विकिस्रोतः sawikisource https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D MediaWiki 1.47.0-wmf.19 first-letter माध्यमम् विशेषः सम्भाषणम् सदस्यः सदस्यसम्भाषणम् विकिस्रोतः विकिस्रोतःसम्भाषणम् सञ्चिका सञ्चिकासम्भाषणम् मीडियाविकि मीडियाविकिसम्भाषणम् फलकम् फलकसम्भाषणम् साहाय्यम् साहाय्यसम्भाषणम् वर्गः वर्गसम्भाषणम् प्रवेशद्वारम् प्रवेशद्वारसम्भाषणम् लेखकः लेखकसम्भाषणम् पृष्ठम् पृष्ठसम्भाषणम् अनुक्रमणिका अनुक्रमणिकासम्भाषणम् श्रव्यम् श्रव्यसम्भाषणम् TimedText TimedText talk पटलम् पटलसम्भाषणम् Event Event talk लघुपाराशरी 0 11014 418570 35080 2026-09-12T03:23:03Z अनुनाद सिंह 1115 418570 wikitext text/x-wiki {{header | title = लघुपाराशरी | author = अज्ञातः | translator = | section = | previous = | next = | year = | notes = }}<br /> ==प्रथमोऽध्यायः (संज्ञाध्यायः)== <poem> सिद्धान्तमौपनिषदं शुद्धान्तं परमेष्ठिनः । शोणाधरं महः किञ्चिद् वीणाधरमुपास्महे ॥ १ ॥ वयं पाराशरीं होरामनुसृत्य यथामति । उडुदायप्रदीपाख्यं कुर्मो दैवविदां मुदे ॥ २ ॥ फलानि नक्षत्रदशा प्रकारेण विवृण्महे । दशा विंशोत्तरी चात्र ग्राह्या नाष्टोत्तरी मता ॥ ३ ॥ बुधैर्भावादयः सर्वे ज्ञेया सामान्यशास्त्रतः । एतच्छास्त्रानुसारेण संज्ञां ब्रूमो विशेषतः ॥ ४ ॥ पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनिजीवकुजाः पुनः । विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोण चतुरष्टमान् ॥ ५ ॥ </poem> ==द्वितीयोऽध्यायः (फलनिर्णयाध्यायः)== <poem> सर्वे त्रिकोणनेतारो ग्रहाः शुभफलप्रदाः । पतयस्त्रिषडायानां यदि पापफलप्रदाः ॥ ६ ॥ न दिशन्ति शुभं नृणां सौम्याः केन्द्राधिपाः यदि । क्रूराश्चेदशुभं ह्येते प्रबलाश्चोत्तरोत्तरम् ॥ ७ ॥ लग्नाद् व्ययद्वितीयेशौ परेषां साहचर्यतः । स्थानान्तरानुगुण्येन भवतः फलदायकौ ॥ ८ ॥ भाग्यव्ययाधिपत्येन रन्ध्रेशो न शुभप्रदः । स एव शुभसन्धाता लग्नाधीशोऽपिचेत्स्वयम् ॥ ९ ॥ केन्द्राधिपत्यदोषस्तु बलवान्गुरुशुक्रयोः । मारकत्वेऽपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥ १० ॥ बुधस्तदनु चन्द्रोऽपि भवेत् तदनु तद्विधः । न रन्ध्रेशत्व दोषस्तु सूर्याचन्द्रमसोर्भवेत् ॥ ११ ॥ कुजस्य कर्मनेतृत्व प्रयुक्ता शुभकारिता । त्रिकोणस्यापि नेतृत्वे न कर्मेशत्वमात्रतः ॥ १२ ॥ यद्यद्भावगतौ वापि यद्यद्भावेशसंयुतौ । तत्तत्फलानि प्रबलौ प्रदिशेतां तमोग्रहौ ॥ १३ ॥ </poem> ==तृतीयोऽध्यायः (योगफलाध्यायः)== <poem> केन्द्रत्रिकोणपतयः सम्बन्धेन परस्परम् । इतरैरप्रसक्ताश्चेद् विषेशफलदायकाः ॥ १४ ॥ केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम् । सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारकौ ॥ १५ ॥ निवसेतां व्यत्ययेन तावुभौ धर्मकर्मणोः । एकत्रान्यतरो वापि वसेच्चेद्योगकारकौ ॥ १६ ॥ त्रिकोणाधिपयोर्मध्ये सम्बन्धो येन केनचित् । केन्द्रनाथस्य बलिनो भवेद्यदि सुयोगकृत् ॥ १७ ॥ दशास्वपि भवेद्योगः प्रायशो योगकारिणोः । दशाद्वयीमध्यगतस्तदयुक् शुभकारिणाम् ॥ १८ ॥ योगकारकसम्बन्धात् पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः । तत्तद् भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगजं फलम् ॥ १९ ॥ केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेकत्वे योगकारकौ । अन्यत्रिकोणपतिना सम्बन्धो यदि किं परम् ॥ २० ॥ यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ । नाथेनान्यतरेणापि सम्बन्धाद्योगकारकौ ॥ २१ ॥ धर्मकर्माधिनेतारौ रन्ध्रलाभाधिपौ यदि । तयोः समान्धमात्रेण न योगं लभते नरः ॥ २२ ॥ </poem> ==चतुर्थोऽध्यायः (मारकाध्यायः)== <poem> अष्टमं ह्यायुषः स्थानमष्टमादष्टमं च यत् । तयोरपि व्ययस्थानं मारकस्थानमुच्यते ॥ २३ ॥ तत्राप्याद्यव्ययस्थानादुत्तरं बलवत्तरम् । तदीशितुस्तत्रगताः पापिनस्तेन संयुताः ॥ २४ ॥ तेषां दशाविपाकेषु संभवे निधनं नृणाम् । तेषामसम्भवे साक्षाद् व्ययाधीशदशास्वपि ॥ २५ ॥ अलाभे पुनरेतेषां सम्बन्धेन व्ययेशितुः । क्वचिच्छुभानां च दशास्वष्टमेशदशासु च ॥ २६ ॥ केवलानां च पापानां दशासु निधनं क्वचित् । कल्पनीयं बुधैर्नृणां मारकाणामदर्शने ॥ २७ ॥ मारकैः सह सम्बन्धान्निहन्ता पापकृच्छनिः । अतिक्रम्येतरान् सर्वान् भवत्येव न संशयः ॥ २८ ॥ </poem> ==पञ्चमोऽध्यायः (दशाफलाध्यायः)== <poem> न दिशेयुर्ग्रहाः सर्वे स्वदशासु स्वभुक्तिषु । शुभाशुभफलं नृणामात्मभावानुरूपतः ॥ २९ ॥ आत्मसम्बन्धिनो ये च ये वा निजसधर्मिणः । तेषामन्तर्दशास्वेव दिशन्ति स्वदशाफलम् ॥ ३० ॥ इतरेषां दशानाथविरुद्धफलदायिनाम् । तत्तत्फलानुगुण्येन जलान्यूह्यानि सूरिभिः ॥ ३१ ॥ स्वदशायां त्रिकोणेशः भुक्तौ केन्द्रपतिः शुभम् । दिशेत् सोऽपि तथा नोचेदसम्बन्धेन पापकृत् ॥ ३२ ॥ आरम्भो राजयोगस्य भवेन्मारकभुक्तिषु । प्रथयन्ति तमारभ्य क्रमशः पापभुक्तिषु ॥ ३३ ॥ तत्सम्बन्धिशुभानां च तथा पुनरसंयुजाम् । शुभानां तु समत्वेन संयोगो योगकारिणाम् ॥ ३४ ॥ शुभस्यास्य प्रसक्तस्य दशायां योगकारकाः । स्वभुक्तिषु प्रयच्छन्ति कुत्रचिद्योगजं फलम् ॥ ३५ ॥ तमोग्रहौ शुभारूढावसम्बन्धेन केनचित् । अन्तर्दशानुसारेण भवेतां योगकारकौ ॥ ३६ ॥ पापा यदि दशानाथाः शुभानां तदसंयुजाम् । भुक्तयः पापफलदास्तत्संयुक्शुभभुक्तयः ॥ ३७ ॥ भवन्ति मिश्राफलदा भुक्तयो योगकारिणाम् । अत्यन्तपापफलदा भवन्ति तदसंयुजाम् ॥ ३८ ॥ सत्यपि स्वेन सम्बन्धे न हन्ति शुभभुक्तिषु । हन्ति सत्यप्यसम्बन्धे मारक्ः पापभुक्तिषु ॥ ३९ ॥ परस्परदशायां स्वभुक्तौ सूर्यजभार्गवौ । व्यत्ययेन विशेषेण प्रदिशेतां शुभाशुभम् ॥ ४० ॥ लग्नकर्माधिनेतारावन्योन्याश्रयसंस्थितौ । राजयोगविति प्रोक्तं विख्यातो विजयी भवेत् ॥ ४१ ॥ धर्मकर्माधिनेतारावन्योन्याश्रयसंस्थितौ । राजयोगविति प्रोक्तं विख्यातो विजयी भवेत् ॥ ४२ ॥ </poem> == हिन्दी अर्थ == 1. यह श्रुतियों का सिद्धान्त है जिसमें में प्रजापति के शुद्ध अन्तःकरण, बिम्‍बफल के समान लाल अधर वाले और वीणा धारण करने वाले तेज, जिसकी अराधना करता हूँ, को समर्पित करता हूँ। 2. मैं महर्षि पाराशर के होराशास्‍त्र को अपनी मति के अनुसार विचारकर ज्‍योतिषियों के आनन्‍द के लिए नक्षत्रों के फलों को सूचित करने वाले उडूदायप्रदीप ग्रंथ का संपादन करता हूँ। 3. हम इसमें नक्षत्रों की दशा के अनुसार ही शुभ अशुभ फल कहते हैं। इस ग्रंथ के अनुसार फल कहने में विशोंतरी दशा ही ग्रहण करनी चाहिए। अष्‍टोतरी दशा यहां ग्राह्य नहीं है। 4. सामान्‍य ग्रंथों पर से भाव, राशि इत्‍यादि की जानकारी ज्‍योति शास्‍त्रों से जानना चाहिए। इस ग्रंथ में जो विरोध संज्ञा है वह शास्‍त्र के अनुरोध से कहते हैं। 5. सभी ग्रह जिस स्‍थान पर बैठे हों, उससे सातवें स्‍थान को देखते हैं। शनि तीसरे व दसवें, गुरु नवम व पंचम तथा मंगल चतुर्थ व अष्‍टम स्‍थान को विशेष देखते हैं। 6. (अ) कोई भी ग्रह त्रिकोण का स्‍वामी होने पर शुभ फलदायक होता है। (लग्‍न, पंचम और नवम भाव को त्रिकोण कहते हैं) तथा त्रिषडाय का स्‍वामी हो तो पाप फलदायक होता है (तीसरे, छठे और ग्‍यारहवें भाव को त्रिषडाय कहते हैं।) 6. (ब) अ वाली स्थिति के बावजूद त्रिषडाय के स्‍वामी अगर त्रिकोण के भी स्‍वामी हो तो अशुभ फल ही आते हैं। 7. सौम्‍य ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र और पूर्ण चंद्र) यदि केन्‍द्रों के स्‍वामी हो तो शुभ फल नहीं देते हैं। क्रूर ग्रह (रवि, शनि, मंगल, क्षीण चंद्र और पापग्रस्‍त बुध) यदि केन्‍द्र के अधिपति हों तो वे अशुभ फल नहीं देते हैं। ये अधिपति भी उत्‍तरोतर क्रम में बली हैं। (यानी चतुर्थ भाव से सातवां भाव अधिक बली, तीसरे भाव से छठा भाव अधिक बली) 8. लग्‍न से दूसरे अथवा बारहवें भाव के स्‍वामी दूसरे ग्रहों के सहचर्य से शुभ अथवा अशुभ फल देने में सक्षम होते हैं। इसी प्रकार अगर वे स्‍व स्‍थान पर होने के बजाय अन्‍य भावों में हो तो उस भाव के अनुसार फल देते हैं। 9. अष्‍टम स्‍थान भाग्‍य भाव का व्‍यय स्‍थान है (सरल शब्‍दों में आठवां भाव नौंवे भाव से बारहवें स्‍थान पर पड़ता है), अतः शुभफलदायी नहीं होता है। यदि लग्‍नेश भी हो तभी शुभ फल देता है (यह स्थिति केवल मेष और तुला लग्‍न में आती है)। 10. शुभ ग्रहों के केन्‍द्राधिपति होने के दोष गुरु और शुक्र के संबंध में विशेष हैं। ये ग्रह केन्‍द्राधिपति होकर मारक स्‍थान (दूसरे और सातवें भाव) में हों या इनके अधिपति हो तो बलवान मारक बनते हैं। 11. केन्‍द्राधिपति दोष शुक्र की तुलना में बुध का कम और बुध की तुलना में चंद्र का कम होता है। इसी प्रकार सूर्य और चंद्रमा को अष्‍टमेष होने का दोष नहीं लगता है। 12. मंगल दशम भाव का स्‍वामी हो तो शुभ फल देता है। किंतु यही त्रिकोण का स्‍वामी भी हो तभी शुभफलदायी होगा। केवल दशमेष होने से नहीं देगा। (यह स्थिति केवल कर्क लग्‍न में ही बनती है) 13. राहू और केतू जिन जिन भावों में बैठते हैं, अथवा जिन जिन भावों के अधिपतियों के साथ बैठते हैं तब उन भावों अथवा साथ बैठे भाव अधिपतियों के द्वारा मिलने वाले फल ही देंगे। (यानी राहू और केतू जिस भाव और राशि में होंगे अथवा जिस ग्रह के साथ होंगे, उसके फल देंगे।)। फल भी भावों और अधिपतियो के मु‍ताबिक होगा। 14. ऐसे केन्‍द्राधिपति और त्रिकोणाधिपति जिनकी अपनी दूसरी राशि भी केन्‍द्र और त्रिकोण को छोड़कर अन्‍य स्‍थानों में नहीं पड़ती हो, तो ऐसे ग्रहों के संबंध विशेष योगफल देने वाले होते हैं। 15. बलवान त्रिकोण और केन्‍द्र के अधिपति खुद दोषयुक्‍त हों, लेकिन आपस में संबंध बनाते हैं तो ऐसा संबंध योगकारक होता है। 16. धर्म और कर्म स्‍थान के स्‍वामी अपने अपने स्‍थानों पर हों अथवा दोनों एक दूसरे के स्‍थानों पर हों तो वे योगकारक होते हैं। यहां कर्म स्‍थान दसवां भाव है और धर्म स्‍थान नवम भाव है। दोनों के अधिपतियों का संबंध योगकारक बताया गया है। 17. नवम और पंचम स्‍थान के अधिपतियों के साथ बलवान केन्‍द्राधिपति का संबंध शुभफलदायक होता है। इसे राजयोग कारक भी बताया गया है। 18. योगकारक ग्रहों (यानी केन्‍द्र और त्रिकोण के अधिपतियों) की दशा में बहुधा राजयोग की प्राप्ति होती है। योगकारक संबंध रहित ऐसे शुभ ग्रहों की दशा में भी राजयोग का फल मिलता है। 19. योगकारक ग्रहों से संबंध करने वाला पापी ग्रह अपनी दशा में तथा योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में जिस प्रमाण में उसका स्‍वयं का बल है, तदअनुसार वह योगज फल देगा। (यानी पापी ग्रह भी एक कोण से राजयोग में कारकत्‍व की भूमिका निभा सकता है।) 20. यदि एक ही ग्रह केन्‍द्र व त्रिकोण दोनों का स्‍वामी हो तो योगकारक होता ही है। उसका यदि दूसरे त्रिकोण से संबंध हो जाए तो उससे बड़ा शुभ योग क्‍या हो सकता है ? 21. राहू अथवा केतू यदि केन्‍द्र या त्रिकोण में बैइे हों और उनका किसी केन्‍द्र अथवा त्रिकोणाधिपति से संबंध हो तो वह योगकारक होता है। 22. धर्म और कर्म भाव के अधिपति यानी नवमेश और दशमेश यदि क्रमशः अष्‍टमेश और लाभेश हों तो इनका संबंध योगकारक नहीं बन सकता है। (उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न)। इस स्थिति को राजयोग भंग भी मान सकते हैं। 23. जन्‍म स्‍थान से अष्‍टम स्‍थान को आयु स्‍थान कहते हैं। और इस आठवें स्‍थान से आठवां स्‍थान आयु की आयु है अर्थात लग्‍न से तीसरा भाव। दूसरा भाव आयु का व्‍यय स्‍थान कहलाता है। अतः द्वितीय एवं सप्‍तम भाव मारक स्‍थान माने गए हैं। 24. द्वितीय एवं सप्‍तम मारक स्‍थानों में द्वितीय स्‍थान सप्‍तम की तुलना में अधिक मारक होता है। इन स्‍थानों पर पाप ग्रह हों और मारकेश के साथ युक्ति कर रहे हों तो उनकी दशाओं में जातक की मृत्‍यु होती है। 25. यदि उनकी दशाओं में मृत्‍यु की आशंका न हो तो सप्‍तमेश और द्वितीयेश की दशाओं में मृत्‍यु होती है। 26. मारक ग्रहों की दशाओं में मृत्‍यु न होती हो तो कुण्‍डली में जो पापग्रह बलवान हो उसकी दशा में मृत्‍यु होती है। व्‍ययाधिपति की दशा में मृत्‍यु न हो तो व्‍ययाधिपति से संबंध करने वाले पापग्रहों की दशा में मरण योग बनेगा। व्‍ययाधिपति का संबंध पापग्रहों से न हो तो व्‍ययाधिपति से संबंधित शुभ ग्रहों की दशा में मृत्‍यु का योग बताना चाहिए। ऐसा समझना चाहिए। व्‍ययाधिपति का संबंध शुभ ग्रहों से भी न हो तो जन्‍म लग्‍न से अष्‍टम स्‍थान के अधिपति की दशा में मरण होता है। अन्‍यथा तृतीयेश की दशा में मृत्‍यु होगी। (मारक स्‍थानाधिपति से संबंधित शुभ ग्रहों को भी मारकत्‍व का गुण प्राप्‍त होता है।) 27. मारक ग्रहों की दशा में मृत्‍यु न आवे तो कुण्‍डली में जो बलवान पापग्रह हैं उनकी दशा में मृत्‍यु की आशंका होती है। ऐसा विद्वानों को मारक कल्पित करना चाहिए। 28. पापफल देने वाला शनि जब मारक ग्रहों से संबंध करता है तब पूर्ण मारकेशों को अतिक्रमण कर निःसंदेह मारक फल देता है। इसमें संशय नहीं है। 29. सभी ग्रह अपनी अपनी दशा और अंतरदशा में अपने भाव के अनुरूप शुभ अथवा अशुभ फल प्रदान करते हैं। 30. दशानाथ जिन ग्रहों के साथ संबंध करता हो और जो ग्रह दशानाथ सरीखा समान धर्मा हो, वैसा ही फल देने वाला हो तो उसकी अंतरदशा में दशानाथ स्‍वयं की दशा का फल देता है। 31. दशानाथ के संबंध रहित तथा विरुद्ध फल देने वाले ग्रहों की अंतरदशा में दशाधिपति और अंतरदशाधिपति दोनों के अनुसार दशाफल कल्‍पना करके समझना चाहिए। 32. केन्‍द्र का स्‍वामी अपनी दशा में संबंध रखने वाले त्रिकोणेश की अंतरदशा में शुभफल प्रदान करता है। त्रिकोणेश भी अपनी दशा में केन्‍द्रेश के साथ यदि संबंध बनाए तो अपनी अंतरदशा में शुभफल प्रदान करता है। यदि दोनों का परस्‍पर संबंध न हो तो दोनों अशुभ फल देते हैं। 33. यदि मारक ग्रहों की अंतरदशा में राजयोग आरंभ हो तो वह अंतरदशा मनुष्‍य को उत्‍तरोतर राज्‍याधिकार से केवल प्रसिद्ध कर देती है। पूर्ण सुख नहीं दे पाती है। 34. अगर राजयोग करने वाले ग्रहों के संबंधी शुभग्रहों की अंतरदशा में राजयोग का आरंभ होवे तो राज्‍य से सुख और प्रतिष्‍ठा बढ़ती है। राजयोग करने वाले से संबंध न करने वाले शुभग्रहों की दशा प्रारंभ हो तो फल सम होते हैं। फलों में अधिकता या न्‍यूनता नहीं दिखाई देगी। जैसा है वैसा ही बना रहेगा। 35. योगकारक ग्रहों के साथ संबंध करने वाले शुभग्रहों की महादशा के योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में योगकारक ग्रह योग का शुभफल क्‍वचित देते हैं। 36. राहू केतू यदि केन्‍द्र (विशेषकर चतुर्थ और दशम स्‍थान में) अथवा त्रिकोण में स्थित होकर किसी भी ग्रह के साथ संबंध नहीं करते हों तो उनकी महादशा में योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में उन ग्रहों के अनुसार शुभयोगकारक फल देते हैं। (यानी शुभारुढ़ राहू केतू शुभ संबंध की अपेक्षा नहीं रखते। बस वे पाप संबंधी नहीं होने चाहिए तभी कहे हुए अनुसार फलदायक होते हैं।) राजयोग रहित शुभग्रहों की अंतरदशा में शुभफल होगा, ऐसा समझना चाहिए। 37-38. यदि महादशा के स्‍वामी पापफलप्रद ग्रह हों तो उनके असंबंधी शुभग्रह की अंतरदशा पापफल ही देती है। उन महादशा के स्‍वामी पापी ग्रहों के संबंधी शुभग्रह की अंतरदशा मिश्रित (शुभ एवं अशुभ) फल देती है। पापी दशाधिप से असंबंधी योगकारक ग्रहों की अंतरदशा अत्‍यंत पापफल देने वाली होती है। 39. मारक ग्रहों की महादशा में उनके साथ संबंध करने वाले शुभग्रहों की अंतरदशा में दशानाथ मारक नहीं बनता है। परन्‍तु उसके साथ संबंध रहित पापग्रह अंतरदशा में मारक बनते हैं। 40. शुक्र और शनि अपनी अपनी महादशा में अपनी अपनी अंतरदशा में अपने अपने शुभ फल देते हैं। यानी शनि महादशा में शुक्र की अंतरदशा हो तो शनि के फल मिलेंगे। शुक्र की महादशा में शनि के अंतर में शुक्र के फल मिलेंगे। इस फल के लिए दोनों ग्रहों के आपसी संबंध की अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। 41. दशम स्‍थान का स्‍वामी लग्‍न में और लग्‍न का स्‍वामी दशम में, ऐसा योग हो तो वह राजयोग समझना चाहिए। इस योग पर विख्‍यात और विजयी ऐसा मनुष्‍य होता है। 42. नवम स्‍थान का स्‍वामी दशम में और दशम स्‍थान का स्‍वामी नवम में हो तो ऐसा योग राजयोग होता है। इस योग पर विख्‍यात और विजयी पुरुष होता है। [[वर्गः:ज्योतिष्यम्]] b78u7ulz9hbbw0aqmdgs2fxt10nshyl साङ्ख्यकारिका 0 11042 418560 357249 2026-09-11T17:38:46Z अनुनाद सिंह 1115 418560 wikitext text/x-wiki == आचार्यश्रीईश्वरकृष्णविरचिता सांख्यकारिका == <poem> दु:खत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥ <br> दृष्टवदानुश्रविक: स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्त: । तद्विपरीत: श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ २ ॥ <br> मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष: ॥ ३ ॥ <br> दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धि: प्रमाणाद्धि ॥ ४ ॥ <br> प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं त्रिविधमनुमानमाख्यातम् । तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनं तु ॥। ५ ॥ <br> सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् । तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥ ६ ॥ <br> अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् । सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ ७ ॥ <br> सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात् कार्यतस्तदुपलब्धे: । महदादि तच्च कार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपं च ॥ ८ ॥ <br> असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥ ९ ॥ <br> हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिंङ्गम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ १० ॥ <br> त्रिगुणमविवेकि विषय: सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि । व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ॥ ११ ॥ <br> प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका: प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्था: । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणा: ॥ १२ ॥ <br> सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रज: । गुरु वरणकमेव तम: प्रदीपवच्चार्थतो वृत्ति: ॥ १३ ॥ <br> अविवेक्यादे: सिद्धिस्त्रैगुण्यात् तद्विपर्ययाभावात् । कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम् ॥ १४ ॥<br> भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तित: प्रवृत्तेश्च । कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥ १५ ॥<br> कारणमस्त्यव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणत: समुदयाच्च । परिणामत: सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ॥ १६ ॥ <br> संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्यादधिष्ठानात् । पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १७ ॥ <br> जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च । पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥ <br> तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वमकर्तृभावश्च ॥ १९ ॥<br> तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीन: ॥ २० ॥ <br> पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्ग: ॥ २१ ॥ <br> प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशक: । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्चभूतानि ॥ २२ ॥ <br> अध्यवसायो बुद्धिर्धर्मो ज्ञानं विराग ऐश्वर्यम् । सात्त्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥ २३ ॥ <br> अभिमानोऽहंकार: तस्माद्विविध: प्रवर्तते सर्ग: । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥ <br> सात्त्विक एकादशक: प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्र: स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ २५ ॥ <br> बुद्धीन्द्रियाणि चक्षु:श्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहु: ॥ २६ ॥ <br> उभयात्मकमत्र मन: सङ्कल्पमिन्द्रियं च साधर्म्यात् । गुणपरिणामविशेषान्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥ <br> रूपादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति: । वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥ २८ ॥ <br> स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या । सामान्यकरणवृत्ति: प्राणाद्या वायव: पञ्च ॥ २९ ॥ <br> युगपच्चतुष्टयस्य तु वृत्ति: क्रमशश्च तस्य निर्दिष्टा । दृष्टे तथाप्यदृष्टे त्रयस्य् तत्पूर्विका वृत्ति: ॥ ३० ॥ <br> स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥ <br> करणं त्रयोदशविधं तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥ ३२ ॥<br> अन्त:करणं त्रिविधं दशधा बाह्यं त्रयस्य विषयाख्यम् । साम्प्रतकालं बाह्यं त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम् ॥ ३३ ॥ <br> बुद्धिन्द्रियाणि तेषां पञ्च विशेषाविशेषविषयाणि । वाग्भवति शब्दविषया शेषाणि तु पञ्चविषयाणि ॥ ३४ ॥ <br> सान्त:करणा बुद्धि: सर्वं विषयमवगाहते यस्मात् । तस्मात् त्रिविधं करणं द्वारि द्वाराणि शेषाणि ॥ ३५ ॥ <br> एते प्रदीपकल्पा: परस्परविलक्षणा गुणविशेषा: । कृत्स्नं पुरुषस्यार्थं प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥ ३६ ॥<br> सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धि: । सैव च विशिनष्टि पुन: प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥ ३७ ॥ <br> तन्मात्राण्यविशेषास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चभ्य: । एते स्मृता विशेषा: शन्ता घोराश्च मूढाश्च ॥ ३८ ॥ <br> सूक्ष्मा मातापितृजा: सह प्रभूतैस्त्रिधा विशेषा: स्यु: । सूक्ष्मास्तेषां नियता मातापितृजा निवर्तन्ते ॥ ३९ ॥ <br> पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥ ४० ॥ <br> चित्रं यथाऽऽश्रयमृते स्थाण्वादिभ्यो विना यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ ४१ ॥ <br> पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥ ४२ ॥ <br> सांसिद्धिकाश्च भावा: प्राकृतिका वैकृताश्च धर्माद्या: । दृष्टा: करणाश्रयिण: कार्याश्रयिणश्च कललाद्या: ॥ ४३ ॥ <br> धर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद् भवत्यधर्मेण । ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्ध: ॥ ४४ ॥ <br> वैराग्यात् प्रकृतिलय: संसारो भवति राजसाद् रागात् । ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यास: ॥ ४५ ॥ <br> एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्य: । गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत् ॥ ४६ ॥ <br> पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् । अष्टाविंशतिभेदा तुष्टिर्नवधाऽष्टधा सिद्धि: ॥ ४७ ॥ <br> भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोह: । तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्र: ॥ ४८ ॥ <br> एकादशेन्द्रियवधा: सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनाम् ॥ ४९ ॥ <br> आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्या: । बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमता: ॥ ५० ॥ <br> ऊह: शब्दोऽध्ययनं दु:खविघातास्त्रय: सुहृत्प्राप्ति: । दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धे: पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविध: ॥ ५१ ॥ <br> न विना भावैर्लिङ्गं न विना लिङ्गेन भावनिर्वृत्ति: । लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविध: प्रवर्तते सर्ग: ॥ ५२ ॥ <br> अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति । मानुषकश्चैकविध: समासतो भौतिक: सर्ग: ॥ ५३ ॥<br> उर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलत: सर्ग: । मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त: ॥ ५४ ॥ <br> तत्र जरामरणकृतं दु:खं प्राप्नोति चेतन: पुरुष: । लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दु:खं स्वभावेन ॥ ५५ ॥ <br> इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्त: । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भ: ॥ ५६ ॥ <br> वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्ति: प्रधानस्य ॥ ५७ ॥ <br> औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोक: । पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥ <br> रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् । पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृति: ॥ ५९ ॥ <br> नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिण: पुंस: । गुणवत्यगुणस्य सत: तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥ ६० ॥<br> प्रकृते: सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति । या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥ ६१ ॥ <br> तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यते नापि संसरति कञ्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृति: ॥ ६२ ॥ <br> रूपै: सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृति: । सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥ <br> एवं तत्वाभ्यास्यान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ ६४ ॥ <br> तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् । प्रकृतिं पश्यति पुरुष: प्रेक्षकवदवस्थित: स्वस्थ: ॥ ६५ ॥ <br> रङ्गस्थ इत्युपेक्षक एको दृष्टाहमित्युपरमत्यन्या । सति संयोगेऽपि तयो: प्रयोजनं नास्ति सर्गस्य ॥ ६६ ॥ <br> सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ । तिष्ठति संस्कारवशाच् चक्रभ्रमिवद् धृतशरीर: ॥ ६७ ॥ <br> प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृतौ । ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ६८ ॥ <br> पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् । स्थित्युत्पत्तिप्रलयाश्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥ ६९ ॥ <br> एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ । आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम् ॥ ७० ॥ <br> शिष्यपरम्परयाऽऽगतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्यादिभि: । संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥ ७१ ॥ <br> सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्था: कृत्स्नस्य षष्टितन्त्रस्य । आख्यायिकाविरहिता: परवादविवर्जिताश्चापि ॥ ७२ ॥ <br> </poem> == बाह्यसूत्राणि == *[https://www.kaggle.com/datasets/sandeepdixit1/sankhya-karika Sankhyakarika Sanskrit, Sanskrit-English, English-Meaning Dataset] [[वर्गः:साङ्ख्यदर्शनम्]] att8cmrqmxzm092dxh0khvnnvfwu6e6 418561 418560 2026-09-11T17:46:53Z अनुनाद सिंह 1115 अनुनाद सिंह इत्यनेन शीर्षकं परिवर्त्य [[सांख्यकारिका]] पृष्ठं [[साङ्ख्यकारिका]] प्रति स्थानान्तरितम्: शीर्षक में गलत वर्तनी 418560 wikitext text/x-wiki == आचार्यश्रीईश्वरकृष्णविरचिता सांख्यकारिका == <poem> दु:खत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥ <br> दृष्टवदानुश्रविक: स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्त: । तद्विपरीत: श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ २ ॥ <br> मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष: ॥ ३ ॥ <br> दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धि: प्रमाणाद्धि ॥ ४ ॥ <br> प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं त्रिविधमनुमानमाख्यातम् । तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनं तु ॥। ५ ॥ <br> सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् । तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥ ६ ॥ <br> अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् । सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ ७ ॥ <br> सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात् कार्यतस्तदुपलब्धे: । महदादि तच्च कार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपं च ॥ ८ ॥ <br> असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥ ९ ॥ <br> हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिंङ्गम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ १० ॥ <br> त्रिगुणमविवेकि विषय: सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि । व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ॥ ११ ॥ <br> प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका: प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्था: । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणा: ॥ १२ ॥ <br> सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रज: । गुरु वरणकमेव तम: प्रदीपवच्चार्थतो वृत्ति: ॥ १३ ॥ <br> अविवेक्यादे: सिद्धिस्त्रैगुण्यात् तद्विपर्ययाभावात् । कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम् ॥ १४ ॥<br> भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तित: प्रवृत्तेश्च । कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥ १५ ॥<br> कारणमस्त्यव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणत: समुदयाच्च । परिणामत: सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ॥ १६ ॥ <br> संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्यादधिष्ठानात् । पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १७ ॥ <br> जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च । पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥ <br> तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वमकर्तृभावश्च ॥ १९ ॥<br> तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीन: ॥ २० ॥ <br> पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्ग: ॥ २१ ॥ <br> प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशक: । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्चभूतानि ॥ २२ ॥ <br> अध्यवसायो बुद्धिर्धर्मो ज्ञानं विराग ऐश्वर्यम् । सात्त्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥ २३ ॥ <br> अभिमानोऽहंकार: तस्माद्विविध: प्रवर्तते सर्ग: । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥ <br> सात्त्विक एकादशक: प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्र: स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ २५ ॥ <br> बुद्धीन्द्रियाणि चक्षु:श्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहु: ॥ २६ ॥ <br> उभयात्मकमत्र मन: सङ्कल्पमिन्द्रियं च साधर्म्यात् । गुणपरिणामविशेषान्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥ <br> रूपादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति: । वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥ २८ ॥ <br> स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या । सामान्यकरणवृत्ति: प्राणाद्या वायव: पञ्च ॥ २९ ॥ <br> युगपच्चतुष्टयस्य तु वृत्ति: क्रमशश्च तस्य निर्दिष्टा । दृष्टे तथाप्यदृष्टे त्रयस्य् तत्पूर्विका वृत्ति: ॥ ३० ॥ <br> स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥ <br> करणं त्रयोदशविधं तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥ ३२ ॥<br> अन्त:करणं त्रिविधं दशधा बाह्यं त्रयस्य विषयाख्यम् । साम्प्रतकालं बाह्यं त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम् ॥ ३३ ॥ <br> बुद्धिन्द्रियाणि तेषां पञ्च विशेषाविशेषविषयाणि । वाग्भवति शब्दविषया शेषाणि तु पञ्चविषयाणि ॥ ३४ ॥ <br> सान्त:करणा बुद्धि: सर्वं विषयमवगाहते यस्मात् । तस्मात् त्रिविधं करणं द्वारि द्वाराणि शेषाणि ॥ ३५ ॥ <br> एते प्रदीपकल्पा: परस्परविलक्षणा गुणविशेषा: । कृत्स्नं पुरुषस्यार्थं प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥ ३६ ॥<br> सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धि: । सैव च विशिनष्टि पुन: प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥ ३७ ॥ <br> तन्मात्राण्यविशेषास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चभ्य: । एते स्मृता विशेषा: शन्ता घोराश्च मूढाश्च ॥ ३८ ॥ <br> सूक्ष्मा मातापितृजा: सह प्रभूतैस्त्रिधा विशेषा: स्यु: । सूक्ष्मास्तेषां नियता मातापितृजा निवर्तन्ते ॥ ३९ ॥ <br> पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥ ४० ॥ <br> चित्रं यथाऽऽश्रयमृते स्थाण्वादिभ्यो विना यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ ४१ ॥ <br> पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥ ४२ ॥ <br> सांसिद्धिकाश्च भावा: प्राकृतिका वैकृताश्च धर्माद्या: । दृष्टा: करणाश्रयिण: कार्याश्रयिणश्च कललाद्या: ॥ ४३ ॥ <br> धर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद् भवत्यधर्मेण । ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्ध: ॥ ४४ ॥ <br> वैराग्यात् प्रकृतिलय: संसारो भवति राजसाद् रागात् । ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यास: ॥ ४५ ॥ <br> एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्य: । गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत् ॥ ४६ ॥ <br> पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् । अष्टाविंशतिभेदा तुष्टिर्नवधाऽष्टधा सिद्धि: ॥ ४७ ॥ <br> भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोह: । तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्र: ॥ ४८ ॥ <br> एकादशेन्द्रियवधा: सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनाम् ॥ ४९ ॥ <br> आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्या: । बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमता: ॥ ५० ॥ <br> ऊह: शब्दोऽध्ययनं दु:खविघातास्त्रय: सुहृत्प्राप्ति: । दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धे: पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविध: ॥ ५१ ॥ <br> न विना भावैर्लिङ्गं न विना लिङ्गेन भावनिर्वृत्ति: । लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविध: प्रवर्तते सर्ग: ॥ ५२ ॥ <br> अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति । मानुषकश्चैकविध: समासतो भौतिक: सर्ग: ॥ ५३ ॥<br> उर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलत: सर्ग: । मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त: ॥ ५४ ॥ <br> तत्र जरामरणकृतं दु:खं प्राप्नोति चेतन: पुरुष: । लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दु:खं स्वभावेन ॥ ५५ ॥ <br> इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्त: । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भ: ॥ ५६ ॥ <br> वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्ति: प्रधानस्य ॥ ५७ ॥ <br> औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोक: । पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥ <br> रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् । पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृति: ॥ ५९ ॥ <br> नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिण: पुंस: । गुणवत्यगुणस्य सत: तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥ ६० ॥<br> प्रकृते: सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति । या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥ ६१ ॥ <br> तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यते नापि संसरति कञ्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृति: ॥ ६२ ॥ <br> रूपै: सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृति: । सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥ <br> एवं तत्वाभ्यास्यान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ ६४ ॥ <br> तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् । प्रकृतिं पश्यति पुरुष: प्रेक्षकवदवस्थित: स्वस्थ: ॥ ६५ ॥ <br> रङ्गस्थ इत्युपेक्षक एको दृष्टाहमित्युपरमत्यन्या । सति संयोगेऽपि तयो: प्रयोजनं नास्ति सर्गस्य ॥ ६६ ॥ <br> सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ । तिष्ठति संस्कारवशाच् चक्रभ्रमिवद् धृतशरीर: ॥ ६७ ॥ <br> प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृतौ । ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ६८ ॥ <br> पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् । स्थित्युत्पत्तिप्रलयाश्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥ ६९ ॥ <br> एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ । आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम् ॥ ७० ॥ <br> शिष्यपरम्परयाऽऽगतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्यादिभि: । संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥ ७१ ॥ <br> सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्था: कृत्स्नस्य षष्टितन्त्रस्य । आख्यायिकाविरहिता: परवादविवर्जिताश्चापि ॥ ७२ ॥ <br> </poem> == बाह्यसूत्राणि == *[https://www.kaggle.com/datasets/sandeepdixit1/sankhya-karika Sankhyakarika Sanskrit, Sanskrit-English, English-Meaning Dataset] [[वर्गः:साङ्ख्यदर्शनम्]] att8cmrqmxzm092dxh0khvnnvfwu6e6 418563 418561 2026-09-11T17:47:27Z अनुनाद सिंह 1115 /* आचार्यश्रीईश्वरकृष्णविरचिता सांख्यकारिका */ 418563 wikitext text/x-wiki == आचार्यश्रीईश्वरकृष्णविरचिता साङ्ख्यकारिका == <poem> दु:खत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥ <br> दृष्टवदानुश्रविक: स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्त: । तद्विपरीत: श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ २ ॥ <br> मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष: ॥ ३ ॥ <br> दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धि: प्रमाणाद्धि ॥ ४ ॥ <br> प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं त्रिविधमनुमानमाख्यातम् । तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनं तु ॥। ५ ॥ <br> सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् । तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥ ६ ॥ <br> अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् । सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ ७ ॥ <br> सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात् कार्यतस्तदुपलब्धे: । महदादि तच्च कार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपं च ॥ ८ ॥ <br> असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥ ९ ॥ <br> हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिंङ्गम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ १० ॥ <br> त्रिगुणमविवेकि विषय: सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि । व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ॥ ११ ॥ <br> प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका: प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्था: । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणा: ॥ १२ ॥ <br> सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रज: । गुरु वरणकमेव तम: प्रदीपवच्चार्थतो वृत्ति: ॥ १३ ॥ <br> अविवेक्यादे: सिद्धिस्त्रैगुण्यात् तद्विपर्ययाभावात् । कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम् ॥ १४ ॥<br> भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तित: प्रवृत्तेश्च । कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥ १५ ॥<br> कारणमस्त्यव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणत: समुदयाच्च । परिणामत: सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ॥ १६ ॥ <br> संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्यादधिष्ठानात् । पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १७ ॥ <br> जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च । पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥ <br> तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वमकर्तृभावश्च ॥ १९ ॥<br> तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीन: ॥ २० ॥ <br> पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्ग: ॥ २१ ॥ <br> प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशक: । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्चभूतानि ॥ २२ ॥ <br> अध्यवसायो बुद्धिर्धर्मो ज्ञानं विराग ऐश्वर्यम् । सात्त्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥ २३ ॥ <br> अभिमानोऽहंकार: तस्माद्विविध: प्रवर्तते सर्ग: । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥ <br> सात्त्विक एकादशक: प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्र: स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ २५ ॥ <br> बुद्धीन्द्रियाणि चक्षु:श्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहु: ॥ २६ ॥ <br> उभयात्मकमत्र मन: सङ्कल्पमिन्द्रियं च साधर्म्यात् । गुणपरिणामविशेषान्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥ <br> रूपादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति: । वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥ २८ ॥ <br> स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या । सामान्यकरणवृत्ति: प्राणाद्या वायव: पञ्च ॥ २९ ॥ <br> युगपच्चतुष्टयस्य तु वृत्ति: क्रमशश्च तस्य निर्दिष्टा । दृष्टे तथाप्यदृष्टे त्रयस्य् तत्पूर्विका वृत्ति: ॥ ३० ॥ <br> स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥ <br> करणं त्रयोदशविधं तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥ ३२ ॥<br> अन्त:करणं त्रिविधं दशधा बाह्यं त्रयस्य विषयाख्यम् । साम्प्रतकालं बाह्यं त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम् ॥ ३३ ॥ <br> बुद्धिन्द्रियाणि तेषां पञ्च विशेषाविशेषविषयाणि । वाग्भवति शब्दविषया शेषाणि तु पञ्चविषयाणि ॥ ३४ ॥ <br> सान्त:करणा बुद्धि: सर्वं विषयमवगाहते यस्मात् । तस्मात् त्रिविधं करणं द्वारि द्वाराणि शेषाणि ॥ ३५ ॥ <br> एते प्रदीपकल्पा: परस्परविलक्षणा गुणविशेषा: । कृत्स्नं पुरुषस्यार्थं प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥ ३६ ॥<br> सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धि: । सैव च विशिनष्टि पुन: प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥ ३७ ॥ <br> तन्मात्राण्यविशेषास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चभ्य: । एते स्मृता विशेषा: शन्ता घोराश्च मूढाश्च ॥ ३८ ॥ <br> सूक्ष्मा मातापितृजा: सह प्रभूतैस्त्रिधा विशेषा: स्यु: । सूक्ष्मास्तेषां नियता मातापितृजा निवर्तन्ते ॥ ३९ ॥ <br> पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥ ४० ॥ <br> चित्रं यथाऽऽश्रयमृते स्थाण्वादिभ्यो विना यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ ४१ ॥ <br> पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥ ४२ ॥ <br> सांसिद्धिकाश्च भावा: प्राकृतिका वैकृताश्च धर्माद्या: । दृष्टा: करणाश्रयिण: कार्याश्रयिणश्च कललाद्या: ॥ ४३ ॥ <br> धर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद् भवत्यधर्मेण । ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्ध: ॥ ४४ ॥ <br> वैराग्यात् प्रकृतिलय: संसारो भवति राजसाद् रागात् । ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यास: ॥ ४५ ॥ <br> एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्य: । गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत् ॥ ४६ ॥ <br> पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् । अष्टाविंशतिभेदा तुष्टिर्नवधाऽष्टधा सिद्धि: ॥ ४७ ॥ <br> भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोह: । तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्र: ॥ ४८ ॥ <br> एकादशेन्द्रियवधा: सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनाम् ॥ ४९ ॥ <br> आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्या: । बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमता: ॥ ५० ॥ <br> ऊह: शब्दोऽध्ययनं दु:खविघातास्त्रय: सुहृत्प्राप्ति: । दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धे: पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविध: ॥ ५१ ॥ <br> न विना भावैर्लिङ्गं न विना लिङ्गेन भावनिर्वृत्ति: । लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविध: प्रवर्तते सर्ग: ॥ ५२ ॥ <br> अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति । मानुषकश्चैकविध: समासतो भौतिक: सर्ग: ॥ ५३ ॥<br> उर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलत: सर्ग: । मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त: ॥ ५४ ॥ <br> तत्र जरामरणकृतं दु:खं प्राप्नोति चेतन: पुरुष: । लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दु:खं स्वभावेन ॥ ५५ ॥ <br> इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्त: । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भ: ॥ ५६ ॥ <br> वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्ति: प्रधानस्य ॥ ५७ ॥ <br> औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोक: । पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥ <br> रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् । पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृति: ॥ ५९ ॥ <br> नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिण: पुंस: । गुणवत्यगुणस्य सत: तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥ ६० ॥<br> प्रकृते: सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति । या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥ ६१ ॥ <br> तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यते नापि संसरति कञ्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृति: ॥ ६२ ॥ <br> रूपै: सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृति: । सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥ <br> एवं तत्वाभ्यास्यान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ ६४ ॥ <br> तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् । प्रकृतिं पश्यति पुरुष: प्रेक्षकवदवस्थित: स्वस्थ: ॥ ६५ ॥ <br> रङ्गस्थ इत्युपेक्षक एको दृष्टाहमित्युपरमत्यन्या । सति संयोगेऽपि तयो: प्रयोजनं नास्ति सर्गस्य ॥ ६६ ॥ <br> सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ । तिष्ठति संस्कारवशाच् चक्रभ्रमिवद् धृतशरीर: ॥ ६७ ॥ <br> प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृतौ । ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ६८ ॥ <br> पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् । स्थित्युत्पत्तिप्रलयाश्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥ ६९ ॥ <br> एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ । आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम् ॥ ७० ॥ <br> शिष्यपरम्परयाऽऽगतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्यादिभि: । संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥ ७१ ॥ <br> सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्था: कृत्स्नस्य षष्टितन्त्रस्य । आख्यायिकाविरहिता: परवादविवर्जिताश्चापि ॥ ७२ ॥ <br> </poem> == बाह्यसूत्राणि == *[https://www.kaggle.com/datasets/sandeepdixit1/sankhya-karika Sankhyakarika Sanskrit, Sanskrit-English, English-Meaning Dataset] [[वर्गः:साङ्ख्यदर्शनम्]] au9iexw5m9cxe9woks4h6rfgxwm2lqx महाभाष्यम्/अष्टमोऽध्यायः/चतुर्थः पादः 0 32493 418571 85776 2026-09-12T07:33:25Z ~2026-49374-19 10736 418571 wikitext text/x-wiki <poem> <M.6.210*> -8-4-1- रषाभ्यां नो णः समानपदे ।। रषाभ्यां णत्वे ऋकारग्रहणम्।। रषाभ्यां णत्वे ऋकारग्रहणं कर्तव्यम्। रषाभ्यां नो णः समानपदे ऋकाराच्चेति वक्तव्यम्। इहापि यथा स्यात्-मातॄणां पितॄणामिति।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्। योऽसावृकारे रेफस्तदाश्रयं णत्वं भविष्यति।। न सिध्यति।। किं कारणम्?।। न हि वर्णैकदेशा वर्णग्रहणेन गृह्यन्ते।। एकदेशे(1) नुडादिषु चोक्तम्।। किमुक्तम्?।। अग्रहणं(2) चेन्नुड्॰्लदेशविनामेष्वृकारग्रहणमिति। तस्माद्गृह्यन्ते(1)।। <M.6.211*> एवमपि न सिध्यति।। किं कारणम्?।। अननन्तरत्वात्। यत्तद्रेफात्परं भक्तेस्तेन व्यवहितत्वान्न प्राप्नोति।। अड्व्यवायेः इत्येवं भविष्यति।। न सिध्यति।। किं कारणम्?।। वर्णैकदेशाः के वर्णग्रहणेन गृह्यन्ते ये व्यपवृक्ता अपि वर्णा भवन्ति। यच्चात्र रेफात्परं भक्तेर्नतत्क्वचिदपि व्यपवृक्तं दृश्यते।। एवं तर्हि योगविभागः करिष्यते-रषाभ्यां नो णः समानपदे। ततो व्यवाये। व्यवाये च रषाभ्यां नो णो भवतीति। तत अट्कुप्वाङ्नुम्भिरिति।। इदमिदानीं किमर्थम्?।। नियमार्थम्-एतैरेवाक्षरसमाम्नायिकैर्व्यवाये नान्यैरिति। अथ वाऽऽचार्यप्रवृत्तिर्ज्ञापयति <M.6.212*> भवति ऋकाराण्णत्वमिति यदयं क्षुभ्नादिषु नृनमनशब्दं पठति।। नैतदस्ति ज्ञापकम्। वृद्ध्यर्थमेतत्स्यात्-नार्नमनिरिति। यत्तर्हि तत्रैव तृप्नोतिशब्दं पठति।। यच्चाऽपि नृनमनशब्दं पठति।। ननु चोक्तंवृद्ध्यर्थमेतत्स्यादिति। बहिरङ्गा वृद्धिरन्तरङ्गं णत्वम्। असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे। अथ वोपरिष्टाद्योगविभागः करिष्यते। (इदमस्ति(1)छन्दस्यृदवग्रहादिति। ऋतः।) ऋतो (उत्तरस्य(2))नो णो भवति। ततः छन्दस्यृवग्रहात्। ऋत इत्येव।। -8-4-2- अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि ।। अड्व्यवाये णत्वेऽन्यव्यवाये प्रतिषेधः।। अड्व्यायेणत्वेऽन्यव्यवाये प्रतिषेधो वक्तव्यः। आदर्शेन। अक्षदर्शेन(3)।। न वाऽन्येन व्यपेतत्वात्(4)।। न वा वक्तव्यः(5)।। किं कारणम्?।। अन्येन व्यपेतत्वात्(4)। अन्येनाऽत्र व्यवायः।। यद्यप्यत्रान्ये व्यवायोऽटाऽपि तु व्यवायोऽस्ति(6)। <M.6.213*> तत्रास्त्यड्व्यवाय(1) इति प्राप्नोति।। अटैव व्यवाये भवति।। किं वक्तव्यमेतत्?।। न हि।। कथमुच्यमानं गंस्यते?।। अड्ग्रहणसार्मथ्यात्। यदिहि यत्राऽटा चाऽन्येन च व्यवायस्तत्र स्यादड्ग्रहणमनर्थकं स्यात्। व्यवाये नो णो भवतीत्येव ब्रूयात्।। अस्त्यन्यदड्ग्रहणस्य प्रयोजनम्।। किम्?।। योऽनिर्दिष्टैरेव व्यवायस्तत्र मा भूत्-कृत्स्नं मृत्स्नेति।। यद्येतावत्प्रयोजनं स्यार्च्छव्यवाये(1) नेत्येव ब्रूयात्।। तत्समुदाये णत्वाऽप्रसिद्धिर्यथान्यत्र।। तत्समुदाये-व्यवायसमुदाये-णत्वस्याऽप्रसिद्धिः-अर्केण अर्घेण। (यथान्यत्र(2))। यथाऽन्यत्रापि व्यवायसमुदाये कार्यं न भवति।। क्वाऽन्यत्र?।। नुम्विसर्जनीयर्शव्यवायेऽपि। निंस्से निंस्स्वेति।। किं पुनः कारणमन्यत्रापि व्यवायसमुदाये कार्यं न भवति?।। प्रत्येकं वाक्यपरिसमाप्तिर्दृष्टेति। तद्यथा-वृद्धिगुणसंज्ञे प्रत्येकं भवतः।। ननु चायमप्यस्ति दृष्टान्तः-समुदाये वाक्यपरिसमाप्तिरिति। तद्यथा गर्गाः शतं दण्ड्यन्तामिति, अर्थिनश्च राजानो हिरण्येन भवन्ति न च प्रत्येकं दण्डयन्ति।। यद्येवमेकेन व्यवाये न प्राप्नोति--किरिणा गिरिणेति।। उभयथापि वाक्यपरिसमाप्तिर्दृश्यते, तद्यथा-गर्गैः सह न भोक्तव्यमिति, प्रत्येकं च न भुज्यते समुदितैश्च।। <M.6.214*> कुव्यवाये हादेशेषु प्रतिषेधः(1)।। कुव्यवाये हादेशेषु प्रतिषेधो वक्तव्यः।। किं प्रयोजनम्?।। प्रयोजनं वृत्रघ्नः स्रुघ्नः(2) प्राघानीति।। (वृत्रघ्नः(3) स्रुघ्नः प्राघानीति प्रयोजनम्)।। हन्तेरत्पूर्वस्येत्यत्पूर्वग्रहणं न कर्तव्यं भवति। ।। नुम्व्यवाये णत्वेऽनुस्वाराऽभावे प्रतिषेधः।। नुम्व्यवाये णत्वेऽनुस्वाराऽभावे प्रतिषेधो वक्तव्यः। प्रेन्वयनम् प्रेन्वनीयम्।। अनागमे च णत्वम्।। अनागमे च णत्वं वक्तव्यम्(4)। तृम्फणम्(5) तृम्फणीयम्(6)।। अनुस्वारव्यवाये वचनात्तु(7) सिद्धम्।। अनुस्वारव्यवाये नो णो भवतीति वक्तव्यम्।। तदनुस्वारग्रहणं कर्तव्यम्? न कर्तव्यम्। क्रियते न्यास एव। नकारेऽनुस्वारः परसवर्णीभूतो निर्दिश्यते।। इहापि तर्हि प्राप्नोति-प्रेन्वनं प्रेन्वनीयम्।। अनुस्वारविशेषणं नुम्ग्रहणं-नुमो योऽनुस्वारःथ्द्य;ति।। इहापि तर्हि न प्राप्नोति-तृम्फणं(6) तृम्फणीयम्।। एवं तर्ह्ययोगवाहानामविशेषेणोपदेशश्चोदितस्तत्राऽनुस्वारे कृतेऽड्व्यवाये इत्येव सिद्धम्।। यद्येवं नार्थो नुम्ग्रहणेन। अनुस्वारे कृतेऽड्व्यवाय इत्येव सिद्धम्।।(अट्कुप्वाङ्) <M.6.215*> -8-4-3- पूर्वपदात्संज्ञायामगः ।। पूर्वपदात्संज्ञायामुत्तरपदग्रहणम्।। पूर्वपदात्संज्ञायामुत्तरपदग्रहणं कर्तव्यम्।। किं प्रयोजनम्?।। तद्धितपूर्वपदस्यथाऽप्रतिषेधार्थम्।। तद्धितस्थस्य पूर्वपदस्थस्य च प्रतिषेधो मा भूत्। खारपायणः, करणप्रियः।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्। पूर्वपदमुत्तरपदमिति संबन्धिशब्दावेतौ। सति पूर्वपदे उत्तरपदं भवति, सति चोत्तरपदे पूर्वपदं भवति। तत्र सम्बन्धादेतदवगन्तव्यं-यत्प्रति पूर्वपदमित्येतद्भवति तत्स्थस्य नियम इति।। किं च प्रत्येतद्भवति?।। उत्तरपदं प्रति।। संज्ञायां नियमवचनेऽगप्रतिषेधान्नियमप्रतिषेधः।। संज्ञायां नियमवचनेऽगप्रतिषेधान्नियमस्याऽयं प्रतिषेधो विज्ञायते-अग इति।। तत्र को दोषः?।। तत्र नित्यं णत्वप्रसङ्गः।। तत्र पूर्वेण संज्ञायां चाऽसंज्ञायां च नित्यं णत्वं प्राप्नोति।। योगविभागात्सिद्धम्(1)।। योगविभागः करिष्यते-पूर्वपदात्संज्ञायाम्। ततः अगः। गान्तात्पूर्वपदाद्या च यावती च(2) णत्वप्राप्तिस्तस्याः सर्वस्याः प्रतिषेधः।। <M.6.216*> अप्रतिषेधो वा यथा सर्वनामसंज्ञायाम्।। न वाऽर्थः प्रतिषेधेन।। णत्वं कस्मान्न भवति?।। यथा सर्वनामसंज्ञायाम्। उक्तं च सर्वनामसञ्ञ्ज्ञायां(1) सर्वनामसंज्ञायां निपातनाण्णत्वाभावः इति।। यथा पुनस्तत्र निपातनं क्रियते-सर्वादीनि सर्वनामानि इति, इहेदानीं किं निपातनम्?।। इहापि निपातनमस्ति।। किम्?।। अणृगयनादिभ्य इति।। नैव वा पुनरत्र णत्वं प्राप्नोति।। किं कारणम्?।। समानपद इत्युच्यते, न चैतत्समानपदम्।। समासे कृते समानपदम्।। समानपदमेव(2) यन्नित्यम्। न चैतन्नित्यं समानपदमेव।। किं वक्तव्यमेतत्?।। न हि।। कथमनुच्यमानं गंस्यते?।। समानग्रहणसार्मथ्यात्। यदि हि यत्समानं चाऽसमानं च तत्र स्यात्समानग्रहणमनर्थकं स्यात्।। (पूर्वपदात्संज्ञायामगः)।। -8-4-6- विभाषौषधिवनस्पतिभ्यः ।। व्द्यक्षरत्र्यक्षरेभ्यः(3)।। व्द्यक्षरत्र्यक्षरेभ्य इति वक्तव्यम्। इह मा भूत्-देवदारुवनम्।। इरिकादिभ्यः प्रतिषेधः(3) ।। इरिकादिभ्यः प्रतिषेधो वक्तव्यः। इरिकावनम्। तिमिरवनम्।। (विभाषौषधिवन)। -8-4-7- अह्नोऽदन्तात् ।। अदन्ताददन्तस्य(3)।। अदन्ताददन्तस्येति वक्तव्यम्। इह मा भूत्-दीर्घाह्नी शरदिति।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम् । नैषाऽहञ्ञ्छब्दात्षष्ठी।। का तर्हि?।। अह्नशब्दात्प्रथमा। पूर्वसूत्रनिर्देशश्च(1)।। अथ वा युवादिषु पाठः करिष्यते।। (अह्नोऽदन्तात्)।। <M.6.217*> -8-4-8- वाहनमाहितात् ।।आहितोपस्थितयोः(2)।। आहितोपस्थितयोरिति वक्तव्यम्। इहापि यथा स्यात्-इक्षुवाहणम् शरवाहणम्।। अपर आह।। वाहनं वाह्यादिति वक्तव्यम्।। यदा हि गर्गाणां वाहनमपविद्धं तिष्ठति तदा मा भूत्गर्गवाहनमिति(3)।। (वाहनमाहितात्)। -8-4-10- वा भावकरणयोः ।। वाप्रकरणे गिरिनद्यादीनामुपसङ्ख्यानम्।। वाप्रकरणे गिरिनद्यादीनामुपसङ्ख्यानं कर्तव्यम्। गिरिणदी गिरिनदी। चक्रणितम्बा चक्रनितम्बा। -8-4-11- प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु च ।। प्रातिदिकान्तस्य णत्वे समासान्तग्रहणमसमासान्तप्रतिषेधार्थम्।। प्रातिपदिकान्तस्य णत्वे समासान्तग्रहणं कर्तव्यम्।। किं प्रयोजनम्?।। असमासान्तप्रतिषेधार्थम्। असमासान्तस्य मा भूत्-गर्गभगिनी <M.6.218*> दक्षभगिनीति।। न वा भवति-गर्गभगिणीति?।। भवति यदैतद्वाक्यं गर्गाणां भगो गर्गभगः,गर्गभगोऽस्याऽस्तीति। यदा त्वेतद्वाक्यं भवतिगर्गाणां भगिनी गर्गभगिनीति, तदा न भवितव्यं, तदा मा भूदिति(1)।। यदि समासान्तग्रहणं क्रियते माषवापिणी व्रीहिवापिणीत्यत्र(1) न प्राप्नोति।। लिङ्गविशिष्टग्रहणे चोक्तम्।। (लिङ्गविशिष्टग्रहणे चोक्तम्(2))।। किमुक्तम्?।। गतिकारकोपपदानां कृदि्भस्सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेरिति।। तत्र युवादिप्रतिषेधः।। तत्र युवादीनां प्रतिषेधो वक्तव्यः। आर्ययूना क्षत्रिययूना। प्रपक्वानि परिपक्वानि। दीर्घाह्नी शरदिति।। -8-4-13- कुमति च अथेह कथं भवितव्यं-माषकुम्भवापेण व्रीहिकुम्भवापेणेति, नित्यं णत्वेन भवितव्यमाहोस्विद्विभाषया(3)?।। यदा तावदेतद्वाक्यं भवति-- कुम्भस्य वापः कुम्भवापः, माषाणां कुम्भवापो माषकुम्भवाप इति, <M.6.219*> तदा नित्यं णत्वेन भवितव्यम्। यदा त्वेतद्वाक्यं भवति,-माषाणां कुम्भो माषकुम्भः, माषकुम्भस्य वापो माषकुम्भवाप इति,-तदा विभाषया भवितव्यम्।। -8-4-14- उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य असमासग्रहणं किमर्थम्?।। समास इति वर्त्तते, असमासेऽपि यथा स्यात्-प्रणमति परिणमति।। क्व पुनः समासग्रहणं प्रकृतम्?।। पूर्वपदात्संज्ञायामगः इति।। कथं पुनस्तेन समासग्रहणं शक्यं विज्ञातुम्?।। पूर्वपदग्रहणसार्मथ्यात्। समास एवैतद्भवति पूर्वपदमुत्तरपदमिति।। अथाऽपिग्रहणं किमर्थम्?।। समासेऽपि यथा स्यात्-प्रणामकः। परिणामकः। यदि तर्हि समासे चाऽसमासे चेष्यते नार्थोऽसमासेऽपिग्रहणेन। निवृत्तं पूर्वपदादिति। अविशेषेणोपसर्गाण्णत्वं वक्ष्यामि।। समासे नियमान्न प्राप्नोति।। असिद्धमुपसर्गाण्णत्वं, तस्याऽसिद्धत्वान्नियमो न भविष्यति।। एवं तर्हि सिद्धे सति यदसमासेऽपिग्रहणं करोति तज्ज्ञापयत्याचार्यो न योगो योगेऽसिद्धः।। किं तर्हि?।। प्रकरणे प्रकरणमसिद्धमिति।। किमेतस्य ज्ञापने प्रयोजनम्?।। यत्तदुक्तं-निष्कृतं निष्पीतमित्यत्र सत्वस्याऽसिद्धत्वात् षत्वं न प्राप्नोतीति, न स दोषो भवति।। णोपदेशं प्रत्युपसर्गाभावादनिर्देशः। (णोपदेशं प्रत्यु(1)पसर्गाभावादनिर्देशः) अगमको निर्देशोऽनिर्देशः। यत्क्रियायुक्तास्तं प्रति गत्युपसर्गसंज्ञे भवतो, न च णोपदेशं प्रति क्रियायोगः।। एवं तर्ह्याहाऽयमुपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्येति, न च णोपदेशं प्रत्युपसर्गोऽस्ति, तत्र वचनाद्भविष्यति।। वचनप्रामाण्यादिति चेत्पदलोपे प्रतिषेधः।। (वचनप्रामाण्यादिति(1) चेत्पदलोपे प्रतिषेधो) वक्तव्यः। प्रगता नायका अस्माद्ग्रामात्-प्रनायको ग्राम इति।। सिद्धं तु यं प्रत्युपसर्गस्तत्स्थस्येति वचनात्।। सिद्धमेतत्।। कथम्?।। (यं प्रत्युपसर्गस्तत्स्थस्येति(1) वचनात्)। यं प्रत्युपसर्गस्तत्स्थस्य(2) णो भवतीति वक्तव्यम्।। सिद्ध्यति। सूत्रं तर्हि भिद्यते।। यथान्यासमेवाऽस्तु।। ननु चोक्तं णोपदेशं प्रत्युपसर्गाऽभावादनिर्देशःथ्द्य;ति।। नैषः दोषः। णोपदेश(3) इति-नैवं विज्ञायते-ण उपदेशः णोपदेशः, णोपदेशस्येति।। कथं(4) तर्हि?।। ण उपदेशोऽस्य सोऽयं णोपदेशः, णोपदेशस्येति।। -8-4-15- हिनुमीना ।। हिनुमीनाग्रहणे विकृतस्योपसङ्ख्यानम्।। हिनुमीनाग्रहणे विकृतस्योपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्। प्रहिणोति प्रमीणीते।। वचनाद्भविष्यति।। अस्ति वचने प्रयोजनम्।। किम्?।। प्रहिणुतः प्रमीणाति।। सिद्धमचः स्थानिवत्त्वात्।। सिद्धमेतत्।। कथम्?।। अचः स्थानिवत्त्वात्। स्थानिवद्भावादत्र णत्वं भविष्यति।। प्रतिषिध्यतेऽत्र स्थानिवद्भावः पूर्वत्रासिद्धे न स्थानिवदिति।। दोषा एवैते तस्याः परिभाषायाः-तस्य दोषः संयोगादिलोपलत्वणत्वेष्विति।। (हिनुमीना)। -8-4-16- आनि लोट् लोडिति किमर्थम्?।। प्रहिमानि कुलानि, प्रवपानि मांसानि।। आनिलोड्ग्रहणानर्थक्यमर्थवद्ग्रहणात्।। आनिलोड्ग्रहणमनर्थकम्।। किं कारणम्?।। अर्थवद्ग्रहणात्। अर्थवत आनिशब्दस्य ग्रहणं, नैषोऽर्थवान्। ।। अनुपसर्गाद्वा।। अथ वा यत्क्रियायुक्तास्तं प्रति गत्युपसर्गसंज्ञे भवतो, न चैत मानिशब्दं प्रति क्रियायोगः।। इहापि तर्हि न प्राप्नोति-प्रयाणि, परियाणीति, अत्रापि नाऽऽनिशब्दं प्रति क्रियायोगः।। इहापि तर्हि न प्राप्नोति-प्रयाणि, परियाणीति, अत्रापि नाऽऽनिशब्दं प्रति क्रियायोगः।। आनिशब्दं प्रत्यत्र क्रियायोगः।। कथम्?।। यत्क्रियायुक्ता(1) इति-नैवं विज्ञायते यस्य क्रिया यत्क्रिया, यत्क्रियायुक्तास्तं प्रति गत्युपसर्गसंज्ञे भवत इति।। कथं तर्हि?।। या क्रिया यत्क्रिया, यत्क्रियायुक्तास्तं प्रति गत्युपसर्गसंज्ञे भवत इति।। -8-4-17- नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च ।। नेर्गदादिषु अड्व्यवाय उपसङ्ख्यानम्(1)।। नेर्गदादिष्वड्व्यवाय उपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्। प्रण्यगदत्। परिण्यगदत्।।आङा(1) च।। आङा चेति वक्तव्यम्। प्रण्यागदत्। ननु चाऽयमड् गदादिभक्तो गदादिग्रहणेन ग्राहिष्यते।। न सिध्यति।। अङ्गस्याऽडुच्यते, विकरणान्तं चाऽङ्गम्। सोऽसौ सङ्घातभक्तोऽशक्यो गदादिग्रहणेन ग्रहीतुम्।। एवं तर्ह्यड्व्यवाय इति वर्त्तते।। क्व प्रकृतम्?।। अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपीति।। तद्वैकार्यिविशेषणं निमित्तविशेषणेन चेहार्थः।। तत्रापि निमित्तविशेषणमेव।। 8-4-19- अनितेः अन्तः ।। अन्तग्रहणं किमर्थम्?।। अनितेरन्तग्रहणं संबुद्ध्यर्थम्।। अनितेरन्तग्रहणं क्रियते।। किं प्रयोजनम्?।। संबुद्ध्यर्थम् । प्राण् । अपर आह -- अनितेरन्तः पदान्तस्य ।। अनितेरन्तग्रहणं क्रियते, पदान्तस्य नेति प्रतिषेधः प्राप्नोति तद्वाधनार्थम् ।। यो वा तस्मादनन्तरः।। अथ वा --अयमन्तशब्दोऽस्त्येवाऽवयववाची । तद्यथा--वस्रान्तो वसनान्त इति । अस्ति सामीप्ये वर्त्तते। तद्यथा--उदकान्तं गतः । उदकसमीपं गत इति गम्यते । तद्यः सामीप्ये वर्त्तते तस्य ग्रहणं विज्ञायते अनितेः समीपे यो रेफस्तस्मान्नस्य यथा स्यात्--प्राणितीति । इह मा भूत् --पर्यनितीति। -8-4-20- अन्तः अनितेः ।। अन्तग्रहणं किमर्थम्?।। अनितेरन्तग्रहणं संबुद्ध्यर्थम्।। अनितेरन्तग्रहणं क्रियते।। किं प्रयोजनम्?।। संबुद्ध्यर्थम् । प्राण् । अपर आह -- अनितेरन्तः पदान्तस्य ।। अनितेरन्तग्रहणं क्रियते, पदान्तस्य नेति प्रतिषेधः प्राप्नोति तद्वाधनार्थम् ।। यो वा तस्मादनन्तरः।। अथ वा --अयमन्तशब्दोऽस्त्येवाऽवयववाची । तद्यथा--वस्रान्तो वसनान्त इति । अस्ति सामीप्ये वर्त्तते। तद्यथा--उदकान्तं गतः । उदकसमीपं गत इति गम्यते । तद्यः सामीप्ये वर्त्तते तस्य ग्रहणं विज्ञायते अनितेः समीपे यो रेफस्तस्मान्नस्य यथा स्यात्--प्राणितीति । इह मा भूत् --पर्यनितीति। -8-4-21- उभौ साभ्यासस्य ।। साभ्यासस्य द्वयोरिष्टम्।। साभ्यासस्य द्वयोर्णत्वमिष्यते, प्राणिणिषति।। (उभौ साभ्यासस्य)।। <M.6.224*> -8-4-22- हन्तेरत्पूर्वस्य हन्तेरत्पूर्वस्येति किमर्थम्?।। प्रघ्नन्ति परिघ्नन्ति।। हन्तेत्पूर्वस्य वचने उक्तम्।। (हन्तेरत्पूर्वस्यं वचने उक्तम्(1))। किमुक्तम्? ।। कुव्यवाये हादेशेषु प्रतिषेध इति।।(हन्तेरत्पूर्वस्य)।। -8-4-28- उपसर्गादनोत्परः कथमिदं विज्ञायते-ओकारात्परः-ओत्परः, न ओत्परोऽनोत्पर इति, आहो स्विदोकारः परोरमात्सोऽयमोत्परः, न ओत्परोऽनोत्पर इति?।। किं चातः?।। यदि विज्ञायते(1) ओकारात्परः ओत्परः, न ओत्परोऽनोत्पर इति,- प्र नो मुञ्चतम्-अत्रापि प्राप्नोति। अथ विज्ञायते-ओकारः परोऽस्मात्सोऽयमोत्परः, न ओत्परोऽनोत्पर इति,-प्राणो वनिर्देवकृता,-अत्र(2) न प्राप्नोति।। उभयथा च प्रक्रमे दोषो भवति। प्र नः मुञ्चतम्-प्र नो मुञ्चतम्। प्र उ नः--प्रोनः।। भाविन्यप्योति नेष्यते।। भाविन्यप्योकारे णत्वं नेष्यते।। एवं तर्ह्युपसर्गाद्बहुलमिति वक्तव्यम्।। (उपसर्गादनोत्परः)।। -8-4-29- कृत्यचः ।। कृत्स्थस्य णत्वे निर्विण्णस्योपसङ्ख्यानम्।। कृत्स्थस्य णत्वे निर्विण्णस्योपसङ्ख्यानं कर्तव्यम्। निर्विण्णोऽहमनेन वासेन।। (कृत्यचः)।। -8-4-30- णेर्विभाषा ।।णेर्विभाषायां(1) साधनव्यवाये उपसङ्ख्यानम्।। णेर्विभाषायां साधनव्यवाये उपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्। प्राप्यमाणं प्राप्यमानम्।। तद्विधानात्सिद्धम्(2)।। (तद्विधानात्सिद्धम्(1))। विहितविशेषणं णिग्रहणंण्यन्ताद्यो विहितःथ्द्य;ति।। अडधिकाराद्वा।। अथ वाऽड्व्यवाय इति वर्तते।। -8-4-32- इजादेः सनुमः किमर्थमिदमुच्यते न कृत्यच इत्येव सिद्धम्? ।। नियमार्थोयमारम्भः(2)।। (नियमार्थोऽयमारम्भः(1))। इजादेरेव च सनुम्कान्नान्यस्मात्सनुम्कादिति। क्व मा भूत्?।। प्रमङ्कनं परिमङ्कनम्।। सनुमो णत्वेऽवधारणाऽप्रसिद्धिर्विधेयभावात्।। सनुमो णत्वेऽवधारणस्याऽप्राप्तिः(1)।। किं कारणम्?।। विधेयभावात्।। कैर्मथ्यान्नियमो भवति?।। विधेयं नास्तीति कृत्वा।। इह चाऽस्ति विधेयम्।। किम्?।। ण्यन्ताद्विभाषा प्राप्ता तत्र नित्यं णत्वं विधेयम्।। तत्राऽपूर्वो विधिरस्तु नियमोऽस्त्विति, अपूर्वो विधिर्भविष्यति न नियमः।। सिद्धं तु प्रतिषेधाधिकारे सनुम्ग्रहणात्।। सिद्धमेतत्।। कथम्?।। प्रतिषेधाधिकारे सनुम्ग्रहणात्। प्रतिषेधाधिकारे सनुम्ग्रहणं कर्त्तव्यं न भाभूपूकमिगमिप्यायीवेपिसनुमामिति।। इहापि तर्हि न प्राप्नोति-प्रेङ्खणीयम्(2)। प्रेङ्खणम्।। कृत्स्थस्य च णत्वे इजादेः सनुमो ग्रहणम्।। कृत्स्थस्य च णत्वे इजादेः सनुमो ग्रहणं कर्त्तव्यम्।। सिध्यति। सूत्रं तर्हि भिद्यते।। यथान्यासमेवास्तु।। ननु चोक्तं-सनुमो णत्वेऽवधारणा(1)प्रसिद्धिर्विधेयभावादिति।। नैषः दोषः। हल इति वर्त्तते।। क्व प्रकृतम्?।। हलश्चेजुपधादिति।। तद्वै तत्रादि विशेषणमन्तविशेषणेन चेहार्थः।। कथं पुनर्ज्ञायते-तत्रादिविशेषणमिति?।। इजुपधादित्युच्यते तत्र नाऽर्थोन्तविशेषणेन।। तत्रादिविशेषणं सदिहाऽन्तविशेषण भविष्यति।। कथम्?।। इजादेरित्युच्यते तत्र नाऽर्थ आदिविशेषणेन।। अथ वा इजादेः सनुम इत्यत्र णेर्विभाषेत्येतदनुवर्त्तिष्यते।। -8-4-34- न भाभूपूकमिगगमिप्यायीवेपाम् भादिषु पूञ्ञ्ग्रहणम् ।। भादिषु पूञ्ञ्ग्रहणं कर्त्तव्यम्। इह माभूत्--प्रपवणं सोमस्येति।। ण्यन्तस्य चोपसङ्ख्यानम्।। ण्यन्तस्य चोपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्।। किं पूञ्ञ् एव ?।। नेत्याह ।। अविशेषेण ।। प्रभापनं परिभापनम्।। -8-4-35- षात्पदान्तात् ।। षात्पदादिपरवचनम्।। षात्पदादिपरग्रहणं कर्त्तव्यम्। इहैव यथा स्यात्-निष्पानं दुष्पानम्। इह मा भूत्-सुसर्पिष्केण(2) सयजुष्केण(3)।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्। नैवं विज्ञायते-पदस्यान्तः पदान्तः, पदान्तादिति।। कथं तर्हि?।। पदे अन्तः पदान्तः, पदान्तादिति।। -8-4-36- नशेः षान्तस्य ।। नशेरशः।। नशेरश इति वक्तव्यम्। इहापि यथा स्यात्- प्रनङ्क्ष्यति। परिनङ्क्ष्यति।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्। इह पुनर्नशेः(4) ष इतीयता सिद्धं, सोऽयमेवं सिद्धे सति यदन्तग्रहणं करोति तस्यैतत्प्रयोजनं षान्तभूतपूर्वस्यापि यथा स्यात्।।(नशेः षान्तस्य)।। <M.6.228*> -8-4-38- पदव्यवायेऽपि ।। पदव्यवायेऽतद्धिते।। पदव्यवायेऽतद्धित इति वक्तव्यम्। इह मा भूत्-आर्द्रगोमयेण शुष्कगोमयेण।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्। नैवं विज्ञायते पदेन व्यवायः पदव्यवायः,(1) पदव्यवायेःथ्द्य;ति।। कथं तर्हि?।। पदे व्यवायः पदव्यवायः, पदव्यवाय इति।। (पदव्यवायेऽपि)।। -8-4-39- क्षुभ्नादिषु च ।। अविहितलक्षणो(2) णत्वप्रतिषेधः क्षुभ्नादिषु।। (अविहितलक्षणो(3) णत्वप्रतिषेधः क्षुभ्नादिषु) द्रष्टव्यः।। (क्षुभ्नादिषु च)।। -8-4-40- स्तोः श्चुना श्चुः किमर्थं तृतीयानिर्देशः क्रियते न श्चावित्येवोच्येत?।। आनन्तर्यमात्रे श्चुत्वं यथा स्यात्-यज्ञः राज्ञः याच्ञ्ञा।। अथ सङ्ख्यातानुदेशः कस्मान्न भवति?।। आचार्यप्रवृत्तिर्ज्ञापयति-सङ्ख्यातानुदेशो नेति यदयं(4) शात्प्रतिषेधं शास्ति।। -8-4-41- ष्टुना ष्टुः किमर्थं तृतीयानिर्देशः क्रियते न ष्टावित्येवोच्येत?।। आनन्तर्यमात्रे ष्टुत्वं यथास्यात्-पेष्टा लेढा(1)।। अथ सङ्ख्यातानुदेशः कस्मान्न भवति?।। आचार्यप्रवृत्तिर्ज्ञापयति नेह सङ्ख्यातानुदेशो भवतीति, यदयं तोःषीति प्रतिषेधं शास्ति।। (ष्टुना ष्टुः)।। -8-4-42- न पदान्ताट्टोरनाम् अनामिति किमर्थम्(2)?।। षण्णां भवति काश्यपः।। अत्यल्पमिदमुच्यते--अनामिति।। अनाम्नवतिनगरीणां चेति वक्तव्यम्।। षण्णाम्। षण्णवतिः। षण्णगर्यः(3)।। (न पदान्ताट्टोरनाम्।) -8-4-45- यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ।। यरोऽनुनासिके प्रत्यये भाषायां नित्यवचनम्।। यरोऽनुनासिके प्रत्यये भाषायां नित्यमिति च वक्तव्यम्। वाङ्मयम्। त्वङ्मयमिति।। -8-4-47- अनचि च ।। द्विर्वचने यणो मयः।। द्विर्वचने यणो मय इति वक्तव्यम्।। किमुदाहरणम्?।। यदि यण इति पञ्चमी मय इति षष्ठी उल्क्का वल्म्मीकमित्युदाहरणम्।। अथ मय इति पञ्चमी यण इति षष्ठी दध्य्यत्र मध्व्यत्रेत्युदाहरणम्?।।शरःखयः।। शरःखय इति वक्तव्यम्।। किमुदाहरणम्?।। यदिशर इति पञ्जमीखयःथ्द्य;ति षष्ठी स्थ्थाली स्थ्थाता इत्युदाहरणम्। अथ खय इति पञ्जमी शर इति षष्ठी स्थ्थाली स्थ्थाता इत्युदाहरणम्। अथ खय इति पञ्चमी शर इति षष्ठी, वत्स्स(र): क्ष्षीरम् अपस्सरा इत्युदाहरणम्। ।। अवसाने च।। अवसाने च द्वे भवत इति वक्तव्यम्। वाक्क्। वाक्। त्वक्क् त्वक्। स्रुक्क्स्रुक्।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्।। नायं प्रसज्यप्रतिषेधः-अचि नेति।। किं तर्हि?।। पर्युदासोऽयं यदन्यदच इति।। -8-4-48- नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य ।।नादिन्याक्रोशे पुत्रस्येति तत्परे च।। नादिन्याक्रोशे पुत्रस्येत्यत्र तत्परे चेति वक्तव्यम्। पुत्रपुत्रादिनि(1)।। वा हतजग्धपरे च।। वा हतजग्धपरे इति वक्तव्यम्। पुत्रहती। पुत्र्रहती। पुत्रजग्धी। पुत्र्रजग्धी। ।। चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेः।। चयो द्वितीया भवन्ति शरि परतः पौष्करसादेराचार्यस्य मतेन। वथ्सः(2)। ख्षीरम्(3)। अफ्सराः।(नदिन्याक्रोशे पुत्रस्य)। -8-4-54- अभ्यासे चर्च प्रकृतिचरां प्रकृतिचरो भवन्ति। चिचीषति। प्रकृतिजशां प्रकृतिजशश्च भवन्ति। जिजनिषति। बुबुधे। ददौ।। (अभ्यासे चर्च)।। -8-4-61- उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ।। उदः(1) पूर्वत्वे स्कन्देश्छन्दस्युपसङ्ख्यानम्।। उदः पूर्वत्वे स्कन्देश्छन्दस्युपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्।। अघ्न्ये दूरमुत्कन्द(2)।। रोगे च(1)।। रोगे चेति वक्तव्यम्। उत्कन्दको रोगः।। -8-4-63- शश्छोऽटि ।। छत्वममि(तच्छ्लोकेन तच्छमश्रुणेति प्रयोजनम्)।। छत्वममीति वक्तव्यम्।। किं प्रयोजनम्?।। तच्छ्लोकेन तच्छ्मश्रुणेति।। -8-4-65- झरो झरि सवर्णे सवर्णग्रहणं किमर्थम्।। झरो झरि सवर्णग्रहणं समसङ्ख्यप्रतिषेधार्थम्।। झरो झरि सवर्णग्रहणं क्रियते।। (किं प्रयोजनम्?)।। समसङ्ख्यप्रतिषेधार्थम्।। सङ्ख्यातानुदेशो मा भूदिति।। किं च स्यात्?।। इह न स्यात्-शिण्ढि पिण्ढि।।(झरो झरि) -8-4-68- अ अ इति(1) किमर्थमिदमुच्यते?।। अकारोऽयमक्षरसमाम्नाये विवृत उपदिष्टस्तस्य संवृतताप्रत्यापत्तिः क्रियते।। किं पुनः कारणं विवृत उपदिश्यते?।। ।। आदेशार्थं सवर्णार्थमकारो विवृतः स्मृतः। आकारस्य तथा ह्रस्वस्तदर्थं पाणिनेर अ।।1।। आदेशार्थं तावत्-वृक्षाभ्याम्। देवदत्ता3। आन्तर्यतो विवृतस्य विवृतो दीर्घप्लुतौ यथा स्याताम्। सवर्णार्थं च-अकारः सवर्णग्रहणेनाऽऽकारमपि यथा गृह्णीयात् । अकारस्य तथा ह्रस्वः। तथा (च) अतिखट्वः अतिमाल इत्यत्र आकारस्य ह्रस्व उच्यमानो विवृतः प्राप्नोति, संवृतः स्यादित्येवमर्था प्रत्यापत्तिः।। अस्ति प्रयोजनमेतत्। किं तर्हीति।। अकारस्य प्रत्यापत्तौ दीर्घप्रतिषेधः।। अकारस्य प्रत्यापत्तौ दीर्घस्य प्रतिषेधो वक्तव्यः।। खटा माला।। नैषः दोषः।। यथैव प्रकृतितः सवर्णग्रहणमेवमादेशतोऽपि भवितव्यं, तत्रान्तर्यतो ह्रस्वस्य ह्रस्वो दीर्घस्य दीर्घो भविष्यति।। आदेशस्य चानण्तावन्न सवर्णग्रहणम्।। आदेशस्य चाऽनण्त्वात्सवर्णानां ग्रहणं न प्राप्नोति।। केषाम्?।। उदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकानाम्। ।। सिद्धं तु तपरनिर्देशात्।। सिद्धमेतत्।। कथम्?।। तपरनिर्देशात्। तपरनिर्देशः कर्तव्यः-अद इति।। अपर आह-।। अकार(स्य)प्रत्यापत्तौ दीर्घप्रतिषेधः।। अकारस्य प्रत्यापत्तौ दीर्घस्य प्रतिषेधो वक्तव्यः। खट्वा माला।। नैषः दोषः।। दीर्घोच्चारणसार्मथ्यान्न भविष्यति।। इदं तर्हि-वृक्षाभ्यां प्लक्षाभ्याम्।। अत्रापि दीर्घवचनसार्मथ्यान्न भविष्यति।। इदं तर्हि-अपि काकः श्येनायते।। ननु चाऽत्रापि दीर्घवचनसार्मथ्यादेव(तत्) न भविष्यति।। अस्त्यन्यदीर्घवचने प्रयोजनम्।। किम्?।। दधीयति मधूयति(1)।। (।। आदेशस्य चानण्त्वात्सवर्णाग्रहणम्।।)।। आदेशस्य चाऽनण्त्वात्सवर्णानां ग्रहणं न प्राप्नोति।। केषाम्?।। उदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकानाम्।। सिद्धं तु तपरनिर्देशात्।। सिद्धमेतत्।। कथम्?।। तपरनिर्देशात्। तपरनिर्देशः कर्तव्यः। अददिति।। एकशेषनिर्देशाद्वा स्वरानुनासिकभिन्नानां(1) भगवतः पाणिनेः(2) सिद्धम्।। एकशेषनिर्देशाद्वा स्वरभिन्नानां भगवतः पाणिनेराचार्यस्य सिद्धम्। एकशेषनिर्देशोऽयम्-अ अ(3)अ इति। इति श्रीमद्भगवत्पतञ्जलि(मुनि)विरचिते व्याकरणमहाभाष्येऽष्टमस्याऽध्यायस्य चतुर्थे पादे प्रथममाह्निकम्।। चतुर्थः पादोऽष्टमोऽध्यायश्च समाप्तः। -9-9-999- </poem> lz155p47znuggzz7eh630k3uuhemtdn पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/३ 104 164938 418564 417006 2026-09-12T01:34:48Z अनुनाद सिंह 1115 418564 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ ॐ रससिद्धेश्वराय नमः श्रीसिंहगुप्तसून्वष्टाङ्गहृदयकर्तृ- श्रीवाग्भटाचार्यकृतः '''रसरत्नसमुच्चयः''' "आयुर्वेदोद्धारक" औषधालयाध्यक्ष वैद्यराज - शंकरलाल हरिशंकर कृत हिन्दीभाषाटीकासहितः खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई<noinclude></noinclude> 3yyzm98eqa78nvw3ls22chy1vylursc पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/४ 104 164939 418565 417007 2026-09-12T01:39:20Z अनुनाद सिंह 1115 418565 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude> संस्करण: मार्च २०१९, संवत् २०७५ मूल्य : ६५० रुपये मात्र । सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा सुरक्षित । Printers & Publishers:<br> Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar<br> Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,<br> Mumbai - 400 004. Web Site : http://www.Khe-shri.com<br> Email : khemraj@vsnl.com<br> Printed by Sanjay Bajaj For M/s.Khemraj Shrikrishnadass<br> Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai-400 004, at<br> their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial<br> Estate, Pune 411 013<noinclude></noinclude> 1g2zch22xzdgpmup0c8moxqxb9hgg5t पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/५ 104 164940 418566 417008 2026-09-12T01:41:49Z अनुनाद सिंह 1115 418566 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude> प्रस्तावना । <poem> संप्रति संसार में विद्या और कला संबन्धी अनेक आविष्कारोंकी धूम मच रही है । पाश्चात्य तथा पौरस्त्य (चीन, जापान आदि) सभी स्वतन्त्र राष्ट्र अपने अपने ज्ञान और धनका सदुपयोग इस विषय में अशान्त परिश्रम और आत्मोत्सर्गके साथ कर रहे हैं। परन्तु विद्या और कलामोंका आय प्रवर्तक, सारे संसारका आदिगुरु भारतवर्ष परतन्त्र होने और राजकीय प्रोत्साहन न मिलनेके कारण अपने प्राचीन गौरवको खोकर पश्चात्पद होरहा है यह बात प्रत्येक सहृदय भारतीयके लिये मर्माविष्ट शल्यके समान है। यद्यपि राष्ट्रीय विद्या और कलाकौशलकी उन्नविके लिय राजाश्रय मुख्य है तथापि जब आजतक के अनुभवसे यह भली भांति सिद्ध हो चुका है कि विदेशी शासकोंसे उसकी आशा करना व्यर्थ है तब केवल स्वावलम्बनही भारतके उत्थानके लिये अमोघ उपाय है । विचार करनेसे प्रतीत होता है कि हमारे प्राचीन भव्य भारतके ध्वंसाव- शेष नव्य भारतमें जिस विविध ज्ञान - कलाकौशलके जीर्णोद्वार पूर्वक विका सकी अत्यधिक आवश्यकता है उसमेंसे आयुर्वेद एक परमावश्यक विषय है । हमारे प्राचीन आयुर्वेदकी उत्तमताके विषयमें किसीको कोई सन्देह हो ही नहीं सकता, क्योंकि पाश्चात्य विद्वानोंने भी समय समय पर उसकी शतमुखसे प्रशंसा की है। हमें इसी पर फूल कर कुप्पा हो जाना भी उचित नहीं क्योंकि वर्तमान समयमें डाक्टरीके समान आयुर्वेद विषयक विकास करते हुए उसे सर्वाधिक सर्वोपयोगी बनानेकी अत्यधिक आवश्यकता है। यह भी निर्विवाद ही है कि हिन्दी जनताको जब तक आयुर्वेदकी उत्तमताका परिचय न दिलाया जायगा तब तक वह उसके प्रति अपनी सहानुभूति अथवा कर्तव्य प्रकट ही नहीं कर सकती। ऐसा होते हुए भी महान शोकके साथ कहना पड़ता है कि इस समय आयुर्वेदोद्धारके सम्बन्धमें जैसा निस्सार प्रयत्न हो रहा है उससे उसकी उपयोगिताका लेश भी लोगों के ध्यानमें नहीं आ सकता, अतः सुचारुरूपसे सुदृढ़ प्रयत्न होनेकी अति शीघ्र आवश्यकता है । सर्व साधारणको स्वशरीररक्षोपयोगी वैद्यक सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करनेके साधन और स्त्रियों को अपने गर्भ व बालकका पालन पोषण एवं गार्हस्थ्य जीवनको उत्तम दशामें लानेके लिय आवश्यक ज्ञान प्राप्त करनेकी सुविधा ओंका प्रबन्ध सबसे प्रथम होना चाहिये। अथवा वैद्यकसंस्था - आयुर्वेदिक पाठशालाओंको स्थापित कर उनमें विद्यार्थियों को अनुभवके साथ पूर्ण शिक्षा देनेका नियम- वद्ध प्रबन्ध हो, आयुर्वेदीय सब प्रकारकी औषधोंका देशमें सर्वत्र प्रचुर प्रचार व्होकर, राजा रङ्क सबको समान रूपसे सुलभ इसके लिए एक विशाल कार्या- </poem><noinclude></noinclude> abtoy8l3rrus37xyid3dmrri5eumpyl 418567 418566 2026-09-12T01:44:30Z अनुनाद सिंह 1115 418567 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude> ::::::::::प्रस्तावना । <poem> संप्रति संसार में विद्या और कला संबन्धी अनेक आविष्कारोंकी धूम मच रही है । पाश्चात्य तथा पौरस्त्य (चीन, जापान आदि) सभी स्वतन्त्र राष्ट्र अपने अपने ज्ञान और धनका सदुपयोग इस विषय में अशान्त परिश्रम और आत्मोत्सर्गके साथ कर रहे हैं। परन्तु विद्या और कलामोंका आय प्रवर्तक, सारे संसारका आदिगुरु भारतवर्ष परतन्त्र होने और राजकीय प्रोत्साहन न मिलनेके कारण अपने प्राचीन गौरवको खोकर पश्चात्पद होरहा है यह बात प्रत्येक सहृदय भारतीयके लिये मर्माविष्ट शल्यके समान है। यद्यपि राष्ट्रीय विद्या और कलाकौशलकी उन्नविके लिय राजाश्रय मुख्य है तथापि जब आजतक के अनुभवसे यह भली भांति सिद्ध हो चुका है कि विदेशी शासकोंसे उसकी आशा करना व्यर्थ है तब केवल स्वावलम्बनही भारतके उत्थानके लिये अमोघ उपाय है । विचार करनेसे प्रतीत होता है कि हमारे प्राचीन भव्य भारतके ध्वंसाव- शेष नव्य भारतमें जिस विविध ज्ञान - कलाकौशलके जीर्णोद्वार पूर्वक विका सकी अत्यधिक आवश्यकता है उसमेंसे आयुर्वेद एक परमावश्यक विषय है । हमारे प्राचीन आयुर्वेदकी उत्तमताके विषयमें किसीको कोई सन्देह हो ही नहीं सकता, क्योंकि पाश्चात्य विद्वानोंने भी समय समय पर उसकी शतमुखसे प्रशंसा की है। हमें इसी पर फूल कर कुप्पा हो जाना भी उचित नहीं क्योंकि वर्तमान समयमें डाक्टरीके समान आयुर्वेद विषयक विकास करते हुए उसे सर्वाधिक सर्वोपयोगी बनानेकी अत्यधिक आवश्यकता है। यह भी निर्विवाद ही है कि हिन्दी जनताको जब तक आयुर्वेदकी उत्तमताका परिचय न दिलाया जायगा तब तक वह उसके प्रति अपनी सहानुभूति अथवा कर्तव्य प्रकट ही नहीं कर सकती। ऐसा होते हुए भी महान शोकके साथ कहना पड़ता है कि इस समय आयुर्वेदोद्धारके सम्बन्धमें जैसा निस्सार प्रयत्न हो रहा है उससे उसकी उपयोगिताका लेश भी लोगों के ध्यानमें नहीं आ सकता, अतः सुचारुरूपसे सुदृढ़ प्रयत्न होनेकी अति शीघ्र आवश्यकता है । सर्व साधारणको स्वशरीररक्षोपयोगी वैद्यक सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करनेके साधन और स्त्रियों को अपने गर्भ व बालकका पालन पोषण एवं गार्हस्थ्य जीवनको उत्तम दशामें लानेके लिय आवश्यक ज्ञान प्राप्त करनेकी सुविधा ओंका प्रबन्ध सबसे प्रथम होना चाहिये। अथवा वैद्यकसंस्था - आयुर्वेदिक पाठशालाओंको स्थापित कर उनमें विद्यार्थियों को अनुभवके साथ पूर्ण शिक्षा देनेका नियम- वद्ध प्रबन्ध हो, आयुर्वेदीय सब प्रकारकी औषधोंका देशमें सर्वत्र प्रचुर प्रचार व्होकर, राजा रङ्क सबको समान रूपसे सुलभ इसके लिए एक विशाल कार्या- </poem><noinclude></noinclude> 2a7yaffi200mo6dy49h22vfgutzlfax 418568 418567 2026-09-12T01:52:08Z अनुनाद सिंह 1115 418568 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude> ::::::प्रस्तावना । <poem> संप्रति संसार में विद्या और कला संबन्धी अनेक आविष्कारोंकी धूम मच रही है । पाश्चात्य तथा पौरस्त्य (चीन, जापान आदि) सभी स्वतन्त्र राष्ट्र अपने अपने ज्ञान और धनका सदुपयोग इस विषय में अशान्त परिश्रम और आत्मोत्सर्गके साथ कर रहे हैं। परन्तु विद्या और कलाओंका आय प्रवर्तक, सारे संसारका आदिगुरु भारतवर्ष परतन्त्र होने और राजकीय प्रोत्साहन न मिलनेके कारण अपने प्राचीन गौरवको खोकर पश्चात्पद होरहा है यह बात प्रत्येक सहृदय भारतीयके लिये मर्माविष्ट शल्यके समान है। यद्यपि राष्ट्रीय विद्या और कलाकौशलकी उन्नति।विके लिय राजाश्रय मुख्य है तथापि जब आजतक के अनुभवसे यह भली भांति सिद्ध हो चुका है कि विदेशी शासकोंसे उसकी आशा करना व्यर्थ है तब केवल स्वावलम्बनही भारतके उत्थानके लिये अमोघ उपाय है । विचार करनेसे प्रतीत होता है कि हमारे प्राचीन भव्य भारतके ध्वंसाव- शेष नव्य भारतमें जिस विविध ज्ञान-कलाकौशलके जीर्णोद्वार पूर्वक विका- सकी अत्यधिक आवश्यकता है उसमेंसे आयुर्वेद एक परमावश्यक विषय है । हमारे प्राचीन आयुर्वेदकी उत्तमताके विषयमें किसीको कोई सन्देह हो ही नहीं सकता, क्योंकि पाश्चात्य विद्वानोंने भी समय समय पर उसकी शतमुखसे प्रशंसा की है। हमें इसी पर फूल कर कुप्पा हो जाना भी उचित नहीं क्योंकि वर्तमान समयमें डाक्टरीके समान आयुर्वेद विषयक विकास करते हुए उसे सर्वाधिक सर्वोपयोगी बनानेकी अत्यधिक आवश्यकता है। यह भी निर्विवाद ही है कि हिन्दी जनताको जब तक आयुर्वेदकी उत्तमताका परिचय न दिलाया जायगा तब तक वह उसके प्रति अपनी सहानुभूति अथवा कर्तव्य प्रकट ही नहीं कर सकती। ऐसा होते हुए भी महान शोकके साथ कहना पड़ता है कि इस समय आयुर्वेदोद्धारके सम्बन्धमें जैसा निस्सार प्रयत्न हो रहा है उससे उसकी उपयोगिताका लेश भी लोगों के ध्यानमें नहीं आ सकता, अतः सुचारुरूपसे सुदृढ़ प्रयत्न होनेकी अति शीघ्र आवश्यकता है । सर्व साधारणको स्वशरीररक्षोपयोगी वैद्यक सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करनेके साधन और स्त्रियों को अपने गर्भ व बालकका पालन पोषण एवं गार्हस्थ्य जीवनको उत्तम दशामें लानेके लिय आवश्यक ज्ञान प्राप्त करनेकी सुविधाओंका प्रबन्ध सबसे प्रथम होना चाहिये। अथवा वैद्यकसंस्था-आयुर्वेदिक पाठशालाओंको स्थापित कर उनमें विद्यार्थियों को अनुभवके साथ पूर्ण शिक्षा देनेका नियम- वद्ध प्रबन्ध हो, आयुर्वेदीय सब प्रकारकी औषधोंका देशमें सर्वत्र प्रचुर प्रचार होकर, राजा रङ्क सबको समान रूपसे सुलभ इसके लिए एक विशाल कार्या- </poem><noinclude></noinclude> jxbhstahdbkpg1l3inn909rl2l69asq पृष्ठम्:रसरत्नसमुच्चयः.pdf/६ 104 164941 418569 417011 2026-09-12T02:04:36Z अनुनाद सिंह 1115 418569 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude> ::::(४) लय खोलकर उसमें उनके निर्माणका विराट् आयोजन करते हुए स्थान स्थान पर उक्त कायालयकी शाखायें इस ढङ्गसे खोली जायँ कि जिससे यत्र- तत्र धार्मिक धनिकों, सभाओं और संयुक्त वाणिज्य समितियों (कम्पनियों) की ओर से जो अंग्रेजी डाक्टरोंकी अध्यक्षतामें औषधोंके दातव्य औषधालय खोले जाते हैं वे विद्वान् वैद्योंके तत्त्वावधान में देशी औषधोंके खोले जायें कि जिनसे " यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् " इस सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति विरुद्ध और धर्मविरुद्ध अभक्ष्य भक्षण और अपेयपानरूप तामसी विदेशी चिकित्सा के क्षणिक और कृत्रिम स्वास्थ्यक दुष्परिणामसे देशी जनता सदाके लिय रोगी अङ्ग्रेजी औषधोंका दास न बनकर सात्विक धर्मानुकूल देशी चिकित्सासे यथार्थ लाभ उठाते हुए सदा के लिये स्वस्थ बनें और साथही देशका धार्मिक और आर्थिक लाभ भी हो। जैन धर्म कि जिसकी मूल भित्ति " अहिंसा परमो धर्मः " इस वचन पर ही है उसके अनेक अनुयायी और शौच, आचार तथा अहिंसाको प्रधान माननेवाले वैदिक धर्मानुयायी अनेक वैष्णवादिभी मद्यमांसादिनिर्मित अंग्रेजी औषधोंका स्वयं निःसङ्कोच व्यवहार करते हुए अन्य दीन अनाथोंके लिये भी डाक्टरोंकी निरीक्षकतामें अङ्ग्रेजी औषधोंके दातव्य औषधालय खोलकर धर्मके बदले अपरिमित अधर्मका सङ्ग्रह कर रहे हैं यह कितने शोक और लज्जाकी बात है यह कहनेकी आवश्यकता नहीं । ऐसी अवस्थामें आयुर्वेद की उन्नति आवश्यक है इसे कौन न मानेगा; क्योंकि सारी देशोन्नतिका मूलाधार यही है इस लेख से भली भांति प्रमाणित हो चुका। परमावश्यक आयुर्वेदका विकास होनेके लिये सर्वप्रथम सबसे अधिक आवश्यकता तत्सम्बन्धी ग्रन्थोंके प्रचुर परिमाणमें प्रकाशित होनेकी है। उनमें से बहुतसे ग्रन्थों के प्रकाशित होजानेपर भी अभी अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थरत्न अप्रकाशित ही हैं । नवीन शोध, कलाकौशल, वाणिज्य, व्यवसाय और विद्यामें सभी यूरोपीय राज्यों की अपेक्षा जो अमेरिका आगे बढ़ा हुआ है और जहां विद्वानों का मत आज सारे संसार में सर्वमान्य हो रहा है, वहांके अग्रगण्य विद्वान् कहते हैं कि “भारतीय प्राचीन वैद्यक शास्त्रानुसार रोगियों का उप- चार किया जाय तो आधुनिक मरणसंख्यामें बहुत बड़ी घटती हो" इसी प्रकार इंग्लैंड और जर्मनीके विद्वान् भी भारतीय वैद्यकको वड़े आदरकी दृष्टिसे देखते हैं। जब कि हमारे देशबन्धु विदेशी टिंक्चर, वाइन आदि औषधोंकी चमक दमकपर मुग्ध होकर भारतीय प्राचीन वैद्यक शास्त्रकी<noinclude></noinclude> awqgvjcmo8wl2d4ggtd334p92s6xoq2 सांख्यकारिका 0 165944 418562 2026-09-11T17:46:53Z अनुनाद सिंह 1115 अनुनाद सिंह इत्यनेन शीर्षकं परिवर्त्य [[सांख्यकारिका]] पृष्ठं [[साङ्ख्यकारिका]] प्रति स्थानान्तरितम्: शीर्षक में गलत वर्तनी 418562 wikitext text/x-wiki #पुनर्निर्दिष्टम् [[साङ्ख्यकारिका]] om2w9x6pwttmqs1sc31p509a0ms5s3o