैकं मधुसर्पि मासमात्रं सदा लिहेत् ।
मासैकं कर्षकर्षे च किन्नरैः सह गायति ॥ ४२ ॥
सैंधवेंद्रवं रात्रौ मरिचं चोष्णवारिणा ।
पाययेत्कर्षमात्रं तु गलदाहप्रशांतये ॥ ४३ ॥
करञ्जवीजमज्जां तु द्विनिष्कां चोष्णवारिणा ।
गलदाहहरं खादेत्पथ्या वा क्षौद्रसंयुता ॥ ४४ ॥
बलानागबला कुष्ठत्वचा चूर्णे च लेपयेत ।
महिषीनवनीतेन स्यातां पीनौ स्थिरौ स्तनौ ॥ ४५ ॥
श्यामानिशा बलाराजीलवणं क्वाथयेत्समम् ।
तोयैरष्टगुणैरेव पादशेषं समाहरेत् ॥ ४६ ॥<noinclude></noinclude>
ngff64otsibyc0z1l0yyqcsyt7xjega
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०७
104
165848
418441
2026-09-06T09:24:14Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाडीकोपेतः । (७८५) ज्योतिष्मतीनाम लता पीता पीतफलोज्ज्वला | आषाढे पूर्वपक्षे स्वाग्रहीत्वा वीजमुत्तमम् ॥ १६ ॥ . आहरे त्तिलवत्तैलं मुष्टिना वाऽपि तत्पचेत् । क्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418441
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाडीकोपेतः ।
(७८५)
ज्योतिष्मतीनाम लता पीता पीतफलोज्ज्वला |
आषाढे पूर्वपक्षे स्वाग्रहीत्वा वीजमुत्तमम् ॥ १६ ॥
. आहरे त्तिलवत्तैलं मुष्टिना वाऽपि तत्पचेत् ।
क्षीरतुल्यं चतुर्थीशमाक्षिकं तेलशेषितम् ॥ १७ ॥
ततस्तत्कोलकर्पूरत्वरजातीफलमिश्रितम् ।
fare भाण्डगतं धान्येष्वनुगुप्तं निधापयेव ॥ १८ ॥
पिबेत्सूर्योदये तैलात्पलं याति विसंज्ञताम् ।
ततः संज्ञां शनैर्लब्ध्वा ततः क्रन्दति रोदिति ||१९||
एवं मासे श्रुतधरः परस्मिन्सूयसन्निभः ।
तृतीये पूज्यते देवैश्चतुर्थे नैव दृश्यते ॥ २० ॥
खेचरः पञ्चमे षष्ठे सिद्धैमिलति सप्तमे ।
विष्णोः समदिनं जीवेज्जीवन्मुक्तोऽष्टमे भवेत् ॥ २१॥
भूमावरनिमात्रायां ताम्रं तैलेन पूरयेत् ।
षण्मासं तापयेदू मृदुना सुषवह्निना ॥ २२ ॥
uttar माषादिनिष्कान्तं तत्रिवर्षान्महाकविः ॥२३॥
तैलप्रस्थं घृतप्रस्थं चतुष्प्रस्थं पयः पचेत ।
द्विप्रस्थशेषं तत्पीत्वा मासं त्रिपुरुषायुषः ॥ २४ ॥
तैलं पिबेद्रघृतक्षौद्रक्षीरान्यतममिश्रितम् ।
कुर्याच्च तैलमध्वाज्यैर्नस्यं क्षीरघृताशनम् ॥
भुक्त्वा शतायुः षण्मासात्सहस्रायुस्त्रिवर्षतः ॥ २५॥<noinclude></noinclude>
4f5ggiwxs9ksiy7epec9jbn332vpec1
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३०
104
165849
418442
2026-09-06T09:24:56Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (८०८) रसरत्नसमुच्चयः । स्तत्तद्दोषप्रभवकुटिलान्दुःखसाध्यान्समस्तान् दद्याद्दीप्ति जठर शिखिनं स्त्रीशतं सेव्य वृष्य- स्थैर्यं कुर्यादपि च वपुषो नामतः कामध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418442
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८०८)
रसरत्नसमुच्चयः ।
स्तत्तद्दोषप्रभवकुटिलान्दुःखसाध्यान्समस्तान्
दद्याद्दीप्ति जठर शिखिनं स्त्रीशतं सेव्य वृष्य-
स्थैर्यं कुर्यादपि च वपुषो नामतः कामधेनुः ॥ ४५ ॥
उत्तम प्रकारसे शुद्ध किया हुआ सुवर्ण ४ तोले, शतपुटी अथवा
सहस्रपुटी अभ्रक भस्म ४ तोले, शुद्ध कान्सलोह ४ तोले शुद्ध ताज ४
तोले और केंचुओं का सत्व १ तोला इन सबको एक मूषामें भरकर
अग्निमें फूँक करके दुति करलेवे । जब सब रस मिल कर एकम एक
होजायँ सब अग्निसे नीचे उतारकर शीतल करके खरल करलेवे । फिर
उसके साथ ८० बोले शुद्ध पारा मिलाकर पारेकी पिट्ठी बनालेवे । उस
पिडीको उन रसों तिर्यक् पातन यन्त्रमें डालकर पारेको उडावे जब
सब पारा उडजाय तब फिर उसनेही सुवर्णादि रसोंके साथ उतनेही
पारेकी पिट्ठी बनाकर के उक्तविधिसे पारेको उडावे । इस प्रकार सौ
वार पारेको उडाना चाहिये । जब पारा उडते २ आठ तोले शेष रह
जाय तब उसको अनिके द्वारा भस्म करलेवे | उस पारेकी भस्म होजाने
पर जब ८ तोले पारेमेंसे ४ तोले पारा शेष रहजाय तब उस पारेकी
भस्म में ही की भस्म ४ मासे अभ्रकभस्म २४ तोले और शुद्ध गन्धक
८ तोले डालकर दो दिनतक खरल करे । फिर सबको लोहे की कढा-
ईमें डालकर उसके नीचे मन्द मन्द अभिसे जलावे और सेमलकी
जडका काय उसमें थोडा २ डालता जावे । जब काय सूख जाय तभी
उसमें और थोडासा काथ डालदेवे । इस प्रकार १६० तोले काथ डाल-
कर परिको जारण करे फिर स्वांगशीतल होजानेपर रसको निकालकर
बारीक पीसलेवे । इसके पश्चात् उस पारेको उक्त काथ और कल्कके
साथ नालिका यन्त्र के द्वारा दग्ध करके शीशीमें भरकर यत्नपूर्वक
रक्खे। यह रस एक २ रत्ती घीमें मिलाकर सेवन करनेसे पृथक
पृथक् दोषोंसे उत्पन्न होनेवाले अत्यन्त भयंकर और कष्टसाध्य सम्पूर्ण<noinclude></noinclude>
1vqinif76ylfxgegci5e22e4ppobixu
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५४
104
165850
418443
2026-09-06T09:26:42Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८३१ ) रसरत्नसमुच्चयः । दूरकर स्त्रियोंको वशीभूत करानेवाला है । असमय पतित हुए स्त्रीके. गर्भको सुखाकर किया हुआ चूर्ण और समान भाग पारा दोनों को शहद के साथ मिलाकर ल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418443
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८३१ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
दूरकर स्त्रियोंको वशीभूत करानेवाला है । असमय पतित हुए स्त्रीके.
गर्भको सुखाकर किया हुआ चूर्ण और समान भाग पारा दोनों को
शहद के साथ मिलाकर लिंगपर लेप करे तो वह मनुष्य सुखे हुए
काठके समान स्त्रीकोभी अवश्य द्रवित करता है । यदि सिन्दूरको शह-
दमें मिलाकर लिंग के ऊपर लेप करे तो अत्यन्त प्रसंग करने पर भी
वीर्यस्तम्भन होता है और वह मनुष्य स्त्रीको द्रवितकर वशमें करलेता
है । कृकवाकु अर्थात् मयूर अथवा मुर्गी तीक्ष्ण पिच्छ ( पंख) को
अंगूठीके समान बनाकर उसको मकडीके जाले से लपेट करके बायें
हाथ की कनिष्ठिका (कनकी ) अंगुली में धारण कर मनुष्य श्रीप्रसंग
करे तो वीर्य स्खलित नहीं होता । कपूर, सुहागा, पारेकी भस्म,
अगस्तियाके फूलोंका रस और मधु इनको एकत्र खरल करके लेप
करे । जबतक यह लेप रहेगा तबतक वीर्य स्तम्भित रहेगा। सफेद
कमलके फलोंकी मोटी २ पंखडियोंको सुखाकर चूर्ण करलेवे, उस
चूर्णको शहद में मिलाकर उसका तिलक करके प्रसंग करनेसे अन्यन्त
बीर्य स्तम्भन होता है । कपूर और पारेकी मस्म अथवा सुहागा और
पारेकी भस्मको एकत्र मिलाकर लिंगपर लेप करें तो यह मदन जीवन
नामसे प्रसिद्ध रस नित्य कामदेवको जागृत रखता है अर्थात् वीर्य
स्तम्भन करता और स्त्रियोंको द्रवित करता है ॥ १३९-१४९ ॥
इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः ।
लोहेकल्प |
सप्तधातुशोधनभस्म ।
अल्पमात्रोपयोज्यत्वादरुवेरप्रसंगतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥ १ ॥<noinclude></noinclude>
gd4s0nym1ft6xwb6449dpgvn5ufp1pw
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७७
104
165851
418444
2026-09-06T09:27:22Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८५५) जड इन प्रत्येकके १६ तोले रसमें खरल करके १०० गोलियाँ बनाकर छायामे सुखा लेवे। उनमें से प्रतिदिन एक २ गोली भैंस के महके साथ सेवन कर पीछेसे हरड, दा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418444
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८५५)
जड इन प्रत्येकके १६ तोले रसमें खरल करके १०० गोलियाँ
बनाकर छायामे सुखा लेवे। उनमें से प्रतिदिन एक २ गोली भैंस के
महके साथ सेवन कर पीछेसे हरड, दारूहल्दी, बहेडा और पाठ
समानभाग मिश्रित इन औषधियोंका क्वाथ पान करे तो प्रमेहरोग
दूर होता है । कान्तलोइकी भस्मके साथ प्रयोग की हुई यह औषध
बालकों के लिये अत्यन्त लाभदायक होती है कुमार अवस्थामें यह
विशेष लाभ, युवावस्थायें साधारण और मध्यम अवस्थामें बहुत थोडा
गुण करती है । अर्थात् कुमार अवस्थावाले मनुष्यको थोडे समयमेही
गुण करती है, युवा पुरुष हो उससे दुगुने समयमें और मध्यम अवस्था
वाले मनुष्य को तिगुने समयमें आरोग्य करती है। (५) अण्डीकी बीजोंकी
गिरी, चीता, शंखाहुली, पुनर्नवा, त्रिकुटा, सैंधानमक और अन्तर्धूम की
विधिसे दग्ध की हुई कौडीकी भस्म इन सबको समानभाग लेकर
बारीक चूर्ण करके कपड़छान कर लेवे। इस चूर्णको गरम जल केसाथ सेवन
करनेसे शूल रोगनष्ट होता है । (६) त्रिफला, गिलोय, निस्रोत, चौलाई,
पुनर्नवा, कसौंदी, आकाशबेल, धतूरा और थूहर इन प्रत्येकके रसमें
उपर्युक्त एरण्डादि चूर्णको भावना देकर सिद्ध करे। फिर उचित मात्रा
गुड, शहद और घृतके साथ मिलाकर सेवन करे और जल मिली हुई
छारका अनुपान करे तथा दूध और मांस रसका भोजन करे तो जीर्ण
ज्वर, क्षय, कुष्ठ, अस्थिस्राव (नाडीव्रण), पाण्डुरोग, अर्श, पक्तिशूल, और
प्लीहा (तिल्ली) ये सब रोग नाश होते हैं । (७) बापची, नीमका पञ्चाग,
वायविडङ्ग, चीता, कुडेकी छाल. हरड, सोंठ, अमलतास, गिलोय, कुटकी
और लोहभस्म इन सबको समानभाग लेकर वारीक चूर्ण करके कपड
छानकर लेवे। फिर खैरसार ( कत्था ) और विजयसारके इसमें एक २
भावना देकर तैयार करे। यह रसायन एक २ तोला परिमाण मधु
और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे क्षय और कुष्ठको नष्ट करती है ।<noinclude></noinclude>
3vqysidinjtjt2yhoqousj9ssblgv6x
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८९९
104
165852
418445
2026-09-06T09:29:13Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भावाटीकोपेतः (८७७) हल्दी, निसोत और नागरमोथा मे प्रत्येक चार रसाले और वत्सनाभ दो तोले लेकर सबको गोयुत्रमें पीस लेने । फिर उसमें ब्राह्मीका रस ६४तोले, आकका दूध, ६४ श... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418445
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भावाटीकोपेतः
(८७७)
हल्दी, निसोत और नागरमोथा मे प्रत्येक चार रसाले और वत्सनाभ
दो तोले लेकर सबको गोयुत्रमें पीस लेने । फिर उसमें ब्राह्मीका रस
६४तोले, आकका दूध, ६४ शो, गौके गोबरका रस ६४तोले और
सरसों का तेल ६४ तोले डालकर यथाविधि तेलको पावे | यह तेल
पान, मलेह, गर्दन आदिके द्वारा प्रयोग करनेसे कुछ, दुष्टव्रण, नाडी-
व्रण, और अपची इन सब रोगोंको शीघ्र दूर करता है । (२७) विष,
मिलाने, चीता, चोंटली और नीमकी निर्मली इनकी खटाईके साथ
पीसकर लेप करने से श्वेतकुष्ट, पुण्डरीक नायक कुष्ठ और दारुण
नावाला कुछ दूर होता है । ( २८ ) अर्जुनवृक्षकी छाल, मिलावे,
चीता, असवरग, तेजपात और एलआ इनके समान भाग मिश्रित २
तो चूर्णको खरसार के क्कायमें पीसकर खैरसारके इसमें भिगोकर
तीन दिन तक रखा रहने देवे। फिर चौथे दिन उसमें यथोचित मात्रा से
विष मिलाकर पान करे और श्वेतकुष्ठपर इस औषवका प्रलेप करे सो
इससे श्वेतकुष्ठके स्थान में छाले पडजाते हैं । उनको कांटेसे भेदकर फिर
उनके ऊपर इस औषधका प्रलेप करनेसे श्वेतकुष्ठ शीघ्र नष्ट होता है ।
(२९) कनेर, आककी जड, बावची, विष, समुद्रफेन, गजपीपल
और भिलावे सबको बकरके मूत्रमें पीसकर लगाने से श्वेतकुष्ठ अथवा
aags छाले शान्त होते हैं । (३०) अण्डीका तेल, त्रिफला,
चीता, विष और गोमूत्र इनका एकत्र कल्क बनाकर उस कल्कको
बराबर घी और उससे चौगुना पानी लेकर सबको एकत्र मिश्रित
करके धृतको पढ़ाने | इस घृतको सेवन करनेसे वातकी पीडा शमन
होती है । (३१) शीतलचीनी, कलिहारी, विष, सरसों, गन्धक, अंको.
लके बीज, मिरच, थूहरका दूध इन सबको समान भाग लेकर कपा-
सकी जडके काय में पास करके कल्क बनालेवे । उस कल्ककी बराबर
restarter तेल और तेलसे चौगुना कपासकी जडका काथ लेकर
1<noinclude></noinclude>
fa0g1n9ijuq0hfut8hvjkgp9x0wbzki
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२२
104
165853
418446
2026-09-06T09:30:06Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (९००) रसरत्नसमुच्चयः । इनके द्वारा जारण करनेसे पारा फोडे, फुन्सी, कुष्ठ आदि विकारोंको उत्पन्न करनेवाला होजाता है । पारेको जारण करनेकी दूसरी विधि । प्रथम बारह अडग... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418446
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९००)
रसरत्नसमुच्चयः ।
इनके द्वारा जारण करनेसे पारा फोडे, फुन्सी, कुष्ठ आदि विकारोंको
उत्पन्न करनेवाला होजाता है ।
पारेको जारण करनेकी दूसरी विधि ।
प्रथम बारह अडगुल लम्बी लोहेकी भूषा बनावे | फिर पीला धतूरा
बाराहीकन्द और घीग्वारके इसके साथ पारेको खरल करके गोला
बनाकर सुखालेवे। फिर उस गोलेको लहसुन के कल्क में खूब लपेटकर
और सुखाकर उपर्युक्त मूषामें रखकर उसके ऊपर तली में एक छोटीसी
मृषाको इस प्रकार ढके कि वह बडी मूबामें दो दो अँगुल नीचेको
फँसजावे । फिर पारेसे चौथाई भाग गन्धकको निर्गुण्डीके पत्तों के
रसमें घोटकर सुखालेवे । और उसको छिद्रवाली छोटी यूषामें उसी
मार्गसे भरकर उस छिद्रको चक्र के समान गोल लोहे के ढक्कन से ढक-
देवे । और दोनों मृषाओंके ऊपर कपरौटी करके सुखालेवे । फिर
पानीसे भरे हुए लोहे के कढावमें मिट्टीका एक बडा कुँडा रखकर उसकी
तलीमें इस मूषाके सम्पुटको अधर लटका कररक्खे और उस सम्पुट
पर एक बडा कुँडा औंधा मुँह करके ढकदेवे फिर उस कँडेके ऊपर
आरने उपलोंकी अग्नि जलावे और नीचे खैर की लकडीकी अग्नि
जलाता हुआ पकावे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब पारेको उस
मेसे निकाल लेवे। यह एक चार गन्धक जारण हुआ । इसी प्रकार
जितना पारा हो उससे अठगुनी गन्धक जबतक जारण हो तबतक
बारम्बार उपर्युक्त विधिसे जारण करे और प्रत्येक बारमें गन्धकको
पारस आठवाँ भाग डाले । इसप्रकार ३२ बार अठगुनी गन्धकमें
जारण होनेपर पारा क्षय और कुष्ठ रोगको अवश्य नष्ट करता है ।
॥ १५-२४ ॥
वज्रपञ्जर रस ।
क्षेत्रीकरणमित्युक्तं वज्र भस्मसमं रसम् ।
हंसपादीरसैर्दृष्टं विपचेत्तत्पुटानले ॥ २५ ॥<noinclude></noinclude>
hbo7p6rtijdm03hbmjpteye06v1fvw8
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४५
104
165854
418447
2026-09-06T09:35:02Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९२३) राजयक्ष्मार्दितश्चन्वस्ताभ्यामेव चिकित्सितः । भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन्विकृतिं गतः १२२ वीर्यवर्णबलोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418447
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ९२३)
राजयक्ष्मार्दितश्चन्वस्ताभ्यामेव चिकित्सितः ।
भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन्विकृतिं गतः १२२
वीर्यवर्णबलोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा ।
एभिश्चान्यैश्च बहुभिः कर्मभिर्भिषत्तमौ ॥ १२३ ॥
बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां महात्मनाम् ।
सौत्रामण्यां च भगवानश्विभ्यां सह मोदते ॥ १२४॥
अश्विभ्यां सहितः सोमं प्रायः पिबति वासवः ।
अश्विभ्यां कल्पितो भागो यज्ञेषु च महर्षिभिः १२३
अश्विनावग्निरिंद्रश्च वेदेषु सुतरां स्तुताः ।
वैद्यावित्यश्विनौ देवौ पूज्येते विबुधैरपि ॥ १२६ ॥
अजरैरमरैर्नित्यं सुखितैरेवमादृतैः ।
व्याधिमृत्यु जरास्तैर्दुःखप्रायैः सुखार्थिभिः ।
किं पुनर्भिषजो मयैः पूज्याः स्युर्नामशक्तितः १२७
(१) यदि युग के स्वभावसे औषधियोंकी अपना कार्य करने में
शक्ति कम होगयी है, ऐसी कोई कल्पना करे तो उसको साथ साथ
में यह भी मानना पड़ेगा कि युगका प्रभाव जैसे औषधियों को शक्ति
क्षीण करने में समर्थ है, उसी प्रकार आयु, बल और शारीरिक
स्थिति आदिमें भी प्राचीन काल की अपेक्षा वर्तमान युगके प्रभावसे
अत्यन्त हीनता उत्पन्न हो गयी है । (वर्तमान समय के परिवर्तन से
शारीरिक स्थितिमें तो हीनता उत्पन्न हुई स्पष्ट दिखायी देता है, पर-
तु औषधियोंकी शक्ति कम हो गयी है, यह बात नहीं मानी जा
सकती । क्योंकि औषधियाँ तो शास्त्रमे लिखे अनुसार अब<noinclude></noinclude>
gn8f7todj76qmzsmj7kpwufe3um4gw3
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७१९
104
165855
418448
2026-09-06T09:38:45Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । छिन्नाफणिज्जहंसा त्रिभानुपत्ररसैः सह । (६९७) सस्तन्यं साधित तैलं लिप्तं सर्वग्रहार्तिजित्॥ १६३ ॥ स्फूर्जकं हपुषापुष्पं हंसपादी कुरंटकम् । कर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418448
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
छिन्नाफणिज्जहंसा त्रिभानुपत्ररसैः सह ।
(६९७)
सस्तन्यं साधित तैलं लिप्तं सर्वग्रहार्तिजित्॥ १६३ ॥
स्फूर्जकं हपुषापुष्पं हंसपादी कुरंटकम् ।
करंजार्कदलस्फूर्जश्वेतपुष्पं च कल्कितम् ॥
तेन संसाधित तैलं तेनाऽभ्यगं चरेच्छिशोः॥१६४॥
निजाश्वत्थ पकाशानी बिल्ब किंशुकयोर्दलैः ।
सिद्धं सर्पिस्तथा तैलं पानाद्वालग्रहाञ्जयेत् ॥ १६५ ॥
त्रिफला और बेरीके पत्तोंका काढा बनाकर उससे गुदाको बार-
स्वार धोवे । यदि वह स्थान लाली, सूजन और खुजली युक्त हो तो
वहाँपर जोंक लगवाकर थोडा रक्त निकलवादे । इस रोगमें विशेषकर
पित्त व्रणके समान चिकित्सा करनी चाहिये और गुदाके पकजानेपर
भी पित्तणनाशक उपचार करने चाहिये । इसमें विशेषरूप से रसौ-
तको पीसकरके पान और प्रलेप द्वारा प्रयोग करना बडाही उपयोगी
है । जीरा और रसौतके चूर्णको चमेलीके पत्तों के रसमें घोटकर और
बकरी के दूधमें मिलाकर कपडेमें छानकरके रस निचोडलेवे । इस
रसको पिलाने से बालकका गुदापाक और गुदकीट रोग दूर होता है ।
बालकों के मुँह में छाले पडजानेपर पीपलको अन्तर्छालके चूर्णको घृत
और शहद मिलाकर मुँहके भीतर लेप करे । अथवा चमेली के पत्ते,
हरड, मुलैठी और दारूहल्दीके समान भाग चूर्णको शहद में मिलाकर
लगाने से भी मुखपाक रोग दूर होता है । बालककी नाभिके पकाने
पर मोमको तेलमें पकाकर बारंबार लेप करे । हल्दी, मुलैठी लोध
और फूल प्रियंगू इन औषधियोंके कल्कके साथ तेलको पकाकर भथवा
इनके चूर्णको तेलमें मिलाकर उस तेलको नाभिपर लगानेसे नाभि-<noinclude></noinclude>
ean40j8zj8osnrm7ex78mx8xsyoa2o4
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४२
104
165856
418449
2026-09-06T09:39:58Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७२० ) रसरत्नसमुच्चयः । रहने देवे | प्रातःकालमें उसकी बत्ती बनाकर छायामें सुख लेवे । इस बत्तीको पानी में घिसकर नेत्रों में लगावे तो इससे अधिमन्थ, तिमिर, अर्म, पिल, श... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418449
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७२० )
रसरत्नसमुच्चयः ।
रहने देवे | प्रातःकालमें उसकी बत्ती बनाकर छायामें सुख लेवे । इस
बत्तीको पानी में घिसकर नेत्रों में लगावे तो इससे अधिमन्थ, तिमिर,
अर्म, पिल, शुकु आदि नेत्ररोग नाश होते हैं । अथवा पारा, सीसा,
रखौत, मूँगेकी पिष्टी, कसीस, लोध ताम्र भस्म, मांसरोहिणी, त्रिकुटा,
गेरू, सैंधानमक, तूतिया, समुद्रफेन, त्रिफला, मोती, कपूरकवरी,
बबूरकी छाल, कोयलकी जड, जियापीता, धतूरे की जड, इमली के
बीजों की गिरि, समुद्रनमक, सैंधानमक, काला नमक, मिडनमक,
कचियानमक और पेढासिंगी इन औषधियोंको समान भाग लेकर
एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे। उस चूर्णको नीम के पत्तोंके रस में घाटकर
ताँबे के बर्तनमें लेप करके रात्रिभर रक्खा रहने देवे। फिर प्रातःकालमें
उसकी बत्ती बनाकर छायामें सुखालेवे | यह बच्ची नेत्रोंके अभिमन्य
और पिल्लरोगको विनाश करनेवाली है । कपूर, काला सुरमा, सीसा,
पारा, पीपल और तीक्ष्णलोह इन समस्त औषधियोंको नीम के पतोंके
रसमें घोटकर सुखालेवे । फिर शहद में घोटकर मैदाके समान बारीक
अंजन बनालेवे । इस अंजनको सींगकी अथवा स्फटिकमणिकी घनी-
• हुई डिबिया में भरकर रक्खे । इस अंजनको सदैव नेत्रोंमें आँगने से
शुक्ल, अर्म, काच (मोतियाविन्द ) तिमिर आदिरोग शीघ्र दूर होते
हैं | नेपाली ताँचा, तूतिया, सुहागा, रजतभस्म, त्रिफला, त्रिकुटा,
समुद्रफेन और नागरमोथा इन सबको जम्बीरी नींबू के रसमें घोटकर
बच्ची बनाकर छाया में सुखालेवे । यह बत्ती -पानीम घिसकर लगाने से
मोतियाबिन्द, अर्म, नेत्रस्राव, तिमिर, फूला, पिल इत्यादि समस्त
1
नेत्रव्याधियोंको नष्ट करती है
। कौडियों में
पारा
भरकर उनके
मुँहको लाख और जम्बीरी
नींबू के रस में
घोटे
हुए सुहागेसे
बन्द करके सुखालेवे । फिर
उनको एक हाँडीमें बन्द करके<noinclude></noinclude>
q54y12tbcssdyo8t6lfyjqcnxo1s4o5
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६४
104
165857
418450
2026-09-06T09:41:00Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७४२ ) रसरत्नसमुच्चयः । लोहभस्म इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके उसको चौगुने तेलमें डालकर पकावे। उस तेलकी मालिश करनेसे सिरके बाल अत्यन्त मजबूत, घूँघरवाले, स... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418450
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७४२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
लोहभस्म इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके उसको
चौगुने तेलमें डालकर पकावे। उस तेलकी मालिश करनेसे सिरके बाल
अत्यन्त मजबूत, घूँघरवाले, सीधे और सुन्दर होजाते हैं । (११) सिर में
जुओके अथवा कीडोंके काटनेसे बालोंकी जडोंमें क्षतसे होगये हों और
बाल न जमतेहों तो उस स्थानको सुवर्ण से खूब घिसे जब घिसते वह
जगह खूब गरम हो जाय तब नीचे लिखा हुआ यह लेप करे । भिलावे,
बडी कटेरीकी जड, चोंटली की जड और फल इन सबको एकत्र चूर्ण
करके कपड़छान करलेवे । उस चूर्णको शहद में मिलाकर सिरपर
मालिश करनेसे चाम्परोग नष्ट होता है । (१२) अथवा चोंटली की
जड और चोंटली के फलोंके चूर्ण को कटेरीके फलाके रस में पीसकर
सिरपर लेप करे । इससे दुस्साध्य चाम्परोग (जुयें आदि कृमियोंके
अत्यन्त काटने से या बालोंकी जडें खाजानेसे सिरमें जो जख्मसे हो
जाते हैं उसको चाम्परोग कहते हैं ।) भी शीघ्र दूर हो जाता है ।
(१३) अभ्रकके द्वारा जारण किया हुआ पारा, तीक्ष्णलोहकी भस्म
और ताम्र भस्म तीनोंको एकत्र मिलाकर खरल करलेवे । फिर यह रस
२ रत्ती लेकर १ तोला लोहासव और एक या दो बूँद थूहरके दूधमें
मिलाकर सेवन करे। यह औषध-सूर्यावर्त आदि समस्त सिरके रोगोंका
विनाश करती है । (१४) सरसों के तेलकी नस्य लेनेसे या उसकी दो चार
बूँदे नाक में टपकाने से पलित (असमय बालोंका पकना) और अरुषिका
(सिरसे गाँठेंसी पडजाना) रोग दूर होता है । (१५) थूहर का दूध,
आकका दूध, भाँगरेका स्वरस, गोमूत्र, कलिहारीकी जड, मीठा
तोलिया, चोंटली, इन्द्रायनकी, जड, और मिरच इन सबको समानभाग
लेकर बारीक चूर्ण कर लेवे । फिर उस चूर्णको चौगुने सरसोंके तेल
और जलमें मिलाकर यथाविधि तेलको पकावे । इस तेलको सिरपर
मलने से अथवा विषसे अठगुनी काँजी लेकर दोनोंको एकत्र पीसकर<noinclude></noinclude>
2jz2m4tib84r7dlplzqapb0cn6aliqk
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८६
104
165858
418451
2026-09-06T09:42:26Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७६४ ) इस रत्न समुच्चयः । तिलतैलं क्वाथपादं तैलार्ध माहिषं घृतम् । स्नेहशेषं पचेत्तेन नस्येन मासमात्रकात् ॥ ४७ ॥ बालादिवृद्धनारीणां यौवनं कुरुतेऽगुनम् ॥ ४८ ॥ क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418451
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७६४ )
इस रत्न समुच्चयः ।
तिलतैलं क्वाथपादं तैलार्ध माहिषं घृतम् ।
स्नेहशेषं पचेत्तेन नस्येन मासमात्रकात् ॥ ४७ ॥
बालादिवृद्धनारीणां यौवनं कुरुतेऽगुनम् ॥ ४८ ॥
कुरुवत्वकषायेण तत्कल्केन च साधितम् ।
तैलं तु वनितानां च कुचकुंभत्रणापहम् ॥ ४९ ॥
शुल्बचूर्ण रसे जीर्ण मदयंतीपुनर्नवा ।
शृंगीरसञ्चतान्रणशोषणरोपणम् ॥ ५० ॥
कुंभी पुष्पाणि चादाय गिलगेद्रविवासरे ।
यावत्संख्यानि पुष्पाणि तावद्वर्षाणिस्नायुकम् ||
न निर्याति न संदेहः सिद्धयोग उदाहृतः ॥ ५१ ॥
मेष
(३२) अधपकी खिरनीकी जडका काढा बनाकर उस छः गुने
काथमें मैनसिलादिगणकी औषधियोंका चूर्ण डालकर अच्छे प्रकारसे
खरल करके मल्हम बनालेवे । पैरोंके फटजानेपर अर्थात् पैरोंमें विवाई
होजानेपर इस मल्हमको लगानेसे शीघ्र लाभ होता है । (३३) गुड,
गूगल, सिन्दूर, खस, गेरू, मैनफल और शहद इन सबको एकत्र पोस-
कर घृतमें मिलाकर पैरोंके तलुवोंमें लेप करे इससे पैरोंकी बिवाई ७
दिनमें दूर होजाती है और पैर कमलके समान कोमल होजाते हैं ।
( ३४ ) अथवा मैनफल, मोम और समुद्रनमक तीनों को समानभाग
लेकर बारीक चूर्ण करले फिर सके नैनी घीमें मिलाकर और गरम
करके लेप करे तो पैरोंकी विचाई या हाथ पैरों का फटना एक सप्ताहमें
दूर होकर हाथ पाँव कमलके समान कोमल होजाते हैं । (३४) पारे
और गन्धकको समान भाग लेकर एकत्र कज्जली करलेवे । फिर कब्ज-
लीके बराबर कचनारकी छाल ले कर चूर्ण करके उसको कज्जली सहित
एक दिन तक चीते के काटेमें खरल करले । इस मल्हमका लेप कर-
नेसे ऍडियोंके भीतर उठी हुई खुजली, गांठ और खुडरोग नष्ट होता<noinclude></noinclude>
aim7rkg3kbre4mgptwxt7yoom03135y
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०८
104
165859
418452
2026-09-06T09:44:06Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७८६) रसरत्नसमुच्चयः । मधुकेन तुगाक्षीरी पिप्पली क्षौद्रसर्पिषा । विडंगपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च ॥ २६ ॥ संवत्सरप्रयोगेण स्मृतिमेधा बलप्रदा । भवत्यायुःप... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418452
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७८६)
रसरत्नसमुच्चयः ।
मधुकेन तुगाक्षीरी पिप्पली क्षौद्रसर्पिषा ।
विडंगपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च ॥ २६ ॥
संवत्सरप्रयोगेण स्मृतिमेधा बलप्रदा ।
भवत्यायुःप्रदा पुंसां जरारोग निबर्हिणी ॥ २७ ॥
खदिराऽसन भृंगसातला कृमिशनदकभाविता
मुहुः । गुडमाक्षिक सर्पिरन्विता त्रिफला
हंति जरां च वत्सरात् ॥ २८ ॥
त्रिफलामसनोदकेन पिट्वा रजनी पर्युषितामयः
कपाले Ingi मधुना लिहन्हिनस्ति स्थविमान
जरस गर्दाश्च सर्वान् ॥ २९ ॥
कांता
कशिलाधातुविषसुतकमाक्षिकम् ।
शीलितं मधुसर्पिर्भ्यां व्याधिवाधकमृत्युजित् ॥३०॥
गंध लोहं भस्म मध्वाज्ययुक्तं सेव्य वर्षे पारिणा
फलेन । शुभ्रे केशे कालिमा दीर्घदृष्टिः पुष्टि-
व जायते दीर्घमायुः ॥ ३१ ॥
नीलज्योतिः कांतचूर्ण रुदंती धात्रीपत्रैर्वारिणा
चैफलेन | मध्वाज्याभ्यां वत्सरार्धप्रयोगात्कुष्ठं
शुभ्रं रोगजातं निहति ॥ ३२ ॥
देहे दाढ दिव्यदृष्टि' पुष्टिवर्य शौर्य जायते
दीघमायुः ॥ ३३ ॥
ज्योतिष्मत्यास्तैलमाज्यं सगंधंगुजावृद्धया सेव-
येन्मासमात्रम् । यावच्च स्याद्यस्तु स प्राप्य मूर्ति-
धायुक्त दिव्यदृष्टिर्नियक्ष्माः ॥ ३४ ॥<noinclude></noinclude>
byzobt4l0bv8yuwloabwiheuy4fr6nf
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३१
104
165860
418453
2026-09-06T09:48:26Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाघाटीकोपेतः (८०९) रोगोंको समूल नष्ट करता है जठराग्निको अत्यन्त दीपन करता है सैक- डॉ स्त्रियोंके भोगने योग्य वीर्यकी वृद्धि तथा स्थिरता उत्पन्न करता है। और शरीर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418453
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाघाटीकोपेतः
(८०९)
रोगोंको समूल नष्ट करता है जठराग्निको अत्यन्त दीपन करता है सैक-
डॉ स्त्रियोंके भोगने योग्य वीर्यकी वृद्धि तथा स्थिरता उत्पन्न करता है।
और शरीरको अत्यन्त दृढ बनाता है । इसको कामधेनु रस कहते
हैं ॥ ३८-४५ ॥
उमापति रस ।
कृष्णाभ्रकस्य धान्याभ्रं कृत्वा भृंगांतुनिं क्षिपेत् ।
तस्त्रिश्च तुत्थकं देयं सूक्ष्मं ताप्यभवं रजः ॥ ४६ ॥
टंकणं चाशिना भृष्टं तावदेव विनिक्षिपेत् ।
छागास्थिसंभवं चूर्ण चतुर्थांशेन निक्षिपेत् ॥ ४७ ॥
रसभस्माष्टमांशं च गुडगुंजापुरस्तथा ।
पञ्चाज्येन विनिष्पिष्य गोलीकृत्य विशोष्यच|१८||
ततो नूतनभाण्डस्य जलघृष्टेन पाण्डुना ।
विलिप्य वटिकाः सर्वा हरेत्सर्वे पुरोक्तवत् ॥ ४९ ॥
महाभ्रसत्त्वमेतत्स्यादेकमप्यखिलातिनुत् ।
त्रिफलाक्वथितेः साधै पुटितं च शतावधिम् ॥५०॥
इत्थं महाभ्रसत्वं तन्मृतं शाणचतुष्टयम् ।
एकशापमितं सम्यग्रसराजस्य भस्म च ॥ ५१ ॥
एकशाणमितं गंध त्रिफला च त्रिशाणिका ।
कांत पात्रे क्षिपेदेतत्सर्वे घृतसितायुतम् ॥ ५२ ॥
मर्दयेदतियत्नेन यावत्स्यात्प्रहराष्टकम् ।
तत्कल्कं निक्षिपेत्कांत लोहजात करण्डके ॥ ५३ ॥<noinclude></noinclude>
8nrxprmzuwnz9jx7wwkhzqb0ws3ncq1
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५५
104
165861
418454
2026-09-06T09:48:51Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ कार्यः भाषाटीकोपेतः । ( ८३३) लोहं मृत कंदविषं सूतं चेति निगद्यते । पानकषायोsस्मिन्पोडशांशावशेषितः ॥ २ ॥ अथ पञ्चमृदा लिप्तं हेम्नः पत्रं पुटानले । विपचेन्नागमाव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418454
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>कार्यः
भाषाटीकोपेतः ।
( ८३३)
लोहं मृत कंदविषं सूतं चेति निगद्यते ।
पानकषायोsस्मिन्पोडशांशावशेषितः ॥ २ ॥
अथ पञ्चमृदा लिप्तं हेम्नः पत्रं पुटानले ।
विपचेन्नागमावाप्य रूप्यं चोर्ध्वाग्निना धमेत् ॥ ३ ॥
स्नुह्यर्क क्षीरलवणक्षाराम्लकृतलेपनम् ।
तप्तताम्रस्य निर्गुण्डचा रसे सिंचेत्पुनः पुनः ॥ ४ ॥
वंगं नागं रसे तस्मिंस्तन्मूलेनावचूर्णकम् ।
यत्पात्राभ्युचिते तोये तैलबिंदुर्न सर्पति ॥ ५ ॥
तारेणावर्तते यत्तत्कान्तलोहं तु तत्स्मृतम् ।
असामुत्तमं सिञ्चत्ततं वरारसे ॥ ६ ॥
एवं शुद्धानि लोहानि पिष्टान्यम्लेन केनचित् ।
मृतसुतस्य पादेन प्रलिप्तानि पुटानले ॥ ७ ॥
• पवेत्तुल्यस्य वा ताप्य गंधाश्महरतेजसः ।
अथवा मृतनागेन खुीक्षीरेण काञ्चनम् ॥ ८ ॥
रूप्यं स्वक्क्षीरतालाभ्यां ताम्रं मूत्राम्लगंधकैः ।
हरितालपलाशाभ्यां बंगं नागं मनोह्वया ॥ ९ ॥
पारिभद्रस्य च रसेनाऽथवा भर्जयेत्रषु ।
चिश्चाक्षकेक्षुवीरद्वबोधिवृक्षैरहिं पुनः ॥ १० ॥
अहिमाराहिद मनीवा सावज्रलतार्जुनैः ।
श्रीस्तन्येहिंगुले नायः पचेलिप्त्वा पुटेऽनले ॥ ११ ॥
सर्वमेव मृतं लोहं सोत्थानं यदि सेवनात् ।
शुकपूर्णाभकण्ठत्वस्फोटाऽरुचि विबन्धकृत् ॥ १२ ॥
२९<noinclude></noinclude>
6nn503eyggltg56gx95y9pbhxrh2grt
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७८
104
165862
418455
2026-09-06T09:51:43Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ८५६ ) (८) एक कुडव (१६ तोले) गुडमें चार तोले लोहभस्म मिलाकर पका लेवे। फिर प्रत्येक रोगों रोगानुसार अनुपानों के साथ एक २ तोला व आधा २ तोला परिमाण प्रय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418455
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः ।
( ८५६ )
(८) एक कुडव (१६ तोले) गुडमें चार तोले लोहभस्म मिलाकर पका
लेवे। फिर प्रत्येक रोगों रोगानुसार अनुपानों के साथ एक २ तोला व
आधा २ तोला परिमाण प्रयोग करे। (९) सोंठ, मिरच, पीपल, पीपलामूल
चन्य, चीता, नागरमोथा अजवायन, और जीरा ये प्रत्येक एक एक
तोला, लोहभस्म तोले, शिलाजीत तोले और खॉड सबसे अठगुणी
लेकर सबको शहद मिलाकर काम्बलोहके वर्तनमें भरकर रखदेवे |
इसके सेवन से यक्ष्णा, ज्वर, अपस्मार और हिस्टेरिया आदि रोग नष्ट
होते हैं। (१०) नीमका गोंद, शतावर, विदारीकन्द, बाराहीकन्द, त्रिफला,
लोहभस्म और शुद्ध गन्धक इनके समानभाग मिश्रित चूर्णको मधु
और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे अथवा अर्जुन वृक्ष के पत्तों का चूर्ण,
भाँगरा त्रिफला और लोहभस्म इनको समभाग लेकर शहद और
वृतमें मिश्रित करके सेवन करनेसे वृद्धावस्था और उसके विकार नाश
होते हैं।(११) मुलैठी, लोहभस्म और आमले इन प्रत्येक उत्तरोत्तर क्रम से
दुगुना लेकर गिलोयके स्वरसमें भावना देकर तैयार करे | फिर वृत
और मधुमें मिलाकर भोजन करनेसे पहले सेवन करे तो वात, पित्त
सम्बन्धी सब रोग दूर होते हैं । यह औषध भोजन के मध्य सेवन
करनेसे अम्लपित्तको और भोजन के अन्तमें सेवन करने से पक्तिशूलको
नष्ट करती है । ( ११ ) मिळावे १००० एवं त्रिफला, नागरमोथा,
चीता, गजपीपल, चिरचिटा, सहदेई, तुलसी, पीपलामूल, गिलोप
और चव्प ये प्रत्येक सोलह २ तोले परिमाण लेकर प्रथम
मिलावोंको छेद लेबे, फिर अन्य औषधियोंको एकत्र कूट करके सबको
एक द्रोण (१२४ तोले) जलमें डालकर पकावे । जब जल
पककर चौथाई भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर
लोहेके पात्रमें भरकर उसमें तीक्ष्ण लोहकी भस्म ९० पल और
घी ३३ तोल डालकर पकावे । उत्तम प्रकारसे पकजानेपर वाय<noinclude></noinclude>
k2ecmj7ctv8g94wyfluwlxqcw7u3v9a
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९००
104
165863
418456
2026-09-06T09:52:17Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (८७८) रसरत्नसमुच्चयः । सबको एकत्रित करके तेलको सिद्ध करे । यह तेल पान करने से जठराग्रिको दीपन करता है और मालिस करनेसे त्वचाके विकारोंको दूर करता है । (३२) बिजौरानी... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418456
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८७८)
रसरत्नसमुच्चयः ।
सबको एकत्रित करके तेलको सिद्ध करे । यह तेल पान करने से
जठराग्रिको दीपन करता है और मालिस करनेसे त्वचाके विकारोंको
दूर करता है । (३२) बिजौरानींबू का स्वरस, वचका रस और
ब्राह्मीका रस ये सब समान भाग और सबकी बराबर गौका भी
इनको एकत्र मिलाकर पकावे । जब पककर वृतमात्र शेष रहजाय तब
उतार कर छान लेवे | इस घृतमें विष को मिलाकर सेवन करने से वन्ध्या
स्त्री उत्तम पुत्र पौत्रोंसे सम्पन्न होती है । ( ३३ ) बडी शतावर,
कलिहारी, दन्तोकी जड,
विष और पाषाणभेद इन औषधियोंको जलमें
पीसकर मूहगर्भा स्त्रियों के योनिस्थान में प्रलेप करनेसे शीघ्र गर्भाव
होता है । (३४) देवदारु, विष कटेरी और बच इनको समान भाग
लेकर गोमूत्र पीस करके कल्क बनालेवे । फिर उस कल्कको समान
भाग घृत और चौगुने गोमूत्र में मिलाकर विधिपूर्वक वृतको पकावे ।
यह घृत जिह्वास्तम्भ रोगको दूर करता है और बुद्धिको बढाता
(३५) वत्सनाभ विषको घी, मिश्री और शहद में उत्तम प्रकार से
खरल कर के नेत्रों में आँजनेसे तिमिररोग नष्ट होता है । (३६) केवल
विषको चकरी के दूध में पीसकर कल्क कर लेवे । उस कलड़के द्वारा
घृतको सिद्ध कर के नेत्रोंमें लगानेसेभी तिमिररोग नाश होता है। (३७)
fast आमलों के इसमें अनेक बार भावना देकर उसमें शङ्खका समा
नभाग चूर्ण डालकर खूब बारीक खरल करके अँजन बनालेवे। यह
अञ्जन नेत्रोंमें आंजनेपर बहुत दिनोंके पुराने तिमिर रोग को दूर करता
है । (३८) कन्दविषको दूधमें पीसकर अअन बनाकर आँजनेसे
काचरोग (मोतियाविन्द ) दूर होता है । ( ३९ ) विजौरे नींबू के
इसके साथ वत्सनाभ विष और मिश्रीको पीसकर नेत्रोंमें आँजनेसे
मोतियाबिन्द नष्ट होता है । (४०) विष और पीपलको एक साथ
पीसकर रात्रि के समय ऑजनेसे मोतियाबिन्दु रोग आरोग्य होता है
(४१) विष और पीपलको गोमूत्रमें पीसकर नेत्रोंमें लगाने से नेत्रोंका<noinclude></noinclude>
8wg98kya8zfd5g4fnhovyp0mose0vdu
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२३
104
165864
418457
2026-09-06T09:53:00Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (९०१ ) तुल्यमन्यं रसं तेन पूर्ववन्मर्दितं पचेत् । यावच्छक्यं चतुर्थीशमानेन रसभस्मना ॥ २६ ॥ अम्लपिष्टेन सौवर्ण पत्रमम्लेन मारयेत् । राजिकाधर्धम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418457
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(९०१ )
तुल्यमन्यं रसं तेन पूर्ववन्मर्दितं पचेत् ।
यावच्छक्यं चतुर्थीशमानेन रसभस्मना ॥ २६ ॥
अम्लपिष्टेन सौवर्ण पत्रमम्लेन मारयेत् ।
राजिकाधर्धमारभ्य यावन्माषं विवर्धितः ॥ २७ ॥
चित्रकार्ड कसिन्धूत्थतीक्ष्णासौवर्चलैः सह ।
सेवितः पलपर्यंत रसोऽयं वज्रपञ्जरः ॥
शरण्यः परिभूतानां व्याधिवार्धकमृत्युभिः ॥ २८ ॥
d
होरेकी भस्मके साथ समान भाग शुद्ध पारेके मिलानेको क्षेत्रीक
रण कहते हैं । उस क्षेत्रीकरणको लाल रंगकी लज्जालुके इसमें
घोटकर भूधरपुट में रखकर पकावे । स्वांगशीतल होजानेपर फिर
उसको पूर्ववत् लज्जालुके रसमें खरल करके भूधर पुटमें पकावे !
इस प्रकार पुट देनेसे जब पारेकी भस्म होजाय तब उसको निकाल
कर खरलकर लेवे | पारेकी भस्म १ भाग और सोने के कंटकवेधी पत्र
चार भाग लेकर प्रथम पारेकी भस्मको नींबू के रसमें घोटकर सोने
के पत्रों पर लेप करके उनको भूधरपुटमें पकावे तो सुवर्णभस्म होजाती
है । इसीको वज्रपंचरस तैयार हुआ समझना चाहिये । इस रसको
पहले दिन चौथाई राईकी बराबर दूसरे दिन आधी राई, तीसरे दिन
पौन राई और चौथे दिन १ राईकी बराबर इस प्रकार प्रतिदिन
चौथाई २ राईकी बराबर मात्रा बढ़ाता हुआ एक उडदकी बराबर
तक मात्रा करके फिर प्रतिदिन एक एक उडदकी बरावरही चीता,
अदरख, सैंधानमक, मिरच और कालानमक इनके समानभाग मिश्रित
तीन मासे चूर्ण के साथ सेवन करे । अथवा अपनी प्रकृति और रोगा-
नुसार अनुपान की कल्पना करके उसके साथ सेवन करें। यह वज्र-
पार रस चार तोलेकी मात्रातक सेवन करने से नाना प्रकार के रोग,<noinclude></noinclude>
r8s8p9f8f7c3wcuee845xib08v8qflm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४६
104
165865
418458
2026-09-06T09:54:40Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (९२४ ) रसरत्नसमुच्चयः । भी प्रत्यक्ष फल देती हैं ) प्राचीनकालमें जैसी शारीरिक स्थिति होता थी, उसीके अनुसार औषधियोंमें भी तेज और गुण होता था । और प्राचीनकाल में औषध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418458
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९२४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
भी प्रत्यक्ष फल देती हैं ) प्राचीनकालमें जैसी शारीरिक स्थिति होता
थी, उसीके अनुसार औषधियोंमें भी तेज और गुण होता था । और
प्राचीनकाल में औषधियोंमें जो तेज और गुण होता था. उसको
सहन करने की शक्ति इस समय के शरीरधारियोंमें नहीं रही है ।
इसलिये वर्तमान कालकी औषधियोंमें जितना गुण होने की कल्पना
की जाती है, उतनी तेज और गुण इस समय के प्राणियोंको सहन
करने के लिये काफी है । अतएव रासायनिक औषधियाँ सेवन करनी
चाहिये । उनके सेवनसे शास्त्रोक्त फल मिल सकता है । (२)
बुद्धिमान मनुष्यको औषधियोंकी शक्ति बिलकुल ही क्षोण होगयी
है, ऐसी कल्पना कदापि नहीं करनी चाहिये । क्योंकि मैनफलको
मन कारक और निसातको रेचक गुणवाला जैसा कि शास्त्रकार
पूर्वकालमें लिख गये हैं, उतनी मात्रा से सेवन करायी हुई उक्त दोनों
औषधियों के इस गुण का प्रत्यक्ष रूपसे किस मनुष्यको अनुभव नहीं हुआ
है ? (साधारण रूपसे विचार करनेपर भी यह निश्चय हो सकता है
कि जो मनुष्य ऐसा कहते हैं कि युगके प्रभावसे औषधियोंके गुणोंकी
शक्ति क्षीण हो गई है । कदाचित यह मान लिया जाय कि किसी
औषघिकी शक्ति क्षीण होगयी है । तो क्या सम्पूर्ण वनौषधियों की
शक्ति हीन हो गयी हैं या मानी जा सकती है। युगका प्रभाव अमुक
औषधिपर होता है । और अमुक औषधिषर नहीं होता । यदि यह
बात नहीं होती तो ऊपर कहे हुए वमन, विरेचनादि शुद्धि कार्योंमें
सेवन योग्य बहुतसी औषधियां हैं उनमेंसे कितनी ही औषधियों के
अति प्राचीन कालमें महर्षिगण जितनी मात्रासे सेवन करने से जो
गुण उहोंने लिख गये हैं, उन गुणको आज भी हम प्रत्यक्ष कर रहे
हैं । एवं कितनी एक औषधियां ऐसी हैं कि हम उनके गुणोंको स्पष्ट
जान भी नहीं सकते और वे चिरकालमें हमारे आभ्यन्तरीय सुक्ष्म
अवयवोंपर अपना चमत्कारिक गुण डालकर रोगको निर्मूल
कर देती है । इसलिये किसी प्रकारसे भी औषधियोंकी<noinclude></noinclude>
9f3uz45v9wxqe2sr2psfofasv8pgtfc
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२०
104
165866
418459
2026-09-06T09:56:53Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ६९८ ) रसरत्नसमुच्चयः । O पाक रोग दूर होता है । फूलोंके विना पीपलके पंचांगके १० तोले काढके साथ पीपलके १० तोले बीजों को पीसकर कल्क करलेवे । इस कल्क के साथ १० तोले तेलक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418459
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ६९८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
O
पाक रोग दूर होता है । फूलोंके विना पीपलके पंचांगके १० तोले
काढके साथ पीपलके १० तोले बीजों को पीसकर कल्क करलेवे । इस
कल्क के साथ १० तोले तेलको पकाकर प्रलेप करनेसे बालककी
त्वचा लाल २ चकत्तोंका पडना (पित्ती उछालना ) फुन्सियों का
निकलना, खुजली होना आदि सब रोग शान्त होते हैं। हींग, सौंठ,
पीपल, हरड और सोंफ इन पाँचोंको पंचामृत कहते हैं। इस पंचामृ
तके समान भाग चूर्णको पश्चामृत (दूध, दही, घी, शहद और खाँड )
के साथ मिलाकर बालकोंको थोडा २ चटावे । यह पंचामृत बाल
कोंके सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है, अग्निको अत्यन्त दीपन करता है
और अत्यन्त पाचक है । कुटकी, चीता, त्रिकुटा और कैथली छाल,
हरड, सैंधानक और हींग सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण
करलेवे । इस चूर्णके बराबर दूब और उतनाही घी लेकर सबको
एकत्र करके घृतको सिद्ध करे । यह घृत पान और प्रलेप द्वारा
प्रयोग करनेसे बालकों के गुल्म, आनाह, विलम्बिका, खाँसी, श्वास
अर गुदभ्रंश इन सब व्याधियोंको निश्चण दूर करता है । राई,
हल्दी, घरका धुआँ और कुडेकी छाल इन सबको महेमें पीसकर लेप
करनेसे विचर्चिका, श्वेतकुष्ठ और खुजली तत्काल दूर होती है ।
गिलोय, छोटे पत्तोंकी तुलसी और लाल रंग की लज्जालु इनको समान
भाग लेकर आक के पत्तोंके रसमें खरल करके कल्क बनालेवे । इस
कल्कके और दूधके साथ तेलको पकाकर मालिश करनेसे बाल-
कोंकी सम्पूर्ण ग्रहवाघायें शान्त होती हैं। तेंदू वृक्षकी जड, हाऊ-
रके फूल, लाल रंग की लज्जालु, पीली कटसरैया, करंजकी जड आक के
पत्ते और सफेद आक के फूल इन औषधियों के कल्कके साथ तेलको सिद्ध
करके बालकके शरीर पर मालिश करे तोभी उक्त पीडायें नष्ट होती
कूठ,<noinclude></noinclude>
5v3ekgogb2d88sukiryenifg9l1gwo1
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२१
104
165867
418460
2026-09-06T09:58:20Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ६९९ ) हैं । नीमके पपिलके और ढाकके कोमल पत्तों को लेकर अथवा बेल और ढाक के पत्तोंको लेकर पानीमें पीसकर कल्क करलेवे और वस्त्रमें बाँधकर रस निचोड लेवे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418460
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ६९९ )
हैं । नीमके पपिलके और ढाकके कोमल पत्तों को लेकर अथवा बेल
और ढाक के पत्तोंको लेकर पानीमें पीसकर कल्क करलेवे और वस्त्रमें
बाँधकर रस निचोड लेवे। उस रसके साथ घृत अथवा तेलको पका-
कर पिलानेसे बाटकोंकी समस्त ग्रहवाघायें दूर होती हैं ।। १५१-१६५॥
इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषाटीकायां
द्वाविशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २२ ॥
त्रयोविंशोऽध्यायः ।
'उन्माद रोगः ।
आधिव्याधिकृशस्य दुर्बलतनोराहारतो वा भया-
पूज्यातिक्रमणाद्विषादुपविषाद्दैवादसामर्थ्यतः ।
वैषम्यादपि कर्मणां हृदि मला बुद्वेर्विधायोल्बणं
कालुष्यं हतसौख्यदुःखमथनादुन्मादमातन्वते ॥ १॥
संजल्पको धावति हंति चेतदुन्मा-
दवातस्य च लक्ष्म बोध्यम् ॥ २ ॥
किसी प्रकार के मानसिक अथवा शारीरिक रोग होनेसे शरीर के
अत्यन्त कृश और दुर्बल होजानेसे, भोजनके न मिलनेसे, अकस्मात्
भयभीत होनेसे, इष्ट देवकी पूजामें व्यतिक्रम होनेसे अथवा किसी
पूज्य व्यक्तिका तिरस्कार करनेसे, विष या उपविष के खानेसे, प्रारब्ध-
जति कर्मोंसे, सांसारिक कार्योंके करनेमें असमर्थ होनेके कारण
प्रत्येक कार्य में विषमता होनेसे और हृदयम किसी प्रकारका मैल
अथवा दोष के संचित होनेसे अथवा एकदम किसी भारी हानिके होनेसे
या स्त्री पुत्र आदि प्रियजनों की अधिक मृत्यु होनेके कारण दुःखके
होनेसे जिस मनुष्य की बुद्धि एकदम नाश होजाती है, वह मनुष्य<noinclude></noinclude>
mjl6aw1y971tr7dufxr6jarikixq24b
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४३
104
165868
418461
2026-09-06T09:59:50Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७११) थानोंके ढेर में गाडकर एक महीने तक रक्खा रहने देवे । महीनेभर के बाद कौडियोंको निकालकर बारीक चूर्ण करके कपडछान करलेवे । यह अंजन नेत्रोंके पटला... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418461
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ७११)
थानोंके ढेर में गाडकर एक महीने तक रक्खा रहने देवे । महीनेभर के
बाद कौडियोंको निकालकर बारीक चूर्ण करके कपडछान करलेवे ।
यह अंजन नेत्रोंके पटलादि (पलकों के ) रोगोंके दूर करनेवाला है ।
सोने के पत्र, कौडी और पारा तीनोंको समानभाग लेकर दुर्गन्ध
करंज के पत्तों के रस में खरल करके बत्तियाँ बनालेवे | इस बत्तीको
नैनविकि साथ घिसकर लगानेसे बहुत पुराना नेत्रोंका पुष्परोग, फूला
नष्ट होता है। शुद्ध वत्सनाभ विषको आमलोंके रस या काढमें एक
दिनक भावना देकर उसमें विषके बराबर शंखका चूर्ण डालकर खुब
बारीक खरल करके अंजन बनाले | यह अंजन नेत्रोंमें लगानेसे
मबल तिमिररोगको शीघ्र दूर करता है। शंख अथवा कौडीको भरमको
बारीक पीसकर कपडछान करके अंजन तैयार करे। यह अंजन नैनी-
धीमें मिलाकर नेत्रों में आँजनसे चिरकालके पुष्परोग (फूले ) को
नाश करता है || ७०-७९ ॥
शिशुमूलं वर्चा क्षोद्वैर्दृष्ट्वा नेत्रं प्रपूरयेत् ।
निष्पिष्याss निशां वाथ सद्यः शूले सुखावहः ॥
श्वेतं पुनर्नवामूलं जलेनांज्यं च शूलनुत् ॥ ८० ॥
श्वेतं पुनर्नवामूलं घृतघृष्टं समञ्जयेत् ।
जलखावं निहंत्याशु तन्मूलं व निशायुतम् ॥ ८१ ॥
अरोमाणि न भवंति कदाचन ॥
निर्घृष्यं नृकपालं च नारीस्तन्येन चांजयेत् ॥८२॥
शूलं सतिमिरं हंति पुष्पं सर्पाक्षिदुग्धतः ।
बीजपूररसैर्दृष्टं विषतुल्यं शिलायु॑तम् ॥ ८३ ॥
अंजनं करयेद्वात्रौ काचमांध्यं च नाशयेत् ।
१ सिवा ।<noinclude></noinclude>
l0la8yfjqzvzx3ht0qncagxfq0e7lm5
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६५
104
165869
418462
2026-09-06T10:02:00Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७४३) के मालिशकरनेसे गंज रोग शीघ्र नष्ट होता है । और फिर बडे सुन्दर बाल जमते हैं ॥ ६६-८० ॥ व्रणरोग | दो द्वैः समस्तैश्व साखेस्तैरसृजाऽपि च । त्रणभेदा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418462
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ७४३)
के मालिशकरनेसे गंज रोग शीघ्र नष्ट होता है । और फिर बडे
सुन्दर बाल जमते हैं ॥ ६६-८० ॥
व्रणरोग |
दो द्वैः समस्तैश्व साखेस्तैरसृजाऽपि च ।
त्रणभेदाहंति प्रोक्ता वैद्यशास्त्रविशारदैः ॥८१॥
वात, पित्त, कफ इन तीनों पृथक् पृथक् दोषोंसे अथवा वातपित्त,
कफपित्त, कफवात इन मिश्रित दोषोंसे अथवा त्रिदोषसे था वात,
पित्तादि दोष सहित रक्तविकारसे अथवा केवल रक्तके विकृत होनेसे
व्रण उत्पन्न होते हैं । वैद्यक शास्त्रके विद्वान् वैद्योंने इन प्रकार व्रणों के
भेद कहे हैं ॥ ८१ ॥
जात्यादि घृत |
जातीपत्र पटोलं च निंबोशीरकरंजकम् ।
मंजिष्ठा मधुयष्टीच तुत्थपत्रकसारिवाः ॥८२॥
प्रत्येकं चूर्णयेत्कर्षे पलं द्वादश गोघृतम् ।
घृताच्चतुर्गुणं तोयं पाच्यमाज्यावशेषितम् ॥८३॥
तेनाभ्यंगो मर्मजातान्त्रणान्नाडीव्रणानपि ।
स्रवंति सूक्ष्मरंध्राणि पूरयेन्नात्र संशयः ॥८४॥
चमेली के पत्ते, पटोलपात, नीमके पत्ते, खस, करंज के पत्ते, मंजीठ,
मुलैठी, दतिया, तालीसपत्र और सारिवा ये प्रत्येक औषधि एक २
तोला लेकर सबको एकत्र चूर्ण करलेवे । उस चूर्णको ४८ तोले
गोघृत और घृतसे चौगुने ( अर्थात् १९२ तोले ) जलमें मिलाकर
यथाविधि घृतको पकावे। जब पककर घृतमात्र शेष रहजाय तब उसको
उतारकर छानलेवें । यह घृत शरीर पर मर्दन करने से मर्मस्थानोंमें
उत्पन्न हुए व्रणों, नाडीव्रणों (नासूर ) और स्रवते हुए सूक्ष्म छिद्र-<noinclude></noinclude>
5q1dkdpaz6aynfhxnsts6nnf5jzb22e
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८७
104
165870
418463
2026-09-06T10:03:31Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७६५) है । (३५) आमलोंके रस को दूधमें मिलाकर पीनेसे स्वरभङ्ग (गलेका बैजाना ) रोग दूर होता है । ( ३६ ) देवदारु, पीपल, त्रिकुटा, सोंफ तेजपात, शिलाजीत, वच, सैंध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418463
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७६५)
है । (३५) आमलोंके रस को दूधमें मिलाकर पीनेसे स्वरभङ्ग (गलेका
बैजाना ) रोग दूर होता है । ( ३६ ) देवदारु, पीपल, त्रिकुटा, सोंफ
तेजपात, शिलाजीत, वच, सैंधानमक और सैंजनकी जड सबको समान
भाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपड़छान करलेवे । इस चूर्ण को प्रति-
दिन प्रातः कालमें एक २ तोला परिमाण लेकर शहद और घृतमें
मिलाकर एक महीने तक सेवन करे । इसके सेवन से स्वरभंग रोग दूर
होकर मनुष्य किन्नरोके समान मधुर और उच्चस्वर से गाने लगता है ।
( ३७ ) गलेकी दाह (जलन) को शान्त करनेके लिये सैंधा नमक,
इन्द्रजौ और मिरचोंके चूर्णको एक २ तोला परिमाण गरम जल के
साथ रात्रिमें सेवन करानेसे विशेष उपकार होता है । (३८) करके
बीजोंकी ८ मासे गिरीको गरम जलके साथ पीस कर पान करनेसे
अथवा हरड के चूर्ण को शहद में मिलाकर खानेसे भी गले की जलन दूर
होजाती है । ( ३९ ) खिरैंटी, गंगेरन, कूठ और तन इनके बारीक
चूर्णको भैंस के नैनी घीमें मिलाकर लेप करनेसे स्त्रियोंके स्तन मोटे,
सख्त और स्थिर होजाते हैं । (४०) सारिवा हल्दी, खिरैटी, राई
और नमक सबको समान भाग लेकर अठगुने जलमें पकाकर काय
बनावे, चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । उस काथ में
चौथाई भाग तिलका तेल और तेलसे आधा भैंसका घी डालकर
पकावे । जब पकते २ सब रस जलजाय और स्नेहमात्र शेष रहजाय
तब उतारकर छानलेवे । इस तेलको एक महीनेतक नस्पद्वारा व्यवहार
करने से बाला त्रियोंको शीघ्र यौवन प्राप्त होता है और वृद्धा स्त्रियोंकी
वृद्धता दूर होकर पुनः नवयौवन प्राप्त होता है । (४१) पीलीकट सरै-
याकी छाल के काथ और कल्कके द्वारा तेलको सिद्ध करके लगाने से
खियों के स्तनोंमें उत्पन्न हुआ कुम्भत्रण दूर होता है । (४२) पारेमें
तांबेके चूर्ण को जारण करके मेंहदी, विषखपरा और मेंढा सिंगीके रस में
क्रमसे खरल करके मल्हम बनालेवे । यह मल्हम स्तनोंके व्रणको भरने<noinclude></noinclude>
l39jki8eifylp7qzefz4gxnma9v8xp5
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८०९
104
165871
418464
2026-09-06T10:05:44Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटी कोपेतः । (७८७) कांताभ्रत्रिफला विडंगरजनीताप्यान्ददेवदुम- व्योषैलाग्निपुनर्नवाङ्घ्रिगिरिजांकोलैः समं गुग्गुलुम्। पिट्वा भृंग जलेन सूक्ष्म टिकां खाद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418464
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटी कोपेतः ।
(७८७)
कांताभ्रत्रिफला विडंगरजनीताप्यान्ददेवदुम-
व्योषैलाग्निपुनर्नवाङ्घ्रिगिरिजांकोलैः समं गुग्गुलुम्।
पिट्वा भृंग जलेन सूक्ष्म टिकां खादेद्यथासात्म्यतो
मेदः श्लेष्मसमीरणोल्वणगदेष्वन्येषु वा पुरुषः॥३५॥
कति तुल्यासत्त्वं चरणपरिमितं हेमततुल्य मर्क
वैकति ताप्यरूपं कृमिहर कटुकै स्तुल्य भागैःसमेतम् ।
ली देवद्रुतैलैर्विरचयति नृणां देवसिद्धिं समृद्धां
पथ्यं कल्पो तिमुक्तं हरति चसकलान् रोग पुंजाअवेन ३६
तदेतत्सर्वरोगनं रम्यं कांतरसायनम् ।
सेव्यं वृष्यं सुपुत्रीयं मंगल्य दीपनं परम् ॥३७॥
रात्रौ कांतराव सुचणका भिन्ना जलै स्वादुभिः
प्रातर्मुष्टिमिताः खलु प्रतिदिनं षण्मासमासेविताः ।
हन्युः पित्तकफामयान्बहुविधं कुष्ठं प्रमेहांस्तथा
पाण्डुं यक्ष्मगदं च कामलगदं पथ्यं च तक्रं तथा ३८
त्रिफलामस्तु संयुक्तं कतिं सर्वरसायनम् ॥३९॥
एतत्स्यादपुनभव हि मसित कांतस्य दिव्यामृतं.
सम्यसिद्धरसायनं त्रिकटुकी वेल्लाज्यमध्वन्वितम् ।
हन्यान्निष्कमित जरामरणजव्याधींश्च सत्पुत्रदं
प्रोक्तं श्री गिरिशेन कालयवनोद्धृत्यै पुरातत्पितुः ४०
सिद्धमभ्रं समं कतिं मदयेदाईवारिणा ॥
कलांशं हेमचूर्णस्य बीजपूररसे पुनः ॥४१॥<noinclude></noinclude>
drsuta0bc6mxy9cwn4fx89akdmmjur9
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३२
104
165872
418465
2026-09-06T10:06:51Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८१०) रसरत्नसमुच्चयः । उमापती रसः सोऽयमुमापतिरिवाऽपरः ॥ ५४ ॥ संसिद्धोऽयमुमापतिर्वररसो गुंजामितः सेवितो मासेनैव महामयान्प्रशमयेत्पथ्यादियुक्तिं विना | नित्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418465
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८१०)
रसरत्नसमुच्चयः ।
उमापती रसः सोऽयमुमापतिरिवाऽपरः ॥ ५४ ॥
संसिद्धोऽयमुमापतिर्वररसो गुंजामितः सेवितो
मासेनैव महामयान्प्रशमयेत्पथ्यादियुक्तिं विना |
नित्यं क्षीरघृताशनेन च पुनः संसेविते नाशये-
दब्देनैव जरां वलीपलितकैर्दद्याच्छतान्दं वयः ॥ ५९ ॥
काली अभ्रकका धान्याचक बनाकर ४० तोले लेकर उसमें नीला-
थोथा, सोनामाखीका बारोकचूर्ण और फूला हुआ सुहागा ये तीनों
समान भाग मिश्रित ४० तोले तथा बकरेकी हड्डीका चूर्ण १० तोले
एवं गुड, चोटली और शुद्ध गूगल ये प्रत्येक ५-५ सोले डालकर
सबको बकरी के दूध, दही, घी, लीद और मूत्र इस प्रत्येक के साथ
बारीक पीसकर भाँगरेके रसमें खरल करके बड़े बड़े गोले बनाकर
सुखालेवे । फिर मिट्टी के एक नवीन पात्रमें उन गोलको रखकर उस
पात्रके मुखपर ढक्कन ढक करके जलमें पीसी हुई पीली मिट्टीसे सन्धि-
योंको बन्द करके सुखालेवे । और गजपुटमें रखकर तीक्षण अनि देवे ।
जब स्वांगशीतल होजाय तब रसको निकाल कर बारीक चूर्ण कर-
लेवे । इस प्रकार जबतक अभ्रक निश्चन्द्र न हो तबतक उसको उपर्युक्त
औषधियोंके साथ मिलाकर और भाँगरेके रसमें घोट २ कर गजपुट
देवे तो महाभ्रसव सिद्ध होता है । यह एक महाअसत्वही संपूर्ण
रोगोंको नाश करनेवाला है। इस महाभ्रसवको त्रिफलेके हाथ के साथ
१० बार गजपुट देने से महाभ्रसवकी शुद्ध भस्म होती है । इस प्रकार
की हुई महासत्त्वकी भस्म १६ मासे, उत्तम प्रकारसे की हुई पारेकी
भस्म ४ मासे, शुद्ध गन्धक ४ मासे और त्रिफलेका चूर्ण १२ मासे
इन चारोंको कान्त लोहके पात्रमें एकत्रित करके घृत और मिश्रीमें
मिलाकर आठ प्रहर ( १२ घंटे ) तक अच्छे प्रकार से घोटे, फिर उस
कल्कको कान्तलोहकी बनी हुई डिचियामें भरकर रखदेवे । यह उमा-<noinclude></noinclude>
bsn0ca0gpujvae2rv73lqtvdhlj8od6
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५६
104
165873
418466
2026-09-06T10:08:05Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८३४ ) रसरत्नसमुच्चयः । 1 पक्कं यावन्निरुत्थानं सेव्यं वारिंतरं हि तत्। कांत पुनः कला भागताप्ये सक्षोद्रसर्पिषि ॥ १३ ॥ क्षिप्तमावर्तत तारं स्वप्रमाणं भवेद्यदि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418466
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८३४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
1
पक्कं यावन्निरुत्थानं सेव्यं वारिंतरं हि तत्।
कांत पुनः कला भागताप्ये सक्षोद्रसर्पिषि ॥ १३ ॥
क्षिप्तमावर्तत तारं स्वप्रमाणं भवेद्यदि ।
जानीयात्तन्निरुत्थानं सोत्थानं च मुहुर्मुहुः ॥
त्रिफलाकाथसंपृक्तं विपचेत्पुटपावके ॥ १४ ॥
अल्पमात्रामें प्रयोग करनेसे अधिक लाभ करता है, अरुचिको नष्ट
करता है और मनुष्यको शीघ्र आरोग्य प्रदान करता है, इस लिये
रस सब औषधियोंसे अधिक श्रेष्ठ होता है । लोहभस्म, कन्द विष और
पारा इत्यादिको शास्त्रोक्त विधिसे मिश्रित करनेको रस कहते हैं सोने के
पत्रको पिघलाकर उसमें १६ वाँ भाग सीसा मिला लेवे फिर नदीका
गार, स्वेतकी मिट्टी, ईंटकी मिट्टी, खडिया, मिट्टी और बैंबई की मिट्टी
इन पाँचों मिट्टीयोंको समान भाग लेकर नागरपानके हाथ से घोटकर
उस मिट्टीका उक्त सोनेके पत्रोंपर लेप करके गजपुटमें पकावे तो
सुवर्ण शुद्ध होता है । पानका क्वाथ बनानेकी विधि यह है- पानोंको
१६ गुने पानी में डालकर पकावे । जब १६ वाँ भाग जल शेष रहे तब
उतारकर छानले । थूहरका दूध, आकका दूध, सेंधानमक और
जवाखार इन सबको काँजीमें अथवा नींबू के रसमें घोटकर उसका
चाँदी के पत्रोंपर लेप करके उनको ऊर्ध्व अनिके द्वारा फूँके तो चाँदी
शुद्ध होती है । ताँबेके पत्रोंको बारम्बार तपाकर बार बार निर्गुण्डीके
रसमें बुझावे । इस प्रकार सात बार करनेसे ताँबा शुद्ध होता है ।
बंग अथवा सीसेको पिघलाकर सात बार निर्गुण्डीके रसमें बुझावे ।
फिर उसको एक मिट्टी के वर्त्तनमें डालकर अग्निपर पिघलावे, जब वह
पिघलकर पतला होजाय तब उसको निगुण्डी की जडसे घोटे । घोटते २
जब बारीक चूर्ण होजाय तब उसको शुद्ध हुआ जानना चाहिये। फिर<noinclude></noinclude>
8ft30lmcf4l8j6tt1hlvxo3ncsapg6m
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८७९
104
165874
418467
2026-09-06T10:11:26Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । f ( ८५७) चिढन, चीता, दारचीनी, त्रिफला, पाँचों नमक औ' त्रिकुटा ये प्रत्येक चार २ तोले, जिमीकन्दका चूर्ण १२ तोले, वाराहीकन्द १६ तोले, विधायरा १६ तोले और शह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418467
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
f
( ८५७)
चिढन, चीता, दारचीनी, त्रिफला, पाँचों नमक औ' त्रिकुटा ये प्रत्येक
चार २ तोले, जिमीकन्दका चूर्ण १२ तोले, वाराहीकन्द १६ तोले,
विधायरा १६ तोले और शहद ३२ तोले डालकर मिलादेवे । इस रसा-
यनको प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा भोजन के समय चाटे । यह ग्रहणी,
अर्श, शूल, गुल्म, काम और क्षय इन सब रोगोंको नष्ट करती है ।
(१३) अंकोल के बीज, लोहभस्म, माणिकभस्म, सुहागा, सैंधानमक,
सोनामाखीकी भस्म, अदरख, त्रिकुटा, तूतिया, शिलाजीत इन सबको
समान भाग लेकर भांगरे के रसमें खरल करके मसूरकी बराबर गोलि-
याँ बनालेवे इस रसको वृद्धावस्थाके जीतनेके लिये और सम्पूर्ण व्या-
धियोंको नाश करनेके लिये सेवन करना चाहिये । (१४) अंकोलके
बीज, वायविडङ्ग, अभ्रक भस्म, कान्तलोहभस्म, सुवर्णमाक्षिक भस्म,
शिलाजीत, त्रिकुटा, त्रिफला और मुसली इनके समानभाग मिश्रित
चूर्णको शहद मिलाकर सेवन करनेसे समस्त कुष्ठ नष्ट होते हैं ।
( १५ ) कान्सलोह भस्म, अभ्रकभस्म, त्रिफला, वायविडंग, हल्दी,
सोनामाखीकी भस्म, नागरमोथा, देवदार, त्रिकुटा, इलायची, चीता,
पुनर्नवाकी जड, शिलाजीत, और अंकोलके बीज इन सबको समान
भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके कपड़छान करले । फिर उस चूर्णके
बराबर भाग शुद्ध गूगल मिलाकर भाँगरके रसमें खरल करके छोटी
छोटी (१-१ मासेकी ) गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको अपनी
प्रकृतिके अनुकूल उचित मात्रासे मेद (चवीं) कफ और वात इनके
भयंकर विकारों तथा अन्यान्य रोगोंमें सेवन करनेवाला मनुष्य भारो-
लाभ करता है । ( १६ ) त्रिकुटा, काले तिल, विजयसारके फूल,
मण्डूर भस्म, कटसरैयाके बीज, हल्दी, लसोडे, मिश्री, निस्रोत वाय-
विडंग, भाँगरा, मिलावे, शतावर, बापची और कान्तलोहकी भस्म इन
सबको समान भाग लेकर एकत्र कूटपीस करके कपड़छान कर लेवे<noinclude></noinclude>
0i0djtoycl7wha3z99bu98mduoe98po
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०१
104
165875
418468
2026-09-06T10:14:12Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८७९) फूला और अर्मरोग दूर होता है । (४२) समुद्रफेन, फटकरी, नागरमोथा रसौत और कछुएकी पीठका चमडा ये प्रत्येक एक एक सोला, मैनसिल २॥ सोले, विरच, सेंधानमक और... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418468
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८७९)
फूला और अर्मरोग दूर होता है । (४२) समुद्रफेन, फटकरी, नागरमोथा
रसौत और कछुएकी पीठका चमडा ये प्रत्येक एक एक सोला, मैनसिल
२॥ सोले, विरच, सेंधानमक और लोह चूर्ण में तीनों २॥ तोले, वत्सनाभ
विष यथोसर क्रमसे लोहेकी बराबर अर्थात् ७५ रत्तीभर और घरका
धुआं १ तोला इन सबको एकत्र खरल करके बकरके मूत्रमें पीसे । फिर
उसका गोलाता बनाकर उसको अण्डके पत्तोंमें लपेट करके ऊपरसे
कपरौटीकर अग्ग़िमें पकाये। जब मिट्टी पककर लाल होजाय तब उसको
निकालकर शीतल होजानेपर उसमें उक्त कल्क के गोलेको निकाल-
करके अंजनके समान बारीक चूर्ण करलेवे। इस अञ्जनको शहद में
मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे सफेद फूला, बाहरको निकलाहुआ डेला
जाला, मोतियाविन्द आदि सब नेत्ररोग नष्ट होते हैं। विषधी औषधको
नेत्रोंमें लगानेपर निरम्बर शीतलजलसे नेत्रोंको धोना चाहिये ४७-९२
विषके अन्य सामान्य प्रयोग |
भातकानिशम्याकविषैर्वा मूत्रपेषितैः ।
लेपो विचर्चिकाद्दुरसिका किंटि भापहः ॥ ९३ ॥
शम्याकपत्रत्वमूलं विषं तकं च तद्गुणम् ॥९४॥
विषा तुंबरूबाजानि वाजिगंधाऽम्लवेतसम् ।
हरिद्रा वायसी रास्ना हरिताल मनःशिला ॥९५॥
पटोलनिंबपत्राणि कणागंध कसैंधवम् ।
बिषं दारु शिरीषास्थि तक्रं लेपेन कुष्ठजित ॥९६॥
करञ्जकरवीरार्कमालतीरक्तचंदनेः ।
आस्फोटा कुष्ठमंजिष्ठा सप्तच्छदनिशानतैः ॥ ९७ ॥<noinclude></noinclude>
d8ks222n3p6zeqwq0ayrgn23wsq5u8k
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२४
104
165876
418469
2026-09-06T10:14:51Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (९०२ ) रसरत्नसमुच्चयः ।- वृद्धावस्था और मृत्युके भयके कारण व्याकुल हुए प्राणियोंकी रक्षा करनेवाला है ।। २५-२८ ॥ पञ्चामृतरस । हेममाक्षिककांताभ्रवज्र भस्म प्रवेश... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418469
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९०२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।-
वृद्धावस्था और मृत्युके भयके कारण व्याकुल हुए प्राणियोंकी रक्षा
करनेवाला है ।। २५-२८ ॥
पञ्चामृतरस ।
हेममाक्षिककांताभ्रवज्र भस्म प्रवेशयेत् ।
रसे सहेनि सप्ताहं मूलिकारसमर्दिताम् ॥ २९ ॥
तां पिष्टीं यन्त्रयोगेन पचेत्पञ्चामृताह्वयः ।
सोऽयं मधुसर्पिर्भ्यां युक्तः पूर्वाऽधिकोगुणैः ॥ ३० ॥
एक भाग शुद्ध पारे में समान भाग सोनेके वर्क डालकर इस प्रकार
घोटे कि दोनों मिलकर एकमे एक होजायें। फिर उस पिडीमें सोनामाखी
की भस्म, कान्तलोहकी भस्म, अभ्रक भस्म और होरेकी भस्म ये
प्रत्येक एक एक भाग डालकर सबको सात दिन तक मूली के रस में
खरल करे। फिर उसका गोला बनाकर सुखालेवे और भूधरपुटमें रख
कर मन्द मन्द अभिसे थोडी देर तक पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय
चब उसको निकालकर बारीक चूर्ण करके शीशीमें भरकर रखदेवे ।
इस पश्चामृत नामक रसको योग्यमात्रासे मधु और घीके साथ मिल-
कर सेवन करे। यह रस पूर्वोक्त वज्रपञ्जर रस के गुणोंसेमी अधिक गुण
करनेवाला है || २९ || ३० ॥
मृतसञ्जीवनीवटी ।
कांताभ्रताप्यसत्वानां वज्रदेशो रसस्य च ।
सप्ताहम ग्लपिष्टानां गोल के लेपितेऽन्वहम् ॥३१॥
गोजिह्वा वायसी पथ्या निर्गुडी मधु सैंधवम् ।
स्विन्ने भूमध्ययंत्रस्थे पक्षात्कठिनतां गते ॥ ३२ ॥
यवचिचापलाशाक्षराजिकार्पासतंदुलैः ।
आवर्तितान्तर्लिप्तायां मूषायां खदिराग्निना ॥ ३३ ॥<noinclude></noinclude>
japivuovqgh4k419sgzt5h6mlxcywr2
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४७
104
165877
418470
2026-09-06T10:17:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः ( ९२५ ) शक्तिको हीन समझना बुद्धिमान् मनुष्यों की बुद्धिकी हीनता कहा जा सकता है । (३) देश, कालका विचार किये बिना और अपनी प्रकृ तिके विरुद्ध, तथा अत्यन्त... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418470
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः
( ९२५ )
शक्तिको हीन समझना बुद्धिमान् मनुष्यों की बुद्धिकी हीनता कहा जा
सकता है । (३) देश, कालका विचार किये बिना और अपनी प्रकृ
तिके विरुद्ध, तथा अत्यन्त उष्ण और अत्यन्त तीक्ष्ण औषधियाँ जैसे
सेवन करतेही एकदम शरीरका नाश करदेती हैं। उसी प्रकार देश,
काल, प्रकृति आदिका विचार करके विधिपूर्वक सेवन की हुई औषध
उत्तम प्रकार से शरीर की वृद्धि और पुष्टि करती है। इसलिये दुष्ट इन्द्रि
योंको जीतकर देना, काल आदिका विचार करके श्रद्धा के साथ विधि-
पूर्वक औषधियों का उपयोग करना चाहिये । एवं आयु, बुद्धि और
तेजकी अत्यन्त वृद्धि होने के लिये बुद्धिमान मनुष्यको शास्त्रों पर विश्वास
रखकर उत्तम वर्यिवर्द्धक औषधियाँ सेवन करनी चाहिये। (४) जो शास्त्र के
अनुसार औषधिका सेवन करता हो. समीपवर्त्ती मनुष्य उसके मनका
अभिप्राय जाननेवाले हो और सम्पूर्ण कार्योंमें अखण्ड बुद्धि रखता
हो, वह मनुष्य वास्तवमें रसायनके गुणोंको पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।
सत्पात्रको दान देना, सम्पूर्ण मनुष्योंके लिये प्रिय शान्त स्वभाव
रखना, दयालु होना, सत्य बोलना, ब्रह्मचर्य पालन करना, दूसरेके
किये हुये उपकारको मानना, उत्तम प्रकारकी शास्त्रीय रसायन औषधि-
योको सेवन करना और सब मनुष्योंके साथ सच्ची मित्रता करना ये सब
बातें पुण्य और बढानेवाली हैं। इस लिये शास्त्रद्वारा सिद्ध होनेसे और
प्रत्यक्ष फल देनेसे औषधको मन्त्रके समान प्रयोग करना चाहिये ।
उसमें किसी प्रकारका संशय या तर्क वितर्क कदापि नहीं करना चाहिये।
(५) मूर्ख (शास्त्रज्ञान और गुरुज्ञानसे विमुख ) वैद्य नाना प्रकारकी
चतुराईयों से अर्थात् चालाकीसे रोगीको लुभाते हैं। ऐसे प्रपश्चियों से
सदैव अपनी आत्माकी रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि यह मनुष्य जन्म
पाना बहुत ही दुर्लभ है। वे मूर्ख वैद्य कदाचित् घुणाक्षर न्यायके समान<noinclude></noinclude>
de9cygqfwydtnzexjo8o6gk06rzaahm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४४
104
165878
418471
2026-09-06T10:20:08Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । कृष्णस्याजस्य मांसांतः पिप्पलीमरिचं क्षिपेत् ॥ ८४ ॥ सीवयित्वा घृतैः पच्याद्वटिकांते समुद्धरेत् । मध्वाज्यस्तन्यसंपिष्ट रात्र्यंधस्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418471
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७१२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
कृष्णस्याजस्य मांसांतः पिप्पलीमरिचं क्षिपेत् ॥ ८४ ॥
सीवयित्वा घृतैः पच्याद्वटिकांते समुद्धरेत् ।
मध्वाज्यस्तन्यसंपिष्ट रात्र्यंधस्यांजनं हितम् ॥८५॥
असकृच्छीततोयेन सिन्नेत्राभिष्यंदजित् ।
अजापित्तगतं व्योषं धूमस्थाने विशोष्य च ॥ ८६ ॥
चिरबिल्वर सैर्दृष्टं राज्यंधल्याञ्जनं हितम् ।
मरिचं मत्कुणे रक्ते रात्र्यं धहरमञ्जनम् ॥ ८७ ॥
irantarः सुतः सौवीरं चाष्टमांशतः ।
कपित्थर ससंपिष्टमअनं तिमिरप्रणुत् ॥ ८८ ॥
सैंज की जड और बचको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके
शहदके साथ खरल करे । इस रगडेको नेत्रोंमें भरने से अथवा गीली
हल्दीको जलमें पीसकर नेत्रोंमें ऑजनेसे नेत्रोंके शूलरोगमें तत्काल
आरोग्यलाभ होता है | अथवा सफेद पुनर्नवा (विषखपरे ) की जडको
जलमें पीसकर ऑजे तो नेत्रशूल दूर होता है और श्वेत पुनर्नवा की
जडको धीमें घिसकर आँजनेसे नेत्रोंमेंसे जलका बहना शीघ्र दूर होता
है । एवं श्वेत पुनर्नवाकी जड और हल्दी को एकत्र जलमें बारीक पीस-
कर नेत्रों में आँजने से मुँह के ऊपर बाल (मूँछे, दाढी कभी नहीं जमते ।
मनुष्य की खोपडी की हड्डीको स्त्रीके दूधमें घिसकर नेत्रोंमें आँजने से
नेत्रोंकी पीडा और अन्धकारसा छाया रहना शीघ्र दूर होता है । और
नकुलकन्दको दूधमें पीसकर ऑजनसे आँखोंका फूला दूर होता है ।
शुद्ध मीठा तेलिया और मैनसिल दोनोंको समान भाग लेकर बिजौरे
नींबू के समें अजनके समान खूब बारीक खरल करे । इस अंजनको
रात्रिम नेत्रोंमें आँजने से मोतियाबिन्द और रतौंधा दूर होता है । काले<noinclude></noinclude>
2d20q710grd0m1n2lzyp10hxp8eqw1p
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६६
104
165879
418472
2026-09-06T10:20:58Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७४४ ) रसरत्नसमुच्चयः । वाले व्रणोंको साफ करके अवश्य भर देता है ॥ ८२-८४ ॥ सामान्य उपाय | शुल्बचूर्ण रसे जीर्ण मदयंती पुनर्नवे । मेष शृंगीरसश्चैतद्रणशोधनरोपणम् ॥ ८... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418472
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७४४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
वाले व्रणोंको साफ करके अवश्य भर देता है ॥ ८२-८४ ॥
सामान्य उपाय |
शुल्बचूर्ण रसे जीर्ण मदयंती पुनर्नवे ।
मेष शृंगीरसश्चैतद्रणशोधनरोपणम् ॥ ८५ ॥
पटोली निंबपत्रं च मधुयष्टी निशा तिलाः ।
त्रिवृतीरसैः पिता पूरयेद्रणरोपणम् ॥
निंबपत्रं तिलं पिट्वा पूरयेन्मधुसर्पिषा ॥ ८६ ॥
अपामार्गस्य पत्रोत्थरसेनाऽऽपूरयेद्वणम् !
किंवा तद्वीजचूर्णेन वणं दुष्टं प्ररोहयेत् ॥८७॥
पुरातन डैस्तुल्यं टंकणं सूक्ष्मचूर्णितम् ।
तद्वयी पुरयेद्गूढं व्रणं शीघ्रतरं महत् ॥८८॥
पारदस्य त्रयो भागाः कमलस्यैकविंशतिः ।
जंबीराम्लेन तत्पिष्टं माणिमन्थस्य सप्त च ॥८९॥
नवभिर्गधकस्यशिभृंगसारेण मर्दयेत् ।
सप्ताहमातपे तीत्रे धारितं शस्त्रवल्लिखेत् ॥९०॥
पारा, ताँबेका चुरा में दही, पुनर्नवा और मेढासिंगीका रस इन
सबको समानभाग लेकर प्रथम पारेके साथ ताँबेके चूर्णको मिलाकर
खरल करे, जब दोनों मिलकर एकमें एक होजायँ तब उनको उक्त
औषधियोंके रसमें घोटकर रखलेवे । इस औषधको पानी में घोलकर
लगानेसे ऋण शुद्ध होकर शोघ्र भरजाता है । अथवा पटोलपात, नीम के
पत्ते, मुलैठी, हल्दी तिल और निसोत इन सबको दन्तीके रस में पीस-
कर व्रणपर लगानेसे व्रण शीघ्र भरकर सूख जाता है । नीमके पत्ते<noinclude></noinclude>
8qt9kn3lqkizgptm7uiz25gf5xzz3y5
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८८
104
165880
418473
2026-09-06T10:21:35Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७६६ ) रसरत्नसमुच्चयः । और सुखानेवाला है । (४३) रविवार के दिन धतूरे के फूलोंको लाकर उनमें से जितनी इच्छा हो उतने फूल खावे । उसदिन मनुष्य जितने खावेगा तो उसके उतनेही... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418473
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७६६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
और सुखानेवाला है । (४३) रविवार के दिन धतूरे के फूलोंको लाकर
उनमें से जितनी इच्छा हो उतने फूल खावे । उसदिन मनुष्य जितने
खावेगा तो उसके उतनेही वर्ष तक स्नायुरोग (नहरूआ ) उत्पन्न
न होगा । यह सिद्ध पुरुषोंका कहा हुआ योग है, इस लिये इसमें
कुछभी सन्देह नहीं है ॥ ३६-५१ ॥
फूल
लीप हररस ।
ताम्र भस्मसमं सूतं शुद्धं मर्च दिनत्रयम् ।
नागवल्लीमेघनादपाठापौनर्न वद्रवैः ॥५२॥
गोमूत्रे मर्दयेद्राढं चत्रयंत्रे दिनं पचेत् ।
मासैकं भक्षयेत्क्षौद्रैः श्लीपदी च पिबेदनु ॥५३॥
खादिरं शल्लकीकाष्ठं क्षौद्रं चाशनकाष्टकम् ।
गवां मूत्रैः समं पिट्वापिबेच्छ्रीपदनाशनम् ॥ ५३ ॥
(४४) तांबेको भस्म और शुद्ध पारा दोनों को समान भाग लेकर
एकत्र मर्दन करके नागर वेलके पान, चौलाई, पाढ और विष खपरा
इनके रसमें तीन दिन तक खरल करे । फिर तीन दिन तक गोमूत्र में
उत्तम प्रकारसे मर्दन करके चक्रयन्त्रमें रखकर एक दिन तक पकावे ।
फिर बारीक पीसकर रखलेवे । यदि श्लीपद (पीलपाया ) रोग से ग्रस्त
मनुष्य इस औषधको प्रतिदिन एक २ मासा परिमाण, शहद में मिला-
कर सेवन करे और पीछेसे खैरखार, सालईकी जड और विजयता-
रकी जड तीनोंको गोमूत्रमें पीसकर और शहद डालकर अनुपानरू-
पसे सेवन करे तो श्लीपदरोग नाशको प्राप्त होताहै ॥ ५२-५४ ॥
श्लीपदहर लेप |
गुडूची कटुका शुंठी देवदारु विडंगकम् ।
पिवा गोमूत्रसंयुक्तो लेपः श्रीपदनाशनः ॥ ५५ ॥<noinclude></noinclude>
p6ab4s3j9d0qnycv9mxp0kun2tzfemy
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१०
104
165881
418474
2026-09-06T10:22:27Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७८८ ) रसरत्नसमुच्चयः । मर्दयेत्खत्वमध्यस्थं यावत्सप्तदिनावधि । आढरूषरसेनैव तथा मुण्डीरसेन वा ॥ ४२ ॥ तालमूलीरसेनैव दशमूलीरसेन वा । तत्तद्रोगहरैः काथैर्भावय... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418474
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७८८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
मर्दयेत्खत्वमध्यस्थं यावत्सप्तदिनावधि ।
आढरूषरसेनैव तथा मुण्डीरसेन वा ॥ ४२ ॥
तालमूलीरसेनैव दशमूलीरसेन वा ।
तत्तद्रोगहरैः काथैर्भावयेत्सप्तधा भिषक् ॥४३॥
त्रिफलान्योषचूर्ण व मध्वाज्याभ्यां प्रयोजयेत् ।
पञ्चकर्म विशुद्धेन सेव्यमेतद्वलायनम् ||१४||
पाण्डुशोफोदराना हग्रहणीशोष कासजित् ।
संततं सततं चैव पुराणं विषमं ज्वरम् ॥४५॥
निहन्यात्सर्वकुष्ठानि प्रमेहान्विशति जयेत् ।
कांताभ्रकमिदं प्रोक्तं रसायनमनुत्तमम् ॥ ४३ ॥
पालाशोलूखले तन्मलवियुजि विमद्यहृतैराढ-
काँशैर्मिश्रं ब्राह्मीरसैस्तैर्विधिवदिह पवेत्प्रस्थमात्रं
गवाज्यम् । पाठाधात्रीहरिद्वात्रिवृदु पर चितेनापि
कल्केन सिद्धं योवा कीटारिकृष्णासलवणजटिला-
भिर्विलीढःसदास्यात् ॥ सौकर्यः सप्तरात्रान्मतिम-
तिविशदां पक्षतो मासमात्राच्चातुर्ये सत्कवित्वं
· वरसकलकलाऽभिज्ञतां प्राप्नुयात्सः ॥१७॥
ताप्याभ्रकत्रिकटुतुत्थशिलाजकांतमं को छलोहम-
लटंकण सैंधवं च । भृंगीरसेन वटकांश्च मसू-
रमात्रान्खादेद्रसायनवरं सकलामय घ्रम् ॥४८॥
( ९ ) मालकांगनी नामवाली लता (बेल) पीले रंगकी,
पीले फलवाली और अत्यन्त उज्ज्वल होती है । उस माल-<noinclude></noinclude>
mv549w30rewyez9plseqhjf4xnwktps
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३३
104
165882
418475
2026-09-06T10:23:03Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भावाटीकोपेतः । ( ८११) पति रस दूसरे उमापति ( महादेवजी) के समान अमोघ फलको देने वाला है । इस प्रकार उत्तम प्रकारसे सिद्ध किया हुआ यह उमापति रस एक २ रत्ती परिमाण एक महीने... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418475
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भावाटीकोपेतः ।
( ८११)
पति रस दूसरे उमापति ( महादेवजी) के समान अमोघ फलको देने
वाला है । इस प्रकार उत्तम प्रकारसे सिद्ध किया हुआ यह उमापति
रस एक २ रत्ती परिमाण एक महीनेतक सेवन करनेसे और बिना
किसी परहेजके कियेही बडे बडे भयंकर रोगोंको शीघ्र शमन करता
है । एवं नित्यप्रति दूध, घी, खाँड, भात आदि पदार्थोंका भोजन
करके एक वर्षतक इस रसको सेवन करे तो यह उस वृद्धावस्था और
बली पलित रोगको नाश करता है और १०० वर्षकी पूर्ण आयुप्र-
दान करता है || ४६-५५ ॥
महाकनकसुन्दर रस !
कांतकांचनगंघाश्मजा रितं मारितं रसम् ।
चतुर्निष्कमितं चाथ स्वर्ण निष्कमितं मृतम् ॥५६॥
निक्षिप्य कांतपात्रे तु पञ्चाशन्निष्कसंमितम् ।
जारयेद्धकं शुद्धमन्धेन वडवाग्निना ॥ ५७ ॥
निष्कतुल्यमिदं चूर्ण लक्ष्णीकृत्य प्रयत्नतः ।
निक्षिपेन्मधु संपूर्ण घृत स्निग्धभाण्डके ॥ ५८ ॥
अधुनैव प्रकारेण पथ्यानां षष्टिसंयुतम् ।
त्रिशतं साधयेद्यत्नाच्छास्त्रदृष्टविधानतः ॥ १९ ॥
त्रिधा विभज्य तत्रैकां समादाय हरीतकीम् ।
एकपादं दिनाभ्यां च द्वितीयं दिवसैस्त्रिभिः ॥ ६० ॥
तृतीयं च ततः पादं चतुर्भिर्दिव से भजेत् ।
एकैकां च ततः पर्थ्यां भजेदावत्सरं नरः ॥ ६३ ॥
जीवेद्वर्षशतं सायं वलीपलितवर्जितः ।
सर्वव्याधिविनिमुक्तो नित्यं स्त्रीशतसेवकः ॥ ६२ ॥
बलवान्वीर्यवांश्चैव पूर्णसर्वेद्रियोदयः ।<noinclude></noinclude>
9jgmpm8fwb88wdvb7ug7pvx3exkwgti
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५७
104
165883
418476
2026-09-06T10:24:46Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८३५) जिस औषधि के साथ उसको भस्म करना हो, उसके रसमें घोटकर देवे । जस्त को भी इसी प्रकार शुद्ध करना चाहिये। जिस पात्रमें भरे • हुये पानी में डालीहुई ते... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418476
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८३५)
जिस औषधि के साथ उसको भस्म करना हो, उसके रसमें घोटकर
देवे । जस्त को भी इसी प्रकार शुद्ध करना चाहिये। जिस पात्रमें भरे
• हुये पानी में डालीहुई तेल की बूँद नहीं फैलती जैसीकी तैसी रहती है
और जो तारसे हिलानेसे चलती है, वह कान्तलोह सब प्रकारके लो-
हमें उत्तम कहा जाता है। उसके बारीक पत्र बनाकर तपा तपा करके
त्रिफले के काथमें बुझावे तो कान्तलोह शुद्ध होता है । तीक्ष्णलोह अथवा
अन्यसाधारण लोहभी इसी प्रकार शुद्ध होते हैं । जिस धातुओंको
शुद्ध करना हो तो प्रथम उसके बारीक १ पत्र करके किसी खटाई के
साथ एक दिनतक घोटे, फिर भस्म करनेवाली धातुसे चौथाई भाग
पारेकी भस्म लेकर उसको खटाईमें घोटकर उपर्युक्त धातुके साथ १
दिन तक खरल करके गोला बनालेवे और उसको सुखाकर गजपुटमें
पकावे । इस प्रकार सात वार पुट देवे सब प्रकारको धातुयें शुद्ध हो-
जाती हैं । अथवा जिस धातुको भस्म करनी हो तो प्रथम उसके कैट-
कवेधी पत्र बनालेवे । फिर सोनामाखी, गन्धक और पारा इन तीनों-
को समानभाग मिश्रित पत्रोंकी बराबर लेकर खटाईम खरल करके
उक्त पत्रोंपर लेपकर गजपुटमें पकावे। इसप्रकार सुवर्ण माक्षिक आदि
औषधियोंका लेप करके सातबार पुट देनेसे भस्म होजाती है ।
सुवर्णमाक्षिक आदि औषधियाँ पहले पुटमें जितनी मिलाई गई हो,
उतनी ही प्रत्येक पुटमें मिलानी चाहिये। सोनेसे १६ वाँ भाग सोसेकी
भस्म लेकर उसको थूहर के दूधमें पीसकर सोनेके पत्रोंपर लेपकरके
गजपुटमें पकावे । इस प्रकार सातबार गजपुट देनेसे उत्तम भस्म होती
है। चाँदीके पत्रोंसे अष्टमांश हरताल लेकर उसको थूहर के दूधमें खरल
करके पत्रोंपर लेपकर सातवार गजपुट देनेसे चाँदीकी उत्तम भस्म
होती है । ताँबे के पत्रों की बराबर गन्धक लेकर उसको गोमूत्र और
खटाई में १ दिनतक घोटकर उक्त पत्रोंपर लेपकरके गजपुटमें पकावे ।
इस प्रकार सातपुट देनेसे ताँबा भस्म होजाता है । यदि उस भस्मके<noinclude></noinclude>
n5jrva1no9d7qd0sxjdx2lspk7awvap
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८०
104
165884
418477
2026-09-06T10:25:26Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८५८ ) रसरत्नसमुच्चयः । और कान्तलोह के पात्र में भरकर रख देवे । इस उत्तम रसायनको मधु और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे कुष्ठ रोग दूर होता है । ( १७ ) मण्डूरकी भस्म, त्रिफल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418477
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८५८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
और कान्तलोह के पात्र में भरकर रख देवे । इस उत्तम रसायनको मधु
और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे कुष्ठ रोग दूर होता है । ( १७ )
मण्डूरकी भस्म, त्रिफला, काले तिल, जायफल, वायविडंग, नकुल
कन्द, बापची, अभ्रक भस्म, कान्त लोहभस्म, गन्धक, हल्दी, मुलैठी का
सत्त्व और पित्तपापडा इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके
भाँगरेके रस में पीसकर बड़े बनालेवे और उनको दूषमें पकालेवे । फिर
सम्पूर्ण व्याधियोंको हरनेवाले उत्तम रसायन और मृत्युको भी नाश
करनेवाले इन षडोंको यथोचित मात्रासे सेवन करे । (१८) चुम्बक
लोहका चूर्ण १ भाग और सीसेका चूर्ण दो भाग दोनों को एकत्र खरल
करके एक कपडे में बाँधकर पोटली बना लेवे । उस पोटलीको एक
पात्रमें भरे हुये कमलके पत्तोंके और आमलोंके समानभाग मिश्रित
रसमें अधर लटकाकर तीन दिन तक रकले। फिर चौथे दिन पोटली-
मेंसे उस चूर्णको निकालकर भाँगरेके रससे घोटलेवे । फिर एक कठा-
ईमें उक्त चूर्ण से छःगुना लाल चौलाईका रस भरकर उसमें उस चूर्ण
को डालकर पकाने और लकडीकी करछी से चलाता जावे जब वह
पककर कल्कके समान होजाय तब उसको उतारकर शीतल होजा-
नेपर छानलेवे। इसके पश्चात् उस लुगदी को छोटी यूषायें रखकर धक-
नीसे फूँके। जब वह उत्तम प्रकारसे गलजाय तब उसकी सलाई बना
लेवे | इसको कान्तनाग कहते हैं । यह कान्तनाग जलमें घिसकर
नेत्रों में ऑजनेसे नेत्रोंको अमृत के समान गुण प्रदान करता है । (१९)
कान्तलोदके पात्रमें दूधको पकानेसे वह अत्युत्तम रसायन चनजा-
ता है । ( २० ) कान्त लोह की भस्मको कफरोगमें सवेनमक के साथ
गुनगुना जलमें पीसकर सेवन करनेसे पितरोगमें गिलोय के स्वरसके
साथ और वातरोगमें खिरैंटी की जडके कायके साथ सेवन करनेसे
शीघ्र लाभ होता है । युवावस्थाको स्थिर रखने के लिये कान्तलोह
reमको नीमके भीतरकी छाल और खिरैंटी की जडके रसके साथ<noinclude></noinclude>
89ndnf0jsmi76ije5aeh67xv56g2kxh
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०२
104
165885
418478
2026-09-06T10:25:56Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (८८०) रसरत्नसमुच्चयः । सिंदुवार चाक्ष्वेवमुत्रे चतुर्गुणे । सिद्धं कुष्ठहरं तैलं दुष्टत्रण विशोधनम् ॥ ९८ ॥ कुष्ठाश्वमार भृंगार्कमूलबुक्क्षीरसैंधवैः । तैलं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418478
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८८०)
रसरत्नसमुच्चयः ।
सिंदुवार चाक्ष्वेवमुत्रे चतुर्गुणे ।
सिद्धं कुष्ठहरं तैलं दुष्टत्रण विशोधनम् ॥ ९८ ॥
कुष्ठाश्वमार भृंगार्कमूलबुक्क्षीरसैंधवैः ।
तैलं सिद्धं विषावापमभ्यंगात्कुष्ठजित्परम् ॥ ९९ ॥
भद्रश्रीदारु परिचाद्विहरिद्रात्रिबृद्धनैः ।
गोमूत्रपिष्टैः परिकेर्विषस्यार्धपलेन च ॥ १०० ॥
ब्राह्मीरसार्कज क्षीरगोशकृद्रससंयुतम् ।
प्रस्थं सर्पपतैलस्य सिध्ममाशु व्यपोहति ॥ १०१ ॥
रसोनकंदमरिच विषसर्षप सैंधवैः ।
पिल्लेशणहितं कार्यं सुरसारसपेषितः ॥
पूरयेत्सर्पिषा चानु सर्पिरेव च पाययेत् ॥
मधूकसारमधुक विपक्षी र जलघृतम् ।
१०२ ॥
पर्क संतर्पणं श्रेष्ठं नक्तांध्येत्वचिरोत्थिते ॥ १०३ ॥
अञ्जनं नरपित्तेन रोचनामधुशृंगिभिः ।
स्वर्जिकाक्षार सिंधूत्थं शुक्के शुकं वरं विषम् ॥
कर्णयोः पूरणं तीव्र कर्णशूलनिबर्हणम् ॥ १०४ ॥
नस्यं शिरोरुक्रशमनं प्रत्यपुष्पी सिताविषम् ।
अथवा घृतयष्ट्याह्नशर्करा विष संयुताः ॥
शुंठी पथ्या विषं पाठा त्रायंती पूतिनास जित् ॥ १०५ ॥
प्रपौण्डरीकमंजिष्ठाविषर्ति दुसमुद्भवैः ।
निहति साधित तैलं गण्डूषेण मुखामयान् ॥१०६॥
पलाख दिरकंको लजाती कर्पूरचन्दनैः<noinclude></noinclude>
ha41mz0mhjyvefzq2gadnb8k1jqotc0
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२५
104
165886
418479
2026-09-06T10:26:55Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । टंकणं चुंबकांत च दत्त्वा विशोषिते । ( ९०३) सूषायां बिडयोगेन समांशं हेम जारयेत् ॥ ३४ ॥ संवत्सरं मुखधृता मृतसंजीवनी मता । गुटिका शस्त्रस्तंभं च कुर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418479
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
टंकणं चुंबकांत च दत्त्वा विशोषिते ।
( ९०३)
सूषायां बिडयोगेन समांशं हेम जारयेत् ॥ ३४ ॥
संवत्सरं मुखधृता मृतसंजीवनी मता ।
गुटिका शस्त्रस्तंभं च कुरुते वार्धमृत्युजित् ॥ ३५ ॥
कागतलोहकी भस्म, अभ्रककी भस्म, सोनामाखीकी भस्म हीरेकी
भस्म, सुवर्ण भस्म और आठ संस्कार किया हुआ पारा इन सबको
समान भाग लेकर सात दिनतक खटाईमें घोटकर गोला बनालेवे ।
फिर उस गोले के ऊपर गोजिया, मकोय, हरड, निर्गुण्डी, शहद और
सैंधानमक इन सबको पानीमें पीसकर दो दो अंगुल ऊँचा लेप करके
सुखालेवे और भूधरयन्त्रमें रखकर पकावे । स्वाङ्गशीतल होजानेपर
गोलेको बाहर निकालकर बिना खरल कियेही फिर उसके ऊपर उप
र्युक्त कल्कका लेप करके भूधापुटमें पकावे । इस प्रकार पन्द्रह दिन-
तक १५ पुट देनेसे जब वह गोला खूब कठिन होजाय तब एक लोहे
की भूषाके भीतर खिरनीकी जड, ढाककी जड, बहेडेकी छाल, राई
और कपास के चावल (बिनौले) इन सबके कल्कका चारों तरफ लेप
करके उसमें उक्त गोलेको रखकर खैरकी लकडी की अनिमें धौंकनी
फूँके । फिर सुहागा और चुम्बक लोहेके चूर्णको समान भाग लेकर
उसको थोडा थोडा मूषामें डालता जावे । जव गोके परिमाणको यह
चूर्ण न खासके तब मूषाको शीतल करके उस गोलेके बराबर भाग
सुवर्ण मिलाकर उसको बडवानल बिडके साथ यन्त्रद्वारा जारण करे ।
फिर उचित मात्राकी गोलियाँ बनाकर रखलेवे। यह मृतसञ्जीवनी
गोलियाँ एक वर्षपर्यंत मुखमें धारण करनेसे मनुष्यके शरीरको शस्त्र-
सेभी न कटने योग्य दृढ करती है और वृद्धावस्था तथा मृत्युको
जीतती है ॥ ३१-३५ ॥<noinclude></noinclude>
pkmgz39n7clgo1lvs8m5y4zllaquw2v
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४८
104
165887
418480
2026-09-06T10:27:24Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ९२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । नियमित आयुवाले किसी रोगीको आरोग्य कर देते हैं, परन्तु फिर वैद्यके अभिमानसे अनियमित आयुवाले सैकडों प्राणियोंका संहार करते हैं । जो लोग अल... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418480
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९२६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
नियमित आयुवाले किसी रोगीको आरोग्य कर देते हैं, परन्तु फिर
वैद्यके अभिमानसे अनियमित आयुवाले सैकडों प्राणियोंका संहार
करते हैं । जो लोग अल्पज्ञ होनेके कारण आयुर्वेद शास्त्रको न पढकर
केवल भाषाकी पुस्तकोंद्वारा उसका अर्थ सीखकर तर्क वितर्क करते
हुए चिकित्सा करते हैं, इस लिये गुरु मुखसे शाखाध्ययन न करने के
कारण उसके गुह्य और उत्तम भाषको नहीं समझ सकते, ऐसे उन
भिषकृपाशों अर्थात् वैद्यकुवैद्योंको यमराजके पाशके समान अर्थात्
मृत्युकारक समझकर सर्वथा त्याग देना चाहिये । अर्थात् रोगीको
ऐसे वैद्योंके पास चिकित्सार्थ कदापि नहीं जाना चाहिये ।
विद्वान वैद्यका कर्त्तव्य |
(६) जिसने विशेष परिश्रम के द्वारा गुरुमुखसे विधिपूर्वक शास्त्रका
ज्ञान प्राप्त किया हो और गुरुके समीप रहकर रोगोंका अनुभव किया
हो वह वैद्य यदि अपनी प्रतिभाका विकाश करता हुआ बहुत ही विचार
पूर्वक उपर्युक्त दोनों साधनों के द्वारा चिकित्सा करने में प्रवृत्त हो तो वह
अपराधी नहीं कहा जा सकता । चिकित्सा करनेसे कहीं धन मिलता
है कहीं मित्रता होती है, कहीं धर्म प्राप्त होता है, कहीं यश मिलता है।
और कहीं अनुभव प्राप्त होता है, इस लिये किसीभी रोगोकी चिकित्सा
करना निष्फल नहीं होता । जो वैद्य शास्त्र के विपरीत चिकित्सा करते
हैं। अर्थात् अमुक प्रकार से करने योग्य उपायको जानकरभी उसको
उल्टे प्रकारसे करते हैं अथवा उपेक्षा (लापरवाही ) करते हैं या भूल
करते हैं तो वे दूसरोंको तो प्राणोंकी हानी करते हैं और अपने
पुण्यों को नाश करदेते हैं। जबतक रोगी श्वास लेता रहे और जबतक
वह औषधि खाता रहें उस समयतक उसकी चिकित्सा करना चाहिये
कारण देवकी गति बडी विचित्र है । जिसकी आशा नहीं होती
वह मनुष्यभी बच जाता है सद्वैद्य अनाथ और दरिद्री रोगियोंको
पुत्रके समान समझकर उनकी चिकित्सा करे और रोगी प्राणाचार्य<noinclude></noinclude>
89s871nmjn1dc2nn8iuyr1sxrf1p5wg
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२२
104
165888
418481
2026-09-06T10:28:11Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७०० ) रसरत्नसमुच्चयः । पागल होजाता है । इसको उन्माद रोग कहते हैं । उन्माद रोगी बहुत चकताहै चारों औरको दोडता है, मनुष्योंको मारता है, इत्यादि उन्माद वातके अनेक लक्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418481
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७०० )
रसरत्नसमुच्चयः ।
पागल होजाता है । इसको उन्माद रोग कहते हैं । उन्माद रोगी बहुत
चकताहै चारों औरको दोडता है, मनुष्योंको मारता है, इत्यादि उन्माद
वातके अनेक लक्षण होते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
ग्रहधनधूप ।
कार्पासास्थिमयूरपिच्छबृहती निर्माल्य पिण्डीतक-
त्वमांसी वृषदंशवितुषवचाकेशाहि निर्मोचकैः ।
नागेंद्र द्विजशृंगहिंगु मरिचैस्तुल्यैस्तु धूपः कृतः
स्कंदोन्मादपिशाचराक्षससुरावेशग्रहनः परम् ॥३॥
कपास के बिनौले, मोरपंख, बडी कटेरी, शिवनिर्माल्य, सगर, तज,
बालछड, अडूसेकी जड, डॉस की विष्ठा, धानोंकी भूसी, बच, वाल,
साँपकी कैंचली, हाथीदांत, सींग, हींग और मिरन्य इन सबको
समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर धूप तैयार करलेवे । इस धूप की
धूनी देने से स्कंद ग्रह, उन्माद रोग, पिशाच, राक्षस, असुर और
देवताओंका आवेश तथा समस्त ग्रहोंकी बाधा शीघ्र नष्ट होती है ।
यह धूप ग्रहबाधाको दूर करने के लिये परमोपयोगी है ॥ ३ ॥
सामान्य उपाय ।
अत्रार्कमूख्य रसस्य व धत्तूरबीजेन
समं प्रदद्यात् । मरीचचूर्णेन घृतेन
वापि पथ्यं च गुर्वत्रमिह प्रशस्तम् ॥ ४ ॥
शुष्कं च शाकं परिवर्जयीत रूक्षं कषायं
बहुशीतलं च । निंबस्य तैलेन विमर्दयेत
कलेारं क्षाम्यति तेन रोगः ॥ ५ ॥<noinclude></noinclude>
i3wtpz7sfjiumi0f88fgmg4ig337lzy
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४५
104
165889
418482
2026-09-06T10:28:54Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७२३) चकरेके मांस (खाल) के भीतर पीपल और मिरचोंका चूर्ण खूब अच्छी तरह भरकर चारों तरफसे उसे सीं देवें । फिर उस थैलीको खोलतेहुए गरम घीमें डालकर एक घडी तक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418482
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७२३)
चकरेके मांस (खाल) के भीतर पीपल और मिरचोंका चूर्ण खूब
अच्छी तरह भरकर चारों तरफसे उसे सीं देवें । फिर उस थैलीको
खोलतेहुए गरम घीमें डालकर एक घडी तक पकाने | इसके बाद
उसको निकालकर शीतल होनेपर खूब बारीक खरल करके शीशों में
भरकर रखदेवे । इस अँजनको शहद, घृत और दूवके साथ पीसकर
नेत्रों में आँजे । यह अंजन रतौंधको दूरकरनेके लिये विशेष उपयोगी
है । बारबार नेत्रों में शीतल जलके छींटे मारनेसे दुखती आँखामें विशेष
लाभ होता है और फिर कभी आँखें नहीं दुखती। बकरीके पित्ते के साथ
त्रिकुटेको पीसकर गोला बनालेवे और उसको घुयेंमें रखकर सुखाये।
खूब सूखजानेपर उसको करंजके पत्तोंके इसमें घोटकर अंजन तैयार
करलेवे | यह अंजन रतौधको दूर करनेकी उत्तम औषध है । खटम-
के रक्त मिरचोंकी भावना देकर नेत्रोंमें आँजनेसेभी रतौंधा दूर
होजाता है । शुद्ध गन्धक १ भाग, पारा २ भाग और सफेद सुरमाट
भाग तीनोंको कैथके रसमें खरल करके प्रतिदिन नेत्रोंमें ऑजनेसे
नेत्रोंका तिमिर - (अन्धेरा) आदि सब रोग नाश होते हैं ॥ ८०-८८ ॥
इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषाटीकायां
त्रयोविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २३ ॥
चतुर्विंशोऽध्यायः ।
कर्णरोग |
शूला दोषचयाभिसूतिजनिताः पञ्च प्रतीनाहरुक
कण्डूविद्रधिपालिशोथ परिपोटोत्पातलेह्यर्बुदाः ।
शोफार्शःकृमिकूचिकर्णकविदोर्युग्मन्थसंतंत्रिका-
नादः पिप्पलिदुःखवृद्धिबधिरास्ते पूतिकर्णेन च ॥१॥
*<noinclude></noinclude>
tbw4jhc6otqu4px366mb53f5lqpt49i
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६७
104
165890
418483
2026-09-06T10:29:35Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाटी कोपेतः । ( ७४५) और तिलोंको एकत्र पीसकर शहदमें और वृतमें मिलाकर लगानेसे व्रणभर जाता है । एवं चिरविटेके पत्तोंके रसको व्रण में भरनेसे या चिराचिके बीजोंके चुर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418483
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाटी कोपेतः ।
( ७४५)
और तिलोंको एकत्र पीसकर शहदमें और वृतमें मिलाकर लगानेसे
व्रणभर जाता है । एवं चिरविटेके पत्तोंके रसको व्रण में भरनेसे या
चिराचिके बीजोंके चुर्णको ऋण (जख्म ) के ऊपर बुरकानेसे दुष्ट
व्रण शीघ्र भर जाता है । अथवा पुराना गुड और सुहागा दोनोंको
समानभाग लेकर बारीक खरल करके बत्ती बनालेव । इस बत्तीको
बहुत पुराने और गहरे व्रणमें भरने से व्रण बहुत शीघ्र भरकर सुखजा-
ताहै । अथवा पारा ३ भाग, कमलके पत्ते २१ भाग, सैंधानमक ७
भाग और गन्धक ८ भाग लेकर प्रथम पारेको और कमलपत्रोंको
जम्बीरी नींबू के रस में घोटे, फिर सबको एकत्र मिलाकर भांगरेके
रसमें मर्दन करे और सात दिनतक तीक्ष्ण धूपमें रक्खारहने देवे । जब
उसका रस सूखताजाय तब उसमें नींबूका और भांगरेका थोडा र रस
डालता जाय। इस प्रकार तैयार किया हुआ यह रस व्रणके ऊपर लगाने से
शस्त्रक्रियाके समान व्रणको शुद्ध करके शीघ्र भर देता है ।। ८५-९० ॥
भङ्गरोग |
int द्विधा निजाigबाह्याभ्यंतर भेदतः ।
भंगेष्वेरण्डतैलेन प्रयुज्यात्पर्पटीरसम् ॥९१॥
भङ्गरोग (हाथ, पाँव आदि अह्नोंका टूटना ) स्वाभाविक और
आगन्तुक इन भेदोंसे दो प्रकारका होता है । अर्थात जन्म सही जिसका
कोई अङ्गटूटा हुआ हो वह स्वाभाविक और चोट आदिके लगने से
जिसका कोई बाह्य या आभ्यन्तर अङ्ग टूटगया होतो वह आगन्तुक
भङ्गरोग कहलाता है । भङ्गरोगमें अण्डीके तेलके साथ पर्पटी रंसंको
व्यवहार करे ॥ ९१ ॥
सामान्य उपाय |
aat पिट्टा वालकेन प्रणुत्यै मेषीदुग्धं कांतपाषा-
णतुल्यम् । युक्तं लेपादस्थिभंगं निहंति बाह्या-
भ्यंतः संस्थित तत्क्षणेन ॥९२॥<noinclude></noinclude>
rndryldwzahby11llxq02p5iiehe5v7
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७८९
104
165891
418484
2026-09-06T10:30:12Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भावाटीकोपेतः । ( ७६७ ) ( ४५ ) गिलोय, कुटकी, सोंठ, देवदारु और वायविडंग इन सबको समान भाग लेकर गोमूत्रमें पीसकर लेप करनेसे श्लीपद रोग दूर होता है ॥ ५५ ॥ वल्मीकरोग | प्रतिमे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418484
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भावाटीकोपेतः ।
( ७६७ )
( ४५ ) गिलोय, कुटकी, सोंठ, देवदारु और वायविडंग इन
सबको समान भाग लेकर गोमूत्रमें पीसकर लेप करनेसे श्लीपद रोग
दूर होता है ॥ ५५ ॥
वल्मीकरोग |
प्रतिमेष रस ।
ब्राह्मीपलाशयोः काथे रीतिपत्रं विनिक्षिपेत् ।
दिनद्वयं ततस्तानि पुनस्तेनैव घर्षयेत् ॥ ६६ ॥
लघुभाण्डे समादाय चूर्ण कूष्मांडवारिणा ।
महत्रिवारं कुर्वीत पुटं ककुभवारिणा ॥ ३७ ॥
मर्दयित्वा पुटं दद्यादजामूत्रेण भावयेत् ।
ततोप्येकं पुटं दत्त्वा तिस्रस्त्रिकटुभावनाः ॥ ५८ ॥
अमर्यजा विडंगाऽग्निगोजलैरथ भावितः ।
प्रतिमेषः सुसंसिद्धो रसो वल्मीकमृद्रसैः ॥ ५९ ॥
ass मितो देयो वल्मीके तस्य मृत्स्नया ।
वल्मीकं संविलिप्यैतत्कृमिसंघप्रशांतये ॥ ६० ॥
(४६) ब्राह्मी और ढाक के पंचांगके काढेमें पीतल के कंटकवेधी
पत्रोंको डालकर दो दिन तक रक्खा रहने देवे। तीसरे दिन उन पत्रों-
को निकालकर गजपुटमें पकाकर चूर्ण करलेवे । फिर समस्त चूर्णको
ब्राह्मी और ढाकके काढेमें खरल करके गजपुटमें फूँके । फिर पेठेके
इसमें घोट घोटकर तीन बार महापुट देवे । पश्चात् अर्जुन वृक्षकी छाल के
का ढेमें घोटकर एकबार गजपुट देवे । फिर बकरीके मूत्रमें पीसकर १
गजपुट देवे । फिर त्रिकुटेकी तीन भावना देकर छोटी तुलसी, बडी
तुलसी, वायविडंग और चीता इन प्रत्येकके रस और गोमूत्रमें एक
२ बार भावना देकर सुखा लेवे। इस प्रकार यह प्रतिमेष रस तैयार<noinclude></noinclude>
0i32dfgaizlogrxq980lf04kotrhc2v
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८११
104
165892
418485
2026-09-06T10:30:49Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भापाटीकोपेतः । ( ७८९ ) काँगनी उत्तम बीजोंको आषाढ महीने के शुरूपक्षामें लाकर उनको तिलोंके समान पेलकर तेल निकाले अथवा उनको पीसकर मुट्ठीसे दवाकर या कपडेकी पोटलीके द... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418485
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भापाटीकोपेतः ।
( ७८९ )
काँगनी उत्तम बीजोंको आषाढ महीने के शुरूपक्षामें लाकर उनको
तिलोंके समान पेलकर तेल निकाले अथवा उनको पीसकर मुट्ठीसे
दवाकर या कपडेकी पोटलीके द्वारा निचोडकर तेल निकाल लेवे और
में छान लेबे / फिर उसमें समान भाग दूध और तेलसे चौथाई
शहद डालकर पकावे । जब पककर तेलमात्र शेष रहजाय तब उतार
कर छान लेवे | उसको एक चिकने वर्त्तनमें या शीशी में भरकर उसमें
चव्य कपूर राज और जायफल इनके समान भाग निश्चित चूर्ण को
(तेल से अष्टमांश ) डालकर उस पात्र के मुँहको बन्द करके धानोंके
ढेर में गाडदेवे । फिर २१ दिनके बाद उसको निकालकर वक्ष छान-
लेवे । इस तेलको प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदयके समय चार तोल
परिमाण सेवन करे । इसके पान करनेपर मनुष्य थोडी देरमें बेहोश
होजाता है । फिर धीरे धीरे होशमें आकर चिल्लाता है और रोता है ।
जब उसको क्षुषा लगे तव दूध, भातका भोजन कराने । यह तेल
प्रकृति के अनुकूल होनेतक पहले दिनकी समानही रोगीकी अवस्था
रखता है । परन्तु कुछ दिनों तक अर्थात् १५-२० दिनतक यह स्थिति
रहती है, फिर दूर होजाती है । इस तेलको निरन्तर सेवन करनेसे
एक महीनमें मनुष्य श्रुतधर ( सुनी हुई बात को याद रखनेवाला )
होता है । दूसरे महीने में सूर्य के समान कान्तिवाला, तीसरे महीने में
देवताओंसे पूजनीय, चौथे महीनेमें अदृश्य अर्थात् स्थूलशरीरको गुप्त
रखने वाला, और पाँचवें महीने में पक्षियोंके समान आकाशमें उड़ने-
वाला होजाता है । छठे महीने में सिद्ध पुरुषोंके साथ इच्छानुसार मिलता
है, सातवें महीने में विष्णुकी जितनी आयु होती है, उतने वर्षों तक
जीवित रहता और आठवें महीने जन्म, मरणसे मुक्त होकर अजर
अमर होजाता है । (१०) भूमिमें एक हाथ गहरा गढ्ढा खोदकर
उसमें एक ताँबेका वर्तन रखकर उसमें १०० तोला मालकांगनीका
तेल भरदेवे और उस वर्तन के मुँहको किसी धातुके पात्रसे ढककर<noinclude></noinclude>
s6el7qv7bj312m1j9scjhs21mxuyx70
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३४
104
165893
418486
2026-09-06T10:31:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८१२ ) रसरत्नसमुच्चयः । जायते नात्र संदेह आज्ञेयं पारमेश्वरी ॥ ६३ ॥ हन्यादक्षिगदांश्च कुष्ठमखिलं मासान्तमासेवितः पाण्डुं च ग्रहणीं प्रमेहगुदजान्गुल्मांश्व... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418486
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८१२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
जायते नात्र संदेह आज्ञेयं पारमेश्वरी ॥ ६३ ॥
हन्यादक्षिगदांश्च कुष्ठमखिलं मासान्तमासेवितः
पाण्डुं च ग्रहणीं प्रमेहगुदजान्गुल्मांश्वशूलामयान् ।
स्थूलत्वं च तथा महाभिसदनं रोगांस्तथैवापरान्
कुर्याद्दीपन पाचनं खलु नृणां भाग्यामयारोधनम् ६४
अयं रसायनं दिव्यं महाकनकसुंदरः ॥ ६५ ॥
कान्तलोह, सुवर्ण और गमकके द्वारा जारण करके भस्म किया
हुआ पारा १६ मासे, सुवर्णभस्म व्यथवा सानेके वर्क मासे और
शुद्ध गन्धक ५० निष्क तीनोंकी कान्तलोह के पात्रमें डालकर उसको
अन्धभूषामें बन्द करके बडवानिके द्वारा गन्धकको जारण करे। इस
प्रकार जारण किये हुए इस रसको चार मासे
2
हुए वर्त्तन में डालदेवे
खूब बारीक चूर्ण
और उसको शह-
मिलादेवे । फिर शास्त्रोक्त विधि से
पानी में पकाकर उसे शहदसे भरे हुए
बन्द करके एक महीनेतक
आरम्भ करे । उसमेंते
करके पहले दिन एक
दिनतक दो २ टुकडे और
करके घृतसे चिकने किये
दसे भरकर उत्तम प्रकार से
तीन सौ साठ ३६० हरडों को
बर्तन में डालदेवे और उस बर्तनका मुँह
रक्खा रहनेदेवे, फिर उनको सेवन करना
प्रथम एक हरड लेकर उसके तीन टुकंडे
टुकडा खावे, फिर दूसरे दिनसे तीसरे
चौथे दिन तीन २ टुकडे भक्षण करे । इसके पश्चात् पाँचवें, छठे,
सातवें और आठवें दिन हरड के तीन २ टुकडे तीन बार सेवन करने
चाहिये । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक हरड एक वर्षपर्यंत
सेवन करनी चाहिये । इस प्रकार इस हरडको सेवन करनेवाला
मनुष्य वली पलितरोगसे मुक्त होकर १०० वर्षतक जीता है । रवं
सम्पूर्ण व्याधियोंसे रहित, नित्य सैकड़ों स्त्रियों को सेवन करनेवाला
बलवान्, वीर्यवान और समस्त इंद्रियोंकी पूर्ण शक्ति से सम्पन्न
है । यह श्रीमहादेवजीने कहा है, इसलिये इसमें किञ्चित्<noinclude></noinclude>
ce9tzu1ilxuigqp4526oy9b2sxtogf5
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५८
104
165894
418487
2026-09-06T10:31:46Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८३६ ) रसरत्नसमुच्चयः । सेवन से वमन आदि उपद्रव उत्पन्न हों तो फिर उसको और अधिक पुट देने चाहिये । बंगसे ८ वाँ भाग हरताल लेकर उसको ढाक के बीजों के इसमें एक दिनतक खरल कर... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418487
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८३६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
सेवन से वमन आदि उपद्रव उत्पन्न हों तो फिर उसको और अधिक
पुट देने चाहिये । बंगसे ८ वाँ भाग हरताल लेकर उसको ढाक के
बीजों के इसमें एक दिनतक खरल करके बंग (राँग ) के पत्रों पर लेप.
कर सात गजपुट देनेसे बंगभस्म होती है । सीसेसे अष्टमांश मैनसि-
लकी फरहदके रसमें घोटकर उपयुक्त विधिसे किये हुए सीसे के चूर्ण में
मिलाकर खरल करके गोला बनालेवे । फिर उसको सुखाकर गजपु·
टमें फूँक देवे । इस प्रकार सात बार मैनसिलको मिला २ कर सात
पुटदेने से सीसा भस्म होजाता है । अथवा दुर्गन्धखैर, नागदमन, अड्डू
सा, हडसंहारी और अर्जुनवृक्षकी छाल इन सबका एकत्र काथ बना-
कर उस काथमें सीसे के चूर्णको खरल करके गोला बनालेवे और गज-
पुटमें रखकर फूँक देवे । इसतरह ७ बार पुट देनेसे भी सीसे की भस्म
होजाती है । अथवा उक्त पाँचों औषधियांक निकाले हुए खार की
अपर पिघलाकर सीसेमें थोडा २ ढालता जावे और जलाता जावे ।
जब वह खूब पतला होजाय तब उसको उन्हीं औषधियों के काथमें
घोटकर के गोला बनाकर गजपुटमें पकाने तो नागभस्म होती है ।
इमली, बहेडा, ईख, मिलावे और पीपल वृक्ष इन सबके स्वरसके
साथ एक दिनतक बराबर जस्तको खरल करके रात्रिमें गजपुट देवे ।
इस प्रकार घोट घोट कर सात बार पुटदेनेसे जस्तकी भस्म होती है । अथवा
उपर्युक्त औषधियोंके खार को थोडा २ जस्तमें डालता जाने और चलाता
जावे और उसके नीचे तीक्ष्ण अग्नि जलाता जावे तो भी जस्तभस्म हो
जाता है। तीक्ष्ण लोहसे आठवाँ भाग सिंगरफ लेकर उसको सीके दूषमें
खरल करके तीक्ष्ण लोहके पत्रोंपर लेपकर उनको गजपुटमें पकावे। इस
विधिसे ७ गजपुट देनेसे उत्तम लोहभस्म होती है । सम्पूर्ण धातुओं की
• उत्थित (अपक्क) भस्मको सेवन करने से गले में शूल, खरास, शरीरमें
फोडे, फुन्सी, अरुचि, मलविबन्ध आदि वायुके उपद्रव उत्पन्न होते हैं।<noinclude></noinclude>
3ude9176tp97w2tg0fdr8jpz3dzktmm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८१
104
165895
418488
2026-09-06T10:32:19Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाडीकोपेतः । (८५९) सेवन करे । गले के रोगोंमें सोनामाखीकी भस्मके साथ, खुजली में मैनसिलकी भस्मके साथ और मल मूत्रका अवरोध होनेपर मिरचोकी के क्वाथ के साथ सेवन करे । (... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418488
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाडीकोपेतः ।
(८५९)
सेवन करे । गले के रोगोंमें सोनामाखीकी भस्मके साथ, खुजली में
मैनसिलकी भस्मके साथ और मल मूत्रका अवरोध होनेपर मिरचोकी
के क्वाथ के साथ सेवन करे । (२१) सुवर्णभस्म और आमलोंका
चूर्ण दोनों को खैरसार के रसमें भावना देकर हमेशा शहदके साथ सेवन
करे और ऊपर से दुग्धपान करे तो मृत्युकी प्राप्त होनेवाला मनुष्यभी
जीवित होता है । (२२) पीपल, वायविडङ्ग, खैरसार, त्रिफला और
सुवर्णभस्म इनको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपडछान
कर लेवे । जो मनुष्य इस चूर्णको घृत, मधु और मिश्रीमें मिलाकर
नित्य सेवन करे तो वह वृद्धावस्थाले पीडित होता हुवा नवीन युवकके
समान शरीरकी नवीन कान्ति और रस रक्तादि सातों धातुओंकी
समतासे युक्त होकर १०० वर्ष तक जीता है । (२३) आयुकी इच्छा
करनेवाला मनुष्य शंखपुष्पी के साथ, बुद्धिकी कामना करनेवाला बचके
चूर्णके साथ, लक्ष्मी (शोभा) की इच्छा करनेवाला कमलकी केस-
रके साथ और कामको सदैव जागृत रखने की अभिलाषावाला मनुष्य
विदारीकन्द के चूर्ण के साथ सुवर्णभस्म को सेवन करे । ( २४ ) कमलके
बीज, आमले, हरड बहेडा और सुवर्णभस्म इन सबको समानरूपसे
एकत्र मिलाकर घृत और शहदके साथ सेवन करनेवाला मनुष्य दीर्घा-
युषी होते हैं तथा रोग और वृद्धावस्था के सम्पूर्ण विकारोंसे रहित होते
हैं और सर्पादि जन्तुओंके भयसेभी मुक्त होजाते हैं । उत्तम प्रकार से
शुद्ध करके भस्म की हुई सम्पूर्ण धातु रसायनके समान गुण प्रदान
करती हैं तथा पृथक् पृथक् अनुगनों के साथ सेवन करनेसे सब प्रका-
रके रोगोंको नाश करती हैं । रस, रक्त, मांस आदि धातुओंको पुष्ट
करती हैं और दीर्घायु प्रदान करती हैं। इसलिये अन्य समस्त योगोंके
व्यवहारसे क्या लाभ केवल धातुयेंही सेवन करनी चाहिये ॥ ६६-१०३॥
इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चयेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥<noinclude></noinclude>
ikskiwu090s22tzvij62ad4bsk35m41
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०३
104
165896
418489
2026-09-06T10:32:47Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८८१ ) बोलाब्दवालेद्विगुणविषैः साराम्बुपेचितैः ॥ ससूत्रा वटिकाःक्लता धृता अंति मुखामयान १०७/ कटुतैलविषं नस्यं पलितारुचिकापहम् ॥ १०८ ॥ स्नुार्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418489
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः । ( ८८१ )
बोलाब्दवालेद्विगुणविषैः साराम्बुपेचितैः ॥
ससूत्रा वटिकाःक्लता धृता अंति मुखामयान १०७/
कटुतैलविषं नस्यं पलितारुचिकापहम् ॥ १०८ ॥
स्नुार्क क्षीर भृंगाम्बुगोमुत्रहलिनीविषैः ।
गुंजा विशालामरिचैः कटुतैलं विपाचितम् ॥
खलति शमयत्यम्लपिष्टमष्टगुणं विषात् ॥ १०९ ॥
सिन्धूत्थकार्पासफलं पिण्डितं सह सर्पिषा ।
क्षीरेणाजेन वा लेपाद्विषदिग्धायुधप्रणुत् ॥ ११० ॥
विषं रसाञ्जनं भाङ्ग वृश्चिकाली महासहा ।
सवेदने सपाके च व्रणे दुष्टे प्रलेपनम् ॥ १११ ॥
कृतमालार्कपूतीकवत्सकातिविषाविषम् ।
सिद्धं यदिगुदकाथैः सर्पिस्तदपचीहरम् ॥ ११२ ॥
काकादनीमागधिका नलिकातुण्डिकाफलैः ।
जीमूतबीजककट विशालाकृतवेधनैः ॥ ११३ ॥
पाठान्वितैः पलार्धाशिविंषकर्षयुतैः पचेत् ।
प्रस्थं करञ्जतैलस्य निर्गुडीस्वरसाढके ॥ ११४ ॥
तज्जयेदपचीं घोरां नावनाभ्यंगपानतः ॥ ११५ ॥
गुंजाटंकण शिग्रुमूलरजनीशम्याकभल्लातक-
स्नुह्यर्काकिर असैंधववचाकुष्ठाभयालांगलीः ।
वर्षाभूशठिभूशिरीषवरणव्योषाश्वमारा विषं
गोमूत्रं शमयेद्विलिप्तमपचीग्रन्थ्यर्बुदश्लीपदान्। ११६।<noinclude></noinclude>
2l992ixouwbgam18nd40lx32ayouf4m
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२६
104
165897
418490
2026-09-06T10:33:19Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ९०४ ) रसरत्नसमुच्चयः । महानीलतैल । वटप्ररोहपिण्डीतमूलत्वककृष्णसैर्यकैः । केतकीस्तनभृंगायः शकल त्रिफलार्जुनैः ॥ ३६ ॥ पृथग्दशपलैः सार्धं चतुद्रणेष्वपां पचे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418490
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९०४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
महानीलतैल ।
वटप्ररोहपिण्डीतमूलत्वककृष्णसैर्यकैः ।
केतकीस्तनभृंगायः शकल त्रिफलार्जुनैः ॥ ३६ ॥
पृथग्दशपलैः सार्धं चतुद्रणेष्वपां पचेत् ।
अष्टभागावशिष्टेऽस्मिन्भृंगस्वरसपेशितैः ॥ ३७ ॥
त्रिफलानीत्ययश्चूणैः पृथग्द्विपलिकैर्युतम् ।
तैलाढकं समक्षीरं पत्ता मृतरसान्वितम् ॥
महानीलं सुभाण्डस्थं मण्डलं धान्यमध्यगम् ।
अभ्यंग विधियोगेन केशानां रंजनं परम् ॥ ३९ ॥
३८ ॥
ash अंकुर, मैनफलकी जडकी छाल, काले फूलकी कटसरैया,
केतकी वृक्ष (केवडा) स्तन, भाँगरा, लोहचूर्ण, त्रिफला और अर्जुन
वृक्षकी छाल प्रत्येकको चालीस २ तोले लेकर एकत्र कूट लेवे । फिर
सबको चार द्रोण जलमें डालकर पकावे । जन पककर आठवाँ भाग
जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । फिर त्रिफला, नीलवृक्षकी जड
और लोहका चूर्ण इन प्रत्येकको आठ २ तोले लेकर भाँगरके रसमें
खूब बारीक पीस करके उपर्युक्त काथमें मिलादेवे । फिर १ व्याढक
तिलका तेल और १ आढक दूध डालकर पकावे पककर जब पानीका
भाग सब जलजाय और तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे
और उसमें चार तोले पारेकी भस्म मिलादेवे । इसके पश्चात् उस महा-
नील तेलको एक चिकने वर्त्तनमें भरकर उसको अच्छे प्रकार धानों-
की राशिमें गाडदेवे और ४० दिनतक रक्खा रहने देवे । ४० दिनके
बाद निकालकर उस तेलकी मालिश करनेसे बाल अत्यन्त काले
होजाते है ॥ ३६-३९ ॥
पारेकी भस्मके सामान्य प्रयोग ।
रोगोक्तयोगयुक्तोऽयं तत्तद्रोगहरो भवेत् ।<noinclude></noinclude>
f323v5dfdw98gex523s1r2n913pyi6a
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९४९
104
165898
418491
2026-09-06T10:34:04Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ९२७) ( प्राणोंके बचानेवाले वैद्य) को पिताके समान समझकर अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक उनका सत्कार करे । ऐसा कोई देश नहीं है, जो मनुष्योंसे रहित ह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418491
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ९२७)
( प्राणोंके बचानेवाले वैद्य) को पिताके समान समझकर अपनी
शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक उनका सत्कार करे । ऐसा कोई देश
नहीं है, जो मनुष्योंसे रहित हो और न कोई ऐसा मनुष्य है, जो
रोगले निर्मुक्त हो इस लिये सब जगह वैद्योंकी आजीविकायें सहज-
मेंही चल सकती है । अत एव वैद्योंको अपनी जीविकाके संबंध में
चिन्ता नहीं करनी चाहिये। सहुद्देश्य और शुद्ध अन्तःकरण से रोगी के
उपचार करने कीही चिन्ता रखनी चाहिये । (७) पूर्वकालमें वीरभ
द्रके द्वारा काटे हुए दक्षप्रजापतिके शिरको अश्विनी कुमारोंने जोडाया
पूषा देवताके टूटे हुए दाँतोंकों और भगदेवताकी फूटी हुई आँखोंको
फिर ठीक किया था । उन्होंनेही राजयक्ष्मारोग से पीडित चन्द्रमाको
अपनी चिकित्सासे आरोग्ध किया था । और भृगुऋषिके पुत्र च्यवन
ऋषि जो अत्यन्त वृद्ध होनेपरभी कामके वशीभूत होकर श्रीमसह
करनेमें अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहे थे, उनको फिर वीर्य, वर्ण और बलसे
पूर्ण करके युवा बनादिया था । इनसे और अन्यान्य अनेक प्रकारके
कार्यों के करने से दोनों उत्तम वैद्य (अश्विनीकुमार) इन्द्रादि देवाता-
ओंके बीच में अत्यन्त पूजनीय हुए थे। सौत्रामणि नामक यज्ञमें भग-
वान् इन्द्र अश्विनीकुमारोंके साथ आनन्द भोगता है और उन्होंके
साथ प्रायः सोमरसपान करता है । महर्षियोंने भी यज्ञोंमें अश्विनीकु·
मारोंके लिये भाग कल्पित किये हैं और वेदोंमें भी अश्विनीकुमार,
और इन्द्र इनकी अत्यन्त स्तुति की गई है। देवता अजर, अमर
और सुखी रहनेपर भी अश्विनीकुमारोंको देव वैद्य जानकर आदरपू
बैंक पूजते हैं जो रोग, मृत्यु और वृद्धावस्थासे प्रसित हों तथा दुःख
सागरमें डूबे हुए हों ऐसे सुखकी इच्छा करनेवाले मनुष्योंको सदैद्यके
द्वारा आरोग्य होनेपर क्या फिर अपनी शक्तिके अनुसार उनका
सम्मान नहीं करना चाहिये १ ।। १०५-१२७ ॥<noinclude></noinclude>
47izyq9dlwtgfkpsj0ngg6kz90hx71d
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२३
104
165899
418492
2026-09-06T10:34:40Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । निर्गुडिकोन्मत्तकतुंबिनीनां रसैस्तु तैलं परिपाचयीत || कलेवरं तेन विलेपयेत मासार्धतः शांतिमुपैति रोगः || ६ || ( ७०१ ) इस रोग अर्कमूर्ति रसको प्रतिदि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418492
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
निर्गुडिकोन्मत्तकतुंबिनीनां रसैस्तु तैलं
परिपाचयीत || कलेवरं तेन विलेपयेत
मासार्धतः शांतिमुपैति रोगः || ६ ||
( ७०१ )
इस रोग अर्कमूर्ति रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती लेकर धतूरेके
बीजों के चूर्ण में मिलाकर सेवन करावे । अथवा मिरवोंके चूर्ण और
घृतमें मिलाकर देवे । इसपर गुरुपाकी और पौष्टिक पदार्थोंका पथ्य
देना चाहिये और रूखे पदार्थ, शाक, कषैले और बहुत शीतल
पदार्थ त्याग देने चाहिये । रोगी के शरीर पर नीमकी तेलकी मालिश
करे । इससे उन्माद रोग बहुत शीघ्र शान्त होताहै । अथवा निर्गुण्डी,
धतूरा और कडवी तोंबीके रसमें तेलको पकाकर उसकी शरीर पर
मालिश करे तो यह रोग १५ दिनमें शान्त होजाता है ॥ ४-६ ॥
अपस्मार (मृगी ) ।
क्रुद्धधातुभिराहते च मनसि प्राणी तमः संविश-
न्दन्तान्खादति फेनमुद्रिरति दोः पादौ क्षिपन्मूढधीः ।
पश्यन् रूपमर्सा क्षतौ निपतति प्रायः करोति क्रिया
बीभत्साः स्वयमेव शाम्यति गते वेगे त्वपस्माररुक्७
मनुष्यकी रस, रक्त, मांसादि धातुओंके विकृत होनेसे अथवा स्त्री,
पुत्र, धन आदि सुखोंका नाश होनेके कारण अत्यन्त दुःख और
चिन्ता होनेसे अथवा कोई शारीरिक या मानसिक रोग होनेसे या
दिल पर किसी प्रकारका आघात होनेसे वायुका बेग बढजाता है,
उस समय उस मनुष्यकी आँखोंमें अन्धेरा छाजाता है, और वह
संज्ञाशून्य होजाता है, दाँतोंको कटकटाता है, मुँहसे झागोंको गेरता
है, हाथ पैरोंको पटकता है और बुद्धिशक्ति नष्ट होजाती है रोगी
भयंकर रूपको देखता हुआ जमीन पर लकडीके समान गिर पडता<noinclude></noinclude>
4kgb7j4ve9jleyk0ortgj3oqhen6dki
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४६
104
165900
418493
2026-09-06T10:35:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७२४ ) रसरत्नसमुच्चयः । वात, पित्त, कफ, रक्त और सन्निपात इन दोष भेदोंके द्वारा उत्पन्न होनेसे कर्णशुल (कानका ) रोग पाँच प्रकारका होता है । प्रतीनाह, कर्णकण्डू, कर्णव... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418493
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७२४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
वात, पित्त, कफ, रक्त और सन्निपात इन दोष भेदोंके द्वारा उत्पन्न
होनेसे कर्णशुल (कानका ) रोग पाँच प्रकारका होता है । प्रतीनाह,
कर्णकण्डू, कर्णविद्रधि, कर्णेपालि, कर्णशोफ, कर्णपोट, कर्णोत्पात,
कर्णलेही, कर्णका अर्बुद, कर्णशोथ, कर्णाश, कर्णकृमि, कूचिकर्णक,
दोर्युग्म, कर्णमन्य, तन्त्रिकानाद, पिप्पलीदुःख, कर्णवृद्धि बधिरता और
पूतिकर्ण ये सब कानके मुख्य २ रोगोंके नाम हैं ॥ १ ॥
कर्णरोगहर रस ।
वज्रवैकांत विमलतुत्थनागरसान्वितैः ।
तुल्यपारदगंधाश्ममाक्षिकैः कजलीकृतः ॥ २ ॥
लशुनाईक शिग्रूणामरण्या मूलकस्य च ।
पृथमः कदल्याश्च सप्तधा परिभाषयेत् ॥ ३ ॥
एवं सुपिष्ट्वा वल्लेन सेवितः कर्णरोगनुत् ॥ ४ ॥
First भस्म, वैकान्तमणिका भस्म, रूपामारखीकी भस्म, शुद्ध
नीलाथोथा, सीसे की भस्म, शुद्ध मीठा तेलिया, पारा, गन्धक और
सोनामाखी की भस्म, इन सब रसोंका समान भाग लेकर यथाविधि
मिश्रित करके कनली करलेवे । फिर उस कज्जलीको लहसुन, अद
रख, सैंजने की जड और अरणीकी जड इन प्रत्येकके उसमें कमसे
एक बार भावना देवे, फिर केलेके रसकी सात बार भावना देकर
सुखालेवे और बारीक पीसकर शीशी में भरकर रखलेये । इस रसको
एक २ रत्ती परिमाण सेवन करनेसे सच प्रकारके कर्णरोग नाश
होते हैं॥ २-४ ॥
कर्णामयन तैल |
कुष्ठशुण्ठीवचाहिंगुशताह्वा शिशु सैंधवैः ।
बस्तमूत्रेः शृतं तैलं सर्वकर्णामयापहम् ॥ ६ ॥<noinclude></noinclude>
mjcdca4vorrwk3139hfw0zc8n2vgn1o
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६८
104
165901
418494
2026-09-06T10:36:00Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७४६ ) रसरत्नसमुच्चयः । टूटे हुए अङ्गको जोडने के लिये थूहरके दूधमें सुगन्धवालाको पीसकर लेपकरे, अथवा चुम्बक पत्थरको समानभाग भेडके दूध में खरल करके लेपकरे । इससे ब... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418494
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७४६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
टूटे हुए अङ्गको जोडने के लिये थूहरके दूधमें सुगन्धवालाको
पीसकर लेपकरे, अथवा चुम्बक पत्थरको समानभाग भेडके दूध में
खरल करके लेपकरे । इससे बाहरकी अथवा भीतर की टूटी हुई हड्डी
तत्काल जुडजाती है ॥ ९२ ॥
भगन्दर रोग ।
गुदस्य पार्श्वे पिटिकार्तिकारी शोफादि-
युक्तः स भगंदरः स्यात् ॥९३॥
वृषणासनयोर्मध्ये प्रेदेशो भग उच्यते ।
तमेव दारयत्यस्माद्भगंदर इतिस्मृतः ॥९४॥
गुदा के पार्श्वभाग (समीप) में पहले एक फुन्सी निकलती है। उसमें
अत्यन्त पीडा, शोथ आदि अनेक उपद्रव होते हैं । फिर वह रिसने
लगती है (अर्थात् उसमें से पानीसा निकलने लगता है । उसको
भगन्दर रोग कहते हैं । अण्डकोष और आसन इन दोनों के बीच के
स्थानको भग कहते हैं । यह रोग उस स्थानको विदीर्णकरके उत्पन्न
होता है, इसलिये इसको भगन्दर कहाजाता है ॥९३-९४ ॥
रविताण्डव रस ।
शुद्धं सूतं द्विधा गंधं कुमारीरसमर्दितम् ।
त्र्यहति गोलकं कृत्वा इंडिकांते निरोधयेत् ॥ ९५ ॥
शुद्धेन ताम्रपात्रेण तयोस्तुल्येन यत्नतः ।
तद्भाण्डं भस्मनाऽऽपूर्व चुल्ल्यां तीव्राशिना पचेत् ९६
द्वियामांते तदुद्धृत्य चूर्णयेत्स्वांगशीतलम् ।
जंबीरस्य द्रवैः पिष्ट्वा रुद्धा सप्तपुटैः पचेत् ॥९७॥
गुंजैकं मधुराहारं दिवा स्वप्नं च मैथुनम् ।
वर्जयेच्छीतलाहारं रसेऽस्मिन् रविताण्डवे ॥९८॥<noinclude></noinclude>
epes3uxg0lj5ai1f2ny1vh04wjyh9bl
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९०
104
165902
418495
2026-09-06T10:36:31Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (७६८) रसरत्नसमुच्चयः । होता है । इस इसकी प्रतिदिन तीन २ रत्ती परिमाण लेकर बाँबीकी मिट्टी के रस के साथ पीसकर पान करावे और बाँबीकी मिट्टोकोही पीसकर लेपकरे तो वल्मीक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418495
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(७६८)
रसरत्नसमुच्चयः ।
होता है । इस इसकी प्रतिदिन तीन २ रत्ती परिमाण लेकर बाँबीकी
मिट्टी के रस के साथ पीसकर पान करावे और बाँबीकी मिट्टोकोही
पीसकर लेपकरे तो वल्मीक रोगमें विशेष उपकार होता है । कृमिस-
मूहको और श्लीपद रोगको शान्त करने के लिये भी यह रस उपयो-
गी है ॥ ५६-६० ॥
क्षुद्ररोगोंके सामान्य उपाय ।
रसैरुत्तरवारुण्याः सभ्रमं हंति मारुतम् ।
वासानीरानुपानेन जयेत्कफसमीरणम् ॥ ६१ ॥
विडंगं नागरं क्षारं काललोहरजो मधु ।
यवामलकचूर्ण च योगोऽतिस्थौल्यदोषजित्॥ ६२॥
वरासनाग्रयः पत्रनिशाक्काथं मधुच्कृतम् ।
द्विरदस्थूलदेहोऽपि पिबेन्भासात्कृशो भवेत्॥ ६३ ॥
विपरीते रते प्राप्ते लिंगे दाहः प्रजायते ।
कायै च सर्वगात्रेषु तत्प्रतीकार उच्यते ॥ ६४ ॥
प्रत्यग्रस्तन्निबद्धचैव लिंगे चोषणमाचरेत् ।
क्षणे स्वेतस्य संजाते क्षालयेच्छीतलांबुना ॥ ६५ ॥
कोल निर्यासमादाय पाययेत्तं सशर्करम् ।
शाल्मली दूर्वयोर्मूली रसपायसमाशयेत् ॥ ६६ ॥
पुरुषव्याधितुत्यर्थं रक्तस्रावो हि पृष्ठके ।
भक्षणं बोलबद्धस्य मत्स्याक्षीमूललेपनम् ॥ ६७ ॥
जानुरुग्रंथिनुत्यर्थं यवचिचाः प्रलेपयेत् ।
सामुद्रकांजिकाभ्यां हि लेपं विधेहि सत्वरम् ॥
सर्वरक्तविकारेषु बोलबद्धस्य सेवनम् ॥ ६८ ॥<noinclude></noinclude>
7xd9wydz1zmljbtpq8mz41n83095cod
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१२
104
165903
418496
2026-09-06T10:36:59Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ रसरत्नसमुच्चयः । ( ७९० ) चूनेसे उसकी सन्धियोंको बन्द करके उस गड्ढे को अच्छी तरह मिट्टीसे पाट देवे । इस प्रकार ६ महीने तक उसको गाड रक्खे । ६ महीने के पश्चात् उस गड्ढे... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418496
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>रसरत्नसमुच्चयः ।
( ७९० )
चूनेसे उसकी सन्धियोंको बन्द करके उस गड्ढे को अच्छी तरह
मिट्टीसे पाट देवे । इस प्रकार ६ महीने तक उसको गाड रक्खे । ६
महीने के पश्चात् उस गड्ढे के ऊपरकी कुछ धूल मिट्टी हटाके मानकी
भूसीकी मन्द मन्द अग्निके द्वारा उस तेलको तपावे । फिर स्वाङ्गशी.
तल होजाने पर उस बर्त्तनको निकालकर तेल पान करना प्रारम्भ
करे । पहले दिन १ मासा, दूसरे दिन २ मासे, तीसरे दिन ३ मासे
और चौथे दिन ४ मासे पीवे फिर प्रतिदिन चार २ मासेकी मात्रा से
सेवन करना चाहिये इस प्रकार इस तेलको तीन वर्ष बराबर पान
करनेसे मनष्य महाकावे होजाता है । ( ११ ) मालकांगनी का तेल
६४ तोले, घी ६४ तोले और दूध २५६ताले तीनोंको एकत्र मिलाकर
पकावे । जब पककर दूध सब जलजाय और दो प्रस्थ तेल, विशेष
रहजाय तब उतारकर छानलेवे । इस तेलको एक महीने तक सेवन
करनेसे १०० वर्ष तक मनुष्यकी आयु होती है (१२) घी, शहद और
दूध इन तीनोंमेंसे किसी एकके साथ तिलका अथवा सरसोंका तेल
मिलाकर योग्यमात्राले पान करे। तेल, शहद और घी तीनों को एकत्र
मिलाकर नस्य लेवे और दूध, घी मिलाकर भोजन करे । इस प्रकार
६ महीने तक इस प्रयोगको सेवन करनेसे मनुष्य १०० वर्षकी आयु-
बाला और तीनवर्ष तक सेवन करनेसे १००० वर्षकी आयुवाला होता
है । (१३ ) शहद और वंशलोचन, शहद, घी और पीपल, विडङ्ग
पीपल और त्रिफला इनका समानभाग चूर्ण अथवा त्रिफला और
सैनमक समभागका चूर्ण इन चारों प्रयोगों में से किसी एक प्रयोगको
एक वर्षातक बराबर सेवन करनेसे मनुष्योंके स्मरणशक्ति, बुद्धि और
बलकी वृद्धि होती है, वृद्धाअवस्था और सबप्रकारके रोगोंसे रहित
दीर्घायु प्राप्त होती है । ( १४ ) त्रिफला चूर्णको खैरेसार, विज-
यसार भाँगरा, सातला (एक प्रकारका थूहर ) और वायविडङ्ग
इन प्रत्येकके रसमें एक एक भावना देकर सुखालेवे । वह चूर्ण गुड,<noinclude></noinclude>
3va7v0mlx29wvvu2vw8sknjv3u38wdd
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३५
104
165904
418497
2026-09-06T10:37:41Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१३) मात्रमा सन्देह नहीं है । यह रस एक महीनेतक सेवन करनेसे नेत्ररोग सम्पूर्ण कुष्ठ, पाण्डु, संग्रहणी, प्रमेह, अर्श, गुल्म, शूल, स्थूलता, अत्यन्त मन्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418497
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८१३)
मात्रमा सन्देह नहीं है । यह रस एक महीनेतक सेवन करनेसे नेत्ररोग
सम्पूर्ण कुष्ठ, पाण्डु, संग्रहणी, प्रमेह, अर्श, गुल्म, शूल, स्थूलता,
अत्यन्त मन्दाग्नि तथा अन्यान्य सब प्रकार के रोगों को शीघ्र नष्ट करता
है । एवं अभिको अत्यन्त दीपन, खाद्य पदार्थका पचन और मनुष्यों के
भावी रोगोंका अवरोध करता है । यह महाकनक सुन्दर रस अत्यन्त
दिव्य रसायन है ॥ ६६-६५ ॥
अमृतार्णव रस ।
कृत्वा कंटकवेध्यानि पलस्वर्णदलान्यथ ।
हिंगु हिंगुल गंधाश्मताप्यनीलाञ्जनैः समैः ॥
अष्टांशरस लितानि निक्षिपेदुपले त्र्यहम् ॥ ६६ ॥
कृतं चूर्णमधोर्ध्व पत्राणां विनिधाय च ॥ ६७ ॥
शतवारं पुटेत्सम्यङ् निरुत्थं मम जायते ।
तद्भस्मद्विगुणं सूतं तस्माद्दिगुणहिंगुलः ॥ ६८ ॥
तस्माच्च द्विगुणं ताप्यं सर्वमेकत्र मर्दयेत् ।
रसेन मातुलुंगस्य निरंतर दिनद्वयम् ॥ ६९ ॥
तुषैः पुटत्रयं दद्याद्रोकरीषैः पुटत्रयम् ।
पुटानि दश विंशत्या छागणानां प्रकल्पयेत् ॥
त्रिंशद्भिश्छ्गणैर्दद्यात्पुटानामथ विंशतिम् ॥ ७० ॥
तस्मिन्वैक्रांतजं भस्म निक्षिपेत्पादमात्रया ।
सर्वमेकत्र संचूर्ण्य भृंगराजनिजद्रवैः ॥ ७१ ॥
भावयेत्सशवाराणि सिद्धयत्येवमयं रसः ।
श्रीमता नंदिना प्रोक्को रसोयमनृतार्णवः ॥ ७२ ॥
गुंजाबीजमितः सिताघृत कणासंयोजितः सेवितः
कुर्यादूवृष्यमनेकशो वरवधूसंतोषसंपोषणः ।<noinclude></noinclude>
ko7esv9aexfouma7b8q8oo0l0o6zb8o
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८५९
104
165905
418498
2026-09-06T10:38:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८३७) | इस लिये प्रत्येक धातु की भस्म जब निरुत्थ और जलमें तैरने वाली हो जाय तब सेवन करनी चाहिये । सोनेकी भत्मको १६ वें भाग सुवर्ण माक्षिक, मधु और घृतम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418498
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८३७)
| इस लिये प्रत्येक धातु की भस्म जब निरुत्थ और जलमें तैरने वाली हो
जाय तब सेवन करनी चाहिये । सोनेकी भत्मको १६ वें भाग सुवर्ण
माक्षिक, मधु और घृतमें मिलाकर पुट देनेपर जितनी सुवर्णमरूप
डाली हो यदि उतनीही वजनमें रहे और सोना जीवित न हो तो उसको
निरुत्थभस्म और जो सोना जीवित होजाय तो उसको उत्थित भस्म
जानना चाहिये। इसी प्रकार अन्य सब धातुओं की भस्मोंकोभी मधु,
घृत, सुहागा, त्रिफलेका काथ आदि औषधियोंमें मिलाकर वारवार
गजपुटों पकानेसे उनकी पुनरुज्जीविता नष्ट होजाती है। उनको उत्तम
प्रकारसे निरुत्थ हुआ जानकर प्रयोग करना चाहिये ॥ १-१४ ॥
मृत्युहारी रस )
अयस्पात्रं तिलोत्सेधं प्रतप्तं चतुरंगुलम् ।
एकविंशतिपर्यायं धात्र्या निर्वापयेद्वसे ॥ १५ ॥
ततः शतपलं स्थाल्यां क्षिप्त्वा धात्रीरसोत्तमम् ।
कृत्वा ततः सुपिहितं भस्मराशौ विनिक्षिपेत् ॥ १६॥
मासि मासि समुद्धृत्य लोहदण्डेन घट्टयेत् ।
तस्मिन्विशुष्यति प्राग्वद्रसं धात्र्या विनिक्षिपेव १७ ॥
द्रवीभवति तत्सर्वे वत्सरात्पत्रमायसम् ।
ततः समं ततोगुष्ठपर्वमात्रमुखेन तु ॥ १८ ॥
आयसेन स्रुवेणायस्पात्रे कल्कीकृतं ततः ।
तं पृथक्समांशेन सेवेत मधुसर्पिषा ॥ १९ ॥
जीणें साज्यं रसक्षीरयूषान्यतममिश्रितम् ।
षष्टिकोदनम श्रीयादुपयुज्येत वत्सरम् ॥ २० ॥
वर्षमन्यच शिष्टान्नो यंत्रितात्मा कुटीं वसेव ।<noinclude></noinclude>
golp9rdruto0los5r3pg6v3vujaqq6h
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८२
104
165906
418499
2026-09-06T10:38:59Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (८६०) रसरत्नसमुच्चयः । एकोनत्रिंशोऽध्यायः । विषकल्प: । विषोत्पत्तिस्तद्भेदश्च । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यत्रोत्पन्नं महाविषम् । भेदांस्तस्य वरारोहे यत्र यत्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418499
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(८६०)
रसरत्नसमुच्चयः ।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।
विषकल्प: ।
विषोत्पत्तिस्तद्भेदश्च ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यत्रोत्पन्नं महाविषम् ।
भेदांस्तस्य वरारोहे यत्र यत्र सविस्तरम् ॥ १ ॥
देवदैत्योरगाः सिद्धा गंधर्वा यक्षराक्षसाः ।
पिशाचाः किन्नराचैव मिलित्या च वरानने ॥ २ ॥
एकता बलिराजश्व ब्रह्माद्याश्च तथैकतः ।
मंथानं मंदरं कृत्वा नागराजेन वेष्टितम् ॥ ३॥
क्षीराब्धिमथनं तत्र प्रारब्धं सुरसुंदरि ।
निर्गतास्तत्र रत्नौघाः कामधेन्वादयः प्रिये ॥ ४ ॥
अमला कमलोत्पन्ना पश्वादुचैःश्रवास्ततः ।
ऐरावतो महाकायो निर्गतं देवि चामृतम् ॥ ५ ॥
अतीव मन्थनादेवि मंदाराघात वेगतः ।
अहिराजश्रमादेवि विषज्वाला विनिर्गता ॥६॥
ततोऽतिघोरा सा ज्वाला निमन्ना क्षीरसागरे ।
तया तत्रैव चोत्पन्नं कालकूटं महाविषम् ॥ ७॥
प्रलयानलसंकाशं क्रुद्धः काल इवोत्कटम् ।
तदृष्ट्वा विबुधाः सर्वे दानवाश्च महाबलाः ॥ ८ ॥
विषण्णवदनाः सद्यः प्राप्ताश्चैव मदंतिकम् ।
ततस्तैः प्रार्थ्यमानो हमपिबं विषमुत्तमम् ॥ ९ ॥
ततोऽवशिष्टमभवन्मूलरूपेण तद्विषम् ।<noinclude></noinclude>
lqnw10al7ltyqdhghyllxeyp6k9tn5a
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०४
104
165907
418500
2026-09-06T10:39:25Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८८२ रसरत्नसमुच्चयः । अन्येष्वपि च रोगेषु शेषोपायपरिक्षये । प्रत्यह विषकंदस्य त्रियवं यवमेव वा ॥ शुद्धस्य राजिकावृद्धया वर्षे भुक्त्वा जयेद्गदान्॥ ११७ ॥ वचा... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418500
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८८२
रसरत्नसमुच्चयः ।
अन्येष्वपि च रोगेषु शेषोपायपरिक्षये ।
प्रत्यह विषकंदस्य त्रियवं यवमेव वा ॥
शुद्धस्य राजिकावृद्धया वर्षे भुक्त्वा जयेद्गदान्॥ ११७ ॥
वचागंधकसिंधूत्थत्रायमाणाम्लवेतसम्
व्योषाग्निवेलपाठाम्लपर्णीकरिकणाविषम् ॥ ११८ ॥
शारीनागदमनीवायसी त्रिफलारसैः ।
।
भावितं मधुसर्पिभक्षितं स्याद्वसायनम् ॥ ११९ ॥
हरिद्रा बिपत्राणि पिप्पल्यो मरिचानि च ।
मुस्ता विडंगं मूत्रेण पिष्टमाजेन पिण्डितम् ॥१२०॥
नावनाञ्जनपानेषु गोमूत्रासृत्र साखनैः ।
जयेत्प्रयुक्तं विषमज्वरान्सघृतसाधितम् ॥ १२१ ॥
सर्वजं समव्योषं गवां मृत्रेण शीतकम् ।
चन्दनस्य कषायेणरक्तपित्तं वृषस्य वा ॥ १२२ ॥
क्षयंक्षीराश्वगंधाभ्यां कासं श्वासं समाक्षिकम् ।
तणग्रहणी रोगं कृच्छ्रं तंदुलवारिणा ॥ १२३ ॥
प्रमेहं मधुना गुल्मं शूलं च गुडवारिणा ।
पाण्डुशोफं गवां क्षीरेणाम्भसा त्रैफलेन वा ॥ १२४ ॥
गवां मूत्रेण कुष्ठानि क्षौद्रेणोदुम्बराह्वयम् ।
तक्रेण युक्तं चालेपाददुपामा विचर्चिकाः ॥ १२५ ॥
पीतमुष्णाम्भसा वायुं तुलस्या लेपनाग्रहान ।
समूत्रं विस्मृर्ति नस्येनाञ्जनेन हगामयान् ॥ १२६ ॥
स्यन्दाधिमन्थौ सस्तन्यमर्मकोपं सशोणितम् ।<noinclude></noinclude>
dus2ysj31khoag0n1h1dr7gwwszrwxl
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२७
104
165908
418501
2026-09-06T10:40:08Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाडीकोपेतः । (९०५) समुस्तपर्पटक्काथो भस्मसूतो हरेज्ज्वरम् ॥ ४० ॥ दशमूलकषायेण पिप्पल्या व समस्तजम् । माक्षिकाऽभयया वासापिप्पल्या चाखपित्तनुत् ४१॥ कण्टकारी... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418501
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाडीकोपेतः ।
(९०५)
समुस्तपर्पटक्काथो भस्मसूतो हरेज्ज्वरम् ॥ ४० ॥
दशमूलकषायेण पिप्पल्या व समस्तजम् ।
माक्षिकाऽभयया वासापिप्पल्या चाखपित्तनुत् ४१॥
कण्टकारीकषायेण पिप्पल्या च सकासजित् ।
अजायाः क्षीरसिद्धेन कणायुक्तेन सर्पिषा ॥
त्रिफला गंधकन्योषगुडैर्वा क्षपयेत्क्षयम् ॥ १२ ॥
हिां निर्हति रुचकबीज पुराम्लमाक्षिकैः ।
छर्दिदाहौ मधुसिताला जामुद्रसिताम्बुभिः ॥ ४३ ॥
अर्शीसि तैलसिन्धूत्थपुटपचितसुरणैः ।
स्वपल्लवैः कषायेण तेनोदश्विदम्भसा ॥ ४४ ॥
क्षीरिण्या वाप्यतीसारं विषूचीं कणहिंगुना ।
अजीर्ण कॉजिकैरण्डक्काथपथ्यावलेहतः ॥ ४५ ॥
कषायपल्लवैः पकं बालबिल्वं सनागरम् ।
सगुडं सरसं इंति बिम्बिसीं दारुणामपि ॥ ४६ ॥
बिल्वकर्कटिकागर्भ मसूरकथिताम्बु वा ।
कृच्छं मृतरसक्षीरक्षीरिणीक्षुरमाक्षिकैः ॥ ४७ ॥
पारदभस्मशिलाजतुकृष्णालो हमल त्रिफला-
कुलिबीजम् । ताप्य निशारजतो पलकान्त-
व्योषरजः खपुरश्च कपित्थात् ॥ ४८ ॥
सर्वमिदं परिचूर्ण्य समाशं भावितभृंगरसं
दिवसादौ । विंशतिवारमिदं मधुलीढं
विंशतिमेहहरं हरिदृष्टम् ॥ ४९ ॥<noinclude></noinclude>
9t02po6ku4hgyws9oq5fnoca3sube2x
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९५०
104
165909
418502
2026-09-06T10:40:39Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ९२८ ) रसरत्नसमुच्चयः । ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति | · रसरत्नसमुच्चयो मयेथं रचितः साधु नितान्त- माद्रियन्ताम् । सुधियो यदि विद्यतेऽत्र दोष' क्वचिदति ममाप्यलं विसो... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418502
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ९२८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति |
· रसरत्नसमुच्चयो मयेथं रचितः साधु नितान्त-
माद्रियन्ताम् । सुधियो यदि विद्यतेऽत्र दोष'
क्वचिदति ममाप्यलं विसोढुम् ॥ १२८ ॥
इतिश्रीवाग्भटाऽऽचार्यविरचितेरसरत्नसमुच्चयेत्रिंशोऽध्यायः ३०
मैंने (ग्रन्थकर्त्ताने ) इस प्रकार (अर्थात् ऊपर वर्णन किये अनु-
सार) विशेष परिश्रम करके इस रसरत्नसमुच्चय नामक ग्रन्थको रचा
है । यदि इस ग्रन्थमें कहीं विद्वानोंको कोई दोष ( भूल या गलती )
मालूम हो तो वे उसको सुधारकर इसका आदर करें और मुझको
क्षमा प्रदान करें, यही मेरी विनय है ॥ १२८ ॥
इति श्रीवाग्भटाचार्यविरचिते रसरत्नसमुच्चये भाषाटीकायां त्रिंशोऽध्यायः ।
समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।
पुस्तकें मिलने के स्थान
१) खेमराज श्रीकृष्णदास,
श्रीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
खेतवाडी, मुंबई - ४००००४.
२) खेमराज श्रीकृष्णदास,
६६, हडपसर इण्डस्ट्रिअल इस्टेट
पुणे- ४११०१३.
३) गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास
लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस,
व बुक डिपो,
अहिल्याबाई चौक, कल्याण
(जि. ठाणे महाराष्ट्र)
४) खेमराज श्रीकृष्णदास,
चौक वाराणसी (उ.प्र.)
-<noinclude></noinclude>
mpjew7faq2ffj1kxw7h30pav4acsoj9
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२४
104
165910
418503
2026-09-06T10:41:22Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७०२ ) रसरत्नसमुच्चयः । है और प्रायः भयोत्पादक चेष्टायें करता है । फिर कुछ देर में वायुका वेग कम होजानेपर रोग अपने आप शान्त होजाता है ॥ ७ ॥ अपस्मारनाशन रस । रसगंध श... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418503
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७०२ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
है और प्रायः भयोत्पादक चेष्टायें करता है । फिर कुछ देर में वायुका
वेग कम होजानेपर रोग अपने आप शान्त होजाता है ॥ ७ ॥
अपस्मारनाशन रस ।
रसगंध शिला तुत्थकांतमाधिफेनकम् ।
रजनी तेजनीबीजं कर्षमात्रं पृथग्युतम् ॥ ८ ॥
निबुद्रांत तेनांतर्लिप्तां ताम्रप लरिमताम् ।
पात्री न्युब्जां सुभाण्डांतां रुद्धा खरिकां धृताम् ॥९
भस्मनापूर्य भाण्डांतर्धृत्वाऽधो द्विनिशं पवेत् ।
स्वांगशीतं विचूर्ण्यीय रसोऽपस्मारनाशनः ॥ १० ॥
वमस्योदये दद्याद्वाव्योषविडंगयुक् ।
अनुदेयमजामूत्र ततोऽर्धप्रदरे गते ॥ ११ ॥
सार्षपे षोडशपले तैले तत्कलितं पचेत् ।
नस्यं तैलेन तेनास्य दद्यात्सव्योषकेण तु ॥ १२ ॥
पारा, गन्धक, शुद्ध मैनसिल, तूतिया, कान्तलोहभस्म, सुवर्णभस्म,
समुद्रफेन, हल्दी और मालकांगनी के बीज ये प्रत्येक औषधि एक २
तोला लेकर एकत्र खरल कर लेवे। फिर नींबू के रसमें घोटकर गोला
बनालेवे | पश्चात् चार तोले शुद्ध ताँबे की मूषा बनाकर उसके भीतर
इस गोलेको लेप करके सुखालेवे । उस मूषाको एक हाँडीके भीतर
औंधा मुँह करके रखदेवे और उस हाँडीमें कण्ठपर्यन्त अरने उप-
लोकी राख खूब दाब दाबकर भरदेवे, फिर ढककने ढककर संधि-
स्थानोंको वन्द करके कपरौटीकर सुखावे और चूल्हेपर चढाकर दो
दिन और दो रात तक बराबर पकावे । स्वाङ्गशीतल होनेपर ताँबेकी
मूषाको निकालकर रससहित चारीक खरल कालेवे । इस रस-<noinclude></noinclude>
lhndoczg0w5oij9udtljrskuox9wdim
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१३
104
165911
418504
2026-09-06T10:57:40Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७९१) शहद और घृतमें मिलाकर एक वर्ष तक सेवन करने से वृद्धावस्थाको दूर करता है । (१५) त्रिफलेके चूर्णको विजयसारके इसमें पीसकर उसको लाहेके कटोरे में भ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418504
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ७९१)
शहद और घृतमें मिलाकर एक वर्ष तक सेवन करने से वृद्धावस्थाको
दूर करता है । (१५) त्रिफलेके चूर्णको विजयसारके इसमें पीसकर
उसको लाहेके कटोरे में भरकर और ढककर रखदेवे । रातभर रक्खा
रहने के बाद प्रातःकाल उसमें मुलैठीका चूर्ण और शहद मिलाकर
सेवन करनेसे यह प्रयोग स्थिर स्थूलता (मुटाई, ) वृद्धावस्था और
उसके समस्त रोगोंको नष्ट करता है । (१६) कान्त लोहभस्म,
अभ्रक भस्म, शिलाजीत, शुद्ध मीठा तेलिया, रससिंदूर और सोना-
माखीकी भस्म इन सबको समानभाग लेकर एकत्र खरल करलेवे 1
यह प्रयोग मधु और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे सम्पूर्ण रोग,
वृद्धावस्था और मृत्यु इन तीनों को जीतनेवाला है । ( १७ ) शुद्ध
गन्धक और लोहभस्म दोनोंको समानभाग लेकर मधु और घृतमें
मिश्रित करके सेवन करे, और ऊपरसे त्रिफलेका जल पान करे । इस
प्रकार एक वर्षतक इस रसायनको सेवन करने से सफेद बाल काले
होजाते हैं, दिव्यदृष्टि होती है, शरीरकी पुष्टि, वीर्य की वृद्धि, और
दीर्घायु प्राप्त होती है । (१८) बावची और कान्तलोहको समान
भागलेकर रुद्रदन्ती, आमलोंके पत्ते और त्रिफला इनके रसमें क्रम से
एकएक भावना देकर सुखाकर रखलेवे । फिर प्रतिदिन योग्यमात्रासे
और घृतमें मिलाकर ६ महीने तक सेवन करे । इस औषधके प्रयोगसे
अनेक प्रकारके रोगोंके साथ उत्पन्न हुआ श्वेत कुष्ठ नष्ट होता है ।
शरीरमें दृढता, दिव्यदृष्टि, अत्यन्त पुष्टि, वीर्य्यवृद्धि, शूरता और
चिरायुकी उत्पत्ति होती है । ( १९ ) मालकांगनी का तेल, घी और
शुद्ध गन्धक तीनोंको समानभाग लेकर एकत्र पकावे । फिर शीतल
होजाने पर जो उसको एक २ रत्तीकी मात्रासे लेकर एक मासेकी
मात्रातक सेवन करे अथवा शुद्ध गन्धकको मालकांगनीके तेल और
धीमें मिलाकर उक्त परिमाणसे सेवन करे तो शरीरके समस्तरोग
निर्मूल होते हैं और वह मनुष्य जबतक जीवित रहता है तबतक अत्य-
न्द्र कान्तिवाला, बुद्धिमान्, दिव्यदृष्टिवाला और राजयक्ष्मा रोगसे<noinclude></noinclude>
7lhtpz9e6w5it19ohqnghqcs9bwachl
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३६
104
165912
418505
2026-09-06T10:58:26Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८१४ ) रसरत्नसमुच्चयः । यक्ष्मव्याधिविधूननो गरहरः पर्याप्तदीप्तानको मूलव्याधिनिवारण: किमपरं सर्वामयध्वंसनः॥७३॥ रम्भापक्कफलं घृतं दधि पयः क्षैरेयकं मण्डका... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418505
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८१४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
यक्ष्मव्याधिविधूननो गरहरः पर्याप्तदीप्तानको
मूलव्याधिनिवारण: किमपरं सर्वामयध्वंसनः॥७३॥
रम्भापक्कफलं घृतं दधि पयः क्षैरेयकं मण्डका
बालं तालफलं सिता च पललं संतानिका मोदकाः ।
खर्जूरं वरपानकं च वटकाः पुंड्रेक्षवः सारसं
गुर्वन पनसं तथा शिखरिणी पथ्यं रसेऽस्मिन्मतम् ७४
चार तोले सुवर्णके कण्टक वेधी पत्र बनाकर उनमें ६ मासे पारा
मिलाकर दोनोंको तीन दिन तक खरल करे । फिर हींग, सिंगरफ
गन्धक, सोनामाखी और काला सुरमा इनको समान भाग लेकर चूर्ण
करलेवे । इस चूर्णको सवाचार तोले लेकर एक सम्पुटमें आधा नीचे
और आधा ऊपर रक्खे और उसके बीचमें पत्थर के ऊपर सोनेके
पत्रोंको रखकर कपरौटी करके गजपुटमें पकावे । इस प्रकार १०० बार
पुट देनेसे उत्तम प्रकारसे सुवर्णकी निरुत्य भस्म होजाती है । उस
भस्मसे दुगुना पारा, पारेसे दुगुना सिंगरफ और सिंगरफसे दुगुनी
सुवर्णमाक्षिककी भस्म लेकर सबको एकत्र खरल कर लेवे । फिर
बिजौरा नींबू के रस में निरन्तर दो दिनतक घोटकर गोला बनाकर
सुखालेवे, उस गोलेको सम्पुटमें रखकर ऊपरसे कपरौटी करके एक
मटके में नीचे ऊपर धानोंकी भूसी भरकर उसके बीच में सम्पुटको दाब-
कर पुटदेवे । इस प्रकार बिजौरे नींबूके रसमें घोट घोटकर तीन बार
भूसी में पुटदेवें । फिर गौके गोबरके उपलोंकी अग्निके द्वारा तीन बाराह
पुटदेवे । फिर बिजौरे नींबू के रसमें घोटकर २० आरने उपलों की
अनिके द्वारा १० पुटदेवे । इसके पश्चात् ३० आरने उपलोंकी अग्निसे २०
पुटदेव और प्रत्येक पुटके अन्तमें बिजौरे नींबू के रसमें घोटता जाय ।
फिर उसमें चौथाई भाग वैकान्तमणिकी भस्म डालकर खरल करके
भांगरे के रसमें सात बार भावना देकर सुखालेवे । इस प्रकार यह<noinclude></noinclude>
8uf0hqiknm8njfglm7pnnkq83tgla1y
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६०
104
165913
418506
2026-09-06T11:00:00Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८३८ ) रसरत्नसमुच्चयः । अधृष्यो रुग्जरामृत्यु शस्त्रा ग्रिविषवारिभिः ॥ जीवेद्वर्षसहस्रं वै सर्वभावेष्वतीन्द्रियः ॥ २१ ॥ ताम्ररूप्यसुवर्णानामयमेव पृथग्विध... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418506
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८३८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
अधृष्यो रुग्जरामृत्यु शस्त्रा ग्रिविषवारिभिः ॥
जीवेद्वर्षसहस्रं वै सर्वभावेष्वतीन्द्रियः ॥ २१ ॥
ताम्ररूप्यसुवर्णानामयमेव पृथग्विधिः ।
द्विगुणं तद्गुणोत्कर्षाज्जानीयादुत्तरोत्तरम् ॥ २२ ॥
तिलके समान ऊँचे, चार अंगुल चौडे और २१ अंगुल लम्बे
लोहे के पात्रको लेकर अग्निमें तपा तपाकर आमलों के रसमें बुझावे ।
फिर धीके चिकने १ मिट्टी के बर्तनये १०० पल आमलोंका उत्तम स्वरस
या रस भरकर उसमें उक्त पात्रको डाल देवे और बर्तन के मुँहको
अच्छे ढक्कन से ढककर ऊपर से कपरौटी करके राख के ढेर में गाड देवे ।
इसके पश्चात् महीने महीने भर में उसको निकालकर लोहे के मुसलेसे
घोटकर फिर वैसेही बन्द करके गाड देवे । जब आमलोका रस सुख-
जाय तब और रस डालदेवे। इस प्रकार एक वर्ष तक रखने से लोहेका
पात्र गल जाता है । फिर उसको उस बर्तनमें से निकालकर लोहेकी
कढाई में डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकाने और अँगूठेकी गाँठके
समान अग्रभागवाले लोहेके खुवे (दंडे ) से घोट घोटकर कल्क बना
लेवे । फिर उस कल्ककी तीन २ मासेकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन
एकसे लेकर तीन गोली तक उन्हीं की समानभाग शहद और घृतमें
मिलाकर सेवन करे ) यदि आवश्यकता हो तो शहद और घृतको
मिलाकर ऊपर से और चाटलेवे। औषध के जीर्ण होजानेपर जब क्षुधा लगे
तब घी, रस, दूध, यूष, साठी चाबलोंका भात आदि पदार्थोंको मिला-
कर भोजन करे । इस प्रकार एक वर्ष तक इस रसको सेवन करे । फिर
दूसरे वर्ष में औषध सेवन न करे, केवल हल्के और हितकर पदार्थोंका
भोजन करे और नियमित रूपसे व्यवहार करता हुआ कुटीमें
बास करे । अर्थात् घरसे बाहर न निकले । दूसरे वर्षको इस
प्रकार व्यतीत करके फिर इच्छानुसार आहार विहार करे । इस<noinclude></noinclude>
shc50bj9tnpke7ou2h0sgkre92afwdm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८३
104
165914
418507
2026-09-06T11:00:48Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८६१ ) १३ ॥ १४ ॥ पत्ररूपेण कुत्रापि मृत्तिकारूपतः कचित् ॥ १० ॥ कुत्रचित्तोयरूपेण धातुरूपेण कुत्रचित् । कंदरूपेण कुत्रापि त्रयोदशविधं विषम् ॥ ११... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418507
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८६१ )
१३ ॥
१४ ॥
पत्ररूपेण कुत्रापि मृत्तिकारूपतः कचित् ॥ १० ॥
कुत्रचित्तोयरूपेण धातुरूपेण कुत्रचित् ।
कंदरूपेण कुत्रापि त्रयोदशविधं विषम् ॥ ११ ॥
तेषु श्रेष्ठं कन्दविषं तत्रयोदशधा स्मृतम् ।
कर्कटं कालकूटं च वत्सनाभं हलाहलम् ॥ १२ ॥
वालुकं कर्दमं चैव सक्तकं मूलकं तथा ।
सर्वपं श्रृंगकं देवि मुस्तकं च महाविषम् ॥
हारिद्रकमिति प्रोक्त त्रयोदशविधं विषम् ॥
कर्कटं कपिवर्ण स्यात्काकचंचुनिभं पुनः ॥
कालकूटं ततो ज्ञेयं वत्सनाभं सु पाण्डुरम् ।
गुराकन्दवदेवि नीलवर्णे हलाहलम् ॥ १५ ॥
वालुकं वा कामं कर्दमं कर्दमोपमम् ।
सन्तुकं श्वेतवर्णस्याच्छुक्कुकंदं तु मूलकम् ॥ १६ ॥
सर्षपं पीतवर्ण स्याच्छंगीकं कृष्णपिंगलम् ।
मुस्ताभं मुस्तकं प्रोक्तं रक्तवर्ण महाविषम् ॥
हारिद्रकं पीतवर्णे विषभेदा प्रकीर्तिताः ॥ १७ ॥
चतुर्धा वर्णभेदेन विषंज्ञेयं मनीषिभिः ।
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः श्वेतरक्ताश्च पीतकाः ॥ १८ ॥
कृष्णवर्णः क्रमाज्ज्ञयो वर्णानामनुपूर्वशः ।
मारणे कृष्णवर्ण स्याद्वक्तं तु रसकर्मणि ॥ १९ ॥
पीतवर्णका श्वेतवर्णे रसायने ॥ २० ॥
क्षीरोदसागरे देवि मध्यमाने वरानने ।<noinclude></noinclude>
lr8zz3bbt1twoq8n8l7t38u1owpm12k
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०५
104
165915
418508
2026-09-06T11:01:19Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेषः । ( ८८३) काम काचादीन् सभृगोदं निशान्धताम् ॥१२७॥ रंभाकन्दाम्भसा पुष्पं पिलं ताम्रमधूत्कटम् । सतूलमार्तिदन्तानां गण्डूषेण विलेपनात् ॥ १२८ ॥ गोमूत... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418508
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेषः ।
( ८८३)
काम काचादीन् सभृगोदं निशान्धताम् ॥१२७॥
रंभाकन्दाम्भसा पुष्पं पिलं ताम्रमधूत्कटम् ।
सतूलमार्तिदन्तानां गण्डूषेण विलेपनात् ॥ १२८ ॥
गोमूत्रं शिरःशूलं सक्षौद्राम्लं क्षतवणान् ।
भगंदरापचीथीन् सक्षौद्रं सगुडं व्रणान् ॥ १२९ ॥
नारिकेराम्भसा लिंगविकारान्सेवनात्पुनः ।
प्रदरं भृंगसारेण नागपुष्पस्य सर्पिषा ॥ १३० ॥
रम्भाकन्दाम्बुसर्पिभ्य पीतं लिप्तमहेर्विषम् ।
गोत नरमूत्राभ्यामथाssखोवृश्विकस्य च ॥ १३१ ॥
सार्क क्षीरं विलेपेन लूतानां तु विषं जयेत् ।
. शतपत्ररसाज्याभ्यां विषं सर्वे च सर्वथा ॥ १३२ ॥
कांताभ्रकशिलाधातु विषसूतकमाक्षिकम् ।
शीलितं मधुसर्पिभ्योग्याधिवार्ध कमृत्यु जित् ॥ १३३ ॥
नष्टशुक्रः पयोद्राक्षाकपिकच्छुमहाविषम् ।
शीलयेन्मधुसर्पि सखर्जूर सयष्टिकम् ॥ १३४ ॥
क्षीरक्षोद्रघृतैर्युक्तं पीतं हन्तिविषं विषम् ।
ससिंदुवारतगरं मृतसंजीवनं विषम् ॥ १३५ ॥ .
शिरीषकुसुमं पत्रं विषमाखु विषापहम् ।
देवदारुनतं मांसी दामिली बाकुची विषम् ॥ १३६ ॥
कुष्ठं च पानलेपाभ्यां समस्त विषनाशनम् ।
मनः शिलाञ्जनाऽऽलैला सिन्दुवारामराह्वयम् ॥<noinclude></noinclude>
qgbnnk07p1ndwv3zabugzuzgwc5cdpr
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२८
104
165916
418509
2026-09-06T11:01:55Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (९०६ ) रसरत्नसमुच्चयः । न्यगोधायसनाद्यैर्वा काथयुक्तो मृतो रसः । पथ्यालशुनगोमुत्रैः प्लीहगुल्म निबर्हणः ॥ ५० ॥ कलाययुपशम्बूकक्षाराभ्यां पंक्तिशूलनुत् । सम्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418509
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९०६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
न्यगोधायसनाद्यैर्वा काथयुक्तो मृतो रसः ।
पथ्यालशुनगोमुत्रैः प्लीहगुल्म निबर्हणः ॥ ५० ॥
कलाययुपशम्बूकक्षाराभ्यां पंक्तिशूलनुत् ।
सम्यूषणतिलक्काथेनामशूलस्य नाशनः ॥ ५१ ॥
नवनीतसुधाक्षारभावितोऽभययोदरे ।
सहितः सहितो यष्टीवारिणा कामलाभये ॥ ५२ ॥
फलत्रिकादिकाथेन पाण्डुशोफे सकामले ।
शोफे सविभूविकाथ गोमूत्रसंयुतः ॥ ५३ ॥
निम्बालकककुष्ठैः प्रशस्तः स मृतो रसः ॥ ९४ ॥
रसोनराजिकावह्निनीलिमार्कवपल्लवैः ।
तुल्यं भल्लातकं क्षिष्वा क्षीरे तैलं विपाचितम् ॥५५ ॥
भूशिरीषसुपर्णाक्षोः पञ्चांगं माक्षिकं घृतम् ।
रसं च लीवा कुष्टात लिम्पेत्रिकटुना तनुम् ॥
रसगंधकपिष्टया वा कटुतेलाभियुक्तया ॥ ५६ ॥
कर्पूरवल्लीसह निम्बतैलपातालमूलीरसभाषि-
तेत । रसेन लिह्यत्सकलं हठं वा
विचूर्णितं पुष्परसेन कुष्ठी ॥ ५७ ॥
फेनिलफलाहिदवकन्दरसं खादतोऽनुदिनम् ।
फेनिलमूलोद्वर्तममाचरतोपि च कुतः कुष्ठम् ॥५८॥
चित्रकवानरिवायसितुण्डी बाकुचिका द्विगुणाः
परिपीताः । मूत्रयुता मृतसुतसमेता-
स्तक्रभुजः शमयंति किलासम् ॥ ६९ ॥<noinclude></noinclude>
stvnvykudcj3a1mowbueatwaseacvwc
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९५१
104
165917
418510
2026-09-06T11:02:33Z
Bnarayanan V
10460
/* Problematic */
418510
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Bnarayanan V" /></noinclude><noinclude></noinclude>
qdu7o4z2rnpstubrv27b5r2mtq4flnm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९५२
104
165918
418511
2026-09-06T11:03:13Z
Bnarayanan V
10460
/* Problematic */
418511
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Bnarayanan V" /></noinclude>नमराज श्रीकृष्णदास
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.<noinclude></noinclude>
s2mkntgcyg1b6je5wows639fhnpkeav
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२५
104
165919
418512
2026-09-06T11:04:06Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ . भाeाटीको पेसः । ( ७०३) त्रिकुटा को प्रतिदिन प्रातः कालम एक २ रत्ती परिमाण लेकर वच, और वायविडंग के चूर्णक साथ प्रयोग करे और आधे पहर ( १ ॥ घटेके बाद) बकरी के मूत्रका अनु... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418512
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>.
भाeाटीको पेसः ।
( ७०३)
त्रिकुटा
को प्रतिदिन प्रातः कालम एक २ रत्ती परिमाण लेकर वच,
और वायविडंग के चूर्णक साथ प्रयोग करे और आधे पहर ( १ ॥
घटेके बाद) बकरी के मूत्रका अनुपान करावे । अथवा वज्र, त्रिकुटा
आर वायविडंग इनके कल्कको चौगुने पानी में घोलकर उसमे १६
मुने सरसों तेलको डालकर यथाविधि तेलको पकावे । उस तेलमें
त्रिकुटेकी बारीक चूर्ण मिलाकर उसकी रोगीको नस्य देवे और दो
चार बूंद तेल रोगीकी नाक में टपका देवे । इस प्रकार इस रसको
व्यवहार करनेसे अपस्मार रोग नाश होता है ॥ ८-१२ ॥
प्रत्ययसूत रस ।
त्रिलोहपिष्ट स्रोतोज॑सृष्टित्रययुतं रसम् ।
गंधतैले सुसिद्ध तदपस्मारहरं परम् ॥
सुतकः प्रत्ययाख्योऽसौ उन्मादापस्मृती हरेत् ॥ १३॥
सुवर्णभस्म, चाँदी की भस्म, ताँबेकी भस्म, सफेद सुरमा, पारा,
। गन्धक और अभ्रक इनको समानभाग लेकर प्रथम पारदादि तीनों
' चीजोंकी कज्जली करलेवे । फिर उसमें उपर्युक्त भस्मोंको और सबकी
बरावर पारेकी भस्मको मिलाकर खरल करलेवे । इसके पश्चात् उक्त
रसको गन्धकके तेल में पकाकर उपर्युक्त मात्राकी गोलियाँ बनालेवे ।
इन गोलियोंको प्रतिदिन योग्य अनुपानके साथ सेवन करावे । यह
प्रत्ययसूत रस उन्माद और अपस्मार इन दोनों रोगोंको शीघ्र नष्ट
करता है ॥ १३ ॥
सर्वेश्वर रस ।
रसं नारंगमूलं च दंती पाठा पृथक् पृथक् ।
पलमेकं फेनफलमर्कमूलं तथैव च ॥ १४ ॥
१ स्रोतोजशब्देन कृष्णाञ्जनग्रहणमेव ।<noinclude></noinclude>
l3nyeuq23hi8vgfeprvzqjptdmavos9
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७२६
104
165920
418513
2026-09-06T11:04:24Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७०४ ) रसरत्नसमुच्चयः । पलं मृगविषाणं च त्रिफला च पलत्रयम् । एतेषां क्वाथ संयुक्तं दिनानि त्रीणि मर्दयेत् ॥ १५ ॥ अम्लवेतस संयुक्तमर्क क्षीरसमन्वितम् । पंचपंचद... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418513
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७०४ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
पलं मृगविषाणं च त्रिफला च पलत्रयम् ।
एतेषां क्वाथ संयुक्तं दिनानि त्रीणि मर्दयेत् ॥ १५ ॥
अम्लवेतस संयुक्तमर्क क्षीरसमन्वितम् ।
पंचपंचदिने तद्वदमरी रससंयुतम् ॥ १६ ॥
त्रिसप्तदिवस तद्वन्मर्दयेत्सिद्धमौषधम् ।
पिष्टं चित्रक निष्क्वाथे छत्रय निषेवितम् ॥
उन्मादापस्मृती हन्यादेष सर्वश्वरो रसः ॥१७॥
पारेकी भस्म, नारंगकी जड, दन्तीकी जड, पाठ, पोस्तके डोडे,
आककीजड और काले हिरन के सींगकी भस्म ये प्रत्येक औषधि
चार २ ताले और त्रिफला १२ तोले लेवे । इन तबको कूटपीसकर
एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे । फिर भस्मोंको छोडकर अन्य औषधि •
योंका एकत्र क्वाथ करके उसमें उक्त चूर्णको डालकर तीन दिन तक
खरल करे । फिर अम्लवेतके रस और आकके दूधमें पाँच पाँच दिन
तक भावना देकर २१ दिन तक तुलसीके इसमें मर्दन करे फिर चीते के
काढमें एक बार भावना देकर सुखालेवे । इस प्रकार यह सर्वेश्वर रस
सिद्ध होता है इस रसको नित्य तीन २ रसी परिमाण सेवन करने से
उन्माद और अपस्मार रोग दूर होते हैं ॥ १४-१७ ॥
सामान्य उपाय ।
कृष्णचत्तूर पंचांगं कृष्णगोनवनीतकम् ।
षड्गुणं नवनीतात्तु माषकाथचतुर्गुणम् ॥१८॥
क्षित्वा पच्याघृतं तत्तु पथ्यं शाकोदनादिषु ।
शाकेषु काकमाची स्याद्भोजने कृष्ण गोपयः ॥ १९ ॥
शतघा मारिचं चूर्ण कूष्मांडीपुष्पभावितम् ।<noinclude></noinclude>
rjul7sdli58obbetdhx5zz194murpuz
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४७
104
165921
418514
2026-09-06T11:05:19Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (७२५) कूठ, सोंठ, वच, हींग, सोया, सैंजनके बीज, सैंधानमक इन सबको समान भाग, सबके बराबर तेल और समस्त औषधियों तथा तेल आदिसे चौगुना बकरेका पुत्र लेवे । प्रथम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418514
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(७२५)
कूठ, सोंठ, वच, हींग, सोया, सैंजनके बीज, सैंधानमक इन सबको
समान भाग, सबके बराबर तेल और समस्त औषधियों तथा तेल
आदिसे चौगुना बकरेका पुत्र लेवे । प्रथम सम्पूर्ण औषधियों को मूत्रमें
पीसकर कल्क कर लेवे, फिर उसको तेलमें मिलाकर यथाविधि तेलको
सिद्ध करे । यह तेल कानमें डालना, मर्दन करना, पान करना आदि
उपचारोंके द्वारा प्रयोग करनेसे सब प्रकारके कान के रोगों को दूर
करता है ॥ ५ ॥
कृमिकर्णारि बैल |
अधिफेनो वच्चा शुण्ठी सधवं च समं समम् ।
मलाई कद्राः पक्के तस्मिन्पलद्वये ॥ ६ ॥
पूर्वोक्तचूर्ण कषशं क्षिप्त्वोत्तार्य सुशीतलम् ।
तत्तैलं प्रक्षिपेत् कर्णे धुत्र गोमक्षिका व्रजेत् ॥ ७ ॥
समुद्रफेन, बच, सोंठ, सैंधानमक इन चारोंको समान भाग लेकर
चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको एक तोला लेकर ८ बोले अदरख के रस में
पीसकर ८ तोले वेल में मिलाकर तेलको उत्तम प्रकार से पकावे । पक-
कर तेलमात्र शेष रह जानेपर उसको उतार कर शीतल होजाने पर वखमें
छानलेवे । इस तेलकी दो चार बूँदें कानमें डालनेसे कानमें गिरा
हुआ मक्खी आदि जन्तु शीघ्र निकल जाता है और कानकी पीडा
शान्त होजाती है ॥ ६ ॥ ७ ॥
सामान्य उपाय |
कर्णशूलहरः क्षेप्यो लवणार्द्रकयो रसः ।
तिलपर्णीद्रवं तैलं कोष्णं कर्णे प्रपूरयेत् ॥
अर्कपत्रद्ववं तैलं पूरयेत्कर्णशूलनुत् ॥ ८ ॥<noinclude></noinclude>
kkul29qjq1dah8r379m4outhrz0nw3y
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७४८
104
165922
418515
2026-09-06T11:05:49Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ७२६ ) रसरत्नसमुच्चयः । लशुनस्य रसं कोष्णं पूरयेत्कर्णशूलनुत् । मेघनादद्रवैः पूर्ण कर्णे पूयः प्रशाम्यति ॥ मुशली बाकुचीचूर्ण खादेद्वाधिर्यशांतये ॥ ९ ॥ कतकं शि... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418515
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>७२६ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
लशुनस्य रसं कोष्णं पूरयेत्कर्णशूलनुत् ।
मेघनादद्रवैः पूर्ण कर्णे पूयः प्रशाम्यति ॥
मुशली बाकुचीचूर्ण खादेद्वाधिर्यशांतये ॥ ९ ॥
कतकं शिशुलवणमारनालेन पेषयेत ।
कर्णमूलस्थितं स्फोटं सोष्णलेपाद्विनाशयेत् ॥१०॥
पुत्रजीवफलस्यैव मज्जा जलनिपेषिता ।
लेपात्कर्णे गले कक्षे स्फोटं इंत्युरुमूलकम् ॥११॥
तगरब्रह्मवृक्षस्य दंतैर्मूलानि चर्वयेत् ।
रसेन श्रवणं तस्य पूरयेद तियत्नतः ॥
गोमक्षिका विनिर्याति पूरणस्य विधानतः ॥ १२ ॥
मुशलीकंदचूर्ण हि महिषीनवनीततः ।
लोलयेोधयेद्भाण्डे धान्यराशौ निधापयेत् ॥ १३ ॥
सप्ताहादुद्धृत लेद्यं कर्णपालीं विवर्धयेत् ।
चर्मचेटस्य रक्तेन लेपात्कर्णो विवर्धते ॥
वराहोत्थेन तैलेन लेपात्कर्णो विवर्धते ॥ १४ ॥
( १ ) समुद्रनमकको अदरखके रसमें पीसकर कुछेक गरम करके
सुहाता २ कानमें डालनेसे कानका दर्द दूर होता है । ( २ ) तिलोंकी
स्खलके रस में तेलको मिलाकर गरम करके सुहाता २ कानमें डाले,
अथवा आक के पत्तों के रसको तेलमें मिलाकर कुछ गरम करके कानमें
डाले तो कानकी पीडा नष्ट होती है । ( ३ ) लहसुनके मन्दोष्ण
रसको कानमें डालने से कानका शुल दूर होता है । (४) चौलाईके
रसको कानमें डालनेसे कानमेसे पीवका निकलना बन्द<noinclude></noinclude>
1yefnfyisd5njwlsbuocdxxbrjpvf1a
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७६९
104
165923
418516
2026-09-06T11:06:31Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ 'भाषाटीकोपेतः । (७४७) शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक २ भाग लेकर दोनोंको घीग्वारके रस में ३ दिन तक खरल करके गोला बनालेवे । उम गोलको सुखाकर समान भाग शुद्ध ताँबे के सम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418516
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>'भाषाटीकोपेतः ।
(७४७)
शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक २ भाग लेकर दोनोंको
घीग्वारके रस में ३ दिन तक खरल करके गोला बनालेवे । उम
गोलको सुखाकर समान भाग शुद्ध ताँबे के सम्पुटमें बन्द करके हाँडीके
भीतर रक्खे और हांडी को खूब अच्छी तरह राखसे भरकर उसपर
ढ ढककर कपरौटी करे । फिर चूल्हे पर चढाकर तीव्र अनिके
द्वारा पकावे | दोपहर तक ( ६ घंटे ) पकने के बाद स्वांगशीतल
होनेपर उसको उत्तार कर गोलेको निकालकर बारीक चूर्ण करलेने ।
फिर उसको जम्बीरीनींबूके रस में घोट २ कर और सम्पुटमें बन्द
करके ७ बार गजपुटमें पकावे । पश्चात् उसको बारीक पीसकर रख-
लेवे । इस रसको प्रतिदिन एक २ रत्ती परिमाण सेवन करे और इस
रविताण्डव रसके सेवन करनेके पश्चात् घृत, दुग्ध, मिश्री, भात आदि
मधुर पदार्थों का आहार करे । इसपर दिनमें सोना मैथुन औरशीतल
पदार्थों का आहार विहार आदि सर्वथा त्याग देना चाहिये । इस
प्रकार इस रसको सेवन करनेसे भगन्दर रोग अवश्य नष्ट होता
है ॥ ९५-९८ ॥
सामान्य उपाय ।
आदौ सर्वप्रयत्नेन पाकं रक्षेद्भगंदरे ।
स्राव्यं रक्तं व्रणे जाते जलौका वा प्रयोजयेत् ॥
लांग लीकृष्णघत्तर विषमुष्टीं प्रलेपयेत् ॥ ९९ ॥
रसगंधकसिंधूत्थ तुत्थनागाः सजीरकाः ।
तिक्तकोशातकी सारैः पिष्ट्वा नंति भगंदरम् ॥
गुल्मोक्तचक्रिकाबद्धो भगंदरहरः परम् ॥ १०० ॥
ताम्रचूर्ण सप्तभागं भागमेकं तु पारदम् ।
सैधवं सप्तभागं च गंधकं नवभागिकम् ॥ १०१ ॥
भृंगीद्रावैः सजंबीरैः सप्ताहं घर्मम र्दितम् ।<noinclude></noinclude>
lm3biow9fpmxnwtwe09toiy2h5eqoae
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७७०
104
165924
418517
2026-09-06T11:06:57Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७४८ ) रसरत्नसमुच्चयः । तेन लिप्त स्फुटत्याशु यदि पक्कं भगंदरम् ॥ १०२ ॥ न शस्त्रैश्छेदयेत्प्राज्ञः स्फोटयेल्लेपनादिभिः । हरिद्रा सिंधूत्थं पिता लिप्त्वा स्फ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418517
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७४८ )
रसरत्नसमुच्चयः ।
तेन लिप्त स्फुटत्याशु यदि पक्कं भगंदरम् ॥ १०२ ॥
न शस्त्रैश्छेदयेत्प्राज्ञः स्फोटयेल्लेपनादिभिः ।
हरिद्रा सिंधूत्थं पिता लिप्त्वा स्फुटत्यलम् ॥
नरास्थितैललेपेन स्फुटितं शुष्यति ब्रणम् ॥ १०३ ॥
ताम्र भस्म दिन मर्छ मदयंती पुनर्नवैः ।
मेष शृंगीद्रवैस्तेन व्रणशोधनरोपणम् १०४ ॥
त्रिफलाका थसंयुक्तमार्जारास्थिप्रलेपनात् ।
क्षालयेत्रिफलाकाथैर्हन्याद्दृष्ट भगंदरम् ॥ १०५ ॥
भूतलोत्थं पिबेच्चूर्ण खररक्तेन संयुतम् ।
श्वानास्थिलेपन कार्य शीघ्रं हन्याद्भगंदरम् ॥ १०६ ॥
भगन्दर रोग में सबसे पहले जैसे हो वैसे इस बाराका यत्न करना
चाहिये कि भगन्दर पके नहीं। और जो कदाचित् वह पककर रिसने
लगे और व्रण होजाय तो शस्त्रक्रिया द्वारा अथवा जोंक लगवाकर
वहांका रक्त निकलवा देवे । फिर कलिहारीकी जड, काला धतरा और
कुचला इन तीनोंको एकत्र जलके साथ पीसकर लेप करे । अथवा
पारा, गन्धक, सैंधानमक, तूतिया, सीसा और जीरा इन सबको कडवी
तीरसमें खरल करके लेपकरे तो भन्दररोग अवश्य नष्ट होता है ।
गुल्मरोग में कहाहुआ चक्रिकावद्ध रसभी भगन्दरको नाश करनेके
लिये परम उपयोगी है । ताँबेके बारीक चूरा ७ भाग, पारा १ भाग
सेंधानमक ७ भाग, और गन्धक ९ भाग सबको भाँगरेके इसमें और
जम्बीरीनींबू के रसमें पृथक् २ खरल करके ७ दिनतक तीक्ष्णधूपमें
रक्खे । इस औषधका पकेहुए भगन्दर पर लेपकरनेसे वह तत्काल
फूटजाता है । बुद्धिमान् वैद्यको चाहिये कि पके हुये भगन्दरको<noinclude></noinclude>
llsik2yj2vgu27oizyb21gpez950e52
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९१
104
165925
418518
2026-09-06T11:07:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ७६९) मेषीक्षीरं द्रवं चूर्ण कटुटुंबे विनिक्षिपेत् । प्रलेपनेन सातत्यादस्थिभंगः प्रशाम्यति ॥ ६९ ॥ स्नायुकस्यापनुत्त्यर्थमस्पर्शारिप्रलेपन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418518
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ७६९)
मेषीक्षीरं द्रवं चूर्ण कटुटुंबे विनिक्षिपेत् ।
प्रलेपनेन सातत्यादस्थिभंगः प्रशाम्यति ॥ ६९ ॥
स्नायुकस्यापनुत्त्यर्थमस्पर्शारिप्रलेपनम् ।
दैवेनातिरते स्त्रीणां विषमोत्कट कासनात् ॥७०॥
जायंते व्यापदो योनौ दुष्टबीजार्त्तवात्ततः ।
'पिष्टी ताराकयोरेका तैले गन्धस्य पाचिता ॥७१॥
गुहारोगान्नियच्छति ।
सेवितामधुसर्पि
निद्रावैः सुसंपिष्टं निंबैरण्डस्य बीजकम् ॥ ७२ ॥
योनिशुलहरं पीत्वा गोलकं योनिमध्यगम् ।
सोमराजीदेवदारु निंबदारुनिशाऽसनम् ॥७३॥
तकपिष्टं प्रलेपोयं योन्यामयहरो भवेत् ।
शुनं गृहधूमं तु विशाला सविडंगकम् ॥७४॥
कण्टकारी फलं तोयैः पिष्ट्वा योनौ प्रलेपयेत् ॥
कृमिशूलहरं ख्यातं सप्ताहान्नात्र संशयः ॥ ७५ ॥
त्रियोनिरसगुंजैकं त्रिनिष्कमभयागुडम् ।
पुष्परोधहरं खादेत्पलैकं तिलजीवनम् ॥७६॥
ततः शीतोदकं क्षित्वा पुष्पं स्रवति तत्क्षणात् ।
लांगली कंदचूर्ण वा मूलं वाप्यापमार्गजम् ॥७७॥
इंद्रवारुणिमूलं वा योनिस्थं पुष्परोधनुव ।
तिलमूलकषायं वा ब्रह्मदण्डीय मूलकम् ॥७८॥
यष्टीत्रिकटुकं चूर्ण क्वाथयुक्तं हि पाययेत् ॥ ७९ ॥
पुष्परोधे रक्तगुल्मे स्त्रीणां सद्यः प्रशस्यते ॥८०॥
२७<noinclude></noinclude>
2ti4fx7c5znqz3g9cjkn93mtxpn751v
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/७९२
104
165926
418519
2026-09-06T11:07:51Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ! 1 ( ७७० ) रसरत्नसमुच्चयः । चणकानां रसं चैव तं क्षीरं घृतेन वा । शर्करामधुसंयुक्तं रक्तदोषहरं पिबेत् ॥८१॥ तिलक्काथो गुडं व्योषं तिलभाङ्गयुतं पिबेत् । काथं रक्तभ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418519
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>!
1
( ७७० )
रसरत्नसमुच्चयः ।
चणकानां रसं चैव तं क्षीरं घृतेन वा ।
शर्करामधुसंयुक्तं रक्तदोषहरं पिबेत् ॥८१॥
तिलक्काथो गुडं व्योषं तिलभाङ्गयुतं पिबेत् ।
काथं रक्तभवे गुल्मे नष्टपुष्पेऽथ पाययेत् ॥ ८३ ॥
ग्राह्यं कृष्णचतुर्दश्यां धत्तुरस्य तु मूलकम् ।
कटीं बध्वा रमेत्स्वेच्छं न गर्भः संभवेत्क्वचित् ॥८३
मुक्ते च लभते गर्भ पुरा नागार्जुनोदितम् ॥८४॥
तन्मूलचूर्ण योनिस्थं न गर्भः संभवेत्क्वचित् ॥ ८९
ऋतौ जाते क्षिपेद्योनौ तिलतैलाक्त सैंधवम् ।
द्रवते तत्क्षणादेव तच्छुकं पुष्पितामपि ॥ ८६ ॥
देवालये तु तच्चूर्ण कर्षेकं तोयपेषितम्
पिबेद्गर्भवती नारी गर्भः स्रवति तत्क्षणात् ॥ ८७
(४७) इन्द्रायनकी जडके रसको प्रतिदिन दो दो ताले परिमाण
सेवन करनेस भ्रमयुक्त वात, अर्थात् चक्करोंका आना दूर होता है ।
एवं इन्द्रायन की जड और अडूसेकी जडके हाथको पनि कफ और
वात शान्त होते हैं । (४८) वायविडंग, सौंठ, जवाखार, कान्तलोह
भस्म, जौ और आमले इन औषधियोंके समान भाग चूर्णको प्रतिदिन
शहदमें मिलाकर चाटे । यह प्रयोग अत्यन्त बढ़ी हुई स्थूलता (मुटावे )
को शीघ्र दूर करता है । (४९) त्रिफला, विजयसार, चीता, तेजपात और
हल्दी इनके काढेको प्रतितिन शहद डालकर एक महीने तक सेवन कर-
नेसे हाथी के समान स्थूलशरीरवाला मनुष्यभी कृश (दुबला) होजाता
है ॥ ६३ ॥ ( ५० ) विपरीत प्रकारसे (अर्थात् स्त्रीके नीचे लेट-
कर या गुदामैथुन, हस्तमैथुन आदिके द्वारा) मैथुन करनेपर लिंगमें<noinclude></noinclude>
4jadfg8y6f5s26ncwpj5mbkevmu27tt
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१४
104
165927
418520
2026-09-06T11:08:33Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ७९२ ) रसरत्नसमुचयः । निर्मुक्त होता है । ( २० ) कान्तलोहभस्म, अभ्रक भस्म, त्रिफला, वायविडङ्ग, हल्दी, सोनामाखीकी भस्म, नागरमोथा, देवदारु, त्रिकुटा, इलायची, चीता, पुनर्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418520
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ७९२ )
रसरत्नसमुचयः ।
निर्मुक्त होता है । ( २० ) कान्तलोहभस्म, अभ्रक भस्म, त्रिफला,
वायविडङ्ग, हल्दी, सोनामाखीकी भस्म, नागरमोथा, देवदारु, त्रिकुटा,
इलायची, चीता, पुनर्नवाकी जड, शिलाजीत और अङ्गोलके बीज इन
सब औषधियोंको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करके कपडछान
करलेवे । उस चूर्णकी बराबर शुद्ध गूगल लेकर सबको भांगरे के रस में
खरल करके छोटी छोटी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको मनुष्य
प्रकृतिके अनुकूल मात्रासे सेवन करेवी मेद (चव ), कफ, वायु और
सन्निपात इनके द्वारा तथा अन्यान्य कारणोंसे उत्पन्न होनेवाले भयंकर
रोगोंमें विशेष लाभ होता है । (२१) कान्तलोहभस्म ४ भाग, अम्र-
कभस्म ४ भाग, सुवर्णभस्म १ भाग, ताम्र भस्म १ भाग, वैकान्त-
भरम, सोनामाखीकी भस्म, वायविड और त्रिकुटा ये प्रत्येक उक्त
सब औषधियोंकी बराबर २ भाग लेकर सबको अलग २ वारीक
पीसकर खरल करलेवे और शीशी में भरकर रखदेवे । फिर इसकी
प्रतिदिन देवदारुके तेल में मिलाकर यथोचित मात्रासे चाटे तो यह
रस मनुष्योंके शरीरको अत्यन्त दृढ, कान्तिमान और वृद्धावस्थाते
मुक्त करता है । एवं सब प्रकार के रोगसमूहको शीघ्र नष्ट करता है ।
इसलिये इस सम्पूर्ण रोगोंको हरनेवाली श्रेष्ठ कान्तरसायनको अवश्य
सेवन करना चाहिये | यह अत्यन्त पुष्टिकारक, सुपुत्रदायक, मङ्गलज.
नक और अत्यन्त अग्निप्रदीपक है । (२२) रात्रिके समय एक
कान्तलोह के वर्त्तनमें एक मुट्ठी उत्तम चनोंको शीतल, मधुर जलसे
मिजोकर रखदेव । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल शौचादिसे निवृत्त
होकर उनको चावलिया करे। इस प्रकार ६ महीने तक चनोंको
सेवन करनेसे पित्त और कफके द्वारा होनेवाले रोग, अनेक प्रकार के
कुष्ठ, प्रमेह, पाण्डु, यक्ष्मा और कामला ये सब व्याधियाँ दूर होती
हैं इसपर मट्ठेका पथ्य सेवन करना चाहिये । ( २३ ) कान्तलोहकी
भस्मको उचित मात्रासे त्रिफलेके काथ और दही के पानी में मिला-<noinclude></noinclude>
o0d4wpg0crztul5hdrbop7cuj2svauh
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८१५
104
165928
418521
2026-09-06T11:08:54Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाडीको पेतः । (७९३) कर सेवनकरे तो इससे समस्त रसायनोंके समान उत्तम गुण प्राप्त होता है । (२४) कान्तलोह की भस्म, त्रिकुटा और वायविडङ्ग तीनोंको समान भाग लेकर एकत्र ख... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418521
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाडीको पेतः ।
(७९३)
कर सेवनकरे तो इससे समस्त रसायनोंके समान उत्तम गुण प्राप्त होता
है । (२४) कान्तलोह की भस्म, त्रिकुटा और वायविडङ्ग तीनोंको समान
भाग लेकर एकत्र खरल करलेवे । फिर प्रतिदिन चार २ मासेकी मात्रा से
शहद और घृतमें मिलाकर सेवन करे। उत्तम प्रकारले सिद्ध की हुई
यह दिव्यामृत नामक रसायन वृद्धावस्था, मृत्यु और सम्पूर्ण रोगोंको
विनाश करती है, और सत्पुत्रको प्रदान करती है। पूर्वकालमें श्रीमहा-
देवजीने कालयवन के पिवासे पुत्रोत्पत्तिकै लिये यह प्रयोग कहाया, अब
एव उसके कालयवन जैसा पराक्रमी पुत्र हुआ। (२५) अनकमस्य भर
कान्तलोहभस्म दोनोंको समभाग लेकर अदरख के रस में खरल करे,
फिर उसमें सोलहवाँ भाग सुवर्णका चूर्ण अथवा सोनेके वर्क मिलाकर
बिजोरेन के रसमें सात दिनसक घोटे । इसके पश्चात् वैद्य अडूसा,
गोरखमुण्डी, मुसली और दशमूल इन प्रत्येकके रसमें एक एक भावना
देकर जिन जिन रोगोंको शमन करनेके लिये यह रस तैयार करना हो
उन्हीं उन्हीं रोगोंको हरनेवाली औषधियोंके रसमें सात २ बार भावना
देकर सिद्ध करे । प्रथम वमन विरेचनादि पञ्चकमोंसे शरीरको शुद्ध
करके फिर इस रसायनको यथोचित मात्रासे त्रिफला और त्रिकुटके
चूर्णके साथ शहद और घूतमें मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । पाण्डु,
शोथ, उदररोग, अफरा, संग्रहणी, धातुशोष, खाँसी, सन्ततज्वर, सततज्वर
पुरानाज्वर, विषमज्वर, सब प्रकार के कुष्ठ और बीसों प्रकार के प्रमेह
इन सब रोगोंको नष्ट करनेके लिये यह कान्ताचक नामक रसायन
अत्युत्तम कही गई है । (२६) ब्राह्मीके नवीन पत्रोंको लाकर जलसे साफ
करके ढाकी लकडीकी बनी हुई ओखलीमें डालकर खूब कूटे, फिर
कपडे में निचोड़कर उसका एक आढक (२५६ तोले) परिमाण रस
'निकाले । पाढ, आमले, हल्दी और निसोत इन प्रत्येक के आठ आठ
ताले चूर्णसे उक्त रसके साथ खरल करके कल्क बनालेवे । उस<noinclude></noinclude>
5i4gdnmn0atm705kn0ipoci3eiepayr
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३७
104
165929
418522
2026-09-06T11:09:28Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१५) अमृतार्णव रस सिद्ध होता है । इस रसको श्रीमान् नान्द नामवाले आचार्यने वर्णन किया है। इस रसका मिश्री, घृत और पीपल के चूर्णके साथ एक १ रत्ती परिम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418522
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८१५)
अमृतार्णव रस सिद्ध होता है । इस रसको श्रीमान् नान्द नामवाले
आचार्यने वर्णन किया है। इस रसका मिश्री, घृत और पीपल के चूर्णके
साथ एक १ रत्ती परिमाण मिलाकर सेवन करनेसे अत्यन्त वीर्यकी
वृद्धि होती है और वह मनुष्य अनेकों सुन्दर युवतिस्त्रियों को सन्तुष्ट
करनेमें स्थिर बीयें होता है। यह रसराज यक्ष्मा रोगको निर्मूल करता
है, षिके विकारको हरता है, जठराग्निको अत्यन्त दीपन करता, अर्श-
रोगको समूल नाश करता और क्या सच प्रकारके रोगोंको विनाश
करनेवाला है । पकीहुई केलेकी फली घी, दही, दूध, दूधके बने पदार्थ
खीर, रवडी, ताडके कच्चे फल, मिश्री, मांस, मलाई, लड्डू, खजूर,
उत्तम प्रकार के शर्बत आदि पेयपदार्थ, बडे, पौंडा ईखका रस, सारस
पक्षीका मांस, भारी अन कटहल और शिखरिणी ये सब पदार्थ इस
रसपर सेवन करने उपयोगी हैं ॥ ६६-७४ ॥
मदन संजीवन रस ।
त्रिपलं पारदं शुद्ध गंधकं च चतुष्पलम् ।
मृतमभ्रकसत्वं च स्वर्णकांत व कार्षिकम् ॥ ७५ ॥
द्विपलं हेमविमलं भूनागायाः पलत्रयम् ।
एभिः सर्वच संपेष्य प्रकुर्यान्नष्ट पिष्टिकाम् ॥७६॥
वालुकायंत्र विन्यस्तलोहपात्रे क्षिपेत्ततः ।
अधस्ताज्ज्वालयेदन्निं कारयेत्तदनंतरम् ॥ ७७ ॥
मण्डूकालिकायाश्च मुसल्याश्वित्रकस्य च ।
हस्तिशुण्डयास्तथा कृष्ण निर्गुण्डया गोक्षुरस्य च ॥
रसं कुडवमानेन क्षिपेत्खल्वे मुहुर्मुहुः ॥ ७८ ॥
तत आकृष्य संपिष्य मधुना सह यत्नतः ।
मलमूषोदरे क्षित्वा विनिरुध्य विशोष्य च ॥ ७९ ॥<noinclude></noinclude>
o3m4wd2kuwcak2b2dg1c1tnzinw8rni
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३८
104
165930
418523
2026-09-06T11:10:16Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८१६ ) रसरत्नसमुच्चयः दशभिश्छगणैर्देयं पुटं संपूज्य भैरवम् । करण्डे क्षेपयेत्पट्वा समभ्यचितकन्यकः ॥ ८० ॥ रसः ख्यातो नान्ना भुवि मदनसंजीवन इति द्विवलाभ्यां त... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418523
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८१६ )
रसरत्नसमुच्चयः
दशभिश्छगणैर्देयं पुटं संपूज्य भैरवम् ।
करण्डे क्षेपयेत्पट्वा समभ्यचितकन्यकः ॥ ८० ॥
रसः ख्यातो नान्ना भुवि मदनसंजीवन इति
द्विवलाभ्यां तुल्यो घृतमधुसितादुग्धसहितः ।
निपीतः सप्ताहं प्रचुरमधुराहारसहितो
नरं कुर्यान्नारीशतसुरत सुप्रीतहृदयम् ॥ ८१ ॥
हन्यादुन्मादमुग्रं क्षयगदमरुचि कामलामम्लपित्तं
सर्वान्पित्तोत्थरोगान्रुधिरभवगदान्रक्तपित्तज्वरांश्व ।
रक्तार्शः पित्तगुल्मं सततमतिमहाऽऽनाहमन्तर्विदाहं
पाण्डुं मेहांश्व मोहं प्रदरगदमपि स्त्रीजनस्योत्रमाशु८२
शुद्ध पारा १२ तोले, शुद्ध गन्धक १६ तोले, अत्रकभस्म १ तोला,
सुवर्णभस्म १ तोला, कान्तलोहभस्म १ तोला, सोनामाखीकी भस्म ८
तोले और केंचुओका सत्व १२ तोले इन सबको एकत्र बारीक पीस-
कर वालुकायन्त्रमें रक्खे हुए कोहे के तप्तखरल में भरदेने और उस रसको
करछी से चलाकर एकम एक करके उसके नीचे अभि जलाता जावे ।
फिर ब्राह्मी, मुसली, चीता, हाथीगुण्डा, काली निर्गुण्डी और गोखुरू
इन प्रत्येक औषधिका रस सोलह रतीले क्रम क्रम से खरलमें बारम्बार
डालता जावे । सब रसोंको क्रमशः डालदेनेके पश्चात् स्वाङ्गशतिल
होजाने पर बालुकायन्त्रमेंसे तप्तखरलको निकालकर मधुके साथ बारीक
पीस लेवे । उसको लोहे की मूषामें बन्द करके कपरौटी करके सुखाले वे
फिर भैरव नाथका यथाविधि पूजन करके दश आरने उपलोंकी अनिके
द्वारा उसको पुटदेवे । जब स्वांगशीतल होजाय तब बारीक पीसकर
उसको शीशीमें भरकर रखदेवे । यह रस पृथ्वीपर मदनसंजीवन<noinclude></noinclude>
iutk83grssw011zwif366jb49c46vno
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८३९
104
165931
418524
2026-09-06T11:11:07Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८१७) नामसे प्रसिद्ध है । इस रसको मनुष्य प्रथम कुँवारी कन्याओंका पूजन करके प्रतिदिन दोररत्तीकी मात्रासे वी, मधु और मिश्रीमें मिलाकर सेवन करे और ऊ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418524
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८१७)
नामसे प्रसिद्ध है । इस रसको मनुष्य प्रथम कुँवारी कन्याओंका पूजन
करके प्रतिदिन दोररत्तीकी मात्रासे वी, मधु और मिश्रीमें मिलाकर
सेवन करे और ऊपर दुग्ध पान करे। इस प्रकार सात दिन तक इसको
सेवन करे और मधुरपदार्थोंका विशेषरूपले आहार करे तो यह रस
उस मनुष्यको सैकडों स्त्रियोंके साथ सुरत सुखका यथेच्छ आनन्द
मिलनसे प्रसन्न हृदयवाला बना देता है। तथा भयङ्कर उन्माद, क्षय,
अरुचि, कामला, अम्लपित्त, सब प्रकारके पित्तजन्यरोग, रक्तविकार
रक्तपित्त, ज्वर, खुनी बवासीर, पित्त, गुल्म, सर्वदा रहनेवाला अत्यन्त
भयङ्कर अफरा, आभ्यन्तरिक दाह, पाण्डु, प्रमेह, मोह और खियका
अत्युग्र प्रदररोग इन सबको बहुत शीघ्र नाश करता है | ॥७६-८२ ॥
पुष्पधन्वा रस ।
रम्भाकन्दे हेमतारार्कपिष्टी पक्का यंत्रे भूधरे तं
पचेत् | गंधं दत्त्वा वड्गुणार्थं क्रमेण पश्चात्कांत
तेन तुल्यं क्रमेण ॥ ८३ ॥
दत्त्वा खत्वे शाल्मलीयष्टितोयैः पक्षैकं तन्मर्दये-
नागवळ्याः । नीरैर्यामं पुष्पधन्वा रसः स्याद्वहं
दद्यादस्य पूर्वोक्तयुक्तया ॥ ८४ ॥
पुष्टिवीर्ये दीपनं सोत्र दद्यादन्याद्रोगानूरोग-
योग्यानुपानैः ॥ ८५ ॥
सुवर्ण, चाँदी और ताँबा इन तीनोंकी पिट्ठीको समान भाग लेकर
एक खरल करके केलेके कन्दमें छिद्र करके उसमें भरदे
उस छिद्रको बन्द करके उसपर कपरौटीकर भूधरपुटमें पकावे । स्वाङ्ग
शीतल होजानेपर रसको निकालकर बारीक पीसलेवे । फिर उसमें
छैगुनी गन्धक और उतनेही कान्तलोहभस्म क्रम क्रमसे डालकर<noinclude></noinclude>
g79jh3n61mhfekv5ofigy73ownmi59i
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६१
104
165932
418525
2026-09-06T11:11:39Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । ( ८३९) प्रकार बराबर दो वर्ष तक इस प्रयोगको सेवन करनेवाला मनुष्य जीवनपर्यन्त सब प्रकार के रोग, वृद्धावस्या, मृत्यु, शत्र, अग्ने, विष, जलके उत्पात आदि क... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418525
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
( ८३९)
प्रकार बराबर दो वर्ष तक इस प्रयोगको सेवन करनेवाला मनुष्य
जीवनपर्यन्त सब प्रकार के रोग, वृद्धावस्या, मृत्यु, शत्र, अग्ने, विष,
जलके उत्पात आदि किसीभी विकार से ग्रसित न होकर १ हजार वर्ष
तक जीता है। और सम्पूर्ण कार्योंके करनेमें अतीन्द्रिय अथाह (जिते
न्द्रिय) होता है । ऊपर लोहका प्रयोग बताया गया है। उसमें तीक्ष्ण
लोह अथवा कान्त लोहके पात्रोंको लेना चाहिये । ताँबा, चाँदी और
खुवर्ण इन प्रत्येकके प्रयोगकी यही विधि है । इन धातुओंमें गुणोंका
उत्कर्ष होनेके कारण उत्तरोत्तर क्रमसे एकमे दूसरेको दुगुना गुण
करनेवाली जानना चाहिये । ( अर्थात लोहेसे ताँबा, ताँबसे चादी,
और चाँदी सोनेका प्रयोग दुगुना गुण करता है ।) इस प्रयोग में
हरे आमलोंका स्वरस लेना चाहिये ॥१५- २२॥
कान्तलोह रसायन |
क्षिप्तं पवेष्टिकायंत्रे द्रावितं जलसन्निभम् ॥ २३ ॥
निषितं त्रिफलाकाथे पर्पटीभूतमायसम् ।
संचूर्ण्य तेन क्वाथेन पिष्ट्वा स्थाल्यां विपाचितम् २४
षोडशांगुलगततः संपुटे च परिक्षिपेत् ।
आईका भीरुमुशली विदारी भृंगहस्तिजैः ॥ २५ ॥
रसैस्तथा मुहुस्ताम्र धान्याभ्रं कांजिके प्लुतम् ।
तेन पिष्टं घृतक्षौद्रैर्मत्स्याक्षीमेघनादयोः ॥ २६ ॥
जयन्त्या स्तीक्ष्णशार्द्वयोर्मुशली मणिमन्थयोः
वज्रिणी सातलावद्यावर्षाभूणां रसेन च ॥ २७ ॥
क्षीरेण च पृथक्कुर्यात्पेषणादिक्रियात्रयम् ।
कन्नलाभं त्रयं चैतद्यथा क्वाथं विभावयेत् ॥ २८ ॥
पलानि पञ्च कांतस्य शुल्बका अकवणयोः ।<noinclude></noinclude>
2dylpjlv20assjflkzgm3uk6d1p3ghm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८६२
104
165933
418526
2026-09-06T11:12:09Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८४० ) रसरत्नसमुच्चयः । सार्धे द्वे सप्त सप्तैव वाते पित्ते पुनः क्रमात् ॥ २९ ॥ पञ्चपादेन युक्तानि पञ्च पञ्च कफे पुनः । कांतताम्राके क्षित्वा त्रिफलाकाथमाढरूम... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418526
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८४० )
रसरत्नसमुच्चयः ।
सार्धे द्वे सप्त सप्तैव वाते पित्ते पुनः क्रमात् ॥ २९ ॥
पञ्चपादेन युक्तानि पञ्च पञ्च कफे पुनः ।
कांतताम्राके क्षित्वा त्रिफलाकाथमाढरूम् ॥३०॥
प्रस्थितानि गुणस्याष्टौ क्वाथस्य पयसस्तथा ।
पलानि षोडशाज्यस्य सिचेत्पाकवशात्पुनः ॥३१॥
वातायपेक्षया पोत्कारिकावालुकानिभे ।
अपने वर्णगंधाव्ये कटूष्णे पीतसर्पिषि ॥ ३२ ॥
दंत्यादिचूर्णमावाप्य स्थापितेनेतरेण वा ।
घृतेन पेषितं भाण्डे घृतस्निग्धे निधापयेत् ॥ ३३ ॥
कुर्यात्तत्कल्पनापाको लेष्मणीव रसायने ।
स्वस्थः शरन्निदाघाभ्यामन्यथा कृतशोधनः ॥ ३४॥
घृतमाक्षिकमात्रा वा लोहे लोहेन मर्दितः ।
रसायनं द्वौ दिवसौ द्वे द्वे मुझे ततः परम् ॥ ३५ ॥
द्वंद्ववृद्धया दिने द्वे द्वे परं विंशतिवासरान् ।
प्रातर्विशतियुंजानां भागौ द्वौ भागमेव च ॥ ३६ ॥
प्राग्भक्तमर्धमधे वा भक्षयेदुक्तकालयोः ।
एवं मात्राविभागेन व्याधिक्षीणोपि सर्वदा ॥ ३७ ॥
पश्चादष्टपलक्षीरं धारोष्णं श्रुतमेव वा ।
वयःस्तंभेऽनुपातव्यं व्याधी काथो यथोदितः॥३८॥
आस्वाद्य चातु मुस्तानां निर्यासं दन्तपीडितम् ।
मुलाने भक्षयेत्तासामास्यवैरस्यनुत्तये ॥ ३९ ॥
क्रूरकोष्ठस्तु दीप्तानिरनुलोमयितुं मलान् ।<noinclude></noinclude>
86ecd22lkmgz71eg7kuft892qrdw8mm
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/८८४
104
165934
418527
2026-09-06T11:12:39Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८६२ ) रसरत्न समुच्चयः । उत्पन्नममृत देवि तथोत्पन्नं महाविषम् ॥ २१ ॥ मात्रया भक्षितं देवि विषमप्यनृतायते । मात्राधिकं वरारोहे ह्यनृतं हि विषं भवेत् ॥ २२ ॥ विषं... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418527
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८६२ )
रसरत्न समुच्चयः ।
उत्पन्नममृत देवि तथोत्पन्नं महाविषम् ॥ २१ ॥
मात्रया भक्षितं देवि विषमप्यनृतायते ।
मात्राधिकं वरारोहे ह्यनृतं हि विषं भवेत् ॥ २२ ॥
विषं युंजीत नित्यं वै रसायन गुणैषिणः ।
घृतोपस्कृत देहस्य विशुद्धस्य हिताशिनः ॥ २३ ॥
सात्त्विकस्यो दिते भानौ योज्यं शीतवसंतयोः ।
ग्रीष्मे चात्ययिके व्याधौ न वर्षासु न दुर्दिने ॥२४॥
न क्रोधिते न पितातें नक्कीबे राजवेश्मनि ।
क्षुतृष्णाश्रमधर्माध्वन्याभ्यंतर निपीडिते ॥
गर्भिण्यां बालवृद्धेषु न रूक्षेषु न मर्मसु ॥ २५ ॥
अभ्यस्तेऽपि विषे यत्नाद्वर्जनीयान्विवर्जयेत् ।
कट्वम्ललवणं तैल दिवास्वप्रानलातपान् ॥ २६ ॥
विभ्रमं कर्णरुजमन्यांश्चानिलजान्गदान ।
विषं रूक्षाशिनः कुर्यान्मृत्युमेव त्वजीर्णिनः ॥ २७ ॥
श्रीमहादेवजी कहते हैं कि- हे देवि, हे वरारोहे, जहाँपर यह महा
विष उत्पन्न हुआ है उसको और उसके भेदोंको विस्तारपूर्वक कह-
हूँ सुनो। हे वरानने, एक समय ब्रह्माको आदि लेकर देवता, दैत्थ,
सर्प, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच, किन्नर और बलिराज ये
सब सम्मिलित होकर क्षीरसमुद्रको मथने की इच्छा से वहाँ पर गये ।
तच मन्दराचलको मन्थान दण्ड (रई) बनाकर उसको शेष नागसे
लपेट कर के एक तरफसे देवता
द्वको मथा । हे सुरसुन्दरि,
• आदि रत्नोंके समूह उत्पन्न हुए
और दूसरी तरफसे दैत्योंने समु-
प्रिये, उस समय उसमेंसे कामधेनु
। प्रथम अत्यन्त निर्मल लक्ष्मी
उत्पन्न हुई पीछेसे उच्चैःश्रवा घोडा, बडेमारी शरीरवाला ऐरावत<noinclude></noinclude>
3oohlefg7sy3fubp8idafo1sxjyenud
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०६
104
165935
418528
2026-09-06T11:13:18Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ ( ८८४) इस रत्न समुच्चयः । सरक्तं कुकुमविषं ध्यातं निःसंहृबोधनम् ॥ १३७ ॥ दाहे विषोद्भवे लेपः समतुक्षीरघृतैर्युतः ॥ १३८ ॥ (४३) मिलावे, चीता, अयलतास और विष इन चारोंको... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418528
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>( ८८४)
इस रत्न समुच्चयः ।
सरक्तं कुकुमविषं ध्यातं निःसंहृबोधनम् ॥ १३७ ॥
दाहे विषोद्भवे लेपः समतुक्षीरघृतैर्युतः ॥ १३८ ॥
(४३) मिलावे, चीता, अयलतास और विष इन चारोंको गो
पीसकर लेप करनेसे विचर्चिका, दाद, खुजली और फिटिभ कुछ दूर
होता है । (४४) अमलतास के पत्ते, छाल, जड और विष इनको म
पीसकर लेप करनेसेभी उक्त विकार नाश होते हैं । (४५) असीस.
तुम्बरुके बीज, असगन्ध, अम्लबेंत, हल्दी, कठूमर, रास्ना, हरसाल,
मैनसिल, पटोलपात, नीम के पत्ते, पीपल, गन्धक, सेंधानमक, विष,
देवदारु और सिरसकी जड इन सबको मट्ठेके साथ पीसकर लेप कर
नेसे कुछ दूर होता है । (४६) करंजफी जड कनेर की जड, आककी
जड, चमेलीकी जड, लाल चन्दन, नेवारको जड, कूठ, मंजीठ, सतौना
हल्दी, तगर, सिम्हालु वच और विष इन सबको समान भाग लेकर
चौगुने गोमूत्र में कल्क बनाकर उसमें सरसोंका तेल डालकर सिद्ध
करे । इस तेलको मालिश करनेसे कुछ नष्ट होता है और दुष्टवण
शुद्ध होता है । (१७) कूठ, कनेर, आँगरा आककी जड, थूहरका दूध,
और सैंधानमक इनके कल्पके द्वारा गोमूत्र में यथाविधि तेलको सिद्ध
करके उसमें विष डालकर मालिश करनेसे कुष्ठ नष्ट होता है । (४८)
चन्दन, देवदारु, मिरच, हल्दी, दारु हल्दी, निसोत और नागरमोथा
ये प्रत्येक चार २ तोले और विष २ तोले इन सबको गोमूत्र में पीसकर
उसमें ब्राह्मीका रस, आकका दूध, गोवरका रस और सरसों का तेल
ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ डालकर उत्तम प्रकारसे तिलको सिद्ध करे ।
यह तेल सिध्म कुष्ठको शीघ्र दूर करता है। (४९) लहसुन, मिरच, विष
सरसों और सैंधानमक इन औषधियोंको समान भाग लेकर तुलसीक
रसम खरल करके बत्तियाँ बनालेवे। और छाया में सुखा लेंवे। इन बत्ति-
याँको पानी में घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे नेत्रोंका फूला, जाला आदि<noinclude></noinclude>
4i1ga2jpa7chnkl61ftfip14adz4754
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९०७
104
165936
418529
2026-09-06T11:13:58Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ xviटीकोपेतः (८८५) विकार दूर होकर आरोग्य लाभ होता है । इस बत्तीको नेत्रमें लगा- ने पर पीछे से घोकी दो तीन बुँदे नेत्रमें डाले और वृराही पान करावे । (५०) मुलैठीका सत्त, मह... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418529
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>xviटीकोपेतः
(८८५)
विकार दूर होकर आरोग्य लाभ होता है । इस बत्तीको नेत्रमें लगा-
ने पर पीछे से घोकी दो तीन बुँदे नेत्रमें डाले और वृराही पान करावे ।
(५०) मुलैठीका सत्त, महुवेके फूल और विष इनको जलमें पीस-
कर कल्क कर लेवे | उस कल्कको समान भाग घृत और चौगुने
दूधमें डालकर विधिपूर्वक वृराको पकावे | यह घृत अल्पकालके
नक्तान्व ( रतौधा) रोगमें नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंको अत्यन्त तृप्त करता
है और उक्त रोगको नष्ट करता है । (५१) मनुष्यका पित्त, गोरोभन
महुवे के फूल, काकडासिंगी, सब्जी, सेंधानमक और श्वेत विष इन
सबको समान भाग लेकर शहदमें खरल करके भंजन बनाले। इस
अंजनको नेत्रोंकी सफेदीमें लगाना विशेष उपयोगी है । और उक्त
औषधिको पानीमें पीसकर कानोंमें डालनेसे कानका तीव्र शुरू नष्ट
होता है । (५२) चिरचिटेका पञ्चाङ्ग मिश्री और विष इनको पानीमें
पीसकर नस्य लेनेसे शिरकी पीडा शमन होती है । (५३) अथवा
मुलैठी, खाँड और विष इनके चूर्ण को घृतमें मिलाकर नस्य लेने से मस्त-
ककी पीडा शान्त होती है। (५४) सोंठ, हरड, विष, पाढ और त्राय.
मालवा इनके चूर्ण की नस्य लेने से नाक की दुर्गन्ध दूर होती है (५५)
श्वेत कमल, मंजीठ और कुचला इनके कल्कके द्वारा सिद्ध किया
हुआ तेल कुरले करनेसे मुख के समस्त रोगोंको नष्ट करता है। (५६)
इलायची, खैरसार, शीतलचीनी, चमेलीको जड, कपूर, चन्दन, बोल,
नागरमोथा, सुगन्धवाला ये सब समान भाग और सबसे दुगुना विष
लेकर सबको खैरसारके रस और गोमूत्रमें खरल करके चने की बरा-
बर गोलियाँ बनावे | ये गोलियाँ मुखमें धारण करनेसे सब प्रकारके
मुखके रोगोंको शमन करती हैं । (५७) सरसों के तेलमें विषको
मिलाकर नस्य लेनेसे पलिस (असमय) बालोंका पकना लोग और
अरुषिका रोग दूर होता है । (५८) थूहरका दूध, आकका दूध.
भाँगरेका रस, गोमूत्र, कलिहारी, विष चोंटली की जड अजवायन की जड<noinclude></noinclude>
rsxmu2jvyn1se0bnxpn4md42ib00c1w
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९२९
104
165937
418530
2026-09-06T11:14:43Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषाटीकोपेतः । (९०७) द्रुतगगनमरी ची बाकुचीतालपत्र्यौ सलिलरिपुन- कुort कृष्णसुंठ्यौ सभृंगम् । मरिचमसित सोम- चित्रक कोलवीजं वरतिलशशिलेखे त्वक् च शाखोटकस्य ॥ ६० ॥ फ... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418530
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषाटीकोपेतः ।
(९०७)
द्रुतगगनमरी ची बाकुचीतालपत्र्यौ सलिलरिपुन-
कुort कृष्णसुंठ्यौ सभृंगम् । मरिचमसित सोम-
चित्रक कोलवीजं वरतिलशशिलेखे
त्वक् च शाखोटकस्य ॥ ६० ॥
फलत्रयं च तत्सर्व मृतसृतसमन्वितम् ।
क्षीरान्नवर्तनो जग्ध्वा श्वित्रमाशु निवर्तयेत् ॥ ६१ ॥
सनिम्बप वक्षौद्रः कुमीन्हन्ति मृतो रसः ।
पीतो लशुनसिद्धेन तैलेनानिलजान्गदान् ॥ ६२ ॥
विश्वैरण्डवत क्षीरसहितो गृध्रसीं जयेत् ।
गुडाभयागुडूच्यम्बुयुक्तः पवनशोणितम् ॥ ६३ ॥
त्रिकटुत्रिफला वेलैः समांशो गुग्गुलुर्जयेत् ।
वातारितैलसंयुक्तः स्थौल्यं भस्मरसान्वितः ॥ ६४ ॥
मधूदकाभ्यां युक्तो वा कार्श्य तु शर्करान्वितः ।
हिंगुसौवर्चलव्योषमूत्रसिद्धेन सर्पिषा ॥
रसो हन्यादपस्मारमुन्मादं च तथाञ्जनात् ॥ ६५ ॥
मधूककुन टी तार्क्ष्य पारावतमलैर्युतः ॥ ६६ ॥
धान्याम्लपिष्टाष्टमपिप्पली का कार्पासबीजान्क-
रमर्दनेन । आदाय तैलं मृतसूतयुक्तमक्ष्णि
प्रयुंजीत विशीर्णरोणि ॥ ६७ ॥
भिन्न भिन्न रोगोंके प्रकरणमें जो योग कहे गये हैं उन योगोंके साथ
पारेकी भस्म को मिलाकर सेवन करनेसे पारा उन सब रोगों को समूल
नष्ट करदेता है । (१) नागरमोथा और पित्तपापडेके कायके साथ<noinclude></noinclude>
9xv2ofuv45ggbjy2pzegg9hq4x5pwim
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३०
104
165938
418531
2026-09-06T11:15:43Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ (९०८) रसरत्नसमुच्चयः । पारेकी भस्मको सेवन करने से ज्वर दूर होता है । (२) दशमूल के क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर उसके साथ पारेकी भस्मको सेवन करने से सन्निपातज्वर शमन... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418531
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>(९०८)
रसरत्नसमुच्चयः ।
पारेकी भस्मको सेवन करने से ज्वर दूर होता है । (२) दशमूल के क्वाथमें
पीपलका चूर्ण डालकर उसके साथ पारेकी भस्मको सेवन करने से
सन्निपातज्वर शमन होता है । (३) शहद और हरडोंके चूर्णके साथ अथवा
अडूसा और पीपल के चूर्णके साथ पारद भस्मको सेवन करनेसे रक्त-
पित्त नष्ट होता है । (४) कटेरी के काथमें पीपल का चूर्ण मिलाकर उसके
साथ सेवन की हुई पारेकी भस्म खाँसीको दूर करती है । (५) बकरी के
दूधमें पीपलका कल्क बनाकर उसके साथ घृतको पका कर सिद्ध कर
लेवे | उस घृत के साथ अथवा त्रिफला, गन्धक, त्रिकुटा और गुड हल
औषधियों के साथ पारेकी भस्मको मिलाकर सेवन करने से क्षयरोग
नष्ट होता है । (६) काला नमक, विजौरा नींबू का रस और मधु
इनके साथ सेवन की हुई पारेकी भस्म हिचकी रोगको शमन करती
है । (७) शहद, मिश्री और खीलोंके पानी के साथ अथवा मूँग के यूपमें
मिश्री डालकर उसके साथ सेवन करनेसे पारेकी भस्म वमन और
दाहको शान्त करती है । (८) पुटपाककी विधिसे पकाये हुए जिमीं-
कन्दके चूर्णको और पारे की भस्मको तेल और सैंधेनमक मिलाकर
सेवन करने से अथवा जिमीकन्दकी छाल और पत्तों का मट्टे के साथ काथ
बनाकर उस कायके साथ पारेकी भस्मको सेवन करनेसे सब प्रका
रका अशेंरोग (बवासीर) दूर होता है । (९) पारेकी भस्मको दुद्धी
वृक्षके पञ्चाङ्गके रसके साथ सेवन करनेसे अतिसार (दस्तों का
होना) रोग और पीपल तथा हींगके साथ सेवन करनेसे विषूचिका
(हैजा ) रोग एवं कॉजी और अण्डकी जडके क्वाथ अथवा
हरड के अवलेह के साथ सेवन करनेसे अजीर्ण रोग नाशको प्राप्त
१ इन सब प्रयोगों में पारदभस्म की मात्रा और अनुपानकी मात्रा नहीं
लिखी गई है। परन्तु इनकी मात्रा रोगके उपद्रव, दोषोंके प्रकोप रोगीकी
अवस्था और देश, काल प्रकृतिका विचार करके देनी चाहिये ।<noinclude></noinclude>
g04xiu26gl7nlbqhy69uqody0ejbqqt
पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/९३१
104
165939
418532
2026-09-06T11:16:14Z
Bnarayanan V
10460
/* अपरिष्कृतम् */ भाषादीकोपेतः । ( ९०९) होता है । (१०) कच्चा बेल और सोंठ दोनोंको समान भाग लेकर बड, गूलर, पीपल, पाखर, बैंस इनके पतोंके हाथमें पीसकर गोला बना लेवे। उस गोलेके ऊपर कपरौटी करक... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
418532
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Bnarayanan V" /></noinclude>भाषादीकोपेतः ।
( ९०९)
होता है । (१०) कच्चा बेल और सोंठ दोनोंको समान भाग
लेकर बड, गूलर, पीपल, पाखर, बैंस इनके पतोंके हाथमें पीसकर
गोला बना लेवे। उस गोलेके ऊपर कपरौटी करके उसको पुटपाक
की विधिले पकावे । स्वाङ्गशीतल होजानेपर बारीक चूर्ण करके
उसमें गुड और पारेकी भस्म मिलाकर सेवन करनेसे दारुण
बिम्बिसी रोग नष्ट होता है । (११) वेल, ककडीका गर्भ, मसू-
रका काय, दूध, खिरनीका रस, तालमखाना और शहद इन
सबको साथ पारेकी भस्मको मिलाकर सेवन करनेसे मूत्रकृच्छ्र
रोग आराम होता है । (१२) पारेकी भस्म, शीलाजीत, पीपल,
बण्डूर भस्म, त्रिफला, नकुलकन्दके बीज, सोनामाखी की भस्म
हल्दी, चाँदी की भस्म, सूर्यकान्तमणिकी भस्म, त्रिकुटा अभ्रक-
भस्म, शुद्ध गूगल और कैथका गूदा इन सब औषधियोंको समान
भाग लेकर एक पीसकरके भाँगरके इसमें एक दिन तक भावना
देकर सुखा लेवे । 'निदानमें' जो २० प्रकारके प्रमेह वर्णन किये
हैं, उन प्रत्येक में क्रम क्रमसे बीस दिन तक इस रसको शहद में
मिलाकर सेवन करे तो यह रस बीसों प्रकार के ममेोंको नष्ट कर
देता है । यह प्रयोग श्रीहरि नामवाले आचार्यका अनुभव किया
हुआ है । (१३) न्यग्रोधादि गण और आसनादि गणकी औष
धियोंके क्वाथके साथ पारेकी भस्मको सेवन कर ऊपरसे गोमूत्र में
पीसा हुआ हरड और लहसुनका कल्क भक्षण करनेसे प्लीहा
(तिल्ली ) और गुल्मरोग निवारण होता है । (१४) मटर के यूष
और शंखकी भस्मके साथ पारदभस्मको प्रयोग करनेसे परिणाम
शूल दूर होता है । (१५) तिलोंके क्वाथमें त्रिकुटेके चूर्णको पारेकी
भस्मको मिलाकर खानेसे आमका शूल नाश होता है । (१६) उदर
रोगमें हरड के चूर्णको प्रथम नैनी घीमें, फिर थूहर के क्षारमें भावना
देकर उसके साथ पारद भस्म मिलाकर सेवन करनी चाहिये । (१७)
पारेकी भस्मको मुलैठीके रसके साथ सेवन करना कामला रोगमे<noinclude></noinclude>
bbpscicxuwgw7m6vkz2sbjua6qmk892